वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| अध्याय ८१ ] | प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भव आख्यान | ३९९ |
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| रम्भा रूपमवापाग्र्यं वाङ्माधुर्यं च मेनका।<br>कान्तिं विधुरवापाग्र्यां राज्यं राजा पुरूरवाः ॥ ३७<br><br>एवं विधानतो ब्रह्मन्नक्षत्राङ्गो जनार्दनः।<br>पूजितो रूपधारी यैस्तैः प्राप्ता तु सुकामिता ॥ ३८<br><br>एतत् तवोक्तं परमं पवित्रं<br>धन्यं यशस्यं शुभरूपदायि।<br>नक्षत्रपुंसः परमं विधान<br>शृणुष्व पुण्यामिह तीर्थयात्राम् ॥ ३९ | (नक्षत्राङ्ग जनार्दनकी पूजा करके) रम्भाने श्रेष्ठ रूप, मेनकाने वाणीकी मधुरता, चन्द्रने उत्तम कान्ति तथा पुरूरवाने राज्य प्राप्त किया था। [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] ब्रह्मन्! इस प्रकार जिसने नक्षत्राङ्ग-रूपधारी जनार्दनकी पूजा की, उसने अपने मनोरथोंकी भलीभाँति पूर्ति कर ली। मैंने आपसे भगवान् नक्षत्र-पुरुषके परम पवित्र धन देनेवाले, कीर्ति बढ़ानेवाले और सुन्दर रूपको देनेवाले व्रतके विधानका वर्णन कर दिया। अब पवित्र तीर्थयात्राका वर्णन सुनिये॥ ३४—३९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अस्सीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८०॥
इक्यासीवाँ अध्याय
प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भवका आख्यान
| पुलस्त्य उवाच<br><br>इरावतीमनुप्राप्य पुण्यां तामृषिकन्यकाम्।<br>स्नात्वा सम्पूजयामास चैत्राष्टम्यां जनार्दनम् ॥ १<br><br>नक्षत्रपुरुषं चीर्त्वा व्रतं पुण्यप्रदं शुचिः।<br>जगाम स कुरुक्षेत्रं प्रह्लादो दानवेश्वरः ॥ २<br><br>ऐरावतेन मन्त्रेण चक्रतीर्थं सुदर्शनम्।<br>उपामन्त्र्य ततः सस्नौ वेदोक्तविधिना मुने ॥ ३<br><br>उपोष्य क्षणदां भक्त्या पूजयित्वा कुरुध्वजम्।<br>कृतशौचो जगामाथ द्रष्टुं पुरुषकेसरिम् ॥ ४<br><br>स्नात्वा तु देविकायां च नृसिंहं प्रतिपूज्य च।<br>तत्रोष्य रजनीमेकां गोकर्णं दानवो ययौ ॥ ५<br><br>तस्मिन् स्नात्वा तथा प्राचीं पूज्येशं विश्वकर्म्मिणम्।<br>प्राचीने चापरे दैत्यो द्रष्टुं कामेश्वरं ययौ ॥ ६<br><br>तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>द्रष्टुं ययौ च प्रह्लादः पुण्डरीकं महाम्भसि ॥ ७ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) प्रह्लादने परम पवित्र ऋषिकन्या उस इरावती नदीके पास जाकर स्नान किया और चैत्रमासकी अष्टमी तिथिमें जनार्दनकी पूजा की। वहाँ पवित्र पुण्यदायक नक्षत्र-पुरुषके व्रतका अनुष्ठान कर दानवेश्वर प्रह्लाद कुरुक्षेत्र चले गये। मुने! उन्होंने ऐरावत-मन्त्रसे सुदर्शनचक्र तीर्थका आवाहन करके वेद-विहित विधिसे स्नान किया। वहाँ एक रात्रि निवास कर श्रद्धासे कुरुध्वजका पूजन किया और शौचाचारसे शुद्ध होकर नृसिंहका दर्शन करनेके लिये चले गये॥ १—४॥<br><br>दानव (प्रह्लाद)-ने वहाँ देविकामें स्नान कर नृसिंहकी पूजा की और एक रात वहाँ निवासकर गोकर्ण-तीर्थ चले गये। वहाँ प्राची (पूज्य-पूजकके मध्य स्थान)-में स्नान कर पहले उन्होंने विश्वकर्मा भगवान्की पूजा की। उसके बाद दूसरे प्राचीन (परकोटा या चहारदीवारी)-में कामेश्वरका दर्शन करनेके लिये गये। वहाँ स्नान करनेके बाद शंकरभगवान्का दर्शन और पूजनकर प्रह्लाद श्रेष्ठ जलमें स्थित पुण्डरीकका दर्शन करने चले गये। |
| ४०० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८१ | | :--- | :--- |
| तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च संतर्प्य पितृदेवताः।<br>पुण्डरीकं च सम्पूज्य उवास दिवसत्रयम्॥ ८<br><br>विशाखयूपे तदनु दृष्ट्वा देवं तथाजितम्।<br>स्नात्वा तथा कृष्णतीर्थे त्रिरात्रं न्यवसच्छुचिः॥ ९ | वहाँ भी स्नानकर उन्होंने पितरोंका तर्पण और पुण्डरीकका दर्शन-पूजन किया। तीन दिनोंतक वहाँ निवास किया। उसके बाद विशाखयूपमें देव अजितका दर्शनकर उन्होंने कृष्णतीर्थमें स्नान किया और तीन रात्रितक वहाँ भी पवित्रतापूर्वक निवास किया॥ ५–९॥ | | ततो हंसपदे हंसं दृष्ट्वा सम्पूज्य चेश्वरम्।<br>जगामासौ पयोष्णायामखण्डं द्रष्टुमीश्वरम्॥ १०<br><br>स्नात्वा पयोष्ण्याः सलिले पूज्याखण्डं जगत्पतिम्।<br>द्रष्टुं जगाम मतिमान् वितस्तायां कुमारिलम्॥ ११<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य देवेशं बालखिल्यैर्मरीचिपैः।<br>आराध्यमानं यद्यत्र कृतं पापप्रणाशनम्॥ १२<br><br>यत्र सा सुरभिर्देवी स्वसुतां कपिलां शुभाम्।<br>देवप्रीत्यर्थमसृजद्धितार्थं जगतस्तथा॥ १३ | उसके बाद हंसपदमें भगवान् हंसका दर्शन एवं पूजन कर वे पयोष्णीके समीपमें अखण्डेश्वरका दर्शन करने चले गये। पयोष्णीके जलमें स्नानकर उन्होंने जगत्पति अखण्डेश्वरकी पूजा की। उसके बाद बुद्धिमान् (प्रह्लादजी) वितस्तामें कुमारिलके दर्शनार्थ चले गये। वहाँ स्नान करनेके पश्चात् (सूर्यकी) किरणोंका पान करनेवाले बालखिल्योंसे आराधित किये जा रहे पापोंको नष्ट करनेवाले देवेशका पूजन किया। जहाँ देवी सुरभिने देवकी प्रीति एवं जगत्की भलाईके लिये अपनी पुत्री कल्याणी कपिलाका त्याग किया था॥ १०–१३॥ | | तत्र देवह्रदे स्नात्वा शम्भुं सम्पूज्य भक्तितः।<br>विधिवद्दधि च प्राश्य मणिमन्तं ततो ययौ॥ १४<br><br>तत्र तीर्थवरे स्नात्वा प्राजापत्ये महामतिः।<br>ददर्श शम्भुं ब्रह्माणं देवेशं च प्रजापतिम्॥ १५<br><br>विधानतस्तु तान् देवान् पूजयित्वा तपोधन।<br>षड्रात्रं तत्र च स्थित्वा जगाम मधुनन्दिनीम्॥ १६<br><br>मधुमत्सलिले स्नात्वा दैवं चक्रधरं हरम्।<br>शूलबाहुं च गोविन्दं ददर्श दनुपुङ्गवः॥ १७ | वहाँ देवह्रदमें स्नानकर उन्होंने भक्तिपूर्वक शंभुका पूजन किया और विधिपूर्वक दही खानेके बाद मणिमन्-तीर्थमें गये। प्रजापतिके उस उत्तम तीर्थमें स्नानकर महामति (प्रह्लाद)-ने शंकर, ब्रह्मा एवं देवेश प्रजापतिका दर्शन किया। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) तपोधन! विधिपूर्वक उन देवोंका पूजन करनेके बाद वहाँ छः रात्रियोंतक निवासकर (वे) मधुनन्दिनीमें चले गये। मधुमत्के जलमें स्नानकर दानवश्रेष्ठ (प्रह्लाद)-ने चक्रधारी शिव और शूलधारी गोविन्दका दर्शन किया॥ १४–१७॥ | | नारद उवाच<br>किमर्थं भगवान् शम्भुर्धारयाथ सुदर्शनम्।<br>शूलं तथा वासुदेवो ममैतद् ब्रूहि पृच्छतः॥ १८ | नारदजीने पूछा— मुझ प्रश्नकर्त्ताको आप (कृपया) यह बतलाइये कि भगवान् शिवने सुदर्शन और वासुदेवने शूल क्यों धारण किया था?॥ १८॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि कथामेतां पुरातनीम्।<br>कथयामास यां विष्णुर्भविष्यमनवे पुरा॥ १९ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) सुनिये; मैं इस पुरानी कथाको कहता हूँ। पहले समयमें इसे भगवान् विष्णुने भावी मनुसे कहा था। | | जलोद्भवो नाम महासुरेन्द्रो<br>घोरं स तप्त्वा तप उग्रवीर्यः।<br>आराधयामास विरञ्चिमारात्<br>स तस्य तुष्टो वरदो बभूव॥ २० | जलोद्भव नामका एक महान् दैत्यपति था। उस शक्तिशाली दैत्यने घोर तपकर परिश्रमसे ब्रह्माकी आराधना की। संतुष्ट होकर ब्रह्माने उसे वर दिया कि | | देवासुराणामजयो महाहवे<br>निजैश्च शस्त्रैरमरैरवध्यः।<br>ब्रह्मर्षिशापैश्च निरीप्सितार्थो<br>जले च वह्नौ स्वगुणोपहर्ता॥ २१ | युद्धमें उसे देवता एवं दैत्य नहीं जीत सकेंगे। देवोंके अपने शस्त्रोंसे भी उसका वध नहीं हो सकेगा। ब्रह्मर्षि (जनों)-के शापोंका भी उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और जल एवं अग्निका भी प्रभाव नहीं होगा। |
| अध्याय ८१ ] | प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भव आख्यान | ४०१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवम्प्रभावो दनुपुङ्गवोऽसौ<br>देवान् महर्षीन् नृपतीन् समग्रान्।<br>आबाधमानो विचचार भूम्यां<br>सर्वाः क्रिया नाशयदुग्रमूर्तिः॥ २२ | इस प्रकारका प्रभावशाली वह दनुश्रेष्ठ सभी देवताओं, महर्षियों और राजाओंको कष्ट पहुँचाता हुआ पृथ्वीपर विचरण करने लगा। (फिर तो) उस क्रूरने समस्त कर्मोंका विनाश कर दिया॥ १९—२२॥ |
| ततोऽमरा भूमिभवाः सभूपाः<br>जग्मुः शरण्यं हरिमीशितारम्।<br>तैश्चापि सार्द्धं भगवाञ्जगाम<br>हिमालयं यत्र हरस्त्रिनेत्रः॥ २३<br>सम्मन्त्र्य देवर्षिहितं च कार्यं<br>मतिं च कृत्वा निधनाय शत्रोः।<br>निजायुधानां च विपर्ययं तौ<br>देवाधिपौ चक्रतुरुग्रकर्म्मिणौ॥ २४<br>ततश्चासौ दानवो विष्णुशर्वौ<br>समायातौ तज्जिघांसू सुरेशौ।<br>मत्वाऽजेयौ शत्रुभिर्घोररूपौ<br>भयात्तोये निम्नगायां विवेश॥ २५<br>ज्ञात्वा प्रनष्टं त्रिदिवेन्द्रशत्रुं<br>नदीं विशालां मधुमत्सुपुण्याम्।<br>द्वयोः सशस्रौ तटयोर्हरीशौ<br>प्रच्छन्नमूर्ती सहसा बभूवतुः॥ २६ | उसके बाद पृथ्वीपर आविर्भूत हुए देवगण राजाओंके साथ शरण देनेवाले एवं (सबके) नियामक विष्णुकी शरणमें गये। भगवान् भी उन सभीके साथ हिमालयपर गये, जहाँ त्रिनेत्र हर अवस्थित थे। देवता और ऋषियोंके कल्याणकारी कार्यकी मन्त्रणा करनेके बाद शत्रुको मारनेका निश्चय कर उन दोनों उग्रकर्मी देवाधिपोंने अपने आयुधोंका परिवर्तन कर लिया। फिर मारनेकी इच्छासे आ रहे देवाधिप शंकर एवं विष्णुको देखकर और उन भयंकर मूर्तिधारियोंको शत्रुओंसे अजेय जानकर वह दानव भयसे नदीके जलमें पैठ गया। देवशत्रुको पुण्यशालिनी मधुमती विशाला नदीमें उसे छिपा हुआ जानकर शस्त्रसहित शंकर और विष्णु सहसा नदीके दोनों तटोंपर छिप गये॥ २३—२६॥ |
| जलोद्भवश्चापि जलं विमुच्य<br>ज्ञात्वा गतौ शङ्करवासुदेवौ।<br>दिशस्समीक्ष्य भयकातराक्षो<br>दुर्गं हिमाद्रिं च तदारुरोह॥ २७ | शंकर और वासुदेवको गया हुआ जानकर जलोद्भव भी जलसे बाहर निकला तथा भयसे चञ्चल नेत्रोंसे दिशाओंमें (इधर-उधर) देखकर दुर्गम हिमालय पर्वतपर चढ़ गया। |
| महीध्रशृङ्गोपरि विष्णुशम्भू<br>चञ्चूर्यमाणं स्वरिपुं च दृष्ट्वा।<br>वेगादुभौ दुद्रुवतुः सशस्रौ<br>विष्णुस्त्रिशूली गिरिशश्च चक्री॥ २८ | पर्वतकी चोटीपर अपने शत्रुको विचरण करते हुए देखकर त्रिशूलधारी विष्णु एवं चक्रधारी शिव शस्त्र लिये हुए तुरंत दौड़ पड़े। |
| ताभ्यां स दृष्टस्त्रिदशोत्तमभ्यां<br>चक्रेण शूलेन च भिन्नदेहः।<br>पपात शैलात् तपनीयवर्णो<br>यथाऽन्तरिक्षाद् विमला च तारा॥ २९ | उन सुरोत्तमोंने उसे देखकर चक्र और शूलसे उसके शरीरका भेदन कर दिया। वह सुवर्णके समान कान्तिवाला अन्तरिक्षसे गिरनेवाले विमल तारेके समान पर्वतसे गिर पड़ा। |
| एवं त्रिशूलं च दधार विष्णु-<br>श्चक्रं त्रिनेत्रोऽप्यरिसूदनार्थम्।<br>यत्राघहन्त्री ह्यभवद् वितस्ता<br>हराङ्घ्रिपाताच्छिशिराचलात्तु ॥ ३० | इस प्रकार शत्रुके विनाशके लिये विष्णुने त्रिशूल तथा शंकरने चक्र धारण किया था। जहाँ शंकरका चरण गिरा था, उस हिमालय पर्वतसे पापविनाशिनी वितस्ता उत्पन्न हुई। |
| तत्प्राप्य तीर्थं त्रिदशाधिपाभ्यां<br>पूजां च कृत्वा हरिशङ्कराभ्याम्।<br>उपोष्य भक्त्या हिमवन्तमागाद्<br>द्रष्टुं गिरीशं शिवविष्णुगुप्तम्॥ ३१ | उस तीर्थमें पहुँचकर प्रह्लादने उन विष्णु एवं शंकर—इन दोनों देवोंकी अर्चा की तथा भक्तिसे वहाँ निवास कर वे शिव एवं विष्णुसे रक्षित गिरिराज हिमालयका दर्शन करने चले गये। |
| ४०२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८२ |
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| तं समभ्यर्च्य विधिवद् दत्त्वा दानं द्विजातिषु।<br>विस्तृते हिमवत्पादे भृगुतुङ्गं जगाम सः॥ ३२<br><br>यत्रेश्वरो देववरस्य विष्णोः<br>प्रादाद्रथाङ्गप्रवरायुधं वै।<br>येन प्रचिच्छेद त्रिधैव शङ्करं<br>जिज्ञासमानोऽस्त्रबलं महात्मा॥ ३३ | प्रह्लाद वहाँ विधिके अनुसार उसकी पूजा करनेके बाद ब्राह्मणोंको दान देकर हिमालयके विस्तृत चरणमें (उपत्यकामें विद्यमान) भृगुतुङ्गतीर्थमें गये। वहाँ भगवान् शंभुने देवश्रेष्ठ विष्णुको श्रेष्ठ अस्त्र दिया था। उस अस्त्र-चक्रके बलको जाननेकी इच्छासे उन महात्माने उससे शंकरको तीन टुकड़ोंमें काट दिया था॥ २७—३३॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८१॥
बयासीवाँ अध्याय
चक्रदानके कथा-प्रसङ्गमें उपमन्यु तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना, हरका विरूपाक्ष हो जाना और श्रीदाम-वध
| नारद उवाच | |
|---|---|
| नारद उवाच<br>भगवँल्लोकनाथाय विष्णवे विषमेक्षणः।<br>किमर्थमायुधं चक्रं दत्तवाँल्लोकपूजितम्॥ १ | नारदजीने पूछा— भगवन्! तीन नेत्रोंवाले शंकरने जगत्पति विष्णुको समस्त लोकोंमें पूजित चक्र नामका आयुध क्यों दिया था?॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम्।<br>चक्रप्रदानसम्बद्धां शिवमाहात्म्यवर्धिनीम्॥ २<br><br>आसीद् द्विजातिप्रवरो वेदवेदाङ्गपारगः।<br>गृहाश्रमी महाभागो वीतमन्युरिति स्मृतः॥ ३<br><br>तस्यात्रेयी महाभागा भार्यासीच्छीलसम्मता।<br>पतिव्रता पतिप्राणा धर्मशीलेति विश्रुता॥ ४<br><br>तस्यामस्य महर्षेस्तु ऋतुकालाभिगामिनः।<br>सम्बभूव सुतः श्रीमान् उपमन्युरिति स्मृतः॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) आप चक्रके प्रदान करनेसे सम्बद्ध और शिवकी महिमाको बढ़ानेवाली इस प्राचीन कथाको सावधान होकर सुनिये—वेद-वेदाङ्ग-पारङ्गत, गृहस्थ और महाभाग्यशाली वीतमन्यु नामके एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे। उनकी महाभाग्यशालिनी, शीलसे सम्पन्न, पतिव्रता एवं पतिमें ही अपने प्राणोंको निहित किये रहनेवाली आत्रेयी नामकी पत्नी थी। वह धर्मशीला नामसे प्रसिद्ध थी। ऋतुकालमें ही उसके साथ समागम करनेवाले उन महर्षिके उससे उपमन्यु नामका एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ॥ २—५॥ |
| तं माता मुनिशार्दूल शालिपिष्टरसेन वै।<br>पोषयामास वदती क्षीरमेतत् सुदुर्गता॥ ६ | मुनिश्रेष्ठ! अत्यन्त दरिद्रतासे जर्जर हुई उसकी माता पिसे हुए चावलके जलको यह दूध है—ऐसा कहकर उससे उस (पुत्र)-का पालन करती थी। |
अध्याय ८२] चक्रदानके कथा-प्रसङ्गमें उपमन्यु तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना ४०३
| संस्कृत | हिन्दी |
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| सोऽजानानोऽथ क्षीरस्य स्वादुतां पय इत्यथ।<br>सम्भावनामप्यकरोच्छालिपिष्टरसेऽपि हि॥ ७<br><br>स त्वेकदा समं पित्रा कुत्रचिद् द्विजवेश्मनि।<br>क्षीरौदनं च बुभुजे सुस्वादु प्राणपुष्टिदम्॥ ८<br><br>स लब्ध्वानुपमं स्वादं क्षीरस्य ऋषिदारकः।<br>मात्रा दत्तं द्वितीयेऽह्नि नादत्ते पिष्टवारि तत्॥ ९ | दूधके स्वादसे अपरिचित होनेके कारण वह पिसे चावलके रस (जल)-में ही दूधकी संभावना करता था। एक दिन उसने अपने पिताके साथ किसी ब्राह्मणके घर प्राणको स्वस्थ बनानेवाली मधुर खीरका भोजन किया। ऋषिके उस पुत्रने दूधके अद्भुत स्वादको पाकर दूसरे दिन माताके द्वारा दिये गये पिसे हुए चावलके उस रसको ग्रहण नहीं किया॥ ६—९॥ |
| रुरोदाथ ततो बाल्यात् पयोऽर्थी चातको यथा।<br>तं माता रुदती प्राह बाष्पगद्गदया गिरा॥ १०<br><br>उमापतौ पशुपतौ शूलधारिणि शङ्करे।<br>अप्रसन्ने विरूपाक्षे कुतः क्षीरेण भोजनम्॥ ११<br><br>यदीच्छसि पयो भोक्तुं सद्यः पुष्टिकंर सुत।<br>तदाराधय देवेशं विरूपाक्षं त्रिशूलिनम्॥ १२<br><br>तस्मिंस्तुष्टे जगद्धात्रि सर्वकल्याणदायिनि।<br>प्राप्यतेऽमृतपायित्वं किं पुनः क्षीरभोजनम्॥ १३ | उसके बाद दूध चाहनेवाला वह बालक बचपनके कारण प्यासे चातककी भाँति रोने लगा। रोती हुई माताने आँखोंमें आँसू भरे गद्गद वाणीमें उससे कहा—शूल धारण करनेवाले पार्वतीपति पशुपति विरूपाक्ष शंकरके असंतुष्ट रहते दूधसे मिला भोजन कहाँसे प्राप्त हो सकता है? पुत्र! यदि तुम तत्काल स्वास्थ्यकर दूध पीना चाहते हो तो त्रिशूल धारण करनेवाले विरूपाक्ष महादेवकी सेवा करो। संसारके आधार, सभी प्रकारसे कल्याण करनेवाले उन शंकरके संतुष्ट होनेपर अमृत पीनेको मिल सकता है, दूध पीनेकी तो बात ही क्या है॥ १०—१३॥ |
| तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा वीतमन्युसुतोऽब्रवीत्।<br>कोऽयं विरूपाक्ष इति त्वयाराध्यस्तु कीर्तितः॥ १४<br><br>ततः सुतं धर्मशीला धर्माढ्यं वाक्यमब्रवीत्।<br>योऽयं विरूपाक्ष इति श्रूयतां कथयामि ते॥ १५<br><br>आसीन्महासुरपतिः श्रीदाम इति विश्रुतः।<br>तेनाक्रम्य जगत्सर्वं श्रीर्नीता स्ववशं पुरा॥ १६<br><br>निःश्रीकास्तु त्रयो लोकाः कृतास्तेन दुरात्मना।<br>श्रीवत्सं वासुदेवस्य हर्तुमैच्छन्महाबलः॥ १७ | माताके उस वचनको सुनकर वीतमन्युके पुत्रने कहा—आप जिनकी सेवा-पूजा करनेको कहती हैं, वे विरूपाक्ष कौन हैं? उसके बाद धर्मशीलने पुत्रसे धर्मसे युक्त वचन कहा—(बेटा!) सुनो, मैं तुम्हें बतलाती हूँ कि ये विरूपाक्ष कौन हैं? प्राचीन कालमें श्रीदामा नामसे विख्यात एक महान् असुरोंका राजा था। उसने सारे संसारको अपने अधीन करके लक्ष्मीको अपने वशमें कर लिया। (सारे विश्वपर अपना अधिकार जमा लिया।) (फिर तो) उस दुष्टात्माने तीनों लोकोंको ही श्रीसे रहित कर दिया। उसके बाद उस महाबलशाली असुरने वासुदेवके श्रीवत्सको छीन लेनेकी कामना की॥ १४—१७॥ |
| तमस्य दुष्टं भगवानभिप्रायं जनार्दनः।<br>ज्ञात्वा तस्य वधाकाङ्क्षी महेश्वरमुपागमत्॥ १८<br><br>एतस्मिन्नन्तरे शम्भुर्योंगमूर्तिधरोऽव्ययः।<br>तस्थौ हिमाचलप्रस्थमाश्रित्य श्लक्ष्णभूतलम्॥ १९<br><br>अथाभ्येत्य जगन्नाथं सहस्रशिरसं विभुम्।<br>आराधयामास हरिः स्वयमात्मानमात्मना॥ २० | उसकी उस दूषित इच्छाको जानकर भगवान् जनार्दन उसके मारनेकी इच्छासे महेश्वरके पास गये। उस समय योगमूर्तिके धारण करनेवाले अविनाशी शंकर हिमालयकी ऊँची चोटीके चिकने भूतलपर स्थित थे। उसके बाद सहस्रशीर्षा सर्वसमर्थ जगन्नाथजीके पास जाकर विष्णुने अपने द्वारा स्वयं अपनी ही अर्चना की। |
| ४०४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८२ |
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| साग्रं वर्षसहस्रं तु पादाङ्गुष्ठेन तस्थिवान्।<br>गृणंस्तत्परमं ब्रह्म योगिज्ञेयमलक्षणम्॥ २१<br><br>ततः प्रीतः प्रभुः प्रादाद् विष्णवे परमं वरम्।<br>प्रत्यक्षं तेजसं श्रीमान् दिव्यं चक्रं सुदर्शनम्॥ २२<br>तद् दत्त्वा देवदेवाय सर्वभूतभयप्रदम्।<br>कालचक्रनिभं चक्रं शङ्करो विष्णुमब्रवीत्॥ २३<br>वरायुधोऽयं देवेश सर्वायुधनिबर्हणः।<br>सुदर्शनो द्वादशारः षण्णाभिर्द्वियुगो जवी॥ २४<br>आरासंस्थास्त्वमी चास्य देवा मासाश्च राशयः।<br>शिष्टानां रक्षणार्थाय संस्थिता ऋतवश्च षट्॥ २५<br>अग्निः सोमस्तथा मित्रो वरुणोऽथ शचीपतिः।<br>इन्द्राग्नी चाप्यथो विश्वे प्रजापतय एव च॥ २६<br>हनूमांश्चाथ बलवान् देवो धन्वन्तरिस्तथा।<br>तपश्चैव तपस्यश्च द्वादशैते प्रतिष्ठिताः।<br>चैत्राद्याः फाल्गुनान्ताश्च मासास्तत्र प्रतिष्ठिताः॥ २७ | योगियोंद्वारा जाननेयोग्य उस अव्यक्त परम ब्रह्मका जप करते हुए वे एक हजार वर्षसे अधिक समयतक पैरके अँगूठेपर खड़े रहे॥ १८—२१॥<br><br>उसके बाद श्रीमान् महादेवने संतुष्ट होकर विष्णुको परमश्रेष्ठ प्रत्यक्ष तेजसे युक्त दिव्य सुदर्शनचक्र प्रदान किया। सभी प्राणियोंके लिये भयदायक कालचक्रके समान वह चक्र देवाधिदेव विष्णुको देकर शंकरने उनसे कहा—देवेश! बारह अरों, छः नाभियों एवं दो युगोंसे युक्त तीव्रगतिशील और समस्त आयुधोंका नाश करनेवाला सुदर्शन नामका यह श्रेष्ठ आयुध है। सज्जनोंकी रक्षा करनेके लिये इसके अरोंमें देवता, मास, राशियाँ, छः ऋतुएँ, अग्नि, सोम, मित्र, वरुण, शचीपति इन्द्र, अग्नि, विश्वेदेव, प्रजापति, बलवान् हनूमान्, धन्वन्तरि देव, तप एवं तपस्या—ये तथा चैत्रसे लेकर फाल्गुनतकके बारह महीने प्रतिष्ठित हैं॥ २२—२७॥ | | त्वमेवमाधाय विभो वरायुधं<br>शत्रुं सुराणां जहि मा विशङ्किथाः।<br>अमोघ एषोऽमरराजपूजितो<br>धृतो मया नेत्रगतस्तपोबलात्॥ २८<br>इत्युक्तः शम्भुना विष्णुः भवं वचनमब्रवीत्।<br>कथं शम्भो विजानीयाममोघो मोघ एव वा॥ २९<br>यद्यमोघो विभो चक्रः सर्वत्राप्रतिघस्तव।<br>जिज्ञासार्थं तवैवेह प्रक्षेप्स्यामि प्रतीच्छ भोः॥ ३०<br>तद्वाक्यं वासुदेवस्य निशम्यैवाह पिनाकधृक्।<br>यद्येवं प्रक्षिपस्वेति निर्विशङ्केन चेतसा॥ ३१ | विभो! आप इस श्रेष्ठ आयुधको ले करके निर्भीक होकर देवोंके शत्रुको संहार करें। मैंने असुर-राजसे आराधित इस अमोघ आयुधको तपके बलसे अपने नेत्रमें स्थित कर लिया था। शम्भुके इस प्रकार कहनेपर विष्णुने शंकरसे यह वचन कहा—शम्भो! मुझे यह कैसे मालूम होगा कि यह अस्त्र अमोघ या मोघ है? विभो! यदि आपका यह चक्र अमोघ तथा सर्वत्र बिना किसी बाधाके निरन्तर गतिशील है तो इसको जाननेके लिये मैं आपके ही ऊपर इसे चलाता हूँ। आप इसे स्वीकार करें। वासुदेवके उस वचनको सुनकर पिनाकधारीने कहा—यदि ऐसा है तो निश्चिन्त होकर मेरे ऊपर इसे चलाइये॥ २८—३१॥ | | तन्महेशानवचनं श्रुत्वा विष्णुः सुदर्शनम्।<br>मुमोच तेजो जिज्ञासुः शङ्करम्प्रति वेगवान्॥ ३२<br>मुरारिकरविभ्रष्टं चक्रमभ्येत्य शूलिनम्।<br>त्रिधा चकार विश्वेशं यज्ञेशं यज्ञयाजकम्॥ ३३<br>हरं हरिस्त्रिधाभूतं दृष्ट्वा कृत्तं महाभुजः।<br>व्रीडोपप्लुतदेहस्तु प्रणिपातपरोऽभवत्॥ ३४<br>पादप्रणामावनतं वीक्ष्य दामोदरं भवः।<br>प्राह प्रीतिपरः श्रीमानुत्तिष्ठेति पुनः पुनः॥ ३५ | महेशके उस वचनको सुनकर विष्णुने सुदर्शनके तेजको जाननेकी अभिलाषासे उसे वेगसे शंकरके ऊपर चलाया। विष्णुके हाथसे छोड़ा गया वह चक्र शंकरके निकट गया और उन्हें काटकर विश्वेश, यज्ञेश तथा यज्ञयाजकके रूपमें तीन भागोंमें अलग कर दिया। शंकरको तीन खण्डोंमें कटा हुआ देखकर महाबाहु विष्णु संकुचित हो गये। वे (शंकरको) प्रणाम करने लगे। चरणोंमें प्रणत हुए दामोदरको देखकर श्रीमान् भव (शंकर)-ने प्रसन्नतापूर्वक बार-बार 'उठो-उठो' कहते हुए (यह) कहा—॥ ३२—३५॥ |
अध्याय ८२] चक्रदानके कथा-प्रसङ्गमें उपमन्यु तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना ४०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्राकृतोऽयं महाबाहो विकारश्चक्रनेमिना।<br>निकृत्तो न स्वभावो मे सोऽच्छेद्योऽदाह्य एव च॥ ३६॥<br><br>तद्यदेतानि चक्रेण त्रीणि भागानि केशव।<br>कृतानि तानि पुण्यानि भविष्यन्ति न संशयः॥ ३७॥<br><br>हिरण्याक्षः स्मृतो ह्येकः सुवर्णाक्षस्तथा परः।<br>तृतीयश्च विरूपाक्षस्त्रयोऽमी पुण्यदा नृणाम्॥ ३८॥<br><br>उत्तिष्ठ गच्छस्व विभो निहन्तुममरादनम्।<br>श्रीदाम्नि निहते विष्णो नन्दयिष्यन्ति देवताः॥ ३९॥<br><br>इत्येवमुक्तो भगवान् हरेण गरुडध्वजः।<br>गत्वा सुरगिरिप्रस्थं श्रीदामानं ददर्श ह॥ ४०॥<br><br>तं दृष्ट्वा देवदर्पघ्नं दैत्यं देववरो हरिः।<br>मुमोच चक्रं वेगाढ्यं हतोऽसीति ब्रुवन्मुहुः॥ ४१॥ | महाबाहो! चक्रकी नेमिद्वारा मेरा यह प्राकृत विकार ही काटा गया है। इसके द्वारा मेरा स्वभाव नहीं क्षत हुआ है। वह तो अच्छेद्य एवं अदाह्य है। केशव! चक्रद्वारा किये गये ये तीनों अंश निस्सन्देह पुण्य प्रदान करनेवाले होंगे। एक अंश हिरण्याक्ष नामधारी, दूसरा सुवर्णाक्ष नामधारी और तीसरा विरूपाक्ष नामका होगा। ये तीनों अंश मनुष्योंके लिये पुण्यप्रदाता होंगे। विभो! उठिये और देव-शत्रुका वध करनेके लिये जाइये। विष्णो! श्रीदामाके वध किये जानेपर देवता प्रसन्न होंगे। शंकरके इस प्रकार कहनेपर भगवान् गरुडध्वजने पर्वतकी ऊँची चोटीपर जाकर श्रीदामाको देखा। देवताओंके दर्पका विनाश करनेवाले उस दैत्यको देखकर देव-श्रेष्ठ विष्णुने बार-बार (यह लो) 'तुम मारे गये' ऐसा कहते हुए तीव्र गतिसे चक्र चलाया॥ ३६—४१॥ |
| ततस्तु तेनाप्रतिपौरुषेण<br>चक्रेण दैत्यस्य शिरो निकृत्तम्।<br>संछिन्नशीर्षो निपपात शैलाद्<br>वज्राहतं शैलशिरो यथैव॥ ४२॥<br><br>तस्मिन् हते देवरिपौ मुरारि-<br>रीशं समाराध्य विरूपनेत्रम्।<br>लब्ध्वा च चक्रं प्रवरं महायुधं<br>जगाम देवो निलयं पयोनिधिम्॥ ४३॥<br><br>सोऽयं पुत्र विरूपाक्षो देवदेवो महेश्वरः।<br>तमाराधय चेत् साधो क्षीरेणेच्छसि भोजनम्॥ ४४॥<br><br>तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा वीतमन्युसुतो बली।<br>तमाराध्य विरूपाक्षं प्राप्तः क्षीरेण भोजनम्॥ ४५॥<br><br>एवं तवोक्तं परमं पवित्रं<br>संछेदनं शर्वतनोः पुरा वै।<br>तत्तीर्थवर्यं स महासुरो वै<br>समाससादाथ सुपुण्यहेतोः॥ ४६॥ | फिर तो अनुपम पौरुषवाले उस चक्रने दैत्यका मस्तक काट डाला। मस्तक कट जानेपर दैत्य पर्वतके ऊपरसे इस प्रकार गिरा जैसे वज्रसे आहत होकर पर्वतकी ऊँची चोटी गिरती है। उस देव-शत्रुके मारे जानेपर मुरारिने विरूपाक्ष शंकरकी आराधना की और चक्ररूपी श्रेष्ठ महायुध लेकर वे देव क्षीरसागरमें स्थित अपने गृहको चले गये। [वीतमन्युकी धर्मशीला पत्नी आत्रेयी कहती हैं—] पुत्र! ये वही देव-देव महेश्वर विरूपाक्ष हैं। साधो! यदि तुम दूधके साथ भोजन करना चाहते हो तो उनकी सेवा-पूजा करो। माताके उस वचनको सुनकर वीतमन्युके बलवान् पुत्रने उन विरूपाक्ष शंकरकी आराधनाकर दुग्धसे युक्त भोजन प्राप्त किया। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] इस प्रकार प्राचीन कालमें घटित हुई शंकरके शरीर-छेदनसे सम्बद्ध परम पवित्र कथाको मैंने तुमसे कहा। उसी श्रेष्ठ तीर्थमें वे महान् असुर प्रह्लाद सुन्दर पुण्य-प्राप्तिके लिये गये॥ ४२—४६॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बयासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८२ ॥
| ४०६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८३ ] |
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तिरासीवाँ अध्याय
प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ-यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व
</div>| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
|---|---|
| तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा दृष्ट्वा देवं त्रिलोचनम्।<br>पूजयित्वा सुवर्णाक्षं नैमिषं प्रययौ ततः॥ १<br>तत्र तीर्थसहस्राणि त्रिंशत्पापहराणि च।<br>गोमत्याः काञ्चनाक्ष्याश्च गुरुदायाश्च मध्यतः॥ २<br>तेषु स्नात्वार्च्य देवेशं पीतवाससमच्युतम्।<br>ऋषीनपि च सम्पूज्य नैमिषारण्यवासिनः॥ ३<br>देवदेवं तथेशानं सम्पूज्य विधिना ततः।<br>गयायां गोपतिं द्रष्टुं जगाम स महासुरः॥ ४ | प्रह्लादने उस उत्तम तीर्थमें स्नान कर त्रिनयन महादेवका दर्शन किया और सुवर्णाक्षकी पूजाकर वे नैमिषारण्य चले गये। वहाँ गोमती, काञ्चनाक्षी और गुरुदाके मध्यमें पाप-नाश करनेवाले तीस हजार तीर्थ हैं। उनमें स्नानकर उन्होंने पीताम्बर धारण करनेवाले देवेश्वर अच्युतकी पूजा की। नैमिषारण्यमें रहनेवाले ऋषियोंकी पूजा करनेके पश्चात् देवाधिदेव महेशका विधिपूर्वक पूजन कर वे महासुर गोपतिका दर्शन करनेके लिये गयातीर्थमें चले गये॥ १–४॥ |
| तत्र ब्रह्मध्वजे स्नात्वा कृत्वा चास्य प्रदक्षिणाम्।<br>पिण्डनिर्वपणं पुण्यं पितॄणां स चकार ह॥ ५<br>उदपाने तथा स्नात्वा तत्राभ्यर्च्य पितॄन् वशी।<br>गदापाणिं समभ्यर्च्य गोपतिं चापि शङ्करम्॥ ६<br>इन्द्रतीर्थे तथा स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः।<br>महानदीजले स्नात्वा सरयूमाजगाम सः॥ ७<br>तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य गोप्रतारे कुशेशयम्।<br>उपोष्य रजनीमेकां विरजां नगरीं ययौ॥ ८ | वहाँ ब्रह्मध्वजमें स्नान और उसकी प्रदक्षिणा कर उन्होंने पितरोंके निमित्त पवित्र पिण्डदान किया। (फिर) उदपानमें स्नानकर जितेन्द्रिय (प्रह्लाद)-ने पितरों, गदापाणि (विष्णु) एवं गोपति शंकरकी पूजा की। इन्द्रतीर्थमें (भी) स्नानकर उन्होंने पितरों एवं देवोंका तर्पण किया तथा महानदीके जलमें स्नानकर वे सरयूके समीप पहुँचे। उसमें स्नानकर उन्होंने गोप्रतारमें कुशेशयकी पूजा की एवं वहाँ एक रात्रि निवास कर वे विरजा नगरीमें गये॥ ५–८॥ |
| स्नात्वा विरजसे तीर्थे दत्त्वा पिण्डं पितॄंस्तथा।<br>दर्शनार्थं ययौ श्रीमानजितं पुरुषोत्तमम्॥ ९<br>तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षमक्षरं परमं शुचिः।<br>षड्रात्रमुष्य तत्रैव महेन्द्रं दक्षिणं ययौ॥ १०<br>तत्र देववरं शम्भुमर्द्धनारीश्वरं हरम्।<br>दृष्ट्वार्च्य सम्पूज्य पितॄन् महेन्द्रं चोत्तरं गतः॥ ११<br>तत्र देववरं शम्भुं गोपालं सोमपायिनम्।<br>दृष्ट्वा स्नात्वा सोमतीर्थे सह्याचलमुपागतः॥ १२ | विरजातीर्थमें स्नान करनेके बाद पितरोंको पिण्डदान कर वे श्रीमान् पुरुषोत्तम अजितका दर्शन करने चले गये। वे निष्पाप प्रह्लाद अविनाशी पुण्डरीकाक्षका दर्शन करनेके पश्चात् छः रातोंतक वहाँ निवासकर दक्षिण दिशामें स्थित महेन्द्रपर्वतपर चले गये। (वे) वहाँ देवश्रेष्ठ अर्धनारीश्वर महादेवका दर्शन तथा पूजनकर पितरोंकी अर्चना करके उत्तर दिशाकी ओर चले गये। वहाँ देववर शम्भु और सोमपायी गोपालका दर्शन करनेके पश्चात् सोमतीर्थमें स्नानकर वे सह्याचलपर गये॥ ९–१२॥ |
| तत्र स्नात्वा महोदक्यां वैकुण्ठं चार्च्य भक्तितः।<br>सुरान् पितॄन् समभ्यर्च्य पारियात्रं गिरि गतः॥ १३ | वहाँ महोदकीमें स्नान करनेके बाद श्रद्धापूर्वक विष्णु, देवताओं एवं पितरोंका पूजन कर वे पारियात्रपर्वतपर चले गये। |
| तत्र स्नात्वा लाङ्गुलिन्यां पूजयित्वाऽपराजितम्।<br>कशेरुदेशं चाभ्येत्य विश्वरूपं ददर्श सः॥ १४ | वहाँ लाङ्गलिनीमें स्नान करनेके बाद उन्होंने अपराजितका पूजन किया और कशेरुदेशमें जाकर विश्वरूपका दर्शन किया। |
अध्याय ८३ ] प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ-यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व ४०७
| यत्र देववरः शम्भुर्गणानां तु सुपूजितम्।<br>विश्वरूपमथात्मानं दर्शयामास योगवित्॥ १५<br>तत्र मङ्कुणिकातोये स्नात्वाभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>जगामाद्रिं स सौगन्धिं प्रह्लादो मलयाचलम्॥ १६ | वहाँ योगवित् देववर शम्भुने गणोंसे पूजित अपना विश्वरूप प्रकट किया था; वहाँ मङ्कुणिकाके जलमें स्नान करनेके बाद महेश्वरका पूजनकर प्रह्लाद सुगन्धियुक्त मलयपर्वतपर गये॥ १३—१६॥ | | महाह्रदे ततः स्नात्वा पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>ततो जगाम योगात्मा द्रष्टुं विन्ध्ये सदाशिवम्॥ १७ | उसके बाद महाह्रदमें स्नान करनेके पश्चात् शंकरकी पूजाकर योगात्मा प्रह्लाद सदाशिवका दर्शन करनेके लिये विन्ध्यपर्वतपर गये। | | ततो विपाशासलिले स्नात्वाभ्यर्च्य सदाशिवम्।<br>त्रिरात्रं समुपोष्याथ अवन्तीं नगरीं ययौ॥ १८ | उसके बाद विपाशाके जलमें उन्होंने स्नान किया और सदाशिवका पूजन किया। उसके पश्चात् तीन रातोंतक वहाँ निवास करके वे अवन्ती नगरीमें गये। | | तत्र शिप्राजले स्नात्वा विष्णुं सम्पूज्य भक्तितः।<br>श्मशानस्थं ददर्शाथ महाकालवपुर्धरम्॥ १९<br>तस्मिन् हि सर्वसत्त्वानां तेन रूपेण शङ्करः।<br>तामसं रूपमास्थाय संहारं कुरुते वशी॥ २० | वहाँ शिप्राके जलमें स्नान करनेके बाद श्रद्धापूर्वक विष्णुका पूजनकर उन्होंने श्मशानमें स्थित महाकाल-शरीरधारीका दर्शन किया। वहाँ उस रूपमें स्थित आत्मवशी शंकर तामसरूप धारण करके समस्त प्राणियोंका संहार करते हैं॥ १७—२०॥ | | तत्रस्थेन सुरेशेन श्वेतकिर्नाम भूपतिः।<br>रक्षितस्त्वन्तकं दग्ध्वा सर्वभूतापहारिणम्॥ २१ | वहाँपर स्थित हुए सुरेशने सर्वभूतापहारी (समस्त भूतोंका अपहरण करनेवाले) अन्तकको जलाकर श्वेतकि नामक राजाकी रक्षा की थी। | | तत्रातिहृष्टो वसति नित्यं शर्वः सहोमया।<br>वृतः प्रमथकोटीभिर्बहुभिस्त्रिदशार्चितः॥ २२ | करोड़ों गणोंसे घिरे हुए एवं देवोंसे पूजित भगवान् शंकर उमाके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वहाँ नित्य निवास करते हैं। | | तं दृष्ट्वाथ महाकालं कालकालान्तकान्तकम्।<br>यमसंयमनं मृत्योर्मृत्युं चित्रविचित्रकम्॥ २३<br>श्मशाननिलयं शम्भुं भूतनाथं जगत्पतिम्।<br>पूजयित्वा शूलधरं जगाम निषधान् प्रति॥ २४ | उन कालोंके काल, अन्तकोंके अन्तक, यमोंके नियामक, मृत्युके मृत्यु, चित्रविचित्र श्मशानके वासी, भूतपति, जगत्पति, शूल धारण करनेवाले शंकरका दर्शन एवं पूजनकर वे निषधदेशकी ओर चले गये॥ २१—२४॥ | | तत्रामरेश्वरं देवं दृष्ट्वा सम्पूज्य भक्तितः।<br>महोदयं समभ्येत्य हयग्रीवं ददर्श सः॥ २५ | वहाँ श्रद्धापूर्वक अमरेश्वर देवका दर्शन एवं अर्चन करनेके बाद उन्होंने महोदयमें जाकर हयग्रीवका दर्शन किया। | | अश्वतीर्थे ततः स्नात्वा दृष्ट्वा च तुरगाननम्।<br>श्रीधरं चैव सम्पूज्य पञ्चालविषयं ययौ॥ २६ | उसके बाद अश्वतीर्थमें स्नान कर अश्वमुखका दर्शन तथा श्रीधरका अर्चन कर वे पाञ्चाल देशमें गये। | | तत्रेश्वरगुणैर्युक्तं पुत्रमर्थपतेरथ।<br>पाञ्चालिकं वशी दृष्ट्वा प्रयागं परतो ययौ॥ २७ | जितेन्द्रिय प्रह्लाद वहाँ ईश्वरीय गुणोंसे सम्पन्न धनपति कुबेरके पुत्र पाञ्चालिकका दर्शनकर प्रयाग चले गये। | | स्नात्वा सन्निहिते तीर्थे यामुने लोकविश्रुते।<br>दृष्ट्वा वटेश्वरं रुद्रं माधवं योगशायिनम्॥ २८<br>द्वावेव भक्तितः पूज्यौ पूजयित्वा महासुरः।<br>माघमासमथोपोष्या ततो वाराणसीं गतः॥ २९ | निकटमें रहनेवाले यमुनाके विख्यात तीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् वटेश्वर रुद्र तथा योगशायी माधवका दर्शन एवं श्रद्धापूर्वक उन दोनों पूजनीयोंका अर्चन कर उन महासुरने माघमासमें वहाँ निवास किया। उसके बाद वे वाराणसी चले गये॥ २५—२९॥ | | ततोऽस्यां वरणायां च तीर्थेषु च पृथक् पृथक्।<br>सर्वपापहराह्येषु स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः॥ ३०<br><br>प्रदक्षिणीकृत्य पुरीं पूज्याविमुक्तकेशवौ।<br>लोलं दिवाकरं दृष्ट्वा ततो मधुवनं ययौ॥ ३१ | उसके बाद समस्त पापोंका अपहरण करनेवाले असी और वरुणाके विभिन्न तीर्थोंमें स्नानके बाद पितरों एवं देवोंका अर्चनकर उन्होंने (वाराणसी) पुरीकी प्रदक्षिणा की। उसके बाद अविमुक्तेश्वर एवं केशवकी पूजा तथा लोलार्कका दर्शन करके वे मधुवन चले गये। |
| ४०८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र स्वयम्भुवं देवं ददर्शासुरसत्तमः।<br>तमभ्यर्च्य महातेजाः पुष्करारण्यमागमत्॥ ३२<br>तेषु त्रिष्वपि तीर्थेषु स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः।<br>पुष्कराक्षमयोगन्धिं ब्रह्माणं चाप्यपूजयत्॥ ३३<br>ततो भूयः सरस्वत्यास्तीर्थे त्रैलोक्यविश्रुते।<br>कोटितीर्थे रुद्रकोटिं ददर्श वृषभध्वजम्॥ ३४ | महातेजस्वी असुरोत्तम प्रह्लाद वहाँ स्वयम्भू देवका दर्शन एवं पूजनकर पुष्करारण्यमें गये। उन तीनों तीर्थोंमें स्नान करनेके बाद पितरों एवं देवोंका पूजन कर उन्होंने अयोगन्धि, पुष्कराक्ष तथा ब्रह्माका अर्चन किया। उसके बाद उन्होंने कोटितीर्थमें सरस्वतीके तटपर स्थित लोकविख्यात रुद्रकोटि वृषभध्वजका दर्शन किया॥ ३०-३४॥ |
| नैमिषेया द्विजवरा मागधेयाः ससैन्धवाः।<br>धर्मारण्याः पौष्करेया दण्डकारण्यकास्तथा॥ ३५<br>चाम्पेया भारुकच्छेया देविकातीरगाश्च ये।<br>ते तत्र शङ्करं द्रष्टुं समायाता द्विजातयः॥ ३६<br>कोटिसंख्यास्तपःसिद्धा हरदर्शनलालसाः।<br>अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं वादिनो मुने॥ ३७<br>तान् संक्षुब्धान् हरो दृष्ट्वा महर्षीन् दग्धकिल्बिषान्।<br>तेषामेवानुकम्पार्थं कोटिमूर्तिरभूद् भवः॥ ३८ | (कथा है कि प्राचीन समयमें) नैमिषारण्य, मगध, सिन्धुप्रदेश, धर्मारण्य, पुष्कर, दण्डकारण्य, चम्पा, भरुकच्छ एवं देविकाके तटपर रहनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ शंकरका दर्शन करने आये थे। मुने! शिवके दर्शनकी इच्छावाले करोड़ों सिद्ध तपस्वी 'मैं पहले दर्शन करूँगा', 'मैं पहले दर्शन करूँगा' इस प्रकारका विवाद करने लगे। उन निष्पाप महर्षियोंको विशेष अधीर हुआ देखकर शंकरने उनपर कृपाकर करोड़ों मूर्तियाँ धारण कर लीं॥ ३५-३८॥ |
| ततस्ते मुनयः प्रीताः सर्व एव महेश्वरम्।<br>सम्पूजयन्तस्तस्थुर्वै तीर्थं कृत्वा पृथक् पृथक्।<br>इत्येवं रुद्रकोटीति नाम्ना शम्भुरजायत॥ ३९<br>तं ददर्श महातेजाः प्रह्लादो भक्तिमान् वशी।<br>कोटितीर्थे ततः स्नात्वा तर्पयित्वा वसून् पितॄन्।<br>रुद्रकोटिं समभ्यर्च्य जगाम कुरुजाङ्गलम्॥ ४०<br>तत्र देववरं स्थाणुं शङ्करं पार्वतीप्रियम्।<br>सरस्वतीजले मग्नं ददर्श सुरपूजितम्॥ ४१<br>सारस्वतेऽम्भसि स्नात्वा स्थाणुं सम्पूज्य भक्तितः।<br>स्नात्वा दशाश्वमेधे च सम्पूज्य च सुरान् पितॄन्॥ ४२ | उसके बाद वे सभी मुनि हर्षपूर्वक अलग-अलग तीर्थ बनाकर महेश्वरकी पूजा करते हुए निवास करने लगे। इस प्रकार शम्भुका नाम रुद्रकोटि हुआ। महातेजस्वी श्रद्धालु जितेन्द्रिय प्रह्लादने उनका दर्शन किया एवं कोटितीर्थमें स्नानकर वसुओं तथा पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद रुद्रकोटिका अर्चनकर वे कुरुजाङ्गलमें चले गये। उन्होंने वहाँ सरस्वतीके जलमें निमग्न हुए देवताओंसे पूजित स्थाणु-पार्वतीपति भगवान् शंकरका दर्शन किया। सरस्वतीके जलमें स्नानकर उन्होंने श्रद्धापूर्वक स्थाणुकी पूजा की तथा दशाश्वमेधमें स्नानकर देवों एवं पितरोंका अर्चन किया॥ ३९-४२॥ |
| सहस्रलिङ्गं सम्पूज्य स्नात्वा कन्याह्रदे शुचिः।<br>अभिवाद्य गुरुं शुक्रं सोमतीर्थं जगाम ह॥ ४३<br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य च पितॄन् सोमं सम्पूज्य भक्तितः।<br>क्षीरिकावासमभ्येत्य स्नानं चक्रे महायशाः॥ ४४<br>प्रदक्षिणीकृत्य तरुं वरुणं चार्च्य बुद्धिमान्।<br>भूयः कुरुध्वजं दृष्ट्वा पद्माख्यां नगरीं गतः॥ ४५<br>तत्रार्च्य मित्रावरुणौ भास्करौ लोकपूजितौ।<br>कुमारधारामभ्येत्य ददर्श स्वामिनं वशी॥ ४६ | कन्याह्रदमें स्नान करनेके बाद पवित्र होकर उन्होंने सहस्रलिङ्गका अर्चन किया। इसके बाद (शुक्रतीर्थमें) गुरु शुक्राचार्यको प्रणामकर वे सोमतीर्थ चले गये। वहाँ स्नान करनेके बाद श्रद्धापूर्वक पितरों एवं सोमका अर्चन करके उन महायशस्वीने क्षीरिकावासमें जाकर स्नान किया। वहाँके वृक्षकी प्रदक्षिणाकर तथा वरुणकी पूजा करनेके पश्चात् बुद्धिमान् प्रह्लाद फिर कुरुध्वजका दर्शनकर पद्मा नामकी नगरीमें चले गये। वहाँ लोकपूजित तेजस्वी मित्रावरुणका पूजन करनेके बाद कुमारधारामें जाकर जितेन्द्रिय प्रह्लादने स्वामी कार्तिकेयका दर्शन किया। |
| अध्याय ८३ ] | प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ-यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व | ४०९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्नात्वा कपिलधारायां संतर्प्यार्च्च पितॄन् सुरान्।<br>दृष्ट्वा स्कन्दं समभ्यर्च्य नर्मदायां जगाम ह॥ ४७<br>तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य वासुदेवं श्रियः पतिम्।<br>जगाम भूधरं द्रष्टुं वाराहं चक्रधारिणम्॥ ४८ | कपिलधारामें स्नान करके पितृतर्पण, देवपूजन एवं स्कन्दका दर्शन तथा अर्चन कर वे नर्मदाके निकट गये। उसमें स्नान करके लक्ष्मीपति वासुदेवकी अर्चना कर वे चक्र धारण करनेवाले भूधर वाराहदेवका दर्शन करने गये॥ ४७-४८॥ |
| स्नात्वा कोकामुखे तीर्थे सम्पूज्य धरणीधरम्।<br>त्रिसौवर्णं महादेवमर्बुदेशं जगाम ह॥ ४९<br>तत्र नारीह्रदे स्नात्वा पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>कालिञ्जरं समभेत्य नीलकण्ठं ददर्श सः॥ ५०<br>नीलतीर्थजले स्नात्वा पूजयित्वा ततः शिवम्।<br>जगाम सागरानूपे प्रभासे द्रष्टुमीश्वरम्॥ ५१<br>स्नात्वा च संगमे नद्याः सरस्वत्यार्णवस्य च।<br>सोमेश्वरं लोकपतिं ददर्श स कपर्दिनम्॥ ५२<br>यो दक्षशापनिर्दिग्धः क्षयी ताराधिपः शशी।<br>आप्यायितः शङ्करेण विष्णुना सकपर्दिना॥ ५३ | वे कोकामुखतीर्थमें स्नान और धरणीधरकी पूजा करके अर्बुददेशमें त्रिसौवर्ण महादेवके पास गये। वहाँ उन्होंने नारीह्रदमें स्नान और शंकरकी अर्चना करनेके बाद कालिंजरमें आकर नीलकण्ठका दर्शन किया। नीलतीर्थके जलमें स्नान करनेके बाद शिवका पूजन कर वे समुद्रके तटपर प्रभासतीर्थमें भगवान्का दर्शन करने गये। वहाँ उन्होंने सरस्वती नदी और सागरके संगममें स्नानकर लोकपति कपर्दी सोमेश्वरका दर्शन किया। कपर्दी शंकर एवं विष्णुने दक्षके शापसे दग्ध हुए एवं क्षयरोगसे ग्रसित ताराधिप चन्द्रमाको पूर्ण किया था॥ ४९-५३॥ |
| तावर्च्य देवप्रवरौ प्रजगाम महालयम्।<br>तत्र रुद्रं समभ्यर्च्य प्रजगामोत्तरान् कुरून्॥ ५४<br>पद्मनाभं स तत्रार्च्य सप्तगोदावरं ययौ।<br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य विश्वेशं भीमं त्रैलोक्यवन्दितम्॥ ५५<br>गत्वा दारुवने श्रीमान् लिङ्गं स ददर्श ह।<br>तमर्च्य ब्राह्मणीं गत्वा स्नात्वाऽर्च्य त्रिदशेश्वरम्॥ ५६<br>प्लक्षावतरणं गत्वा श्रीनिवासमपूजयत्।<br>ततश्च कुण्डिनं गत्वा सम्पूज्य प्राणतृप्तिदम्॥ ५७<br>शूर्पारके चतुर्बाहुं पूजयित्वा विधानतः।<br>मागधारण्यमासाद्य ददर्श वसुधाधिपम्॥ ५८<br>तमर्चयित्वा विश्वेशं स जगाम प्रजामुखम्।<br>महातीर्थे ततः स्नात्वा वासुदेवं प्रणम्य च॥ ५९<br>शोणं सम्प्राप्य सम्पूज्य रुक्मवर्माणमीश्वरम्।<br>महाकोश्यां महादेवं हंसाख्यं भक्तिमानथ॥ ६०<br>पूजयित्वा जगामाथ सैन्धवारण्यमुत्तमम्।<br>तत्रेश्वरं सुनेत्राख्यं शङ्खशूलधरं गुरुम्।<br>पूजयित्वा महाबाहुः प्रजगाम त्रिविष्टपम्॥ ६१ | उन दोनों श्रेष्ठ देवोंका पूजनकर वे महालय गये; वहाँ रुद्रका पूजन कर वे उत्तरकुरु गये। वहाँ पद्मनाभका अर्चन कर वे सप्तगोदावरतीर्थमें गये। वहाँ स्नान करनेके बाद उन्होंने तीनों लोकोंसे वन्दित भीमविश्वेश्वरका पूजन किया। दारुवनमें जाकर श्रीमान् प्रह्लादने लिङ्गका दर्शन किया। उनकी पूजा करनेके पश्चात् ब्राह्मणी (नदी)-में जाकर उन्होंने स्नान और त्रिदशेश्वर महादेवकी अर्चना की। उसके बाद प्लक्षावतरणमें जाकर उन्होंने श्रीनिवासकी अर्चना की। फिर कुण्डिनमें जाकर प्राणोंके तृप्तिदाता देवका अर्चन किया। उन्होंने शूर्पारकममें चतुर्भुज देवकी भलीभाँति पूजा करनेके बाद मागधारण्यमें जाकर वसुधाधिपका दर्शन किया। उन विश्वेशका पूजन कर वे प्रजामुखमें गये। उसके बाद उन्होंने महातीर्थमें स्नानकर वासुदेवको प्रणाम किया। उन्होंने शोणतटपर जाकर स्वर्णकवच धारण करनेवाले ईश्वरका पूजन किया। उसके बाद श्रद्धालु (प्रह्लाद)-ने महाकोशीमें हंस नामक महादेवका अर्चन किया एवं श्रेष्ठ सैन्धवारण्यमें जाकर शङ्ख तथा शूल धारण करनेवाले सुनेत्र नामक पूज्य ईश्वरका पूजन किया। उसके बाद वे महाबाहु त्रिविष्टप चले गये॥ ५४-६१॥ |
| तत्र देवं महेशानं जटाधरमिति श्रुतम्।<br>तं दृष्ट्वाऽर्च्य हरिं चासौ तीर्थं कनखलं ययौ॥ ६२ | वहाँ जटाधर नामसे प्रसिद्ध महेशान देवका दर्शन और विष्णुकी पूजा कर वे कनखलतीर्थमें गये। |
| ४९० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्राच्र्य भद्रकालीशं वीरभद्रं च दानवः।<br>धनाधिपं च मेघाङ्कं ययावथ गिरिव्रजम्॥ ६३<br>तत्र देवं पशुपतिं लोकनाथं महेश्वरम्।<br>सम्पूजयित्वा विधिवत्कामरूपं जगाम ह॥ ६४<br>शशिप्रभं देववरं त्रिनेत्रं सम्पूजयित्वा सह वै मृडान्या।<br>जगाम तीर्थप्रवरं महाख्यं तस्मिन् महादेवमपूजयत् सः॥ ६५ | दानव प्रह्लाद वहाँ भद्रकालीश और वीरभद्र तथा धनाधिप मेघाङ्ककी पूजा कर गिरिव्रज चले गये। वहाँ लोकनाथ महेश्वर पशुपति देवका विधिवत् अर्चन कर वे कामरूप चले गये। वहाँ चन्द्रकी कान्तिसे युक्त देवश्रेष्ठ त्रिनेत्र शंकरकी मृडानी (पार्वती)-के साथ विधिवत् अर्चना कर प्रह्लाद श्रेष्ठ महाख्यतीर्थमें गये और वहाँपर (भी) उन्होंने महादेवकी अर्चना की॥ ६२-६५॥ |
| ततस्त्रिकूटं गिरिमत्रिपुत्रं जगाम द्रष्टुं स हि चक्रपाणिणम्।<br>तमीड्य भक्त्या तु गजेन्द्रमोक्षणं जजाप जप्यं परमं पवित्रम्॥ ६६<br>तत्रोष्य दैत्येश्वरसूनुरादरा-<br>न्मासत्रयं मूलफलाम्बुभक्षी।<br>निवेद्य विप्रप्रवरेषु काञ्चनं जगाम घोरं स हि दण्डकं वनम्॥ ६७<br>तत्र दिव्यं महाशाखं वनस्पतिवपुर्धरम्।<br>ददर्श पुण्डरीकाक्षं महाश्वापदवारणम्॥ ६८<br>तस्याधस्तात् त्रिरात्रं स महाभागवतोऽसुरः।<br>स्थितः स्थण्डिलशायी तु पठन् सारस्वतं स्तवम्॥ ६९ | उसके बाद वे अत्रिपुत्र चक्रपाणि विष्णुका दर्शन करनेके लिये त्रिकूटपर्वतपर चले गये और श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा कर उन्होंने परम पवित्र जपनेयोग्य गजेन्द्रमोक्षणस्तवका पाठ किया। मूल, फल एवं जलका भक्षण करते हुए दैत्येश्वर-पुत्र प्रह्लादने वहाँ तीन मासतक श्रद्धापूर्वक निवास किया। उसके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुवर्ण दान कर वे घोर दण्डकवन चले गये। वहाँ उन्होंने महान् हिंस्र पशुओंके निवारक, महान् शाखाओंसे युक्त वनस्पतिका शरीर धारण करनेवाले पुण्डरीकाक्षका दर्शन किया। सारस्वतस्तोत्रका पाठ करते हुए महान् विष्णुभक्त असुर प्रह्लादने तीन रातोंतक उसके नीचे बिना विस्तरके चबूतरेपर शयन किया॥ ६६-६९॥ |
| तस्मात् तीर्थवरं विद्वान् सर्वपापप्रमोचनम्।<br>जगाम दानवो द्रष्टुं सर्वपापहरं हरिम्॥ ७०<br>तस्याग्रतो जजापासौ स्तवौ पापप्रणाशनौ।<br>यौ पुरा भगवान् प्राह क्रोडरूपी जनार्दनः॥ ७१<br>तस्मादथागाद् दैत्येन्द्रः शालग्रामं महाफलम्।<br>यत्र संनिहितो विष्णुश्चरेषु स्थावरेषु च॥ ७२<br>तत्र सर्वगतं विष्णुं मत्वा चक्रे रतिं बली।<br>पूजयन् भगवत्पादौ महाभागवतो मुने॥ ७३<br>इयं तवोक्ता मुनिसंघजुष्टा प्रह्लादतीर्थानुगतिः सुपुण्या।<br>यत्कीर्तनाच्छ्रवणात् स्पर्शनाच्च विमुक्तपापा मनुजा भवन्ति॥ ७४ | विद्वान् दानव (प्रह्लादजी) वहाँसे सर्वपापहारी हरिका दर्शन करनेके लिये सर्वपापनाशक श्रेष्ठ तीर्थमें चले गये। उन्होंने उनके सामने प्राचीन कालमें क्रोडरूपी जनार्दनसे कथित पापनाश करनेवाले दो स्तोत्रोंका पाठ किया। उसके बाद वे वहाँसे दैत्येन्द्र (प्रह्लाद) महाफलदायक शालग्रामतीर्थमें गये। वहाँ विष्णु समस्त चर और स्थावर पदार्थोंमें विराजमान हैं। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) मुने! वहाँ महान् विष्णुभक्त बलवान् प्रह्लाद विष्णुको सर्वव्यापी जानकर भगवान्के चरणोंकी पूजा करते हुए उन (-की भक्ति)-में परायण हो गये। मैंने तुमसे मुनियोंके समूहोंसे सेवित अत्यन्त पवित्र प्रह्लादकी तीर्थयात्राका वर्णन कर दिया, जिसके कीर्तन, श्रवण एवं स्पर्शसे मनुष्य निष्पाप हो जाते हैं॥ ७०-७४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिरासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८३॥
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अध्याय ८४ ] प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४११
चौरासीवाँ अध्याय
प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना, गजेन्द्रद्वारा विष्णुकी स्तुति, गज-ग्राहका उद्धार एवं ‘गजेन्द्रमोक्षणस्तोत्र' की फलश्रुति
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| नारद उवाच<br>यान् जप्यान् भगवद्भक्त्या प्रह्लादो दानवोजपत्।<br>गजेन्द्रमोक्षणादींस्तु चतुरस्तान् वदस्व मे॥ १ | **नारदजीने कहा—**दनुवंशमें उत्पन्न हुए प्रह्लादने भगवान्की भक्तिसे भावित होकर जप (पाठ) करनेयोग्य गजेन्द्रमोक्षणादि जिन चार स्तोत्रोंका जप किया था उन चारों स्तोत्रोंको आप मुझे बतलावें॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि जप्यानेतांस्तपोधन।<br>दुःस्वप्ननाशो भवति यैरुक्तैः संश्रुतैः स्मृतैः॥ २<br><br>गजेन्द्रमोक्षणं त्वादौ शृणुष्व तदनन्तरम्।<br>सारस्वतं ततः पुण्यौ पापप्रशमनौ स्तवौ॥ ३<br><br>सर्वरत्नमयः श्रीमांस्त्रिकूटो नाम पर्वतः।<br>सुतः पर्वतराजस्य सुमेरोर्भास्करद्युतेः॥ ४<br><br>क्षीरोदजलवीच्यग्रैर्धौतामलशिलातलः ।<br>उत्थितः सागरं भित्त्वा देवर्षिगणसेवितः॥ ५ | **पुलस्त्यजी बोले—**तपोधन! मैं उन (जप करनेयोग्य) स्तोत्रोंका वर्णन करता हूँ जिनके कहने, सुनने और स्मरण करनेसे दुःस्वप्नोंका विनाश होता है उसे आप सुनें। पहले गजेन्द्रमोक्षणस्तोत्र सुनिये। उसके बाद सारस्वतस्तोत्र एवं उसके बाद पापोंके प्रशमन करनेवाले (दो पवित्र) स्तोत्रोंका वर्णन करूँगा। सूर्यके सदृश कान्तिवाले पर्वतराज सुमेरुका पुत्र सर्वरत्नोंसे भरा श्रीसे सम्पन्न त्रिकूट नामका एक पर्वत है। क्षीरसागरके जलकी लहरोंसे धुले हुए निर्मल शिलातलवाला वह पर्वत समुद्रका भेदन कर उसके ऊपर निकल आया है एवं देवता और ऋषिगण वहाँ सदा निवास करते हैं॥ २—५॥ |
| अप्सरोभिः परिवृतः श्रीमान् प्रस्त्रवणाकुलः।<br>गन्धर्वैः किन्नरैर्यक्षैः सिद्धचारणपन्नगैः॥ ६<br><br>विद्याधरैः सपत्नीकैः संयतैश्च तपस्विभिः।<br>वृकद्वीपिगजेन्द्रैश्च वृतगात्रो विराजते॥ ७<br><br>पुन्नागैः कर्णिकारैश्च बिल्वामलकपाटलैः।<br>चूतनीपकदम्बैश्च चन्दनागुरुचम्पकैः॥ ८<br><br>शालैस्तालैस्तमालैश्च सरलार्जुनपर्पटैः।<br>तथान्यैर्विविधैर्वृक्षैः सर्वतः समलङ्कृतः॥ ९ | अप्सराओंसे घिरा, झरते हुए झरनोंवाला, गन्धर्वों, किन्नरों, यक्षों, सिद्धों, चारणों, पन्नगों, पत्नीके साथ विद्याधरों, संयमका पालन करनेवाले तपस्वियों और भेड़ियों, चीतों एवं गजेन्द्रोंसे भरा-पूरा वह शोभाशाली पर्वत अत्यन्त सुशोभित है। पुंनाग, कर्णिकार, बिल्व, आमलक, पाटल, आम्र, नीप, कदम्ब, चन्दन, अगुरु, चम्पक, शाल, ताल, तमाल, सरल, अर्जुन, पर्पट तथा दूसरे बहुत प्रकारके वृक्षोंसे वह पर्वत सब तरहसे सुशोभित है॥ ६—९॥ |
| ४१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नानाधात्वङ्कितैः शृङ्गैः प्रस्रवद्भिः समन्ततः।<br>शोभितो रुचिरप्रख्यैस्त्रिभिर्विस्तीर्णसानुभिः॥ १०॥<br><br>मृगैः शाखामृगैः सिंहैर्मतङ्गजैश्च सदामदैः।<br>जीवंजीवकसंघुष्टैश्चकोरशिखिनादितैः ॥ ११॥<br><br>तस्यैकं काञ्चनं शृङ्गं सेवते यं दिवाकरः।<br>नानापुष्पसमाकीर्णं नानागन्धाधिवासितम्॥ १२॥<br><br>द्वितीयं राजतं शृङ्गं सेवते यं निशाकरः।<br>पाण्डुराम्बुदसंकाशं तुषारचयसंनिभम्॥ १३॥ | वह पर्वत भाँति-भाँतिकी धातुओंसे चमकती चोटियों, चारों ओरसे बहनेवाले झरनों और अत्यन्त मनोहर तथा सुदूर देशमें फैले हुए तीन शिखरोंसे शोभित है। वह पर्वत हरिण, बन्दर, सिंह, मदसे मतवाले हाथी, चातक, चकोर एवं मोर आदिके शब्दोंसे सदा शब्दायमान होता रहता है। कई प्रकारके फूलोंसे भरे-पूरे एवं तरह-तरहकी सुगन्धोंसे सुवासित उसके एक सुनहले शिखरका सेवन सूर्य करते हैं। सफेद बादलोंकी तरह एवं बर्फके ढेरके समान चाँदी-जैसी उसकी दूसरी चोटीका सेवन चन्द्रमा करते हैं॥ १०—१३॥ |
| वज्रेन्द्रनीलवैडूर्यतेजोभिर्भासयन् दिशः।<br>तृतीयं ब्रह्मसदनं प्रकृष्टं शृङ्गमुत्तमम्॥ १४॥<br><br>न तत् कृतघ्नाः पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः।<br>नातप्ततपसो लोके ये च पापकृतो जनाः॥ १५॥<br><br>तस्य सानुमतः पृष्ठे सरः काञ्चनपङ्कजम्।<br>कारण्डवसमाकीर्णं राजहंसोपशोभितम्॥ १६॥<br><br>कुमुदोत्पलकह्लारैः पुण्डरीकैश्च मण्डितम्।<br>कमलैः शतपत्रैश्च काञ्चनैः समलङ्कृतम्॥ १७॥<br><br>पत्रैर्मरकतप्रख्यैः पुष्पैः काञ्चनसंनिभैः।<br>गुल्मैः कीचकवेणूनां समन्तात् परिवेष्टितम्॥ १८॥ | हीरा, इन्द्रनील, वैडूर्य आदि रत्नोंकी चमकसे दिशाओंको प्रकाशित करनेवाला उसका अत्यन्त उत्तम तीसरा शिखर ब्रह्माका निवास-स्थान है। कृतघ्न, क्रूर, नास्तिक, तपस्यासे हीन एवं लोकमें पापकर्म करनेवाले मनुष्य उसे नहीं देख सकते। उस पर्वतके पीछेकी ओर कमलोंसे युक्त, कारण्डव पक्षियोंसे भरे, राजहंसोंसे सुशोभित, कुमुद, उत्पल, कह्लार, पुण्डरीक आदि अनेक प्रकारके सुनहले कमलोंसे अलङ्कृत एवं सुनहले शतपत्रोंवाले तथा अन्य प्रकारके कमलोंसे (और भी) सुशोभित एवं मरकतके सदृश पत्तों तथा सोनेके समान पुष्पों और हवासे चूँ-चूँ शब्द करनेवाले बाँसके झाड़ोंसे चारों ओरसे घिरा एक सरोवर है॥ १४—१८॥ |
| तस्मिन् सरसि दुष्टात्मा विरूपोऽन्तर्जलेशयः।<br>आसीद् ग्राहो गजेन्द्राणां रिपुराकेकरेक्षणः॥ १९॥ | उस सरोवरके जलमें हाथियोंका शत्रु दुष्ट स्वभावका आधी खुली आँखोंवाला कुरूप एक मगर रहता था। |
| अथ दन्तोज्ज्वलमुखः कदाचिद् गजयूथपः।<br>मदस्रावी जलाकाङ्क्षी पादचारीव पर्वतः॥ २०॥ | एक समय उज्ज्वल दाँतोंवाला, मदस्रावी, पैरसे चलनेवाले पर्वतके समान, मदके गन्धसे वासित |
| वासयन्मदगन्धेन गिरिमैरावतोपमः।<br>गजो ह्यञ्जनसंकाशो मदाच्चलितलोचनः॥ २१॥ | ऐरावतके सदृश अञ्जनकी भाँति काला, मदके कारण चञ्चल नेत्रोंवाला, प्यासा एक गजयूथपति पानी पीनेकी |
| तृषितः पातुकामोऽसौ अवतीर्णश्च तज्जलम्।<br>सलीलः पङ्कजवने यूथमध्यगतश्चरन्॥ २२॥ | इच्छासे उस सरोवरके जलमें पैठा और कमलोंके समूहमें अपने झुंडके बीचमें रहकर क्रीडा करने लगा। |
अध्याय ८४] प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गृहीतस्तेन रौद्रेण ग्राहेणाव्यक्तमूर्तिना।<br>पश्यन्तीनां करेणूनां क्रोशन्तीनां च दारुणम्॥ २३<br><br>ह्रियते पङ्कजवने ग्राहेणातिबलीयसा।<br>वारुणैः संयतः पाशैर्निष्प्रयत्नगतिः कृतः॥ २४ | (जलके भीतर) अपने शरीरको छिपाये हुए एक भयंकर ग्राहने उसे पकड़ लिया। करुण स्वरसे चिग्घाड़ कर रही हथिनियोंके देखते-ही-देखते अत्यन्त बलवान् ग्राह उसे कमलोंसे संकुल जलमें खींच ले गया और वरुणके पाशोंसे बाँधकर उसे चेष्टारहित एवं गतिहीन (विवश) कर दिया॥ १९—२४॥ |
| वेष्ट्यमानः सुघोरैस्तु पाशैर्नागो दृढैस्तथा।<br>विस्फूर्य च यथाशक्ति विक्रोशंश्च महारवान्॥ २५<br><br>व्यथितः स निरुत्साहो गृहीतो घोरकर्मणा।<br>परमापदमापन्नो मनसाऽचिन्तयद्धरिम्॥ २६<br><br>स तु नागवरः श्रीमान् नारायणपरायणः।<br>तमेव शरणं देवं गतः सर्वात्मना तदा॥ २७<br><br>एकात्मा निगृहीतात्मा विशुद्धेनान्तरात्मना।<br>जन्मजन्मान्तराभ्यासाद् भक्तिमान् गरुडध्वजे॥ २८<br><br>नान्यं देवं महादेवात् पूजयामास केशवात्।<br>मथितामृतफेनाभं शङ्खचक्रगदाधरम्॥ २९<br><br>सहस्रशुभनामानमादिदेवमजं विभुम्।<br>प्रगृह्य पुष्कराग्रेण काञ्चनं कमलोत्तमम्।<br>आपद्विमोक्षमन्विच्छन् गजः स्तोत्रमुदीरयत्॥ ३० | वहाँ सुदृढ और भयङ्कर पाशोंसे आबद्ध हो जानेके कारण गजराज यथाशक्ति छटपटाकर ऊँचे स्वरसे चिग्घाड़ने लगा। क्रूर कर्मवाले (उस ग्राह)-के द्वारा पकड़े जानेपर वह पीड़ित और उत्साहरहित हो गया। भारी विपत्तिमें पड़कर वह मनसे भगवान् श्रीहरिका ध्यान करने लगा। वह सुन्दर गजराज (पूर्वजन्मका) नारायणका भक्त था। इसलिये वह उस समय सर्वतोभावेन उन्हीं देवकी शरणमें प्रपन्न हो गया। वह गजराज जन्म-जन्मान्तरके अभ्याससे एकाग्र एवं संयतचित्त होकर विशुद्ध अन्तःकरणसे गरुडध्वज भगवान् विष्णुकी भक्तिमें लग गया था। उसने महान् देव केशव (श्रीविष्णु)-के सिवा अन्य देवताओंकी पूजा नहीं की। उस गजने मथे हुए अमृतके फेनके समान कान्तिवाले, शङ्ख तथा चक्र और गदाको धारण करनेवाले, सहस्रों शुभ नामोंवाले, आदिदेव एवं अजन्मा सर्वव्यापक विष्णु (नारायण)-का ध्यान किया और अपने शुण्डके अग्रभागमें एक उत्तम स्वर्ण-कमल लेकर (इस) आपत्तिसे मुक्ति प्राप्त करनेकी इच्छासे इस स्तोत्रका पाठ करने लगा॥ २५—३०॥ |
| गजेन्द्र उवाच<br><br>ॐ नमो मूलप्रकृतये अजिताय महात्मने।<br>अनाश्रिताय देवाय निःस्पृहाय नमोऽस्तु ते॥ ३१<br><br>नम आद्याय बीजाय आर्षेयाय प्रवर्तिने।<br>अनन्तराय चैकाय अव्यक्ताय नमो नमः॥ ३२<br><br>नमो गुह्याय गूढाय गुणाय गुणवर्तिने।<br>अप्रतर्क्याप्रमेयाय अतुलाय नमो नमः॥ ३३<br><br>नमः शिवाय शान्ताय निश्चिन्ताय यशस्विने।<br>सनातनाय पूर्वाय पुराणाय नमो नमः॥ ३४ | गजेन्द्र बोला— ॐ मूलप्रकृतिस्वरूप महान् आत्मा अजित विष्णुभगवान्को नमस्कार है। अन्योंपर आश्रित न रहनेवाले एवं (किसी वस्तुकी प्राप्तिकी) इच्छासे रहित आप देवको नमस्कार है। आद्यबीजस्वरूप, ऋषियोंके आराध्यदेव संसारचक्रके प्रवर्तक आपको नमस्कार है। अन्तररहित—सर्वत्र व्याप्त एकमात्र अव्यक्तको पुनः-पुनः नमस्कार है। गुह्य, गूढ़, गुणस्वरूप एवं गुणोंमें रहनेवालेको नमस्कार है। तर्कसे अतीत, निर्णयात्मिका बुद्धिसे भी नहीं समझे जानेयोग्य, अतुलनीय (आप)-को बार-बार नमस्कार है। प्रथम मङ्गलमय, शान्त, निश्चिन्त, यशस्वी, सनातन और पुराणपुरुषको बार-बार नमस्कार है॥ ३१—३४॥ |
| ४१४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय.८४ |
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| नमो देवाधिदेवाय स्वभावाय नमो नमः।<br>नमो जगत्प्रतिष्ठाय गोविन्दाय नमो नमः॥ ३५<br><br>नमोऽस्तु पद्मनाभाय नमो योगोद्भवाय च।<br>विश्वेश्वराय देवाय शिवाय हरये नमः॥ ३६<br><br>नमोऽस्तु तस्मै देवाय निर्गुणाय गुणात्मने।<br>नारायणाय विश्वाय देवानां परमात्मने॥ ३७<br><br>नमो नमः कारणवामनाय<br>नारायणायामितविक्रमाय ।<br>श्रीशाङ्गिर्चक्रासिगदाधराय<br>नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय॥ ३८ | आप देवाधिदेवको नमस्कार है। स्वभावस्वरूपी आपको बार-बार नमस्कार है। जगत्की प्रतिष्ठा करनेवाले (आप)-को नमस्कार है। गोविन्दको बार-बार नमस्कार है। पद्मनाभको नमस्कार है और योगसे उत्पन्न होनेवाले (आप) योगोद्भवको नमस्कार है। विश्वेश्वर, देव, शिव, हरिको नमस्कार है। निर्गुण और गुणात्मा उन (प्रसिद्ध) देवको नमस्कार है। विश्वात्मा, नारायण एवं देवोंके परम आत्मा (आप)-को नमस्कार हैं। कारणवश वामनरूप धारण करनेवाले, अतुल विक्रमवाले नारायणको नमस्कार है। श्री, शार्ङ्ग, चक्र, तलवार एवं गदा धारण करनेवाले उन पुरुषोत्तमको नमस्कार है॥ ३५–३८॥ | | गुह्याय वेदनिलयाय महोदराय<br>सिंहाय दैत्यनिधनाय चतुर्भुजाय।<br>ब्रह्मेन्द्ररुद्रमुनिचारणसंस्तुताय<br>देवोत्तमाय वरदाय नमोऽच्युताय॥ ३९<br><br>नागेन्द्रदेहशयनासनसुप्रियाय<br>गोक्षीरहेमशुकनीलघनोपमाय ।<br>पीताम्बराय मधुकैटभनाशनाय<br>विश्वाय चारुमुकुटाय नमोऽजराय॥ ४०<br><br>नाभिप्रजातकमलस्थचतुर्मुखाय<br>क्षीरोदकार्णवनिकेतयशोधराय ।<br>नानाविचित्रमुकुटाङ्गदभूषणाय<br>सर्वेश्वराय वरदाय नमो वराय॥ ४१<br><br>भक्तिप्रियाय वरदीप्तिसुदर्शनाय<br>फुल्लारविन्दविपुलायतलोचनाय ।<br>देवेन्द्रविघ्नशमनोद्यतपौरुषाय<br>योगेश्वराय विरजाय नमो वराय॥ ४२ | गुह्य, वेदनिलय, महोदर, दैत्यके निधनके लिये सिंहरूप धारण करनेवाले, चार भुजाओंवाले, ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मुनि तथा चारणोंके द्वारा स्तुत किये गये वरदानी देवोत्तम अच्युतभगवान्को नमस्कार है। शेषनागके शरीरपर प्रसन्नतापूर्वक शयन करनेवाले, गोदुग्ध, स्वर्ण, शुक एवं नीलघनकी उपमासे युक्त, पीला वस्त्र धारण करनेवाले, मधु-कैटभका विनाश करनेवाले, सुन्दर मुकुट धारण करनेवाले, वृद्धावस्थासे रहित, विश्वकी आत्मा आप देवको नमस्कार है। नाभिसे उत्पन्न हुए कमलपर स्थित ब्रह्मासे युक्त, क्षीरसमुद्रको अपना निवास बनानेवाले, यशस्वी, अनेक प्रकारके विचित्र मुकुट एवं अङ्गद आदि आभूषणोंसे युक्त, वरदानी तथा वरस्वरूप सर्वेश्वरको नमस्कार है। भक्तिके प्रेमी, श्रेष्ठ दीप्तिसे सर्वथा पूर्ण सुन्दर दिखलायी देनेवाले, खिले हुए कमलके समान विशाल आँखोंवाले, देवेन्द्रके विघ्नोंका विनाश करनेके लिये पुरुषार्थ करनेको उद्यत वरस्वरूप, विरज योगेश्वरको नमस्कार है॥ ३९–४२॥ | | ब्रह्मायनाय त्रिदशायनाय<br>लोकाधिनाथाय भवापनाय।<br>नारायणायात्महितायनाय<br>महावराहाय नमस्करोमि॥ ४३<br><br>कूटस्थमव्यक्तमचिन्त्यरूपं<br>नारायणं कारणमादिदेवम्। | ब्रह्मा और अन्य देवोंके आधारस्वरूप, लोकाधिनाथ, भवहर्त्ता, नारायण आत्महितके आश्रयस्थान महावराहको नमस्कार करता हूँ। मैं कूटस्थ, अव्यक्त, अचिन्त्य रूपवाले, कारणस्वरूप, आदिदेव |
अध्याय ८४] प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१५
| श्लोक | अर्थ |
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| युगान्तशेषं पुरुषं पुराणं<br>तं देवदेवं शरणं प्रपद्ये ॥ ४४<br>योगेश्वरं चारुविचित्रमौलि-<br>मज्ञेयमग्र्यं प्रकृतेः परस्थम्।<br>क्षेत्रज्ञमात्मप्रभवं वरेण्यं<br>तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये ॥ ४५<br>अदृश्यमव्यक्तमचिन्त्यमव्ययं<br>महर्षयो ब्रह्ममयं सनातनम्।<br>वदन्ति यं वै पुरुषं सनातनं<br>तं देवगुह्यं शरणं प्रपद्ये ॥ ४६ | नारायण, युगान्तमें शेष रहनेवाले पुराणपुरुष, देवाधिदेवकी शरण ग्रहण करता हूँ। मैं योगेश्वर, सुन्दर विचित्र रंगोंसे युक्त मुकुटको धारण करनेवाले, अज्ञेय, सर्वश्रेष्ठ, प्रकृतिके परे अवस्थित, क्षेत्रज्ञ, आत्मप्रभव, वरेण्य उन वासुदेवकी शरण ग्रहण करता हूँ। ब्रह्मर्षिजन जिन्हें अदृश्य, अव्यक्त, अचिन्तनीय, अव्यय, ब्रह्ममय और सनातन पुरुष कहते हैं, उन देवगुह्यकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥ ४३—४६॥ |
| यदक्षरं ब्रह्म वदन्ति सर्वगं<br>निशम्य यं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते।<br>तमीश्वरं तृप्तमनुत्तमैर्गुणैः<br>परायणं विष्णुमुपैमि शाश्वतम् ॥ ४७<br>कार्यं क्रिया कारणमप्रमेयं<br>हिरण्यबाहुं वरपद्मनाभम्।<br>महाबलं वेदनिधिं सुरेशं<br>व्रजामि विष्णुं शरणं जनार्दनम् ॥ ४८<br>किरीटकेयूरमहार्हनिष्कै-<br>र्मण्युत्तमालङ्कृतसर्वगात्रम् ।<br>पीताम्बरं काञ्चनभक्तिचित्रं<br>मालाधरं केशवमभ्युपैमि ॥ ४९<br>भवोद्भवं वेदविदां वरिष्ठं<br>योगात्मनां सांख्यविदां वरिष्ठम्।<br>आदित्यरुद्राश्विवसुप्रभावं<br>प्रभुं प्रपद्येऽच्युतमात्मवन्तम् ॥ ५० | (ब्रह्मवेत्ता) जिसे अक्षर एवं सर्वव्यापी ब्रह्म कहते हैं तथा जिसके श्रवणसे मृत्युके मुखसे मुक्ति मिल जाती है, मैं उसी श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त, आत्मतृप्त, शाश्वत आश्रयस्वरूप ईश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ। मैं कार्य, क्रिया और कारणस्वरूप, प्रमाणसे अगम्य, हिरण्यबाहु, नाभिमें श्रेष्ठ कमल धारण करनेवाले, महाबलशाली, वेदोंकी निधि, सुरेश्वर जनार्दन विष्णुकी शरणमें जाता हूँ। मैं किरीट, केयूर एवं अतिमूल्यवान् श्रेष्ठ मणियोंसे सुसज्जित समस्त शरीरवाले, पीताम्बर धारण करनेवाले, स्वर्णिम पत्र-रचनासे अलङ्कृत, माला धारण करनेवाले केशवकी शरणमें जाता हूँ। मैं संसारको उत्पन्न करनेवाले, वेदके जाननेवालोंमें श्रेष्ठ, योगात्माओं तथा सांख्यशास्त्रके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ, आदित्य, रुद्र, अश्विनीकुमार एवं वसुओंके प्रभावसे युक्त अच्युत, आत्मस्वरूप प्रभुकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ४७—५०॥ |
| श्रीवत्साङ्कं महादेवं देवगुह्यमनौपमम्।<br>प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम् ॥ ५१ | मैं श्रीवत्स-चिह्न धारण करनेवाले, महान् देव, देवताओंमें गुह्य, उपमासे रहित, सूक्ष्म, अचल तथा अभय देनेवाले वरेण्य देवकी शरण ग्रहण करता हूँ। |
| प्रभवं सर्वभूतानां निर्गुणं परमेश्वरम्।<br>प्रपद्ये मुक्तसङ्गानां यतीनां परमां गतिम् ॥ ५२ | मैं समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले, निर्गुण, निःसङ्ग, यम और नियमका पालन करनेवाले संन्यासियोंकी परम गतिस्वरूप परमेश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ। |
| भगवन्तं गुणाध्यक्षमक्षरं पुष्करेक्षणम्।<br>शरण्यं शरणं भक्त्या प्रपद्ये भक्तवत्सलम् ॥ ५३ | मैं गुणाध्यक्ष, अक्षर, कमलनयन, आश्रय ग्रहण करनेयोग्य, शरण देनेवाले, भक्तोंसे प्रेम रखनेवाले भगवान्की श्रद्धापूर्वक शरण ग्रहण करता हूँ। |
| त्रिविक्रमं त्रिलोकेशं सर्वेषां प्रपितामहम्।<br>योगात्मानं महात्मानं प्रपद्येऽहं जनार्दनम् ॥ ५४ | मैं तीन पगोंमें तीनों लोकोंको नाप लेनेवाले, तीनों लोकोंके ईश्वर, सभीके प्रपितामह, योगकी मूर्ति, महात्मा जनार्दनकी शरण ग्रहण |
| ४१६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आदिदेवमजं शम्भुं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्।<br>नारायणमणीयांसं प्रपद्ये ब्राह्मणप्रियम् ॥ ५५ | करता हूँ। मैं आदिदेव, अजन्मा, शम्भु, व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप, सनातन, परम सूक्ष्म, ब्राह्मणप्रिय नारायणकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ५१—५५॥ |
| नमो वराय देवाय नमः सर्वसहाय च।<br>प्रपद्ये देवदेवेशमणीयांसमणोः सदा॥ ५६<br>एकाय लोकतत्त्वाय परतः परमात्मने।<br>नमः सहस्रशिरसे अनन्ताय महात्मने॥ ५७<br><br>त्वामेव परमं देवमृषयो वेदपारगाः।<br>कीर्तयन्ति च यं सर्वे ब्रह्मादीनां परायणम् ॥ ५८<br><br>नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामभयप्रद।<br>सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम्॥ ५९ | श्रेष्ठ देवको नमस्कार है। सर्वशक्तिमान्को नमस्कार है। मैं सदा सूक्ष्म-से-सूक्ष्म देवदेवेशकी शरण हूँ। लोकतत्त्वस्वरूप, एकमात्र परात्पर परमात्मा, सहस्रशीर्ष महात्मा अनन्तको नमस्कार है। वेदोंके पारगामी ऋषिगण आपको ही परम देव एवं ब्रह्मा आदि देवोंका आश्रयस्थान कहते हैं। हे पुण्डरीकाक्ष! हे भक्तोंको अभयदान देनेवाले! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य! आपको नमस्कार है। आप मुझ शरणागतकी रक्षा करें॥ ५६—५९॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>भक्तिं तस्यानुसंचिन्त्य नागस्यामोघसम्भवः।<br>प्रीतिमानभवद् विष्णुः शङ्खचक्रगदाधरः ॥ ६०<br>सान्निध्यं कल्पयामास तस्मिन् सरसि केशवः।<br>गरुडस्थो जगत्स्वामी लोकाधारस्तपोधनः ॥ ६१<br>ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं तं तं च ग्राहं जलाशयात्।<br>उज्जहाराप्रमेयात्मा तरसा मधुसूदनः ॥ ६२<br>स्थलस्थं दारयामास ग्राहं चक्रेण माधवः।<br>मोक्षयामास नागेन्द्रं पाशेभ्यः शरणागतम् ॥ ६३<br>स हि देवलशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तमः।<br>ग्राहत्वमगमत् कृष्णाद् वधं प्राप्य दिवंगतः ॥ ६४ | पुलस्त्यजी बोले—शङ्ख, चक्र एवं गदाको धारण करनेवाले, सफलताके आश्रय विष्णु उस गजेन्द्रकी भक्तिका विचार कर प्रसन्न हो गये। उसके बाद संसारके आधार जगत्स्वामी तपोधन केशव गरुड़पर सवार हो उस सरोवरके निकट गये। अप्रमेय आत्मस्वरूप मधुसूदनने ग्राहके द्वारा पकड़े गये उस गजेन्द्र तथा उस ग्राहको वेगपूर्वक सरोवरसे बाहर निकाला। माधवने पृथ्वीपर स्थित ग्राहको चक्रके द्वारा विदीर्ण कर शरणापन्न गजेन्द्रको बन्धनसे मुक्त कर दिया। देवलके शापसे ग्राह बना हुआ गन्धर्वश्रेष्ठ हूहू भगवान् श्रीकृष्णसे मृत्यु पाकर स्वर्ग चला गया॥ ६०—६४॥ |
| गजोऽपि विष्णुना स्पृष्टो जातो दिव्यवपुः पुमान्।<br>आपद्विमुक्तौ युगपद् गजगन्धर्वसत्तमौ ॥ ६५<br>प्रीतिमान् पुण्डरीकाक्षः शरणागतवत्सलः।<br>अभवत् त्वथ देवेशस्ताभ्यां चैव प्रपूजितः॥ ६६<br>इदं च भगवान् योगी गजेन्द्रं शरणागतम्।<br>प्रोवाच मुनिशार्दूल मधुरं मधुसूदनः ॥ ६७ | भगवान् विष्णुका स्पर्श होनेसे वह हाथी भी दिव्य शरीर धारण करनेवाला पुरुष हो गया। इस प्रकार हाथी एवं गन्धर्वश्रेष्ठ दोनों एक ही साथ संकटसे मुक्त हो गये। मुनिवर! उसके बाद उन दोनोंसे पूजित होकर शरणागतवत्सल पुण्डरीकाक्ष देवेश प्रसन्न हुए और उन योगी भगवान् मधुसूदनने शरणागत गजेन्द्रसे यह मधुर वचन कहा—॥ ६५—६७॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>ये मां त्वां च सरश्चैव ग्राहस्य च विदारणम्।<br>गुल्मकीचकरेणूनां रूपं मेरोः सुतस्य च ॥ ६८ | श्रीभगवान्ने कहा—स्थिर बुद्धिसे पवित्र व्रत धारण करनेवाले जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक मेरा, तुम्हारा तथा इस सरोवरका एवं ग्राहके विदारण, गुल्म, कीचक, रेणु |
अध्याय ८४] प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अश्वत्थं भास्करं गङ्गां नैमिषारण्यमेव च।<br>संस्मरिष्यन्ति मनुजाः प्रयताः स्थिरबुद्धयः ॥ ६९<br>कीर्तयिष्यन्ति भक्त्या च श्रोष्यन्ति च शुचिव्रताः।<br>दुःस्वप्नो नश्यते तेषां सुस्वप्नश्च भविष्यति ॥ ७०<br>मात्स्यं कौर्मञ्च वाराहं वामनं तार्क्ष्यमेव च।<br>नारसिंहं च नागेन्द्रं सृष्टिप्रलयकारकम् ॥ ७१<br>एतानि प्रातरुत्थाय संस्मरिष्यन्ति ये नराः।<br>सर्वपापैः प्रमुच्यन्ते पुण्यं लोकमवाप्नुयुः ॥ ७२ | एवं मेरु पुत्रके रूप, पीपल, सूर्य, गङ्गा और नैमिषारण्यका श्रद्धापूर्वक स्मरण एवं कीर्तन तथा श्रवण करेंगे उनके दुःस्वप्नका विनाश हो जायगा एवं सुस्वप्नकी सृष्टि होगी। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वराहावतार, वामनावतार, गरुड़, नरसिंहावतार, गजेन्द्र और सृष्टि-प्रलय करनेवाले (भगवान्)-का स्मरण करेंगे, वे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यलोकको प्राप्त करेंगे॥ ६८–७२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>एवमुक्त्वा हृषीकेशो गजेन्द्रं गरुडध्वजः।<br>स्पर्शयामास हस्तेन गजं गन्धर्वमेव च ॥ ७३<br>ततो दिव्यवपुर्भूत्वा गजेन्द्रो मधुसूदनम्।<br>जगाम शरणं विप्र नारायणपरायणः ॥ ७४<br>ततो नारायणः श्रीमान् मोक्षयित्वा गजोत्तमम्।<br>पापबन्धाच्च शापाच्च ग्राहं चाद्भुतकर्मकृत् ॥ ७५<br>ऋषिभिः स्तूयमानश्च देवगुह्यपरायणैः।<br>गतः स भगवान् विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः ॥ ७६ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) गजेन्द्रसे ऐसा कहकर गरुड़ध्वज हृषीकेशने हाथसे गजेन्द्र और गन्धर्व दोनोंका स्पर्श किया। हे विप्र! उसके बाद नारायणकी आराधना करनेमें लीन गजेन्द्र दिव्य शरीर धारणकर मधुसूदनकी शरणमें चला गया। उसके बाद अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीमान् नारायणने गजोत्तम एवं ग्राहको पाप-बन्धसे एवं शापसे मुक्त किया। भगवद्भक्त ऋषियोंद्वारा स्तुत होते हुए वे अविज्ञेय गतिवाले प्रभु भगवान् विष्णु (अपने धाम) चले गये॥ ७३—७६॥ |
| गजेन्द्रमोक्षणं दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>ववन्दिरे महात्मानं प्रभुं नारायणं हरिम् ॥ ७७<br>महर्षयश्चारणाश्च दृष्ट्वा गजविमोक्षणम्।<br>विस्मयोत्फुल्लनयनाः संस्तुवन्ति जनार्दनम् ॥ ७८<br>प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा चक्रपाणिविचेष्टितम्।<br>गजेन्द्रमोक्षणं दृष्ट्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७९<br>य इदं शृणुयान्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः।<br>प्राप्नुयात् परमां सिद्धिं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति ॥ ८० | गजेन्द्रके मोक्षको देखकर इन्द्र आदि देवोंने महात्मा प्रभु नारायण श्रीहरिकी वन्दना की। गजको ग्राहसे मुक्त हुए देखकर विस्मयसे खिले नेत्रोंवाले महर्षियों एवं चारणोंने जनार्दनकी स्तुति की। चक्रपाणिके गजेन्द्रमोक्षणरूपी कर्मको देखकर प्रजापति ब्रह्माने यह वचन कहा—जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन इसे सुनेगा, वह परमसिद्धिको प्राप्त करेगा और उसका दुःस्वप्न विनष्ट हो जायगा॥ ७७—८०॥ |
| गजेन्द्रमोक्षणं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>कथितेन स्मृतेनाथ श्रुतेन च तपोधन।<br>गजेन्द्रमोक्षणेनेह सद्यः पापात् प्रमुच्यते ॥ ८१<br>एतत्पवित्रं परमं सुपुण्यं<br>संकीर्तनीयं चरितं मुरारेः।<br>यस्मिन् किलोक्ते बहुपापबन्धनात्<br>लभ्येत मोक्षो द्विरदेन यद्वत् ॥ ८२<br>अजं वरेण्यं वरपद्मनाभं<br>नारायणं ब्रह्मनिधिं सुरेशम्। | तपोधन! गजेन्द्रमोक्ष पवित्र और सब प्रकारके पापोंका नाश करनेवाला है। इस गजेन्द्रमोक्षके कहने, स्मरण करने और सुननेसे मनुष्य तुरंत सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। मुरारि विष्णुका यह पवित्र चरित्र पुण्य प्रदान करनेवाला तथा कीर्तन करने योग्य है। इसे कहनेसे मनुष्य गजेन्द्रके समान अनेक पापोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। मैं अज, वरेण्य, श्रेष्ठ, पद्मनाभ, नारायण, ब्रह्मनिधि, सुरेश, |
| ४१८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८५ |
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| तं देवगुह्यं पुरुषं पुराणं<br>वन्दाम्यहं लोकपतिं वरेण्यम्॥ ८३<br>पुलस्त्य उवाच<br>एतत् तवोक्तं प्रवरं स्तवानां<br>स्तवं मुरारेर्वरनागकीर्तनम्।<br>यं कीर्त्य संश्रुत्य तथा विचिन्त्य<br>पापापनोदं पुरुषो लभेत॥ ८४ | देवगुह्य, पुराणपुरुष उन लोक-स्वामीकी वन्दना करता हूँ॥ ८१-८३॥<br><br>पुलस्त्यजी बोले—स्तुतियोंमें श्रेष्ठ गजेन्द्रद्वारा कीर्तित मुरारिके इस श्रेष्ठ स्तोत्रको मैंने तुमसे कहा। इसके कीर्तन, श्रवण तथा चिन्तन करनेसे मनुष्य पापोंसे विमुक्ति पा जाता है॥ ८४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौरासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८४॥
पचासीवाँ अध्याय
सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त, राक्षसग्रस्त मुनिकी अग्नि-प्रार्थना, सारस्वतस्तोत्र और मुनिद्वारा राक्षसको उपदेश
| पुलस्त्य उवाच<br>कश्चिदासीद् द्विजद्रोग्धा पिशुनः क्षत्रियाधमः।<br>परपीडारुचिः क्षुद्रः स्वभावादपि निर्घृणः॥ १<br>पर्यासिताः सदा तेन पितृदेवद्विजातयः।<br>स त्वायुषि परिक्षीणे जज्ञे घोरो निशाचरः॥ २<br>तेनैव कर्मदोषेण स्वेन पापकृतां वरः।<br>क्रूरैश्चक्रे ततो वृत्तिं राक्षसत्वाद् विशेषतः॥ ३<br>तस्य पापरतस्यैवं जग्मुर्वर्षशतानि तु।<br>तेनैव कर्मदोषेण नान्यां वृत्तिमरोचयत्॥ ४<br>यं यं पश्यति सत्त्वं स तं तमादाय राक्षसः।<br>चखाद रौद्रकर्मासौ बाहुगोचरमागतम्॥ ५<br>एवं तस्यातिदुष्टस्य कुर्वतः प्राणिनां वधम्।<br>जगाम च महान् कालः परिणामं तथा वयः॥ ६<br><br>स कदाचित् तपस्यन्तं ददर्श सरितस्तटे।<br>महाभागमूर्ध्वभुजं यथावत्संयतेन्द्रियम्॥ ७ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) ब्राह्मणसे वैर और घृणा रखनेवाला, चुगलखोर, दूसरोंको कष्ट देनेवाला, नीच, स्वभावसे भी निर्दय एक अधम क्षत्रिय था। उसने सदा ही पितरों, देवों एवं द्विजातियोंका अपमान किया। आयु समाप्त होनेपर वह भयंकर राक्षस हुआ। अपने उसी कर्मके दोष एवं विशेषकर राक्षस होनेके कारण वह नीच पापी अशुभ कर्मोंद्वारा जीवनका निर्वाह करता रहा। पापकर्म करते हुए उसके सौ वर्ष बीत गये। उसी कर्म-दोषके कारण जीविकाके दूसरे साधनोंमें उसकी इच्छा नहीं होती थी। वह निन्दनीय कर्म करनेवाला राक्षस जिस प्राणीको देखता उसे अपनी भुजाओंसे पकड़कर खा जाता था॥ १-५॥<br><br>इस प्रकार प्राणियोंका संहार करते हुए उस अतिदुष्टका अधिक समय बीत गया और उसकी अवस्था ढलने लगी। किसी समय उसने नदी-तीरपर बाँह ऊपर उठाये एवं भलीभाँति इन्द्रियोंपर संयत किये हुए महाभाग्यशाली |