बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
( ५७ ) तरफ आती हुई जो रेखा होती है वही विवाह रेखा कहलाती है। कुछ लोगों के हाथों में ऐसी तीन चार रेखाएं होती हैं, परन्तु इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उस विवाह रेखा विवाह रेखा व्यक्ति का विवाह तीन चार स्त्रियों से होगा, परन्तु इसका अर्थ यह होता है कि उसका सम्बन्ध तीन चार प्राणियों से अवश्य ही रहेगा। इन तीन चार रेखाओं में से जो रेखा गहरी और स्पष्ट होती है वास्तव में वही रेखा विवाह रेखा कहलाती है। कई बार यह भी देखने में आया है कि व्यक्ति के हाथ में विवाह रेखा होते हुए भी वह आजीवन कुंआरा रहता है। इसका कारण यह है कि जब विवाह रेखा पर किसी प्रकार का कोई क्रॉस बना हुआ हो तो यह समझ लेना चाहिए कि इस व्यक्ति के सम्बन्ध बन कर समाप्त हो जायेंगे। जीवन में विवाह नहीं हो सकेगा। यदि विवाह रेखा के साथ में चलने वाली किसी रेखा पर छोटे-छोटे चिह्न हों तो उस व्यक्ति के जीवन में अनैतिक सम्बन्ध बने रहते हैं। ऊपर मैंने सात प्रमुख रेखाओं की विवेचना की है अब आगे मैं गौण रेखाओं के बारे में जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूं। १. बृहस्पति वलय :—इसे अंग्रेजी में 'रिंग आफ जुपिटर' कहते हैं। हिन्दी में इसको गुरुमुद्रा या गुरु रेखा भी कहते हैं। यह तर्जनी उंगली से नीचे बृहस्पति पर्वत पर तर्जनी उंगली के नीचे अर्द्ध चन्द्राकार बनाती हुई उसके पूरे क्षेत्र को घेर लेती है जो कि अंगूठी के समान दिखाई देती है इसी को गुरुवलय या वृहस्पति मुद्रा कहते हैं। बृहस्पतिवलय
( ६८ ) २. मंगल रेखा :—इसे अंग्रेजी में 'लाइन आफ मार्स' कहते हैं। यह रेखा अंगूठे के पास जीवन रेखा के मूल उद्गम से निकल कर मंगल क्षेत्र पर होती हुई शुक्र पर्वत की ओर जाती है इसे मंगल रेखा कहते हैं परन्तु इसका उद्गम स्थान निश्चित नहीं होता । कुछ लोगों के हाथों में यह जीवन रेखा के बीच में से, तो कुछ हाथों में मंगल रेखा मंगल रेखा यह रेखा जीवन रेखा के बराबर चलती हुई भी दिखाई देती है। शुक्र क्षेत्र की ओर जब यह रेखा बढ़ती है तो वह जीवन रेखा से दूर हटती जाती है। हथेली में इस रेखा का महत्त्व बहुत अधिक माना गया है। ३. शनिवलय : इसे 'रिंग आफ सेटर्न' कहते हैं तथा हिन्दी में शनि मुद्रा या शनि रेखा या शनि वलय कहते हैं । यह रेखा मध्यमा उंगली के मूल में शनि पर्वत को घेरती हुई अपना एक छोर तर्जनी और मध्यमा के बीच में तो दूसरा छोर मध्यमा और अनामिका के बीच में रख देती है। इस प्रकार से यह शनि पर्वत को अंगूठी की तरह घेर लेती है। यह वलय हाथ में बहुत महत्व रखता है। शनिवलय
( ९६ ) रविवलय ४. रविवलय : इसे “रिंग आफ सन” कहते हैं तथा हिन्दी में इसको सूर्य मुद्रा या सूर्य वलय भी कहा जाता है। यह अनामिका उंगली के मूल में अंगूठी की तरह सूर्य पर्वत को घेर लेती है। इस रेखा का एक छोर मध्यमा अनामिका के बीच में होता है तथा दूसरा छोर अनामिका कनिष्ठिका के बीच में पाया जाता है जिस किसी हाथ में यह वलय देखा जाता है वह इसी रूप में होता है।
वाचालता, विज्ञान चतुराई, चोरी मानसिक विश्व दया, अहिंसा, त्याग उच्चादर्श, आत्मज्ञान तेज, सम्मान अध्ययन, विचार, पूजा अन्धविश्वास, गंभीरता निराशा, घुटन धर्म, यश, मान, नेतृत्व, महत्त्वाकांक्षा व्यावहारिक विश्व | बुध | सूर्य | शनि | गुरु साहस, संतुलन नियमबद्धता, शान्ति | ऊर्ध्व मंगल | मंगल का मैदान | जीवन रेखा हिंसा, क्रोध इच्छाशक्ति तर्क शक्ति निम्न विश्व | कल्पना | ऊर्ध्व चन्द्र | शुक्र रहस्य स्वार्थ | मध्य चन्द्र वासना असाधारण प्रकृति | निम्न चन्द्र | सुन्दर, वासना, कला, सहानुभूति अस्थिरता | १००%
( १०० ) ५. शुक्रवलय : इसे अंग्रेजी में "गर्डल आफ वीनस" कहते हैं तथा संस्कृत में इसको भृगु रेखा, शुक्र रेखा या शुक्र वलय कहा जाता है। यह वलय तर्जनी और मध्यमा के बीच में से प्रारम्भ होकर अनामिका और कनिष्ठिका के बीच में जाकर समाप्त होता है। इस प्रकार यह रेखा शनि और सूर्य दोनों पर्वतों को घेर लेता है। कई हाथों में यह वलय दोहरी रेखाओं से बनता है। यद्यपि इसका नाम शुक्र वलय होता है परन्तु इसका शुक्र पर्वत से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं होता। यह वलय व्यक्ति के हाथों में बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण कहा जाता है। शुक्रवलय
६. चन्द्र रेखा : यह धनुष के आकार की रेखा होती है तथा यह चन्द्र क्षेत्र से प्रारम्भ होकर वरुण तथा प्रजापति क्षेत्रों के ऊपर से चलती हुई बुध पर्वत तक जाकर रुकती है, बहुत ही कम लोगों के हाथों में यह रेखा देखने को मिलती है। चन्द्र रेखा
७. प्रभावक रेखा : अंग्रेजी में इस रेखा को "लाइन ऑफ इन्फ्लुएन्स" कहते हैं। तथा यह जिस रेखा के साथ में भी होता है उस रेखा के प्रभाव को बढ़ा देती है। यह रेखा चन्द्र क्षेत्र तथा वरुण क्षेत्र के ऊपर से चलकर भाग्य रेखा तक पहुँचती है। कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा दुहरी तथा कुछ लोगों के हाथों में यह तिहरी दिखाई पड़ती है। इसका प्रारम्भ शुक्र पर्वत से भी देखा जा सकता है परन्तु इस प्रकार का प्रारम्भ बहुत कम हाथों में अनुभव हुआ है। प्रभावक रेखा
( १०१ ) ८. यात्रा रेखा : अंग्रेजी भाषा में इसको 'ट्रेवलिंग लाइन' कहा जाता है । यह यात्रा वायुयान यात्रा, जल यात्रा या पैदल यात्रा किसी भी प्रकार की यात्रा को स्पष्ट करती है । परन्तु सूक्ष्मता से देखने पर ज्ञात होता है कि इस रेखा पर अलग-अलग प्रकार के चिह्न होते हैं जिनमें यात्राओं का भेद ज्ञात किया जा सकता है यह रेखा चन्द्र रेखा पर या शुक्र क्षेत्र से, मंगल क्षेत्र की ओर जाती हुई राहू क्षेत्र को पार कर चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई दिखाई देती है । ऐसी रेखाएं मोटी और पतली दोनों ही प्रकार की दिखाई देती हैं । यात्रा रेखा
९. सन्तति रेखा : इन रेखाओं को 'लाइन्स आफ चिल्ड्रन' भी कहते हैं। ये रेखाएं बुध पर्वत के पास में विवाह- रेखा पर खड़ी लकीरों के रूप में दिखाई देती है । वास्तव में ये रेखाएं बाल के समान पतली होती है जिनको नंगी आंखों से देखना सम्भव नहीं रहता । सन्तति रेखा
१०. मणिबन्ध रेखा : ये रेखाएं कलाई पर पाई जाती हैं परन्तु इनकी संख्या अलग-अलग हाथों में अलग-अलग होती है। किसी व्यक्ति के हाथ में एक मणिबन्ध रेखा किसी में दो तीन या चार मणिबन्ध रेखाएं भी देखने को मिल जाती है । मणिबन्ध रेखा
( १०२ )
आकस्मिक रेखाएं ११. आकस्मिक रेखाएं : ये रेखाएं समय-समय पर बनती रहती हैं तथा अच्छे और बुरे समय को प्रदर्शित करती रहती हैं। ये रेखाएं स्थायी नहीं होती वरन् इनका क्षणिक प्रभाव समाप्त हो जाता है तो ये रेखाएं मिट जाती हैं। ये रेखाएं हथेली पर कहीं पर भी बन सकती हैं और बनकर मिट सकती हैं।
१२. उच्च पद रेखा : यह रेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर केतु क्षेत्र की ओर जाती दिखाई देती है। यदि यह रेखा गहरी और स्पष्ट हो तो व्यक्ति निश्चय ही उच्च पद प्राप्त करता है। उच्च पद रेखा
ऊपर मैंने प्रधान तथा गौण रेखाओं का स्थान तथा उनका संक्षिप्त परिचय दिया है। अब आगे के पृष्ठों में मैं इनसे सम्बन्धित कुछ और तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं :
जीवन रेखा जीवन रेखा ही हथेली में एक ऐसी रेखा है जो प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में पाई जाती है। यदि किसी के हाथ में यह रेखा न देखने को मिले तो यह समझना चाहिए कि ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व शून्यवत् है और उस व्यक्ति का जीवन शक्ति का सर्वथा लोप हो गया है। ऐसे व्यक्ति का जीवन किसी भी समय समाप्त हो सकता है, कई बार मंगल रेखा चल कर इस रेखा को बल देती है, कभी-कभी शनि रेखा भी इस रेखा को बल देती हुई दिखाई दी है परन्तु फिर भी जो जीवन रेखा अपने आप में निर्दोष और स्पष्ट होती है वास्तव में वही रेखा मानव के लिये कल्याणकारी मानी जाती है। इसी रेखा से व्यक्ति की आयु का पता चलता है तथा इस रेखा के माध्यम से यह ज्ञात किया जा सकता है कि जीवन में कौन-कौन सी दुर्घटनाएं किस-किस समय घटिया होंगी तथा मृत्यु का कारण और मृत्यु का समय भी इसी रेखा से ज्ञात होता है। यह रेखा बृहस्पति पर्वत के नीचे से निकलती है पर कई बार यह रेखा बृहस्पति पर्वत के ऊपर से भी निकलती हुई दिखाई दी है। इस रेखा के बारे में यह ध्यान रखना अत्यन्त जरूरी है कि यह रेखा शुक्र पर्वत को जितने ही बड़े रूप में घेरती है उतनी ही यह रेखा ज्यादा श्रेष्ठ मानी जाती है। यद्यपि कई बार यह रेखा शुक्र पर्वत को अत्यन्त संकीर्ण बना देती है जब ऐसा तथ्य हथेली में दिखाई दे तब यह समझ लेना चाहिए कि इस व्यक्ति की प्रगति जीवन में कठिन ही होगी, साथ ही साथ इस व्यक्ति को जीवन में प्रेम भोग सुख आदि सांसारिक गुणों की न्यूनता ही रहेगी । अंगूठे के पास में से होकर यदि यह रेखा निकले तो उस व्यक्ति की आयु बहुत कम होती है। जीवन रेखा जितनी ही ज्यादा गहरी स्पष्ट और बिना टूटी हुई होती है उतनी ही वह ज्यादा अच्छी कहलाती है। ऐसे व्यक्ति का स्वास्थ्य उन्नत होगा, उसके हृदय में प्रेम और सौन्दर्य की भावना विकसित रहेगी परन्तु जिसके हाथ में यह रेखा कटी-फटी या टूटी हुई अथवा अस्पष्ट दिखाई दे तो उसका जीवन दुखमय भावनाशून्य एवं दुर्घटनाओं से युक्त रहता है। ऐसे व्यक्ति तुनक मिजाज चिड़चिड़े तथा बात-बात पर क्रोधित होने वाले होते हैं।
( १०४ ) यदि गुरु पर्वत के नीचे जीवन रेखा और मस्तिष्क रेखा का पूर्ण मिलन होता है तो यह शुभ माना जाता है। ऐसा व्यक्ति परिश्रमी सतर्क और योजनाबद्ध तरीके से काम करने वाला होता है। परन्तु यदि इन दोनों रेखाओं का उद्गम अलग-अलग होता है तो व्यक्ति उन्मुख विचारों वाला तथा अपनी ही धुन से कार्य करने वाला होता है। परन्तु यदि किसी के हाथ में जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा, और हृदय रेखा तीनों ही एक ही स्थान से निकले तो यह एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रतीक होता है ऐसे व्यक्ति की निःसंदेह हत्या हो जाती है। जीवन रेखा पर यदि आड़ी-तिरछी लकीरें दिखाई दें तो उस व्यक्ति का स्वास्थ्य कमजोर समझना चाहिए। यदि हृदय रेखा और जीवन रेखा के बीच में त्रिभुज बन जाय तो ऐसा व्यक्ति दमे का रोगी होता है। यदि जीवन रेखा से कोई पतली रेखा निकल कर गुरु पर्वत की ओर जाती दिखाई दे तो उस व्यक्ति में इच्छाएं, भावनाएं और महत्त्वाकांक्षाएं जरूरत से ज्यादा होती हैं और वह उन इच्छाओं को पूरी करने का भगीरथ प्रयत्न करता है। यदि इस रेखा पर कोई रेखाएं उठती हुई दिखाई दें तो वह व्यक्ति परिश्रमी और कर्मष्ठ होता है तथा अपने प्रयत्नों से भाग्य का निर्माण करता है। यदि जीवन रेखा के प्रारम्भ से ही उसके साथ-साथ सहायक रेखा चल रही हो तो ऐसा व्यक्ति सोच-समझ कर कार्य करने वाला विवेकपूर्ण योजनाएं बनाने वाला चतुर तथा महत्त्वाकांक्षी होता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में कुछ भी असम्भव नहीं होता। यदि जीवन रेखा चलती-चलती अचानक बीच में समाप्त हो जाती है तो यह आकस्मिक मृत्यु की ओर संकेत करती है। यदि जीवन रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई दिखाई दे तो वह व्यक्ति वृद्धावस्था में पागल होता है, यदि इस रेखा में शनि रेखा आकर मिल जाए तो वह व्यक्ति प्रति- भावान और तेजस्वी होता है। जीवन रेखा के अंत में यदि किसी प्रकार का कोई बिंदु या क्रॉस दिखाई दे तो उस व्यक्ति की मृत्यु अचानक होती है। यदि जीवन रेखा अन्त में जाकर कई भागों में बंट जाए तो ऐसे व्यक्ति को बुढ़ापे में निश्चय ही क्षय रोग होगा। इससे सम्बन्धित कुछ अन्य तथ्य भी नीचे स्पष्ट किये जा रहे हैं :— १. छोटी रेखा—कम आयु। २. पीली और चौड़ी रेखा—बीमारी और विवादास्पद चरित्र। ३. लाल रेखा—हिंसा की भावना। ४. पतली रेखा—आकस्मिक मृत्यु।
( १०५ ) ५. जंजीरदार रेखा—शारीरिक कोमलता । ६. टूटी हुई रेखा—बीमारी । ७. सीढ़ी के समान रेखा—जीवन-भर रुग्णता । ८. बृहस्पति पर्वत के नीचे से प्रारम्भ—उच्च सफलता । ६. मस्तिष्क रेखा से मिली हुई—विवेकपूर्ण जीवन । १०. जीवन मस्तिष्क तथा हृदय रेखा का मिलन—दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्ति । ११. बंसी हुई गहरी रेखा—अशिष्टतापूर्ण व्यवहार । १२. स्वास्थ्य तथा मस्तिष्क रेखाओं के पास नक्षत्र—सन्तानहीनता । १३. स्पष्ट रेखा—न्यायपूर्ण जीवन । १४. प्रारम्भ स्थल पर शाखा पुंज—अस्थिर जीवन । १५. रेखा के मध्य में शाखाएं—क्षयपूर्ण जीवन । १६. अन्तिम सिरे पर शाखाएं—दुखदायी बुढ़ापा । १७. अन्त में दो भागों में विभक्त—निर्धनतापूर्ण मृत्यु । १८. अन्त में जाल—धनहानि के बाद मृत्यु । १६. रेखा से ऊपर की ओर उठती हुई सहायक रेखा—आकस्मिक धन-प्राप्ति । २०. रेखा पर काला धब्बा—रोग का प्रारम्भ । २१. नीचे की ओर जाती हुई सहायक रेखाएं—स्वास्थ्य तथा धन की हानि । २२. मार्ग में रेखा का टूटना—आर्थिक हानि । २३. कई जगह पर काटती हुई रेखाएं—स्थायी रोग । २४. रेखा पर वृत्त का निशान—हत्या । २५. प्रारम्भ में क्रॉस—दुर्घटना से अंग-भंग । २६. रेखा के अन्त में क्रॉस—असफलत बुढ़ापा । २७. क्रॉस से कटती हुई जीवन रेखा—मानसिक कमजोरी । २८. रेखा के प्रारम्भ में द्वीप—तंत्र-विद्या में रुचि । २६. रेखा के मध्यम में द्वीप—शारीरिक कमजोरी । ३०. लहरदार जीवन रेखा और उस पर द्वीप—रोगी जीवन । ३१. जीवन रेखा से हाथ के पार जाती हुई रेखाएं—चिन्ताएं और कष्ट । ३२. जीवन रेखा से गुरु पर्वत को जाती हुई रेखाएं-कदम-कदम पर सफलता । ३३. शनि पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—पशु से दुर्घटना एवं मृत्यु । ३४. सूर्य पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—प्रसिद्धि और सम्मान । ३५. बुध पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में विशेष सफलता । ३६. चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—जरूरत से ज्यादा निर्धनता तथा रोगमय जीवन ।
( १०६ ) ३७. निम्न मंगल की ओर जाती हुई रेखाएं—क्रोध में आत्महत्या । ३८. मंगल पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—प्रेम के कारण युवावस्था में बदनामी । ३६. शुक्र पर्वत की ओर अंदर की ओर जाती हुई रेखाएं—प्रेम-भंग । ४०. जीवन रेखा को कई स्थानों पर काटती हुई रेखाएं—पारिवारिक जीवन में पूर्ण असफलता । ४१. जीवन रेखा को काटकर भाग्य रेखा तक जाने वाली रेखा—व्यापार में पूर्ण असफलता । ४२. जीवन रेखा को काटकर मस्तिष्क रेखा की ओर जाती हुई रेखा— पागलपन । ४३. जीवन रेखा को काटकर हृदय रेखा की ओर जाती हुई रेखा—हृदयरोग से पीड़ित । ४४. जीवन रेखा तथा हृदय रेखा को काटती हुई रेखा—प्रेम कार्यों में असफलता । ४५. हृदय रेखा की ओर जाने वाली रेखा के अन्त में द्वीप—दुखपूर्ण वैवाहिक जीवन । ४६. जीवन रेखा और सूर्य रेखा को काटती हुई रेखा—सामाजिक पतन । ४७. शुक्र पर्वत तथा जीवन रेखा पर नक्षत्र का चिह्न—घरेलू झगड़े । ४८. सूर्य रेखा तथा जीवन रेखा पर नक्षत्र—दुखमय घरेलू जीवन । ४६. मस्तिष्क हृदय रेखा तथा जीवन रेखा पर चिह्न—रोगपूर्ण जीवन । ५०. भाग्य रेखा तथा जीवन रेखा पर त्रिकोण—आर्थिक हानि । ५१. सूर्य रेखा तथा जीवन रेखा पर त्रिकोण—अपराधपूर्ण जीवन ।
मस्तिष्क रेखा
जीवन और मस्तिष्क का आपस में गहरा सम्बन्ध है क्योंकि बिना बुद्धि के या मस्तिष्क के जीवन व्यर्थ-सा हो जाता है। जीवन में यश, मान, प्रतिष्ठा आदि बुद्धि के द्वारा ही प्राप्त होती है अतः जीवन रेखा का जितना महत्त्व हथेली में है, लगभग उतना ही महत्त्व मस्तिष्क रेखा का भी है । विद्वानों के अनुसार हथेली में मस्तिष्क रेखा का पुष्ट सुदृढ़ एवं स्पष्ट होना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि यदि मस्तिष्क रेखा जरा-सी भी विकृत होती है तो उसका पूरा जीवन लगभग बरबाद-सा हो जाता है । मस्तिष्क रेखा का कोई एक उद्गम नहीं है । यह अलग-अलग स्थानों से निक- लती है । प्रधानतः इनका उद्गम निम्न प्रकार से देखा गया है : १. जीवन की रेखा के उद्गम स्थान से निकल कर यह जीवन रेखा को ही काटती हुई हथेली के दूसरे छोर पर पहुंच जाती है । २. जीवन रेखा के उद्गम स्थान के पास से निकल कर हथेली के मध्य में समाप्त हो जाती है । ३. जीवन रेखा के बराबर चलती हुई काफी आगे चलकर यह अपना रास्ता बदल लेती है । ४. जीवन रेखा के पास से चलकर हथेली को दो भागों में बांटती हुई दूसरे छोर पर पहुंच जाती है । ५. मस्तिष्क रेखा और हृदय रेखा आपस में मिलती हुई-सी चलती है इस प्रकार ये पांच उद्गम स्थान देखे जा सकते हैं । परन्तु इसके अलावा भी मस्तिष्क रेखा के अन्य उद्गम स्थान होते हैं । जिस व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा पहले प्रकार के अनुसार दिखाई देती है वह अनुकूल नहीं मानी जाती । क्योंकि ऐसी रेखा जीवन रेखा को काट कर चलती है और इस प्रकार का चिह्न मानव जीवन में दुर्घटना का संकेत देता है । ऐसा व्यक्ति जीवन में दुर्बल, कमजोर तथा रुग्ण रहता है । जरा-जरा सी बात पर वह क्रोधित हो जाता है तथा दूरदर्शी न होने के कारण जीवन में अपना ही अहित कर बैठता है । ऐसे व्यक्ति के जीवन में मित्रों की संख्या कम ही होती है और समय पड़ने पर मित्र भी धोखा दे देते हैं ।
( १०८ ) दूसरे प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम जिस हथेली में दिखाई देता है ऐसा व्यक्ति निश्चय ही जीवन में महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त करता है । ऐसे व्यक्ति के जीवन के कार्य और विचार में परस्पर पूर्ण सामंजस्य रहता है, और वह समय पड़ने पर शीघ्र निर्णय लेने वाला एवं अवसर को भली प्रकार से पहिचानने वाला होता है । ऐसा व्यक्ति कुशाग्र बुद्धि वाला होता है तथा बात के मर्म तक शीघ्र ही पहुंचने में सक्षम होता है । यात्राओं के माध्यम से यह व्यक्ति जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है । जिसके हाथ में तीसरे प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम होता है ऐसा व्यक्ति प्रबल आत्मविश्वासी होता है, तथा अपना कार्य निकालने में वह बहुत अधिक चतुर एवं योग्य होता है । जीवन में आय के स्रोत एक से अधिक होते हैं । यद्यपि कई बार इनके मन में हीनभावना आ जाती है परन्तु फिर भी यह अपने पुरुषार्थ के माध्यम से जीवन में सफल हो जाता है । चौथे प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम जिन व्यक्तियों के हाथों में होता है उनके जीवन में कई बार विदेश यात्राओं के योग बनते हैं साथ ही वह विदेश में व्यापार कर विशेष धन लाभ करता है। ऐसे व्यक्ति भौतिक दृष्टि से पूर्ण सफल होते देखे गये हैं । जिन व्यक्तियों के हाथों में पांचवें प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम होता है वे व्यक्ति कठोर, निर्दयी एवं भावनाशून्य होते हैं। एक प्रकार से इन व्यक्तियों के पास हृदय नाम की कोई वस्तु नहीं होती । अधिकतर अपराधियों के हाथ में इस प्रकार का उद्गम सहज ही देखने को मिल जाता है । यदि इस प्रकार के हाथों में मात्र मस्तिष्क रेखा ही हो और हृदय रेखा दिखाई न दे या हाथ में मस्तिष्क रेखा तथा हृदय रेखा परस्पर मिल गई हो या एक दूसरे से लिपट गई हो तो ऐसा व्यक्ति जीवन में कई हत्याएं करता है तथा भयंकर डाकू बनता है । वस्तुतः हस्तरेखा विशेषज्ञ को हाथ देखते समय मस्तिष्क रेखा के उद्गम पर विशेष विचार करना चाहिए, और उस उद्गम को देखकर उसके अनुसार अपनी धारणा बनानी चाहिए । क्योंकि मस्तिष्क रेखा का प्रारम्भ कई नए तथ्यों को स्पष्ट करता है । आगे की पंक्तियों में मस्तिष्क रेखा से सम्बन्धित अन्य तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं : १. यदि मस्तिष्क रेखा से कोई पतली रेखा गुरु पर्वत की ओर जा रही हो, तो वह व्यक्ति योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने वाला तथा बुद्धिमान होता है । २. यदि यह रेखा सीधी, स्पष्ट, और निर्दोष हो तो वह व्यक्ति तुरन्त निर्णय लेने वाला, क्रियाशील मस्तिष्क का धनी तथा बुद्धिमान व्यक्ति होता है । ३. यदि मस्तिष्क रेखा तथा जीवन रेखा का उद्गम अलग-अलग हो तो ऐसा
( १०६ ) व्यक्ति स्वच्छन्द प्रकृति का होता है । वह अपने तरीके से काम करता है और किसी के दबाव में कार्य नहीं करता । ४. यदि किसी स्त्री के हाथ में मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा का उद्गम अलग-अलग हो तो वह स्त्री कुलटा होती है । ५. यदि मस्तिष्क रेखा से कोई शाखा निकल कर गुरु पर्वत के अन्त तक पहुंच जाती है तो वह व्यक्ति देश का श्रेष्ठ साहित्यकार अथवा कलाकार होता है । वह अपना जीवन शालीनता से व्यतीत करने में समर्थ होता है । ६. यदि मस्तिष्क रेखा हथेली के बीच में जाकर नीचे की ओर झुक जाती है तो ऐसा व्यक्ति धन के प्रति बहुत अधिक मोह रखने वाला होता है । उसकी इच्छाएं ऐश्वर्य में जीवन व्यतीत करने की होती हैं । परन्तु परिस्थितियों के कारण वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाता । ७. यदि मस्तिष्क रेखा बढ़कर हृदय रेखा को छू ले तो वह व्यक्ति अपनी पत्नी के अलावा अन्य कई स्त्रियों से सम्बन्ध रखने वाला होता है । परन्तु जीवन में इस क्षेत्र में उसे बदनामी भी मिलती है । ८. यदि मस्तिष्क रेखा हृदय रेखा से लिपटती हुई-सी आगे बढ़ती है तो ऐसा व्यक्ति क्रोध में अपनी पत्नी या प्रेमिका की हत्या कर देता है । ९. मस्तिष्क रेखा का झुकाव जिस पर्वत की ओर विशेष होता है उस पर्वत के गुणों में वृद्धि हो जाती है उदाहरणार्थ यदि इसका झुकाव गुरु पर्वत की ओर होता है तो वह व्यक्ति श्रेष्ठ साहित्यकार या तत्त्वज्ञानी होता है । १०. यदि मस्तिष्क रेखा शनि पर्वत की ओर जा रही हो तो ऐसा व्यक्ति दार्शनिक अथवा चिन्तक होता है । ११. यदि यह रेखा सूर्य पर्वत की ओर झुकती हुई दिखाई दे तो वह व्यक्ति अत्यन्त उच्च पद प्राप्त करता है । १२. यदि मस्तिष्क रेखा का झुकाव बुद्ध पर्वत की ओर प्रतीत हो तो ऐसा व्यक्ति एक सफल व्यापारी होता है, तथा व्यापार के माध्यम से वह अतुलनीय धन प्राप्त करता है । १३. यदि मस्तिष्क रेखा लहराती हुई आगे बढ़ती हो तो ऐसे व्यक्ति का चित्त अस्थिर होता है, तथा उसकी कथनी और करनी में समानता एवं एकरूपता नहीं रह पाती । १४. यदि मस्तिष्क रेखा आगे चलकर चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई दिखाई दे तो निश्चय ही वह व्यक्ति कवि होता है और जीवन में कई बार जलयात्रा करता है ।
( ११० ) १५. मस्तिष्क रेखा जहां समाप्त होती है उस स्थान पर क्रॉस का चिह्न हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही वृद्धावस्था में पागल हो जाता है। १६. यदि मस्तिष्क रेखा चन्द्र पर्वत के ऊपर से होती हुई मणिबन्ध तक पहुंच जाती है तो ऐसा व्यक्ति जीवन-भर दुखी, दरिद्री और निकम्मा रहता है। १७. यदि यह रेखा मणिबन्ध तक पहुंच कर रुक जाती है और इसके आगे क्रॉस का चिह्न होता है तो वह व्यक्ति निश्चय ही आत्महत्या करता है। १८. यदि मस्तिष्क रेखा के अन्तिम छोर पर दो भाग हो जाते हैं तो वह व्यक्ति कई प्रयत्नों से धन-संग्रह करने में लगा रहता है। जीवन में ऐसे व्यक्ति को धन, यश, मान, पद, प्रतिष्ठा सहज ही मिल जाते हैं। १९. यदि मस्तिष्क रेखा मंगल क्षेत्र पर ही समाप्त हो जाय तो ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में असफल ही रहता है। २०. यदि मस्तिष्क रेखा शनि पर्वत की ओर जाती हो तथा उसके अन्तिम सिरे पर क्रॉस का चिह्न हो तो वह व्यक्ति आधा पागल कहलाता है, तथा जीवन में उसको असफलता ही मिलती है। २१. मस्तिष्क रेखा जिस स्थान पर भी हृदय रेखा को काटती है जीवन की उस उम्र में व्यक्ति को बहुत बड़ी स्वास्थ्य की हानि होती है। २२. यदि हाथ में मस्तिष्क रेखा दोहरी हो अर्थात् मस्तिष्क रेखा के साथ ही साथ उसकी सहायक रेखा भी चल रही हो तो ऐसा व्यक्ति अत्यन्त भाग्यवान कहलाता है। २३. यदि दोहरी मस्तिष्क रेखा सीधी, स्पष्ट और सपाट हो तो निश्चय ही व्यक्ति कूटनीति में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है। २४. यदि मस्तिष्क रेखा चलते-चलते मार्ग में टूट गई हो तो वह असंतुलित मस्तिष्क वाला होता है। २५. यदि मस्तिष्क रेखा गुरु पर्वत के नीचे ही खण्डित हो जाती है तो उस व्यक्ति को बचपन में भयंकर चोट लगती है। इसी प्रकार यदि यह रेखा शनि पर्वत के नीचे टूटती है तो २४वें वर्ष में शस्त्र घात का योग बनता है। २६. यदि मस्तिष्क रेखा सूर्य पर्वत के नीचे भंग हो जाती है, तो उस व्यक्ति को नौकरी में बहुत बदनामी का सामना करना पड़ता है। यदि ऐसी रेखा बुध पर्वत के नीचे जाकर टूटती हो तो उसे व्यापार में दिवालिया होना पड़ता है। २७. यदि मस्तिष्क रेखा जंजीर के समान हो तो उसे जीवन में मस्तिष्क सम्बन्धी रोग रहते हैं। २८. यदि गुरु पर्वत के नीचे मस्तिष्क रेखा पर किसी प्रकार का कोई द्वीप हो तो वह व्यक्ति पागल होता है।
( १११ ) २६. शनि पर्वत के नीचे यदि मस्तिष्क रेखा पर द्वीप का चिह्न दिखाई दे तो २४वें वर्ष में उसे पागलखाने जाना पड़ता है । ३०. यदि सूर्य पर्वत के नीचे मस्तिष्क रेखा पर किसी प्रकार का कोई द्वीप दिखाई दे तो वह व्यक्ति जीवन में सभी दृष्टियों से असफल रहता है । ३१. यदि बुध पर्वत के नीचे इस रेखा पर द्वीप बन जाय तो विस्फोट के कारण उस व्यक्ति की मृत्यु होती है । ३२. यदि मस्तिष्क रेखा बीच में से कटी हुई हो तो ऐसे व्यक्ति असंतुलित दिमाग वाला कहा जायगा । ३३. यदि मस्तिष्क रेखा के आस-पास छोटी-मोटी बारीक रेखाएं दिखाई दें तो वह व्यक्ति अस्थिर निर्णय वाला होता है । ३४. यदि मस्तिष्क रेखा घूम कर शुक्र पर्वत की ओर जाती हुई दिखाई दे तो वह व्यक्ति उन्नति करता है तथा स्त्रियों में अत्यधिक लोकप्रिय होता है । ३५. यदि मस्तिष्क रेखा पर सफेद बिन्दु दिखाई दे तो वह व्यक्ति जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है । ३६. यदि मस्तिष्क रेखा पर काले धब्बे या बिन्दु दिखाई दें तो ऐसा व्यक्ति विकृत मस्तिष्क वाला होता है । ३७. यदि इस रेखा पर क्रॉस का चिह्न हो तो उस व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना से होती है। ३८. यदि इस रेखा पर नक्षत्र का चिह्न दिखाई दे तो उसे जीवन में गहरी चोट लगती है । ३६. यदि इस रेखा पर वृत्त का चिह्न हो तो वह व्यक्ति अदूरदर्शी तथा मूर्ख होता है । ४०. यदि इस रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो तो उसे जीवन में भयंकर हानि का सामना करना पड़ता है । ४१. यदि लम्बी उंगलियां हों और मस्तिष्क रेखा भी सीधी तथा स्पष्ट हो तो वह व्यक्ति सूक्ष्मदर्शी एवं बुद्धिमान होता है । ४२. यदि छोटी उंगलियां हों पर मस्तिष्क रेखा स्पष्ट हो तो उसके जीवन में पूर्ण प्रगति नहीं हो पाती । ४३. यदि सभी पर्वत पुष्ट हों तथा मस्तिष्क रेखा भी सीधी और स्पष्ट हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही अपने प्रयत्नों से जीवन में सफलता प्राप्त करता है । ४४. यदि हाथ में नोकीली उंगलियां हों तथा मस्तिष्क रेखा सीधी हो तो वह व्यक्ति विद्वान होता है।
( ११२ ) ४५. यदि हृदय रेखा तथा जीवन रेखा के अन्तिम छोर पर त्रिकोण का चिह्न हो तो यह शुभ माना गया है । ४६. यदि मस्तिष्क रेखा हथेली के आरपार जाती हुई दिखाई दे तो उस व्यक्ति की स्मरणशक्ति अत्यन्त तीव्र होती है और वह जीवन में मेधावी कहा जाता है । ४७. यदि हृदय रेखा छल्लेदार हो तो उसे सिर के रोग बराबर बने रहते हैं । ४८. यदि छोटा अंगूठा हो पर साथ में मस्तिष्क रेखा हल्की हो तो वह व्यक्ति अपनी ही मूर्खता से दिवालिया हो जाता है । ४९. यदि बुध पर्वत विकसित हो परन्तु मस्तिष्क रेखा कमजोर हो तो उसे जीवन में बहुत बड़ा विश्वासघात सहन करना पड़ता है । ५०. यदि चौड़ी हथेली हो तथा सूर्य पर्वत कमजोर हो, परन्तु मस्तिष्क रेखा स्पष्ट हो तो भी वह व्यक्ति जीवन में सफल नहीं हो पाता । ५१. पतली हृदय रेखा मानसिक दुर्बलता को स्पष्ट करती है । ५२. यदि मस्तिष्क रेखा पर छोटे-छोटे कई द्वीप हों तो उस व्यक्ति को सन्निपात की अवस्था में मरना पड़ता है । ५३. यदि मस्तिष्क रेखा टेढ़ी-मेढ़ी हो तो, वह व्यक्ति संकुचित विचार-धारा का होता है । ५४. यदि हृदय रेखा कमजोर हो और मस्तिष्क रेखा स्पष्ट हो तो उसे जीवन में क्षयरोग का सामना करना पड़ता है । ५५. यदि जीवन रेखा ऊपर से उद्गम करती हुई आगे बढ़ती हो, और साथ में कई छोटी-मोटी रेखाएं हों तो ऐसा व्यक्ति अत्यधिक शक्तिशाली होता है। ५६. यदि इस रेखा के अन्त में चतुर्भुज हो तो वह व्यक्ति विदेश में सफलता प्राप्त करता है । ५७. यदि गुरु एवं मंगल पर्वत विकसित हो तथा मस्तिष्क रेखा स्पष्ट हो तो ऐसे व्यक्ति में असाधारण आत्मविश्वास एवं प्रबल इच्छाशक्ति होती है । ५८. यदि मस्तिष्क रेखा अंगूठे के पास में से होकर चल रही हो तो उसकी आयु बहुत कम होती है । ५९. यदि हृदय रेखा की ओर बढ़ती हुई यह रेखा बीच में कई जगह टूटी हुई हो तो उसे जीवन में मिर्गी का रोग होता है । ६०. यदि यह रेखा जीवन रेखा के साथ-साथ आगे बढ़ रही हो तो प्रेम में विश्वासघात होने के कारण इसकी मृत्यु होती है । ६१. यदि यह रेखा चन्द्र पर्वत पर जाकर समाप्त होती है तो वह व्यक्ति प्रसिद्ध तांत्रिक होता है ।
( ११३ ) ६२. यदि यह रेखा जालीदार हो तो वह कुबास बनता होता है । ६३. यदि यह रेखा तिरछापन लिये हुए आगे बढ़ती हो तो ऐसा व्यक्ति जूए में अपना सब-कुछ बर्बाद कर लेता है। ६४. यदि यह रेखा हथेली के बीच में समाप्त होती है तो वह व्यक्ति पागल होता है। ६५. यदि यह रेखा कुछ दूर चलकर वापिस मुड़ जाती हो तो ऐसे व्यक्ति का प्रेम में दुखद अन्त होता है । ६६. यदि यह भाग्य रेखा के आस-पास जाकर समाप्त होती है तो वह व्यक्ति २५ साल के पहले-पहले मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । ६७. यदि इसका अन्त बुध पर्वत की ओर हो तो वह व्यवस्थित कार्य करने वाला व्यक्ति होता है । यदि इसका अन्त मंगल पर्वत पर हो तो उसे दिमागी परेशानी रहती है । ६८. यदि यह रेखा छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी हुई हो तो वह व्यक्ति अत्यधिक घमण्डी होता है । ६६. यदि यह सूर्य क्षेत्र के नीचे टूट जाती है तो हिंसक पशु के आघात से उसकी मृत्यु होती है । ७०. यदि मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा मिलकर न्यून कोण बनाते हों तो वह व्यक्ति राज्य सेवा में अत्यन्त उच्चपद पर पहुंचता है । ७१. यदि यह जीवन रेखा से मिलकर हृदय रेखा की ओर जा रही हो तो वह व्यक्ति अंधा होता है । ७२. यदि मस्तिष्क रेखा और स्वास्थ्य रेखा दोनों के अन्तिम सिरे पर क्रॉस का चिह्न हो तो उसे जीवन में मस्तिष्क रोगों से ग्रसित होना पड़ता है । ७३. यदि मस्तिष्क रेखा और हृदय रेखा दोनों टूटी हुई हों तो उसे गृहस्थ- जीवन का सुख नहीं मिलता । ७४. यदि स्वास्थ्य रेखा और मस्तिष्क रेखा दोनों ही लहरदार हों तो उस व्यक्ति का स्वास्थ्य अत्यन्त कमजोर होता है । ७५. यदि हथेली के मध्य में यह हृदय रेखा से मिलती है तो उसके जीवन में शस्त्र भय बना रहता है । ७६. यदि कोई अन्य रेखा मस्तिष्क रेखा को काट दे तो उसका मस्तिष्क कमजोर होता है । ∙ ७७. यदि मस्तिष्क रेखा टूटी हुई हो तथा इसके साथ अन्य रेखाएं भी हों वह व्यक्ति जीवन में पागल होता है ।
( ११४ ) ७८. यदि कोई रेखा शुक्र पर्वत से निकलकर मस्तिष्क रेखा को काटती हो तो उसका गृहस्थ-जीवन बरबाद हो जाता है । ७६. यदि मस्तिष्क रेखा से कोई शाखा निकलकर शुक्र पर्वत की ओर जाती हो तो उसका प्रेम जीवन-भर गुप्त बना रहता है । ८०. यदि इस रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर गुरु पर्वत की ओर जाती हो तो वह व्यक्ति किराने का व्यापारी होता है । ८१. यदि इस रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर शनि पर्वत की ओर जाती हो तो वह जीवन में उच्चकोटि का धार्मिक व्यक्ति होता है । ८२. यदि इस रेखा से निकल कर कोई सहायक रेखा सूर्य पर्वत की ओर जाती हो तो उसे आकस्मिक धन-लाभ होता है । ८३. यदि इस रेखा से कोई सहायक रेखा बुध पर्वत की ओर जाती हो तो निश्चय ही वह लाखों का स्वामी होता है । ८४. यदि इस रेखा के अन्त में रेखाओं का गुच्छा-सा हो तो वह व्यक्ति कुटिल झूठा एवं चालाक होता है । ८५. यदि शनि पर्वत के नीचे इस रेखा पर सफेद धब्बे हों तो उसे जीवन में आर्थिक सफलता मिलती है । ८६. यदि सूर्य पर्वत के नीचे इस रेखा पर सफेद धब्बे हों तो उसे राष्ट्र- व्यापी सम्मान मिलता है । ८७. यदि बुध पर्वत के नीचे इस रेखा पर सफेद धब्बे हों तो वह व्यक्ति करोड़पति होता है । ८८. यदि मंगल पर्वत बलवान हो और इस रेखा के अन्त में त्रिकोण बना हुआ हो तो वह अपने जीवन में किसी न किसी की हत्या अवश्य करता है । ८६. यदि इस रेखा पर कहीं पर भी लाल धब्बा हो तो सिर पर चोट लगने से उस व्यक्ति की मृत्यु होती है । ६०. यदि इस रेखा पर कहीं पर भी नीला धब्बा होता है तो वह जीवन में अपराधी मनोवृत्ति का होता है । यदि यह रेखा तर्जनी के मूल तक पहुंच जाए तो वह जीवन में असफल व्यक्ति होता है । ६१. 'यदि यह रेखा मध्यमा उंगली पर चढ़ जाय तो उस व्यक्ति की डूबने से मृत्यु होती है ।
( ११५ ) ६३. यदि यह रेखा अनामिका के मूल तक पहुंच जाए तो ऐसा व्यक्ति प्रसिद्ध तांत्रिक होता है। ६४. यदि यह रेखा कनिष्ठिका उंगली पर चढ़ जाय तो उसकी सन्निपात की अवस्था में मृत्यु होती है। ६५. यदि यह रेखा सभी दृष्टियों से दोष मुक्त हो तो उसका चुम्बकीय व्यक्तित्व होता है। वस्तुतः मस्तिष्क रेखा का हथेली में बहुत बड़ा महत्त्व होता है और यदि इस रेखा का सम्यक् अध्ययन न किया जाए तो सही भविष्यफल स्पष्ट करना कठिन हो जाता है। इसलिये हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह मस्तिष्क रेखा का भली-भांति अध्ययन कर अपनी धारणा को पुष्ट बनाकर भविष्य कथन करे जिससे वह अपने जीवन में यशस्वी हो सके।
हृदय रेखा हथेली में जीवन रेखा, और मस्तिष्क रेखा का जितना महत्त्व है लगभग उतना ही महत्त्व हृदय रेखा का भी है । इसलिये विद्वानों को चाहिए कि वह हृदय रेखा के बारे में सावधानी के साथ अध्ययन करें । जिस व्यक्ति के हाथ में हृदय रेखा शुद्ध, स्पष्ट, निर्दोष और ललायी लिये हुए होती है, वह व्यक्ति वास्तव में ही अपने जीवन में सफल होता है, और उसे समाज से पूरा यश तथा सम्मान मिलता है। ऐसे व्यक्ति सामाजिक उत्तरदायित्व को अनुभव करते हैं और अपने जीवन में मानवोचित गुण सामने रखकर आगे बढ़ते हैं । यदि यह रेखा अस्पष्ट कमजोर टूटी हुई या कटी-छटी होती है तो वह व्यक्ति कितना ही दृढ़ एवं धनवान क्यों न हो उसे सही रूप में मानव नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऐसा व्यक्ति हृदय से स्वार्थी, पापी तथा कलुषित होगा। ऐसे व्यक्ति का सहज ही विश्वास नहीं करना चाहिए । हृदय रेखा मनुष्य की हथेली में कनिष्ठिका उंगली के नीचे बुध पर्वत के नीचे से निकलकर सूर्य तथा शनि क्षेत्र को पार करती हुई गुरु पर्वत तक जाती है, परन्तु सभी हाथों में ऐसा नहीं होता । सामान्यतः इस रेखा की पांच स्थितियां पायी जाती हैं जो कि निम्नलिखित हैं : १. पहले प्रकार की हृदय रेखा वह होती है जो बुध पर्वत के नीचे से प्रारम्भ होकर सूर्य और शनि पर्वत के नीचे चलती हुई गुरु पर्वत पर जाकर समाप्त होती है। २. कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से प्रारम्भ होकर सूर्य शनि तथा गुरु पर्वत के नीचे-नीचे चलती हुई हथेली के उस पार तक जा पहुंचती है। ३. कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से निकलकर सूर्य पर्वत के नीचे ही समाप्त हो जाती है । ४. कुछ हाथों में यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से निकल कर शनि पर्वत के नीचे समाप्त हो जाती है। ५. कुछ व्यक्तियों की हथेलियों में यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से निकल कर तर्जनी और मध्यमा के बीच में जाकर समाप्त होती है । उपर्युक्त पांचों ही प्रकार की स्थितियों का अध्ययन करने से उनका फलादेश में अन्तर आता है । इस रेखा से मानव का हृदय उसकी इच्छाएं, उसका व्यवहार,