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व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) १५ कौन (दूषित होता है) ? वाग्योगवित् ही । कैसे यह (जाना) ? जो शब्दों को जानता है, वह अपशब्दों को भी जानता है । जिस तरह शब्दों के ज्ञान में धर्म है, उसी तरह अपशब्द के ज्ञान में अधर्म भी है । अथवा, अधिक अधर्म को प्राप्त करता है । अपशब्द अधिक हैं, (साधु) शब्द कम । एक एक शब्द के बहुत से अपभ्रंश हैं । जैसे “गो:” इस शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि प्रकार के अपभ्रंश हैं । और जो अवाग्योगवित् है, उसका रक्षक अज्ञान है । (यह) कथन अनुचित है । अज्ञान पूर्णरूप से रक्षक नहीं हो सकता । मेरा विचार है कि जो अनजाने में भी ब्राह्मण की हत्या कर दे या सुरापान करे, वह भी कदाचित् पतित होता ही है । अच्छा तो—वह वाग्योगवित् परलोक में अनन्त विजय को प्राप्त करता है । (अवाग्योगवित्) अपशब्दों से दूषित (पतित) हो जाता है । कौन (पतित होता है) ? अवाग्योगवित् ही । जो वाग्योगवित् है, विशिष्ट ज्ञान ही उसका रक्षक है । यह (वचन) कहाँ पढ़ा गया है ! भ्राज नामक (कात्यायन प्रणीत) श्लोक है, (उनमें) । अरे ! तो क्या श्लोक भी प्रमाण हैं ? तो क्या है ? यदि श्लोक भी प्रमाण हैं, तो यह श्लोक भी प्रमाण हो सकता है—“जो ताम्र वर्ण वाली सुराहियों का महान् समूह भी दिया हुआ स्वर्ग को नहीं ले जा सकता तो यज्ञगत (वह थोड़ा सा सुरापान) क्या ले जायेगा । यह आपका प्रमादपूर्ण गीत है । जो अप्रमत्तगीत होता है, वही प्रमाण होता है । यस्तु प्रयुङ्क्ते । उषा—शब्द एक अर्थ में प्रयुक्त होने पर साधु होता है, अन्यत्र दूसरे अर्थ में वही असाधु हो जाता है । जैसे 'अस्व' शब्द धनाभाव निमित्तक होने पर साधु है, जातिवाचक 'अश्व' अर्थ में प्रयुक्त होने पर यही असाधु हो जाता है । वाग्योगवित् शब्दों के इन विशिष्ट अर्थों को जानता है और व्यवहार में उनका कुशलतापूर्वक प्रयोग करता है, अत एव साधु शब्द के ज्ञानपूर्वक प्रयोग से वह अभ्युदय को प्राप्त करता है । श्लोक में प्रत्यासत्ति के कारण वाग्योगबित् का ही “दुष्यति” के साथ अन्वय करके पूर्वपक्षी ने उसके लिए तर्क उपस्थित करते हुए कहा है कि शब्दज्ञान की

१६ महाभाष्यम् प्रक्रिया में अपशब्द का ज्ञान भी होता ही है और शब्दज्ञान जिस प्रकार से धर्म का हेतु है उसी प्रकार अपशब्दज्ञान अधर्म का कारण होगा और क्योंकि अपशब्द अधिक है अतः वह अधिक दोष से युक्त होगा । इसके विपरीत जो शब्दों का प्रयोग नहीं जानता उसके प्रयोग अज्ञानावस्था में किये जाने के कारण क्षम्य होंगे । अतः वाग्योगवित् ही दूषित होता है । परन्तु पूर्वपक्षी के ये दोनों ही तर्क सिद्धान्ती को स्वीकार्य नहीं हुए । शब्द- ज्ञान तो धर्म का हेतु होता है परन्तु अपशब्दज्ञान से अधर्म प्राप्ति में कोई भी श्रुति प्रमाणरूप में उपस्थापित नहीं की जा सकती । यही बात आगे “कि पुनः शब्दस्य ज्ञाने धर्मः ग्राहोस्वित्प्रयोगे" इस वार्त्तिक के व्याख्यान में विस्तार से प्रतिपादित है । जहाँ तक अवाग्योगवित् के अज्ञानशरण होने की बात है, वह भी इसलिए स्वीकार्य नहीं हो सकती क्योंकि अज्ञानावस्था में किये गये ब्रह्महत्या आदि पाप भी दोष के कारण होते ही हैं । इसलिए वाग्योगवित् के साथ 'दुष्यति' का अन्वय नहीं किया जा सकता । वाग्योगवित् साधु शब्दों के ज्ञानपूर्वक प्रयोग से विजय को प्राप्त करता है, अवाग्योगवित् असाधु शब्दों के प्रयोग से दूषित होता है । यही बात कात्यायन प्रणीत भ्राज नामक श्लोकों में भी कही गई है । सौत्रामणि याग में किञ्चित् सुरापान के विधान को लेकर कहे गये— यदुदुम्बरवर्णानां घटीनां मण्डलं महत् । पीतं न गमयेत्स्वर्गं किं तत्क्रतुगतं नयेत् ॥ इस श्लोक की तरह कात्यायन प्रणीत श्लोक प्रमत्तगीत नहीं हैं । मूलम्— अविद्वांसः— अविद्वांसः प्रत्यभिवादे नाम्नो ये न प्लुतिं विदुः । कामं तेषु तु विप्रोष्य स्त्रीष्विवायमहं वदेत् ॥ अभिवादे स्त्रीवन्मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम् । अविद्वांसः । प्रदीपः—स्त्रीष्विवेति । प्रत्यभिवादे हि गुरुणा प्लुतः कार्यः । यस्तु प्लुतं कर्तुं न जानाति स स्त्रीवद्वक्तव्योऽयमह्मिति; न "अभिवादये देवदत्तोऽहम्" इत्यादिना संस्कृतवाक्येनेत्यर्थः । अनुवाद—जो अविद्वान् प्रत्यभिवादन में नाम को प्लुत करना नहीं जानता, बाहर से आने पर भले ही उनके प्रति स्त्रियों की तरह "अयमहम्" इस प्रकार से कहे (अभिवादन करे) । अभिवादन में हम स्त्रियों की तरह न हो जायें, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । अविद्वांसः । उषा—मनुस्मृति में कहा गया है कि वृद्ध पुरुष के प्रवेश करने पर युवक के प्राण ऊपर की ओर उत्क्रमित होते हैं । वृद्ध को प्रणाम करके वह उन्हें पुनः प्राप्त

प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) १७ कर लेता है (मनु० २।२०) । अभिवादन प्रकार के विषय में मनु का कथन है कि युवा अभिवादन करने के पश्चात् “अमुकनामाऽहं भोः” ऐसा कहे । (अभिवादये शुभशर्माऽहं भोः) । प्रत्यभिवादन में ब्राह्मण अभिवादनकर्त्ता को पूर्वाक्षर प्लुत करके आशीर्वाद दे— आयुष्मान्भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने । अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः ॥ २।१२५ प्रत्यभिवादन में जो लोग नाम को प्लुत करना नहीं जानते उन्हें स्त्रियों के समान “अयमहर्माभिवादये” इस प्रकार ही कहकर अभिवादन करना चाहिए— नामधेयस्य ये केचिदभिवादं न जानते । तान्प्राज्ञोऽहमिति ब्रूयात्स्त्रियः सर्वास्तथैव च ॥ २।१२३ पाणिनि ने भी शूद्रविषयक प्रत्यभिवादन से अतिरिक्त वाक्य की 'टि' को प्लुत करने का विधान किया था — “प्रत्यभिवादेऽशूद्रे” (अष्टा० ८।२।८३) । 'टि', 'प्लुत' आदि का ज्ञान व्याकरण से ही होता है। हमारे साथ भी प्रत्यभिवादन विधि का ज्ञान न होने के कारण स्त्रियों की तरह व्यवहार न हो इसलिए हमें भी इस प्रकार के नियमों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । मूलम्—विभक्तिं कुर्वन्ति— याज्ञिकाः पठन्ति—"प्रयाजाः सविभक्तिकाः कार्याः" इति । न चान्तरेण व्याकरणं प्रयाजाः सविभक्तिकाः शक्याः कर्तुम् । विभक्तिं कुर्वन्ति । प्रदीपः—प्रयाजा इति । प्रयाजमन्त्रा ऊह्यमानाग्निशब्दप्रकृतिकविभक्तियुक्ता इत्यर्थः । यथा समिधः समिधोऽग्न आज्यस्य व्यन्तु अग्नेऽग्न इति । अनुवाद — मीमांसक कहते हैं—"प्रयाज मन्त्रों को विभक्तियुक्त करना चाहिए (करके पढ़ना चाहिए) । और व्याकरण (के ज्ञान) के बिना प्रयाजों को सविभक्तिक नहीं किया जा सकता । विभक्तिं कुर्वन्ति । उषा—यद्यपि प्रयाजमन्त्र विभक्तिसहित ही पढ़े गये हैं तथापि आधान के अनन्तर यदि कोई विघ्न उपस्थित हो जाये तो पुनराधेय इष्टि करनी पड़ती है । ऐसी परिस्थिति के लिये ही इस शास्त्र का आरम्भ किया गया है । "त्वमेव प्रयाजानुयाजानां पुरस्तात्तवं पश्चात्" इत्यादि वेदमन्त्र में प्रकृतिभूत अग्नि शब्द को श्रौत सम्प्रदाय के अनुसार प्रथमा, द्वितीया, तृतीया षष्ठी और सप्तमी विभक्ति से युक्त करके पढ़ा जाता है। आपस्तम्ब के अनुसार प्रथम चार को विभक्तियुक्त किया जाता है, अन्तिम को नहीं। व्याकरण ज्ञान के बिना इस प्रकार से प्रयाजों को विभक्तियुक्त कर पाना सम्भव नहीं है ।

१८ महाभाष्यम् मूलम्—यो वा इमाम्— “यो वा इमां पदशः स्वरशोऽक्षरशश्च वाचं विदधाति स ऋत्विजीनो भवति ।” ऋत्विजीनाः स्यामेत्यध्येयं व्याकरणम् । यो वा इमाम् । प्रदीपः-- पदश इति । पदं पदमिति संख्यैकवचनाच्च वीप्सायामिति शस् । स्वरश । स्वर उदात्तादिः । अक्षरश इति । अक्षरं व्यञ्जनसहितोऽच् । ऋत्विजीन इति । ऋत्विजमर्हत्यर्त्विजीनो यजमानः । ऋत्विक्कर्मार्हतीति याजकोऽप्यार्त्विजीनः । यज्ञर्त्विग्भ्यां घखञाविति सूत्रेण यज्ञर्त्विग्भ्यां तत्कर्मार्हतीति चोपसंख्यानमिति वार्तिकेन च खञ् । विद्वान्यजेत विद्वाञ्याजयेदिति द्वयोरपि विदुषोरधिकारात् । अनुवाद—जो इस वाणी का पदशः, स्वरशः और अक्षरशः यथायुक्त विधान (प्रयोग, व्यवहार) करता है, वह निश्चय ही ऋत्विजीन होता है । हम भी ऋत्विजीन हों इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । यो वा इमाम् । उषा—जो विद्वान् प्रतिपद, प्रतिस्वर तथा प्रत्यक्षर इस वाणी का यथोचित प्रयोग करता है, वह “ऋत्विजीन” होता है। ऋत्विजीन पद के प्रदीपकार के अनुसार “ऋत्विजमर्हत्यर्त्विजीनः” इस व्युत्पत्ति के अनुसार यजमान तथा “ऋत्विक्कर्मार्हतीति” इस व्युत्पत्ति से याजक, दोनों ही अर्थ हो सकते हैं । यजन और याजन दोनों में ही विद्वन्मात्र का अधिकार होने के कारण पद, स्वर और अक्षर का ज्ञान कर विद्वान् होने के लिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । तत्त्वालोककार के अनुसार यजमान को यजन के फल से स्वर्गादि की अप्रत्यक्ष प्राप्ति होती है । याजक को धनादि का लाभ प्रत्यक्ष ही है । पदशः, स्वरशः, अक्षरशः पदों में शस् प्रत्यय “संख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम्” इस सूत्र से हुआ है । मूलम्—चत्वारि— “चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ आविवेश ॥” इति चत्वारि शृङ्गाणि पदजातानि नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्च । त्रयो अस्य पादाः । त्रयः काला भूतभविष्यद्वर्तमानाः । द्वे शीर्षे । द्वौ शब्दात्मानौ नित्यः कार्यश्च । सप्त हस्तासो अस्य । सप्त विभक्तयः । त्रिधा बद्धः । त्रिषु स्थानेषु बद्ध उरसि, कण्ठे, शिरसीति । वृषभो वर्षणात् । रोरवीति शब्दं करोति । कुत एतत् ? रौतिः शब्दकर्मा । महो देवो मर्त्याँ आविवेशेति । महान्देवः शब्दः । मर्त्या मरणधर्माणो मनुष्यास्तानाविवेश । महता देवेन नः साम्यं यथा स्यादित्यध्येयं व्याकरणम् ।

प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) १६ अपर आह— “चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥” 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि ।' चत्वारि पदजातानि नामाख्यातो- पसर्गनिपाताश्च । 'तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।' मनस ईषिणो मनीषिणः 'गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति ।' न चेष्टन्ते न निमिषन्तीत्यर्थः । 'तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ।' तुरीयं वा एतद्वाचो यन्मनुष्येषु वर्तते चतुर्थमित्यर्थः । चत्वारि । प्रदीपः—चत्वारि । शब्दस्य वृषभत्वेन निरूपणम् । त्रयः काला इति । लडादिविषयाः । नित्यः कार्यश्चेति । व्यङ्ग्यव्यञ्जकभेदेन । सप्त विभक्तय इति । सुप इत्यर्थः । केचित्तु तिङामपरिग्रहप्रसङ्गात्सह शेषेण सप्त कारकाणि विभक्तशब्दा- भिधेयानीति व्याचक्षते । वर्षणादिति । कामानां ज्ञानपूर्वकानुष्ठानफलत्वात् । महतेति । परेण ब्रह्मणेत्यर्थः । चत्वारीत्यनेनैकदेशेन सदृशेन वाक्यान्तरमपि सूचयत इत्याह— अपर आहेति । परिमितानीति प्राप्ते शेश्छन्दसि बहुलमिति शेर्लोपः परिमितेति भवति । परिमितानि परिच्छिन्नान्येतावन्त्येवेत्यर्थः । मनीषिशब्दः पृषोदरादित्वात्साधुः । कथं मनीषिण एव विदन्तीत्याह—गुहेति । अज्ञानमेव गुहा तस्यामित्यर्थः । सुपां सुलुकिति सप्तम्या लुक् । व्याकरणप्रदीपेन तु तानि प्रकाशन्ते । तत्र चतुर्णां पदजातानामेकैकस्य चतुर्थभागं मनुष्या अवैयाकरणा वदन्ति । नेङ्गयन्तीत्यस्यैव व्याख्यानं न चेष्टन्ते, न निमिषन्तीति । अनुवाद—इसके चार सींग हैं, तीन पैर, दो सिर (और) इसके सात हाथ हैं । तीन स्थानों से बँधा हुआ वृषभ शब्द करता है । (ऐसे) महान् देव ने मनुष्यों में प्रवेश किया है । चार सींग पदराशियां हैं—नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात । इसके तीन पाद तीन काल हैं—भूत, वर्तमान और भविष्यत् । दो सिर नित्य और कार्यरूप दो शब्द हैं । सात विभक्तियां हैं । "त्रिधा बद्धः" (का अर्थ है) तीन स्थानों छाती, कण्ठ व सिर से बँधा हुआ । वृष्टि करने के कारण वह वृषभ है । रोरवीति (का अर्थ है) शब्द करता है । यह कैसे (जाना) ? 'रु' धातु शब्दकर्मक है । "महान् देव मनुष्यों में प्रविष्ट हुआ है", इसमें महान् देव 'शब्द' का वाचक है (अर्थात्) (शब्द) मरणधर्मा मनुष्यों में प्रविष्ट हुआ है । (उस) महान् देव (शब्द) के साथ हमारा सायुज्य हो, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए ।

२० महाभाष्यम् अन्य (व्यथित) कहता है— वाणी चार पदों में परिच्छिन्न है। उन्हें (चार पदों को) मनीषी ब्राह्मण जानते हैं। (उनके) तीन भाग गुहा में निहित हैं (जो) चेष्टा नहीं करते। मनुष्य (अवैयाकरण) (तो) उनका चतुर्थ भाग ही बोलते हैं। 'वाणी चार पदों में परिच्छिन्न है', (यह) वाणी के चार पदों नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात (का वाचक है)। जो मनीषी ब्राह्मण हैं, (वे) उन्हें जानते हैं। मन के वशीकर्त्ता मनीषी हैं। 'गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति' (का अर्थ है कि) (उनमें से) तीन गुहा में निहित चेष्टा नहीं करते, झपकते नहीं। यह वाणी का तुरीय अर्थात् चतुर्थ भाग है जो (साधारण) मनुष्यों में रहता है। चत्वारि। उषा—ऋग्वेद के इस मन्त्र की व्याख्या यास्क ने अपने निरुक्त में भी की है परन्तु उसका विवेचन देवयज्ञ को लक्ष्य बनाकर प्रवृत्त हुआ है। पतञ्जलि ने यहाँ शब्द का वृषभ के रूप में निरूपण किया है। शब्द रूप वह महान् देव मर्त्यधर्मा मनुष्यों में उनके आर्थिक व्यवहारों के सम्पादन के लिए आविर्भूत हुआ है— इदमन्धं तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम् । यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यति ॥ (काव्यादर्श १।४) उस महान् वृषभ रूप शब्द के नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात रूप चार सींग हैं। "नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्च" में अनुक्तसमुच्चयार्थक चकार के अर्थ को ग्रहण करके नागेश ने इनका विवेचन परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप में भी किया है। अभ्यासार्थक √म्ना से व्युत्पन्न नाम शब्द सुबन्तका तथा आख्यात शब्द तिङन्त का वाचक है। उपसर्ग और निपात का पृथगुपादान गोबलीवर्दन्‍याय से किया गया है। तीन पादों से इसके तीन काल भूत, वर्त्तमान और भविष्यत् वाच्य हैं। वर्त्तमान काल लट् लकार का विषय है, भूतकाल लिट्, लङ् और लुङ् लकारों से वाच्य होता है, लुट् और लृट् लकार भविष्यत् के विषय हैं। "द्वे शीर्षे" पद का व्याख्यान शब्द की नित्य और कार्य रूप दो अवस्थाओं को आधार बनाकर किया गया है। नित्य शब्द स्फोट रूप तथा व्यंग्य है, कार्य शब्द ध्वनि रूप तथा स्फोट का व्यंजक है। भर्तृहरि ने शब्द के इन दो रूपों का व्याख्यान इस वारिका में किया है— द्वावुपादानशब्देषु शब्दौ शब्दविदो विदुः । एको निमित्तं शब्दानाम्अपरोऽर्थे प्रयुज्यते ॥ सात हाथ इसकी सात विभक्तियों के वाचक हैं। सम्बन्ध के कारकों में परिगणित न होने के कारण कारकों की सात विभक्तियों के रूप में उद्भावना नहीं की जा सकती, कारक छः ही होते हैं। वह उरस्, कण्ठ और शिर रूप तीन

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २१ स्थानों में बद्ध है। इस प्रकार के महान् शब्दब्रह्म रूप देव के साथ सायुज्य प्राप्ति की बात भर्तृहरि ने इस प्रकार की थी— अपि प्रयोक्तुरात्मानं शब्दमन्तरवस्थितम् । प्राहुर्महान्तमृषभं येन सायुज्यमिष्यते ॥ एक अन्य मन्त्र में भी वाणी का पदविभाजन चार रूपों में किया गया है । मनीषी लोग नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात रूप चारों विभागों में विभक्त पदों की परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप चारों स्थितियों को जानते हैं । परा वाङ्मूलचक्रस्था पश्यन्ती नाभिसंस्थिता । हृदिस्था मध्यमा ज्ञेया वैखरी कण्ठदेशगा ॥ इनमें से परा, पश्यन्ती और मध्यमा रूप प्रथम तीन ज्ञान-सामान्य का विषय नहीं हो सकतीं । केवल वैयाकरण ही उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । साधारण मनुष्य केवल वैखरी रूप चतुर्थ भाग को ही जानते हैं क्योंकि यही सामान्य व्यक्ति के ज्ञान का विषय है । अन्यत्र भर्तृहरि ने वाणी के तीन रूपों की ही चर्चा की है— वैखर्या मध्यमायाश्च पश्यन्त्याश्चैतदद्भुतम् । अनेकतीर्थभेदायास्त्रय्या वाचः परं पदम् ॥ उनके अनुसार परा रूप वाणी व्याकरण के विवेचन का विषय नहीं बनती । मूलम्—उत त्वः— “उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाच- मुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्य उशती सुवासाः ॥” उत त्वः अपि खल्वेकः पश्यन्नपि न पश्यति । अपि खल्वेकः शृण्वन्नपि न शृणोत्येनामिति । अविद्वांसमाहार्धम् । उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे तनुं विवृणुते । जायेव पत्य उशती सुवासाः । तद्यथा जाया पत्ये कामयमाना सुवासाः स्वमात्मानं विवृणुते, एवं वाग्योगविदे स्वात्मानं विवृणुते । वाङ्नो विवृणुयादात्मानमित्यध्येयं व्याकरणम् । उत त्वः । प्रदीपः—उत त्व इति । त्वशब्दोऽन्यवाची । उतशब्दोऽपि शब्दस्यार्थे । स च भिन्नक्रमः । प्रत्यक्षेण शब्दस्वरूपमुपलभमानोऽप्यर्थापरिज्ञानान्न पश्यतीत्यर्थः । उतो इति । उत उ इति निपातसमाहारः अविद्वांसमाहार्धमिति । अविद्वल्लक्षण- मर्थमर्धचं आहेत्यर्थः । अनुवाद—“कोई एक देखता हुआ भी वाणी को नहीं देखता, कोई एक सुनता हुआ भी इसे नहीं सुनता । किसी अन्य एक के लिए (वाणी) पति के सम्मुख शुभ्र वस्त्र धारण किये हुए कामयमाना पत्नी के समान अपने शरीर को अनावृत कर देती है ।”

कोई एक (मनुष्य) देखता हुआ भी वाणी को नहीं देखता है, कोई एक सुनता हुआ भी इसे नहीं सुनता है । यह आधा भाग अविद्वान् के विषय में कहा है । 'उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे' (का अभिप्राय है कि) अन्य एक के लिए वह अपने शरीर को अनावृत कर देती है, जैसे सुन्दर वस्त्र धारण करने वाली कामयमाना पत्नी पति के सम्मुख अपने शरीर को अनावृत कर देती है । वाणी हमारे सम्मुख भी (इसी प्रकार) अपने को अनावृत कर दे, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । उत त्वः । उषा :—प्रस्तुत वैदिक ऋचा वाक्तत्त्व की एवं अर्थतत्त्व की अवश्यं- प्रापणीयता की ओर संकेत करती है । वाणी का फल अर्थपरिज्ञान है और अर्थ की प्राप्ति यदि नहीं होती तो शब्दज्ञान भी महत्त्वहीन होकर रह जाता है । अर्थात्मक विज्ञान से हीन होने पर अध्ययन में अभ्यस्त तथा तीक्ष्ण बुद्धि व्यक्ति भी वाक्तत्त्व का दर्शन नहीं कर पाता । दूसरा व्यक्ति वाणी को सुनता हुआ भी यथार्थ में नहीं सुन पाता क्योंकि अर्थज्ञान की हीनता की स्थिति में वह श्रवण भी अर्थहीन होकर रह जाता है । क्योंकि अर्थतत्त्व वस्तुतः वाक्तत्त्व का शरीर है और वाक्तत्त्व और अर्थ- तत्त्व की आत्मा, अतः एक अन्य व्यक्ति जिसने वाक्तत्त्व का सम्यक् अध्ययन तथा अर्थतत्त्व का अनुशीलन किया है, उसके सम्मुख वाणी अपने शरीर को उसी प्रकार से अनावृत कर देती है जैसे ऋतुकाल के उपरान्त सद्यः स्नाता स्त्री अपने स्वरूप को पति के सम्मुख प्रकट कर देती है । प्रकृति प्रत्ययादि के ज्ञान से युक्त वह वैयाकरण वाणी के अर्थ को सम्यक् ग्रहण करके उसका दर्शन और श्रवण करता है । यह वाणी हमारे सम्मुख भी उसी प्रकार से अनावृत और प्रकाशित हो जाये, इसलिए व्याकरण का अध्ययन अपरिहार्य है । विसस्रे—वि + √सृ + लिट् प्र०पु० एक व० । उशती—√वश् + शतृ + ङीष् । मूलम्—सक्तुमिव— “सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत । अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि ॥” सक्तु—सचतेर्दुर्भावो भवति । कसतेर्वा विपरीताद् विकसितो भवति । तितउ परिपवनं भवति—ततवद्वा तुन्नवद्वा । धीरा ध्यानवन्तः । मनसा प्रज्ञानेन । वाचमक्रत वाचमकृषत । अत्र सखायः सख्यानि जानते । अत्र सखायः सन्तः सख्यानि जानते । क्व ?

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २३ य एष दुर्गो मार्गः, एकगम्यो वाग्विषयः । के पुनस्ते ? वैयाकरणाः । कुत एतत् ? भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि । एषां वाचि भद्रा लक्ष्मीर्निहिता भवति । लक्ष्मीर्लक्षणाद्भासनात्परिवृढा भवति । सक्तुमिव । प्रदीपः—सचतेरिति । षच सेचन इत्यस्य । दुर्धाव इति । दुःशोधः । यथा तितउना सक्तोस्तुषाद्यपनीयते तथा व्याकरणेन वाचोऽपशब्दा इत्यर्थः । कसतेरिति । पृषोदरादित्वादवर्णव्यत्ययः । ततवदिति । विस्तारयुक्तमित्यर्थः । तुन्नवदिति । बहुच्छिद्रम् धीरा इति । वैयाकरणाः । वाचमक्रतेति । अपशब्दभ्यो विविक्तां कृतवन्तः । मन्त्रे घसेति च्लेर्लुकि सत्यक्रतेति रूपम् । अत्रा सखाय इति । ऋचि तुनुघेति दीर्घः । सखायः समानख्यातयो भेदग्रहस्य निवृत्तत्वात्सर्वमेकमिति मन्यन्ते । सख्यानीति । सायुज्यानीत्यर्थः । एकगम्य इति । ज्ञानेनैव प्राप्यः । वाचीति । वेदाख्ये ब्रह्मणि या लक्ष्मीर्वेदान्तेषु परमार्थसंविल्लक्षणोक्ता सैषां निहितेत्यर्थः । अनुवाद—"पवित्र से सत्तू के समान जहाँ धीर लोग मन से पुनकर वाणी का व्याकरण करते हैं वहाँ समान ख्याति वाले मनुष्य सायुज्य का अनुभव करते हैं । कल्याणमयी लक्ष्मी इनकी वाणी में निहित होती है ।" 'सक्तुः' सच धातु से बना है (क्योंकि) इसे धोना कठिन होता है । अथवा कस् धातु से आद्यन्तविपर्यय करके (क्योंकि) विकसित होता है । 'तितउ' पवित्र (छलनी) को कहते हैं (क्योंकि) यह विस्तार वाली होती है, अथवा छिद्रों वाली होती है । धीर (वे हैं जो) ध्यानवान् होते हैं । मनसा (का अर्थ है) प्रकृष्ट ज्ञान से । वाचमक्रत (अर्थात्) वाणी को व्याकृत किया । यहाँ समान ख्याति वाले होकर सायुज्य का अनुभव करते हैं । कहाँ ? यह जो दुर्गम, एकमात्रगम्य वाणी का मार्ग है । वे कौन हैं ? वैयाकरण । यह कैसे (कहा) ? (क्योंकि) इनकी वाणी में कल्याणमयी लक्ष्मी निहित होती है । लक्ष्मी (वह है जो) लक्षण करती है (अर्थात्) चमकती है (अपि च) विस्तार वाली होती है । सक्तुमिव । उषा—प्रस्तुत मन्त्र व्याकरण के मोक्षजनकत्व का ज्ञापक है । छलनी से जिस प्रकार सत्तूओं को शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार से वैयाकरण व्याकरण के

२४ महाभाष्यम् प्रकृष्ट ज्ञान से शब्दों का संस्कार करते हैं। शब्द-अपशब्द का विवेक होने के कारण वे केवल साधु शब्दों का प्रयोग करते हैं और अपशब्दों का परिहार करते हैं। इस प्रकार सुशब्द के ज्ञानपूर्वक प्रयोग करने से वे वाक्तत्त्व के साथ सायुज्य को प्राप्त करते हैं। इससे उनकी द्वैतबुद्धि मिट जाती है, अद्वैतभाव उत्पन्न हो जाने के कारण वे सम्पूर्ण जगत् को शब्दब्रह्ममय अनुभव करते हैं, अतश्च वे भी ब्रह्ममय ही हो जाते हैं, क्योंकि "तज्ज्ञात्वा तदेव भवति" ऐसा श्रुति में कहा गया है । कैयट ने यहाँ कहा है कि वेदब्रह्म में जिसे लक्ष्मी कहा गया है तथा वेदान्त दर्शन में जो परमार्थसंविल्लक्षणा सिद्धि के नाम से व्याख्यात हुई है, वही लक्ष्मी वैयाकरणों की वाणी में निहित है। नागेश ने इसका भाव स्पष्ट करते हुए इसका सम्बन्ध उस शब्दब्रह्म से स्थापित किया है जो अर्थतत्त्व के साथ अभिन्नता को प्राप्त कर अद्वैत रूप में स्थित है। ब्रह्मतत्त्व की प्राप्ति का उपाय निर्विकल्प समाधि है, इसके कठिनता से प्राप्त हो सकने के कारण ही इसे (वाणी के मार्ग को) "दुर्गो मार्ग एकगम्यो..." कहा गया है। "एकगम्यः" से अभिप्राय है कि इसकी (ब्रह्मतत्त्व की) प्राप्ति का और कोई उपाय भी सम्भव नहीं—"नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।" भाष्यकार ने 'तितउ' शब्द का नपुंसकलिंग में प्रयोग किया है, जबकि अन्यत्र अमरकोश में यह पुंल्लिंग पढ़ा गया है— "चालनी तितउः पुमान् ।" मूलम्—सारस्वतीम्— याज्ञिकाः पठन्ति—"आहिताग्निरपशब्दं प्रयुज्य प्रायश्चित्तीयां सारस्वती- मिष्टिं निर्वपेद्" इति । प्रायश्चित्तीया मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम् । सारस्वतीम् । प्रदीपः — प्रायश्चित्तीयामिति । भवार्थे वृद्धाच्छः । प्रायश्चित्तीया इति । प्रायश्चित्ताय पापशोधनाय श्रुतिस्मृतिविहिताय कर्मणे हितास्तन्निमित्तोपादाना मा भूमेत्यर्थः । अनुवाद—मीमांसक पढ़ते हैं कि "अग्न्याधान करके अपशब्द का प्रयोग (करने पर) प्रायश्चित्त स्वरूप सारस्वती इष्टि का सम्पादन करे।" (हमें) प्रायश्चित्त न करना पड़े इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । सारस्वतीम् । उषा—भाष्यस्थ "आहिताग्निः" शब्द के अनन्तर 'यज्ञमध्ये' शब्द का अध्याहार करना होगा। अर्थात् वह पुरुष जिसने अग्न्याधान किया है, यदि वह यज्ञ में अपशब्द का प्रयोग करता है तो उस पाप के प्रक्षालन के लिए सारस्वती इष्टि का निर्वाप करना पड़ता है। हमें आहिताग्नि होने पर अपशब्द के प्रयोग से पाप प्रक्षालन के लिए प्रायश्चित्त ही न करना पड़े, इसलिए हमें व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए।

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २५ "दुष्टः शब्दः", 'यस्तु प्रयुङ्क्ते" इत्यादि अन्य प्रयोजनों में यद्यपि अपशब्द के प्रयोग से होने वाले दोष की ओर संकेत किया गया है तथापि यहाँ यज्ञ में अपशब्द के प्रयोग से होने वाले दोष का पृथक् आख्यान किया गया है क्योंकि यज्ञ में अपशब्द का प्रयोग करने से यज्ञ और पुरुष दोनों को ही दोष लगता है, जबकि अन्यत्र दोषभाक् केवल पुरुष ही होता है । "आहिताग्नि" पद का उपादान प्रस्तुत निषेधवाक्य के यज्ञगत होने का संकेत देता है । प्रायश्चित्तीय शब्द में 'वृद्धाच्छः' सूत्र से 'छ' प्रत्यय हुआ है । मूलम् - दशम्यां पुत्रस्य- याज्ञिकाः पठन्ति-दशम्युत्तरकालं पुत्रस्य जातस्य नाम विदध्याद् घोषवदाद्यन्तरन्तःस्थमवृद्धं त्रिपुरुषानूकमनरिप्रतिष्ठितम् । तद्धि प्रतिष्ठिततमं भवति । द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा नाम कृतं कुर्यान्न तद्धितम् इति । न चान्तरेण व्याकरणं कृतास्तद्धिता वा शक्या विज्ञातुम् । दशम्यां पुत्रस्य । प्रदीपः-दशम्युत्तरकालमिति । दशम्या उत्तर इति । पञ्चमीति योग- विभागात्समासः । ततः कालशब्देन बहुव्रीहिः । क्रियाविशेषणं चैतत् । दश दिनान्य- शौचं भवतीति दशम्युत्तरकालमित्युक्तम् । येऽपि गृह्यकाराः पठन्ति दशम्यां पुत्रस्येति, तैरपि दशम्यामिति सामीपिकमधिकरणं व्याख्येयम् । घोषवदादीति । घोषवन्तो ये वर्णाः शिक्षायां प्रदर्शितास्तदादि । अन्तरन्तःस्थमिति । मध्ये यरलवा यस्य तदित्यर्थः । त्रिपुरुषानूकमिति । नामकरणे योऽधिकारी पिता तस्या ये त्रयः पुरुषास्ताननुकायत्यभिधत्त इति त्रिपुरुषानूकम् । अन्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः । अनुवाद - मीमांसक कहते हैं-"दशमी (रात्रि) के अनन्तर उत्पन्न पुत्र का नामकरण करना चाहिए जो आदि में घोष वर्णं वाला हो, बीच में अन्तःस्थ वर्णं वाला हो, वृद्ध स्वरों (आदैच्) से युक्त न हो, जो (पिता के) तीन पूर्वपुरुषों के नाम का स्मरण कराता हो (तथा) जो शत्रु में प्रसिद्ध न हो । वह प्रतिष्ठिततम होता है । दो अक्षरों वाला अथवा चार अक्षरों वाला कृदन्त नाम करना चाहिए, तद्धित नहीं । व्याकरणाध्ययन के बिना कृदन्त अथवा तद्धित प्रत्ययों का विशिष्ट ज्ञान नहीं हो सकता । दशम्यां पुत्रस्य । उषा-नामकरण में भी व्याकरणाध्ययन का प्रयोजन है । वैदिक लोग जातकर्म संस्कार के अनन्तर बालक के नामकरण संस्कार का उल्लेख करते हैं । उत्पन्न पुत्र का दस दिन के उपरान्त नामकरण संस्कार किया जाना चाहिए । इससे पूर्व अशौच के कारण यह संस्कार नहीं किया जाता । मनुस्मृतिकार ने भी दसवें अथवा बारहवें दिन नामकरण का निर्देश किया है- नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वाऽस्य कारयेत् । मनु० २।३०. नाम के आदि में घोष वर्णं होना चाहिए (हशः संवारा नादा घोषाश्च) । नाम के मध्य में अन्तस्थ वर्णं होना चाहिए (यणोऽन्तस्थाः) । वृद्ध स्वरों से युक्त नाम नहीं

२६ महाभाष्यम् होना चाहिए (वृद्धिरादैच्) । अपि च नामकरण के अधिकारी पिता के तीन पूर्व- पुरुषों का स्मरण कराने वाला तथा शत्रुकुल में अप्रसिद्ध नाम सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है । यह बहुत बड़ा न होकर दो अथवा चार अक्षरों का कृत्प्रत्ययांत होना चाहिए, तद्धितान्त नहीं । तद्धितान्त का निषेधमुखेन स्पष्ट उल्लेख यह बताता है कि तद्धितान्त नाम न केवल पुण्य-प्राप्ति में बाधक ही होता है प्रत्युत उससे अधर्म की प्राप्ति होती है । यह कृत् और तद्धित प्रत्ययों का ज्ञान व्याकरण के बिना नहीं हो सकता । मूलम्—सुदेवो असि— सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः । अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव ॥ सुदेवो असि वरुण सत्यदेवोऽसि । यस्य ते सप्त सिन्धवः सप्त विभक्तयः । अनुक्षरन्ति काकुदम् । काकुदं तालु । काकुर्जिह्वा, साऽस्मिन्नुद्यत इति काकुदम् । सूम्यं सुषिरामिव । तद्यथा—शोभनामूर्मिं सुषिरामग्निरन्तः प्रविश्य दहति, एवं ते सप्त सिन्धवः सप्त विभक्तयस्ताल्वनुक्षरन्ति । तेनासि सत्यदेवः । सत्यदेवाः स्यामेत्यध्येयं व्याकरणम् । सुदेवो असि । प्रदीपः—सुदेवो असीति । वरुणस्येयं स्तुतिः । यतो हेतोर्व्याकरणज्ञानाद्वरुण सत्यदेवोऽसि ततो हेतोरन्येऽपि सत्यदेवा भवन्तीत्यर्थः । सिन्धव इति । नद्य इव विभक्तय इत्यर्थः । अनुक्षरन्तीति । ताल्वनुप्राप्य प्रकाशन्त इत्यर्थः । सास्मिन्नुद्यत इति । अनेकार्थत्वाद‍्धातूनामुत्क्षिप्यत इत्यर्थः । सूर्म्यमिति । सूर्मीमिति प्राप्ते अमि पूर्व इत्यत्र वा छन्दसीत्यनुवृत्त्या यणादेशः । अनुवाद—'हे वरुण ! तुम सत्यदेव हो जिसकी सात नदियाँ (सात विभक्तियाँ) सच्छिद्रा लोहप्रतिमा में अग्नि की तरह तालु में बहती हैं ।' हे वरुण तुम सुदेव हो (अर्थात्) सत्यदेव हो, तुम्हारी सात नदियाँ सात विभक्तियाँ हैं। (वे) तालु में क्षरित होती हैं । काकुद तालु को कहते हैं (क्योंकि) काकु (नाम है) जिह्वा का (और) वह उसमें उठाकर लगाई जाती है इसलिए वह काकुद हैं । 'सूम्यं सुषिरामिव' (का तात्पर्य है) जैसे कि अग्नि सुन्दर सच्छिद्रा लोह प्रतिमा के अन्दर प्रविष्ट होकर जलाती है इसी प्रकार से तुम्हारी सात सिन्धु रूप सात विभक्तियाँ तालु में क्षरित होती हैं । इसी से तुम सत्यदेव हो । हम भी सत्य- देव हों, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । सुदेवो असि । उषा—वरुण व्याकरणज्ञान से युक्त होने के कारण सत्यदेव है । अग्नि सुन्दर लौह प्रतिमा में जिस प्रकार प्रविष्ट होकर उसे प्रतिभासित करती है, उसी प्रकार से व्याकरण की सात विभक्तियाँ उसके तालु प्रदेश में प्रवाहित होती हुईं उसे सत्यदेव बनाती हैं । व्याकरणज्ञान से शब्दब्रह्म का प्रकाश प्राप्त कर साधक सांसारिक पापों से विमुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त करता है—"शब्दब्रह्मणि

२. शब्द-स्वरूप विचार (द्रव्य, क्रिया, गुण एवं जाति शब्दत्व निरूपण)

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २७ निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ।" यही उसका सत्यदेवत्व है । हम भी वरुण के समान ही इस उच्च प्रतिष्ठित पद को प्राप्त हों, इसके लिए व्याकरण का अध्ययन अनिवार्य है । मूलम्—किं पुनरिदं व्याकरणमेवाधिजिगांसमानेभ्यः प्रयोजनमन्वाख्यायते, न पुनरन्यदपि किञ्चित् । ओमित्युक्त्वा वृत्तान्तशः शमित्यादीन् शब्दान्पठन्ति । पुराकल्प एतदासीत् — संस्कारोत्तरकालं ब्राह्मणा व्याकरणं स्माधीयते । तेभ्य- स्तत्तत्स्थानकरणानुप्रदानज्ञेभ्यो वैदिकाः शब्दा उपदिश्यन्ते । तदद्यत्वे न तथा । वेदमधीत्य त्वरिता वक्तारो भवन्ति — "वेदान्नो वैदिकाः शब्दाः सिद्धा लोकाच्च लौकिकाः । अनर्थकं व्याकरणमिति ।" तेभ्य एवं विप्रतिपन्नबुद्धिभ्योऽध्येतृभ्यः सुहृद्भूत्वा आचार्य इदं शास्त्रमन्वाचष्टे । इमानि प्रयोजनान्यध्येयं व्याकरणमिति । प्रदीपः—किं पुनरिति । ननु कानि पुनरस्येति येन पृष्टं स एव कथं पृच्छति — किं पुनरिति । एवं तर्हि भाष्यकारः प्रयोजनान्वाख्यानस्य विषयविभागं दर्शयति । पुरा वेदाध्ययनात्पूर्वं व्याकरणमधीयते ते बाल्यात्प्रष्टुमसमर्था इति न प्रयोजनमन्वाख्येयम् । अद्यत्वे तु स्वल्पायुष्ट्वात्पूर्वमेव वेदं प्रधानमधीयते ततः प्रष्टुं समर्थत्वाद् व्याकरणाध्ययनस्य प्रयोजनं पृच्छन्तीत्यवश्यान्वाख्येयं प्रयोजनम् न पुनरन्यदिति । वेदमप्यधिजिगांसमानेभ्य इत्यर्थः । ओमित्युक्त्वेति । अभ्युपगम्येत्यर्थः । वृत्तान्तश इति । वृत्तान्तः प्रपाठक उच्यते । वृत्तान्तं वृत्तान्तं पठन्तीत्यर्थः । अद्यत्व इति । अद्यत्वेशब्दो निपातोऽस्मिन्काल इत्यत्रार्थे वर्तते । त्वरिता इति । विवाहादौ । अनुवाद — क्या फिर यह व्याकरण पढ़ना चाहने वालों के लिए प्रयोजन बताये जा रहे हैं या कुछ और भी ? (वेद पढ़ना चाहने वाले) 'ओम्' ऐसा कहकर प्रति प्रपाठक 'शम्' पर्यन्त शब्दों को पढ़ते हैं । पुराकाल में ऐसा था कि (उपनयन) संस्कार के अनन्तर ब्राह्मण व्याकरण का अध्ययन करते थे । तत्तत् वर्णोच्चारण- स्थान, करण और अनुप्रदान जान लेने पर उन्हें वैदिक शब्दों का उपदेश किया जाता था । आजकल वैसा नहीं है । (पहले) वेद का अध्ययन करके शीघ्र ही कहने लगते हैं, वेद से हमने वैदिक शब्द जान लिये हैं, लोक से लौकिक । इसलिए व्याकरण अनर्थक है । उन्हीं विप्रतिपन्न बुद्धि वाले अध्येताओं को सुहृद होकर आचार्य इस शास्त्र का आख्यान करते हैं — "ये प्रयोजन हैं, (इसलिए) व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए ।" उषा — उपनयन संस्कार के अनन्तर बालक को वेद का अध्ययन करवाया जाता है, अतः ऐसी परिस्थिति में वेदाध्ययन के प्रयोजनों का अन्वाख्यान होना चाहिए था, व्याकरणाध्ययन के प्रयोजनों का नहीं । इसी आशंका के अनुरोध से भाष्यकार ने कहा है कि पुरा काल में ब्राह्मण बालक को उपनयन संस्कार के अनन्तर पहले व्याकरण का अध्ययन करवाया जाता था । उस समय में विभिन्न

२८ महाभाष्यम् उच्चारण स्थानों, विभिन्न ग्राभ्यन्तर तथा बाह्य प्रयत्नों का उपदेश किया जाता था । बाल्यावस्था होने के कारण वे इस प्रकार के (प्रयोजनादि विषयक) प्रश्न पूछने में असमर्थ होते थे, अतः प्रयोजनों का व्याख्यान भी नहीं किया जाता था। व्याकरणाध्ययन पूर्ण हो जाने के अनन्तर उन्हें वेदाध्ययन करवाया जाता था । परन्तु ग्राज स्थिति विपरीत है। अब उपनयन के अनन्तर ही छात्र वेदाध्ययन प्रारम्भ कर देता है। जब तक वेदाध्ययन समाप्त हो, छात्र में पर्याप्त प्रौढ़ता ग्रा जाती है। वेद का अध्ययन कर वह झट से कहने लगता है कि लौकिक व्यवहार से उसने लौकिक भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया है तथा वेद से वैदिक शब्दों को सीख लिया है, व्याकरण का प्रयोजन भी तो यही है। अतः अब पृथक् रूप से व्याकरण सीखने का कोई लाभ नहीं । इस प्रकार के विप्रतिपन्न बुद्धि वाले अध्येताओं के लिए भाष्यकार ने इन प्रयोजनों का अन्वाख्यान किया है। यहाँ “त्वरिताः” के सम्बन्ध में कैयट की टिप्पणी “विवाहादौ (त्वरिताः)” भाष्यकाराभिमत है अथवा नहीं, यह सन्दिग्ध है । मूलम् — उक्तः शब्दः । स्वरूपमप्युक्तम् । प्रयोजनान्यप्युक्तानि । शब्दानु- शासनमिदानीं कर्त्तव्यम् । तत्कथं कर्त्तव्यम् । किं शब्दोपदेशः कर्तव्यः, आहोस्विद- पशब्दोपदेशः, आहोस्विदुभयोपदेश इति । अन्यतरोपदेशेन कृतं स्यात् । तद्यथा भक्ष्यनियमेनाभक्ष्यप्रतिषेधो गम्यते । ‘पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः’ इत्युक्ते गम्यत एतद् — अतोऽन्येऽभक्ष्या इति । अभक्ष्य- प्रतिषेधेन वा भक्ष्यनियमः । तद्यथा ‘अभक्ष्यो ग्राम्यकुक्कुटः अभक्ष्यो ग्राम्यसूकरः’ इत्युक्ते गम्यत एतद् — आरण्यो भक्ष्य इति । एवमिहापि तावच्छब्दोपदेशः क्रियते, गौरित्येतस्मिन्नुपदिष्टे गम्यत एतद् — गाव्यादयोऽपशब्दा इति । अथाप्यपशब्दो- पदेशः क्रियते, गाव्यादिषूपदिष्टेषु गम्यत एतद् — गौरित्येष शब्द इति । किं पुनरत्र ज्यायः ? लघुत्वाच्छब्दोपदेशः । लघीयाञ्छब्दोपदेशः । गरीयानपशब्दोपदेशः । एकैकस्य शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशा । तद्यथा गौरित्यस्य शब्दस्य गावीगोणीगोता- गोपोतलिकेत्येवमादयोऽपभ्रंशाः । इष्टान्वाख्यानं खल्वपि भवति । प्रदीपः — उभयोपदेश इति । हेयोपादेयोपदेशे स्पष्टा प्रतिपत्तिर्भवतीत्युभयो- पदेश उद्भावितः । यद्यपि प्रतिपत्तिः स्पष्टा, गौरवं तु भवतीत्याह अन्यतरेति । शब्दापशब्दयोरित्यर्थः । अन्यतरान्यतमशब्दावव्युत्पन्नौ स्वभावाद् द्विबहुविषये निर्धारणे वर्तेते । पञ्चेति । अर्थित्वादभक्षणं प्राप्तं पञ्चसु पञ्चनखेषु नियम्यमानं सामर्थ्यादन्येभ्यो निवर्तते । न त्वयं विधिः, अप्राप्तेरभावात् । किं पुनरिति । उभयोपदेशाद् गुरोर्द्वावपि प्रशस्यौ तयोः को ज्यायानित्यर्थः । इष्टेति । साधुशब्दप्रयोगाद्धर्मावाप्तेरित्यर्थः । अथवा उपादेयोपदेशात् साक्षात्प्रतिपत्ति- र्भवतीति भावः ।

प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) २६ अनुवाद—(व्याकरण का विषयभूत) शब्द कह दिया गया है। (शब्द का) स्वरूप भी कहा गया है। (प्रसङ्गानुसार) प्रयोजन भी बताये गये हैं। अब शब्दा- नुशासन करना चाहिए। तो वह कैसे करना चाहिए। क्या (साधु) शब्दों का उपदेश करना चाहिए अथवा अपशब्दों का उपदेश अथवा दोनों का उपदेश (करना चाहिए)। किसी एक के उपदेश से काम हो सकता है। जैसे कि भक्ष्य (पदार्थों) का नियम करने से अभक्ष्य का प्रतिषेध समझा जाता है। 'पाँच पञ्चनख प्राणियों का भक्षण करना चाहिए, ऐसा कहने पर समझा जाता है कि इसके अतिरिक्त अभक्ष्य हैं। इसी प्रकार अभक्ष्य के प्रतिषेध से भक्ष्य पदार्थों का नियम (किया जाता है)। जैसे 'ग्राम्य-कुक्कुट अभक्ष्य है,' 'ग्राम्य शूकर अभक्ष्य है,' ऐसा कहने पर आरण्य (कुक्कुट अथवा सूकर) भक्ष्य है, ऐसा समझा जाता है। यही बात यहाँ भी है। यदि (साधु) शब्दों का उपदेश किया जाता है, (तो) 'गो:' ऐसा उपदेश करने से यह समझ लिया जाता है कि 'गावी' आदि अपशब्द हैं। और भी यदि अपशब्दोपदेश किया जाता है तो 'गावी' आदि का उपदेश होने पर यह (स्वयं) समझ लिया जाता है कि 'गो:' यह शब्द है। फिर यहाँ श्रेष्ठ कौन सा है ? लघु होने से (साधु) शब्दोपदेश। शब्दोपदेश लघु है, अपशब्दोपदेश में गौरव है। (क्योंकि) एक-एक शब्द के बहुत से अपभ्रंश है। जैसे कि 'गो:' इस (एक) शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि अपभ्रंश हैं। और फिर इष्ट का अनुशासन भी होता है। उषा—शब्द स्वरूप प्रतिपादन व्याकरण शास्त्र का विषयभूत है। सर्वप्रथम उसका निरूपण किया गया है। तदनन्तर व्याकरणाध्ययन के मुख्य और गौण प्रयोजनों का विवेचन है। सम्बन्ध और अधिकारी का पृथक् निर्देश यद्यपि नहीं है तथापि विषय और प्रयोजनों के प्रसङ्ग में उनका भी उल्लेख हो ही गया है। कहा जा सकता है कि शब्दज्ञान रूप प्रमेय और शब्दानुशासन रूप साधन का परस्पर बोध्यबोधक भाव सम्बन्ध है तथा "तेभ्य एव विप्रतिपन्नबुद्धिभ्योऽध्येतव्यम्:" इत्यादि के द्वारा शास्त्र के अधिकारी का निरूपण है। अनुबन्धचतुष्टय का विवेचन करने के अनन्तर शास्त्र का प्रारम्भ होता है। साधु शब्दज्ञान तीन प्रकार से करवाया जा सकता है—(१)साधु शब्दों के उपदेश द्वारा, (२)अपशब्दों के उपदेश द्वारा, (३) साधु तथा असाधु उभयशब्दोपदेश द्वारा। इनमें से उभय शब्दोपदेश रूप तृतीय साधन यद्यपि विषय के स्पष्ट प्रतिपादन की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, परन्तु यह गौरव दोष से दूषित है। इसीलिए शब्दानुशासन की कथंकर्त्तव्यता पर विचार करते हुए इसका त्याग ही

३० महाभाष्यम् कर दिया गया है, तथा अन्यतर उपदेश की बात कही गई है, तरप् प्रत्यय दो वस्तुओं की अपेक्षा-बुद्धि में प्रयुक्त होता है । "पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः" इत्यादि रूप में भक्ष्य पदार्थों का नियमन अपने से अतिरिक्त पदार्थों में अभक्ष्यत्व की प्रतीति करवाता है अथवा कहा जा सकता है कि इसका अर्थबोध तदितर पदार्थों के भक्ष्यत्व प्रतिषेध में पर्यवसित होता है । इसी प्रकार से सास्नादिमत्पदार्थ में अनुशिष्ट 'गो' शब्द इस बात का बोधक है कि इस अर्थ में प्रयुक्त होने वाले अन्य 'गावी' इत्यादि शब्द असाधु हैं । मीमांसादर्शन में यह उदाहरण नियमविधि का नहीं प्रत्युत परिसंख्या विधि का माना गया है— विधिरत्यन्तमप्राप्तौ नियमः पाक्षिके सति । तत्र चान्यत्र च प्राप्तौ परिसंख्येति गीयते ॥ अर्थात् अत्यन्त अप्राप्त क्रिया की ज्ञापक विधि, अनेक विकल्पों के प्राप्त होने पर उनमें से एक का विधान नियम तथा अन्य वस्तुओं की निवृत्तफलकता परिसंख्या है । प्रस्तुत सन्दर्भ में नियम और परिसंख्या में अप्राप्तांशपूरणरूपफल- बोधन द्वारा अन्य अर्थों की निवृत्ति रूप समानता होने के कारण नियम शब्द का प्रयोग परिसंख्या के अर्थ में किया गया है, ऐसा उद्योतकार का मत है। यहाँ भक्ष्य नियम का अर्थ है—भक्ष्यानुमतिरूप उपदेश । इसी प्रकार से 'गावी' आदि अपशब्दों का अनुशासन करने से यह ज्ञात हो जाता है कि इनके अतिरिक्त 'गो' शब्द साधु है जिसका सास्नादिमत्पदार्थ के बोधन में प्रयोग किया जाना चाहिए । इन दोनों में से भी साधु शब्दों का उपदेश लघु है, अपशब्दों के उपदेश से पुनः गौरव दोष आ जाता है । क्योंकि साधु शब्द एक ही होता है परन्तु देश और कालादि के भेद से उसके प्राकृत रूप अनेक बन जाते हैं । यथा सास्नादिमत्पदार्थ के बोधक एक ही 'गो' शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि अनेक अपभ्रष्ट रूप हैं । असाधु शब्दों के उपदेश में इन सभी का अनुशासन करना होगा, जो निश्चय ही साधु शब्दों के उपदेश की अपेक्षा गुरु है। अतः शब्दानुशासन में साधु शब्दों का प्रयोग ही ज्यायान् है । इसके अतिरिक्त साधु शब्द में अभ्युदय और निःश्रेयस् साधकत्व है और शास्त्र का उद्देश्य भी यही है । इसके विपरीत असाधु शब्द अधर्म का साधन है अतः उनका उपदेश करने से शास्त्र अनिष्टोपदेश के दूषण से दूषित हो जायेगा । यही बात वाक्यपदीयकार ने भी इन शब्दों में कही है— धर्मे ये प्रत्यये चाङ्ग सम्बन्धाः साध्वसाधुषु । १।२५. ते लिङ्गंश्च स्वशब्दैश्च शास्त्रेऽस्मिन्नुपवर्णिताः । १।२६.

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ३१ इसके अतिरिक्त यह, भी कहा जा सकता है कि अपशब्दों का अनुशासन करना दुष्कर भी है। एक शुद्ध शब्द के विभिन्न देशों तथा प्रत्येक काल में प्रचलित समस्त प्राकृत रूपों को ढूंढना अपेक्षाकृत दुष्कर है। अपि च, यह पद्धति विषय का स्पष्ट प्रतिपादन कर पाने में भी सक्षम नहीं होगी क्योंकि अध्येता को विभिन्न प्राकृत रूपों का संकलन देखकर उनके अतिरिक्त एक साधु शब्द की प्राप्ति में पुनः प्रयास करना ही पड़ेगा । मूलम्—अथैतस्मिञ्छब्दोपदेशे सति किं शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः कर्त्तव्यः । गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मण इत्येवमादयः शब्दाः पठितव्याः ? नेत्याह । अनभ्युपाय एष शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः । एवं हि श्रूयते— बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां शब्दपारायणं प्रोवाच । नान्तं जगाम ।" बृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रश्चाध्येता, दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालो, न चान्तं जगाम, किं पुनरद्यत्वे । यः सर्वथा चिरं जीवति वर्षशतं जीवति । चतुर्भिश्ञ्च प्रकारैर्विद्योपयुक्ता भवति—आगमकालेन, स्वाध्यायकालेन, प्रवचनकालेन, व्यवहारकालेनेति । तत्र चास्यागमकालेनैवायुः कृत्स्नं पर्युपयुक्तं स्यात् । तस्माद- नभ्युपायः शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः । कथं तर्हीमे शब्दाः प्रतिपत्तव्याः ? किञ्चित्त्सामान्यविशेषवल्लक्षणं प्रवर्त्यम् । येनाल्पेन यत्नेन महतो महतः शब्दौघान् प्रतिपद्येरन् । किं पुनस्तत् ? उत्सर्गापवादौ । कश्चिदुत्सर्गः कर्त्तव्यः, कश्चिदपवादः । कथंजातीयकः पुनरुत्सर्गः कर्त्तव्यः, कथंजातीयकोऽपवादः ? सामान्येनोत्सर्गः कर्तव्यः । तद्यथा—"कर्मण्यण्" । तस्य विशेषेणापवादः । तद्यथा—"आतोऽनुपसर्गे कः ।" प्रदीपः—बृहस्पतिरिन्द्रायेति । प्रतिपदपाठस्याशक्यत्वं प्रतिपादयितुमयं- मर्थवादः । शब्दानामिति । शब्दपारायणशब्दो योगरूढः शास्त्रविशेषस्य, तत्र प्रतिपदोक्तानामिति विशेषाभिधानाय गम्यमानार्थस्यापि शब्दाना मित्यस्य प्रयोगः । एकदेशोपयोगादपि लोके उपयुक्तमित्युच्यते यथौषधसंस्कृतघृतमात्रैकदेशोपयोगे उपयुक्तं घृतमिति व्यवहारः, तथेह नेति प्रतिपादयति—चतुर्भिरिति । आगमकालो ग्रहणकालः । स्वाध्यायकालोऽभ्यासकालः । प्रवचनकालोऽध्यापनकालः । व्यवहारो याज्ञे कर्मणि । किञ्चिदिति । सामान्यविशेषौ यस्मिंस्तत्सामान्यविशेषवत् । कर्मण्यण्, आतोऽनुपसर्गे क इत्यादि । अनुवाद—इस प्रकार इस शब्दोपदेश की व्यवस्था होने पर क्या शब्दों की

३२ महाभाष्यम् प्रतिपत्ति में (उनका) प्रतिपद पाठ करना चाहिए । गौ, अश्व, पुरुष, हस्ती, शकुनि, मृग, ब्राह्मण इत्यादि प्रकार के शब्दों का पृथक्-पृथक् पाठ होना चाहिए ? (पाणिनि ने) ऐसा नहीं कहा। शब्दप्रतिपादन के लिए प्रतिपदपाठ कोई उपाय नहीं है । ऐसा सुना जाता है कि—“बृहस्पति ने इन्द्र के लिए सहस्र दिव्य वर्षों तक प्रतिपद शब्दों का पारायण किया, (फिर भी) समाप्त नहीं हो पाया ।” बृहस्पति प्रवक्ता और इन्द्र अध्येता । सहस्र दिव्य वर्ष अध्ययन काल । फिर भी समाप्त नहीं हो पाया, फिर आजकल (तो बात ही) क्या । जो बहुत जीता है, सौ साल तक जी लेता है । चार प्रकार से विद्या का उपयोग होता है— अध्ययन काल, स्वाध्याय काल, अध्यापन काल और (अधीत विद्या का) यज्ञ आदि व्यवहार में विनियोग । वहाँ अध्ययन काल में ही सारी आयु समाप्त हो जायेगी । इसलिए शब्दों के प्रतिपादन में (उनका) प्रतिपद पाठ कोई उपाय नहीं है । तो फिर इन शब्दों का प्रतिपादन कैसे होना चाहिए ? कुछ सामान्य और विशेष (नियमों) वाला लक्षण शास्त्र बनाना चाहिए जिससे अल्प प्रयत्न से महान् शब्दराशि का प्रतिपादन हो सके । फिर वह क्या (हो) ? उत्सर्ग और अपवाद । कोई उत्सर्ग नियम किया जायेगा, कोई अपवाद नियम । किस प्रकार का उत्सर्ग और किस प्रकार का अपवाद करना चाहिए । सामान्य रूप से उत्सर्ग (का कथन) करना चाहिए, जैसे “कर्मण्यण्”। उसका विशेष नियम अपवाद, जैसे—“आतोऽनुपसर्गे कः ।” उषा—सप्तद्वीपा वसुमती, तीन लोक, षडङ्ग तथा रहस्य सहित चार वेद, उनकी विभिन्न शाखायें, स्मृति साहित्य, इतिहास, पुराण, वैद्यक इस महान् शब्द प्रयोग के विषयभूत लोक में अनन्त शब्दों का प्रयोग होता है । उन समस्त साधु शब्दों का भी प्रतिपद व्याख्यान सम्भव नहीं है । अतः शब्दानुशासन करने के लिए गौ, अश्व, पुरुष, हस्ती, शकुनि, मृग, ब्राह्मण इत्यादि रूप में प्रतिपद शब्दों का पाठ करके उनका व्याख्यान करना लघु, ऋत एव स्वीकार्य उपाय नहीं हो सकता । इस सन्दर्भ में महाभाष्यकार ने एक ऐतिहासिक आख्यान प्रस्तुत किया है कि सुरगुरु बृहस्पति सुरेश्वर इन्द्र को एक सहस्र दिव्य वर्षों तक इसी पद्धति से शब्दोपदेश करते रहे, परन्तु शब्दपारायण समाप्त नहीं हो पाया। आज के युग में तो सौ वर्ष से अधिक आयु की सम्भावना ही नहीं की जा सकती। इस पर भी आगम, स्वाध्याय, प्रवचन और व्यवहार रूप में चार प्रकार से विद्या का उपयोग इस पद्धति की प्रासङ्गिकता पर और भी प्रश्न चिह्न लगा देता है । “शब्दानां शब्दपारायणम्” के रूप में भासमान पुनरुक्ति का वारण करने के लिए यहाँ कैयट ने “शब्दपारायण” को योगरूढ अर्थ में ग्रन्थविशेष का वाचक

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ३३ माना है। वस्तुतः यह स्वतन्त्र ग्रन्थ का वाचक शब्द है अथवा वैदिक शैली का प्रभावमात्र, यह सन्देहास्पद है । विद्या की प्राप्ति का समय आगम-काल, अभ्यास स्वाध्याय-काल, अध्यापन प्रवचन-काल तथा उसका याज्ञिक क्रियाओं में उपयोग व्यवहार-काल है। नागेश के अनुसार 'आगमकालेन' इत्यादि शब्दों में विद्योपयोग के आधारभूत कालों में करणत्व की विवक्षा से तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है, अर्थात् चार कालों में विद्या का उपयोग होता है। आगम और स्वाध्याय काल में इसका उपयोग आदर पूर्वक अन्नवस्त्रादि लाभरूप है, प्रवचन-काल में इसका उपयोग प्रतिष्ठा, अर्थप्राप्ति आदि तथा याज्ञिक व्यवहार के समय इसका उपयोग दक्षिणादि-लाभ में पर्यवसित होता है। 'नैषधीयचरितम्' महाकाव्य के प्रणेता श्रीहर्ष ने भी विद्या की इन चार दशाओं का उल्लेख किया है, परन्तु वहाँ इसका क्रम महाभाष्य के क्रम से किञ्चित् परिवर्तित है। वहाँ अध्ययन तथा स्वाध्याय के अनन्तर पहले व्यवहार तथा उसके अनन्तर प्रवचन-काल का उल्लेख है— अधीतिबोधाचरणप्रचारणै- र्दशाश्चतस्रः प्रणयन्नुपाधिभिः । नैषध० १।४. परन्तु आज के युग में कहा जा सकता है कि सर्वप्रथम अध्ययन काल तथा उसके अनन्तर प्रवचन और व्यवहार काल को युगपत् लिया जा सकता है। स्वाध्याय-काल तो विद्याध्ययन के समय भी तथा उससे भी अधिक अध्यापनकाल में भी आवश्यक है। प्रतिपद पाठ रूप उपाय के शब्दानुशासन में अनभ्युपायभूत सिद्ध हो जाने पर 'सामान्यवत् लक्षण' को इसके उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अल्प यत्न से ही महान् शब्द राशि का प्रतिपादक होने के कारण लघु उपाय है। उत्सर्ग और अपवाद रूप सूत्रों का निर्माण करके विस्तृत शब्दराशि को अनुशिष्ट किया जा सकता है। सामान्य नियम उत्सर्ग कहलाता है, विशेष नियम अपवाद । यथा 'कर्मण्यण्' सूत्र कर्म कारक उपपद होने पर धातु मात्र से अण् प्रत्यय का विधान करता है, किन्तु उसका विशेष अपवाद सूत्र "आतोऽनुपसर्गे कः" कर्मकारक के उपपद होने पर उपसर्ग रहित आकारान्त धातुओं से 'क' प्रत्यय का उपदेश करता है। मूलम्—किं पुनराकृतिः पदार्थः आहो स्विद् द्रव्यम् ? उभयमित्याह । कथं ज्ञायते ?

उभयथा ह्याचार्येण सूत्राणि पठितानि । आकृतिं पदार्थं मत्वा—"जात्या- ख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम्" इत्युच्यते । द्रव्यं पदार्थं मत्वा "सरूपाणाम्"— इत्येकशेष आरभ्यते । प्रदीप.—सकलशास्त्रव्यवस्थैकतरपक्षाश्रयणे न सिध्यतीति पक्षद्वयाश्रयणं प्रश्नपूर्वकं करोति—किं पुनरिति । आकृतिपक्षे केवल आश्रीयमाणे सकृद्गतौ विप्रतिषेध इत्यादि नोपपद्यते, केवलेपि व्यक्तिपक्षे पुनः प्रसङ्गविज्ञानादित्यादि न घटते । तस्माल्लक्ष्यसिद्धये क्वचित्प्रदेशे कश्चित्पक्षः परिगृह्यते । तत्र जातिवादिन आहुः—जातिरेव शब्देन प्रतिपाद्यते, व्यक्तीनामानन्त्यात्सम्बन्धग्रहणासम्भवात् । सा च जातिः सर्वव्यक्तिष्वेकाकारप्रत्ययदर्शनादस्तीत्यवसीयते । तत्र गवादयः शब्दा भिन्नद्रव्यसमवेतां जातिमभिदधति । तस्यां प्रतीतायां तदावेशात्तदवच्छिन्नं द्रव्यं प्रतीयते । शुक्लादयः शब्दा गुणसमवेतां जातिमाचक्षते । गुणे तु तत्सम्बन्धात्प्रत्ययः, द्रव्ये सम्बन्धिसम्बन्धात् । संज्ञाशब्दानामप्युत्पत्तिप्रभृत्या विनाशात्पिण्डस्य कौमार- यौवनाद्यवस्थाभेदेऽपि स एवायमित्यभिन्नप्रत्ययनिमित्ता डित्थत्वादिका जातिर्वाच्या । क्रियास्वपि जातिर्विद्यते सैव धातुवाच्या । पठति पठतः पठन्तीत्यादेरभिन्नस्य प्रत्ययस्य सद्भावात्तन्निमित्तजात्यभ्युपगमः । व्यक्तिवादिनस्त्वाहुः—शब्दस्य व्यक्तिरेव वाच्या, जातेस्तूपलक्षणभावेनाश्रयणादानन्त्यादिदोषानवकाशः । अनुवाद—क्या आकृति पद का अर्थ है, अथवा द्रव्य । "दोनों ही," ऐसा (सूत्रकार) कहता है । कैसे जाना जाता है ? दोनों ही प्रकार के आचार्य ने सूत्र पढ़े हैं । आकृति को पदार्थ मानकर "जात्याख्यायामेकस्मिन्बहुवचनमन्यतरस्याम्" ऐसा कहा जाता है । द्रव्य को पदार्थ मानकर "सरूपाणाम्०"—इत्यादि एकशेष शास्त्र का आरम्भ किया गया है । उषा—पतञ्जलि से पूर्व वाजप्यायन और व्याडि पद के अर्थ के सम्बन्ध में क्रमशः जाति और व्यक्ति अथवा आकृति और द्रव्य का विस्तृत विवेचन कर चुके थे । महाभाष्यकार ने इन दोनों वादों में समन्वय स्थापित किया । "चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः" कहकर एक स्थल पर जाति, गुण, क्रिया और यदृच्छा के रूप में चार प्रकार की शब्द प्रवृत्ति की बात स्वीकार की है । शब्दानुशासन के प्रणेता आचार्य पाणिनि भी जाति और व्यक्ति दोनों में ही पदों का वाचकत्व स्वीकार करते हैं । इसलिए दोनों ही प्रकार के सूत्र अष्टा- ध्यायी में प्राप्य हैं । व्यक्तिपक्ष के ही सर्वत्र पदार्थत्वेन इष्ट होने पर "सम्पन्ना व्रीहयः" इत्यादि स्थलों में, जहाँ अनेकत्व सिद्ध ही है, "जात्याख्यायामेकस्मिन्बहु- वचनमन्यतरस्याम्" सूत्र के निर्माण की आवश्यकता ही नहीं रहती । इसी प्रकार से जाति ही यदि पदार्थत्वेन इष्ट हो तो उसके सर्वत्र एकवचनान्त होने के कारण एकत्व