महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कच्चिदाचरितं पूर्वैर्नरदेव पितामहैः । वर्तसे वृत्तिमक्षुद्रां धर्मार्थसहितां त्रिषु ॥ १८ ॥ नरदेव! क्या तुम ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र—इन तीनों वर्णोंकी प्रजाओंके प्रति अपने पिता-पितामहोंद्वारा व्यवहारमें लायी हुई धर्मार्थयुक्त उत्तम एवं उदार वृत्तिका व्यवहार करते हो? ॥ १८ ॥
कच्चिदर्थेन वा धर्मं धर्मेणार्थमथापि वा । उभौ वा प्रीतिसारेण न कामेन प्रबाधसे ॥ १९ ॥ तुम धनके लोभमें पड़कर धर्मको, केवल धर्ममें ही संलग्न रहकर धनको अथवा आसक्ति ही जिसका बल है, उस कामभोगके सेवनद्वारा धर्म और अर्थ दोनोंको ही हानि तो नहीं पहुँचाते? ॥ १९ ॥
कच्चिदर्थं च धर्मं च कामं च जयतां वर । विभज्य काले कालज्ञः सदा वरद सेवसे ॥ २० ॥ विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ एवं वरदायक नरेश! तुम त्रिवर्गसेवनके उपयुक्त समयका ज्ञान रखते हो; अतः कालका विभाग करके नियत और उचित समयपर सदा धर्म, अर्थ एवं कामका सेवन करते हो न? ॥ २० ॥१-
कच्चिद् राजगुणैः षड्भिः सप्तोपायांस्तथानघ । बलाबलं तथा सम्यक् चतुर्दश परीक्षसे ॥ २१ ॥ निष्पाप युधिष्ठिर! क्या तुम राजोचित छः२ गुणोंके द्वारा सात३ उपायोंकी, अपने और शत्रुके बलाबलकी तथा देशपाल, दुर्गपाल आदि चौदह४ व्यक्तियोंकी भलीभाँति परख करते रहते हो? ॥ २१ ॥
कच्चिदात्मानमन्वीक्ष्य परांश्च जयतां वर । तथा संधाय कर्माणि अष्टौ भारत सेवसे ॥ २२ ॥ विजेताओंमें श्रेष्ठ भरतवंशी युधिष्ठिर! क्या तुम अपनी और शत्रुकी शक्तिको अच्छी तरह समझकर यदि शत्रु प्रबल हुआ तो उसके साथ संधि बनाये रखकर अपने धन और कोषकी वृद्धिके लिये आठ५ कर्मोंका सेवन करते हो? ॥ २२ ॥
कच्चित् प्रकृतयः सप्त न लुप्ता भरतर्षभ । आढ्यास्तथा व्यसनिनः स्वनुरक्ताश्च सर्वशः ॥ २३ ॥ भरतश्रेष्ठ! तुम्हारी मन्त्री आदि सात६ प्रकृतियाँ कहीं शत्रुओंमें मिल तो नहीं गयी हैं? तुम्हारे राज्यके धनीलोग बुरे व्यसनोंसे बचे रहकर सर्वथा तुमसे प्रेम करते हैं न? ॥ २३ ॥
कच्चिन्न कृतकैर्दूतैर्ये चाप्यपरिशङ्किताः । त्वत्तो वा तव चामात्यैर्भिद्यते मन्त्रितं तथा ॥ २४ ॥
जिनपर तुम्हें संदेह नहीं होता, ऐसे शत्रुके गुप्तचर कृत्रिम मित्र बनकर तुम्हारे मन्त्रियोंद्वारा तुम्हारी गुप्त मन्त्रणाको जानकर उसे प्रकाशित तो नहीं कर देते? ॥ २४ ॥
मित्रोदासीनशत्रूणां कच्चिद् वेत्सि चिकीर्षितम् ।
कच्चित् संधिं यथाकालं विग्रहं चोपसेवसे ॥ २५ ॥
क्या तुम मित्र, शत्रु और उदासीन लोगोंके सम्बन्धमें यह ज्ञान रखते हो कि वे कब क्या करना चाहते हैं? उपयुक्त समयका विचार करके ही संधि और विग्रहकी नीतिका सेवन करते हो न? ॥ २५ ॥
कच्चिद् वृत्तिमुदासीने मध्यमे चानुमन्यसे ।
कच्चिदात्मसमा वृद्धाः शुद्धाः सम्बोधनक्षमाः ॥ २६ ॥
कुलीनाश्चानुरक्ताश्च कृतास्ते वीर मन्त्रिणः ।
विजयो मन्त्रमूलो हि राज्ञो भवति भारत ॥ २७ ॥
क्या तुम्हें इस बातका अनुमान है कि उदासीन एवं मध्यम व्यक्तियोंके प्रति कैसा बर्ताव करना चाहिये? वीर! तुमने अपने स्वयंके समान विश्वसनीय वृद्ध, शुद्ध हृदयवाले, किसी बातको अच्छी तरह समझानेमें समर्थ, उत्तम कुलमें उत्पन्न और अपने प्रति अत्यन्त अनुराग रखनेवाले पुरुषोंको ही मन्त्री बना रखा है न? क्योंकि भारत! राजाकी विजयप्राप्तिका मूल कारण अच्छी मन्त्रणा (सलाह) और उसकी सुरक्षा ही है, (जो सुयोग्य मन्त्रीके अधीन है) ॥ २६-२७ ॥
कच्चित् संवृतमन्त्रैस्तैरमात्यैः शास्त्रकोविदैः ।
राष्ट्रं सुरक्षितं तात शत्रुभिर्न विलुप्यते ॥ २८ ॥
तात! मन्त्रको गुप्त रखनेवाले उन शास्त्रज्ञ सचिवोंद्वारा तुम्हारा राष्ट्र सुरक्षित तो है न? शत्रुओंद्वारा उसका नाश तो नहीं हो रहा है? ॥ २८ ॥
कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित् काले विबुद्ध्यसे ।
कच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तयस्यर्थमर्थवित् ॥ २९ ॥
तुम असमयमें ही निद्राके वशीभूत तो नहीं होते? समयपर जग जाते हो न? अर्थशास्त्रके जानकार तो तुम हो ही। रात्रिके पिछले भागमें जगकर अपने अर्थ (आवश्यक कर्तव्य एवं हित)-के विषयमें विचार तो करते हो न?* ॥ २९ ॥
कच्चिन्मन्त्रयसे नैकः कच्चिन्न बहुभिः सह ।
कच्चित् ते मन्त्रितो मन्त्रो न राष्ट्रं परिधावति ॥ ३० ॥
(कोई भी गुप्त मन्त्रणा दोसे चार कानोंतक ही गुप्त रहती है, छः कानोंमें जाते ही वह फूट जाती है, अतः मैं पूछता हूँ,) तुम किसी गूढ़ विषयपर अकेले ही तो विचार नहीं करते अथवा बहुत लोगोंके साथ बैठकर तो मन्त्रणा नहीं
करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी निश्चित की हुई गुप्त मन्त्रणा फूटकर शत्रुके राज्यतक फैल जाती हो? ।। ३० ।।
कच्चिदर्थान् विनिश्चित्य लघुमूलान् महोदयान् ।
क्षिप्रमारभसे कर्तुं न विघ्नयसि तादृशान् ।। ३१ ।।
धनकी वृद्धिके ऐसे उपायोंका निश्चय करके, जिनमें मूलधन तो कम लगाना पड़ता हो, किंतु वृद्धि अधिक होती हो, उनका शीघ्रतापूर्वक आरम्भ कर देते हो न? वैसे कार्योंमें अथवा वैसा कार्य करनेवाले लोगोंके मार्गमें तुम विघ्न तो नहीं डालते? ।। ३१ ।।
कच्चिन्न सर्वे कर्मान्ताः परोक्षास्ते विशङ्किताः ।
सर्वे वा पुनरुत्सृष्टाः संसृष्टं चात्र कारणम् ।। ३२ ।।
तुम्हारे राज्यके किसान—मजदूर आदि श्रमजीवी मनुष्य तुमसे अज्ञात तो नहीं हैं? उनके कार्य और गतिविधिपर तुम्हारी दृष्टि है न? वे तुम्हारे अविश्वासके पात्र तो नहीं हैं अथवा तुम उन्हें बार-बार छोड़ते और पुनः कामपर लेते तो नहीं रहते? क्योंकि महान् अभ्युदय या उन्नतिमें उन सबका स्नेहपूर्ण सहयोग ही कारण है। (क्योंकि चिरकालसे अनुगृहीत होनेपर ही वे ज्ञात, विश्वासपात्र और स्वामीके प्रति अनुरक्त होते हैं) ।। ३२ ।।
आप्तैरलुब्धैः क्रमिकैस्ते च कच्चिदनुष्ठिताः ।
कच्चिद् राजन् कृतान्येव कृतप्रायाणि वा पुनः ।। ३३ ।।
विदुस्ते वीर कर्माणि नानवाप्तानि कानिचित् ।
कृषि आदिके कार्य विश्वसनीय, लोभरहित और बड़े-बूढ़ोंके समयसे चले आनेवाले कार्यकर्त्ताओंद्वारा ही कराते हो न? राजन्! वीरशिरोमणे! क्या तुम्हारे कार्योंके सिद्ध हो जानेपर या सिद्धिके निकट पहुँच जानेपर ही लोग जान पाते हैं? सिद्ध होनेसे पहले ही तुम्हारे किन्हीं कार्योंको लोग जान तो नहीं लेते ।। ३३ ½ ।।
कच्चित् कारणिका धर्मे सर्वशास्त्रेषु कोविदाः ।
कारयन्ति कुमारंश्च योधमुख्यांश्च सर्वशः ।। ३४ ।।
तुम्हारे यहाँ जो शिक्षा देनेका काम करते हैं, वे धर्म एवं सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मज्ञ विद्वान् होकर ही राजकुमारों तथा मुख्य-मुख्य योद्धाओंको सब प्रकारकी आवश्यक शिक्षाएँ देते हैं न? ।। ३४ ।।
कच्चित् सहस्रैर्मूर्खाणामेकं क्रीणासि पण्डितम् ।
पण्डितो ह्यर्थकृच्छ्रेषु कुर्यान्निःश्रेयसं परम् ।। ३५ ।।
तुम हजारों मूर्खोंके बदले एक पण्डितको ही तो खरीदते हो न? अर्थात् आदरपूर्वक स्वीकार करते हो न? क्योंकि विद्वान् पुरुष ही अर्थसंकटके समय
महान् कल्याण कर सकता है ।। ३५ ।। कच्चिद् दुर्गाणि सर्वाणि धनधान्यायुधोदकैः । यन्त्रैश्च परिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरैः ।। ३६ ।। क्या तुम्हारे सभी दुर्ग (किले) धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, यन्त्र (मशीन), शिल्पी और धनुर्धर सैनिकोंसे भरे-पूरे रहते हैं? ।। ३६ ।। एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दान्तो विचक्षणः । राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम् ।। ३७ ।। यदि एक भी मन्त्री मेधावी, शौर्यसम्पन्न, संयमी और चतुर हो तो राजा अथवा राजकुमारको विपुल सम्पत्तिकी प्राप्ति करा देता है ।। ३७ ।। कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च । त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकैः ।। ३८ ।। क्या तुम शत्रुपक्षके अठारह³ और अपने पक्षके पंद्रह³ तीर्थोंकी तीन-तीन अज्ञात गुप्तचरोंद्वारा देख-भाल या जाँच-पड़ताल करते रहते हो? ।। ३८ ।। कच्चिद् द्विषामविदितः प्रतिपन्नश्च सर्वदा । नित्ययुक्तो रिपून् सर्वान् वीक्षसे रिपुसूदन ।। ३९ ।। शत्रुसूदन! तुम शत्रुओंसे अज्ञात, सतत सावधान और नित्य प्रयत्नशील रहकर अपने सम्पूर्ण शत्रुओंकी गतिविधिपर दृष्टि रखते हो न? ।। ३९ ।। कच्चिद् विनयसम्पन्नः कुलपुत्रो बहुश्रुतः । अनसूयुरनुप्रष्टा सत्कृतस्ते पुरोहितः ।। ४० ।। क्या तुम्हारे पुरोहित विनयशील, कुलीन, बहुज्ञ, विद्वान्, दोषदृष्टिसे रहित तथा शास्त्रचर्चामें कुशल हैं? क्या तुम उनका पूर्ण सत्कार करते हो? ।। ४० ।। कच्चिदग्निषु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजुः । हुतं च होष्यमाणं च काले वेदयते सदा ।। ४१ ।। तुमने अग्निहोत्रके लिये विधिज्ञ, बुद्धिमान् और सरल स्वभावके ब्राह्मणको नियुक्त किया है न? वह सदा किये हुए और किये जानेवाले हवनको तुम्हें ठीक समयपर सूचित कर देता है न? ।। ४१ ।। कच्चिदङ्गेषु निष्णातो ज्योतिषः प्रतिपादकः । उत्पातेषु च सर्वेषु दैवज्ञः कुशलस्तव ।। ४२ ।। क्या तुम्हारे यहाँ हस्त-पादादि अंगोंकी परीक्षामें निपुण, ग्रहोंकी वक्र तथा अतिचार आदि गतियों एवं उनके शुभाशुभ परिणाम आदिको बतानेवाला तथा दिव्य, भौम एवं शरीरसम्बन्धी सब प्रकारके उत्पातोंको पहलेसे ही जान लेनेमें कुशल ज्योतिषी है? ।। ४२ ।। कच्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमाः ।
जघन्याश्च जघन्येषु भृत्याः कर्मसु योजिताः ॥ ४३ ॥ तुमने प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंको उनके योग्य महान् कार्योंमें, मध्यम श्रेणीके कार्यकर्ताओंको मध्यम कार्योंमें तथा निम्न श्रेणीके सेवकोंको उनकी योग्यताके अनुसार छोटे कामोंमें ही लगा रखा है न? ॥ ४३ ॥
अमात्यानुपधातीतान् पितृपैतामहाञ्छुचीन् । श्रेष्ठाञ्छ्रेष्ठेषु कच्चित् त्वं नियोजयसि कर्मसु ॥ ४४ ॥ क्या तुम निश्छल, बाप-दादोंके क्रमसे चले आये हुए और पवित्र आचार-विचारवाले श्रेष्ठ मन्त्रियोंको सदा श्रेष्ठ कर्मोंमें लगाये रखते हो? ॥ ४४ ॥
कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्विजसे प्रजाः । राष्ट्रं तवानुशासन्ति मन्त्रिणो भरतर्षभ ॥ ४५ ॥ भरतश्रेष्ठ! कठोर दण्डके द्वारा तुम प्रजाजनोंको अत्यन्त उद्वेगमें तो नहीं डाल देते? मन्त्रीलोग तुम्हारे राज्यका न्यायपूर्वक पालन करते हैं न? ॥ ४५ ॥
कच्चित् त्वां नावजानन्ति याजकाः पतितं यथा । उग्रप्रतिग्रहीतारं कामयानमिव स्त्रियः ॥ ४६ ॥ जैसे पवित्र याजक पतित यजमानका और स्त्रियाँ कामचारी पुरुषका तिरस्कार कर देती हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरतापूर्वक अधिक कर लेनेके कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती? ॥ ४६ ॥
कच्चिद्धृष्टश्च शूरश्च मतिमान् धृतिमाञ्छुचिः । कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्षः सेनापतिस्तथा ॥ ४७ ॥ क्या तुम्हारा सेनापति हर्ष और उत्साहसे सम्पन्न, शूरवीर, बुद्धिमान्, धैर्यवान्, पवित्र, कुलीन, स्वामिभक्त तथा अपने कार्यमें कुशल है? ॥ ४७ ॥
कच्चिद् बलस्य ते मुख्याः सर्वयुद्धविशारदाः । धृष्टावदाता विक्रान्तास्त्वया सत्कृत्य मानिताः ॥ ४८ ॥ तुम्हारी सेनाके मुख्य-मुख्य दलपति सब प्रकारके युद्धोंमें चतुर, धृष्ट (निर्भय), निष्कपट और पराक्रमी हैं न? तुम उनका यथोचित सत्कार एवं सम्मान करते हो न? ॥ ४८ ॥
कच्चिद् बलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम् । सम्प्राप्तकाले दातव्यं ददासि न विकर्षसि ॥ ४९ ॥ अपनी सेनाके लिये यथोचित भोजन और वेतन ठीक समयपर दे देते हो न? जो उन्हें दिया जाना चाहिये, उसमें कमी या विलम्ब तो नहीं कर देते? ॥ ४९ ॥
कालातिक्रमणादेते भक्तवेतनयोर्भृताः । भर्तुः कुप्यन्ति यद्भृत्याः सोऽनर्थः सुमहान् स्मृतः ॥ ५० ॥
भोजन और वेतनमें अधिक विलम्ब होनेपर भृत्यगण अपने स्वामीपर कुपित हो जाते हैं और उनका वह कोप महान् अनर्थका कारण बताया गया है ।। ५० ।। कच्चित् सर्वेऽनुरक्तास्त्वां कुलपुत्राः प्रधानतः । कच्चित् प्राणांस्तवार्थेषु संत्यजन्ति सदा युधि ॥ ५१ ॥ क्या उत्तम कुलमें उत्पन्न मन्त्री आदि सभी प्रधान अधिकारी तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे युद्धमें तुम्हारे हितके लिये अपने प्राणोंतकका त्याग करनेको सदा तैयार रहते हैं? ।। ५१ ।। कच्चिन्नैको बहून्अर्थान् सर्वशः साम्परायिकान् । अनुशास्ति यथाकामं कामात्मा शासनातिगः ॥ ५२ ॥ तुम्हारे कर्मचारियोंमें कोई ऐसा तो नहीं है, जो अपनी इच्छाके अनुसार चलनेवाला और तुम्हारे शासनका उल्लङ्घन करनेवाला हो तथा युद्धके सारे साधनों एवं कार्योंको अकेला ही अपनी रुचिके अनुसार चला रहा हो? ।। ५२ ।। कच्चित् पुरुषकारेण पुरुषः कर्म शोभयन् । लभते मानमधिकं भूयो वा भक्तवेतनम् ॥ ५३ ॥ (तुम्हारे यहाँ काम करनेवाला) कोई पुरुष अपने पुरुषार्थसे जब किसी कार्यको अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता है, तब वह आपसे अधिक सम्मान अथवा अधिक भत्ता और वेतन पाता है न? ।। ५३ ।। कच्चिद् विद्याविनीतांश्च नराञ्ज्ञानविशारदान् । यथार्हं गुणतश्चैव दानेनाभ्युपपद्यसे ॥ ५४ ॥ क्या तुम विद्यासे विनयशील एवं ज्ञाननिपुण मनुष्योंको उनके गुणोंके अनुसार यथायोग्य धन आदि देकर उनका सम्मान करते हो? ।। ५४ ।। कच्चिद् दारान्मनुष्याणां तवार्थे मृत्युमीयुषाम् । व्यसनं चाभ्युपेतानां बिभर्षि भरतर्षभ ॥ ५५ ॥ भरतश्रेष्ठ! जो लोग तुम्हारे हितके लिये सहर्ष मृत्युका वरण कर लेते हैं अथवा भारी संकटमें पड़ जाते हैं, उनके बाल-बच्चोंकी रक्षा तुम करते हो न? ।। ५५ ।। कच्चिद् भयादुपगतं क्षीणं वा रिपुमागतम् । युद्धे वा विजितं पार्थ पुत्रवत् परिरक्षसि ॥ ५६ ॥ कुन्तीनन्दन! जो भयसे अथवा अपनी धन-सम्पत्तिका नाश होनेसे तुम्हारी शरणमें आया हो या युद्धमें तुमसे परास्त हो गया हो, ऐसे शत्रुको तुम पुत्रके समान पालन करते हो या नहीं? ।। ५६ ।। कच्चित् त्वमेव सर्वस्याः पृथिव्याः पृथिवीपते ।
समश्न्रानभिशङ्क्यश्च यथा माता यथा पिता ॥ ५७ ॥ पृथ्वीपते! क्या समस्त भूमण्डलकी प्रजा तुम्हें ही समदर्शी एवं माता-पिताके समान विश्वसनीय मानती है? ॥ ५७ ॥ कच्चिद् व्यसनिनं शत्रुं निशम्य भरतर्षभ । अभियासि जवेनैव समीक्ष्य त्रिविधं बलम् ॥ ५८ ॥ भरतकुलभूषण! क्या तुम अपने शत्रुको (स्त्री-द्यूत आदि) दुर्व्यसनोंमें फँसा हुआ सुनकर उसके त्रिविध बल (मन्त्र, कोष एवं भृत्य-बल अथवा प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति एवं उत्साहशक्ति)-पर विचार करके यदि वह दुर्बल हो तो उसके ऊपर बड़े वेगसे आक्रमण कर देते हो? ॥ ५८ ॥ यात्रामारभसे दिष्ट्या प्राप्तकालमरिंदम । पार्ष्णिमूलं च विज्ञाय व्यवसायं पराजयम् । बलस्य च महाराज दत्त्वा वेतनमग्रतः ॥ ५९ ॥ शत्रुदमन! क्या तुम पार्ष्णिग्राह आदि बारह* व्यक्तियोंके मण्डल (समुदाय)-को जानकर अपने कर्तव्यका³ निश्चय करके और पराजयमूलक व्यसनोंका³ अपने पक्षमें अभाव तथा शत्रुपक्षमें आधिक्य देखकर उचित अवसर आनेपर दैवका भरोसा करके अपने सैनिकोंको अग्रिम वेतन देकर शत्रुपर चढ़ाई कर देते हो? ॥ ५९ ॥ कच्चिच्च बलमुख्येभ्यः परराष्ट्रे परंतप । उपच्छन्नानि रत्नानि प्रयच्छसि यथार्हतः ॥ ६० ॥ परंतप! शत्रुके राज्यमें जो प्रधान-प्रधान योद्धा हैं, उन्हें छिपे-छिपे यथायोग्य रत्न आदि भेंट करते रहते हो या नहीं? ॥ ६० ॥ कच्चिदात्मानमेवाग्रे विजित्य विजितेन्द्रियः । परान् जिगीषसे पार्थ प्रमत्तानजितेन्द्रियान् ॥ ६१ ॥ कुन्तीनन्दन! क्या तुम पहले अपनी इन्द्रियों और मनको जीतकर ही प्रमादमें पड़े हुए अजितेन्द्रिय शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा करते हो? ॥ ६१ ॥ कच्चित् ते यास्यतः शत्रून् पूर्वं यान्ति स्वनुष्ठिताः । साम दानं च भेदश्च दण्डश्च विधिवद् गुणाः ॥ ६२ ॥ शत्रुओंपर तुम्हारे आक्रमण करनेसे पहले अच्छी तरह प्रयोगमें लाये हुए तुम्हारे साम, दान, भेद और दण्ड—ये चार गुण विधिपूर्वक उन शत्रुओं तक पहुँच जाते हैं न? (क्योंकि शत्रुओंको वशमें करनेके लिये इनका प्रयोग आवश्यक है।) ॥ ६२ ॥ कच्चिन्मूलं दृढं कृत्वा परान् यासि विशाम्पते ।
तांश्च विक्रमेसे जेतुं जित्वा च परिरक्षसि ॥ ६३ ॥ महाराज! तुम अपने राज्यकी नींवको दृढ़ करके शत्रुओंपर धावा करते हो न? उन शत्रुओंको जीतनेके लिये पूरा पराक्रम प्रकट करते हो न? और उन्हें जीतकर उनकी पूर्णरूपसे रक्षा तो करते रहते हो न? ॥ ६३ ॥
कच्चिदष्टाङ्गसंयुक्ता चतुर्विधबला चमूः । बलमुख्यैः सुनीता ते द्विषतां प्रतिवर्धिनी ॥ ६४ ॥ क्या धनरक्षक, द्रव्यसंग्राहक, चिकित्सक, गुप्तचर, पाचक, सेवक, लेखक और प्रहरी—इन आठ अंगों और हाथी, घोड़े, रथ एवं पैदल—इन चार³ प्रकारके बलोंसे युक्त तुम्हारी सेना सुयोग्य सेनापतियोंद्वारा अच्छी तरह संचालित होकर शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ होती है? ॥
कच्चिल्लवं च मुष्टिं च परराष्ट्रे परंतप । अविहाय महाराज निहंसि समरे रिपून् ॥ ६५ ॥ शत्रुओंको संतप्त करनेवाले महाराज! तुम शत्रुओंके राज्यमें अनाज काटने और दुर्भिक्षके समयकी उपेक्षा न करके रणभूमिमें शत्रुओंको मारते हो न? ॥ ६५ ॥
कच्चित् स्वपरराष्ट्रेषु बहवोऽधिकृतास्तव । अर्थान् समधितिष्ठन्ति रक्षन्ति च परस्परम् ॥ ६६ ॥ क्या अपने और शत्रुके राष्ट्रोंमें तुम्हारे बहुत-से अधिकारी स्थान-स्थानमें घूम-फिरकर प्रजाको वशमें करने एवं कर लेने आदि प्रयोजनोंको सिद्ध करते हैं और परस्पर मिलकर राष्ट्र एवं अपने पक्षके लोगोंकी रक्षामें लगे रहते हैं? ॥ ६६ ॥
कच्चिदभ्यवहार्याणि गात्रसंस्पर्शनानि च । घ्रेयाणि च महाराज रक्षन्त्यनुमतास्तव ॥ ६७ ॥ महाराज! तुम्हारे खाद्य पदार्थ, शरीरमें धारण करनेके वस्त्र आदि तथा सूँघनेके उपयोगमें आनेवाले सुगन्धित द्रव्योंकी रक्षा विश्वस्त पुरुष ही करते हैं न? ॥ ६७ ॥
कच्चित् कोषश्च कोष्ठं च वाहनं द्वारमायुधम् । आयश्च कृतकल्याणैस्तव भक्तैरनुष्ठितः ॥ ६८ ॥ तुम्हारे कल्याणके लिये सदा प्रयत्नशील रहनेवाले, स्वामिभक्त मनुष्योंद्वारा ही तुम्हारे धन-भण्डार, अन्न-भण्डार, वाहन, प्रधान द्वार, अस्त्र-शस्त्र तथा आयके साधनोंकी रक्षा एवं देख-भाल की जाती है न? ॥ ६८ ॥
कच्चिदाभ्यन्तरेभ्यश्च बाह्येभ्यश्च विशाम्पते । रक्षस्यात्मानमेवाग्रे तांश्च स्वेभ्यो मिथश्च तान् ॥ ६९ ॥
प्रजापालक नरेश! क्या तुम रसोइये आदि भीतरी सेवकों तथा सेनापति आदि बाह्य सेवकोंद्वारा भी पहले अपनी ही रक्षा करते हो, फिर आत्मीयजनोंद्वारा एवं परस्पर एक-दूसरेसे उन सबकी रक्षापर भी ध्यान देते हो? ।। ६९ ।।
कच्चिन्न पाने द्यूते वा क्रीडासु प्रमदासु च ।
प्रतिजानन्ति पूर्वाह्ने व्ययं व्यसनजं तव ।। ७० ।।
तुम्हारे सेवक पूर्वाह्नकालमें (जो कि धर्माचरणका समय है) तुमसे मद्यपान, द्यूत, क्रीड़ा और युवती स्त्री आदि दुर्व्यसनोंमें तुम्हारा समय और धनको व्यर्थ नष्ट करनेके लिये प्रस्ताव तो नहीं करते? ।। ७० ।।
कच्चिदायस्य चार्धेन चतुर्भागेन वा पुनः ।
पादभागैस्त्रिभिर्वापि व्ययः संशुद्ध्यते तव ।। ७१ ।।
क्या तुम्हारी आयके एक चौथाई या आधे अथवा तीन चौथाई भागसे तुम्हारा सारा खर्च चल जाता है? ।। ७१ ।।
कच्चिज्ज्ञातीन् गुरून् वृद्धान् वणिजः शिल्पिनः श्रितान् ।
अभीक्ष्णमनुगृह्णासि धनधान्येन दुर्गतान् ।। ७२ ।।
तुम अपने आश्रित कुटुम्बके लोगों, गुरुजनों, बड़े-बूढ़ों, व्यापारियों, शिल्पियों तथा दीन-दुखियोंको धन-धान्य देकर उनपर सदा अनुग्रह करते रहते हो न? ।। ७२ ।।
कच्चिच्चायव्यये युक्ताः सर्वे गणकलेखकाः ।
अनुतिष्ठन्ति पूर्वाह्ने नित्यमायं व्ययं तव ।। ७३ ।।
तुम्हारी आमदनी और खर्चको लिखने और जोड़नेके काममें लगाये हुए सभी लेखक और गणक प्रतिदिन पूर्वाह्नकालमें तुम्हारे सामने अपना हिसाब पेश करते हैं न? ।। ७३ ।।
कच्चिदर्थेषु सम्प्रौढान् हितकामाननुप्रियान् ।
नापकर्षसि कर्मभ्यः पूर्वमप्राप्य किल्बिषम् ।। ७४ ।।
किन्हीं कार्योंमें नियुक्त किये हुए प्रौढ़, हितैषी एवं प्रिय कर्मचारियोंको पहले उनके किसी अपराधको जाँच किये बिना तुम कामसे अलग तो नहीं कर देते हो? ।। ७४ ।।
कच्चिद् विदित्वा पुरुषानुत्तमाधममध्यमान् ।
त्वं कर्मस्वनुरूपेषु नियोजयसि भारत ।। ७५ ।।
भारत! तुम उत्तम, मध्यम और अधम श्रेणीके मनुष्योंको पहचानकर उन्हें उनके अनुरूप कार्योंमें ही लगाते हो न? ।। ७५ ।।
कच्चिन्न लुब्धाश्चौरा वा वैरिणो वा विशाम्पते ।
अप्राप्तव्यवहारा वा तव कर्मस्वनुष्ठिताः ।। ७६ ।।
राजन्! तुमने ऐसे लोगोंको तो अपने कामोंपर नहीं लगा रखा है? जो लोभी, चोर, शत्रु अथवा व्यावहारिक अनुभवसे सर्वथा शून्य हों? ।। ७६ ।।
कच्चिन्न चौरैर्लुब्धैर्वा कुमारैः स्त्रीबलेन वा ।
त्वया वा पीड्यते राष्ट्रं कच्चित् तुष्टाः कृषीवलाः ।। ७७ ।।
चोरों, लोभियों, राजकुमारों या राजकुलकी स्त्रियोंद्वारा अथवा स्वयं तुमसे ही तुम्हारे राष्ट्रको पीड़ा तो नहीं पहुँच रही है? क्या तुम्हारे राज्यके किसान संतुष्ट हैं? ।। ७७ ।।
कच्चिद् राष्ट्रे तडागानि पूर्णानि च बृहन्ति च ।
भागशो विनिविष्टानि न कृषिर्देवमातृका ।। ७८ ।।
क्या तुम्हारे राज्यके सभी भागोंमें जलसे भरे हुए बड़े-बड़े तालाब बनवाये गये हैं? केवल वर्षाके पानीके भरोसे ही तो खेती नहीं होती है? ।। ७८ ।।
कच्चिन्न भक्तं बीजं च कर्षकस्यावसीदति ।
प्रत्येकं च शतं वृद्ध्या ददास्यृणमनुग्रहम् ।। ७९ ।।
तुम्हारे राज्यके किसानका अन्न या बीज तो नष्ट नहीं होता? क्या तुम प्रत्येक किसानपर अनुग्रह करके उसे एक रुपया सैकड़े ब्याजपर ऋण देते हो? ।। ७९ ।।
कच्चित् स्वनुष्ठिता तात वार्ता ते साधुभिर्जनैः ।
वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते ।। ८० ।।
तात! तुम्हारे राष्ट्रमें अच्छे पुरुषोंद्वारा वार्ता—कृषि, गोरक्षा तथा व्यापारका काम अच्छी तरह किया जाता है न? क्योंकि उपर्युक्त वार्तावृत्तिपर अवलम्बित रहनेवाले लोग ही सुखपूर्वक उन्नति करते हैं ।। ८० ।।
कच्चिच्छूराः कृतप्रज्ञाः पञ्च पञ्च स्वनुष्ठिताः ।
क्षेमं कुर्वन्ति संहत्य राजञ्जनपदे तव ।। ८१ ।।
राजन्! क्या तुम्हारे जनपदके प्रत्येक गाँवमें शूरवीर, बुद्धिमान् और कार्यकुशल पाँच-पाँच पंच मिलकर सुचारुरूपसे जनहितके कार्य करते हुए सबका कल्याण करते हैं? ।। ८१ ।।
कच्चिन्नगरगुप्त्यर्थं ग्रामा नगरवत् कृताः ।
ग्रामवच्च कृताः प्रान्तास्ते च सर्वे त्वदर्पणाः ।। ८२ ।।
क्या नगरोंकी रक्षाके लिये गाँवोंको भी नगरके ही समान बहुत-से शूरवीरोंद्वारा सुरक्षित कर दिया गया है? सीमावर्ती गाँवोंको भी अन्य गाँवोंकी भाँति सभी सुविधाएँ दी गयी हैं? तथा क्या वे सभी प्रान्त, ग्राम और नगर तुम्हें (कर-रूपमें एकत्र किया हुआ) धन समर्पित करते हैं?³ ।। ८२ ।।
कच्चिद् बलेनानुगताः समानि विषमाणि च ।
पुराणि चौरान् निघ्नन्तश्चरन्ति विषये तव ॥ ८३ ॥
क्या तुम्हारे राज्यमें कुछ रक्षक पुरुष सेना साथ लेकर चोर-डाकुओंका दमन करते हुए सुगम एवं दुर्गम नगरोंमें विचरते रहते हैं? ॥ ८३ ॥
कच्चित् स्त्रियः सान्त्वयसि कच्चित् ताश्च सुरक्षिताः ।
कच्चिन्न श्रद्दधास्यासां कच्चिद् गुह्यं न भाषसे ॥ ८४ ॥
तुम स्त्रियोंको सान्त्वना देकर संतुष्ट रखते हो न? क्या वे तुम्हारे यहाँ पूर्णरूपसे सुरक्षित हैं? तुम उनपर पूरा विश्वास तो नहीं करते? और विश्वास करके उन्हें कोई गुप्त बात तो नहीं बता देते? ॥ ८४ ॥
कच्चिदात्ययिकं श्रुत्वा तदर्थमनुचिन्त्य च ।
प्रियाण्यनुभवञ्छेषे न त्वमन्तःपुरे नृप ॥ ८५ ॥
राजन्! तुम कोई अमंगलसूचक समाचार सुनकर और उसके विषयमें बार-बार विचार करके भी प्रिय भोग-विलासोंका आनन्द लेते हुए अन्तःपुरमें ही सोते तो नहीं रह जाते? ॥ ८५ ॥
कच्चिद् द्वौ प्रथमौ यामौ रात्रेः सुप्त्वा विशाम्पते ।
संचिन्तयसि धर्मार्थौ याम उत्थाय पश्चिमे ॥ ८६ ॥
प्रजानाथ! क्या तुम रात्रिके (पहले पहरके बाद) जो प्रथम दो (दूसरे-तीसरे) याम हैं, उन्हींमें सोकर अन्तिम पहरमें उठकर बैठ जाते और धर्म एवं अर्थका चिन्तन करते हो? ॥ ८६ ॥
कच्चिदर्थयसे नित्यं मनुष्यान् समलंकृतः ।
उत्थाय काले कालज्ञैः सह पाण्डव मन्त्रिभिः ॥ ८७ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम प्रतिदिन समयपर उठकर स्नान आदिके पश्चात् वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो देश-कालके ज्ञाता मन्त्रियोंके साथ बैठकर (प्रार्थी या दर्शनार्थी) मनुष्योंकी इच्छा पूर्ण करते हो न? ॥ ८७ ॥
कच्चिद् रक्ताम्बरधराः खड्गहस्ताः स्वलंकृताः ।
उपासते त्वामभितो रक्षणार्थमरिंदम ॥ ८८ ॥
शत्रुदमन! क्या लाल वस्त्र धारण करके अलंकारोंसे अलंकृत हुए योद्धा अपने हाथोंमें तलवार लेकर तुम्हारी रक्षाके लिये सब ओरसे सेवामें उपस्थित रहते हैं? ॥ ८८ ॥
कच्चिद् दण्ड्येषु यमवत्पूज्येषु च विशाम्पते ।
परीक्ष्य वर्तसे सम्यगप्रियेषु प्रियेषु च ॥ ८९ ॥
महाराज! क्या तुम दण्डनीय अपराधियोंके प्रति यमराज और पूजनीय पुरुषोंके प्रति धर्मराजका-सा बर्ताव करते हो? प्रिय एवं अप्रिय व्यक्तियोंकी
भलीभाँति परीक्षा करके ही व्यवहार करते हो न? ।। ८९ ।। कच्चिच्छारीरमाबाधमौषधैर्नियमेन वा । मानसं वृद्धसेवाभिः सदा पार्थपकर्षसि ।। ९० ।। कुन्तीकुमार! क्या तुम ओषधिसेवन या पथ्य-भोजन आदि नियमोंके पालनद्वारा अपने शारीरिक कष्टको तथा वृद्ध पुरुषोंकी सेवारूप सत्संगद्वारा मानसिक संतापको सदा दूर करते रहते हो? ।। ९० ।। कच्चिद् वैद्याश्चिकित्सायामष्टाङ्गायां विशारदाः । सुहृदश्चानुरक्ताश्च शरीरे ते हिताः सदा ।। ९१ ।। तुम्हारे वैद्य अष्टांगचिकित्सामें ३ कुशल, हितैषी, प्रेमी एवं तुम्हारे शरीरको स्वस्थ रखनेके प्रयत्नमें सदा संलग्न रहनेवाले हैं न? ।। ९१ ।। कच्चिन्न लोभान्मोहाद् वा मानाद् वापि विशाम्पते । अर्थिप्रत्यर्थिनः प्राप्तान् न पश्यसि कथंचन ।। ९२ ।। नरेश्वर! कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम अपने यहाँ आये हुए अर्थी (याचक) और प्रत्यर्थी (राजाकी ओरसे मिली हुई वृत्ति बंद हो जानेसे दुःखी हो पुनः उसीको पानेके लिये प्रार्थी)-की ओर लोभ, मोह अथवा अभिमानवश किसी प्रकार आँख उठाकर देखतेतक नहीं? ।। ९२ ।। कच्चिन्न लोभान्मोहाद् वा विश्रम्भात् प्रणयेन वा । आश्रितानां मनुष्याणां वृत्तिं त्वं संरुणत्सि वै ।। ९३ ।। कहीं अपने आश्रितजनोंकी जीविकावृत्तिको तुम लोभ, मोह, आत्मविश्वास अथवा आसक्तिसे बंद तो नहीं कर देते? ।। ९३ ।। कच्चित् पौरा न सहिता ये च ते राष्ट्रवासिन । त्वया सह विरुध्यन्ते परैः क्रीताः कथंचन ।। ९४ ।। तुम्हारे नगर तथा राष्ट्रके निवासी मनुष्य संगठित होकर तुम्हारे साथ विरोध तो नहीं करते? शत्रुओंने उन्हें किसी तरह घूस देकर खरीद तो नहीं लिया है? ।। ९४ ।। कच्चिन्न दुर्बलः शत्रुुर्बलेन परिपीडितः । मन्त्रेण बलवान् कश्चिदुभाभ्यां च कथंचन ।। ९५ ।। कोई दुर्बल शत्रु जो तुम्हारे द्वारा पहले बलपूर्वक पीड़ित किया गया (किंतु मारा नहीं गया), अब मन्त्रणाशक्तिसे अथवा मन्त्रणा और सेना दोनों ही शक्तियोंसे किसी तरह बलवान् होकर सिर तो नहीं उठा रहा है? ।। ९५ ।। कच्चित् सर्वेऽनुरक्तास्त्वां भूमिपालाः प्रधानतः । कच्चित् प्राणांस्त्वदर्थेषु संत्यजन्ति त्वयाऽऽदृताः ।। ९६ ।।
क्या सभी मुख्य-मुख्य भूपाल तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे तुम्हारे द्वारा सम्मान पाकर तुम्हारे लिये अपने प्राणोंकी बलि दे सकते हैं? ॥ ९६ ॥ कच्चित् ते सर्वविद्यासु गुणतोऽर्चा प्रवर्तते । ब्राह्मणानां च साधूनां तव नैःश्रेयसी शुभा । दक्षिणास्त्वं ददास्येषां नित्यं स्वर्गापवर्गदाः ॥ ९७ ॥ क्या तुम्हारे मनमें सभी विद्याओंके प्रति गुणके अनुसार आदरका भाव है? क्या तुम ब्राह्मणों तथा साधु-संतोंकी सेवा-पूजा करते हो? जो तुम्हारे लिये शुभ एवं कल्याणकारिणी है। इन ब्राह्मणोंको तुम सदा दक्षिणा तो देते रहते हो न? क्योंकि वह स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली है ॥ ९७ ॥ कच्चिद् धर्मे त्रयीमूले पूर्वैराचरिते जनैः । यतमानस्तथा कर्तुं तस्मिन् कर्मणि वर्तसे ॥ ९८ ॥ तीनों वेद ही जिसके मूल हैं और पूर्वपुरुषोंने जिसका आचरण किया है, उस धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये तुम अपने पूर्वजोंकी ही भाँति प्रयत्नशील तो रहते हो? धर्मानुकूल कर्ममें ही तुम्हारी प्रवृत्ति तो रहती है? ॥ ९८ ॥ कच्चित्तव गृहेऽन्नानि स्वादून्यश्नन्ति वै द्विजाः । गुणवन्ति गुणोपेतास्तवाध्यक्षं सदक्षिणम् ॥ ९९ ॥ क्या तुम्हारे महलमें तुम्हारी आँखोंके सामने गुणवान् ब्राह्मण स्वादिष्ट और गुणकारक अन्न भोजन करते हैं? और भोजनके पश्चात् उन्हें दक्षिणा दी जाती है? ॥ ९९ ॥ कच्चित् क्रतूनकचित्तो वाजपेयांश्च सर्वशः । पुण्डरीकांश्च कात्स्न्येन यतसे कर्तुमात्मवान् ॥ १०० ॥ अपने मनको वशमें करके एकाग्रचित्त हो वाजपेय और पुण्डरीक आदि सभी यज्ञ-यागोंका तुम पूर्णरूपसे अनुष्ठान करनेका प्रयत्न तो करते हो न? ॥ १०० ॥ कच्चिज्ज्ञातीन् गुरून् वृद्धान् दैवतांस्तापसानपि । चैत्यांश्च वृक्षान् कल्याणान् ब्राह्मणांश्च नमस्यसि ॥ १०१ ॥ जाति-भाई, गुरुजन, वृद्ध पुरुष, देवता, तपस्वी, चैत्यवृक्ष (पीपल) आदि तथा कल्याणकारी ब्राह्मणोंको नमस्कार तो करते हो न? ॥ १०१ ॥ कच्चिच्छोको न मन्युर्वा त्वया प्रोत्पाद्यतेऽनघ । अपि मङ्गलहस्तश्च जनः पार्श्वे नु तिष्ठति ॥ १०२ ॥ निष्पाप नरेश! तुम किसीके मनमें शोक या क्रोध तो नहीं पैदा करते? तुम्हारे पास कोई मनुष्य हाथमें मंगलसामग्री लेकर सदा उपस्थित रहता है न? ॥ १०२ ॥
कच्चिदेषा च ते बुद्धिवृत्तिरेषा च तेऽनघ । आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थदर्शिनी ॥ १०३ ॥ पापरहित युधिष्ठिर! अबतक जैसा बतलाया गया है, उसके अनुसार ही तुम्हारी बुद्धि और वृत्ति (विचार और आचार) हैं न? ऐसी धर्मानुकूल बुद्धि और वृत्ति आयु तथा यशको बढ़ानेवाली एवं धर्म, अर्थ तथा कामको पूर्ण करनेवाली है ॥ १०३ ॥
एतया वर्तमानस्य बुद्ध्या राष्ट्रं न सीदति । विजित्य च महीं राजा सोऽत्यन्तसुखमेधते ॥ १०४ ॥ जो ऐसी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करता है, उसका राष्ट्र कभी संकटमें नहीं पड़ता। वह राजा सारी पृथ्वीको जीतकर बड़े सुखसे दिनोदिन उन्नति करता है ॥ १०४ ॥
कच्चिदार्यो विशुद्धात्मा क्षारितश्चौरकर्मणि । अदृष्टशास्त्रकुशलैर्न लोभाद् वध्यते शुचिः ॥ १०५ ॥ कहीं ऐसा तो नहीं होता कि शास्त्रकुशल विद्वानोंका संग न करनेवाले तुम्हारे मूर्ख मन्त्रियोंने किसी विशुद्ध हृदयवाले श्रेष्ठ एवं पवित्र पुरुषपर चोरीका अपराध लगाकर उसका सारा धन हड़प लिया हो? और फिर अधिक धनके लोभसे वे उसे प्राणदण्ड देते हों? ॥ १०५ ॥
दृष्टो गृहीतस्तत्कारी तज्ज्ञैर्दृष्टः सकारणः । कच्चिन्न मुच्यते स्तेनो द्रव्यलोभान्नर्षभ ॥ १०६ ॥ नरश्रेष्ठ! कोई ऐसा दुष्ट चोर जो चोरी करते समय गृहरक्षकोंद्वारा देख लिया गया और चोरीके मालसहित पकड़ लिया गया हो, धनके लोभसे छोड़ तो नहीं दिया जाता? ॥ १०६ ॥
उत्पन्नान् कच्चिदाढ्यस्य दरिद्रस्य च भारत । अर्थान् न मिथ्या पश्यन्ति तवामात्या हृता जनैः ॥ १०७ ॥ भारत! तुम्हारे मन्त्री चुगली करनेवाले लोगोंके बहकावेमें आकर विवेकशून्य हो किसी धनीके या दरिद्रके थोड़े समयमें ही अचानक पैदा हुए अधिक धनको मिथ्यादृष्टिसे तो नहीं देखते? या उनके बढ़े हुए धनको चोरी आदिसे लाया हुआ तो नहीं मान लेते? ॥ १०७ ॥
नास्तिक्यमनृतं क्रोधं प्रमादं दीर्घसूत्रताम् । अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पञ्चवृत्तिताम् । एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च चिन्तनम् ॥ १०८ ॥ निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम् । मङ्गलाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः ॥ १०९ ॥
कच्चित्त्वं वर्जयस्येतान् राजदोषांश्चतुर्दश ।
प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूलापि पार्थिवाः ॥ ११० ॥
युधिष्ठिर! तुम नास्तिकता, झूठ, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियोंका संग न करना, आलस्य, पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति, प्रजाजनोंपर अकेले ही विचार करना, अर्थशास्त्रको न जाननेवाले मूर्खोंके साथ विचार-विमर्श, निश्चित कार्योंके आरम्भ करनेमें विलम्ब या टालमटोल, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखना, मांगलिक उत्सव आदि न करना तथा एक साथ ही सभी शत्रुओंपर चढ़ाई कर देना—इन राजसम्बन्धी चौदह दोषोंका त्याग तो करते हो न? क्योंकि जिनके राज्यकी जड़ जम गयी है, ऐसे राजा भी इन दोषोंके कारण नष्ट हो जाते हैं ॥ १०८—११० ॥
कच्चित् ते सफला वेदाः कच्चित् ते सफलं धनम् ।
कच्चित् ते सफला दाराः कच्चित् ते सफलं श्रुतम् ॥ १११ ॥
क्या तुम्हारे वेद सफल हैं? क्या तुम्हारा धन सफल है? क्या तुम्हारी स्त्री सफल है? और क्या तुम्हारा शास्त्रज्ञान सफल है? ॥ १११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कथं वै सफला वेदाः कथं वै सफलं धनम् ।
कथं वै सफला दाराः कथं वै सफलं श्रुतम् ॥ ११२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— देवर्षे! वेद कैसे सफल होते हैं, धनकी सफलता कैसे होती है? स्त्रीकी सफलता कैसे मानी गयी है तथा शास्त्रज्ञान कैसे सफल होता है? ॥ ११२ ॥
नारद उवाच
अग्निहोत्रफला वेदा दत्तभुक्तफलं धनम् ।
रतिपुत्रफला दाराः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ॥ ११३ ॥
नारदजीने कहा— राजन्! वेदोंकी सफलता अग्निहोत्रसे होती है, दान और भोगसे ही धन सफल होता है, स्त्रीका फल है—रति और पुत्रकी प्राप्ति तथा शास्त्रज्ञानका फल है, शील और सदाचार ॥ ११३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतदाख्याय स मुनिर्नारदो वै महातपाः ।
पप्रच्छानन्तरमिदं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥ ११४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! यह कहकर महातपस्वी नारद मुनिने धर्मात्मा युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया ॥ ११४ ॥
नारद उवाच
कच्चिदभ्यागता दूराद् वणिजो लाभकारणात् ।
यथोक्तमवहार्यन्ते शुल्कं शुल्कोपजीविभिः ॥ ११५ ॥
नारदजीने पूछा— राजन्! कर वसूलनेका काम करनेवाले तुम्हारे कर्मचारीलोग दूरसे लाभ उठानेके लिये आये हुए व्यापारियोंसे ठीक-ठीक कर वसूल करते हैं न? (अधिक तो नहीं लेते?) ॥ ११५ ॥
कच्चित् ते पुरुषा राजन् पुरे राष्ट्रे च मानिताः ।
उपानयन्ति पण्यानि उपधाभिरवञ्चिताः ॥ ११६ ॥
महाराज! वे व्यापारीलोग आपके नगर और राष्ट्रमें सम्मानित हो बिक्रीके लिये उपयोगी सामान लाते हैं न! उन्हें तुम्हारे कर्मचारी छलसे ठगते तो नहीं? ॥ ११६ ॥
कच्चिच्छृणोषि वृद्धानां धर्मार्थसहिता गिरः ।
नित्यमर्थविदां तात यथाधर्मार्थदर्शिनाम् ॥ ११७ ॥
तात! तुम सदा धर्म और अर्थके ज्ञाता एवं अर्थशास्त्रके पूरे पण्डित बड़े-बूढ़े लोगोंकी धर्म और अर्थसे युक्त बातें सुनते रहते हो न? ॥ ११७ ॥
कच्चित् ते कृषितन्त्रेषु गोषु पुष्पफलेषु च ।
धर्मार्थं च द्विजातिभ्यो दीयेते मधुसर्पिषी ॥ ११८ ॥
क्या तुम्हारे यहाँ खेतीसे उत्पन्न होनेवाले अन्न तथा फल-फूल एवं गौओंसे प्राप्त होनेवाले दूध, घी आदिमेंसे मधु (अन्न) और घृत आदि धर्मके लिये ब्राह्मणोंको दिये जाते हैं? ॥ ११८ ॥
द्रव्योपकरणं किंचित् सर्वदा सर्वशिल्पिनाम् ।
चातुर्मास्यावरं सम्यङ् नियतं सम्प्रयच्छसि ॥ ११९ ॥
नरेश्वर! क्या तुम सदा नियमसे सभी शिल्पियोंको व्यवस्थापूर्वक एक साथ इतनी वस्तु-निर्माणकी सामग्री दे देते हो, जो कम-से-कम चौमासे भर चल सके ॥ ११९ ॥
कच्चित् कृतं विजानीषे कर्तारं च प्रशंससि ।
सतां मध्ये महाराज सत्करोषि च पूजयन् ॥ १२० ॥
महाराज! क्या तुम्हें किसीके किये हुए उपकारका पता चलता है? क्या तुम उस उपकारीकी प्रशंसा करते हो और साधु पुरुषोंसे भरी हुई सभाके बीच उस उपकारीके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उसका आदर-सत्कार करते हो? ॥ १२० ॥
कच्चित् सूत्राणि सर्वाणि गृह्णासि भरतर्षभ ।
हस्तिसूत्राश्वसूत्राणि रथसूत्राणि वा विभो ॥ १२१ ॥
भरतश्रेष्ठ! क्या तुम संक्षेपसे सिद्धान्तका प्रति-पादन करनेवाले सभी सूत्रग्रन्थ—हस्तिसूत्र, अश्वसूत्र एवं रथसूत्र आदिका संग्रह (पठन एवं अभ्यास) करते रहते हो? ॥ १२१ ॥
कच्चिदभ्यस्यते सम्यग् गृहे ते भरतर्षभ ।
धनुर्वेदस्य सूत्रं वै यन्त्रसूत्रं च नागरम् ॥ १२२ ॥
भरतकुलभूषण! क्या तुम्हारे घरपर धनुर्वेदसूत्र, यन्त्रसूत्र³, और नागरिक³ सूत्रका अच्छी तरह अभ्यास किया जाता है? ॥ १२२ ॥
कच्चिदस्त्राणि सर्वाणि ब्रह्मदण्डश्च तेऽनघ ।
विषयोगास्तथा सर्वे विदिताः शत्रुनाशनाः ॥ १२३ ॥
निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके अस्त्र (जो मन्त्रबलसे प्रयुक्त होते हैं), वेदोक्त दण्ड-विधान तथा शत्रुओंका नाश करनेवाले सब प्रकारके विषप्रयोग ज्ञात हैं न? ॥ १२३ ॥
कच्चिदग्निभयाच्चैव सर्वं व्यालभयात् तथा ।
रोगरक्षोभयाच्चैव राष्ट्रं स्वं परिरक्षसि ॥ १२४ ॥
क्या तुम अग्नि, सर्प, रोग तथा राक्षसोंके भयसे अपने सम्पूर्ण राष्ट्रकी रक्षा करते हो? ॥ १२४ ॥
कच्चिदन्धांश्च मूकांश्च पङ्गून् व्यङ्गानबान्धवान् ।
पितेव पासि धर्मज्ञ तथा प्रव्रजितानपि ॥ १२५ ॥
धर्मज्ञ! क्या तुम अंधों, गूँगों, पंगुओं, अंगहीनों और बन्धु-बान्धवोंसे रहित अनाथों तथा संन्यासियोंका भी पिताकी भाँति पालन करते हो? ॥ १२५ ॥
षडनर्था महाराज कच्चित् ते पृष्ठतः कृताः ।
निद्राऽऽलस्यं भयं क्रोधोऽमार्दवं दीर्घसूत्रता ॥ १२६ ॥
महाराज! क्या तुमने निद्रा, आलस्य, भय, क्रोध, कठोरता और दीर्घसूत्रता—इन छः दोषोंको पीछे कर दिया (त्याग दिया) है? ॥ १२६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः कुरूणामृषभो महात्मा
श्रुत्वा गिरो ब्राह्मणसत्तमस्य ।
प्रणम्य पादावभिवाद्य तुष्टो
राजाब्रवीन्नारदं देवरूपम् ॥ १२७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कुरुश्रेष्ठ महात्मा राजा युधिष्ठिरने ब्रह्माके पुत्रोंमें श्रेष्ठ नारदजीका यह वचन सुनकर उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम एवं अभिवादन किया और अत्यन्त संतुष्ट हो देवस्वरूप नारदजीसे कहा ॥
युधिष्ठिर उवाच
एवं करिष्यामि यथा त्वयोक्तं प्रज्ञा हि मे भूय एवाभिवृद्धा । उक्त्वा तथा चैव चकार राजा लेभे महीं सागरमेखलां च ॥ १२८ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**देवर्षे! आपने जैसा उपदेश दिया है, वैसा ही करूँगा। आपके इस प्रवचनसे मेरी प्रज्ञा और भी बढ़ गयी है। ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिरने वैसा ही आचरण किया और इसीसे समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य पा लिया ॥ १२८ ॥
नारद उवाच
एवं यो वर्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे । स विहृत्येह सुसुखी शक्रस्यैति सलोकताम् ॥ १२९ ॥
**नारदजीने कहा—**जो राजा इस प्रकार चारों वर्णों (और वर्णाश्रमधर्म)-की रक्षामें संलग्न रहता है, वह इस लोकमें अत्यन्त सुखपूर्वक विहार करके अन्तमें देवराज इन्द्रके लोकमें जाता है ॥ १२९ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि नारदप्रश्नमुखेन राजधर्मानुशासने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें नारदजीके द्वारा प्रश्नके व्याजसे राजधर्मका उपदेशविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
३. परस्पर विरुद्ध प्रतीत होनेवाले वेदके वचनोंकी एकवाक्यता।
४. एकमें मिले हुए वचनोंको प्रयोगके अनुसार अलग-अलग करना।
५. यज्ञके अनेक कर्मोंके एक साथ उपस्थित होनेपर अधिकारके अनुसार यजमानके साथ कर्मका जो सम्बन्ध होता है, उसका नाम समवाय है।
* दूसरेको किसी वस्तुका बोध करानेके लिये प्रवृत्त हुआ पुरुष जिस अनुमानवाक्यका प्रयोग करता है, उसमें पाँच अवयव होते हैं—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन। जैसे किसीने कहा—‘इस पर्वतपर आग है’ यह वाक्य प्रतिज्ञा है। ‘क्योंकि वहाँ धूम है’ यह हेतु है। ‘जैसे रसोईघरमें धूआँ दीखनेपर वहाँ आग देखी जाती है’ यह दृष्टान्त ही उदाहरण है। ‘चूँकि इस पर्वतपर धूआँ दिखायी देता है’ हेतुकी इस उपलब्धिका नाम उपनय है। ‘इसलिये वहाँ आग है’ यह निश्चय ही निगमन है। इस वाक्यमें अनुकूल तर्कका होना गुण है और प्रतिकूल तर्कका होना दोष है, जैसे ‘यदि वहाँ आग न होती, तो धूआँ भी नहीं उठता’ यह अनुकूल तर्क है। जैसे कोई तालाबसे भाप उठती देखकर यह कहे कि इस तालाबमें आग है, तो उसका वह अनुमान आश्रयासिद्धरूप हेत्वाभाससे युक्त होगा।
१. दक्षस्मृतिमें त्रिवर्गसेवनका काल-विभाग इस प्रकार बताया गया है—
पूर्वाह्णे त्वाचरेद् धर्मं मध्याह्नेऽर्थमुपार्जयेत्। सायाह्ने चाचरेत् काममित्येषा वैदिकी श्रुतिः।।
पूर्वाह्नकालमें धर्मका आचरण करे, मध्याह्नके समय धनोपार्जनका काम देखे और सायाह्न (रात्रि)-के समय कामका सेवन करे। यह वैदिक श्रुतिका आदेश है।
(नीलकण्ठीसे उद्धृत)
२. राजाओंमें छः गुण होने चाहिये—व्याख्यानशक्ति, प्रगल्भता, तर्ककुशलता, भूतकालकी स्मृति, भविष्यपर दृष्टि तथा नीतिनिपुणता।
३. सात उपाय ये हैं—मन्त्र, औषध, इन्द्रजाल, साम, दान, दण्ड और भेद।
४. परीक्षाके योग्य चौदह स्थान या व्यक्ति नीतिशास्त्रमें इस प्रकार बताये गये हैं—
देशो दुर्गं रथो हस्तिवाजियोधाधिकारिणः। अन्तःपुरान्नगणनाशास्त्रलेख्यधनासवः।।
देश, दुर्ग, रथ, हाथी, घोड़े, शूर सैनिक, अधिकारी, अन्तःपुर, अन्न, गणना, शास्त्र, लेख्य, धन और असु (बल), इनके जो चौदह अधिकारी हैं, राजाओंको उनकी परीक्षा करते रहना चाहिये।
५. राजाके कोष और धनकी वृद्धिके लिये आठ कर्म ये हैं—
कृषिवणिक्पथो दुर्गं सेतुः कुञ्जरबन्धनम्। खन्याकरकरादानं शून्यानां च निवेशनम्।।
अष्ट संधानकर्माणि प्रयुक्तानि मनीषिभिः।।
खेतीका विस्तार, व्यापारकी रक्षा, दुर्गकी रचना एवं रक्षा, पुलोंका निर्माण और उनकी रक्षा, हाथी बाँधना, सोने-हीरे आदिकी खानोंपर अधिकार करना, करकी वसूली और उजाड़ प्रान्तोंमें लोगोंको बसाना—मनीषी पुरुषोंद्वारा ये आठ संधानकर्म बताये गये हैं।
६. स्वामी, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा सेना एवं पुरवासी—ये राज्यके सात अंग ही सात प्रकृतियाँ हैं। अथवा—दुर्गाध्यक्ष, बलाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, सेनापति, पुरोहित, वैद्य और ज्योतिषी—ये भी सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं।
* स्मृतिमें कहा है कि—‘ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय चिन्तयेदात्मनो हितम्।’ अर्थात् ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर अपने हितका चिन्तन करे। (नीलकण्ठी टीकासे उद्धृत)
१. शत्रुपक्षके मन्त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वेशिक (अन्तःपुरका अध्यक्ष), कारागाराध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, यथायोग्य कार्योंमें धनको व्यय करनेवाला सचिव, प्रदेष्टा (पहरेदारोंको काम बतानेवाला), नगराध्यक्ष (कोतवाल), कार्यनिर्माणकर्ता (शिल्पियोंका परिचालक), धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक—ये अठारह तीर्थ हैं, जिनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये।
२. उपर्युक्त टिप्पणीमें अठारह तीर्थोंमेंसे आदिके तीनको छोड़कर शेष पंद्रह तीर्थ अपने पक्षके भी सदा परीक्षणीय हैं।
* विजयके इच्छुक राजाके आगे खड़े होनेवाले उसके शत्रुके शत्रु २, उन शत्रुओंके मित्र २, उन मित्रोंके मित्र २—ये छः व्यक्ति युद्धमें आगे खड़े होते हैं। विजिगीषुके पीछे पार्ष्णिग्राह (पृष्ठरक्षक) और आक्रन्द (उत्साह दिलानेवाला)—ये दो व्यक्ति खड़े होते हैं। इन दोनोंकी सहायता करनेवाले एक-एक व्यक्ति इनके पीछे खड़े होते हैं, जिनकी आसार संज्ञा है। ये क्रमशः पार्ष्णिग्राहासार और आक्रन्दासार कहे जाते हैं। इस प्रकार आगेके छः और पीछेके चार मिलकर दस होते हैं। विजिगीषुके पार्श्वभागमें मध्यम और उसके भी पार्श्वभागमें उदासीन होता है। इन दोनोंको जोड़ लेनेसे इन सबकी संख्या बारह होती है। इन्हींको द्वादश राजमण्डल अथवा ‘पार्ष्णिमूल’ कहते हैं। अपने और शत्रुपक्षके इन व्यक्तियोंको जानना चाहिये।
१. नीतिशास्त्रके अनुसार विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको चाहिये कि वह शत्रुपक्षके सैनिकोंमेंसे जो लोभी हो, किंतु जिसे वेतन न मिला हो, जो मानी हो किंतु किसी तरह अपमानित हो गया हो, जो क्रोधी हो और उसे क्रोध दिलाया गया हो, जो स्वभावसे ही डरनेवाला हो और उसे पुनः डरा दिया गया हो—इन चार प्रकारके लोगोंको फोड़ ले और अपने पक्षमें ऐसे लोग हों, तो उन्हें उचित सम्मान देकर मिला ले।
२. व्यसन दो प्रकारके हैं—दैव और मानुष। दैव व्यसन पाँच प्रकारके हैं—अग्नि, जल, व्याधि, दुर्भिक्ष और महामारी। मानुष व्यसन भी पाँच प्रकारका है—मूर्ख पुरुषोंसे, चोरोंसे, शत्रुओंसे, राजाके प्रिय व्यक्तिसे तथा राजाके लोभसे प्रजाको प्राप्त भय। (नीलकंठी टीकाके अनुसार)
३. आठ अंग और चार बल भारतकौमुदीटीकाके अनुसार लिये गये हैं।
१. सीमावर्ती गाँवका अधिपति अपने यहाँका राजकीय कर एकत्र करके ग्रामाधिपतिको दे, ग्रामाधिपति नगराधिपतिको, वह देशाधिपतिको और देशाधिपति साक्षात् राजाको वह धन अर्पित करे।
२. नाड़ी, मल, मूत्र, जिह्वा, नेत्र, रूप, शब्द तथा स्पर्श—ये आठ चिकित्साके प्रकार कहे जाते हैं।
३. लोहेकी बनी हुई उन मशीनोंको, जिनके द्वारा बारूदके बलसे शीशे, काँसे और पत्थरकी गोलियाँ चलायी जाती हैं—यन्त्र कहते हैं। उन यन्त्रोंके प्रयोगकी विधिके प्रतिपादक संक्षिप्त वाक्य ही यन्त्रसूत्र हैं।
३. नगरकी रक्षा तथा उन्नतिके साधनोंको बतानेवाले संक्षिप्त वाक्योंको ही यहाँ नागरिक सूत्र कहा गया है।