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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

[Header] पंचम लम्बक ५९७

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[Header] पंचम लम्बक ५९७

वह शक्तिवेग भी अब राजा बनकर अपनी प्रियतमाओं के साथ विद्याधर-लोक की पताका के समान कनकपुरी में आ गया॥२८४॥ विद्याधराधिप वह शक्तिवेग मानों अत्यन्त ऊँची होने से नीचे गिरती हुई सूर्य-किरणों के समान सोने की रचना से चमचमाती हुई प्रासाद श्रृंखलाओंवाली कनकपुरी में उन चारों प्रियतमाओं के साथ रत्नजड़ित सीढ़ियोंवाली उद्यान-वावलियों में अत्यन्त मुग्ध और आनन्द लेने लगा॥२८५॥ वाक्पटु शक्तिवेग इस प्रकार अपना विचित्र चरित्र वत्सराज को सुनाकर फिर बोला-॥२८६॥ हे वत्स्य भूपाल वत्सराज तुम मुझ उसी शक्तिवेग को उत्पन्न हुए अपने नये चक्रवर्ती पुत्र के चरणकमलों के दर्शन का अधिकारी समझो॥२८७॥ इस प्रकार मनुष्य होकर भी मैंने शिवजी की कृपा से विद्याधरों की प्रभुता प्राप्त की है। अब मैं अपने स्थान को जाता हूँ। बाल-रामा का रक्षण कर लिया। आपका सर्वदा मंगल हो॥२८८॥ इस प्रकार प्रणाम कर जाने की आज्ञा प्राप्त करके चन्द्रमा के समान तेजस्वी शक्तिदेव के आकाश में उड़ जाने पर महारानियों मन्त्रियों और पिता के साथ वत्सराज ने अत्यन्त आनन्द का अनुभव किया॥२८९॥ तृतीय तरङ्ग समाप्त चतुर्दारिका नामक पंचम लम्बक समाप्त

मदनमञ्चुका नाम षष्ठो लम्बक

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मदनमञ्चुका नाम षष्ठो लम्बक इदं गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्वरान्दोलना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥ प्रथमस्तरङ्ग तर्जयन्निव विघ्नौघानमितोन्नमितेन यः। मुहुर्विभाति शिरसा स पायाद् वो गजाननः ॥१॥ नमः कामाय यद्बाणपातैरिव निरन्तरम्। भाति कण्टकितं शम्भोरप्याश्लिङ्गितं वपुः ॥२॥ इत्यादि दिव्यचरितं कृत्वात्मानं किसान्यवत्। प्राप्तविद्याधरैश्वर्यो यदा मरुत् स्वयं जगौ ॥३॥ नरवाहनदत्तोऽत्र सपत्नीकैर्महर्षिभिः। पृष्टः प्रसङ्गे कुत्रापि तदिदं शृणुताधुना ॥४॥ नरवाहनदत्तस्य युवावस्था अथ संवर्ध्यमानोऽत्र पित्रा वत्सेश्वरेण सः। नरवाहनदत्तोऽभूद्व्युत्क्रान्ताष्टमवत्सरः ॥५॥ विनीयमानो विद्यासु क्रीडन्नुपवनेषु च। सह मन्त्रिसुतैरासीद्राजपुत्रस्तदा न सः॥६॥ देवी वासवदत्ता च राज्ञी पद्मावती तथा। आस्तामेकतमस्नेहात्तदेवाग्रे दिवानिशम् ॥७॥ आरोहद्गुणभङ्गेण रेजे सद्‌वंशजन्मना। आनीरापूर्यमाणेन वपुषा धनुषा च सः ॥८॥ पिता वत्सेश्वरश्चास्य विवाहादिमनोरथैः। आसन्नफलसम्पत्तिकामैः कालं निनाय तम् ॥९॥

मदनमञ्चुका नामक छठा लम्बक

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मदनमञ्चुका नामक छठा लम्बक (मंगला-श्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।) प्रथम तरंग ऊपर उठने और नीचे झुकते हुए मस्तक से विघ्नों के समूह को मानो दूर करते हुए गजानन आपकी रक्षा करें ॥१॥ उस कामदेव को नमस्कार है, जिसके बाणों के प्रहार से पार्वती द्वारा निरन्तर आलिङ्गित रहने पर भी शिवजी का शरीर सदा रोमाञ्चित रहता है ॥२॥ विद्याधरों का चक्रवर्ती साम्राज्य प्राप्त करके अपने को एक स्तम्भ व्यक्ति बनाकर नर वाहनदत्त ने वार्तालाप के प्रसंग में मरुभूति महर्षियों के पूछने पर प्रारम्भ से लेकर जिस प्रकार अपना चरित्र वर्णन किया अब उसे सुनो ॥३॥ पिता वत्सराज द्वारा पालन-पोषण करते हुए नरवाहनदत्त ने अपनी बाल्यावस्था के आठ वर्ष व्यतीत किये ॥४॥ नरवाहनदत्त की युवावस्था उस समय वह राजकुमार नरवाहनदत्त मन्त्रियों के पुत्रों के साथ विद्याओं की शिक्षा ग्रहण करता हुआ और उद्यानों में खेलता हुआ समय व्यतीत कर रहा था ॥५॥ रानी वासवदत्ता और रानी पद्मावती दोनों समान स्नेह से रात-दिन उसकी देखभाल करती रहती थीं ॥६॥ वह राजकुमार जन्म में प्राप्त होने हुए गुणों से तथा उच्च कुल में जन्म लेने के कारण उत्तरोत्तर गौरवान्वित और धीरे-धीरे शरीर से तथा (धनुःपक्ष में) चढ़ाई हुई प्रत्यञ्चा (गुण) से तथा श्रेष्ठ बाँस से निर्मित और धीरे-धीरे चढ़ाये जाते हुए धनुष से शोभित होने लगा ॥७-८॥ कुमार का पिता वत्सराज उदयन भी शीघ्र ही फल देने के कारण मनोहर और आकर्षक उसके विवाह आदि मनोरथों से अपना समय व्यतीत कर रहा था ॥ ९॥

६ कथासरित्सागर

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६ कथासरित्सागर राज्ञः कलिङ्गदत्तस्य कथा अत्रान्तरे कथासन्धौ यद्वृत्तं तन्निशम्यताम्। आसीत्तक्षशिला¹ नाम वितस्तापुलिने पुरी ॥११०॥ तदम्भसि बभौ यस्याः प्रतिमा सौधसन्ततेः। पातालनगरीबाधस्तच्छामालोकनागता ॥१११॥ तस्यां कलिङ्गदत्ताख्यो राजा परमकौगतः²। अभूत्तारावरस्फीतजिनभक्ताखिलप्रजः³ ॥११२॥ रराज सा पुरी यस्य चैत्यरत्नैर्निरन्तरे। मत्तुल्या नाम नास्तीति मङ्क्ष्वङ्गैरिबोदिते ॥११३॥ प्रजानां न परं चक्रे यः पितेवानुपालनम्। यावद्गुरुरिव ज्ञानमपि स्वयमुपादिशत् ॥११४॥ तथा च तस्यां कोऽप्यासीन्नगर्यां सौगतो⁴ वणिक। धनी वितस्तादत्ताख्यो भिक्षुपूजैकतत्परः ॥११५॥ रत्नदत्ताभिधानश्च तस्याभूत्तनयो युवा। स च तं पितरं शश्वत्पापं कृत्याजुगुप्सत ॥११६॥ पुत्र निन्दसि कस्मान्मामिति पित्रा च तेन सः। पृच्छ्यमानो वणिक्पुत्रः सामर्षयूयमभाषत ॥११७॥ तात त्यक्तत्रयीधर्मेस्त्वमधर्मं निषेवसे। यद् ब्राह्मणान् परित्यज्य श्रमणांश्चाप्सदर्चसि ॥११८॥ स्नानादियन्त्रणाहीना स्वच्छालाधनलोलुपाः। अपास्तसन्धिस्याशेपकेशकौपीमसुस्थिताः ॥११९॥ विहारास्पदलोभाय सर्वेऽप्यधमजातयः। यमाधमन्ति धि तेन सौगतेन मयेन ते ॥१२०॥


१ पश्चिमोत्तरसीमाप्रान्ते प्रसिद्धा तक्षशिला नगरी साम्प्रतं पाकिस्तानप्रदेशे वर्तते Taxila नाम्ना प्रसिद्धा। अस्या विषये परिशिष्टे विस्तरं विवक्षितम्। २ तक्षशिलायां कदाचित् बौद्धधर्मस्य जैनधर्मस्य च प्रचुरः प्रचार आसीदित्यैति- हासिकानां मतम् तत् परिशिष्टे द्रष्टव्यम्। ३ जिनधर्मानुयायीत्यर्थः, ४ त्रयी-वेदत्रयी तत्प्रतिपादितो वैदिकधर्मः।

षष्ठ लम्बक ६१

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षष्ठ लम्बक ६१ राजा कलिङ्गदत्त की कथा इसी बीच कथा की सन्धि में जो कुछ हुआ उसे सुनो। वितस्ता (झेलम) नदी के किनारे तक्षशिला नाम की नगरी थी। उस नगरी के भवनों की छाया वितस्ता के जल में प्रति बिम्बित होती थी॥१ ॥ उस प्रतिबिम्ब से ऐसा प्रतीत होता था कि मानो तक्षशिला पुरी की शोभा निरखने के लिए पातालपुरी ऊपर उठकर आ रही हो॥११॥ उस नगरी में सुगत (बुद्ध) का परम भक्त कलिङ्गदत्त नाम का राजा था जिसकी सारी प्रजा जिनभक्त (जैन) थी॥१२॥ वह नगरी ऊँचे-ऊँचे अनेक विहारों से ऐसी प्रतीत होती थी मानों ऊँचे शृंगों से यह घोषणा कर रही हो कि मेरे समान दूसरी नगरी संसार में नहीं है॥१३॥ राजा कलिङ्गदत्त पिता के समान प्रजा का केवल पालन ही नहीं करता था प्रत्युत गुरु के समान स्वयं ज्ञान का उपदेश भी करता था॥१४॥ उस नगरी में बौद्ध भिक्षुओं की पूजा में तत्पर वितस्तादत्त नाम का एक धनी वैश्य रहता था। उसका रत्नदत्त नामक एक युवा पुत्र था जो अपने पिता को पापी कहकर उससे चिढ़ता रहता था॥१५-१६॥ 'बेटा मेरी निन्दा क्यों करते हो'—इस प्रकार पिता के पूछने पर पुत्र उस पर आक्षेप करता हुआ बोला—॥१७॥ 'पिता तुम वैदिक धर्म को छोड़कर अधर्म का सेवन करते हो। ब्राह्मणों को छोड़कर भिक्षुओं की सदा पूजा किया करते हो॥१८॥ स्नान शौच आदि से हीन और अपने समय पर भोजन के लोभी शिखा और केशों को मुड़वाकर केवल कौपीन पहिननेवाले तथा विहारों (मठों) में स्थान मिलने के लोभ से सभी नीच जाति के व्यक्ति जिस बौद्धधर्म का ग्रहण करते हैं, उससे हमारा क्या प्रयोजन ?॥१९-२ ॥ ७६

६०२ कथासरित्सागर

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६०२ कथासरित्सागर

तच्छ्रुत्वा स वणिक्प्राह न धर्मस्यैकरूपता । अन्यो लोकोत्तरः पुत्र ! धर्मोऽन्यः सार्वलौकिकः ॥२१॥ ब्राह्मण्यमपि तत्राहुर्मेद्याद्यविविवर्जनम् । सत्यं दया च भूतेषु न मृषा जातिविग्रहः ॥२२॥ किं च दर्शनमेतत्त्वं सर्वसत्त्वाभयप्रदम् । प्रायः पुरुषदोषेण न दूषयितुमर्हसि ॥२३॥ उपकारस्य धर्मत्वे विवादो नास्ति कस्यचित् । भूतेष्वभयदानेन नान्या चोपकृतिर्मम ॥२४॥ सर्वहिंसाप्रधानेऽस्मिन्वत्स मोक्षप्रदायिनि । दर्शनेऽप्रतिरतिध्ये मे तद्धर्मो ममात्र कः ॥२५॥ इति सञ्चोदितः पित्रा वणिक्पुत्रः प्रसह्य सः । न तथा प्रतिपेदे तन्निन्द्याम्यधिके पुनः ॥२६॥ ततः स तत्पिता खेदाद् गत्वा धर्मानुशासितुः । राज्ञः कलिङ्गदत्तस्य पुरतः सर्वमब्रवीत् ॥२७॥ सोऽपि राजा सभास्थाने युक्त्यानाय्य वणिक्सुतम् । नृपारचितकोपः सन्नवं वत्सारमन्वित् ॥२८॥ श्रुतं मया वणिक्पुत्र पापोऽयमसिदुष्कृती । निर्विचारं तदेषोऽद्य हन्यतां दण्डपूकः ॥२९॥ इत्यूचिवांस्ततः पित्रा कृतविज्ञापने किल । नृपतिर्धर्मपर्यायं द्वौ मासौ वधनिग्रहम् ॥३०॥ विविधार्ये तदन्ते च पुनरानयनाय च । रम्यैव तत्पितुर्हस्ते न्यस्तवस्तं वणिक्पुतम् ॥३१॥ सोऽपि पित्रा गृहं नीतो वणिक्पुत्रो भयाकुलः । किं मयापकृतं राज्ञो भवदिति विचिन्तयन् ॥३२॥ अशरणं डिमानानो मरणं भावि भावयन् । मनिद्रोऽपिनोऽगण्वन्तन्मरणौ न्पानितम् ॥३३॥ गता मासद्वये याते राज्ञाग्रे धृतराष्टृरः । पुनः स्वर्पाता सेनागौ वणिक्पुतुरनीयत ॥३४॥

षष्ठ लम्बक १०३

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[Header] षष्ठ लम्बक १०३

यह सुनकर वह कहने लगा—'बेटा! धर्म का एक ही रूप नहीं है। सार्वलौकिक धर्म पृथक् है और पारलौकिक धर्म पृथक् ॥२१॥ ब्राह्मण-धर्म भी यही है कि रागद्वेषहीनता सत्य प्राणिमात्र पर दया करना और जाति पांति के झूठे झगड़ों से वह रहित हो ॥२२॥ सभी जीवों पर अभय प्रदान करनेवाले इस बौद्ध सिद्धान्त को तुम किसी एक पुरुष के दोष से दूषित नहीं कर सकते ॥२३॥ उपकार करना धर्म है इसमें किसी का मतभेद नहीं है। प्राणियों को अभय प्रदान करने के अतिरिक्त और दूसरा कोई उपकार नहीं है, यह मेरा अपना विचार है ॥२४॥ इसलिए अहिंसा-प्रधान मांगल्यदायक इस सिद्धान्त में मेरा प्रेम है तो यह कौन-सा अधर्म है' ॥२५॥ पिता के इस प्रकार कहने पर भी वैश्यपुत्र न उसे स्वीकार नहीं किया। प्रत्युत अधिक निन्दा करने लगा ॥२६॥ तब उसके पिता ने खिन्न होकर धर्म का उपदेश करनेवाले राजा के सामने सारी बातें कह दीं ॥२७॥ राजा ने भी किसी समय युक्ति से उस वैश्यपुत्र को सभा में बुलाकर झूठा क्रोध प्रदर्शित करते हुए आदेश दिया कि 'मैंने सुना है, यह बनिये का बालक पापी और अति कुकर्मी है। इस लिए इस देशद्रोही को बिना विचारे ही आज मार डालो' ॥२८-२९॥ ऐसा कहते हुए राजा से उसके पिता ने प्राणदान की प्रार्थना की और राजा ने दो मास तक उस धर्माचरण के लिए निश्चित करके कहा कि 'इसके पश्चात् इसे फिर मेरे सम्मुख लाना' ऐसा कहकर उसके पिता को सौंप दिया ॥३०-३१॥ पिता से घर में लाया गया वह वैश्यपुत्र प्राणों के भय से सोचने लगा कि 'मैंने राजा का कौन-सा अपराध किया है जो वह मुझे दो महीने बाद फाँसी पर चढ़ा देगा। वह रात-दिन इसी सोच में नींद और भूख को भूलकर कुछ ही दिनों में अत्यन्त दुर्बल हो गया। दो महीने बीतने पर अत्यन्त दुर्बल और पीले पड़ हुए पुत्र को लेकर पिता राजा के पास गया ॥३२-३४॥

आत्मापि विस्मृतो भीत्या मम का स्वशनं कथा॥३६॥

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राजा तं च तथाभूतं वीक्ष्यापन्नमभाषत। किमीदृक्त्वं कृशीभूतं किं रुद्धं ते मयाशनम्॥३५॥ तच्छ्रुत्वा स वणिक्पुत्रो राजानं तमभाषत। आत्मापि विस्मृतो भीत्या मम का स्वशनं कथा॥३६॥ युष्मदादिष्टनिधनश्रवणात् प्रभृति प्रभो!। मृत्युमायान्तमायान्तमन्वहं चिन्तयाम्यहम्॥३७॥ इत्युक्तवन्तं तं राजा स वणिक्पुत्रमब्रवीत्। बोधितोऽसि मया वत्स युक्त्या प्राणभयं स्वतः॥३८॥ ईदृगेव हि सर्वस्य जन्तोर्मृत्युभयं भवेत्। तद्रक्षणोपकाराच्च धर्मः कोऽभ्यधिको वद॥३९॥ तदेतत्तव धर्माय मुमुक्षायै च दर्शितम्। मृत्युभीतो हि यतते नरो मोक्षाय बुद्धिमान्॥४०॥ असौ न गर्हणीयोऽयमेतद्धर्मा पिता त्वया। इति राजवचः श्रुत्वा प्रह्वोऽवादीद् वणिक्सुतः॥४१॥ धर्मोपदेशाद्देवेन कृती तावदहं कृतः। मोक्षायेच्छा प्रजाता मे तमप्युपदिश प्रभो!॥४२॥ तच्छ्रुत्वा तं वणिक्पुत्रं प्राप्ते तत्र पुरोत्सवे। तैलपूर्णं करे पात्रं दत्त्वा राजा जगाद सः॥४३॥ इदं पात्रं गृहीत्वा त्वमेहि भ्रान्त्वा पुरीमिमाम्। तैलबिन्दुनिपातश्च रक्षणीयस्त्वया सुत!॥४४॥ निपतिष्यति यद्येकस्तैलबिन्दुरितस्तव। सद्यो निपातिष्यन्ति त्वामेते पुरुषास्ततः॥४५॥ एवं विलोक्त्वा व्यसृजत् भ्रमाय वणिक्सुतम्। उत्खातखड्गान् पुरुषान् दत्त्वा पश्चात्स भूपतिः॥४६॥ वणिक्पुत्रोऽपि स भयाद्ग्रंस्तैस्तत्सबन्धुभिर्। पुरीं तामभितो भ्रान्त्वा दृष्ट्वाहागादृपान्तिकम्॥४७॥ नृपोऽप्यन्यसितानीतं दृष्ट्वा तमम्यधात्। कच्चित्पुरभ्रमेऽप्यद्य दृष्टोऽत्र भ्रमता त्वया॥४८॥ तच्छ्रुत्वा स वणिक्पुत्रः प्रोवाच रचिताञ्जलिः। यत्सत्यं न मया देव दृष्टं किञ्चिन्न च श्रुतम्॥४९॥

षष्ठ लम्बक ६५

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षष्ठ लम्बक ६५ राजा ने इस प्रकार पीड़ित और दुर्बल वैश्यपुत्र को देखकर कहा—'तू इतना दुर्बल क्यों हो गया ? मैंने तेरा भोजन तो बन्द नहीं किया था'॥३५॥ वैश्यपुत्र कहने लगा—'प्रभो ! आप द्वारा दी गई प्राणदण्ड की आज्ञा के समय से ही मैं भय के कारण अपनी आत्मा को भी भूल गया भोजन की तो बात ही क्या ? प्रतिक्षण सिर पर मंडराती हुई मृत्यु को ही देखता हूँ'॥३६-३७॥ ऐसा कहते हुए वैश्यपुत्र से राजा ने कहा—'बेटा मैंने प्राणदण्ड का भय देकर तुझे युक्ति पूर्वक ज्ञान कराया॥३८॥ इसी प्रकार समस्त प्राणियों को मृत्यु का भय होता है। उनकी रक्षा के लिए उपकार से बढ़कर और धर्म क्या है ? ॥३९॥ मैंने तुझे धर्म और मुक्ति का यही तत्त्व समझाने के लिए यह उपाय किया था क्योंकि मृत्यु से डरा हुआ बुद्धिमान् व्यक्ति मुक्ति के लिए यत्न करता है॥४०॥ इसलिए इसी प्रकार का धर्म करनेवाले अपने पिता की तुम निन्दा न करना। राजा की यह बात सुनकर नम्र वैश्यपुत्र ने कहा—॥४१॥ आपने धर्म का उपदेश देकर मुझे कृतार्थ किया। अब मेरी इच्छा मुक्ति के लिए हो रही है। अतः हे स्वामिन् उसका भी उपदेश दें'॥४२॥ यह सुनकर राजा ने उत्सव (मेले) के दिनों में वैश्यपुत्र के हाथ में तैल से भरा एक बरतन देकर कहा—॥४३॥ 'इस पात्र को लेकर तुम मेले के दिनों में सारी नगरी का भ्रमण करके आओ। लेकिन बेटा इस बात का ध्यान रखना कि तेल की एक बूँद भी न गिरने पावे॥४४॥ यदि इसमें से एक बूँद भी तेल गिरा तो मेरे ये सिपाही तुम्हें मार डालेंगे ॥४५॥ ऐसा कहकर राजा ने उसे नगरी का चक्कर लगाने के लिए छोड़ दिया और उसके पीछे नंगी तलवार लिये हुए सिपाही नियुक्त कर दिये॥४६॥ वह वैश्यपुत्र भयपूर्वक अत्यन्त सावधानी से तेल की रक्षा करता हुआ बड़े ही कष्ट से सारी नगरी की प्रदक्षिणा करके लौट आया॥४७॥ राजा ने भी बिना एक बूँद तेल गिराये तैलपात्र लेकर आए हुए वैश्यपुत्र से कहा— 'बेटा तुमने नगर में भ्रमण करते हुए किसी संगीत या वाद्य को सुना ? ॥४८॥ यह सुनकर वैश्यपुत्र ने हाथ जोड़कर कर कहा—'महाराज ! यह सच है कि भय से कांपते हुए मैंने न किसी को देखा और न कुछ सुना॥४९॥

६ ६ कथासरित्सागर

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६ ६ कथासरित्सागर अह ह्येकावधानेन तैलस्नेहपरिच्युतिम्। खड्गपातमयाद्राक्षंस्तदानीमभ्रमं पुरीम् ॥५०॥ एवं वणिक्सुतेनोक्ते स राजा निजगाद तम्। दृश्यतैरेकचित्तेन न त्वया किञ्चिदीक्षितम् ॥५१॥ तत्तेनैवावधानेन परानुध्यानमाचर। एकाग्रो हि बहिर्वृत्तिनिर्वृत्तस्तत्त्वमीक्षते ॥५२॥ दृष्टतत्त्वश्च न पुनः कर्मजालेन बध्यते। एष मोक्षोपदेशस्ते सक्षपात्कथितो मया ॥५३॥ इत्युक्त्वा प्रहितो राज्ञा पतित्वा तस्य पादयोः। कृतार्थः स वणिग्पुत्रो हृष्टः पितृगृहं ययौ ॥५४॥ एवं कलिङ्गदत्तस्य प्रजास्तस्यानुशासतः। तारादत्ताभिधानाऽभूद्राज्ञी राज्ञः पुरोषिता ॥५५॥ यथा स राजा शुशुभे रीतिमत्या सुवृत्तया। नानादृष्टान्तरसिको भार्यया सुकविर्यथा ॥५६॥ या प्रकाशगुणश्लाघ्या ज्योत्स्नेव शशलक्ष्मणः। तस्याममृतमस्याभूद्विबिम्बैरिव भूपतेः ॥५७॥ तया देव्या समं तत्र सुखिनस्तस्य तिष्ठतः। नृपस्य जग्मुर्दिवसा दाक्ष्येव दिवि वज्रिणः ॥५८॥ सुरभिदत्ताप्सरसः कथा अत्रान्तरे क्वचित्तस्मिन् कथासङ्गी क्षतत्रसः। कुतोऽपि हेतोस्त्रिदिवे वर्त्तते स्म महोत्सवः ॥५९॥ तत्राप्सरःसु सर्वासु नर्त्तितुं मिलितास्वपि। एका सुरभिदत्ताख्या नादृश्यत वराप्सराः ॥६०॥ प्रणिधानाऽथ शक्रस्तां ददर्श रहःस्थिताम्। विद्याधरेण केनापि सहितां नन्दनान्तरे ॥६१॥ सद्दृष्ट्वा जातकोपोऽन्त स वृत्रारिरचिन्तयत्। अहो एतौ दुराचारौ मदनान्धावुभावपि ॥६२॥ एका यदाचरत्येव विस्मृत्यात्मानं स्वतन्त्रवत्। करोत्यविनयं चान्यो देवभूमौ प्रविश्य यत् ॥६३॥ अथवास्य वराकस्य दोषो विद्याधरस्य कः। आकृष्टो हि वशीकृत्य रूपेणायमिहानया ॥६४॥

षष्ठ लम्बक ६७

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षष्ठ लम्बक ६७ भ्रमण करते समय मैं एकाग्र चित्त से गले पर तलवार गिरने के भय से तैल की ओर दृष्टि लगाये हुए उस बचाने में तल्लीन था' ॥५१ ॥ वैश्यपुत्र के ऐसा कहने पर राजा ने कहा—'जिस प्रकार दीखते हुए भी तैल पर दृष्टि लगाये हुए तुमने सारे भ्रमण में कुछ नहीं देखा उसी प्रकार की तल्लीनता से तुम आत्मा के ध्यान में लग जाओ। आत्मा को एकाग्र वृत्ति से देखनेवाला व्यक्ति बाहरी वृत्तियों से हटकर आन्तरिक तत्त्व को देखता है॥५१-५२॥ जिसे तत्त्व का ज्ञान हो जाता है वह फिर कर्मजाल के बन्धन में नहीं बँधता। यह मैंने तुझे संक्षेप में मोक्ष का उपदेश कर दिया' ॥५३॥ इस प्रकार राजा से उपदेश पाकर और उसके चरणों में गिरकर, प्रसन्नचित्त वह वैश्यपुत्र अपने घर गया॥५४॥ इस प्रकार स्नेह से प्रजा का पालन करनेवाले उस राजा की तारादत्ता नाम की कुलीन रानी थी ॥५५॥ सच्चरित्रा और सुन्दरी उस रानी से अनेक दृष्टान्तों का रसिक वह राजा इस प्रकार शोभित होता था जिस प्रकार सुकवि भारती से शोभित होता है॥५६॥ प्रकट होते हुए गुणों से सराहनीय वह रानी अमृतमय उस राजा से उसी प्रकार अभिन्न थी जैसे अमृतमय चन्द्रमा से चाँदनी अभिन्न होती है॥५७॥ उस महारानी के साथ सुखपूर्वक रहते हुए उस राजा के दिन इन्द्राणी के साथ रहते हुए इन्द्र के समान व्यतीत होने लगे॥५८॥ सुरभिदत्ता अप्सरा की कथा इसी कथा की सन्धि में स्वर्ग में इन्द्र के यहाँ एक महोत्सव हुआ। उस महोत्सव में वेश्याओं के सभी वर्गों के सम्मिलित होने पर भी सुरभिदत्ता नाम की वेश्या वहाँ नहीं दीख पड़ी ॥५९ ½ ॥ इन्द्र ने योगबल द्वारा उसे किसी विद्याधर के साथ नन्दन-वन में क्रीड़ा करते हुए देखा॥६१॥ यह देखकर मन में क्रुद्ध इन्द्र ने सोचा कि ये दोनों कामान्ध दुराचारी हैं। एक अप्सरा तो मुझे भूलकर उद्दण्डता कर रही है दूसरा यह विद्याधर भी इस देवभूमि में आकर यह जो अविशय कर रहा है यह आश्चर्य है॥६२-६३॥ अथवा इस बेचारे विद्याधर का क्या दोष है? इसे तो यही वेश्या अपने रूपजाल में फँसाकर ले आई है॥६४॥

६८ कथासरित्सागर

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६८ कथासरित्सागर कान्तयान्तं किलापूर्णतुङ्गस्तनतटान्तया । लावण्याम्बुतरङ्गिण्या हृत स्यादालमनः प्रभुः ॥६५॥ शुश्रुमे किं न शर्वोऽपि पुरा दृष्ट्वा तिलोत्तमाम् । भ्रात्रा गृहीत्वा रक्षितामृतमेभ्यनिल तिलम् ॥६६॥ तपश्च मेनकां दृष्ट्वा विश्वामित्रो न किं जहौ । शर्मिष्ठा रूपशोभाञ्च ययातिर्नाप्तिवान् जराम् ॥६७॥ अतो विद्याधरयुवा नैवायमपराध्यति । त्रिजगत्क्षोभशक्तेन रूपेणाप्सरसा हृतः ॥६८॥ इयं तु स्वर्षेषु पापा हीनासक्तापराधिनो । प्रवेषित सुरान् हित्वा मयायमिय नन्दने ॥६९॥ इत्यालोच्य विमुञ्चैन विद्याधरकुमारकम् । अहल्याकामुक¹ सोऽस्यै शापमप्सरसे ददौ ॥७०॥ पापे प्रयाहि मानुष्य प्राप्य चायोनिजां सुताम् । दिव्यं कृत्वा च कर्तव्यमेष्यसि द्यामियामिति ॥७१॥ अत्रान्तरे च सा तस्य राज्ञस्तक्षशिलापुरि । राज्ञी कलिङ्गदत्तस्य तारावत्या ययावृतुम् ॥७२॥ तस्या सुरभिदत्ता सा शक्रशापच्युताप्सराः । सम्बभूवोदरे देव्या देहसौन्दर्यदायिनी ॥७३॥ तया च नभसो भ्रष्टां ज्वालां वेदीं ददर्श सा । तारावत्ता किल स्वप्ने प्रविशन्तीं निजोदरे ॥७४॥ प्रातश्चावर्णयत्स्वप्नं भर्त्रे तं सा सविस्मया । राजे कलिङ्गदत्ताय सोऽपि प्रीतो जगाद ताम् ॥७५॥ देवि ! दिव्या पतन्त्येव शापान्मानुष्ययोनिषु । तन्नानेव विजातीयः कोऽपि गर्भं तवार्पितः ॥७६॥ विचित्रसदसत्कर्मनिबद्धाः सञ्चरन्ति हि। जगत्त्रयस्त्रिजगत्यस्मिन् शुभाशुभफलाप्तये ॥७७॥ ―――― १ स्वयमहुल्या कामुकोऽपि सुरभिदत्तां शशापेति व्यङ्ग्यमिदं विशेषनम् ।

षष्ठ लम्बक ६१

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षष्ठ लम्बक ६१ उभरे हुए स्तनरूपी तटोंवाली एवं लावण्य-जल से भरपूर रमणी-नदी में बहाया हुआ कौन व्यक्ति अपने नियन्त्रण में रह सकता है? ॥६५॥ क्या पूर्व समय में तिलोत्तमा को देखकर शिवजी क्षुब्ध नहीं हो गये थे, जिसे विधाता ने सभी सुन्दर वस्तुओं से एक रत्न एकत्र करके निर्मित किया था? ॥६६॥ क्या मेनका को देखकर विश्वामित्र ने तप करना नहीं छोड़ दिया था ? क्या शर्मिष्ठा के रूप के लोभ से ययाति ने बुढ़ावस्था नहीं प्राप्त की थी ? ॥६७॥ इसलिए यहाँ इस विषय में यह विद्याधर-युवक अपराधी नहीं है; क्योंकि अप्सरा ने अपने तीनों लोकों को वश में करनेवाले रूप से इसे मोहित कर लिया ॥६८॥ हीन जाति में उत्पन्न यह स्वर्गीया रमणी पापिनी है, जिसने देवताओं का त्याग कर इस नन्दन वन में प्रविष्ट किया ॥६९॥ ऐसा सोचने के पश्चात् विद्याधर युवक को छोड़कर अहल्या के प्रेमी' (जार) इन्द्र ने उस अप्सरा को शाप दिया—॥७०॥ 'पापिन् ! तू मानुष्य योनि में जाकर, उसमें अयोनिशा कन्या को प्राप्त करके फिर तपस्या करने के पश्चात् फिर स्वर्ग में आवेगी ॥७१॥ इसी समय तक्षशिला के राजा कलिङ्गदत्त की रानी तारादत्ता ऋतुमती हुई। उसी रानी के गर्भ में इन्द्र के शाप से पतित सुवर्णप्रभा स्वर्गीया ने प्रवेश और निवास किया ॥७२-७३॥ उस समय रानी तारादत्ता ने स्वप्न में देखा कि आकाश से एक ज्वाला उसके पेट में प्रवेश कर रही है ॥७४॥ प्रातःकाल रानी ने आदर के साथ पति को स्वप्न की घटना सुनाई। सुनने पर राजा ने प्रसन्न होकर कहा ॥७५॥ 'देवि, चिरञ्जीवि-ऋषियों द्वारा दिया गया वरदान निष्फल नहीं होता है। इसीलिए मैं समझता हूँ कि कोई देवजातीय प्राणी तुम्हारे गर्भ में आया है ॥७६॥ इस नौवें महीने के पेट में रहने और बड़े विचित्र-विचित्र प्रकार से रानी अपने रूपों को बदलने लगी और अद्भुत रूप प्राप्त करने के लिए वह उद्यत हुई ॥७७॥ १. अहल्या के प्रेमी—यह विशेषण इन्द्र के लिए आया है। ५३

११० कथासरित्सागर

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११० कथासरित्सागर इत्युक्ता भूभृता राज्ञी सा प्रसङ्गादुवाच तम्। सत्यं कर्मैव बलवद् भोगदायि शुभाशुभम् ॥७८॥ तथा चेदमुपोद्घातं श्रुतं वक्ष्यत्र ते शृणु। राज्ञो धर्मदत्तस्य कथा अभवद्धर्मदत्ताख्यः कौशलाधिपतिर्नृपः ॥७९॥ नागश्रीरिति तस्यासीद्राज्ञी या पतिदेवता। भूमावरुन्धती ख्याता रूपेणर्याप सतीधुरम् ॥८०॥ काले गच्छति तस्यां च दम्यां तस्य च भूपतेः। अहमेषा समुत्पन्ना दुहितारिहन्तूसूदन ॥८१॥ ततो मय्यतिबालायां देव सा जननी मम। अकस्मात्पूर्वजातिं स्वां स्मृत्वा स्वपतिमब्रवीत् ॥८२॥ राजन्नकाण्ड एवाद्य पूर्वजन्म स्मृतं मया। अप्रतीये तवनाख्यातमाख्यातं मृत्यवे च मे ॥८३॥ अनुत्थितं स्मृता जातिः स्यादाख्यातेव मृत्यवे। इति प्राहुरतो देव मम्यधीव विषादिता ॥८४॥ इत्युक्तः स तथा पत्न्या राजा तां प्रत्यभाषत। प्रिये ! मयापि प्राग्जन्म त्वयेव सहसा स्मृतम् ॥८५॥ सममेवाद्य तावत्स्वं कथयिष्याम्यहं च ते। यदस्तु कोऽन्यथाकर्तुं शक्तो हि भवितव्यताम् ॥८६॥ इति सा प्रेरिता तेन भर्त्रा राज्ञी जगाद तम्। निर्बन्धो यदि ते राजन् शृणु तर्हि वदाम्यहम् ॥८७॥ इहैव देशे विप्रस्य माधवाख्यस्य कस्यचित्। गृहेऽहमभवं दासी सुवृत्ता पूर्वजन्मनि ॥८८॥ देवदासाभिधानश्च पतिरत्र ममाभवत्। कस्याप्येकस्य वणिजः साधुः कर्मकरो गृहे ॥८९॥ तावावामवसायात्र कृत्वा गेहं निजोचितम्। स्वस्वस्वामिगृयानीवपक्वान्नकृतवर्त्तनी ॥९०॥ वारिधानी च कुम्भश्च मार्जनी मञ्चकस्तथा। अहं च मत्पतिश्चेति युग्मत्रितयमेव नौ ॥९१॥ १ वारिधानी कुम्भश्चेति एकं युग्मम् मार्जनी मञ्चकश्चेति द्वितीयम्, अहं पतिश्चेति तृतीयम्।

षष्ठ लम्बक ६११

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षष्ठ लम्बक ६११ राजा के इस प्रकार कहने पर रानी ने प्रसंगतः कहा—'क्या यह सत्य है कि शुभ या अशुभ का भोग देनेवाला कर्म ही है' ॥७८॥ इस विषय की भूमिका के रूप में रानी ने राजा से कहा मैं इस प्रसंग की सुनी हुई एक कहानी तुम्हें सुनाती हूँ सुनो— राजा धर्मदत्त की कथा कोशल-देश का एक राजा था। उसका नाम धर्मदत्त था। उसकी नागश्री नाम की पति- व्रता रानी थी। सतियों के मान को रोके हुए भी (रूपवती) वह पृथ्वी पर बन्धुमती नाम से विख्यात हुई। कुछ समय के उपरान्त उस रानी के गर्भ से उस राजा की मैं पुत्री उत्पन्न हुई ॥७९-८१॥ एक बार जब मैं बहुत छोटी थी तब मेरी माता ने अकस्मात् अपने पूर्वजन्म की जाति का स्मरण करके अपने पति से कहा—॥८२॥ 'राजन् ! मैंने आज अकस्मात् ही पूर्वजन्म का स्मरण किया है। यदि मैं उसे आपसे न कहूँ तो प्रेम के विरुद्ध है और यदि कहूँ तो मेरी मृत्यु होती है ॥८३॥ कहते हैं कि यदि पूर्वजन्म की स्मृति बिना किसी शंका के हो जाय तो उसका कहना मृत्यु के लिए होता है। इसलिए मुझे बहुत खेद है' ॥८४॥ पत्नी द्वारा इस प्रकार कहे गये हुए राजा ने उससे कहा—'प्रिये ! मैंने भी तुम्हारे ही समान सहसा अपना पूर्वजन्म स्मरण कर लिया है। इसलिए तू मुझसे कह दे और मैं भी तुझसे कह देता हूँ। जो होना होगा होगा। भवितव्यता को कौन लौटा सकता है ॥८५-८६॥ इस प्रकार पति से प्रेरित होकर रानी ने कहा—'राजन् ! सुनो कहती हूँ—पूर्वजन्म में इसी (कोशल) देश में मैं माधव नामक किसी ब्राह्मण की सदाचारिणी दासी थी। देवदास नाम का मेरा पति था। वह सम्भवतः किसी वैश्य के घर में नौकर था ॥८७-८८॥ इस प्रकार हम दोनों, अपने अनुरूप घर बनाकर, अपने-अपने स्वामियों (मालिकों) के घरों से लाये हुए पक्वान्नों से जीवन-निर्वाह किया करते थे ॥८९ ॥ पानी का एक मटका (घड़ा) झाड़ू चारपाई, मैं और मेरा पति—ये तीन जोड़ियाँ हमारे घर में थीं ॥९१॥

४१९ कथासरित्सागर

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४१९ कथासरित्सागर भक्तलिप्समरे' गृहं रन्तोप भुञ्जिनाऽभूत् । दद्यप्रियतिथिप्रसङ्गेन प्रमितमदननो ॥९२॥ एश्वतोऽपि च पिण्डिरवनामच्छादनमप्यभूत् । सुदुर्लभतरं यस्मैचित्तदावाभ्यामश्रीयत ॥९३॥ अथानोदमवतीत्रो दुर्भिक्षस्तन पाबयोः । भूयश्चमम्बुहं प्राप्यमल्पमल्पमुपानमत् ॥९४॥ तत शूलामवपुषो दानेनैववसीदतोः । कदाचिदागादाहारकाले क्लान्तोऽतिथिर्द्विजः ॥९५॥ तस्मै निर्दोषभावाभ्यां द्वाभ्यामपि निजाशनम् । प्राणसंशयकालेऽपि दत्तं यावन्न यच्च तत् ॥९६॥ भुक्त्वा तस्मिन्गते प्राणा भर्तारं मे तमत्यजन् । अचिन्त्यस्यादरो नास्मास्विति मन्युवशान्निव ॥९७॥ ततश्वाहं समाधाय पत्ये समुचितां चिताम् । आरूढा चाबुरुद्वेव विपद्मारा ममारमम ॥९८॥ अथ राजगृहे जाता जाताऽहं महिषी तव । अचिन्त्यं हि फलं सूते मद्यः सुकृतपादपः ॥९९॥ इत्युक्तः स तया राजा धर्मदत्तो नृपोऽब्रवीत् । एहि प्रिये स एवाहं पूर्वजन्मपतिस्तव ॥१००॥ बणिक्कर्मकरोऽभूवं देवदासोऽहमुन्मयः सः । एतदेव मयाप्यद्य प्राक्तनं जन्म हि स्मृतम् ॥१०१॥ इत्युक्त्वा स्वान्यभिज्ञानान्युदीर्य च तया सह । वेष्या विषण्णा हृष्टश्च राजा सद्यो दिवं गतः ॥१०२॥ एवं तयोश्च मत्पित्रोर्लोकान्तरमुपेयुषोः । मातुः स्वसा वर्धयितुं मामनेषीन्निजं गृहम् ॥१०३॥ कल्यायां मयि भाग्यागादेकस्तत्रातिथिर्मुनिः । मातृस्वसा च मां तस्य शुश्रूषायै समादिशत् ॥१०४॥ स च कृत्यैव दुर्वासा यत्नेनाराधितो मया । तद्वरान्च मया प्राप्तो धार्मिकस्त्वं पतिः प्रभो ॥१०५॥ १ परस्परफलहाविरहिते शुचिभिः।

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षष्ठ लम्बक ११३ कलह-रहित होकर इस घर में हम दोनों अत्यन्त सुखी थे और देवता पितर तथा अतिथि को देकर बचे हुए परिमित अन्न को हम साथ खाया करते थे॥ २॥ हम दोनों की आवश्यकता से अधिक भोजन-आच्छादन आदि जो भी होता था उस हम किसी दीन-दुःखी को दे देते थे॥१३॥ कुछ समय के अनन्तर उस देश में एक बार अकाल पड़ गया। इस कारण हम दोनों को मिलनेवाला भोजन अब कम मात्रा में मिलने लगा॥१४॥ तब भूख-प्यास से व्याकुल और अन्न की कमी से कष्ट पाते हुए हम लोगों के भोजन के समय कोई थका हुआ ब्राह्मण अतिथि घर में आ गया॥१५॥ फलतः इस भीषण प्राण-संकट के समय में भी हम दोनों ने अपना सारा भोजन उसे दे दिया॥ १६॥ उस अतिथि के तृप्त चले जाने पर प्राणों ने मेरे पति को इसलिए छोड़ दिया मानो 'उसका अतिथि के प्रति विशेष आदर था, मेरे प्रति नहीं'—अर्थात् मेरा पति क्षुधा से पीड़ित होकर परलोक सिधार गया॥१७॥ तब मैं पति की चिता सुधारकर सती होने के लिए उस पर चढ़ गई और मेरी विपत्ति का भार उतर गया॥ ८॥ तदनन्तर मैं इस जन्म में राजा के घर महारानी होकर तुम्हारी पत्नी बनी। पुण्य का वृक्ष तुरन्त ही अचिन्तनीय फल प्रदान करता है॥ १९॥ रानी के इस प्रकार कहने पर राजा ने कहा—'आओ प्रिये! मैं वही तुम्हारे पूर्वजन्म का पति देवदास हूँ। मैंने भी आज ही अपना पूर्वजन्म स्मरण किया है॥१०-११॥ ऐसा कहकर और अपने पूर्वजन्म के संस्मरण उसे बताकर प्राणहीन राजा उस देवी के साथ ही स्वर्ग को चला गया॥१२॥ इस प्रकार मेरे माता-पिता द्वारा दूसरे लोक में चले जाने पर मेरी माता की बहन मौसी मेरा पालन-पोषण करने के लिए मुझे अपने घर ले गई॥१३॥ जब मैं कुमारी अवस्था में ही थी तब वहाँ एक मुनि अतिथि के रूप में आया और मेरी मौसी ने मुझे उसकी सेवा के लिए आदेश दिया॥१४॥ मुनि द्वारा दुर्वासा के समान मेरे द्वारा यत्न से सेवा करने पर प्रसन्न मुनि के वर प्रदान से मैंने तुम्हारे इस धार्मिक पति को प्राप्त किया॥१५॥

६१४ कथासरित्सागर

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६१४ कथासरित्सागर एव भवन्ति भद्राणि धर्मस्यैव यदादरात्। पितृभ्यां सह सम्प्राप्य राज्यं जातिरपि स्मृता ॥१०६॥ एतस्य चारुदत्ताया दम्या धूर्या वचो नृपः। बलिन्ददत्तो धर्मैकसान्द्रा निजगाद ताम् ॥१०७॥ सत्यं मय्यकृतेऽप्येष धर्मो भूरिफलो भवेत्। तथा च प्राक्तनीं देवि सप्तद्विजकथां शृणु ॥१०८॥ सप्तब्राह्मणकथा कुण्डिनाख्ये पुरे पूर्वमुपाध्यायस्य कस्यचित्। ब्राह्मणास्याभवञ्छिष्याः सप्तभ्रातृणपुत्रकाः ॥१०९॥ स तान्विष्यानुपाध्यायो धेनुं दुर्भिक्षसङ्कटे। गोमन्तं स्वपुराच्छे याचितुं प्राहिणोत्ततः ॥११०॥ ते च गत्वान्यदेशस्थं सुभिक्षाभृतुगय। तं तद्गुणं लब्धवान्दूरं तच्छिष्या गां ययाचिरे ॥१११॥ गोर्भरैः पूरितस्फीतमी पेतु लब्ध्व समन्ततः। क्षुधन् क्षुधितमभ्यार्ति न तु सम्भोजनं व्योः ॥११२॥ ततश्च तां गृहीत्वा गामायातस्त्वथ क्षुधा। उद्गाढपीडिताः सन्तः निवृत्तूपरणीतले ॥११३॥ उपाध्यायरूते दूरे दूरे भारद्गता वयम्। दुर्भिक्षे सर्वतःप्राये मरिष्यामोंऽगताः स्मः ॥११४॥ तन्न चेद् धेनुमेतां निपातयामहे। भक्षयद्भिर्भवतः सर्वैरनर्थस्य कृतेऽथ ॥११५॥ ततश्च पिशितं शाखामृगयोर्युवयोः। गत्वाऽपायामण्डगोऽगस्त्यस्यौदनं यथा ॥११६॥ इति मन्त्रयित्वा मन्त्रांस्तेनैव तद्वधकारिणः। सम्भारविधिना यद्नु तां सम्पाद्य तदा ते ॥११७॥ दृष्ट्वा रक्तान् पितॄन्भक्त्या कृत्वाऽतिथिरतन्द्रितः। प्रायश्चित्तं समभ्यर्च्याश्वमेधफलं परं ददुः ॥११८॥ सर्वे जग्मुः शशं गोर्दं न स्मृत्युपलब्धवान्। ते गते तदनन्तरमेवैषामुपसम्पन्नम् ॥११९॥

षष्ठ लम्बक ११५

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[Header] षष्ठ लम्बक ११५

इस प्रकार तप का मान करने से उस शुभ फल प्राप्त होते हैं। इसलिए मैंने माता पिता के साथ राज्य प्राप्त करके शूर्पारक का भी स्मरण किया॥१०६॥ इस प्रकार रानी तारावली की बातें सुनकर पर्यन्तग राजा रतिदत्त ने कहा — यह सच है। अनीति से दिया गया थोड़ा भी फल महान् फल देनेवाला होता है। इस सम्बन्ध में सात ब्राह्मणों की एक कथा सुनाता हूँ सुनो॥१०७-१०८॥ सात ब्राह्मणों की कथा कुरुङ्गार नामक नगर में किसी उपाध्याय (अध्यापक) ब्राह्मण के सात ब्रह्मचारी शिष्य थे॥१०९॥ एक बार दुर्भिक्ष पड़ने पर उस अध्यापक ने उन सातों शिष्यों को अन्न लानेके आत्म श्वशुर के घर अन्न संग्रह के लिए अपनी ससुराल भेजा॥११०॥ दुर्भिक्ष से मृत प्रायः उन सातों शिष्यों ने गुरु के कथनानुसार गुरु ससुराल से जाकर गाय माँगी॥१११॥ तब कुल और वंश के प्रभाव से अपनी जीविका की सम्भावनायुक्त उस गाय को अपने लिए किन्तु गुरुवर के लिए नहीं पूछा॥११२॥ वे सातों शिष्य उस गाय को लेकर गुरु के आश्रम की ओर आते हुए रास्ते में थककर बैठ गये! ...॥११३॥ और भूख से व्याकुल उन सातों ने उस गाय को मारकर खाने का निश्चय किया॥११४॥ उनमें से सबसे छोटे भाई ने कहा—गाय हमारी माता है, अतः इसे मारना ठीक नहीं है। शिष्यों ने अपने लिये ही उसके भूखे होने पर उस गाय को मारकर खाने का विचार करके उस गाय को मार डाला और उसका मांस आपस में बाँटकर खा लिया॥११५॥ उस छोटे भाई ने मांस नहीं खाया केवल उसके एक अंश की रक्षा की॥११६॥ समय बीतने पर वे सातों भाई मरकर मृग की योनि में उत्पन्न हुए॥११७॥ वहाँ भी वे सातों भाई साथ-साथ रहे और पूर्वजन्म के पाप के कारण कष्ट भोगते रहे॥११८॥

६१६ कथासरित्सागर

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६१६ कथासरित्सागर दिनैः सप्तापि दुर्भिक्षदोषात्ते च विपेशिरे । जातिस्मराश्च भूयोऽपि तेन सत्येन जज्ञिरे ॥१२०॥ इत्थं फलति शुद्धेन सिक्तं सङ्कल्पवारिणा । पुण्यबीजमपि स्वल्पं पुंसां दृष्टिकृतामिव ॥१२१॥ एवमेव द्रूषितं देवि दुष्टसङ्कल्पपाथसा। फलत्यनिष्टमेत्रेह वक्ष्यन्त्यदपि तच्छृणु ॥१२२॥ ब्राह्मणचाण्डालयोः कथा गङ्गायां तुल्यकालौ द्वौ तपस्यनशने जनौ। एको विप्रो द्वितीयश्च चण्डालस्तस्थतुः पुरा ॥१२३॥ तयोर्विप्रः क्षुभाक्रान्तो निषादान् वीक्ष्य तत्रगान्। मत्स्यानादाय मुञ्चानानेव मढो व्यचिन्तयत् ॥१२४॥ अहो वास्याः सुता एते धन्या जगति धीवराः । ये यथाकाममश्नन्ति प्रत्यहं शफरामिषम् ॥१२५॥ द्वितीयस्तु स चाण्डालो दृष्ट्वा तानेव धीवरान् । अचिन्तयद्धिगस्त्वेतान् क्रूयावान् प्राणियातिनः ॥१२६॥ सत्किमेवं स्थितस्येह दृष्टीरेषां मुखेर्मम । इति सम्मील्य नेत्रे स तत्रासीत्स्वात्मनि स्थितः ॥१२७॥ प्रमाञ्चानशनेनोभौ विपन्नौ तौ द्विजान्त्यजौ । द्विजस्तत्र श्वभिर्भुक्तः शीर्णो गङ्गाजलञ्जयत्र ॥१२८॥ ततोऽमृतात्मा केवर्त्तकुल एवात्र स द्विजः । अभ्यजायत तीर्थस्य गुणाज्जातिस्मरस्त्वभूत् ॥१२९॥ चण्डालोऽपि स तत्रैव गङ्गातीरे महीभुजः । गृहे जातिस्मरो जज्ञे धीरोऽनुपहतात्मकः ॥१३०॥ जातमोदश्च तयोरेव प्राग्जन्म स्मरतोर्द्वयोः । एकोऽनुतेपे दासः सन् राजा सन् मुमुदे परः ॥१३१॥ इति धर्मतरोर्मूलमपापं यस्य मानसम् । शुध्यं यस्य च तद्रूपं फल तस्य न संशयः ॥१३२॥ इत्येतदुक्त्वा देवीं तां तारावत्तां स भूपतिः । कलिङ्गदत्त पुनरप्युवावैनां प्रसङ्गतः ॥१३३॥