कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
पंचम लम्बक ५१३
पंचम लम्बक ५१३ उसे आते देखकर वे ब्राह्मण मठ के ऊपर भाग गये। सच है, अफवाहों से भीत व्यक्तियों में विचार करने का सामर्थ्य नहीं होता॥२१९॥ यह देखकर मन्द ही हँस हरस्वामी ने मठ के ऊपर चढ़े हुए ब्राह्मणों में से एक-एक का नाम लेकर बुलाया और कहा॥२२०॥ 'अरे ब्राह्मणो! यह क्या मूढ़ता तुममें आ गई है। क्या तुम परस्पर नहीं देख रहे हो कि मैंने कितने बच्चे कहाँ खाये ? ॥२२१॥ यह सुनकर जब सभी जाँच करने लगे तब देखा कि सभी के बच्चे जागते खेल रहे हैं॥२२२॥ तब सभी ब्राह्मण और वणिक विश्वस्त हुए और हरस्वामी की बात सच मानकर देखने लगे कि सभी के बालक जीवित हैं। तब वे कहने लगे कि 'हमने झूठे ही बेचारे तपस्वी को दूषित किया सभी के बच्चे तो जीवित हैं। तब किसके बच्चे इसने खाये ? ॥२२३-२२४॥ जब सभी एकस्वर से इस प्रकार कहने लगे तब निष्कलंक हरस्वामी उस नगर से जाने को उद्यत हुआ क्योंकि पहले उठाई गई अपनी निन्दा से उसका मन विरक्त हो गया था॥२२५॥ स्वतन्त्र विचारवाले मनस्वी का दुष्ट देश में रहने वाले विचारहीनों के साथ प्रेम कैसे हो सकता है ? तदनन्तर चरणों में गिरे हुए ब्राह्मणों और वणिकों के प्रार्थना करने पर किसी प्रकार हरस्वामी ने वहाँ रहना स्वीकार किया॥२२६-२२७॥ इस प्रकार सज्जनों के सच्चरित्रों को देखकर जलते हुए तथा उनकी नाना प्रकार से निन्दा करते हुए दुष्टजन सज्जनों को प्रायः झूठे कलंक लगा देते हैं। यदि उन्हें सचमुच ही कोई छोटा-सा भी अवसर मिल जाय तो वह उनके लिए जलती हुई आग में घी का-सा काम करता है॥२२८॥ इसलिए हे बेटी! यदि तू मेरे हृदय का काँटा निकालकर मुझे स्वस्थ देखना चाहती है, तो इस उमड़ते हुए नव यौवन में अपनी इच्छा से कुमारी नहीं रह सकती। यह दुष्ट लोगों के लिए निन्दा करने का सुलभ अवसर है' ॥२२९॥ राजा से इस प्रकार कही गई कनकरेखा अपने दृढ़ निश्चय के साथ फिर राजा से बोली कि 'जिस ब्राह्मण या क्षत्रिय युवक ने वह कनकपुरी देखी हो उसे शीघ्र ढूँढ़ो और मुझे उसके लिए दान कर दो। यह मैंने पहले ही कह दिया है' ॥२३०-२३१॥ ६५
५१४ कथासरित्सागर
५१४ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा दृढनिश्चयां विगणयञ्जातिस्मरां तां सुताम् नास्याश्चायमभीष्टमर्थघटने पश्यन्नुपायक्रमम्। देशे सत्र ततः प्रभृत्यनुदिनं प्रष्टुं नवागन्तुकान्। भूयो भूमिपतिः स नित्यपटहप्रोद्घोषणामादिशत् ॥२१२॥ ‘यो विप्रः क्षत्रियो वा ननु कनकपुरीं दृष्टवान्सोऽभिधत्तां तस्मै राजा किल स्वां वितरति तनयां यौवराज्येन साकम्’ । सर्वत्राघोष्यतैव पुनरपि पटहानन्तरं नाप दास्य श्च त्वेकः कोऽपि साक्षात्कृतकनकपुरीदर्शनो लभ्यते स्म॥२१३॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे चतुर्दारिकालम्बके प्रथमस्तरङ्गः।
द्वितीयस्तरङ्गः कनकपुरीदर्शनार्थं शक्तिदेवस्य प्रस्थानम् अत्रान्तरे द्विजयुवा शक्तिदेवः स दुर्मनाः। अचिन्तयदभिप्रतराजकन्यावमानितः ॥१॥ मयेह मिथ्याकनकपुरीदर्शनवादिना। विमानना परं प्राप्ता न त्वसौ राजकन्यका॥२॥ तदेतत्प्राप्तये तावद् भ्रमणीया मही मया। यावत्सा नगरी दृष्टा प्राणैरपि गतैर्मम॥३॥ तां हि दृष्ट्वा पुरीमस्य तत्पणोपार्जितां न चेत्। रुन्धेय राजतनयामहं किं जीवितेन तत् ॥४॥ एवं कृतप्रतिज्ञः सन् वर्धमानपुरात्ततः। दक्षिणां दिशमारभ्य स प्रतस्थे स ततो द्विजः ॥५॥ क्रमञ्च गच्छंश्च प्राप गोव्यं विन्ध्यमहाटवीम्। विवेश च निजां वाञ्छामिव तां गहनायताम् ॥६॥ तस्यां च मारुताधूतमुदुपाञ्चत्पल्लवैः। वीजयन्त्यामिवात्मानं तज्जमश्रकरोस्तरः ॥७॥ भूरिखोरपशभूतिदुःखान्दि दिवानिशम् । श्रोदन्यो तीव्रमद्वान्द्रिह्व्यमानमृपारवः ॥८॥
पंचम लम्बक ५१५
पंचम लम्बक ५१५ राजा ने पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाली उस कन्या को अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ देखकर और उसके मनानुकूल वर मिलने में कोई दूसरा उपाय न देखकर अपने देश में आये हुए यात्रियों के लिए प्रतिदिन इसी प्रकार का डिंडोरा पीटने की आज्ञा दे दी ॥२३२॥ 'जिस ब्राह्मण या क्षत्रिय युवक ने कनकपुरी देखी हो, वह बताये राजा उस युवराज-पद के साथ अपनी कन्या देंगे'। इस प्रकार ललकारने से सभी जगह घोषणा होने लगी किन्तु कनकपुरी देखा हुआ एक व्यक्ति भी नहीं मिल पाया ॥२३३॥ प्रथम तरङ्ग समाप्त। द्वितीय तरंग शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना इसी बीच चाही हुई राजकन्या द्वारा अपमानित अतएव दुःखित वह युवक ब्राह्मण शक्ति- देव सोचने लगा ॥१॥ 'कनकपुरी मैंने देखी है'—इस प्रकार झूठ बोलकर मैंने उस राजकन्या के बदले अत्यन्त अपमान प्राप्त किया है ॥२॥ अत उस राजकन्या की प्राप्ति के लिए मुझे तबतक सारी पृथ्वी का चक्कर काटना पड़ेगा जबतक मैं उस नगरी को न देख लूँ या प्राणों का त्याग न कर दूँ ॥३॥ उस नगरी को देखकर उसी शर्त पर मैं राजकन्या को न ब्याह लूं, तो मेरे इस जीवन से ही क्या लाभ है ? ॥४॥ ऐसी प्रतिज्ञा करके वह उस वर्धमान नगर से दक्षिण दिशा का मार्ग पकड़कर चल पड़ा ॥५॥ क्रमशः चलते हुए उस शक्तिदेव को मार्ग में विन्ध्य भाग का महान् और घोर वन- प्रान्त मिला। वह ब्राह्मण-युवक अपनी लम्बी और दृढ़ इच्छा के समान उस महान् वनप्रान्त में प्रविष्ट हुआ ॥६॥ वायु से हिलाये गये कोमल पल्लवों से वह वन अत्यन्त उष्ण सूर्य की किरणों से सन्तप्त उसके शरीर पर मानों पंखा झल रहा था ॥७॥ सिंह आदि हिंस्र जन्तुओं से मारे जाते हुए मृग आदिकी करुण चीत्कारों के बहाने अनेका- नैक चोर-डाकुओं के पराभव-दुःख के कारण मानो वह वन दिन-रात रोता रहता था ॥८॥
स्वच्छन्दोच्छलदुद्दाममहामरुमरीचिभिः । भिगीषन्त्यामिवात्यूष्मव्याप्येव तेजांसि भास्वतः ॥९॥ जलसङ्गतिहीनायामप्यहो सुरुभापवि । सततोल्लङ्घ्यमानायामपि दूरीभवद्भुवि ॥१०॥ दिवसैर्बूरमध्वानमतिक्रम्य ददर्श सः । एकान्ते शीतलस्वच्छसलिलं सुमहत्सरः ॥११॥ पुण्डरीकोत्थितच्छत्रं प्रोल्लसद्धंसचामरम् । कुर्वन्तमिव सर्वेषां सरसामधिराजताम् ॥१२॥ तस्मिन्स्नानादिकं कृत्वा च तत्पार्श्वे पुनरुत्तरे । अपश्यदाश्रमपदं सफलस्निग्धपादपम् ॥१३॥ तत्राश्वत्थतरोर्मूले निषण्णं तापसंवृतम् । स सूर्यतपसं नाम स्थविरं मुनिमक्षत ॥१४॥ स्ववयोऽब्दशतग्रन्थिसङ्ख्येवाक्षमालया । जराधवलकर्णाग्रसस्थियिया विराजितम् ॥१५॥ प्रणामपूर्वकं तं च मुनिमभ्याजगाम सः । तेनाप्यतिथिसत्कारैर्मुनिना सोऽभ्यनन्द्यत ॥१६॥ अपृच्छ्यत च तेनैव सविभज्य फलादिभिः । कुत प्राप्तोऽसि गन्तासि क्व च मद्गोच्यतामिति ॥१७॥ वर्धमानपुरात्तावद् भगवन्नहमागतः । गन्तुं प्रवृत्तः कनकपुरीमस्मि प्रतिज्ञया ॥१८॥ न जाने क्व भवेत्सा तु भगवान्वस्तु वेत्ति चेत् । इति तं शक्तिदेवोऽपि स प्राज्ञो मुनिमभ्यधात् ॥१९॥ वत्स ! वर्षशतान्यष्टौ ममाश्रमपदे त्विह । व्यतिक्रान्तानि न च सा श्रुतापि नगरी मया ॥२०॥ इति सेनापि मुनिना गदितः स विषादवान् । पुनरेवाब्रवीत्तर्हि मृतोऽस्मि क्षमो भ्रमन्विह ॥२१॥ ततः श्रमण शान्तार्थं स मुनिस्तमभाषत । यदि ते निष्प्रपस्तर्हि यदहं वच्मि तत्कुरु ॥२२॥ अस्ति काम्पिल्यविषयो योजनानां शतद्वितः । त्रिषु तत्रोत्तरास्यादौ गिरिरस्त्यपि मध्यमः ॥२३॥
पंचम लम्बक ५१७
पंचम लम्बक ५१७ स्वतन्त्रता से उछलती हुई मरुभूमि की किरणों से वह वन मानों सूर्य के उग्र तेज को जीतना चाहता था॥९॥ जल के सम्पर्क से रहित निरन्तर चलते रहने पर भी समाप्त न होनेवाले एवं पग-पग पर विपत्तियों से भरे रम्य रास्तोंवाले उस वन को कुछ दिनों में लांघकर उसने एकान्त और शान्त स्थान में शीतल और स्वच्छ जल से भरे हुए एक बड़े सरोवर को देखा॥१०-११॥ उस सरोवर में खिले हुए कमल ऊपर उठे हुए छत्र के समान लग रहे थे और हंस-रूपी चँवर इधर-उधर चलायमान हो रहे थे। मानों वह सरोवर, सभी सरोवरों के राजा की शोभा धारण कर रहा था॥१२॥ शक्तिदेव ने उसमें स्नान आदि किया और तत्पश्चात् उसने उस सरोवर के उत्तर की ओर सफल एवं सघन वृक्षों से भरे हुए आश्रम-स्थल को देखा। उसमें एक पीपल-वृक्ष के नीचे अनेक तपस्वियों से घिरे हुए सूर्यतपा नामक ऋषि को देखा। वह ऋषि अपनी अवस्था के सौ वर्षों के समान मानों सौ गाँठों से गूँथी हुई एवं वृद्धावस्था से श्वेत कनपटी में लटकती हुई स्फटिक की माला से शोभित हो रहा था॥१३-१५॥ वह शक्तिदेव प्रणाम करके उस मुनि के समीप गया और मुनि ने भी अतिथि-सत्कार करते हुए उसका स्वागत किया॥१६॥ मुनि ने भोजन के लिए फल आदि देकर उससे पूछा—'हे भद्र कहाँ से आये हो और कहाँ जाओगे बताओ'॥१७॥ 'भगवन् ! मैं वर्धमान नगर से आया हूँ और प्रतिज्ञा करके कनकपुरी जाने के लिए उद्यत हूँ ॥१८॥ पता नहीं वह नगरी कहाँ है यदि आप जानते हों तो कृपाकर कहें। इस प्रकार नम्रता पूर्वक शक्तिदेव ने मुनि से कहा॥१९॥ 'बेटा मुझे इस आश्रम स्थान में एक सौ आठ वर्ष व्यतीत हो गये। आज तक मैंने कनक पुरी का नाम भी नहीं सुना। इस प्रकार मुनि से कहा गया शक्तिदेव अत्यन्त निराश और दुःखी हुआ॥२० ॥ तब फिर वह बोला-'यदि ऐसा है तो मैं इस पृथ्वी पर घूमते-घूमते मर जाऊंगा। क्रमशः उसकी सारी बातें सुनकर मुनि उससे बोला—'यदि तुम्हारा यह निश्चय है, तो मैं तुमसे कहता हूँ सुनो।' यहाँ से तीन सौ योजन (अर्थात् बारह सौ कोस) पर काम्पिल्य नाम का नगर है। वहाँ पर उत्तर नाम का पर्वत है उनमें एक आश्रम है॥२१ २३॥
५१८ कथासरित्सगर
५१८ कथासरित्सगर
सत्राथार्योऽस्ति मम भ्राता ज्येष्ठो दीर्घतपा इति। तत्पार्श्वं व्रज जानीयात्स वृद्धो जातु तां पुरीम् ॥२४॥ एतच्छ्रुत्वा सधृत्युक्त्वा जातास्त्यस्तत्र तां निशाम्। नीत्वा प्रतस्थे स प्रातः शक्तिदेवो द्रुतं सतः ॥२५॥ कृशातिक्रान्तकान्तारशतश्वासाद्य तं चिरात्। कामिल्यविषयं तस्मिन्नाहरोहोत्तरे गिरौ ॥२६॥ तत्र तं दीर्घतपसं मुनिमाध्यमवर्त्तिनम्। दृष्ट्वा प्रणम्य च प्रीतः कृतातिथ्यमुपाययौ ॥२७॥ व्यजिज्ञपच्च कनकपुरीं राजसुतोदिताम्। प्रस्थितोऽहं न जानामि भगवन्क्वास्ति सा पुरी ॥२८॥ सा च मेऽवश्यं गन्तव्या सतस्तुवुपलब्धये। ऋषिणा सूयतपसा प्रेषितोऽस्मि तवान्तिकम् ॥२९॥ इत्युक्तवन्तं तं शक्तिदेवं सोऽप्यब्रवीन्मुनिः। इयता वयसा पुत्र ! पुरी साद्य श्रुता मया ॥३०॥ देशान्तरागते के नैर्जाति परिचयो न मे। न च तां श्रुतवानस्मि दूरे तद्दर्शनं पुनः ॥३१॥ जामाम्यहं च नियतं दवीयसि तया क्वचित्। भाव्यं द्वीपान्तरे वत्स तत्रोपायं च वच्मि ते ॥३२॥ अस्ति वारिनिधेर्मध्ये द्वीपमुत्स्थलसंज्ञकम्। तत्र सत्यव्रताख्योऽस्ति निषादाधिपतिर्धनी ॥३३॥ तस्य द्वीपान्तरेष्वस्ति सर्वेष्वपि गतागतम्। तेन सा नगरी जातु भवेद्दृष्टा श्रुतापि वा ॥३४॥ तस्मात्प्रयाहि जलधेरुपकण्ठप्रतिष्ठितम्। नगरं प्रथमं तावद् विटङ्कपुरसंज्ञकम् ॥३५॥ तत केनापि वणिजा समं प्रवहणेन तत्। निषादस्यास्पदं गच्छ द्वीप तस्येष्टसिद्धये ॥३६॥ इत्युक्तस्तेन मुनिना शक्तिदेवः स तत्क्षणम्। तथेत्युक्त्वा तमामन्त्र्य प्रयाति स्म तदाश्रमात् ॥३७॥ काञ्चन प्राप्य चोत्लङ्घ्य दशान् कौशाम्बकूहस्ततः। वारिधेस्तीरतिलकं तद्विटङ्कपुरं परम् ॥३८॥
पंचम लम्बक ५१९
पंचम लम्बक ५१९ 'वहाँ पर मेरा माननीय बड़ा भाई दीर्घतपा नाम का ऋषि है। उसके पास जाओ। वह बहुत वृद्ध है। सम्भव है वह उस पुरी को जानता हो' ॥२४॥ यह सुनकर 'ठीक है' ऐसा कहकर और मुनि की बातों में विश्वास करके शक्तिदेव ने वह रात वहीं व्यतीत की और प्रातःकाल ही काम्पिल्य नगरी की ओर शीघ्रता से चला गया ॥२५॥ अनेक कष्टों से सैकड़ों दुर्गम पथ पार करते हुए बहुत दिनों के पश्चात् वह काम्पिल्य नगर में पहुँचा और उस पर्वत पर चढ़ा ॥२६॥ वहाँ जाकर उसने आश्रम में रहनेवाले दीप्ततपा मुनि को देखा और प्रणाम करके उसके समीप गया। मुनि ने भी उसका स्वागत किया ॥२७॥ तत्पश्चात् शक्तिदेव ने राजकुमारी द्वारा बताई हुई कनकपुरी नगरी के सम्बन्ध में निवेदन किया और कहा कि मैं उसी ओर जा रहा हूँ किन्तु ज्ञात नहीं कि वह नगरी कहाँ है ॥२८॥ मुझे वहाँ अवश्य जाना है। उसका पता प्राप्त करने के लिए ही सूर्यतप ऋषि ने आपके पास मुझे भेजा है ॥२९॥ इस प्रकार कहते हुए शक्तिदेव से मुनि ने कहा— बेटा ! इतनी लम्बी अवस्था में भी मैंने आजतक इस नगरी का नाम नहीं सुना था ॥३०॥ दूर-दूर देशों से आये हुए किन-किन से मेरा परिचय नहीं हुआ किन्तु किसी से भी यह नाम मैंने नहीं सुना दर्शन तो दूर की बात है ॥३१॥ बेटा ! मैं तो समझता हूँ कि वह दूर कहीं किसी दूसरे ही द्वीप में है। उसका उपाय तुम्हें बताता हूँ ॥३२॥ समुद्र के मध्य में उत्स्थल नाम का एक द्वीप है वहाँ न यदत्त नाम का एक धनी निषादराज है। उसका नाव सदा दूर-दूर के द्वीपों में आना-जाना है। इसलिए सम्भव है कि उसने वह नगरी कहीं देखी या सुनी हो। इसलिए तुम यहाँ से पहले समुद्र के गम्भीर-स्थित विटंकपुर नामक नगर को जाओ। वहाँ से किसी बनिये के साथ उसकी नाव में उस निषादराज के पास अपनी इष्टसिद्धि के लिए जाओ ॥३३-३६॥ इस प्रकार उस मुनि से कहा हुआ शक्तिदेव उसी समय मुनि से आज्ञा लेकर उसके आश्रम से चला गया ॥३७॥ क्रमानुक्रम से वह कष्टों से देशों और वनों को पार करके समुद्र-तट के भूषण उस विटंकपुर में पहुँचा ॥३८॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर तस्मिन् समुद्रदत्ताख्यमुत्पलद्वीपयायिनम्। अविश्य वणिजं तेन सह सख्यं चकार सः॥३९॥ तदीयं यानपात्रं च समं समाधिरुह्य सः। तत्प्रीतिपूर्णपाथेयः प्रतस्थेऽम्बुधिवर्त्मना ॥४०॥ ततोऽन्यदेश गन्तव्ये समुत्तस्थावशक्तिकम्। काले विद्युल्लसज्जिह्वो गर्जज्जलधराक्षसः ॥४१॥ क्षुभ्यन्नुद्यम्य पाषाणानूरूनप्यवपातयन् । ववौ विधेरिवाऽरम्भः प्रचण्डश्च प्रभञ्जनः ॥४२॥ वाताहताश्च जलभूदतिष्ठन्महोर्मयः। आश्लेषाभिभवक्रोधादिव क्षमाः सपक्षकः ॥४३॥ ययौ च तत्प्रवहणं क्षणमूर्ध्वमधः क्षणम्। उच्छ्रायपातपर्य्याय¹ दक्षयद्वनितामिव ॥४४॥ क्षणान्तरं च वणिजामाक्रन्दस्तीव्रपूरितम्। भरादिव लघूत्पत्य वहनं सममज्जयत् ॥४५॥ मग्ने च तस्मिंस्तत्स्वामी स बणिक्पतितोऽम्बुधौ। तीर्णश्च फलकास्तम्बं प्राप्यान्यद् वहनं चिरात् ॥४६॥ शक्तिदेवः पतंस्तं सु तं व्यात्तमुखकन्दरः। अपरिक्षतसर्वाङ्गं महामत्स्यो निगीर्णवान् ॥४७॥ स च मत्स्योऽब्धिमध्येन तत्काल स्वच्छया चरन्। उत्पलद्वीपनिकटं जगाम विधियोगतः ॥४८॥ तत्र तस्यव कैवर्त्तपतेः सत्यव्रतस्य सः। शफरग्राहिमितृत्यैः प्राप्य दैवादगृह्यत ॥४९॥ ते च तं सुमहाकायं निन्युराकृष्य कौतुकात्। सर्वेष धीवरास्तस्य निजस्य स्वामिनोऽन्तिकम् ॥५०॥ सोऽपि तं तादृशं दृष्ट्वा तैरेव सकुतूहलः। पाठीनं पाटयामास मुख्यैः सत्यव्रतो निजैः ॥५१॥ पाटितस्योदराञ्जीवञ्छक्तिदेवोऽथ तस्य सः। मनुभूतापराश्चर्य्यगर्भवाशो विनिर्ययौ ॥५२॥ १ कर्मणित्पर्य्यः
पंचम लम्बक ५२१
पंचम लम्बक ५२१ वहाँ उसने पता लगाकर उत्पल द्वीप जानेवाले समुद्रदत्त नामक बनिये से मित्रता की और उसी के जहाज पर प्रेमपूर्ण पाथेय लेकर समुद्री मार्ग से वह उत्पल द्वीप को चला ॥३९-४०॥ समुद्र में कुछ दूर जाने पर बिजली-रूपी जीभ को लपलपाता हुआ काल-रूपी मेघ-घटाटोप एकाएक उमड़ पड़ा। साथ ही विधि के समान भारी को हल्का और हल्के को भारी करता हुआ प्रचंड पवन भी चलने लगा ॥४१-४२॥ समुद्र में वायु से विताड़ित बड़ी-बड़ी पर्वताकार लहरें उठने लगीं। मानो अपने आधार का अपमान होने के कारण पक्षाधारी पर्वत उठ खड़े हुए हों ॥४३॥ वह जहाज कभी ऊपर और कभी नीचे इस प्रकार उछलने लगा मानो बनिकों में उत्थान और पतन का आदर्श उपस्थित कर रहा हो ॥४४॥ कुछ ही समय में बनियों की चिल्लाहट से शब्दायमान वह जहाज मानो भार वहन न कर सकने के कारण टूट गया ॥४५॥ जहाज के टूटने पर उसका स्वामी एक तख्ते के सहारे तैरता हुआ दूसरे जहाज के मिल जाने पर उसके द्वारा पार हो गया ॥४६॥ गिरते हुए शक्तिदेव को मुँह बाये हुए एक बड़े मत्स्य (ह्वेल) ने समूचा ही निगल लिया ॥४७॥ वह मत्स्य समुद्र में स्वच्छन्दता से घूमता हुआ दैवयोग से उत्पल द्वीप के समीप जा पहुँचा ॥४८॥ वहाँ पर उसी मत्स्येन्द्र मण्डल के मछली पकड़नेवाले व्यक्तियों (केवटियाओं) द्वारा दैववश वह पकड़ लिया गया ॥४९॥ वे उस महामत्स्य को खींचकर अपने स्वामी मत्स्येन्द्र के पास ले गये ॥५०॥ मत्स्येन्द्र ने भी उस भारी मत्स्य को देखकर कौतुकवश उन दासों से उसे फड़वा दिया ॥५१॥ उसके फाड़ने पर, उसके पेट से आश्चर्यजनक दूसरे गर्भवास का अनुभव करनेवाला जीवित शक्तिदेव निकल पड़ा ॥५२॥ ६६
५२२ कथासरित्सागर
५२२ कथासरित्सागर निर्याति च कृतस्वस्तिकार तं च सविस्मयम् । युवानं वीक्ष्य पप्रच्छ दाशः सत्यव्रतस्ततः ॥५३॥ कस्त्वं कथं कुतश्चैषा शफरोदरशामिता । वृथास्त्वयाप्ता कोऽयं ते वृत्तान्तोऽप्यन्तमद्भुतः ॥५४॥ तच्छ्रुत्वा शक्तिदेवस्तं दाशेन्द्रं प्रत्यभाषत । ब्राह्मणः शक्तिदेवाख्यो वर्धमानपुरावहम् ॥५५॥ अवश्यगम्या कनकपुरी च नगरी मया । अजानानश्च तां दूराद् भ्रान्तोऽस्मि सुचिरं भुवम् ॥५६॥ ततो दीर्घतपोवाक्यात्सम्भाव्य द्वीपगां च ताम् । तज्जन्मज दाशपतेरस्यैतद्द्दीपवासिनः ॥५७॥ पार्श्वं सत्यव्रतस्याहं गच्छन्वहनभङ्गतः । मग्नोऽम्बुधौ निगीर्णोऽस्मि मत्स्येन प्रापितोऽधुना ॥५८॥ इत्युक्तवन्तं च शक्तिदेवं सत्यव्रतोऽब्रवीत् । सत्यव्रतोऽहमेवेन्द्रद्वीपे सम्मदमव ते ॥५९॥ किन्तु दृष्टा बहुद्वीपद्रुत्वेनापि१ न सा मया । नगरी त्वदभिप्रेता द्वीपान्तपु श्रुता पुन ॥६०॥ इत्युक्त्वा शक्तिदेवं च विषण्णं वीक्ष्य तत्क्षणम् । पुनरभ्यागतप्रीत्या तं स सत्यव्रतोऽभ्यधात् ॥६१॥ ब्रह्मन् ! मा गा विषादं त्वमिहैवाद्य निशां वस । प्रातः कश्चिन्दुपायं तं विधास्यामीप्सितद्धये ॥६२॥ इत्याश्वास्य स तेनैव दाशेन प्रहितोऽथ । मुख्यमातिथ्यसत्कारं द्विजो विप्रमठं ययौ ॥६३॥ तत्र मठासिनस्तेन कृताहारो द्विजन्मना । विष्णुदत्ताभिधानेन सह चक्रे कथाक्रमम् ॥६४॥ तत्प्रसङ्गाच्च तेनैव पृष्टस्तस्मै शशंस तत् । निजं दशं कृतं कृत्स्नं वृत्तान्तं च शनैः सः ॥६५॥ तद्बद्धया परिरभ्यमं विष्णुदत्तः स तत्क्षणम् । बभाषे हर्षवाष्पाम्बुधर्मराजशरर्जरम् ॥६६॥ शिष्या मातृष्वसुपुत्रस्त्वंमवत्त्वद्गमञ्च मे। १ दृष्टवत्तेत्यर्थः ।
पंचम लम्बक ५२१
पंचम लम्बक ५२१ मच्छ के पेट से निकले हुए और कल्याण-कामना करते हुए उस युवक को देखकर चकित सत्यव्रत ने पूछा—'हे ब्राह्मण ! तुम कौन हो ? कैसे हो ? इस मत्स्य के पेट में तुमने शयन कैसे किया ? तुम्हारा यह वृत्तान्त अत्यन्त अद्भुत है' ।।५३-५४।। यह सुनकर शक्तिदेव उस निषादराज से बोला—'मैं शक्तिदेव नामक ब्राह्मण वर्धमान नगर से आया हूँ। मुझे कनकपुरी अवश्य जाना है। उसका पता न जानने के कारण चिरकाल तक दूर-दूर घूमा हूँ। तत्पश्चात् दीर्घतपा मुनि के कथन से उसके किसी द्वीपान्तर में होने का अनुमान करके उत्पल द्वीप-निवासी निषादराज सत्यव्रत के पास जाने के लिए जहाज पर आया और जहाज के टूट जाने पर मुझे मत्स्य ने निगल लिया और उसीने मुझे यहाँ पहुँचा दिया' ।।५५- ५८।। इस प्रकार कहते हुए शक्तिदेव को सत्यव्रत ने पुनः कहा—'मैं ही सत्यव्रत हूँ और यही उत्पलक द्वीप है। किन्तु अनेक द्वीपों को देखनेवाले मैंने तुम्हारी ईप्सित कनकपुरी नहीं देखी है। हाँ द्वीपों के अन्त में है ऐसा सुना गया है' ।।५९-६०॥ उसके ऐसा कहने पर शक्तिदेव को निराश और खिन्न देखकर अतिथि-प्रेम से सत्यव्रत बोला—॥६१॥ 'हे ब्राह्मणदेवता खेद न करो। आज रात को यहीं निवास करो। प्रातःकाल तुम्हारी सफलता के लिए कोई उपाय करूँगा' ।।६२।। ऐसा आश्वासन देकर निषाद के द्वारा भेजा गया वह शक्तिदेव एक ब्राह्मण-मठ में गया जहाँ अतिथियों का सत्कार सुलभ था। उस मठ में रहनेवाले विष्णुदत्त नामक एक ब्राह्मण द्वारा भोजन कराने पर शक्तिदेव ने उसके साथ अपनी जीवन-चर्चा प्रारम्भ की ।।६३-६४।। उसका परिचय सुनकर तुरन्त ही विष्णुदत्त ने उसका आलिङ्गन करके हर्ष के आँसुओं के कारण रुँधे हुए कण्ठ से गद्गद होकर कहा—'भाग्य से तू मेरे मामा का लड़का (ममेरा भाई) है और हम दोनों एक ही देश में उत्पन्न हुए हैं ।।६५-६७।।
५२४ कथासरित्सागर
५२४ कथासरित्सागर अहं च बाल्य एव प्राक्तस्माद्देशादिहागतः ॥६७॥ तदिहस्वास्व न चिरात् साधयिष्यसि चात्र ते । इष्टं द्वीपान्तरगच्छद्वणिक्कणपरम्परा ॥६८॥ इत्युक्त्वानयमावेशं विष्णुदत्तो यथोचितम् । तं शक्तिदेवं तत्कारमुपचारमथाचरत् ॥६९॥ शक्तिदेवोऽपि सम्प्राप्य विस्मृताध्वक्लमो मुदम् । विदधे वायुलाभो हि मराब्मुसनिर्मंरः ॥७०॥ अमन्यत च निजाभीष्टसिद्धिमप्यनवर्तिनीम् । अन्तरापाति हि श्रेयः कार्यसम्पत्तिसूचकम् ॥७१॥ ततो रात्रावनिद्रस्य शयनीयं निपेयुषः । अभिवाञ्छितसम्प्राप्तिगतचित्तस्य तस्य सः ॥७२॥ शक्तिदेवस्य पार्श्वस्थो विष्णुदत्तः समथनम् । विनोदपूर्वकं कुर्वन्कथां कथितवानिमाम् ॥७३॥ अशोकदत्तस्य कपालस्फोटराक्षसाधिपतेश्च कथा पुरामूत् सुमहाविप्रो गोविन्दस्वामिसंज्ञकः । महाप्रहारे कालिन्द्या उपकण्ठनिवेशिनि ॥७४॥ जायेते स्म च तस्य द्वौ सदृशौ गुणशालिनः । अशोकदत्तो विजयदत्तश्चेति सुतौ क्रमात् ॥७५॥ कालेन तत्र वसतां तेषामजनि दारुणम् । दुर्भिक्षं तत्र गोविन्दस्वामी भार्यामुवाच सः ॥७६॥ अयं दुर्भिक्षदोषेण देशस्तावद् विनाशितः । तन्न शक्नोम्यहं द्रष्टुं सुहृद्बान्धवदुर्गतिम् ॥७७॥ दीयतां च कियत् कस्य तस्मादन्नं यदस्ति नः । तद्गृह्या मित्रबन्धुभ्यां व्रजामो विषयादितः ॥७८॥ वाराणसीं च मासाय सकुडुम्बा धयामहे । इत्युक्तया सोऽनुमतो भार्ययाऽस्मदाशिजम् ॥७९॥ सदारसुतभृत्यश्च स देशात्प्रययौ ततः । उत्सहन्ते न हि । द्रष्टमुत्तमाः स्वजनापदम् ॥८०॥
पंचम लम्बक ५२५
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मैं बहुत पहले अपने देश से यहाँ आ गया था। अब तुम यहीं रहो। शीघ्र ही द्वीपान्तरों से आनेवाले व्यापारी बनियों के कानों-कान तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा॥६७-६८॥ ऐसा कहकर अपने कुल का पता लगाकर विष्णुदत्त ने उस समय के योग्य उपचारों से शक्तिदेव की सेवा की॥६९॥ शक्तिदेव भी उसे पाकर मार्ग के दुःसह कष्टों को भूल गया। विदेश में अपने बन्धु जन का मिलना मरुभूमि में अमृत के झरने के समान सुखद होता है॥७०॥ उसने अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि को भी समीप आया हुआ समझा। किसी कार्य के प्रसंग के बीच में आनेवाला क्षेम कार्य की समृद्धि का सूचक होता है॥७१॥ तब रात्रि में शय्या पर लेटे हुए, अपनी कार्य-सिद्धि की चिन्ता में जागते हुए शक्तिदेव के पास सोया हुआ विष्णुदत्त उसकी कार्य-सिद्धि का समर्थन करता हुआ इस प्रकार की कथा उसको सुनाने लगा—॥७२-७३॥
अशोकदत्त और राक्षसराज कपालस्फोट की कथा
पुराने समय में यमुना नदी के तट पर एक विशाल गाँव में गोविन्दस्वामी नाम का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था॥७४॥ उस गुणी ब्राह्मण के उसी के समान दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें बड़े का नाम अशोकदत्त और छोटे का नाम विजयदत्त था॥७५॥ उसके वहाँ रहते हुए दैवयोग से उस ग्राम में भीषण अकाल पड़ गया। तब गोविन्द स्वामी ने अपनी पत्नी से कहा—अकाल के कारण यह देश नष्ट हो रहा है। अतः मैं अपने सामने अपने मित्रों और बन्धु-बान्धवों की दुर्दशा नहीं देख सकता॥७६-७७॥ इसलिए हमारे घर में जितना अन्न है उसे 'किसे कितना देना है'—यह निश्चय करके मित्रों और बन्धुओं को दे डालो। तब यहाँ से किसी दूसरे देश को चलें॥७८॥ यहाँ से चलकर कुटुम्ब के साथ वाराणशी नगरी को चलें। इस प्रकार अपनी पत्नी से परामर्श करके उसने अपने घर का सारा अन्न बाँट दिया॥७९॥ तदनन्तर, अपनी स्त्री बालक और सेवक के साथ उस देश से चल पड़ा। उच्चकोटि के व्यक्ति अपने व्यक्तियों का कष्ट नहीं देखना चाहते॥८०॥
गच्छंश्च मार्गे जटिलं भस्मपाण्डुं कपालिनम्। सार्धचन्द्रमिवेशानं महाव्रतिनमक्षत॥८१॥ उपेत्य ज्ञानिनं तं च नत्वा स्नेहेन पुत्रयोः। शुभाशुभं स पप्रच्छ सोऽप्य योगी जगाद तम्॥८२॥ पुत्रौ त भाविकल्याणौ किं स्वनेन कनीयसा। ब्रह्मन्विजयदत्तेन वियोगस्ते भविष्यति॥८३॥ ततोऽन्याशोकदत्तस्य द्वितीयस्य प्रभावतः। एतेन सह युष्माकं भूयो भावी समागमः॥८४॥ इत्युक्तस्तेन गोविन्दस्वामी स ज्ञानिना सदा। मुमुचुः साद्भुताश्चान्तस्तमामन्त्र्य ततो ययौ॥८५॥ प्राप्य वाराणस्रीं तां च तद्वाह्ये चण्डिकागृहे। न्नि तत्प्रातिषेन्नाम देवीपूजादिकर्मणा॥८६॥ भाया च तत्रैव बहिः सकुडुम्बस्तरास्तलम्। समावसद कार्पटिकः सोऽन्यदेशागतैः सह॥८७॥ रात्रौ च तत्र सुप्तेषु सर्वेष्वधिगताध्वसु। श्रान्तेष्वास्तीर्णपर्णादिपान्थशय्यानिपातिषु ॥८८॥ तदीयस्य विबुद्धस्य तस्याकस्मात्कनीयसः। सूनोर्विजयदत्तस्य महान् शीतज्वरोऽजनि॥८९॥ स तमं सहसा भावि बन्धुविश्लेषहेतुना। भयेनेव ज्वरेणाभूदूर्ध्वरोमा सबाष्पयुः॥९०॥ शीतातंश्च प्रबोध्यैव पितरं स्वमवाच तम्। बाधत तात तीव्रो मामिह शीतज्वरोऽधुना॥९१॥ तन्मे समिधमानीय शीतघ्नं ज्वलयानलम्। नान्यथा मम शास्तिः स्यान्नयय न च यामिनीम्॥९२॥ तच्छ्रुत्वा तं स गोविन्दस्वामी तद्वेदनाकुलः। तावत्कुतोऽधुना वह्निर्वत्सेति च समन्यथात्॥९३॥ नन्वयं निकटे तात पश्यत्यग्निर्ज्वलन्नितः। भूमिष्ठेऽत्रव तद्गत्वा किं नाङ्गं तापयाम्यहम्॥९४॥ तस्मात् सकम्पं हस्ते मां गृहीत्वा प्रापय द्रुतम्। इत्युक्तस्तेन पुत्रेण पुनर्विप्रोऽपि सोऽब्रवीत्॥९५॥
पंचम लम्बक ५२७
पंचम लम्बक ५२७ गोविन्दस्वामी ने मार्ग में चलते हुए जटाधारी भस्म रमाये खप्पर लिये और अर्धचन्द्र धारण किय हुए शिव के समान एक तपस्वी को देखा ॥८१॥ उसने उस तपस्वी से अपना शुभ-अशुभ पूछा। तब वह योगी कहने लगा—'तुम्हारे तीनों बालकों का भविष्य कल्याणमय है किन्तु इनमें छोटे बालक विजयदत्त से तुम्हारा वियोग हो जायगा। तब बड़े पुत्र अशोकदत्त के प्रभाव से उसके साथ फिर तुम्हारा समागम होगा' ॥८२-८४॥ इस प्रकार उस ज्ञानी से कहा हुआ गोविन्दस्वामी सुख और दुःख दोनों से आक्रान्त होकर वहाँ से चला गया ॥८५॥ तदनन्तर वाराणसी पहुँचकर उसके बाहरी भाग में स्थित चंडिका के मन्दिर में ठहरा। यहाँ देवी की पूजा आदि कार्यों में उसका दिन बीत गया। रात में भी वह मन्दिर के बाहर, वृक्ष के नीचे अन्य देशों से आये हुए यात्रियों के साथ सपरिवार सो गया ॥८६-८७॥ यात्रा से होनेवाली थकावट के कारण अन्य सभी यात्रियों के पत्त आदि के बिछावनों पर सो जाने के पश्चात् जागते हुए उस ब्राह्मण के छोटे पुत्र को शीतज्वर का महान् प्रकोप हुआ। भविष्य में होनेवाले अपने परिवार के वियोग के कारण-स्वरूप उसके ज्वर का प्रकोप बढ़ गया। रौंगटे खड़े हो गये और शरीर कांपने लगा ॥८८-९०॥ ठंडक से काँपते हुए उसने पिता को जगाकर कहा—'पिता ! मुझे भीषण शीतज्वर कष्ट दे रहा है। इसलिए इस शीत को दूर करने के लिए लकड़ी लाकर आग जलाओ। इसके बिना न तो मुझे शान्ति मिलेगी और न रात ही बिता सकूँगा' ॥९१-९२॥ यह सुनकर उसके कष्ट से घबराया हुआ गोविन्दस्वामी बोला—'इस समय रात को आग कहाँ से लगाऊँ? तब विजयदत्त ने कहा—'पिताजी वह देखो पास ही कहीं आग जल रही है। इसलिए काँपते हुए मुझे हाथ पकड़कर वहाँ ले चलो' ॥९३-९५॥
५२८ कथासरित्सागर
५२८ कथासरित्सागर श्मशानमेतद्देषा च चिता ज्वलति तत्क्षणम्। गम्यतेऽत्र पिशाचादिभीषणं त्वं हि बालकः ॥१९६॥ एतच्छ्रुत्वा पितुर्वाक्यं त्रस्तस्य विहस्य सः। वीरो विजयदत्तस्तं सावष्टम्भमभाषत ॥१९७॥ किं पिशाचादिभिस्तात वराकं क्रियत मम। किमल्पसत्त्वः कोऽप्यस्मि तदशङ्क नयैष माम् ॥१९८॥ इत्याग्रहाद् ब्रुवन्तं तं स पिता तत्र नीतवान्। सोऽप्यङ्गं तापयन् बाण्च्छितामुपससर्प ताम् ॥१९९॥ ज्वलन्तीमनलज्वालाधूमव्याकुलमूर्धजाम् । नृमांसग्राहिणीं साक्षान्नि रक्षोधिदेवताम् ॥२००॥ क्षणात्तत्र समाश्वस्य सोऽर्भकः पितरं च तम्। चितान्तर्वृष्यते वृत्तं किमसदिति पृष्टवान् ॥२०१॥ कपालं मानुपम्यतन्चितायां पुत्र दह्यते। इति तं प्रत्यवादीत्तं सोऽपि पार्श्वस्थितः पिता ॥२०२॥ ततः स्वसाहसेनेव दीप्ताग्रेण निहत्य तम्। कपालं स्फोटयामास काष्ठेनैकेन सोऽर्भकः ॥२०३॥ ततोऽस्य प्रसुता तस्मान् मुखे तस्यापतद् वसा। श्मशानबलिभा नक्तञ्चरीसिद्धिरिवापिता ॥२०४॥ तदास्वादन बालश्च सम्पन्नाद्भूत्स राक्षसः । ऊर्ध्वकेशः शिखोल्लातसङ्गो दंष्ट्राविशङ्कटः ॥२०५॥ आकृष्य च कपालं तद् वसां पीत्वा लिलेह सः। अस्थिलग्नाननज्वालालोलया निजजिह्वया ॥२०६॥ ततस्त्यक्तकपालः सन्नितरं निजमेव तम्। गोविन्दस्वामिनं हन्तुमुद्यतासिरियद्य सः॥२०७॥ कपालस्फोट भो देव न हन्तव्यः पिता तव। इत एहीति तत्कालं श्मशानादुवभूव वचः ॥२०८॥ तच्छ्रुत्वा नाम लब्ध्वा च कपालस्फोट इत्यदः । स वटं पितरं मुक्त्वा रक्षामूखस्तिरोदधे ॥२०९॥ १ वृत्तम्—गोलाकारम्।
पंचम लम्बक ५२१
पंचम लम्बक ५२१ पुत्र के ऐसा कहने पर पिता गोविन्दस्वामी ने कहा—'बेटा ! वह तो श्मशान है और वह चिता जल रही है। पिशाच भूत प्रेत आदि से युक्त भीषण श्मशान में तुम्हें कैसे ले जाऊँ ? तुम अभी बच्चे हो।' इस प्रकार पिता के वचन सुनकर वीर बालक विजयदत्त पिता को फटकारते हुए बोला—'पिताजी ये बेचारे पिशाच आदि मेरा क्या कर लेंगे ? क्या मैं दुर्बल हूँ ? तुम बिना किसी शंका के मुझे वहीं ले चलो' ॥११९ १८॥ आग्रहपूर्वक इस प्रकार कहते हुए पुत्र को पिता वहाँ ले गया और वह बालक भी शरीर को तपाता हुआ चिता के पास जा पहुँचा ॥११९॥ जलती हुई आग की लपटों के केशोंवाली और नर-मांस को ग्रहण करनेवाली वह चिता मानों राक्षसों की गृहदेवी थी॥१२०॥ कुछ देर तक शरीर तपाने से सावधान होकर बालक ने पिता से पूछा—'चिता के अन्दर यह बोला-सा क्या बोलता है ? ॥१२१॥ पास बैठे हुए पिता ने कहा—'बेटा ! यह मनुष्य का कपाल (सिर) जल रहा है' ॥१२२॥ तब उस लड़के ने ग्राह के समान जलती हुई चिता की लकड़ी से उस सिर को फोड़ दिया॥१२३॥ सिर को फोड़ते ही उससे निकलती हुई चर्बी की धारा उस बालक के मुँह में आ गिरी। मानों श्मशान की आग ने उसे राक्षसी सिद्धि प्रदान की हो॥१२४॥ उस चर्बी के चखन से वह बालक राक्षस बन गया। उसके सिर के बाल खड़े हो गये। विकट दाँत निकल आये और उसने तलवार तान ली॥१२५॥ तदनन्तर लकड़ी से उस कपाल को खींचकर वह बालक उसकी सारी चर्बी को आग के समान लपलपाती जीभ से चटपट चाट गया ॥१२६॥ तब वह कपाल को फेंककर और तलवार खींचकर अपने पिता गोविन्दस्वामी को ही मारने के लिए उसके पीछे दौड़ा॥१२७॥ इतने में ही श्मशान से आवाज आयी कि 'हे करालास्फोट देव ! अपने पिता को मत मारो। इधर आओ' ॥१२८॥ यह सुनकर करालास्फोट भय प्राप्त करके वह बालक पिता को छोड़कर राक्षस बनकर अन्तर्धान हो गया ॥१२९॥ ६७
५३० | कथासरित्सागर
५३० | कथासरित्सागर
तत्पिता सोऽपि गोविन्दस्वामी हा पुत्र ! हा गुणिन् । हा हा विजयदत्तेति मुक्ताक्रन्दस्ततो ययौ ॥११०॥ एत्य चण्डीगृहं तच्च प्रातं पश्यन् मृताय च । श्यायसेऽशोकदत्ताय यथावृत्तं शशंस सः ॥१११॥ ततस्ताभ्यो सहान्विष्युदापात्तारणम् । तथा शोकान्नगवदामाजगाम न तापसः ॥११२॥ यथा वाराणसीसंस्थो देवीसन्दर्शनागतः । तत्रोपेत्य जनोऽप्यन्यो ययौ तत्समदुःखताम् ॥११३॥ तावच्च देवी पूजायामागत्यैको महावणिक् । अपश्यत्तं गोविन्दस्वामिनं तं तथाविधम् ॥११४॥ समुद्रदत्तनामासावुपेत्याश्वास्य च द्विजम् । तत्रैव स्वगृहं साधुर्निनाय सपरिच्छदम् ॥११५॥ स्नानादिनोपचारैण सत्र चैनमुपाचरत् । निसर्गो ह्येष महतां यदापन्नानुकम्पनम् ॥११६॥ सोऽपि जग्राह गोविन्दस्वामी पत्न्या समं धृतिम् । महाप्रतिश्रव श्रुत्वा जानानश्च सुतसङ्गमम् ॥११७॥ ततः प्रभृति चैतस्यां वाराणस्यामुवास सः । अभ्यर्चितो महाहृद्यस्य तस्यैव वणिजो गृहे ॥११८॥ तत्रैकाधीतविद्योऽस्य स सुतं प्राप्तयोवनः । द्वितीयोऽशोकदत्ताख्यो बाहुयुद्ध'मशिक्षत ॥११९॥ क्रमेण च ययौ तत्र प्रकर्षं स तथा यथा । अजीयत न केनापि प्रतिमल्लेन भूतले ॥१२०॥ एकदा देवयात्रायां तत्र मल्लसमागमे । जगामैको महामल्लः ख्यातिमान् दक्षिणापथात् ॥१२१॥ तेनात्र निखिला मल्ला राज्ञो वाराणसीपतेः । प्रतापमुकुटाख्यस्य पुरतोऽन्ये पराजिताः ॥१२२॥ ततः स राजा मल्लस्य युद्धं तस्य समादिशत् । आनाय्याशोकदत्तं च श्रुतं तस्माद् वणिग्वरात् ॥१२३॥
१ मल्लयुद्धम्; कुश्तीति भाषायाम् ।
पञ्चम लम्बक ५३१
पञ्चम लम्बक ५३१ तदनन्तर उसका पिता गोविन्दस्वामी 'हाय बेटा ! हाय मुनी विजयदत्त ! -इन शब्दों के साथ रोता-चिल्लाता हुआ वहाँ से चला गया ॥११०॥ वहाँ से चण्डी के मन्दिर में जाकर उसने प्रातःकाल अपनी पत्नी और ज्येष्ठ पुत्र अशोक- दत्त से रात की वह सारी घटना सुना दी ॥१११॥ देवी-दर्शन के लिए आया हुआ वाराणसी का रहनेवाला एक तपस्वी तथा अन्य एकत्र यात्री-गणों बिना मेघ के वज्रपात के समान इस घटना के संबंध में सुनकर गोविन्द स्वामी के दुःख में समवेदना प्रकट करने लगे ॥११२-११३॥ इतने में ही देवी-पूजन के लिए वहाँ समुद्रदत्त नाम का एक धनी वैश्य आया। उसने इस प्रकार दुःखी गोविन्दस्वामी के पास जाकर उसे धैर्य प्रदान किया ॥११४॥ तदनन्तर वह सज्जन बनिया गोविन्द स्वामी को सपरिवार अपने घर ले गया और स्नान भोजन आदि की आवश्यक व्यवस्था करा दी। विपद्ग्रस्त प्राणियां पर दया करना उच्च व्यक्तियों का स्वभाव होता है ॥११५-११६॥ महातपस्वी के बचन पर विश्वास करके पुत्र के पुनर्मिलन की आशा से गोविन्दस्वामी ने किसी प्रकार धैर्य धारण किया ॥११७॥ तब से लेकर उस महाधनी बनिये की प्रार्थना पर उसने वाराणसी में उस बनिये के घर ही रहना निश्चित किया ॥११८॥ वहाँ पर विद्या प्राप्त करके उसका पुत्र अशोकदत्त युवक हो गया और कुश्ती लड़ना सीखने लगा ॥११९॥ धीरे-धीरे वह मल्लविद्या (पहलवानी) में निपुण हो गया। संसार में किसी भी दूसरे पहलवान के लिए उसे जीतना कठिन था ॥१२० ॥ एक बार किसी देवयात्रा के मेले में दक्षिण-देश का एक विख्यात मल्ल (पहलवान) वाराणसी आया और उसने काशिराज प्रतापनुकुट के सभी पहलवानों को उनके सामने ही पछाड़ दिया ॥१२१-१२२॥ तब राजा ने उस बनिये से अशोकदत्त की प्रशंसा सुनकर, उसे बुलवाकर लड़ने की आज्ञा दी ॥१२३॥
५३२ कथासरित्सागर
५३२ कथासरित्सागर सोऽपि मल्लो भुजं हत्वा हस्तेनारभताहवम्। मल्लं चाशोकदत्तस्तु भुजं हत्वा ऽपातयत् ॥१२४॥ ततस्तत्र महामल्लनिपातोत्थितशब्द्यया। युद्धभूम्यापि सन्तुष्य साधुवाद इवोदितः ॥१२५॥ स राजाशोकदत्तं तं तुष्टो रत्नैःपूरयत्। चकार चात्मनः पार्श्ववर्तिनं दृष्टविक्रमम् ॥१२६॥ सोऽपि राज्ञः प्रियो भूत्वा दिनं प्राप परां श्रियम्। दधधि शूरविद्यस्य विक्षपक्षो विशाम्पतिः ॥१२७॥ सोऽथ जातु ययौ राजा चतुर्दश्यां बहिःपुरे। सुप्रतिष्ठापितं दूरे देवमर्चयितुं शिवम् ॥१२८॥ कृतार्चनस्ततो नक्तं श्मशानस्यान्तिमेन सः। आगच्छन्नशृणोदार्तां तन्मध्यादुद्गतां गिरम् ॥१२९॥ अह दण्डाधिपनेह मिथ्या बध्यानुकीर्तनात्। द्वेघेण विद्धः शूलायां तृतीय दिवस प्रभो ! ॥१३०॥ अद्यापि च न निर्यान्ति प्राणा म पापकर्मणः। तद्वद तृषितोऽस्त्यर्थमह दापय मे जलम् ॥१३१॥ तच्छ्रुत्वा कृपया राजा स पार्श्वस्थमुवाच तम्। अशोकदत्तमस्याम्भः प्रहिणोतु भवानिति ॥१३२॥ कोऽत्र रात्रौ प्रजह्वः सदगच्छाम्यहमात्मना। इत्युक्त्वाशोकदत्तः स गृहीत्वाम्भस्ततो ययौ ॥१३३॥ याते च स्वपुरीं राज्ञि स धीरो गहनान्तरम्। महत्तरण तमसा सर्वतोऽन्तरधिष्ठितम् ॥१३४॥ शिबावकीर्णपिशितप्रतप्त श्यामहावलि । क्वचिद् क्वचिच्चिताज्योतिर्र्दीप्रदीपप्रकाशितम् ॥१३५॥ रुसद्रुत्तालबेतालतालवाद्यं विवशं तम्। दमशानं कृष्णरजनीनिवासभवनोपमम् ॥१३६॥ केनाम्भो याचितं भूपावित्यपृच्छस्तत्र स ब्रुवन्। मया याचितमित्यवमशृणोत् बाचमेकतः ॥१३७॥ गत्वा तदनुसारण निकटस्थ चितामठम्। ददर्श तत्र शूलाग्रे विद्धं कञ्चिन्नरं पूयम् ॥१३८॥