वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ८५ ] सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त ४१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अनया रक्षया ब्रह्मन् कृतरक्षं तपोनिधिम्।<br>योगाचार्यं शुचिं दक्षं वासुदेवपरायणम्॥ ८<br><br>विष्णुः प्राच्यां स्थितश्चक्री विष्णुर्दक्षिणतो गदी।<br>प्रतीच्यां शार्ङ्गधृग्विष्णुर्विष्णुः खड्गी ममोत्तरे॥ ९<br><br>हृषीकेशो विकोणेषु तच्छिद्रेषु जनार्दनः।<br>क्रोडरूपी हरिर्भूमौ नारसिंहोऽम्बरे मम॥ १०<br><br>क्षुरान्तममलं चक्रं भ्रमत्येतत् सुदर्शनम्।<br>अस्यांशुमाला दुष्प्रेक्ष्या हन्तुं प्रेतनिशाचरान्॥ ११ | ऋषिको तपस्या करते हुए देखा। ब्रह्मन्! तपोनिधि पवित्र दक्ष और वासुदेवकी आराधना करनेमें तत्पर उस योगाचार्यने अपनी रक्षा इस रक्षामन्त्रके द्वारा कर ली थी कि 'पूर्व दिशामें चक्र धारण करनेवाले विष्णु, दक्षिण दिशामें गदा धारण करनेवाले विष्णु, पश्चिम दिशामें शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले विष्णु और उत्तर दिशामें खड्ग धारण करनेवाले विष्णु मेरी रक्षा करें। दिशाओंके कोणों (अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण, ईशानकोणों)-में हृषीकेश, उन दिशाओं और कोणोंके मध्य अवशिष्ट स्थानोंमें जनार्दन, भूमिमें वराहरूप धारण करनेवाले हरि एवं आकाशमें नृसिंहभगवान् मेरी रक्षा करें। प्रेतों एवं निशाचरोंके संहारके लिये छुरेकी धारके समान अत्यन्त तीक्ष्ण यह निर्मल सुदर्शन चक्र घूम रहा है। इसकी किरणमालाका दर्शन होना प्रयत्न करनेपर भी सम्भव नहीं है॥ ६—११॥ |
| गदा चेयं सहस्रार्चिरुद्गमन् पावको यथा।<br>रक्षोभूतपिशाचानां डाकिनीनां च शातनी॥ १२<br><br>शार्ङ्गं विस्फूर्जितं चैव वासुदेवस्य मद्रिपून्।<br>तिर्यङ्मनुष्यकूष्माण्डप्रेतादीन् हन्त्वशेषतः॥ १३<br><br>खड्गधाराज्वलज्ज्योत्स्नानिर्धूता ये ममाहिताः।<br>ते यान्तु सौम्यतां सद्यो गरुडेनेव पन्नगाः॥ १४<br><br>ये कूष्माण्डास्तथा यक्षा दैत्या ये च निशाचराः।<br>प्रेता विनायकाः क्रूरा मनुष्या जृम्भकाः खगाः॥ १५<br><br>सिंहादयो ये पशवो दन्दशूकाश्च पन्नगाः।<br>सर्वे भवन्तु मे सौम्या विष्णुचक्ररवाहताः॥ १६ | ज्वाला उगलनेवाली अग्निकी भाँति हजारों किरणोंसे युक्त यह गदा राक्षसों, भूतों, पिशाचों और डाकिनियोंका संहार करे। वासुदेवका चमकनेवाला शार्ङ्गधनुष मेरे साथ शत्रुता काम करनेवाले हिंसक पशु-पक्षियों, मनुष्यों, दानवों तथा प्रेतोंका जड़-मूलसे विनाश करे। जैसे गरुड़को देखकर साँप शान्त हो जाते हैं, उसी प्रकार (विष्णुके) खड्गकी चमकती हुई तेज धारसे मेरा अहित करनेवाले निष्प्रभ होकर तत्काल शान्त हो जायँ। सारे कूष्माण्ड, यक्ष, दैत्य, निशाचर, प्रेत, विनायक, क्रूर मनुष्य, जृम्भक, पक्षी, सिंहादि पशु एवं तीव्र दाँतोंसे काट खानेवाले सर्प आदि—ये सभी विष्णुके चक्रकी तीव्र गतिसे घायल होकर मेरे प्रति सरल बन जायँ॥ १२—१६॥ |
| चित्तवृत्तिहरा ये च ये जनाः स्मृतिहारकाः।<br>बलौजसां च हर्तारश्छायाविध्वंसकाश्च ये॥ १७<br><br>ये चोपभोगहर्तारो ये च लक्षणनाशकाः।<br>कूष्माण्डास्ते प्रणश्यन्तु विष्णुचक्ररवाहताः॥ १८<br><br>बुद्धिस्वास्थ्यं मनःस्वास्थ्यं स्वास्थ्यमैन्द्रियकं तथा।<br>ममास्तु देवदेवस्य वासुदेवस्य कीर्तनात्॥ १९ | जो चित्तकी वृत्तियों—मानसिक आचार-व्यवहारोंका हरण करनेवाले, स्मृतिको हरण करनेवाले, बल और ओजको अपहरण करनेवाले, कान्तिका विध्वंस करनेवाले, सुखोंका विनाश करनेवाले तथा सुलक्षणोंके विनाशक हैं, वे सभी कूष्माण्डादि (भूत-प्रेत) विष्णुके चक्रकी तीव्र गतिसे घायल होकर नष्ट हो जायँ। देवदेव वासुदेवके कीर्तनसे मुझे बुद्धि, मन तथा इन्द्रियोंकी |
४२० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पृष्ठे पुरस्तादथ दक्षिणोत्तरे<br>विकोणतश्चास्तु जनार्दनो हरिः।<br>तमीड्यमीशानमनन्तमच्युतं<br>जनार्दनं प्रणिपतितो न सीदति॥ २० | सबलता प्राप्त हो। जनार्दन हरि मेरे पीछे, आगे, दायें, बायें एवं दिशाओंके कोणों (अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण, ईशानकोण)-में स्थित रहें। स्तुतियोग्य उन ईशान, अनन्त, अच्युत जनार्दनको साष्टाङ्ग प्रणिपात करनेवाला मनुष्य दुःखी नहीं होता॥ १७—२०॥ |
| यथा परं ब्रह्म हरिस्तथा परं<br>जगत्स्वरूपश्च स एव केशवः।<br>ऋतेन तेनाच्युतनामकीर्तनात्<br>प्रणाशमेतु त्रिविधं ममाशुभम्॥ २१<br>इत्यासावात्मरक्षार्थं कृत्वा वै विष्णुपञ्जरम्।<br>संस्थितोऽसावपि बली राक्षसः समुपाद्रवत्॥ २२<br>ततो द्विजनियुक्तायां रक्षायां रजनीचरः।<br>निर्धूतवेगः सहसा तस्थौ मासचतुष्टयम्॥ २३<br>यावद् द्विजस्य देवर्षे समाप्तिर्वै समाधितः।<br>जाते जप्यावसानेऽसौ तं ददर्श निशाचरम्॥ २४<br>दीनं हतबलोत्साहं कान्दिशीकं हतौजसम्।<br>तं दृष्ट्वा कृपयाविष्टः समाश्वास्य निशाचरम्॥ २५<br>पप्रच्छागमने हेतुं स चाचष्ट यथातथम्।<br>स्वभावमात्मनो द्रष्टुं रक्षया तेजसः क्षितिम्॥ २६<br>कथयित्वा च तद्रक्षः कारणं विविधं ततः।<br>प्रसीदेत्यब्रवीद् विप्रं निर्विण्णः स्वेन कर्मणा॥ २७ | जैसे ब्रह्म श्रेष्ठ है उसी प्रकार हरि भी श्रेष्ठ हैं। वे केशव ही जगत्के (नित्य) स्वरूप हैं। अच्युतभगवान्के नाम-कीर्तनके उस सत्यद्वारा मेरे तीनों प्रकारके अमङ्गल नष्ट हो जायँ। इस प्रकार अपनी रक्षाके लिये विष्णुपञ्जरस्तोत्रका पाठकर वे खड़े थे। वह बलवान् राक्षस उनकी ओर दौड़ा। देवर्षे! उसके बाद द्विजद्वारा रक्षाकी व्यवस्था रहनेपर वह राक्षस गतिहीन होकर चार मासतक, जबतक कि ब्राह्मणकी समाधि समाप्त नहीं हुई तबतक, रुका रहा। जप समाप्त होनेपर उन्होंने उस निशाचरको देखा। उन्होंने दीन, बलसे हीन, उत्साहसे रहित, भयसे आकुल तथा निस्तेज हुए उस निशाचरको देखकर दयापूर्वक उसे निर्भयता प्रदान कर दी तथा उसके आनेका कारण पूछा। उसने अपने यथार्थ स्वभाववश देखनेकी इच्छा एवं आनेपर तेजका नाश होना बताया। उसके बाद दूसरे और भी बहुत-से कारणोंका वर्णन कर अपने कर्मसे दुखी हुए उस राक्षसने ब्राह्मणसे कहा—आप प्रसन्न हो जायँ॥ २१—२७॥ |
| बहूनि पापानि मया कृतानि बहवो हताः।<br>कृताः स्त्रियो मया बह्व्यो विधवाः पुत्रवर्जिताः।<br>अनागसां च सत्त्वानामल्पकानां क्षयः कृतः॥ २८<br>तस्मात् पापादहं मोक्षमिच्छामि त्वत्प्रसादतः।<br>पापप्रशमनायालं कुरु मे धर्मदेशनम्॥ २९<br>पापस्यास्य क्षयकरमुपदेशं प्रयच्छ मे।<br>तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसस्य द्विजोत्तमः॥ ३०<br>वचनं प्राह धर्मात्मा हेतुमच्च सुभाषितम्।<br>कथं क्रूरस्वभावस्य सतस्तव निशाचर।<br>सहसैव समायाता जिज्ञासा धर्मवर्त्मनि॥ ३१ | मैंने बहुत पाप किये हैं। मैंने बहुत-से मनुष्योंको मारा है। मैंने बहुत-सी स्त्रियोंको विधवा एवं पुत्रसे हीन कर दिया है तथा निर्दोष और निर्बल प्राणियोंका विनाश किया है। आपकी दयासे मैं उन पापोंसे मुक्त होना चाहता हूँ; अतः आप मुझे पापोंका नाश करनेवाले धर्माचरणका उपदेश दें। आप मुझे इस पापको नष्ट करनेवाला उपदेश प्रदान करें। उस राक्षसके उस वचनको सुनकर धर्मात्मा द्विजोत्तमने युक्तियुक्त मधुर वचन कहा—निशाचर! क्रूर स्वभावके होते हुए भी एकाएक धर्मके मार्गमें तुम्हारी जिज्ञासा कैसे उत्पन्न हुई?॥ २८—३१॥ |
| राक्षस उवाच<br>त्वां वै समागतोऽस्म्यद्य क्षिप्तोऽहं रक्षया बलात्।<br>तव संसर्गतो ब्रह्मन् जातो निर्वेद उत्तमः॥ ३२ | राक्षसने कहा— मैं आज आपके निकट आते ही बलपूर्वक रक्षाद्वारा फेंक दिया गया। ब्रह्मन्! आपके सम्पर्कसे मुझे श्रेष्ठ वैराग्य प्राप्त हो गया। |
| अध्याय ८५ ] | सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त | ४२१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| का सा रक्षा न तां वेद्मि वेद्मि नास्याः परायणम्।<br>यस्याः संसर्गमासाद्य निर्वेदं प्रापितं परम्॥ ३३<br><br>त्वं कृपां कुरु धर्मज्ञ मय्यनुक्रोशमावह।<br>यथा पापापनोदो मे भवत्वार्य तथा कुरु॥ ३४ | मैं यह नहीं समझ पाता हूँ कि जिसका सम्पर्क पाकर मुझे श्रेष्ठ वैराग्य उत्पन्न हुआ है वह रक्षा क्या है और उसका आधार कौन है? धर्मज्ञ! आर्य! आप कृपा करें। मेरे ऊपर दया करें। आप वह कार्य करें जिससे मेरे पापोंका विनाश हो जाय॥ ३२—३४॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्तः स मुनिस्तदा वै तेन रक्षसा।<br>प्रत्युवाच महाभागो विमृश्य सुचिरं मुनिः॥ ३५ | पुलस्त्यजी बोले— उस राक्षसके इस प्रकार कहनेपर उन महाभाग मुनिने बहुत देरतक विचार कर उत्तर दिया॥ ३५॥ |
| ऋषिरुवाच<br>यन्मामाहोपदेशार्थं निर्विण्णः स्वेन कर्मणा।<br>युक्तमेतद्धि पापानां निवृत्तिरुपकारिका॥ ३६<br><br>करिष्ये यातुधानानां न त्वहं धर्मदेशनम्।<br>तान् सम्पृच्छ द्विजान् सौम्य ये वै प्रवचने रताः॥ ३७<br><br>एवमुक्त्वा ययौ विप्रश्चिन्तामाप स राक्षसः।<br>कथं पापापनोदः स्यादिति चिन्ताकुलेन्द्रियः॥ ३८<br><br>न चखाद स सत्त्वानि क्षुधा सम्बाधितोऽपि सन्।<br>षष्ठे षष्ठे तदा काले जन्तुमेकमभक्षयत्॥ ३९<br><br>स कदाचित्क्षुधाविष्टः पर्यटन् विपुले वने।<br>ददर्शाथ फलाहारमागतं ब्रह्मचारिणम्॥ ४०<br><br>गृहीतो रक्षसा तेन स तदा मुनिदारकः।<br>निराशो जीविते प्राह सामपूर्वं निशाचरम्॥ ४१ | ऋषिने उत्तर दिया— अपने कर्मसे पीड़ित होकर तुमने मुझसे जो उपदेश देनेके लिये कहा है, सो ठीक ही है। पापोंकी निवृत्तिसे उपकार होता है। परंतु मैं राक्षसोंको धर्मका उपदेश नहीं दूँगा। अतः भले राक्षस! इस विषयको तुम उन ब्राह्मणोंसे पूछो जो विषयोंपर शास्त्रीय व्याख्यान करते हैं। इस प्रकार कहकर वह ब्राह्मण चला गया। वह राक्षस चिन्तासे आकुल हो गया। मेरे पाप किस प्रकार दूर होंगे—इस विषयकी चिन्तासे उसकी इन्द्रियाँ घबड़ा गयीं। (पर) भूखसे कष्ट पानेपर भी उसने प्राणियोंका भक्षण करना छोड़ दिया। (प्रतिदिन) प्रत्येक छठे समय एक जीवका आहार करने लगा। किसी समय भूखसे पीड़ित होकर विशाल वनमें घूमते हुए उसने फल लेनेके लिये आये हुए एक ब्रह्मचारीको देखा। राक्षसने मुनिपुत्रको पकड़ लिया। उसके बाद जीवनसे निराश होकर उस ब्रह्मचारीने शान्त भाव प्रकट करनेवाला वचन कहा॥ ३६—४१॥ |
| ब्राह्मण उवाच<br>भो भद्र ब्रूहि यत् कार्यं गृहीतो येन हेतुना।<br>तदनुब्रूहि भद्रं ते अयमस्म्यनुशाधि माम्॥ ४२ | ब्राह्मणने कहा— भद्र! यह बतलाओ कि तुम्हारा क्या कार्य है, तुमने मुझे क्यों पकड़ा है? तुम्हारा कल्याण हो। यह मैं प्रस्तुत हूँ। मुझे आज्ञा दो॥ ४२॥ |
| राक्षस उवाच<br>षष्ठे काले त्वमाहारः क्षुधितस्य समागतः।<br>निःश्रोकस्यातिपापस्य निर्घृणस्य द्विजद्रुहः॥ ४३ | राक्षसने कहा— ब्रह्मचारिन्! इस समय मैं ब्राह्मणोंसे द्वेष और घृणा करनेके कारण श्रीसे हीन, अत्यन्त पापी और निर्दय हो गया हूँ। मुझे भूख लगी हुई है। आज छठे समयमें तुम मेरे भोजनके रूपमें आये हो॥ ४३॥ |
| ब्राह्मण उवाच<br>यद्यवश्यं त्वया चाहं भक्षितव्यो निशाचर।<br>आयास्यामि तवाद्यैव निवेद्य गुरवे फलम्॥ ४४ | ब्राह्मणने कहा— निशाचर! यदि अवश्य ही तुम मुझे खाना चाहते हो तो मैं यह फल गुरुको समर्पित |
| ४२२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८५ |
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| गुर्वर्थमेतदागत्य यत्फल Tow...<br>गुर्वर्थमेतदागत्य यत्फलग्रहणं कृतम्।<br>ममात्र निष्ठा प्राप्तस्य फलानि विनिवेदितुम्॥ ४५<br><br>स त्वं मुहूर्तमात्रं मामत्रैव प्रतिपालय।<br>निवेद्य गुरवे यावदिहागच्छाम्यहं फलम्॥ ४६ | करके अभी आ जाता हूँ। यहाँ आकर गुरुके लिये मैंने जो फल एकत्र किये हैं, उन्हें गुरुको समर्पित करनेके लिये मेरी अत्यन्त श्रद्धा है। अतः तुम यहाँ मुहूर्तमात्र मेरी प्रतीक्षा करो, जबतक कि मैं इन फलोंको गुरुको देकर लौट आता हूँ॥ ४४-४६॥ | | राक्षस उवाच<br>षष्ठे काले न मे ब्रह्मन् कश्चिद् ग्रहणमागतः।<br>प्रतिमुच्येत देवोऽपि इति मे पापजीविका॥ ४७<br>एक एवात्र मोक्षस्य तव हेतुः शृणुष्व तत्।<br>मुञ्चाम्यहमसंदिग्धं यदि तत् कुरुते भवान्॥ ४८ | **राक्षसने कहा—**ब्रह्मन्! छठे समयमें मेरे पंजेमें आया हुआ कोई देवता भी छूट नहीं सकता। यही मेरी पापजीविका है। तुम्हारे छूटनेका एक ही उपाय है, उसे सुनो। यदि तुम उसे करो तो निःसंदेह मैं तुमको छोड़ दूँगा॥ ४७-४८॥ | | ब्राह्मण उवाच<br>गुरोर्यन्न विरोधाय यन्न धर्मोपरोधकम्।<br>तत् करिष्याम्यहं रक्षो यन्न व्रतहरं मम॥ ४९ | **ब्राह्मणने कहा—**राक्षस! यदि वह कार्य गुरुकी सेवाकार्यमें विरोध डालनेवाला, धर्मके विषयमें बाधा डालनेवाला एवं मेरे व्रतको नष्ट करनेवाला न होगा तो मैं उसे करूँगा केवल तुमसे अपने छुटकारेके लिये नहीं॥ ४९॥ | | राक्षस उवाच<br>मया निसर्गतो ब्रह्मन् जातिदोषाद् विशेषतः।<br>निर्विवेकेन चित्तेन पापकर्म सदा कृतम्॥ ५०<br><br>आबाल्यान्मम पापेषु न धर्मेषु रतं मनः।<br>तत्पापसंक्षयान्मोक्षं प्राप्नुयां येन तद् वद॥ ५१<br><br>यानि पापानि कर्माणि बालत्वाच्चरितानि च।<br>दुष्टां योनिमिमां प्राप्य तन्मुक्तिं कथय द्विज॥ ५२<br><br>यद्येतद् द्विजपुत्र त्वं समाख्यास्यस्यशेषतः।<br>ततः क्षुधार्तान्मत्तस्त्वं नियतं मोक्षमाप्स्यसि॥ ५३<br><br>न चेत् तत्पापशीलोऽहमत्यर्थं क्षुत्पिपासितः।<br>षष्ठे काले नृशंसात्मा भक्षयिष्यामि निर्घृणः॥ ५४ | **राक्षसने कहा—**ब्रह्मन्! मैंने स्वभावतः तथा विशेषतः जातिदोषके कारण और विचारशक्तिसे रहित मनके कारण सदा पापका कार्य किया है। बाल्यावस्थासे ही मेरा मन धर्ममें नहीं, अपितु पापमें आसक्त रहा है। इसलिये तुम वह उपाय बताओ जिससे पापका नाश होकर मेरी मुक्ति हो जाय। द्विज! इस पापयोनिको पाकर अज्ञानवश मैंने जिन पापकर्मोंका आचरण किया है, उनसे छुटकारा पानेका उपाय बतलाओ। ब्राह्मणपुत्र! यदि तुम मुझे यह भलीभाँति बतलाओ तो मुझ भूखसे पीड़ित हुएसे निःसंदेह छुटकारा पा जाओगे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो अत्यन्त भूखा-प्यासा निर्दय हुआ मैं छठे समयमें (प्राप्त हुए) तुमको खा जाऊँगा॥ ५०-५४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>एवमुक्तो मुनिसुतस्तेन घोरेण रक्षसा।<br>चिन्तामवाप महतीमशक्तस्तदुदीरणे॥ ५५ | **पुलस्त्यजी बोले—**उस भयंकर राक्षसके इस प्रकार कहनेपर मुनिपुत्र (राक्षसकी पापसे मुक्तिका उपाय) कहनेमें असमर्थ होनेसे बहुत चिन्तित हुआ। |
| अध्याय ८५ ] | सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त | ४२३ | | :--- | :--- |
| स विमृश्य चिरं विप्रः शरणं जातवेदसम्।<br>जगाम ज्ञानदानाय संशयं परमं गतः॥ ५६<br><br>यदि शुश्रूषितो वह्निर्गुरुशुश्रूषणादनु।<br>व्रतानि वा सुचीर्णानि सप्तार्चिः पातु मां ततः॥ ५७<br><br>न मातरं न पितरं गौरवेण यथा गुरुम्।<br>सर्वदैवावगच्छामि तथा मां पातु पावकः॥ ५८<br><br>यथा गुरुं न मनसा कर्मणा वचसाऽपि वा।<br>अवजानाम्यहं तेन पातु सत्येन पावकः॥ ५९<br><br>इत्येवं मनसा सत्यान् कुर्वतः शपथान् पुनः।<br>सप्तार्चिषा समादिष्टा प्रादुरासीत् सरस्वती॥ ६०<br><br>सा प्रोवाच द्विजसुतं राक्षसग्रहणाकुलम्।<br>मा भैर्द्विजसुताहं त्वां मोक्षयिष्यामि संकटात्॥ ६१<br><br>यदस्य रक्षसः श्रेयो जिह्वाग्रे संस्थिता तव।<br>तत् सर्वं कथयिष्यामि ततो मोक्षमवाप्स्यसि॥ ६२<br><br>अदृश्या रक्षसा तेन प्रोक्त्वेत्थं सा सरस्वती।<br>अदर्शनं गता सोऽपि द्विजः प्राह निशाचरम्॥ ६३ | बहुत समयतक विचार करनेके पश्चात् अत्यन्त संशययुक्त ब्राह्मण ज्ञानदानके हेतु अग्निके पास गया। (उसने कहा—) अग्निदेव! गुरुकी सेवा करनेके बाद यदि मैंने आपकी सेवा की हो तथा व्रतोंका अच्छी तरह पालन किया हो तो हे सप्तार्चि! आप मेरी रक्षा करें। अग्निदेव! यदि मैंने गौरवमें माता-पितासे गुरुको अधिक महत्त्व दिया हो तो आप मेरी रक्षा करें। यदि मन, कर्म एवं वाणीसे भी मैंने गुरुका अनादर न किया हो तो उस सत्यके कारण अग्निदेव आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार मनसे सत्य शपथोंके लेनेवाले उसके सामने अग्निदेवके आदेशसे सरस्वती प्रकट हुईं। उन्होंने राक्षसके द्वारा पकड़े जानेके कारण व्याकुल हुए ब्राह्मणके पुत्रसे कहा—ब्राह्मणपुत्र! डरो मत। मैं तुम्हें संकटसे मुक्त करूँगी। तुम्हारी जीभके अग्रभागपर स्थित होकर मैं राक्षसके कल्याणकारी समस्त विषयोंका कथन करूँगी। उसके बाद तुम मुक्त हो जाओगे। उस राक्षससे अदृश्य रहती हुई सरस्वती ऐसा कहनेके बाद अन्तर्धान हो गयी। उस ब्राह्मणने निशाचरसे (सरस्वतीकी शक्तिसे) कहा—॥ ५५—६३॥ | | ब्राह्मण उवाच<br>श्रूयतां तव यच्छ्रेयस्तथाऽन्येषां च पापिनाम्।<br>समस्तपापशुद्ध्यर्थं पुण्योपचयदं च यत्॥ ६४ | ब्राह्मणने कहा—(निशाचर!) सुनो! तुम्हारे और दूसरे अन्य पापियोंके लिये कल्याणकर सारे पापोंकी शुद्धि एवं पुण्य बढ़ानेवाले तत्त्वोंको मैं कहता हूँ। | | प्रातरुत्थाय जप्तव्यं मध्याह्नेऽह्नःक्षयेऽपि वा।<br>असंशयं सदा जप्यो जपतां पुष्टिशान्तिदः॥ ६५ | प्रातःकाल उठकर, मध्याह्नमें अथवा सायंकाल इस जपने योग्य स्तोत्रका सदा जप करना चाहिये। यह जप जप करनेवालेको निःसंदेह शान्ति एवं पुष्टि प्रदान करता है। | | ॐ हरिं कृष्णं हृषीकेशं वासुदेवं जनार्दनम्।<br>प्रणतोऽस्मि जगन्नाथं स मे पापं व्यपोहतु॥ ६६ | ॐ, हरि, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दन, जगन्नाथको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापको दूर करें। | | चराचरगुरुं नाथं गोविन्दं शेषशायिनम्।<br>प्रणतोऽस्मि परं देवं स मे पापं व्यपोहतु॥ ६७ | चर और अचरके गुरु, नाथ, शेषशय्यापर विराजमान, परमदेव गोविन्दको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापको दूर करें। | | शङ्खिनं चक्रिणं शार्ङ्गधारिणं स्रग्धरं परम्।<br>प्रणतोऽस्मि पतिं लक्ष्म्याः स मे पापं व्यपोहतु॥ ६८ | शङ्ख धारण करनेवाले, चक्र धारण करनेवाले, शार्ङ्ग धारण करनेवाले एवं उत्तम मालाधारी, लक्ष्मीपतिको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे |
| ४२४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दामोदरमुदाराक्षं पुण्डरीकाक्षमच्युतम्।<br>प्रणतोऽस्मि स्तुतं स्तुत्यैः स मे पापं व्यपोहतु॥ ६९ | पापको दूर करें। दामोदर, उदाराक्ष, पुण्डरीकाक्ष, स्तवनीय स्तोत्रोंसे स्तुत अच्युतको मैं नमस्कार करता हूँ। वे मेरे पापोंको दूर करें। नारायण, नर, शौरि, माधव, मधुसूदन एवं धराको धारण करनेवाले भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापको दूर करें॥ ६४—७०॥ |
| नारायणं नरं शौरिं माधवं मधुसूदनम्।<br>प्रणतोऽस्मि धराधारं स मे पापं व्यपोहतु॥ ७० | |
| केशवं चन्द्रसूर्याक्षं कंसकेशिनिषूदनम्।<br>प्रणतोऽस्मि महाबाहुं स मे पापं व्यपोहतु॥ ७१ | चन्द्र एवं सूर्यरूपी नेत्रोंवाले, कंस और केशीको मारनेवाले महाबाहु केशवको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंको दूर करें। वक्षःस्थलपर श्रीवत्स धारण करनेवाले, श्रीश, श्रीधर, श्रीनिकेतन एवं श्रीकान्तको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंको दूर करें। संयम करनेवाले लोग जिन सब प्राणियोंके स्वामी, अक्षर एवं अनिर्देश्य वासुदेवका ध्यान करते हैं मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ। (संन्यासी लोग) अन्य समस्त सहारोंसे मनकी गतिको लौटाकर जिस वासुदेव नामक ईश्वरका ध्यान करते हैं, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। मैं सर्वगत, सर्वभूत, सर्वाधार ईश्वर एवं वासुदेव नामक परब्रह्मकी शरण जाता हूँ। श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न लोग कर्मका नाश होनेपर जिन अदृष्ट, अविनाशी, परमात्मदेवको प्राप्त करते हैं, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। पुण्य तथा पापसे रहित योगीलोग जिन्हें पाकर फिर जन्म ग्रहण नहीं करते, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। ब्रह्माका रूप धारण कर देवता, दैत्य एवं मनुष्योंसे युक्त सारे जगत्की सृष्टि करनेवाले अच्युत देवकी मैं शरणमें जाता हूँ॥ ७१—७८॥ |
| श्रीवत्सवक्षसं श्रीशं श्रीधरं श्रीनिकेतनम्।<br>प्रणतोऽस्मि श्रियः कान्तं स मे पापं व्यपोहतु॥ ७२ | |
| यमीशं सर्वभूतानां ध्यायन्ति यतयोऽक्षरम्।<br>वासुदेवमनिर्देश्यं तमस्मि शरणं गतः॥ ७३ | |
| समस्तालम्बनेभ्यो यं व्यावृत्य मनसो गतिम्।<br>ध्यायन्ति वासुदेवाख्यं तमस्मि शरणं गतः॥ ७४ | |
| सर्वगं सर्वभूतं च सर्वस्याधारमीश्वरम्।<br>वासुदेवं परं ब्रह्म तमस्मि शरणं गतः॥ ७५ | |
| परमात्मानमव्यक्तं यं प्रयान्ति सुमेधसः।<br>कर्मक्षयेऽक्षयं देवं तमस्मि शरणं गतः॥ ७६ | |
| पुण्यपापविनिर्मुक्ता यं प्रविश्य पुनर्भवम्।<br>न योगिनः प्राप्नुवन्ति तमस्मि शरणं गतः॥ ७७ | |
| ब्रह्मा भूत्वा जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>यः सृजत्यच्युतो देवस्तमस्मि शरणं गतः॥ ७८ | |
| ब्रह्मत्वे यस्य वक्त्रेभ्यश्चतुर्वेदमयं वपुः।<br>प्रभुः पुरातनो जज्ञे तमस्मि शरणं गतः॥ ७९ | ब्रह्माका रूप धारण करनेपर जिनके मुखोंसे चारों वेदोंसे युक्त शरीर धारण करनेवाले पुरातन प्रभुका आविर्भाव हुआ था, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। मैं सृष्टिके लिये स्रष्टारूपसे स्थित ब्रह्मरूप धारण करनेवाले सनातन जगद्योनि जनार्दनको प्रणाम करता हूँ। सृष्टिकर्ता होकर योगिरूपमें विद्यमान एवं स्थितिकालमें राक्षसोंका नाश करनेवाले आदिपुरुष जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। मैं उन आदिपुरुष ईश्वर जनार्दन विष्णुको प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने पृथिवीको धारण किया है, दैत्योंको |
| ब्रह्मरूपधरं देवं जगद्योनिं जनार्दनम्।<br>स्रष्टृत्वे संस्थितं सृष्टौ प्रणतोऽस्मि सनातनम्॥ ८० | |
| स्रष्टा भूत्वा स्थितो योगी स्थितावसूरसूदनः।<br>तमादिपुरुषं विष्णुं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम्॥ ८१ | |
| धृता मही हता दैत्याः परित्रातास्तथा सुराः।<br>येन तं विष्णुमाद्येशं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम्॥ ८२ |
अध्याय ८५] सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त ४२५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यज्ञैर्यजन्ति यं विप्रा यज्ञेशं यज्ञभावनम्।<br>तं यज्ञपुरुषं विष्णुं प्रणतोऽस्मि सनातनम्॥ ८३<br><br>पातालवीथीभूतानि तथा लोकान् निहन्ति यः।<br>तमन्तपुरुषं रुद्रं प्रणतोऽस्मि सनातनम्॥ ८४<br><br>सम्भक्षयित्वा सकलं यथासृष्टमिदं जगत्।<br>यो वै नृत्यति रुद्रात्मा प्रणतोऽस्मि जनार्दनम्॥ ८५<br><br>सुरासुराः पितृगणाः यक्षगन्धर्वराक्षसाः।<br>सम्भूता यस्य देवस्य सर्वगं तं नमाम्यहम्॥ ८६ | मारा है एवं देवताओंकी रक्षा की है। ब्राह्मणलोग यज्ञोंके द्वारा जिनकी अर्चना करते हैं, मैं उन यज्ञपुरुष, यज्ञभावन, यज्ञेश, सनातन विष्णुको प्रणाम करता हूँ। मैं पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियों तथा लोकोंका विनाश करनेवाले उन अन्तपुरुष सनातन रुद्रको प्रणाम करता हूँ। सृष्ट किये गये इस समस्त जगत्का भक्षणकर नृत्य करनेवाले रुद्रात्मा जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। मैं सर्वत्र गमन करनेवाले देवको प्रणाम करता हूँ, जिनसे समस्त सुर, असुर, पितृगण, यक्ष, गन्धर्व एवं राक्षस उत्पन्न हुए हैं॥ ७९-८६॥ |
| समस्तदेवाः सकला मनुष्याणां च जातयः।<br>यस्यांशभूता देवस्य सर्वगं तं नतोऽस्म्यहम्॥ ८७<br><br>वृक्षगुल्मादयो यस्य तथा पशुमृगादयः।<br>एकांशभूता देवस्य सर्वगं तं नमाम्यहम्॥ ८८<br><br>यस्मान्नान्यत् परं किञ्चिद् यस्मिन् सर्वं महात्मनि।<br>यः सर्वमध्यगोऽनन्तः सर्वगं तं नमाम्यहम्॥ ८९<br><br>यथा सर्वेषु भूतेषु गूढोऽग्निरिव दारुषु।<br>विष्णुरेवं तथा पापं ममाशेषं प्रणश्यतु॥ ९०<br><br>यथा विष्णुमयं सर्वं ब्रह्मादि सचराचरम्।<br>यच्च ज्ञानपरिच्छेद्यं पापं नश्यतु मे तथा॥ ९१<br><br>शुभाशुभानि कर्माणि रजःसत्त्वतमांसि च।<br>अनेकजन्मकर्मोत्थं पापं नश्यतु मे तथा॥ ९२<br><br>यन्निशायां च यत्प्रातर्यन्मध्याह्नापराह्नयोः।<br>सन्ध्ययोश्च कृतं पापं कर्मणा मनसा गिरा॥ ९३<br><br>यत्तिष्ठता यद् व्रजता यच्च शय्यागतेन मे।<br>कृतं यदशुभं कर्म कायेन मनसा गिरा॥ ९४<br><br>अज्ञानतो ज्ञानतो वा मदाच्चलितमानसैः।<br>तत् क्षिप्रं विलयं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात्॥ ९५ | मैं उन सर्वव्यापी देवको प्रणाम करता हूँ जिनके अंशसे सम्पूर्ण देव एवं मनुष्योंकी सभी जातियाँ उत्पन्न हुई हैं। वृक्ष, गुल्म आदि तथा पशु, मृग आदि जिन परमदेवके एक अंशरूप हैं, मैं उन सर्वगामी देवको प्रणाम करता हूँ। मैं उन सर्वव्यापी देवको प्रणाम करता हूँ जिनसे पृथक् कोई वस्तु नहीं है एवं जिन महात्मामें सम्पूर्ण पदार्थ स्थित हैं तथा जो सभीके अन्तःकरणमें रहनेवाले और अनन्त हैं। काष्ठमें अग्निके समान समस्त प्राणियोंमें व्याप्त विष्णु मेरे सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करें; क्योंकि विष्णुसे ब्रह्मा आदि समस्त चराचरात्मक जगत् व्याप्त है तथा जो ज्ञानके द्वारा धारण करने योग्य हैं। इसलिये मेरे पाप नष्ट हो जायें। (विष्णुकी कृपासे) मेरे शुभ तथा अशुभ कर्म, सत्त्व, रज एवं तमोगुण तथा अनेक जन्मोंके कर्मसे उत्पन्न पाप नष्ट हो जायें। शरीर, कर्म, मन एवं वाणीके द्वारा रात्रिमें तथा प्रातःकाल, मध्याह्नकाल, अपराह्नकाल और सन्ध्याकालमें चलते, बैठते और शयन करते हुए ज्ञान या अज्ञानपूर्वक अथवा निरहंकार मनसे मैंने जो अशुभ (पाप) कर्म किये हों वे वासुदेवके नाम-कीर्तनसे शीघ्र नष्ट हो जायें॥ ८७-९५॥ |
| परदारपरद्रव्यवाञ्छाद्रोहोद्भवं च यत्।<br>परपीड़ोद्भवं निन्दां कुर्वता यन्महात्मनाम्॥ ९६<br><br>यच्च भोज्ये तथा पेये भक्ष्ये चोष्ये विलेहने।<br>तद् यातु विलयं तोये यथा लवणभाजनम्॥ ९७ | परस्त्री और परधनकी कामना, द्रोह, परपीड़ा, महात्माओंकी निन्दा तथा (निषिद्ध) भोज्य, पेय, भक्ष्य, चोष्य एवं चाटनेवाले वस्तुके कारण उत्पन्न सम्पूर्ण पाप इस प्रकार नष्ट हो जायें जैसे लवण रखनेवाला मिट्टीका |
| ४२६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८५ |
|---|
| यद् बाल्ये यच्च कौमारे यत् पापं यौवने मम।<br>वयःपरिणतौ यच्च यच्च जन्मान्तरे कृतम्॥ ९८<br>तन्नारायण गोविन्द हरिकृष्णेश कीर्तनात्।<br>प्रयातु विलयं तोये यथा लवणभाजनम्॥ ९९<br>विष्णवे वासुदेवाय हरये केशवाय च।<br>जनार्दनाय कृष्णाय नमो भूयो नमो नमः॥ १००<br>भविष्यन्नरकघ्नाय नमः कंसविघातिने।<br>अरिष्टकेशिचाणूरदेवारिक्षयिणे नमः॥ १०१<br>कोऽन्यो बलेर्वञ्चयिता त्वामृते वै भविष्यति।<br>कोऽन्यो नाशयति बलाद् दर्पं हैहयभूपतेः॥ १०२<br>कः करिष्यत्यथाऽन्यो वै सागरे सेतुबन्धनम्।<br>वधिष्यति दशग्रीवं कः सामात्यपुरःसरम्॥ १०३ | पात्र पानीमें (पड़ते ही) नष्ट हो जाता है। नारायण, गोविन्द, हरि, कृष्ण, ईशका कीर्तन करनेसे बाल्यकाल, कुमारावस्था, यौवन, वार्द्धक्य एवं जन्मान्तरमें किये गये मेरे सम्पूर्ण पाप इस प्रकार नष्ट हो जायँ जैसे जलमें नमक रखनेवाला मिट्टीका बर्तन विलीन हो जाता (गल जाता) है। विष्णु, वासुदेव, हरि, केशव, जनार्दन, कृष्णको पुनः-पुनः प्रणाम है। भावी नरकका नाश करनेवाले तथा कंसको मारनेवालेको नमस्कार है। अरिष्ट, केशी एवं चाणूर आदि राक्षसोंके नष्ट करनेवालेको नमस्कार है। आपके सिवाय बलिको कौन छल सकता था एवं आपके बिना हैहयनरेशके घमंडको कौन नष्ट कर सकता था? आपके सिवाय समुद्रमें सेतुको कौन बाँध सकता था तथा मन्त्री आदिके साथ ही दशग्रीव रावणको कौन मार सकता था॥ ९६—१०३॥ | | कस्त्वामृतेऽन्यो नन्दस्य गोकुले रतिमेष्यति।<br>प्रलम्बपूतनादीनां त्वामृते मधुसूदन।<br>निहन्ताऽप्यथवा शास्ता देवदेव भविष्यति॥ १०४<br>जपन्नेवं नरः पुण्यं वैष्णवं धर्ममुत्तमम्।<br>इष्टानिष्टप्रसङ्गेभ्यो ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा॥ १०५<br>कृतं तेन तु यत् पापं सप्तजन्मान्तराणि वै।<br>महापातकसंज्ञं वा तथा चैवोपपातकम्॥ १०६<br>यज्ञादीनि च पुण्यानि जपहोमव्रतानि च।<br>नाशयेद् योगिनां सर्वमामपात्रमिवाम्भसि॥ १०७<br>नरः संवत्सरं पूर्णं तिलपात्राणि षोडश।<br>अहन्यहनि यो दद्यात् पठत्येच्च तत्समम्॥ १०८<br>अविलुप्तब्रह्मचर्यं सम्प्राप्य स्मरणं हरेः।<br>विष्णुलोकमवाप्नोति सत्यमेतन्मयोदितम्॥ १०९<br>यथैतत् सत्यमुक्तं मे न ह्यल्पमपि मे मृषा।<br>राक्षसस्त्रस्तसर्वाङ्गं तथा मामेष मुञ्चतु॥ ११० | मधुसूदन! आपके सिवाय कौन ऐसा है जो नन्दके गोकुलमें प्रेममयी क्रीडा कर सके? देवदेव! आपके सिवा प्रलम्ब और पूतना आदिका वध एवं शासन कौन कर सकता था? इस धर्ममय उत्तम वैष्णव मन्त्रका जप करनेवाला मनुष्य इष्ट और अनिष्टके प्रसङ्गवश तथा ज्ञान या अज्ञानपूर्वक सात जन्मोंमें किये अपने महापातकों, उपपातकों, यज्ञ, होम एवं व्रत आदिके पुण्य कर्मोंके भी योगको इस प्रकार नष्ट कर देता है जैसे जलमें मिट्टीका कच्चा घड़ा नष्ट हो जाता है। मैं यह सत्य कहता हूँ कि अखण्डित ब्रह्मचर्य एवं हरिस्मरणपूर्वक एक वर्षतक इस स्तोत्रके पाठके साथ प्रतिदिन तिलसे भरे सोलह पात्रोंका दान करनेवाला मनुष्य विष्णुलोकको प्राप्त करता है। यदि मैंने यह सत्य कहा हो एवं इसमें अल्पमात्र भी असत्य न हो तो यह राक्षस सब अङ्गोंसे पीड़ित हो चुके मुझे छोड़ दे॥ १०४—११०॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>एवमुच्चारिते तेन मुक्तो विप्रस्तु रक्षसा।<br>अकामेन द्विजो भूयस्तमाह रजनीचरम्॥ १११ | **पुलस्त्यजी बोले—**उसके ऐसा कहते ही राक्षसने ब्राह्मणको छोड़ दिया। पुनः द्विजने निष्कामभावसे राक्षससे कहा—॥ १११॥ | | ब्राह्मण उवाच<br>एतद् भद्र मया ख्यातं तव पातकनाशनम्।<br>विष्णोः सारस्वतं स्तोत्रं यज्जगाद सरस्वती॥ ११२ | **ब्राह्मणे कहा—**भद्र! सरस्वती देवीने जिस पापका नाश करनेवाले सारस्वत विष्णुस्तोत्रको कहा है, |
अध्याय ८६ ] स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र ४२७
| हुताशनेन प्रहिता मम जिह्वाग्रसंस्थिता।<br>जगादैनं स्तवं विष्णोः सर्वेषां चोपशान्तिदम्॥ ११३<br><br>अनेनैव जगन्नाथं त्वमाराधय केशवम्।<br>ततः शापापनोदं तु स्तुते लप्स्यसि केशवे॥ ११४<br><br>अहर्निशं हृषीकेशं स्तवेनानेन राक्षस।<br>स्तुहि भक्तिं दृढां कृत्वा ततः पापाद् विमोक्ष्यसे॥ ११५<br><br>स्तुतो हि सर्वपापानि नाशयिष्यत्यसंशयम्।<br>स्तुतो हि भक्त्या नृणां वै सर्वपापहरो हरिः॥ ११६<br><br>पुलस्त्य उवाच<br>ततः प्रणम्य तं विप्रं प्रसाद्य स निशाचरः।<br>तदैव तपसे श्रीमान् शालग्राममगाद् वशी॥ ११७<br><br>अहर्निशं स एवैनं जपन् सारस्वतं स्तवम्।<br>देवक्रियारतिर्भूत्वा तपस्तेपे निशाचरः॥ ११८<br><br>समाराध्य जगन्नाथं स तत्र पुरुषोत्तमम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्तवान्॥ ११९<br><br>एतत्ते कथितं ब्रह्मन् विष्णोः सारस्वतं स्तवम्।<br>विप्रवक्त्रस्थया सम्यक् सरस्वत्या समीरिमितम्॥ १२०<br><br>य एतत् परमं स्तोत्रं वासुदेवस्य मानवः।<br>पठिष्यति स सर्वेभ्यः पापेभ्यो मोक्षमाप्स्यति॥ १२१ | उसे मैंने तुमसे कह दिया। अग्निदेवसे भेजी गयी एवं मेरी जिह्वाके अग्रभागमें स्थित सरस्वतींने सभीको शान्ति देनेवाले इस विष्णुस्तोत्रको कहा है। तुम इसीसे जगत्स्वामी केशवकी आराधना करो। उसके बाद केशवकी स्तुति करनेसे तुम शापसे मुक्त हो जाओगे। राक्षस! इस स्तुतिके द्वारा दृढ़ भक्तिपूर्वक दिन-रात हृषीकेशकी स्तुति करो। तब तुम पापसे मुक्त हो जाओगे। स्तुति किये गये हरि निःसंदेह समस्त पापोंको नष्ट करेंगे। भक्तिपूर्वक स्तुति करनेसे सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले हरि मनुष्योंके सब पापोंका नाश कर देते हैं॥ ११२—११६॥<br><br>पुलस्त्यजी बोले—उसके बाद आत्मनिष्ठ वह राक्षस ब्राह्मणको प्रणाम एवं प्रसन्न करनेके पश्चात् उसी समय तपस्याके लिये शालग्राम नामक स्थानमें चला गया। वह राक्षस दिन-रात इसी सारस्वतस्तोत्रका जप करते हुए देवक्रियामें लीन होकर तप करने लगा। वहाँ पुरुषोत्तम जगन्नाथकी पूजा कर सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर उसने विष्णुलोक प्राप्त किया। ब्रह्मन्! मैंने तुमसे ब्राह्मणके मुखसे सरस्वतीद्वारा कहा गया विष्णुका यह सारस्वतस्तोत्र कहा। वासुदेवके इस श्रेष्ठ स्तोत्रको पढ़नेवाला मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ११७—१२१॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८५॥
छियासीवाँ अध्याय
स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र
| पुलस्त्य उवाच<br><br>नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ देवदेव नमोऽस्तु ते।<br>वासुदेव नमस्तेऽस्तु बहुरूप नमोऽस्तु ते॥ १ | पुलस्त्यजी बोले—हे जगन्नाथ! आपको नमस्कार है। हे देवदेव! आपको नमस्कार है। हे वासुदेव! आपको नमस्कार है। हे अनन्त रूप धारण करनेवाले! |
| ४२८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८६ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकशृङ्ग नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं वृषाकपे।<br>श्रीनिवास नमस्तेऽस्तु नमस्ते भूतभावन॥ २ | आपको नमस्कार है। हे एकशृङ्ग! आपको नमस्कार है। हे वृषाकपे! आपको नमस्कार है। हे श्रीनिवास! आपको नमस्कार है। हे भूतभावन! आपको नमस्कार है। |
| विष्वाक्सेन नमस्तुभ्यं नारायण नमोऽस्तु ते।<br>ध्रुवध्वज नमस्तेऽस्तु सत्यध्वज नमोऽस्तु ते॥ ३ | हे विष्वाक्सेन! आपको नमस्कार है। हे नारायण! आपको नमस्कार है। हे ध्रुवध्वज! आपको नमस्कार है। हे सत्यध्वज! आपको नमस्कार है। हे यज्ञध्वज! |
| यज्ञध्वज नमस्तुभ्यं धर्मध्वज नमोऽस्तु ते।<br>तालध्वज नमस्तेऽस्तु नमस्ते गरुडध्वज॥ ४ | आपको नमस्कार है। हे धर्मध्वज! आपको नमस्कार है। हे तालध्वज! आपको नमस्कार है। हे गरुडध्वज! आपको नमस्कार है। हे वरेण्य! हे विष्णो! हे वैकुण्ठ! |
| वरेण्य विष्णो वैकुण्ठ नमस्ते पुरुषोत्तम।<br>नमो जयन्त विजय जयानन्त पराजित॥ ५ | हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। हे जयन्त! हे विजय! हे जय! हे अनन्त! हे पराजित! आपको नमस्कार है। हे कृतावर्त! हे महावर्त! हे महादेव! आपको नमस्कार |
| कृतावर्त महावर्त महादेव नमोऽस्तु ते।<br>अनाद्याद्यन्त मध्यान्त नमस्ते पद्मजप्रिय॥ ६ | है। हे अनादि एवं आदि और अन्तमें विद्यमान! हे मध्यान्त! (मध्य और अन्तवाले) हे पद्मजप्रिय! आपको प्रणाम है। हे पुरञ्जय! आपको नमस्कार है। |
| पुरञ्जय नमस्तुभ्यं शत्रुञ्जय नमोऽस्तु ते।<br>शुभञ्जय नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु धनञ्जय॥ ७ | हे शत्रुञ्जय! आपको प्रणाम है। हे शुभञ्जय! आपको प्रणाम है। हे धनञ्जय! आपको प्रणाम है। हे सृष्टिको अपनेमें सुरक्षित रखनेवाले हे सृष्टिगर्भ! श्रवणमात्रसे ही पवित्र कर देनेवाले हे शुचिश्रवः! आर्तजनोंकी पुकारको विशाल कर्णोंसे सुननेवाले हे पृथुश्रवः! आपको नमस्कार |
| सृष्टिगर्भ नमस्तुभ्यं शुचिश्रवः पृथुश्रवः।<br>नमो हिरण्यगर्भाय पद्मगर्भाय ते नमः॥ ८ | है। आप हिरण्यगर्भको नमस्कार है। आप पद्मगर्भको नमस्कार है॥ १—८॥ |
| नमः कमलनेत्राय कालनेत्राय ते नमः।<br>कालनाभ नमस्तुभ्यं महानाभ नमो नमः॥ ९ | आप कमलनेत्रको प्रणाम है। आप कालनेत्रको प्रणाम है। हे कालनाभ! आपको प्रणाम है। हे महानाभ! आपको बारम्बार प्रणाम है। हे वृष्टिमूल! |
| वृष्टिमूल महामूल मूलावास नमोऽस्तु ते।<br>धर्मावास जलावास श्रीनिवास नमोऽस्तु ते॥ १० | हे महामूल! हे मूलावास! आपको प्रणाम है। हे धर्मावास! हे जलावास! हे श्रीनिवास! आपको प्रणाम है। |
| धर्माध्यक्ष प्रजाध्यक्ष लोकाध्यक्ष नमो नमः।<br>सेनाध्यक्ष नमस्तुभ्यं कालाध्यक्ष नमोऽस्तु ते॥ ११ | हे धर्माध्यक्ष! हे प्रजाध्यक्ष! हे लोकाध्यक्ष! आपको बार-बार प्रणाम है। हे सेनाध्यक्ष! आपको प्रणाम है। हे कालाध्यक्ष! आपको प्रणाम है। |
| गदाधर श्रुतिधर चक्रधारिन् श्रियोधर।<br>वनमालाधर हरे नमस्ते धरणीधर॥ १२ | हे गदाधर! हे श्रुतिधर! हे चक्रधर! हे श्रीधर! हे वनमाला और पृथ्वीको धारण करनेवाले हे हरे! आपको प्रणाम है। |
| आर्चिषेण महासेन नमस्तेऽस्तु पुरुष्टुत।<br>बहुकल्प महाकल्प नमस्ते कल्पनामुख॥ १३ | हे आर्चिषेण! हे महासेन! हे पुरुसे स्तुत! आपको प्रणाम है। हे बहुकल्प! हे महाकल्प! हे कल्पनामुख! आपको प्रणाम है। |
| अध्याय ८६ ] | स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र | ४२९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वात्मन् सर्वग विभो विरिञ्चे श्वेत केशव ।<br>नील रक्त महानील अनिरुद्ध नमोऽस्तु ते ॥ १४<br><br>द्वादशात्मक कालात्मन् सामात्मन् परमात्मक ।<br>व्योमकात्मक सुब्रह्मन् भूतात्मक नमोऽस्तु ते ॥ १५<br><br>हरिकेश महाकेश गुडाकेश नमोऽस्तु ते।<br>मुञ्जकेश हृषीकेश सर्वनाथ नमोऽस्तु ते ॥ १६ | हे सर्वात्मन्! हे सर्वग! हे विभो! हे विरिञ्चिन्! हे श्वेत! हे केशव! हे नील! हे रक्त! हे महानील! हे अनिरुद्ध! आपको नमस्कार है। हे द्वादशात्मक! हे कालात्मन्! हे सामात्मन्! हे परमात्मक! हे आकाशात्मक! हे सुब्रह्मन्! हे भूतात्मक! आपको प्रणाम है। हे हरिकेश! हे महाकेश! हे गुडाकेश! आपको प्रणाम है। हे मुञ्जकेश! हे हृषीकेश! हे सर्वनाथ! आपको प्रणाम है॥ ९–१६॥ |
| सूक्ष्म स्थूल महास्थूल महासूक्ष्म शुभङ्कर।<br>श्वेतपीताम्बरधर नीलवास नमोऽस्तु ते ॥ १७<br><br>कुशेशय नमस्तेऽस्तु पद्मेशय जलेशय।<br>गोविन्द प्रीतिकर्ता च हंस पीताम्बरप्रिय ॥ १८<br><br>अधोक्षज नमस्तुभ्यं सीरध्वज जनार्दन।<br>वामनाय नमस्तेऽस्तु नमस्ते मधुसूदन ॥ १९<br><br>सहस्रशीर्षाय नमो ब्रह्मशीर्षाय ते नमः।<br>नमः सहस्रनेत्राय सोमसूर्यानलेक्षण ॥ २०<br><br>नमश्चाथर्वशिरसे महाशीर्षाय ते नमः।<br>नमस्ते धर्मनेत्राय महानेत्राय ते नमः ॥ २१<br><br>नमः सहस्रपादाय सहस्रभुजमन्यवे।<br>नमो यज्ञवराहाय महारूपाय ते नमः ॥ २२<br><br>नमस्ते विश्वदेवाय विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।<br>विश्वरूप नमस्तेऽस्तु त्वत्तो विश्वमभूदिदम् ॥ २३<br><br>न्यग्रोधस्त्वं महाशाखस्त्वं मूलकुसुमार्चितः।<br>स्कन्धपत्राङ्कुरलतापल्लवाय नमोऽस्तु ते ॥ २४ | हे सूक्ष्म! हे स्थूल! हे महास्थूल! हे महासूक्ष्म! हे शुभङ्कर! हे उज्ज्वल-पीले वस्त्रको धारण करनेवाले! हे नीलवास! आपको प्रणाम है। हे कुशपर शयन करनेवाले! हे पद्मपर शयन करनेवाले! हे जलमें शयन करनेवाले! हे गोविन्द! हे प्रीतिकर्ता! हे हंस! हे पीताम्बरप्रिय! आपको नमस्कार है। हे अधोक्षज! हे सीरध्वज! हे जनार्दन! आपको प्रणाम है। हे वामन! आपको प्रणाम है। हे मधुसूदन! आपको प्रणाम है। आप सहस्र सिरवालेको नमस्कार है। आप ब्रह्मशीर्षको प्रणाम है। आप सहस्रनेत्र और चन्द्र, सूर्य तथा अग्निरूपी आँखवालेको प्रणाम है। अथर्वशिराको नमस्कार है। महाशीर्षको प्रणाम है। धर्मनेत्रको प्रणाम है। महानेत्रको प्रणाम है। सहस्रपादको नमस्कार है। सहस्रों भुजाओं एवं सहस्रों यज्ञोंवालेको नमस्कार है। यज्ञवराहको नमस्कार है! आप महारूपको नमस्कार है। विश्वदेवको प्रणाम है। हे विश्वात्मन्! हे विश्वसम्भव! हे विश्वरूप! आपको नमस्कार है। आपसे यह विश्व उत्पन्न हुआ है। आप न्यग्रोध और महाशाख हैं, आप ही मूलकुसुमार्चित हैं। स्कन्ध, पत्र, अङ्कुर, लता एवं पल्लवस्वरूप आपको नमस्कार है॥ १७–२४॥ |
| मूलं ते ब्राह्मणा ब्रह्मन् स्कन्धस्ते क्षत्रियाः प्रभो।<br>वैश्याः शाखा दलं शूद्रा वनस्पते नमोऽस्तु ते ॥ २५<br><br>ब्राह्मणाः साग्नयो वक्त्राः दोर्दण्डाः सायुधा नृपाः।<br>पार्श्वाद् विशश्चोरुयुगाज्जाताः शूद्राश्च पादतः ॥ २६<br><br>नेत्राद् भानुरभूत् तुभ्यं पद्भ्यां भूः श्रोत्रयोर्दिशः।<br>नाभ्या ह्यभूदन्तरिक्षं शशाङ्को मनसस्तव ॥ २७ | ब्रह्मन्! ब्राह्मण आपके मूल हैं। प्रभो! क्षत्रिय आपके स्कन्ध, वैश्य शाखा एवं शूद्र पत्ते हैं। वनस्पते! आपको नमस्कार है। अग्निसहित ब्राह्मण आपके मुख एवं शस्त्रसहित क्षत्रिय आपकी भुजाएँ हैं। वैश्य आपके दोनों जाँघोंके पार्श्वभागसे तथा शूद्र आपके चरणोंसे उत्पन्न हुए हैं। आपके नेत्रसे सूर्य उत्पन्न हुए हैं। आपके चरणोंसे पृथ्वी, कानोंसे दिशाएँ, नाभिसे अन्तरिक्ष तथा |
| ४३० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८६ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राणाद् वायुः समभवत् कामाद् ब्रह्मा पितामहः।<br>क्रोधात् त्रिनयनो रुद्रः शीर्ष्णोः द्यौः समवर्तत ॥ २८<br><br>इन्द्राग्नी वदनात् तुभ्यं पशवो मलसम्भवाः।<br>ओषध्यो रोमसम्भूता विराजस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ २९<br><br>पुष्पहास नमस्तेऽस्तु महाहास नमोऽस्तु ते।<br>ॐकारस्त्वं वषट्कारो वौषट्त्वं च स्वधा सुधा ॥ ३०<br><br>स्वाहाकार नमस्तुभ्यं हन्तकार नमोऽस्तु ते।<br>सर्वाकार निराकार वेदाकार नमोऽस्तु ते ॥ ३१<br><br>त्वं हि वेदमयो देवः सर्वदेवमयस्तथा।<br>सर्वतीर्थमयश्चैव सर्वयज्ञमयस्तथा ॥ ३२ | मनसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए हैं। आपके प्राणसे वायु, कामसे पितामह ब्रह्मा, क्रोधसे त्रिनेत्र रुद्र और सिरसे द्युलोक आविर्भूत हुए हैं। आपके मुखसे इन्द्र और अग्नि, मलसे पशु तथा रोमसे ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। आप विराज हैं। आपको नमस्कार है। हे पुष्पहास! आपको प्रणाम है। हे महाहास! आपको प्रणाम है। आप ओङ्कार, वषट्कार और वौषट् हैं। आप स्वधा और सुधा हैं। हे स्वाहाकार! आपको प्रणाम है। हे हन्तकार! आपको प्रणाम है। हे सर्वाकार! हे निराकार! हे वेदाकार! आपको प्रणाम है। आप वेदमय देव तथा सर्वदेवमय हैं। आप सर्वतीर्थमय और सर्वयज्ञमय हैं॥ २५–३२ ॥ |
| नमस्ते यज्ञपुरुष यज्ञभागभुजे नमः।<br>नमः सहस्रधाराय शतधाराय ते नमः ॥ ३३<br><br>भूर्भुवःस्वःस्वरूपाय गोदायामृतदायिने।<br>सुवर्णब्रह्मदात्रे च सर्वदात्रे च ते नमः ॥ ३४<br><br>ब्रह्मेशाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मादे ब्रह्मरूपधृक्।<br>परब्रह्म नमस्तेऽस्तु शब्दब्रह्म नमोऽस्तु ते ॥ ३५<br><br>विद्यास्त्वं वेद्यरूपस्त्वं वेदनीयस्त्वमेव च।<br>बुद्धिस्त्वमपि बोध्यश्च बोधस्त्वं च नमोऽस्तु ते ॥ ३६<br><br>होता होमश्च हव्यं च हूयमानश्च हव्यवाट्।<br>पाता पोता च पूतश्च पावनीयश्च ॐ नमः ॥ ३७<br><br>हन्ता च हन्यमानश्च ह्रियमाणस्त्वमेव च।<br>हर्त्ता नेता च नीतिश्च पूज्योऽग्र्यो विश्वधार्यसि ॥ ३८<br><br>स्रुकस्रुवौ परधामासि कपालोलूखलोऽरणिः।<br>यज्ञपात्रारण्येस्त्वमेकधा बहुधा त्रिधा ॥ ३९<br><br>यज्ञस्त्वं यजमानस्त्वमीड्यस्त्वमसि याजकः।<br>ज्ञाता ज्ञेयस्तथा ज्ञानं ध्येयो ध्याताऽसि चेश्वर ॥ ४०<br><br>ध्यानयोगश्च योगी च गतिर्मोक्षो धृतिः सुखम्।<br>योगाङ्गानि त्वमीशानः सर्वगस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ ४१ | यज्ञपुरुष! आपको प्रणाम है। हे यज्ञभागके भोक्तः! आपको प्रणाम है। सहस्रधार और शतधारको प्रणाम है। भूर्भुवःस्वःस्वरूप, गोदाता, अमृतदाता, सुवर्ण और ब्रह्म (संसारके निमित्त और उपादान कारण आदि)-के भी जन्मदाता तथा सर्वदाता आपको प्रणाम है। आप ब्रह्मेशको नमस्कार है। हे ब्रह्मादि! हे ब्रह्मरूपधारिन्! हे परमब्रह्म! आपको प्रणाम है। हे शब्दब्रह्म! आपको प्रणाम है। आप ही विद्या, आप ही वेद्यरूप तथा आप ही जानने योग्य हैं। आप ही बुद्धि, बोध्य और बोधरूप हैं। आपको प्रणाम है। आप होता, होम, हव्य, हूयमान द्रव्य तथा हव्यवाट्, पाता, पोता, पूत तथा पावनीय ओङ्कार हैं। आपको नमस्कार है। आप हन्ता, हन्यमान, ह्रियमाण, हर्ता, नेता, नीति, पूज्य, श्रेष्ठ तथा संसारको धारण करनेवाले हैं। आप स्रुक्, स्रुव, परधाम, कपाली, उलूखल, अरणि, यज्ञपात्र, आरणेय, एकधा, त्रिधा और बहुधा हैं। आप यज्ञ हैं और आप यजमान हैं। आप स्तुत्य और याजक हैं। आप ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान, ध्येय, ध्याता तथा ईश्वर हैं। आप ध्यानयोग, योगी, गति, मोक्ष, धृति, सुख, योगाङ्ग, ईशान एवं सर्वग हैं। आपको नमस्कार है॥ ३३–४१ ॥ |
अध्याय ८६ ] स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र [ ४३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मा होता तथोद्गाता साम यूपोऽथ दक्षिणा।<br>दीक्षा त्वं त्वं पुरोडाशस्त्वं पशुः पशुवाह्यसि॥ ४२ | आप ब्रह्मा, होता, उद्गाता, साम, यूप, दक्षिणा तथा दीक्षा हैं। आप पुरोडाश एवं आप ही पशु तथा पशुवाही हैं। |
| गुह्यो धाता च परमः शिवो नारायणस्तथा।<br>महाजनो निरयनः सहस्रार्केन्दुरूपवान्॥ ४३ | आप गुह्य, धाता, परम, शिव, नारायण, महाजन, निराश्रय तथा हजारों सूर्य और चन्द्रमाके समान रूपवान् हैं। |
| द्वादशारोऽथ षण्णाभिस्त्रिव्यूहो द्वियुगस्तथा।<br>कालचक्रो भवानीशो नमस्ते पुरुषोत्तमः॥ ४४ | आप बारह अरों, छः नाभियों, तीन व्यूहों एवं दो युगोंवाले कालचक्र तथा ईश एवं पुरुषोत्तम हैं। आपको नमस्कार है। |
| पराक्रमो विक्रमस्त्वं हयग्रीवो हरीश्वरः।<br>नरेश्वरोऽथ ब्रह्मोशः सूर्येशस्त्वं नमोऽस्तु ते॥ ४५ | आप पराक्रम, विक्रम, हयग्रीव, हरीश्वर, नरेश्वर, ब्रह्मोश और सूर्येश हैं। आपको नमस्कार है। |
| अश्ववक्त्रो महामेधाः शम्भुः शक्रः प्रभञ्जनः।<br>मित्रावरुणमूर्तिस्त्वममूर्तिरनघः परः॥ ४६ | आप अश्ववक्त्र, महामेधा, शम्भु, शक्र, प्रभञ्जन, मित्रावरुणकी मूर्ति, अमूर्ति, निष्पाप और श्रेष्ठ हैं। |
| प्राग्वंशकायो भूतादिर्महाभूतोऽच्युतो द्विजः।<br>त्वमूर्ध्वकर्त्ता ऊर्ध्वश्च ऊर्ध्वरेता नमोऽस्तु ते॥ ४७ | आप प्राग्वंशकाय (मूलपुरुष), भूतादि, महाभूत, अच्युत और द्विज हैं। आप ऊर्ध्वकर्त्ता, ऊर्ध्व और ऊर्ध्वरेता हैं। आपको नमस्कार है। |
| महापातकहा त्वं च उपपातकहा तथा।<br>अनीशः सर्वपापेभ्यस्त्वामहं शरणं गतः॥ ४८ | आप महापातकोंका विनाश करनेवाले तथा उपपातकोंके नाशक हैं। आप सभी पापोंसे निर्लिप्त हैं। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। |
| इत्येतत् परमं स्तोत्रं सर्वपापप्रमोचनम्।<br>महेश्वरेण कथितं वाराणस्यां पुरा मुने॥ ४९ | मुने! प्राचीन कालमें महेश्वरने सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति देनेवाले इस श्रेष्ठ स्तोत्रको वाराणसीमें कहा था। |
| केशवस्याग्रतो गत्वा स्नात्वा तीर्थे सितोदके।<br>उपशान्तस्तथा जातो रुद्रः पापवशात् ततः॥ ५० | तीर्थके स्वच्छ जलमें स्नान कर केशवका दर्शन करनेसे रुद्र पापके प्रभावसे मुक्त एवं शान्त हुए थे। |
| एतत् पवित्रं त्रिपुरघ्नभाषितं<br>पठन् नरो विष्णुपरो महर्षे।<br>विमुक्तपापो ह्युपशान्तमूर्तिः<br>सम्पूज्यते देववरैः प्रसिद्धैः॥ ५१ | महर्षे! त्रिपुरारिके द्वारा कहे गये इस स्तोत्रका पाठ करनेसे विष्णुभक्त मनुष्य पापसे मुक्त और सौम्य होकर प्रसिद्ध तथा श्रेष्ठ देवताओंसे पूजित होता है॥ ४२-५१॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छियासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८६॥
| ४३२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८७ |
|---|
सतासीवाँ अध्याय
अगस्त्यद्वारा कथित पापप्रशमनस्तोत्र
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>द्वितीयं पापशमनं स्तवं वक्ष्यामि ते मुने।<br>येन सम्यगधीतेन पापं नाशं तु गच्छति॥ १<br><br>मत्स्यं नमस्ये देवेशं कूर्मं गोविन्दमेव च।<br>हयशीर्षं नमस्येऽहं भवं विष्णुं त्रिविक्रमम्॥ २<br><br>नमस्ये माधवेशानौ हृषीकेशकुमारिणौ।<br>नारायणं नमस्येऽहं नमस्ये गरुडासनम्॥ ३<br><br>ऊर्ध्वकेशं नृसिंहं च रूपधारं कुरुध्वजम्।<br>कामपालमखण्डं च नमस्ये ब्राह्मणप्रियम्॥ ४<br><br>अजितं विश्वकर्माणं पुण्डरीकं द्विजप्रियम्।<br>हंसं शम्भुं नमस्ये च ब्रह्माणं सप्रजापतिम्॥ ५<br><br>नमस्ये शूलबाहुं च देवं चक्रधरं तथा।<br>शिवं विष्णुं सुवर्णाक्षं गोपतिं पीतवाससम्॥ ६<br><br>नमस्ये च गदापाणिं नमस्ये च कुशेशयम्।<br>अर्धनारीश्वरं देवं नमस्ये पापनाशनम्॥ ७<br><br>गोपालं च सवैकुण्ठं नमस्ये चापराजितम्।<br>नमस्ये विश्वरूपं च सौगन्धिं सर्वदाशिवम्॥ ८ | **पुलस्त्यजी बोले—**मुने! अब मैं आपसे पापोंका निवारण करनेवाला दूसरा स्तोत्र कहूँगा; जिसका भलीभाँति अध्ययन (पाठ) करनेसे पाप विनष्ट हो जाता है। मैं मत्स्य एवं कच्छपका रूप धारण करनेवाले देवेश गोविन्दभगवान्को नमस्कार करता हूँ। मैं हयशीर्ष, भव और त्रिविक्रम विष्णुभगवान्को नमस्कार करता हूँ। मैं माधव, ईशान, हृषीकेश और कुमारको नमस्कार करता हूँ। मैं नारायणको नमस्कार करता हूँ। मैं गरुडासन भगवान्को नमस्कार करता हूँ। मैं ऊर्ध्वकेश तथा नरसिंहका रूप धारण करनेवाले एवं कुरुध्वज, कामपाल, अखण्ड और ब्राह्मणप्रिय देवको नमस्कार करता हूँ। मैं अजित, विश्वकर्मा, पुण्डरीक, द्विजप्रिय, हंस, शम्भु तथा प्रजापतिके सहित ब्रह्माको नमस्कार करता हूँ। मैं शूलबाहु, चक्रधरदेव, शिव, विष्णु, सुवर्णाक्ष और गोपति तथा पीतवासाको प्रणाम करता हूँ। मैं गदा धारण करनेवाले गदाधर भगवान्को नमस्कार करता हूँ और कुशेशयको नमस्कार करता हूँ। मैं पापका नाश करनेवाले अर्धनारीश्वर देवको नमस्कार करता हूँ। मैं वैकुण्ठसहित गोपाल तथा अपराजितको नमस्कार करता हूँ। मैं विश्वरूप, सौगन्धि और सदाशिवको प्रणाम करता हूँ॥ १—८॥ |
| पाञ्चालिकं हयग्रीवं स्वयम्भुवममरेश्वरम्।<br>नमस्ये पुष्कराक्षं च पयोगन्धिं च केशवम्॥ ९ | मैं पाञ्चालिक, हयग्रीव, स्वयम्भुव, अमरेश्वर, पुष्कराक्ष, पयोगन्धि और केशवको नमस्कार करता हूँ। |
| अविमुक्तं च लोलं च ज्येष्ठेशं मध्यमं तथा।<br>उपशान्तं नमस्येऽहं मार्कण्डेयं सजम्बुकम्॥ १० | मैं अविमुक्त, लोल, ज्येष्ठेश, मध्यम, उपशान्त तथा जम्बुकसहित मार्कण्डेयको नमस्कार करता हूँ। |
| नमस्ये पद्मकिरणं नमस्ये वडवामुखम्।<br>कार्तिकैयं नमस्येऽहं बाह्लीकं शिखिनं तथा॥ ११ | मैं पद्मकिरणको नमस्कार करता हूँ। मैं वडवामुखको नमस्कार करता हूँ। मैं कार्तिकेय, बाह्लीक तथा शिखीको प्रणाम करता हूँ। |
अध्याय ८७ ] अगस्त्यद्वारा कथित पापप्रशमनस्तोत्र [ ४३३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमस्ये स्थाणुमनघं नमस्ये वनमालिनम्।<br>नमस्ये लाङ्गलीशं च नमस्येऽहं श्रियः पतिम्॥ १२<br>नमस्ये च त्रिनयनं नमस्ये हव्यवाहनम्।<br>नमस्ये च त्रिसौवर्णं नमस्ये धरणीधरम्॥ १३<br>त्रिणाचिकेतं ब्रह्मेशं नमस्ये शशिभूषणम्।<br>कपर्दिनं नमस्ये च सर्वामयविनाशनम्॥ १४<br>नमस्ये शशिनं सूर्यं ध्रुवं रौद्रं महौजसम्।<br>पद्मनाभं हिरण्याक्षं नमस्ये स्कन्दमव्ययम्॥ १५<br>नमस्ये भीमर्हंसौ च नमस्ये हाटकेश्वरम्।<br>सदाहंसं नमस्ये च नमस्ये प्राणतर्पणम्॥ १६ | मैं स्थाणु एवं अनघको नमस्कार करता हूँ तथा वनमालीको नमस्कार करता हूँ। मैं लाङ्गलीश तथा लक्ष्मीपतिको नमस्कार करता हूँ। मैं त्रिनेत्रको प्रणाम करता हूँ तथा हव्यवाहनको नमस्कार करता हूँ। मैं त्रिसौवर्णको नमस्कार करता हूँ तथा धरणीधरको नमस्कार करता हूँ। मैं त्रिणाचिकेत, ब्रह्मेश तथा शशिभूषणको प्रणाम करता हूँ। मैं सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करनेवाले कपर्दीभगवान्को प्रणाम करता हूँ। मैं चन्द्र, सूर्य, ध्रुव तथा महान् ओजस्वी रुद्रभगवान्को प्रणाम करता हूँ। मैं पद्मनाभ, हिरण्याक्ष तथा अव्यय स्कन्दको प्रणाम करता हूँ। मैं भीम और हंसको प्रणाम करता हूँ। मैं हाटकेश्वरको प्रणाम करता हूँ। मैं सदाहंसको प्रणाम करता हूँ और प्राणोंको तृप्त करनेवालेको प्रणाम करता हूँ॥ ९—१६॥ |
| नमस्ये रुक्मकवचं महायोगिनमीश्वरम्।<br>नमस्ये श्रीनिवासं च नमस्ये पुरुषोत्तमम्॥ १७<br>नमस्ये च चतुर्बाहुं नमस्ये वसुधाधिपम्।<br>वनस्पतिं पशुपतिं नमस्ये प्रभुमव्ययम्॥ १८<br>श्रीकण्ठं वासुदेवं नीलकण्ठं सदण्डिनम्।<br>नमस्ये सर्वमनघं गौरीशं नकुलीश्वरम्॥ १९<br>मनोहरं कृष्णकेशं नमस्ये चक्रपाणिनम्।<br>यशोधरं महाबाहुं नमस्ये च कुशप्रियम्॥ २०<br>भूधरं छादितगदं सुनेत्रं शूलशङ्खिनम्।<br>भद्राक्षं वीरभद्रं च नमस्ये शङ्कुकर्णिकम्॥ २१<br>वृषध्वजं महेशं च विश्वामित्रं शशिप्रभम्।<br>उपेन्द्रं चैव गोविन्दं नमस्ये पङ्कजप्रियम्॥ २२<br>सहस्रशिरसं देवं नमस्ये कुन्दमालिनम्।<br>कालाग्निं रुद्रदेवेशं नमस्ये कृत्तिवाससम्॥ २३<br>नमस्ये छागलेशं च नमस्ये पङ्कजासनम्।<br>सहस्राक्षं कोकनदं नमस्ये हरिशङ्करम्॥ २४ | मैं रुक्म-कवच धारण करनेवाले महायोगी ईश्वरको नमस्कार करता हूँ और पुरुषोत्तम श्रीनिवासभगवान्को नमस्कार करता हूँ। मैं चार भुजा धारण करनेवाले देवको प्रणाम करता हूँ। मैं पृथ्वीके अधिपतिको प्रणाम करता हूँ। मैं वनस्पति, पशुपति और अव्यय प्रभुको प्रणाम करता हूँ। मैं श्रीकण्ठ वासुदेव, दण्डसहित नीलकण्ठ, सर्व, अनघ, गौरीश तथा नकुलीश्वरभगवान्को नमस्कार करता हूँ। मैं मनको हरण करनेवाले कृष्णकेश चक्रपाणि भगवान्को नमस्कार करता हूँ और यशोधारी, महाबाहु कुशप्रियको नमस्कार करता हूँ। मैं भूधर, छादितगद, सुनेत्र, शूलशंखी, भद्राक्ष, वीरभद्र तथा शंकुकर्णिकको नमस्कार करता हूँ। मैं वृषध्वज, महेश, विश्वामित्र, शशिप्रभ, उपेन्द्र, गोविन्द तथा पङ्कजप्रियको नमस्कार करता हूँ। मैं सहस्रशीर्षा तथा कुन्दमाली देवको नमस्कार करता हूँ। मैं कालाग्नि, रुद्रदेवेश तथा कृत्तिवासाको प्रणाम करता हूँ। मैं छागलेशको नमस्कार करता हूँ तथा पङ्कजासनको नमस्कार करता हूँ। मैं सहस्राक्ष, कोकनद तथा हरिशंकरको नमस्कार करता हूँ॥ १७—२४॥ |
| अगस्त्यं गरुडं विष्णुं कपिलं ब्रह्मवाङ्मयम्।<br>सनातनं च ब्रह्माणं नमस्ये ब्रह्मतत्परम्॥ २५ | मैं अगस्त्य, गरुड, विष्णु, कपिल, ब्रह्मवाङ्मय, सनातन, ब्रह्मा तथा ब्रह्मतत्परको नमस्कार करता हूँ। |
| ४३४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८८ |
|---|
| अप्रतर्क्यं चतुर्बाहुं सहस्त्रांशुं तपोमयम्।<br>नमस्ये धर्मराजानं देवं गरुडवाहनम्॥ २६<br><br>सर्वभूतगतं शान्तं निर्मलं सर्वलक्षणम्।<br>महायोगिनमव्यक्तं नमस्ये पापनाशनम्॥ २७<br><br>निरञ्जनं निराकारं निर्गुणं निर्मलं पदम्।<br>नमस्ये पापहन्तारं शरण्यं शरणं व्रजे॥ २८<br><br>एतत् पवित्रं परमं पुराणं<br>प्रोक्तं त्वगस्त्येन महर्षिणा च।<br>धन्यं यशस्यं बहुपापनाशनं<br>संकीर्तनात् स्मरणात् संश्रवाच्च॥ २९ | मैं अनुमानसे परे, चार भुजाधारी, सहस्रांशु, तपोमूर्ति, धर्मराज गरुड़वाहन देवको नमस्कार करता हूँ। मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्याप्त, शान्तस्वरूप, निर्मल, समस्त लक्षणोंसे युक्त, महान् योगी, अव्यक्तस्वरूप एवं पाप नाश करनेवाले भगवान्को नमस्कार करता हूँ। मैं निरञ्जन, निराकार, गुणोंसे रहित, निर्मलपदस्वरूप, पाप हरण करनेवालेको नमस्कार करता हूँ तथा शरणागतकी रक्षा करनेवालेकी शरणमें जाता हूँ। महर्षि अगस्त्यने इस परम पवित्र पुरातन स्तोत्रको कहा था। इसके कथन, स्मरण तथा श्रवण करनेसे अनेक पापोंका विनाश हो जाता है और मनुष्य धन्य एवं यशस्वी हो जाता है॥ २५—२९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८७॥
अट्टासीवाँ अध्याय
बलिको कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव, उनकी स्तुति, बलिके यज्ञमें जानेकी उत्कण्ठा और भरद्वाजसे स्वस्थानका कथन
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
|---|---|
| गतेऽथ तीर्थयात्रायां प्रह्लादे दानवेश्वरे।<br>कुरुक्षेत्रं समभ्यागाद् यष्टुं वैरोचनो बलिः॥ १ | दानवेश्वर प्रह्लादके तीर्थयात्राके लिये चले जानेपर विरोचनका पुत्र बलि कुरुक्षेत्रमें यज्ञ करनेके लिये गया। |
| तस्मिन् महाधर्मयुते तीर्थे ब्राह्मणपुङ्गवः।<br>शुक्रो द्विजातिप्रवरानामन्रयत् भार्गवान्॥ २ | उस महान् धर्मयुक्त तीर्थमें ब्राह्मणश्रेष्ठ शुक्राचार्यने द्विजोंमें अत्यन्त श्रेष्ठ भार्गवोंको आमन्त्रित किया। |
| भृगूनामन्त्र्यमाणान् वै श्रुत्वात्रेयाः सगौतमाः।<br>कौशिकाङ्गिरसश्चैव तत्यजुः कुरुजाङ्ग्लान्॥ ३ | भृगुवंशीय ब्राह्मणोंका आमन्त्रित किया जाना सुनकर अत्रि, गौतम, कौशिक और अङ्गिरागोत्रीय ब्राह्मणोंने कुरुजाङ्गलका त्याग कर दिया। |
| उत्तराशां प्रजग्मुस्ते नदीमनु शतद्रुकाम्।<br>शातद्रवे जले स्नात्वा विपाशां प्रययुस्ततः॥ ४ | वे उत्तर दिशामें शतद्रु नदीके तटपर गये। शतद्रुके जलमें स्नान करनेके बाद वे वहाँसे विपाशा नदीके निकट चले गये। |
| विज्ञाय तत्राप्यरतिं स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः।<br>प्रजग्मुः किरणां पुण्यां दिनेशकिरणच्युताम्॥ ५ | वहाँ भी मनके अनुकूल न होनेके कारण वे सब स्नान करनेके पश्चात् पितरों एवं देवोंका पूजन कर सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न किरणा नदीके समीप गये। |
अध्याय ८८ ] बलिका कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव ४३५
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्यां स्नात्वाऽर्च्य देवर्षे सर्व एव महर्षयः।<br>ऐरावतीं सुपुण्योदां स्नात्वा जग्मुरथेश्वरीम्॥ ६<br><br>देविकाया जले स्नात्वा पयोष्ण्यां चैव तापसाः।<br>अवतीर्णा मुने स्नातुमात्रेयाद्याः शुभां नदीम्॥ ७<br><br>ततो निमग्ना ददृशुः प्रतिबिम्बमथात्मनः।<br>अन्तर्जले द्विजश्रेष्ठ महदाश्चर्यकारकम्॥ ८ | देवर्षे! उसमें स्नान और अर्चन करनेके बाद सभी महर्षि पवित्र जलवाली ऐरावती नदीके निकट गये तथा उसमें स्नान करके ईश्वरी नदीके तटपर चले गये। मुने! देविका और पयोष्णीमें स्नान करके आत्रेय आदि तपस्वियोंने शुभा नामकी नदीमें स्नान करनेके लिये प्रवेश किया। द्विजश्रेष्ठ! जलमें गोता लगानेपर उन लोगोंने जलके भीतर महान् आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली अपनी-अपनी परछाई देखी॥ ६-८॥ |
| उन्मज्जने च ददृशुः पुनर्विस्मितमानसाः।<br>ततः स्नात्वा समुत्तीर्णा ऋषयः सर्व एव हि॥ ९<br><br>जग्मुस्ततोऽपि ते ब्रह्मन् कथयन्तः परस्परम्।<br>चिन्तयन्तश्च सततं किमेतदिति विस्मिताः॥ १०<br><br>ततो दूरादपश्यन्त वनषण्डं सुविस्तृतम्।<br>वनं हरगलश्यामं खगध्वनिनिनादितम्॥ ११<br><br>अतितुङ्गतया व्योम आवृण्वानं नगोत्तमम्।<br>विस्तृताभिर्जटाभिस्तु अन्तर्भूमिं च नारद॥ १२<br><br>काननं पुष्पितैर्वृक्षैरतिभाति समन्ततः।<br>दशार्द्धवर्णैः सुखदैर्नभस्तारागणैरिव॥ १३<br><br>तं दृष्ट्वा कमलैर्व्याप्तं पुण्डरीकैश्च शोभितम्।<br>तद्वत् कोकनदैर्व्याप्तं वनं पद्मवनं यथा॥ १४<br><br>प्रजग्मुस्तुष्टिमंतुलां ते ह्लादं परमं ययुः।<br>विविशुः प्रीतमनसो हंसा इव महासरः॥ १५<br><br>तन्मध्ये ददृशुः पुण्यमाश्रमं लोकपूजितम्।<br>चतुर्णां लोकपालानां वर्गाणां मुनिसत्तम॥ १६ | महर्षियोंने डुबकी लगानेके बाद जब सिर ऊपर किया, तब पुनः वैसा ही देखा; इससे वे आश्चर्यमें भर गये। उसके बाद स्नान करके सभी ऋषि बाहर निकले। ब्रह्मन्! उसके पश्चात् वे सभी लोग यह क्या है?—इस विषयमें आश्चर्यपूर्वक आपसमें बातचीत एवं विचार-विमर्श करते हुए वहाँसे भी चले गये। उसके बाद उन लोगोंने दूरसे ही अतिविस्तृत, शंकरके कण्ठकी भाँति श्यामवर्णवाले और पक्षियोंकी ध्वनिसे भरा एक वृक्षोंका समूह (वन) देखा। नारदजी! वह वन अत्यन्त ऊँचा होनेके कारण आकाशको घेरे हुए था तथा उसकी नीचेकी भूमि बिखरे हुए फूलोंसे ढकी रहती थी। वह वन तारागणोंसे जगमगाते हुए आकाशके समान खिले हुए पाँचरंगे वृक्षोंसे बहुत सुन्दर लग रहा था। कमल-वनके समान कमलोंसे व्याप्त, पुण्डरीकोंसे विभूषित एवं कोकनदोंसे भरे उस वनको देखकर वे अत्यन्त प्रसन्न एवं गद्गद हो गये। वे लोग संतुष्ट-चित्तसे उसमें इस प्रकार प्रविष्ट हुए, जिस प्रकार हंस महासरोवरमें प्रवेश करते हैं। मुनिसत्तम! उन लोगोंने उसके बीचमें लोकपालोंके चार वर्गों (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष)-का लोकपूजित पवित्र आश्रम देखा॥ ९—१६॥ |
| धर्माश्रमं प्राङ्मुखं तु पलाशविटपावृतम्।<br>प्रतीच्याभिमुखं ब्रह्मन् अर्थस्येक्षुवनावृतम्॥ १७<br><br>दक्षिणाभिमुखं काम्यं रम्भाशोकवनावृतम्।<br>उदङ्मुखं च मोक्षस्य शुद्धस्फटिकवर्चसम्॥ १८ | ब्रह्मन्! पूर्व दिशाकी ओर मुखवाला पलाशवृक्षसे घिरा हुआ धर्माश्रम, पश्चिममुख इक्षुवनसे घिरा हुआ अर्थाश्रम, दक्षिणकी ओर कदली और अशोकके वनसे घिरा हुआ कामाश्रम तथा उत्तरकी ओर शुद्धस्फटिकके समान तेजस्वी मोक्षाश्रम स्थित था। |
| ४३६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८८ | | :--- | :--- |
| कृतान्ते त्वाश्रमी मोक्षः कामस्त्रेतान्तरे श्रमी।<br>आश्रम्यर्थो द्वापरान्ते तिष्यादौ धर्म आश्रमी ॥ १९<br><br>तान्याश्रमाणि मुनयो दृष्ट्वात्रेयादयोऽव्ययाः।<br>तत्रैव च रतिं चक्रुरखण्डे सलिलाप्लुते ॥ २०<br><br>धर्माद्यैर्भगवान् विष्णुरखण्ड इति विश्रुतः।<br>चतुर्मूर्तिर्जगन्नाथः पूर्वमेव प्रतिष्ठितः ॥ २१<br><br>तमर्चयन्ति ऋषयो योगात्मानो बहुश्रुताः।<br>शुश्रूषयाऽथ तपसा ब्रह्मचर्येण नारद ॥ २२<br><br>एवं ते न्यवसंस्तत्र समेता मुनयो वने।<br>असुरेभ्यस्तदा भीताः स्वाश्रित्याखण्डपर्वतम् ॥ २३<br><br>तथाऽन्ये ब्राह्मणा ब्रह्मन् अश्मकुट्टा मरीचिपाः।<br>स्नात्वा जले हि कालिन्द्याः प्रजग्मुर्दक्षिणामुखाः ॥ २४ | सत्ययुगके अन्तमें मोक्ष अपने आश्रममें निवास करने लगता है, त्रेतामें काम आश्रमवासी हो जाता है, द्वापरके अन्तमें अर्थ आश्रमी बन जाता है और कलिके आदिमें धर्म आश्रममें रहना प्रारम्भ करता है। अव्यय, आत्रेय आदि मुनियोंने उन आश्रमोंको देखकर अखण्ड जलसे परिपूर्ण उस स्थानमें सुखसे रहनेका निश्चय किया। धर्म आदिके द्वारा भगवान् विष्णु अखण्ड नामसे विख्यात हैं। जगन्नाथ चार मूर्तियोंवाले हैं, यह पहलेसे ही निश्चित है। नारदजी ! बहुश्रुत योगात्मा ऋषिलोग सेवा, तप और ब्रह्मचर्यके द्वारा उनकी पूजा करते हैं। असुरोंसे त्रस्त होकर वे मुनिगण सम्मिलितरूपसे उस अखण्ड पर्वतका भलीभाँति आश्रयण कर रहने लगे। ब्रह्मन् ! केवल पत्थरसे कूटे हुए अन्नको खानेवाले वानप्रस्थी साधु तथा सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले अन्य ब्राह्मण आदि कालिन्दीके जलमें स्नान कर दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥ १७—२४॥ | | अवन्तिविषयं प्राप्य विष्णुमासाद्य संस्थिताः।<br>विष्णोरपि प्रसादेन दुष्प्रवेशं महासुरैः ॥ २५<br><br>बालखिल्यादयो जग्मुरवशा दानवाद् भयात्।<br>रुद्रकोटिं समाश्रित्य स्थितास्ते ब्रह्मचारिणः ॥ २६<br><br>एवं गतेषु विप्रेषु गौतमाङ्गिरसादिषु।<br>शुक्रस्तु भार्गवान् सर्वान् निन्ये यज्ञविधौ मुने ॥ २७<br><br>अधिष्ठिते भार्गवैस्तु महायज्ञेऽमितद्युते।<br>यज्ञदीक्षां बलेः शुक्रश्चकार विधिना स्वयंम् ॥ २८<br><br>श्वेताम्बरधरो दैत्यः श्वेतमाल्यानुलेपनः।<br>मृगाजिनावृतः पृष्ठे बर्हिपत्रविचित्रितः ॥ २९<br><br>समास्ते वितते यज्ञे सदस्यैरभिसंवृतः।<br>हयग्रीवप्रलम्बाद्यैर्मयबाणपुरोगमैः ॥ ३०<br><br>पत्नी विन्ध्यावली चास्य दीक्षिता यज्ञकर्मणि।<br>ललनानां सहस्त्रस्य प्रधाना ऋषिकन्यका ॥ ३१<br><br>शुक्रेणाश्वः श्वेतवर्णो मधुमासे सुलक्षणः।<br>महीं विहर्तुमुत्सृष्टस्तारकाक्षोऽन्वगाच्च तम् ॥ ३२ | वे विष्णुभगवान्की कृपासे महान् असुरोंके कारण प्रवेश पानेमें कठिन अवन्ति नगरीमें पहुँचे और उनके निकट रहने लगे। दानवोंके डरसे विवश होकर बालखिल्य आदि ब्रह्मचारी ऋषि रुद्रकोटि चले गये और वहाँ रहने लगे। मुने! इस प्रकार गौतम और आङ्गिरस आदि ब्राह्मणोंके चले जानेपर शुक्राचार्य सभी भार्गववंशीय ब्राह्मणोंको यज्ञ-कार्यमें ले गये। अमिततेजस्विन्! भार्गव-वंशीय ब्राह्मणोंसे अधिकृत शुक्राचार्यने बलिको महायज्ञमें स्वयं विधिवत् यज्ञकी दीक्षा दी। श्वेत वस्त्र धारण करनेवाले, श्वेत माल्य एवं अनुलेपनसे युक्त, मृग-चर्मसे आवृत एवं मयूरपुच्छसे सुसज्जित दैत्य बलिने हयग्रीव, प्रलम्ब, मय एवं बाण आदि सदस्योंसे घिरे हुए विस्तृत यज्ञ-मण्डपमें आसन ग्रहण किया। उसकी पत्नी विन्ध्यावली भी यज्ञकर्ममें दीक्षित हुई। वह ऋषि-कन्या हजारों ललनाओंमें प्रधान थी। शुक्राचार्यने चैत्रमासमें सुलक्षण अश्व पृथ्वीपर विचरण करनेके लिये छोड़ा। तारकाक्ष नामका असुर उसके पीछे-पीछे चलने लगा ॥ २५—३२॥ |
अध्याय ८८ ] बलिका कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव ४३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवमश्वे समुत्सृष्टे वितथे यज्ञकर्मणि।<br>गते च मासत्रितये हूयमाने च पावके ॥ ३३<br>पूज्यमानेषु दैत्येषु मिथुनस्थे दिवाकरे।<br>सुषुवे देवजननी माधवं वामनाकृतिम् ॥ ३४<br>तं जातमात्रं भगवन्तमीशं<br>नारायणं लोकपतिं पुराणम्।<br>ब्रह्मा समभ्येत्य समं महर्षिभिः<br>स्तोत्रं जगादाथ विभोर्महर्षे ॥ ३५<br>नमोऽस्तु ते माधव सत्त्वमूर्ते<br>नमोऽस्तु ते शाश्वत विश्वरूप।<br>नमोऽस्तु ते शत्रुवनेन्धनाग्ने<br>नमोऽस्तु वै पापमहादवाग्ने ॥ ३६<br>नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।<br>नमस्ते जगदाधार नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ ३७<br>नारायण जगन्मूर्ते जगन्नाथ गदाधर।<br>पीतवासः श्रियःकान्त जनार्दन नमोऽस्तु ते ॥ ३८<br>भवांस्त्राता च गोप्ता च विश्वात्मा सर्वगोऽव्ययः।<br>सर्वधारी धराधारी रूपधारी नमोऽस्तु ते ॥ ३९<br>वर्धस्व वर्धिताशेषत्रैलोक्य सुरपूजित।<br>कुरुष्व दैवतपते मघोनोऽश्रुप्रमार्जनम् ॥ ४०<br>त्वं धाता च विधाता च संहर्ता त्वं महेश्वरः।<br>महालय महायोगिन् योगशायिन् नमोऽस्तु ते ॥ ४१ | इस प्रकार उस अश्वके छोड़े जानेपर यज्ञकर्मके चलते हुए अग्निमें हवन करते तीन मास व्यतीत हो जानेपर तथा दैत्योंके पूजित होने और सूर्यके मिथुन-राशिमें सङ्क्रमण करनेपर देवमाता अदितिने वामनके आकारवाले माधवको जन्म दिया। महर्षे! उन भगवान्, ईश, नारायण लोकपति पुराण-पुरुषके अवतार होते ही ब्रह्मा महर्षियोंके साथ उनके निकट गये तथा (उन) विभुकी स्तुति करने लगे। हे माधव! हे सत्त्वमूर्ते! आपको नमस्कार है। हे शाश्वत! हे विश्वरूप! आपको नमस्कार है। शत्रुरूपी वनके ईंधनके लिये हे अग्निस्वरूप! आपको नमस्कार है। पापरूपी वनके लिये हे महादवाग्निस्वरूप! आपको नमस्कार है। हे पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। हे विश्वकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है। हे जगत्के आधार! आपको नमस्कार है। हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। हे नारायण! हे जगन्मूर्ते! हे जगन्नाथ! हे गदाधर! हे पीताम्बर धारण करनेवाले! हे लक्ष्मीपते! हे जनार्दन! आपको नमस्कार है। आप पालन करनेवाले, रक्षक, विश्वकी आत्मा, सर्वत्र गमन करनेवाले, अविनाशी, सबको धारण करनेवाले, पृथिवीको धारण करनेवाले तथा रूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। हे देवपूजित! हे सारी त्रिलोकीको बढ़ानेवाले! आपका अभ्युदय हो। हे दैवतपते! आप इन्द्रके आँसू पोंछें। आप धाता, विधाता, संहर्ता, महेश्वर, महालय, महायोगी और योगशायी हैं। आपको नमस्कार है॥ ३३—४१॥ |
| इत्थं स्तुतो जगन्नाथः सर्वात्मा सर्वगो हरिः।<br>प्रोवाच भगवान् मह्यं कुरूपनयनं विभो ॥ ४२<br>ततश्चकार देवस्य जातकर्मादिकाः क्रियाः।<br>भरद्वाजो महातेजा बार्हस्पत्यस्तपोधनः ॥ ४३<br>व्रतबन्धं तथेशस्य कृतवान् सर्वशास्त्रवित्।<br>ततो ददुः प्रीतियुताः सर्व एव वरान् क्रमात् ॥ ४४ | इस प्रकारकी स्तुति किये जानेपर सर्वात्मा, सर्वगामी जगन्नाथभगवान् श्रीहरिने कहा—विभो! मेरा उपनयन-संस्कार कीजिये। उसके बाद बृहस्पतिवंशमें उत्पन्न महातेजस्वी तपोधन भरद्वाजने वामनकी जातकर्म आदि सभी क्रियाएँ सम्पन्न करायीं। उसके पश्चात् सभी शास्त्रोंके वेत्ता भरद्वाजने ईश्वरका व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत) कराया। उसके बाद अन्य सभीने प्रसन्न होकर वटुकको क्रमशः श्रेष्ठ दान दिये। |
| ४३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८८ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| यज्ञोपवीतं पुलहस्त्वहं च सितवाससी।<br>मृगाजिनं कुम्भयोनिर्भरद्वाजस्तु मेखलाम् ॥ ४५<br>पालाशनददद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः।<br>अक्षसूत्रं वारुणिस्तु कौशयं वेदमथाङ्गिराः ॥ ४६ | पुलहने यज्ञोपवीत, मैं (पुलस्त्य)-ने दो शुक्ल वस्त्र, अगस्त्यने मृगचर्म तथा भरद्वाजने मेखला दी। ब्रह्माके पुत्र मरीचिने पलाशदण्ड, वारुणि (वसिष्ठ)-ने अक्षसूत्र एवं अङ्गिराने रेशमी वस्त्र तथा वेद दिया॥ ४२—४६॥ |
| छत्रं प्रादाद् रघू राजा उपानद्युगलं नृगः।<br>कमण्डलुं बृहत्तेजाः प्रादाद्विष्णोर्बृहस्पतिः ॥ ४७<br>एवं कृतोपनयनो भगवान् भूतभावनः।<br>संस्तूयमानो ऋषिभिः साङ्गं वेदमधीयत ॥ ४८<br>भरद्वाजादाङ्गिरसात् सामवेदं महाध्वनिम्।<br>महदाख्यानसंयुक्तं गन्धर्वसहितं मुने ॥ ४९<br>मासेनैकेन भगवान् ज्ञानश्रुतिमहार्णवः।<br>लोकाचारप्रवृत्त्यर्थमभूच्छ्रुतिविशारदः ॥ ५०<br>सर्वशास्त्रेषु नैपुण्यं गत्वा देवोऽक्षयोऽव्ययः।<br>प्रोवाच ब्राह्मणश्रेष्ठं भरद्वाजमिदं वचः ॥ ५१ | राजा रघुने छत्र, नृगने एक जोड़ा जूता एवं अत्यन्त तेजस्वी बृहस्पतिने विष्णुको कमण्डलु दिया। इस प्रकार उपनयन-संस्कार हो जानेपर ऋषियोंसे संस्तुत होते हुए भगवान् भूतभावनने (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-इन) अङ्गोंके साथ चारों वेदोंका अध्ययन किया। मुने! उन्होंने आङ्गिरस भरद्वाजसे गन्धर्वविद्याके साथ महान् आख्यानोंसे पूर्ण महाध्वन्यात्मक सामवेदका अध्ययन किया। इस प्रकार ज्ञानस्वरूप वेदके अगाध समुद्र भगवान् एक मासमें लोकाचारके व्यवहारके लिये वेदविशारद हो गये। समस्त शास्त्रोंमें निपुण होकर अक्षय, अव्यय वामनने ब्राह्मणश्रेष्ठ भरद्वाजजीसे यह वचन कहा— ॥ ४७-५१ ॥ |
| श्रीवामन उवाच<br><br>ब्रह्मन् व्रजामि देह्याज्ञां कुरुक्षेत्रं महोदयम्।<br>तत्र दैत्यपतेः पुण्यो हयमेधः प्रवर्तते ॥ ५२<br><br>समाविष्टानि पश्यस्व तेजांसि पृथिवीतले।<br>ये संनिधानाः सततं मदंशाः पुण्यवर्धनाः।<br>तेनाहं प्रतिजानामि कुरुक्षेत्रं गतो बलिः ॥ ५३ | श्रीवामनजीने कहा— ब्रह्मन्! मैं अत्यन्त उत्तम कुरुक्षेत्रतीर्थमें जाना चाहता हूँ। आप आज्ञा दीजिये। वहाँ दैत्यराज बलिका पवित्र अश्वमेधयज्ञ हो रहा है। देखिये, पृथ्वीतलपर पुण्यकी वृद्धि करनेवाले मेरे स्थानोंमें तेजोंका समावेश हो रहा है। अतः मुझे यह मालूम हो रहा है कि बलि कुरुक्षेत्रमें स्थित हैं॥ ५२-५३॥ |
| भरद्वाज उवाच<br><br>स्वेच्छया तिष्ठ वा गच्छ नाहमाज्ञापयामि ते।<br>गमिष्यामो वयं विष्णो बलेरध्वरं मा खिद ॥ ५४<br>यद् भवन्तमहं देव परिपृच्छामि तद् वद।<br>केषु केषु विभो नित्यं स्थानेषु पुरुषोत्तम।<br>सान्निध्यं भवतो ब्रूहि ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ५५ | भरद्वाजजीने कहा— आप अपनी इच्छासे यहाँ रहें अथवा जायँ। मैं आपको आदेश नहीं दूँगा। विष्णो! हमलोग बलिके यज्ञमें जायँगे। आप चिन्ता न करें। देव! मैं आपसे जो पूछता हूँ उसे आप बतलायें। विभो! पुरुषोत्तम! मैं यथार्थरूपसे यह जानना चाहता हूँ कि आप किन-किन स्थानोंमें रहते हैं॥ ५४-५५ ॥ |
| वामन उवाच<br><br>श्रूयतां कथयिष्यामि येषु येषु गुरो अहम्।<br>निवसामि सुपुण्येषु स्थानेषु बहुरूपवान् ॥ ५६ | श्रीवामनजी बोले— गुरो! अनेक रूपोंसे युक्त होकर जिन-जिन पवित्र स्थानोंमें मैं रहता हूँ, उनका मैं वर्णन कर रहा हूँ; उसे आप सुनें। |