विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)
Vishnudharmottara Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा
स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)
वि० ध०
॥३॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| १७ | मन्त्रब्राह्मणकल्पपुराणकथनपुरस्सरं नाटकनाटिकाप्रकरणप्रकरणीसमवकारोहामृगादिदशरूपकलक्षणकथनपुरस्सरं नायकानाथिकाभेदशृङ्गारादिरसवर्णनम् .... | ३१६ | १ |
| १८ | गीतकयोः कण्ठशिरःस्थानैर्यथा मन्द्रादिस्वरोत्पत्तिः, ग्रामत्रयं, सप्तस्वराः, एकविंशतिसूर्च्छनाः, एकोनपञ्चाशत्तानाः, वृत्तित्रयम्, शृङ्गारादिनवरसानां ग्रामविभागः, दशलक्षणा जातयश्चतारोह्यलंकाराः, अपरान्तकादिगीतानि चेतिगीतलक्षणवर्णनम् .... | ३१७ | १ |
| १९ | ततः सुप्रीतादिभेदेन चतुर्विधाताद्यस्वरतालचित्रादिद्विविधक्रमनिपुणानवदादिदणपुरस्सरं गायकवादिकादिसियातितमदर्शनम् .... | ” | ” |
| २० | नाट्यनृत्तनृत्यलास्यमण्डपदिग्दर्शनपूर्वकं देवदानवनृपतरुद्रुतमृगजीविषु विविधगतिगोदिलाक्षणतद्गुरुपञ्चाशल्लक्षणिकाभिनयकटिपार्दाद्याश्रितरेचकचारिमहागीतनामण्डलगाहारकरणावृत्तनृत्यादिवर्णनम् .... | ३१८ | १ |
| २१ | शय्यासनस्थानवर्णनम् .... | ३२५ | २ |
| २२ | स्वरस्तन्यदालक्तकान्तमभालसाह्यापञ्चाशत्स्थानकटाक्षदिदर्शनम् | ” | ” |
| २३ | वैष्णवसमपादादिभेदेन पुंस्थानकादिवर्णनम् .... | ३२६ | १ |
| २४ | अङ्गवर्णनम् .... | ” | ” |
| २५ | रसहास्यतम्प्रोगयुक्तकर्मतारकाकर्मनयनाचोकिनादिनर्त्तन दृष्टिकर्मतद्वृ- |
अनु०
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ङ्गसूचकनासिकाकर्मजिह्वाधरोष्ठमर्द्दनदन्तकर्मगण्डपिण्डकर्मवर्णनम् | ३१९ | २ | |
| २६ | अर्धयुतसंतुतादिभेदेनपुरस्सरं तूर्ये करक्रियाम्, करकर्मलक्षणादि च | ३०१ | २ |
| २७ | वाचिकादिशौर्यकासिकोवकभेदेन चतुःप्रकाराभिनयमस्तकाङ्गिङ्गङ्गचनाङ्गुलीवदनादिबोधकप्रणवर्णनम् .... | ३२२ | २ |
| २८ | इन्द्रियार्थाभिनयप्रकाराः, दृष्टानिष्ठमध्यमभेदेन गात्रप्रवाङतादिना चेष्टानिष्ठ पणाम् प्रभातमागधगीतप्रबोधादिवर्तुवनस्वर्गजलशयादिङ्कनश्चयःअभिनयादिवर्णनम् .... | ३२८ | १ |
| २९ | जादूकर्दलक्षणंनाविकोक्तुङ्गमत्स्युडुमञ्चानांपर्वागौत्यूक्यादिषु नाबुकदीसमानादिनानागतिप्रचारवर्णनम् .... | ३३३ | २ |
| ३० | शृङ्गादिवन्नुवप्रक्रमकथनक्रमङ्गेन शृङ्गागढ्डास्यस्य रौद्रार्कणणस्य वीगतुङ्गम्य वैभन्माहृतनस्यश्रीयश्चिमिश्रिभाव नतहचनावर्णनभेदद्वयज्ञनादिदिग्दर्शनम् .... | ३२६ | १ |
| ३१ | हासनर्तकोक्तवेकापञ्चाशद्भावनिदिपणम् .... | ” | ” |
| ३२ | कर्णयुक्ताने विविधैर्वक्तव्यस्वभावौचित्यात्तत्तद्वस्तुभेदेनपुंभगवचूननिकोदिदन्तसमुदावर्णनम् .... | ३२७ | २ |
| ३३ | मन्त्र प्रज्ञानलक्षणप्रशंसा नवरोपंच्यदेवताविष्वादिदुतनुबलातुरवाचनान् | ३२८ | २ |
| ३४ | नवरंजनितचतुरङ्गमंत्रगद्यसर्वदुःखह्रणम् | ३३२ | २ |
॥१३॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः | अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३५ | तपस्यता नारायेणाप्सरोदर्शमंगाय चित्रकर्मणाऽऽदर्शं निर्माय विश्वकर्मणे तत्कर्मांशार्पणं, तन्नानुसारं चित्रेपि त्रैलोक्यानुकर्षण-दृष्टिभावांगोपांगकरणविन्यासादिकरणम्, हंसादिपञ्चपुरुषलक्षणानि च | ३३१ | २ | ४३ | चित्रे शृंगारादिनवरसमदर्शनं, देवालयनृपसभामारोस्तद्मशं, निधिविद्याधरगुह्यकदिमंगलिहार्याचित्राणां गृहेषु यत्रालोहेवने स्वरंगरेनामसगृहे चित्रलेखनेनपिचित्रदंशेषगुणवर्णनम, चित्रसूत्रसमाप्तिः | ३३७ | १ |
| ३६ | चित्रसूत्रवर्णने सूर्यमवयवममान तदनुसारेण मधुकंसभाल्मल्यादिवर्णनम् | ३३२ | १ | ४४ | ब्रह्मविष्णुशंकरादिचित्रनिर्माणनियमवर्णनम् | ” | २ |
| ३७ | चित्रकर्मण्यंगप्रत्यंगमानेन स्त्रीणां निर्माणम् | ” | २ | ४५ | विष्णुप्रजाभ्योऽध्यक्षनिर्माणवर्णनम् | ३३८ | १ |
| ३८ | चित्रकर्मणि देवतानांनेत्राद्यंगवर्णनम् | ” | ” | ४६ | अष्टपस्यापि देवस्य विक्रितिवशात्साङ्गाता, तत्र च ब्रह्मणः संह्तुकं चतुर्वक्तादिभििरूपणम् | ” | २ |
| ३९ | नानावर्णोत्पत्ताः शुभाकारविहारा ऋजुवागतासाचीकृतदेहत्वोनेकोपवेधसहिताश्चित्रकर्मणो नव भेदाः ( वर्ण ) | ३३३ | १ | ४७ | विष्णुरूपनिर्माणॆ चतुर्बाहूनाम्बांतुरूपत्वं, चतुर्वक्राणामञ्च बलक्षानेश्वर्यशक्तिरूपता, वलस्यापि वासुदेवसङ्कर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धा, वासुदेवस्य प्रमिक्तवे सूर्यचन्द्ररूपं काद्युद्गम्, संकर्षणदिरूपाणामपि मुसलाङ्गिलाद्यायुधतादिवर्णनम् | ” | ” |
| ४० | चित्रकर्मभूमिसंस्कारकथनपूर्वकं बहुसमयस्थायिरंग निर्माणं, कनकजातादिगद्रव्यकथनञ्च | ३३४ | २ | ४८ | महादेवस्य सद्योजातवामदेवादिभेदेन पञ्चरूपाणि प्रतिवक्रे सोमसूर्याग्निनेत्रत्रयत्वम्, सूक्ष्मादितत्त्वानि, विशुद्धज्ञानवैराग्यादीनामादर्शदिक्पती | ३३९ | १ |
| ४१ | सत्यवैणिकादिभेदेन सलक्षणं चित्रचातुर्विध्यम्, पत्राकृतिक्रान्तिविन्दुवर्तनादिचित्रदोषस्थानप्रमानमाणादिचित्रभूषणगुणासनादिचित्रनाशहेतुभूमादिवर्णनञ्च | ३३६ | १ | ४९ | नासत्यरूपनिर्माणम्.... | ” | २ |
| ४२ | चित्रे देवनृपपिंगोश्वदैत्यदानवादीनां सायुधानां सपरिच्छदानां निर्माणदेशविशेषावुरुवासनशयनयानवेशस्तित्सागरावरोहणशैलशिखरपक्षीभूमण्डलञ्चक्रप्रम्हादीनिधिसचन्द्रनक्षत्रराजिसन्ध्यादिनिर्माणम् | ” | २ | ५० | दक्षप्रजापतिनिर्माणं सहेतुकम् .... | ” | ” |
वि० ध० ॥ १४ ॥ अनु० ॥ १४ ॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ५१ | सहैके यमरूपनिरूपणं तस्य संकर्षणरूपता, तद्वाहनमहिषस्य मोह-रूपत्वं धूमोर्णारूपत्वं चित्रगुप्तस्वरूपकथनञ्चादि च .... | ३४० | १ |
| ५२ | सप्तशक्तिकायुधसवाहनवरुणस्वरूपं, तद्दक्षिणभागे मकरवाहनग-ङ्गास्वरूपम्, वामभागे सचामरकूर्मस्थयमुनास्वरूपम्, वरुणस्य प्रद्युम्नता तद्भार्याया रतिरूपतादिकथनञ्च .... | ” | २ |
| ५३ | धनदस्वरूपनिर्माणम्, तस्य वामभागे ऋद्धिः, शंखपद्मनिध्यादि तत्पार्श्वे, .... | ३४१ | १ |
| ५४ | गरुडरूपनिर्माणम् ... | ” | ” |
| ५५ | गौरीशप्रतिकृतिरचनम् ... | ” | २ |
| ५६ | स्वाहादिसहितोग्निप्रतिमार्निर्माणं चतुर्वेदषडङ्गयुक्ताग्निविचित्रसहितम् ... | ३४२ | १ |
| ५७ | विरूपाक्षरूपनिर्माणं सनिदृत्यादि .... | ” | ” |
| ५८ | आकाशवर्णस्य वायोः सप्तशक्तिकस्य निर्माणम् .... | ” | ” |
| ५९ | भैरवमहाकालयोः स्वरूपनिर्माणप्रकारः .... | ” | ” |
| ६० | एकवक्त्रद्विबाहुगदाचक्रधगविष्णुरूपमपरम् .... | ” | २ |
| ६१ | शुक्लं वर्णं चतुर्मुखं जगत्प्रसवाधिपं पञ्चहस्ततादिभूवर्णस्वरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ६२ | नीलोत्पलश्यामवर्णयुतमाकाशस्वरूपम् .... | ” | ” |
| ६३ | असिताभाग्निरूपयोगेश्वरः .... | ” | ” |
| ६४ | ध्यातुः सर्वार्थसाधकं सरस्वतरूपनिर्माणम् .... | ३४२ | २ |
| ६५ | अनन्त ( शेष ) रूपनिरूपणम् .... | ३४३ | १ |
| ६६ | जयविजयाख्यदत्त्वपराजितादेवीसहितस्य महादेवचम्बूरोंनिर्माणम् | ” | ” |
| ६७ | प्रकारद्वयेन पिंगलातिपिंगलगणयुक्तस्य रेवन्तादिचतुःपुत्रैश्च तत्प्रभिः पत्नीभिश्च सहितस्य रवे रूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ६८ | सितचतुस्तुरङ्गरथस्थ कान्तितोषाभ्यां भार्याभ्यां सहितस्यानिवन्ध्याष्टा-विंशतिभार्याभिर्वा सहितस्य चन्द्रमसो निर्माणम् .... | ” | २ |
| ६९ | सायुधसवाहनभौमादिग्रहानेर्माणम् .... | ३४४ | १ |
| ७० | वर्तमानभविष्यन्मनुरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ७१ | स्कन्दविशाखमुखरुद्रकालोग्रिगणेशविश्वकर्मरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ७२ | धरादिसुतानां विष्ण्वब्जरूपादीनाञ्च रूपवर्णनम् .... | ” | ” |
| ७३ | कश्यपादिसप्तऋतुकाद्यादीनां ध्रुवागस्त्यभृगुप्रभृद्यनेकैदेवानां निर्माणम् .... | ” | ” |
| ७४ | लिङ्गरूपनिर्माणम् .... | ३४६ | १ |
| ७५ | व्योमरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ७६ | वदनेवृक्षमधु नगरानायपणरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ७७ | कीर्त्यादिचतुर्दशभार्यायुतधर्मरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ७८ | प्रकारत्रयेण नृसिंहमूर्तिनिर्माणम् .... | ” | ” |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|---|---|
| ७९ | अनैश्वर्यरूपिहिरण्याक्षशिरश्छेदोद्यतस्य धरणीद्विसनाथस्यैश्वर्यरूप-नृवराहस्य निर्माणम् .... | ३४७ | १ |
| ८० | हयग्रीवरूपनिर्माणम् .... | " | " |
| ८१ | शेषशायिरूपनिर्माणम् .... | " | २ |
| ८२ | विष्णोः पार्श्वे पृथक् च लक्ष्मीचित्रनिर्माणकारः | " | " |
| ८३ | हरिविश्वरूपवर्णनम् .... | " | " |
| ८४ | वैकुण्ठरूपनिर्माणम् .... | ३४८ | १ |
| ८५ | वासुदेवरूपनिर्मापणे सायुधसप्तर्षिसहितिकस्य विष्णोश्चतुर्मुखादिभेदेन रूपनिर्माणं तथा भार्गवरामादशस्थिरामादि (देवोद्यान) मूर्ति-निर्माणम् .... | " | २ |
| ८६ | हिमवदादिप्रभासादृदर्शनं तत्र च सर्वतोभद्र+केशवादिमूर्त्ति-स्थापनम् .... | ३५० | १ |
| ८७ | मण्डपद्वारशिखरादिषु क्रमासादे पूर्वाद्रिक्रमेण वासुदेवसङ्कर्षणार्दि-मूर्त्तिस्थापनम् .... | ३५२ | २ |
| ८८ | चतुःषष्टिपदे देवायतने (सामान्यप्रासादे) द्वारप्रतिमापिण्डिका-कवित्वसुधामंतरणीमदिधारिमितिवसुधाक्षरसोपानादिप्रमाणवर्णनम् | ३५४ | १ |
| ८९ | देवालयार्थं दारुपरीक्षणम् .... | " | " |
| ९० | दारुपरीक्षोक्तविधिंविधच्छेदुले दण्डपुरोहिताभ्यां देवाचैर्हिशिलार्पणक्षणं शिलानामुत्तममध्यमनिकृष्टतादिभेदेन तासां फलानि पाकेन तासां दार्ढ्यकरणञ्च .... | ३५५ | १ |
| ९१ | ब्राह्मणादिजातिभेदेन मृद्मानीय ब्राह्मणादिभिर्ब्रह्मतालादार्थामिष्टका-करणम् .... | " | २ |
| ९२ | बिन्दुकर्कटपिथाश्चाश्रमलीपपुष्पादिभिर्द्रव्यैश्चलेपकप्रकारणाः .... | ३५६ | १ |
| ९३ | सत्ययुगे देवानां प्रत्यक्षपूजनं त्रेताद्वापाययोः प्रत्यक्षपूजा प्रतिमासु च, तत्रापि त्रेतायुगे गृहे द्वापर चारण्ये कलौ च देवायतननिर्मितिर्नरेषु समारब्धा, भूमिदानं विधायैव देवायतनप्रतिष्ठा कार्या, देवालय-योग्यभूमिः .... | " | " |
| ९४ | ब्राह्मणादिपङ्क्तिक्रोर्मात् मृशोधननपुरस्सरं शल्योद्धारादि विधाय श्री-विष्णुवाराहुदेवाद्विपूजनं कार्यम्, ऐशान्यां शिलां विन्यस्य प्राग्दक्षिणयेन पुनस्तन्न्यासं समाचरेत् । तद्दहेव सूत्रन्यासनन्द्रादिशिलाचने विधाय चित्रकर्म विधेयं विष्ण्वादित्रासादे गरुडाद्रेक्षाभ्यान्मपि कर्त्तव्यानि... | ३५७ | १ |
| ९५ | वास्तुपुरुषे शल्यज्ञानं, शल्यं विहाय वास्तुदेवायतनं कर्त्तव्यम्, देवा-यतनदक्षिणादिभागेषु देवतार्कोशभवनादि, धनशल्ये लब्धे वृद्धिः | ३५८ | १ |
| ९६ | वैश्य, वालिदुगोर्वाञ्च्चिन्यादिक्षेत्रेषु संवत्सरादिषु वर्षेषु वसन्तादृऋतुषु |
| वि० ध० | अनु० |
|---|---|
| ॥१५॥ | ॥१५॥ |
| अध्यायः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मासादिमासेषु सूर्यादिवारेषु प्रतिपदादितिथिषु शकुनादिकरणेषु मेषादित्येषु सूर्यादिहोरासु प्रतिष्ठाफलानि .... | ३६१ | १ | १०७ | श्रीवासुदेवविवोधनमन्त्राः .... | ३७१ | २ | |
| ९७ | प्रतिष्ठाविधिकथने यजमानस्त्वृत्विग्भिः सह दीक्षाग्रहणं स्वस्तिवाचनपूर्वकं प्रतिसरकंकणबन्धनमासनमर्यादित्यागहविष्यप्राशनादिनियमवर्णनम् .... | ३६१ | २ | १०८ | व्यक्ताव्यक्तमूर्तीष्णोध्यानंसौख्यार्थ भोगमोक्षहेतवे च मूर्तिकल्पनावाहनं .... | ” | ” |
| ९८ | विधिर्बलिंम तामासोऽधिवासनस्थण्डिलपश्चिमादिभागेषु कल्पकादिवेशपुरस्सरं कलशस्थापनांतरीगणन्यासध्वजबितानघटिप्रतीहारस्थापनघटादर्पणादिना सुसजीकरणं रक्षोध्नमंत्रैश्चेश्वररक्षकरणञ्च | ३६२ | १ | १०९ | होमविधिवर्णनम् .... | ३७२ | १ |
| ९९ | पञ्चगव्यसंस्कारः .... | ३६३ | १ | ११० | श्रीभगवद्विबोधनमन्त्रवर्णनम् .... | ” | २ |
| १०० | अर्चाशौचादिविवर्णनम् .... | ” | २ | १११ | बृहत्तनपद्मव्योमन्त्रमाहात्म्यवर्णनम् .... | ३७३ | १ |
| १०१ | अधिवासनवर्णनम् .... | ” | ” | ११२ | गन्धानुलेपनताम्बूलनिवेदनदूतिं(भांगदान)-वर्णनम् .... | ” | २ |
| १०२ | समन्त्रतोकै जीवाधोधाववासनाविधिर्वर्णनम् ... | ३६४ | १ | ११३ | मधुपर्कनिवेदनम् .... | ” | ” |
| १०३ | नास्त्यादिदेवतानामावाहनानि .... | ” | २ | ११४ | श्रीविष्णोर्वस्त्राणिनिवेदनपुरस्सरं भक्ष्यभोज्यादि-(हव्या)-निवेदनम् | ३७४ | १ |
| १०४ | ब्रह्मादिदेवतानामावाहनाद्यर्ध्याद धूपोदियमन्त्रकथनम् | ” | ” | ११५ | शङ्करगीताधिकविधिना सास्वेतेज्यावर्णनम् .... | ” | ” |
| १०५ | लोकपालशूलनन्दीश्वराद्यावाहनम् .... | ३६७ | ११६ | तोरणोद्धारादिविधिवर्णनम् .... | ” | ” | |
| १०६ | श्रीविष्णुव्येवकतावतारिदेवानां युधिष्ठिरादिपाण्डवानां याज्ञसेनीसीतादेवकीयशोदारुक्मिणीप्रभृतीनामावाहनादिवर्णनम् .... | ३६८ | २ | ११७ | तत्तद्देवतातिथिषु प्रथमादिपञ्चमादिवसपर्यन्तं विनायकग्रहर्र्कशेनागममथब्राह्मणपूजनानि षष्ठेऽह्नि च बृहत्स्नपनं कर्तव्यम्। तत्र सर्वेषां नागार्दिकाणां गक्षा सह महता वाद्यघोषेण नृत्यगीर्तिादिमङ्गलैस्तुतिभिक्षातृग्ममं निर्मित्तदर्शनञ्च .... | ” | २ |
| ११८ | धर्मार्थकाममोक्षादिकमानानुरागेणार्तिनरुद्धमंकर्पणप्रद्युम्नवासुदेवाद्यर्चनानि .... | ३७५ | १ |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ११९ | समुद्रयात्रानुष्ठानविचारम्भादिकामानुसारं मत्स्यवराहहयग्रीवादिपूजनम् | ३७५ | २ |
| १२० | हयग्रीवादिदेवानां पूजाकालनिर्णयः | " | " |
| १२१ | पुष्करप्रयागकालञ्जरादितीर्थेषु ब्रह्मयोगिशयिमहादेवशतकलादिव्रतपूजनानियमः | ३७६ | १ |
| १२२ | विष्णोर्वासुदेवादीनामेषु मोक्षादिद्वादशशक्तितर्पणम् | " | " |
| १२३ | पूर्वादिदिक्सरलेन क्षमादिकामपरत्वेन च विष्णोश्चक्रादीनामस्मरणकीर्तनादिनाभीष्टसिद्धिः | " | " |
| १२४ | चैत्रादिमासपरत्वेन कृत्तिकादिनक्षत्रपरत्वेन च विष्ण्वादीनामस्मरणफलानि | ३७७ | १ |
| १२५ | अर्जुनावर्तेन पुष्करादिक्षेत्रेषु पुण्डरीकाक्षादिपञ्चपञ्चाशन्नामकीर्तनादिना पापक्षयपुरस्सरं महत्फलम् | " | " |
| १२६ | अष्टपत्रकमलकर्णिकायां ब्रह्मपूजनं पूर्वादिपत्रेषु च ऋगादिपूजनविधानम् | ३७८ | १ |
| १२७ | चैत्रशुक्लप्रतिपदादौ ब्रह्मादित्रिदेवपूजनविधानम् | " | " |
| १२८ | चैत्रशुक्लप्रतिपदि स्थले जले वा विष्णुपूजनेन सर्वपापक्षयमोक्षप्राप्तिः | " | २ |
| १२९ | अशीतिभागात्मकप्रकृतिमण्डलनिर्माणवार्तासुष्ठुत्वं, चैत्रशुक्लप्रतिपदि वेधोलक्ष्म्याश्च पूजनादिनियमाः | ३७९ | २ |
| १३० | नामत्रयपूजाचक्रव्रतप्रतिपादनम् | ३७८ | २ |
| १३१ | चैत्रशुक्लद्वितीयायां बालेन्दुव्रतवर्णनम् | ३७९ | १ |
| १३२ | अङ्गन्यासनिहतिप्रान्तम् | " | " |
| १३३ | ज्येष्ठशुक्लतृतीयायां त्रिविक्रमव्रतम् | " | " |
| १३४ | अस्यामेव तिथौ द्वितीयं त्रिविक्रमव्रतम् | " | " |
| १३५ | अस्यामेव तिथौ तृतीयं त्रिविक्रमव्रतम् | ३८० | २ |
| १३६ | वार्षिकश्चन्द्रेन्द्रस्य विष्णोरुक्त- ज्येष्ठशुक्लतृतीयायां तिथौ व्रताचरणपूर्वकमुक्तेनारत्नलोके यथेष्टसुखप्राप्तिः | " | " |
| १३७ | वह्निसूर्यसोमवरुणारुणविष्ण्वेषु श्रुतरश्मिव्रतवर्णनम् | " | " |
| १३८ | इन्द्रयमवरुणकुबेरचतुःसीतावतवर्णनम् | ३८१ | १ |
| १३९ | विष्णुभूमिमनोबलचतुर्भूतव्रतप्रतिधानम् | " | " |
| १४० | बलज्ञानैश्वर्यशक्तिरुचिमूर्तित्रितयवर्णनम् | " | " |
| १४१ | पञ्चमचतुर्भूतकल्पे वेदव्रतकथनम् | " | २ |
| १४२ | चैत्रशुक्लचतुर्थ्या वासुदेवस्य वैशाखे सङ्कर्षणस्य ज्येष्ठे प्रद्युम्नस्याप- | " | २ |
वि० ध० | ॥ १६ ॥ | अनु०
[भाग १]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| — | ठेऽनिरुद्धस्य चार्चनं विधाय योग्यब्राह्मणाय तत्तद्व्रतोक्तदक्षिणादिदानम् .... | ३८१ | २ |
| १४३ | सप्तमचतुर्मूर्त्तिकल्पेनेोद्विव्रतवर्णनम् .... | ३८२ | १ |
| १४४ | अष्टमचतुर्मूर्त्तिकल्पे चतुर्युगसूतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १४५ | श्रावणादिचतुर्मासेषु विष्णुरूपिचतुःसागरोपचरणंकुम्भपूजनहवनादिविधानम् .... | ” | ” |
| १४६ | वासुदेवादिचतुर्मूर्त्तिण्डमकरादिरुचिसहितस्य पूजनम् .... | ” | २ |
| १४७ | ईशानाद्यैविश्वरूपश्चाक्षुषरूपाणि निर्माय चैत्रशुक्लादिप्रतिपदि भौमनादेयताम्रकाजलस्नानादिपद्मदित्यल्यवबूद्यहोमादिकमारेण व्रतवर्णनम् .... | ३८३ | १ |
| १४८ | शंखचक्रगदापद्मानां वासुदेवानिरुद्धादिचतुर्द्दण्डालमकानां श्रावणादिचतुर्मासेषु वह्निस्नानभक्तभोजनादिनियमपुरस्सरमर्चनम् .... | ” | ” |
| १४९ | वासन्तिकविषुवद्दिने त्रिरात्रोपवासपुरस्सरं यथाशक्ति वासुदेवाचंनं विधाय पुरो मासतूयं च नित्यार्चनफलाहारविधिं कृत्वा वामरोक्तविषुवद्दिने व्रतं समापयेत् .... | ” | ” |
| १५० | पूर्वोक्त ( १४९ अध्यायोक्त ) व्रते विष्णोः स्यागेऽनंतपूजनं विधाय द्वितीयादिषु महीगंगनेवद्यप्रामेकत्रवर्णनं व्रतमाचरेच्चंडनरूपपुष्पादिव्याभाः .... | ” | ” |
[भाग २]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| १५१ | नरनारायणहंसादिरूपचतुर्मूर्त्तिव्रतवर्णनम्, समाप्तं चतुर्मूर्त्तितत्त्वम् ॥<br>अथ पंचमूर्त्तितत्त्वम् | ३८३ | २ |
| १५२ | चैत्रशुक्लपंचम्यां पृथिव्यादिपंचभूतात्मकस्य विष्णोः शुक्लादिवर्णमण्डलेषु तत्तद्वर्णगन्धपुष्पादिभिरर्चनम् .... | ” | ” |
| १५३ | बन्धूकोदधिषुपवित्रस्तरपरिवेस्तरनदीनां सफललतावाविधिवर्णनम् | ” | ” |
| १५४ | सावित्रीलक्ष्मीव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १५५ | पंचमूर्त्तिव्रते शंखचक्रगदापद्मपूजनहवनादि .... | ३८४ | १ |
| १५६ | वसतऋतुषु मधुमाधवादियुग्मनामकपण्मूर्त्तितत्त्ववर्णनम् .... | ” | २ |
| १५७ | सप्तमूर्त्तिव्रते सुभास्त्रादिदीप्तव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १५८ | चैत्रमासादारभ्य कृष्णपक्षे प्रतिदिनं रुक्मभौमादित्यालत्र नवव्रतन्म् | ३८५ | १ |
| १५९ | चैत्रशुक्लपक्षादारभ्य प्रत्यहं सप्ताहपर्यन्तं जम्बूद्वीपादिममद्वीपवर्णनम् | ” | ” |
| १६० | चैत्रशुक्लपक्षादारभ्य लवणादिसप्तसमुद्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६१ | महेंद्रादिसप्तकुलपर्वतपूजनविधिवानम् .... | ” | ” |
| १६२ | मन्वन्त्यादिसप्तमलोकव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६३ | ह्रादिन्यादिनदीव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६४ | नागसप्तव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६५ | मोक्षप्राप्तिफलदं गताश्वव्रतकथनम् .... | ” | ३८६ |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १६६ | चैत्रशुक्लसप्तम्यां मरुत्प्लावितव्रतम् .... | ३८६ | १ | १८२ | मार्गशुक्लद्वादश्यां धातादित्यादिद्वादशादित्यव्रतवर्णनम् .... | ३८९ | २ |
| १६७ | ” मरुद्धूतेऽग्नौ गोपतिपूजनम्, तत्र चाष्टदलकमलकर्णिकायां विभावसुं संस्थाप्यर्तुकारिकादिगन्धवैिर्धूपजनैर्विधानम् .... | ” | २ | १८३ | वैशाखत्रयोदश्यां कामदेवव्रतम्.... | ” | ” |
| १६८ | वसन्ताद्यृतुनुसारं सर्षपार्चनार्चादिदेववर्णनम् .... | ३८७ | १ | १८४ | फाल्गुनशुक्लत्रयोदशीतो दम्पत्यर्च्चनं शुक्लत्रयोदश्यां धनव्रतम् .... | ” | २ |
| १६९ | अष्टदलकमले भास्करस्य तदंगदेवांनाञ्च पूजनम् .... | ” | २ | १८५ | ज्येष्ठशुक्लपक्षत्रयोदश्यां वायुलोंकप्रदं वापिकव्रतम् .... | ” | ” |
| १७० | रक्तसप्तमीव्रतवर्णनप्रसंगेन सांगदेवभास्करपूजनम् .... | ” | ” | १८६ | पौषमासिककृष्णचतुर्दशीषु वत्सरपर्यन्तं विरुपाक्षव्रतस्य कृष्णचतुर्दशीभ्यां यमव्रतम् .... | ” | ” |
| १७१ | संवत्सरपर्यन्तमुक्तविधिना सप्तमीव्रतकरणेन सूर्यप्रसादात्सतवार्थाभिष्टिसिद्धिः | ३८८ | १ | १८७ | फाल्गुनशुक्लपक्षचतुर्दश्यां शिवव्रतम् .... | ” | ” |
| १७२ | ब्रह्मसूर्यदिग्निभपालपुरस्सरस्याम्यश्वसुपूजामाहात्म्यम् .... | ” | ” | १८८ | चैत्रशुक्लपक्षादारभ्य वर्षपर्यन्तं प्रतिपञ्चदशीषु श्राद्धपापिनुव्रतम् | ३९० | १ |
| १७३ | सोमाष्टमी महेश्वरव्रतपूजोपवासस्नानप्रदानिकरणफलम् .... | ” | ” | १८९ | चैत्रकृष्णपञ्चदशीतो वर्षपर्यन्तं वह्निहुतदहनवानादिक्स .... | ” | ” |
| १७४ | हिमवदादिपर्वतेशशैलानां भद्रादिनववर्षाणां नवम्यां पूजनम् .... | ” | २ | १९० | अमावास्यायां चन्द्रसूर्यव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७५ | भद्रकालीव्रतपूजाविधानम् .... | ” | ” | १९१ | कार्त्तिकरात्रौस्थितिप्रतिमासं कृत्तिकागोहिण्यादिनक्षत्रयुतचन्द्रमःपूजनाद्विवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७६ | दशम्यां क्रत्यादिवेधदेवव्रतवर्णनं समाहात्म्यम् .... | ” | ” | १९२ | कात्तिकपूर्णिमायां षोडशदले पद्मे कर्णिकायां चन्द्रस्य केसरेष्वष्टाविंशतिनक्षत्राणां पत्रेषु च तिथिनिदेवतानां सचन्द्रिकाणां पूजनविधिः | ” | २ |
| १७७ | ” अङ्गिरोव्रतवर्णनम् .... | ” | ” | १९३ | प्रौष्ठपदपूर्णिमायां वरुणव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७८ | धर्मव्रतवर्णनम् .... | ” | ” | १९४ | आश्वयुक्पूर्णिमायां शक्रव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७९ | मार्गशीर्षमासमारभ्याऽसंवत्सरमेकादश्यां रुद्रमहद्रुद्रव्रतवर्णनम् .... | ३८९ | १ | १९५ | आश्वयुक्पूर्णिमायां शक्रव्रतम् .... | ” | ” |
| १८० | मार्गकृष्णद्वादशीषु संवत्सरपर्यन्तं शुचिव्रतवर्णनम् .... | ” | ” | ||||
| १८१ | मार्गशीर्षद्वादश्यां वत्सरपर्यन्तं साध्यव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
वि० ध० | अनु०
॥ १७ ॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| १९७ | ब्रह्मकूर्च-(पञ्चगव्य) वर्णनम् .... .... .... | ३९० | २ |
| १९८ | पौर्णमामावास्यासु द्वादशवर्षपर्यन्तं महाव्रतम् .... | ,, | ,, |
| १९९ | तिर्यग्योनिसंरूढदशजन्मनि निवारकं मेषादिसंक्रान्तिषु पशुरामकृष्णादिव्रतम् .... .... .... .... | ,, | ,, |
| २०० | इष्टप्राप्त्यादिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | २ |
| २०१ | सत्कुलादिमित्रव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०२ | रूपावाप्तिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०३ | इह लावण्यमदभन्ते च स्वर्गाप्तिकरं व्रतम् .... .... | ३९२ | १ |
| २०४ | सौभाग्यविधायकव्रतम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०५ | आश्वयुजप्रतिपद्मारभ्यास्यपर्यन्तमारोग्यसम्पदादिषड्विधव्रतविधानम् | ,, | ,, |
| २०६ | ज्ञानबुद्धिविवर्द्धनं वैशाखमासवतम् .... .... | ,, | ,, |
| २०७ | विद्याप्राप्तिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | २ |
| २०८ | शीलप्राप्तिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०९ | धर्मप्राप्तिकरं श्रावणमासवतम् .... .... | ,, | ,, |
| २१० | धनप्राप्तिकरं सङ्कर्षणव्रतम् .... .... | ,, | ,, |
| २११ | लक्ष्मीप्राप्तिकरं ज्येष्ठमासवतम् .... .... | ,, | ,, |
| २१२ | भोगावाप्तिकमाघाद्यष्टमासवतम् .... .... | ३९३ | १ |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| २१३ | जयप्राप्तिविधायकं कार्तिकमासवतम् .... .... | ३९३ | २ |
| २१४ | कार्तिकपौर्णमासीतः श्रावणीपर्यन्तं प्रतिपद्दिनेषुजननव्रतविधानम् .... | ,, | ,, |
| २१५ | फाल्गुन्याद्याश्चतस्रऋक्षैरेकादशीषु विविक्तकृष्णेकशयनादिव्रतकथनादिह लोके श्रेष्ठाप्तिमृतिकालसमये च श्रीकृष्णस्मरणमाप्नोति जनः .... | ||
| २१६ | फाल्गुनपूर्णिमायां लक्ष्मीनारायणाविन्दुगोरात्रिरूपिणावभ्यर्च्य चैत्रवैशा-खज्येष्ठमासेषु चैतेयथासंख्यं पारणमा आपाढाश्रावणाभाद्रपदाश्विन-मासेषु श्रिया सह श्रीधरं सम्पूज्य चन्द्रमसः पूजनेन द्वितीयं पारणम् । कार्तिकादिमासेषु केशवमर्चयित्वा मुक्तिचन्द्रमसः पूजनेन तृतीयं तुरीये पारणम् । एतत्पारणत्रये प्रथमपारण पञ्चगव्यप्राशनं, द्वितीये कुशौदकं, तृतीये सुवर्णोदकप्राशनेति नियमनं लक्ष्मीनारायणौ सम्पूज्य नरो नैविद्ययुक्तैऽन्नफलैर् लभते च द्रुमस्मृतिं मुक्तिञ्च तत इति .... | ३९४ | १ |
| २१७ | चैत्रकृष्णाष्टम्यामुपवासपुरस्सरं कृष्णाष्टमीमर्च्य वशागव्यदुग्ध-योनिन्नमिश्रकपारणव्रतस्नानादिविधानेन सम्मस्तानायुरन्नदा स्यात् । | ,, | २ |
| २१८ | हरिशयनप्रबोधनयोर्मध्ये द्वादशव्रतविधानाव्रतनिर्देशनम् | ,, | ,, |
| २१९ | भाद्रशुक्लद्वादश्यां प्रारभ्य यावत्संवत्सरं द्वादशीव्रतव्रतवर्णनम् | ३९७ | ,, |
| २२० | पापशुद्धशर्वाणी दम्परत्नं प्रनहद्भावनेषु जगदर्चितनदानगोदत्र-प्राप्तानादिविधानम् .... .... .... | ,, | ,, |
॥ १७ ॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २२१ | चैत्रशुक्लप्रतिपदादौ ब्रह्मादिदेवानां सहेतुफलं पूजनम् | ३९६ | २ | र्जन्मादिनियमपुरस्सरमाचारगतिकथनम् | ४०१ | १ | |
| २२२ | रोचेषु मासोपवासफलानिरूपणम् | ३९७ | " | २३४ | महापातकोपपातकादिनिर्देशपूर्वकं प्रायश्चित्तवर्णनम् | ४०३ | २ |
| २२३ | तत्तन्नक्षत्रेषु तत्तद्देवादिपूजनवर्णनम् | ३९८ | " | २३५ | रहस्यप्रायश्चित्तनिर्देशः | ४१० | " |
| २२४ | अष्टावक्रादिक्संवादे तया स्त्रीस्वभावादिवर्णनं भार्गवेण मुनिनिष्ठावक्त्राय स्वसुताया दिशो दानञ्च | ३९९ | १ | २३६ | पापप्रशमनाश्राद्धजपादिच्छिद्रच्छद्मवर्णनम् | " | " |
| २२५ | पुरुषसूक्तविधानेन संवत्सरपर्यन्तं हंसस्वरूपजनार्दनपूजनव्रतम् | ४०० | " | २३७ | दानतपोवृद्धगवादिकर्मदानं भोगिनस्त्वग्ज्यामालादिकल्पकथनम् | ४११ | |
| २२६ | ऋतुतुगस्यान्ते दाम्पत्यव्यवहारप्रवृत्तैर्लोभदंभादिदोषमाकुले लोके हंस-रूपिनारायणेन मुन्यनुरोधेन ज्ञानोपदेशकथनमभिहितमासीत् | " | " | २३८ | निधनसूचकाङ्गारिष्टयोगवर्णनम् | ४१२ | |
| अथ हंसगीता। | २३९ | अज्ञानेनापाज्ञानफलानि | ४१३ | ||||
| २२७ | वर्णाश्रमधर्मवर्णनम् | " | २ | २४० | पापफलदुःखवर्णनम् | " | २ |
| २२८ | ब्रह्मचर्यपालनपुरःसरं वेदस्वीकरणादन्यमावण्याद्गुरुकुले वासो गृहाश्रमस्वीकृतिर्वा | " | " | २४१ | कामासक्तिनिन्दाथार्थ्यपूर्वकं कामसेवनेन सुखम् | " | " |
| २२९ | गृहस्थधर्मवर्णनम् | ४०१ | १ | २४२ | चञ्चलं लक्ष्मीरस्वभावं निश्चित्य तन्नाशे न हृष्येत् | ४१४ | " |
| २३० | भिक्षाभक्ष्यवर्णनम् | " | " | २४३ | मानदोषवर्णनम् | " | " |
| २३१ | द्रव्यशुद्धिनिरूपणप्रसङ्गे मलमूत्रादीनां परिगणनम् | " | २ | २४४ | मददोषवर्णनम् | " | " |
| २३२ | अशौचविधिवर्णनम् | " | " | २४५ | लोभदोषवर्णनम् | " | " |
| २३३ | हस्ते देवादितर्पणानि जपादिकोले मनःप्रणिधानमक्रोधकार्याद्यावन्त- | २४६ | क्रोधदोषवर्णनम् | " | " | ||
| २४७ | नास्तिक्यस्य गुरुतरपापवर्णनम् | " | " | ||||
| २४८ | अहङ्कारस्य सर्वनाशकत्वम् | ४१५ | |||||
| २४९ | शौचवर्णनम् | " | " |
वि० ध० ॥ १८ ॥ अनु० ॥ ३८ ॥
| अध्यायः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २५० | अशौचदोषाः | ४१५ | १ | २६७ | शूरशौर्यवर्णनम् | ४२० | १ |
| २५१ | अनृतदोषवर्णनम् | ,, | २ | २६८ | अहिंसागुणहिंसादोषवर्णने | ४२१ | १ |
| २५२ | हिंसादोषकथनम् | ४१६ | १ | २६९ | क्षमागुणवर्णनम् | ,, | ,, |
| २५३ | कायवाङ्मनोजनितपापफलनिर्देशवर्णनम् | ,, | २ | २७० | कृतज्ञता (आनृशंस्य) गुणवर्णनम् | ४२२ | १ |
| २५४ | ज्ञानमहत्त्ववर्णनम् | ४१७ | १ | २७१ | आचारगुणवर्णनम् | ,, | ,, |
| २५५ | धर्मप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २७२ | शौचप्रशंसा | ,, | २ |
| २५६ | गृहस्थाश्रममाहात्म्यम् | ४१८ | १ | २७३ | तीर्थानुसरणप्रशंसनम् | ,, | ,, |
| २५७ | स्वाध्यायप्रशंसा | ,, | ,, | २७४ | उपवासप्रशंसावर्णनम् | ४२३ | १ |
| २५८ | ब्रह्मचर्यप्रशंसावर्णनम् | ,, | २ | २७५ | मनःशौचिनिरूपणम् | ,, | २ |
| २५९ | सन्तानप्रशंसा | ,, | ,, | २७६ | श्रद्धावर्णनम् | ,, | ,, |
| २६० | कीर्तिप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २७७ | ज्ञानमाहात्म्यवर्णनम् | ,, | ,, |
| २६१ | यशःप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २७८ | जपप्रशंसावर्णनम् | ४२४ | १ |
| २६२ | यज्ञप्रशंसावर्णनम् | ४१९ | १ | २७९ | जलान्तर्जपमाहात्म्यवर्णनम् | ,, | २ |
| २६३ | शीलप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २८० | प्राणायाममाहात्म्यवर्णनम् | ,, | ,, |
| २६४ | दम (जितेन्द्रियत्व) प्रशंसनम् | ,, | ,, | २८१ | प्रत्याहारवर्णनम् | ,, | ,, |
| २६५ | सत्यप्रशंसावर्णनम् | ,, | २ | २८२ | धारणातिरूपणम् | ४२५ | १ |
| २६६ | तपःप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २८३ | ध्यानवर्णनम् | ,, | ,, |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|---|---|
| २८४ | समाधिनिरूपणं सफलम् | ४२६ | २ |
| २८५ | व्यवसायाववर्णनम् | ४२६ | १ |
| २८६ | संकल्पवर्णनम् | ,, | ,, |
| २८७ | होमविधिवर्णनम् | ,, | ,, |
| २८८ | देवपितृपूजाफलवर्णनम् | ,, | २ |
| २८९ | आतिथ्यपूजामहत्त्वकथनम् | ४२७ | २ |
| २९० | ब्राह्मणमहत्त्ववर्णनपुरस्सरं तच्छुश्रूषाफलम् | ४२८ | १ |
| २९१ | गोमहत्त्वप्रदर्शनपुरस्सरं तच्छुश्रूषणम् | ,, | २ |
| २९२ | दयामहत्त्ववर्णनम् | ४२९ | १ |
| २९३ | दाक्षिण्यनिरूपणम् | ,, | २ |
| २९४ | प्रियंवदप्रशंसा | ,, | ,, |
| २९५ | आलस्यदोषप्रकटनपुरस्सरं यत्नस्य कार्यसाधकतावर्णनम् | ,, | ,, |
| २९६ | उदकमहत्त्वप्रदर्शनपुरस्सरं तडागादिनिर्माणफलम् | ,, | ,, |
| २९७ | वृक्षारोपणपुण्यफलारामदिनिर्माणकर्तृणां तत्तल्लोके सुखनिवास-निरूपणम् | ४३० | १ |
| २९८ | प्रपानिर्माणतज्जलाभ्यां पथिकतृषितजनितानि प्रपाकर्तृपञ्चारकयोः फलानि | ४३१ | १ |
| २९९ | तामसादिविभेदेन पुण्यफलोपदेशः, शुक्लकृष्णशबलव्याप्तिभेदेन धर्मादि-चाराश्च | ४३१ | २ |
| ३०० | दानकालसम्पद्दानफलादिकथनम् | ४३२ | १ |
| ३०१ | प्रतिग्राह्यपदार्थमितमहत्त्वमयतद्देवतादिवर्णनम् | ,, | ,, |
| ३०२ | अभयप्रदानप्रशंसावर्णनम् | ,, | २ |
| ३०३ | वेदापवेदाङ्गधर्मशास्त्रार्थव्याख्यानस्य दुस्सङ्गिनिवारणस्य च फलम् | ४३४ | १ |
| ३०४ | कन्यादानफलम् | ,, | २ |
| ३०५ | आरामजलाशयदेवताया विधिविशिष्टोप्रकारकर्मोविविधान्नमलाक्तसु-वस्त्र दाने फलानि | ४३५ | १ |
| ३०६ | गोप्रदानशक्तपरमाह्लादिकफलानिरूपणम् | ,, | २ |
| ३०७ | घृतधेनुकल्पवर्णनम् | ४३७ | १ |
| ३०८ | तिलधेनुविविधदानवर्णनम् | ,, | २ |
| ३०९ | जलधेनुविविधदानवर्णनम् | ४३८ | १ |
| ३१० | सुवर्णतिलादिविधाननिरूपणम् | ,, | ,, |
| ३११ | आसनशय्यावितानच्छत्रोपानत्तथादिदानफलवर्णनम् | ,, | २ |
| ३१२ | नृवाहशिविकादासदास्यादिदानमाहात्म्यम् | ४३९ | १ |
| ३१३ | रूपलावण्यधनसौभाग्यादिमदशमकापरसेविकादिदानवर्णनम् | ,, | २ |
वि० ध० | अनु०
[भाग १]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ३१४ | सूर्य्याश्वदर्शकलैकादिमापकरफंशालियुगपञ्चकलामादिधान्यदानवर्णनम् .... | ४४० | १ |
| ३१५ | प्राणानामन्नमयत्वात्सर्वेषामपि जीवाना मन्नाधिकारित्वदाविर्विशेषेणान्नदानस्य माहात्म्यं तत्रापि भोजने ब्राह्मणानांगुणबाहुल्यम् .... | ” | ” |
| ३१६ | पात्रविशेषेण दानविशेषफलवर्णनम् .... | ” | २ |
| ३१७ | कालविशेषे दानविशेषफलवर्णनम् .... | ४४१ | १ |
| ३१८ | तद्दानफलं नक्षत्रव्रतवर्णनम् .... | ४४२ | १ |
| ३१९ | चैत्रादिपूर्णिमासु द्वादशीषु च व्रतोपवासदानादिफलवर्णनम् .... | ” | २ |
| ३२० | चैत्रपञ्चदश्यामुपवासादिचित्रवस्त्रादिपुरस्सरं नक्तैकभक्तादिनियमपालनपूर्वकं मासव्रतविधानम् .... | ४४३ | २ |
| ३२१ | गृहीतविष्णुपञ्जरश्रवणादिना यमकुवेरादित्याद्यष्टकेषु प्रतिद्यत्सुखादिप्राप्तितत्तल्लोकान्त्यानुभावविवर्णनम् .... | ४४४ | २ |
| ३२२ | पातिव्रत्यादिकर्म्मयनिरूपणम् .... | ४४५ | १ |
| ३२३ | वर्णानां स्वेस्वे धर्मे स्थापनान्निरोग्यधर्मनिरूपणम् .... | ” | २ |
| ३२४ | कुलश्रवणाद्याधिकृतगणानिर्याणपुरस्सरं वृद्धब्राह्मणैः सह गतो व्यवहारदर्शनवर्णनम् .... | ४४६ | २ |
| ३२५ | विशुद्धागमपूर्वकस्य भूम्यादिभागस्य प्रामाण्यवचनम् .... | ४४७ | १ |
[भाग २]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ३२६ | व्यवहारेषु पौरुषद्दिव्ययोर्निर्णयोधौर्लिखितसाक्षिभेदेन द्विविधपौरुषेऽपि राजसाक्षिकससाक्षिकस्वहस्तलिखितभेदेर्कोविध्यं तत्र स्थावराणां लेख्येनैव सिद्धिरलेख्यस्य सोपध्ये दिव्यधैर्व्यव्यवस्था .... | ” | ” |
| ३२७ | कृताकृतभेदेन साक्षिणामेकादशविधता, पूर्वपक्षीणां साक्षिषु पूर्वं प्रक्षा, साक्षिभेदवृत्तसाक्षिणोनिर्णयः, नृपतिशिल्पिश्रोत्रियादीनां साक्ष्यनिषेधः, आसानां सर्वेषांच साक्षित्वम् देवद्विजातिसन्निधावुदङ्मुखेन पूर्व्वाहे सशौचं साक्षिग्रहणम्, साक्ष्यारम्भे ब्राह्मणादीनां सत्यादिना शपनम् .... | ४४८ | १ |
| ३२८ | कोशाद्यादिभेदेन दिव्यानामष्टविधता, तत्र कोशस्याशिरस्कता, विप्रवर्ज्यं वर्णानां कोशादानम्, देशकालाबधुभयं दिव्यदानम्, गजाश्वदेशकाण्टककानां निस्सारणं कर्त्तव्यम्, दिव्याहिर्डनऋनयम्, तुलायोग्यशुस्तलक्षणनिर्माणिप्रकारातद्वेक्षणशान्तिपुरस्सरं तदुपविष्टस्य शुद्धिज्ञानम्, वह्निसाध्यादिव्यद्यानां विधानप्रकारः .... | ” | ” |
| ३२९ | ब्राह्मणादिवर्णानामष्टौ विवाहाः, कन्यादायोपच्छ्लोकांगपक्कोपदण्डा, ज्ञातिबलाद्विक्रयमंत्रिणोणिग्याः कटीरमाणदण्डः, भार्याया व्यभिचारे दण्डः, एकवगाय कन्यां दत्त्वाऽन्यस्मै क्षात्रे विनवृत्तयोंशाद्दण्डो राजा देयः। ऋतौ भार्यामगच्छतो भतृर्मातातथा अगच्छन्त्या भा- |
॥११॥
॥१२॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | दिनयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| योग्याश्च दण्डः। ऋतुसत्या भर्त्रऽप्रतिपादिताया वर्षत्रयात्सत्यं विवाहाधिकारः।.... .... .... | ४५० | २ | ३३७ | सीमाविवादे सामन्तस्थविरागोपकृषकादिद्वारा तन्निर्णयः, सस्यक्षेत्रेषु सस्यनाशकमाहिषादीनां स्वामिषु दण्डकल्पना .... | ... | ||
| ३३० | औरसादिद्वादशविधपुत्राणां पित्ररिक्थाधिकारः, प्रतिलोमजातानां जडादीनाञ्च भरणमात्रं, पतितानामनधिकारः, क्रमागतभूम्यादौ पितापुत्रयोस्तुल्याधिकारः, पित्यूर्ध्वं विभागे मातापि समांशभागिनी, ब्राह्मणादीनां क्षत्रियादिपुत्राणामंशविभागः, अपुत्रधनभाजां निर्देशः, स्त्रीधनन्तदधिकारिनिरूपणञ्च .... .... | ४५१ | १ | ३३८ | धर्माद्यर्थकमूलं हि धनं नृणां बहिश्चराः प्राणास्तद्धर्तॄन्प्रजा वातयेत, ब्राह्मणांस्तु स्वराष्ट्राद्दिवासयेत्, महापातकात्साहसिकादीनामवश्यं दण्डयत् .... .... ... | ... | ,, |
| ३३१ | ऋणादानप्रसङ्गे चोत्तमर्णोधमर्णान्न धनं संवृद्ध्यावृद्धिं वा यथानियमं देयं, देवराजदोषादहृते चाधिभोक्ता सवृद्धिकरादिदेयः, एकस्याविभक्तस्मै दातुः प्राणदण्डः, पश्चाद्विचैत्तनां वा नष्टेऽपि धतिनोऽक्षतिः, द्विरूप्यपक्षादिषु वृद्धिनियमः, त्रिपुरुषपर्यन्तमृणदानम्, प्रातिभाव्ये ऋणदानव्यवस्था, अशक्तौ कर्मकरणम्, .... | ४५२ | १ | ३३९ | आत्मनो वलीपलितमपश्यस्य चापत्यं वीक्ष्य गृहं वानप्रस्थमाश्रयेत, तत्र च सभायां निर्लोभो वः नियम्रनीतुपाचन्वयेन च कन्दमूलादिना वर्त्तन्देवपित्रातिथीनभ्यज्ययथावलम्पञ्चाश्रितपक्षशणादिनाकालं नयेत्प्रमाशाद्दष्टा प्रासानानायोषावलाभेन विशेद्धिहाभे च न हृष्येद्दिस्वादिवानामश्यमंयोग दुग्कन्तपः कुर्यात् .... | ... | ४६० २ |
| ३३२ | निक्षेपरक्षावर्णनेन याचित्तान्वाहितादीनामपि गतार्थता ... | ४५३ | १ | ३४० | आयुषश्चतुर्थस्त्ये भागे यातिधममाश्रयेत. तत्र चेद्विप्रगुरूसरप्रशोगात्मनि समारोप्य ब्रह्मास्रमो भवेत् । ग्सारस्वादल्पमटो न स्यात. कर्मवाङ्मनोदण्डवान्भवेत्, 'दृष्टिपूतं न्यस्तपादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत, सत्य पूतां वदेद्वाणीं मनः पूतसमाचरेत !, शङ्गाभिन्नादिषु समानभावं कुर्यात् .... .... ... | ... | ,, ,, |
| ३३३ | सम्भूयसमुत्थाने क्षयव्ययवृद्ध्यनुसारमंशकल्पना ... | ,, | ,, | ||||
| ३३४ | कायदेशकर्मार्थाधिककर्मकरादिदत्तनादिनियमः ... | ,, | ,, | ||||
| ३३५ | क्रयविक्रयनियमनिर्णयः ... ... | ४५५ | १ | ३४१ | विष्णुमाश्रित्य कृतानां धर्माणां फलवत्त्वम्, तत्स्मरणकीर्तनादिभिस्तिर्योन्गम्य सवार्थलाभकत्वम्, दुर्वालबत्रिमाय तद्दत्तपरमाणुसंख्या- | ||
| ३३६ | पाषण्डनैगमादिविभागवर्णनम् ... ... | ,, | ,, |
| वि० धं० | अनु० | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ॥२०॥ | ॥२०॥ |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वृक्षस्वरूपान्नं स्वर्गलोके पूज्यते देवालयेकृत । काष्ठामललोहताम्र-रौप्यरलनिर्मितप्रसादे विष्णुप्रतिमापूजनेऽनन्तपुण्यम् । देवप्रासादे सुधासंस्कार-चित्रकरण-गीतवाद्यनृत्यकरण-प्रक्षीणमद्यदानाभ्यर्थनामृक्षण-सम्मार्जनानुलेपन-पुष्पोपचय-जीर्णोद्धार-कीर्त्तन-सहस्रनामोच्चारणपूर्वकस्तवन-चतुर्वेदैस्तत्प्रकारामिभ्रुस्तवन-भक्तिभावूर्ध्वस्वरचित्तस्तवतवन-तन्माहात्म्यप्रतिपादकपुस्तकविवरण-तद्देहीभ्यस्तन्माहात्म्याश्रवण-तदालये शंखघण्टाकिंकिणीपताकादिप्रदान-विचित्रपुष्पसमलंकृतवाटिकानुकारिण्यादिनिर्माणरसङ्ख्यापुण्यफलभाक्त्वम् । एवंविधमहापूजया सकामस्यान्तकालपरिमितसुखभोगाभावापि न तादृग्भावतोपो यादृङ् निष्कामस्येति ... | ४५६ | १ | सुखस्यापात् । स्वामरात्भयदर्शानि हगे रुष्टेऽधोलितं च गरुत्मति हरिणाङ्गिके तत्पृष्ठेऽध्यापयतःद्वारक्रान्तस्य तादृशस्य पक्षशान्तं बलहानिश्च समजर्नि, हरिश्चार्यमेव महिमा कोऽहं वराक इति गतगर्वाय खगेश्वराय भगवता प्रसादपुरस्सरमपमितबलप्रदायि... | ” | २ | ||
| ३४४ | कश्यपकृतविष्णुस्तवः | ४६४ | १ | ||||
| ३४५ | भूविवरस्थराज्ञो ( उपरिचरवसोः ) रक्षणवर्णनम् | ” | २ | ||||
| ३४६ | वैष्णव्यपराजिताविद्यावर्णनपुरस्सरं वसुकृतगरुडस्तोत्रम् | ४६५ | १ | ||||
| ३४७ | वसुकृतं वासुदेवस्तोत्रम् | ४६६ | २ | ||||
| ३४८ | विष्णुना वसवे सत्यपालनपुरस्सरं ब्राह्मणापमानवर्जनेोपदेशकथनम् | ” | ” | ||||
| ३४९ | विश्वरूपदर्शनार्थं नारदस्य श्वेतद्वीपगमनम् | ४६७ | १ | ||||
| ३४२ | श्रीविष्णुतत्त्वान्ते मुनिदृष्टहंस ( विष्णु ) विश्वरूपदर्शनम् | ४६३ | २ | ३५० | विश्वरूपदिदृक्षया श्वेतद्वीपं नारदकृतं स्तोत्रम् | ४६८ | १ |
| ॥ इति हंसगीता ॥ | ३५१ | श्वेतद्वीपे नारदस्य विश्वरूपदर्शनं तत्रत्यमहान्तर्यामीपीडिताप्तिश्च.... | ” | २ | |||
| ३४३ | गुणकथासात्स्यशक्त्या वरमार्थणाय नारदसहायं मातली निर्गते मुहुर्वाक्यं तावपश्यताम्, तत्रैव शक्रदर्शनानन्तरं तौ तांस्तान्स्वसाम्यमयाचताम्. अमिति शक्रोक्तावपि विष्णुमर्चय्य मातलिर्वेततयाऽभयं | ३५२ | सरःसन्निहिताश्वत्थविधन्धन्यान्मस्वा हृदये प्रदर्य हसन्तमष्टमण्डलं निम्माय मध्योऽष्टपत्रपद्मं लिखेत. तत्कर्णिकामध्ये श्वेतकानपत्रकर्णिकापद्मकमण्डलं, तदुपरि चन्द्रमण्डलं. तदुपरिभीमण्डलं पद्मपुष्पमण्डलंगं विष्ण्यमंतृ. कमलपुर्वोद्दिष्टश्वश्वकारिषु वासुदेवसंकर्षणादीन्न्यनेन. प्रपूर्वोद्दिष्टेषु वेनतयादींश्च न्यनिस्या बाह्यमूर्ध्वा पद्मावादींश्चमोंकारा- |
| संख्याः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | संख्याः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कारादिक्रान्तिक्षामिनष्टेति वरुणकुवेरनेत्राभ्यां न्यसेत, यथाक्तारूपं ध्यायेत् । "ॐनमो भगवते वासुदेवायत्यनेन" ॐनमो नागयणेत्यनेन वा संविधि पूजयंत .... .... | ४६१ | २ | ३०७ | नागमंत्रानपुरस्सरं नारगादिविषूचपमानशान्तये क्कते निदेशः .... | १७० | १ | |
| ३०८ | लिङ्गमोटननृसिंहवर्णनम् .... .... .... | २ | |||||
| ३५५ | श्रीमन्नृसिंहस्तोत्रवर्णनम् .... .... | १७१ | १ |
॥ इत्यनुक्रमणिका समाप्ता ॥
केके ह्यपूर्वविषयाः प्रतिपादिता न धर्मांतरेऽत्र महितै किल विष्णुपूर्व्वे ॥
तस्यातिसूक्ष्मविषयप्रतिपादकंच वोऽनुक्रमोऽकृत मया तनुबुद्धिभाजा ॥ १ ॥
सर्व्वांतरस्थितमहामहिमप्रतीतः सर्व्वेश्वरः सकलवाञ्छितसिद्धिदाता ॥
लक्ष्मीसहाय उरुगाययशाः प्रसीदेदित्यं प्रयाचति हृदा हरिदत्तशर्म्मा ॥ २ ॥
॥ इति श्रीविष्णुधर्मोत्तरमहापुराणविषयानुक्रमणिका समाप्ता ॥
॥ अथ श्रीविष्णुधर्मोत्तरप्रारम्भः ॥
The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.
श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ श्रीनारायणाय नमः ॥ अथ श्रीविष्णुधर्मोत्तरप्रारम्भः ॥ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ॥ देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥ कृतवर्मा तथा भोजः श्वेतो माहिष्मतीपतिः ॥ कुलिन्दः सर्वदमनो मालवेन्द्रस्त्वधूर्द्धनः ॥ २ ॥ वत्सनामश्च बाणश्च नन्दीशो दरसत्पतिः ॥ प्रतिसारश्वित्रधनुस्सवौं वायुरथस्तथा ॥ ३ ॥ द्रविडः कुसुमापीड ओड्रश्च समरप्रियः ॥ शम्भुः किरातराजश्च ओरसो नन्दिवर्द्धनः ॥ ४ ॥ वटुमुलश्च तूनेशः शाल्वश्च जनमेजयः ॥ सुभ्राजो दीर्घकर्णो बाह्रीको दमनस्तथा ॥ ५ ॥ हिरण्यनामः कौसल्यो दशार्हो विजयस्तथा ॥ एते चान्ये च राजानः शतशो बहुदक्षिणाः ॥ ६ ॥ सम्पूर्र्णचन्द्रवदना गजराजकरोरवः ॥ उपासांचक्रिरे वज्रं सिंहासनगता नृपाः ॥ ७ ॥ बहुभिर्भूमिपालैश्च तथा वज्रेण धीमतां ॥ युधिष्ठिरण च सदा शोभिता शुशुभे सभा ॥ ८ ॥ राजानस्ते ततो दृष्ट्वा ऋषीन्दुंल्लभदर्शनान्॥ ब्रह्मलोकस्थमात्मानममन्यन्त यशोभृतः ॥ ९ ॥ ऊचुस्ते प्रणयाद्वाक्यं वज्रं भूरिसहस्रदम् ॥ यथा त्रेतायुगे राजन् द्वापरे च यथा नृपाः ॥ १० ॥ ब्राह्मणा ब्रह्मकल्पाश्च तथैव सुसमागताः ॥ १० ॥ अस्मिंस्तिष्ये च संप्रति तव राजन् प्रसादतः ॥ राजन् कृष्णसगोत्रोऽसि तेनेयन्ते सभा नृप ! ॥ ११ ॥ उपास्यते महाभागैर्ब्रह्मकल्पैस्तपोधनैः ॥......................न तथा वीर्यनिर्जिता ॥ १२॥ भक्त्या यथा तु तत्त्वेन कृष्णस्यामिततेजसः ॥ तेन कृष्णेन ये चक्रुर्व्यतीताः पूर्वपार्थिवाः ॥ १३ ॥ वर्त्तता तेन कृष्णेन ते राजन् मोक्षमाप्नुयुः ॥ अथ तिष्ययुगः प्राप्तो घोरः परमदारुणः ॥ १४॥ दुर्लभं दर्शनं यत्र नृपसवै महात्मनाम् ॥ १५ ॥ तत्सारवं राजशार्दूल प्रष्टुमहौ द्विजोत्तमान् ॥ वैष्णवान्विविधान्धर्मान्सरहस्यान्ससंग्रहान् ॥ १६॥ इत्येवमुक्तो वज्रस्तैस्त्यक्त्वा सिंहासनं तदा ॥ वज्र तु प्राञ्जलिं दृष्ट्वा सर्व एव नराधिपाः ॥ १७ ॥ वरासनान्युत्थायोशु तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ वज्र उवाच ॥ भवद्भिर्नृपशार्दूलाः प्रार्थिता ये द्विजाः स्थिताः ॥ १८ ॥ अनुग्रहार्थं भूपानां जगतो हितकाम्यया ॥ भवन्तो वक्तुमर्हन्ति विष्णुधर्मान्सना तनान् ॥ १९ ॥ तस्मात्तिष्ययुगे नास्ति भवतो दर्शनं नृपैः ॥ ऋषय ऊचुः ॥ उत्तिष्ठ त्वं महीपाल अलङ्कुरु स्वमांसनम् ॥ २० ॥ श्रवणेपि वयं तस्य विशेषेणार्थिता नृप ॥ वज्र ते संशयान्सर्व्वाञ्छेत्स्यत्येष महामुनिः ॥ २१ ॥ इत्येवमुक्ता वज्रं ते ऋषयस्तपसि स्थिताः ॥ मार्कण्डेयमथोचुस्ते ब्रूहि धर्मान्महीपते ॥ २२ ॥ वैष्णवान्विविधान्धर्मान्मोक्षोकानांमघहारिणः ॥ तथा पार्थिवसंशस्य संशयान् मनसि स्थितान् ॥ २३ ॥ मार्कण्डेय उवाच ॥ ब्रह्मण्यः सत्यवान् धन्यः सर्वयज्ञनिबर्हणः ॥ यद्गत्पृच्छसि मां वज्र तत्तद्वक्ष्याम्यसंशयम् ॥ २४ ॥ सिंहासनस्थो भव भूमिपाल
१ ‘वरगो वत्सनामश्च’ इति बहुपुस्तके। २ ‘बालक्ष’ इति क०। ३—‘मूब्जा’ इति ख०। ४ ‘ऋषिंस्तेव महोद्धतान्’ इति ख०। ५ ‘तदासनम्’ इति ख०।