भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2390)

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विनवतितमोऽध्यायः

कौरवोंका शोक, भीम आदि पाण्डवोंका हर्ष, कौरव-सेनाका पलायन और दुःखित शल्यका दुर्योधनको सान्त्वना देना

संजय उवाच

शल्यस्तु कर्णार्जुनयोर्विमर्दे
बलानि दृष्ट्वा मृदितानि बाणैः।
ययौ हते चाधिरथौ पदानुगे
रथेन संछिन्नपरिच्छदेन ॥ १ ॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! कर्ण और अर्जुनके संग्राममें बाणोंद्वारा सारी सेनाएँ रौंद डाली गयी थीं और अधिरथपुत्र कर्ण पैदल होकर मारा गया था। यह सब देखकर राजा शल्य, जिसका आवरण एवं अन्य सारी सामग्री नष्ट कर दी गयी थी, उस रथके द्वारा वहाँसे चल दिये ॥ १ ॥

निपातितस्यन्दनवाजिनागं
बलं च दृष्ट्वा हतसूतपुत्रम्।
दुर्योधनोऽश्रुप्रतिपूर्णनेत्रो
दीनो मुहुर्निःश्वसंश्चार्तरूपः ॥ २ ॥

कौरव-सेनाके रथ, घोड़े और हाथी मार डाले गये थे। सूतपुत्रका भी वध कर दिया गया था। उस अवस्थामें उस सेनाको देखकर दुर्योधनकी आँखोंमें आँसू भर आये और वह बारंबार लंबी साँस खींचता हुआ दीन एवं दुःखी हो गया ॥ २ ॥

कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां
शराचितं शोणितदिग्धगात्रम्।
यदृच्छया सूर्यमिवावनिस्थं
दिदृक्षवः सम्परिवार्य तस्थुः ॥ ३ ॥

शूरवीर कर्ण पृथ्वीपर पड़ा हुआ था। उसके शरीरमें बहुत-से बाण व्याप्त हो रहे थे तथा सारा अंग खूनसे लथपथ हो रहा था। उस अवस्थामें दैवेच्छासे पृथ्वीपर उतरे हुए सूर्यके समान उसे देखनेके लिये सब लोग उसकी लाशको घेरकर खड़े हो गये ॥ ३ ॥

प्रहृष्टवित्रस्तविषण्णविस्मिता-
स्तथा परे शोकहता इवाभवन्।
परे त्वदीयाश्च परस्परेण

यथायथैषां प्रकृतिस्तथाभवन् ॥ ४ ॥ कोई प्रसन्न था तो कोई भयभीत। कोई विषादग्रस्त था तो कोई आश्चर्यचकित तथा दूसरे बहुत-से लोग शोकसे मृतप्राय हो रहे थे। आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमेंसे जिसकी जैसी प्रकृति थी, वे परस्पर उसी भावमें मग्न थे ॥

प्रविद्धवर्माभरणाम्बरायुधं धनंजयेनाभिहतं महौजसम् । निशाम्य कर्णं कुरवः प्रदुद्रुवु- र्हतर्षभा गाव इवाजने वने ॥ ५ ॥ जिसके कवच, आभूषण, वस्त्र और अस्त्र-शस्त्र छिन्न-भिन्न होकर पड़े थे, उस महाबली कर्णको अर्जुनद्वारा मारा गया देख कौरव-सैनिक निर्जन वनमें साँड़के मारे जानेपर भागनेवाली गायोंके समान इधर-उधर भाग चले ॥

भीमश्च भीमेन तदा स्वनेन नादं कृत्वा रोदसीः कम्पयानः । आस्फोटयन् वल्गते नृत्यते च हते कर्णे त्रासयन् धार्तराष्ट्रान् ॥ ६ ॥ कर्णके मारे जानेपर धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भयभीत करते हुए भीमसेन भयंकर स्वरसे सिंहनाद करके आकाश और पृथ्वीको कँपाने तथा ताल ठोंककर नाचने-कूदने लगे ॥

तथैव राजन् सोमकाः सृञ्जयाश्च शङ्खान् दध्मुः सस्वजुश्चापि सर्वे । परस्परं क्षत्रिया हृष्टरूपाः सूतात्मजे वै निहते तदानीम् ॥ ७ ॥ राजन्! इसी प्रकार समस्त सोमक और सृंजय भी शंख बजाने और एक-दूसरेको छातीसे लगाने लगे। सूतपुत्रके मारे जानेपर उस समय पाण्डवदलके सभी क्षत्रिय परस्पर हर्षमग्न हो रहे थे ॥ ७ ॥

कृत्वा विमर्दं महदर्जुनेन कर्णो हतः केसरिणेव नागः । तीर्णा प्रतिज्ञा पुरुषर्षभेण वैरस्यान्तं गतवांश्चापि पार्थः ॥ ८ ॥ जैसे सिंह हाथीको पछाड़ देता है, उसी प्रकार पुरुषप्रवर अर्जुनने बड़ी भारी मार-काट मचाकर कर्णका वध किया, अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और उन्होंने वैरका अन्त कर दिया ॥ ८ ॥

मद्राधिपश्चापि विमूढचेता- स्तूर्णं रथेनापकृतध्वजेन ।

दुर्योधनस्यान्तिकमेत्य राजन् सबाष्पदुःखाद् वचनं बभाषे ॥ ९ ॥ राजन्! जिसकी ध्वजा काट दी गयी थी, उस रथके द्वारा मद्रराज शल्य भी विमूढ़चित्त होकर तुरंत दुर्योधनके पास गये और दुःखसे आँसू बहाते हुए इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥ विशीर्णनागाश्वरथप्रवीरं बलं त्वदीयं यमराष्ट्रकल्पम् । अन्योन्यमासाद्य हतं महद्भि- र्नरश्वनागैर्गिरिकूटकल्पैः ॥ १० ॥ ‘नरेश्वर! तुम्हारी सेनाके हाथी, घोड़े, रथ और प्रमुख वीर नष्ट-भ्रष्ट हो गये। सारी सेनामें यमराजका राज्य-सा हो गया है। पर्वतशिखरोंके समान विशाल हाथी, घोड़े और पैदल मनुष्य एक-दूसरेसे टक्कर लेकर अपने प्राण खो बैठे हैं ॥ १० ॥ नैतादृशं भारत युद्धमासीद् यथा तु कर्णार्जुनयोर्बभूव । ग्रस्तौ हि कर्णेन समेत्य कृष्णा- वन्ये च सर्वे तव शत्रवो ये ॥ ११ ॥ ‘भारत! आज कर्ण और अर्जुनमें जैसा युद्ध हुआ है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। कर्णने धावा करके श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा तुम्हारे अन्य सब शत्रुओंको भी प्रायः प्राणोंके संकटमें डाल दिया था; परंतु कोई फल नहीं निकला ॥ ११ ॥ दैवं ध्रुवं पार्थवशात् प्रवृत्तं यत् पाण्डवान् पाति हिनस्ति चास्मान् । त्वदर्थसिद्धयर्थकरास्तु सर्वे प्रसह्य वीरा निहता द्विषद्भिः ॥ १२ ॥ ‘निश्चय ही दैव कुन्तीपुत्रोंके अधीन होकर काम कर रहा है; क्योंकि वह पाण्डवोंकी तो रक्षा करता है और हमारा विनाश। यही कारण है कि तुम्हारे अर्थकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करनेवाले प्रायः सभी वीर शत्रुओंके हाथसे बलपूर्वक मारे गये ॥ १२ ॥ कुबेरवैवस्वतवासवानां तुल्यप्रभावा नृपते सुवीराः । वीर्येण शौर्येण बलेन तेजसा तैस्तैस्तु युक्ता विविधैर्गुणौघैः ॥ १३ ॥ ‘राजन्! तुम्हारी सेनाके श्रेष्ठ वीर कुबेर, यम और इन्द्रके समान प्रभावशाली तथा बल, पराक्रम, शौर्य, तेज एवं अन्य नाना प्रकारके गुणसमूहोंसे सम्पन्न थे ॥ १३ ॥ अवध्यकल्पा निहता नरेन्द्रा- स्त्वदर्थकामा युधि पाण्डवेयैः ।

तन्मा शुचो भारत दिष्टमेतत् पर्यायश्वस त्वं न सदास्ति सिद्धिः ॥ १४ ॥ ‘जो-जो राजा तुम्हारे स्वार्थकी सिद्धि चाहनेवाले और अवध्यके समान थे, उन सबको पाण्डवोंने युद्धमें मार डाला। अतः भारत! तुम शोक न करो। यह सब प्रारब्धका खेल है। सबको सदा ही सिद्धि नहीं मिलती, ऐसा जानकर धैर्य धारण करो’ ॥ १४ ॥

एतद् वचो मद्रपतेर्निशम्य स्वं चाप्यनीतं मनसा निरीक्ष्य । दुर्योधनो दीनमना विसंज्ञः पुनः पुनर्न्यश्वसदार्तरूपः ॥ १५ ॥ मद्रराज शल्यकी ये बातें सुनकर और अपने अन्यायपर भी मन-ही-मन दृष्टि डालकर दुर्योधन बहुत उदास एवं दुःखी हो गया। वह अत्यन्त पीड़ित और अचेत-सा होकर बारंबार लंबी उसाँसें भरने लगा ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यप्रत्यागमने द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यका युद्धसे प्रत्यागमनविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2394)

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिनवतितमोऽध्यायः

भीमसेनद्वारा पचीस हजार पैदल सैनिकोंका वध, अर्जुनद्वारा रथसेनाका विध्वंस, कौरव-सेनाका पलायन और दुर्योधनका उसे रोकनेके लिये विफल प्रयास

धृतराष्ट्र उवाच

तस्मिंस्तु कर्णार्जुनयोर्विमर्दे
दग्धस्य रौद्रेऽहनि विद्रुतस्य।
बभूव रूपं कुरुसृञ्जयानां
बलस्य बाणोन्मथितस्य कीदृक् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! कर्ण और अर्जुनके उस संग्राममें, जबकि सबके लिये भयानक दिन उपस्थित हुआ था, बाणोंकी आगसे दग्ध और उन्मथित होकर भागती हुई कौरव-सेना तथा सृंजय-सेनाकी कैसी अवस्था हुई? ॥ १ ॥

संजय उवाच

शृणु राजन्नवहितो यथा वृत्तो महाक्षयः।
घोरो मनुष्यदेहानामाजौ च गजवाजिनाम् ॥ २ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! उस युद्धस्थलमें मनुष्यके शरीरों, हाथियों और घोड़ोंका जैसा घोर एवं महान् विनाश हुआ, वह सब सावधान होकर सुनिये ॥ २ ॥
यत्र कर्णे हते पार्थः सिंहनादमथाकरोत्।
तदा तव सुतान् राजन्नाविवेश महद् भयम् ॥ ३ ॥
महाराज! कर्णके मारे जानेपर अर्जुनने महान् सिंहनाद किया, उस समय आपके पुत्रोंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ॥ ३ ॥
न संधातुमनीकानि न चैवाशु पराक्रमे।
आसीद् बुद्धिर्हते कर्णे तव योधस्य कर्हिचित् ॥ ४ ॥
जब कर्णका वध हो गया, तब आपके किसी भी योद्धाका मन कदापि जल्दी पराक्रम दिखानेमें नहीं लगा और न सेनाको संगठित रखनेकी ओर ही किसीका ध्यान गया ॥ ४ ॥
वणिजो नावि भिन्नायामगाधे विप्लवे यथा।
अपारे पारमिच्छन्तो हते द्वीपे किरीटिना ॥ ५ ॥
अगाध एवं अपार समुद्रमें तूफान उठनेपर जब जहाज फट जाता है, उस समय पार जानेकी इच्छावाले व्यापारियोंकी जैसी अवस्था होती है, वही दशा किरीटधारी अर्जुनके द्वारा द्वीपस्वरूप कर्णके मारे जानेपर कौरवोंकी हुई ॥ ५ ॥

सूतपुत्रे हते राजन् वित्रस्ताः शस्त्रविक्षताः ।
अनाथा नाथमिच्छन्तो मृगाः सिंहैरिवार्दिताः ॥ ६ ॥
राजन्! सूतपुत्रका वध हो जानेपर सिंहसे पीड़ित हुए मृगोंके समान कौरव-सैनिक भयभीत हो उठे। वे अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल हो गये थे और अनाथ होकर अपने लिये कोई रक्षक चाहते थे ॥ ६ ॥

भग्नशृङ्गा वृषा यद्वद् भग्नदंष्ट्रा इवोरगाः ।
प्रत्यपायाम सायाह्ने निर्जिताः सव्यसाचिना ॥ ७ ॥
हम सब लोग सायंकालमें सव्यसाची अर्जुनसे परास्त होकर शिबिरकी ओर लौटे थे। उस समय हमारी दशा उन बैलोंके समान हो रही थी, जिनके सींग तोड़ दिये गये हों। हम उन सर्पोंके समान हो गये थे, जिनके विषैले दाँत नष्ट कर दिये गये हों ॥ ७ ॥

हतप्रवीरा विध्वस्ता निकृत्ता निशितैः शरैः ।
सूतपुत्रे हते राजन् पुत्रास्ते दुद्रुवुर्भयात् ॥ ८ ॥
राजन्! सूतपुत्रके मारे जानेपर पैने बाणोंसे क्षत-विक्षत एवं पराजित हुए आपके पुत्र भयके मारे भागने लगे। उनके प्रमुख वीर रणभूमिमें मारे जा चुके थे ॥ ८ ॥

विस्रस्तयन्त्रकवचाः कांदिग्भूता विचेतसः ।
अन्योन्यमवमृद्नन्तो वीक्षमाणा भयार्दिताः ॥ ९ ॥
उनके यन्त्र और कवच गिर गये थे। वे अचेत होकर यह भी नहीं सोच पाते थे कि हम भागकर किस दिशामें जायँ? एक-दूसरेको कुचलते और चारों ओर देखते हुए भयसे पीड़ित हो गये थे ॥ ९ ॥

मामेव नूनं बीभत्सुर्मामेव च वृकोदरः ।
अभियातीति मन्वानाः पेतुर्मम्लुश्च सम्भ्रमात् ॥ १० ॥
‘निश्चय अर्जुन मेरा ही पीछा कर रहे हैं। भीमसेन मेरी ही ओर चढ़े आ रहे हैं’ ऐसा मानते हुए कौरव-सैनिक घबराहटमें पड़कर गिर जाते थे। वे सब-के-सब उदास हो गये थे ॥ १० ॥

हयानन्ये गजानन्ये रथानन्ये महारथाः ।
आरुह्य जवसम्पन्नाः पदातीन् प्रजहुर्भयात् ॥ ११ ॥
कुछ लोग घोड़ोंपर, कुछ हाथियोंपर और कुछ दूसरे महारथी रथोंपर आरूढ़ हो भयके मारे बड़े वेगसे भागने लगे। उन्होंने पैदल सैनिकोंको वहीं छोड़ दिया ॥ ११ ॥

कुञ्जरैः स्यन्दनाः क्षुण्णाः सादिनश्च महारथैः ।
पदातिसंघाश्चाश्वौघैः पलायद्भिर्भयार्दितैः ॥ १२ ॥
भयभीत होकर भागते हुए हाथियोंने रथोंको चकनाचूर कर दिया। विशाल रथपर बैठे हुए महारथियोंने घुड़सवारोंको कुचल दिया और अश्वसमुदायोंने पैदलसमूहोंके कचूमर निकाल दिये ॥ १२ ॥

व्यालतस्करसंकीर्णे सार्थहीना यथा वने । सूतपुत्रे हते राजंस्तव योधास्तथाभवन् ॥ १३ ॥ राजन्! जैसे सर्पों और चोरों-बटमारोंसे भरे हुए वनमें अपने दलसे बिछुड़े हुए लोग अनाथ हो भारी विपत्तिमें पड़ जाते हैं, सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके योद्धाओंकी भी वैसी ही दशा हो गयी ॥ १३ ॥

हतारोहा यथा नागाश्छिन्नहस्ता यथा नराः । सर्वे पार्थमयं लोकं सम्पश्यन्तो भयार्दिताः ॥ १४ ॥ जिनके सवार मारे गये हों वे हाथी और जिनके हाथ काट लिये गये हों वे मनुष्य जैसी दुरवस्थामें पड़ जाते हैं वैसी ही दशामें पड़कर समस्त कौरव भयसे पीड़ित हो सारे जगत्को अर्जुनमय देखने लगे ॥ १४ ॥

सम्प्रेक्ष्य द्रवतः सर्वान् भीमसेनभयार्दितान् । दुर्योधनोऽथ स्वं सूतं हा हा कृत्वेदमब्रवीत् ॥ १५ ॥ महाराज! उस समय अपने समस्त योद्धाओंको भीमसेनके भयसे व्याकुल हो भागते देख दुर्योधनने हाहाकार करके अपने सारथिसे कहा— ॥ १५ ॥

नातिक्रमेच्च मां पार्थो धनुष्पाणिमवस्थितम् । जघने सर्वसैन्यानां शनैरश्वान् प्रचोदय ॥ १६ ॥ ‘सूत! तुम धीरे-धीरे रथ आगे बढ़ाओ। मैं सम्पूर्ण सेनाओंके पीछे जब हाथमें धनुष लेकर खड़ा होऊँगा, उस समय अर्जुन मुझे लाँघकर आगे नहीं बढ़ सकते ॥

युध्यमानं हि कौन्तेयं हनिष्यामि न संशयः । नोत्सहेन्मामतिक्रान्तुं वेलामिव महोदधिः ॥ १७ ॥ ‘यदि वे मुझसे युद्ध करेंगे तो मैं उन्हें निःसंदेह मार गिराऊँगा। जैसे महासागर अपनी तटभूमिको लाँघकर आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार वे भी मुझे लाँघ नहीं सकते ॥ १७ ॥

अद्यार्जुनं सगोविन्दं मानिनं च वृकोदरम् । हन्यां शिष्टांस्तथा शत्रून् कर्णस्यानृण्यमाप्नुयाम् ॥ १८ ॥ ‘आज मैं अर्जुन, श्रीकृष्ण और उस घमंडी भीमसेनको तथा बचे-खुचे दूसरे शत्रुओंको भी मार डालूँ, तभी कर्णके ऋणसे मुक्त हो सकता हूँ' ॥ १८ ॥

तच्छ्रुत्वा कुरुराजस्य शूरार्यसदृशं वचः । सूतो हेमपरिच्छन्नान् शनैरश्वानचोदयत् ॥ १९ ॥ कुरुराज दुर्योधनकी वह श्रेष्ठ शूरवीरोंके योग्य बात सुनकर सारथिने सोनेके साज-बाजसे सजे हुए घोड़ोंको धीरे-धीरे आगे बढ़ाया ॥ १९ ॥

रथाश्वनागहीनास्तु पादातास्तव मारिष । पञ्चविंशतिसाहस्रा युद्धायैव व्यवस्थिताः ॥ २० ॥

माननीय नरेश! उस समय रथों, घोड़ों और हाथियोंसे रहित आपके केवल पचीस हजार पैदल सैनिक ही युद्धके लिये डटे हुए थे ॥ २० ॥

तान् भीमसेनः संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः।
बलेन चतुरङ्गेण संवृत्याजघ्नतुः शरैः ॥ २१ ॥
उन सबको क्रोधमें भरे हुए भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने अपनी चतुरंगिणी सेनाद्वारा चारों ओरसे घेरकर बाणोंसे मारना आरम्भ किया ॥ २१ ॥

प्रत्ययुध्यन्त समरे भीमसेनं सपार्षतम्।
पार्थपार्षतयोश्चान्ये जगृहुस्तत्र नामनी ॥ २२ ॥
वे भी समरांगणमें भीमसेन और धृष्टद्युम्नका डटकर सामना करने लगे। उनमेंसे कितने ही योद्धा भीमसेन और धृष्टद्युम्नके नाम ले-लेकर उन्हें युद्धके लिये ललकारने लगे ॥ २२ ॥

अक्रुध्यत रणे भीमस्तैस्तदा पर्यवस्थितैः ।
सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं गदापाणिरयुध्यत ॥ २३ ॥
उस समय भीमसेन रणमें कुपित हो उठे और तुरंत ही रथसे नीचे उतरकर हाथमें गदा ले वहाँ खड़े हुए पैदल-सैनिकोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ २३ ॥

न तान् रथस्थो भूमिष्ठान् धर्मापेक्षी वृकोदरः।
योधयामास कौन्तेयो भुजवीर्यव्यपाश्रयः ॥ २४ ॥
कुन्तीनन्दन भीमसेन युद्धधर्मका पालन करनेवाले थे, इसलिये उन्होंने स्वयं रथपर बैठकर भूमिपर खड़े हुए पैदल-सैनिकोंके साथ युद्ध नहीं किया। उन्हें अपने बाहुबलका पूरा भरोसा था ॥ २४ ॥

जातरूपपरिच्छन्नां प्रगृह्य महतीं गदाम्।
अवधीत्तावकान् सर्वान् दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ २५ ॥
वे दण्डपाणि यमराजके समान सुवर्णजटित विशाल गदा हाथमें लेकर आपके समस्त सैनिकोंका वध करने लगे ॥ २५ ॥

पदातिनोऽपि संत्यज्य प्रियं जीवितमात्मनः।
भीममभ्यद्रवन् संख्ये पतङ्गा ज्वलनं यथा ॥ २६ ॥
वे पैदल सैनिक भी अपने प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर उस युद्धस्थलमें भीमसेनकी ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे पतंग आगपर टूट पड़ते हैं ॥ २६ ॥

आसाद्य भीमसेनं तु संरब्धा युद्धदुर्मदाः।
विनेशुः सहसा दृष्ट्वा भूतग्रामा इवान्तकम् ॥ २७ ॥
जैसे प्राणियोंके समुदाय यमराजको देखते ही प्राण त्याग देते हैं, उसी प्रकार वे रोषभरे रणदुर्मद सैनिक भीमसेनसे टक्कर लेकर सहसा नष्ट हो गये ॥ २७ ॥

श्येनवद् विचरन् भीमो गदाहस्तो महाबलः।

पञ्चविंशतिसाहस्त्रांस्तावकान् समपोथयत् ॥ २८ ॥ हाथमें गदा लिये बाजके समान विचरते हुए महाबली भीमसेनने आपके उन पचीसों हजार सैनिकोंको मार गिराया ॥ २८ ॥

हत्वा तत्पुरुषानीकं भीमः सत्यपराक्रमः । धृष्टद्युम्नं पुरस्कृत्य तस्थौ तत्र महाबलः ॥ २९ ॥ सत्यपराक्रमी महाबली भीमसेन उस पैदल सेनाका संहार करके धृष्टद्युम्नको आगे किये वहीं खड़े रहे ॥ २९ ॥

धनंजयो रथानीकमभ्यवर्तत वीर्यवान् । माद्रीपुत्रौ तु शकुनिं सात्यकिश्च महारथः ॥ ३० ॥ जवेनाभ्यपतन् हृष्टा घ्नन्तो दौर्योधनं बलम् । दूसरी ओर पराक्रमी अर्जुनने रथसेनापर आक्रमण किया। माद्रीकुमार नकुल-सहदेव और महारथी सात्यकि हर्षमें भरकर दुर्योधनकी सेनाका संहार करते हुए बड़े वेगसे शकुनिपर टूट पड़े ॥ ३० १/२ ॥

तस्याश्वसादीन् सुबहूंस्ते निहत्य शितैः शरैः ॥ ३१ ॥ समभ्यधावंस्त्वरितास्तत्र युद्धमभून्महत् । वे अपने पैने बाणोंद्वारा उसके बहुत-से घुड़सवारोंको मारकर तुरंत ही उसकी ओर भी दौड़े। फिर तो वहाँ बड़ा भारी युद्ध होने लगा ॥ ३१ १/२ ॥

धनंजयोऽपि चाभ्येत्य रथानीकं तव प्रभो ॥ ३२ ॥ विश्रुतं त्रिषु लोकेषु गाण्डीवं व्याक्षिपद् धनुः । प्रभो! अर्जुन भी आपकी रथसेनाके समीप जाकर त्रिभुवनविख्यात गाण्डीव धनुषकी टंकार करने लगे ॥ ३२ १/२ ॥

कृष्णसारथिमायान्तं दृष्ट्वा श्वेतहयं रथम् ॥ ३३ ॥ अर्जुनं चापि योद्धारं त्वदीयाः प्राद्रवन् भयात् । श्रीकृष्ण जिसके सारथि हैं, उस श्वेत घोड़ोंवाले रथ और अर्जुन-जैसे रथी योद्धाको आते देख आपके सैनिक भयसे भागने लगे ॥ ३३ १/२ ॥

विप्रहीणरथाश्चैव शरैश्च परिकर्षिताः ॥ ३४ ॥ पञ्चविंशतिसाहस्राः कालमार्छन् पदातयः । बहुतोंके रथ नष्ट हो गये और कितने ही बाणोंकी मारसे अत्यन्त घायल हो गये। इस प्रकार पचीस हजार पैदल सैनिक कालके गालमें चले गये ॥ ३४ १/२ ॥

हत्वा तान् पुरुषव्याघ्रः पञ्चालानां महारथः ॥ ३५ ॥ पुत्रः पाञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नो महामनाः । भीमसेनं पुरस्कृत्य नचिरात् प्रत्यदृश्यत ॥ ३६ ॥

महाधनुर्धरः श्रीमानमित्रगणतापनः ।
पांचालराजकुमार, पांचाल महारथी और महामनस्वी पुरुषसिंह धृष्टद्युम्न उन पैदल सैनिकोंका संहार करके भीमसेनको आगे किये शीघ्र ही वहाँ दिखायी दिये। वे महाधनुर्धर, तेजस्वी और शत्रुसमूहोंको संताप देनेवाले हैं ॥
पारावतसवर्णाश्वं कोविदारमयध्वजम् ।। ३७ ।।
धृष्टद्युम्नं रणे दृष्ट्वा त्वदीयाः प्राद्रवन् भयात् ।
धृष्टद्युम्नके रथके घोड़े कबूतरके समान रंगवाले थे, उनकी ध्वजापर कचनारके वृक्षका चिह्न था। धृष्टद्युम्नको रणमें उपस्थित देख आपके योद्धा भयसे भाग खड़े हुए ।।
गान्धारराजं शीघ्रास्त्रमनुसृत्य यशस्विनौ ।। ३८ ।।
नचिरात् प्रत्यदृश्येतां माद्रीपुत्रौ ससात्यकी ।
गान्धारराज शकुनि शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चला रहा था, यशस्वी माद्रीकुमार नकुल-सहदेव और सात्यकि तुरंत ही उसका पीछा करते दिखायी दिये ।। ३८ १/२ ।।
चेकितानः शिखण्डी च द्रौपदेयाश्च मारिष ।। ३९ ।।
हत्वा त्वदीयं सुमहत् सैन्यं शङ्खांस्तथाधमन् ।
माननीय नरेश! चेकितान, शिखण्डी और द्रौपदीके पाँचों पुत्र आपकी विशाल सेनाका विनाश करके शंख बजाने लगे ।। ३९ १/२ ।।
ते सर्वे तावकान् प्रेक्ष्य द्रवतोऽपि पराङ्मुखान् ।। ४० ।।
अभ्यवर्तन्त संरब्धान् वृषाञ्जित्वा यथा वृषाः ।
उन सबने आपके सैनिकोंको पीठ दिखाकर भागते देख उनका उसी प्रकार पीछा किया, जैसे साँड़ रोषमें भरे हुए दूसरे साँड़ोंको जीतकर उन्हें खदेड़ने लगते हैं ।। ४० १/२ ।।
सेनावशेषं तं दृष्ट्वा तव सैन्यस्य पाण्डवः ।। ४१ ।।
व्यवस्थितः सव्यसाची चुक्रोध बलवान् नृप ।
धनंजयो रथानीकमभ्यवर्तत वीर्यवान् ।। ४२ ।।
विश्रुतं त्रिषु लोकेषु व्याक्षिपद् गाण्डिवं धनुः ।
नरेश्वर! उस समय वहाँ खड़े हुए बलवान् पराक्रमी सव्यसाची पाण्डुपुत्र अर्जुन आपकी सेनाका कुछ भाग अवशिष्ट देखकर कुपित हो उठे और अपने त्रिलोकविख्यात गाण्डीवधनुषकी टंकार करते हुए आपकी रथसेनापर जा चढ़े ।। ४१-४२ १/२ ।।
तत एनाञ्शरव्रातैः सहसा समवाकिरत् ।। ४३ ।।
तमसा संवृतेनाथ न स्म किंचिद् व्यदृश्यत ।
उन्होंने अपने बाणसमूहोंद्वारा उन सबको सहसा आच्छादित कर दिया। उस समय सब ओर अन्धकार फैल गया; अतः कुछ भी दिखायी नहीं देता था ।। ४३ १/२ ।।
अन्धकारीकृते लोके रजोभूते महीतले ।। ४४ ।।

योधाः सर्वे महाराज तावकाः प्राद्रवन् भयात् । महाराज! इस प्रकार जब जगत्में अँधेरा छा गया और भूतलपर धूल-ही-धूल उड़ने लगी, तब आपके समस्त योद्धा भयभीत होकर भाग गये ॥ ४४ १/२ ॥ सम्भज्यमाने सैन्ये तु कुरुराजो विशाम्पते ॥ ४५ ॥ परानभिमुखांश्चैव सुतस्ते समुपाद्रवत् । ततो दुर्योधनः सर्वानजुहावाथ पाण्डवान् ॥ ४६ ॥ युद्धाय भरतश्रेष्ठ देवानिव पुरा बलिः । प्रजानाथ! आपकी सेनामें भगदड़ मच जानेपर आपके पुत्र कुरुराज दुर्योधनने अपने सामने खड़े हुए शत्रुओंपर धावा किया। भरतश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें राजा बलिने देवताओंको युद्धके लिये ललकारा था, उसी प्रकार दुर्योधनने भी समस्त पाण्डवोंका युद्धके लिये आह्वान किया ॥ त एनमभिगर्जन्तः सहिताः समुपाद्रवन् ॥ ४७ ॥ नानाशस्त्रभृतः क्रुद्धा भर्त्सयन्तो मुहुर्मुहुः । तब नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण किये कुपित पाण्डव-सैनिक एक साथ गर्जना करते हुए वहाँ दुर्योधनपर टूट पड़े और बारंबार उसे फटकारने लगे ॥ दुर्योधनोऽप्यसम्भ्रान्तस्तान् रणे निशितैः शरैः ॥ ४८ ॥ तत्रावधीत्ततः क्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः । तत् सैन्यं पाण्डवेयानां योधयामास सर्वतः ॥ ४९ ॥ इससे दुर्योधनको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। वह रणभूमिमें कुपित हो पैने बाणोंसे शत्रुपक्षके सैकड़ों और हजारों योद्धाओंका संहार करने लगा। वह सब ओर घूम-घूमकर पाण्डव-सेनाके साथ जूझ रहा था ॥ ४८-४९ ॥ तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम् । यदेकः सहितान् सर्वान् रणेऽयुध्यत पाण्डवान् ॥ ५० ॥ राजन्! वहाँ हमलोगोंने आपके पुत्रका यह अद्भुत पुरुषार्थ देखा कि उसने अकेले ही रणभूमिमें एक साथ आये हुए समस्त पाण्डवोंका डटकर सामना किया ॥ ५० ॥ ततोऽपश्यन्महात्मा स स्वसैन्यं भृशदुःखितम् । ततोऽवस्थाप्य राजेन्द्र कृतबुद्धिस्तवात्मजः ॥ ५१ ॥ हर्षयन्निव तान् योधानिदं वचनमब्रवीत् । राजेन्द्र! उस समय आपके बुद्धिमान् पुत्र महामनस्वी दुर्योधनने अपनी सेनाको जब बहुत दुःखी देखा, तब उन सबको सुस्थिर करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा — ॥ ५१ १/२ ॥ न तं देशं प्रपश्यामि यत्र याता भयार्दिताः ॥ ५२ ॥ गतानां यत्र वै मोक्षः पाण्डवात् किं गतेन वः ।

अल्पं च बलमेतेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ ।। ५३ ।। अद्य सर्वान् हनिष्यामि ध्रुवो हि विजयो भवेत् । 'योद्धाओ! तुम भयसे पीड़ित हो रहे हो। परंतु मैं ऐसा कोई स्थान नहीं देखता, जहाँ तुम भागकर जाओ और वहाँ जानेपर तुम्हें पाण्डुपुत्र अर्जुन या भीमसेनसे छुटकारा मिल जाय। ऐसी दशामें तुम्हारे भागनेसे क्या लाभ है? इन शत्रुओंके पास थोड़ी-सी ही सेना बच गयी है। श्रीकृष्ण और अर्जुन भी बहुत घायल हो चुके हैं; अतः आज मैं इन सब लोगोंको मार डालूँगा। हमारी विजय अवश्य होगी ।।

विप्रयातांस्तु वो भिन्नान् पाण्डवाः कृतकिल्बिषान् ।। ५४ ।। अनुसृत्य वधिष्यन्ति श्रेयान् नः समरे वधः । 'यदि तुम अलग-अलग होकर भागोगे तो पाण्डव तुम सब अपराधियोंका पीछा करके तुम्हें मार डालेंगे। ऐसी दशामें युद्धमें मारा जाना ही हमारे लिये श्रेयस्कर है ।।

सुखं सांग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम् ।। ५५ ।। मृतो दुःखं न जानीते प्रेत्य चानन्त्यमश्रुते । 'क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीरोंकी संग्राममें सुखपूर्वक मृत्यु होती है। वहाँ मरे हुएको मृत्युके दुःखका अनुभव नहीं होता और परलोकमें जानेपर उसे अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है ।। ५५ १/२ ।।

शृणुध्वं क्षत्रियाः सर्वे यावन्तः स्थ समागताः ।। ५६ ।। यदा शूरं च भीरुं च मारयत्यन्तको यमः । को नु मूढो न युध्येत मादृशः क्षत्रियव्रतः ।। ५७ ।। 'तुम जितने क्षत्रिय वीर यहाँ आये हो सभी कान खोलकर सुन लो। जब प्राणियोंका अन्त करनेवाला यमराज शूरवीर और कायर दोनोंको ही मार डालता है, तब मेरे-जैसा क्षत्रियव्रतका पालन करनेवाला होकर भी कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो युद्ध नहीं करेगा? ।। ५६-५७ ।।

द्विषतो भीमसेनस्य क्रुद्धस्य वशमेष्यथ । पितामहैराचरितं न धर्मं हातुमर्हथ ।। ५८ ।। 'हमारा शत्रु भीमसेन क्रोधमें भरा हुआ है। यदि भागोगे तो उसके वशमें पड़कर मारे जाओगे; अतः अपने बाप-दादोंके द्वारा आचरणमें लाये हुए क्षत्रिय-धर्मका परित्याग न करो ।। ५८ ।।

न ह्यधर्मोऽस्ति पापीयान् क्षत्रियस्य पलायनात् । न युद्धधर्माच्छ्रेयो हि पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः । अचिरेण हता लोकान् सद्यो योधाः समश्रुत ।। ५९ ।। 'कौरववीरो! क्षत्रियके लिये युद्धसे पीठ दिखाकर भागनेसे बढ़कर दूसरा कोई महान् पाप नहीं है तथा युद्धधर्मके पालनसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्गकी प्राप्तिका कल्याणकारी

मार्ग भी नहीं है; अतः योद्धाओ! तुम युद्धमें मारे जाकर शीघ्र ही उत्तम लोकोंके सुखका अनुभव करो' ॥ ५९ ॥

संजय उवाच

एवं ब्रुवति पुत्रे ते सैनिका भृशविक्षताः ।
अनवेक्ष्यैव तद्वाक्यं प्राद्रवन् सर्वतो दिशः ॥ ६० ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! आपका पुत्र इस प्रकार व्याख्यान देता ही रह गया; किंतु अत्यन्त घायल हुए सैनिक उसकी बातपर ध्यान दिये बिना ही सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ६० ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कौरवसैन्यपलायने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कौरवसेनाका पलायनविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2403)

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्नवतितमोऽध्यायः

शल्यके द्वारा रणभूमिका दिग्दर्शन, कौरव-सेनाका पलायन और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनका शिविरकी ओर गमन

संजय उवाच

दृष्ट्वा तु सैन्यं परिवर्तमानं
 पुत्रेण ते मद्रपतिस्तदानीम् ।
संत्रस्तरूपः परिमूढचेता
 दुर्योधनं वाक्यमिदं बभाषे ॥ १ ॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! आपके पुत्रद्वारा सेनाको पुनः लौटानेका प्रयत्न होता देख उस समय भयभीत और मूढ़चित्त हुए मद्रराज शल्यने दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

शल्य उवाच

पश्येदमग्रं नरवाजिनागै-
 रायोधनं वीरहतैः सुपूर्णम् ।
महीधराभैः पतितैश्च नागैः
 सकृत्प्रभिन्नैः शरभिन्नदेहैः ॥ २ ॥
सुविह्वलद्भिश्च गतासुभिश्च
 प्रध्वस्तवर्मायुधचर्मखड्गैः ।
वज्रापविद्धैरिव चाचलोत्तमै-
 र्विभिन्नपाषाणमहाद्रुमौषधैः ॥ ३ ॥
प्रविद्धघण्टाङ्कुशतोमरध्वजैः
 सहेमजालै रुधिरौघसम्प्लुतैः ।
शरावभिन्नैः पतितैस्तुरङ्गमैः
 श्वसद्भिरार्तैः क्षतजं वमद्भिः ॥ ४ ॥
दीनं स्तनद्भिः परिवृत्तनेत्रै-
 र्महीं दशद्भिः कृपणं नदद्भिः ।
तथापविद्धैर्गजवाजियोधैः
 शरापविद्धैरथ वीरसंघैः ॥ ५ ॥
मन्दासुभिश्चैव गतासुभिश्च
 नराश्वनागैश्च रथैश्च मर्दितैः ।
मन्दांशुभिश्चैव मही महाहवे

नूनं यथा वैतरणीव भाति ॥ ६ ॥ **शल्य बोले—**वीर नरेश! देखो, मारे गये मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंकी लाशोंसे भरा हुआ यही युद्धस्थल कैसा भयंकर जान पड़ता है? पर्वताकार गजराज, जिनके मस्तकोंसे मदकी धारा फूटकर बहती थी, एक ही साथ बाणोंकी मारसे शरीर विदीर्ण हो जानेके कारण धराशायी हो गये हैं। उनमेंसे कितने ही वेदनासे छटपटा रहे हैं, कितनोंके प्राण निकल गये हैं। उनपर बैठे हुए सवारोंके कवच, अस्त्र-शस्त्र, ढाल और तलवार आदि नष्ट हो गये हैं। इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो वज्रके आघातसे बड़े-बड़े पर्वत ढह गये हों और उनके प्रस्तरखण्ड, विशाल वृक्ष तथा औषधसमूह छिन्न-भिन्न हो गये हों। उन गजराजोंके घंटा, अंकुश, तोमर और ध्वज आदि सभी वस्तुएँ बाणोंके आघातसे टूट-फूटकर बिखर गयी हैं। उन हाथियोंके ऊपर सोनेकी जालीसे युक्त आवरण पड़ा है। उनकी लाशें रक्तके प्रवाहसे नहा गयी हैं। घोड़े बाणोंसे विदीर्ण होकर गिरे हैं, वेदनासे व्यथित हो उच्छ्वास लेते और मुखसे रक्त वमन करते हैं। वे दीनतापूर्ण आर्तनाद कर रहे हैं। उनकी आँखें घूम रही हैं। वे धरतीमें दाँत गड़ाते और करुण चीत्कार करते हैं। हाथी, घोड़े, पैदल सैनिक तथा वीरसमुदाय बाणोंसे क्षत-विक्षत हो मरे पड़े हैं। किन्हींकी साँसें कुछ-कुछ चल रही हैं और कुछ लोगोंके प्राण सर्वथा निकल गये हैं। हाथी, घोड़े, मनुष्य और रथ कुचल दिये गये हैं। इन सबकी कान्ति मन्द पड़ गयी है। इनके कारण उस महासमरकी भूमि निश्चय ही वैतरणीके समान प्रतीत होती है ॥ २—६ ॥

गजैर्निकृत्तैर्वरहस्तगात्रै- रुद्वेपमानैः पतितैः पृथिव्याम् । विशीर्णदन्तैः क्षतजं वमद्भिः स्फुरद्भिरार्तैः करुणं नदद्भिः ॥ ७ ॥ हाथियोंके शुण्डदण्ड और शरीर छिन्न-भिन्न हो गये हैं। कितने ही हाथी पृथ्वीपर गिरकर काँप रहे हैं, कितनोंके दाँत टूट गये हैं और वे खून उगलते तथा छटपटाते हुए वेदनाग्रस्त हो करुण स्वरमें कराह रहे हैं ॥ ७ ॥

निकृत्तचक्रेषयुगैः सयोक्त्रैः प्रविद्धतूणीरपताककेतुभिः । सुवर्णजालावततैर्भृशाहतै- र्महारथौघैर्जलदैरिवावृता ॥ ८ ॥ बड़े-बड़े रथोंके समूह इस रणभूमिमें बादलोंके समान छा गये हैं। उनके पहिये, बाण, जूए और बन्धन कट गये हैं। तरकस, ध्वज और पताकाएँ फेंकी पड़ी हैं; सोनेके जालसे आवृत्त हुए वे रथ बहुत ही क्षतिग्रस्त हो गये हैं ॥ ८ ॥

यशस्विभिर्नागरथाश्वयोधिभिः पदातिभिश्चाभिमुखैर्हतैः परैः ।

विशीर्णवर्माभरणाम्बरायुधै- वृता प्रशान्तैरिव तावकैर्मही ॥ ९ ॥

हाथी, रथ और घोड़ोंपर सवार होकर युद्ध करनेवाले यशस्वी योद्धा और पैदल वीर सामने लड़ते हुए शत्रुओंके हाथसे मारे गये हैं। उनके कवच, आभूषण, वस्त्र और आयुध सभी छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये हैं। इस प्रकार शान्त पड़े हुए आपके प्राणहीन योद्धाओंसे यह पृथ्‍वी पट गयी है ॥ ९ ॥

शरप्रहाराभिहतैर्महाबलै- रवेक्ष्यमाणैः पतितैः सहस्रशः । दिवश्च्युतैर्भूरतिदीप्तिमद्भि- र्नक्तं ग्रहैद्यौरमलप्रदीप्तैः ॥ १० ॥

बाणोंके प्रहारसे घायल होकर गिरे हुए सहस्रों महाबली योद्धा आकाशसे नीचे गिरे हुए अत्यन्त दीप्तिमान् एवं निर्मल प्रभासे प्रकाशित ग्रहोंके समान दिखायी देते हैं और उनसे ढकी हुई यह भूमि रातके समय उन ग्रहोंसे व्याप्त हुए आकाशके सदृश सुशोभित होती है ॥ १० ॥

प्रणष्टसंज्ञैः पुनरुच्छ्वसद्भि- र्मही बभूवानुगतैरिवाग्निभिः । कर्णार्जुनाभ्यां शरभिन्नगात्रै- र्हतैः प्रवीरैः कुरुसृञ्जयानाम् ॥ ११ ॥

कर्ण और अर्जुनके बाणोंसे जिनके अंग-अंग छिन्न-भिन्न हो गये हैं, उन मारे गये कौरव-संजय वीरोंकी लाशोंसे भरी हुई भूमि यज्ञमें स्थापित हुई अग्नियोंके द्वारा यज्ञभूमिके समान सुशोभित होती है। उनमेंसे कितने ही वीरोंकी चेतना लुप्त हो गयी है और कितने ही पुनः साँस ले रहे हैं ॥ ११ ॥

शरास्तु कर्णार्जुनबाहुमुक्ता विदार्य नागाश्वमनुष्यदेहान् । प्राणान् निरस्याशु महीं प्रतीयु- र्महोरगा वासमिवातिताम्राः ॥ १२ ॥

कर्ण और अर्जुनके हाथोंसे छूटे हुए बाण हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंको विदीर्ण करके उनके प्राण निकालकर तुरंत पृथ्वीमें घुस गये थे, मानो अत्यन्त लाल रंगके विशाल सर्प अपनी बिलमें जा घुसे हों ॥

हतैर्मनुष्याश्वगजैश्च संख्ये शरापविद्धैश्च रथैनरिन्द्र । धनंजयस्याधिरथेश्च मार्गणै- रगम्यरूपा वसुधा बभूव ॥ १३ ॥

नरेन्द्र! अर्जुन और कर्णके बाणोंद्वारा मारे गये हाथी, घोड़े एवं मनुष्योंसे तथा बाणोंसे नष्ट-भ्रष्ट होकर गिरे पड़े रथोंसे इस पृथ्वीपर चलना-फिरना असम्भव हो गया है ।। १३ ।। रथैर्वरिष्ठून्मथितैः सुकल्पैः सयोधशस्त्रैश्च वरायुधैर्ध्वजैः । विशीर्णयोक्त्रैर्विनिकृत्तबन्धनै- र्निकृत्तचक्राक्षयुगत्रिवेणुभिः ॥ १४ ॥ सजे-सजाये रथ बाणोंके आघातसे मथ डाले गये हैं। उनके साथ जो योद्धा, शस्त्र, श्रेष्ठ आयुध और ध्वज आदि थे, उनकी भी यही दशा हुई है। उनके पहिये, बन्धनरज्जु, धुरे, जूए और त्रिवेणु काष्ठके भी टुकड़े-टुकड़े हो गये हैं ॥ १४ ॥ विमुक्तशस्त्रैश्च तथा व्युपस्करै- र्हतानुकर्षैर्विनिषङ्गबन्धनैः । प्रभग्ननीडैर्मणिहेमभूषितैः स्तृता मही द्यौरिव शारदैर्घनैः ॥ १५ ॥ उनपर जो अस्त्र-शस्त्र रखे गये थे, वे सब दूर जा पड़े हैं। सारी सामग्री नष्ट हो गयी है। अनुकर्ष, तूणीर और बन्धनरज्जु—ये सब-के-सब नष्ट-भ्रष्ट हो गये हैं। उन रथोंकी बैठकें टूट-फूट गयी हैं। सुवर्ण और मणियोंसे विभूषित उन रथोंद्वारा आच्छादित हुई पृथ्वी शरद्-ऋतुके बादलोंसे ढके हुए आकाशके समान जान पड़ती है ॥ १५ ॥ विकृष्यमाणैर्जवनैस्तुरङ्गमै- र्हतेश्वरै राजरथैः सुकल्पितैः । मनुष्यमातङ्गरथाश्वराशिभि- र्द्रुतं व्रजन्तो बहुधा विचूर्णिताः ॥ १६ ॥ जिनके स्वामी (रथी) मारे गये हैं, राजाओंके उन सुसज्जित रथोंको, जब वेगशाली घोड़े खींचे लिये जाते थे और झुंड-के-झुंड मनुष्य, हाथी, साधारण रथ और अश्व भी भागे जा रहे थे, उस समय उनके द्वारा शीघ्रतापूर्वक भागनेवाले बहुत-से मनुष्य कुचलकर चूर-चूर हो गये हैं ॥ १६ ॥ सहेमपट्टाः परिघाः परश्वधाः शिताश्च शूला मुसलानि मुद्गराः । पेतुश्च खड्गा विमला विकोशा गदाश्च जाम्बूनदपट्टनद्धाः ॥ १७ ॥ सुवर्ण-पत्रसे जड़े गये परिघ, फरसे, तीखे शूल, मूसल, मुद्गर, म्यानसे बाहर निकाली हुई चमचमाती तलवारें और स्वर्णजटित गदाएँ जहाँ-तहाँ बिखरी पड़ी हैं ॥ १७ ॥ चापानि रुक्माङ्गदभूषणानि शराश्च कार्तस्वरचित्रपुङ्खाः ।

ऋष्ट्यश्च पीता विमला विकोशाः प्रासाश्च दण्डैः कनकावभासैः ॥ १८ ॥ छत्राणि वालव्यजनानि शङ्खा- श्छिन्नापविद्धाश्च स्रजो विचित्राः । सुवर्णमय अंगदोंसे विभूषित धनुष, सोनेके विचित्र पंखवाले बाण, ऋष्टि, पानीदार एवं कोशरहित निर्मल खड्ग तथा सुनहरे डंडोंसे युक्त प्रास, छत्र, चँवर, शंख और विचित्र मालाएँ छिन्न-भिन्न होकर फेंकी पड़ी हैं ॥ कुथाः पताकाम्बरभूषणानि किरीटमाला मुकुटाश्च शुभ्राः ॥ १९ ॥ प्रकीर्णका विप्रकीर्णाश्च राजन् प्रवालमुक्तातरालाश्च हाराः । राजन्! हाथीकी पीठपर बिछाये जानेवाले कम्बल या झूल, पताका, वस्त्र, आभूषण, किरीटमाला, उज्ज्वल मुकुट, श्वेत चामर, मूँगे और मोतियोंके हार—से सब-के-सब इधर-उधर बिखरे पड़े हैं ॥ १९ १/२ ॥ आपीडकेयूरवराङ्गदानि ग्रैवेयनिष्काः ससुवर्णसूत्राः ॥ २० ॥ मण्युत्तमा वज्रसुवर्णमुक्ता रत्नानि चोच्चावचमङ्गलानि । गात्राणि चात्यन्तसुखोचितानि शिरांसि चेन्दुप्रतिमाननानि ॥ २१ ॥ देहांश्च भोगांश्च परिच्छदांश्च त्यक्त्वा मनोज्ञानि सुखानि चैव । स्वधर्मनिष्ठां महतीमवाप्य व्याप्याशु लोकान् यशसा गतास्ते ॥ २२ ॥ शिरोभूषण, केयूर, सुन्दर अंगद, गलेके हार, पदक, सोनेकी जंजीर, उत्तम मणि, हीरे, सुवर्ण तथा मुक्ता आदि छोटे-बड़े मांगलिक रत्न, अत्यन्त सुख भोगनेके योग्य शरीर, चन्द्रमाको भी लज्जित करनेवाले मुखसे युक्त मस्तक, देह, भोग, आच्छादन-वस्त्र तथा मनोरम सुख—इन सबको त्यागकर स्वधर्मकी पराकाष्ठाका पालन करते हुए सम्पूर्ण लोकोंमें अपने यशका विस्तार करके वे वीर सैनिक दिव्य लोकोंमें पहुँच गये हैं ॥ २०—२२ ॥ निवर्त दुर्योधन यान्तु सैनिका व्रजस्व राजन् शिबिराय मानद । दिवाकरोऽप्येष विलम्बते प्रभो

पुनस्त्वमेवात्र नरेन्द्र कारणम् ॥ २३ ॥
दूसरोंको सम्मान देनेवाले राजा दुर्योधन! अब लौटो। इन सैनिकोंको भी जाने दो। शिबिरमें चलो। प्रभो! ये भगवान् सूर्य भी अस्ताचलपर लटक रहे हैं। नरेन्द्र! तुम्हीं इस नर-संहारके प्रधान कारण हो ॥ २३ ॥
इत्येवमुक्त्वा विरराम शल्यो
दुर्योधनं शोकपरीतचेताः ।
हा कर्ण हा कर्ण इति ब्रुवाण-
मार्तं विसंज्ञं भृशमश्रुनेत्रम् ॥ २४ ॥
दुर्योधनसे ऐसा कहकर राजा शल्य चुप हो गये। उनका चित्त शोकसे व्याकुल हो रहा था। दुर्योधन भी आर्त होकर 'हा कर्ण! हा कर्ण!' पुकारने लगा। वह सुध-बुध खो बैठा था। उसके नेत्रोंसे वेगपूर्वक आँसुओंकी अविरल धारा बह रही थी ॥ २४ ॥
तं द्रोणपुत्रप्रमुखा नरेन्द्राः
सर्वे समाश्वास्य मुहुः प्रयान्ति ।
निरीक्षमाणा मुहुरर्जुनस्य
ध्वजं महान्तं यशसा ज्वलन्तम् ॥ २५ ॥
द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तथा अन्य सभी नरेश बारंबार आकर दुर्योधनको सान्त्वना देते और अर्जुनके महान् ध्वजको, जो उनके उज्ज्वल यशसे प्रकाशित हो रहा था, देखते हुए फिर लौट जाते थे ॥ २५ ॥
नराश्वमातङ्गशरीरजेन
रक्तेन सिक्तां च तथैव भूमिम् ।
रक्ताम्बरस्रक् तपनीययोगा-
न्नारीं प्रकाशामिव सर्वगम्याम् ॥ २६ ॥
मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके शरीरसे बहते हुए रक्तकी धारासे वहाँकी भूमि ऐसी सिंच गयी थी कि लाल वस्त्र, लाल फूलोंकी माला तथा तपाये हुए सुवर्णके आभूषण धारण करके सबके सामने आयी हुई सर्वगम्या नारी (वेश्या)-के समान प्रतीत होती थी ॥ २६ ॥
प्रच्छन्नरूपां रुधिरेण राजन्
रौद्रे मुहूर्तेऽतिविराजमाने ।
नैवावतस्थुः कुरवः समीक्ष्य
प्रव्राजिता देवलोकाय सर्वे ॥ २७ ॥
राजन्! अत्यन्त शोभा पानेवाले उस रौद्रमुहूर्त (सायंकाल)-में, रुधिरसे जिसका स्वरूप छिप गया था, उस भूमिको देखते हुए कौरव-सैनिक वहाँ ठहर न सके। वे सब-के-सब देवलोककी यात्राके लिये उद्यत थे ॥ २७ ॥
वधेन कर्णस्य तु दुःखितास्ते

हा कर्ण हा कर्ण इति ब्रुवाणाः । द्रुतं प्रयाताः शिबिराणि राजन् दिवाकरं रक्तमवेक्षमाणाः ॥ २८ ॥ महाराज! समस्त कौरव कर्णके वधसे अत्यन्त दुःखी हो ‘हा कर्ण! हा कर्ण!’ की रट लगाते और लाल सूर्यकी ओर देखते हुए बड़े वेगसे शिबिरकी ओर चले ॥ २८ ॥

गाण्डीवमुक्तैस्तु सुवर्णपुङ्खैः शिलाशितैः शोणितदिग्धवाजैः । शरैश्चिताङ्गो युधि भाति कर्णो हतोऽपि सन् सूर्य इवांशुमाली ॥ २९ ॥ गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सुवर्णमय पंखवाले और शिलापर तेज किये हुए बाणोंसे कर्णका अंग-अंग बिंध गया था। उन बाणोंकी पाँखें रक्तमें डूबी हुई थीं। उनके द्वारा युद्धस्थलमें पड़ा हुआ कर्ण मर जानेपर भी अंशुमाली सूर्यके समान सुशोभित हो रहा था ॥ २९ ॥

कर्णस्य देहं रुधिरावसिक्तं भक्तानुकम्पी भगवान् विवस्वान् । स्पृष्ट्वांशुभिर्लोहितरक्तरूपः सिष्णासुरभ्येति परं समुद्रम् ॥ ३० ॥ भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान् सूर्य खूनसे भीगे हुए कर्णके शरीरका किरणोंद्वारा स्पर्श करके रक्तके समान ही लालरूप धारणकर मानो स्नान करनेकी इच्छासे पश्चिम समुद्रकी ओर जा रहे थे ॥ ३० ॥

इतीव संचिन्त्य सुरर्षिसंघाः सम्प्रस्थिता यान्ति यथा निकेतनम् । संचिन्तयित्वा जनता विसस्रु- र्यथासुखं खं च महीतलं च ॥ ३१ ॥ इस युद्धके ही विषयमें सोच-विचार करते हुए देवताओं तथा ऋषियोंके समुदाय वहाँसे प्रस्थित हो अपने-अपने स्थानको चल दिये और इसी विषयका चिन्तन करते हुए अन्य लोग भी सुखपूर्वक अन्तरिक्ष अथवा भूतलपर अपने-अपने निवासस्थानको चले गये ॥ ३१ ॥

तदद्भुतं प्राणभृतां भयंकरं निशाम्य युद्धं कुरुवीरमुख्ययोः । धनंजयस्याधिरथेश्च विस्मिताः प्रशंसमानाः प्रययुस्तदा जनाः ॥ ३२ ॥ कौरव तथा पाण्डवपक्षके उन प्रमुख वीर अर्जुन और कर्णका वह अद्भुत तथा प्राणियोंके लिये भयंकर युद्ध देखकर सब लोग आश्चर्यचकित हो उनकी प्रशंसा करते हुए