पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६५
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६५ विपरीत भावना तो भूख की तरह से केवल दृष्टबाधा ही किया करती है । [यह बात सब के अनुभव से सिद्ध हो रही है] उस विपरीत भावना को किसी भी उपाय से जीत लेना चाहिये । उसके जीतने में अनुष्ठान का कोई भी निश्चित क्रम नहीं हो सकता । उपायः पूर्वमेवोक्त स्तच्चिन्ताकथनादिकः । एतदेकपरत्वेऽपि निर्वन्धो ध्यानवन्नहि ॥११८॥ एक सौ छःवें श्लोक में उसी की चिन्ता, उसी का कथन आदि उपाय का वर्णन तो हमने पहले ही कर दिया है। यद्यपि उसमें तदेकपरता का कथन है,परन्तु ध्यान की तरह का कठिन वन्धन उसमें नहीं है । मूर्तिप्रत्ययसान्तत्य मन्यानन्तरितं धियः । ध्यानं, तत्रातिनिर्वन्धो मनसश्चञ्चलात्मनः ॥११९॥ बुद्धि को जो मूर्ति का ज्ञान हो रहा है, वह ज्ञान निरन्तर धाराप्रवाह रूप से चलता रहे, कोई भी विजातीय प्रत्यय उस के बीच में न आये, तो बस इसी को 'ध्यान' कहते हैं। [सदा घूमते रहने वाले हाथी घोड़े आदि को जैसे एक ठूंठ आदि में बाँध दिया जाता है इसी तरह] इस चंचलात्मा मन को इसी ध्यान में बाँध देना चाहिये । चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥१२०॥ गीता में भी कहा है कि—हे कृष्ण ! यह मन बड़ा ही चंचल है, यह प्रमथनशील है [पुरुष को व्याकुल कर रखना ही इसका स्वभाव है] यह बड़ा ही बल वाला है [इसका वश १७
२६६ पञ्चदशी
में करना कोई सुकर काम नहीं है] यह बड़ा ही दृढ है [यह सच्चे या झूठे किसी भी विषय में दृढता से गड़ा रहता है । उसमें से इसे उखाड़ लेना अशक्य काम समझा जाता है] इस कारण उस मन के निग्रह करने को मैं वायु को रोक रखने के समान ही सुदुष्कर काम मानता हूँ । अप्यब्धिपानान्महतः सुमेरून्मूलनादपि । अपि वह्न्यशनात् साधो विषमश्चित्तनिग्रहः ॥१२१॥ योगवासिष्ठ में भी कहा है कि—समुद्र को पी डालने से सुमेरु पर्वत को उखाड़ डालने से या फिर दहकते अंगारों को सटक लेने से भी हे साधो ! इस चित्त का निग्रह कर लेना कहीं कठिन ही है । कथनादौ न निर्बन्धः शृङ्खलाबद्धदेहवत् । किन्त्वनन्तेतिहासाद्यै र्विनोदो नाट्यवद्धियः ॥१२२॥ श्रृंखला से बांधे हुए देह का जैसा निर्बन्ध होता है, ऐसा निर्बन्ध कथन तथा चिन्ता आदि का नहीं माना जाता [निर्बन्ध न हो इतना ही नहीं] प्रत्युत अनन्त इतिहास, युक्ति, दृष्टान्त आदि के द्वारा इससे बुद्धि का विनोद भी तो होता ही है। जैसे कि नाट्य को देखकर किसी की बुद्धि का विनोद होता हो। [यही राजयोग की विशेषता है] चिदेवात्मा जगन्मिथ्येत्यत्र पर्यवसानतः । निदिध्यासनविक्षेपो नेतिहासादिभिर्भवेत् ॥१२३॥ उन इतिहासादि का पर्यवसान केवल इसी अर्थ में होता है कि—आत्मा चिन्मात्र स्वरूप है [वह देहादि रूप नहीं है] तथा यह जगत् मिथ्या है । जब किसी को ऐसा निश्चय हो
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६७
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६७ जाता है तब फिर इतिहासादियों से उस के निदिध्यासन में विक्षेप नहीं पड़ता । कृषिवाणिज्यसेवाद्यौ काव्यतर्कादिकेषु च । विक्षिप्यते प्रवृत्त्या धीस्तैस्तत्वस्मृत्यसंभवात् ॥१२४॥ खेती, व्योपार, नौकरी, काव्य तथा तर्कादि का अनुशीलन करने पर तो उनमें प्रवृत्ति के कारण बुद्धि विक्षिप्त हो ही जाती है । क्योंकि इनके करते हुए तत्व की स्मृति असम्भव है । [इस कारण कृषि आदि को छोड़कर उन इतिहासादि को स्वीकार किया गया है] अनुसन्दधतैवात्र भोजनादौ प्रवर्तितुम् । शक्यतेऽत्यन्तविक्षेपाभावादाशु पुनः स्मृतेः ॥१२५॥ [शरीर यात्रा के लिये अत्यावश्यक] भोजन आदि में तो आत्मा का अनुसन्धान (स्मरण) करते हुए भी प्रवृत्ति हो सकती है। क्योंकि भोजनादि अन्तरंग कामों से किसी को अत्यन्त विक्षेप नहीं होता। उसका कारण यह है कि तत्व का स्मरण फिर तुरन्त ही हो जाता है। [भोजनादि में हमारा मन व्यग्र नहीं होता है, यह तो शरीर करता रहता है, भोज- नादि के समय भी तत्वस्मृति रखी जा सकती है। हाँ, मनो- राज्य जब होगा तब वह तत्व को उलटा समझा कर ही होगा ।] तत्वविस्मृतिमात्रान्नार्थः किन्तु विपर्ययात् । विपर्येतुं न कालोऽस्ति झटिति स्मरतः क्वचित् ॥१२६॥ तत्व को भूल जाने मात्र से ही अनर्थ नहीं होता। किन्तु अनर्थ तो विपरीत ज्ञान हो जाने से होता है । जब कोई पुरुष
१६८ पञ्चदशी तुरन्त ही आत्मतत्व का स्मरण कर लेता है उसे विपरीत ज्ञान होने का तो कोई अवसर ही नहीं मिलता । तत्त्वस्मृतेरवसरो नास्त्यन्याभ्यासशालिनः । प्रत्युताभ्यासघातित्वाद् बलात् तत्त्वमुपेक्ष्यते ॥१२७॥ जो पुरुष अनात्मपदार्थों का अभ्यास किया करता है, उसको तो तत्त्वस्मरण का अवकाश [ मौक़ा=फुर्सत ] ही नहीं मिलता । इतना ही नहीं प्रत्युत ऐसे अभ्यास ब्रह्माभ्यास के विघातक होते हैं । उस समय तो स्मरण किया हुआ तत्व भी बलात् भूल जाता है । तमेवैकं विजानीथ ह्यन्या वाचो विमुञ्चथ । इति श्रुतं तथान्यत्र वाचो विग्लापनं त्विति ॥१२८॥ तत्त्वस्मरण के विरोधी काव्यतर्कादि के अनुशीलन को छोड़ने की बात 'तमेवैकं विजानीथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैष सेतुः' (मुण्ड२५-२) इस श्रुति में तथा (नानुध्यायाद्बहूञ्शब्दा न्वाचो विग्लापनं हि तत्) (बृह० ४-४-२१) इस श्रुति में कही गयी है । आहारादि त्यजन्नैव जीवेच्छास्त्रान्तरं त्यजन् । किं न जीवसि, येनैवं करोष्यत्र दुराग्रहम् ॥१२९॥ भोजनादि का त्याग करके तो कोई जीवित नहीं रह सकता । क्या तुम उसी तरह दूसरे अनात्मशास्त्रों का त्याग करके जीवित नहीं रह सकते हो ? जिससे ऐसा दुराग्रह किये जा रहे हो । जनकादेः कथं राज्यमिति चेद् दृढबोधतः । तथा तवापि चेत् तर्कं पठ यद्वा कृषिं कुरु ॥१३०॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६९ यदि यह पूछो कि—जनकादि तत्त्ववेत्ताओं ने राज्य का पालन आदि कैसे किया था ? तो उसका उत्तर यह है कि वे तो दृढबोध के कारण वैसा कर सके थे [उनका अपरोक्षज्ञान बड़ा दृढ था। उससे उनकी प्रवृत्ति उनके आत्मचिन्तन में बाधक नहीं होती थी] जनकादि जैसा ही दृढबोध यदि तुमको भी हो चुका हो, तो तुम भी चाहे तो तर्क पढ़ो, या खेती करने लगो। [पक्षी अपने नन्हे बच्चों को तभी तक अपने निवास में रखते हैं, जब तक उनके पंख पक नहीं जाते। पंखों के पक जाने पर तो वे उन्हें चोंचों से मार मार कर बाहर निकाल देते हैं। इसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी को तभी तक सांसारिक कर्मों से बचने को कहा जाता है जब तक उसका ज्ञान पक नहीं जाता। पंखों के पक जाने पर पक्षियों के बच्चे चाहे जहां उड़ें, इसी प्रकार ज्ञान के पक जाने पर ज्ञानी लोग चाहे जो कुछ करें,फिर उनका ज्ञानदीपक बुझता नहीं। प्रत्युत उनका व्य- वहार उनके ज्ञान को पकाता रहता है] मिथ्यात्ववासनादार्थ्ये प्रारब्धक्षयकाङ्क्षया। अक्लिश्यन्तः प्रवर्तन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः ॥१३१॥ जिन लोगों की संसारमिथ्यात्व की वासना दृढ हो जाती है [संसार की असारता को जानने वाले] वे तत्त्वज्ञानी भी प्रारब्ध को क्षय करने की ही एक मात्र इच्छा से, बिना किसी खेद के, अपने अपने कर्मों के अनुसार, प्रवृत्ति किया करते हैं [क्योंकि प्रारब्ध का फल तो अवश्य ही मिलता है, उसका क्षय तो केवल भोग से ही हो सकता है, इस विचार को लेकर ज्ञानियों की प्रवृत्ति हुआ करती है। प्रारब्ध के अनुसार आये
२७० पञ्चदशी
सुख दुःखों को देखकर अज्ञानियों की तरह उन्हें कोई क्लेश नहीं होता ] अतिप्रसङ्गो मा शंक्यः स्वकर्मवशवर्तिनाम् । अस्तु वा केन शक्येत कर्म वारयितुं वद ॥१३२॥ ऐसे तो फिर ज्ञानी लोग अनाचार भी करेंगे, ऐसी शंका न करनी चाहिए। या फिर अपने अपने प्रारब्ध कर्म के बस में आकर अनाचार कर भी बैठे तो बताओ प्रारब्ध कर्म को वारण कर देने का सामर्थ्य ही किसमें है ? [ प्रारब्ध तो ईश्वर का संकल्प है वह हमारे संकल्पों से प्रबल होता है उसका वारण कोई भी नहीं कर सकता । ] ज्ञानिनोऽज्ञानिनश्चात्र समे प्रारब्धकर्मणी । न क्लेशो ज्ञानिनो धैर्यान्मूढः क्लिश्यत्यधैर्यतः ॥१३३॥ ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही के प्रारब्ध कर्म समान होते हैं। उनमें भेद केवल इतना ही है कि धैर्य के कारण ज्ञानो को तो क्लेश नहीं होता। परन्तु अधीरता के कारण मूढ पुरुष दुःखी हुआ है। [ इसी विषय पर एक भाषा कवि ने कहा है—देह धरे का दण्ड है सब काहू को होय। ज्ञानी भुगते ज्ञान सों मूरख भुगते रोय । ] मार्गे गन्त्रोर्द्वयोः श्रान्तौ समायामप्यदूरताम् । जानन् धैर्याद् द्रुतं गच्छेद॒न्यस्तिष्ठति दीनधीः ॥१३४॥ मार्ग में जाने वाले दो यात्री जब थक जाते हैं और दोनों की यात्रा समाप्त होने को होती है, उन दोनों यात्रियों में से, यात्रा की समाप्ति को जानने वाला एक तो, धीरता के कारण शीघ्र शीघ्र चलता ही जाता है। दूसरा तो
[Header] तृप्तिदीपप्रकरणम् २७१
[Header] तृप्तिदीपप्रकरणम् २७१
की अदूरता का ज्ञान नहीं होता] दीनबुद्धि होकर मार्ग में ही बैठ रहता है । साक्षात्कृतात्मधीः सम्यगविपर्ययबाधितः । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीर मनुसंज्वरेत् ॥१३५॥ आत्मा को साक्षात्कार कर लेने वाली बुद्धि, जिसके हाथ लग गयी है, जो कभी भी विपरीत ज्ञान से बाधित नहीं होता है [जो कभी भी देहादि को आत्मा नहीं समझता है ] ऐसा महापुरुष बताओ तो सही कि किस वस्तु की चाह में फँसकर तथा किसके लिये, मांस के ढेर इस शरीर के पीछे पीछे दुःखी होता फिरे ? [ऐसे ज्ञानी को तो दुःखी होने की कुछ आवश्य- कता ही नहीं रह जाती] जगन्मिथ्यात्वधीभावादाक्षिप्तौ काम्यकामुकौ । तयोरभावे सन्तापः शाम्येन्निःस्नेहदीपवत् ॥१३६॥ क्योंकि इस ज्ञानी को जगत् के मिथ्या होने की बुद्धि उत्पन्न हो गयी है, इस कारण ज्ञानी की उदार दृष्टि में न तो कामना करने का पदार्थ रहता है और न कामना करने वाला ही, शेष रहता है। जब कि इस संसाररूपी गाड़ी को चलानेवाले काम्य और कामुक नाम के ये दो पहिये ही न रहे तब बिचारा सन्ताप इस प्रकार शान्त हो जाता है, मानो तेल के न रहने से कोई दीपक ही बुझ गया हो । गन्धर्वपत्तने किंचिन्मैन्द्रजालिकनिर्मितम् । जानन् कामयते किन्तु जिहासति हसन्निदम् ॥१३७॥ ऐन्द्रजालिक की बनाई हुई समझ लेने के कारण, गन्धर्व- नगर की किसी भी वस्तु की कामना, कोई नहीं करता। प्रत्युत
'यह तो झूठी है' इस प्रकार हँस कर उसे छोड़ देना चाहता है [इस दृष्टान्त से यह समझ लो कि—जब काम्य पदार्थ नहीं रहता तब कामना भी नहीं होती] । आपातरमणीयेषु भोगेष्वेवं विचारवान् । नानुरज्यति, किन्त्वेतान् दोषदृष्ट्या जिहासति ॥१३८॥ ऊपर के दृष्टान्त के अनुसार जो माला, चन्दन, स्त्री आदि भोग केवल देखने में ही रमणीक मालूम होते हैं, उनको आपात- रमणीक समझ लेने वाला पुरुष, उनमें आसक्ति नहीं करता । किन्तु वह तो दोषों को देख कर इनको छोड़ देना ही चाहता है । अर्थानामर्जने क्लेशस्तथैव परिपालने । नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थान् क्लेशकारिणः ॥१३९॥ [विषयों के दोष तो ये हैं जिनको कि ज्ञानी देखा करता है] सम्पत्ति के उपार्जन में साधारण कष्ट नहीं होता । उसकी रक्षा करने में तो उससे भी अधिक दुःख भोगना पड़ जाता है । वह सम्पत्ति जब अपनी आंखों के सामने नष्ट होती है या व्यय होने लगती है तब उस दुःख को भी सभी जानते हैं । प्रत्येक अवस्था में दुःख देने वाले इन भोगों को धिक्कार ही है। मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोलेऽङ्गपंजरे । स्नाय्वस्थिग्रन्थिशालिन्याः स्त्रियाः किमिव शोभनम् ॥१४०॥ नाड़ियों, हड्डियों और मांस के मोटे मोटे लोथड़ों वाली, मांस की पुतली इस स्त्री के, यन्त्र की तरह के इस चंचल शरीर रूपी पींजरे में खूबसूरत चीज़ ही क्या है ? [यही बात विवेकी की समझ में नहीं आती] ।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २७३
तृप्तिदीपप्रकरणम् २७३ एवमादिषु शास्त्रेषु दोषाः सम्यक् प्रपंचिताः । विमृशन्ननिशं तानि कथं दुःखेषु मज्जति ॥१४१॥ इत्यादि शास्त्रों में विषयों के दोषों को भले प्रकार सम- झाया गया है । उन दोषों का विमर्श दिन रात करता हुआ साधक, दुःखों में फँस ही कैसे सकता है ? क्षुधया पीड्यमानोऽपि न विषं ह्यत्तुमिच्छति । मिष्टान्नध्वस्ततृड् जानन्नामूढस्तज्जिघत्सति ॥१४२॥ मूर्ख लोगों की बात हम नहीं कहते, किन्तु जो अमूढ हैं, जिनकी तृष्णा एक बार मिष्टान्न भोजन से नष्ट हो चुकी है, वे भूख से व्याकुल होने पर भी, 'यह विष है' यह जान लेने पर उस विष को खाना नहीं चाहते । प्रारब्धकर्मप्राबल्याद्द्भोगेपिच्छा भवेद्यदि । क्लिश्यन्नेव तदाप्येष भुङ्क्ते विष्टिगृहीतवत् ॥१४३॥ प्रारब्ध कर्मों की प्रबलता से यदि ज्ञानी को भोगों की इच्छा हो जाती है तो भी यह बेगार में पकड़े हुए मजदूरों की तरह दुःखी होता हुआ ही, उन विषयों को भोगा करता है । [इच्छा होने पर भी वह कुछ चाव के साथ उन्हें नहीं भोगता]। भुञ्जाना वा अपि बुधाः श्रद्धावन्तः कुटुम्बिनः । नाद्यापि कर्म नश्छिन्नमिति क्लिश्यन्ति सन्ततम् ॥१४४॥ लोक में देखते हैं कि—जो श्रद्धाशील गृहस्थी ज्ञानी होते हैं, वे भोगों को भोगते हुए भी, सदा यही दुःख माना करते हैं, कि ओहो ! अभी तक भी हमारे कर्म क्षीण नहीं हो पाये ।
है उसका चलते रहना उन्हें पसन्द नहीं रहता। वे अपनी विवेक
२७४ पञ्चदशी है उसका चलते रहना उन्हें पसन्द नहीं रहता। वे अपनी विवेक की आंख से उसको बन्द हुआ देखना चाहते हैं ] नायं क्लेशोऽत्र संसारतापः किन्तु विरक्तता । भ्रान्तिज्ञाननिदानो हि तापः सांसारिकःस्मृतः ॥१४५॥ उनके इस अनुताप रूप क्लेश को सांसारिक दुःख नहीं समझना चाहिए। क्योंकि यह तो उनकी विरक्तता है [संसार की अनासक्ति के कारण वे ऐसा अनुताप किया करते हैं ] सांसा- रिक ताप को तो आचार्यों ने भ्रान्ति ज्ञान से उत्पन्न होने वाला कहा है [यह ताप तो विवेक ज्ञान से उत्पन्न हुआ करता है। इस कारण यह वैसा हेय नहीं है]। विवेकेन परिक्लिश्यन्नल्पभोगेन तृप्यति । अन्यथानन्तभोगेऽपि नैव तृप्यति कर्हिचित् ॥१४६॥ [ सांसारिक ताप और विरक्तता का भेद भी सुन लो ] विवेक से परिक्लिष्ट होता हुआ [ज्ञानी] थोड़े से भोग से ही तृप्त हो जाता है। [उन भोगों को दूर से ही नमस्कार कर लेता है] विवेक के न होने पर तो अनन्त भोगों के भोग लेने पर भी कभी तृप्त नहीं हो पाता [यों कामनाओं का निवर्तक होने से, यह क्लेश तो विवेकमूलक ही है]। न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥१४७॥ यह कामना कभी भी कामों के भोग से शान्त नहीं होती। यह [कामना] तो घी से आग की तरह विषयाहुति से उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाती है। [भाव यह है कि—विवेकी की तरह, अविवेकी लोग भोगों से तृप्त नहीं हो सकते। ऐसी अवस्था में
तृप्तिदीपप्रकरणम् २७५
तृप्तिदीपप्रकरणम् २७५ विवेक को बेकार न समझना चाहिए। विवेकी लोगों में यह विशेषता होती है कि वे शरीरयात्रा के लिए तो थोड़ा बहुत भोगसंग्रह कर लेते हैं परन्तु व्यर्थ मनोरथों का जाल कभी नहीं फैलाते। वे जब किसी भोग को भोगते हैं उस समय भी उस भोग्य के अन्दर के आत्मतत्व को याद रखते हुए भोगते हैं। यों वे भोगों को भोगते हुए भी भोगों में नहीं उलझते। प्रत्युत भोगों को भोगर्तँ हुए भी उनका आत्मसाधन चलता है और वे भोगों को भोगते हुए भी मुक्ति का मार्ग साफ़ करते रहते हैं। यों उनकी भोगभूमि ही समाधि का अंग बन जाती है।] परिज्ञायोपभुक्तो हि भोगो भवति तृप्तये । विज्ञाय सेवितश्चोरो मैत्रीमेति न चोरताम् ॥१४८॥ [जो भोग विवेकमूलक होता है, उससे तृप्ति हो जाती है, यह अनुभव से भी सिद्ध होता है। देखो कि] जान कर भोगा हुआ भोग तृप्ति कर देता है। यह चोर है ऐसा जानकर सेवित किया हुआ चोर, उसके लिए चोर नहीं रहता। वह तो उसका मित्र बन जाता है। यह भोग 'इतना है' 'इसकी सत्यता इतनी है' 'इतनी कठिनाइयों से यह हमें मिलना है' यह सब समझ कर जब किसी भोग को भोगा जाता है तब उससे तुरन्त ही तृप्ति हो जाती है-उसे दूर से ही नमस्कार करने को जी चाहता है। लोक में भी देखते हैं कि-यह चोर है ऐसा जान लेने पर, जब उस चोर के साथ रहा जाता है तब वह चोर उस पुरुष के लिए चोर नहीं रहता। किन्तु वह तो उसका मित्र बन जाता है।
२७६ पञ्चदशी यों यद्यपि भोगों से तृष्णा की वृद्धि होती है परन्तु जब विवेक नाम का साथी मिल जाता है तब उन भोगों से ही तृप्ति भी होने लग जाती है ] । मनसो निगृहीतस्य लीलाभोगोऽल्पकोऽपि यः । तमेवालब्धविस्तारं क्लिष्टत्वाद् बहु मन्यते ॥१४९॥ [योगाभ्यास से] जिस मन का निग्रह कर लिया जाता है, उस मन को जो थोड़ा सा भी लीलाभोग मिल जाता है, वह मन, भोगों के दोषयुक्त होने के कारण, उसी संक्षिप्त (थोड़े से) भोग को अधिक मान लेता है । अर्थात् थोड़े से ही तृप्ति मान बैठता है । बद्धमुक्तो महीपालो ग्राममात्रेण तुष्यति । परैर्न बद्धो नाक्रान्तो न राष्ट्रं बहु मन्यते ॥१५०॥ देखते हैं कि—जिस राजा को कोई शत्रु क़ैद करके छोड़ देता है, तो फिर वह एकाध गांव को अपनी जीविका के लिए लेकर ही सन्तुष्ट हो जाता है । परन्तु जिस राजा पर न तो किसी ने कभी आक्रमण किया हो और न जो कभी किसी से बांध लिया गया हो, वह तो समूचे राष्ट्र को भी कुछ नहीं समझता । विवेके जाग्रति सति दोषदर्शनलक्षणे । कथमारब्धकर्मापि भोगेच्छां जनयिष्यति ॥१५१॥ नैष दोषो यतोऽनेकविधं प्रारब्धमीक्ष्यते । इच्छानिच्छा परेच्छा च प्रारब्धं त्रिविधं स्मृतम् ॥१५२॥ दोषदर्शन रूपी विवेक जब कि जाग रहा हो तब प्रारब्ध कर्म भी भोग की इच्छा को कैसे उत्पन्न कर सकेगा ?
तृप्तिदीपप्रकरणम् २७७
तृप्तिदीपप्रकरणम् २७७ इच्छा का विघात करने वाला विवेकज्ञान तो भोगेच्छा को उत्पन्न ही नहीं होने देगा] ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि [दोष दीखने पर भी इच्छाएँ पैदा होती हुई पाई जाती हैं] प्रारब्ध कर्म अनेक प्रकार के पाये जाते हैं । एक इच्छा को पैदा करके भोग देने वाला प्रारब्ध । दूसरा अनिच्छा के रहने पर भी भोग देने वाला प्रारब्ध । तीसरा परेच्छा से भोग देने वाला प्रारब्ध । यों तीन प्रकार का प्रारब्ध माना जाता है । [ विवेक के पहरे में भी भोगेच्छा कैसे हो जाती है ? इस प्रश्न को समझने के लिए प्रारब्ध के इन तीन भेदों को समझ लेना आवश्यक है ] । अपथ्यसेविनश्चोरा राजदाररता अपि । जानन्त एव स्वानर्थ मिच्छन्त्यारब्धकर्मतः ॥१५३॥ अपथ्यसेवी,रोगी,चोर, तथा राजा की स्त्री से रमण करने वाले, ये सभी अपने भावी अनर्थों को जानते हुए भी, आर- ब्धकर्म के शासन [ प्रभाव ] में आकर वैसी वैसी उलटी इच्छायें किया करते हैं । न चात्रैतद् वारयितु मीश्वरेणापि शक्यते । यत ईश्वर एवाह गीतायामर्जुनं प्रति ॥१५४॥ ईश्वर भी आये तो इन अपथ्यसेवन आदि की इच्छाओं को रोक नहीं सकता । [ ये इच्छायें अपरिहार्य होती हैं । इसी कारण इन इच्छाओं को प्रारब्ध का फल माना गया है ] ईश्वर ने स्वयं अपने मुख से गीता में अर्जुन के प्रति यही बात कही है कि ये इच्छायें अपरिहार्य होती हैं । सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृते र्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥१५५॥
गीता में कहा है कि—पुरुप ज्ञानवान् भी हो, तो भी तो वह अपनी प्रकृति के अनुरूप ही चेष्टा किया करता है [पहले जन्मों में किए हुए धर्माधर्मों के जो संस्कार इस जन्म में अभिव्यक्त हो जाते हैं, उन को ही 'प्रकृति' कहा जाता है। यह तो अवस्था ज्ञानवान् लोगों की है। मूर्खों की तो बात ही मत पूछो। इस कारण प्राणी तो अपनी अपनी प्रकृति की ओर को ही दौड़ते हैं] भगवान् कहते हैं कि मैं या कोई और आकर उन की प्रवृत्ति या निवृत्ति का निग्रह करने लगे तो भी वह क्या कर सकेगा ? [ऐसा निग्रह करने से तो कुछ भी फल नहीं होगा ।] अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो भवेद् यदि । तदा दुःखैर्न लिप्येरन्नलरामयुधिष्ठिराः ॥१५६॥ अवश्यम्भावी जो दुःखादि भाव हैं, उन का यदि कोई प्रतीकार हो सकता होता तो नल, राम, तथा युधिष्ठिर जैसे महापुरुष उन विपत्तियों में कभी न फंसते । न चेश्वरत्वमीशस्य हीयते तावता यतः । अवश्यंभाविताप्येषाभीश्वरेणैव निर्मिता ॥१५७॥ प्रारब्ध को न हटा सकने से, ईश्वर का ईश्वरभाव नष्ट नहीं हो जाता । क्योंकि इन दुःखों की आवश्यंभाविता भी तो ईश्वर ने ही बनाई है। [इच्छा प्रारब्ध का वर्णन यहां तक समाप्त हुआ] प्रश्नोत्तराभ्यामेवैतद् गम्यतेऽर्जुनकृष्णयोः । अनिच्छापूर्वकं चास्ति प्रारब्धमिति तच्छृणु ॥१५८॥ अनिच्छापूर्वक प्रारब्ध भी होता है, यह बात तो अर्जुन
तृप्तिदीपप्रकरणम् २७९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २७९ और कृष्ण के प्रश्नोत्तर से ही ज्ञात हो जाती है । अब आगे इसी "अनिच्छाप्रारब्ध" का वर्णन सुन लो । अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः ॥१५९॥ अर्जुन का प्रश्न यह है कि—हे श्रीकृष्ण ! यह पुरुष न चाहने पर भी किस की प्रेरणा से पाप कर बैठता है ? मानों किसी ने उस को ज़बरदस्ती उस पाप में लगाया हो । काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥१६०॥ श्रीकृष्ण ने यह उत्तर दिया कि—यह जो कोई पदार्थ पुरुष को प्रवृत्त करने वाला है वह रजोगुण से उत्पन्न हुआ 'काम' है। यही 'काम' कभी 'क्रोध' का रूप भी धारण कर लेता है । यह काम 'महाशन' है [ इस की मांग बहुत ही बड़ी है ] यही बड़े बड़े पापों की जननी है । इस कारण इस 'काम' को अपना बैरी जानो । [ भाव यह है कि—प्रारब्ध के वश से बढ़े हुए रजोगुण से, जब काम या क्रोध उत्पन्न हो जाते हैं, तब ये ही पुरुष की प्रवृत्ति के कारण होते हैं। ऐसे स्थलों पर प्रवृत्ति का मूल कारण इच्छा नहीं होती । स्वस्थ होने पर जिस काम को करने की इच्छा तक नहीं होती काम और क्रोध के वेग से वही काम प्राणी कर बैठता है । इसी से अनि- च्छा प्रारब्ध सिद्ध होता है ] स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥१६१॥ हे कौन्तेय ! अपने स्वभावजकर्म से
२८० पञ्चदशी कि अपने प्रारब्ध कर्म से ] जकड़ा हुआ तू जो कुछ करना नहीं भी चाहता है उसे भी मोह के कारण बेबस होकर करेगा [ इससे यही सिद्ध होता है कि अनिच्छा प्रारब्ध भी मानना ही चाहिये । ] नानिच्छन्तो न चेच्छन्तः परदाक्षिण्यसंयुताः । सुखदुःख्वे मजन्त्येतत् परेच्छापूर्वकर्म हि ॥१६२॥ न तो चाहते ही हैं, और न न चाहते ही हैं, किन्तु दूसरे को खुश करने के विचार में फंस कर दूसरे की प्रीति के लिये ही सुख दुःख भोगा करते हैं। यों सुखादि भोग देने वाला 'परेच्छाप्रारब्ध' होता है । दोष देख लेने पर भी ऐसे प्रारब्ध का परिहार हो नहीं सकता । उस प्रारब्ध में जो कि इच्छा को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है उस को कोई हटा नहीं सकता । ] कथं तर्हि किमिच्छन्नित्येवमिच्छा निषिध्यते । नेच्छानिषेधः किन्त्विच्छाबाधो भर्जितबीजवत् ॥१६३॥ उक्त रीति से जब तत्त्वज्ञानी लोग भी इच्छा करते हैं तब फिर "आत्मानं चेद्विजानीयात्"(बृ०४-४।२)इस श्रुति में किमिच्छन् किस वस्तु की इच्छा से— इस पद से इच्छा का अभाव क्यों कहते हो ? इसका समाधान यह है कि—यह इच्छा का निषेध नहीं है। किन्तु यह तो भुने हुए बीज की तरह इच्छा के बाध का वर्णन है [ उसका तात्पर्य यही है कि—ज्ञानी में इच्छा रहती तो है । परन्तु वह निर्वीर्य होती है । भुने हुए बीज में जैसे उत्पादन का सामर्थ्य नहीं रहता,इसी प्रकार ज्ञानी की इच्छा से समर्थ प्रवृत्ति पैदा नहीं होती ] ।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २८१
तृप्तिदीपप्रकरणम् २८१ भर्जितानि तु बीजानि सन्त्यकार्यकराणि च । विद्वदिच्छा तथेष्टव्याऽसत्वबोधान्न कार्यकृत् ॥१६४॥ जैसे भुने हुए बीज,स्वरूप से बने तो रहते हैं,परन्तु वे अङ्कुर आदि कार्यों को उत्पन्न नहीं कर सकते । इसी प्रकार विद्वान् की इच्छा को मान लो—स्वयं चाहे विद्यमान् भी रहती हो, परन्तु जिन पदार्थों की इच्छा वह करता है, असत् समझ लेने से, उन पदार्थों की तो बाधा हो चुकी है, फिर ज्ञानी की वह इच्छा व्यसन आदि कार्यों को उत्पन्न नहीं कर सकती । [उसकी वह इच्छा मरी हुई होती है] । दग्धबीजमरोहेऽपि भक्षणायोपयुज्यते । विद्वदिच्छाप्यल्पभोगं कुर्यान्न व्यसनं बहु ॥१६५॥ भुना हुआ बीज यद्यपि उगता तो नहीं, परन्तु खाने के काम तो आता ही है । इसी प्रकार विद्वान् की निर्वीर्य इच्छा भी उसको थोड़ा सा भोग तो दे ही सकती है। बहुत से व्यसन को उत्पन्न नहीं कर सकती। [तत्त्वज्ञानी लोग प्रारब्ध को भोगते समय मनोरथों के क़िले नहीं बनाते हैं] । भोगेन चरितार्थत्वात् प्रारब्धं कर्म हीयते । भोक्तव्यसत्यताभ्रान्त्या व्यसनं तत्र जायते ॥१६६॥ भोग देकर चरितार्थ हो चुकने के कारण, प्रारब्ध कर्म तो भोग देते ही नष्ट हो जाता है । [वह व्यसन को उत्पन्न नहीं करता] । जब तो किसी को भोक्तव्य पदार्थों के सत्य होने का भ्रम हो जाता है तब ही उस विषय में आगे को व्यसन उत्पन्न होता है [भोगते समय जो सुख दुःख मिलते हैं वे तो पूर्व कर्मों के किंवा प्रारब्ध के फल हैं। भोगते समय उन पदार्थों को सत्य १८
१८२ पंचदशी समझ कर उनके विषय में जो अनकें संकल्प उठते हैं, उनको अपने पास बहुत दिनों तक ठहराने की जो इच्छा होती है, उससे आगे के लिए हमारे मन में संस्कार रह जाते हैं। इन संस्कारों से प्रभावित होकर फिर फिर भोगों को जुटाने के लिए कर्म करते हैं और फिर फिर भोग आते हैं। यों शुद्ध भोग हमको भोगना नहीं आता किन्तु भोगते समय ही उन भोगों को आगे के लिए नौता दे देकर हम अज्ञानी लोग भोग और कर्म का अनन्त चक्कर घुमा रहे हैं।] मा विनश्यत्वयं भोगो वर्धतामुत्तरोत्तरम् । मा विघ्नाः प्रतिबध्नन्तु धन्योऽस्म्यस्मादिति भ्रमः ॥१६७॥ यह मुझे मिला हुआ भोग, कभी भी नष्ट न हो, यह तो उत्तरोत्तर चढ़ता ही जाय, भगवान् करे कि—कोई भी विघ्न इस भोग में रुकावट न डाल दे, मैं तो इस भोग के कारण कृतार्थ हो रहा हूँ। बस इसी तरह की निरर्थक और अनहोनी बातें 'भ्रम'कहाती हैं [ऐसे विचारों से व्यसन की उत्पत्ति हुआ करती है। लौकिक लोग प्रारब्ध फल को भोगते समय जब कि लाख मुद्रा देने वाला कर्म आता है तब बड़े प्रसन्न होते हैं परन्तु प्रारब्ध के समाप्त हो जाने पर जब वे मुद्रायें नष्ट हो जाती हैं तब वे प्रारब्ध कर्म को तो पहचानते नहीं कि यह कर्म इतना ही था और दहाड़ मार कर रोते हैं कि हाय ! मैं बर- बाद हो गया ] । यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा । इति चिन्ताविषघ्नोऽयं बोधो भ्रमनिवर्तकः ॥१६८॥ 'जो होना नहीं है, वह तो कभी होगा ही नहीं। जो होना
तृप्तिदीपप्रकरणम् २८१ है वह कभी टलता नहीं, ['यह मेरा काम कब बन जायगा, यह आपत्ति मेरी कब टलेगी'] इत्यादि चिन्ता रूपी विष को मार भगाने वाला यह उपर्युक्त [पूर्वोक्त] बोध ही भ्रम को निवृत्त कर सकता है। [भ्रम को निवृत्त करने वाला दूसरा कोई भी इससे अच्छा उपाय नहीं है] इसके प्रताप से सैकड़ों चिन्ताओं का विषैला प्रभाव नष्ट हो जाता है। समेऽपि भोगे व्यसनं भ्रान्तो गच्छेन्न बुद्धवान् । अशक्यार्थस्य संकल्पाद् भ्रान्तस्य व्यसनं बहु ॥१६९॥ ज्ञानी और अज्ञानी इन दोनों को भोग तो समान ही होता है। परन्तु भ्रान्त पुरुष व्यसन में फँस जाता है। बुद्धवान् अर्थात् ज्ञानी को व्यसन नहीं होता। भ्रान्त पुरुष, जो बात हो ही नहीं सकती, उसी का संकल्प कर बैठता है। इस कारण भ्रान्त को ही बहुत सा व्यसन होता है [तत्वज्ञानी को अकेला भोग होता है और अज्ञानी को भोग के साथ ही आगे को उस भोग का व्यसन भी पड़ जाता है]। मायामयत्वं भोगस्य बुद्ध्वास्थामुपसंहरन् । भुञ्जानोऽपि न संकल्पं कुरुते व्यसनं कुतः ॥१७०॥ विवेकी पुरुष तो भोगों को मायामय जान कर, उनमें से अपनी आस्था (श्रद्धा, भरोसा) को हटा लेता है, उन्हें भोगता हुआ भी वह जब कि संकल्प ही नहीं करता तब उस ज्ञानी को व्यसन कैसे हो ? स्वप्नेन्द्रजालसदृश मचिन्त्यरचनात्मकम् । दृष्टनष्टं जगत् पश्यन् कथं तत्रानुरज्यति ॥१७१॥ जिस विवेकी ने इस जगत् को सुपने या इन्द्रजाल के समान
विवेकी भला बताओ इसमें अनुराग [प्रेम का नाता] कैसे कर
समझ लिया है, जिसने इसे अचिन्त्यरचनारूप जान लिया है, जिसे यह दृष्टनष्ट रूप में दीखने लगा है, वह दोषदर्शी विवेकी भला बताओ इसमें अनुराग [प्रेम का नाता] कैसे कर लेगा ? स्वस्वप्नमापरोक्ष्येण दृष्ट्वा पश्यन् स्वजागरम् । चिन्तयेदप्रमत्तः सन्नुभावप्यनुदिनं मुहुः ॥१७२॥ चिरं तयोः सर्वसाम्य मनुसन्धाय जागरे । सत्यत्वबुद्धिं सन्त्यज्य नानुरज्यति पूर्ववत् ॥१७३॥ अपने स्वप्न को अपरोक्ष देख कर, उसके पीछे अपने जाग- रण को भी अनुभव करके, फिर इन बातों को ही, सावधान होकर, प्रतिदिन, और प्रतिक्षण सोचा करे [कि यह जागरण तो स्वप्नतुल्य ही है] ॥१७२॥ इन स्वप्न और जागरण की पूरी समता को चिरकाल तक अपने जी में बैठाकर कि जैसे सुपने के पदार्थ तात्कालिक भोग देते हैं, जैसे वे परिणाम में नीरस हैं, जैसे वे विनाशी हैं, वैसे ही ये जागरण के पदार्थ भी हैं। जागरण को सत्य समझना छोड़ देने पर, फिर पहले की तरह [अज्ञानी अवस्था की तरह] अनुरक्त नहीं होता । इन्द्रजालमिदं द्वैतमचिन्त्यरचनात्वतः । इत्यविस्मरतो हानिः का वा प्रारब्धभोगतः ॥१७४॥ अचिन्त्य रचनावाले होने से ये सम्पूर्ण भोग्य पदार्थ तो इन्द्रजाल के समान मिथ्या हैं [युक्ति से इस बात को विचार लेने पर] जब यह बात किसी विद्वान् को कभी भूलती ही नहीं, जब कोई विद्वान् प्रत्येक समय इस बात को याद रखने लगता है, तब फिर वह भले ही अपने प्रारब्ध कर्मों के सुख दुःख रूपी