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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 677)

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त्रिनवतितमोऽध्यायः

ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रयान्तं कौन्तेयं ब्राह्मणा वनवासिनः ।
अभिगम्य तदा राजन्निदं वचनमब्रुवन् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको तीर्थयात्राके लिये उद्यत जान काम्य-कवनके निवासी ब्राह्मण उनके निकट आकर इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

राजंस्तीर्थानि गन्तासि पुण्यानि भ्रातृभिः सह ।
ऋषिणा चैव सहितो लोमशेन महात्मना ॥ २ ॥
‘महाराज! आप अपने भाइयों तथा महात्मा लोमश मुनिके साथ पुण्यतीर्थोंमें जानेवाले हैं ॥ २ ॥

अस्मानपि महाराज नेतुमर्हसि पाण्डव ।
अस्माभिर्हि न शक्यानि त्वदृते तानि कौरव ॥ ३ ॥
‘कुरुकुलतिलक पाण्डुनन्दन! हमें भी अपने साथ ले चलें। महाराज! आपके बिना हमलोग उन तीर्थोंकी यात्रा नहीं कर सकते ॥ ३ ॥

श्वापदैरुपसृष्टानि दुर्गाणि विषमाणि च ।
अगम्यानि नरैरल्पैस्तीर्थानि मनुजेश्वर ॥ ४ ॥
‘मनुजेश्वर! वे सभी तीर्थ हिंसक जन्तुओंसे भरे पड़े हैं। दुर्गम और विषम भी हैं। थोड़े-से मनुष्य वहाँकी यात्रा नहीं कर सकते ॥ ४ ॥

भवतो भ्रातरः शूरा धनुर्धरवराः सदा ।
भवद्भिः पालिताः शूरैर्गच्छामो वयमप्युत ॥ ५ ॥
‘आपके भाई शूरवीर हैं और सदा श्रेष्ठ धनुष धारण किये रहते हैं। आप-जैसे शूरवीरोंसे सुरक्षित होकर हम भी उन तीर्थोंकी यात्रा पूरी कर लेंगे ।। ५ ।।
भवत्प्रसादाद्धि वयं प्राप्नुयाम सुखं फलम् ।
तीर्थानां पृथिवीपाल वनानां च विशाम्पते ॥ ६ ॥
‘भूपाल! प्रजानाथ! आपके प्रसादसे हमलोग भी उन तीर्थों और वनोंकी यात्राका फल अनायास ही पा लेंगे ।। ६ ।।
तव वीर्यपरित्राताः शुद्धास्तीर्थपरिप्लुताः ।
भवेम धूतपाप्मानस्तीर्थसंदर्शनान्नृप ॥ ७ ॥
‘नरेश्वर! आपके बल-पराक्रमसे सुरक्षित हो हम भी तीर्थोंमें स्नान करके शुद्ध हो जायँगे और उन तीर्थोंके दर्शनसे हमारे सब पाप धुल जायँगे ।। ७ ।।
भवानपि नरेन्द्रस्य कार्तवीर्यस्य भारत ।
अष्टकस्य च राजर्षेर्लोमपादस्य चैव ह ॥ ८ ॥
भरतस्य च वीरस्य सार्वभौमस्य पार्थिव ।

ध्रुवं प्राप्स्यसि दुष्प्रापाँल्लोकांस्तीर्थपरिप्लुतः ॥ ९ ॥ ‘भूपाल! भरतनन्दन! आप भी तीर्थोंमें नहाकर राजा कार्तवीर्य अर्जुन, राजर्षि अष्टक, लोमपाद और भूमण्डलमें सर्वत्र विदित सम्राट् वीरवर भरतको मिलनेवाले दुर्लभ लोकोंको अवश्य प्राप्त कर लेंगे ।। ८-९ ।।

प्रभासादीनि तीर्थानि महेन्द्रादींश्च पर्वतान् । गङ्गाद्याः सरितश्चैव प्लक्षादींश्च वनस्पतीन् ॥ १० ॥ त्वया सह महीपाल द्रष्टुमिच्छामहे वयम् । यदि ते ब्राह्मणेष्वस्ति काचित् प्रीतिर्जनाधिप ॥ ११ ॥ कुरु क्षिप्रं वचोऽस्माकं ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे । ‘महीपाल! प्रभास आदि तीर्थों, महेन्द्र आदि पर्वतों, गंगा आदि नदियों तथा प्लक्ष आदि वृक्षोंका हम आपके साथ दर्शन करना चाहते हैं। जनेश्वर! यदि आपके मनमें ब्राह्मणोंके प्रति कुछ प्रेम है तो आप हमारी बात शीघ्र मान लीजिये; इससे आपका कल्याण होगा ।। १०-११ १/२ ।।

तीर्थानि हि महाबाहो तपोविघ्नकरैः सदा ॥ १२ ॥ अनुकीर्णानि रक्षोभिस्तेभ्यो नस्त्रातुमर्हसि । ‘महाबाहो! तपस्यामें विघ्न डालनेवाले बहुत-से राक्षस उन तीर्थोंमें भरे पड़े हैं, उनसे आप हमारी रक्षा करनेमें समर्थ हैं' ।। १२ १/२ ।।

तीर्थान्युक्तानि धौम्येन नारदेन च धीमता ॥ १३ ॥ यान्युवाच च देवर्षिर्लोमशः सुमहातपाः । विधिवत् तानि सर्वाणि पर्यटस्व नराधिप ॥ १४ ॥ धूतपाप्मा सहास्माभिर्लोमशेनाभिपालितः । ‘नरेश्वर! आप पापरहित हैं, धौम्य मुनि, परम बुद्धिमान् नारदजी तथा महातपस्वी देवर्षि लोमशने जिन-जिन तीर्थोंका वर्णन किया है, उन सबमें आप महर्षि लोमशजीसे सुरक्षित हो हमारे साथ विधिपूर्वक भ्रमण करें' ।। १३-१४ १/२ ।।

स राजा पूज्यमानस्तैर्हर्षादश्रुपरिप्लुतः ॥ १५ ॥ भीमसेनादिभिर्वीरैर्भ्रातृभिः परिवारितः । बाढमित्यब्रवीत् सर्वांस्तानृषीन् पाण्डवर्षभः ॥ १६ ॥ लोमशं समनुज्ञाप्य धौम्यं चैव पुरोहितम् । पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपने वीर भ्राता भीमसेन आदिसे घिरकर खड़े थे। उन ब्राह्मणोंद्वारा इस प्रकार सम्मानित होनेपर उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भर आये। उन्होंने देवर्षि लोमश तथा पुरोहित धौम्यजीकी आज्ञा लेकर उन सब ऋषियोंसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया ।। १५-१६ १/२ ।।

ततः स पाण्डवश्रेष्ठो भ्रातृभिः सहितो वशी ॥ १७ ॥

द्रौपद्या चानवद्याङ्ग्या गमनाय मनो दधे । तदनन्तर मन-इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरने भाइयों तथा सुन्दर अंगोंवाली द्रौपदीके साथ यात्रा करनेका मन-ही-मन निश्चय किया ॥ १७ १/२ ॥ अथ व्यासो महाभागस्तथा पर्वतनारदौ ॥ १८ ॥ काम्यके पाण्डवं द्रष्टुं समाजग्मुर्मनीषिणः । तेषां युधिष्ठिरो राजा पूजां चक्रे यथाविधि । सत्कृतास्ते महाभाग युधिष्ठिरमथाब्रुवन् ॥ १९ ॥ इतनेहीमें महाभाग व्यास, पर्वत और नारद आदि मनीषीजन काम्यकवनमें पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरसे मिलनेके लिये आये। राजा युधिष्ठिरने उनकी विधिपूर्वक पूजा की। उनसे सत्कार पाकर वे महाभाग महर्षि महाराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले ॥ १८-१९ ॥

ऋषय ऊचुः युधिष्ठिर यमौ भीम मनसा कुरुतार्जवम् । मनसा कृतशौचा वै शुद्धास्तीर्थानि यास्यथ ॥ २० ॥ ऋषियोंने कहा—युधिष्ठिर! भीमसेन! नकुल! और सहदेव! तुमलोग तीर्थोंके प्रति मनसे श्रद्धापूर्वक सरलभाव रखो। मनसे शुद्धिका सम्पादन करके शुद्धचित्त होकर तीर्थोंमें जाओ ॥ २० ॥ शरीरनियमं प्राहुर्ब्राह्मणा मानुषं व्रतम् । मनोविशुद्धां बुद्धिं च दैवमाहुर्व्रतं द्विजाः ॥ २१ ॥ ब्राह्मणलोग शरीर-शुद्धिके नियमको 'मानुषव्रत' बताते हैं और मनके द्वारा शुद्ध की हुई बुद्धिको 'दैवव्रत' कहते हैं ॥ २१ ॥ मनो ह्यदुष्टं शौचाय पर्याप्तं वै नराधिप । मैत्रीं बुद्धिं समास्थाय शुद्धास्तीर्थानि द्रक्ष्यथ ॥ २२ ॥ नरेश्वर! यदि मन राग-द्वेषसे दूषित न हो तो वह शुद्धिके लिये पर्याप्त माना गया है। सब प्राणियोंके प्रति मैत्री-बुद्धिका आश्रय ले शुद्धभावसे तीर्थोंका दर्शन करो ॥ २२ ॥ ते यूयं मानसैः शुद्धाः शरीरनियमव्रतैः । दैवं व्रतं समास्थाय यथोक्तं फलमाप्स्यथ ॥ २३ ॥ तुम मानसिक और शारीरिक नियमव्रतोंसे शुद्ध हो। दैवव्रतका आश्रय ले यात्रा करोगे तो तीर्थोंका तुम्हें यथावत् फल प्राप्त होगा ॥ २३ ॥ ते तथेति प्रतिज्ञाय कृष्णया सह पाण्डवाः । कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे मुनिभिर्दिव्यमानुषैः ॥ २४ ॥ महर्षियोंके ऐसा कहनेपर द्रौपदीसहित पाण्डवोंने 'बहुत अच्छा' कहकर (उनकी आज्ञाएँ शिरोधार्य कीं और उनके बताये हुए नियमोंका पालन करनेकी) प्रतिज्ञा की।

तत्पश्चात् उन दिव्य और मानव महर्षियोंने उन सबके लिये स्वस्तिवाचन किया ॥ २४ ॥
लोमशस्योपसंगृह्य पादौ द्वैपायनस्य च ।
नारदस्य च राजेन्द्र देवर्षेः पर्वतस्य च ॥ २५ ॥
धौम्येन सहिता वीरास्तथा तैर्वनवासिभिः ।
मार्गशीर्ष्यामतीतायां पुष्येण प्रययुस्ततः ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर महर्षि लोमश, द्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद और पर्वतके चरणोंका स्पर्श करके वनवासी ब्राह्मणों, पुरोहित धौम्य और लोमश आदिके साथ वीर पाण्डव तीर्थयात्राके लिये निकले। मार्गशीर्षकी पूर्णिमा व्यतीत होनेपर जब पुष्य नक्षत्र आया तब उसी नक्षत्रमें उन्होंने यात्रा प्रारम्भ की ॥ २५-२६ ॥
कठिनानि समादाय चीराजिनजटाधराः ।
अभेद्यैः कवचैर्युक्तास्तीर्थान्यन्वचरंस्ततः ॥ २७ ॥
उन सबने शरीरपर फटे-पुराने वस्त्र या मृगचर्म धारण कर रखे थे। उनके मस्तकपर जटाएँ थीं। उनके अंग अभेद्य कवचोंसे ढके हुए थे। वे सूर्यप्रदत्त बटलोई आदि पात्र लेकर वहाँ तीर्थोंमें विचरण करने लगे ॥ २७ ॥
इन्द्रसेनादिभिर्भृत्यै रथैः परिचतुर्दशैः ।
महानसव्यापृतैश्च तथान्यैः परिचारकैः ॥ २८ ॥
उनके साथ इन्द्रसेन आदि चौदहसे अधिक सेवक रथ लिये पीछे-पीछे जा रहे थे। रसोईके काममें संलग्न रहनेवाले अन्यान्य सेवक भी उनके साथ थे ॥ २८ ॥
सायुधा बद्धनिस्त्रिंशास्तूणवन्तः समार्गणाः ।
प्राङ्मुखाः प्रययुर्वीराः पाण्डवा जनमेजय ॥ २९ ॥
जनमेजय! वीर पाण्डव आवश्यक अस्त्र-शस्त्र ले कमरमें तलवार बाँधकर पीठपर तरकस कसे हुए हाथोंमें बाण लिये पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥

देवताओं और धर्मात्मा राजाओंका उदाहरण देकर महर्षि लोमशका युधिष्ठिरको अधर्मसे हानि बताना और तीर्थयात्राजनित पुण्यकी महिमाका वर्णन करते हुए आश्वासन देना

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चतुर्नवतितमोऽध्यायः

देवताओं और धर्मात्मा राजाओंका उदाहरण देकर महर्षि लोमशका युधिष्ठिरको अधर्मसे हानि बताना और तीर्थयात्राजनित पुण्यकी महिमाका वर्णन करते हुए आश्वासन देना

युधिष्ठिर उवाच

न वै निर्गुणमात्मानं मन्ये देवर्षिसत्तम ।
तथास्मि दुःखसंतप्तो यथा नान्यो महीपतिः ॥ १ ॥

युधिष्ठिर बोले— देवर्षिप्रवर लोमश! मेरी समझसे मैं अपनेको सात्त्विक गुणोंसे हीन नहीं मानता तो भी दुःखोंसे इतना संतप्त होता रहता हूँ जितना दूसरा कोई राजा नहीं हुआ होगा ॥ १ ॥

परांश्च निर्गुणान् मन्ये न च धर्मगतानपि ।
ते च लोमश लोकेऽस्मिन्नृध्यन्ते केन हेतुना ॥ २ ॥

इसके सिवा, दुर्योधनादि शत्रुओंको सात्त्विक गुणोंसे रहित समझता हूँ। साथ ही यह भी जानता हूँ कि वे धर्म-परायण नहीं हैं तो भी वे इस लोकमें उत्तरोत्तर समृद्धिशाली होते जा रहे हैं, इसका क्या कारण है? ॥ २ ॥

लोमश उवाच

नात्र दुःखं त्वया राजन् कार्यं पार्थ कथंचन ।
यदधर्मेण वर्धेयुरधर्मरुचयो जनाः ॥ ३ ॥

लोमशजीने कहा— राजन्! कुन्तीनन्दन! अधर्ममें रुचि रखनेवाले लोग यदि उस अधर्मके द्वारा बढ़ रहे हों तो इसके लिये तुम्हें किसी प्रकार दुःख नहीं मानना चाहिये ॥ ३ ॥

वर्धत्यधर्मेण नरस्ततो भद्राणि पश्यति ।
ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ ४ ॥

पहले अधर्मद्वारा मनुष्य बढ़ सकता है, फिर अपने मनोऽनुकूल सुख-सम्पत्तिरूप अभ्युदयको देख सकता है, तत्पश्चात् वह शत्रुओंपर विजय पा सकता है और अन्तमें जड़-मूलसहित नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥

मया हि दृष्टा दैतेया दानवाश्च महीपते ।
वर्धमाना ह्यधर्मेण क्षयं चोपगताः पुनः ॥ ५ ॥

महीपाल! मैंने दैत्यों और दानवोंको अधर्मके द्वारा बढ़ते और पुनः नष्ट होते भी देखा है॥ ५॥

पुरा देवयुगे चैव दृष्टं सर्वं मया विभो।
अरोचयन् सुरा धर्मं धर्मं तत्यजिरेऽसुराः ॥ ६॥
प्रभो! पहले देवयुगमें ही मैंने यह सब अपनी आँखों देखा है। देवताओंने धर्मके प्रति अनुराग किया और असुरोंने उसका परित्याग कर दिया॥ ६॥

तीर्थानि देवा विविशुर्नाविशन् भारतासुराः।
तानधर्मकृतो दर्पः पूर्वमेव समाविशत्॥ ७॥
भरतनन्दन! देवताओंने स्नानके लिये तीर्थोंमें प्रवेश किया, परंतु असुर उनमें नहीं गये। अधर्मजनित दर्प असुरोंमें पहलेसे ही समा गया था॥ ७॥

दर्पान्मानः समभवन्मानात् क्रोधो व्यजायत।
क्रोधाद्ध्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत्॥ ८॥
दर्पसे मान हुआ और मानसे क्रोध उत्पन्न हुआ। क्रोधसे निर्लज्जता आयी और निर्लज्जताने उनके सदाचारको नष्ट कर दिया॥ ८॥

तानलज्जान् गतह्रीकान् हीनवृत्तान् वृथाव्रतान्।
क्षमा लक्ष्मीः स्वधर्मश्च न चिरात् प्रजहुस्ततः ॥ ९॥
लक्ष्मीस्तु देवानगमदलक्ष्मीरसुरान् नृप।
तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दर्पोपहतचेतसः ॥ १०॥
दैतेयान् दानवांश्चैव कलिरप्याविशत् ततः।
तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दानवान् कलिना हतान् ॥ ११॥
दर्पाभिभूतान् कौन्तेय क्रियाहीनानचेतसः।
मानाभिभूतानचिराद् विनाशः समपद्यत॥ १२॥
इस प्रकार लज्जा, संकोच और सदाचारसे हीन एवं निष्फल व्रतका आचरण करनेवाले उन असुरोंको क्षमा, लक्ष्मी और स्वधर्मने शीघ्र त्याग दिया। राजन्! लक्ष्मी देवताओंके पास चली गयी और अलक्ष्मी असुरोंके यहाँ। अलक्ष्मीके आवेशसे युक्त होनेपर उनका चित्त दर्प और अभिमानसे दूषित हो गया। उस दशामें उन दैत्यों और दानवोंमें कलिका भी प्रवेश हो गया। जब वे दानव अलक्ष्मीसे संयुक्त, कलिसे तिरस्कृत और अभिमानसे अभिभूत हो सत्कर्मोंसे शून्य, विवेकरहित और मानसे उन्मत्त हो गये, तब शीघ्र ही उनका विनाश हो गया॥ ९—१२॥

निर्यशस्कास्तथा दैत्याः कृत्स्नशो विलयं गताः।
देवास्तु सागरांश्चैव सरितश्च सरांसि च॥ १३॥
अभ्यगच्छन् धर्मशीलाः पुण्यान्यायतनानि च।
तपोभिः क्रतुभिर्दानैराशीर्वादैश्च पाण्डव॥ १४॥

प्रजहुः सर्वपापानि श्रेयश्च प्रतिपेदिरे । एवमादानवन्तश्च निरादानाश्च सर्वशः ॥ १५ ॥ तीर्थान्यगच्छन् विबुधास्तेनापुर्भूतिमुत्तमाम् । (यत्र धर्मेण वर्तन्ते राजानो राजसत्तम । सर्वान् सपत्नान् बाधन्ते राज्यं चैषां विवर्धते ॥) तथा त्वमपि राजेन्द्र स्नात्वा तीर्थेषु सानुजः ॥ १६ ॥ पुनर्वेत्स्यसि तां लक्ष्मीमेष पन्थाः सनातनः । यशोहीन दैत्य पूर्णतः विनष्ट हो गये, किंतु धर्मशील देवताओंने पवित्र समुद्रों, सरिताओं, सरोवरों और पुण्यप्रद आश्रमोंकी यात्रा की। पाण्डुनन्दन! वहाँ तपस्या, यज्ञ और दान आदि करके महात्माओंके आशीर्वादसे वे सब पापोंसे मुक्त हो कल्याणके भागी हुए। इस प्रकार उत्तम नियम ग्रहण करके किसीसे भी कोई प्रतिग्रह न लेकर देवताओंने तीर्थोंमें विचरण किया; इससे उन्हें उत्तम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई। नृपश्रेष्ठ! जहाँ राजा धर्मके अनुसार बर्ताव करते हैं वहाँ वे सब शत्रुओंको नष्ट कर देते हैं और उनका राज्य भी बढ़ता रहता है। राजेन्द्र! इसलिये तुम भी भाइयोंसहित तीर्थोंमें स्नान करके खोयी हुई राजलक्ष्मी प्राप्त कर लोगे। यही सनातन मार्ग है ॥ १३—१६ १/२ ॥

यथैव हि नृगो राजा शिबिरौशीनरो यथा ॥ १७ ॥ भगीरथो वसुमना गयः पूरुः पुरूरवाः । चरमाणास्तपो नित्यं स्पर्शनादम्भसश्च ते ॥ १८ ॥ तीर्थाभिगमनात् पूता दर्शनाच्च महात्मनाम् । अलभन्त यशः पुण्यं धनानि च विशाम्पते ॥ १९ ॥ तथा त्वमपि राजेन्द्र लब्धासि विपुलां श्रियम् । जैसे राजा नृग, उशीनरपुत्र शिबि, भगीरथ, वसुमना, गय, पूरु तथा पुरूरवा आदि नरेशोंने सदा तपस्यापूर्वक तीर्थयात्रा करके वहाँके जलके स्पर्श और महात्माओंके दर्शनसे पावन यश और प्रचुर धन प्राप्त किये थे; उसी प्रकार तुम भी तीर्थयात्राके पुण्यसे विपुल सम्पत्ति प्राप्त कर लोगे ॥ १७—१९ १/२ ॥

यथा चेक्ष्वाकुरभवत् सपुत्रजनबान्धवः ॥ २० ॥ मुचुकुन्दोऽथ मान्धाता मरुत्तश्च महीपतिः । कीर्तिं पुण्यामविन्दन्त यथा देवास्तपोबलात् ॥ २१ ॥ देवर्षयश्च कार्त्स्न्येन तथा त्वमपि वेत्स्यसि । धार्तराष्ट्रास्त्वधर्मेण मोहेन च वशीकृताः । न चिराद् वै विनङ्क्ष्यन्ति दैत्या इव न संशयः ॥ २२ ॥ जैसे पुत्र, सेवक तथा बन्धु-बान्धवोंसहित राजा इक्ष्वाकु, मुचुकुन्द, मान्धाता तथा महाराज मरुत्तने पुण्यकीर्ति प्राप्त की थी, जैसे देवताओं और देवर्षियोंने तपोबलसे यश

और ऐश्वर्य प्राप्त किया था; उसी प्रकार तुम भी पूर्णरूपसे यश और धन-सम्पत्ति प्राप्त करोगे। धृतराष्ट्रके पुत्र पाप और मोहके वशीभूत हैं; अतः वे दैत्योंकी भाँति शीघ्र नष्ट हो जायँगे; इसमें संशय नहीं है ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां
चतुर्नवतितमोऽध्यायः ।। ९४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 686)

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पञ्चनवतितमोऽध्यायः

पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना

वैशम्पायन उवाच

ते तथा सहिता वीरा वसन्तस्तत्र तत्र ह ।
क्रमेण पृथिवीपाल नैमिषारण्यमागताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार वे वीर पाण्डव विभिन्न स्थानोंमें निवास करते हुए क्रमशः नैमिषारण्यतीर्थमें आये ॥ १ ॥
ततस्तीर्थेषु पुण्येषु गोमत्याः पाण्डवा नृप ।
कृताभिषेकाः प्रददुर्गाश्च वित्तं च भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! नरेश्वर! तदनन्तर गोमतीके पुण्य तीर्थोंमें स्नान करके पाण्डवोंने वहाँ गोदान और धनदान किया* ॥ २ ॥
तत्र देवान् पितॄन् विप्रांस्तर्पयित्वा पुनः पुनः ।
कन्यातीर्थेऽश्वतीर्थे च गवां तीर्थे च भारत ।
कालकोट्यां वृषप्रस्थे गिरावुष्य च पाण्डवाः ॥ ३ ॥
बाहुदायां महीपाल चक्रुः सर्वेऽभिषेचनम् ।
प्रयागे देवयजने देवानां पृथिवीपते ॥ ४ ॥
ऊषुराप्लुत्य गात्राणि तपश्चातस्थुरुत्तमम् ।
गङ्गायमुनयोश्चैव संगमे सत्यसंगराः ॥ ५ ॥
भारत! भूपाल! वहाँ देवताओं, पितरों तथा ब्राह्मणोंको बार-बार तृप्त करके कन्यातीर्थ, अश्वतीर्थ, गोतीर्थ, कालकोटि तथा वृषप्रस्थगिरिमें निवास करते हुए उन सब पाण्डवोंने बाहुदा नदीमें स्नान किया। पृथ्वीपते! तदनन्तर उन्होंने देवताओंकी यज्ञभूमि प्रयागमें पहुँचकर वहाँ गंगा-यमुनाके संगममें स्नान किया। सत्यप्रतिज्ञ पाण्डव वहाँ स्नान करके कुछ दिनोंतक उत्तम तपस्यामें लगे रहे ॥ ३—५ ॥
विपाप्मानो महात्मानो विप्रेभ्यः प्रददुर्वसु ।
तपस्विजनजुष्टां च ततो वेदीं प्रजापतेः ॥ ६ ॥
जग्मुः पाण्डुसुता राजन् ब्राह्मणैः सह भारत ।
तत्र ते न्यवसन् वीरास्तपश्चातस्थुरुत्तमम् ॥ ७ ॥
संतर्पयन्तः सततं वन्येन हविषा द्विजान् ।

उन पापरहित महात्माओंने (त्रिवेणीतटपर) ब्राह्मणोंको धन दान किया। भरतनन्दन! तत्पश्चात् पाण्डव ब्राह्मणोंके साथ ब्रह्माजीकी वेदीपर गये, जो तपस्वीजनोंसे सेवित है। वहाँ उन वीरोंने उत्तम तपस्या करते हुए निवास किया। वे सदा कन्द-मूल-फल आदि वन्य हविष्यद्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करते रहते थे ।। ६-७१/२ ।।

ततो महीधरं जग्मुर्धर्मज्ञेनाभिसंस्कृतम् ।। ८ ।। राजर्षिणा पुण्यकृता गयेनानुपमद्युते । अनुपम तेजस्वी जनमेजय! प्रयागसे चलकर पाण्डव पुण्यात्मा एवं धर्मज्ञ राजर्षि गयके द्वारा यज्ञ करके शुद्ध किये हुए उत्तम पर्वतसे उपलक्षित गयातीर्थमें गये ।। ८१/२ ।।

नगो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी ।। ९ ।। वानीरमालिनी रम्या नदी पुलिनशोभिता । जहाँ गयशिर नामक पर्वत और बेंतकी पंक्तियोंसे घिरी हुई रमणीय महानदी है, जो अपने दोनों तटोंसे विशेष शोभा पाती है ।। ९१/२ ।।

दिव्यं पवित्रकूटं च पवित्रं धरणीधरम् ।। १० ।। ऋषिजुष्टं सुपुण्यं तत् तीर्थं ब्रह्मसरोत्तमम् । अगस्त्यो भगवान् यत्र गतो वैवस्वतं प्रति ।। ११ ।। वहाँ महर्षियोंसे सेवित, पावन शिखरोंवाला, दिव्य एवं पवित्र दूसरा पर्वत भी है जो अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ है। वहीं उत्तम ब्रह्मसरोवर है जहाँ भगवान् अगस्त्यमुनि वैवस्वत यमसे मिलनेके लिये पधारे थे ।। १०-११ ।।

उवास च स्वयं तत्र धर्मराजः सनातनः । सर्वासां सरितां चैव समुद्भेदो विशाम्पते ।। १२ ।। क्योंकि सनातन धर्मराज वहाँ स्वयं निवास करते हैं। राजन्! वहाँ सम्पूर्ण नदियोंका प्राकट्य हुआ है ।।

यत्र संनिहितो नित्यं महादेवः पिनाकधृक् । तत्र ते पाण्डवा वीराश्चातुर्मास्यैस्तदेजिरे ।। १३ ।। ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान् । पिनाकपाणि भगवान् महादेव उस तीर्थमें नित्य निवास करते हैं। वहाँ वीर पाण्डवोंने उन दिनों चातुर्मास्यव्रत ग्रहण करके महान् ऋषियज्ञ अर्थात् वेदादि सत्शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा भगवान्‌की आराधना की। वहीं महान् अक्षयवट है ।। १३१/२ ।।

अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम् ।। १४ ।। देवताओंकी वह यज्ञभूमि अक्षय है और वहाँ किये हुए प्रत्येक सत्कर्मका फल अक्षय होता है ।। १४ ।।

ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्नि Schweit... ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्नेश्चितमानसाः । ब्राह्मणास्तत्र शतशः समाजग्मुस्तपोधनाः ।। १५ ।।

अविचल चित्तवाले पाण्डवोंने उस तीर्थमें कई उपवास किये। उस समय वहाँ सैकड़ों तपस्वी ब्राह्मण पधारे ।। १५ ।।

चातुर्मास्येनायजन्त आर्षेण विधिना तदा ।
तत्र विद्यातपोवृद्धा ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
कथां प्रचक्रिरे पुण्यां सदसिस्था महात्मनाम् ।। १६ ।।
उन्होंने शास्त्रोक्त विधिपूर्वक चातुर्मास्य यज्ञ किया। वहाँ आये हुए ब्राह्मण विद्या और तपस्यामें बढ़े-चढ़े तथा वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। उन्होंने परस्पर मिलकर सभामें बैठकर महात्मा पुरुषोंकी पवित्र कथाएँ कहीं ।। १६ ।।

तत्र विद्याव्रतस्नातः कौमारं व्रतमास्थितः ।
शमठोऽकथयद् राजन्नामूर्तरयसं गयम् ।। १७ ।।
उनमें शमठ नामक एक विद्वान् ब्राह्मण थे जो विद्याध्ययनका व्रत समाप्त करके स्नातक हो चुके थे। उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्यपालनका व्रत ले रखा था। राजन्! शमठने वहाँ अमूर्तरयाके पुत्र महाराज गयकी कथा इस प्रकार कही ।। १७ ।।

शमठ उवाच

अमूर्तरयसः पुत्रो गयो राजर्षिसत्तमः ।
पुण्यानि यस्य कर्माणि तानि मे शृणु भारत ।। १८ ।।
**शमठ बोले—**भरतनन्दन युधिष्ठिर! अमूर्तरयाके पुत्र गय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ थे। उनके कर्म बड़े ही पवित्र एवं पावन थे। मैं उनका वर्णन करता हूँ, सुनो— ।।

यस्य यज्ञो बभूवेह बह्वन्नो बहुदक्षिणः ।
यत्रान्नपर्वता राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ।। १९ ।।
घृतकुल्याश्च दध्नश्च नद्यो बहुशतास्तथा ।
व्यञ्जनानां प्रवाहाश्च महार्हाणां सहस्रशः ।। २० ।।
राजन्! यहाँ राजा गयने बड़ा भारी यज्ञ किया था। उसमें बहुत अन्न खर्च हुआ था और असंख्य दक्षिणा बाँटी गयी थी। उस यज्ञमें अन्नके सैकड़ों और हजारों पर्वत लग गये थे। घीके कई सौ कुण्ड और दहीकी नदियाँ बहती थीं। सहस्रों प्रकारके उत्तमोत्तम व्यञ्जनोंकी बाढ़-सी आ गयी थी ।। १९-२० ।।

अहन्यहनि चाप्येवं याचतां सम्प्रदीयते ।
अन्ये च ब्राह्मणा राजन् भुञ्जतेऽन्नं सुसंस्कृतम् ।। २१ ।।
याचकोंको प्रतिदिन इसी प्रकार भोजन और दान दिया जाता था। राजन्! अन्यान्य ब्राह्मण भी वहाँ उत्तम रीतिसे तैयारकी हुई रसोई जीमते थे ।। २१ ।।

तत्र वै दक्षिणाकाले ब्रह्मघोषो दिवं गतः ।
न च प्रज्ञायते किंचिद् ब्रह्मशब्देन भारत ।। २२ ।।

भरतनन्दन! उस यज्ञमें दक्षिणा देते समय जो वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होती थी वह स्वर्गलोकतक गूँज उठती थी। उस वेदध्वनिके सामने दूसरा कोई शब्द नहीं सुनायी पड़ता था ॥ २२ ॥

पुण्येन चरता राजन् भूर्दिशः खं नभस्तथा । आपूर्णामासीच्छब्देन तदप्यासीन्महाद्भुतम् ॥ २३ ॥ यत्र स्म गाथा गायन्ति मनुष्या भरतर्षभ । अन्नपानैः शुभैस्तृप्ता देशे देशे सुवर्चसः ॥ २४ ॥ राजन्! वहाँ सब ओर फैले हुए पुण्यमय शब्दसे पृथ्वी, दिशाएँ, स्वर्ग और आकाश परिपूर्ण हो गये। यह बड़ी ही अद्भुत बात थी। भरतश्रेष्ठ! उस यज्ञमें सब मनुष्य यह गाथा गाते रहते थे कि ‘इस यज्ञमें देश-देशके अत्यन्त तेजस्वी पुरुष उत्तम अन्नपानसे तृप्त हो रहे हैं’ ॥ २३-२४ ॥

गयस्य यज्ञे के त्वद्य प्राणिनो भोक्तुमीप्सवः । तत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ॥ २५ ॥ ‘गयके यज्ञमें लोग यही पूछते फिरते थे कि ‘कौन-कौन ऐसे प्राणी रह गये हैं जो अभी भोजन करना चाहते हैं?’ वहाँ खानेसे बचे हुए अन्नके पचीस पर्वत शेष रह गये थे ॥ २५ ॥

न तत् पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे । गयो यदकरोद् यज्ञे राजर्षिरमितद्युतिः ॥ २६ ॥ ‘अमिततेजस्वी राजर्षि गयने अपने यज्ञमें जो व्यय किया था, वह पहलेके राजाओंने भी नहीं किया था और भविष्यमें भी कोई दूसरे कर सकेंगे, ऐसा सम्भव नहीं है ॥

कथं तु देवा हविषा गयेन परितर्पिताः । पुनः शक्ष्यन्त्युपादातुमन्यैर्दत्तानि कानिचित् ॥ २७ ॥ ‘गयने सम्पूर्ण देवताओंको हविष्यसे भलीभाँति तृप्त कर दिया है, अब वे दूसरोंके दिये हुए हविष्यको कैसे ग्रहण कर सकेंगे? ॥ २७ ॥

सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारकाः । यथा वा वर्षतो धारा असंख्येयाः स्म केनचित् । तथा गणयितुं शक्या गययज्ञे न दक्षिणाः ॥ २८ ॥ ‘जैसे लोकमें बालूके कण, आकाशके तारे और बरसते हुए बादलोंकी जलधाराएँ किसीके द्वारा भी गिनी नहीं जा सकतीं, उसी प्रकार गयके यज्ञमें दी हुई दक्षिणाओंकी भी कोई गणना नहीं कर सकता था ॥ २८ ॥

एवंविधाः सुबहवस्तस्य यज्ञा महीपतेः । बभूवुरस्य सरसः समीपे कुरुनन्दन ॥ २९ ॥ कुरुनन्दन! महाराज गयके ऐसे ही बहुत-से यज्ञ इस ब्रह्मसरोवरके समीप सम्पन्न हुए हैं ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गययज्ञकथने पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमश-तीर्थयात्राके प्रसंगमें ‘गयके यज्ञका वर्णन’-विषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९५ ।।


* यहाँ पाण्डवोंके द्वारा गोदान और धनदान करनेके विषयमें यह शंका होती है कि इनके पास ये सब कहाँसे आये पर ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वनपर्वके बारहवें अध्यायमें आता है कि काम्यकवनमें पाण्डवोंसे मिलनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण एवं भोजवंशी, वृष्णिवंशी और अन्धककुलके राजागण तथा द्रुपद, धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु एवं केकय राजकुमार आये थे। उनका पाण्डवोंसे मिलकर अपने-अपने राज्यमें लौट जानेका भी वर्णन वनपर्वके बाईसवें अध्यायमें आया है। इससे अनुमान होता है कि इन राजाओंने पाण्डवोंको भेंटमें प्रचुर धन दिया होगा।

इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना

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षण्णवतितमोऽध्यायः

इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना

वैशम्पायन उवाच

ततः सम्प्रस्थितो राजा कौन्तेयो भूरिदक्षिणः ।
अगस्त्याश्रममासाद्य दुर्जयायामुवास ह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर प्रचुर दक्षिणा देनेवाले कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरने गयासे प्रस्थान किया और अगस्त्याश्रममें जाकर दुर्जय मणिमती नगरीमें निवास किया ॥ १ ॥

तत्रैव लोमशं राजा पप्रच्छ वदतां वरः ।
अगस्त्येनेह वातापिः किमर्थमुपशामितः ॥ २ ॥
वहीं वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने महर्षि लोमशसे पूछा—‘ब्रह्मन्! अगस्त्यजीने यहाँ वातापिको किसलिये नष्ट किया? ॥ २ ॥

आसीद्वा किं प्रभावश्च स दैत्यो मानवान्तकः ।
किमर्थं चोदितो मन्युरगस्त्यस्य महात्मनः ॥ ३ ॥
‘मनुष्योंका विनाश करनेवाले उस दैत्यका प्रभाव कैसा था? और महात्मा अगस्त्यजीके मनमें क्रोधका उदय कैसे हुआ’? ॥ ३ ॥

लोमश उवाच

इल्वलो नाम दैतेय आसीत् कौरवनन्दन ।
मणिमत्यां पुरि पुरा वातापिस्तस्य चानुजः ॥ ४ ॥
लोमशजीने कहा—कौरवनन्दन! पूर्वकालकी बात है, इस मणिमती नगरीमें इल्वल नामक दैत्य रहता था। वातापि उसीका छोटा भाई था ॥ ४ ॥

स ब्राह्मणं तपोयुक्तमुवाच दितिनन्दनः ।
पुत्रं मे भगवानेकमिन्द्रतुल्यं प्रयच्छतु ॥ ५ ॥
तस्मै स ब्राह्मणो नादात् पुत्रं वासवसम्मितम् ।
चुक्रोध सोऽसुरस्तस्य ब्राह्मणस्य ततो भृशम् ॥ ६ ॥
तदाप्रभृति राजेन्द्र इल्वलो ब्रह्महासुरः ।
मन्युमान् भ्रातरं छागं मायावी ह्यकरोत् ततः ॥ ७ ॥
मेषरूपी च वातापिः कामरूप्यभवत् क्षणात् ।

संस्कृत्य च भोजयति ततो विप्रं जिघांसति ॥ ८ ॥ एक दिन दितिनन्दन इल्वलने एक तपस्वी ब्राह्मणसे कहा—'भगवन्! आप मुझे ऐसा पुत्र दें, जो इन्द्रके समान पराक्रमी हो।' उन ब्राह्मणदेवताने इल्वलको इन्द्रके समान पुत्र नहीं दिया। इससे वह असुर उन ब्राह्मणदेवतापर बहुत कुपित हो उठा। राजन्! तभीसे इल्वल दैत्य क्रोधमें भरकर ब्राह्मणोंकी हत्या करने लगा। वह मायावी अपने भाई वातापिको मायासे बकरा बना देता था। वातापि भी इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ था! अतः वह क्षणभरमें भेड़ा और बकरा बन जाता था। फिर इल्वल उस भेड़ या बकरेको पकाकर उसका मांस राँधता और किसी ब्राह्मणको खिला देता था। इसके बाद वह ब्राह्मणको मारनेकी इच्छा करता था ॥ ५—८ ॥

स चाह्वयति यं वाचा गतं वैवस्वतक्षयम् । स पुनर्देहमास्थाय जीवन् स्म प्रत्यदृश्यत ॥ ९ ॥ इल्वलमें यह शक्ति थी कि वह जिस किसी भी यमलोकमें गये हुए प्राणीको उसका नाम लेकर बुलाता वह पुनः शरीर धारण करके जीवित दिखायी देने लगता था ॥ ९ ॥

ततो वातापिमसुरं छागं कृत्वा सुसंस्कृतम् । तं ब्राह्मणं भोजयित्वा पुनरेव समाह्वयत् ॥ १० ॥ उस दिन वातापि दैत्यको बकरा बनाकर इल्वल उसके मांसका संस्कार किया और उन ब्राह्मणदेवको वह मांस खिलाकर पुनः अपने भाईको पुकारा ॥ १० ॥

तामिल्वलेन महता स्वरेण वाचमीरिताम् । श्रुत्वातिमायो बलवान् क्षिप्रं ब्राह्मणकण्टकः ॥ ११ ॥ तस्य पार्श्वं विनिर्भिद्य ब्राह्मणस्य महासुरः । वातापिः प्रहसन् राजन् निश्चक्राम विशाम्पते ॥ १२ ॥ राजन्! इल्वलके द्वारा उच्चस्वरसे बोली हुई वाणी सुनकर वह अत्यन्त मायावी ब्राह्मणशत्रु बलवान् महादैत्य वातापि उस ब्राह्मणकी पसलीको फाड़कर हँसता हुआ निकल आया ॥ ११-१२ ॥

एवं स ब्राह्मणान् राजन् भोजयित्वा पुनः पुनः । हिंसयामास दैतेय इल्वलो दुष्टचेतनः ॥ १३ ॥ राजन्! इस प्रकार दुष्टहृदय इल्वल दैत्य बार-बार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर अपने भाईद्वारा उनकी हिंसा करा देता था (इसीलिये अगस्त्यमुनिने वातापिको नष्ट किया था) ॥ १३ ॥

अगस्त्यश्चापि भगवानेतस्मिन् काल एव तु । पितॄन् ददर्श गर्ते वै लम्बमानानधोमुखान् ॥ १४ ॥ इन्हीं दिनों भगवान् अगस्त्यमुनि कहीं चले जा रहे थे। उन्होंने एक जगह अपने पितरोंको देखा जो एक गड्ढेमें नीचे मुँह किये लटक रहे थे ॥ १४ ॥

सोऽपृच्छल्लम्बमानांस्तान् भवन्त इव कम्पिताः ।
(किमर्थं वेह लम्बध्वं गर्ते यूयमधोमुखाः ।)
संतानहेतोरिति ते प्रत्यूचुर्ब्रह्मवादिनः ।। १५ ।।

तब उन लटकते हुए पितरोंसे अगस्त्यजीने पूछा—'आपलोग यहाँ किसलिये नीचे मुँह किये काँपते हुए-से लटक रहे हैं?' यह सुनकर उन वेदवादी पितरोंने उत्तर दिया—'संतानपरम्पराके लोपकी सम्भावनाके कारण हमारी यह दुर्दशा हो रही है' ।। १५ ।।
ते तस्मै कथयामासुर्वयं ते पितरः स्वकाः ।
गर्तमेतमनुप्राप्ता लम्बामः प्रसवार्थिनः ।। १६ ।।

उन्होंने अगस्त्यके पूछनेपर बताया कि 'हम तुम्हारे ही पितर हैं। संतानके इच्छुक होकर इस गड्ढेमें लटक रहे हैं' ।। १६ ।।
यदि नो जनयेथास्त्वमगस्त्यापत्यमुत्तमम् ।
स्यान्नोऽस्मान्निरयान्मोक्षस्त्वं च पुत्राप्नुया गतिम् ।। १७ ।।

'अगस्त्य! यदि तुम हमारे लिये उत्तम संतान उत्पन्न कर सको तो हम इस नरकसे छुटकारा पा सकते हैं और बेटा! तुम्हें भी सद्गति प्राप्त होगी' ।। १७ ।।
स तानुवाच तेजस्वी सत्यधर्मपरायणः ।

करिष्ये पितरः कामं व्येतु वो मानसो ज्वरः ॥ १८ ॥ तब सत्यधर्मपरायण तेजस्वी अगस्त्यने उनसे कहा—'पितरो! मैं आपकी इच्छा पूर्ण करूँगा। आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये' ॥ १८ ॥

ततः प्रसवसंतानं चिन्तयन् भगवानृषिः । आत्मनः प्रसवस्यार्थे नापश्यत् सदृशीं स्त्रियम् ॥ १९ ॥ तब भगवान् महर्षि अगस्त्यने संतानोत्पादनकी चिन्ता करते हुए अपने अनुरूप संतानको गर्भमें धारण करनेके लिये योग्य पत्नीका अनुसंधान किया, परंतु उन्हें कोई योग्य स्त्री दिखायी नहीं दी ॥ १९ ॥

स तस्य तस्य सत्त्वस्य तत् तदङ्गमनुत्तमम् । संगृह्य तत्समैरङ्गैर्निर्ममे स्त्रियमुत्तमाम् ॥ २० ॥ तब उन्होंने एक-एक जन्तुके उत्तमोत्तम अंगोंका भावनाद्वारा संग्रह करके उन सबके द्वारा एक परम सुन्दर स्त्रीका निर्माण किया ॥ २० ॥

स तां विदर्भराजस्य पुत्रार्थं तप्यतस्तपः । निर्मितामात्मनोऽर्थाय मुनिः प्रादान्महातपाः ॥ २१ ॥ उन दिनों विदर्भराज पुत्रके लिये तपस्या कर रहे थे। महातपस्वी अगस्त्यमुनिने अपने लिये निर्मित की हुई वह स्त्री राजाको दे दी ॥ २१ ॥

सा तत्र जज्ञे सुभगा विद्युत् सौदामनी यथा । विभ्राजमाना वपुषा व्यवर्धत शुभानना ॥ २२ ॥ उस सुन्दरी कन्याका उस राजभवनमें बिजलीके समान प्रादुर्भाव हुआ। वह शरीरसे प्रकाशमान हो रही थी। उसका मुख बहुत सुन्दर था, वह राजकन्या वहाँ दिनोदिन बढ़ने लगी ॥ २२ ॥

जातमात्रां च तां दृष्ट्वा वैदर्भः पृथिवीपतिः । प्रहर्षेण द्विजातिभ्यो न्यवेदयत भारत ॥ २३ ॥ भरतनन्दन! राजा विदर्भने उस कन्याके उत्पन्न होते ही हर्षमें भरकर ब्राह्मणोंको यह शुभ संवाद सुनाया ॥

अभ्यनन्दन्त तां सर्वे ब्राह्मणा वसुधाधिप । लोपामुद्रेति तस्याश्च चक्रिरे नाम ते द्विजाः ॥ २४ ॥ राजन्! उस समय सब ब्राह्मणोंने राजाका अभिनन्दन किया और उस कन्याका नाम 'लोपामुद्रा' रख दिया ॥ २४ ॥

ववृधे सा महाराज बिभ्रती रूपमुत्तमम् । अप्सुवोत्पलिनी शीघ्रमग्नेरिव शिखा शुभा ॥ २५ ॥ महाराज! उत्तम रूप धारण करनेवाली वह राजकुमारी जलमें कमलिनी तथा यज्ञवेदीपर प्रज्वलित शुभ्र अग्निशिखाकी भाँति शीघ्रतापूर्वक बढ़ने लगी ॥ २५ ॥

तां यौवनस्थां राजेन्द्र शतं कन्याः स्वलंकृताः ।
दास्यः शतं च कल्याणीमुपातस्थुर्वशानुगाः ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! जब उसने युवावस्थामें पदार्पण किया, उस समय उस कल्याणी कन्याको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सौ सुन्दरी कन्याएँ और सौ दासियाँ उसकी आज्ञाके अधीन होकर घेरे रहतीं और उसकी सेवा किया करती थीं ॥ २६ ॥
सा स्म दासीशतवृता मध्ये कन्याशतस्य च ।
आस्ते तेजस्विनी कन्या रोहिणीव दिवि प्रभा ॥ २७ ॥
सौ दासियों और सौ कन्याओंके बीचमें वह तेजस्विनी कन्या आकाशमें सूर्यकी प्रभा तथा नक्षत्रोंमें रोहिणीके समान सुशोभित होती थी ॥ २७ ॥
यौवनस्थामपि च तां शीलाचारसमन्विताम् ।
न वव्रे पुरुषः कश्चिद् भयात् तस्य महात्मनः ॥ २८ ॥
यद्यपि वह युवती और शील एवं सदाचारसे सम्पन्न थी तो भी महात्मा अगस्त्यके भयसे किसी राजकुमारने उसका वरण नहीं किया ॥ २८ ॥
सा तु सत्यवती कन्या रूपेणाप्सरसोऽप्यति ।
तोषयामास पितरं शीलेन स्वजनं तथा ॥ २९ ॥
वह सत्यवती राजकुमारी रूपमें अप्सराओंसे भी बढ़कर थी। उसने अपने शील-स्वभावसे पिता तथा स्वजनोंको संतुष्ट कर दिया था ॥ २९ ॥
वैदर्भीं तु तथायुक्तां युवतीं प्रेक्ष्य वै पिता ।
मनसा चिन्तयामास कस्मै दद्यामिमां सुताम् ॥ ३० ॥
पिता विदर्भराजकुमारीको युवावस्थामें प्रविष्ट हुई देख मन-ही-मन यह विचार करने लगे कि ‘इस कन्याका किसके साथ विवाह करूँ’ ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां अगस्त्योपाख्याने षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३० १/३ श्लोक हैं]

अध्याय (पृष्ठ 696)

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सप्तनवतितमोऽध्यायः

महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गङ्गाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान

लोमश उवाच

यदा त्वमन्यतागस्त्यो गार्हस्थ्ये तां क्षमामिति ।
तदाभिगम्य प्रोवाच वैदर्भं पृथिवीपतिम् ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जब मुनिवर अगस्त्यजीको यह मालूम हो गया कि विदर्भराजकुमारी मेरी गृहस्थी चलानेके योग्य हो गयी है, तब वे विदर्भ-नरेशके पास जाकर बोले— ॥ १ ॥

राजन् निवेशे बुद्धिर्मे वर्तते पुत्रकारणात् ।
वरये त्वां महीपाल लोपामुद्रां प्रयच्छ मे ॥ २ ॥
‘राजन्! पुत्रोत्पत्तिके लिये मेरा विवाह करनेका विचार है। अतः महीपाल! मैं आपकी कन्याका वरण करता हूँ। आप लोपामुद्राको मुझे दे दीजिये’ ॥ २ ॥

एवमुक्तः स मुनिना महीपालो विचेतनः ।
प्रत्याख्यानाय चाशक्तः प्रदातुं चैव नैच्छत ॥ ३ ॥
मुनिवर अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विदर्भराजके होश उड़ गये। वे न तो अस्वीकार कर सके और न उन्होंने अपनी कन्या देनेकी इच्छा ही की ॥ ३ ॥

ततः स भार्यामभ्येत्य प्रोवाच पृथिवीपतिः ।
महर्षिर्वीर्यवानेष क्रुद्धः शापाग्निना दहेत् ॥ ४ ॥
तब विदर्भनरेश अपनी पत्नीके पास जाकर बोले—‘प्रिये! ये महर्षि अगस्त्य बड़े शक्तिशाली हैं। यदि कुपित हों तो हमें शापकी अग्निसे भस्म कर सकते हैं’ ॥ ४ ॥

तं तथा दुःखितं दृष्ट्वा सभार्यं पृथिवीपतिम् ।
लोपामुद्राभिगम्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
रानीसहित महाराजको इस प्रकार दुःखी देख लोपामुद्रा उनके पास गयी और समयके अनुसार इस प्रकार बोली— ॥ ५ ॥

न मत्कृते महीपाल पीडामभ्येतुमर्हसि ।
प्रयच्छ मामगस्त्याय त्राह्यात्मानं मया पितः ॥ ६ ॥
‘राजन्! आपको मेरे लिये दुःख नहीं मानना चाहिये। पिताजी! आप मुझे अगस्त्यजीकी सेवामें दे दें और मेरे द्वारा अपनी रक्षा करें’ ॥ ६ ॥

दुहितुर्वचनाद् राजा सोऽगस्त्याय महात्मने ।