भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं भक्ति-तत्त्व मंगलाचरण
॥ श्रीहरिः ॥ 1982 भक्तिसुधा घासीराम गीताप्रेस गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज
धर्म सम्राट् स्वामी करपात्रीजी महाराज
1982 ॥ श्रीहरिः ॥
भक्तिसुधा
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥ प्रणेता—स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज गीताप्रेस, गोरखपुर 1982 Bhaktisudha
सं० २०७५ तृतीय पुनर्मुद्रण २,००० कुल मुद्रण ७,००० ❖ मूल्य— ₹ २०० ( दो सौ रुपये ) प्रकाशक एवं मुद्रक— गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५ ( गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन : ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३३०३० web : gitapress.org e-mail : booksales@gitapress.org गीताप्रेस प्रकाशन gitapressbookshop.in से online खरीदें।
निवेदन भारतीय संस्कृति पुनर्जन्म एवं कर्म-सिद्धान्तपर आधारित है। संसारमें सर्वत्र सुख-दुःख, हानि- लाभ, जीवन-मरण, दरिद्रता-सम्पन्नता आदि वैभिन्न्य स्पष्ट रूपसे दिखायी पड़ता है, पर यह भिन्नता क्यों है? इसपर विचार करना आवश्यक है। इतना ही नहीं पशु-पक्षी, कीट-पतंग तथा तिर्यक् आदि चौरासी लाख योनियोंमें भटकता हुआ जीव भगवत्कृपासे मानव-शरीर प्राप्त करता है। इस योनिमें उसे कर्म करनेकी सामर्थ्य, विवेक और बुद्धि भी भगवत्प्रदत्त है, परंतु इस विवेक- बुद्धि और सामर्थ्यका वह कितना सदुपयोग करता है—यह तो जीवपर ही निर्भर है। मनुष्य-जीवन पाकर भी मनमाना स्वेच्छाचारितापूर्वक भोग-विलासमें ही जीवन बिता दिया और धर्मशास्त्ररूपी भगवद्-आज्ञानुसार जीवनचर्या नहीं चलायी तो पुनः कूकर-शूकर, कीट-पतंग, पशु-पक्षी और तिर्यक् योनियोंमें दुःखरूप जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। इसीलिये सावधानीपूर्वक शास्त्रोंका स्वाध्याय, मनन और उनके अनुसार अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये। मानव-जीवनका एकमात्र लक्ष्य है—अपना कल्याण करना अर्थात् जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त होना अथवा भगवत्प्राप्ति करना। ये तीनों बातें एक ही हैं। जीवनमें समग्र सफलता एवं शान्तिका समन्वय केवल आध्यात्मिक विचारों एवं चिन्तनसे ही सम्भव हो सकता है। जीवनमें सफलता एवं समृद्धि तथा मनकी शान्ति प्राप्त होती रहे और हमारा जीवन पूर्णतः सार्थक बने, इसके लिये हमें समुचित मार्गदर्शनकी आवश्यकता होती है। ऐसा मार्गदर्शन सच्चे सन्त-महात्मा या सात्त्विक महापुरुषद्वारा प्रणीत आध्यात्मिक साहित्यसे ही प्राप्त हो सकता है। हमारे आध्यात्मिक वाङ्मयमें वेद, उपनिषद्, पुराण, गीता, रामायणसहित ऐसे अनेक ग्रन्थ हैं, जो हमें आध्यात्मिक सन्देश प्रदान करते हैं; परंतु आजका मानव कभी-कभी इन सद्ग्रन्थोंका वास्तविक अर्थ एवं रहस्य न समझनेके कारण दिग्भ्रमित भी हो जाता है। प्रस्तुत पुस्तक 'भक्तिसुधा' के प्रणेता अनन्तश्री स्वामी करपात्रीजी महाराज (१९०७—१९८१ ई०) हैं। इस पुस्तकमें श्रीस्वामीजीने धार्मिक-तत्त्व और रहस्योंका विशद विवेचन किया है। मूर्तिपूजा, इष्टदेवकी उपासना आदिमें अनेक भ्रान्तियाँ एवं जिज्ञासाएँ उत्पन्न होती हैं; उनका जबतक पूर्ण समाधान नहीं होता, तबतक उन कार्योंके प्रति पूर्ण दृढ़ता नहीं आती है। अतः इस पुस्तकमें गायत्री- तत्त्व, विष्णु-तत्त्व, शिव-तत्त्व, भगवती-तत्त्व आदि नामोंसे उन-उन देवताओंकी उपासनाका पूरा रहस्योद्घाटन किया गया है, जिससे उपासकके मनमें पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा उत्पन्न होना स्वाभाविक है। प्रस्तुत पुस्तकमें धर्म-सम्बन्धी नानाप्रकारके प्रश्नोंका समाधान प्राप्त होगा, अपने इष्टदेवकी उपासनामें दृढ़ता आयेगी, वेदोक्त धर्मके प्रति पूर्ण आस्था होगी एवं भगवान्में अनन्य भक्ति होगी। इस तरह मनुष्य अपना कल्याण-साधन एवं सुख-शान्ति प्राप्त करनेमें सफल हो सकेगा।
[ ४ ] 'करपात्री स्वामी' एक युगपुरुष थे। इतिहास साक्षी है कि भारतकी इस पवित्र भूमिने समय- समयपर ऐसे सन्त-महात्माओं और आचार्योंको जन्म दिया, जिनके जीवनसे भारतीय संस्कृति तथा सनातन-धर्मको प्रकाश तो मिला ही साथ ही सुरक्षा भी मिली। आदिशंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामानन्दाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य तथा वल्लभाचार्य आदिका अवतरण इस देशको इसी रूपमें प्राप्त हुआ। इसी कड़ीमें आदिशंकराचार्यकी परम्परामें अनन्तश्री स्वामी करपात्रीजी महाराज भी अवतरित हुए, जिनमें अलौकिक प्रतिभा थी और तपस्या एवं साधनाका अमित तेज था। कलिके इस प्रथम चरणमें जीवनपर्यन्त वर्णाश्रम-व्यवस्था और धर्मकी रक्षाके लिये वे संघर्षरत तो रहे ही, साथ ही उन्होंने जगत्को वेदशास्त्र और धर्मके सूक्ष्म तत्त्वोंसे अवगत भी कराया। 'भक्तिसुधा' का उद्देश्य आस्तिक जनताकी भावनाको दृढ़ करना एवं इस साहित्यके द्वारा सनातन-धर्मके प्रति फैली हुई भ्रान्तियोंको दूर करना है। अनेक प्रकारके वादोंके प्रसारसे जनताकी भावना उत्तरोत्तर शिथिल होती जा रही है। पाखण्डवादियोंद्वारा अपनी स्वार्थ-सिद्धिके लिये अनेक भ्रान्त मत फैलाये जा रहे हैं। उन पाखण्डवादोंको रोकनेके लिये जनतामें सत्साहित्यद्वारा वैदिक धर्मके गूढ़ तत्त्वोंका प्रकाशन करना ही एकमात्र उपाय है। इस पुस्तकमें श्रीस्वामीजी महाराजने सनातन-धर्मके प्रधान अंग देवोपासनाके रहस्योंका विशद विवेचन किया है। भगवत्प्राप्तिके सरल तथा सुन्दर मार्गका उपदेश दिया है। धर्मके मर्मका विवेचन करते हुए वे उन गूढ़ तत्त्वोंको प्रकाशमें लाये हैं, जिनसे पाखण्डवादका स्वतः ही खण्डन हो जाता है। प्रस्तुत 'भक्तिसुधा' चार भागोंमें विभक्त है, पहला भाग श्रीकृष्णलीलादर्शन है, जिसमें श्रीकृष्णजन्म, श्रीकृष्णकी बालक्रीडा, वेणुरव, वेणुगीत, चीरहरण, रासलीला-रहस्य एवं श्रीरासपंचाध्यायी आदिका विशद विवेचन एवं रहस्योद्घाटन हुआ है। द्वितीय खण्डमें देवोपासनातत्त्वके अन्तर्गत पंचदेवोंका तात्त्विक विवेचन गायत्री तत्त्व, शक्तिका स्वरूप, शक्तिपीठ-रहस्य, श्रीरामजन्म- रहस्य, भगवदवतारका प्रयोजन, बुद्धावतारका प्रयोजन, निर्गुण-निराकारसे सगुण-साकार आदिका तात्त्विक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। तृतीय खण्डमें भक्तितत्त्वके अन्तर्गत भगवत्प्राप्ति, नामरूपकी उपयोगिता, इष्टदेवकी उपासना, मानसी आराधना, सगुणोपासनामें सरलता, विभीषण- शरणागति, प्रेमतत्त्व, भगवत्कथामृत, करुणालहरी, गजेन्द्रमुक्ति, संकल्पबल, ज्ञान और भक्ति एवं भक्तिरसामृतास्वादन आदि विषयोंपर मार्मिक विवेचन किया गया है। चतुर्थ खण्ड ज्ञानतत्त्वदर्शनके अन्तर्गत वेदान्तरससार एवं सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकारकी मीमांसा की गयी है। इस प्रकार यह ग्रन्थ पूर्ण होता है, आशा है आस्तिक जनता इस भक्तिसुधाका पान करके अपना कल्याण-साधन करनेमें समर्थ हो सकेगी। —राधेश्याम खेमका
विषय-सूची प्रथम खण्ड — श्रीकृष्णलीला-दर्शन
१. श्रीकृष्ण-जन्म .................................................. १५ ✤ श्रीनन्दराय और देवी नन्दरानीजीका परिचय . १५ ✤ नन्दरानीके पुत्रदर्शनका उल्लास ..................... १८ २. श्रीकृष्णकी बालक्रीडा ...................................... १९ ✤ जन्मोत्सवका उल्लास ....................................... १९ ✤ बालरूपकी झाँकी ............................................. १९ ✤ स्तुति-निवेदन ................................................. २० ✤ यशोदाजीको बालरूपके दर्शन .......................... २१ ✤ व्रजांगनाओंको माधुर्यरूप बालप्रभुका दर्शन ... २२ ✤ श्रीनन्दरानीद्वारा पयःपान कराना ..................... २३ ✤ श्रीब्रजेश्वरीका बालकृष्णके मनोरम अंगोंको देखकर मुग्ध होना ............................................ २३ ✤ बालदर्शनसे श्रीनन्दरायजी आनन्दमूर्च्छित हो गये ............................................................. २४ ✤ भगवान्का जातकर्म-संस्कारोत्सव ................ २४ ✤ श्रीगर्गजीद्वारा भगवान्का नामकरण-संस्कार . २५ ✤ श्रीबलभद्रजी और कृष्णजीकी माधुर्यमयी शिशुलीला ....................................................... २५ ✤ नवनीतचोरी-लीला ......................................... २६ ✤ मैया, मैं तो चन्द्र-खिलौना लैहों .................... २६ ✤ नर्तन और वेणुवादन-लीला ............................. २७ ३. भगवान्का मंगलमय स्वरूप ............................. २८ ✤ भगवान् सर्वथा अनुपमेय ................................ २८ ✤ भगवान्के मंगलमय दिव्य अंगोंकी शोभा ... २९ ✤ भगवान्के नेत्रोंकी अरुणिमा ............................ ३० ✤ भगवान्की दिव्य नासिकाकी शोभा ......... ३१ ✤ भगवान्के मधुर मन्द हास्ययुक्त मुखारविन्दकी शोभा .............................................................. ३२ ✤ दिव्य विग्रहके अनुलेपनकी शोभा ............ ३३ ✤ भगवान्का दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य-माधुर्य ... ३५ ✤ भगवान्के कटितटकी शोभा .......................... ३६ ✤ भगवान्के चरणारविन्दोंकी शोभा ................... ३८ ✤ भगवान्के चरणचिह्नोंकी शोभा ................... ३९ ✤ भगवान्के युगलस्वरूपके चिन्तनसे अन्तः- करणकी निर्मलता ............................................. ४० ४. 'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ........................................ ४१ ✤ भगवान् तथा कामदेवका संवाद ................. ४१ ✤ जीवात्मा और परमात्माका मिलन ............. ४४ ✤ आनन्दकी अभिलाषा ................................. ४७ ✤ भक्तियोगके विधानके लिये भगवान्का अवतरण ........................................................... ४८ ✤ भक्तिका ज्ञानरूपमें परिणमन ..................... ५२ ५. श्रीवृन्दावनमें वर्षा और शरद् ........................... ५३ ✤ श्रीमद्भागवतमें वर्णित वर्षा एवं शरद्- ऋतुकी शोभा ................................................ ५३ ✤ श्रीरामचरितमानसमें वर्षा एवं शरद्-ऋतुका वर्णन ................................................................ ५६ ६. वेणुरव ................................................................... ५६ ✤ वेणुवादन-भगवान्की मंगलमयी लीला ... ५६ ✤ वेणुध्वनि-श्रवणका विलक्षण प्रभाव ......... ५७ ७. किरातिनियोंका स्मररोग ................................... ५९ ✤ भगवत्सम्बन्धसे तृष्णा, काम आदि भी भूषण बन जाते हैं ...................................................... ६० ८. वेणुगीत ............................................................... ६४ ✤ भगवान्के श्रीचरणोंमें अनुराग होना लोकोत्तर सौभाग्य है ..................................................... ६५ ✤ भगवान्का वृन्दावन-आगमन ..................... ६६ ✤ श्रीवृन्दारण्यकी शोभा .................................... ६७ ✤ अदृश्य वस्तुकी सत्ताका दृष्टान्त ................ ६७ ✤ वृन्दावनमें भगवान्का आतिथ्य ................. ६९ ✤ भगवान्के प्रवेशसे वृन्दावनधाम रसमय हो गया ................................................................... ७१ ✤ भगवत्सम्मिलनके लिये उत्कण्ठाके उत्कर्षकी आवश्यकता ................................................... ७२ ✤ वेणु-कूजनका प्रभाव ................................... ७२ ✤ भक्तिका स्वरूप ......................................... ७७ ✤ भगवान्का विग्रह फलात्मक है, साधन नहीं ................................................................... ७८ ✤ बाह्य रमण और आन्तर रमण ...................... ७९ ✤ मनोमयी प्रतिमाका वैशिष्ट्य ...................... ७९ ✤ भक्तकी भावनाके अनुसार ही भगवान्का स्वरूपधारण .................................................... ७९ ✤ अमलात्मा महायोगीन्द्र भी भगवान्के लोकोत्तर माधुर्यसे मुग्ध हो जाते हैं ............................. ८०
[ ६ ] ✿ भगवान्में सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभय- विध शृंगारकी एक कालमें प्रतिष्ठा ....... ८२ ✿ भगवान्के अंगसंगसे ही भूषणोंकी शोभा ..... ८४ ✿ भगवान्द्वारा माधुर्यभावयुक्त विचित्र वेश धारण करना ............................................ ८६ ✿ भगवान्द्वारा मयूरपिच्छ-धारण ................... ९१ ✿ भगवान्द्वारा कानोंमें कर्णिकार-धारण ......... ९३ ✿ पीताम्बरधारणका रहस्य ........................... ९३ ✿ भगवान्के श्रीकण्ठमें वैजयन्ती-मालाकी शोभा .................................................... ९५ ✿ भगवान्की भूषणमयी शोभा ....................... ९६ ✿ वेणुवादन .............................................. ९६ ✿ रसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रकी मंगलमयी लीला भी रसस्वरूप है ..................................... ९८ ✿ भगवान्के जन्म-कर्म बन्धनकारक नहीं हैं... ९९ ✿ प्रथम भगवान्का भक्तमें रमण, अनन्तर भक्तका भगवान्में रमण ........................... १०० ✿ भगवान्का आत्माभिरमण ........................... १०२ ✿ भगवान्के गुणगणोंके श्रवणसे अन्तःकरणमें भगवान्का प्राकट्य ................................ १०३ ✿ भगवान् पूर्ण स्वतन्त्र भक्त पूर्ण परतन्त्र .... १०५ ✿ शरणागतिका स्वरूप ................................. १०५ ✿ भक्तमें स्वातन्त्र्य और भगवान्में पारतन्त्र्य ...... १०५ ✿ भगवद्धाम वृन्दावनकी अद्भुत शोभा ........ १०८ ✿ भगवान्के चरणस्पर्शसे वृन्दावनकी भूमि सौभाग्यशालिनी हो गयी ......................... १०९ ✿ वृन्दाके आख्यानका रहस्य ........................ ११३ ✿ वेणुरव-श्रवणका प्रभाव ............................ ११६ ✿ वेणुरवमें भगवान्का स्वरूप तथा उनकी लीला प्रतिष्ठित है .................................. ११९ ✿ वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण परस्पर अन्तरात्मा हैं ....................................................... १२१ ✿ इन्द्रियवानोंकी यही लालसा कि प्रभु इन्द्रियग्राह्य होकर प्राप्त हों .................... १२१ ✿ ध्यान लगानेकी रीति ............................... १२४ ✿ व्रजांगनाओंका उपालम्भनयुक्त मनोभाव ..... १२६ ✿ आसक्तिकी महिमासे गोपांगनाओंको श्रीकृष्ण- बलरामके मनोहरभावयुक्त दर्शनकी अनुभूति ............................................. १२७ ✿ गोपांगनाओंद्वारा वेणु आदिके प्रति ईर्ष्याभाव .. १३१ ✿ वृन्दावनका सौभाग्य ...................................... १३७ ✿ वेणुनादसे आकृष्ट मयूरोंका नर्तन ............. १४१ ९. चीरहरण ..................................................... १४२ ✿ श्रुतियाँ ही व्रजकुमारियाँ बनीं ..................... १४४ ✿ श्रुतियोंके दो भेद ......................................... १४५ ✿ दण्डकारण्यनिवासी मुनिगण भी गोपकुमारियोंके रूपमें प्रकट हुए ........................................... १४६ ✿ गोपकुमारिकाओंद्वारा उत्तम वरकी प्राप्तिके लिये देवी कात्यायनीका आराधन ........... १४६ ✿ यमुनास्नानका माहात्म्य .............................. १४८ ✿ कर्मयोग और भक्तियोगकी विलक्षणता ..... १४९ ✿ भगवान्का व्रजकुमारिकाओंके साथ परिहास .................................................... १५० ✿ प्रेममयी कुमारिकाओंद्वारा अपने वस्त्रोंकी याचना ...................................................... १५१ ✿ दुस्त्यज्य त्यागके कारण व्रजांगनाओंकी दिव्य महिमा ...................................................... १५१ ✿ दोषानुसन्धान करनेपर भी गोपांगनाएँ मनमोहन श्रीकृष्णको भूल नहीं पातीं ....................... १५३ ✿ सर्वव्यवधानशून्य निवारण हुए बिना जीवकी कृतकृत्यता नहीं होती ................................. १५५ ✿ सभी जीव भगवान्के परतन्त्र होते हैं ..... १५८ ✿ भगवान् ही सबके मुख्य पति हैं ............ १५८ ✿ राग, तृष्णा, मोह आदि निन्द्यभाव भी भगवत्सम्बन्धसे अतिमूल्यवान् हो जाते हैं .... १५९ ✿ अद्वैतसे सुन्दर द्वैत ...................................... १६० ✿ श्रीकृष्ण-संस्पृष्ट वस्त्रोंको धारणकर व्रजांगनाएँ रसाक्रान्त हो उठीं ...................................... १६१ ✿ भगवत्सम्मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा ही भक्ति है ................................................. १६२ ✿ श्रीकृष्णलीला कृष्णके लिये ही है, किसी दूसरेके लिये नहीं....................................... १६५ १०. व्रजभूमि ................................................. १६६ ✿ व्रजभूमिका अद्भुत वैभव ............................ १६६ ✿ नित्य-निकुंजकी श्रीवृन्दावनसे भी अधिक रसमयता ................................................. १७० ११. श्रीरासलीलारहस्य ................................. १७१ ✿ श्रीरासपंचाध्यायीके वक्ता व्यास-पुत्र महाज्ञानी श्रीशुकदेवजी और श्रोता गर्भज्ञानी श्रीपरीक्षित्जीका माहात्म्य ................................................... १७१
[७] ✿ भक्तोंके लिये तो एकमात्र श्रीहरिश्रवण ही परमावलम्ब है १७८ ✿ श्रीमद्भागवतमें दस प्रकारसे भगवान्का कीर्तन किया गया है १७८ ✿ भागवतमें दशमस्कन्ध सार है और उसका भी सारातिसार है रासपंचाध्यायी १८० ✿ रासपंचाध्यायी श्रीमद्भागवतका प्राण है १८१ ✿ श्रीभगवान्के अवतारका प्रधान प्रयोजन— अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान करना १८२ ✿ भगवान्के सगुण दिव्य मंगलविग्रहमें विशेष आकर्षण है १८४ ✿ भगवान् विधिनिषेधातीत हैं १८८ ✿ भगवान्की रासक्रीड़ा कामजयके लिये १९४ ✿ रासलीलाके श्रवण और कीर्तनके अधिकारीकी योग्यता १९८ ✿ श्रीवृषभानुनन्दिनीके कलवाक् नामक शुककी कथा २०० ✿ 'भगवान्' शब्दकी व्याख्या २०१ ✿ रासपंचाध्यायीके प्रथम श्लोककी व्याख्या २०५ ✿ रासलीलाका प्रयोजन २२० ✿ भगवत्साक्षात्कारके लिये भगवल्लीलाओंका श्रवण-कीर्तन अनिवार्य है २२९ ✿ नेत्रोंके साफल्यका रहस्य २३० ✿ व्रजांगनाओंके विविध भेद २३३ ✿ रासकी रात्रियोंकी विलक्षणता २३५ ✿ भक्तोंके तीन भेद २३९ ✿ भगवान्की रासलीला मुमुक्षुओंके लिये २४१ ✿ रासपंचाध्यायीके दूसरे श्लोककी व्याख्या २५० ✿ रासपंचाध्यायीके दूसरे श्लोककी एक अन्य व्याख्या २६१ ✿ दूसरे श्लोककी एक अन्य प्रकारकी व्याख्या २७० ✿ प्रेमी भक्तकी रक्षाके लिये भगवान् स्वयं ही अवतीर्ण होते हैं—एक दृष्टान्त २७१ ✿ विवेककी महिमा २७५ ✿ भगवान्का गोपांगनाओंको उपदेश २८० ✿ स्वधर्ममें निष्ठा होनेका उपाय २८२ ✿ अपनी कुल-परम्पराका समादर आवश्यक है २८३ ✿ कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयके लिये शास्त्रका ही प्रामाण्य है २८४ ✿ शास्त्रानुमोदित आचरणके बिना शास्त्रज्ञान निष्फल है २८७ ✿ जो हितका उपदेश करे, वह शास्त्र है २९२ ✿ वेदोंकी अपौरुषेयता २९४ ✿ समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं २९५ ✿ प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पद में ही होती है २९६ ✿ परमात्मप्रभुका आश्रय लेनेसे प्रपंचकी सहज ही निवृत्ति हो जाती है २९८ ✿ इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार—सभीका अवभासक सर्वसाक्षी परमात्मा ही है ३०० ✿ आत्मसमर्पणरूप अद्वैतदर्शन ही सच्ची पूजा और उत्कृष्टतम भक्ति है ३०४ ✿ प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये ३०६ ✿ ब्रह्मज्ञानके अधिकारीका निर्णय ३०७ ✿ कर्म और उपासनाका समुच्चय ३०७ ✿ विषयचिन्तनसे दुःखकी प्राप्ति ३११ ✿ चित्तमें ही सारा प्रपंच है—योगवासिष्ठका एक दृष्टान्त ३१२ ✿ लीलाके विकासके लिये नित्य अभिन्न श्रीवृषभानुदुलारी और रासेश्वर श्रीकृष्णका द्वैधीभाव ३१४ ✿ इन्द्रियोंको विषय-सेवन मत कराओ ३१५ ✿ प्रभुको एकमात्र आश्रय बना लेनेपर सारे विकार निवृत्त हो जाते हैं ३१८ ✿ इन्द्रियोंको तुष्ट करनेकी चेष्टासे तृष्णा और भी अधिक बढ़ती है ३२० ✿ सच्चा भगवत्प्रेमी वही है, जो शास्त्रका उल्लंघन नहीं करता ३२२ ✿ प्रभु-मिलनकी तीव्र उत्कण्ठा होना बड़े सौभाग्यकी बात है ३२३ ✿ साधन-कार्यमें श्रद्धा (उत्साह)-की बड़ी आवश्यकता है ३२५ ✿ भगवत्प्राप्तिका एकमात्र साधन—भगवत्- सम्मिलनकी तीव्रतर अभिलाषा—एक दृष्टान्त ३२७ ✿ भगवान्द्वारा व्रजांगनाओंको आश्वासन ३२८ ✿ व्रजांगनाओंकी उच्चतम स्थिति ३३२ ✿ रासलीला परब्रह्मका नित्य लास्य है ३३५ ✿ जीवका परमपुरुषार्थ प्रभुकी प्राप्ति ही है ३३५
[ ८ ] १२. श्रीरासपंचाध्यायी .................................... ३३६ ✿ गोपियोंके गर्वपहरणके लिये भगवान् अन्तर्धान हो गये ..................................... ३३६ ✿ गोपबालाओंका अन्तर्द्वन्द्व .......................... ३३६ ✿ रासेश्वरके अन्तर्धान हो जानेपर व्रजांगनाओंकी मनोदशा ................................................. ३३८ ✿ श्रीकृष्णमय गोपियां भगवान्की चेष्टाओंका अनुकरण करने लगीं .............................. ३३९ ✿ भक्त और भगवान्—दोनोंकी विवशता ..... ३४० ✿ भगवदनुरक्त गोपियोंद्वारा भगवद्विस्मरणके लिये उनमें दोषानुसन्धान ................................ ३४१ ✿ भगवान्के अन्तर्धान होनेका हेतु—गोपियोंपर कृपा करना ............................................. ३४३ ✿ भगवान् भक्तपराधीन हैं ........................... ३४७ ✿ लीलविहारीकी लीलाओंने व्रजांगनाओंको स्ववश करके अपनी लीलाका सम्पादन कराया .. ३४८ ✿ भगवान्के लीलानुकरणसे गोपियां अपनेको 'मैं श्रीकृष्ण ही हूँ'—ऐसा मानने लगीं ... ३४९ ✿ गोपरामाओंका प्रेमोन्माद ............................ ३५२ ✿ प्रेममें गुण-दोषकी परीक्षा या विवेकको स्थान नहीं है ........................................... ३५३ ✿ प्रेमकी दृढ़ताका एक दृष्टान्त .................. ३५४ ✿ आप्तकाम पूर्णकाम भी लीलावादनमें तत्पर रहते हैं ................................................ ३५५ ✿ गोपांगनाओंके हृदयमें रहकर भगवान्ने उनकी रक्षा की ................................................ ३५६ ✿ प्रेमोद्रेकमें व्यवधान सह्य नहीं होता........ ३५७ ✿ भक्तकी दृढ़ भावनासे भगवान् भक्तके अधीन हो जाते हैं .......................................... ३५९ ✿ गोपियोंकी प्रेमसमाधि भग्न होनेपर वे श्यामसुन्दरको पुकारने लगीं ................... ३६० ✿ गोपांगनाओंका प्रेमविह्वल हो वृक्षों- वनस्पतियोंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना तथा उत्तर न मिलनेपर दोषानुसन्धान करना ... ३६१ ✿ गोपांगनाओंका कुरबक-अशोक आदिसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना ................... ३७१ ✿ गोपांगनाओंका तुलसी आदिसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना .................................... ३७५ ✿ व्रजांगनाओंद्वारा तुलसीमें दोषानुसन्धान ..... ३८० ✿ भगवान्की पूजामें भावका प्राधान्य है, प्रचुर उपचारोंका नहीं................................... ३८२ ✿ भगवान्का सौन्दर्य-माधुर्य स्वयं भगवान्को भी विस्मयमें डाल देता है ..................... ३८३ ✿ प्रेमोन्मादिनी गोपांगनाओंका आम्र, प्रियाल आदि वृक्षोंसे मनमोहन श्यामके विषयमें पूछना और उत्तर न मिलनेपर उनपर असूया भाव रखना .. ३८६ ✿ व्रजांगनाओंका प्रेमोन्माद .......................... ३९२ ✿ गोपांगनाओंद्वारा पृथ्वीसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना....................................... ४०० ✿ अघासुरकी मुक्ति ................................... ४०५ ✿ मानसी-आराधनाकी महिमा ...................... ४०५ ✿ निकुंजस्थ माधुर्यनिधि श्यामसुन्दरकी श्रेष्ठता— एक रोचक दृष्टान्त .................................... ४०६ ✿ भगवान्की लोकोत्तर अलकावलीका माधुर्य.. ४०७ ✿ व्रजांगनाओंका वियोगिनी हरिणीसे श्याम- सुन्दरके विषयमें पूछना ............................ ४१० ✿ गोपांगनाओंका सर्वातिशय माहात्म्य ......... ४१२ ✿ श्यामाश्यामके मनोहररूपकी बाँकी झाँकी.. ४१५ ✿ श्रीकृष्णको जिसने अपना सर्वस्व नहीं बनाया, वह सोचनीय है .................................... ४१६ ✿ गोपांगनाओंद्वारा हरिणियोंके सौभाग्यकी सराहना .. ४१७ ✿ अपने प्रियतमके दर्शनोंकी तीव्र उत्कण्ठा ही सच्ची प्रीति है ....................................... ४१९ ✿ श्यामसुन्दरके दर्शनमें ही नेत्रोंके होनेका साफल्य ................................................ ४२१ ✿ हरिणीके प्रति ईर्ष्याभाव........................ ४२७ ✿ गोपांगनाओंका मनमोहनके स्वरूपका वर्णन करके वृक्षोंसे प्रश्न करना ............. ४२८ ✿ लताओंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना ..... ४३२ ✿ श्रीरासपंचाध्यायीके पठन, श्रवण एवं मननका फल—हृद्रोग-कामका सर्वथा विनाश ...... ४३७ ✿ श्रीश्यामरसका आस्वादन होते ही अन्य रस नीरस हो जाते हैं .......................... ४३७ ✿ गोपांगनाओंद्वारा श्यामसुन्दरकी मधुर लीलाओंका अनुकरण ............................................. ४३९ ✿ गोपियोंद्वारा शकटासुर-तृणावर्त-उद्धार आदि लीलाओंका अनुकरण ............................. ४४७ ✿ भगवान्को वशमें करनेका एकमात्र साधन— रागानुगा भक्ति ...................................... ४४७ ✿ ऐश्वर्यभावसे भी अधिक माधुर्यभावकी महत्ता—लीलाका एक दृष्टान्त ................ ४४९ ✿ श्रीराधिकाजीमें पूर्णतम माधुर्यका प्रकाश ... ४४९
[ ९ ] द्वितीय खण्ड—देवोपासनातत्त्व १. गणपति-तत्त्व .................................................... ४५० ✿ गणपति ब्रह्म ही हैं ............................................ ४५० ✿ शास्त्रद्वारा ही गणपतिके ब्रह्मत्वका परिज्ञान .. ४५० ✿ गणेशजीके विविध नामों तथा आयुधों आदिका स्वरूप ............................................................. ४५१ ✿ गणपति, श्रीकृष्ण, शिव आदि एक ही तत्त्व हैं ............................................................ ४५२ ✿ सर्वविघ्नोंके विनाशक गणेशकी आदि- पूज्यता ............................................................ ४५३ ✿ मरणासन्नावस्था तथा श्राद्ध आदिमें भी गणेश- स्मरण आवश्यक ............................................ ४५४ ✿ क्या गणेश अनार्योंके देव हैं ? .......................... ४५४ २. भगवान् सूर्य—हमारे प्रत्यक्ष देवता .................... ४५६ ✿ गायत्री-उपासना सर्वदेवमय आदित्यकी उपासना है ..................................................... ४५७ ३. श्रीशिव-तत्त्व .................................................... ४५८ ✿ भगवान् शिव—समस्त प्राणियोंके विश्राम- स्थान ............................................................. ४५८ ✿ विश्वका उत्पादक, पालक, संहारक—एक या अनेक ? ......................................................... ४५८ ✿ एक तत्त्वका अनेक नाम-रूपोंमें परिणमन .... ४५९ ✿ संहारमें भी भगवत्कृपा .................................. ४६० ✿ शिव सर्वाराध्य परम दैवत हैं ........................... ४६० ✿ शिव-विष्णुका सर्वथा अभेद ........................... ४६२ ✿ शिवके सगुणस्वरूपकी मनोहरता एवं मंगलमयता .................................................... ४६२ ✿ भगवान् शिव आशुतोष हैं ............................... ४६३ ४. शिवसे शिक्षा ..................................................... ४६४ ✿ शिवकुटुम्बका वैचित्र्य ................................... ४६५ ५. शिवलिंगोपासना-रहस्य ...................................... ४६६ ✿ सच्चिदानन्द परमात्माका शिवशक्ति-रूपमें प्राकट्य .......................................................... ४६६ ✿ शास्त्रनिषिद्ध विषयोंमें आनन्द और प्रेम दोष है, हेय है ........................................................ ४६७ ✿ शुद्ध प्रेम ही शुद्ध काम है ................................. ४६७ ✿ शिव-शक्तिमें ही लिंगयोनि-भावकी कल्पना .......................................................... ४६८ ✿ ईश्वरभाव मायासे आवृत और शिवभाव अनावृत है ....................................................... ४७० ✿ ज्योतिर्लिङ्गका स्वरूप ................................. ४७० ✿ शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव हैं ........ ४७२ ✿ शिवलिंग योनिरूपा कुण्डलिनीसे परिवेष्टित ..................................................... ४७३ ✿ लिंगपूजनसे भुक्ति एवं मुक्ति .......................... ४७३ ✿ लिंगयोनिभाव ही अर्धनारीश्वर ....................... ४७६ ✿ कामनाभेदसे लिंगके विविध भेद ...................... ४७७ ✿ बाण और नर्मद लिंगकी परीक्षा ....................... ४७७ ✿ एक ही परमात्माके अनेक नाम ......................... ४७८ ✿ शिवको तामसदेवता कहना अनभिज्ञता ....... ४७९ ✿ भगवान् शिव रसमय, कल्याणमय ............. ४७९ ६. श्रीविष्णु-तत्त्व .................................................... ४८० ✿ अनेक ईश्वरका मानना युक्तिविरुद्ध ................. ४८० ✿ जगत्पालनके लिये भगवान् विष्णुमें सर्वातिशायी ऐश्वर्य ............................................................. ४८१ ✿ भगवान्का स्थूल विराट् स्वरूप ..................... ४८२ ✿ भगवान्के आभूषणों एवं आयुधोंका रहस्य .. ४८३ ✿ भगवद्धाम .................................................... ४८४ ७. श्रीभगवती-तत्त्व ............................................... ४८६ ✿ महाचिति भगवतीमें सम्पूर्ण विश्व भासित ... ४८६ ✿ महाचिति ही भगवती, आत्मा, पुरुष ब्रह्म आदि शब्दोंसे व्यवहृत ............................................. ४८६ ✿ भगवती मायारूपा नहीं है ................................ ४८६ ✿ मायाविशिष्ट ब्रह्म ही भगवती है ..................... ४८८ ✿ शक्तिका खण्डन ............................................ ४९० ✿ शक्ति-समर्थन ................................................ ४९४ ✿ मायारूपिणी भगवती ....................................... ४९९ ✿ माया और अविद्या ......................................... ५०० ✿ मायाकी अनिर्वचनीयता .................................. ५०१ ✿ तान्त्रिक दृष्टिमें शक्ति ..................................... ५०२ ✿ प्रकृतिकी सत्ता ............................................. ५०२ ✿ भगवती और मायाका वैलक्षण्य ...................... ५०२ ✿ रात्रिरूपिणी .................................................. ५०२ ✿ चण्डी ............................................................ ५०३ ✿ नवार्णमन्त्रार्थ ................................................. ५०४ ✿ प्रथम चरित्र ................................................. ५०५ ✿ उत्तर चरित्र .................................................. ५०६ ✿ 'देवीसूक्त' में भगवतीका स्वरूप ................... ५०९ ✿ भगवतीकी विविध विभूतियाँ ......................... ५१०
[ १० ] ✿ भगवती और सृष्टि .................................................... ५१० ✿ मूर्तिरहस्य ............................................................. ५११ ✿ दशमहाविद्या ......................................................... ५१४ (१) महाकाली ......................................................... ५१४ (२) तारा ................................................................ ५१४ (३) षोडशी ............................................................. ५१५ (४) भुवनेश्वरी .......................................................... ५१५ (५) छिन्नमस्ता ......................................................... ५१५ (६) त्रिपुरभैरवी ......................................................... ५१६ (७) धूमावती ........................................................... ५१६ (८) बगला ............................................................... ५१६ (९) मातङ्गी ............................................................ ५१७ (१०) कमला ........................................................... ५१७ ✿ पूजारहस्य ............................................................ ५१७ ✿ पुरुषरूपिणी ......................................................... ५१८ ✿ शिवपरात्पर .......................................................... ५२० ✿ ब्रह्मजाया ............................................................ ५२३ ✿ भगवतीकी ब्रह्मरूपता .............................................. ५२३ ८. गायत्री-तत्त्व ........................................................ ५२४ ✿ त्रिपदा गायत्री ...................................................... ५२५ ९. शक्तिका स्वरूप ..................................................... ५२७ ✿ भगवती ही निखिल प्रपंचकी निर्मात्री ........................ ५३० १०. माँके श्रीचरणोंमें .................................................. ५३० ✿ कातर प्रार्थना ....................................................... ५३४ ✿ सांसारिक मोह-ममताका परिणाम ............................. ५३६ ✿ मोहकी विचित्र महिमा ............................................ ५३९ ✿ माँ ही एकमात्र शरण .............................................. ५४० ✿ दीनजनोंपर माँकी विशेष कृपा ................................. ५४० ✿ माँकी कृपासे ही माँका स्वरूपबोध .......................... ५४१ ✿ स्वकल्पित प्रपंच ही दुःखका हेतु है ......................... ५४३ ✿ कामनात्यागसे दृढबोधकी प्राप्ति ............................... ५४३ ✿ अखण्डबोधसे संसारकी नश्वरताका भान .................... ५४५ ✿ देहभावनासे ही देहकी सत्ता और मनके कारण ही जगद्विभ्रम ................................................. ५४६ ११. शक्तिपीठ-रहस्य ................................................... ५४८ ✿ इक्यावन शक्तिपीठ ................................................ ५४९ ✿ वर्णमालाएँ .......................................................... ५५२ १२. श्रीरामजन्म-रहस्य ............................................... ५५४ ✿ भगवान्का आविर्भाव चार रूपोंमें ............................. ५५५ १३. श्रीरामभद्रका ध्यान ............................................... ५५६ ✿ भगवान्के विविध अंगों तथा आभूषणोंकी शोभा .................................................................... ५५६ १४. भगवदवतारका प्रयोजन ......................................... ५६० ✿ भगवदवतरणके विभिन्न प्रयोजनोंके विविध अभिप्राय ................................................................ ५६१ १५. भारतमें ही अवतार क्यों ? ..................................... ५६३ ✿ धर्माधर्मके निर्णयमें बुद्धिबल नहीं, शास्त्र ही प्रमाण है ............................................................... ५६५ ✿ शास्त्रोंमें संशोधनकी कल्पना नितान्त अल्पज्ञता ................................................................ ५६६ ✿ भारतवर्ष समस्त भूमण्डलकी नाभि है ....................... ५६६ १६. अवतारमीमांसा ................................................... ५६८ ✿ भगवान्का पूर्णावतार या अंशावतार ........................... ५६९ ✿ अवतारदेह और जीवदेहका पार्थक्य .......................... ५७० १७. बुद्धावतारका प्रयोजन .......................................... ५७३ ✿ वेदोंको माननेवाला आस्तिक और उनकी निन्दा करनेवाला नास्तिक ................................................... ५७४ १८. निराकारसे साकार ................................................ ५७५ ✿ परमात्मामें पारमार्थिक सत्तासे जन्माभाव और व्यावहारिक दृष्टिसे जन्म का भाव ............................... ५७६ ✿ साकाररूपमें प्रकट भगवान्के दर्शनमें विलक्षणता .............................................................. ५७८ ✿ साकाररूपमें किसी भी भावसे चित्त लगानेसे प्राणीका कल्याण ..................................................... ५७९ ✿ सगुणस्वरूपका चिन्तन सरल एवं सुगम ..................... ५७९ ✿ श्रुतियोंमें सगुण-साकाररूपकी अवधारणा ................... ५८० ✿ भगवद्विग्रहका उपादान ........................................... ५८३ ✿ प्राकट्यके विषयमें विभिन्न अभिमतोंकी मीमांसा और निष्कर्ष ................................................ ५८५ १९. निर्गुण या सगुण .................................................. ५८६ ✿ ध्याता, ध्यान और ध्येय ........................................... ५८६ ✿ दिव्य स्वरूप-धारणाका प्रयोजन ............................... ५८८ ✿ करणग्रामोंकी सार्थकता किसमें ? ............................. ५८९ ✿ परमानन्दघन ब्रह्म अद्भुत रसमय है .......................... ५९० ✿ द्रुतचित्तपर भगवान्का प्राकट्य ही भक्ति है ................. ५९० ✿ भक्त और भगवान्का अभिन्न सम्बन्ध ....................... ५९१ ✿ भगवान्का स्वरूप ही प्रेम है .................................... ५९२ ✿ भगवान्में चित्त लगानेसे परम कल्याण ...................... ५९४
[ ११ ] तृतीय खण्ड—भक्तितत्त्व १. भगवत्प्राप्ति .................................................. ५९५ ✿ भगवान्में उत्कट प्रीति होनेपर तत्क्षण ही भगवत्प्राप्ति ..................................................... ५९५ २. नामरूपकी उपयोगिता .......................................... ५९६ ✿ नामरूपसे नामरूपातीत तत्त्वकी प्राप्ति ...... ५९७ ✿ मनकी एकाग्रताके लिये सात्त्विक कर्म और ज्ञानका अवलम्बन अपेक्षित .......................... ५९७ ✿ नामरूपसे अतीत परब्रह्मकी दिव्यलीलाशक्तिके सहयोगसे नामरूपयुक्त सगुण-साकार रूपमें अभिव्यक्ति ..................................................... ५९८ ✿ सभी नामरूप भगवान्के ही हैं ..................... ५९८ ✿ भगवदर्थनामरूपकर्मसे भवबन्धनकी विमुक्ति ... ५९९ ३. इष्टदेवकी उपासना ............................................ ५९९ ✿ निन्दाका तात्पर्य अपने अभीष्टकी प्रशंसामें .. ५९९ ✿ अपने इष्टमें अनन्यता .................................. ६०० ✿ शिव-विष्णुमें अभेद-बुद्धि ............................. ६०१ ✿ जिस रूपमें प्रीति हो, उस रूपकी उपासना करनी चाहिये ................................................. ६०२ ✿ उपासनाके लिये अपनी कुल-परम्पराका समादर ........................................................... ६०३ ✿ कृपापरवश भगवान्द्वारा अनेक मंगलमय स्वरूपोंका धारण ............................................ ६०४ ✿ श्रौत-स्मार्तप्रतिपादित स्वधर्मका सम्पादन परमेश्वरका आराधन है ................................... ६०५ ४. मानसी आराधना ................................................ ६०६ ✿ उपासनामें भावनाका प्राधान्य ........................ ६०८ ५. सगुणोपासनामें सरलता ....................................... ६०९ ✿ सगुणोपासना एवं निर्गुणोपासनाका तारतम्य .. ६०९ ६. अव्यभिचार भक्तियोग ........................................ ६११ ✿ मानसी-सेवा ................................................ ६१२ ✿ चार प्रकारके भक्त ........................................ ६१२ ✿ सविकल्पक और निर्विकल्पक ब्रह्म ........... ६१३ ✿ ब्रह्म—अतिशयताकी कल्पनासे अतीत ...... ६१५ ७. सबसे सगे भगवान् ............................................ ६१६ ✿ एकमात्र भगवान्का सम्बन्ध ही स्थिर है .... ६१७ ८. विभीषण-शरणागति ............................................. ६१८ ✿ जीवभावसे मुक्त हुए बिना पूर्ण स्वातन्त्र्य सम्भव नहीं ..................................................... ६१८ ✿ भगवान्के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है ..... ६१९ ✿ सत्संकल्पकी महिमा .................................... ६२२ ✿ भगवान्की भक्तपरवशताका एक दृष्टान्त ... ६२४ ✿ भगवान्के अवतरणका हेतु—अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान ......... ६२७ ९. चतुर्विधा भजन्ते ................................................ ६२८ ✿ ज्ञानी भक्त ................................................... ६२८ ✿ जिज्ञासु भक्त ................................................. ६२९ ✿ आर्त भक्त .................................................... ६३० ✿ अर्थार्थी भक्त ................................................ ६३० १०. भगवच्छरणागतिसे ही गति ................................. ६३१ ✿ अनन्य भगवत्परायणताका एक दृष्टान्त ..... ६३२ ११. भगवान्का अवलम्बन अनिवार्य ........................... ६३३ ✿ स्वधर्मानुष्ठानसे कल्याणकी प्राप्ति ................. ६३४ १२. प्रेमतत्त्व ........................................................... ६३५ ✿ अन्तःकरणकी सात्त्विकी वृत्ति ही प्रेम है ..... ६३५ ✿ भगवान् ही प्रेमके उद्गम-स्थान किंवा प्रेमस्वरूप हैं ................................................. ६३६ ✿ प्रेम, प्रेमी और प्रेमास्पदका अभेद सम्बन्ध ... ६३९ १३. भगवान् और प्रेम .............................................. ६४० ✿ आत्मामें सर्वातिशायी प्रेम होता है ............. ६४० ✿ उच्चकोटिका ज्ञान भी प्रेमके बिना सुशोभित नहीं होता .............................................................. ६४१ ✿ रागानुगा प्रीतिके सम्पादनके लिये भगवान्का प्राकट्य ......................................................... ६४२ १४. भगवत्कथामृत ................................................. ६४३ ✿ ब्रह्मसुख बृहत्तम सुख है ............................. ६४४ ✿ भगवान् सबके परम प्रकाशक ..................... ६४५ ✿ श्रवणकी महिमा .......................................... ६४५ ✿ श्रवणमें सभीका अधिकार ............................ ६४५ १५. प्रभुकृपा ........................................................... ६४६
[ १२ ] ✿ निरन्तर भगवत्स्मरण सभीके लिये परम श्रेयस्कर है ............................................. ६५० १७. करुणालहरी ............................................ ६५३ ✿ प्रेमी भक्तका भगवान्के प्रति मधुर उपालम्भ.. ६५३ १८. गजेन्द्र-मुक्ति ......................................... ६५५ ✿ आर्तभक्तकी प्रार्थना ................................. ६५५ १९. संकल्प-बल ............................................ ६५८ ✿ परमात्मा ही जगत्के उपादान और निमित्त कारण ............................................... ६५९ ✿ संकल्पका प्राधान्य .................................. ६५९ ✿ संकल्पके अनुसार ही क्रियाकी निष्पत्ति ... ६६१ ✿ असत्संकल्पोंको त्यागनेकी रीति ............... ६६१ ✿ सत्-तत्त्वका प्रभाव ................................ ६६२ ✿ संकल्पसिद्धिका बाधक—अविश्वास ......... ६६२ ✿ संकल्पका स्वरूप .................................. ६६४ ✿ शुभसंकल्पकी ही भावना करें .................. ६६४ ✿ योगियोंका संकल्प-बल ........................... ६६५ ✿ मनसे पापकर्मोंका परित्याग और अच्छे कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये ............. ६६५ ✿ बुरे कर्मोंके संकल्पोंको रोकना परमावश्यक .. ६६६ ✿ सत्कर्म और उत्तम मन्त्रोंके जपसे संकल्पका बल दुगुना हो जाता है ............................ ६६७ ✿ मन्त्रजपके अधिकारी-अनधिकारी ............ ६६८ २०. ज्ञान और भक्ति ...................................... ६७० ✿ ज्ञान बड़ा या भक्ति बड़ी ........................... ६७० ✿ भक्ति और ज्ञानका स्वरूप ....................... ६७१ ✿ भक्तिसे ज्ञानकी प्राप्ति ............................ ६७२ ✿ भक्तिका अर्थ ज्ञान है .............................. ६७३ ✿ ज्ञान नामकी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है ......... ६७४ ✿ वेदोंके दो काण्ड—कर्मकाण्ड और उपासना- काण्ड................................................. ६७५ ✿ भक्तिका उत्कर्ष ................................... ६७५ ✿ भक्ति और वेदान्त ................................ ६७६ ✿ भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष तथा अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है ................................... ६७८ ✿ भक्तिसे ज्ञानद्वारा परम तत्त्वकी प्राप्ति....... ६८१ ✿ सगुणोपासना और निर्गुणोपासनाका तारतम्य .. ६८२ ✿ सगुणोपासना सरल है .......................... ६८४ ✿ जीवन्मुक्तकी भी भगवान्के भजनमें अभिरुचि ... ६९० २१. भक्तिरसामृतास्वादन .................................... ६९१ ✿ प्रेम वाणीका विषय नहीं ......................... ६९३ ✿ विरक्तोंद्वारा भी भक्तिकी कामना ............. ६९४ ✿ भगवत्प्रेमके साधन ............................... ६९४ ✿ चित्तद्रुतिसे भक्तिमें भेद ........................ ६९५ ✿ परब्रह्मकी प्रेमास्पदता ............................ ६९६ ✿ ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्में भेद....... ६९७ ✿ निर्गुण और सगुणका स्वरूप .................. ६९९ ✿ भगवान्के सभी गुण भक्तोपयोगी ............. ७०० ✿ भगवान्की तीन शक्तियाँ ......................... ७०१ ✿ बिम्बप्रतिबिम्बभाव ................................. ७०२ ✿ अज्ञातज्ञापकत्व ही प्रमाणोंका प्रामाण्य है .... ७०३ ✿ आचार्य श्रीमद्मधुसूदनजी सरस्वती—व्यक्तित्व एवं कृतित्व ......................................... ७०४ २२. क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ..... ७०५ ✿ विविध शंकाओंके युक्तियुक्त शास्त्रोक्त समाधान .............................................. ७०५ चतुर्थ खण्ड—ज्ञानतत्त्वदर्शन १. वेदान्तरससार ........................................... ७१४ ✿ मंगलाचरण ......................................... ७१४ ✿ वेदप्रामाण्य-तात्पर्यविमर्श ....................... ७१४ ✿ ब्रह्मकी सच्चिदानन्दरूपता और जगत्की असच्चिदानन्दरूपता ............................ ७१५ ✿ मायाकी अनिर्वचनीयता ............................ ७१५ ✿ ज्ञानस्वरूप-विमर्श ................................. ७१६ ✿ भगवत्तत्त्व-प्रतिपादन ............................ ७१६ ✿ भगवत्तत्त्वकी आत्मरूपता ......................... ७२० ✿ शोधित अहमर्थकी प्रत्यगात्मरूपता .......... ७२३ ✿ ब्रह्मात्मतत्त्वकी रसरूपता ......................... ७२५ ✿ अविक्रिय विज्ञानघन आत्माकी ब्रह्मरूपता.. ७२७ ✿ भ्रमबीज द्वैतमूल अज्ञानातीत आत्माकी स्वप्रकाश आनन्दरूपता ........................ ७२८ ✿ सबीज ब्रह्मकी परिणामोपादानता और निर्बीज ब्रह्मकी विवर्तोपादानता ........................... ७३० ✿ अनुभवगोचरता और आच्छादकताके कारण अज्ञानकी भावरूपता न कि ज्ञानाभावरूपता .. ७३२ ✿ निष्प्रपंच परमात्मामें कल्पित तादात्म्य-सम्बन्धसे प्रकृति तथा प्रपंचकी विद्यमानता ............ ७३३ ✿ वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कारसम्पन्न निरुद्धान्तःकरणसे निरावरण ब्रह्मसाक्षात्कारकी सम्पन्नता ......... ७३५
[ १३ ] ✿ ब्रह्मात्मविज्ञानसे सर्वविज्ञानकी बाधरूपता... ७३९ ✿ तारतम्यशून्य अद्वयज्ञानस्वरूप तत्त्वकी निरतिशय बृहद् ब्रह्मरूपता ........... ७४६ २. सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ........................ ७४९ ✿ महेश्वरकी महाशक्ति और उसकी अद्भुत चमत्कृति ........................................... ७४९ ✿ वैदिक तथा अवैदिक दर्शनभेद .............. ७४९ ✿ चार्वाकमत-प्रतिपादन ............................ ७४९ ✿ बौद्धमतविवेचन .................................. ७५० ✿ बौद्धमतप्रभेद ..................................... ७५० ✿ जैनमतनिरूपण ................................... ७५० ✿ न्यायमतनिरूपण ................................. ७५१ ✿ सांख्यमतप्रतिपादन ................................ ७५१ ✿ योगमतनिरूपण ................................... ७५१ ✿ मीमांसामतविवेचन .............................. ७५१ ✿ वेदान्तमतप्रभेदप्रतिपादन ........................ ७५२ ✿ श्रीमाध्वमतनिरूपण .............................. ७५२ ✿ श्रीरामानुजमतनिरूपण ........................... ७५२ ✿ श्रीनिम्बार्कमतनिरूपण ........................... ७५२ ✿ श्रीवल्लभमतविवेचन ............................. ७५३ ✿ शैवादि विविधमतविवेचन ........................ ७५३ ✿ सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ...................... ७५४ ✿ सुन्दोपसुन्दन्यायकी अप्रसक्ति, किंतु सोपानारोह- क्रमकी प्रसक्ति .................................... ७५५ ✿ अद्वैतमें द्वैतान्तभावकी प्रसक्ति ................ ७५५ ✿ द्वैतप्रपंचभगवदाश्रिता अनिर्वचनीयताशक्तिकी अद्भुत चमत्कृति ................................. ७५५ ✿ द्रष्टा आत्माकी दृश्यतादात्म्यापत्तिके कारण विविध वादोंकी प्रवृत्ति .......................... ७५५ ✿ परोवरीयक्रमके समादरसे समन्वयकी सिद्धि तथा वास्तव आत्माकी समुपलब्धि ......... ७५५ ✿ तदभिमतविषयविशेषकी उपादेयता तथा तदतिरिक्तकी उपेक्षा—समन्वयकी स्वरूप- विधा................................................. ७५६ ✿ सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मकी निरावरण स्फूर्ति शिवादि पंचदेवोंमें एकातिरिक्त अन्योंकी निन्दा निज इष्टमें दृढ़ आस्था-सम्पादनकी विधा .... ७५८ ✿ कार्यब्रह्म, कारणब्रह्म और कार्यकारणातीत परब्रह्ममें पूर्व-पूर्वकी निन्दा उत्तरोत्तरकी उत्कृष्टताकी स्वस्थ दिशा .................... ७५९ ✿ सत्ताभेदकी समीचीनता ........................ ७६१ ✿ उपाधिपर्यन्त व्यावहारिक भेदके कारण भगवद्भक्तिके लिये अपेक्षित जीवेश्वरभेदकी सम्पन्नता .......................................... ७६२ ✿ कर्मसंन्यासकी शास्त्रसम्मतता ................. ७६२ ✿ सर्वविध व्यवधानकी असहिष्णुता भगवत्प्रेमकी प्रगल्भता ........................................... ७६३ ✿ स्वात्मसमर्पणसे ही भक्ति और भगवान्की पूर्णता .............................................. ७६४ ✿ भगवद्-विग्रहकी व्यावहारिकता तथापि उपादानांशमें परमार्थता एवं निमित्तांशमें आकाशादिसे विलक्षणता ..................... ७६५ ✿ स्वरूपतः निर्गुण-निरपेक्ष-परमानन्दस्वरूप भगवत्तत्त्वके सगुण-साकाररूपसे प्रादुर्भावमें विशुद्ध सत्त्वात्मिका शक्तिकी निमित्तमात्रता .................................... ७६५ ✿ सबके अभिमत स्वरूपकी वास्तविक भगवद्रूपता .......................................... ७६६
࿇ पूर्णपरात्पर भगवान् श्रीकृष्ण ࿇ शिखिमुकुटविशेषं नीलपद्माङ्गदेशं विधुमुखकृतकेशं कौस्तुभापीतवेशम्। मधुररवकलेशं शं भजे भ्रातृशेषं व्रजजनवनितेशं माधवं राधिकेशम्॥
भक्तिसुधा प्रथम खण्ड—श्रीकृष्णलीला-दर्शन श्रीकृष्ण-जन्म श्रीनन्दराय और देवी नन्दरानीजीका परिचय 'श्रीगोपालचम्पू' में श्रीकृष्ण-जन्मका बड़ा सुन्दर वर्णन मिलता है। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके बाल्य- सुखके उपभोक्ता श्रीमन्नन्दराय कौन थे? 'गोप' शब्दसे भी उनका व्यवहार होता है। 'सच्छूद्रौ गोपनापितौ' इत्यादि वचनोंके आधारपर कुछ लोग उन्हें शूद्र समझ सकते हैं। वैसे तो भगवान्का जहाँ ही प्राकट्य हो, वही कुल धन्य है, फिर कोई भी क्यों न हो! परंतु 'श्रीगोपालचम्पू' के रचयिताने तो उन्हें क्षत्रियसे वैश्यकन्यामें उत्पन्न, अतएव वैश्य माना है। वृष्णिवंशमें भूषणस्वरूप देवमीढ़ मथुरापुरीमें निवास करते थे। उनकी दो स्त्रियाँ थीं, एक वैश्यकन्या और दूसरी क्षत्रियकन्या। क्षत्रियकन्यासे शूर हुए, जिनके वसुदेवादि हुए और वैश्यकन्यासे पर्जन्य हुए। अनुलोम संकरोंका वही वर्ण होता है, जो माताका होता है। इसी कारण पर्जन्यने वैश्यताको ही स्वीकार किया और गोपालनमें ही विशेष रूपसे प्रवृत्त हुए, जो कि वैश्य- जातिका प्रधान कर्म है, इसीलिये वे गोप भी कहे गये— 'वृष्णिवंशावतंसः श्रीदेवमीढ़नामा परमगुण- धामा मथुरामध्यासयामास। तस्य भार्याद्वयमासीत्। प्रथमा द्वितीयवर्णा द्वितीया तृतीयवर्णा। तयोश्च क्रमेण शूरः पर्जन्य इति पुत्रद्वयं बभूव। शूरस्य वसुदेवादयः समुदयन्ति स्म। श्रीमान् पर्जन्यस्तु 'मातृवर्णवद्दर्णसङ्कर' इति न्यायेन वैश्यतामेवाविश्य गवामेवैश्यं वश्यं चकार।' पर्जन्य बड़े धर्मात्मा और ब्रह्म-हरिपूजनपरायण थे। उनका मातृवंश वैश्य सर्वत्र विस्तीर्ण और प्रशंसनीय था, उनमें भी वैश्यविशेष आभीर वंश था। वैश्यकी पुत्रीमें ब्राह्मणसे उत्पन्न पुत्र 'अम्बष्ठ' होता है और अम्बष्ठ-कन्यामें ब्राह्मणसे उत्पन्न 'आभीर' होता है। यह आभीर वैश्य ही होता है। ऐसे ही वैश्यकुलकी कन्यामें देवमीढ़ क्षत्रियसे उत्पन्न पर्जन्य वैश्य थे। ये ही गोपवंशरूपसे कृष्णलीलामें प्रख्यात हैं, अतएव इससे शूद्र गोप पृथक् हैं। यह तो वैश्य ही गोपालन कर्मसे गोप कहे गये। ब्रह्माने भी आभीरापरपर्याय गोप-कन्याको पत्नीत्वेन स्वीकार करके उसके साथ यज्ञ किया था। अतएव 'भागवत' में भी गर्गजीसे नन्दजीने कहा था कि इन दोनों पुत्रोंका द्विजातिसंस्कार करो—'कुरु द्विजातिसंस्कारम्॥' (श्रीमद्भा० १०।८।१०) कृष्णने भी 'कृषिवाणिज्य- गोरक्षा कुसीदं तुर्यमुच्यते। वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम्॥' (श्रीमद्भा० १०।२४।२१) इत्यादिसे अपनेको गोवृत्त वैश्य कहा है। पर्जन्यके उपनन्द, अभिनन्द, नन्द, सनन्द और नन्दन—ये पाँच पुत्र हुए। उनमें भी श्रीमन्नन्दराय सबके ही प्रेमास्पद थे। किसी सुमुख नामक प्रमुख गोपने श्रीमन्नन्दरायको परम धन्या, सुननेवालों,
देखनेवालों, भक्तिवालोंको यश देनेवाली यशोदा नाम्नी कन्याको प्रदान किया। पर्जन्यने मध्यम पुत्र नन्दको ही सर्वसम्मतिसे राज्य दिया और सम्पूर्ण भाई मन्त्री आदिका कार्य करते थे। पाँचों भाइयोंमें कोई सन्तति न थी। पुत्रेष्टि यज्ञादि किये गये, अनेक प्रकारकी भगवदाराधना होती रही। एक दिन श्रीमन्नन्दरायने नन्दरानीसे कहा—'मानिनि ! मैं तुम्हारे अंकमें दुग्धोद्गारी पयोधरपर क्रीड़ा करनेवाला श्यामवर्णका चंचल, चारु, दीर्घ नेत्रोंवाला बालक स्पष्ट रूपसे देख रहा हूँ। क्या यह स्वप्न है या जागर ? सहधर्मिणि ! ठीक कहो, क्या तुम्हें भी वैसा ही प्रतीत होता है ? श्यामश्चञ्चलचारुदीर्घनयनो बालस्तवाङ्कस्थले दुग्धोद्गारि पयोधरे स्फुटमसौ क्रीडन् मयालोक्यते। (गोपालचम्पू) नन्दरानीने कहा—'देव ! मेरे भी मनमें ऐसी ही बात आ रही है।' इसके अनन्तर दोनोंने ही अपनी मनोरथपूर्तिके लिये द्वादशी-व्रत प्रारम्भ किया। वर्ष पूर्ण होनेपर समान कालमें ही दोनोंके सामने देवदेवका प्राकट्य हुआ और कहा कि 'अहो ! तुम व्रतसे क्यों खिन्न हो रहे हो ? जो अतसीकुसुमके समान सुषमा- सम्पन्न सुकुमार तुम दोनोंके अनुभवमें आता है, वह तुम्हारे संकल्पका ही फल है।' ऐसा कहकर देव अन्तर्हित हुए। यथासमय दिव्य कालमें, जिस समय जाति (जूही)-के साथ माधवी, केतकीके साथ केतक, अम्बुजोंके साथ कुमुद फूले थे, दिशाएँ प्रसन्न थीं, उसी समय सर्वाश्चर्यनिधि श्रीकृष्णका जन्म हुआ। ललित स्मितसे नील कमलोंके सम्राट्के समान बालकका मुख था। वस्तुतः वह स्वरूप ऐसा विचित्र था कि औरोंकी तो कौन कहे, वह अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् भगवान्को ही आश्चर्यसिन्धु या विस्मयमें डालनेवाला था— यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२।१२) भूषणोंको भी विभूषित करनेवाले अंगोंको मणिमय प्रांगणमें प्रतिबिम्बित देखकर कृष्ण स्वयं मुग्ध होकर उससे मिलनेके लिये उत्सुक हो उठते थे— रत्नस्थले जानुचरः कुमारः सङ्क्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम् । आदातुकामस्तदलाभखेदा- न्निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद॥ कुछ महानुभावोंका कहना है, श्रीभगवान्का सम्बन्ध केवल प्रेम-निबन्धन ही है। तभी कहा है— 'भक्त्याहमेकया ग्राह्यः' (श्रीमद्भा० ११।१४।२१) अर्थात् भगवान् केवल भक्तिसे ही ग्राह्य होते हैं। जो जिस भावसे प्रभुको भजते हैं, प्रभु भी उन्हें वैसे ही प्राप्त होते हैं, अतः श्रीमन्नन्दराय एवं नन्दरानीके भावानुसार प्रभु वात्सल्य-प्रेमानुकूल उनकी पुत्रताको प्राप्त हुए। श्रीवसुदेवजीको भी वात्सल्य- रस प्राप्त था, परंतु सूतिका-गृहमें ही भगवान्के ऐश्वर्यपूर्ण रूपको देखनेसे उनमें वात्सल्य-रसका उतना तारल्य नहीं रह गया था, किंतु श्रीमन्नन्दरायमें सर्वदा समुद्बुद्ध अतएव सर्वदा ही शुद्ध वात्सल्य- रस रह गया था। वसुदेव और देवकीने भगवान्को मनसे ही पुत्रत्वेन धारण किया था, यह बात अग्रिम वचनोंसे ज्ञात होती है। 'आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः॥' (श्रीमद्भा० १०।२।१६) अर्थात् अंशभागसे भगवान् आनकदुन्दुभिके मनमें प्रविष्ट हुए। 'दधार सर्वात्मकमात्मभूतं काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः॥' (श्रीमद्भा० १०।२।१८) अर्थात् जैसे पूर्वा दिक् आनन्दकर चन्द्रमाको धारण करती है, वैसे ही देवकीने मनसे ही सर्वान्तरात्मा कृष्णको धारण किया। जैसे वसुदेव-देवकीने मनसे ही कृष्णको धारण किया था, वैसे ही श्रीव्रजराज और व्रजरानीने भी पुत्रत्वेन उन्हें धारण किया था;
श्रीकृष्ण-जन्म १७ इसलिये कहा जाता है कि माघ शुक्ल प्रतिपदाकी सर्व-सुखसम्पन्न रजनीमें श्रीव्रजराजकी सेवा करती हुई यशोदाने तन्द्राामें स्वप्नके समान कुछ चमत्कार देखा। जिस कुमारको पहले देखा था, वही किसी सर्वावरणकारिणी दिव्य कुमारीसे अपनेको आवृत करके व्रजराजके हृदयसे निकलकर उनके हृदयमें प्रविष्ट हुए। बालक हृदयमें विराजमान हुआ और कन्या उदरमें और उसी समयसे नन्दरानीमें गर्भ- लक्षण दिखलायी देने लगे। व्रजरानीमें प्रस्फुरित होनेसे ही कृष्णका लोकमें भी वैसे ही स्फुरण हुआ, जैसे स्फटिक-घटीमें रहनेवाला दीपक भीतर- बाहर सर्वत्र प्रकाश करता है— व्रजराज्ञां स्फुरितात्मा कृष्णः स्फुरति स्म लोकेऽपि। दीपः स्फटिकघटी भागन्तर्बहिरपि विभाति तत्तुल्यः ॥ यद्यपि नन्दरानी रसना-रसके जीतनेवाले धैर्यसे युक्त और गाम्भीर्यादि गुणोंमें अत्यन्त प्रवीण थीं, फिर भी कृष्णावेशसे तुलसी-संस्कृत घृत और सितायुक्त स्वच्छ परमान्नरूप दोहदकी उन्हें इच्छा होने लगी। उधर योगमायाने देवकीके सप्तमासिक गर्भको आकर्षित करके रोहिणीमें रख दिया। फिर रोहिणीने श्रावणसे पहले श्रवण नक्षत्रमें गौर सुन्दर कुमारको उत्पन्न किया। जैसे पौर्णमासी पूर्ण चन्द्रको प्रकट करती है, सिंहवधू विक्रमी शावकको उत्पन्न करती है, वैसे ही रोहिणीने बलरामको प्रकट किया। उस बालकके अंगकी कान्ति सूर्यकी कान्तिको लज्जित करती थी, मुखकान्ति चन्द्रमाकी कान्तिको लजानेवाली थी। महाप्रभावशाली वह बालक अन्य समयमें अत्यन्त जड़-सा ही दिखायी देता था, परंतु कृष्णको गर्भमें धारण करनेवाली नन्दरानी जब उसको अपनी गोदमें लेती थी, तभी बालकको विश्रान्ति और प्रसन्नता होती थी। अनन्तर परम शुभ कालमें कृष्णका प्रादुर्भाव हुआ। ललितस्मित नीलकमलके समान मुख, सूक्ष्म भ्रमरसे चित्रित कैरव-कोशके समान नेत्र, मधुर श्यामल तिल-प्रसूनके समान नासिका, सिन्दूर-गिरि- समुद्भूत जवाकुसुम और बिम्बाफलके सदृश ओष्ठ और अधर थे। अंजनभूमि-समुद्भूत श्याम लता-पत्रके समान कान, नवपल्लवयुक्त नव तमाल-शाखाके समान दोनों ही श्रीहस्त, कोमल मृणालतन्तुसदृश रोमोंकी दक्षिणावर्तराजिसे लांछित दक्षिण वक्षःस्थल और सुवर्णवर्ण रोमोंकी वामावर्तराजिसे लांछित वाम वक्षःस्थल विद्युत्से आश्लिष्ट श्यामल मेघ-खण्डके समान सुशोभित होता था। वे बालकृष्ण अपने मुखसे महापद्मको, नयनोंसे पद्मको, नासिकासे मकरको, स्मितसे कुन्दको, कण्ठसे शंखको, चरणपृष्ठोंसे कच्छपको और दीप्तिसे इन्द्रनीलको जीतनेवाले थे। इनका आविर्भाव स्नेहमयी स्फूर्ति-परम्पराके वशीकारसे ही होता है, अन्यथा नहीं। पुत्र-रूपसे आविर्भावमें पितृभावमय स्नेह ही बीज है। जहाँ भी कहीं पुत्रभावसे उनका प्रादुर्भाव होता है, वहाँ तत्सम्बन्धमय स्नेहकी स्फूर्ति ही मुख्य कारण है। व्रजराज आदिमें शुद्ध समुद्बुद्ध वात्सल्य भाव था। श्रीदेवकी-वसुदेवके हृदयमें वही चतुर्भुजरूपसे थे, अतएव बाहर भी वैसे ही प्रकट हुए। श्रीव्रजराज- व्रजरानीके हृदयमें द्विभुज ही स्वरूप था, अतएव बाहर भी उन्हें द्विभुज स्वरूपका ही उपलम्भ हुआ। जिस समय देवकीको कंसके भयसे आविर्भूत चतुर्भुजरूपको आच्छादन करके द्विभुज रूप देखनेकी इच्छा हुई, उस समय श्रीयशोदाके यहाँ प्रकट द्विभुज स्वरूप ही वहाँ प्रकट होकर चतुर्भुज स्वरूपको अपनेमें लीन करके आविर्भूत हुआ। साकाररूप माताके गर्भमें स्थित रहकर भी निराकारतया योगमाया ऊर्ध्व गतिसे द्विभुज कृष्णको देवकीके पास वैसे ही लायी, जैसे गन्धवाह नीलकमल-दलको लाये, वैसे ही सबसे अलक्षित होकर एवं माताको भी मोहित करके आयी और गर्भस्थ आकारसे माताको प्रसूतिक भ्रम पैदा करके अपने-आपको बाहर प्रकट करके शय्यापर स्थित रही। उसीने संकर्षणको हटाकर रोहिणीमें प्रवेश कराया था। 'अथाहमंशभागेन'
१८ भक्तिसुधा (श्रीमद्भा० १०।२।९) का यही आशय है कि आकारभेद चतुर्भुज स्वरूपके साथ द्विभुज कृष्णका अवतार होगा और वह आकारभेद द्विभुजाकार नन्दनन्दनमें मिल जायगा। अनन्तर वसुदेवजी योगमायाके प्रभावसे सबके प्रसुप्त हो जानेपर उस बालकको लेकर श्रीनन्दरायके भवनमें पहुँचे और नन्दरानीकी शय्यापर उस बालकको पधराकर वहाँसे कन्याको उठा लाये। ईश्वरता-प्रत्यायक चतुर्भुजरूपसे और उपदेशसे भगवान्ने वसुदेवके यहाँ उत्पन्न होना तो व्यक्त कर दिया, परंतु पुत्रता-सन्देह उत्पन्न किया, अतएव उन्हें अनेकों बार उनकी पुत्रतामें सन्देह होता था। श्रीमन्नन्दरानी और नन्दके यहाँ तो द्विभुजरूपसे और वचनादि शक्तिको व्यक्त करनेसे निःसन्देह पुत्रताको व्यक्त किया। आनकदुन्दुभि (वसुदेव)-को इन बातोंका कुछ भी अनुसन्धान नहीं हुआ। फिर भी श्रीनन्दकी कन्याको ले जाकर उसे खो दिया, उसके बदलेमें कोई प्रतिदान नहीं दिया। ऐसी स्थितिमें वे छोड़े हुए कृष्णमें अपनापन कैसे मान सकते थे? आगमादिकोंमें भी नन्दनन्दन, नन्दात्मज आदि स्पष्ट पद आते हैं। नन्दरानीके पुत्रदर्शनका उल्लास फिर मायाके उपरत होनेपर नन्दरानीने जागकर प्रत्यक्ष नीलोत्पल-दल-श्याम पुत्रको देखा— ददृशे च प्रबुद्धा सा यशोदा जातमात्मजम्। नीलोत्पलदलश्यामं ततोऽत्यर्थं मुदं ययौ॥ बालकका दिव्यातिदिव्य इन्द्रनीलमणिके समान वपु और चन्द्रको जीतनेवाला परम मनोहर मुख था। लोकातीत कमल-दलके सदृश नेत्र और कल्पतरु- नव-पल्लव दलोंके सदृश हाथ थे। हस्त-पादादिको कुछ चलाते हुए वह अपने मृदु, मधुर क्रन्दनसे विश्वको मोहित करता था। 'क्या यह श्यामल प्रकाशोंका साम्राज्य या रूपरत्नाकरोंकी निधि है, लावण्यभागियोंका भाग्य—किंवा तत्तत् अंगावलियोंका विलसित सिद्धान्त है' जबतक नन्दरानी यह विचार कर ही रही थीं, तबतक 'ओमोम्' इस तरह रोदन- व्याजसे बालकने उसकी विकल्पपरम्पराको स्वीकार किया। प्रजात पुत्रको देखकर नन्दरानी सखियोंको भी न बुला सकीं, फिर और चेष्टित होना तो दूर रहा। प्रेमाश्रुओंसे आँखें मिच गयीं, कण्ठ गद्गद हो उठा, वपु स्तब्ध हो उठा, लालनकी लालसासे आत्मा व्यग्र हो उठा। जब माया चली गयी, तब लोगोंका मोह गया। पुरुषोत्तमके प्राकट्यमें व्यवहित नरनारियोंके भी मन वैसे ही विकसित हो उठे, जैसे चन्द्रोदय होते ही व्यवहित कुमुदिनियोंके भी सुमन खिल उठते हैं। वह बालक केवल नन्दरानीकी शय्यापर ही नहीं, अपितु स्निग्धाओंके स्वच्छ चित्तोंमें भी प्रतिबिम्बके समान प्रस्फुरित हुआ, अतः वे शीघ्र ही रोहिणी आदिके संग आकर बालकको वैसे देखने लगीं, जैसे समुदित होते ही चन्द्रको चकोरगण देखते हैं। यशोदा यद्यपि प्रेममें स्तब्ध थीं तथापि स्मेर नेत्रोंसे बालकको देख रही थीं। व्रजपुर-पुरन्ध्रीगण कल्पना करती हैं—क्या यह नवीन इन्दीवर महान् इन्द्रनील है किंवा वैदूर्य है? अहो! यह जो बालकका स्वरूप है, वह मानो मृगमद-सौरभ और तमाल-दलसे बना हुआ है, अद्भुत लावण्यसे अभ्यक्त है, निज देहके तेजसे उद्वर्तित है, निज मुखनिर्गत कान्तिसुधासे स्नात है, सौन्दर्यसे अनुलिप्त है, त्रैलोक्य-लक्ष्मीसे समलंकृत है। चूर्णीभूत तमके समान इसके केश और चन्द्रबिम्बके समान इसका मुख है। मानो सबका मन खींचनेके लिये ही उसने मुट्ठी बाँध रखी है। यमुना-तरंगके समान चरण- कमलको चलाते हुए उस बालकको देखकर सब बहुत ही प्रसन्न हुईं और कहने लगीं—'अहो! इसे सिरपर रखें, नयनमें रखें या हृदय-मध्यमें रखें।' बार- बार उस बालकको देखकर भी नहीं तृप्त होतीं। फिर धैर्यसे किसी तरह उन्होंने स्नानादि कृत्य सम्पादित किया। श्रीमन्नन्दादि गोपोंको कृष्ण-जन्मका समाचार जब प्राप्त हुआ, तब परमानन्दमें सब विभोर हो गये। क्या भारतको वह शुभ दिन देखनेका सौभाग्य पुनः प्राप्त होगा?