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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

१५१-

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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना

भीष्म उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच तं मुनिं जनमेजयः ।
गर्ह्यं भवान् गर्हयते निन्द्यं निन्दति मां पुनः ॥ १ ॥
धिक्कार्यं मां धिक्कुरुते तस्मात् त्वाहं प्रसादये ।

**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! मुनिवर इन्द्रोतके ऐसा कहनेपर जनमेजयने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—'मुने! मैं घृणा और तिरस्कारके योग्य हूँ; इसीलिये आप मेरा तिरस्कार करते हैं। मैं निन्दाका पात्र हूँ; इसीलिये बार-बार मेरी निन्दा करते हैं। मैं धिक्कारने और दुत्कारनेके ही योग्य हूँ; इसीलिये आपकी ओरसे मुझे धिक्कार मिल रहा है और इसीलिये मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ ॥ १ १/२ ॥

सर्वं हीदं दुष्कृतं मे ज्वालाम्यग्नाविवोहितः ॥ २ ॥
स्वकर्मण्यभिसंधाय नाभिनन्दति मे मनः ।

'यह सारा पाप मुझमें मौजूद है; अतः मैं चिन्तासे उसी प्रकार जल रहा हूँ, मानो किसीने मुझे आगके भीतर रख दिया हो। अपने कुकर्मोंको याद करके मेरा मन स्वतः प्रसन्न नहीं हो रहा है ॥ २ १/२ ॥

प्राप्य घोरं भयं नूनं मया वैवस्वतादपि ॥ ३ ॥
तत्तु शल्यमनिहृत्य कथं शक्ष्यामि जीवितुम् ।
सर्वं मन्युं विनीय त्वमभि मां वद शौनक ॥ ४ ॥

'निश्चय ही मुझे यमराजसे भी घोर भय प्राप्त होनेवाला है, यह बात मेरे हृदयमें काँटेकी भाँति चुभ रही है। अपने हृदयसे इसको निकाले बिना मैं कैसे जीवित रह सकूँगा? अतः शौनकजी! आप समस्त क्रोधका त्याग करके मुझे उद्धारका कोई उपाय बताइये ॥ ३-४ ॥

महानासं ब्राह्मणानां भूयो वक्ष्यामि साम्प्रतम् ।
अस्तु शेषं कुलस्यास्य मा पराभूदिदं कुलम् ॥ ५ ॥

'मैं ब्राह्मणोंका महान् भक्त रहा हूँ; इसीलिये इस समय पुनः आपसे निवेदन करता हूँ कि मेरे इस कुलका कुछ भाग अवश्य शेष रहना चाहिये। समूचे कुलका पराभव या विनाश नहीं होना चाहिये ॥ ५ ॥

न हि नो ब्रह्मशप्तानां शेषं भवितुमर्हति ।

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स्तुतीरलभमानानां संविदं वेदनिश्चितान् ॥ ६ ॥ निर्विद्यमानः सुभृशं भूयो वक्ष्यामि शाश्वतम् । भूयश्चैवाभिरक्षन्तु निर्धनान् निर्जना इव ॥ ७ ॥ ‘ब्राह्मणोंके शाप दे देनेपर हमारे कुलका कुछ भी शेष नहीं रह जायगा। हम अपने पापके कारण न तो समाजमें प्रशंसा पा रहे हैं न सजातीय बन्धुओंके साथ एकमत ही हो रहे हैं; अतः अत्यन्त खेद और विरक्तिको प्राप्त होकर हम पुनः वेदोंका निश्चयात्मक ज्ञान रखनेवाले आप-जैसे ब्राह्मणोंसे सदा यही कहेंगे कि जैसे निर्जन स्थानमें रहनेवाले योगीजन पापी पुरुषोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आपलतो अपनी दयासे ही हम-जैसे दुखी मनुष्योंकी रक्षा करें’ ॥ ६-७ ॥

न ह्ययज्ञा अमुं लोकं प्राप्नुवन्ति कथञ्चन । आपातान् प्रतितिष्ठन्ति पुलिन्दशबरा इव ॥ ८ ॥ ‘जो क्षत्रिय अपने पापके कारण यज्ञके अधिकारसे वंचित हो जाते हैं, वे पुलिन्दों और शबरोंके समान नरकोंमें ही पड़े रहते हैं। किसी प्रकार परलोकमें उत्तम गतिको नहीं पाते’ ॥ ८ ॥

अविज्ञायैव मे प्रज्ञां बालस्येव स पण्डितः । ब्रह्मन् पितेव पुत्रस्य प्रीतिमान् भव शौनक ॥ ९ ॥ ‘ब्रह्मन्! शौनक! आप विद्वान् हैं और मैं मूर्ख। आप मेरी बालबुद्धिपर ध्यान न देकर जैसे पिता पुत्रपर स्वभावतः संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मुझपर भी प्रसन्न होइये’ ॥ ९ ॥

शौनक उवाच

किमाश्चर्यं यदप्राज्ञो बहु कुर्यादसाम्प्रतम् । इति वै पण्डितो भूत्वा भूतानां नानुकुप्यते ॥ १० ॥ शौनकनै कहा—यदि अज्ञानी मनुष्य अयुक्त कार्य भी कर बैठे तो इसमें कौन-सी आश्चर्यकी बात है; अतः इस रहस्यको जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह प्राणियोंपर क्रोध न करे ॥ १० ॥

प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्य शोचते जनान् । जगतीस्थानिवाद्रिस्थः प्रज्ञया प्रतिपत्स्यति ॥ ११ ॥ जो विशुद्ध बुद्धिकी अट्टालिकापर चढ़कर स्वयं शोकसे रहित हो दूसरे दुखी मनुष्योंके लिये शोक करता है, वह अपने ज्ञानबलसे सब कुछ उसी प्रकार जान लेता है, जैसे पर्वतकी चोटीपर खड़ा हुआ मनुष्य उस पर्वतके आस-पासकी भूमिपर रहनेवाले सब लोगोंको देखता रहता है ॥ ११ ॥

न चोपलभ्यते तेन न चाश्चर्याणि कुर्वते । निर्विण्णात्मा परोक्षो वा धिक्कृतः पूर्वसाधुषु ॥ १२ ॥

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जो प्राचीन श्रेष्ठ पुरुषोंसे विरक्त हो उनके दृष्टिपथसे दूर रहता है तथा उनके द्वारा धिक्कारको प्राप्त होता रहता है, उसे ज्ञानकी उपलब्धि नहीं होती है और ऐसे पुरुष के लिये दूसरे लोग आश्चर्य भी नहीं करते हैं ॥ १२ ॥ विदितं भवतो वीर्यं माहात्म्यं वेद आगमे । कुरुष्वेह यथाशान्ति ब्रह्म शरणमस्तु ते ॥ १३ ॥ तुम्हें ब्राह्मणोंकी शक्तिका ज्ञान है। वेदों और शास्त्रोंमें जो उनकी महिमा उपलब्ध होती है, उसका भी पता है; अतः तुम शान्तिपूर्वक ऐसा प्रयत्न करो, जिससे ब्राह्मणजाति तुम्हें शरण दे सके ॥ १३ ॥ तद् वै पारत्रिकं तात ब्राह्मणानामकुप्यताम् । अथवा तप्यसे पापे धर्ममेवानुपश्य वै ॥ १४ ॥ तात! क्रोधरहित ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये जो कुछ किया जाता है वह पारलौकिक लाभका ही हेतु होता है। अथवा यदि तुम्हें पापके लिये पश्चात्ताप होता है तो तुम निरन्तर धर्मपर ही दृष्टि रक्खो ॥ १४ ॥

जनमेजय उवाच अनुतप्ये च पापेन न च धर्मं विलोपये । बुभूषुं भजमानं च प्रीतिमान् भव शौनक ॥ १५ ॥ **जनमेजयने कहा—**शौनक! मुझे अपने पापके कारण बड़ा पश्चात्ताप होता है, अब मैं धर्मका कभी लोप नहीं करूँगा। मुझे कल्याण प्राप्त करनेकी इच्छा है; अतः आप मुझ भक्तपर प्रसन्न होइये ॥ १५ ॥

शौनक उवाच छित्त्वां दम्भं च मानं च प्रीतिमिच्छामि ते नृप । सर्वभूतहितं तिष्ठ धर्मं चैव प्रतिस्मरन् ॥ १६ ॥ **शौनक बोले—**नरेश्वर! मैं तुम्हें तुम्हारे दम्भ और अभिमानका नाश करके तुम्हारा प्रिय करना चाहता हूँ। तुम धर्मका निरन्तर स्मरण रखते हुए समस्त प्राणियोंके हितका साधन करो ॥ १६ ॥ न भयान्न च कार्पण्यान्न लोभात् त्वामुपाह्वये । तां मे दैवीं गिरं सत्यां शृणु त्वं ब्राह्मणैः सह ॥ १७ ॥ राजन्! मैं भयसे, दीनतासे और लोभसे भी तुम्हें अपने पास नहीं बुलाता हूँ। तुम इन ब्राह्मणोंके सहित दैवीवाणीके समान मेरी यह सच्ची बात कान खोलकर सुन लो ॥ १७ ॥ सोऽहं न केनचिच्चार्थी त्वां च धर्मादुपाह्वये । क्रोशतां सर्वभूतानां हाहा धिगिति जल्पताम् ॥ १८ ॥

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मैं तुमसे कोई वस्तु लेनेकी इच्छा नहीं रखता। यदि समस्त प्राणी मुझे खोटी-खरी सुनाते रहें, हाय-हाय मचाते रहें और धिक्कार देते रहें तो भी उनकी अवहेलना करके मैं तुम्हें केवल धर्मके कारण निकट आनेके लिये आमन्त्रित करता हूँ॥ १८॥

वक्ष्यन्ति मामधर्मज्ञं त्यक्ष्यन्ति सुहृदो जनाः।
ता वाचः सुहृदः श्रुत्वा संज्वरिष्यन्ति मे भृशम्॥ १९॥
मुझे लोग अधर्मज्ञ कहेंगे। मेरे हितैषी सुहृद् मुझे त्याग देंगे तथा तुम्हें धर्मोपदेश देनेकी बात सुनकर मेरे सुहृद् मुझपर अत्यन्त रोषसे जल उठेंगे॥ १९॥

केचिदेव महाप्राज्ञाः प्रतिज्ञास्यन्ति तत्त्वतः।
जानीहि मत्कृतं तात ब्राह्मणान् प्रति भारत॥ २०॥
तात! भारत! कोई-कोई महाज्ञानी पुरुष ही मेरे अभिप्रायको यथार्थरूपसे समझ सकेंगे। ब्राह्मणोंके प्रति भलाई करनेके लिये ही मेरी यह सारी चेष्टा है। यह तुम अच्छी तरह जान लो॥ २०॥

यथा ते मत्कृते क्षेमं लभन्ते ते तथा कुरु।
प्रतिजानीहि चाद्रोहं ब्राह्मणानां नराधिप॥ २१॥
ब्राह्मणलोग मेरे कारण जैसे भी सकुशल रहें, वैसा ही प्रयत्न तुम करो। नरेश्वर! तुम मेरे सामने यह प्रतिज्ञा करो कि अब मैं ब्राह्मणोंसे कभी द्रोह नहीं करूँगा॥ २१॥

जनमेजय उवाच

नैव वाचा न मनसा पुनर्जातु न कर्मणा।
द्रोग्धास्मि ब्राह्मणान् विप्र चरणावपि ते स्पृशे॥ २२॥
**जनमेजयने कहा—**विप्रवर! मैं आपके दोनों चरण छूकर शपथपूर्वक कहता हूँ कि मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी ब्राह्मणोंसे द्रोह नहीं करूँगा॥ २२॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि इन्द्रोतपारिक्षितीये
एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें इन्द्रोत और पारिक्षितका संवाद विषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५१॥

इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुनः अपने राज्यमें प्रवेश

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुनः अपने राज्यमें प्रवेश

शौनक उवाच

तस्मात् तेऽहं प्रवक्ष्यामि धर्ममावृत्तचेतसे ।
श्रीमान् महाबलस्तुष्टः स्वयं धर्ममवेक्षसे ॥ १ ॥
**शौनकने कहा—**राजन्! तुमने ऐसी प्रतिज्ञा की है, इससे जान पड़ता है कि तुम्हारा मन पापकी ओरसे निवृत्त हो गया है; इसलिये मैं तुम्हें धर्मका उपदेश करूँगा; क्योंकि तुम श्रीसम्पन्न, महाबलवान् और संतुष्टचित्त हो। साथ ही स्वयं धर्मपर दृष्टि रखते हो ॥ १ ॥

पुरस्ताद् दारुणो भूत्वा सुचित्रतरमेव तत् ।
अनुगृह्णाति भूतानि स्वेन वृत्तेन पार्थिवः ॥ २ ॥
राजा पहले कठोर स्वभावका होकर पीछे कोमल भावका अवलम्बन करके जो अपने सद्व्यवहारसे समस्त प्राणियों पर अनुग्रह करता है, वह अत्यन्त आश्चर्यकी ही बात है ॥ २ ॥

कृत्स्नं नूनं स दहति इति लोको व्यवस्यति ।
यत्र त्वं तादृशो भूत्वा धर्ममेवानुपश्यसि ॥ ३ ॥
चिरकालतक तीक्ष्ण स्वभावका आश्रय लेनेवाला राजा निश्चय ही अपना सब कुछ जलाकर भस्म कर डालता है, ऐसी लोगोंकी धारणा है; परंतु तुम वैसे होकर भी जो धर्मपर ही दृष्टि रख रहे हो, यह कम आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ३ ॥

हित्वा तु सुचिरं भक्ष्यं भोज्यांश्च तप आस्थितः ।
इत्येतदभिभूतानामद्भुतं जनमेजय ॥ ४ ॥
जनमेजय! तुम जो दीर्घकालसे भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थोंका परित्याग करके तपस्यामें लगे हुए हो, यह पापसे अभिभूत हुए मनुष्योंके लिये अद्भुत बात है ॥

योऽदुर्लभो भवेद् दाता कृपणो वा तपोधनः ।
अनाश्चर्यं तदित्याहुर्नातिदूरेण वर्तते ॥ ५ ॥
यदि धन-सम्पन्न पुरुष दानी हो एवं कृपण या दरिद्र मनुष्य तपस्याका धनी हो जाय तो इसे आश्चर्यकी बात नहीं मानते हैं; क्योंकि ऐसे पुरुषोंका दान और तपसे सम्पन्न होना अधिक कठिन नहीं है ॥ ५ ॥

एतदेव हि कार्पण्यं समग्रमसमीक्षितम् ।

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यच्चेत् समीक्ष्यैव स्याद् भवेत् तस्मिंस्ततो गुणः ॥ ६ ॥ यदि सारी बातोंपर पूर्वापर विचार न करके कोई कार्य आरम्भ किया जाय तो यही कायरतापूर्ण दोष है और यदि भलीभाँति आलोचना करके कोई कार्य हो तो यही उसमें गुण माना जाता है ॥ ६ ॥

यज्ञो दानं दया वेदाः सत्यं च पृथिवीपते । पञ्चैतानि पवित्राणि षष्ठं सुचरितं तपः ॥ ७ ॥ पृथ्वीनाथ! यज्ञ, दान, दया, वेद, और सत्य—ये पाँचों पवित्र बताये गये हैं। इनके साथ अच्छी तरह आचरणमें लाया हुआ तप भी छठा पवित्र कर्म माना गया है ॥ ७ ॥

तदेव राज्ञां परमं पवित्रं जनमेजय । तेन सम्यग्गृहीतेन श्रेयांसं धर्ममाप्स्यसि ॥ ८ ॥ जनमेजय! राजाओंके लिये ये छहों वस्तुएँ परम पवित्र हैं। इन्हें भलीभाँति आचरणमें लानेपर तुम श्रेष्ठतम धर्मको प्राप्त कर लोगे ॥ ८ ॥

पुण्यदेशाभिगमनं पवित्रं परमं स्मृतम् । अत्राप्युदाहरन्तीमां गाथां गीतां ययातिना ॥ ९ ॥ पुण्य तीर्थोंकी यात्रा करना भी परम पवित्र माना गया है। इस विषयमें विज्ञ पुरुष राजा ययातिकी गायी हुई इस गाथाका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ९ ॥

यो मर्त्यः प्रतिपद्येत आयुर्जीवितमात्मनः । यज्ञमेकान्ततः कृत्वा तत् संन्यस्य तपश्चरेत् ॥ १० ॥ जो मनुष्य अपने लिये दीर्घ जीवनकी इच्छा रखता है, वह यत्नपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करके फिर उसे त्यागकर तपस्यामें लग जाय ॥ १० ॥

पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात् सरस्वतीम् । सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम् ॥ ११ ॥ कुरुक्षेत्रको पवित्र तीर्थ बताया गया। कुरुक्षेत्रसे अधिक पवित्र सरस्वती नदी है, उससे भी अधिक पवित्र उसके भिन्न-भिन्न तीर्थ हैं। उन तीर्थोंमें भी दूसरोंकी अपेक्षा पृथूदक तीर्थको श्रेष्ठ कहा गया है ॥ ११ ॥

यत्रावगाह्य पीत्वा च नैनं श्वोमरणं तपेत् । महासरः पुष्कराणि प्रभासोत्तरमानसे ॥ १२ ॥ कालोदकं च गन्तासि लब्धायुर्जीविते पुनः । सरस्वतीदृषद्वत्योः संगमो मानसः सरः ॥ १३ ॥ उसमें स्नान करने और उसका जल पीनेसे मनुष्यको कल ही होनेवाली मृत्युका भय नहीं सताता अर्थात् वह कृतकृत्य हो जाता है। इस कारण मरनेसे नहीं डरता। यदि तुम महासरोवर पुष्कर, प्रभास, उत्तर मानस, कालोदक, दृषद्वती और सरस्वतीके संगम तथा

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मानसरोवर आदि तीर्थोंमें जाकर स्नान करोगे तो तुम्हें पुनः अपने जीवनके लिये दीर्घायु प्राप्त होगी ।। १२-१३ ।।

स्वाध्यायशीलः स्थानेषु सर्वेषु समुपस्पृशेत् ।
त्यागधर्मः पवित्राणां संन्यासं मनुरब्रवीत् ।। १४ ।।
सभी तीर्थस्थानोंमें स्वाध्यायशील होकर स्नान करे। मनुने कहा है कि सर्वत्यागरूप संन्यास सम्पूर्ण पवित्र धर्मोंमें श्रेष्ठ है ।। १४ ।।

अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथाः सत्यवता कृताः ।
यथा कुमारः सत्यो वै नैव पुण्यो न पापकृत् ।। १५ ।।
इस विषयमें भी सत्यवान् द्वारा निर्मित हुई इन गाथाओंका उदाहरण दिया जाता है। जैसे बालक रण-द्वेषसे शून्य होनेके कारण सदा सत्यपरायण ही रहता है। न तो वह पुण्य करता है और न पाप ही। इसी प्रकार प्रत्येक श्रेष्ठ पुरुषको भी होना चाहिये ।। १५ ।।

न ह्यास्ति सर्वभूतेषु दुःखमस्मिन् कुतः सुखम् ।
एवं प्रकृतिभूतानां सर्वसंसर्गयायिनाम् ।। १६ ।।
त्यजतां जीवितं श्रेयो निवृत्ते पुण्यपापके ।
इस संसारके सम्पूर्ण प्राणियोंमें जब दुःख ही नहीं है, तब सुख कहाँसे हो सकता है? यह सुख और दुःख दोनों ही प्रकृतिस्थ प्राणियोंके धर्म हैं, जो कि सब प्रकारके संसर्गदोषको स्वीकार करके उनके अनुसार चलते हैं। जिन्होंने ममता और अहंकार आदिके साथ सब कुछ त्याग दिया है, जिनके पुण्य और पाप सभी निवृत्त हो चुके हैं, ऐसे पुरुषोंका जीवन ही कल्याणमय है ।। १६ ½ ।।

यत्त्वेव राज्ञो ज्यायिष्ठं कार्याणां तद् ब्रवीमि ते ।। १७ ।।
बलेन संविभागैश्च जय स्वर्गं जनेश्वर ।
यस्यैव बलमोजश्च स धर्मस्य प्रभूर्नरः ।। १८ ।।
अब मैं राजाके कार्योंमें जो सबसे श्रेष्ठ है, उसका वर्णन करता हूँ। जनेश्वर! तुम धैर्ययुक्त बल और दानके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त करो। जिसके पास बल और ओज है, वही मनुष्य धर्माचरणमें समर्थ होता है ।। १७-१८ ।।

ब्राह्मणानां सुखार्थं हि त्वं पाहि वसुधां नृप ।
यथैवैतान् पुराऽऽक्षैप्सीस्तथैवैतान् प्रसादय ।। १९ ।।
नरेश्वर! तुम ब्राह्मणोंको सुख पहुँचानेके लिये ही सारी पृथ्वीका पालन करो। जैसे पहले इन ब्राह्मणोंपर आक्षेप किया था, वैसे इन सबको अपने सद्बर्तावसे प्रसन्न करो ।। १९ ।।

अपि धिक्क्रियमाणोऽपि त्यज्यमानोऽप्यनेकधा ।
आत्मनो दर्शनाद् विप्रान्न हन्तास्मीति मार्गय ।
घटमानः स्वकार्येषु कुरु निःश्रेयसं परम् ।। २० ।।

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वे बार-बार तुम्हें धिक्कारें और फटकारकर दूर हटा दें तो भी उनमें आत्मदृष्टि रखकर तुम यही निश्चय करो कि अब मैं ब्राह्मणोंको नहीं मारूँगा। अपने कर्तव्यपालनके लिये पूरी चेष्टा करते हुए परम कल्याणका साधन करो ॥ २० ॥ हिमाग्निघोरसदृशो राजा भवति कश्चन ।
लांगलाशनिकल्पो वा भवेदन्यः परंतप ॥ २१ ॥
परंतप! कोई राजा बर्फके समान शीतल होता है, कोई अग्निके समान ताप देनेवाला होता है, कोई यमराजके समान भयानक जान पड़ता है, कोई घास-फूसका मूलोच्छेद करनेवाले हलके समान दुष्टोंका समूल उन्मूलन करनेवाला होता है तथा कोई पापाचारियोंपर अकस्मात् वज्रके समान टूट पड़ता है ॥ २१ ॥
न विशेषेण गन्तव्यमविच्छिन्नेन वा पुनः ।
न जातु नाहमस्मीति सुप्रसक्तमसाधुषु ॥ २२ ॥
कभी मेरा अभाव नहीं हो जाय, ऐसा समझकर राजाको चाहिये कि दुष्ट पुरुषोंका संग कभी न करे। न तो उनके किसी विशेष गुणपर आकृष्ट हो, न उनके साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध स्थापित करे और न उनमें अत्यन्त आसक्त ही हो ॥ २२ ॥
विकर्मणा तप्यमानः पापाद् विपरिमुच्यते ।
नैतत् कार्यं पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते ॥ २३ ॥
यदि कोई शास्त्रविरुद्ध कर्म बन जाय तो उसके लिये पश्चात्ताप करनेवाला पुरुष पापसे मुक्त हो जाता है। यदि दूसरी बार पाप बन जाय तो ‘अब फिर ऐसा काम नहीं करूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा करनेसे वह पापमुक्त हो सकता है ॥ २३ ॥
करिष्ये धर्ममेवेति तृतीयात् परिमुच्यते ।
शुचिस्तीर्थान्यनुचरन् बहुत्वात्परिमुच्यते ॥ २४ ॥
‘आजसे केवल धर्मका ही आचरण करूँगा’ ऐसा नियम लेनेसे वह तीसरी बारके पापसे छुटकारा पा जाता है और पवित्र तीर्थोंमें विचरण करनेवाला पुरुष अनेक बारके किये हुए बहुसंख्यक पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २४ ॥
कल्याणमनुकर्तव्यं पुरुषेण बुभूषता ।
ये सुगन्धीनि सेवन्ते तथागन्धा भवन्ति ते ॥ २५ ॥
ये दुर्गन्धीनि सेवते तथागन्धा भवन्ति ते ।
तपश्चर्यापरः सद्यः पापाद् विपरिमुच्यते ॥ २६ ॥
सुखकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको कल्याणकारी कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये। जो सुगन्धित पदार्थोंका सेवन करते हैं, उनके शरीरसे सुगन्ध निकलती है और जो सदा दुर्गन्धका सेवन करते हैं, वे अपने शरीरसे दुर्गन्ध ही फैलाते हैं। जो मनुष्य तपस्यामें तत्पर होता है, वह तत्काल सारे पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २५-२६ ॥
संवत्सरमुपास्याग्निमभिशस्तः प्रमुच्यते ।

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त्रीणि वर्षाण्युपास्याग्निं भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥ २७ ॥ लगातार एक वर्षतक अग्निहोत्र करनेसे कलंकित पुरुष अपने ऊपर लगे हुए कलंकसे छूट जाता है। तीन वर्षोंतक अग्निकी उपासना करनेसे भ्रूणहत्यारा भी पापमुक्त हो जाता है ॥ २७ ॥

महासरः पुष्कराणि प्रभासोत्तरमानसे । अभ्येत्य योजनशतं भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥ २८ ॥ महासरोवर पुष्कर, प्रभास तीर्थ तथा उत्तर मानसरोवर आदि तीर्थोंमें सौ योजनतककी पैदल यात्रा करनेसे भी भ्रूणहत्याके पापसे छुटकारा मिल जाता है ॥ २८ ॥

यावतः प्राणिनो हन्यात् तज्जातीयांस्तु तावतः । प्रमीयमानानुन्मोच्य प्राणिहा विप्रमुच्यते ॥ २९ ॥ प्राणियोंकी हत्या करनेवाला मनुष्य जितने प्राणियोंका वध करता है, उसी जातिके उतने ही प्राणियोंको मृत्युसे छुटकारा दिला दे अर्थात् उनको मरनेके संकटसे छुड़ा दे तो वह उनकी हत्याके पापसे मुक्त हो जाता है ॥ २९ ॥

अपि चाप्सु निमज्जेत जपेस्त्रिरघमर्षणम् । यथाश्वमेधावभृथस्तथा तन्मनुरब्रवीत् ॥ ३० ॥ यदि मनुष्य तीन बार अघमर्षणका जप करते हुए जलमें गोता लगावे तो उसे अश्वमेधयज्ञमें अवभृथस्नान करनेका फल मिलता है, ऐसा मनुजीने कहा है ॥ ३० ॥

तत् क्षिप्रं नुदते पापं सत्कारं लभते तथा । अपि चैनं प्रसीदन्ति भूतानि जडमूकवत् ॥ ३१ ॥ वह अघमर्षण मन्त्रका जप करनेवाला मनुष्य शीघ्र ही अपने सारे पापोंको दूर कर देता है और उसे सर्वत्र सम्मान प्राप्त होता है। सब प्राणी जड एवं मूकके समान उसपर प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ३१ ॥

बृहस्पतिं देवगुरुं सुरासुराः सर्वे समेत्याभ्यनुयुज्य राजन् । धर्म्म फलं वेत्थ फलं महर्षे तथैव तस्मिन्नरके पारलोक्ये ॥ ३२ ॥

उभे तु यस्य सदृशे भवेतां किंस्वित् तयोस्तत्र जयोऽथ न स्यात् । आचक्ष्व नः पुण्यफलं महर्षे कथं पापं नुदते धर्मशीलः ॥ ३३ ॥

राजन्! एक समय सब देवताओं और असुरोंने बड़े आदरके साथ देवगुरु बृहस्पतिके निकट जाकर पूछा—'महर्षे! आप धर्मका फल जानते हैं। इसी प्रकार परलोकमें जो पापोंके फलस्वरूप नरकका कष्ट भोगना पड़ता है, वह भी आपसे अज्ञात नहीं है, परंतु

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जिस योगीके लिये सुख और दुःख दोनों समान हैं, वह उन दोनोंके कारणरूप पुण्य और पापको जीत लेता है या नहीं। महर्षे! आप हमारे समक्ष पुण्यके फलका वर्णन करें और यह भी बतावें कि धर्मात्मा पुरुष अपने पापोंका नाश कैसे करता है?' ।। ३२-३३ ।।

बृहस्पतिरुवाच

कृत्वा पापं पूर्वमबुद्धिपूर्वं पुण्यानि चेत्कुरुते बुद्धिपूर्वम् । स तत् पापं नुदते कर्मशीलो वासो यथा मलिनं क्षारयुक्तम् ।। ३४ ।। **बृहस्पतिजीने कहा—**यदि मनुष्य पहले बिना जाने पाप करके फिर जान-बूझकर पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करता है तो वह सत्कर्मपरायण पुरुष अपने पापको उसी प्रकार दूर कर देता है, जैसे क्षार (सोडा, साबुन आदि) लगानेसे कपड़े का मैल छूट जाता है ।। ३४ ।। पापं कृत्वाभिमन्येत नाहमस्मीति पूरुषः । तच्चिकीर्षति कल्याणं श्रद्दधानोऽनसूयकः ।। ३५ ।। मनुष्यको चाहिये कि वह पाप करके अहंकार न प्रकट करे—हेकड़ी न दिखाये, अपितु श्रद्धापूर्वक दोषदृष्टिका परित्याग करके कल्याणमय धर्मके अनुष्ठानकी इच्छा करे ।। ३५ ।। छिद्राणि विवृतान्येव साधूनां चावृणोति यः । यः पापं पुरुषः कृत्वा कल्याणमभिपद्यते ।। ३६ ।। जो मनुष्य श्रेष्ठ पुरुषोंके खुले हुए छिद्रोंको ढकता है अर्थात् उनके प्रकट हुए दोषोंको भी छिपानेकी चेष्टा करता है तथा जो पाप करके उससे विरत हो कल्याणमय कर्ममें लग जाता है, वे दोनों ही पापरहित हो जाते हैं ।। ३६ ।। यथाऽऽदित्यः प्रातरुद्यंस्तमः सर्वं व्यपोहति । कल्याणमाचरन्नेवं सर्वपापं व्यपोहति ।। ३७ ।। जैसे सूर्य प्रातःकाल उदित होकर सारे अन्धकारको नष्ट कर देता है उसी प्रकार शुभकर्मका आचरण करनेवाला पुरुष अपने सभी पापोंका अन्त कर देता है ।। ३७ ।।

भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा तु राजानमिन्द्रोतो जनमेजयम् । याजयामास विधिवत् वाजिमेधेन शौनकः ।। ३८ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर शौनक इन्द्रोतने राजा जनमेजयसे विधिपूर्वक अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराया ।। ३८ ।। ततः स राजा व्यपनीतकल्मषः श्रेयोवृत्तः प्रज्वलिताग्निरूपवान् । विवेश राज्यं स्वममित्रकर्षणो

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यथा दिवं पूर्णवपुर्निशाकरः ॥ ३९ ॥

इससे राजा जनमेजयका सारा पाप नष्ट हो गया और वे प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान होने लगे। उन्हें सब प्रकारके श्रेय प्राप्त हो गये। जैसे पूर्ण चन्द्रमा आकाशमण्डलमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार शत्रुसूदन जनमेजयने पुनः अपने राज्यमें प्रवेश किया ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि इन्द्रोतपारिक्षितीये द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें इन्द्रोत और पारिक्षितका संवादविषयक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५२ ॥

मृतककी पुनर्जीवन-प्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमत्ता

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त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

मृतककी पुनर्जीवन-प्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमत्ता

युधिष्ठिर उवाच
कच्चित् पितामहेनासीच्छ्रुतं वा दृष्टमेव च ।
कच्चिन्मर्त्यो मृतो राजन् पुनरुज्जीवितोऽभवत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—‘पितामह! क्या आपने कभी यह भी देखा या सुना है कि कोई मनुष्य मरकर फिर जी उठा हो! ॥ १ ॥

भीष्म उवाच
शृणु पार्थ यथावृत्तमितिहासं पुरातनम् ।
गृध्रजम्बुकसंवादं यो वृत्तो नैमिषे पुरा ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा—कुन्तीनन्दन! प्राचीनकालमें नैमिषारण्यक्षेत्रमें गीध और गीदड़का जो संवाद हुआ था, उसे सुनो, वह पूर्वघटित यथार्थ इतिहास है ॥ २ ॥

कस्यचिद् ब्राह्मणस्यासीद् दुःखलब्धःसुतो मृतः ।
बाल एव विशालाक्षो बालग्रहनिपीडितः ॥ ३ ॥
किसी ब्राह्मणको बड़े कष्टसे एक पुत्र प्राप्त हुआ था। वह बड़े-बड़े नेत्रोंवाला सुन्दर बालक बाल-ग्रहसे पीड़ित हो बाल्यावस्थामें ही चल बसा ॥ ३ ॥

दुःखिताः केचिदादाय बालमप्राप्तयौवनम् ।
कुलसर्वस्वभूतं वै रुदन्तः शोकविह्वलाः ॥ ४ ॥
जिसने युवावस्थामें अभी प्रवेश ही नहीं किया था तथा जो अपने कुलका सर्वस्व था, उस मरे हुए बालकको लेकर उसके कुछ दुखी बान्धव शोकसे व्याकुल हो फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ४ ॥

बालं मृतं गृहीत्वाथ श्मशानाभिमुखाः स्थिताः ।
अङ्केनैव च संक्रम्य रुरुदुर्भृशदुःखिताः ॥ ५ ॥
उस मृत बालकको गोदमें लेकर वे श्मशानकी ओर चले। वहाँ पहुँचकर खड़े हो गये और अत्यन्त दुखी होकर रोने लगे ॥ ५ ॥

शोचन्तस्तस्य पूर्वोक्तान् भाषितांश्चासकृत् पुनः ।

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तं बालं भूतले क्षिप्य प्रतिगन्तुं न शक्नुयुः ॥ ६ ॥ वे उसकी पहलेकी बातोंको बारंबार याद करके शोकमग्न हो जाते थे; इसलिये उसे श्मशानभूमिमें डालकर लौट जानेमें असमर्थ हो रहे थे ॥ ६ ॥

तेषां रुदितशब्देन गृध्रोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् । एकात्मजमिमं लोके त्यक्त्वा गच्छत मा चिरम् ॥ ७ ॥ इह पुंसां सहस्राणि स्त्रीसहस्राणि चैव ह । समानीतानि कालेन हित्वा वै यान्ति बान्धवाः ॥ ८ ॥ उनके रोनेके शब्दसे आकृष्ट होकर एक गीध वहाँ आया और इस प्रकार कहने लगा—'मनुष्यों! इस जगत्में अपने इस इकलौते पुत्रको यहाँ छोड़कर लौट जाओ, देर मत करो। यहाँ हजारों स्त्री-पुरुष कालके द्वारा लाये जा चुके हैं और उन सबको उनके भाई-बन्धु छोड़कर चले जाते हैं ॥ ७-८ ॥

सम्पश्यत जगत् सर्वं सुखदुःखैरधिष्ठितम् । संयोगो विप्रयोगश्च पर्यायेणोपलभ्यते ॥ ९ ॥ 'देखो, यह सम्पूर्ण जगत् ही सुख और दुःखसे व्याप्त है, यहाँ सबको बारी-बारीसे संयोग और वियोग प्राप्त होते रहते हैं ॥ ९ ॥

गृहीत्वा ये च गच्छन्ति ये न यान्ति च तान् मृतान् । तेऽप्यायुषः प्रमाणेन स्वेन गच्छन्ति जन्तवः ॥ १० ॥ 'जो लोग अपने मृतक सम्बन्धियोंको लेकर श्मशानमें जाते हैं, और जो नहीं जाते हैं, वे सभी जीव-जन्तु अपनी आयु पूरी होनेपर इस संसारसे चल बसते हैं ॥ १० ॥

अलं स्थित्वा श्मशानेऽस्मिन् गृध्रगोमायुसंकुले । कङ्कालबहुले रौद्रे सर्वप्राणिभयङ्करे ॥ ११ ॥ 'गीधों और गीदड़ोंसे भरे हुए इस भयंकर श्मशानमें सब ओर असंख्य नरकंकाल पड़े हैं। यह स्थान सभी प्राणियोंके लिये भयदायक है। यहाँ तुम्हें नहीं ठहरना चाहिये; ठहरनेसे कोई लाभ भी नहीं है ॥ ११ ॥'

न पुनर्जीवितः कश्चित् कालधर्ममुपागतः । प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरीदृशी ॥ १२ ॥ 'अपना प्रिय हो या द्वेषपात्र। कोई भी कालधर्ममें (मृत्यु) को पाकर कभी पुनः जीवित नहीं हुआ है। समस्त प्राणियोंकी ऐसी ही गति है ॥ १२ ॥

सर्वेण खलु मर्तव्यं मर्त्यलोके प्रसूयता । कृतान्तविहिते मार्गे मृतं को जीवयिष्यति ॥ १३ ॥ 'जिसने इस मर्त्यलोकमें जन्म लिया है, उसे एक-न-एक दिन अवश्य मरना होगा। कालद्वारा निर्मित पथपर मरकर गये हुए प्राणीको कौन जीवित कर सकेगा ॥ १३ ॥

कर्मान्तविरते लोके अस्तं गच्छति भास्करे ।

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गम्यतां स्वमधिष्ठानं सुतस्नेहं विसृज्य वै ॥ १४ ॥ ‘सूर्य अस्ताचलको जा रहे हैं, जगत्‌के सब लोग दैनिक कार्य समाप्त करके अब उससे विरत हो रहे हैं। तुमलोग भी अब अपने पुत्रका स्नेह छोड़कर घर लौट जाओ’ ॥ १४ ॥
ततो गृध्रवचः श्रुत्वा प्राक्रोशंस्तस्तदा नृप ।
बान्धवास्तेऽभ्यगच्छन्त पुत्रमुत्सृज्य भूतले ॥ १५ ॥
नरेश्वर! तब गीधकी बात सुनकर वे बन्धु-बान्धव जोर-जोरसे रोते हुए अपने पुत्रको भूतलपर छोड़कर घरकी ओर लौटने लगे ॥ १५ ॥
विनिश्चित्याथ च तदा विक्रोशन्तस्ततस्ततः ।
मृतमित्येव गच्छन्तो निराशास्तस्य दर्शने ॥ १६ ॥
वे इधर-उधर रो-गाकर इसी निश्चयपर पहुँचे कि अब तो यह बालक मर ही गया; अतः उसके दर्शनसे निराश हो वहाँसे जानेके लिये तैयार हो गये ॥ १६ ॥
निश्चितार्थाश्च ते सर्वे संत्यजन्तः स्वमात्मजम् ।
निराशा जीविते तस्य मार्गमावृत्य धिष्ठिताः ॥ १७ ॥
जब उन्हें यह निश्चित हो गया कि अब यह नहीं जी सकेगा, तो उसके जीवनसे निराश हो वे सब लोग अपने बच्चेको छोड़कर जानेके लिये रास्तेपर आकर खड़े हुए ॥ १७ ॥
ध्वांक्षपक्षसवर्णस्तु बिलान्निःसृत्य जम्बुकः ।
गच्छमानान् स्म तानाह निर्घृणाः खलु मानुषाः ॥ १८ ॥
इतनेहीमें कौएकी पाँखके समान काले रंगका एक गीदड़ अपनी माँद (घूरी) से निकलकर उन लौटते हुए बान्धवोंसे कहा—‘मनुष्यों! तुम बड़े निर्दय हो! ॥ १८ ॥
आदित्योऽयं स्थितो मूढाः स्नेहं कुरुत मा भयम् ।
बहुरूपो मुहूर्तश्च जीवेदपि कदाचन ॥ १९ ॥
‘अरे मूर्खो! अभी तो सूर्यास्त भी नहीं हुआ है; अतः डरो मत। बच्चेको लाड़-प्यार कर लो। अनेक प्रकारका मुहूर्त आता रहता है। सम्भव है किसी शुभ घड़ीमें यह बालक जी उठे ॥ १९ ॥
यूयं भूमौ विनिक्षिप्य पुत्रस्नेहविनाकृताः ।
श्मशाने सुतमुत्सृज्य कस्माद् गच्छत निर्घृणाः ॥ २० ॥
‘तुम लोग कैसे निर्दयी हो? पुत्रस्नेहका त्याग करके इस नन्हेंसे बालकको श्मशान-भूमिमें लाकर डाल दिया। अरे! अपने बेटेको इस मरघटमें छोड़कर क्यों जा रहे हो? ॥ २० ॥
न वोऽस्त्यस्मिन् सुते स्नेहो बाले मधुरभाषिणि ।
यस्य भाषितमात्रेण प्रसादमधिगच्छत ॥ २१ ॥
‘जान पड़ता है’ इस मधुर भाषी छोटे-से बालकपर तुम्हारा तनिक भी स्नेह नहीं है। यह वही बालक है, जिसकी मीठी-मीठी बातें सुनते ही तुम्हारा हृदय हर्षसे खिल उठता

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था ॥ २१ ॥ ते पश्यत सुतस्नेहो यादृशः पशुपक्षिणाम् । न तेषां धारयित्वा तान् कश्चिदस्ति फलागमः ॥ २२ ॥ चतुष्पात्पक्षिकीटानां प्राणिनां स्नेहसङ्गिनाम् । परलोकगतिस्थानां मुनियज्ञक्रिया इव ॥ २३ ॥ 'पशु और पक्षियोंका भी अपने बच्चेपर जैसा स्नेह होता है, उसे तुम देखो। यद्यपि स्नेहमें आसक्त उन पशु-पक्षी-कीट आदि प्राणियोंको अपने बच्चोंके पालन-पोषण करनेपर भी परलोकमें उनसे उस प्रकार कोई फल नहीं मिलता जैसे कि परलोककी गतिमें स्थित हुए मुनियोंको यज्ञादि क्रियासे मिलता है ॥ २२-२३ ॥ तेषां पुत्राभिरामाणामिहलोके परत्र च । न गुणो दृश्यते कश्चित् प्रजाः संधारयन्ति च ॥ २४ ॥ 'क्योंकि उनके पुत्रोंमें स्नेह रखनेवाले पशु आदि के लिये इहलोक और परलोकमें संतानोंके लालन-पालनसे कोई लाभ नहीं दिखायी देता तो भी वे अपने-अपने बच्चोंकी रक्षा करते रहते हैं ॥ २४ ॥ अपश्यतां प्रियान् पुत्रांस्तेषां शोको न तिष्ठति । न च पुष्णन्ति संवृद्धास्ते मातापितरौ क्वचित् ॥ २५ ॥ 'यद्यपि उनके बच्चे बड़े हो जानेपर अपने माँ-बापका पालन-पोषण नहीं करते हैं तो भी अपने प्यारे बच्चोंको न देखनेपर उनका शोक काबूमें नहीं रहता ॥ मानुषाणां कुतः स्नेहो येषां शोको भविष्यति । इमं कुलकरं पुत्रं त्यक्त्वा क्व नु गमिष्यथ ॥ २६ ॥ 'परंतु मनुष्योंमें इतना स्नेह ही कहाँ है, जो उन्हें अपने बच्चोंके लिये शोक होगा। अरे! यह तुम्हारा वंशधर बालक है। इसे छोड़कर तुम कहाँ जाओगे ॥ २६ ॥ चिरं मुञ्चत बाष्पं च चिरं स्नेहेन पश्यत । एवंविधानि हीष्टानि दुस्त्यजानि विशेषतः ॥ २७ ॥ 'इस अपने लाड़लेके लिये देरतक आँसू बहाओ और दीर्घ कालतक स्नेहभरी दृष्टिसे इसकी ओर देखो, क्योंकि ऐसी प्यारी-प्यारी संतानोंको छोड़कर जाना अत्यन्त कठिन है ॥ २७ ॥ क्षीणस्यार्थाभियुक्तस्य श्मशानाभिमुखस्य च । बान्धवा यत्र तिष्ठन्ति तत्रान्यो नाधितिष्ठति ॥ २८ ॥ 'जो शरीरसे क्षीण हुआ हो, जिसपर कोई आर्थिक अभियोग लगाया गया हो तथा जो श्मशानकी ओर जा रहा हो, ऐसे अवसरोंपर उसके भाई-बन्धु ही उसके साथ खड़े होते हैं। दूसरा कोई वहाँ साथ नहीं देता ॥ २८ ॥ सर्वस्य दयिताः प्राणाः सर्वः स्नेहं च विन्दति ।

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तिर्यग्योनिष्वपि सतां स्नेहं पश्यत यादृशम् ॥ २९ ॥ ‘सबको अपने-अपने प्राण प्यारे होते हैं और सभी दूसरोंसे स्नेह पाते हैं। पशु-पक्षीकी योनिमें भी जो प्राणी रहते हैं, उनका अपनी संतानोंपर कैसा प्रेम है, इसे देखो ॥ २९ ॥ त्यक्त्वा कथं गच्छथेमं पद्मलोलायताक्षिकम् । यथा नवोद्वाहककृतं स्नानमाल्यविभूषितम् ॥ ३० ॥ इस बालककी कमल-जैसी चंचल एवं विशाल आँखें कितनी सुन्दर हैं। इसका शरीर स्नान एवं पुष्पमाला आदिसे विभूषित नया-नया विवाह करके आये दुल्हे जैसा है। ऐसे मनोहर बालकको छोड़कर जानेके लिये तुम्हारे पैर कैसे उठ रहे हैं?' ॥ ३० ॥ जम्बुकस्य वचः श्रुत्वा कृपणं परिदेवतः । न्यवर्तन्त तदा सर्वे शवार्थं ते स्म मानुषाः ॥ ३१ ॥ करुणाजनक विलाप करते हुए उस सियारकी यह बात सुनकर वे सभी मनुष्य उस मृत बालकके शरीरकी देख-रेखके लिये पुनः लौट आये ॥ ३१ ॥

गृध्र उवाच

अहो बत नृशंसेन जम्बुकेनाल्पमेधसा । क्षुद्रेणोक्ता हीनसत्त्वा मानुषाः किं निवर्तथ ॥ ३२ ॥ **तब गीधने कहा—**अहो! उस मन्दबुद्धि एवं क्रूर स्व भाववाले क्षुद्र गीदड़की बातोंमें आकर तुम लौटे कैसे आते हो? मनुष्यो! तुम बड़े धैर्यहीन हो ॥ ३२ ॥ पञ्चेन्द्रियपरित्यक्तं शुष्कं काष्ठत्वमागतम् । कस्माच्छोचथ तिष्ठन्तमात्मानं किं न शोचथ ॥ ३३ ॥ इस बच्चेका शरीर पाँचों इन्द्रियोंसे परित्यक्त होकर सूखे काठके समान तुम्हारे सामने पड़ा है। तुम इसके लिये क्यों शोक करते हो? एक दिन तुम्हारी भी यही दशा होगी, फिर अपने लिये क्यों नहीं शोक करते? ॥ ३३ ॥ तपः कुरुत वै तीव्रं मुच्यध्वं येन किल्बिषात् । तपसा लभ्यते सर्वं विलापः किं करिष्यति ॥ ३४ ॥ अब तुमलोग तीव्र तपस्या करो, जिससे समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाओगे। तपस्यासे सब कुछ मिल सकता है। तुम्हारा यह विलाप क्या करेगा? ॥ ३४ ॥ अनिष्टानि च भाग्यानि जातानि सह मूर्तिना । येन गच्छति बालोऽयं दत्त्वा शोकमनन्तकम् ॥ ३५ ॥ भाग्य शरीरके साथ ही प्रकट होता है और उसका अनिष्ट फल भी सामने आता ही है, जिससे यह बालक तुम्हें अनन्त शोक देकर जा रहा है ॥ ३५ ॥ धनं गावः सुवर्णं च मणिरत्नमथापि च । अपत्यं च तपोमूलं तपयोगाच्च लभ्यते ॥ ३६ ॥

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धन, गाय, सोना, मणि, रत्न, और पुत्र-इन सबका मूल कारण तप ही है। तपस्याके योगसे ही इनकी उपलब्धि होती है ॥ ३६ ॥ यथाकृता च भूतेषु प्राप्यते सुखदुःखिता । गृहीत्वा जायते जन्तुर्दुःखानि च सुखानि च ॥ ३७ ॥ जीव अपने पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार दुःख-सुखको लेकर ही जन्म ग्रहण करता है। सभी प्राणियोंमें सुख और दुःखका भोग कर्मानुसार ही प्राप्त होता है ॥ न कर्मणा पितुः पुत्रः पिता वा पुत्रकर्मणा । मार्गेणान्येन गच्छन्ति बद्धाः सुकृतदुष्कृतैः ॥ ३८ ॥ पिताके कर्मसे पुत्रका और पुत्रके कर्मसे पिताका कोई सम्बन्ध नहीं है। अपने-अपने पाप-पुण्यके बन्धनमें बँधे हुए जीव कर्मानुसार विभिन्न मार्गसे जाते हैं ॥ ३८ ॥ धर्मं चरत यत्नेन न चाधर्मे मनः कृथाः । वर्तध्वं च यथाकालं दैवतेषु द्विजेषु च ॥ ३९ ॥ तुमलोग यत्नपूर्वक धर्मका आचरण करो और अधर्ममें कभी मन न लगाओ। देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी सेवामें यथासमय तत्पर रहो ॥ ३९ ॥ शोकं त्यजत दैन्यं च सुतस्नेहान्निवर्तत । त्यज्यतामयमाकाशे ततः शीघ्रं निवर्तत ॥ ४० ॥ शोक और दीनताको छोड़ो तथा पुत्रस्नेहसे मनको हटा लो। इस बालकको इसी सूने स्थानमें छोड़ दो और शीघ्र लौट जाओ ॥ ४० ॥ यत् करोति शुभं कर्म तथा कर्म सुदारुणम् । तत् कर्तैव समश्नाति बान्धवानां किमत्र ह ॥ ४१ ॥ प्राणी जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका फल भी करनेवाला ही भोगता है। इसमें भाई-बन्धुओंका क्या है? ॥ ४१ ॥ इह त्यक्त्वा न तिष्ठन्ति बान्धवा बान्धवं प्रियम् । स्नेहमुत्सृज्य गच्छन्ति बाष्पपूर्णाविलेक्षणाः ॥ ४२ ॥ बन्धु-बान्धव लोग यहाँ अपने प्रिय बन्धुओंका परित्याग करके ठहरते नहीं हैं। सारा स्नेह छोड़कर आँखोंमें आँसू भरे यहाँसे चल देते हैं ॥ ४२ ॥ प्राज्ञो वा यदि वा मूर्खः सधनो निर्धनोऽपि वा । सर्वः कालवशं याति शुभाशुभसमन्वितः ॥ ४३ ॥ विद्वान् हो या मूर्ख, धनवान् हो या निर्धन, सभी अपने शुभ या अशुभ कर्मोंके साथ कालके अधीन हो जाते हैं ॥ ४३ ॥ किं करिष्यथ शोचित्वा मृतं किमनुशोचथ । सर्वस्य हि प्रभुः कालो धर्मतः समदर्शनः ॥ ४४ ॥

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अच्छा, यह तो बताओ, तुम शोक करके क्या कर लोगे? क्या इसे जिला दोगे? फिर इस मृतकके लिये क्यों शोक करते हो? काल ही सबका शासक और स्वामी है, जो धर्मतः सबके ऊपर समान दृष्टि रखता है ।। ४४ ।।

यौवनस्थांश्च बालांश्च वृद्धान् गर्भगतानपि ।
सर्वानविशते मृत्युरेवंभूतमिदं जगत् ।। ४५ ।।
यह कराल काल युवा, बालक, वृद्ध और गर्भस्थ शिशु—सबमें प्रवेश करता है। इस संसारकी ऐसी ही दशा है ।। ४५ ।।

जम्बुक उवाच

अहो मन्दीकृतः स्नेहो गृध्रेणाल्पबुद्धिना ।
पुत्रस्नेहाभिभूतानां युष्माकं शोचतां भृशम् ।। ४६ ।।
इसपर गीदड़ने कहा—अहो! क्या इस मन्दबुद्धि गीधने तुम्हारे स्नेहको शिथिल कर दिया? तुम तो पुत्रस्नेहसे अभिभूत होकर उसके लिये बड़ा शोक कर रहे थे ।। ४६ ।।

समैः सम्यक्प्रयुक्तैश्च वचनैः प्रत्ययोत्तरैः ।
यद् गच्छति जनश्चायं स्नेहमुत्सृज्य दुस्त्यजम् ।। ४७ ।।
गीधके अच्छी युक्तियोंसे युक्त न्यायसंगत और विश्वासोत्पादक प्रतीत होनेवाले वचनोंसे प्रभावित हो ये सब लोग जो दुस्त्यज स्नेहका परित्याग करके चले जा रहे हैं, यह कितने आश्चर्यकी बात है! ।। ४७ ।।

अहो पुत्रवियोगेन मृतशून्योपसेवनात् ।
क्रोशतं सुभृशं दुःखं विवत्सानां गवामिव ।। ४८ ।।
अद्य शोकं विजानामि मानुषाणां महीतले ।
स्नेहं हि कारणं कृत्वा ममाप्यश्रूण्यथापतन् ।। ४९ ।।
अहो! पुत्रके वियोगसे पीड़ित हो मृतकोंके इस शून्य स्थानमें आकर अत्यन्त दुःखसे रोने-बिलखनेवाले इन भूतलावासी मनुष्योंके हृदयमें बछड़ोंसे रहित हुई गायोंकी भाँति कितना शोक होता है? इसका अनुभव मुझे आज हुआ है; क्योंकि इनके स्नेहको निमित्त बनाकर मेरी आँखोंसे भी आँसू बहने लगे हैं ।।

यत्नो हि सततं कार्यस्ततो दैवेन सिद्ध्यति ।
दैवं पुरुषकारश्च कृतान्तेनोपपद्यते ।। ५० ।।
अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये सदा प्रयत्न करते रहना चाहिये, तब दैवयोगसे उसकी सिद्धि होती है। दैव और पुरुषार्थ—दोनों कालसे ही सम्पन्न होते हैं ।। ५० ।।

अनिर्वेदः सदा कार्यो निर्वेदाद्धि कुतः सुखम् ।
प्रयत्नात् प्राप्यते ह्यर्थः कस्माद् गच्छथ निर्दयम् ।। ५१ ।।

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खेद और शिथिलताको कभी अपने मनमें स्थान नहीं देना चाहिये। खेद होनेपर कहाँसे सुख प्राप्त हो सकता है। प्रयत्नसे ही अभिलषित अर्थकी प्राप्ति होती है; अतः तुमलोग इस बालककी रक्षाका प्रयत्न छोड़कर निर्दयतापूर्वक कहाँ चले जा रहे हो? ।। ५१ ।। आत्ममांसोपवृत्तं च शरीरार्धमयीं तनुम् । पितॄणां वंशकर्तारं वने त्यक्त्वा क्व यास्यथ ।। ५२ ।। यह बालक तुम्हारे अपने ही रक्त-मांसका बना हुआ है, आधे शरीरके समान है और पितरोंके वंशकी वृद्धि करनेवाला है, इसे वनमें छोड़कर तुम कहाँ जाओगे? ।। ५२ ।। अथवास्तंगते सूर्ये संध्याकाल उपस्थिते । ततो नेष्यथ वा पुत्रमिहस्था वा भविष्यथ ।। ५३ ।। अच्छा, इतना ही करो कि जबतक सूर्य अस्त न हो और संध्याकाल उपस्थित न हो जाय, तबतक यहाँ रुके रहो; फिर अपने इस पुत्रको साथ ले जाना अथवा यहीं बैठे रहना ।। ५३ ।।

गृध्र उवाच

अद्य वर्षसहस्रं मे साग्रं जातस्य मानुषाः । न च पश्यामि जीवन्तं मृतं स्त्रीपुंनपुंसकम् ।। ५४ ।। **गीधने कहा—**मनुष्यो! मुझे जन्म लिये आज एक हजार वर्षसे अधिक हो गये; परंतु मैंने कभी किसी स्त्री-पुरुष या नपुंसकको मरनेके बाद फिर जीवित होते नहीं देखा ।। ५४ ।। मृता गर्भेपु जायन्ते जातमात्रा म्रियन्ति च । चङ्क्रमन्तो म्रियन्ते च यौवनस्थास्तथा परे ।। ५५ ।। कुछ लोग गर्भोंमें ही मरकर जन्म लेते हैं, कुछ जन्म लेते ही मर जाते हैं, कुछ चलने-फिरने लायक होकर मरते हैं और कुछ लोग भरी जवानीमें ही चल बसते हैं ।। ५५ ।। अनित्यानीह भाग्यानि चतुष्पात्पक्षिणामपि । जङ्गमानां नगानां वाप्यायुरग्रेऽवतिष्ठते ।। ५६ ।। इस संसारमें पशुओं और पक्षियोंके भी भाग्यफल अनित्य हैं। स्थावरों और जंगमोंके जीवन में भी आयुकी ही प्रधानता है ।। ५६ ।। इष्टदारवियुक्ताश्च पुत्रशोकान्वितास्तथा । दह्यमानाः स्म शोकेन गृहं गच्छन्ति नित्यशः ।। ५७ ।। प्रिय पत्नीके वियोग और पुत्रशोकसे संतप्त हो कितने ही प्राणी प्रतिदिन शोककी आगमें जलते हुए इस मरघटसे अपने घरको लौटते हैं ।। ५७ ।। अनिष्टानां सहस्राणि तथेष्टानां शतानि च । उत्सृज्येह प्रयाता वै बान्धवा भृशदुःखिताः ।। ५८ ।।

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कितने ही भाई-बन्धु अत्यन्त दुखी हो यहाँ हजारों अप्रिय त था सैकड़ों प्रिय व्यक्तियोंको छोड़कर चले गये हैं॥ ५८॥

त्यज्यतामेष निस्तेजाः शून्यः काष्ठत्वमागतः ।
अन्यदेहविषक्तं हि शावं काष्ठत्वमागतम् ॥ ५९ ॥
त्यक्तजीवस्य चैवास्य कस्माद्धित्वा न गच्छत ।
निरर्थको ह्ययं स्नेहो निष्फलश्च परिश्रमः ॥ ६० ॥
यह मृत बालक तेजोहीन होकर थोथे काठके समान हो गया है। इसे छोड़ दो। इसका जीव दूसरे शरीरमें आसक्त है। इस निष्प्राण बालकका यह शव काठके समान हो गया है तुमलोग इसे छोड़कर चले क्यों नहीं जाते? तुम्हारा यह स्नेह निरर्थक है और इस परिश्रमका भी कोई फल नहीं है॥ ५९-६०॥

चक्षुर्भ्यां न च कर्णाभ्यां संशृणोति समीक्षते ।
कस्मादेनं समुत्सृज्य न गृहान् गच्छताशु वै ॥ ६१ ॥
यह न तो आँखोंसे देखता है और न कानोंसे कुछ सुनता ही है। फिर इसे त्यागकर तुमलोग जल्दी अपने घर क्यों नहीं चले जाते ॥ ६१ ॥

मोक्षधर्माश्रितैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिः सुनिष्ठुरैः ।
मयोक्ता गच्छत क्षिप्रं स्वं स्वमेव निवेशनम् ॥ ६२ ॥
मेरी ये बातें बड़ी निष्ठुर जान पड़ती हैं; परंतु हेतुगर्भित और मोक्ष-धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं; अतः इन्हें मानकर मेरे कहनेसे तुमलोग शीघ्र अपने-अपने घर पधारो ॥ ६२ ॥

प्रज्ञाविज्ञानयुक्तेन बुद्धिसंज्ञाप्रदायिना ।
वचनं श्राविता नूनं मानुषाः संनिवर्तत ।
शोको द्विगुणतां याति दृष्ट्वा स्मृत्वा च चेष्टितम् ॥ ६३ ॥
मनुष्यो! मैं बुद्धि और विज्ञानसे युक्त तथा दूसरोंको भी ज्ञान प्रदान करनेवाला हूँ। मैंने तुम्हें विवेक उत्पन्न करनेवाली बहुत-सी बातें सुनायी हैं। अब तुमलोग लौट जाओ। अपने मरे हुए स्वजनका शव देखकर तथा उसकी चेष्टाओंको स्मरण करके दूना शोक होता है॥ ६३॥

इत्येतद् वचनं श्रुत्वा संनिवृत्तास्तु मानुषाः ।
अपश्यत् तं तदा सुप्तं द्रुतमागत्य जम्बुकः ॥ ६४ ॥
गीधकी यह बात सुनकर वे सब मनुष्य घरकी ओर लौट पड़े। तब सियारने तुरंत आकर उस सोते हुए बालकको देखा ॥ ६४ ॥

जम्बुक उवाच

इमं कनकवर्णाभं भूषणैः समलंकृतम् ।