यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय आभूषण, सिर एवं पैर को बांधने की मेखलाएं आदि सभी देवताओं को प्रसन्न करने की कृपा करें. ( ३९ ) यत्ते सादे महसा शूकृतस्य पाष्ण्या वा कशया वा तुतोद. स्रुचेव ता हविषो अध्वरेषु सर्वा ता ते ब्रह्मणा सूदयामि.. (४०) हे अश्व! जो आप के पीड़क हैं, जो पीछे और नीचे के भाग के पीड़क हैं, वे त्रुटियां और यज्ञों में हवि संबंधी अन्य त्रुटियां ब्राह्मण स्रुवा की घी की आहुतियों से सुधारते हैं. ( ४० ) चतुस्त्रि ᳵशद्वाजिनो देवबन्धोर्वङ्क्रीरश्वस्य स्वधितिः समेति. अच्छिद्रा गात्रा वयुना कृणोत परुष्परुरनुघुष्या विशस्त.. (४१) हे यजमानो! यह अश्व देवताओं का बंधु है. यह धारण की क्षमता रखता है. सामर्थ्यवान है. चौंतीस शक्तियों से युक्त हो. शरीर छिद्र रहित ( दोष रहित ) हो. देवगण इस की सभी कमियों को दूर करने की कृपा करें. ( ४१ ) एकस्त्वष्टुरश्वस्या विशस्ता द्वा यन्तारा भवतस्तथ ऋतुः. या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ता ता पिण्डानां प्र जुहोम्यग्नौ.. (४२) वर्ष त्वष्टा ( सूर्य ) रूप अश्व को बांटता है. वह उसे दो भागों ( उत्तरायण व दक्षिणायन ) में बांटता है. दोनों भागों को ऋतुओं ( छह ) में बांटता है. शरीर के अंगों के स्वास्थ्य के लिए ऋतु के अनुसार पदार्थों की आहुति अग्नि में भेंट की जाती है. ( ४२ ) मा त्वा तपत्प्रिय ऽ आत्मापियन्तं मा स्वधितिस्तन्व ऽ आ तिष्ठिपत्ते. मा ते गृध्नुरविशस्तातिहाय छिद्रा गात्राण्यसिना मिथू कः... (४३) हे अश्व! अपना प्यारा आत्मतत्त्व सदा आप धारण करते रहें. वह प्यारा आत्मतत्त्व कभी आप को छोड़ कर न जाएं. बांटने वाली शक्तियां कभी आप के शरीर और अंगों पर अधिकार न कर सकें. अनिपुण व्यक्ति भी आप के शरीर तथा किसी अंग पर तलवार न चला सके. उस की तलवार आप के दोषों पर चले. ( ४३ ) न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ २ इदेषि पथिभिः सुगेभिः. हरी ते युञ्जा पृषती अभूतामुपास्थाद्वाजी धुरि रासभस्य.. (४४) हे अश्व! न आप मारते हैं, न मरते हैं. आप सुगम पथ से देवताओं के पास जाते हैं. घोड़े आप के रथ में जुड़ कर पुष्ट होते हैं. वे शब्द मात्र से ही रथ में जुड़ जाते हैं. घोड़े बहुत वेगवान हैं. ( ४४ ) सुगव्यं नो वाजी स्वश्व्यं पु ᳵश सः पुत्राँ २ उत विश्वापुषं ᳵश रयिम्. अनागास्त्वं नो अदितिः कृणोतु क्षत्रं नो अश्वो वनतां ᳵश हविष्मान्.. (४५) ३२० - यजुर्वेद 632/20
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय यह अच्छी तरह देवताओं को प्राप्त कराने वाला है. यह हमें अपने वश में रखे, पुत्र व पौत्र प्रदान करे. हम सब को धन से पुष्ट करे व गरीबी व पाप से दूर रखे. हमें बलवान बनाए. हम इस के लिए हविमान हैं. ( ४५ ) इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवा:. आदित्यैरिन्द्र: सगणो मरुद्भिरस्मभ्यं भेषजा करत्. यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्र: सह सीषधाति.. (४६) इंद्र देव तथा सभी देव सभी भुवनों को अपने वश में रखें. आदित्यगण मरुद्गण तथा इंद्र देव अपने गण सहित हमें निरोग रखें. यह यज्ञ इंद्र देव और आदित्यगण सहित हमारे शरीर और प्रजाओं को अपने वश में रखें. ( ४६ ) अग्ने त्वं नो अन्तम ऽ उत त्राता शिवो भवा वरूथ्य:. वसुरग्निर्वसुश्रवा ऽ अच्छा नक्षि द्युमत्तम १७ रयिं दा:. तं त्वा शोचिष्ठ दीदिव: सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्य:.. (४७) हे अग्नि! आप अन्यतम, त्राता व कल्याणकारी हैं. हे अग्नि! आप हितैषी हैं. आप हिंसकों व आततायियों से हमारी रक्षा करें. आप प्रख्यात हैं. हमारी रक्षा करें. आप धनवान हैं. हमारी रक्षा करें. आप प्रकाशवान हैं. हमारी रक्षा करें. आप स्वर्गलोक को भी प्रकाशित करते हैं. आप हमें मित्रों सहित धन और वैभव दीजिए. हम अच्छे मन से आप के लिए प्रार्थना करते हैं. ( ४७ ) यजुर्वेद - ३२१
छब्बीसवां अध्याय
छब्बीसवां अध्याय अग्निश्च पृथिवी च सन्नते ते मे सं नमतामदो वायुश्चान्तरिक्षं च सन्नते ते मे सं नमतामद ऽ आदित्यश्च द्यौश्च सन्नते ते मे सं नमतामद ऽ आपश्च वरुणश्च सन्नते ते मे सं नमतामदः. सप्त सꣳसदो अष्टमी भूतसाधनी. सकामाँ २ अध्वनस्कुरु संज्ञानमस्तु मेमुना.. (१) अग्नि और पृथिवी देव हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. हमें आनंद प्रदान करने की कृपा करें. वायु और अंतरिक्ष देव हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. हमें आनंद प्रदान करने की कृपा करें. आदित्य और स्वर्गलोक हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. हमें आनंद प्रदान करने की कृपा करें. जल और वरुण देव हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. हमें आनंद प्रदान करने की कृपा करें. सात संसद ( अग्नि, वायु, अंतरिक्ष, सूर्य, आकाश, जल और वरुण ) और आठवीं पृथिवी को हमारे अनुकूल बनाने की कृपा करें. आप की कृपा से हमारे यज्ञ सकाम ( कामना को फलीभूत करने वाले ) हों. आप की कृपा से हमें संज्ञान ( श्रेष्ठ पूर्ण ज्ञान ) हो. ( १ ) यथेमां वाचं कल्याणी मावदानि जनेभ्यः. ब्रह्मराजन्याभ्या ꣳ शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च. प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे कामः समृध्यतामुप मादो नमतु.. (२) जैसे यह वाणी लोगों के लिए कल्याणकारी होती है, वैसे ही हमारे लिए कल्याणकारी हो. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के लिए आप की वाणी कल्याणकारी हो. दक्षिणा देने वाले देवताओं के प्रिय हों. हमारी इच्छाएं फलीभूत हों. हमें आनंद प्राप्त हो. ( २ ) बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु. यद्दीदयच्छवस ऽ ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्. उपयामगृहीतोसि बृहस्पतये त्वैष ते योनिर्बृहस्पतये त्वा.. (३) हे बृहस्पति देव! आप यज्ञ में लोगों द्वारा पूजनीय हैं. आप स्वर्गलोक में सुशोभित होते हैं. आप सब के स्वामी होने योग्य हैं. आप ऋत और इच्छा शक्ति से सारी प्रजा की रक्षा करते हैं. आप हमें श्रेष्ठ धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप ३२२ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध छब्बीसवां अध्याय
उत्तरार्ध छब्बीसवां अध्याय अद्भुत हैं. आप को उपयाम पात्र में ग्रहण किया गया है. इसीलिए आप बृहस्पति हैं. उपयाम आप का मूल स्थान है. ( ३ ) इन्द्र गोमन्निहा याहि पिबा सोम ष्ठं शतक्रतो. विद्यद्भिर्ग्रावभिः सुतम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा गोमत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा गोमते.. (४) हे इंद्र देव! आप गोमान और सैकड़ों यज्ञ करने वाले हैं. आप ( यज्ञ में ) पधारिए. सोमरस पीने की कृपा कीजिए. हम ने पत्थरों से कूट कर, निचोड़ कर सोमरस तैयार किया है. आप गोमान हैं. हम आप को गोमान इंद्र देव के लिए उपयाम में ग्रहण करते हैं. उपयाम आप का मूल स्थान है. ( ४ ) इन्द्रा याहि वृत्रहन्पिबा सोम ष्ठं शतक्रतो. गोमद्भिर्ग्रावभिः सुतम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा गोमत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा गोमते.. (५) हे इंद्र देव! आप वृत्र नाशक और सैकड़ों यज्ञ करने वाले हैं. आप पधारिए. आप सोमरस पीने की कृपा कीजिए. आप के पुत्रों ने पत्थरों से कूट कर सोमरस आप के लिए तैयार किया है. हम ने आप को गोमान इंद्र देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ५ ) ऋतावानं वैश्वानरममृतस्य ज्योतिष्पतिम्. अजस्रं घर्ममीमहे. उपयामगृहीतोसि वैश्वानराय त्वैष ते योनिर्वैश्वानराय त्वा.. (६) हे वैश्वानर ( अग्नि )! आप ऋतवान ( सत्यवान ) व अमर हैं. आप प्रकाश के स्वामी हैं. हम आप से अजस्र बल चाहते हैं. आप को उपयाम में ग्रहण किया गया है. आप को अग्नि के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ६ ) वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्रीः. इतो जातो विश्वमिदं वि चष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण. उपयामगृहीतासि वैश्वानराय त्वैष ते योनिर्वैश्वानराय त्वा.. (७) हम वैश्वानर देव की सुमति जैसी सुमति पाएं. वैश्वानर देव संसार के राजा, संसार की शोभा हैं. व देव संसार का निरीक्षण करते हैं और यहीं उत्पन्न हुए हैं. वे सूर्य के समान प्रकाशवान हैं. हम उन को उपयाम में ग्रहण करते हैं. वही उन का मूल स्थान है. ( ७ ) वैश्वानरो न ऽ ऊतय ऽ आ प्र यातु परावतः. अग्निरुक्थेन वाहसा. उपयामगृहीतोसि वैश्वानराय त्वैष ते योनिर्वैश्वानराय त्वा.. (८) यजुर्वेद - ३२३
उत्तरार्ध छब्बीसवां अध्याय वैश्वानर यहां पधारें, वैश्वानर सब ओर से अपने रक्षा साधनों से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. उक्थ रूपी वाहन द्वारा अग्नि की उपासना करते हैं. हम आप को उपयाम में ग्रहण करते हैं. वही आप का मूल स्थान है. (८) अग्निर्ऋषिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः. तमीमहे महागयम्. उपयामगृहीतोस्यग्नये त्वा वर्चस ऽ एष ते योनिरग्नये त्वा वर्चसे.. (९) हे अग्नि! आप ऋषि, पवित्र और पांचों वर्णों के पुरोहित हैं. हम आप को चाहते हैं. हम आप के लिए स्तोत्र गाते हैं और उपयाम में ग्रहण करते हैं. वही आप का मूल स्थान है. आप वर्चस्वी हैं. हम भी अग्नि से वर्चस्व पाना चाहते हैं. (९) महाँ २ इन्द्रो वज्रहस्तः षोडशी शर्म यच्छतु. हन्तु पाप्मानं योस्मान्द्वेष्टि. उपयामगृहीतोसि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा.. (१०) हे इंद्र देव! आप महान् और हाथ में वज्र रखते हैं. आप सोलह कलाओं वाले हैं. आप हमें सुख देने की कृपा कीजिए. जो हम से द्वेष करते हैं, आप उन पापियों को नष्ट करने की कृपा करें. इंद्र देव की प्रसन्नता के लिए अग्नि को उपयाम में ग्रहण किया जाता है. वही आप का मूल स्थान है. हम वहीं आप की प्रतिष्ठा करते हैं. (१०) तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः. अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव ऽ इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे.. (११) हे यजमानो! इंद्र देव धनवान, आनंददाता, आवास दाता और अन्नदाता हैं. हम आप के पुत्र उसी तरह वाणी से आप को पुकारते हैं, जैसे गाएं बछड़ों के लिए रंभाती हैं. (११) यद्वाहिष्ठं तदग्नये बृहदर्च विभावसो. महिषीव त्वद्रयिस्त्वद्वाजा ऽ उदीरते.. (१२) हे यजमानो! आप अग्नि के लिए स्तुति कीजिए. आप विशाल, वर्चस्वी, प्रकाशमान व महारानी की तरह उदार हैं. आप अन्न और बल प्रदान करने की कृपा कीजिए. (१२) एह्यू षु ब्रवाणि तेग्न ऽ इत्थेतरा गिरः. अभिर्वधर्धास ऽ इन्दुभिः.. (१३) हे अग्नि! आप आइए. हम आप के लिए इस प्रकार वाणी से उपासना करते हैं. आप सोमरस से बढ़ोतरी पाते हैं. (१३) ऋतवस्ते यज्ञं वि तन्वन्तु मासा रक्षन्तु ते हविः. संवत्सरस्ते यज्ञं दधातु नः प्रजां च परिपातु नः.. (१४) ३२४ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध छब्बीसवां अध्याय सभी ऋतुएं यज्ञ का विस्तार करने की कृपा करें. मास हमारी हवि की रक्षा करने की कृपा करें. संवत्सर यज्ञ को धारण करने की कृपा करें. हम सभी प्रजाजनों का परिपालन करने की कृपा कीजिए. ( १४) उपह्वरे गिरीणा ᳵ सङ्गमे च नदीनाम्. धिया विप्रो अजायत.. (१५) पर्वत की कंदराओं, पर्वतों और नदियों के संगम पर ब्राह्मणों में बुद्धि पैदा होती है. ( १५ ) उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे. उग्र ᳵ शर्म महि श्रवः.. (१६) हे सोम! आप उच्चलोक के हैं. आप स्वर्गलोक में रहते हैं. आप हमें श्रेष्ठ भूमि दीजिए. आप उग्र हैं. आप पृथ्वी पर स्रवित होइए ( बहिए ). आप सुख प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( १६ ) स न ऽ इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भ्यः. वरिवोवित्परि स्रव.. (१७) हे सोम! आप जलमय हैं. आप यज्ञ में इंद्र देव, वरुण देव व मरुद्गण के लिए स्रवित होइए. ( १७ ) एना विश्वान्यर्य ऽ आ द्युम्नानि मानुषाणाम्. सिषासन्तो वनामहे.. (१८) आप आइए. आप मनुष्यों के लिए स्वर्ग के सारे सुख प्रदान कीजिए. आप की कृपा से हम सुखपूर्वक जीवन निर्वाह कर सकें. ( १८ ) अनु वीरैरनु पुष्यास्म गोभिरन्वश्वैरनु सर्वेण पुष्टैः. अनु द्विपदानु चतुष्पदा वयं देवा नो यज्ञमृता नयन्तु.. (१९) हमें वीर पुत्र दीजिए. हमें गायों से पुष्ट बनाइए. हमें अश्व दीजिए. हमें सेवक दीजिए. दोपाए और चौपाए हमारे देवताओं के इस यज्ञ को ऋतु के अनुसार ले जाने की कृपा करें. ( १९ ) अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामशतीरुप. त्वष्टार ᳵ सोमपीतये.. (२०) हे अग्नि! देव पत्नियां भी आहुति चाहती हैं. उन के लिए भी आहुति देते हैं. त्वष्टा देव को आप सोमपान के लिए हमारे पास लाने की कृपा कीजिए. ( २० ) अभि यज्ञं गृणीहि नो ग्नावो नेष्टः पिब ऋतुना. त्व ᳵ हि रत्नधा ऽ असि.. (२१) हे अग्नि! आप हमारे लिए श्रेष्ठ धन धारिए. आप हमारे गणमान्य यज्ञ को संपन्न कराइए. आप हमारे लिए रत्न धारिए. आप ऋतु के अनुसार सोमरस पीजिए. ( २१ ) द्रविणोदाः पिपीषति जुहोत प्र च तिष्ठत. नेष्ट्रादृतुभिरिष्यत.. (२२) यजुर्वेद - ३२५
उत्तरार्ध छब्बीसवां अध्याय हे अग्नि! आप ऋतु के अनुसार इच्छानुसार सोमरस पीने की कृपा कीजिए. आप धनदाता हैं. आप भी यज्ञ में सोमरस को पीने की इच्छा कीजिए. सोमरस पीने के लिए प्रतिष्ठित होइए. ( २२ ) तवाय ꣪ सोमस्त्वमेह्यर्वाङ् शश्वत्तम ꣪ सुमना ऽ अस्य पाहि. अस्मिन् यज्ञे बर्हिष्या निषद्या दधिष्वेमं जठर ऽ इन्दुमिन्द्र.. (२३) हे इंद्र! आप हमारे यज्ञ में पधारिए और कुश के आसन पर विराजिए. यह आप के पीने योग्य सोमरस है. आप आनंदपूर्वक उसे पीजिए. आप अच्छे मन से उस की रक्षा कीजिए. ( २३ ) अमेव नः सुहवा ऽ आ हि गन्तन नि बर्हिषि सदतना रणिष्टन. अथा मदस्व जुजुषाणो अन्धसस्त्वष्टर्देवैर्जनिभिः सुमद्गणः.. (२४) हे देव पत्नियो! आप इस यज्ञ मंडप को अपने घर की तरह समझिए. हम आप का आह्वान करते हैं. आप पधार कर कुश के आसन पर विराजिए. आप आनंदित होइए. आप हवि को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. ( २४ ) स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया. इन्द्राय पातवे सुतः.. (२५) हे सोम! आप स्वादिष्ट और मददायी हैं. आप अपनी पवित्र धाराओं से इंद्र देव के पीने के लिए बहें. ( २५ ) रक्षोहा विश्वचर्षणिर्भि योनिमयोहते. द्रोणे सधस्थमासदत्.. (२६) हे सोम! आप विलक्षण, सर्वद्रष्टा व रक्षक हैं. आप अपने मूल निवास स्थान द्रोण कलश में स्थापित होने की कृपा कीजिए. ( २६ ) ३२६ - यजुर्वेद
सत्ताईसवां अध्याय
सत्ताईसवां अध्याय समास्त्वाग्न ऽ ऋतवो वर्धयन्तु संवत्सरा ऽ ऋषयो यानि सत्या. सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन विश्वा ऽ आ भाहि प्रदिशश्चतस्रः.. (१) हे अग्नि! सत्यवादी ऋषिगण हर माह, ऋतु व वर्ष में आप की बढ़ोतरी करते हैं. आप अपनी दिव्यता दीजिए. आप संसार को आलोकित व चारों दिशाओं और उपदिशाओं को आभासित करने की कृपा कीजिए. ( १ ) सं चेध्यस्वाग्ने प्र च बोधयैनमुच्च तिष्ठ महते सौभगाय. मा च रिषदुपसत्ता ते अग्ने ब्रह्माणस्ते यशसः सन्तु मान्ये.. (२) हे अग्नि! आप यजमान को चेताइए व जगाइए! आप ऊंचे आसन पर विराजिए. आप हमें सौभाग्य प्रदान कीजिए. आप हमें अपनी उपसत्ता और हम ब्राह्मणों को अपना वह यश प्रदान कीजिए. आप हमें मान्यता प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( २ ) त्वामग्ने वृणते ब्राह्मणा ऽ इमे शिवो अग्ने संवरणे भवा नः. सपत्नहा नो अभिमातिजिच्च स्वे गये जागृह्यप्रयुच्छन्.. (३) हे अग्नि! ब्राह्मण आप का वरण करते हैं. आप हमारे लिए कल्याणकारी होइए. आप हमारे शत्रुओं का संवरण कीजिए. आप शत्रुओं पर हमें जिताइए. आप की कृपा से हम अपने घर में आलस्य रहित हो कर जागते रहें. ( ३ ) इहैवाग्ने अधि धारया रयिं मा त्वा नि क्रन्पूर्वचितो निकारिणः. क्षत्रमग्ने सुयममस्तु तुभ्यमुपसत्ता वर्धतां ते अनिष्टतः.. (४) हे अग्नि! आप इधर पधारिए. आप हमारे लिए धन धारण करिए. यजमान आप की आज्ञा का उल्लंघन न करें. क्षत्रिय भी आप के वश में हो जाएं. आप की उपासना में बढ़ोतरी हो. आप के भक्त अविनाशी हों. आप उन की बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. ( ४ ) क्षेत्रेणाग्ने स्वायुः स १४ रभस्व मित्रेणाग्ने मित्रधेये यतस्व. सजातानां मध्यमस्था ऽ एधि राज्ञामग्ने विहव्यो दीदिहीह.. (५) यजुर्वेद - ३२७
उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय
उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय हे अग्नि! क्षत्रियों को आप अपनी आयु व उन्हें अपना वैभव प्रदान कीजिए. मित्र देव के साथ रह कर रचनात्मक कार्य करने का यत्न कीजिए. आप सजातियों के बीच रहने की कृपा कीजिए. आप राजा हैं. आप आइए. आप यज्ञ में प्रज्वलित होने की कृपा कीजिए. (५) अति निहो अति स्रिधोत्यचित्तिमत्यरातिमग्ने. विश्वा ह्यग्ने दुरिता सहस्वाथास्मभ्य १४ सहवीरा १४ रयिं दाः.. (६) हे अग्नि! हत्यारों, अत्याचारियों, स्वेच्छाचारियों, शत्रुओं को साहस के साथ दूर करने की कृपा कीजिए. आप हमें वीर पुत्रों के साथसाथ धन भी प्रदान करने की कृपा कीजिए. (६) अनाधृष्यो जातवेदा ऽ अनिष्टृतो विराज्दग्ने क्षत्रभृद्दीदिहीह. विश्वा ऽ आशाः प्रमुञ्चन्मानुषीर्भियः शिवेभिरद्य परि पाहि नो वृधे.. (७) हे अग्नि! आप को कोई नहीं हरा सकता. आप सब कुछ जानते हैं. आप अनश्वर, विराट्, क्षात्र धर्म के पोषक व सब की आशा हैं. आप मनुष्यों को कष्ट मुक्त कीजिए. आप हमारा आज कल्याण कीजिए. आप सब ओर से हमारी रक्षा व हमारी बढ़ोत्तरी करने की कृपा कीजिए. (७) बृहस्पते सवितर्बोधयैन १४ स १४ शितं चित्सन्तरा १४ स १४ शिशाधि. वर्धयैनं महते सौभगाय विश्व ऽ एनमनु मदन्तु देवाः.. (८) हे बृहस्पति व सविता देव! आप इन यजमानों को बोधित व चेतना प्रदान कीजिए. आप यजमानों के सौभाग्य की बढ़ोत्तरी कीजिए. सभी देवता यजमान के अनुकूल होने व उन को आनंद प्रदान करने की कृपा करें. (८) अमुत्रभूयादध यद्यमस्य बृहस्पते अभिशस्तेरमुञ्चः. प्रत्यौहतामश्विना मृत्युमस्माद्देवानामग्ने भिषजा शचीभिः.. (९) हे बृहस्पति देव! आप हमें यमराज के घर जाने के डर से मुक्त कीजिए. अश्विनी देव हमारे मृत्यु के भय को दूर करने की कृपा करें. अश्विनी देव ओषधियों के ज्ञाता हैं. वे अग्नि को पवित्र बनाने की कृपा करें. (९) उद्वयं तमस्परि स्वः पश्यन्त ऽ उत्तरम्. देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (१०) हे सूर्य! आप देवों के देव हैं. हम अंधकार से ऊपर उठें और आत्मावलोकन करें (अपनेआप को देखें). हमें उत्तरोत्तर सुख मिले. हम सविता देव व सब से उत्तम ज्योति को प्राप्त करें. (१०) ३२८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय ऊर्ध्वा ऽ अस्य समिधो भवन्त्यूर्ध्वा शुक्रा शोची १४ ष्यग्नेः. द्युमत्तमा सुप्रतीकस्य सूनोः.. (११) अग्नि की लपटें पवित्र, चमकीली, ऊपर की ओर जाती हैं. वे लपटें समिधा से ऊर्ध्वगमन करती हैं और स्वर्गलोक तक जाती हैं. अग्नि की लपटें यजमान के लिए श्रेष्ठ प्रतीक हैं. ( ११ ) तनूनपादसुरो विश्ववेदा देवो देवेषु देवः. पथो अनक्तु मध्वा घृतेन.. (१२) हे अग्नि! आप देवताओं के देव, सर्वज्ञाता, शरीर रक्षक व असुरनाशक हैं. आप मधुर घी की आहुतियों से अपने पथ पर बढ़ने की कृपा कीजिए. आप हमें भी श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ने की प्रेरणा दीजिए. ( १२ ) मध्वा यज्ञं नक्षसे प्रीणानो नराश १४ सो अग्ने. सुकृद्देवः सविता विश्ववारः.. (१३) हे अग्नि! आप को प्राणी यज्ञ में मधु ( आदि सामग्रियों से ) पूजते हैं. आप सर्वप्रिय हैं. आप श्रेष्ठ कार्य करने वाले हैं. आप सभी को प्रिय लगते हैं. ( १३ ) अच्छायमेति शवसा घृतेनेडानो वह्निर्नमसा. अग्नि १४ स्रुचो अध्वरेषु प्रयत्सु.. (१४) अग्नि! यज्ञ में अध्वर्यु प्रयत्नपूर्वक घी से आहुति प्रदान कर रहे हैं. अग्नि को नमन कर रहे हैं. विभिन्न प्रार्थनाओं से अग्नि के समीप जाते हैं. ( १४ ) स यक्षदस्य महिमानमग्नेः स ईं मन्द्रा सुप्रयसः. वसुश्चेतिष्ठो वसुधातमश्च.. (१५) हे अग्नि! आप महिमावान, प्रकाशमान, श्रेष्ठ संपत्तिदाता व धनवान हैं. हम आनंदपूर्वक धनधारी अग्नि को आहुति प्रदान करते हैं. ( १५ ) द्वारो देवीरन्वस्य विश्वे व्रता ददन्ते अग्नेः. उरुव्यचसो धाम्ना पत्यमानाः.. (१६) हे अग्नि! आप देवों का द्वार, व्रतशील व वर्चस्वी हैं. आप हम सभी की रक्षा करते हैं. ( १६ ) ते अस्य योषणे दिव्ये न योना उषासानक्ता. इमं यज्ञमवतामध्वरं नः.. (१७) अग्नि की दो दिव्य देवियां हैं—उषा व रात्रि. ये दोनों देवियां हमारे यज्ञ में अग्नि के साथ विराजने की कृपा करें. ( १७ ) दैव्या होतारा ऽ ऊर्ध्वमध्वरं नोग्नेर्जिह्वामभि गृणीतम्. कृणुतं नः स्विष्टिम्.. (१८) दिव्य अध्वर्यु अग्नि और वायु! विधिवत इस यज्ञ को संपन्न कराने की कृपा करें. अग्नि की जिह्वा ऊपर की ओर बढ़ती है. वे हमें भी ऊपर बढ़ने की प्रेरणा देने की कृपा करें. ( १८ ) यजुर्वेद - ३२९
उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय तिस्रो देवीर्बर्हिरेद ᳪ सदन्त्विडा सरस्वती भारती. मही गृणाना.. (१९) इड़ा देवी, सरस्वती देवी और भारती देवी महिमामयी हैं. वे गणमान्य हैं. वे (यज्ञ) सदन में पधारने और कुश के आसन पर विराजने की कृपा करें. (१९) तन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरुक्षु त्वष्टा सुवीर्यम्. रायस्पोषं वि ष्यतु नाभिमस्मे.. (२०) त्वष्टा देव! अद्भुत, सर्वद्रष्टा, श्रेष्ठ वीर्य वाले और गतिमान हैं. वे देव हमें पोषक धन प्रदान करने की कृपा करें. (२०) वनस्पतेव सृजा रराणस्तमना देवेषु. अग्निहर्व्य ᳪ शमिता सूदयति.. (२१) हे वनस्पति! आप हमारे और देवताओं के लिए ओषधि उपलब्ध कराएं. अग्नि सुखदायी हैं. वे हमारी आहुति को शोधित करने की कृपा करें. (२१) अग्ने स्वाहा कृणुहि जातवेद ऽ इन्द्राय हव्यम्. विश्वे देवा हविरिदं जुषन्ताम्.. (२२) हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप इंद्र देव के लिए हमारी ओर से दी गई आहुति व यज्ञ में सभी देवताओं तक हमारी हवि पहुंचाने की कृपा कीजिए. (२२) पीवो अन्ना रयिवृधः सुमेधाः श्वेताः सिषक्ति नियुतामभिश्रीः. ते वायवे समनसो वि तस्थुर्विश्वेनरः स्वपत्यानि चक्रुः.. (२३) वायु अन्न व धन से बढ़ोत्तरी पाते हैं. वे श्रेष्ठ बुद्धि संपन्न, श्वेत व समान मन वाले हैं. श्रेष्ठ मनुष्य अच्छी संतान पाने के लिए वायु की आराधना करते हैं. (२३) राये नु यं जज्ञतू रोदसीमे राये देवी धिषणा धाति देवम्. अध वायुं नियतः सश्चतः स्वा उत श्वेतं वसुधितिं निरेके.. (२४) देवी देव को धन के लिए धारण करती है. स्वर्गलोक और पृथ्वी लोक हमारे यज्ञ में हमारे लिए धन धारण करें. वायु धनधारी हैं. सभी उन का सेवन करते हैं. (२४) आपो ह यद्बृहतीर्विश्वमायन् गर्भं दधाना जनयन्तीरग्निम्. ततो देवाना ᳪ समवर्ततासुरेकः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (२५) जल अपार है. विश्व को अपने में समाए हुए है. अग्नि को गर्भ में धारण करता है. उस से देवताओं की उत्पत्ति हुई. उन के अलावा हम अब किस देवता के लिए हवि का विधान करें ? (२५) यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद्दक्षं दधाना जनयन्तीर्यज्ञम्. यो देवेष्वधि देव ऽ एक ऽ आसीत् कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (२६) जिन्होंने पृथ्वी के चारों ओर जल देखा, जिस ने यज्ञ धारण करने वालों को ३३० - यजुर्वेद
उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय जना, जो देवों के एकमात्र अधिदेव हैं, उन के अलावा अब हम किस देवता के लिए हवि का विधान करें ? ( २६ ) प्र याभिर्यासि दाश्वा १७ समच्छा नियुद्भिर्वायविष्टये दुरोणे. नि नो रयि १७ सुभोजसं युवस्व नि वीरं गव्यमश्व्यं च राधः.. ( २७) हे वायु! आप जिन यजमान के पास घोड़े की गति से जाते हैं, उसी युवा गति से हमारे पास आइए. आप हमें वीर संतान, गोधन व अश्वधन दीजिए. आप हमें धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( २७ ) आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वर १७ सहस्रिणीभिरुप याहि यज्ञम्. वायो अस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२८) हे वायु! आप अपने सैकड़ों और हजारों घोड़ों को रथ में जोत कर इस यज्ञ में जल्दी से पधारिए. हे वायु! इस यज्ञ में आप भी आनंदित होइए और अपने कल्याणकारी साधनों से हमारी भी रक्षा करने की कृपा कीजिए. ( २८ ) नियुत्वान्वायवा गह्यय १७ शुक्लो अयामि ते. गन्तासि सुन्वतो गृहम्.. (२९) हे वायु! शुक्र ग्रह आप को धारण करना चाहते हैं. आप अपने घोड़े रथ में जोतिए. आप हमारी सुनिए. शीघ्र गंतव्य ( यजमान के घर ) की ओर पधारिए. ( २९ ) वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु. आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता.. (३०) हे वायु! आप को शुक्र ग्रह धारण करना चाहते हैं. हे देव! आप अग्रगण्य हैं. आप स्वर्गलोक से पधारिए. आप मधुर सोमरस का पान करने के लिए तेजी से पधारिए. ( ३० ) वायुरग्रेगा यज्ञप्रीः साकं गन्मनसा यज्ञम्. शिवो नियुद्भिः शिवाभिः.. (३१) हे वायु! आप अग्रगामी, यज्ञ से प्रीति रखने वाले व कल्याणकारी हैं. आप अपने कल्याणकारी घोड़ों को रथ में जोतिए. आप अपने मन के साथ इस यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. ( ३१ ) वायो ये ते सहस्रिणो रथासस्तेभिरा गहि. नियुत्वान्त्सोमपीतये.. (३२) हे वायु! आप के जो हजारों रथ हैं, आप उन में घोड़े जोतिए. आप सोमरस पीने के लिए पधारिए. ( ३२ ) एकया च दशभिश्च स्वभूते द्वाभ्यामिष्टये वि १७ शती च. तिसृभिश्च वहसे त्रि १७ शताच नियुद्भिर्वायविह ता विमुञ्च.. (३३) यजुर्वेद - ३३१
उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय हे वायु! आप एक, दो, तीन, दस, बीस, तीस, तीन सौ और जितने चाहे, उतने घोड़े जोत कर अपने रथ अभीष्ट कार्य के लिए छोड़िए. ( ३३ ) तव वायवृतस्पते त्वष्टुर्जामातरद्भुत. अवा ४४ स्या वृणीमहे.. (३४) हे वायु! आप संकल्पशील, अद्भुत व त्वष्टा देव के जमाई हैं. हम आप के रक्षा साधनों का वरण करते हैं. ( ३४ ) अभि त्वा शूर नोनुमोदुग्धा ऽ इव धेनवः. ईशानमस्य जगतः स्वर्द्दशमीशानमिन्द्र तस्थुषः... (३५) हे इंद्र देव! आप शूरवीर, संसार के स्वामी, सर्वद्रष्टा व ईश्वर हैं. बिना दुही हुई गाय की तरह हम आप से धन पाना चाहते हैं. ( ३५ ) न त्वावाँ २ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते. अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे.. (३६) हे इंद्र देव! आप जैसा दिव्य कोई देव न कभी पृथ्वी पर पैदा हुआ है और न ही होगा. आप धनवान हैं. आप हमें अश्वायित ( घोड़ों से युक्त ) कीजिए. आप हमें बलशाली बनाइए. हम आप का आह्वान करते हैं. ( ३६ ) त्वामिद्धि हवामहे सातौ वाजस्य कारवः. त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः... (३७) हे इंद्र देव! आप सत्पति व वृत्रनाशक हैं. याजक सर्वत्र विजय और अन्न बल पाने के लिए आप का आह्वान करते हैं. ( ३७ ) स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया मह स्तवानो अद्रिवः. गामश्व ४४ रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे.. (३८) हे इंद्र देव! आप अद्भुत, वज्रधारी व पृथ्वी पर स्तुत्य हैं. आप हमें गोधन और अश्वमय रथ दीजिए. आप हमें बलवान बनाइए, ताकि हम युद्धों में विजय पा सकें. ( ३८ ) कया नश्चित्र ऽ आ भुवदूती सदावृधः सखा. कया शचिष्ठया वृता.. (३९) हे इंद्र देव! आप हमारे सखा हैं. आप सदैव बढ़ोतरी पाते हैं. आप हमारी किस पवित्र वृत्ति से प्रसन्न हो कर हम पर कृपा करते हैं. ( ३९ ) कस्त्वा सत्यो मदानां म ४४ हिष्ठो मत्सदन्धसः. दृढा चिदारुजे वसु.. (४०) हे इंद्र देव! आप धनवान व सत्यवान हैं. कौन सी वस्तु आप को प्रिय है. आनंददायी है, जिस से आप यजमानों पर धन बरसाते हैं ? ( ४० ) ३३२ – यजुर्वेद
उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय
उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्. शतं भवास्यूतये.. (४१) हे इंद्र देव! आप हमारे मित्र जैसे हैं. आप हम लोगों की रक्षा के लिए सैकड़ों यत्न करते हैं. ( ४१ ) यज्ञा यज्ञा वो अग्नये गिरा गिरा च दक्षसे. प्र प्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न श १७ सिषम्.. (४२) हर यज्ञ में अग्नि की स्तोत्रों से उपासना की जाती है. आप अमर, सर्वज्ञ, हमारे प्रिय व मित्र हैं. आप प्रशंसित हैं. ( ४२ ) पाहि नो अग्न ऽ एकया पाहुत द्वितीयया. पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जां पते पाहि चतसृभिर्वसो.. (४३) हे अग्नि! आप हमारी रक्षा कीजिए. हम एक स्तुति करते हैं. आप हमारी रक्षा कीजिए. हम दो प्रार्थनाओं से उपासना करते हैं. आप हमारी रक्षा कीजिए. हम तीन प्रार्थनाओं से आप की उपासना करते हैं. आप हमारी रक्षा कीजिए. हम चार प्रार्थनाओं से आप की उपासना करते हैं. आप हमारी रक्षा कीजिए. ( ४३ ) ऊर्जो नपात १७ स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये. भुवद्वाजेष्वविता भुवद्वृध ऽ उत त्राता तनूनाम्.. (४४) अग्नि ऊर्जस्वी हैं. हवि देने के लिए उन का आह्वान करते हैं. वे हमारे तन की रक्षा करते हैं और हमारी मनोकामना पूरी करते हैं. ( ४४ ) संवत्सरोसि परिवत्सरोसीदावत्सरोसीद्वत्सरो ऽ सि वत्सरोसि. उषसस्ते कल्पन्तामहोरात्रास्ते कल्पन्तामर्धमासास्ते कल्पन्तां मासास्ते कल्पन्तामृतवस्ते कल्पन्ता १७ संवत्सरस्ते कल्पताम्. प्रेत्या ऽ एत्यै सं चाञ्च प्र च सारय. सुपर्णचिदसि तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवः सीद.. (४५) हे अग्नि! आप संवत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर व वत्सर हैं. उषा आप की है. दिनरात आप के हैं. आधा मास ( पक्ष ) आप का है. माह आप के हैं. वर्ष आप के हैं. कल्पांत संवत्सर आदि का आप समुचित विस्तार करते हैं. आप आइए. आप इन सब को संवारिए. आप चित्त की प्राणवायु जैसे हैं. आप ध्रुव ( स्थिर ) हो कर विराजिए. आप हमारी आहुति अंगीकार कीजिए और देवताओं से अंगीकार कराइए. ( ४५ ) यजुर्वेद - ३३३
अठ्ठाईसवां अध्याय
अठ्ठाईसवां अध्याय होता यक्षत्समिधेन्द्रमिडस्पदे नाभा पृथिव्या ऽ अधि. दिवो वर्ष्मन्त्समिध्यत ऽ ओजिष्ठश्चर्षणीसहां वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (१) होता ( पुरोहित ) समिधा से इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. यज्ञ पृथ्वी और अंतरिक्ष की नाभि है. स्वर्गलोक में समिधा चमक रही है. इंद्र देव ओजस्वी और विजेता हैं. यजमान से अनुरोध है कि वह उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. उन से अनुरोध है कि वे हवि ग्रहण करने की कृपा करें. ( १ ) होता यक्षत्तनूनपातमूर्तिभिर्जेतारमपराजितम्. इन्द्रं देव २४ स्वर्विदं पथिभिर्मधुमत्तमैर्नराश २४ सेन तेजसा वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( २ ) इंद्र देव तेजस्वी, शरीर के रक्षक, अपने रक्षा साधनों से जीतने वाले और कभी नहीं हारने वाले हैं. होता उन के प्रति प्रसन्नतादायी आहुतियों से यज्ञ करते हैं. वे आत्मज्ञाता हैं. वे मधुर हवि ग्रहण करने की कृपा करें. होता उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( २ ) होता यक्षदिडाभिरिन्द्रमीडितमाजुह्वानममर्त्यम्. देवो देवैः सवीर्यो वज्रहस्तः पुरन्दरो वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( ३ ) इंद्र देव अमर, उपासना के योग्य है. वे देवताओं के सर्वेसर्वा और उन के हाथ में वज्र हैं. वे शत्रुओं के नगर नष्ट करने वाले हैं. होता उन के लिए मधुर प्रार्थनाओं से यज्ञ करने की कृपा करें. वे हवि द्वारा आनंदित होने की कृपा करें. ( ३ ) होता यक्षद्बर्हिषीन्द्रं निष्षद्वरं वृषभं नर्यापसम्. वसुभी रुद्रैरादित्यैः सयुग्भिर्बर्हिरासदद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (४) इंद्र देव धनवर्षक, यजमानों का हित चाहने वाले व बलवान हैं. होता कुश के आसन पर विराज कर उन के लिए यज्ञ करते हैं. वे वसु, रुद्र, आदित्य और अपने साथ के अन्य देवों के साथ कुश के आसन पर बैठ कर हवि ग्रहण करने की कृपा करें. होता उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४ ) ३३४ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय होता यक्षदोजो न वीर्य १७ सहो द्वार ऽ इन्द्रमवर्धयन्. सुप्रायणा ऽ अस्मिन्यज्ञे वि श्रयन्तामृतावृधो द्वार ऽ इन्द्राय मीढुषे व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (५) होता ने इंद्र देव हेतु यज्ञ किया. उन्होंने उन की बढ़ोत्तरी की एवं उन के ओज और वीर्य की बढ़ोत्तरी की. इस यज्ञ में यज्ञ को बढ़ाने वाले द्वार की ओर देवता अच्छी तरह प्रयाण करें. वे इच्छापूर्ति करने वाले हैं. वे यज्ञ में पधारें. अमृत स्वरूप हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. हम उन के लिए यज्ञ करते हैं. होता उन के लिए यज्ञ कीजिए. ( ५ ) होता यक्षदुषे इन्द्रस्य धेनू सुदुघे मातरा मही. सवातरौ न तेजसा वत्समिन्द्रमवर्धतां वीतामाज्यस्य होतर्यज.. (६) इंद्र देव के लिए पृथ्वि मां जैसी है, अच्छे दूधवाली गायों जैसी है. होता ने महान् उन के लिए पवित्र यज्ञ किया. होता ने अपने तेज से उन की बढ़ोत्तरी की. जैसे मां के प्यार से बच्चा दृढ़ बनता है, वैसे ही वे हवि से दृढ़ हों. होता ! आप उन के लिए यज्ञ कीजिए. ( ६ ) होता यक्षदैव्या होतारा भिषजा सखाया हविषेन्द्रं भिषज्यतः. कवी देवौ प्रचेतसाविन्द्राय धत्त ऽ इन्द्रियं वीतामाज्यस्य होतर्यज.. (७) अश्विनीकुमार दिव्य, भिषगाचार्य ( चिकित्सक ) हमारे सखा, इंद्र देव के वैद्य और कवि हैं. वे श्रेष्ठ चित्त वाले हैं. इंद्र देव के लिए स्वास्थ्य धारण करते हैं. होता देवों ने अश्विनीकुमारों के लिए यज्ञ किया. अश्विनीकुमार हवि ग्रहण करने की कृपा करें. होता उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ७ ) होता यक्षत्तिस्रो देवीर्न भेषजं त्रयस्त्रिधातवो ऽ पस ऽ इडा सरस्वती भारती मही:. इन्द्रपत्नीर्हविष्मतीर्व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (८) होता ने इड़ा, सरस्वती व भारती के लिए यज्ञ किया. तीनों देवियों के लिए होता ने यज्ञ किया. ये तीनों देवियां तीनों लोकों में तीनों ऋतुओं को धारण करने वाले इंद्र देव की आज्ञा का पालन करती हैं. ये तीनों देवियां ओषधि युक्त हैं. तीनों देवियां हविष्मती हों. यजमान इन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ८ ) होता यक्षत्त्वष्टारमिन्द्रं देवं भिषज १७ सुयजं घृतश्रियम्. पुरुरूप १७ सुरेतसं मघोनमिन्द्राय त्वष्टा दधदिन्द्रियाणि वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (९) त्वष्टा देव वैभववान, दानी, रोगनाशक, श्रेष्ठ यज्ञकर्त्ता, शोभाधारी व अनेक रूप वाले हैं. उत्तम वीर्य वाले धनवान त्वष्टा ने इंद्र के लिए शक्तियां धारीं. त्वष्टा देव हवि ग्रहण करने की कृपा करें. होता उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ९ ) यजुर्वेद – ३३५
उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय होता यक्षद्वनस्पति ᳵ शमितार ᳵ शतक्रतुं धियो जोष्टारमिन्द्रियम्. मध्वा समजन्पथिभिः सुगेभिः स्वदाति यज्ञं मधुना घृतेन वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (१०) वनस्पति देव शांतिदाता, सैकड़ों यज्ञ करने वाले, बुद्धि योजक (जोड़ने वाले) और इंद्र देव से संबंधित हैं. वे पथ को सुगम बनाने वाले हैं. यज्ञ को मधुर हवियों से पूरते हैं. वे वनस्पति मधुर हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. होता उन वनस्पति देव के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (१०) होता यक्षदिन्द्र ᳵ स्वाहाज्यस्य स्वाहा मेदसः स्वाहा स्तोकाना ᳵ स्वाहा स्वाहाकृतीना ᳵ स्वाहा हव्यसूक्तीनाम्. स्वाहा देवा ऽ आज्यपा जुषाणा ऽ इन्द्र ऽ आज्यस्य व्यन्तु होतर्यज.. (११) इंद्र देव के लिए स्वाहा. आज्य के लिए स्वाहा. मेद के लिए स्वाहा. स्तोत्र के लिए स्वाहा. स्वाहा करने वाले के लिए स्वाहा. हवि के लिए सूक्त गाने वालों के लिए स्वाहा. देवों के लिए स्वाहा. हवि का पान करने वालों के लिए स्वाहा. इंद्र देव हवि का पान करने की कृपा करें. यजमान इंद्र देव के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (११) देवं बर्हिरिन्द्र ᳵ सुदेवं देवैर्वीरवत्स्तीर्णं वेद्यामवर्धयत्. वस्तोर्वृतं प्राक्तोर्भृत ᳵ राया बर्हिष्मतोत्यगाद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (१२) हे इंद्र देव! देवता अच्छी वेदी पर बढ़ोतरी पाते हैं. देवताओं की भी बढ़ोतरी करते हैं. देवगण कुश के आसन पर विराजने व हवि का भोग लगाने की कृपा करें. यजमान कुश के आसन से युक्त हैं. यजमान ऐश्वर्य पाने व धन धारण करने के लिए यज्ञ करते हैं. (१२) देवीर्द्वार ऽ इन्द्र ᳵ सङ्घाते वीड्वीर्यामन्नवर्धयन्. आ वत्सेन तरुणेन कुमारेण च मीवतापावार्ण ᳵ रेणुककाटं नुदन्तां वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (१३) इंद्र देव देवों के द्वार हैं. सब ने मिल कर उन के पराक्रम व बल की बढ़ोतरी की. इंद्र देव बाल्य, युवा और कुमारावस्था में होने वाले हानिकारी तत्त्वों व धूल भरे बादलों को भी रोकते हैं. वे यजमान को वैभव प्रदान करने व वैभव धारण करने की कृपा करें. वे यजमान के घर में सुखशांति के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. हे यजमानो! आप इंद्र देव के लिए यज्ञ कीजिए. (१३) देवी उषासानक्तेन्द्रं यज्ञे प्रत्यह्वेताम्. दैवीर्विशः प्रायासिष्टा ᳵ सुप्रीते सुधिते वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज.. (१४) उषा देवी और रात्रि देवी प्रेमिल हैं. यज्ञ में उन का आह्वान कीजिए. वे यजमानों को अच्छी प्रीति और अच्छी बुद्धि के लिए प्रेरित करती हैं. हे यजमानो! आप ३३६ - यजुर्वेद 632/21
उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय यज्ञ कीजिए ताकि वे आप के लिए धन धारण कर सकें. आप को धन प्रदान कर सकें. ( १४ ) देवी जोष्ट्री वसुधिती देवमिन्द्रमवर्धताम्. अयाव्यन्याघा द्वेषा १७ स्यान्या वक्षद्वसु वार्याणि यजमानाय शिक्षिते वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज.. ( १५) देवी जोशीली, धन धारण करने वाली, इंद्र देव की बढ़ोत्तरी करने वाली, द्वेषों व पापों को दूर करने वाली हैं. यजमान के लिए धन धारने की कृपा कीजिए. यजमान को धन प्राप्ति की शिक्षा दीजिए. यजमान इस सब के लिए यज्ञ करें. ( १५ ) देवी ऊर्जाहुती दुघे सुदुघे पयसेन्द्र मवर्धताम्. इषमूर्जमन्या वक्षत्सग्धि १७ सपीतिमन्या नवेन पूर्वं दयमाने पुराणेन नवमधातामूर्जमूर्जाहुती ऊर्जयमाने वसु वार्याणि यजमानाय शिक्षिते वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज.. (१६) देवी ने इंद्र देव को ऊर्जस्वी बनाया. पयस से उन की बढ़ोत्तरी की. देव अन्न शक्ति से युक्त हैं. देवी जल शक्ति से युक्त हैं. देवी दयामयी, पुरातन तत्त्वों को जानने वाली हैं व नए और पुराने अन्न को धारण करती हैं. वे यजमान के लिए महान् ऐश्वर्य प्रदान करने उस को स्थायित्व प्रदान करने की कृपा करें. देवगण हव्यपान की कृपा करें. यजमान गण इन के लिए यज्ञ करें. ( १६ ) देवा दैव्या होतारा देवमिन्द्रमवर्धताम्. हताघश १७ सावाभार्ष्टां वसु वार्याणि यजमानाय शिक्षितौ वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज.. (१७) होता दिव्य है. वह ( यज्ञ से ) देवी की बढ़ोत्तरी करने की कृपा करे. होता इंद्र देव की बढ़ोत्तरी करने की कृपा करें. देव और देवी हमारा वैभव बढ़ाने की कृपा करें. देवी और देव यजमान को वैभव प्रदान कराने के लिए हवि ग्रहण करने की कृपा करें. देव और देवी उस वैभव को स्थायी बनाने की कृपा करें. हे यजमान! आप भी इसीलिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( १७ ) देवीस्तिस्रस्तिस्रो देवीः पतिमिन्द्रमवर्धयन्. अस्पृक्षद्भारती दिव १७ रुदैर्यज्ञ १७ सरस्वतीडा वसुमती गृहान् वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (१८) इंद्र देव पालक हैं. तीन देवियों ने उन की बढ़ोत्तरी की. भारती देवी स्वर्गलोक का व रुद्र यज्ञ का स्पर्श करते हैं. सरस्वती, इड़ा और वसुमती घर का स्पर्श करती हैं. तीनों देवियां यजमान के लिए धन धारने की कृपा करें. यजमान इस के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( १८ ) यजुर्वेद - ३३७
उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय
उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय देव ऽ इन्द्रो नराश १४ सस्त्रिवरूथस्त्रिबन्धुरो देवमिन्द्रमवर्धयत्. शतेन शितिपृष्ठानामाहितः सहस्रेण प्रवर्त्तते मित्रावरुणेदस्य होत्रमर्हतो बृहस्पतिः स्तोत्रमश्विनाध्वर्यवं वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (१९) इंद्र बहुप्रशंसित हैं. तीनों लोकों के बंधु हैं. यज्ञ देव इंद्र देव की बढ़ोतरी की कृपा करें. इंद्र देव सैकड़ों काली पीठ वाली गायों से शोभते हैं. कर्मनिष्ठ वरुण, स्तोता बृहस्पति एवं अध्वर्यु अश्विनीकुमारद्वय इस यज्ञ के होता हैं. देवगण यजमानों को वैभव दें. देवगण यजमानों के लिए धन धारने की कृपा करें. होता इस के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (१९) देवो देवैर्वनस्पतिर्हिरण्यपर्णो मधुशाखः सुपिप्पलो देवमिन्द्रमवर्धयत्. दिवमग्रेणास्पृक्षदान्तरिक्षं पृथिवीमदृ १४ हीद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (२०) वनस्पति देव सोने के पत्तों से युक्त, मधुर शाखाओं वाले और उत्तम फलों वाले हैं. वनस्पति इंद्र देव की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. वनस्पति देव अपने उग्र त्याग से स्वर्गलोक व अंतरिक्षलोक का स्पर्श करते हैं. वनस्पति देव पृथ्वीलोक में व्याप्त हैं. वनस्पति देव यजमानों को धन देने व धन धारने की कृपा करें. होता इस के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२०) देवं बर्हिर्वारितीनां देवमिन्द्रमवर्धयत्. स्वासस्थमिन्द्रेणासनमन्या बर्ही १४ ष्यभ्यभूद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (२१) हे देवगण! इंद्र देव कुश के आसन पर विराजते हैं. हे देवगण! उन की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. वे आकाश में स्थित वस्तुओं को अभिभूत करने व यजमान को ऐश्वर्य देने की कृपा करें. उस वैभव को स्थिर करने की कृपा करें. यजमान उस वैभव को पाने के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२१) देवो अग्निः स्विष्टकृद्देवमिन्द्रमवर्धयत्. स्विष्टं कुर्वन्त्स्विष्टकृत्स्विष्टमद्य करोतु नो वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (२२) अग्नि इष्ट कार्य की पूर्ति करते हैं. इंद्र देव की बढ़ोतरी करते हैं. इंद्र देव आज हमारे इष्ट कार्य की पूर्ति करने की कृपा करें. (सदैव) इष्ट कार्य की पूर्ति करने की कृपा करें. वे यजमान को वैभव प्रदान करने की कृपा करें. आप यजमान के लिए वैभव धारण करने की कृपा करें. यजमान उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२२) अग्निमद्य होतारमवृणीतायं यजमानः पचन्पक्तीः पचन्पुरोडाशं बध्नन्निन्द्राय छागम्. सूपस्था ऽ अद्य देवो वनस्पतिरभवदिन्द्राय छागेन. अघतं मेदस्तः प्रति पचताग्रभीदवी वृधत्पुरोडाशेन. त्वामद्य ऋषे.. (२३) ३३८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय अग्नि ने आज होता का वरण किया. पचने योग्य वस्तु व पुरोडाश को पकाया. इंद्र देव के लिए बकरी को बांधा. आज वनस्पति देव ने बकरी के दूध से इंद्र देव की बढ़ोतरी की. आज पुरोडाश पका कर उस से उन की बढ़ोतरी की. हे ऋषि गणो! आप भी ऐसा करने की कृपा कीजिए. ( २३ ) होता यक्षत्समिधानं महद्यशः सुसमिद्धं वरेण्यमग्निमिन्द्रं वयोधसम्. गायत्रीं छन्द ऽ इन्द्रियं त्र्यविं गां वयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( २४ ) होता ने अग्नि और इंद्र देव के लिए यज्ञ किया. दोनों देव महान् यशस्वी, श्रेष्ठ समिधा से युक्त, वरेण्य व आयुधारी हैं. होता गायत्री छंद और इंद्रिय शक्ति के द्वारा उन के लिए आहुति भेंट करते हैं. होता ऊर्जा प्रकाश और उन की किरणों से उन के लिए आहुति भेंट करते हैं. ( २४ ) होता यक्षत्तनूनपातमृद्धिदं यं गर्भमदितिर्दधे शुचिमिन्द्रं वयोधसम्. उष्णिहं छन्द ऽ इन्द्रियं दित्यवाहं गां वयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( २५) होता ने इंद्र देव के लिए यज्ञ किया. उन को अदिति देवी ने गर्भ में धारा. वे आयुधारी हैं. होता उष्णिक् छंद में इंद्र देव की स्तुति करते हैं. होता इंद्रियशक्ति से उन को हवि प्रदान करते हैं. वे दित्यवाट् गौ ( यज्ञीय प्रक्रिया संचालित करने वाली किरणें ) धारने वाले हैं. यजमान उन के लिए आहुति समर्पित करते हैं. प्रयाज देव के साथ वे हमारी हवि ग्रहण करें. ( २५ ) होता यक्षदीडेन्यमीडितं वृत्रहन्तममिडाभिरीड्य २४ सहः सोममिन्द्रं वयोधसम्. अनुष्टुभं छन्द ऽ इन्द्रियं पञ्चाविं गां वयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( २६ ) होता इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. वे वृत्रासुरनाशक व सुखदाता हैं. सोम के साथ आनंददाता व आयुधारी हैं. हम अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा बारंबार उन की उपासना करते हैं. हम इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. हम अनुष्टुप् छंद में उन की स्तुति करते हैं. इंद्रिय शक्ति के द्वारा हम पंचावि गायों ( पंचभूतों में व्याप्त किरणें ) से उन को आहुति भेंट करते हैं. प्रयाज देव इंद्रादि देवता के साथ आहुति ग्रहण करने की कृपा करें. ( २६ ) होता यक्षत्सुबर्हिषं पूषण्वन्तममर्त्य २४ सीदन्तं बर्हिषि प्रियेमृतेन्द्रं वयोधसम्. बृहतीं छन्द ऽ इन्द्रियं त्रिवत्सं गां वयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( २७) होता इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. वे कुश के आसन पर विराजते हैं. वे पोषकता से युक्त, अमर हैं, प्रिय हैं, अमृतराज व आयुधारी हैं. हम बृहती छंद में उन की स्तुति करते हैं. हम इंद्रिय शक्ति से उन की स्तुति करते हैं. हम तीन बछड़ों वाली गाय से उन की स्तुति करते हैं. प्रयाज देव इंद्र आदि देव सहित हवि ग्रहण करने की कृपा करें. यजमान आहुति भेंट करने की कृपा करें. ( २७ ) यजुर्वेद - ३३९