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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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६६ : विज्ञानभैरव अभ्यास से भावनिर्मुक्त शून्य में चित्त के लीन हो जाने के कारण उसमें परम तत्त्व की अभिव्यक्ति हो जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि यह घट है, यह पट है, यह तट है, इत्यादि नाना प्रकार की प्रतीतियों के आधार पर वेद्य (ज्ञेय) रूप में भासित हो रही वस्तुओं के सार को समझ कर कि इन सब के मध्य में ज्ञाता के रूप में विद्यमान तत्त्व एक ही है और इसी से ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के ये नाना प्रकार (भेद) केवल कल्पना से प्रसूत हैं, वस्तुतः यह सब एक ही तत्त्व का विस्तार है, योगी नानात्व का परिहार करके, अर्थात् विभाग (भेद) कल्पना का परित्याग करके चित्त को एकाग्र करने का अभ्यास करता है। बाद में इस भावना में चित्त के स्थिर हो जाने पर यह सब प्रमाता (ज्ञाता) के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, इस तरह से निर्विकल्प दशा का सहारा लेकर साधक "तत्त्वमसि" (छा० ६।८।७) इत्यादि उपनिषद् वाक्यों में उपदिष्ट पद्धति से अपने (प्रमाता के) वास्तविक स्वरूप को जान लेता है। यह स्थिति ही परम धाम में प्रवेश के नाम से यहाँ वर्णित है। पहले २५-२६ संख्या के श्लोकों में ^1प्राण और अपान की मध्य-दशा का विकास कर उसमें चित्त को स्थिर करने की भावना का उपदेश किया गया है। यहाँ दो भावों के मध्य में मध्य-दशा के विकास की बात वर्णित है। "प्राणापानमयः" (३।२।१९) इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा- कारिका की विवृतिविमर्शिनी (भा० ३, पृ० ३४६) में अभिनवगुप्त ने "एकचिन्ताप्रसक्तस्य" (४१ श्लो०) इस स्पन्दकारिका के श्लोक के साथ विज्ञानभैरव के प्रस्तुत श्लोक को भी उद्धृत कर इस स्वात्मविश्रान्ति दशा का विश्लेषण किया है। नेत्रतन्त्र के "नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत" (८।४१-४३) इत्यादि श्लोकों की व्याख्या करते हुए क्षेमराज ने तो निरालम्ब भावना के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत श्लोकों को उद्धृत कर "अकिञ्चिच्चिन्तकस्य" (मा० २।२३) इत्यादि वचनों के आधार पर इस भावना के परित्याग की ही बात कही है। इसका अभि- प्राय यही है कि शाम्भव उपाय के अवलम्बन की सामर्थ्य प्राप्त हो जाने पर फिर आणव उपाय का सहारा न लिया जाय ॥६०॥ [ धारणा ३८ ] ^२भावे 'न्यक्ते निरुद्धा चिन्नैव भावान्तरं व्रजेत् । तदा तन्मध्यभावेन विकसत्यति भावना ॥६१॥ १. त्य°-ख० स्प० ने० ई० तवि० । प्रत्यक्ष का विवेचन मिलता है। प्रकृत धारणा में इन्द्रियों के इस आलोचनात्मक व्यापार में प्रवृत्त होने वाली वृत्तियों का निरोध कर लिया जाता है, भैरवी मुद्रा के सहारे विषयों को देखते हुए भी अनदेखा कर दिया जाता है और इस तरह से अनालोचनात्मक पद्धति से भावों का परित्याग हो जाता है।

  1. प्राण और अपान के संबन्ध में पृ० २९-३० पर दी गई टिप्पणी देखनी चाहिये । इस विषय पर अनेक प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर उपोद्घात में विचार किया जायेगा ।
  2. स्पन्दनिर्णय (पृ० ६२), नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २०१), ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृति-

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विज्ञानभैरव : ६७ न्यक्तेऽन्तर्हितेऽदृष्टे, भावे पदार्थे त्रिनेत्रचतुर्भुजाकारे ध्येयवस्तुनि, चित् चेतना, निरुद्धा अभ्यासपाटवेन नितरां रुद्धा स्थापिता सती, भावान्तरम् अन्यपदार्थं दृष्टदेह- घटादिकं नैव व्रजेत् । 'भावेऽव्यक्ते' इति पाठे तु अकारप्रश्लेषेणापि 'अव्यक्ते' इति पूर्वोक्त एवार्थः । 'भावेऽत्यक्ते' इति चाप्यकारप्रश्लेषण अत्यक्ते स्वीकृते इत्यर्थः । तदा तयोः व्यक्ताव्यक्तभावयोः, मध्यभावेन न किञ्चिद्रूपमध्यधामविश्रान्तया, भावना मध्य- दशाविश्रान्तिसंस्कारः, अति अतिशयेन, विकसति उद्बोधमायाति । अद्भुतफुल्ल- न्यायेन¹ मनश्चातिविकासत्वं यायात्, ब्रह्मैव संपद्यत इति भावः ॥६१॥ न्यक्त अर्थात् अन्तर्हित = अदृष्ट (कभी नहीं देखे गये) तीन नेत्र, चार भुजा आदि से युक्त शंकर, विष्णु आदि इष्ट ध्येय पदार्थों में चेतना को अभ्यास के सहारे स्थापित कर लेने पर वह पहले देखे गये शरीर, घट, पट आदि बाह्य पदार्थों की ओर आकृष्ट नहीं होती । यहाँ न्यक्त यह छान्दस प्रयोग है । वेदभाष्यकारों ने ²न्यक्त का अर्थ बुडित (डूबा हुआ), तिरोहित या अन्तर्हित किया है । 'भावे न्यक्ते' के स्थान पर 'भावेव्यक्ते' अथवा 'भावेत्यक्ते' ऐसे पाठ भी मिलते हैं। यहाँ सन्धि के नियमों के अनुसार 'भावेऽव्यक्ते' तथा 'भावेऽत्यक्ते' इस तरह से अकार का प्रश्लेष³ मानना चाहिये । इस तरह से अव्यक्त का अर्थ अदृष्ट और अत्यक्त का अर्थ स्वीकृत होगा, अर्थात् किसी अदृष्ट भाव में, इष्टदेव के रूप में स्वीकृत भाव में, चेतना को लगा देने पर वह फिर किसी दूसरे भाव की तरफ उन्मुख नहीं होती । योगशास्त्र में इसी स्थिति को 'समाधि' कहा गया है— विमर्शिनी (भा० ३, पृ० ३४६), तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १२७; भा० ११, आ० २९, पृ० ८५) में यह उद्धृत है । ई० वि० वि० में केवल प्रथम चरण ही मिलता है ।

  1. कमल, गुलाब आदि के खिले हुए फूल को देखकर हमारे मन की कली खिल उठती है । उसी तरह से किसी भी अनोखी वस्तु को देख कर हमारे मन की यही स्थिति होती है । अद्भुतफुल्ल न्याय से इसी स्थिति की ओर इंगित किया गया है । "कुहनेन प्रयोगेण" (श्लो० ६५) इस श्लोक में भी इसी तरह की स्थिति में धारणा को केन्द्रित करने की बात कही गई है ।
  2. वैदिक पदानुक्रमकोश की सहायता से ज्ञात होता है कि न्यक्त पद तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि में आया है । उक्त स्थलों के मुद्रित भाष्यों में कहीं भी ऐसा अर्थ नहीं मिला । इसी से मिलता-जुलता अर्थ अवश्य मिलता है । जैसे कि—"न्यक्तं निमग्नं विस्मृतम्" (तै० सं० १।५।२।४ पर सायण का भाष्य) ।
  3. सन्धि के नियमों के अनुसार जब अकार या आकार पूर्व पद के साथ प्रश्लिष्ट हो जाता है, जुड़ जाता है, तो ऐसे स्थलों पर उनके लोप को दिखाने के लिये क्रमशः ऽ ऽऽ इस तरह के अवग्रह चिह्न लगाये जाते हैं । इन चिह्नों को देख कर सरलता से जाना जा सकता है कि यहाँ अकार या आकार प्रश्लिष्ट है ।

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६८ : विज्ञानभैरव ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम् । निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥ (पञ्चदशी १।५५) अर्थात् ध्याता और ध्यान को छोड़कर अभ्यास की परिपक्वता के कारण जब चित्त केवल ध्येय को ही अपना विषय बनाता है, तब वह उसी तरह से स्थिर हो जाता है, जैसे कि पवनरहित स्थान में दीपक स्थिर रहता है। चित्त की इसी अवस्था को 'समाधि' कहा जाता है। योगशास्त्र प्रतिपादित इस प्रक्रिया के अनुसार ध्याता और ध्यान को छोड़कर केवल ध्येय की आलम्बन रहित, शून्य स्वभाव, १मध्यम धाम में विश्रान्ति ही योगी के लिये उपेय (प्राप्तव्य) है। इसीलिये व्यक्त और अव्यक्त भाव के बीच में, रूपरहित स्वभावरहित मध्यम धाम में, चित्त की विश्रान्ति हो जाने से भावना (इस मध्य-दशा में विश्रान्ति का संस्कार) भलीभांति विकसित हो जाती है, उद्बुद्ध हो जाती है। अर्थात् इस संस्कार के उद्बुद्ध होने से व्यक्त और अव्यक्त इन दोनों भावों के बीच की अवस्था में इन दोनों दशाओं का एक रूप में अनुसन्धान करने वाली चिन्मात्रस्वरूपा विश्रान्ति की प्राप्ति होती है। उस अवस्था में किसी अद्भुत वस्तु को देखकर हुई चित्त की उत्फुल्ल दशा के समान साधक का चित्त हर्षातिरेक से खिल उठता है और उसी में उसको अपने स्वात्मस्वरूप का बोध होता है, वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। इस श्लोक को भी अभिनवगुप्त एवं क्षेमराज ने पूर्व श्लोक के साथ उद्धृत किया है। तन्त्रालोक में— ईदृक्तादृक्प्रायप्रशमोदयभावविलयपरिकथया । अनवच्छिन्नं धाम प्रविशेद् वैसर्गिकं सुभगः ॥ (२९।११८-११९) • अनवच्छिन्न वैसर्गिक धाम के नाम से चित्त की इसी उत्फुल्ल दशा में प्रवेश की बात वर्णित है। साथ ही क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय में “एकचिन्ताप्रसक्तस्य” (श्लोक ४१) इस श्लोक की व्याख्या के प्रसंग में भी उन्मेषावस्था के रूप में चित्त की इसी विकासावस्था को समझाया है ॥६१॥ [ धारणा-३९] २सर्वं देहं चिन्मयं हि जगद् वा विभावयेत् । युगपन्निर्विकल्पेन मनसा१ परमोदयः२ ॥६२॥ १. °सः-ख० । २. °मा गतिः-ख०, °द्भवः-शि० । १. इस शब्द की पहले एकाधिक स्थलों पर व्याख्या की जा चुकी है। मध्यम धाम या मध्य- दशा को शून्यस्वभाव इस लिये कहा जाता है कि यहां ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय प्रभृति त्रिपुटियों की कोई सत्ता नहीं बची रहती। ७२ संख्या की कारिका में भी प्रमेय, मान आदि की शान्त दशा का वर्णन है। २. स्वच्छन्दतन्त्र की उद्योत टीका (भा० ३, प० ७, पृ० ३१२) में इस श्लोक की प्रथम पंक्ति और शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १७) में पूरा श्लोक मिलता है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ६९ आपादात् केशान्तं सर्वं देहं जगद् वा सर्वं चिन्मयं प्रत्यंशं चिदेकरूपं युगपत् अक्रमं निर्विकल्पेन मनसा स्फुरच्चिच्चमत्कारव्याप्त्या परिभावयेत् परितः अन्तर्बहिश्च भावयेत् । अनया धारण्या "प्रकाशमानं न पृथक् प्रकाशात्"¹ इति न्यायेन परमोदयो भवति, प्रकाशः प्रकाशात इति भावः । 'मनसः परमा गतिः' इति पाठे मनस उत्कर्षरूपा परमा गतिर्भवतीत्यर्थः ॥६२॥ पैर से लगाकर चोटी तक अपने पूरे देह की, इसके प्रत्येक अंश की, अथवा इस सारे जगत् की एक साथ अक्रम रूप से चिन्मय स्वरूप में भावना करे । इस तरह की भावना से मन के निर्विकल्प हो जाने से भीतर और बाहर चित् के चमत्कार की अभिव्यक्ति हो जाने पर सब तरफ केवल प्रकाश ही प्रकाश बच रहता है, अर्थात् "प्रकाशमान वस्तु, शरीर या जगत्, प्रकाश स्वभाव परमतत्त्व से भिन्न नहीं है" इस न्याय के अनुसार मन की निर्विकल्प दशा में सभी वस्तुओं के प्रकाश रूप में परिणत हो जाने पर योगी की परमोदय अवस्था अभिव्यक्त हो जाती है । 'मनसः परमा गतिः' इस पाठ में इसका अर्थ होगा कि मन की गति उत्कर्ष की ओर बढ़ जाती है । क्षेमराज ने "शुद्धतत्त्वानुसंधानाद्वाऽपशुशक्तिः" (१।१६) इस शिवसूत्र की व्याख्या करते हुए विज्ञानभैरव के इस श्लोक के साथ स्पन्दकारिका के— इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । संपश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ इस श्लोक को भी उद्धृत किया है । स्वच्छन्दतन्त्र के 'तत्त्वाध्वधर्मनिर्मुक्तः....'सर्वं शिवमयं स्मरेत्" (७।२४२-२४४) इत्यादि श्लोकों में भी यही विषय प्रतिपादित है ॥६२॥ [ धारणा- ४०] ²सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् । युगपत् स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥६३॥ सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं त्यक्तविषयानन्देन स्वकीयेनानन्देन भरितं स्वकीयचिदानन्दपूर्णं स्मरेत् चिन्तयेत् । भावनयाऽनया भावको युगपत् सहसा स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ! "आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीव- न्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति" (तै० उ० ३।६) इति दृष्ट्या कृतकृत्यो भवेदिति भावः । "इह आश्यानचिद्रसरूपस्य जगतोऽपि भासनात् "सर्वं देहं चिन्मयं हि" (श्लो० ६२) इति पूर्वस्याः प्रकाशधारणायाः सकाशाद् विशेषः" इति शिवोपाध्यायः । वस्तुतस्तु पूर्वं चिन्मयो, अत्र चानन्दमयी धारणा प्रदर्शिता ॥६३॥ १. शिवोपाध्यायेन पूर्वं 'वायुद्वयस्य' ततश्च 'सर्वं जगत्' इति श्लोको व्याख्यातः ।

  1. पूरा श्लोक 'ज्ञानप्रकाशकं सर्वं' (१३४) की व्याख्या में उद्धृत है। वहीं इसका अर्थ भी किया गया है । २. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १८, ६४) और महार्थमंजरीपरिमल (पृ० ११२) में यह श्लोक उद्धृत है ।

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७० : विज्ञानभैरव इस सारे जगत् में अथवा अपने शरीर में, बाहरी विषयों के आनन्द से अलग अपने भीतरी स्वाभाविक आनन्द से यह सब परिपूर्ण है, इस तरह की भावना करे । इस भावना के अभ्यास से योगी सहसा उस अमृतमय स्वाभाविक आनन्दमय अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है, जिसका कि वर्णन उपनिषदों में मिलता है । तैत्तिरीय उपनिषद् में बताया गया है कि आनन्द से ही ये सब भूत (पदार्थ) उत्पन्न होते हैं, उसी की सहायता से पैदा होकर जीते हैं और प्रलय की अवस्था में उसी में लीन हो जाते हैं । इस स्थिति को पा लेने पर योगी कृतकृत्य हो जाता है । प्रस्तुत भावना में चिद्रस की आश्यान (घन=जमी हुई) अवस्था के रूप में जगत् का भी आभास होता रहता है, अतः यही पूर्व धारणा से इस धारणा की विशेषता है, ऐसा शिवोपाध्याय कहते हैं । वस्तुतः पूर्व श्लोक में चिन्मयी और इसमें आनन्दमयी धारणा वर्णित है । अतः स्पष्ट ही ये दोनों धारणाएं एक दूसरे से भिन्न हैं । "लोकानन्दः समाधिसुखम्" (१।१८) और "चित्तस्थितिवच्छरीरकरणबाह्येषु" (३।३९) इन दोनों शिवसूत्रों की व्याख्या करते हुए क्षेमराज ने प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत किया है । महेश्वरानन्द ने "शोषो मलस्य नाशो०" (श्लोक ४४) इत्यादि पूर्व उद्धृत गाथा में प्राणा- याम के प्रसंग में 'आप्लावन' शब्द की व्याख्या करते समय इस श्लोक का उदाहरण दिया है ॥६३॥ [ धारणा-४१ ] वायुद्वयस्य संघट्टादन्तर्वा बहिरन्ततः । योगी समत्वविज्ञानसमुद्गमनभाजनम् ॥६४॥ अन्तः हृदये, बहिः द्वादशान्ते, वा च, वाशब्दोऽत्र चकारार्थः । वायुद्वयस्य प्राणा- पानरूपस्य संघट्टात् योजनात् । अन्ततः प्रवेशनिर्गमयोः पर्यवसाने प्राणापानसंघट्टमनु- ल्लिखितभेदं निर्गमप्रवेशविनाकृतं शून्यकल्पं ध्यात्वा योगी प्रबुद्धः समत्वविज्ञानेन संमदृष्ट्या समुद्गमनभाजनं रहस्यस्थानपर्यवसायिप्राणापानादिगोचरः स्यात् । परम- सिद्धिभाग् भवेदिति भावः ॥६४॥ आन्तर स्थान हृदय और बाह्य स्थान द्वादशान्त में प्राण और अपान रूप दो वायुओं के संघट्ट से, अर्थात् इनकी हृदय और द्वादशान्त में अन्तः प्रवेश और बहिः (बाहर) निर्गमन काल की समाप्ति हो जाने पर, अन्ततः उस शून्यकल्प अवस्था का ध्यान करने पर, जिसमें कि प्राण और अपान के संघट्ट की अलग से प्रतीति नहीं हो पाती, योगी ^1प्रबुद्ध हो जाता है, उसमें समत्व दृष्टि का विकास हो जाता है । योगी में सर्वत्र समत्व बोध का उदय होने से सर्वत्र समान (एक सी) दृष्टि रखने से वह प्राण और अपान की भेद-स्थिति की जिस रहस्यमय स्थान में समाप्ति हो जाती है, उस साम्यावस्था को तो वह जान ही लेता है, साथ ही जागतिक सभी पदार्थों को भी वह इसी तरह से उस रहस्यात्मक परमतत्त्व में विलीन कर लेता है, अर्थात्

  1. प्रबुद्ध प्रभृति शब्दों के विषय में १२८वें श्लोक की अन्तिम टिप्पणी द्रष्टव्य । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ७१ अपने से अभिन्न रूप से देखने लगता है और इस समता-दृष्टि के विकसित होने से वह परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। तन्त्रालोक के— समता सर्वदेवानामोवल्लीमन्त्रवर्णयोः । आगमानां गतीनां च सर्वं शिवमयं यतः ॥ (४।२७४-२७५) इस श्लोक की व्याख्या करते हुए जयरथ ने तथा महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १६८) में महेश्वरानन्द ने समता-दृष्टि के बोधक त्रिकशासन के निम्न दो श्लोकों को उद्धृत किया है— समता सर्वभावानां वृत्तीनां चैव सर्वशः । समता सर्वदृष्टीनां द्रव्याणां चैव सर्वशः ॥ भूमिकानां च सर्वासामोवल्लीनां तथैव च । समता सर्वदेवानां वर्णानां चैव सर्वशः ॥ अर्थात् जगत् के सभी भावों, वृत्तियों, दृष्टियों, द्रव्यों, भूमिकाओं, ओवल्लियों, देवताओं और वर्णों में सब तरह से एक सी दृष्टि रखना ही समता दृष्टि कहलाती है। तन्त्रालोककार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सब कुछ शिवमयं है, अतः इस समता-दृष्टि का उदय हो, यह स्वाभाविक है। ऊपर की भावना के अभ्यास से इसी समता-दृष्टि का विकास होता है ॥६४॥ [ धारणा-४२ ] १कुहनेन प्रयोगेण सद्य एव मृगेक्षणे । समुदेति महानन्दो येन तत्त्वं २प्रकाशते ॥६५॥ हे मृगक्षणे, कुहनप्रयोगः विस्मापकाद्भुतमायादिप्रयोगः, ऐन्द्रजालिकरचितमायी- योद्यान-तत्स्थितचित्रकुसुमवृक्षादितत्स्थस्वात्मविहरण-स्वाङ्गच्छेदन-पुनस्तत्संयोजनादि- -अतिविस्मयजनकप्रयोगस्तेन कुहनेन प्रयोगेण सद्य एव विस्मयभरितो महानन्दः समु- देति, तथैवेदृशान् कुहनप्रयोगान् भावयतो योगिनस्तत्क्षणं परमानन्दोदयस्वरूपा निर्वि- कल्पावस्था समुदेति, येन तत्त्वं परमभैरवस्वरूपं प्रकाशतेऽभिव्यक्तीभवति ॥६५॥ हे मृगनयनि, कुहन प्रयोग (जादू का खेल) मनुष्य के मन में तत्काल विस्मय पैदा करता है। जादूगर जब अपने जादू से जादुई बगीचा बनाता है, उसमें विचित्र फल-फूलों से लदे वृक्ष दिखाई देने लगते हैं; उस बगीचे में वह बिहार करता दिखाई पड़ता है, बाद में दिखाई पड़ता है कि उसके हाथ-पैर आदि अंग कट-कट कर गिर रहे हैं, फिर दिखाई पड़ता है कि वे पुनः आपस में जुड़ गये हैं। इन सब आश्चर्यजनक कार्यों को देखकर देखनेवाले का मन उस समय कुछ क्षण के लिये अद्भुत आनन्द से सराबोर हो जाता है। इसी तरह की अद्भुत आनन्द से परिपूर्ण मिथ्या परिस्थितियों पर अपनी भावना को केन्द्रित करने वाले योगी के चित्त में १. विभाव्यते—तवि० । २. तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७९) में यह मिलता है।

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७२ : विज्ञानभैरव तत्काल परम आनन्द का उदय होने से वह निर्विकल्प दशा में आरूढ़ हो जाता है, जिससे कि उसका पर भैरव स्वरूप प्रकट होने लगता है। तन्त्रालोक के पूर्वोक्त "शाक्ते क्षोभे०" (५।७१) इत्यादि श्लोक में 'अग्रगोचर' पद की व्याख्या करते हुए जयरथ ने इस श्लोक को उद्धृत किया ॰है ॥६५॥ [ धारणा-४३ ] सर्वस्रोतोनि¹बन्धेन प्राणशक्त्योर्ध्वया शनैः । पिपी²लस्पर्शवेलायां प्रथते परमं सुखम् ॥६६॥ सर्वस्रोतोनिबन्धेन श्रोत्रचक्षुर्नासामुखगुह्योपस्थरन्ध्रनिरोधेन, ऊर्ध्वया प्राणशक्त्या, 1आधाराद् द्वादशान्तं यावदूर्ध्वं क्रमेण वहन्त्या प्राणशक्त्या, द्वादशान्ते आत्मविषया- नुभवसमये, पिपीलस्पर्शवेलायां पिपीलिकाया इव शनैश्चरतः प्राणस्य यः स्पर्शो जन्माग्रादिसकाशान्मूलकन्दादिस्थानस्पर्शास्तद्वेलायाम्, अस्यां हि वेलायां योगिनः परीक्षन्ते—अमुतः स्थानादुत्थाय अद्य अदः स्थानं प्राणः प्राप्त इति, परमं सुखं प्रथते योगिनः परानन्दावाप्तिर्भवति, अन्तर्मुखारामो भवतीत्यर्थः ॥६६॥ श्रोत्र, चक्षु, नासिका, मुख, गुह्य, उपस्थ प्रभृति प्राण और अपान आदि वायुओं के निकलने के मार्गों को रोक देने पर वायु की गति ऊपर उठने लगती है । आधार से लेकर द्वाद- शान्त पर्यन्त क्रमशः धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ रही इस प्राण-शक्ति के द्वादशान्त में प्रविष्ट हो जाने पर स्वात्मस्वरूप का अनुभव होने लगता है । योगशास्त्र की परिभाषा में इसको पिपील- स्पर्शवेला कहा जाता है, जिसमें कि प्राण के ऊपर उठते समय जन्माग्र से लेकर मूल, कन्द प्रभृति स्थानों का स्पर्श होने पर उसी तरह की अनुभूति होती है, जैसी कि देह पर चींटी के चलने से होती है। इसी अवस्था में योगी इसकी परीक्षा कर पाते हैं कि प्राण आज अमुक स्थान से चलकर अमुक स्थान तक उठा । इस स्थिति तक पहुँच जाने पर योगी का चित्त परम आनन्द से भर जाता है और वह इसी अन्तर्मुख वृत्ति में रम जाता है । भगवान् पतंजलि ने योग की इस प्रक्रिया का वर्णन 'श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणा- यामः' और 'बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः' (२।४९-५०) इन दो सूत्रों में किया है। इनका अभिप्राय यह है कि प्राण और अपान वायु के धर्म श्वास और प्रश्वास पुरुष के प्रयत्न के बिना निरन्तर स्वाभाविक रूप से गतिशील बने रहते हैं। पुरुष जब अपने विशेष प्रयत्न से क्रमशः अथवा एकाएक इनकी गति को रोकता है, तो प्राण और अपान की गति की यह अवरोध प्रक्रिया योगशास्त्र में प्राणायाम के नाम से जानी जाती है। यह प्राणायाम पूरक, रेचक और कुम्भक के भेद से तीन तरह का होता है । १. °रोधे° - ख० । २. °लिकास्पर्शमात्रात्-खटो० ।

  1. आधार से द्वादशान्त पर्यन्त स्थानों का वर्णन २८ से ३० संख्या के श्लोकों की व्याख्या के प्रसंग में किया जा चुका है । उपोद्घात में भी इस विषय पर विचार किया जायगा । वहीं जन्माग्र, आधार आदि शब्दों की भी स्पष्ट व्याख्या की जायगी । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ७३ शिवोपाध्याय ने यहां अपनी व्याख्या में बताया है कि प्राण की बाह्य गति का निरोधक होने से बाह्य वृत्ति वाला प्राणायाम पूरक, प्राण की अन्दर की गति का निरोधक होने से आन्तर वृत्ति वाला प्राणायाम रेचक कहलाता है। आगे वे लिखते हैं कि कुछ लोग 1बाह्य शब्द से रेचक और आन्तर शब्द से पूरक प्राणायाम का ग्रहण करते हैं। ऐसा लिखते हुए वे इस द्वितीय मत के प्रति अपनी अरुचि प्रकट करते हैं। किन्तु भाष्यकार व्यास, वाचस्पति मिश्र, भोजदेव प्रभृति व्याख्याकारों ने द्वितीय मत को ही स्वीकार किया है। प्राण और अपान की बाह्य और आन्तर गति का एक साथ निरोध कर देने पर स्तम्भ वृत्ति वाला कुम्भक प्राणायाम संपन्न होता है। जैसा कि वाचस्पति मिश्र ने प्रस्तुत सूत्र के व्यासभाष्य की टीका करते हुए लिखा है— जहां श्वास और प्रश्वास दोनों का, एक साथ ही रोक देने के कारण, अभाव हो जाता है, अर्थात् इस अवरोधक प्रयत्न के कारण फिर वह न तो सांस भरने में ही समर्थ होता है और न सांस छोड़ने में ही, किन्तु जैसे तपे हुए पत्थर पर पानी पड़ने से वह वहीं सूख जाता है, उसी तरह से श्वास-प्रश्वास के रूप में पवन का प्रवहमान यह प्रवाह भी बलवान् अवरोधक प्रयत्न से अवरुद्ध होकर शरीर में ही सूक्ष्म रूप से विलीन हो जाता है। उस समय पूरकता के अभाव में यह पूरक और रेचकता के अभाव में रेचक भी नहीं कहला सकता। यह तीनों प्रकार का प्राणायाम देश, काल और संख्या से परीक्षित होकर 'दीर्घसूक्ष्म' नाम से अभिहित होता है। अर्थात् जैसे भली भांति दबाई गई रुई की गांठ छोटी सी दिखाई पड़ती है, किन्तु उसमें से निकाल कर रुई को फैला देने पर वह बहुत जगह घेरती है, उसी तरह से प्राण भी दुर्लक्ष्य होने से यद्यपि अत्यन्त सूक्ष्म रहता है, किन्तु देश, काल और संख्या के अनुसार क्रमशः प्राणायाम का अभ्यास बढ़ाने से वह अत्यन्त विस्तृत हो जाता है। फैलाई हुई रुई को जैसे फिर गांठ में बांध देने पर वह थोड़ा ही स्थान घेरती है, उसी तरह से प्राणायाम के अभ्यास से उस प्राण को पुनः सूक्ष्म किया जा सकता है। उक्त तीनों प्रकार के प्राणायामों में देश, काल और संख्या की अधिकता और अल्पता के आधार पर प्राण दीर्घ और सूक्ष्म रूप में परिणत होता रहता है। अतः प्राणायाम की यह विधि 'दीर्घ-सूक्ष्म' कही जाती है। देश-परीक्षा की विधि यह है—हृदय से निकल कर श्वास नाक के सामने बारह अंगुल तक जाकर समाप्त हो जाता है। वहीं से लौट कर यह पुनः हृदय में प्रवेश करता है। यह प्राण और अपान की स्वाभाविक गति है। प्राणायाम का विधिपूर्वक अभ्यास करने से प्राण की यह गति क्रमशः नाभि अथवा मूलाधार से निकलने लगती है और नाक से बाहर २४ अंगुल तक अथवा ३६ अंगुल तक पहुँच जाती है। इसी तरह से वहाँ से पुनः लौटकर वह नाभि अथवा मूलाधार तक पहुँचती है। इनमें से नासिका के बाहर प्राण की गति कहाँ तक पहुँची, इसकी परीक्षा किसी निवात (पवन रहित) स्थान में तिनके में रुई लपेट कर की

  1. जैसा कि पृ० २९-३० की टिप्पणी में लिखा गया है, इस विषय पर उपोद्घात में विचार किया जायगा। पृ० २९-३० की टिप्पणी में पालि-साहित्य में उपलब्ध इस तरह के परस्पर विरोधी विचारों का उल्लेख किया गया है।

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७४ : विज्ञानभैरव जा सकती है। निवात स्थान में रुई में अपने आप स्पन्दन नहीं होगा। इसको नासिका के सामने रखने पर प्राण की गति जितनी दूर तक पहुँचेगी, उतनी दूर तक रुई में स्पन्दन का अनुभव होगा। इस तरह से अभ्यास के द्वारा प्राण की गति में कितना विस्तार हुआ, इस बात का सहज में अनुमान हो जायगा। इसी तरह से भीतर प्राण की गति का कहाँ तक विस्तार हुआ, इसका अनुमान प्राण की भीतर की शरीर पर चींटी के चलने सरीखी गति के स्पर्श से किया जा सकता है। प्राण की गति के विस्तार की ही भाँति उसके संकोच की भी परीक्षा इसी विधि से की जा सकती है। काल-परीक्षा इस तरह से सम्पन्न होती है—पलक झपने में जितना समय लगता है, उसका चतुर्थ भाग क्षण कहलाता है। निमेष आदि क्रियाओं से परिच्छिन्न होने से, नापे जाने के कारण, काल परिमित हो जाता है। वाचस्पति मिश्र ने मात्रा की परिभाषा यह की है कि अपने घुटनों को हाथ से तीन बार छूकर चुटकी बजाने में जितना समय लगता है, उसको मात्रा¹ कहा जाता है। इस तरह की ३६ मात्राओं का पहला उद्घात मृदु कहलाता है। इसको दुगुना कर देने पर दूसरा उद्घात मध्य तथा तिगुना कर देने पर तृतीय उद्घात तीव्र कहलाता है। नाभि के मूल से उठकर बाहर की ओर जाने वाली वायु का शिर पर आघात उद्घात के नाम से जाना जाता है। प्रणव के जप की आवृत्ति के द्वारा अथवा श्वास की गति के प्रवेश की गणना करके संख्या-परीक्षा की जाती है। यद्यपि कुम्भक प्राणायाम में देश की व्याप्ति नहीं बन सकती, तो भी वहाँ काल और संख्या की व्याप्ति तो जानी ही जा सकती है। इस तरह से देश, काल और संख्या के अनुसार प्रतिदिन प्राणायाम का अभ्यास बढ़ाने पर दिन, पक्ष और मास के क्रम से देश और काल की व्याप्ति के बढ़ने पर वह बढ़ता जाता है, अतः यह दीर्घ है। इसका अनुभव निपु- णता से अभ्यास करने पर ही हो सकता है, अतः यह सूक्ष्म भी है। प्राण जब सूक्ष्म हो जाता तो उससे मन शान्त हो जाता है, मन की शान्ति से अन्त में प्राण भी शान्त हो जाता है और प्राण के शान्त हो जाने पर सारे विकल्पों का नाश हो जाता है। इस तरह से यह योग-दशा अतीव कष्ट-साध्य है। किन्तु इससे योगी को निर्विकल्प दशा की प्राप्ति होती है, अतः इसका अभ्यास योगी के लिये अतीव आवश्यक है। इसी बात को प्रस्तुत श्लोक के उत्तर भाग में समझाया गया है कि प्राण की गति भीतर की ओर होने पर शरीर पर चींटी के चलने के जैसे स्पर्श की जो अनुभूति होती

  1. मात्रा और उद्घात की यह परिभाषा व्यास-भाष्य की वाचस्पति मिश्र कृत तत्त्ववैशा- रदी टीका में मिलती है। वहाँ की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं— “स्वजानुमण्डलं पाणिना त्रिः परामृश्य छोटिकावच्छिन्नः कालो मात्रा। ताभिः षट्त्रिंशता मात्राभिः परिमितः प्रथम उद्घातो मृदुः। स एव द्विगुणीकृतो द्वितीयो मध्यमः। स एव त्रिगुणीकृतस्तृतीय- स्तीव्रः” (२।५०)। इसका हिन्दी अनुवाद ऊपर टीका में कर दिया गया है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ७५ है, उसमें देश, काल और संख्या की परीक्षा करने पर योगी के चित्त में अन्त में परम आनन्द की अभिव्यक्ति हो उठती है ॥६६॥ [ धारणा-४४ ] ^१वह्नेर्विषस्य मध्ये तु चित्तं सुखमयं क्षिपेत् । केवलं वायुपूर्णं वा स्मरानन्देन युज्यते ॥६७॥ अनुप्रवेशक्रमेण संकोचभूमिः वह्निः, नासापुटोध्वर्स्पन्दनक्रमोन्मिषत्सूक्ष्म- प्राणशक्त्या अभेदनक्रमासादितोध्वर्कुण्डलिनीपदे तद्विश्रान्तिरूपसंकोचस्थानं विषस्थानं प्रसरयुक्त्या विकासपदम् । अनयोर्वह्निविषयोर्मध्ये मध्यनाड्यां सृष्टिग्रन्थि- भूतायाम्, सुखमयम् आनन्दमयं चित्तं मनः, भावनया क्षिपेत् चिन्तयेत् । वायुनिर्गम- प्रवेशधारणां विहाय मध्यभूते उन्मेषभट्टारके तन्निर्गमप्रवेशकारणे तद्द्वयैक्यानु- सन्धात्रात्मके तद्धारणया आनन्दमयं चित्तं क्षिपेत् । कीदृशम् ? केवलम् आरोहावरोह- विषयसम्बन्धरहितं वायुपूर्णं च मध्यनाडीस्थिताक्रमोच्चारानवकलात्मकप्राणशक्तिभरितं च । वह्नेः प्राणस्य, विषस्य अपानस्य च मध्ये वायुपूर्णं प्राणायामसहितं केवलं प्राणा- यामवर्जितमपि च सुखमयं चित्तं क्षिपेदिति सरलार्थः । ततः स्मरानन्देन कामानन्देन युज्यते, स्मरानन्दमयो भवेदित्यर्थः । सर्वविषयविस्मारकारणत्वात् कामानन्दस्य आनन्दान्तरेभ्यः परतत्वम् । यद्वा वह्निः मेढ्रादूर्ध्वं नाभ्यधोऽङ्गुलानां चतुष्टयेऽग्निनाम पवनाधारः षोडश- पवनाधारमध्ये गणितः । विषनामा पवनाधारो मेढ्रमध्ये ज्ञेयः । तयोः पवना- धारयोर्मध्ये सुखमयचित्तनिक्षेपणम् । ततः कामानन्दावाप्तिः । षोडशाधारास्तु कुलाम्नाये कथिताः । अथवा वह्निविषशब्दयोर्लोकप्रसिद्ध एवार्थो ग्राह्यः । तेन वह्नौ वा विषे च कठिनतरे सुखभावनयैव चित्तं क्षिपेत् । 'स्मरानन्दे न युज्यते' इति च्छेदे कामानन्दे सर्वविषयविस्मारके न युज्यते नैव संलग्नो भवति । यस्माद् दुःखे वह्निविषादौ सुखसंधारणमेव परमार्थ इति परमार्थविदः । स्त्रीसंगेन विना स्त्रिया य आनन्दानुभवः स एव परमार्थ इति कथ्यत इति तात्पर्य्यार्थः ॥६७॥ प्राण की श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया में जब वायु ऊर्ध्व-मुख अधः सहस्रार कमल में प्रविष्ट हो जाता है, तब जीव की असीम शक्ति संकुचित हो जाती है। शक्ति के इसी संकोच स्थान को योगशास्त्र में वह्नि के नाम से जाना जाता है। यही पवन जब नासिका मार्ग से न निकल कर ऊपर के सहस्रार कमल की ओर बढ़ता हुआ सूक्ष्म प्राणशक्ति के रूप में विशुद्धि चक्र (भ्रस्थान) का भेदन कर ऊर्ध्व कुण्डलिनी, अर्थात् ऊपर के अधोमुख सहस्रार कमल में प्रविष्ट हो जाता है और वहाँ विश्राम करता है, तो उसकी शक्ति का विकास होने लगता है। १. न-ख० ।

  1. यह श्लोक प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ८७) में मिलता है ।

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७६ : विज्ञानभैरव यह विकास पद (स्थान) योगशास्त्र में 'विष' नाम से जाना जाता है। यद्यपि प्रारंभ में जीव की शक्ति यहाँ संकुचित अवस्था में ही रहती है, किन्तु योगाभ्यास से उसका विस्तार किया जा सकता है, अतः इसको विकास पद (स्थान) कहा जाता है। ऊर्ध्व कुण्डलिनी में शक्ति का विकास होने पर षष्ठ वक्त्र, गुह्य स्थान, आधार प्रदेश आदि के नाम से जानी जाने वाली, अधः स्थान में स्थित, प्रसुप्त कुण्डलिनी में भी प्राणशक्ति का विकास कर शक्ति का प्रसार, शक्ति का विस्तार किया जा सकता है। इस अवस्था में अधः कुण्डलिनी के मूल, अग्र और मध्य भाग में प्राणशक्ति के स्पर्श की स्पष्ट अनुभूति होने लगती है। इन वह्नि¹ और विष स्थानों के बीच में सृष्टि ग्रन्थीभूत मध्य नाडी में भावना के द्वारा आनन्द से ओत-प्रोत मन को स्थिर कर दे । वायु की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से, प्राण-अपान की गति में नियोजित धारणा से, मन को हटा कर इन दोनों के बीच में विद्यमान उन्मेष दशा में, जिससे कि प्राण की ऊर्ध्व कुण्डलिनी की ओर गति होती है, जो श्वास-प्रश्वास, प्राण-अपान की गति की भी कारण स्वरूप है² और जहाँ इनकी एकता का अनुसन्धान किया जा सकता है, धारणा का अभ्यास करते हुए साधक अपने आनन्द से परिपूर्ण चित्त को नियोजित कर दे, भले ही वह चित्त प्राण वायु के आरोह और अवरोह व्यापार से रहित होने से अकेला हो अथवा वायु से परिपूर्ण हो, अर्थात् मध्य नाडी में स्थित बिना क्रम के स्वाभाविक रूप से उच्चरित होने वाली अनच्क कला स्वरूप (अजपा गायत्री) प्राणशक्ति से भरा हो । इस तरह के अभ्यास से योगी कामानन्द से परिपूर्ण हो जाता है, अर्थात् अपने परम आनन्दमय स्वरूप का अनुभव करने लगता है। कामानन्द अन्य सभी लौकिक विषयों के आनन्द को दबा देता है, अन्य सभी आनन्दों की अपेक्षा उसकी इस उत्कृष्टता के आधार पर ही यहाँ उसको उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस मानव पिण्ड (शरीर) में पवन के ठहराव के १६ स्थान हैं। योगशास्त्र में इनको आधार कहा जाता है। इनमें से लिंग के ऊपर नाभि से चार अंगुल नीचे अग्नि नाम का स्थान है। विष नाम का आधार लिंग के मध्य में माना जाता है। शरीरवर्ती पवन के इन दोनों आधारों के बीच में आनन्दमय चित्त की बार-बार भावना करनी चाहिये, चाहे वह चित्त प्राणायाम से नियन्त्रित हो अथवा न हो। उक्त भावना के अभ्यास से वह कामानन्द से परिपूर्ण हो जाता है। यहां इस भावना के अभ्यास की कामानन्द से तुलना इसलिये की गई है कि जैसे अन्य सभी विषयों से उत्पन्न होने वाले आनन्द की अपेक्षा कामानन्द सर्वोत्कृष्ट है, उसी

  1. वह्नि और विष नामक स्थानों का तथा उनके बीच में विद्यमान सृष्टि ग्रन्थिभूत मध्यनाडी का विवेचन उपोद्घात में किया जायगा। कुलागम-संमत सोलह आधारों का वर्णन भी वहीं देखना चाहिये।
  2. प्राण और अपान व्यापार से भिन्न, श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से अलग, स्वाभाविक रूप से निरन्तर चल रहे प्राण (हृदय) के स्पन्दन व्यापार का यहां उल्लेख है। इस पर भी उपोद्घात में विचार किया जायगा।

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विज्ञानभैरव : ७७ तरह से इस भावना का अभ्यास करने वाला योगी भी सर्वोत्कृष्ट परम आनन्द से सराबोर हो जाता है। अथवा वह्नि और विष शब्दों के लोक-प्रसिद्ध अर्थ को स्वीकार करके भी इसकी व्याख्या की जा सकती है। अर्थात् अग्नि और विष जैसे कष्टदायक पदार्थों में भी ये सब सुखमय ही हैं, इस तरह की भावना करे। इस धारणा के अभ्यास से साधक अन्य सभी विषयों को दबा देने वाले कामानन्द से कभी अभिभूत नहीं होता। 'कामानन्दे न युज्यते' ऐसा पदच्छेद करने पर यह अर्थ निकलता है। व्यक्ति जब कामाकुल हो जाता है, तो उस समय वह सब कुछ भूल जाता है। उक्त धारणा के अभ्यास से साधक इस अवांछनीय स्थिति से उबर जाता है। सदा दुःखमय प्रतीत होने वाले अग्नि, विष आदि में भी यदि सुख की भावना, सुख की अनुभूति होने लगे, यही तो प्राणी की यथार्थ स्थिति है। बिना ¹स्त्रीसंग के भी योगी के चित्त में स्त्रीसंग के सदृश उत्कृष्ट आनन्द की अनुभूति निरन्तर होने लगे, यही वास्तव में प्राणी की परम आनन्दमय परमार्थ स्थिति मानी जाती है ॥६७॥ [ धारणा-४५ ] ²शक्तिसङ्गमसं¹क्षुब्धशक्त्यावेशावसानि²कम् । यत्सुखं ब्रह्मतत्त्वस्य तत्सुखं स्वाक्यमुच्यते ॥६८॥ शक्तिसङ्गमः स्त्रीसङ्गः, तेन संक्षुब्धः सम्प्रवृत्तः, शक्त्यावेश आनन्दशक्ति- समावेशः, तदावसानिकं तत्पर्य्यन्तिकम्, स्त्रीसङ्गानन्दाविर्भूतानन्दशक्तिसमावेशान्त इति यावत्। यद् घण्टद्यनुरणनरूपं ब्रह्मतत्त्वस्य सुखं परब्रह्मानन्दः, त्यक्तस्त्रीपुरुषद्वैतपर्य्या- लोचनं स्वात्ममात्रनिष्ठम्, तत् सुखं स्वकमेव स्वाक्यम्, स्वार्थे घञ्, आत्मन एव संबन्धि, न अन्यत आयातमुच्यते। स्त्रीसङ्गस्तु अभिव्यक्तिकारणमेव, यतः स्वक एव स आनन्दः। ततश्च स्त्रीसङ्गेन य आनन्दोऽनुभूयते, तामेव स्त्रियं ध्यात्वा आनन्दमयो भवे- दिति भावः। विश्वस्फुरणशक्तिसङ्गमसंक्षुब्धा या चिच्छक्तिस्तस्या य आवेश इति केचित् ॥६८॥ शक्ति-संगम अर्थात् स्त्री के सहवास से संक्षुब्ध हुई, उत्तेजित हुई, आनन्द शक्ति की समावेश-दशा की समाप्ति के समय घनघनाहट की सी अनुभूति होती है। स्त्री के सहवास से अभिव्यक्त इस सुखमय स्थिति को ब्रह्मानन्द सहोदर माना जाता है। उस समय स्त्री और पुरुष का द्वैतभाव छूट जाता है और स्वात्मनिष्ठ परमानन्द केवल बच रहता है। इस अवस्था १. ॰क्षोभ॰-परा॰ । २. ॰न॰-परा॰ ।

  1. अगले श्लोक में इस विषय का स्पष्ट विश्लेषण किया गया है।
  2. यह और इसके आगे का श्लोक परात्रिशिका व्याख्या (पृ० ५१), शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३), महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १४६-१४७) और तन्त्रालोक की विवेक टीका (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७८) में उद्धृत है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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७८ : विज्ञानभैरव में अभिव्यक्त हुआ यह सुख अपना ही है, यह कहीं अन्यत्र से नहीं आता, स्त्री का सहवास केवल उसकी अभिव्यक्ति करता है। अतः जिस स्त्री के सहवास से इस आनन्द की अभिव्यक्ति होती है, अनुभूति होती है, उसी का ध्यान कर साधक ब्रह्मानन्द दशा मे समाविष्ट हो सकता है। शिवोपाध्याय और आनन्दभट्ट ने इस प्रसंग में दो श्लोक उद्धृत किये हैं— जायया संपरिष्वक्तो न बाह्यं वेद नान्तरम् । निदर्शनं श्रुतिः प्राह मूर्खस्तं मन्यते विधिम् ॥ १न सृष्टिर्जायते लिङ्गान्न भगान्नापि रेतसः । आनन्दोच्छलिता शक्तिः सृजत्यात्मानमात्मना ॥ इसका अभिप्राय यह है कि "तद्यथा प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्" (४।३।२१) इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति में उदाहरण के रूप में पत्नी के आलि- गन की बात कही गई है, किन्तु अज्ञ जन इसको विधि मानकर उसी में लिप्त हो जाते हैं। वास्तव में यह सृष्टि न तो लिंग से पैदा होती है, न भग से और न वीर्य से ही। आनन्द से सराबोर यह शक्ति स्वयं अपने आप अपना विस्तार कर लेती है। इसी लिये कुछ व्याख्या- कार इस श्लोक के पूर्वार्ध का यह अर्थ करते हैं— "विश्व के विस्फुरण की शक्ति के समागम से संक्षुब्ध चिच्छक्ति के आवेश से"। उच्च दार्शनिक भूमिका में यही स्थिति मान्य हो सकती है। इस श्लोक को अभिनवगुप्त ने परात्रिंशिका व्याख्या (पृ० ५१) में उद्धृत किया है और तन्त्रालोक (५।७१) की व्याख्या करते हुए जयरथ ने शाक्त क्षोभ के उदाहरण के रूप में। क्षेमराज ने भी "त्रिपदाद्यनुप्राणनम्" (३।३८) इस शिवसूत्र की व्याख्या करते हुए प्रस्तुत श्लोक को याद किया है और बताया है कि— अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वामृशन् । धावन् वा तत्पदं गच्छेद्यत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ (श्लो० २२) स्पन्दकारिका के इस श्लोक में वर्णित स्पन्दावस्था प्रस्तुत धारणा से प्राप्त होने वाली स्थिति से अभिन्न है। शाक्त उपाय की व्याख्या करते हुए महेश्वरानन्द ने भी महार्थमंजरी की परिमल व्याख्या में इस श्लोक को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है। इन सब स्थलों का अवलोकन करने से उक्त अभिप्राय की ही पुष्टि होती है ॥६८॥ १. "न पद्माङ्का न चक्राङ्का न वज्राङ्का यतः प्रजा। लिङ्गाङ्का च भगाङ्का च तस्मान्माहेश्वरी प्रजा ।।" (अनु० १४।२३३) महाभारत के इस श्लोक से तथा इसी अभिप्राय के— "न च चक्राङ्कितं विश्वं न च वज्राङ्कितं क्वचित् । भगलिङ्गाङ्कितं विश्वं तेन शैवमिदं जगत् ।।" किसी शैवतन्त्र के ग्रन्थ में पठित इस वचन से केवल इतना ही प्रतीत होता है कि ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र के अथवा वैष्णव और बौद्ध दर्शनों के प्रतीकों के साथ किसी की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु शैव और शाक्त प्रतीकों के साथ ही जीव उत्पन्न होते हैं। इस तरह से टीका में उद्धृत वचन से इन वचनों का कोई विरोध नहीं है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ७९ [धारणा-४६] लेहनामन्थनाकोटैः स्त्रीसुखस्य भरात् स्मृतेः । शक्त्यभावेऽपि देवेशि भवेदानन्दसंप्लवः ॥६९॥ हे देवेशि, लेहनामन्थनाकोटैः, लेहनं वक्त्रासवास्वादनम्, परिचुम्बनमिति यावत् । मन्थनं प्रधानाङ्गविलोड़नम् आलिङ्गनं वा । आकोटः पुनः पुनर्मर्दनम्, नख- क्षतादि वा। तैस्तैः परिचुम्बनालिङ्गनदन्तक्षतनखक्षतादिभिर्विशेषैः पूर्वानुभूतस्य स्त्रीसुखस्य भरात् स्मृतेः गाढध्यानमात्रात् शक्त्यभावेऽपि स्फुटस्त्र्यादीनां कारणाना- मभावेऽपि आनन्दसंप्लवो भवेत् प्रत्यक्षतयैव सर्वविषयविस्मारक आनन्दोदयः स्यात् । शक्त्यभावेऽपीत्यनेन स्वकीय एव स आनन्दस्तत्संमुखीभावेनायातो न पुनस्तत्र स्त्री कारणमिति स्वयमेवात्मानमानन्दमयं ध्यायेदित्यर्थः । “भरात् स्मर्यमाणो हि स स्पर्शः । तत्स्पर्शक्षेत्रे च मध्यमाकृत्रिमपरात्मकशक्तिनालिकाप्रतिबिम्बित उन्मुक्तशाक्तस्पर्शा- भावेऽपि तदन्तर्वृत्तिशाक्तस्पर्शात्मकवीर्यक्षोभकारी भवतीत्यभिनवगुप्तपादाः” (परा० व्या०, पृ० ५१) ॥६९॥ हे देवेशि, लेहन का अर्थ है अधर-मधु का आस्वादन, अर्थात् परिचुम्बन, मन्थन का अर्थ है प्रधान अंग का विलोडन अथवा आलिंगन, आकोट का अर्थ पुनः पुनः मर्दन अथवा नखक्षत, दन्तक्षत आदि नाना प्रकार के इस तरह के हाव-भावों से उत्पन्न हुए पूर्वानुभूत स्त्रीसुख का प्रयत्नपूर्वक स्मरण करने पर भी व्यक्ति का मन आनन्द से भर उठता है । स्त्री प्रभृति आनन्द के स्पष्ट कारणों की अनुपस्थिति में भी उनको याद करने मात्र से व्यक्ति उनमें डूब जाता है और थोड़ी देर के लिये सब कुछ भूल बैठता है । इससे स्पष्ट होता है कि यह अपना ही आनन्द स्त्री के सहवास से प्रकट होता है । इस आनन्द की अभिव्यक्ति में स्त्री को कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसकी अभिव्यक्ति स्त्री के अभाव में भी स्मृति की सहायता से होती है । अतः यह मानना पड़ेगा कि इस आनन्द की स्थिति अपने स्वरूप में ही है । साधक को चाहिये कि वह इसी स्वाभाविक स्वरूपानन्द की भावना करे और इसकी अभिव्यक्ति के बाह्य उपादानों का परित्याग कर दे । इस भावना के अभ्यास से साधक का चित्त आनन्द से सराबोर हो जाता है । शिवोपाध्याय के अनुसार अभिनवगुप्त ने इस तरह से इस स्थिति को स्पष्ट किया है कि यह स्मर्यमाण स्पर्श उस स्पर्श क्षेत्र में, अकृत्रिम पराशक्ति रूप मध्यम नालिका में, जब प्रतिबिम्बित होता है, तो उस दशा में उन्मुक्त बाह्य शाक्त स्पर्श के अभाव में भी आन्तर शाक्त स्पर्श के कारण वीर्य के क्षोभ का, आनन्दोदय अवस्था की अभिव्यक्ति का, कारण होता है । ध्यान मात्र से सर्वविषय विस्मारक (अन्य सभी विषयों के अनुभव को भुला देने वाले) आनन्द की जो प्रत्यक्ष अनुभूति होती है, उसी को आनन्दोदय दशा कहा जाता है ॥६९॥

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८० : विज्ञानभैरव [धारणा-४७] ¹आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बान्धवे¹ चिरात् । आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा त²ल्लयस्तन्मना भवेत् ॥७०॥ आनन्दे महति प्राप्ते, स्फुटेष्टस्त्र्यादिसमागमे सति महान् आनन्दो जायते, एव- मेव दारिद्र्याद्युपद्रुतस्य कस्यचिदनन्तनिष्कण्टककोशप्राप्तेर्महानानन्दो जायते, तस्मिन् प्राप्ते सतीत्यर्थः । वा अथवा । चिराद् बान्धवे दृष्टे चिरकालं प्रवासादागते बान्धवे पुत्रमित्रादौ प्राप्ते सति उद्गतम् उत्पन्नम्, आनन्दं ध्यात्वा उद्गतमात्रमेवानन्दं गृहीत्वा तत्र धारणादार्ढ्येन तल्लयस्तन्मना भवेत्, अन्तर्मनस्कत्वेन परानन्दोदये विश्रान्तः स्यादेवेत्यर्थः ॥७०॥ चिरकाल की प्रतीक्षा के बाद अपनी प्रेमिका का सहवास मिलने पर व्यक्ति के मन में आनन्द का सागर हिलोरे लेने लगता है। परम दरिद्र व्यक्ति को एकाएक अटूट धनराशि मिल जाय तो उसके आनन्द का पूछना ही क्या ! इसी तरह से बड़े लम्बे समय से परदेश गये व्यक्ति के एकाएक घर लौट आने पर उसके परिवार वालों को अपार हर्ष होता है। आनन्द की इसी उत्फुल्ल अवस्था को पकड़ कर उसमें दृढ़ता और आदर पूर्वक निरन्तर धारणा का अभ्यास करने से साधक का चित्त उसी में लीन होकर तदाकार हो जाता है, वह अन्तर्मुख होकर उत्कृष्ट आनन्दोदय दशा में विश्राम प्राप्त कर लेता है। स्पन्दकारिका के “अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा” (श्लो० २२) इस श्लोक में स्पन्दावस्था के नाम से इसी स्थिति को बताया गया है। क्षेमराज और महेश्वरानन्द ने पूर्व श्लोकों की भांति इस श्लोक को भी उसी प्रसंग में उद्धृत किया है और अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० ५०) में इस स्थिति में परानन्द की अभिव्यक्ति का विश्लेषण किया है ॥७०॥ [ धारणा-४८ ] ²जग्धिपानकृतोल्लासरसा³नन्दविजृम्भणात्⁴ । भावयेद् ⁵भरितावस्थां महानन्दस्ततो⁶ भवेत् ॥७१॥ १. °वेऽचि°-ख० । २. °क्ष्यस्तन्मयो-म०, °न्मनस्तल्लयी°-शि० । ३. °स्वाद°-यो० । ४. °व्यवस्थितेः-ई० । ५. भैरवं भावं-शि० । ६. °मयो-शि० प्र० ।

  1. ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० ५०), शि० वि० (पृ० ६३), महा० परि० (पृ० १४७) और स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०-४१) में यह श्लोक मिलता है । प्रथम पुस्तक में केवल प्रथम पंक्ति मिलती है ।
  2. शि० वि० (पृ० ६३), स्तवचिन्तामणिटीका (पृ० ७१), यो० दो० (पृ० १९७, २६५, ३४०) और प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ९०) में यह पूरा श्लोक तथा ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० १७९) और स्वच्छन्द० (भा० ६, प० १५, पृ० १२७) में प्रथम पंक्ति मिलती है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ८१ क्षुदतिशयनिवर्तकयत्किञ्चिन्मात्रभक्ष्यादिभक्षणं जग्धिः, पिपासातिशयनिषेधक- शीतलजलादेर्मधुरक्षीरादेर्वाऽऽस्वादनं पानम्, ताभ्यां प्रतिग्रासं प्रतिसिक्तं प्रतिबिन्दु तुष्टिपुष्टिक्षुत्पिपासानिवृत्त्याख्यकार्यत्रयहेतुभ्यां कृता ये उल्लासरसानन्दाः-करचरणादीनां स्वाङ्गानां स्पर्शनादिविमर्शनेनोच्चैर्द्योतनमुल्लासः, सर्वासु स्थूलसूक्ष्मगर्भनाडीषु शुष्क- ताया अभावे स्नेहार्द्रतालक्षणो रसः, भोजनाद्यभावे हि नाडीनां रूक्षता जायते, तद्भावे तु रसवितननम्, तदनन्तरम् आनन्दः अहंविमर्शसंचेतनम्-तेषां विजृम्भणात् । उल्ल- सद्रसरूपो वा आनन्द उल्लासरसानन्दस्तस्य विजृम्भणात् सर्वगात्रविषयकानुभवविक- सनाद् हेतोः, भरितावस्थां आनन्दपूर्णां स्वदेहदशां भावयेत्, ततो महानन्दो भवेत् । एवं भरितावस्थां भावयत एकाग्रचित्तस्य योगिनः परमानन्दप्राप्तिः स्यादित्यर्थः ॥७१॥ गहरी भूख को मिटाने के लिये जो कुछ खाया जाय, उसको 1'जग्धि' कहते हैं । इसी तरह से गहरी प्यास को मिटाने के लिये पिया गया शीतल जल, मधुर दूध, शर्बत आदि 'पान' कहलाता है । भोजन के प्रत्येक ग्रास और 'पान' की प्रत्येक घूँट से शरीर में सन्तोष, पुष्टि और भूख-प्यास की निवृत्ति ये तीन कार्य अवश्य होते हैं । इनसे शरीर में उल्लास, रस और आनन्द का आविर्भाव होता है। भोजन-पान से संपुष्ट व्यक्ति अपने हाथ-पैर आदि अंगों को छूकर, अपने शरीर के उत्कर्ष को देखकर अनोखी तुष्टि (सन्तोष) का अनुभव करता है, इसी को 'उल्लास' कहा जाता है। भोजन-पान से सभी स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतम नाडियों का सूखापन दूर होकर उनमें स्निग्धता का संचार होता है, इसको 'रस' कहते हैं । भोजन-पान के अभाव में नाडियां रूक्ष हो जाती हैं और भोजन-पान से इनमें रस का संचार होने लगता है । रस का संचार होने से शरीर में एक अनोखे सुख की अनुभूति होती है । यह आनन्द स्वात्मस्वरूप की अनुभूति की याद दिला देता है । इस तरह से भोजन और पान से शरीर की तुष्टि, पुष्टि और भूख प्यास की निवृत्ति होने के उपरान्त आविर्भूत उल्लास, रस और आनन्द शरीर के प्रत्येक अवयव में भर जाते हैं । अथवा—"रसो वै सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति" (तै० उ० २।७) इस श्रुति के अनुसार उत्फुल्ल रस रूपी ब्रह्मानन्द से, हर्षातिरेक से, साधक का सारा शरीर भर जाता है । इस भरितावस्था में, अर्थात् आनन्द से परिपूर्ण स्थिति में पूर्णता दशा की एकाग्रचित्त से भावना करने पर योगी का मन परम आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है । श्रुति प्रतिपादित ब्रह्मानन्द का स्तवचिन्तामणिकार भट्ट नारायण ने इस तरह से वर्णन किया है— त्रैलोक्येऽप्यत्र यो यावानानन्दः कश्चिदीक्ष्यते । स बिन्दुर्यस्य तं वन्दे देवमानन्दसागरम् ॥ (श्लो० ६१) इसकी व्याख्या करते हुए आनन्द की प्राप्ति के उपाय के रूप में क्षेमराज ने प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत किया है । क्षेमराज ने शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३) में तथा स्वच्छन्दतन्त्र (भा० ६, प० १२, पृ० १२९) में भी इस श्लोक को उद्धृत किया है और—"योगिनं प्रति बलस्य स्पन्दात्मनः शाक्तवीर्यस्य विवर्धनादुत्तेजनात्" इस तरह से उसकी व्याख्या भी की है ।

  1. जग्धि और पान का लौकिक अर्थ मांसभक्षण और मदिरापान है ।

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८२ : विज्ञानभैरव परमानन्द की प्राप्ति के उपाय के रूप में इस स्थिति को अभिनवगुप्त ने भी स्वीकार किया है (ई० प्र० वि० वि०, भा० २, पृ० १७९) । अमृतानन्द ने योगिनीहृदयदीपिका (पृ० १९७) में परा पूजा की व्याख्या करते हुए, आन्तर पूर्णाहूति के प्रसंग में (पृ० २६५) और आनन्द की परिपूर्ण अवस्था की व्याख्या करते हुए (पृ० ३४०) इस श्लोक को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है ॥७१॥ [धारणा-४९] ¹गीतादिविषयास्वादासमसौख्यैकतात्मनः । योगिनस्तन्मयत्वेन मनोरूढेस्तदात्मता ॥७२॥ गीतं गायनम् ऊर्ध्वमध्याधोग्रामत्रयस्थस्वरावृत्त्या उच्चारणम्, आदिशब्देन स्पर्शरूपरसादिग्रहणम्, तेन शब्दस्पर्शरूपरसादिमधुरकोमलसुन्दरविषयाणां यदास्वादनं श्रवणेन्द्रियादिवृत्त्या ग्रहणम्, तस्माद् हेतोर्यद् असमम् अनुपमं स्वानुभवैकगम्यं सौख्यम्, तेन या एकता, तद्रूप आत्मा यस्य तस्य योगिनो मनोरूढेर्हेतोर्यत् तन्मयत्वं शाक्तस्पर्शा- वेशः शुभाशुभचिन्तादिविस्मरणम्, तेन हेतुना तदात्मता परब्रह्मस्वरूपता विकसति । अस्यां भावनायां वेद्यराशेर्विस्मरणाद् वेदकसत्तामात्रस्थितौ शान्तमेयमानादिव्याप्तौ महानन्दोदय इति निश्चितमिति भावः ॥७२॥ तार (तीव्र), मध्य और मन्द्र इन तीन ²ग्रामों में स्वरों के नियमित उच्चारण को गान कहते हैं। केवल कण्ठ से ही नहीं, बांसुरी, वीणा, मृदंग आदि के माध्यम से मधुर, सूक्ष्म स्वरों के आरोह-अवरोह क्रम को भी गान कहा जाता है। एक हलवाहा और विद्वान् दोनों समान रूप से इसमें आनन्द का अनुभव करते हैं। इसी तरह से नाना प्रकार के स्पर्श, रूप रस आदि विषयों में भी मूर्ख और विद्वान् व्यक्ति की समान अनुरक्ति रहती है। सभी व्यक्ति कान से गीत आदि के शब्दों को सुनकर, आंख से सुन्दर रूप को देखकर, जीभ से मधुर भोजन को चखकर, हाथ से कोमल वस्तु को छूकर और इसी तरह के अन्य लुभावने विषयों की भी प्रतीति होने पर गूंगे के गुड़ की तरह अपने अनुभव मात्र में भासित हो रहे अनोखे आनन्द में डूब जाते हैं। इस स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति का चित्त थोड़ी देर के लिये एकाग्र, स्थिर हो जाता है। अर्थात् थोड़ी देर के लिये वह भली-बुरी सब तरह की चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है। साधक योगी जब इस एकाग्र दशा में अपने चित्त को अभ्यास के द्वारा तन्मय बना लेता है, तब उसके चित्त की स्थिरता में तन्मयता के कारण अद्भुत शक्ति का संचार होता है और अन्ततः वह परब्रह्म स्वरूप हो जाता है। उस अवस्था में वेद्य विषय का विस्मरण हो जाता है और केवल वेदक (प्रमाता) की सत्ता बच रहती है, अर्थात् प्रमेय (विषय) और उसके

  1. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३), तन्त्रा० वि० (भाग २, आ० ३, पृ० २००, २१९), महा० परि० (पृ० १३), प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ९०) में यह श्लोक उद्धृत है।
  2. स्वरों के नियमित उच्चारण को ग्राम कहते हैं। तीव्र, मध्य, और मन्द्र के नाम से इसके तीन भेद होते हैं। हारमोनियम के तीन सप्तकों के रूप में इनको पहचाना जा सकता है।

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विज्ञानभैरव : ८३ ग्राहक प्रमाण उस समय निवृत्त हो जाते हैं। इस तरह से प्रमाता के अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होने से महान् आनन्द का आविर्भाव निश्चित रूप से हो जाता है। शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३) में यह श्लोक भी उद्धृत है। महेश्वरानन्द ने परिमल व्याख्या (पृ० १३) में महाप्रकाश की अभिव्यक्ति के साधन के रूप में इस धारणा का उल्लेख किया है, तथा इसी प्रसंग में— वीणावादनतत्त्वज्ञः स्वरशास्त्रविशारदः। तालज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्गं निगच्छति ॥ (३।११५) याज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक को भी उद्धृत किया है। अभिनवगुप्त ने तन्त्रा- लोक के— तथाहि मधुरे गीते स्पर्शे वा चन्दनादिके ॥ माध्यस्थ्यविगमे याऽसौ हृदये स्पन्दमानता । आनन्दशक्तिः सैवोक्ता•••• •••• •••• ••• ••••• ॥ (३।२०९-२१०) शब्दोऽपि मधुरो यस्माद् वीर्योपचयकारकः। तद्धि वीर्यं परं शुद्धं बिसिसृक्षात्मकं मतम् ॥ (३।२२९) इत्यादि श्लोकों में इसी विषय का प्रतिपादन किया है और टीकाकार जयरथ ने दोनों ही स्थलों में प्रस्तुत श्लोक को प्रमाण मानकर इस विषय की महत्ता का प्रतिपादन किया है। जयरथ ने इस प्रसंग में— ये ये भावा ह्लादिन इह दृश्याः सुभगसुन्दराकृतयः। तेषामनुभवकाले स्वस्थितिपरिपोषणं सतामर्चा ॥ प्रशस्तिभूतिपाद के इस श्लोक को भी उद्धृत किया है, जिसमें कि पूर्व श्लोक में उद्धृत योगिनीहृदयदीपिका के वचन के समान इस स्थिति को परा पूजा बताया गया है ॥७२॥ [ धारणा-५० ] ¹यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् । तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं ²संप्रवर्तते ॥७३॥ मनस्तुष्टिरिति मनसः प्रमोदः, न तु मनसः क्षोभः । यस्मिन् यस्मिन् वस्तुनि मनोहरे कामिनिवदनकमलादौ ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियविषयेषु मनः सज्जते, तत्रैव धारयेत् स्थिरं कुर्यात्, न तु मनोनियमनमकृत्वा नानाविधविकल्पक्षोभैः स्वात्मानं भोगा- रूढत्वदशाया अधः पातयेत् । मनसो धारणमपि कामादिक्षोभं प्रशमय्य, अत्र नितम्बिनी- सुन्दरकायमन्दिरे चिदात्मकः शिवोऽहमस्मि, ममैवेयं भङ्गिरिति यथाशक्ति कामादिक्षोभं स्वात्मनि प्रशमय्य, एकाग्रां निश्चलां मतिं विधाय कुर्यात् । अनया धारणया यत्र शुभे वाऽशुभे वा मनो लगति तत्र तत्र योगिनः परानन्दस्वरूपं संप्रवर्तते संप्रकाशते ॥७३॥ १. °प्:-ख० । २. संप्रकाशते-ख०, यो०, प्र० ।

  1. प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ९०) और योगिनी० दी० (पृ० ३३९) में यह मिलता है।

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८४ : विज्ञानभैरव मन की तुष्टि का तात्पर्य मन के आह्लाद में है, मन के क्षोभ में नहीं। मन पर नियं- त्रण न रखने पर नाना प्रकार के विकल्पों से क्षुब्ध होकर वह मन योगी को योगारूढ़ दशा से गिरा देता है। काम, क्रोध आदि के क्षोभ को शान्त करके ही योगी मन को स्थिर कर सकता है। इसलिये कामिनी के वदन-कमल सरीखी जिस-जिस मनोहर वस्तु में, पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों के विषयों में, मन रमता हो, उसको वहीं स्थिर रखने का अभ्यास करे कि कामिनी के मनोहर शरीर जैसे सभी विषयों में चित् ओर आनन्दमय शिवस्वरूप में मैं ही विद्यमान हूँ, यह सब मेरी हो विभूति है। इस तरह से काम आदि के क्षोभ को अपने स्वरूप में ही विलीन करके; अपनी बुद्धि को एकाग्र अर्थात् स्थिर करके योगी यह भावना करे कि मेरा अपना स्वरूप ही सर्वत्र स्पन्दित हो रहा है। साधारण व्यक्ति का भी शुभ अथवा अशुभ जिस किसी विषय में मन लग जाता है, तो उस समय अन्य सारी बातों को वह भूल जाता है। इसी स्थिति को केन्द्र-बिन्दु बना कर योगी जब भावना के अभ्यास से मन की एकाग्रता को बढ़ाता जाता है, तो उसकी परम आनन्दमय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठा हो जाती है। तात्पर्य यह है कि साधक को चाहिये कि अतिशय सुन्दर रूप को देखकर भी अपनी शक्ति के अनुसार मन को पवित्र रखे, उसको मलिन न होने दे। मुमुक्षु साधक की दृष्टि से यह बात कही गई है। मुक्त साधक में तो इस तरह का क्षोभ उठेगा ही नहीं, क्योंकि सात प्रकार की समाधि के अभ्यास से उसका मन सदा समाधिस्थ रहता है। उसमें इस तरह के क्षोभ की लहरियों के उठने का कोई अवसर नहीं है। समाधि और उसके सात भेदों का वर्णन आगे (श्लो० ११३) किया जायगा। जब साधक के मन का क्षोभ शान्त हो जाता है, तभी उसको परम पद की प्राप्ति होती है, इस बात को स्पन्दकारिका में भी कहा गया है— यदा क्षोभः प्रलीयेत तदा स्यात् परं पदम् । (श्लो० ९) इसी स्थिति से मिलती जुलती स्थितियों का वर्णन "कामक्रोध०" (श्लो० ९९) और "यत्र यत्र" (श्लो० ११३-११४) इत्यादि श्लोकों में भी किया गया है। इनकी व्याख्या वहीं की जायगी। स्वच्छन्दतन्त्र में भी— यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव चिन्तयेत् । चलित्वा यास्यते कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥ (४।३१३) यहाँ इसी स्थिति का वर्णन किया गया है। शिवदृष्टिकारक भी कहते हैं— शिवभावनयौषध्या बद्धे मनसि संसृतेः । काष्ठकुड्यादिषु क्षिप्ते रसवच्छ्वहेमता ॥ (७।४७-४८) अर्थात् जैसे अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियों में बाँधकर उनके रसों के प्रभाव से रासा- यिनक परिवर्तन के आधार पर पारा सोना बन जाता है, उसी भांति सभी पदार्थों में शिव की भावना रूपी औषधी से मन को बाँधकर, अर्थात् सब कुछ शिवमय ही है, इस भावना से Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ८५ मन का परिष्कार कर देने पर वह परिष्कृत मन काष्ठ (लकड़ी), कुड्य (भित्ति) आदि सभी पदार्थों में शिवता को ही देखने लगता है ॥७३॥ [ धारणा-५१ ] ¹अनागतायां निद्रायां १प्रणष्टे बाह्यगोचरे । २सावस्था मनसा गम्या परा देवी प्रकाशते ॥७४॥ निद्रायामनागतायामपि जागरदशायां चित्तवृत्तौ तमसा आच्छन्नायां सत्यां बाह्यगोचरे बाह्ये विषयपञ्चके प्रणष्टे विनष्टदर्शने या अवस्था निरावरणा मध्येऽस्ति, सा मनसा गम्या स्वसंविदवष्टम्भस्वीकार्या, तथा सति सैवावस्था परादेवीत्वेन प्रका- शते भाति ॥७४॥ अभी ठीक तरह से नींद नहीं लगी है, व्यक्ति जब जगा हुआ ही है, किन्तु नींद आने वाली है, उस स्थिति में उसकी चित्त की वृत्ति तमोगुण से आच्छन्न होने लगती है । तब बाहरी विषय उसकी आँखों (सभी ज्ञानेन्द्रियों) के सामने रहते हुए भी उसको दिखाई नहीं पड़ते । यह जाग्रत् अवस्था और स्वप्नावस्था के बीच की स्थिति है । इस अवस्था में बाह्य विषयों के रहते हुए भी उनका भान नहीं होता । साधक को अपनी संवित्ति (चेतना) में इसी स्थिति को लाने का अभ्यास करना चाहिये, जब कि बाह्य विषय उसके सामने रहते हुए भी न रहने के समान हो जाय । इससे साधक का मन निर्विकल्प हो जाता है, बाह्य विकल्पों की प्रतीति समाप्त हो जाती है, वह उनको देखता हुआ भी नहीं देखता । उक्त दोनों (निद्रा और जाग्रत्) अवस्थाओं के बीच की इस स्थिति को परावस्था कहा जाता है । इस परावस्था में साधक का परा देवीमय स्वरूप भासित होने लगता है । इस स्थिति का वर्णन ²योगवासिष्ठ में भी किया गया है— निद्रादौ जागरस्यान्ते यो भाव उपजायते । तं भावं भावयन् साक्षादक्षयानन्दमश्नुते ॥ यहाँ केवल शब्दों का ही अन्तर है । अर्थ दोनों श्लोकों का एक ही है । विज्ञानभैरव के प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत कर क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय (पृ० ५६) में तथा महेश्वरानन्द ने परिमल (पृ० १८७) में परा देवी के स्वरूप का भली-भाँति विश्लेषण किया है ॥७४॥ [ धारणा-५२ ] ³तेजसा सूर्यदीपादेराकाशे शबलीकृते । दृष्टिं३निवेश्या तत्रैव स्वात्मरूपं प्रकाशते ॥७५॥ १. विनष्टे-स्प०, म० । २. या०-म० । ३. ०ष्टि निवेश्य-ने० ।

  1. स्पन्दनिर्णय (पृ० ५६) और महार्थ० परि० (पृ० १८७) में उद्धृत है ।
  2. शिवोपाध्याय ने इस श्लोक को वासिष्ठ दर्शन का बताया है । योगवासिष्ठ में यह उप- लब्ध नहीं है ।
  3. नेत्रतन्त्र (भा० १, पृ० २००) की उद्योत टीका में यह उद्धृत है ।