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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३८५ “देवताओ ! हम यज्ञ करते हुए कानों से भद्र (कल्याण) सुनें—कल्याण का ही दर्शन करें। हम भगवान का स्तोत्र करते हुए अपने दृढ़ अङ्गों से ऐसी आयु पावें जो हमारे उपास्य भगवान के भजन, चिन्तनादि में काम आवे। इस प्रकार 'भद्र' वर्णित होने से भगवान को 'भद्र' कहते हैं।' देवताओं ने पूछा कि "भगवान को मृत्यु-मृत्यु क्यों कहा जाता है ?" ब्रह्माजी ने उत्तर दिया कि 'अपनी महिमा द्वारा अपने भक्तों के स्मरण करते ही उनकी मृत्यु और अपमृत्यु को भी नष्ट कर डालते हैं। वेद का कथन है कि जिनकी अनुज्ञा में देवगण मस्तक झुकाकर रहते और आज्ञा पालन करते हैं, जिनकी छाया अमृत स्वरूप है, जो आत्मा और शक्ति के देने वाले हैं, जो मृत्यु के लिए भी मृत्यु स्वरूप ऐसे एक एवं अद्वितीय भगवान के समक्ष हम स्वयं उपस्थित होकर आराधना करते हैं।' इसी के अनुसार भगवान् को 'मृत्यु-मृत्यु' कहते हैं।' देवताओं ने प्रश्न किया कि 'मन्त्रराज में 'नमामि' पद क्यों प्रयुक्त हुआ है ?' प्रजापति ने उत्तर दिया 'कि जिन भगवान को सभी देवता, ब्रह्मवादीजन तथा मुक्ति की कामना वाले साधक नमस्कार करते हैं, इसलिए उन्हें नमस्कार करना चाहिए।' वेद में कहा है कि जिन भगवान को लक्ष्य करके ही ब्रह्मा अपने स्तवन में नमस्कार करते हैं, वे भगवान ब्रह्मा और वेदों के रक्षक हैं। इन्द्र, वरुण, मित्र, अर्यमा आदि के आश्रयभूत हैं, इसीलिए उनके निमित्त 'नमामि' शब्द प्रयुक्त हुआ है।' देवताओं ने पुनः प्रश्न किया कि 'मंत्र में 'अहम्' पद क्यों प्रयुक्त हुआ है ?' इसके उत्तर में ब्रह्माजी ने कहा कि 'श्रुति में कहा है कि मैं अमृत का भण्डार हूँ। देवताओं से भी पूर्व मैं प्रकट हुआ हूँ। मैं ही इस प्रकट और अप्रकट संसार से पूर्व प्रकट होने वाला आत्मा

३८६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri हूँ। हे देव ! तुम मुझे आश्रय प्रदान करते हो, वैसे तुमने मेरा पालन किया है। मैं अन्न हूँ, अन्न भक्षक का भी भक्षक बन जाता हूँ। सूर्य के प्रकाश के समान यह सम्पूर्ण विश्व मेरे प्रकाश के सामने फीका पड़ जाता है। जो इस प्रकार का ज्ञाता है; वही यथार्थ उपासना करने वाला है। यही महोपनिषत् है। ॥ द्वितीय उपनिषद् समाप्त ॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नानुष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नर- सिंहस्य शक्तिं बीजं नो ब्रूहि भगवन्निति स होवाच प्रजापतिर्माया वा एषा नारसिंही सर्वमिदं सृजति सर्वमिदं रक्षति सर्वमिदं संहरति तस्मान्मायामेतां शक्तिं विद्याद्य एतां मायां शक्तिं वेद स पाप्मानं तरति स मृत्युं तरति स संसारं तरति सोऽमृतत्वं च गच्छति महतीं श्रियतश्नुते मीमासन्ते ब्रह्मवादिनो ह्रस्वा दीर्घा- प्लुता चेति ॥ यदि ह्रस्वा भवति सर्वं पाप्मानं दहत्यमृतत्वं च गच्छति यदि दीर्घा भवति महतीं श्रियमाप्नोत्यमृतत्वं च गच्छति यदि प्लुता भवति ज्ञानवान्भवत्यमृतत्वं च गच्छति तदेतदृषिणो- क्तं निदर्शनं स ईं पाहि य ऋजीषी तरुतः श्रियं लक्ष्मीमौपलाम- म्बिकां गां षष्ठीं च यामिन्द्रसेनेत्युदाहुः तां विद्यां ब्रह्मयोनिं सरूपा- मिहायुषे शरणमहं प्रपद्ये।सर्वेषां वा एतद्भूतानामाकाशः परा- यणं सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव जायन्त आकाशादेव जातानि जीवन्त्याकाशं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तस्मादाकाशं बीजं विद्यात्तदेव ज्यायस्तदेतदृषिणोक्तं निदर्शनं हंस शुचिषद्वसुरन्त- रिक्षद्वोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ॥ नृषद्वरसदृतसद् व्योम- दब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ य एवं वेदेति महोपनिषत् ॥ ॥ इति तृतीयोपनिषत् ॥ प्रसिद्ध देवगण जिज्ञासु भाव से प्रजापति ब्रह्माजी के सामने Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३८७ नतमस्तक होकर बोले- 'भगवान ! मंत्रराज आनुष्टुभ की शक्ति और बीज का हमें उपदेश कीजिये ।' इस पर ब्रह्माजी ने कहा- "भगवान की शक्तिभूता माया ही इस विश्व की रचना, रक्षा और विनाश करती है। इसलिए यह माया ही शक्ति है। इस माया को शक्ति रूप से जानने वाला ज्ञानी पापों से पार होता है और भव-सागर से तर कर अमृतत्व को प्राप्त होता है, और वह इस लोक में भी महान् सुख-समृद्धि का उपभोग करता है। ब्रह्मवादी जन सोचते हैं कि भगवान की माया शक्ति लघु दीर्घ अथवा प्लुत है ? यदि लघु है तो जो कोई इसे लघु जाने वह अपने सब पापों को उसके द्वारा भस्म कर देता और अमृतत्व को पाता है। यदि दीर्घ है तो जो कोई उसके इस रूप को जानता है वह महान् ऐश्वर्य प्राप्त करता हुआ अंत में अमर हो जाता है। यदि वह प्लुत है तो जो उसके इस रूप का ज्ञाता है, वह अत्यन्त ज्ञानी होता और अमृतत्व प्राप्त करता है। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि- "हे माया रूप बिन्दुममय स्वर ! मैं इस भव-सागर से पार होने की कामना वाला हूँ तो साधन के निमित्त दीर्घ आयु भी प्राप्त करना चाहता हूँ। इस उद्देश्य से मैं भगवान की शक्ति श्री, लक्ष्मी शङ्कर भगवान की शक्ति अम्बिका, ब्रह्मशक्ति सरस्वती, स्कन्दशक्ति षष्ठी, इन्द्र-शक्ति इन्द्रसेना और ब्रह्म को प्राप्त कराने वाली साक्षात् प्रकट विद्या-शक्ति का आश्रय ग्रहण करता हूँ । तुम सभी उपरोक्त शक्तियों के सहित मेरी रक्षा करो।' यह सभी प्राणी आकाश से उत्पन्न होते हैं, इसलिए आकाश ही सब प्राणियों का आश्रयभूत है। उत्पन्न प्राणी आकाश से ही जीवन धारण करते और अपना देह त्यागते और आकाश में ही लीन हो जाते हैं। अतः आकाश को ही सम्पूर्ण विश्व का बीज मानना चाहिए। इस विषय में यह दृष्टांत है कि जो पुरुषोत्तम भगवान् अपने

३८८ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् विशुद्ध परमधाम में स्वयं प्रकाशित हैं, वे ही अन्तरिक्ष में निवास करने वाले वसु हैं। वे ही घरों में आने वाले अतिथि हैं। वे ही यज्ञ की वेदी में प्रतिष्ठित अग्नि और उसमें आहुति देने वाले होते हैं। वे आकाश और स्वर्गलोक में निवास करते हैं, वे मर्त्यलोक में और सर्वश्रेष्ठ सत्यलोक में रहते हैं। वे ही पृथिवी, जल, पर्वतों और शुभ कर्मों में प्रकट होते हैं, वे ही परम सत्य एवं सबसे महान् हैं।' इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी पूर्व कथित फलों को प्राप्त करता है। यह महोपनिषद् है। ॥ तृतीय उपनिषद् समाप्त ॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नाष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नारसिंहस्याङ्गमन्त्रान्नो ब्रूहि भगव इति सहोवाच प्रजापतिः प्रणवं सावित्रीं यजुर्लक्ष्मीं नृसिंहगायत्रीमित्यङ्गानि जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ॥ १ ॥ प्रसिद्ध देवताओं ने जिज्ञासु भाव से ब्रह्माजी ने प्रश्न किया— ‘मन्त्रराज अनुष्टुप के अङ्गभूत मन्त्रों को हमारे प्रति कहने की कृपा करो।' प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा— 'प्रणव, यजुलक्ष्मी, गायत्री और नृसिंह गायत्री ये सब मंत्रराज के अङ्गभूत मन्त्र हैं। इनका ज्ञाता ऐश्वर्य प्राप्ति के साथ ही अन्त में अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥ ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भ- विष्यदिति सर्वमोंकार एव यच्चान्यन्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव सर्वं ह्येतद्ब्रह्मायामात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पाज्जा- गरितस्थानो बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वा- नरः प्रथमः पादः। स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्तांग एकोनविंश- तिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः। यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तं सुषुप्तस्थान Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३८१

एकीभूतः प्रज्ञानघन एकानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञ- स्तृतीयः पादः । एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्यौ हि भूतानां नान्तः प्रज्ञं न बहिः प्रज्ञं नोभयतः न प्रज्ञं प्रज्ञं नाप्रज्ञं न प्रज्ञानघनमदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणम- चिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ २

‘ओंकार अविनाशी है, इसी की महिमा यह सम्पूर्ण दृश्यमान विश्व है । भूत, भविष्यत्, वर्तमान इन तीनों कालों से सम्बन्धित जो कुछ है, वह सब ओंकार ही है । उक्त तीनों कालों में अतीत जो है, वह भी ओंकार है । यह सब कुछ ओंकार रूप ब्रह्म है । यह भगवान् नृसिंह ब्रह्म ही है । उनके चार पाद हैं ।

जाग्रत अवस्था और उससे व्याप्त यह स्थूल विश्व ही जिनका स्थान है और बाह्य संसार में जिनका ज्ञान प्रसारित है, सातों लोक जिनके अङ्ग हैं, पञ्च कर्मेन्द्रिय, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पंच प्राण और चार अन्तःकरण, इस प्रकार उन्नीस जिनके मुख हैं, जो इस स्थूल विश्व के भोगने वाले हैं, जो विश्व रूप देह में स्थित होने से वैश्वानर कहाते हैं, वही सर्वरूप वैश्वानर भगवान् श्रीनृसिंह के प्रथम पाद हैं ।

स्वप्नावस्था और उससे प्रभावित यह सूक्ष्म विश्व ही जिनका स्थान है और आन्तरिक संसार में जिनका ज्ञान फैला हुआ है, सातों लोक जिनके अङ्ग और उन्नीस मुख हैं जो सूक्ष्म विश्व के भोक्ता, पालक एवं रक्षक हैं, ऐसे वे तैजस पुरुष ही भगवान् नृसिंह के द्वितीय पाद हैं ।

सुषुप्ति और उससे उपलक्षित सम्पूर्ण विश्व की प्रलय रूप अवस्था ही जिनका स्थान है, जो एक रूप में ही स्थित हैं और जिनका रूप घनीभूत विज्ञान है, जिनका मुख चिन्मय प्रकाश है, जो स्वयं आनन्दमय हैं और जो अपने स्वरूप रूप आनन्द के भोगने वाले हैं तथा

३६० ] [नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् जिनसे परे और कोई नहीं है, ऐसे वे प्राज्ञ पुरुष ही भगवान् नृसिंह के तृतीय पाद हैं । उपरोक्त त्रिपाद परमेश्वर सबके स्वामी, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं । सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के स्थान भी वही हैं । जो न स्थूल का ज्ञाता है, न सूक्ष्म का और न इन दोनों का ही ज्ञाता है, जो न प्रज्ञान का घनीभूत है, न दिखाई देता है, जो न व्यवहार में आता, न स्पर्श में, जो किसी आकार वाला भी नहीं है, जो अचिन्त्य और अवर्णनीय है, जिनका स्वरूप आत्मसत्ता की प्रतीति मात्र है । जो प्रपंच-रहित, कल्याणकारी अद्वितीय है, ऐसा पूर्ण ब्रह्म ही भगवान् नृसिंह का चतुर्थ पाद है इस प्रकार ज्ञानीजन मानते हैं । उपरोक्त चार पादों में जिनका वर्णन हुआ है वे भगवान् नृसिंह ही हैं । उन्हें जानना चाहिए ॥२॥ अथ सावित्री गायत्र्या यजुषा प्रोक्ता तया सर्वमिदं व्याप्तं घृणिरिति द्वे अक्षरे सूर्य इति त्रीणि आदित्य इति त्रीणि एतद्वै सावित्रस्याष्टाक्षरं पदं श्रियाभिषिक्तं यं एवं वेद श्रिया हैवाभिषिच्यते तदेयहचाभ्युक्तं ऋचो अक्षरे परमे व्योम- न्यस्मिन्देवा अधिविश्वे निषेदुः । यस्तन्न वेदा किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासस इति न ह वा एतस्यर्चा न यजुषा न साम्नार्थोऽस्ति यः सावित्रं वेदेति । ओंभूलक्ष्मीर्भु वर्लक्ष्मीः स्वर्लक्ष्मीः कालकर्णी तन्नो महालक्ष्मीः प्रचोदयात् इत्येषा वै महालक्ष्मीर्यजुर्गायत्री चतुर्विंशत्यक्षरा भवति । गायत्री वा इदं सर्वं यदिदं किंच तस्माद्य एतां महालक्ष्मीं याजुषीं वेद महतीं श्रियमश्नुते । ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि । तन्नः सिंहः प्रचोदयात् इत्येषा वै नृसिंहगायत्री देवानां वेदानां निदानं भवति य एवं वेद निदानवान्भवति ॥ ३ ॥

नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३६१ अब सावित्री मन्त्र के सम्बन्ध में उपदेश करते हैं—यह सावित्री मन्त्र, गायत्री छन्द से युक्त होकर यजुर्मन्त्र के रूप में प्रकट हुआ है । यह सभी विश्व उससे व्याप्त है । अष्टाक्षरी होने से इसे गायत्री कहा गया है । इसमें 'घृणिः' और 'सूर्य' दो-दो अक्षर हैं तथा 'आदित्यः' तीन अक्षर हैं, आरम्भ में इसे 'श्री' बीज से अलंकृत किया जाता है । इस प्रकार यह सावित्री मन्त्र अष्टाक्षरी कहा गया है । जो ज्ञानी इस मन्त्र का ज्ञाता है, वह लक्ष्मी के द्वारा अलंकृत होता है । ऐसा दृष्टान्त भी है कि 'ऋग्वेद की ऋचायें परम व्योमरूप अविनाशी, प्रकाशमान ब्रह्म में विद्यमान हैं, वहीं सब देवताओं का निवास है। जो साधक उन स्वयं तेजस्वी ब्रह्म को नहीं जानता वह स्वाध्याय से क्या लाभ उठा लेगा ? जो ज्ञानी उस ब्रह्म के ज्ञाता हैं, वे परमधाम में आनन्दोपभोग करते हुए रहते हैं।' इस सावित्रमन्त्र के इस प्रकार जानने वाले को ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मन्त्र से कोई कार्य नहीं रहता । 'जो देवी भू-लोक की लक्ष्मी, भुवर्लोक की लक्ष्मी और स्वर्ग लोक की लक्ष्मी है, जो कालकर्णी नाम वाली है, वह महालक्ष्मी हमें श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरित करे ।' यह यजुर्वेदोक्त महालक्ष्मी की गायत्री चौबीस अक्षरों वाली है। यह सब दृश्यमान विश्व गायत्री रूप ही है । अतः जो इस गायत्री का ज्ञाता है, वह महान् ऐश्वर्य को प्राप्त करता है । 'हम भगवान् नृसिंह की प्राप्ति के निमित्त उपासना करते हैं । वज्ररूप नखों वाले उन परमात्मा का ही हम चिन्तन करते हैं, वे ही नृसिंह भगवान् हमें सत्कर्मों में प्रेरित करें।' यह नृसिंह गायत्री देवताओं और वेदों के भी कारणभूता हैं । इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी भगवान् को प्राप्त होता है ॥३॥ देवा ह वै प्रजापति मब्रुवन्नथ कैर्मन्त्रैः स्तुतो देवः प्रीतो भवति स्वात्मानं दर्शयति तन्नो ब्रूहि भगवन्निति स होवाच

३६२ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् प्रजापतिः । ॐ यो ह वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च ब्रह्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १ ॥ (यथा प्रथममन्त्रोक्तावाद्यन्तौ तथा सर्वमन्त्रेषु द्रष्टव्यौ) ॥ यश्च विष्णुः ॥ २ ॥ यश्च महेश्वरः ॥ ३ ॥ यश्च पुरुषः ॥ ४ ॥ यश्चेश्वरः ॥ ५ ॥ या सरस्वती ॥ ६ या श्रीः ॥ ७ ॥ या गौरी ॥ ८ ॥ या प्रकृतिः ॥ ९ ॥ या विद्या ॥ १० ॥ यश्चोंकारः ॥ ११ ॥ याश्चतस्रोऽर्धमात्राः ॥ १२ ॥ ये वेदाः साङ्गाः सशाखाः सेतिहासाः ॥ १३ ॥ ये च पंचाग्नयः ॥ १४ ॥ याः सप्त महाव्याहृतयः ॥ १५ ॥ ये चाष्टौ लोकपालाः ॥ १६ ॥ ये चाष्टौ वसवः ॥ १७ ॥ ये चैकादश रुद्राः ॥ १८ ॥ ये च द्वादशादित्याः ॥ १९ ॥ ये चाष्टौ ग्रहाः ॥ २० ॥ यानि च पंच महाभूतानि ॥ २१ ॥ यश्च कालः ॥ २२ ॥ यश्च मनुः ॥ २३ ॥ यश्च मृत्युः ॥ २४ ॥ यश्च यमः ॥ २५ ॥ यश्चान्तकः ॥ २६ ॥ यश्च प्राणः ॥ २७ ॥ यश्च सूर्यः ॥ २८ ॥ यश्च सोमः ॥ २९ ॥ यश्च विराट् पुरुषः ॥ ३० ॥ यश्च जीवः ॥ ३१ ॥ यश्च सर्वम् ॥ ३२ ॥ इति द्वात्रिंशत् इति तान्प्रजापतिरब्रवीदेतैर्मन्त्रै- र्नित्यं देवं स्तुवध्वम् । ततो देवः प्रीतो भवति स्वात्मान दर्शयति तस्माद्य एतैर्मन्त्रैर्नित्यं देवं स्तौति स देवं पश्यति सोऽमृतत्वं च गच्छति य एवं वेदेति महोपनिषत् ॥ ४ ॥ देवताओं ने प्रजापति से पुनः प्रश्न किया कि 'भगवान् नृसिंह किन स्तोत्रों से स्तुत होने पर प्रसन्न होते और अपने दर्शन देते हैं?' इस पर प्रजापति ब्रह्माजी बोले—वे ऊपर लिखे १ से ३२ की संख्या वाले मन्त्रराज के बत्तीस मन्त्रों से परम प्रसन्न होते हैं । 'देवताओ ! इन मन्त्रों से नित्य प्रति भगवान् की स्तुति करो । ऐसा करने से भगवान् नृसिंह प्रसन्न होकर अपना साक्षात् दर्शन देते हैं । अतः जो इस प्रकार स्तुति करता है वह उनके विश्वरूप के दर्शन करता है और उसे

नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३६३ अमृतत्व की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जानने वाले को भी उपरोक्त फल प्राप्त होता है। यह महोपनिषद् है। ॥ चतुर्थ उपनिषद् समाप्त ॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नाष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नार- सिंहस्य महाचक्रं नाम चक्रं नो ब्रूहि भगव इति सार्वकामिकं मोक्षद्वारं उद्योगिन उपदिशन्ति स होवाच प्रजापतिः षडक्षरं व एतत्सुदर्शनं महाचक्रं तस्मात्षडरं भवति षट्पत्रं चक्रं भवति षड्वा ऋतव ऋतुभिः सम्मितं भवति मध्ये नाभिर्भवति नाभ्यां वा एते अराः प्रतिष्ठिता मायया एतत्सर्वं वेष्टितं भवति नात्मानं माया स्पृशति तस्मान्मायया बहिर्वेष्टितं भवति । अथाष्टारमष्ट- पत्रं चक्रं भवत्यष्टाक्षरा वै गायत्री गायत्र्या सम्मितं भवति बहिर्मायया वेष्टितं भवति क्षेत्रं क्षेत्रं वै मायैषा सम्पद्यते । अथ द्वादशारं द्वादशपत्रं चक्रं भवति द्वादशाक्षरा वै जगती जगत्या संमितं भवति बहिर्मायया वेष्टितं भवति । अथ षोडशारं षोड- शपत्रं चक्रं भवति षोडशकलो वै पुरुषः पुरुष एवेदं सर्वं पुरुषेण संमितं भवति मायया बहिर्वेष्टितं भवति । अथ द्वात्रिंशदरं द्वात्रिंशत्पत्रं चक्रं भवति द्वात्रिंशदक्षरा वा अनुष्टुब्भवत्यनुष्टुभा सर्वमिदं भवति बहिर्मायया वेष्टितं भवत्यरैर्वा एतत्सुबद्धं भवति वेदा वा एते आराः पत्रैर्वा एतत्सर्वतः परिक्रामति छन्दांसि वै पत्राणि ॥ १ देवताओं ने प्रजापतिजी से श्रद्धापूर्वक कहा—'भगवन् ! आनुष्टुभ मन्त्रराज के महाचक्र नामक चक्र के सम्बन्ध में बताने की कृपा करें। यह चक्र मोक्ष-द्वार और सम्पूर्ण अभीष्टों का पूरक बताया जाता है।' इस पर प्रसिद्ध प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा—'आपका कहना यथार्थ है। इस महाचक्र का नाम सुदर्शन है और यह छै अक्षरों से युक्त है। इसमें छः ऋतुएं हैं, उन ऋतुओं की समता अरों से की जाती

३६४ ] [नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् है। इस चक्र में जो नाभि हैं, उसमें यह अरे जुड़े हुए हैं। सम्पूर्ण चक्र माया रूप नेमि से घिरा हुआ है। माया आत्मा का स्पर्श नहीं कर सकती, इसलिये इस चक्र को माया ने बाहर से ही घेर रखा है। फिर आठ अरों वाला अष्टदल चक्र बनता है और गायत्री के भी आठ पाद होते हैं इसलिए गायत्री के पादों से अरों की समता की जाती है। माया ने इन्हें भी बाहर की ओर ही घेर रखा है। फिर द्वादश अरों वाला चक्र बनता है, द्वादश अक्षरों वाले जगती छन्द से इस द्वादश दल चक्र की समता की जाती है। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही घिरा है। फिर सोलह दल वाला षोडशार बनता है यह सोलह कलाओं से युक्त है, भगवान् नृसिंह भी सोलह कला वाले हैं, इसलिये इसे साक्षात् भगवान् ही समझें। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही आवेष्टित है। फिर बत्तीस अरों से युक्त चक्र बनता है, अनुष्टुप् में भी बत्तीस अक्षर होते हैं। अनुष्टुप् के अक्षरों से चक्र के अरों की समता करे। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही आवेष्टित है। वेद ही इस चक्र के अरे हैं, छन्द इसके पत्ते हैं। उन पत्तों से ही यह सब ओर घूमता है ॥१॥ एतत्तत्सुदर्शनं महाचक्रं तस्य मध्ये नाभ्यां तारकं यदक्षरं नरसिंहमेकाक्षरं तद्भवति षट्सु पत्रेषु षडक्षरं सुदर्शनं भवत्य- ष्टसु पत्रेष्वष्टाक्षरं नारायणं भवति द्वादशसु पत्रेषु द्वादशाक्षरं वासुदेवं भवति षोडशसु पत्रेषु मातृकाद्याः सबिन्दुकाः षोडश स्वरा भवन्ति द्वात्रिंशत्सु पत्रेषु द्वात्रिंशदक्षर मन्त्रराजं नारसिंह मानुष्टुभं भवति तद्वा एतत्सुदर्शन नाम चक्रं सार्वकामिकं मोक्षद्वारमृङ् मयं यजुर्मयं साममयं ब्रह्ममयममृतमयं भवति तस्य पुरस्ताद्वसव आसते रुद्रा दक्षिणत आदित्याः पश्चाद्विश्वे देवा उत्तरतो ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा नाभ्यां सूर्याचन्द्रमसौ पार्श्वयोस्त- देतदृचाभ्युक्तम्। ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधिविश्वे

नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३६५ निषेदुः । यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासत इति तदेतत्सुदर्शनं महाचक्रं बालो वा युवा वा वेद स महान्भवति स गुरुः सर्वेषां मन्त्राणामुपदेष्टा भवत्यनुष्टुभा होमं कुर्यादनुष्टुभार्चनं कुर्यात्तदेतद्रक्षोघ्न मृत्यतारकं गुरुणा लब्धं कण्ठे बाहौ शिखायां वा बध्नीत सप्तद्वीपवती भूमिर्दक्षिणार्थं नावकल्पते तस्माच्छ्रद्धया यां कांचिद्गां दद्यात्सा दक्षिणा भवति ॥२ यह बत्तीस दल वाला चक्र ही सुदर्शन नामक महाचक्र है । इसके बीच में जो नाभि है, उनमें ही भगवान् नृसिंह से सम्बन्धित तारक मन्त्र का न्यास करना चाहिए । वह तारक मन्त्र केवल एक अक्षर का है । छः पत्रों में षडाक्षरी सुदर्शन मन्त्र का न्यास होता है । आठ दलों में अष्टाक्षरी नारायण मन्त्र का और बारह दलों में द्वादशाक्षरी वासुदेव मन्त्र का न्यास होता है । सोलह दलों में षोडश अक्षर होते हैं । बत्तीस दलों में मन्त्रराज अनुष्टुभ का न्यास किया जाता है । यह सुदर्शन नामक महाचक्र सुविख्यात है । यह सभी अभीष्टों का पूरक, मुक्ति का द्वार और ऋक्, यजु, साम का साक्षात् रूप तथा अमृतयुक्त है । इनके पूर्व में अष्टावसु, पश्चिम में द्वादश आदित्य, उत्तर में विश्वेदेवा और दक्षिण में एकादश रुद्र रहते हैं । नाभि में ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा इधर- उधर सूर्य और चन्द्रमा रहते हैं । ऋचा में भी कहा है कि 'भगवान् नृसिंह परम व्योम रूप एवं अविनाशी हैं, उन्हीं में सम्पूर्ण वेद विद्यमान हैं । उन्हीं में सब देवता प्रतिष्ठित हैं । जो उन परमेश्वर भगवान् नृसिंह को नहीं जानता, उसे ऋग्वेद पढ़ने से कोई लाभ नहीं । जो पुरुष भगवान् नृसिंह और उनके महाचक्र का ज्ञाता है, वह परब्रह्म में स्थित होता है । इस महाचक्र को यदि कोई बालक अथवा युवा भी जान लेता है, वह महान् हो जाता

३६६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् है और सब का गुरु होता है। मन्त्रराज अनुष्टुप् से ही पूजन और हवन करे। यह महाचक्र राक्षसों के डर से बचाने वाला है, यही मृत्यु से पार लगाने वाला है। गुरु से इसे यन्त्र रूप में लेकर कण्ठ, शिखा या भुजा में बांधे। जो गुरु इस मन्त्र का उपदेश दे, उसे दक्षिणा में समूची पृथिवी भी दे दी जाय तो वह न्यून है। श्रद्धा के अनुसार जितना हो सके भू-भाग दान करे, वही सर्वश्रेष्ठ दक्षिणा है ॥२॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नानुष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नार- सिंहस्य फलं नो ब्रूहि भगव इति स होवाच प्रजापतिर्थ एतं मन्त्रराज नारसिंहमानुष्टुभं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति स वायुपूतो भवति स आदित्यपूतो भवति स सोमपूतो भवति स सत्यपूतो भवति स ब्रह्मपूतो भवति स विष्णुपूतो भवति स रुद्र- पूतो भवति स देवपूतो भवति स सर्वपूतो भवति स सर्वपूतो भवति ॥ ३ देवताओं ने प्रजापति से पुनः पूछा—भगवन् ! आनुष्टुभ मन्त्रराज का फल हमें कृपापूर्वक बताइये।' प्रजापति बोले— 'इस मन्त्रराज का दैनिक जप करने वाला पुरुष अग्नि में तपा कर शुद्ध किये सुवर्ण के समान हो जाता है। वह वायु, सूर्य और चन्द्रमा द्वारा शुद्ध कर दिया जाता है। वह सत्य तथा लोक के द्वारा और ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा वेद के द्वारा शुद्ध हो जाता है ॥३॥ ॥ नृसिंहपूर्वंतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥

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नृसिंहषट्चक्रोपनिषत्

ॐ देवा हः वै सत्यं लोकमायंतं प्रजापतिमपृच्छन्नार- सिंहचक्रन्नो ब्रूहीति । तान्प्रजापमिनार्रसिंहचक्रमवोचत् । षड् वै नार्सिंहानि चक्राणि भवन्ति । यत् प्रथमं तच्चतुररं यद्वितीयं तच्चतुररं यत्तृतीयं तदष्टारं यच्चतुर्थं तत्पञ्चारं यत्पञ्चमं तत्पञ्चारं यत् षष्ठं तदष्टारं तदेताति षडेव नार्सिहानि चक्राणि भवन्ति ॥ अथ कानि नामानि भवन्ति । यत् प्रथमं तदाचक्रं यद्- द्वितीयं तत्सुचक्रं यत्तृतीयं तन्महाचक्रं यच्चतुर्थं यत्सकललोक- रक्षणचक्रं यत्पञ्चमं तद्द्यूतचक्रं यद्वै षष्ठं तदसुरान्तकचक्रं तदेतानि षडेव नारसिंहचक्रनामानि भवन्ति ॥ अथ कानि त्रीणि वलयानि भवन्ति । यत्प्रथमं तदान्तर- वलयं भवति । यद्द्वितीयं तन्मध्यमवलयं भवति । यत् तृतीयं तद्बाह्यं वलयं भवति । तदेतानि त्रीण्येव वलयानि भवन्ति । यदा तद्धैतद्बीजं यन्मध्यमं तां नारसिंहगायत्रीं यद्बाह्यं तन्मन्त्रः ॥ अथ किमान्तरं वलयम् । षड्वान्तराणि वलयानि भवन्ति । यन्नारसिंह तत्प्रथमस्य यन्माहालक्ष्म्यं तद्द्वितीयस्य यत्सारस्वतं तत्तृतीयस्य यस्य यत्कामं देवं तच्चतुर्थस्य यत् प्रणवं तत्पञ्चमस्य तत्क्रोधदैवतं तत् षष्ठस्य । तदेतानि षष्णां नारसिंहचक्राणां षडा- न्तराणि वलयानि भवन्ति ॥ ॐ देवताओं ने सत्य स्वरूप व्यापक लोकपिता प्रजापति से कहा हमें नारसिंह चक्र का उपदेश करो । तब उन्हें प्रजापति ने नारसिंह चक्र का उपदेश दिया, जो इस प्रकार है कि नारसिंह चक्र छः हैं । पहला चक्र चार 'अर' वाला ( तांगे आदि के पहियों में जो गोलाकार रूप से Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

[३६८ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ नृसिंहषट्चक्रोपनिषत्

कई बारीक-बारीक डण्डे जुड़े रहते हैं उसे अर कहते हैं ) दूसरा भी चार ही अर वाला, तीसरा आठ, चौथा पांच, पांचवां भी पांच अर वाला छठा आठ अर वाला है। सो इस प्रकार छः ही नारसिंह चक्र होते हैं। यह पूछे जाने पर कि उनके नाम क्या हैं ? प्रजापति ने उत्तर दिया—पहला आचक्र, दूसरा सुचक्र, तीसरा महाचक्र, चौथा सकल लोक रक्षण, पांचवां द्यूतचक्र एवं छठा असुरान्तचक्र के नाम प्रसिद्ध है । तो ये छः नारसिंह चक्रों के नाम हैं । ये पूछने पर कि उसके तीन वलय ( वेष्टन ) कौन-कौन हैं ? प्रजापति ने उत्तर दिया पहला आन्तर, दूसरा मध्यम, तीसरा बाह्य । ये तीन ही वलय हैं। इनमें जो मध्यम बीज है वह नारसिंह गायत्री एवं जो बाह्य है वह मन्त्र है। आन्तर वलय कितने हैं ? यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा— आन्तर वलयों की संख्या छः है । नारसिंहम् पहले का, महालक्ष्म्यं का, सारस्वत तीसरे का, जिसका जो नष्ट देव हो वह चौथे का, प्रणव ( ओंकार ) पांचवे का, क्रोध दैवत छठे का नाम है। सो ये छः नारसिंह चक्रों के छः आन्तर वलय हुआ करते हैं । अथ किं मध्यमं वलयम् । षड्वै मध्यमानि वलयानि भवन्ति । यन्नारं॑सिहाय तत्प्रथमस्य यद्विद्महे तद्द्वितीयस्य यद्व- ञ्रनखाय तत्तृतीयस्य यद्धीमहि तच्चतुर्थस्य यत्तन्नस्तत्पंचमस्य यत्सिंहः प्रचोदयादिति तत् षष्ठस्य । तदेतानि षण्णां नारसिंह चक्राणां षण्मध्यमानि वलयानि भवन्ति ॥ अथ किं बाह्यं वलयम् । षड्वै बाह्यानि वलयानि भवन्ति । यदाचक्रं यादात्मा तत्प्रथमस्य यत्सुचक्रं यत्प्रियात्मा तद्द्वितीयस्य यन्महाचक्रं यज्ज्योतिरात्मा तत्तृतीयस्य यत्सकल- लोकरक्षणचक्रं यन्मायात्मा तच्चतुर्थस्य यदाचक्रं यद्योगात्मा तत्पञ्चमस्य यदसुरान्तकचक्रं यत्सत्यात्मा तत् षष्ठस्य । तदेतानि षण्णां नारसिंहचक्राणां षट बाह्यानि वलयानि भवन्ति ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

मध्यम वलयों की कितनी संख्या है ? यह जब पूछा तो प्रजा- पति ने उत्तर दिया-मध्यम वलयों की संख्या भी छः ही है । 'नारसिंहाय' प्रथम का 'विद्महे' दूसरे का 'वज्रनखाय' तीसरे का 'धीमहि' चौथे का 'तन्नः' पांचवे का 'सिंहः प्रचोदयात्' छठे का नाम है । सो ये छः नारसिंह चक्रों के छः वलय होते हैं । बाह्य वलय कितने तथा क्या हैं ! इसका उत्तर दिया कि वाह्य वलय भी छः ही होते हैं। जो आचक्र तथा आत्मा है वह पहले का, जो सुचक्र तथा प्रियात्मा है वह दूसरे का, जो महाचक्र तथा ज्योतिरात्मा वह तीसरे का, जो सकल लोक रक्षण चक्र तथा मायात्मा है वह चौथे का, जो आचक्र तथा योगात्मा है वह पांचवें का, जो असुराम्त चक्र तथा सत्यात्मा है वह छठे का नाम है । सो ये छः नारसिंह चक्रों के छः बाह्य वलय हैं । क्व तानि न्यस्यानि । यत्प्रथमं तद्धृदये यद्द्वितीयं तच्छि- रसि यत्तृतीयं तच्छिखायां यच्चतुर्थं तत्सर्वेष्वङ्गेषु यत्पंचमं तत्सर्वेषु [!] यत् षष्ठं तत्सर्वेषु देशेषु । य एतानि नारसिंहानि चक्राण्येतेष्वङ्गेषु बिभृयात् तस्यानुष्टुप् सिध्यति । तं भगवान् नृसिंहः प्रसीदति । तस्य कैवल्यं सिध्यति । तस्य सर्वे लोकाः सिध्यन्ति । तस्य सर्वे जनाः सिध्यन्ति । तस्मादेतानि षण्णां नारसिंहचक्राण्यङ्गेषु न्यस्यानि भवन्ति । पवित्रं एतत्तस्य न्यसनम् । न्यसनान्नृसिंहानन्दो भवति । कर्मण्यो भवति । ब्रह्मण्यो भवति । अन्यसानान्न नृसिंहानन्दी भवति । न कर्मण्यो भवति । तस्मादेतत्पवित्रं तस्य न्यसनम् ॥ यो वा एतं नरसिंहं चक्रमधीते स सर्वेषु वेदेष्वधीतो भवति । स सर्वेषु यज्ञेषु याजको भवति । स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति । स सर्वेषु मन्त्रेषु सिद्धो भवति । स सर्वत्र शुद्धो भवति । स सर्वरक्षो भवति । भूतपिशाचशाकिनीप्रेतवन्ताक- नाशको भवति । तदेतन्नाश्रद्दधानाय प्रब्रूयात्तदेतन्नाश्रद्दधाय प्रब्रूयादिति ॥

४०० ] [ नृसिंहषट्चक्रोपनिषत् ये कहाँ रखने चाहिये इनका न्यास कहाँ करना चाहिये ? यह पूछने पर उत्तर दिया कि—जो पहला है वह हृदय में, जो दूसरा है वह शिर में, जो तीसरा है वह शिखा में, जो चौथा है वह सभी अङ्गों में, जो पाँचवाँ वह सभी (१) जो छठा वह सभी देशों में धारण करने चाहिये । जो इन नारसिंह चक्रों को इन-इन अङ्गों में धारण करता है, उसे अनुष्टुप सिद्धि हो जाती है । उसके ऊपर भगवान् नृसिंह प्रसन्न होते हैं । उसे मोक्ष प्राप्त होती है । उसे सभी लोक सिद्ध होते हैं ( प्राप्त होते हैं ) सभी लोग उसे सिद्ध होते हैं ( उसके वश में हो जाते हैं ।) सो ये छः नारसिंह चक्रों के अङ्गों में न्यास के स्थान हैं। इनका न्यास अत्यन्त पवित्र है इनके न्यास से मनुष्य नृसिंह को आनन्द देने वाला, कर्मण्य, ब्रह्मज्ञाता हो जाता है । इसके विना न्यास के नृसिंह आनन्दित नहीं होते और मनुष्य कर्मण्य ही हो सकता है, सो यह अत्यन्त पवित्र हैं इनका न्यास ही अत्यन्त पवित्र है । जो इस नारसिंह चक्र का अध्ययन करता है वह सभी वेदों का अध्ययनकर्ता समझा जाता है। वह सभी यज्ञों का कर्त्ता समझा जाता है अर्थात् वह सभी यज्ञ कर चुका यह माना जाता है । उसने सभी तीर्थों में स्नान भी कर लिया । उसे सभी मन्त्रों की सिद्धियाँ भी प्राप्त हो जाती हैं । वह सभी जगह शुद्ध हो जाता है । वह सबकी रक्षा करने वाला होता है। भूत, पिशाच, शाकिन, प्रेत तथा वंताक आदि भया वह योनियों का नाश करने वाला भी वह होता है ( उसके पास ये सब फटक नहीं सकते ।) वह निर्भय हो जाता है। इस नारसिंह चक्र का उपदेश श्रद्धाहीन को किसी भी अवस्था में नहीं करना चाहिए । ॥ नृसिंहषट्चक्रोपनिषत् समाप्त ॥ —:०:— Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri दक्षिणामूर्त्युपनिषत ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों एक साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्मावर्ते महाभाण्डीरवटमूले महासत्राय समेता महर्षयः शौनकादयस्त ह समित्पाणयस्तत्त्वजिज्ञासवो मार्कण्डेयं चिरञ्जीवि- नमुपसमेत्य पप्रच्छुः केन त्वं चिरं जीवसि केन वाऽऽनन्दमनु- भवसीति ॥ १ ॥ परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानेनेति स होवाच ॥ २ ॥ किं तत् परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानम् । तत्र को देवः । के मन्त्राः । का निष्ठा । किं तज्ज्ञानसाधनम् । कः परिकरः । को बलिः कः कालः । किं तत्स्थानमिति ॥ ३ ॥ स होवाच । येन दक्षिणामुखः शिवोऽपरोक्षीकृतो भवति तत् परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानम् ॥ ४ ॥ यः सर्वोपरमे काले सर्वान्त्मन्युपसंहृत्य स्वात्मानन्दसुखे मोदते प्रकाशते वा स देवः ॥ ५ ॥ ब्रह्मावर्त में महाभाण्डीर नामक बरगद के नीचे बड़े भारी दीर्घ- कालीन यज्ञ करने के लिये शौनकादि महाऋषि एकत्रित हुए तथा तत्त्व-ज्ञान की जिज्ञासा से हाथों में समिधायें लेकर (कुशहस्त होकर) चिरञ्जीवी मार्कण्डेय के पास आकर पूछा—महाराज ! आप कैसे Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

४०२ ]CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri[ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् चिरकाल से जीवित रह रहे हो ? तथा कैसे आप अपार आनन्द का अनुभव करते रहते हो ? । २ । तब उन्होंने उत्तर दिया कि परम गुप्त जो शिव-तत्व का ज्ञान है वही मेरे चिरजीवी होने में कारण है। २ । तब शौनकादि, ऋषि बोले—वह परम गुप्त शिवतत्व ज्ञान क्या वस्तु है ? उसका आराध्य कौन देवता है ? मन्त्र कौन से हैं ? आस्था क्या है ? उस ज्ञान के साधन कौन से हैं ? (क्या सामग्री चाहिये) क्या बलि उसमें अपेक्षित है ? क्या काल है ? उसकी प्राप्ति का स्थान कौन-सा है ? । ३ । मार्कण्डेय बोले—जिससे दक्षिणा मुख नामक शिव दृष्टिगोचर होते हैं वही परम गुप्त शिवतत्व ज्ञान है । ४ । जो सकल विश्व के समाप्ति के समय सारे चराचर को अपने अन्दर लीन करके अपने आप आत्मानन्द के सुख में प्रसन्न रहते हैं (अर्थात् आत्माराम हो जाते हैं ) तथा स्वयं प्रकाशित होते हैं वही इस तत्वज्ञान के देव हैं । ५ । अत्रैते मन्त्र रहस्यश्लोका भवन्ति अस्य श्रीमेधादक्षिणा- मूर्तिमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । देवता दक्षिणाऽऽस्यः । मन्त्रेणाङ्गन्यासः ॥ ६ ॥ ॐ आदौ नम उच्चार्य ततो भगवते पदम् । दक्षिणेति पदं पश्चान्मूर्तये पदमुद्धरेत् ॥७ अस्मच्छब्दं चतुर्थ्यन्तं मेधां प्रज्ञां पदं वदेत् । समुच्चार्य ततो वायुबीजं च्छं च ततः पठेत् ॥ अग्निजायां ततस्त्वेष चतुर्विंशाक्षरो मनुः ॥७ ध्यानम् स्फटिकरजतवर्णं मौक्तिकीमक्षमाला- ममृतकलशविद्यां ज्ञानमुद्रां कराग्रे । दधतमुरगकक्षं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं विधृतविविधभूषं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥८ मन्त्रेण न्यासः— आदौ वेदादिमुच्चार्य स्वराद्यं सविसर्गकम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

पञ्चार्णं तत उद्धृत्य अतरं सविसर्गकम् । अन्ते समुद्धरेत्तारं मनुरेष नवाक्षरः ॥६॥ मुद्रां भद्रार्थदात्रीं सपरशुहरिणं बाहुभिर्वाहुमेकं जान्वासक्तं दधानो भुजग विलसमाबद्धकक्ष्यो वटाधः । आसीनश्चन्द्रखण्डप्रतिघटिजटाक्षीरगौरस्त्रिनेत्रो दद्यादाद्यः शुकाद्यैर्मुनिभिरभिवृतो भावशुद्धिं भवो नः ॥१० इस विषय में मन्त्रों के रहस्य को प्रकट करने वाले श्लोक इस प्रकार हैं—इस मेधादक्षिणामूर्ति मन्त्र का ऋषि ब्रह्मा है, छन्द गायत्री है, तथा देवता दक्षिणामुख है। ६। ( मन्त्र के द्वारा अङ्गन्यास ) ( नीचे दिये गये श्लोकों से मन्त्र निकलता है । ) प्रारम्भ में 'ॐ नमः' उच्चारण करके तब 'भगवते' इस पद को पुनः 'दक्षिणा' यह शब्द फिर 'मूर्तये' यह पद तत्पश्चात अस्मद् शब्द का चतुर्थी का एक वचन अर्थात् 'मह्यं' पद एवं 'मेधां प्रज्ञां' इन पदों का उच्चारण करना चाहिये । 'प्र' उच्चारण कर तब वायु का बीज मन्त्र 'य' और उसके बाद 'च्छ' शब्द को पढ़े उसके बाद अग्निदेव की स्त्री अर्थात् 'स्वाहा' बोले—यही चौबीस अक्षर वाल मनु मन्त्र है । भावार्थ यह हुआ कि 'ॐ नमो भगवते दक्षिण मूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा' यह मन्त्र पढ़ना चाहिए । ७। (ध्यान) मैं ऐसी दक्षिणामूर्ति की स्तुति करता हूँ जो कि स्फटिक मणि तथा चाँदी के समान गोरे वर्ण वाली है तथा जिसके हाथ में ज्ञान की मुद्रा स्वरूप तथा अमृततत्वदात्री विद्या स्वरूपिणी मोतियों की माला है । एवं जिसके शरीर पर साँप घूम रहे हैं और जिसके सिर पर चन्द्रमा है तथा जिसकी तीन आँखें हैं तथा जो अनेकों वेषों की धारणा किये हुए है । ८ । मन्त्र द्वारा न्यास — प्रारम्भ में विसर्ग सहित स्वरों के आदि अक्षरों को एवं वेद के आदि अक्षर को अर्थात् 'ॐ' (अः उ म्) (ओ अः स्.) को पुनः पंचार्ण

४०४ ] [ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् अर्थात् 'दक्षिणामूर्तिः' शब्द को तत्पश्चात् विसर्ग सहित अतर शब्द को अर्थात् 'अतरः' को और अन्त में तार अर्थात् 'ॐ' का उच्चारण करे। यह नवाक्षर मनु-मन्त्र कहलाता है। ९। (ध्यान) ऐसे आद्य भगवान् शंकर हमें भावबुद्धि प्रदान करें जो कि शुकदेव आदि मुनियों से घिरे रहते हैं तथा जिनका एक हाथ कल्याणमय अभयदान की मुद्रा में है तथा अन्य दो हाथों में जिन्होंने फरसा तथा (हिरण) हरिण धारण कर रखा है। एवं जिनका एक हाथ जांघ पर रखा है तथा जो बरगद के नीचे बैठे हैं जिनके शरीर पर बड़े-बड़े साँप घूम रहे हैं। साथ ही दूज के चांद से जिनकी जटा सुशोभित है एवं जो कि दूध के समान गोरे रङ्ग के हैं तथा जिनकी तीन आँखें हैं। १०। मन्त्रेण न्यासः— तारं ब्लूं नम उच्चार्य मायां वाग्भवमेव च । दक्षिणापदमुच्चार्य यतः स्यान्मूर्तये पदम् ॥११ ज्ञानं देहि पदं पश्चाद्वह्न्रिजायां ततो न्यसेत् । मनुरष्टादशार्णोऽयं सर्वमन्त्रेषु गोपितः ॥१२ भस्मव्यापाण्डुराङ्गः शशिशकलधरो ज्ञानमुद्राक्षमाला- वीणापुस्तैर्विराजत्कमलधरो योगपट्टाभिरामः । व्याख्यापीठे निषण्णो मुनिवरनिकरैः सेव्यमानः प्रसन्नः सव्यालः कृत्तिवासाः सततमवतु नो दक्षिणामूर्तिरीशः ॥१३ मन्त्रेण न्यासः — तारं परां रमाबीजं वदेत् साम्बशिवाय च । तुभ्यं चानलजायां तु मनुर्द्वादशवर्णकः ॥१४ वीणां करैः पुस्तकमक्षमालां बिभ्राणमभ्रा भगलं वराढ्यम् । फणीन्द्रकक्ष्यं मुनिभिः शुकाद्यैः सेव्यं वटाधः कृत- नीडमीडे ॥ १५ ॥