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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

२८ वेदान्तसार शतश्लोकी, दशश्लोकी, सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह वाक्यसुधा, पञ्चीकरण, प्रपञ्चसारतन्त्र, आत्मबोध, मनीषापञ्चक, आनन्दलहरीस्तोत्र इत्यादि। आचार्य शङ्कर का सिद्धान्त अद्वैतवाद के नाम से प्रसिद्ध है, तदनुसार उन्होंने ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य समस्त जगत् को मिथ्या प्रतिपादित किया (ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या) एतदर्थ उन्होंने मायावाद की स्थापना की। इसे विद्वानों ने उनका अमोघमन्त्र बताया, जिसके माध्यम से उन्होंने ब्रह्म एवं जगत् विषयक पहेली को सुलझाकर विद्वानों के समक्ष रखा। उनके अनुसार सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् ब्रह्म का विवर्तमात्र है। जैसे हमें रज्जु में सर्प की भ्रान्ति हो जाती है, ठीक उसीप्रकार ब्रह्मतत्त्व में ही हमें जगत् की भ्रान्ति हो रही है। उन्होंने आत्मा को स्वतःसिद्ध माना। उनके मत में मोक्ष एक व्यावहारिक सत्य है। इसे प्राप्त करने के लिए उन्होंने ज्ञान, कर्म एवं उपासना सभी की उपादेयता को स्वीकार किया। इसीकारण उनका सिद्धान्त केवल विद्वानों, ज्ञानियों एवं योगियों के लिए ही उपयोगी नहीं, अपितु सामान्यव्यक्ति के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। आचार्य शङ्कर के परवर्ती वेदान्तदर्शन के आचार्यों की परम्परा अत्यन्त विशाल रही है। यहाँ हम उनका संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं- (२२) पद्मपादाचार्य-ये शङ्कराचार्य के प्रथम शिष्य थे। इनका पूर्वनाम सञ्दन था। दक्षिण के चोलप्रदेश में इनका जन्म हुआ। ये गुरु के परमभक्त एवं आज्ञापालक थे। पद्मपाद नाम इन्हें शङ्कराचार्य ने दिया था। एक बार जब उग्रभैरव नामक कापालिक ने शङ्कराचार्य की बलि चढ़ानी चाही तो आचार्य पद्मपाद ने ही उसका वध किया। शङ्कराचार्य ने इन्हें पुरी के गोवर्धनमठ का अध्यक्ष बनाया। इन्होंने अपने जीवनपर्यन्त अद्वैतमत का प्रचार किया। इनका एक अपूर्ण ग्रन्थ पञ्चपादिका, आत्मानात्मविवेक, प्रपञ्चसार तथा सुरेश्वराचार्यकृत लघुवार्तिक की टीका उपलब्ध हैं। पञ्चपादिका में शरीरक भाष्य के केवल चार सूत्रों की व्याख्या की गई है। जिसपर प्रकाशात्ममुनि की विवरण नामक टीका तथा इसपर भी अखण्डानन्दमुनि की तत्त्वदीपन नाम की टीका मिलती है। आचार्य पद्मपाद के शिष्यों में से ही दशनामी संन्यासियों की 'आश्रम' और 'अरण्य' शाखाएँ निकली हैं।

भूमिका २९ (२३) आचार्यमण्डनमिश्र-इनका अन्य नाम सुरेश्वराचार्य भी था। ये रेवा नदी के तटवर्ती प्राचीन महिष्मती के निवासी थे। मण्डनमिश्र अपने समय के मगधप्रदेश के सबसे बड़े विद्वान् और पूर्वमीमांसक थे। ऐसी मान्यता है कि पहले ये कुमारिलभट्ट के शिष्य थे तथा उन्होंने ही शङ्कराचार्य को इनसे शास्त्रार्थ करने के लिए भेजा था। आचार्य शङ्कर ने इनके घर पर पहुँच कर इनसे शास्त्रार्थ किया तथा शास्त्रार्थ में इन्हें परास्त किया। अतः शर्त के अनुसार शङ्कराचार्य का शिष्यत्व ग्रहण करके ये संन्यासी हो गए तथा विश्वरूप एवं सुरेश्वराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए। शङ्कराचार्य ने बाद में शृंगेरी मठ की स्थापना करके इन्हें वहाँ का आचार्य नियुक्त किया। सुरेश्वराचार्य पाण्डित्य के अगाध सागर थे। उनके ग्रन्थों में विचारों की प्रौढ़ता एवं क्रमबद्धता देखने को मिलती है। चित्सुख, विद्यारण्य, सदानन्द, गोविन्दानन्द, अप्पयदीक्षित आदि परवर्ती आचार्यों ने उनके वचनों को अपने ग्रन्थों में प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। संन्यास ग्रहण करने से पहले इन्होंने आपस्तम्बीय मण्डनकारिका, भावनाविवेक एवं काशीमोक्षनिर्णय नामक ग्रन्थों की रचना की तथा उसके पश्चात् इन्होंने तैत्तिरीयश्रुतिवार्तिक, नैष्कर्म्यसिद्धि, इष्टसिद्धि, पञ्चीकरण- वार्तिक, बृहदारण्यकोपनिषद्वार्तिक, ब्रह्मसिद्धि, ब्रह्मसूत्रभाष्यवार्तिक, विधिविवेक, मानसोल्लास, लघुवार्तिक, वार्तिकसार तथा वार्तिकसारसंग्रह ग्रन्थों की संरचना की। संन्यास ग्रहण करने के बाद इन्होंने शङ्करमत का ही प्रचार किया तथा अपने ग्रन्थों में भी उन्हीं के मत का समर्थन किया। (२४) सर्वज्ञात्ममुनि-शङ्कराचार्य द्वारा स्थापित शृंगेरीमठ की गद्दी पर आठवीं शताब्दी के अन्त में इन्हें पदस्थापित किया गया। इनका दूसरा नाम नित्यबोधाचार्य था। शङ्करमत के प्रचार की दृष्टि से इन्होंने 'संक्षेपशारीरक' ग्रन्थ की संरचना की। इनके गुरु का नाम देवेश्वराचार्य था। मधुसूदन सरस्वती एवं स्वामीरामतीर्थ ने सुरेश्वराचार्य से इसकी अभिन्नता प्रतिपादित की है। जो कालक्रम की दृष्टि से संगत प्रतीत नहीं होता। शृंगेरीमठ के प्राचीनलेखों से इनका स्थितिकाल 758 ई० से 848 ई० प्रतीत होता है। ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य के आधार पर लिखे गए 'संक्षेपशारीरक' में श्लोक एवं वार्तिक दोनों की संरचना की गई है। चार अध्यायों में विभक्त इस ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में 562, द्वितीय में 248, तृतीय में 365 तथा चतुर्थ में 53 श्लोक हैं। परवर्ती आचार्यों ने इसे प्रमाणरूप में स्वीकार

३० वेदान्तसार किया है तथा मधुसूदनसरस्वती एवं स्वामीरामतीर्थ ने इस ग्रन्थ पर टीकाएँ भी लिखी हैं। (२५) आचार्य वाचस्पतिमिश्र-इनका जन्मस्थान मिथिला माना जाता है। इनके ग्रन्थों से प्रतीत होता है कि ये अपने विषय के धुरन्धर विद्वान् तथा अद्वैतमत के प्रमुख आचार्य थे। विद्वानों ने इनका समय आठवीं शताब्दी के अन्त से लेकर नवम शती का प्रारम्भ निर्धारित किया है। इनके बाद के प्रायः सभी आचार्यों ने इनके वाक्यों को प्रमाणरूप में स्वीकार किया है। इन्होंने शङ्करभाष्य पर भामती टीका का प्रणयन किया। शङ्करमत को समझाने हेतु इसका अध्ययन अनिवार्य माना जाता है। इनके वैदुष्य से प्रभावित होकर इन्हें राजसम्मान की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये ग्रन्थ लिखने में इतने अधिक तल्लीन रहते थे कि इन्हें अपने आसपास का भी कोई भान नहीं रहता था। जब ये शारीरकभाष्य की टीका लिख रहे थे तो कमरे में दीपक बुझ गया। तब इनकी धर्मपत्नी भामती ने कमरे में आकर वह दीपक जलाया। उसीसमय इनका परिचय अपनी पत्नी से हुआ, तभी पत्नी ने अपने पातिव्रत्य से इन्हें परिचित कराया तो उससे प्रभावित होकर इन्होंने अपनी टीका का नाम 'भामती' रखने का निश्चय करके अपनी पत्नी को सदैव के लिए अमर बना दिया। वाचस्पतिमिश्र ने छहों दर्शनों पर अपनी टीकाएँ लिखीं। उन्होंने वेदान्त पर 'भामती', सुरेश्वरकृत ब्रह्मसिद्धि पर 'ब्रह्मतत्त्वसमीक्षा', सांख्यकारिका पर 'तत्त्वकौमुदी' पातञ्जलदर्शन पर 'तत्त्ववैशारदी', न्यायदर्शन पर 'न्यायवार्तिक- तात्पर्य', पूर्वमीमांसादर्शन पर 'न्यायसूचीनिबन्ध, भाट्टमत पर 'तत्त्वबिन्दु' तथा मण्डनमिश्र के विधिविवेक पर 'न्यायकणिका' नामक टीका की संरचना की। इनके ग्रन्थों में तत्तत् आचार्य के सिद्धान्तों का निष्पक्षभाव से समर्थन के साथ-साथ, उनमें मौलिकता के दर्शन भी होते हैं। शाङ्करसिद्धान्त के प्रचार में इनका बहुत बड़ा हाथ माना जाता है। ये विद्वान् ही नहीं, अपितु उच्चकोटि के साधक भी थे। (२६) श्रीकृष्णमिश्र यति-नवम एवं दशम शती तक वेदान्त विषयक चर्चा विद्वानों तक सीमित थी, किन्तु इसका प्रभाव बढ़ने के कारण धीरे-धीरे यह सर्वसाधारण में भी लोकप्रिय होने लगी। इस दृष्टि से ग्यारहवीं शती में नाटक-काव्यादि के माध्यम से वेदान्तदर्शन को समझाने

भूमिका ३१ का प्रयास आरम्भ हुआ, क्योंकि काव्यादि सर्वसाधारण पर गद्य की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होते हैं। साथ ही ये सुबोध भी होते हैं। अतः अद्वैतमत का प्रचार करने की दृष्टि से श्रीकृष्णमिश्र ने 'प्रबोधचन्द्रोदय' नामक नाटक की संरचना की। इनका काल ग्यारहवीं शती का उत्तरार्द्ध माना जाता है। ये एक संन्यासी थे। इनके द्वारा विरचित नाटक के माध्यम से ही इनकी कवित्व शक्ति एवं दार्शनिकप्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है। (२७) प्रकाशात्मयति-ग्यारहवीं शती में आचार्य रामानुज ने शाङ्कर मत का जोरदार खण्डन किया। उसीसमय इन्होंने शांकरमत की प्रस्थापना का प्रयास किया। इन्होंने पद्मपादाचार्य द्वारा विरचित पञ्चपादिका पर 'पञ्चपादिकाविवरण' नामक टीका का प्रणयन किया। अद्वैतसिद्धान्त की दृष्टि से यह टीका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है, क्योंकि परवर्ती आचार्यों ने अनेकशः इसके वाक्यों को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है। विद्वानों ने इनका स्थितिकाल दसवीं शताब्दी एवं तेरहवीं शताब्दी के मध्य निर्धारित किया है। इनके गुरु का नाम अनन्यानुभव था। इनके ग्रन्थों से पता चलता है कि इनके गुरु को ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ था। इनका दूसरा नाम प्रकाशानुभव था। (२८) आचार्य अद्वैतानन्द- इनका जन्म 1149 ई० में दक्षिणभारत में स्थित कावेरीनदी के तट पर पञ्चनद नामक स्थान में हुआ। इनके पिता प्रेमनाथ तथा माता पार्वती देवी थीं। कौण्डिन्य गोत्र में उत्पन्न इनका पूर्वनाम सीतानाथ था। इन्होंने सत्रह वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण किया। काञ्ची स्थित शारदामठ के अध्यक्ष भूमानन्द (चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती) इनके गुरु थे। जिन्होंने लगभग 1166 ई० में अद्वैतानन्द को अपने स्थान पर नियुक्त करके काशी के लिए प्रस्थान किया। संन्यास लेने से पूर्व ही अद्वैतानन्द ने न्याय एवं मीमांसादर्शन में पर्याप्त निपुणता प्राप्त कर ली थी। स्वामीरामानन्द से इन्होंने शारीरकसूत्रभाष्य का अध्ययन किया, इनके प्रति अद्वैतानन्द की अगाध श्रद्धा थी। 33 वर्षों तक मठ के अध्यक्ष पद पर रहने के पश्चात् 50 वर्ष की आयु में इन्होंने सन् 1199 ई० में समाधि ग्रहण की। इन्हें चिद्विलास एवं आनन्दबोधाचार्य के नाम से जाना जाता है।

३२ वेदान्तसार इन्होंने ब्रह्मविद्याभरण, शान्तिविवरण तथा गुरुप्रदीप आदि तीन ग्रन्थों की रचना की। इनमें ब्रह्मविद्याभरण ही प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसमें ब्रह्मसूत्र के चारों अध्यायों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है। इन्होंने अपने ग्रन्थों में प्रायः वाचस्पतिमिश्र के मत का ही अनुकरण किया है। (२९) श्रीहर्षमिश्र-श्रीहर्ष दार्शनिक और पण्डितकवि दोनों थे। इनके पिता का नाम श्रीहीरपण्डित तथा माता का नाम मामल्ल देवी था। माँ भगवती की उपासना के फलस्वरूप इन्हें पुत्ररत्न (श्रीहर्ष) की प्राप्ति हुई थी। ये अनन्य पितृभक्त तथा दृढ़प्रतिज्ञ थे। कहते हैं चिन्तामणिमन्त्र की सिद्धि के फलस्वरूप इन्हें समस्त विद्याओं में नैपुण्य तथा अद्भुत वाक्चातुर्य की प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् कान्यकुब्ज के राजा की सभा में जाकर इन्होंने शास्त्रार्थ करके राजपण्डितों को पराजित किया तथा राज्यानुकम्पा प्राप्त की। उनके आश्रयदाता राजा का नाम जयचन्द्र अथवा जयन्तचन्द्र था। श्रीहर्ष के समय में देश में न्यायदर्शन का विशेष प्रभाव था। साथ ही दक्षिण और उत्तरभारत में रामानुज एवं निम्बार्क के मतों का भी प्रचार हो रहा था। ऐसे समय में इन्होंने अपनी अपूर्वप्रतिभा द्वारा अद्वैतमत का समर्थन किया। न्यायमत का खण्डन करने हेतु उन्होंने 'खण्डनखण्डखाद्य' नामक अद्भुत एवं प्रौढ़ग्रन्थ की संरचना की। इनका दूसरा काव्यग्रन्थ 'नैषधचरित' है। इनमें इनके अपूर्व कवित्व एवं पाण्डित्य की अभिव्यक्ति हुई है। इनके अतिरिक्त उन्होंने अर्णववर्णन, शिवशक्तिसिद्धि, साहसाङ्कचम्पू, छन्दःप्रशस्ति, विजयप्रशस्ति, गौडोर्वीशकुलप्रशस्ति, ईश्वराभिसन्धि तथा स्थैर्यविचारणप्रकरण इत्यादि ग्रन्थों की भी संरचना की। अपने ग्रन्थों में उन्होंने विशेषरूप से उदयनाचार्य के न्यायमत का खण्डन करते हुए अद्वैतमत की स्थापना की है। उनके खण्डनखण्डखाद्य को 'अनिर्वचनीयसर्वस्व' के नाम से भी जाना जाता है। (३०) आनन्दबोधभट्टारकाचार्य-ये बारहवीं शताब्दी में विद्यमान थे। उन्होंने विभिन्नग्रन्थों से संग्रह करके 'न्यायमकरन्द' नामक ग्रन्थ की रचना की। तेरहवीं शताब्दी में विद्यमान चित्सुखाचार्य ने इस ग्रन्थ की व्याख्या प्रस्तुत की। ये संन्यासी थे। इनके जीवन की इससे अधिक कुछ बात ज्ञात नहीं है। इनके तीन ग्रन्थ प्राप्त होते हैं-(1) न्यायमकरन्द, (2) प्रमाण- माला (3) न्यायदीपावली। इन तीनों में ही इन्होंने अद्वैतमत का विवेचन किया है।

भूमिका ३३ ( ३१ ) आचार्य अमलानन्द– इनका आविर्भाव दक्षिणभारत में हुआ। इन्हें देवगिरि के राजा महादेव ( 1260 ई० से-1271 ई०) तथा राजा रामचन्द्र का समसामयिक माना जाता है। अतः इनका स्थितिकाल तेरहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध मानना उचित प्रतीत होता है। इनके गुरु का नाम अनुभवानन्द था। ये अद्वैतमत के समर्थक थे। इन्होंने तीन ग्रन्थों की रचना की–वेदान्तकल्पतरु, शास्त्रदर्पण तथा पञ्चपादिकादर्पण। इनमें से प्रथम में वाचस्पतिमिश्र की भामती टीका की व्याख्या की गई है। यह ग्रन्थ अद्वैतसिद्धान्त का प्रामाणिकग्रन्थ माना जाता है। द्वितीय में ब्रह्मसूत्र के अधिकरणों की व्याख्या हुई है तथा तृतीय ग्रन्थ पद्मपादाचार्य की 'पञ्चपादिका' नामक ग्रन्थ की व्याख्या है। इन तीनों ग्रन्थों में भाषा प्राञ्जल तथा भावों की गम्भीरता देखने को मिलती है। ( ३२ ) चित्सुखाचार्य–बारहवीं एवं तेरहवीं शताब्दी भारतीय दार्शनिक इतिहास में खण्डन-मण्डन का युग रहा है। इस कालावधि में द्वैत-अद्वैतवादी न्यायमत के आचार्य परस्पर एक-दूसरे के सिद्धान्तों का खण्डन करने में लगे हुए थे। इन दिनों न्यायमत का प्रभाव बढ़ रहा था। अतः बारहवीं शती में श्रीहर्ष ने न्यायमत का खण्डन किया। पुनः तेरहवीं शती के आरम्भ में आचार्य गङ्गेश ने उनके मत को काटकर पुनः न्यायमत की प्रस्थापना की। इसीप्रकार द्वैतवादी वैष्णवाचार्य भी अद्वैतमत के खण्डन में लिप्त थे। ऐसे समय में चित्सुखाचार्य ने अद्वैतमत के समर्थन तथा न्याय आदि मतों का खण्डन करके शाङ्करमत की रक्षा की। एतदर्थ उन्होंने 'तत्त्वप्रदीपिका', 'न्यायमकरन्द' की टीका तथा खण्डनखण्डखाद्य की टीका लिखी। इनमें तत्त्वदीपिका का दूसरा नाम चित्सुखी भी है। इसके मङ्गलाचरण के अनुसार इनके गुरु का नाम 'ज्ञानोत्तम' था। इस ग्रन्थ में इन्होंने 12वीं शती में स्थित न्यायलीलावतीकार वल्लभाचार्य के मत का खण्डन श्रीहर्ष के मत का उद्धरण देते हुए किया है। अतः इनका समय तेरहवीं शताब्दी माना गया है। ( ३३ ) आचार्य शङ्करानन्द–चौदहवीं शताब्दी में स्थित अद्वैतवादी आचार्य शङ्करानन्द, विद्यारण्यस्वामी के शिक्षागुरु थे, क्योंकि उन्होंने पञ्चदशी एवं विवरणप्रमेयसंग्रह के मङ्गलाचरण में इन्हें गुरुरूप में प्रणाम किया है। इन्होंने शाङ्करमत के प्रचारार्थ 'ब्रह्मसूत्रदीपिका', गीता की टीका तथा 108 उपनिषदों की टीका की संरचना की। इनके ग्रन्थों के अध्ययन से इनके

३४ वेदान्तसार अगाधपाण्डित्य की अभिव्यक्ति होती है। एक आत्मपुराण नामक ग्रन्थ भी इनके नाम से मिलता है। इन्होंने अपने ग्रन्थों में सर्वत्र शङ्कराचार्य का ही अनुसरण किया है। (३४) विद्यारण्यमुनि- इनका दूसरा नाम 'माधव' था। ये विजय नगर राज्य के संस्थापक थे। सन् 1336 ई. के लगभग इन्होंने महाराज वीर बुक्क का राजसिंहासन पर अभिषेक किया तथा स्वयं उनके प्रधानमन्त्री बने। ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, क्योंकि ये उच्चकोटि के दार्शनिक, कवि, वैयाकरण, स्मृतिसंग्रहकार और राजनीतिज्ञ थे। प्रसिद्ध विशिष्टाद्वैताचार्य वेदान्तदेशिकाचार्य इनके समकालीन और बालसखा थे। इनका स्थितिकाल विद्वानों ने 1296 ई० से 1386 ई० निर्धारित किया है। लोकमान्यता के अनुसार इनका जन्म तुंगभद्रा नदी के तटवर्ती हाम्पी नगर के पास एक गाँव में हुआ था। इनका सूत्र बोधायन तथा गोत्र भारद्वाज था 'पराशरमाधव' नामक ग्रन्थ के अनुसार इनके पिता का नाम मायण तथा माता का नाम श्रीमती था। सायण और भोगनाथ इनके दो भाई थे। ये दोनों ही भाई अत्यन्त प्रतिभाशाली थे। जिसमें सायण ने वेदों पर विद्वत्तापूर्ण भाष्यों की संरचना की। वृद्धावस्था (1377 ई०) में इन्होंने विद्यारण्यस्वामी के नाम से संन्यास ग्रहण किया। किंवदन्तियों के अनुसार इनकी मृत्यु 90 वर्ष की आयु में हुई। इन्होंने गुरुरूप में विद्यातीर्थ, भारतीतीर्थ एवं शङ्करानन्द को स्मरण किया है।$^1$ अपने जीवनकाल में इन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की। जिनमें-माधवीयधातुवृत्ति (व्याकरणग्रन्थ), जैमिनीयन्यायमाला एवं उसकी टीका 'विवरण' (पूर्वमीमांसाविषयक ग्रन्थ), पराशरमाधव (स्मृतिशास्त्र- विषयक ग्रन्थ), सर्वदर्शनसंग्रह (समस्त दर्शनों का सारसंग्रह), विवरणप्रमेय- संग्रह (पद्मपादकृत पञ्चपादिकाविवरण की व्याख्या), सूतसंहिता की टीका (स्कन्दपुराण के अन्तर्गत स्थित सूतसंहिता-वेदान्त के सिद्धान्तों की व्याख्या) पञ्चदशी (अद्वैतवेदान्त का प्रकरण ग्रन्थ, 15 प्रकरण, 1500 श्लोकों में निबद्ध), अनुभूति प्रकाश (श्लोकबद्ध उपनिषद् आख्यायिकाएँ), अपरोक्षानुभूति की टीका (शङ्कराचार्य विरचित अपरोक्षानुभूति ग्रन्थ पर वैदुष्यपूर्ण टीका), जीवन्मुक्तिविवेक (संन्यासियों के धर्मों का विस्तृत

  1. पञ्चदशी एवं विवरणप्रमेय संग्रह- मंगलाचरण।

[Page Header] भूमिका ३५

निरूपण), ऐतरेयोपनिषद् दीपिका (शांकरभाष्यानुसारी व्याख्या), तैत्तिरीयोपनिषद्दीपिका (शाङ्करभाष्यानुसारी टीका), छान्दोग्योपनिषद्दीपिका (शाङ्करभाष्यानुसारी) बृहदारण्यकवार्तिकसार (शाङ्करभाष्य पर लिखे गए सुरेश्वराचार्यकृत वार्तिक का श्लोकबद्ध सार), शङ्करदिग्विजय (शङ्कराचार्य जीवनचरितविषयक उत्कृष्ट काव्यरचना, कालमाधव (स्मृतिशास्त्रविषयक ग्रन्थ)। उपर्युक्त ग्रन्थों से इनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है। ये उच्चकोटि के राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ तत्त्वनिष्ठ एवं तपोमयीवृत्ति के धनी थे। संन्यास ग्रहण करने के बाद ये शृंगेरीमठ के अध्यक्षरूप में भी प्रतिष्ठित रहे। (३५) आचार्य आनन्दगिरि—शङ्कराचार्य ने जितने भी भाष्य किए उन सभी पर इन्होंने टीका लिखी है। भाष्यों के अभिप्राय को अभिव्यक्त करने में इनकी टीकाएँ अत्यधिक सहायक रही हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने 'शङ्कर दिग्विजय' नामक एक स्वतन्त्रग्रन्थ की भी रचना की। जिसकी संरचना विद्यारण्य स्वामी की 'शङ्करदिग्विजय' के बाद की है। अतः इन्हें विद्यारण्य स्वामी से परवर्ती तथा अप्ययदीक्षित से पूर्ववर्ती कहा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने सिद्धान्तलेशसंग्रह में इनकी न्यायनिर्णयटीका का उल्लेख किया है। इस दृष्टि से इन्हें पन्द्रहवीं शती में स्थित माना जा सकता है, क्योंकि विद्वानों ने विद्यारण्यस्वामी का समय 14वीं शताब्दी तथा अप्ययदीक्षित का सोलहवीं शताब्दी निर्धारित किया है। इनका दूसरा नाम आनन्दज्ञान था, यद्यपि इनके जीवन के सम्बन्ध में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ये सफल टीकाकार, उन्नत दार्शनिक तथा सरल संन्यासी थे। इनके गुरु शुद्धानन्दस्वामी थे। कुछ विद्वानों ने इन्हें शङ्कराचार्य का शिष्य भी माना है, किन्तु कालक्रम की दृष्टि से यह समीचीन प्रतीत नहीं होता। इन्होंने शङ्कराचार्यकृत उपनिषद्भाष्य, गीताभाष्य, शारीरकभाष्य तथा शतश्लोकी पर वैदुष्यपूर्ण टीकाएँ लिखीं। इसके अतिरिक्त सुरेश्वराचार्यकृत तैत्तिरीयोपनिषद्- वार्तिक तथा बृहदारण्यकोपनिषद्द्वार्तिक पर भी टीका लिखी। (३६) प्रकाशानन्दाचार्य—इन्होंने 'वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' ग्रन्थ की रचना की। इनका स्थितिकाल पन्द्रहवीं शताब्दी माना गया है, क्योंकि अप्ययदीक्षित ने सिद्धान्तलेशसंग्रह में इनके मत का उल्लेख किया है। अतः

३६ वेदान्तसार ये अप्पयदीक्षित से पूर्ववर्ती हुए। साथ ही अपनी वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' में पञ्चदशी के उदाहरण प्रस्तुत करने के कारण विद्यारण्यस्वामी से परवर्ती सिद्ध होते हैं। इनके गुरु का नाम ज्ञानानन्द था। 'वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' वेदान्त का उत्कृष्टकोटि का प्रमाणग्रन्थ माना गया है। इसमें गद्य में विचार-विवेचन करते हुए पद्य में सिद्धान्त निरूपण किया गया है। इस ग्रन्थ पर अप्पयदीक्षित ने 'सिद्धान्तदीपिकावृत्ति' का प्रणयन किया। (३७) आचार्य मल्लनाराध्य-इनका जन्म सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में कोटीश वंश में हुआ। ये दक्षिणभारत के निवासी थे। इन्होंने द्वैतवादियों के मत का खण्डन करने के उद्देश्य से 'अद्वैतरत्न' तथा 'अभेदरत्न' नामक दो प्रकरणग्रन्थों की संरचना की। ये दोनों ग्रन्थ अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं। (३८) आचार्य नृसिंहाश्रम-अद्वैतसम्प्रदाय के प्रमुख आचार्यों में इनकी गणना की जाती है। इनका स्थितिकाल सोलहवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना गया है, क्योंकि इन्होंने अपने 'तत्त्वविवेक' नामक ग्रन्थ का पूर्ण होने का समय सं० 1604 अर्थात् 1547 ई० बताया है। ये उद्भटदार्शनिक एवं प्रौढ़ पण्डित थे। इन्हीं की प्रेरणा से अप्पयदीक्षित ने परिमल, न्यायरक्षामणि तथा सिद्धान्तलेश आदि वेदान्तग्रन्थों की रचना की थी। इन्होंने 'भावप्रकाशिका' (प्रकाशात्मयतिकृत-पञ्चपादिकाविवरण की टीका), 'तत्त्वविवेक' एवं इसी पर स्वयं 'तत्त्वदीपन' टीका, भेदधिक्कार (भेदभाव का खण्डन); अद्वैतदीपिका (अद्वैतवेदान्त का युक्तिप्रधान ग्रन्थ), वैदिकसिद्धान्तसंग्रह (ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों का ऐक्य प्रतिपादित) तथा तत्त्वबोधिनी (सर्वज्ञात्ममुनिकृत संक्षेपशारीरक की व्याख्या) इत्यादि ग्रन्थों की संरचना की। ये सभी उच्चकोटि के ग्रन्थ युक्तिप्रधान शैली में लिखे गए हैं। (३९) आचार्य रंगराजाध्वरी-ये सुप्रसिद्ध विद्वान् अप्पयदीक्षित के पिता थे। इनके पिता अद्वैत सम्प्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य दीक्षित थे। अनेक यज्ञों को सम्पादित कराने के कारण इन्हें 'दीक्षित' पदनाम से विभूषित किया गया। इनका मूलनाम वक्षःस्थलाचार्य था। ये काञ्ची के निवासी थे तथा विजयनगर के राजा कृष्णदेव के सभापण्डित थे। इन्होंने दो विवाह किए। इनमें पहली पत्नी शैवमतावलम्बी ब्राह्मण की पुत्री थी तथा दूसरी श्री

भूमिका ३७ बैकुण्ठाचार्य वंश में उत्पन्न रंगमाचार्य की कन्या थी। इसका नाम तोतारम्बा देवी था। इनके चार पुत्रों में सबसे बड़े रंगराजाध्वरी थे। अप्ययदीक्षित ने अपने ग्रन्थों में पिता, पितामह तथा मातामह आदि का विस्तारपूर्वक परिचय दिया है। रंगराजाध्वरी सभी विद्याओं में निपुण थे। उनका पाण्डित्य असाधारण था। उन्होंने अपने पुत्र अप्ययदीक्षित को स्वयं विभिन्न विषयों की शिक्षा प्रदान की। इस बात को अप्ययदीक्षित ने स्वयं स्वीकार किया है- तन्मूलानिह संग्रहेण कतिचित्सिद्धान्तभेदान्धियः। शुद्धयै सङ्कलयामि तातचरणव्याख्यावचः ख्यापितान्॥ रंगराजाध्वरी ने 'अद्वैतविद्यामुकुर' तथा 'विवरणदर्पण' नामक अद्वैतमत का प्रतिपादन करने वाले दो महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की संरचना की। इसमें न्याय, वैशेषिक, सांख्य आदि मतों का खण्डन करके अद्वैतमत की स्थापना की गई है। (४०) आचार्य अप्ययदीक्षित-शङ्कराचार्य के परवर्ती विद्वानों में अद्वैत सम्प्रदाय की परम्परा में अप्ययदीक्षित का नाम अग्रगण्य है। ये आलंकारिक, वैयाकरण एवं धुरन्धर दार्शनिक थे। ये अकबर और जहाँगीर के शासनकाल में हुए। इनका जन्म सन् 1550 ई० में हुआ। इनके पिता रंगराजाध्वरि तथा पितामह आचार्यदीक्षित थे। इनके छोटे भाई का नाम अच्छान दीक्षित था। यद्यपि इन्हें अपने पिता एवं पितामह से अद्वैतमत की शिक्षा प्राप्त हुई थी तथापि ये परम शिवभक्त थे। इन्हें विजयनगर राज्य के सभी राजाओं से अत्यधिक सम्मान प्राप्त हुआ। ये सिद्धान्तकौमुदीकार भट्टोजिदीक्षित के गुरु थे। कुछ समय तक ये दोनों साथ-साथ काशी में रहे। अपने मृत्युकाल में इन्होंने चिदम्बरम् जाने की इच्छा व्यक्त की। इनकी मृत्यु 72 वर्ष की आयु में सन् 1622 ई० में हुई। मृत्यु के समय इनके ग्यारह पुत्र तथा छोटे भाई के पौत्र नीलकण्ठदीक्षित पास ही उपस्थित थे। इन्होंने अलंकार, व्याकरण, मीमांसा, वेदान्त आदि विभिन्न विषयों पर लगभग 104 ग्रन्थों की रचना की। वे सभी वर्तमान समय में उपलब्ध नहीं हैं। प्राप्य ग्रन्थों का यहाँ नामोल्लेख किया जा रहा है-(1) कुवलयानन्द ('चन्द्रालोक' नामक अलंकार ग्रन्थ की विस्तृत व्याख्या), (2) चित्रमीमांसा (अर्थचित्रविषयक ग्रन्थ), (3) वृत्तिवार्तिक (अभिधा, लक्षणा शब्दशक्ति विवेचन, (4) नामसंग्रहमाला (आलंकारिक कोश), (5) नक्षत्रवादावली

३८ वेदान्तसार (सत्ताईस संदिग्ध विषयों का विवेचन), (6) प्राकृतचन्द्रिका (प्राकृत शब्दानुशासन की आलोचना), (7) चित्रपुट, (8) विधिरसायन, (9) सुखोपयोजनी, (10) उपक्रमपराक्रम, (11) वादनक्षत्रमाला (सात से ग्यारह तक मीमांसाग्रन्थ), (12) परिमल (कल्पतरु की व्याख्या), (13) न्यायरक्षामणि (ब्रह्मसूत्र प्रथम अध्याय की व्याख्या), (14) सिद्धान्तलेश (अद्वैतसम्प्रदाय के आचार्यों के मत निरूपण), (15) मतसारार्थसंग्रह (श्रीकण्ठ, शङ्कर, रामानुज आदि आचार्यों के मतों का परिचय 12 से 15 तक वेदान्तग्रन्थ), (16) न्यायमञ्जरी (शाङ्कर सिद्धान्तानुसारी), (17) न्याय मुक्तावली (मध्वमतानुसारी), (18) नियमयूथमालिका (रामानुजमतानुसारी), (19) शिवार्कमणिदीपिका, (20) रत्नत्रयपरीक्षा (श्रीकण्ठमतानुसारी), (21) मणिमालिका, (22) शिखरिणीमाला, (23) शिवतत्त्वविवेक, (24) ब्रह्मतर्कस्तव, (25) शिवार्चनचन्द्रिका, (26) शिवध्यानपद्धति, (27) आदित्यस्तवरत्न, (28) मध्वतन्त्रमुखमर्दन, (29) यादवाभ्युदय का भाष्य (21 से 29 तक सभी ग्रन्थ शैवमतानुसारी) इसके अतिरिक्त शिवकर्णामृत, रामायणतात्पर्यसंग्रह, भारततात्पर्यसंग्रह, शिवाद्धैतविनिर्णय, पञ्चरत्नस्तव एवं उसकी व्याख्या, शिवानन्दलहरी, दुर्गाचन्द्रकलास्तुति एवं व्याख्या, कृष्णध्यानपद्धति व्याख्या सहित तथा आत्मार्पण आदि अनेक ग्रन्थ भी इनकी कृतियों में परिगणित हैं। इनके ग्रन्थों से इनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है। मीमांसादर्शन के तो ये प्रकाण्डविद्वान् थे। शिवार्कमणिदीपिका से इनके न्याय, मीमांसा, व्याकरण तथा अलंकारशास्त्रविषयक प्रगाढ़पाण्डित्य की अभिव्यक्ति होती है। विद्वानों ने इन्हें एक जीववादी एवं बिम्ब-प्रतिबिम्बवादी कहकर इनका वैशिष्ट्य प्रतिपादित किया है। (४१) आचार्य भट्टोजिदीक्षित- ये प्रसिद्ध वैयाकरण थे। इनके द्वारा लिखे गए ग्रन्थों में आचार्य पाणिनि के सूत्रों पर व्याख्यारूप में लिखा गया ग्रन्थ 'सिद्धान्तकौमुदी' तथा इसकी व्याख्या रूप में लिखा गया ग्रन्थ 'प्रौढमनोरमा' अत्यधिक प्रसिद्ध है। इनका तीसरा ग्रन्थ 'शब्दकौस्तुभ' है। जिसमें पातञ्जलमहाभाष्य के विषय का युक्तिपूर्वक समर्थन किया गया है। चतुर्थ ग्रन्थ 'वैयाकरणभूषण' है। इन व्याकरणग्रन्थों के अतिरिक्त इन्होंने 'तत्त्वकौस्तुभ' एवं 'वेदान्ततत्त्वविवेकटीकाविवरण' नामक दो वेदान्तविषयक ग्रन्थों की भी संरचना की। इन दोनों ग्रन्थों में इन्होंने द्वैतवाद का खण्डन किया है।

भूमिका ३९ वेदान्तशास्त्र में ये आचार्य अप्पयदीक्षित के शिष्य थे तथा व्याकरणशास्त्र के गुरु प्रक्रियाप्रकाशकार श्रीकृष्णदीक्षित थे। ये असाधारण प्रतिभा के धनी थे। प्रौढ़मनोरमा में इन्होंने अद्भुत चातुर्यपूर्वक अपने गुरु के मत का खण्डन किया है। (४२) आचार्य सदाशिव ब्रह्मेन्द्र- ये काञ्ची कामकोटि पीठ के अधीश्वर एवं संन्यासी थे। इन्होंने अद्वैतविद्याविलास, बोधार्यात्मनिवेद, गुरुरत्नमालिका तथा ब्रह्मकीर्तनतरङ्गिणी नामक ग्रन्थों की रचना की। अद्वैतानन्दबोधेन्द्र के प्रति इनकी अगाध श्रद्धा थी। (४३) आचार्य नीलकण्ठसूरि- इनका जन्म महाराष्ट्र प्रदेश में गोदावरी नदी के तट पर कूर्पर नामक स्थान में हुआ। इनका स्थितिकाल 16वीं शताब्दी माना गया है। चतुर्धर वंश में उत्पन्न इनके पिता का नाम गोविन्दसूरि था। इनकी महाभारत पर लिखी गयी टीका 'भारतभावदीप' अत्यधिक प्रसिद्ध है। ये अद्वैतवादी आचार्य थे। गीता की व्याख्या के आरम्भ में इन्होंने शङ्कराचार्य एवं श्रीधरादि विद्वान् आचार्यों की श्रद्धापूर्वक वन्दना की है। (४४) आचार्य सदानन्दयोगीन्द्र- इनका स्थितिकाल विद्वानों ने सोलहवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध निर्धारित किया है। इन्होंने अद्वैतवेदान्त पर अत्यन्त सरलशैली में वेदान्तसार नामक प्रकरणग्रन्थ की रचना की। यह वस्तुतः सम्पूर्ण वेदान्तसिद्धान्तों का परिचायक ग्रन्थ है। साथ ही वेदान्तदर्शन के प्रारम्भिकज्ञान प्राप्त करने वाले जिज्ञासुओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है। वेदान्तसार के मङ्गलाचरण में इन्होंने श्लेष के माध्यम से अपने गुरु अद्वयानन्द को नमन किया है। इस ग्रन्थ पर नृसिंहसरस्वती ने सुबोधिनी टीका, आपदेव ने बालबोधिनी तथा स्वामीरामतीर्थ ने विद्वन्मनोरञ्जनी टीकाओं की संरचना की। इनमें नृसिंह सरस्वती की सुबोधिनीटीका के अन्त में लिखे गए श्लोक में टीका का रचनाकाल शक संवत् 1518 बताया गया है। अतः स्पष्टरूप से कहा जा सकता है कि इससमय तक वेदान्तसार ने विद्वानों में पर्याप्त प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक ग्रन्थ 'शङ्कर दिग्विजय' की भी रचना की, जो सम्प्रति अप्राप्य है। (४५) आचार्य नृसिंहसरस्वती-इन्होंने सन् 1596 ई० में आचार्य सदानन्द के प्रसिद्धग्रन्थ वेदान्तसार पर 'सुबोधिनी' नाम टीका की संरचना की। इसलिए इनका स्थितिकाल सोलहवीं शती का उत्तरार्द्ध माना गया है।

४० वेदान्तसार इनके गुरु का नाम कृष्णानन्दस्वामी था। इसी सुबोधिनीटीका के कारण वेदान्तजगत् में आचार्य नृसिंह को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। इससे इनकी उच्चकोटि की प्रतिभा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। (४६) स्वामीरामतीर्थ-वेदान्तसार के द्वितीय टीकाकार हैं। इनका स्थितिकाल सत्रहवीं शताब्दी माना गया है। स्वामी कृष्णतीर्थ इनके गुरु थे। इन्होंने आचार्य सदानन्द के वेदान्तसार पर 'विद्वन्मनोरञ्जिनी' नामक टीका का प्रणयन किया। इसके अतिरिक्त इन्होंने 'संक्षेपशारीरक' के ऊपर 'अन्वयार्थप्रकाशिका', शङ्कराचार्यकृत उपदेशसाहस्री पर 'पदयोजनिका' नामक टीकाएँ भी लिखीं एवं मैत्रायणी उपनिषद् पर भी इन्होंने एक टीका की संरचना की जो सम्भवतः उपलब्ध नहीं है। इनकी कृतियों के कारण वेदान्तजगत् में इनका नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। (४७) आचार्य आपदेव-मूलतः ये मीमांसक थे। इनके द्वारा विरचित 'मीमांसा न्यायप्रकाश' पूर्वमीमांसा का प्रामाणिक प्रकरणग्रन्थ माना जाता है, किन्तु मीमांसक होते हुए भी इन्होंने सदानन्द विरचित वेदान्तसार नामक प्रसिद्ध प्रकरणग्रन्थ के ऊपर 'बालबोधिनी' नामक सुन्दर टीका का प्रणयन किया। यह टीका वस्तुतः नृसिंहसरस्वती की 'सुबोधिनी, रामतीर्थकृत 'विद्वन्मनोरञ्जिनी' इन दोनों टीकाओं की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट मानी जाती है। कुछ विद्वान् इन्हें पूर्वमीमांसा का प्रौढ़विद्वान् होते हुए भी अद्वैतवादी मानते हैं। (४८) आचार्य मधुसूदनसरस्वती- इनका जन्म बंगप्रदेश में हुआ। ये फरीदपुर जिले के अन्तर्गत कोटालियापाडा नामक ग्राम के निवासी थे। ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे। इनके दीक्षागुरु का नाम विश्वेश्वरसरस्वती था। इन्हीं की प्रेरणा से इन्होंने दण्ड धारण किया। इनके विद्यागुरु माधवसरस्वती थे। विद्याध्ययन के अनन्तर इन्होंने काशी जाकर अनेक पण्डितों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। आचार्य मधुसूदनसरस्वती अद्वैतसम्प्रदाय के उद्भट विद्वान् थे। इनके युक्तिकौशल एवं उत्कृष्ट मेधासामर्थ्य के कारण इन्हें अद्वैतसाहित्य का युगनिर्माता भी कहा जाता है। इनके पूर्ववर्ती आचार्यों की युक्ति में शास्त्रप्रमाण प्रधान रहता था, किन्तु इन्होंने मुख्यरूप से अनुमानप्रमाण के बल पर ही अपने सिद्धान्त की स्थापना की है। अद्वैतसिद्धान्त का प्रधान स्तम्भ होते हुए भी इनकी कृतियों में सगुणभक्ति को अभिव्यक्ति मिली है।

भूमिका ४१ इसके अतिरिक्त इनके द्वारा विरचित 'भक्ति रसायन' नामक ग्रन्थ उनके अद्भुत भक्तिभाव का परिचायक है। इससे इनकी भगवद्रसज्ञता एवं भावुकता का परिचय प्राप्त होता है। इन्होंने अनेकग्रन्थों की संरचना की, जिनका संक्षिप्त विवरण इसप्रकार है- (1) सिद्धान्तबिन्दु (शङ्कराचार्य विरचित 'दशश्लोकी' की व्याख्या), (2) संक्षेपशारीरक की व्याख्या (3) अद्वैतसिद्धि (चार परिच्छेदों में निबद्ध अद्वैतसिद्धान्त का उच्च कोटि का ग्रन्थ) (4) अद्वैतरत्नलक्षण (द्वैतवाद का खण्डन एवं अद्वैतवाद की स्थापना) (5) वेदान्तकल्पलतिका (वेदान्तग्रन्थ) (6) गूढार्थदीपिका (श्रीमद्भगवद्गीता की सर्वोत्तम व्याख्या) (7) प्रस्थान भेद (सभी शास्त्रों का सामञ्जस्य करके उनका अद्वैत में तात्पर्य प्रदर्शित किया है। यह ग्रन्थ लेखक की अद्भुत प्रतिभा का द्योतक है) (8) महिम्नस्तोत्र की टीका (प्रत्येक श्लोक की शिव एवं विष्णुपारक व्याख्या करके असाधारणकौशल प्रदर्शित किया है) (9) भक्तिरसायन (भक्ति- विषयक लक्षणग्रन्थ)। (४९) आचार्य धर्मराज अध्वरीन्द्र-इनका स्थितिकाल 17वीं शताब्दी का आरम्भ माना गया है। इन्होंने 'वेदान्तपरिभाषा' नामक उत्कृष्ट एवं अद्वैतसिद्धान्त के लिए अत्यन्त उपयोगी प्रकरणग्रन्थ की रचना की। इसपर अनेक विद्वानों ने टीकाएँ लिखीं। अद्वैतवेदान्त के रहस्य को समझने के लिए इस ग्रन्थ का अध्ययन अत्यन्त उपयोगी है। इनके गुरु का नाम वेंकटनाथ था। इसके अतिरिक्त इन्होंने आचार्य गंगेशोपाध्यायकृत 'तत्त्वचिन्तामणि' नामक नव्यन्याय के ग्रन्थ पर 'तर्कचूडामणि' नामक टीका भी लिखी। इसमें इन्होंने अपनी पूर्ववर्ती दश टीकाओं के मत का खण्डन किया है। (५०) आचार्य गोविन्दानन्द-इनका भी स्थितिकाल 17वीं शताब्दी रहा है। इनके विद्यागुरु शिवराम थे। उन्होंने शारीरकभाष्य पर 'रत्नप्रभा' नामक टीका लिखी। इसे शारीरकभाष्य की टीकाओं में सर्वाधिक सरल माना गया है। इस टीका में इन्होंने भाष्य के प्रायः प्रत्येक पद की व्याख्या प्रस्तुत की है। अतः यह टीका भाष्य को हृदयंगम कराने में सर्वाधिक उपयोगी है। ग्रन्थकार के अनुसार जो जिज्ञासु विस्तृत और गम्भीर टीकाओं को समझने में असमर्थ हैं, यह व्याख्या उन्हीं के लिए लिखी गयी है- विस्तृतग्रन्थवीक्षायामलसं यस्य मानसम्। व्याख्या तदर्थमारब्धा भाष्यरत्नप्रभाभिधा॥

४२ वेदान्तसार (५१) रामानन्दसरस्वती-ये स्वामी गोविन्दानन्द के शिष्य थे। अतः इनका स्थितिकाल 17वीं शताब्दी माना गया है। इन्होंने ब्रह्मसूत्र की शाङ्करभाष्यानुसारी 'ब्रह्मामृतवर्षिणी' नामक टीका का सरल भाषा में प्रणयन किया। इसके अतिरिक्त इनका दूसरा ग्रन्थ पद्मपादाचार्य की पञ्चपादिका पर प्रकाशात्मयति द्वारा लिखे गए 'विवरण' नामक ग्रन्थ पर 'विवरणोपन्यास' नामक व्याख्या है। इसकी तुलना विद्यारण्यस्वामी के 'विवरणप्रमेयसंग्रह' से की जा सकती है। इस ग्रन्थ में इन्होंने गद्य में विचार करने के उपरान्त फलरूप सिद्धान्त को पद्य में प्रस्तुत किया है। (५२) काश्मीरक सदानन्दयति- इन्होंने अद्वैतसिद्धि नामक प्रकरण ग्रन्थ का प्रणयन किया। ये काश्मीरप्रदेश के निवासी थे। इसलिए इनके नाम से पूर्व काश्मीरक शब्द का प्रयोग किया जाता है। इनका समय 17वीं शताब्दी माना गया है। प्रतिविम्बवाद एवं अवच्छिन्नवादविषयक विवादों की विवेचना में न पड़कर इन्होंने अपने ग्रन्थ में एकजीववाद को ही वेदान्त का मुख्यसिद्धान्त प्रतिपादित किया है, क्योंकि जिज्ञासु वस्तुतः प्रबल साधना द्वारा ऐकात्म्य का अनुभव करने तक ही वाग्जाल में फंसा रहता है। (५३) ब्रह्मानन्द सरस्वती-ये अद्वैतसिद्धि के टीकाकार एवं मधुसूदन सरस्वती के समकालीन आचार्य थे। इनकी गणना अद्वैतवाद के प्रमुख आचार्यों में की जाती है। इनका स्थितिकाल 17वीं शताब्दी माना गया है। इनके दीक्षागुरु परमानन्दसरस्वती एवं विद्यागुरु नारायणतीर्थ थे। इसके अतिरिक्त इन्होंने शिवराम नामक व्यक्ति को भी अपनी लघुचन्द्रिका के अन्त में अत्यन्त श्रद्धापूर्वक नमन किया है। इन्होंने व्यासराज के शिष्य रामाचार्य की 'तरङ्गिणी' के मत का खण्डन करने हेतु अद्वैतसिद्धि पर 'लघुचन्द्रिका' ग्रन्थ की संरचना की। इस ग्रन्थ से इनकी दार्शनिक प्रतिभा का सुन्दर परिचय प्राप्त होता है। इसमें रामाचार्य की सभी आपत्तियों का अत्यन्त सन्तोषजनक समाधान किया गया है। इन्होंने अपने ग्रन्थ में संसार का मिथ्यात्व, एकजीववाद, निर्गुणब्रह्मवाद, आनन्दरूपमुक्तिवाद इन सभी विषयों का सुन्दर विवेचन किया है। इसके अतिरिक्त इन्होंने मधुसूदन के सिद्धान्त- बिन्दु पर 'रत्नावली' एवं 'सूत्रमुक्तावली' नामक दो ग्रन्थों की भी रचना की। (५४) आचार्य अच्युतकृष्णानन्द-ये कावेरी तट पर स्थित नीलकण्ठेश्वरम् नामक स्थान पर निवास करते थे तथा परम कृष्णभक्त थे। सिद्धान्तलेश पर लिखी इनकी टीका का नाम 'कृष्णालङ्कार' है। इससे इनके

भूमिका ४३ पाण्डित्य का अच्छा परिचय प्राप्त होता है। ये परमगुरुभक्त एवं विनम्र थे। इसके अतिरिक्त इन्होंने तैत्तिरीयोपनिषद् शाङ्करभाष्य पर 'वनमाला' नामक टीका की भी संरचना की। इससे भी इनकी कृष्णभक्ति का परिचय प्राप्त होता है। (५५) आचार्य महादेवसरस्वती- इनका समय 18वीं शताब्दी माना गया है। ये स्वयं प्रकाशानन्दसरस्वती के शिष्य थे। इन्होंने वेदान्तदर्शन पर तत्त्वानुसंधान नामक प्रकरणग्रन्थ की रचना करके उस पर स्वयं ही अद्वैत- चिन्ताकौस्तुभ नामक टीका का प्रणयन किया। 'तत्त्वानुसंधान' अद्वैतसिद्धान्त का ज्ञान कराने के लिए अत्यन्त सरलभाषा में लिखा गया ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ वेदान्त के आरम्भिक जिज्ञासुओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है। (५६) आचार्य सदाशिवेन्द्र सरस्वती-इन्होंने 18वीं शताब्दी में करूर नामक स्थान पर जन्म ग्रहण किया। इनका अध्ययन ताञ्जोर जिले के तिरुविसानाल्लूर नामक स्थान पर हुआ। असाधारण प्रतिभा के धनी इनकी तार्किकशक्ति अत्यन्त तीक्ष्ण थी। ये असाधारण योगी थे। इनके दीक्षागुरु परमशिवेन्द्रसरस्वती थे। दक्षिणभारत में इनके जीवन की अनेक चमत्कारपूर्ण घटनाएँ आज भी प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि इन्होंने यूरोप में तुर्की तक भ्रमण किया था। नेरूर के पास इनकी समाधि आज भी बनी हुई है। इन्होंने ब्रह्मसूत्रों पर शाङ्करभाष्यानुसारिणी 'ब्रह्मतत्त्व प्रकाशिका' नामक वृत्ति की संरचना की। बारह उपनिषदों पर टीका, योगसूत्रों पर 'योगसुधाकर' 'आत्मविद्याविलास' 'कविताकल्पवल्ली' तथा 'अद्वैतमञ्जरी' इत्यादि ग्रन्थों का भी इन्होंने प्रणयन किया। इनमें ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्य को समझने के लिए 'ब्रह्मतत्त्वप्रकाशिका' अत्यन्त उपयोगी ग्रन्थ है। इनकी सभी रचना सरल एवं भावपूर्ण हैं। ये वस्तुतः महान् योगी एवं परम अद्वैतनिष्ठ सिद्ध महात्मा थे। (५७) आचार्य आयन्नदीक्षित- इनका स्थितिकाल 18वीं शताब्दी माना गया है। ये वेंकटेश के शिष्य थे। आचार्य वेंकटेश ने अक्षयषष्टि और दायशतक नामक दो ग्रन्थों का प्रणयन किया। जबकि आयन्नदीक्षित ने 'व्यासतात्पर्यनिर्णय' नामक केवल एक किन्तु अद्भुतग्रन्थ की रचना की। भगवान् वेदव्यास के वेदान्तसूत्रों की अलग-अलग विद्वानों ने अद्वैतवादी, विशिष्टाद्वैती, शुद्धाद्वैती, द्वैताद्वैती तथा शिवाद्वैती व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं। इन मत सिद्धान्तों में पर्याप्त भिन्नता होते हुए भी सभी ने अपने-अपने सिद्धान्त को मूलसिद्धान्त के अधिक निकट बताया। ऐसी स्थिति में भगवान् वेदव्यास के

भूमिका: (ङ) वेदान्तदर्शन के प्रमुख सिद्धान्त (ब्रह्म, माया, जीव, पञ्चकोश, महावाक्य)

अभिप्राय को ही समझना कठिन हो गया। आयन्नदीक्षित ने मौलिक युक्तियों को प्रस्तुत करते हुए व्यास के अद्वैत में ही मुख्यतात्पर्य-सिद्धि की। अद्वैतसिद्धान्त के प्रति रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए 'व्यास तात्पर्य निर्णय' वस्तुतः संग्रहणीय ग्रन्थ है।¹ यहाँ तक हमने वेदान्तदर्शन के प्रमुख आचार्यों का संक्षेप में विवरण प्रस्तुत किया। वस्तुतः वेदान्तदर्शन की शाखा-प्रशाखाओं के आचार्यों की सुदीर्घपरम्परा रही है। उनमें सभी का उल्लेख यहाँ सम्भव भी नहीं है। अन्वेषणपूर्वक इसके स्वतन्त्रलेखन एवं प्रकाशन की महती आवश्यकता है। जिससे अनेक अपरिचित, किन्तु महत्त्वपूर्ण आचार्यों एवं उनकी कृतियों से वेदान्तजगत् का परिचय हो सकेगा। (छ) वेदान्तदर्शन के प्रमुख सिद्धान्त- (१) ब्रह्म-वेदान्तदर्शन और विशेषरूप से अद्वैतवेदान्त एकमात्र ब्रह्म को सत्य, नित्य एवं सर्वोपरि तत्त्व के रूप में मान्यता प्रदान करता है। इसीकारण इस दर्शन का प्रारम्भ ही 'ब्रह्मजिज्ञासा' से होता है (अथातो ब्रह्मजिज्ञासा-ब्रह्मसूत्र)। वस्तुतः इस परमतत्त्व ब्रह्म के ज्ञात हो जाने पर किसी अन्य वस्तु के ज्ञान की आवश्यकता ही नहीं रहती है। अतः यहाँ इसका ज्ञान अत्यावश्यक माना गया है। 'बृहवृद्धौ' वृद्धि अर्थ में प्रयुक्त 'वृह्' धातु से 'मनिन्' प्रत्यय करके ब्रह्म शब्द निष्पन्न होता है। अर्थात् महान्, व्यापक, निरवधिक, निरतिशय महत्त्व से युक्त तत्त्व ही ब्रह्म है। 'बृंहणाद् ब्रह्म' इस व्युत्पत्ति के अनुसार देश, काल तथा वस्तु आदि से अपरिच्छिन्न नित्यतत्त्व ही ब्रह्म है।² इससे ब्रह्म के निरतिशय महत्त्व की स्पष्ट प्रतीति होती है। वेदान्तियों के अनुसार यह तत्त्व, प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द आदि प्रमाणों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता है, अपितु 'मैं हूँ' इसप्रकार के अनुभव का आधार ही इसकी सत्ता को सिद्ध करता है। इसके अतिरिक्त यहाँ श्रुति (वेद-उपनिषदादि) को ब्रह्म की सिद्धि में प्रबलप्रमाण के रूप में मान्यता प्रदान की है। ब्रह्मतत्त्व का लक्षण करते हुए वेदान्तदर्शन कहता है कि जिसप्रकार उष्णता, लौहित्य एवं प्रकाश द्वारा दीपक का लक्षण किया जा


  1. वेदान्त के प्राचीन आचार्यों के विवरण हेतु महामहोपाध्याय पं० गोपीनाथकविराज के लेखों का ही यहाँ मुख्यरूप से प्रयोग किया गया है।
  2. ब्रह्मसूत्र (शांकरभाष्य) 1/1/1 पर रत्नप्रभा टीका।

भूमिका ४५

सकता है। ठीक उसीप्रकार सत्, चित् और आनन्द इन तीन शब्दों के माध्यम से ब्रह्म का स्वरूप प्रतिपादित किया जा सकता है। श्रुति वाक्य इस विषय में प्रमाण हैं- (1) सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (तैत्तिरीयोपनिषद्-2/1/1) (2) विज्ञानमानन्दं ब्रह्म (बृहदारण्यकोपनिषद्-3/9/28) (3) आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (तैत्तिरीयोपनिषद्-3/6) छान्दोग्योपनिषद्कार का इस विषय में कथन है-सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् (6/2/1) अर्थात् सृष्टि के आरम्भ में एक अद्वितीय तत्त्व की सत्ता थी। वेदान्तदर्शन के अनुसार वह सत्ता केवल ब्रह्म की थी। इस प्रसंग में सत् की व्याख्या करते हुए आचार्य शङ्कर कहते हैं-सत् उसे कहा जाता है जो तीनों कालों में विद्यमान हो तथा ब्रह्म ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जिसका अस्तित्व तीनों कालों में विद्यमान रहता है। यह न केवल सृष्टि के आरम्भ में विद्यमान था, अपितु वर्तमान में भी इसकी स्थिति है और प्रलयकाल के पश्चात् भी रहेगा। यह वस्तुतः कालातीत यथार्थसत्ता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्म चिद्रूप है। जो ज्ञानवाची 'चिती संज्ञाने' धातु से क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न होता है। इसीलिए शङ्कराचार्य आदि विद्वानों ने इसे ज्ञानस्वरूप माना है। श्रुति इसे 'विज्ञान' शब्द के माध्यम से कहती है (विज्ञानमानन्दं ब्रह्म-बृहदा० 3/9/28)। विज्ञान शब्द का सामान्य अर्थ विशिष्ट या विशुद्धज्ञान भी किया जा सकता है। अतः ब्रह्म विशुद्ध या विशिष्टज्ञानस्वरूप है। 'चित्' का एक अर्थ चैतन्य भी है, जिससे ब्रह्म का जडरहित होना अभिव्यक्त होता है। अतः संसार के सभी प्राणियों एवं वनस्पति आदि में जो चैतन्य प्रतीत होता है, वह चित्स्वरूप ब्रह्म के कारण ही है, क्योंकि सर्वव्यापक होने से उसकी सत्ता सम्पूर्णसृष्टि के कण-कण में है। कुछ विद्वानों ने 'चित्' शब्द का प्रकाश अर्थ भी किया है (स्वप्रकाशत्वं चित्त्वम्-ब्रह्मसूत्र भामतीटीका-वाचस्पतिमिश्र 1/1/1)। मुण्डकोपनिषद् ने ब्रह्म की ज्योतिषां ज्योतिः कहकर व्याख्या की है (मुण्डकोपनिषद्-2/2/9) इसप्रकार ब्रह्म के लिए प्रयुक्त 'चित्' शब्द विज्ञान, ज्ञान, चैतन्य तथा स्वप्रकाशत्व आदि अर्थों को अभिव्यक्त करता है। इससे ब्रह्म की सत्ता, ज्ञानरूपता एवं स्वयंप्रकाशत्व आदि विशेषताएँ प्रकट होती हैं। ब्रह्म के स्वरूप की व्याख्या में तीसरे 'आनन्द' शब्द का प्रयोग किया जाता है।

४६ वेदान्तसार उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं वेदान्त के सभी ग्रन्थों में इसके इस स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई है। तैत्तिरीयोपनिषद् का इस विषय में स्पष्टरूप से कथन है—“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (3/6)। यहाँ आनन्द शब्द ब्रह्म में आनन्द की प्रचुरता एवं पूर्णता को अभिव्यक्त करता है। बृहदारण्यकोपनिषद् ने भी ब्रह्म की 'सर्वोच्च आनन्द' कहकर व्याख्या की है-(4/3/32) इसके अतिरिक्त ब्रह्म के लिए 'अनन्तम्' पद का प्रयोग भी श्रुतियों ने किया है- (सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म-तैत्तिरीयोपनिषद्-2/1/1)। अनन्त का अभिप्राय है जिसका कोई अन्त अर्थात् सीमा न हो। अतः वह सर्वव्यापक, नित्य एवं सर्वात्मक है। वेदान्तदर्शन में ब्रह्म की बीजशक्ति के रूप में माया अथवा अविद्या का उल्लेख किया गया है। इसकी उपाधि से युक्त ब्रह्म ही 'ईश्वर' कहलाता है। यहाँ इसी ईश्वर को सम्पूर्ण चराचरजगत् की रचना का निमित्त और उपादानकारण माना गया है। अपनी प्रधानता की स्थिति में चैतन्यरूप ब्रह्म निमित्तकारण तथा अपनी उपाधि की प्रधानता की स्थिति में उपादानकरण होता है। ठीक उस मकड़ी के समान जो अपने शरीर के चैतन्य के कारण तन्तुजाल का निमित्तकारण होती है तथा शरीर से निकलने वाले तरलपदार्थ से तन्तुजाल का निर्माण करने से उपादानकारण भी है। यह दर्शन ब्रह्म को सर्वशक्तिमान मानता है। इसके अनुसार सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्म को किसी बाह्यसत्ता की आवश्यकता नहीं होती है। मुण्डकोपनिषद् के अनुसार 'जिसप्रकार जीवितपुरुष के शरीर से केश और रोम स्वतः उत्पन्न होते हैं, ठीक उसीप्रकार अक्षरब्रह्म से यह सम्पूर्ण चराचरजगत् उत्पन्न होता है।¹ इस जगत् की रचना करने के पश्चात् वह इसी में अनुप्रविष्ट हो जाता है।² इसीकारण एक होते हुए भी इसकी सभी यहाँ भूतों, पदार्थों एवं स्थानों में अर्थात् जगत् के कण-कण में सत्ता को स्वीकार किया गया है।³ वही यह प्राणियों के कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म का


  1. मुण्डकोपनिषद् 1/1/7
  2. तत् सृष्ट्वा तदैवानुप्राविशत् तैत्तिरीयोपनिषद् 2/6/1
  3. एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।। (श्वेताश्वतरोपनिषद्, 6/11)

भूमिका ४७ साक्षी है तथा उन्हें कर्म का फल प्रदान करता है। शङ्कराचार्य के अनुसार 'इस संसाररूपी वृक्ष का मूल ब्रह्म ही है।' इसके अतिरिक्त ब्रह्म को यहाँ 'अवाङ्मनसगोचर' कहा गया है, क्योंकि उसे न तो आँखों से देखा जा सकता है, न ही मन और वाणी उसे जानने में समर्थ हैं। वह अत्यन्तसूक्ष्म होने के कारण अविज्ञेय है तथा अकथनीय है। फिर भी योगविद्या से योग्य गुरु के मार्गदर्शन में उसका साक्षात्कार किया जा सकता है, किन्तु उसके स्वरूप की व्याख्या असम्भव है। गूँगे के गुड़ के समान उसके आनन्द को केवल अनुभव किया जा सकता है। इसीकारण उपनिषदों में ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करने के लिए 'नेति नेति' की शैली को अपनाया गया है। यहाँ 'नेति नेति' का दो बार प्रयोग माया एवं उसके प्रपञ्च का निराकरण करके एकमात्र ब्रह्म की सत्ता को इंगित करने के लिए विशेष अभिप्राय हेतु किया गया है। वेदान्त के अनुसार-यद्यपि यह परमतत्त्व ब्रह्म एक है-'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' (छान्दोग्योपनिषद्-6/2/1), किन्तु पारमार्थिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से इसकी सगुण और निर्गुण दो रूपों में परिकल्पना की गई है। माया की उपाधि से विशिष्टब्रह्म ही ईश्वर सगुण, साकार या सविशेष कहा गया है तथा इससे रहित ब्रह्म ही निर्गुण, निराकार या निर्विशेष माना गया है। उपनिषदों में ब्रह्म का ध्यान करने का सर्वश्रेष्ठ आधार 'ओम्' या 'ओङ्कार' को माना गया है-'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षुभिः (ध्यानबिन्दूपनिषद्-2) इसका ध्यान करने से साधक ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्म को मुक्तजीवों का आश्रय कहा गया है (मुण्डकोपनिषद्-2/2/8)। ब्रह्म का साक्षात्कार होने के पश्चात् साधक के हृदय की ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं तथा उसके सभी संशय दूर हो जाते हैं। ब्रह्म को जानने वाला व्यक्ति ठीक उसीप्रकार ब्रह्म ही हो जाता है, जिसप्रकार बहती हुई नदियाँ समुद्र में मिलकर अपने नामरूप को खोकर उसमें एकाकार हो जाती हैं। ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करके व्यक्ति का पुनः इस संसार में आगमन नहीं होता है-'न स पुनरावर्तते'। इसीकारण ब्रह्म को आश्रय, अमृतमय एवं अविनश्वर कहा गया है। गीता ने भी इस बात का अनुमोदन किया है- अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ (श्रीमद्भगवद्गीता 8/21)