१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३८१
एकीभूतः प्रज्ञानघन एकानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञ- स्तृतीयः पादः । एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्यौ हि भूतानां नान्तः प्रज्ञं न बहिः प्रज्ञं नोभयतः न प्रज्ञं प्रज्ञं नाप्रज्ञं न प्रज्ञानघनमदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणम- चिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ २
‘ओंकार अविनाशी है, इसी की महिमा यह सम्पूर्ण दृश्यमान विश्व है । भूत, भविष्यत्, वर्तमान इन तीनों कालों से सम्बन्धित जो कुछ है, वह सब ओंकार ही है । उक्त तीनों कालों में अतीत जो है, वह भी ओंकार है । यह सब कुछ ओंकार रूप ब्रह्म है । यह भगवान् नृसिंह ब्रह्म ही है । उनके चार पाद हैं ।
जाग्रत अवस्था और उससे व्याप्त यह स्थूल विश्व ही जिनका स्थान है और बाह्य संसार में जिनका ज्ञान प्रसारित है, सातों लोक जिनके अङ्ग हैं, पञ्च कर्मेन्द्रिय, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पंच प्राण और चार अन्तःकरण, इस प्रकार उन्नीस जिनके मुख हैं, जो इस स्थूल विश्व के भोगने वाले हैं, जो विश्व रूप देह में स्थित होने से वैश्वानर कहाते हैं, वही सर्वरूप वैश्वानर भगवान् श्रीनृसिंह के प्रथम पाद हैं ।
स्वप्नावस्था और उससे प्रभावित यह सूक्ष्म विश्व ही जिनका स्थान है और आन्तरिक संसार में जिनका ज्ञान फैला हुआ है, सातों लोक जिनके अङ्ग और उन्नीस मुख हैं जो सूक्ष्म विश्व के भोक्ता, पालक एवं रक्षक हैं, ऐसे वे तैजस पुरुष ही भगवान् नृसिंह के द्वितीय पाद हैं ।
सुषुप्ति और उससे उपलक्षित सम्पूर्ण विश्व की प्रलय रूप अवस्था ही जिनका स्थान है, जो एक रूप में ही स्थित हैं और जिनका रूप घनीभूत विज्ञान है, जिनका मुख चिन्मय प्रकाश है, जो स्वयं आनन्दमय हैं और जो अपने स्वरूप रूप आनन्द के भोगने वाले हैं तथा
३६० ] [नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् जिनसे परे और कोई नहीं है, ऐसे वे प्राज्ञ पुरुष ही भगवान् नृसिंह के तृतीय पाद हैं । उपरोक्त त्रिपाद परमेश्वर सबके स्वामी, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं । सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के स्थान भी वही हैं । जो न स्थूल का ज्ञाता है, न सूक्ष्म का और न इन दोनों का ही ज्ञाता है, जो न प्रज्ञान का घनीभूत है, न दिखाई देता है, जो न व्यवहार में आता, न स्पर्श में, जो किसी आकार वाला भी नहीं है, जो अचिन्त्य और अवर्णनीय है, जिनका स्वरूप आत्मसत्ता की प्रतीति मात्र है । जो प्रपंच-रहित, कल्याणकारी अद्वितीय है, ऐसा पूर्ण ब्रह्म ही भगवान् नृसिंह का चतुर्थ पाद है इस प्रकार ज्ञानीजन मानते हैं । उपरोक्त चार पादों में जिनका वर्णन हुआ है वे भगवान् नृसिंह ही हैं । उन्हें जानना चाहिए ॥२॥ अथ सावित्री गायत्र्या यजुषा प्रोक्ता तया सर्वमिदं व्याप्तं घृणिरिति द्वे अक्षरे सूर्य इति त्रीणि आदित्य इति त्रीणि एतद्वै सावित्रस्याष्टाक्षरं पदं श्रियाभिषिक्तं यं एवं वेद श्रिया हैवाभिषिच्यते तदेयहचाभ्युक्तं ऋचो अक्षरे परमे व्योम- न्यस्मिन्देवा अधिविश्वे निषेदुः । यस्तन्न वेदा किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासस इति न ह वा एतस्यर्चा न यजुषा न साम्नार्थोऽस्ति यः सावित्रं वेदेति । ओंभूलक्ष्मीर्भु वर्लक्ष्मीः स्वर्लक्ष्मीः कालकर्णी तन्नो महालक्ष्मीः प्रचोदयात् इत्येषा वै महालक्ष्मीर्यजुर्गायत्री चतुर्विंशत्यक्षरा भवति । गायत्री वा इदं सर्वं यदिदं किंच तस्माद्य एतां महालक्ष्मीं याजुषीं वेद महतीं श्रियमश्नुते । ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि । तन्नः सिंहः प्रचोदयात् इत्येषा वै नृसिंहगायत्री देवानां वेदानां निदानं भवति य एवं वेद निदानवान्भवति ॥ ३ ॥
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३६१ अब सावित्री मन्त्र के सम्बन्ध में उपदेश करते हैं—यह सावित्री मन्त्र, गायत्री छन्द से युक्त होकर यजुर्मन्त्र के रूप में प्रकट हुआ है । यह सभी विश्व उससे व्याप्त है । अष्टाक्षरी होने से इसे गायत्री कहा गया है । इसमें 'घृणिः' और 'सूर्य' दो-दो अक्षर हैं तथा 'आदित्यः' तीन अक्षर हैं, आरम्भ में इसे 'श्री' बीज से अलंकृत किया जाता है । इस प्रकार यह सावित्री मन्त्र अष्टाक्षरी कहा गया है । जो ज्ञानी इस मन्त्र का ज्ञाता है, वह लक्ष्मी के द्वारा अलंकृत होता है । ऐसा दृष्टान्त भी है कि 'ऋग्वेद की ऋचायें परम व्योमरूप अविनाशी, प्रकाशमान ब्रह्म में विद्यमान हैं, वहीं सब देवताओं का निवास है। जो साधक उन स्वयं तेजस्वी ब्रह्म को नहीं जानता वह स्वाध्याय से क्या लाभ उठा लेगा ? जो ज्ञानी उस ब्रह्म के ज्ञाता हैं, वे परमधाम में आनन्दोपभोग करते हुए रहते हैं।' इस सावित्रमन्त्र के इस प्रकार जानने वाले को ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मन्त्र से कोई कार्य नहीं रहता । 'जो देवी भू-लोक की लक्ष्मी, भुवर्लोक की लक्ष्मी और स्वर्ग लोक की लक्ष्मी है, जो कालकर्णी नाम वाली है, वह महालक्ष्मी हमें श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरित करे ।' यह यजुर्वेदोक्त महालक्ष्मी की गायत्री चौबीस अक्षरों वाली है। यह सब दृश्यमान विश्व गायत्री रूप ही है । अतः जो इस गायत्री का ज्ञाता है, वह महान् ऐश्वर्य को प्राप्त करता है । 'हम भगवान् नृसिंह की प्राप्ति के निमित्त उपासना करते हैं । वज्ररूप नखों वाले उन परमात्मा का ही हम चिन्तन करते हैं, वे ही नृसिंह भगवान् हमें सत्कर्मों में प्रेरित करें।' यह नृसिंह गायत्री देवताओं और वेदों के भी कारणभूता हैं । इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी भगवान् को प्राप्त होता है ॥३॥ देवा ह वै प्रजापति मब्रुवन्नथ कैर्मन्त्रैः स्तुतो देवः प्रीतो भवति स्वात्मानं दर्शयति तन्नो ब्रूहि भगवन्निति स होवाच
३६२ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् प्रजापतिः । ॐ यो ह वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च ब्रह्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १ ॥ (यथा प्रथममन्त्रोक्तावाद्यन्तौ तथा सर्वमन्त्रेषु द्रष्टव्यौ) ॥ यश्च विष्णुः ॥ २ ॥ यश्च महेश्वरः ॥ ३ ॥ यश्च पुरुषः ॥ ४ ॥ यश्चेश्वरः ॥ ५ ॥ या सरस्वती ॥ ६ या श्रीः ॥ ७ ॥ या गौरी ॥ ८ ॥ या प्रकृतिः ॥ ९ ॥ या विद्या ॥ १० ॥ यश्चोंकारः ॥ ११ ॥ याश्चतस्रोऽर्धमात्राः ॥ १२ ॥ ये वेदाः साङ्गाः सशाखाः सेतिहासाः ॥ १३ ॥ ये च पंचाग्नयः ॥ १४ ॥ याः सप्त महाव्याहृतयः ॥ १५ ॥ ये चाष्टौ लोकपालाः ॥ १६ ॥ ये चाष्टौ वसवः ॥ १७ ॥ ये चैकादश रुद्राः ॥ १८ ॥ ये च द्वादशादित्याः ॥ १९ ॥ ये चाष्टौ ग्रहाः ॥ २० ॥ यानि च पंच महाभूतानि ॥ २१ ॥ यश्च कालः ॥ २२ ॥ यश्च मनुः ॥ २३ ॥ यश्च मृत्युः ॥ २४ ॥ यश्च यमः ॥ २५ ॥ यश्चान्तकः ॥ २६ ॥ यश्च प्राणः ॥ २७ ॥ यश्च सूर्यः ॥ २८ ॥ यश्च सोमः ॥ २९ ॥ यश्च विराट् पुरुषः ॥ ३० ॥ यश्च जीवः ॥ ३१ ॥ यश्च सर्वम् ॥ ३२ ॥ इति द्वात्रिंशत् इति तान्प्रजापतिरब्रवीदेतैर्मन्त्रै- र्नित्यं देवं स्तुवध्वम् । ततो देवः प्रीतो भवति स्वात्मान दर्शयति तस्माद्य एतैर्मन्त्रैर्नित्यं देवं स्तौति स देवं पश्यति सोऽमृतत्वं च गच्छति य एवं वेदेति महोपनिषत् ॥ ४ ॥ देवताओं ने प्रजापति से पुनः प्रश्न किया कि 'भगवान् नृसिंह किन स्तोत्रों से स्तुत होने पर प्रसन्न होते और अपने दर्शन देते हैं?' इस पर प्रजापति ब्रह्माजी बोले—वे ऊपर लिखे १ से ३२ की संख्या वाले मन्त्रराज के बत्तीस मन्त्रों से परम प्रसन्न होते हैं । 'देवताओ ! इन मन्त्रों से नित्य प्रति भगवान् की स्तुति करो । ऐसा करने से भगवान् नृसिंह प्रसन्न होकर अपना साक्षात् दर्शन देते हैं । अतः जो इस प्रकार स्तुति करता है वह उनके विश्वरूप के दर्शन करता है और उसे
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३६३ अमृतत्व की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जानने वाले को भी उपरोक्त फल प्राप्त होता है। यह महोपनिषद् है। ॥ चतुर्थ उपनिषद् समाप्त ॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नाष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नार- सिंहस्य महाचक्रं नाम चक्रं नो ब्रूहि भगव इति सार्वकामिकं मोक्षद्वारं उद्योगिन उपदिशन्ति स होवाच प्रजापतिः षडक्षरं व एतत्सुदर्शनं महाचक्रं तस्मात्षडरं भवति षट्पत्रं चक्रं भवति षड्वा ऋतव ऋतुभिः सम्मितं भवति मध्ये नाभिर्भवति नाभ्यां वा एते अराः प्रतिष्ठिता मायया एतत्सर्वं वेष्टितं भवति नात्मानं माया स्पृशति तस्मान्मायया बहिर्वेष्टितं भवति । अथाष्टारमष्ट- पत्रं चक्रं भवत्यष्टाक्षरा वै गायत्री गायत्र्या सम्मितं भवति बहिर्मायया वेष्टितं भवति क्षेत्रं क्षेत्रं वै मायैषा सम्पद्यते । अथ द्वादशारं द्वादशपत्रं चक्रं भवति द्वादशाक्षरा वै जगती जगत्या संमितं भवति बहिर्मायया वेष्टितं भवति । अथ षोडशारं षोड- शपत्रं चक्रं भवति षोडशकलो वै पुरुषः पुरुष एवेदं सर्वं पुरुषेण संमितं भवति मायया बहिर्वेष्टितं भवति । अथ द्वात्रिंशदरं द्वात्रिंशत्पत्रं चक्रं भवति द्वात्रिंशदक्षरा वा अनुष्टुब्भवत्यनुष्टुभा सर्वमिदं भवति बहिर्मायया वेष्टितं भवत्यरैर्वा एतत्सुबद्धं भवति वेदा वा एते आराः पत्रैर्वा एतत्सर्वतः परिक्रामति छन्दांसि वै पत्राणि ॥ १ देवताओं ने प्रजापतिजी से श्रद्धापूर्वक कहा—'भगवन् ! आनुष्टुभ मन्त्रराज के महाचक्र नामक चक्र के सम्बन्ध में बताने की कृपा करें। यह चक्र मोक्ष-द्वार और सम्पूर्ण अभीष्टों का पूरक बताया जाता है।' इस पर प्रसिद्ध प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा—'आपका कहना यथार्थ है। इस महाचक्र का नाम सुदर्शन है और यह छै अक्षरों से युक्त है। इसमें छः ऋतुएं हैं, उन ऋतुओं की समता अरों से की जाती
३६४ ] [नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् है। इस चक्र में जो नाभि हैं, उसमें यह अरे जुड़े हुए हैं। सम्पूर्ण चक्र माया रूप नेमि से घिरा हुआ है। माया आत्मा का स्पर्श नहीं कर सकती, इसलिये इस चक्र को माया ने बाहर से ही घेर रखा है। फिर आठ अरों वाला अष्टदल चक्र बनता है और गायत्री के भी आठ पाद होते हैं इसलिए गायत्री के पादों से अरों की समता की जाती है। माया ने इन्हें भी बाहर की ओर ही घेर रखा है। फिर द्वादश अरों वाला चक्र बनता है, द्वादश अक्षरों वाले जगती छन्द से इस द्वादश दल चक्र की समता की जाती है। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही घिरा है। फिर सोलह दल वाला षोडशार बनता है यह सोलह कलाओं से युक्त है, भगवान् नृसिंह भी सोलह कला वाले हैं, इसलिये इसे साक्षात् भगवान् ही समझें। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही आवेष्टित है। फिर बत्तीस अरों से युक्त चक्र बनता है, अनुष्टुप् में भी बत्तीस अक्षर होते हैं। अनुष्टुप् के अक्षरों से चक्र के अरों की समता करे। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही आवेष्टित है। वेद ही इस चक्र के अरे हैं, छन्द इसके पत्ते हैं। उन पत्तों से ही यह सब ओर घूमता है ॥१॥ एतत्तत्सुदर्शनं महाचक्रं तस्य मध्ये नाभ्यां तारकं यदक्षरं नरसिंहमेकाक्षरं तद्भवति षट्सु पत्रेषु षडक्षरं सुदर्शनं भवत्य- ष्टसु पत्रेष्वष्टाक्षरं नारायणं भवति द्वादशसु पत्रेषु द्वादशाक्षरं वासुदेवं भवति षोडशसु पत्रेषु मातृकाद्याः सबिन्दुकाः षोडश स्वरा भवन्ति द्वात्रिंशत्सु पत्रेषु द्वात्रिंशदक्षर मन्त्रराजं नारसिंह मानुष्टुभं भवति तद्वा एतत्सुदर्शन नाम चक्रं सार्वकामिकं मोक्षद्वारमृङ् मयं यजुर्मयं साममयं ब्रह्ममयममृतमयं भवति तस्य पुरस्ताद्वसव आसते रुद्रा दक्षिणत आदित्याः पश्चाद्विश्वे देवा उत्तरतो ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा नाभ्यां सूर्याचन्द्रमसौ पार्श्वयोस्त- देतदृचाभ्युक्तम्। ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधिविश्वे
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३६५ निषेदुः । यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासत इति तदेतत्सुदर्शनं महाचक्रं बालो वा युवा वा वेद स महान्भवति स गुरुः सर्वेषां मन्त्राणामुपदेष्टा भवत्यनुष्टुभा होमं कुर्यादनुष्टुभार्चनं कुर्यात्तदेतद्रक्षोघ्न मृत्यतारकं गुरुणा लब्धं कण्ठे बाहौ शिखायां वा बध्नीत सप्तद्वीपवती भूमिर्दक्षिणार्थं नावकल्पते तस्माच्छ्रद्धया यां कांचिद्गां दद्यात्सा दक्षिणा भवति ॥२ यह बत्तीस दल वाला चक्र ही सुदर्शन नामक महाचक्र है । इसके बीच में जो नाभि है, उनमें ही भगवान् नृसिंह से सम्बन्धित तारक मन्त्र का न्यास करना चाहिए । वह तारक मन्त्र केवल एक अक्षर का है । छः पत्रों में षडाक्षरी सुदर्शन मन्त्र का न्यास होता है । आठ दलों में अष्टाक्षरी नारायण मन्त्र का और बारह दलों में द्वादशाक्षरी वासुदेव मन्त्र का न्यास होता है । सोलह दलों में षोडश अक्षर होते हैं । बत्तीस दलों में मन्त्रराज अनुष्टुभ का न्यास किया जाता है । यह सुदर्शन नामक महाचक्र सुविख्यात है । यह सभी अभीष्टों का पूरक, मुक्ति का द्वार और ऋक्, यजु, साम का साक्षात् रूप तथा अमृतयुक्त है । इनके पूर्व में अष्टावसु, पश्चिम में द्वादश आदित्य, उत्तर में विश्वेदेवा और दक्षिण में एकादश रुद्र रहते हैं । नाभि में ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा इधर- उधर सूर्य और चन्द्रमा रहते हैं । ऋचा में भी कहा है कि 'भगवान् नृसिंह परम व्योम रूप एवं अविनाशी हैं, उन्हीं में सम्पूर्ण वेद विद्यमान हैं । उन्हीं में सब देवता प्रतिष्ठित हैं । जो उन परमेश्वर भगवान् नृसिंह को नहीं जानता, उसे ऋग्वेद पढ़ने से कोई लाभ नहीं । जो पुरुष भगवान् नृसिंह और उनके महाचक्र का ज्ञाता है, वह परब्रह्म में स्थित होता है । इस महाचक्र को यदि कोई बालक अथवा युवा भी जान लेता है, वह महान् हो जाता
३६६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् है और सब का गुरु होता है। मन्त्रराज अनुष्टुप् से ही पूजन और हवन करे। यह महाचक्र राक्षसों के डर से बचाने वाला है, यही मृत्यु से पार लगाने वाला है। गुरु से इसे यन्त्र रूप में लेकर कण्ठ, शिखा या भुजा में बांधे। जो गुरु इस मन्त्र का उपदेश दे, उसे दक्षिणा में समूची पृथिवी भी दे दी जाय तो वह न्यून है। श्रद्धा के अनुसार जितना हो सके भू-भाग दान करे, वही सर्वश्रेष्ठ दक्षिणा है ॥२॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नानुष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नार- सिंहस्य फलं नो ब्रूहि भगव इति स होवाच प्रजापतिर्थ एतं मन्त्रराज नारसिंहमानुष्टुभं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति स वायुपूतो भवति स आदित्यपूतो भवति स सोमपूतो भवति स सत्यपूतो भवति स ब्रह्मपूतो भवति स विष्णुपूतो भवति स रुद्र- पूतो भवति स देवपूतो भवति स सर्वपूतो भवति स सर्वपूतो भवति ॥ ३ देवताओं ने प्रजापति से पुनः पूछा—भगवन् ! आनुष्टुभ मन्त्रराज का फल हमें कृपापूर्वक बताइये।' प्रजापति बोले— 'इस मन्त्रराज का दैनिक जप करने वाला पुरुष अग्नि में तपा कर शुद्ध किये सुवर्ण के समान हो जाता है। वह वायु, सूर्य और चन्द्रमा द्वारा शुद्ध कर दिया जाता है। वह सत्य तथा लोक के द्वारा और ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा वेद के द्वारा शुद्ध हो जाता है ॥३॥ ॥ नृसिंहपूर्वंतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥
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नृसिंहषट्चक्रोपनिषत्
ॐ देवा हः वै सत्यं लोकमायंतं प्रजापतिमपृच्छन्नार- सिंहचक्रन्नो ब्रूहीति । तान्प्रजापमिनार्रसिंहचक्रमवोचत् । षड् वै नार्सिंहानि चक्राणि भवन्ति । यत् प्रथमं तच्चतुररं यद्वितीयं तच्चतुररं यत्तृतीयं तदष्टारं यच्चतुर्थं तत्पञ्चारं यत्पञ्चमं तत्पञ्चारं यत् षष्ठं तदष्टारं तदेताति षडेव नार्सिहानि चक्राणि भवन्ति ॥ अथ कानि नामानि भवन्ति । यत् प्रथमं तदाचक्रं यद्- द्वितीयं तत्सुचक्रं यत्तृतीयं तन्महाचक्रं यच्चतुर्थं यत्सकललोक- रक्षणचक्रं यत्पञ्चमं तद्द्यूतचक्रं यद्वै षष्ठं तदसुरान्तकचक्रं तदेतानि षडेव नारसिंहचक्रनामानि भवन्ति ॥ अथ कानि त्रीणि वलयानि भवन्ति । यत्प्रथमं तदान्तर- वलयं भवति । यद्द्वितीयं तन्मध्यमवलयं भवति । यत् तृतीयं तद्बाह्यं वलयं भवति । तदेतानि त्रीण्येव वलयानि भवन्ति । यदा तद्धैतद्बीजं यन्मध्यमं तां नारसिंहगायत्रीं यद्बाह्यं तन्मन्त्रः ॥ अथ किमान्तरं वलयम् । षड्वान्तराणि वलयानि भवन्ति । यन्नारसिंह तत्प्रथमस्य यन्माहालक्ष्म्यं तद्द्वितीयस्य यत्सारस्वतं तत्तृतीयस्य यस्य यत्कामं देवं तच्चतुर्थस्य यत् प्रणवं तत्पञ्चमस्य तत्क्रोधदैवतं तत् षष्ठस्य । तदेतानि षष्णां नारसिंहचक्राणां षडा- न्तराणि वलयानि भवन्ति ॥ ॐ देवताओं ने सत्य स्वरूप व्यापक लोकपिता प्रजापति से कहा हमें नारसिंह चक्र का उपदेश करो । तब उन्हें प्रजापति ने नारसिंह चक्र का उपदेश दिया, जो इस प्रकार है कि नारसिंह चक्र छः हैं । पहला चक्र चार 'अर' वाला ( तांगे आदि के पहियों में जो गोलाकार रूप से Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
[३६८ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ नृसिंहषट्चक्रोपनिषत्
कई बारीक-बारीक डण्डे जुड़े रहते हैं उसे अर कहते हैं ) दूसरा भी चार ही अर वाला, तीसरा आठ, चौथा पांच, पांचवां भी पांच अर वाला छठा आठ अर वाला है। सो इस प्रकार छः ही नारसिंह चक्र होते हैं। यह पूछे जाने पर कि उनके नाम क्या हैं ? प्रजापति ने उत्तर दिया—पहला आचक्र, दूसरा सुचक्र, तीसरा महाचक्र, चौथा सकल लोक रक्षण, पांचवां द्यूतचक्र एवं छठा असुरान्तचक्र के नाम प्रसिद्ध है । तो ये छः नारसिंह चक्रों के नाम हैं । ये पूछने पर कि उसके तीन वलय ( वेष्टन ) कौन-कौन हैं ? प्रजापति ने उत्तर दिया पहला आन्तर, दूसरा मध्यम, तीसरा बाह्य । ये तीन ही वलय हैं। इनमें जो मध्यम बीज है वह नारसिंह गायत्री एवं जो बाह्य है वह मन्त्र है। आन्तर वलय कितने हैं ? यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा— आन्तर वलयों की संख्या छः है । नारसिंहम् पहले का, महालक्ष्म्यं का, सारस्वत तीसरे का, जिसका जो नष्ट देव हो वह चौथे का, प्रणव ( ओंकार ) पांचवे का, क्रोध दैवत छठे का नाम है। सो ये छः नारसिंह चक्रों के छः आन्तर वलय हुआ करते हैं । अथ किं मध्यमं वलयम् । षड्वै मध्यमानि वलयानि भवन्ति । यन्नारं॑सिहाय तत्प्रथमस्य यद्विद्महे तद्द्वितीयस्य यद्व- ञ्रनखाय तत्तृतीयस्य यद्धीमहि तच्चतुर्थस्य यत्तन्नस्तत्पंचमस्य यत्सिंहः प्रचोदयादिति तत् षष्ठस्य । तदेतानि षण्णां नारसिंह चक्राणां षण्मध्यमानि वलयानि भवन्ति ॥ अथ किं बाह्यं वलयम् । षड्वै बाह्यानि वलयानि भवन्ति । यदाचक्रं यादात्मा तत्प्रथमस्य यत्सुचक्रं यत्प्रियात्मा तद्द्वितीयस्य यन्महाचक्रं यज्ज्योतिरात्मा तत्तृतीयस्य यत्सकल- लोकरक्षणचक्रं यन्मायात्मा तच्चतुर्थस्य यदाचक्रं यद्योगात्मा तत्पञ्चमस्य यदसुरान्तकचक्रं यत्सत्यात्मा तत् षष्ठस्य । तदेतानि षण्णां नारसिंहचक्राणां षट बाह्यानि वलयानि भवन्ति ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
मध्यम वलयों की कितनी संख्या है ? यह जब पूछा तो प्रजा- पति ने उत्तर दिया-मध्यम वलयों की संख्या भी छः ही है । 'नारसिंहाय' प्रथम का 'विद्महे' दूसरे का 'वज्रनखाय' तीसरे का 'धीमहि' चौथे का 'तन्नः' पांचवे का 'सिंहः प्रचोदयात्' छठे का नाम है । सो ये छः नारसिंह चक्रों के छः वलय होते हैं । बाह्य वलय कितने तथा क्या हैं ! इसका उत्तर दिया कि वाह्य वलय भी छः ही होते हैं। जो आचक्र तथा आत्मा है वह पहले का, जो सुचक्र तथा प्रियात्मा है वह दूसरे का, जो महाचक्र तथा ज्योतिरात्मा वह तीसरे का, जो सकल लोक रक्षण चक्र तथा मायात्मा है वह चौथे का, जो आचक्र तथा योगात्मा है वह पांचवें का, जो असुराम्त चक्र तथा सत्यात्मा है वह छठे का नाम है । सो ये छः नारसिंह चक्रों के छः बाह्य वलय हैं । क्व तानि न्यस्यानि । यत्प्रथमं तद्धृदये यद्द्वितीयं तच्छि- रसि यत्तृतीयं तच्छिखायां यच्चतुर्थं तत्सर्वेष्वङ्गेषु यत्पंचमं तत्सर्वेषु [!] यत् षष्ठं तत्सर्वेषु देशेषु । य एतानि नारसिंहानि चक्राण्येतेष्वङ्गेषु बिभृयात् तस्यानुष्टुप् सिध्यति । तं भगवान् नृसिंहः प्रसीदति । तस्य कैवल्यं सिध्यति । तस्य सर्वे लोकाः सिध्यन्ति । तस्य सर्वे जनाः सिध्यन्ति । तस्मादेतानि षण्णां नारसिंहचक्राण्यङ्गेषु न्यस्यानि भवन्ति । पवित्रं एतत्तस्य न्यसनम् । न्यसनान्नृसिंहानन्दो भवति । कर्मण्यो भवति । ब्रह्मण्यो भवति । अन्यसानान्न नृसिंहानन्दी भवति । न कर्मण्यो भवति । तस्मादेतत्पवित्रं तस्य न्यसनम् ॥ यो वा एतं नरसिंहं चक्रमधीते स सर्वेषु वेदेष्वधीतो भवति । स सर्वेषु यज्ञेषु याजको भवति । स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति । स सर्वेषु मन्त्रेषु सिद्धो भवति । स सर्वत्र शुद्धो भवति । स सर्वरक्षो भवति । भूतपिशाचशाकिनीप्रेतवन्ताक- नाशको भवति । तदेतन्नाश्रद्दधानाय प्रब्रूयात्तदेतन्नाश्रद्दधाय प्रब्रूयादिति ॥
४०० ] [ नृसिंहषट्चक्रोपनिषत् ये कहाँ रखने चाहिये इनका न्यास कहाँ करना चाहिये ? यह पूछने पर उत्तर दिया कि—जो पहला है वह हृदय में, जो दूसरा है वह शिर में, जो तीसरा है वह शिखा में, जो चौथा है वह सभी अङ्गों में, जो पाँचवाँ वह सभी (१) जो छठा वह सभी देशों में धारण करने चाहिये । जो इन नारसिंह चक्रों को इन-इन अङ्गों में धारण करता है, उसे अनुष्टुप सिद्धि हो जाती है । उसके ऊपर भगवान् नृसिंह प्रसन्न होते हैं । उसे मोक्ष प्राप्त होती है । उसे सभी लोक सिद्ध होते हैं ( प्राप्त होते हैं ) सभी लोग उसे सिद्ध होते हैं ( उसके वश में हो जाते हैं ।) सो ये छः नारसिंह चक्रों के अङ्गों में न्यास के स्थान हैं। इनका न्यास अत्यन्त पवित्र है इनके न्यास से मनुष्य नृसिंह को आनन्द देने वाला, कर्मण्य, ब्रह्मज्ञाता हो जाता है । इसके विना न्यास के नृसिंह आनन्दित नहीं होते और मनुष्य कर्मण्य ही हो सकता है, सो यह अत्यन्त पवित्र हैं इनका न्यास ही अत्यन्त पवित्र है । जो इस नारसिंह चक्र का अध्ययन करता है वह सभी वेदों का अध्ययनकर्ता समझा जाता है। वह सभी यज्ञों का कर्त्ता समझा जाता है अर्थात् वह सभी यज्ञ कर चुका यह माना जाता है । उसने सभी तीर्थों में स्नान भी कर लिया । उसे सभी मन्त्रों की सिद्धियाँ भी प्राप्त हो जाती हैं । वह सभी जगह शुद्ध हो जाता है । वह सबकी रक्षा करने वाला होता है। भूत, पिशाच, शाकिन, प्रेत तथा वंताक आदि भया वह योनियों का नाश करने वाला भी वह होता है ( उसके पास ये सब फटक नहीं सकते ।) वह निर्भय हो जाता है। इस नारसिंह चक्र का उपदेश श्रद्धाहीन को किसी भी अवस्था में नहीं करना चाहिए । ॥ नृसिंहषट्चक्रोपनिषत् समाप्त ॥ —:०:— Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri दक्षिणामूर्त्युपनिषत ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों एक साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्मावर्ते महाभाण्डीरवटमूले महासत्राय समेता महर्षयः शौनकादयस्त ह समित्पाणयस्तत्त्वजिज्ञासवो मार्कण्डेयं चिरञ्जीवि- नमुपसमेत्य पप्रच्छुः केन त्वं चिरं जीवसि केन वाऽऽनन्दमनु- भवसीति ॥ १ ॥ परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानेनेति स होवाच ॥ २ ॥ किं तत् परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानम् । तत्र को देवः । के मन्त्राः । का निष्ठा । किं तज्ज्ञानसाधनम् । कः परिकरः । को बलिः कः कालः । किं तत्स्थानमिति ॥ ३ ॥ स होवाच । येन दक्षिणामुखः शिवोऽपरोक्षीकृतो भवति तत् परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानम् ॥ ४ ॥ यः सर्वोपरमे काले सर्वान्त्मन्युपसंहृत्य स्वात्मानन्दसुखे मोदते प्रकाशते वा स देवः ॥ ५ ॥ ब्रह्मावर्त में महाभाण्डीर नामक बरगद के नीचे बड़े भारी दीर्घ- कालीन यज्ञ करने के लिये शौनकादि महाऋषि एकत्रित हुए तथा तत्त्व-ज्ञान की जिज्ञासा से हाथों में समिधायें लेकर (कुशहस्त होकर) चिरञ्जीवी मार्कण्डेय के पास आकर पूछा—महाराज ! आप कैसे Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४०२ ]CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri[ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् चिरकाल से जीवित रह रहे हो ? तथा कैसे आप अपार आनन्द का अनुभव करते रहते हो ? । २ । तब उन्होंने उत्तर दिया कि परम गुप्त जो शिव-तत्व का ज्ञान है वही मेरे चिरजीवी होने में कारण है। २ । तब शौनकादि, ऋषि बोले—वह परम गुप्त शिवतत्व ज्ञान क्या वस्तु है ? उसका आराध्य कौन देवता है ? मन्त्र कौन से हैं ? आस्था क्या है ? उस ज्ञान के साधन कौन से हैं ? (क्या सामग्री चाहिये) क्या बलि उसमें अपेक्षित है ? क्या काल है ? उसकी प्राप्ति का स्थान कौन-सा है ? । ३ । मार्कण्डेय बोले—जिससे दक्षिणा मुख नामक शिव दृष्टिगोचर होते हैं वही परम गुप्त शिवतत्व ज्ञान है । ४ । जो सकल विश्व के समाप्ति के समय सारे चराचर को अपने अन्दर लीन करके अपने आप आत्मानन्द के सुख में प्रसन्न रहते हैं (अर्थात् आत्माराम हो जाते हैं ) तथा स्वयं प्रकाशित होते हैं वही इस तत्वज्ञान के देव हैं । ५ । अत्रैते मन्त्र रहस्यश्लोका भवन्ति अस्य श्रीमेधादक्षिणा- मूर्तिमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । देवता दक्षिणाऽऽस्यः । मन्त्रेणाङ्गन्यासः ॥ ६ ॥ ॐ आदौ नम उच्चार्य ततो भगवते पदम् । दक्षिणेति पदं पश्चान्मूर्तये पदमुद्धरेत् ॥७ अस्मच्छब्दं चतुर्थ्यन्तं मेधां प्रज्ञां पदं वदेत् । समुच्चार्य ततो वायुबीजं च्छं च ततः पठेत् ॥ अग्निजायां ततस्त्वेष चतुर्विंशाक्षरो मनुः ॥७ ध्यानम् स्फटिकरजतवर्णं मौक्तिकीमक्षमाला- ममृतकलशविद्यां ज्ञानमुद्रां कराग्रे । दधतमुरगकक्षं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं विधृतविविधभूषं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥८ मन्त्रेण न्यासः— आदौ वेदादिमुच्चार्य स्वराद्यं सविसर्गकम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
पञ्चार्णं तत उद्धृत्य अतरं सविसर्गकम् । अन्ते समुद्धरेत्तारं मनुरेष नवाक्षरः ॥६॥ मुद्रां भद्रार्थदात्रीं सपरशुहरिणं बाहुभिर्वाहुमेकं जान्वासक्तं दधानो भुजग विलसमाबद्धकक्ष्यो वटाधः । आसीनश्चन्द्रखण्डप्रतिघटिजटाक्षीरगौरस्त्रिनेत्रो दद्यादाद्यः शुकाद्यैर्मुनिभिरभिवृतो भावशुद्धिं भवो नः ॥१० इस विषय में मन्त्रों के रहस्य को प्रकट करने वाले श्लोक इस प्रकार हैं—इस मेधादक्षिणामूर्ति मन्त्र का ऋषि ब्रह्मा है, छन्द गायत्री है, तथा देवता दक्षिणामुख है। ६। ( मन्त्र के द्वारा अङ्गन्यास ) ( नीचे दिये गये श्लोकों से मन्त्र निकलता है । ) प्रारम्भ में 'ॐ नमः' उच्चारण करके तब 'भगवते' इस पद को पुनः 'दक्षिणा' यह शब्द फिर 'मूर्तये' यह पद तत्पश्चात अस्मद् शब्द का चतुर्थी का एक वचन अर्थात् 'मह्यं' पद एवं 'मेधां प्रज्ञां' इन पदों का उच्चारण करना चाहिये । 'प्र' उच्चारण कर तब वायु का बीज मन्त्र 'य' और उसके बाद 'च्छ' शब्द को पढ़े उसके बाद अग्निदेव की स्त्री अर्थात् 'स्वाहा' बोले—यही चौबीस अक्षर वाल मनु मन्त्र है । भावार्थ यह हुआ कि 'ॐ नमो भगवते दक्षिण मूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा' यह मन्त्र पढ़ना चाहिए । ७। (ध्यान) मैं ऐसी दक्षिणामूर्ति की स्तुति करता हूँ जो कि स्फटिक मणि तथा चाँदी के समान गोरे वर्ण वाली है तथा जिसके हाथ में ज्ञान की मुद्रा स्वरूप तथा अमृततत्वदात्री विद्या स्वरूपिणी मोतियों की माला है । एवं जिसके शरीर पर साँप घूम रहे हैं और जिसके सिर पर चन्द्रमा है तथा जिसकी तीन आँखें हैं तथा जो अनेकों वेषों की धारणा किये हुए है । ८ । मन्त्र द्वारा न्यास — प्रारम्भ में विसर्ग सहित स्वरों के आदि अक्षरों को एवं वेद के आदि अक्षर को अर्थात् 'ॐ' (अः उ म्) (ओ अः स्.) को पुनः पंचार्ण
४०४ ] [ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् अर्थात् 'दक्षिणामूर्तिः' शब्द को तत्पश्चात् विसर्ग सहित अतर शब्द को अर्थात् 'अतरः' को और अन्त में तार अर्थात् 'ॐ' का उच्चारण करे। यह नवाक्षर मनु-मन्त्र कहलाता है। ९। (ध्यान) ऐसे आद्य भगवान् शंकर हमें भावबुद्धि प्रदान करें जो कि शुकदेव आदि मुनियों से घिरे रहते हैं तथा जिनका एक हाथ कल्याणमय अभयदान की मुद्रा में है तथा अन्य दो हाथों में जिन्होंने फरसा तथा (हिरण) हरिण धारण कर रखा है। एवं जिनका एक हाथ जांघ पर रखा है तथा जो बरगद के नीचे बैठे हैं जिनके शरीर पर बड़े-बड़े साँप घूम रहे हैं। साथ ही दूज के चांद से जिनकी जटा सुशोभित है एवं जो कि दूध के समान गोरे रङ्ग के हैं तथा जिनकी तीन आँखें हैं। १०। मन्त्रेण न्यासः— तारं ब्लूं नम उच्चार्य मायां वाग्भवमेव च । दक्षिणापदमुच्चार्य यतः स्यान्मूर्तये पदम् ॥११ ज्ञानं देहि पदं पश्चाद्वह्न्रिजायां ततो न्यसेत् । मनुरष्टादशार्णोऽयं सर्वमन्त्रेषु गोपितः ॥१२ भस्मव्यापाण्डुराङ्गः शशिशकलधरो ज्ञानमुद्राक्षमाला- वीणापुस्तैर्विराजत्कमलधरो योगपट्टाभिरामः । व्याख्यापीठे निषण्णो मुनिवरनिकरैः सेव्यमानः प्रसन्नः सव्यालः कृत्तिवासाः सततमवतु नो दक्षिणामूर्तिरीशः ॥१३ मन्त्रेण न्यासः — तारं परां रमाबीजं वदेत् साम्बशिवाय च । तुभ्यं चानलजायां तु मनुर्द्वादशवर्णकः ॥१४ वीणां करैः पुस्तकमक्षमालां बिभ्राणमभ्रा भगलं वराढ्यम् । फणीन्द्रकक्ष्यं मुनिभिः शुकाद्यैः सेव्यं वटाधः कृत- नीडमीडे ॥ १५ ॥
दक्षिणामूर्त्युपनिषत् ] [ ४०५ प्रथम तारं अर्थात् 'ॐ' 'ब्लू' नमः' उच्चारण करके माया अर्थात् ह्रीं वाग्भव अर्थात् ऐं तथा दक्षिणा पद को कहकर पुनः 'मूर्तये' तथा 'ज्ञानंदेहि' और अन्त में 'अग्नि की स्त्री' अर्थात् 'स्वाहा' शब्द का उच्चारण करें अर्थात् 'ॐ' ब्लू नमो ह्रीं ऐं दक्षिणा मूर्तये ज्ञानं देहि स्वाहा' इस अठारह अक्षर वाले मनु मन्त्र का उच्चारण करे । यह सब मन्त्रों में अत्यन्त गोपनीय है । ११-१२ । (ध्यान) भस्म से जिनका सारा शरीर सफेद हो रहा है तथा जो कि चन्द्रमा के टुकड़े को धारण किये हैं एवं जो करकमल में ज्ञानमुद्रा (अभयदान की मुद्रा) रुद्राक्ष माला, वीणा एवं पुस्तक को धारण किये हैं तथा जो कि योगियों के पास रहने वाले पट्ट से (लकड़ी का बना हुआ भुजाटेकने का) सुशोभित हैं। एवं जो कि व्यास पीठ पर विराजमान हैं तथा श्रेष्ठ श्रेष्ठ मुनिजन जिनकी सेवा सुश्रूषा में लगे हैं और जो प्रसन्न मुख सर्पों से शोभित तथा व्याघ्र चर्म को धारण किये हैं ऐसे दक्षिणामूर्ति भगवान हमारी निरन्तर रक्षा करें । १३ । (मन्त्र द्वारा न्यास) प्रथम ओं, ह्रीं, श्रीं, कहे पुनः 'साम्ब शिवाय' पुनः 'तुभ्यं' अन्त में स्वाहा—यह बारह अक्षर वाला मनुमन्त्र है । १४ । ध्यानः— जिन्होंने हाथों में वीणा, पुस्तक तथा रुद्राक्ष माला धारण कर रखी है एवं (एक हाथ अभदान की मुद्रा में हमेशा ही रहता है) तथा जिसके गले की शोभा काले घने बादल के समान है । और जो श्रेष्ठों में भी श्रेष्ठ हैं सर्प जिनके शरीर पर लपलपा रहे हैं एवं जो शुकदेव आदि मुनियों द्वारा सेवित किये जा रहे हैं और जो कि बरगद के नीचे ( वास किये ) विराजमान हैं ऐसे भगवान की मैं स्तुति करता हूँ । १५ । विष्णु ऋषिरनुष्टुप् छन्दः । देवता दक्षिणाऽऽस्यः । मन्त्रेणन्यासः । तारं नमो भगवते तुभ्यं वटपदं ततः । मूलेति पदमुच्चार्य वासिने पद मुद्धरेत् ॥१६ वागीशाय पदं पश्चान्महाज्ञानपदं ततः ।
४०६ ] [ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् दायिने पदमुच्चार्य मायिने नम उद्धरेत् ॥१७ आनुष्टुभो मन्त्र राजः सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमः ॥१८ मुद्रापुस्तकवह्निनागविलसद्बाहुं प्रसन्नननं मुक्ताहारविभूषणं शशिकलाभास्वत्किरीटोज्ज्वलम् । अज्ञानापहमादिमादिमगिरामर्थं भवानीपतिं न्यग्रोधान्तनिवासिनं परगुरुं ध्यायाम्यभीष्टाप्तये ॥१९ प्रथम 'ओं नमो भगवते तुभ्यं' पुन 'वट' शब्द तब 'मूल' शब्द फिर 'वासिने' शब्द कहकर 'वागीशाय' पुनः 'महाज्ञान' एवं 'दयिने' और 'मायिने' का उच्चारण कर अन्त में नमः शब्द का उच्चारण करे । अर्थात् 'ओं नमो भागवते तुभ्यं' वट मूल वासिने वागीशाय महाज्ञानदायिने मायिने नमः' । यह आनुष्टुभ मंत्रराज है जो कि सभी श्रेष्ठ मन्त्रों में उत्तम है। १६-१७-१८ । ( ध्यान )—अभय ज्ञान मुद्रा, पुस्तक तथा भयानक सर्पों से जिनके हाथ सुशोभित हैं और जो कि प्रसन्नमुख हैं। मोतियों के हार जिनकी शोभा बढ़ा रहे हैं और चन्द्रमा की कला से चमकने वाले मुकुट से जो अधिक शोभायमान लग रहे हैं। साथ ही जो अज्ञान को नाश करने वाले हैं और जो कि आदि पुरुष हैं और वाणी के जो विषय नहीं हैं (यत्र वाचो निवर्तंको) ऐसे पार्वती के पति जो कि सबके गुरु हैं और बरगद के पेड़ के नीचे रहने वाले हैं, उनका मैं अपनी इच्छित वस्तु की प्राप्ति के लिये ध्यान करता हूँ ॥१९॥ सोऽहमिति यावदास्थितिः सा निष्ठा भवतिः ॥२० तदभेदेन मन्त्राम्रेडनं ज्ञानसाधनम् ॥२१ चित्ते तदेकतानता परिकरः ॥२२ अङ्गचेष्टार्पणं बलिः ॥२३ त्रीणि धामानि कालः ॥२४ द्वादशान्तपदं स्थानमिति ॥२५
दक्षिणामूर्त्युपनिषत् [ ४०७ शरीर के नष्ट होने तक 'सोऽहं' मैं वही परब्रह्म हूँ, यही ब्रह्म- निष्ठा है ।२०। उस परब्रह्म से अभिन्न मानकर पूर्व कहे गये मनुमन्त्रों का बार-बार निरन्तर उच्चारण ही ज्ञान का साधन है । २१ । चित्त से उस परमतत्त्व में एकता लगाकर ध्यान करना ही परिकर 'उपकरण' सामग्री है। २२। अंगों की चेष्टाओं का अर्पण ही बलि है अर्थात् हाथ पाँव आदि चलाना ( भगवत्कार्य में ) ही उसकी पूजा है । २३। स्वअविद्यापद, स्थूल तथा सूक्ष्म बीजरूप तीन धाम ही काल है । २४। द्वादशांत पद अर्थात् हृदय किंवा सहस्रार (सहस्रदलकमल) ही परमात्मा की प्राप्ति का स्थान होने के कारण स्थान है। २५ । ते ह पुनः श्रद्दधानास्तं प्रत्यूचुः—कथं वाऽस्योदयः । किं स्वरूपम् । को वाऽस्योपासक इति ॥ २६ ॥ स होवाच- वैराग्यतैलसंपूर्णे भक्तिवर्तिसमन्विते । प्रबोधपूर्णपात्रे तु ज्ञप्तिदीपं विलोकयेत् ॥२७ मोहान्धकारे निः सारे उदेति स्वयमेव हि । वैराग्यमरणं कृत्वा ज्ञानं कृत्वा तु चित्रगुम् ॥२८ गाढतामिस्रसंशून्यै गूढमर्थं निवेदयेत् । मोहभानुजसंक्रान्तं विवेकाख्यं मृकण्डुजम् ॥२९ तत्त्वाविचारपाशेन बद्धं द्रुतभयातुरम् । उज्जीवयन्निजानन्दे स्वस्वरूपेण संस्थित ॥३० शेमुषी दक्षिणा प्रोक्ता सा यस्याभीक्षणे मुखम् । दक्षिणाभिमुखः प्रोक्तः शिवोऽसौ ब्रह्मवादिभिः ॥३१ सर्गादिकाले भगवान् विरञ्चिरुपास्यैनं सर्गसामर्थ्यमाप्य । तुतोष चित्ते वाञ्छितार्थांश्च लब्ध्वा सोऽस्योपासको भवति धाता ।३२।
४०८ ] [ दक्षिणामृत्यु षपनित् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri य इमां परमरहस्यशिवतत्त्वविद्यामधीते स सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति । य एवं वेद स कैवल्यमनुभवतीत्यु- पनिषत् ॥ ३३ ॥ श्रद्धा से युक्त उन ऋषियों ने पुनः मार्कण्डेय से पूछा—इसका उदय कैसे होता है ? क्या इसका स्वरूप है ? और कौन इसका उपासक है ? । २६ (वह बोले) वैराग्यरूपी तेल से लबालब भरे हुये भक्ति रूपी बत्ती से युक्त प्रबोध के ( ज्ञान के ) पूर्व मात्र में ( बर्तन में ) ज्ञप्ति रूपी (अपने अन्दर तथा चराचर में व्याप्त ईश्वर को अपनी आत्मा मानना ) दीप का दर्शन होता है। २७। अर्थात् वैराग्य भक्ति तथा ज्ञान से ही ईश्वर दर्शन होता है ) सारहीन अपनी अज्ञता से कल्पित महान् अज्ञान रूपी अंधकार में वह दीप स्वयं ही उदित होता है। वैराग्य को अरणी बनाकर तथा अपने ज्ञान को ही मथने का डण्डा बनाकर गहन अज्ञान रूपी घने अन्धकार की समाप्ति के लिये गुप्त अर्थ को (परम तत्व को) जानना चाहिये । (अर्थात् निरन्तर वैराग्य तथा ज्ञान के परि- शीलन से ही उस परम तत्व का दर्शन सम्भव है ) तथा परमतत्त्व का विचार न करना रूपी जो पाश उससे बँधे हुए, द्वैतवाद के भय से व्याकुल एवं मोहरूपी शनि या मृत्यु के मुख में पड़े हुये विवेकरूपी मृकंडु के पुत्र (मार्कण्डेय) को ( अपने अज्ञान से ) पुनः उज्जजीवित करते हुए आत्माराम रूपी परमानन्द में अपने स्वरूप से स्थित हो जाता है । । २८--२६--३० । तथा तत्वज्ञानरूपिणी ब्रह्म प्रकाशिक बुद्धि ही जिसमें दक्षिणा है और वही जिस परमतत्व के अभीक्षण में अर्थात् साक्षात्कार में मुख अर्थात् द्वार है वह ब्रह्मवादियों द्वारा दक्षिणामुख नामक शिव Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi