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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

ध्यानबिन्दूपनिषत् [२६३]

रितमहं कर्ताऽहं भोक्ता सुखी दुःखी काणः खंजो बधिरो मूकः कृशः स्थूलोऽनेन प्रकारेण स्वतन्त्रवादेन वर्तते । पूर्वदले विश्र- मते पूर्वदलं श्वेतवर्णं तदा भक्तिपुरः सरं धर्मे मतिर्भवति । यदाऽऽग्नेयदले विश्रमते तदाग्नेयदलं रक्तवर्णं तदा निद्रालस्य- मतिर्भवति । यदा दक्षिणदले विश्रमते तद्दक्षिणदलं कृष्णवर्णं तदा द्वेषकोपमतिर्भवति । यदा नैर्ऋतदले विश्रमते तन्नैर्ऋत- दलं नीलवर्णं तदा पापकर्महिंसामतिर्भवति ॥ यदा पश्चिम- दले विश्रमते तत्पश्चिमदलं स्फटिकवर्णं तदा क्रीडा विनोदमति- र्भवति । यदा वायव्यदले विश्रमते वायव्यदलं माणिक्यवर्णं तदा गमन चालनवैराग्यमतिर्भवति । यदोत्तरदले विश्रमते तदुत्तरदलं पीतवर्णं तदा सुखशृङ्गारमतिर्भवति । यदेशानदले विश्रमते तदीशानदलं वैडूर्यवर्णं तदा दानादिकृपामतिर्भवति । यदा संधिसंधिषु मतिर्भवति तदा वातपित्तश्लेष्ममहाव्याधि प्रकोपॊ भवति । यदा मध्ये तिष्ठति तदा सर्वं जानाति गायति नृत्यति पठत्यानन्दं करोति । यदा नेत्रश्रमो भवति श्रमनिर्ह- रणार्थं प्रथमरेखावलयं कृत्वा मध्ये किमज्जनं कुरुते प्रथम- रेखा बन्धूकपुष्पवर्णं तदा निद्रावस्था भवति । निद्रावस्थामध्ये स्वप्नावस्था भवति । स्वप्नावस्थामध्ये दृष्टं श्रुतमनुमानसंभव- वार्ता इत्यादिकल्पनां करोति तदादिश्रमो भवति । श्रमनिर्ह- रणार्थं द्वितीयरेखावलयं कृत्वा मध्ये निमज्जनं कुरुते द्वितीय- रेखा इन्द्रकोपवर्णं तदा सुषुप्त्यावस्था भवति सुषुप्तौ केवल- परमेश्वरसम्बन्धिनी बुद्धिर्भवति नित्यबोधस्वरूपा भवति पश्चा- त्परमेश्वररूपेण प्राप्तिर्भवति । तृतियरेखावलयं कृत्वा मध्ये निमज्जनं कुरुते तृतीयरेखा पद्मरागवर्णं तदा तुरीयावस्था भवति तुरीये केवलपरमात्म संबन्धिनी मतिर्भवति नित्यबोध- स्वरूपो भवति तदा ॥

२६४ ध्यानबिन्दूपनिषत् शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ तदा प्राणापानयोरैक्यं कृत्वा सर्वं विश्वमात्मस्वरूपेण लक्ष्यं धारयति यदा तुरीयातीतावस्था तदा सर्वेषामानन्दस्वरूपो भवति द्वन्द्वातीतो भवति यावद्देहधारणा वर्तते तावत्तिष्ठति पश्चात्परमा- त्मस्वरूपेण प्राप्तिर्भवति इत्यनेन प्रकारेण मोक्षो भवतीदमेवा- त्मदर्शनोपायं भवति ॥ - चतुष्पथसमायुक्तमहाद्वारगवायुना । सहस्थित त्रिकोणोर्ध्वगमने दृश्यतेच्युतः ॥ ९४ अब आत्मा के निर्णय के विषय में विचार करते हैं । हृदय स्थान में अष्टदल कमल है, उसमें रेखाओं का आश्रय लेकर जीवात्मा ज्योतिरूप अणुमात्र रूप में रहता है । उसी में सब कुछ प्रतिष्ठित है, वही सब कुछ जानता है, सब कुछ करता है । वही ऐसा विचार करता है कि मैं सब चरित्रों का करता हूँ, भोक्ता हूँ, सुखी, दुखी, काना खंज, बहिरा, गूँगा, दुबला, मोटा हूँ। इस प्रकार वह स्वतन्त्रता का व्यवहार करता है। उस कमल का पूर्वदल श्वेत वर्ण का है और उसमें निवास करने से भक्ति और धर्म में मति रहती है । तब आग्नेय दिशा के रक्त वर्ण के दल में निवास होता है तब निद्रा और आलस्य में मति होती है । जब दक्षिण वाले कृष्ण-दल में निवास करते हैं तब द्वेष और कोप की मति होती है । जब नैर्ऋत्य दिशा के नील- वर्ण दल में निवास करता है तब पापकर्म और हिंसा में मति रहती है । जब पश्चिम के स्फटिक वर्ण वाले दल में निवास करता है तब

क्रीड़ा, विनोद में मति रहती है । जब वायव्यकोण के माणिक्य के से रङ्ग वाले दल में निवास करता है तब चलने और वैराग्य की भावना होती है । जब उत्तर के पीतवर्ण दल में निवास करता है तब सुख, शृङ्गार में मति होती है । जब ईशानकोण के वैडूर्यमणि के वर्ण के दल में निवास करता है तब दानादि, कृपा करने में मति रहती है । जब संधियों की संधि में मति रहती है तब वात, पित्त, कफ सम्बन्धी महा- व्याधियों का प्रकोप होता है। जब मध्य में मति रहती है तब सब जानने गाने, नृत्य करने, पढ़ने, आनन्द करने में लगी रहती है । जब नेत्र को श्रम होता है तो उसे दूर करने के उद्देश्य से प्रथम रेखा के मध्य में डुबकी लगाती है जिससे निद्रावस्था होती है । वह प्रथम रेखा बन्धूक पुष्प के रङ्ग वाली है । निद्रावस्था के मध्य में ही स्वप्न अवस्था रहती है । स्वप्न में देखी हुई सुनी हुई, अनुमान की हुई, बातों की कल्पना की जाती है तो उससे श्रम होता है । उस श्रम के दूर करने के हेतु दूसरी रेखा के मध्य में डुबकी लगाती है जिसका वर्ण वीर-बहूटी का सा है । तब सुषुप्ति अवस्था होती है जिसमें बुद्धि ईश्वर के सम्बन्ध वाली तथा नित्य बोधरूप होती है, इससे बाद में परमेश्वर की प्राप्ति होती है । जब दूसरी पद्मराग के वर्ण वाली रेखा के मध्य में डुबकी लगाई जाती है तब तुरीयावस्था होती है । तुरीया में बुद्धि परमात्मा से सम्बन्ध वाली और नित्य बोधरूप होती है । तब शनैः शनैः सबसे पृथक होकर धैर्ययुक्त हो मन को आत्मा में स्थित करे और अन्य कुछ भी चिन्तन न करे । तब प्राण अपान में एक्यभाव स्थापित करके समस्त विश्व को आत्मरूप समझते हुये उसी का लक्ष्य रखा जाता है । जब तुरीयातीत अवस्था प्राप्त हो जाती है तब सब आनन्दरूप होकर द्वन्द्वभाव मिट जाता है । इसके पश्चात् प्रारब्ध को पूरा करने की अवधि तक ही जीव देह में ठहरता हैं फिर परमात्मतत्व में मिल जाता है । यही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है और इसी मार्ग से आत्म-दर्शन होता है । चारों

२६६ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् पथ संयुक्त महाद्वार में जाने वाले वायु के साथ स्थित होकर, अर्ध त्रिकोण में होकर अच्युत दिखाई देता है ॥९४॥ पूर्वोक्तत्रिकोणस्थानादुपरि पृथिव्यादिपञ्चवर्णकं ध्येयम् । प्राणादिपंचवायुश्च बीजं वर्णं च स्थानकम् । यकारं प्राणबीजं च नीलजीमूतसन्निभम् रकारमग्निबीजं च अपानादित्यसंनिभम् ॥ ९५ लकारं पृथिवीरूपं व्यानं बन्धूकसन्निभम् । वकार जीवबीजं च उदानं शङ्खवर्णकम् ॥ ९६ हकारं वियत्स्वरूपं च समानं स्फटिकप्रभम् । हृन्नाभि नासिकाकण्ठपादांगुष्ठादिसंस्थितः ॥ ९७ द्विसप्ततिसहस्राणि नाडिमार्गेषु वर्तते । अष्टाविंशतिकोटीषु रोमकूपेषु संस्थितः ॥ ९८ समानप्राण एकस्तु जीवः स एक एव हि । रेचकादित्रयं कुर्याद्दृढचित्तः समाहितः ॥ ९९ शनैः समस्तमाकृष्य हृत्सरोरुहकोटरे । प्राणापानौ च बध्वा तु प्रणवेन समुच्चरेत् ॥ १०० पूर्वोक्त त्रिकोण स्थान के ऊपर पांच वर्ण वाले पृथिवी आदि तत्व ध्यान करने योग्य हैं । बीज, वर्ण और स्थान वाले पांच वायु ध्यान करने योग्य हैं । 'य'कार वायु रूप प्राण का बीज है जो नीले बादल के तुल्य है । 'र'कार आदित्य रूप अपान का बीज है ॥९५॥ 'ल'कार पृथ्‍वी रूप का ध्यान बन्धूक पुष्प के वर्ण

ध्यानबिन्दूपनिषत् [ २९७ फा है। 'व'कार शङ्ख के वर्ण का जलरूप उदान का बीज है ॥९६॥ 'ह'कार स्फटिक वर्ण का आकाश के समान है। हृदय, नाभि, नासिका, कान और पैर का अंगूठा समान के स्थान हैं ॥९७॥ यह समान वायु बहत्तर हजार नाड़ियों में तथा शरीर के रोम कूपों तक में रहती है ॥९८॥ समान और प्राण एक ही है, वही एक जीव है। चित्त को भली प्रकार समाहित करके, रेचक, कुम्भक तीनों करे । सब को शनैः-शनैः खींचकर हृदय कमल के कोटर में प्राणवायु और अपानवायु को रोककर प्रणव का उच्चारण करे ॥१००॥ कण्ठसंकोचनं कृत्वा लिङ्गसंकोचनं तथा । मूलाधारात्सुषुम्ना च बिसतन्तुनिभा शुभा ॥ १०१ अमूर्तो वर्तते नादो वीणादण्डसमुत्थितः । शङ्खनादादिभिश्चैव मध्यमेव ध्वनिर्यथा ॥ १०२ व्योमरन्ध्रगतो नादो मायूरं नादमेव च । कपालकुहरे मध्ये चतुर्द्वारस्य मध्यमे ॥ १०३ यदात्मा राजते तत्र यथा व्योम्नि दिवाकरः । कोदण्डद्वयमध्ये तु ब्रह्मरन्ध्रे तु शक्ति च ॥ १०४ स्वात्मानं पुरुषं पश्येन्मनस्तत्र लय गतम् । रत्नानि ज्योतिस्ननादं तु बिन्दु माहेश्वरं पदम् ॥ १०५ य एवं वेद पुरुषः स कैवल्यं समुश्नुते ॥ १०६ इत्युपनिषत् ॥ कण्ठ और लिंग का संकोचन करे, फिर मूलाधार से पद्मतंतु के समान निकलने वाली सुषुम्ना का संकोचन करे ॥१०१॥ वीणा

२६८ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् से उठने वाला अमूर्तं नाद जान पड़ता है, उसी के मध्य में शङ्ख आदि के समान ध्वनि होती है ॥१०२॥ कपाल कुहर के मध्य में चारों द्वारों का मध्य-स्थान है, वहाँ आकाशरन्ध्र में से जाता हुआ नाद मोर के शब्द के तुल्य होता है ॥१०३। जैसे आकाश में सूर्य है वैसे ही यहाँ विराजमान है और ब्रह्मरन्ध्र में दो कोदण्ड के मध्य शक्ति विराजमान है ॥१०४॥ वहाँ पुरुष अपने मन को लय करके स्वात्मा को देखे, वहाँ रत्नों की ज्योति रूप नाद विन्दु महेश्वर का पद है । जो इसको जानता है वह कैवल्य को प्राप्त करता है । यह उपनिषद है ॥१०५-१०६॥ ॥ ध्यानबिन्दूपनिषद समाप्त ॥

अक्षमालिकोपनिषत् ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमा- विरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे माप्रहासीरनेना- धीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारमवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ शान्तिपाठ – ॐ। मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर हो, हे स्वयं प्रकाश आत्मा ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ। हे वाणी और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो, इसलिये मेरे वेदाभ्यास का नाश न करो। इस वेदाभ्यास ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत करता हूँ। मैं ऋत भाषण करूँगा, सत्य भाषण करूँगा, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । अथ प्रजापतिर्गुहं पप्रच्छ—भो भगवन् अक्षमालाभेदविधिं ब्रूहीति। सा किल्लक्षणा कतिभेदा अस्याः कति सूत्राणि कथं घटनाप्रकारः के वर्णाः का प्रतिष्ठा कैषाऽधिदेवता किं फलं चेति ॥१॥ तं गुहः प्रत्युवाच—प्रवालमौक्तिकस्फटिकशंखरजताष्टा- पदचन्दनपुत्रजीविकाब्जरुद्राक्षा इत्यादिक्षान्तरमूर्त्तिसंविधानुभावाः सौवर्णं राजतं ताम्रं चेति सूत्रत्रयम्। तद्विवरे सौवर्णं तद्दक्षपार्श्वे राजतं तद्वामे ताम्रं तन्मुखे मुखं तत्पुच्छे पुच्छं तदन्तरावर्तनक्रमेण योजयेत् ॥२॥

३०० ] [ अक्षमालिकोपनिषत् यदस्यान्तरं सूत्रं तद्ब्रह्म । यद्दक्षपार्श्वं तच्छैवम् । यद्वामे तद्वैष्णवम् । यन्मुखं सा सरस्वती । यत् पुच्छं सा गायत्री । यत् सुषिरं सा विद्या । या ग्रन्थिः सा प्रकृतिः । ये स्वरास्ते धवलाः । ये स्पर्शास्ते पीताः । ये परास्ते रक्ताः ॥३॥ किसी समय प्रजापति ने गुह से पूछा—हे भगवन् ! अक्षमाला की भेद-विधि को कहिए। उसका क्या लक्षण है ? कितने भेद हैं ? इसके कितने सूत्र हैं ? कैसे घटना प्रकार है ? ( पिरोने का प्रकार ) कौन अक्षर हैं ? क्या प्रतिष्ठा है ? और कौन इसका अधिदेवता है ? और क्या फल है ? ॥ १ ॥ तब उन्हें गुह ने उत्तर दिया—प्रबाल, मोती, स्फटिक, शंख, चांदी, सोना चंदन, पुत्र जीविका, कमल तथा रुद्राक्ष ये दस प्रकार की होती है जो कि अ से लेकर क्ष तक के अक्षरों से अनुभावित करके धारण की जाती है। इसमें सोना, चांदी तथा तांबा ये तीन सूत्र होते हैं। उस ( मणके ) के छेद में सोना, दाहिने भाग में चाँदी तथा बाँये हिस्से में तांबा, उसके मुख में मुख, पूँछ स्थान में पूँछ उसके अन्दर का सूत्र है वह ब्रह्मा है। जो दाहिने भाग में है वह शैव है। जो बायें हिस्से में है वह वैष्णव है। जो मुख है वह सरस्वती है जो पूँछ है। वह गायत्री है । जो छेद है वह विद्या है। जो गांठ है यह प्रकृति है। जो स्वर है वह सात्विक होने के कारण धवल अर्थात् सफेद है तथा जो स्पर्श है वह सत्व तथा तम मिश्रित होने के कारण पीले हैं एवं जो पर हैं वे राजस के कारण लाल हैं ॥ ३ ॥ अथ तां पञ्चभिर्गव्यैरमृतैः पञ्चभिर्गव्यैस्तनुभिः शोध- यित्वा पञ्चभिर्गव्यैर्गन्धोदकेन तस्नाप्य तुस्मात् सोङ्कारेण पत्र-

अक्षमालिकोपनिषत् [ ३०१: कूर्चेन स्नपयित्वाऽष्टभिर्गन्धैराषिच्य सुमनःस्थले निवेश्याक्षत- पुष्पैराराध्य प्रत्यक्षमादिक्षान्तवर्णैर्भावयेत् ॥४॥ ओमंकार मृत्युञ्जय सर्वव्यापक प्रथमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमांक आकर्षणात्मक सर्वगत द्वितीयेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमिंकार पुष्टिदाक्षोभकर तृतीयेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमींकार वाक्प्रसादकर निर्मल चतुर्थेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमुंकार सर्वबलप्रद सारतर पञ्च- मेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमूॅकारोच्चाटनकर दुःसह षष्ठेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्ॄकार संक्षोभकर चञ्चल सप्तमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्ॄंकार सम्मोहनकरोज्ज्वलाष्टमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्लूंकार विद्वेषणकर शूहक नवमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्लॄंकार मोहकर दशमेऽक्षे प्रति- तिष्ठ । ओमेंकार सर्ववश्यकर शुद्धसत्त्वैकादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमैकार शुद्धसात्विक पुरुषवश्यकर द्वादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमों- काराखिलवाङ्मय नित्यशुद्ध त्रयोदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमौंकार सर्ववाङ्मय वश्यकर शान्त चतुर्दशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमंकार गजादिवश्यकर मोहन पञ्चदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमःकार मृत्यु- नाशनकर रौद्र षोडशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं कंकार सर्वविषहर कल्याणद सप्तदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं खंकार सर्वक्षोभकर व्याप- काष्टादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं गंकार सर्वविघ्नशमन महत्तरैको- नविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं घंकार सौभाग्यद स्तरम्भनकर विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ङंकार सर्वविषनाशकरोग्रैकविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं चंकाराभिचारघ्न क्रूर द्वाविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं छंकार भूतनाशकर भीषण त्रयोविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं जंकार

३०२ ] [ अक्षमालिकोपनिषत् कृत्याऽदिनाशकर दुर्धर्ष चतुर्विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं झंकार भूतनाशकर पञ्चविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ञंकार मृत्युप्रमथन षड्विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं टंकार सर्वव्याधिहर सुभग सप्तविं- शेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ठंकार चन्द्ररूपाष्टाविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं डंकार गरुडात्मक विषघ्न शोभनैकोनत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ढंकार सर्वसंपत्प्रद सुभग त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं णंकार सर्वसिद्धिप्रद मोहकरैकत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं तंकार धन- धान्यादिसंपत्प्रद प्रसन्न द्वात्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं थंकार धर्मप्राप्तिकर निर्मल त्रयस्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं दंकार पुष्टिवृद्धिकर प्रियदर्शन चतुस्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं धंकार विषज्वरनिघ्न विपुल पञ्चत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं नंकार भुक्ति- मुक्तिप्रद शान्त षट्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं पंकार विषविघ्न- नाशन भव्य सप्तत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं फंकाराणिमादिसिद्धि- प्रद ज्योतीरूपाष्टात्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं बंकार सर्वदोषहर शोभनैकोनचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं भंकार भूत प्रशान्तिकर भयानक चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं मंकार विद्वेषिमोहनकरै- कचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं यंकार सर्वव्यापक पावन द्विचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं रंकार दाहकर विकृत त्रिचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं लंकार विश्वम्भर भासुर चतुश्चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं वंकार सर्वाप्यायकर निर्मल पञ्चचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं शंकार सर्वफलप्रद पवित्र षट्चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं षंकार धर्मार्थकामद धवल

अक्षमालिकोपनिषत् [ ३०३

सप्तचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ। ओं संकार सर्वकारण सावंत्र्यणि- काष्टचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ। ओं हंकार सर्ववाङ्मय निर्मलै- कोनपञ्चाशदक्षे प्रतितिष्ठ। ओं लंकार सर्वशक्तिप्रद प्रधान पञ्चाशदक्षे प्रतितिष्ठ। ओं क्षकार परापरतत्त्वज्ञापक परंज्योतीरूप शिखामणौ प्रतितिष्ठ ॥५॥

इसके बाद उसे नन्दा आदि पांच गायों के दूध से तथा गौ के शरीर से उत्पन्न गोमूत्र, गोमय, दूध, दधि, घृत, इन पंचगव्यों से शोधित करके, पुनः पंचगव्य ( नन्दादि पांच गायों के दही मात्र से ) तथा गन्ध मिश्रित जल से स्नान कराकर ओंकार का उच्चारण करते हुए पत्र कूर्च द्वारा स्नान करवा कर, मन्त्र शास्त्र में प्रसिद्ध तक्कोल, उशीर कपूर आदि आठ गन्धों से लीपकर "मणशिला" नामक धातु पर स्थापित कर अक्षत तथा पुष्पों से उसकी पूजा करके प्रत्येक अक्ष (मणके) को अ से लेकर क्ष तक के अक्षरों द्वारा क्रमशः भावित करें (उनकी उसमें स्थापना करें) ॥४॥ ॐ हे ओंकार ! तुम मृत्यु को जीतने वाले हो। सर्व व्यापक इस प्रथम अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे ओंकार ! तुम आकर्षण शक्ति वाले हो, सर्वव्यापी हो, इस दूसरे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे इंकार ! तुम पुष्टि (पोषण) करने वाले तथा क्षुभिततारहित हो तीसरे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ईकार ! तुम वाणी की स्वच्छता को करने वाले तथा निर्मल हो इस चौथे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे उंकार ! तुम सभी को सभी प्रकार के बल देने वाले तथा सारयुक्तों में श्रेष्ठ हो, पांचवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ऊंकार ! तुम उच्चारण करने वाले तथा दुःसह (न सहे जा सकने वाले) हो इस छठे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ऋंकार ! तुम संक्षोभ (चलचित्तता) को करने

३०४ ] [ अक्षमालिकोपनिषत्. वाले तथा चंचल हो इस सातवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ॠंकार ! तुम सम्मोहन करने वाले तथा उज्ज्वल हो इस आठवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे लृंकार ! तुम विद्वेष को उत्पन्न कर देने वाले तथा सब कुछ जानने वाले अत्यन्त गुप्त हो इस नवे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे लॄंकार ! तुम मोहकारी हो इस दसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे एंकार ! तुम सब को वश में करने वाले तथा शुद्ध सत्य हो इस ग्यारहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ऐंकार ! तुम शुद्ध तथा सात्विक हो और पुरुषों को वश में करने वाले हो इस बारहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे ओंकार ! तुम अखिल वाङ्मय (सारे ही अक्षरों के समूह) हो एवं नित्य शुद्ध हो इस तेरहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे औंकार ! तुम भी अक्षर समूह स्वरूप वश में करने वाले तथा शान्त हो इस चौदहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे अंकार ! हाथी आदमियों को वश में करने वाले एवं मोहित करने वाले हो इस पन्द्रहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे अःकार ! तुम मृत्यु नाशक तथा रौद्र (अत्यन्त भयानक) हो इस सोलहवें अक्ष में प्रतिष्ठा पाओ। हे कंकार ! तुम सभी विषों को हरने वाले तथा कल्याण देने वाले हो इस सत्रहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे खंकार ! तुम सबको क्षुभित करने वाले एवं व्यापक हो इस अठ्ठारहवें अक्ष में प्रति- ष्ठित हो जाओ। ओं हे गंकार ! तुम सभी विघ्नों को शान्त करने वाले तथा बड़ों में भी बड़े (विशाल) हो इस उन्नीसवें अक्ष में प्रतिष्ठा पाओ। ओं हे घंकार ! तुम सौभाग्य देने वाले तथा स्तम्भन (गति को रोकने वाले) कर्त्ता हो बीसवें अक्ष में प्रतिष्ठा पाओ) ओं हे ङंकार ! तुम सभी विषों के नाशक तथा उग्र भयानक हो इस इक्कीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे चंकार ! तुम Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

अक्षमालिकोपनिषत् ] [ ३०५

अभिचार नाशक तथा क्रूर हो बाईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे छंकार ! तुम भूत नाशक तथा भयानक हो तेईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे जंकार ! तुम कृत्या आदि ( डाकिनी आदि ) नाशक तथा दुर्धर्ष हो इस चौबीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे झंकार ! तुम भूतनाशक हो इस पच्चीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे ञंकार ! तुम मृत्यु को मथित कर देने वाले हो इस छब्बीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे टंकार ! तुम सभी रोगों के नाशक तथा सौम्य हो इस सत्ताईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे ठंकार ! तुम चन्द्रस्वरूप हो इस अठ्ठाईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे डंकार ! तुम गरुड़ स्वरूप विषनाशक तथा सुन्दर हो उनतीसवें में प्रति- ष्ठित हो जाओ । ओं हे ढंकार ! तुम सभी तरह की सम्पत्ति- दायक तथा सौम्य हो इस तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । दायक तथा सौम्य हो इस तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे णंकार ! तुम सभी सिद्धि देने वाले तथा मोह कर देने वाले हो इस इकत्तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे तंकार ! तुम धनधान्य आदि सम्पत्तिदाता तथा सदा प्रसन्न हो इस बत्तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे थंकार ! तुम धर्म की प्राप्ति कराने वाले तथा निर्मल हो इस तेतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे दंकार ! तुम पुष्टि तथा वृद्धिकर्ता हो तथा सुन्दर दीखने वाले हो इस चौंतीसवें अक्ष प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे धंकार ! तुम विष तथा ज्वर के नाशक हो तथा विशाल ( बहुत ) हो इस पैंतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे नंकार तुम भोग तथा मोक्षदाता तथा शान्त हो इस छत्तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे पंकार ! तुम विष एवं विघ्नों के नाशक तथा कल्याणमय हो इन सैंतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे फंकार ! तुम अणिमा महिमा गरिमा आदि आठ सिद्धि के

३०६ ] [ अक्षमालिकोपनिषत् तथा प्रकाश स्वरूप हो, इस अड़तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे बंकार ! तुम सब दोषों को हरण करने वाले तथा सुन्दर हो, इस उनतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे भंकार ! तुम भूत बाधा शान्त करने वाले तथा भयानक हो, इस चालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे मंकार ! तुम विद्वेष (बैर) करने वाले को मोहित करने वाले अथवा विद्वेषी तथा मोह करने वाले हो, इस इकतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे यंकार ! तुम सब जगह व्यापी तथा पवित्र हो, इस बयालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। हे रंकार ! तुम दाह (जलन) (तपन) उत्पन्न करने वाले तथा विकृत हों, इस तेतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे लकार ! तुम विश्व का पोषण करने वाले तथा तेजस्वी (चमकने वाले) हो, इस चौवालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे वंकार ! तुम सब को तृप्त (पुष्ट) करने वाले तथा निर्मल हो इस पैंतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे शंकार ! तुम सभी प्रकार के फलों के दाता एवं पवित्र हो इस छयालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे षंकार ! तुम धर्म अर्थ तथा काम को देने वाले तथा श्वेत (सात्त्विक) हो, इस सैंतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे संकार ! तुम सब वस्तुओं के कारण सभी वर्गों से सम्बन्धित इस अड़तालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे हंकार ! तुम सभी सर्व वाङ्मय (सब अक्षरों के या साहित्य के स्वरूप) तथा निर्मल हो, इस उनचासवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ळंकार ! तुम सभी शक्तियों के दाता तथा प्रधान (प्रमुख) हो, इस पचासवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे क्षंकार ! तुम परात्पर तत्व के बताने वाले तथा परंज्योती स्वरूप हो, इस शिखा मणि में मेरुमाला का प्रधान मणका, प्रतिनिधि रूप से स्थित हो जाओ ॥५॥

'अक्षमालिकोपनिषत् ] [ ३०७ अथोवाच ये देवाः पृथिवीषदस्तेभ्यो नमो भगवन्तोऽनु- 'मदन्तु शोभायै पितरोऽनुमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ॥६ अथोवाच ये देवा अन्तरिक्षसदस्तेभ्य ॐ नमो भगवन्तो- 'ऽनुमदन्तु शोभायै पितरोऽनुमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ।७। अथोवाच ये देवा दिविषहस्तेभ्यो नमो भगवन्तोऽनुमदन्तु शोभायै पितरोऽनमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ।८। अथोवाच ये मन्त्रा या विद्यास्तेभ्यो नमस्ताभ्यश्चोन- मस्तच्छक्तिरस्याः प्रतिष्ठापयति ।६। अथोवाच ये ब्रह्मविष्णुरुद्रास्तेम्य सगुणेभ्यः ओं नमस्त- 'द्दीर्यमस्याः प्रतिष्ठापयति ॥१० वे इस प्रकार बोले — 'जो देवता पृथिवी में विचरने वाले हैं उन्हें नमस्कार है। हे भगवन् ! आप लोग इस माला में स्थित हो, इस माला का अनुमोदन (मेरे द्वारा ग्रहण का समर्थन करें) तथा इसकी शोभा के लिए पितृगण ही अनुमोदन करें। इस ज्ञानमयी अक्षमालिका को प्राप्त कर अग्निष्वात्त आदि पितर अनुमोदन करें ॥ ६ ॥ पुनः बोले — 'जो देवता आकाश में रहने वाले हैं, उन्हें नमस्कार है, वे भगवान् पितरों के सहित इसे ज्ञानमयी माला में स्थित हो, इसकी शोभा के लिए अनमोदन करे ॥ ७ ॥ जो देवता स्वर्ग में (आकाश में) निवास करने वाले हैं, वे ज्ञान स्वरूपिणी अक्षमालिका में स्थित हो, वरदान दायक बनकर पितरों सहित इसकी शोभा के लिए अनुमोदन करें ॥ ८ ॥ पुनः इस प्रकार कहे — 'इस लोक में जो सात करोड़ संख्यक मन्त्र हैं, जो चौंसठ कला स्वरूप 'विद्यायें हैं, उन्हें नमस्कार है। उनकी शक्तियां इसमें विराजमान होवें

३०८ अक्षमालिकोपनिषत् ॥६॥ पुनः ऐसा कहे—'जो ब्रह्मा विष्णु तथा रुद्र हैं उन्हें नमस्कार है उनके वीर्य को (पराक्रम को) नमस्कार है उनका वीर्य इसमें प्रतिष्ठित हो ॥१०॥ अथोवाच ये सांख्यादितत्त्वभेदास्तेभ्यो नमो वर्तध्वं वरोधेनुवर्तध्वम् ॥११॥ अथोवाच ये शैवा वैष्णवाः शाक्ताः शतसहस्रशस्तेभ्यो नमो नमो भगवन्तोऽनुमदन्तवनुगृह्णन्तु ॥१२ अथोवाच याश्च मृत्योः प्राणक्त्यस्ताभ्यो नमो नमस्तेनैतां मृडयत मृडयत ॥१३ पुनरेतस्यां सर्वात्मकत्वं भावयित्वा भावेन पूर्वमालिका- मुत्पाद्यारभ्य तन्मयीं महोपहारंरुपहृत्यादिक्षान्तैरक्षै रक्षमाला- मष्टोत्तरशतं स्पृशेत् ॥१४ अथ पुनरुत्थाप्य प्रदक्षिणीकृत्योंनमस्ते भगवति मन्त्र- मातृकेऽक्षमाले सर्ववशंकर्योनमस्ते भगवति मन्त्रमातृकेऽक्षमालि- केऽशेषस्तम्भिन्योंनमस्ते भगवति मन्त्रमातृकेऽक्षमाले उच्चाटन्यों- नमस्ते भगवति मात्रमग्तृकेऽक्षमाले विश्वामृत्यो मृत्युंजयस्व- रूपिणि सकलोद्दीपिनि सकललोकदरक्षादिके सकललोको- ज्जीविके सकलोत्पादिके दिवाप्रवर्तिके रात्रिप्रवर्तिके नद्यन्तरयासि देशान्तरयासि द्वीपान्तरयासि लोकान्तरयासि सर्वदा स्फुरसि सर्वहृदि वासयसि । नमस्ते परारूपे नमस्ते पश्यन्तीरूपे नमस्ते मध्यमारूपे नमस्ते वैखरीरूपे सर्वतत्त्वात्मिके सर्वविद्याऽऽत्मिके सर्वशक्त्यात्मिके सर्वदेवात्मिके वसिष्ठेन मुनिनाऽऽराधिते विश्वा- मित्रेण मुनिनोपसेव्यमाने नमस्ते नमस्ते ॥१५॥ प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधियानो दिवसकृतं पापं नाशयति । तत् सायं प्रयुपानः पापोऽपापो

Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

अक्षमालिकोपनिषत् [ ३०६ भवति एवमक्षमालिकया जप्तो मन्त्रः सद्यः सिद्धिकरो भवती- त्याह भगवान गुह प्रजापतिमित्युपनिषत् ।।१६।। पुनः बोले—जो सांख्यादिक दर्शनों में छयानवे तत्व हैं तुम्हें नमस्कार है ( हो ) आप लोग इस माला में स्थित हो जपने वाले को वर देने वाले कामधेनु स्वरूप तथा ( जपकर्त्ता के विरोधों के नाशक होकर ) शोभित होवे ॥ ११ ॥ पुनः इस प्रकार बोले—इस ब्रह्माण्ड में जो शैव, वैष्णव, तथा शाक्त सैकड़ों तथा हजारों की संख्या में निवास करते हैं उन्हें नमस्कार हो वे सभी भगवान् ( शक्तिशाली ) कृपा करें तथा अनुमोदन करें ( समर्थन, आज्ञा ) करें ॥ १२ ॥ अन्त में ऐसा कहे—जो मृत्यु की जो उपजीव्य शक्तियाँ हैं उन्हें नमस्कार हो आप लोग इस नमस्कार से स्तुति से प्रसन्न हो इस अक्षमालिका को अपने उपासकों को सुख देने वाली करदें ॥१३॥ फिर इस मालिका में सर्वात्मकता (सर्वविधि पूर्णता) की भावना करके इसी भावना से पूर्ण मालिका (आधी माला) को पिरोकर पुनः शेष आधी पचास मणकों में उसी प्रकार आवृत्ति करके ( १०० पूरे हुये ) और पुनः शेष आठ मणकों में 'अ' क, च, ट, त, प, य, तथा श इस अष्टवर्ग को ( पूर्वोक्तक्रम से ) योजित करे । तब एक सौ आठ हो जाते हैं ( मेरु में तो वही पूर्वोक्त क्ष रहेगा ) इस प्रकार मालिका की योजना एक २ का उपहार ( पास में पिरो २ ) करके करे ॥ १४ ॥ अक्ष मालिका की स्तुति—करके बाद उठकर प्रदक्षिणा करके ओं भगवती मन्त्र मातृके ! अक्षमाले तुम सबको वश में करने वाली हो तुम्हें नमस्कार है । हे मन्त्र मातृके ! अक्षमाले ! तुम सब की गति स्तम्भ करने वाली, उच्चाटन ( विक्षिप्तता, विनाशता ) करने वाली हो तुम्हें नमस्कार है । हे मन्त्रमातृके ! अक्षमाले ! तुम सबकी मृत्यु स्वरूप तथा मृत्युञ्जय स्वरूपिणी हो और तुम सब की उद्दीप्त करने वाली

३१० ] [ अक्षमालिकोपनिषत् हो । साथ ही तुम सारे लोक की रक्षा करने वाली सकल संसार की प्राणदात्री, सब कुछ उत्पन्न करने वाली दिन तथा रात्रि की प्रवर्तक एवं नदियों, से दूसरी नदियों, सभी देशों, द्वीपों लोक में संचार करने की शक्ति रखने वाली हो । इन सभी जगह तुम विद्यमान हो तथा सदैव स्फुरण करने वाली ( हृदयों में प्रकाशित होने वाली) तथा सभी के हृदयों में वास करती हो । परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी आदि जो वाणी हैं तुम उनकी स्वरूप हो तथा सभी तत्त्वरूपिणी, सर्वं विद्यामय, सभी शक्तियों की अधिष्ठात्री, सर्व देवों की आराध्या हो । तुम वशिष्ठ मुनि द्वारा आराधित एवं विश्वामित्र मुनि द्वारा उपसेव्यमान ( सेवा शुश्रूषा किये जाने वाली ) हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार है ॥१५॥ इसे प्रातः अध्ययन करने वाला रात में किये गये पापों से मुक्त हो जाता है । सांयकाल इसे पढ़ने वाला दिन में किये पापों से छूट जाता है । जो सायं प्रातः दोनों समय सदैव इसका पाठ करता है, वह बड़ा पापी भी तो पाप मुक्त हो 'जाता है। भगवान् गुह ने प्रजापति को अन्त में यही कहा कि इस प्रकार अभिमन्त्रित पूजित अक्षमाला से जपा हुआ मन्त्र शीघ्र हीं सिद्धिदायक होता है । ॥१६॥ ॥ अक्षमालिकोपनिषत् समाप्त ॥ ─:०:─

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri रुद्राक्षजाबालोपनिषत् ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मे अस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ मेरे अङ्ग वृद्धि को प्राप्त हों; वाणी, घ्राण, चक्षु, श्रोत, बल और सब इन्द्रियां वृद्धि को प्राप्त हों । सब उपनिषद् ब्रह्मरूप हैं । मुझ से ब्रह्म का त्याग न हो और ब्रह्म मेरा त्याग न करे । उसमें रत हुये मुझको उपनिषद् धर्म की प्राप्ति हो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । अथ हैनं कालाग्निरुद्रं भुसुण्डः पप्रच्छ—कथं रुद्राक्षोत्पत्तिः, तद्धारणात् किं फलमिति ॥ १ तं होवाचं भगवान् कालाग्निरुद्रः । त्रिपुरवधार्थं महं निमीलिताक्षोऽभवम् । तेभ्यो जलबिन्दवो भूमौ पतितास्ते रुद्राक्षा जाताः । सर्वानुग्रहार्थाय तेषां नामोच्चारणमात्रेण दशगोप्रदानफलं दर्शनस्पर्शनाभ्यां द्विगुणफलमत ऊर्ध्वं वक्तुं न शक्नोमि ॥ २ तत्रैते श्लोका भवन्ति— कस्मिन् स्थितं तु किं नाम कथं वा धर्यते नरैः । कतिभेदमुखान्यत्र कैर्मन्त्रैर्धार्यते कथम् ॥ ३ दिव्यवर्षसहस्राणि चक्षुरुन्मीलितं मया । भूमावक्षिपुटाभ्यां तु पतिता जलबिन्दवः ॥ ४ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

३१२ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत् तत्राश्रुबिन्दवो जाता महारुद्राक्षवृक्षकाः । स्थावरत्वतनुप्राप्य भक्तानुग्रहकारणात् ॥ ५ रुद्राक्ष के विषय में भुसुण्ड का प्रश्न—एक समय इन कालाग्नि रुद्र से भुसुण्ड ने पूछा—कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई ? और उसको धारण करने से क्या फल होता है ? ॥१॥ भगवान् कालाग्नि रुद्र ने उसको कहा कि त्रिपुर नामक राक्षस को मारने के लिए मैंने आँखें बन्द करलीं अर्थात् समाधिस्थ होगया । तब उन आंखों से जल की बूंदें पृथ्वी में गिरीं और वह रुद्राक्ष बन गईं । सब के ऊपर कृपा करने के लिए ( मैं इतना ही कहता हूँ ) कि उसके नाम लेने मात्र से दस गौ दान करने का फल और देखने तथा स्पर्श करने से दुगुना फल होता है । इससे अधिक ( आगे ) मैं नहीं कह सकता ॥२॥ इस विषय में श्लोक हैं—प्रश्नः—कहां स्थित हैं ? क्या नाम है ? और कैसे मनुष्य इसे धारण करते हैं ? कितने भेद हैं ? और किन मन्त्रों से किस प्रकार धारण किये जाते हैं ? ॥३॥ उत्तर—एक हजार दिव्य वर्ष [ देवताओं के वर्ष ] में मैंने आँखें खोलीं तो पृथ्वी में आंखों से जल की बूंदें गिरीं ॥४॥ वहां आंसू की बूंदें महारुद्राक्ष के पेड़ बन गईं और भक्तों पर दया की दृष्टि से स्थावर [ अचल ] हो गईं ॥५॥ भक्तानां धारणात् पापं दिवारात्रिकृतं हरेत् । लक्षं तु दर्शनात् पुण्यं कोटिस्तद्धारणाद्भवेत् ॥ ६ तस्य कोटिशतं पुण्यं लभते धारणान्नरः । लक्षकोटिसहस्राणि लक्षकोटिशतानि च ॥ ७ तज्जपाल्लभते पुण्यं नरो रुद्राक्षधारणात् । धात्रीफलप्रमाणं यच्छ्रेष्ठमेतदुदाहृतम् ॥ ८