१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
दक्षिणामूर्त्युपनिषत् ] [ ४०५ प्रथम तारं अर्थात् 'ॐ' 'ब्लू' नमः' उच्चारण करके माया अर्थात् ह्रीं वाग्भव अर्थात् ऐं तथा दक्षिणा पद को कहकर पुनः 'मूर्तये' तथा 'ज्ञानंदेहि' और अन्त में 'अग्नि की स्त्री' अर्थात् 'स्वाहा' शब्द का उच्चारण करें अर्थात् 'ॐ' ब्लू नमो ह्रीं ऐं दक्षिणा मूर्तये ज्ञानं देहि स्वाहा' इस अठारह अक्षर वाले मनु मन्त्र का उच्चारण करे । यह सब मन्त्रों में अत्यन्त गोपनीय है । ११-१२ । (ध्यान) भस्म से जिनका सारा शरीर सफेद हो रहा है तथा जो कि चन्द्रमा के टुकड़े को धारण किये हैं एवं जो करकमल में ज्ञानमुद्रा (अभयदान की मुद्रा) रुद्राक्ष माला, वीणा एवं पुस्तक को धारण किये हैं तथा जो कि योगियों के पास रहने वाले पट्ट से (लकड़ी का बना हुआ भुजाटेकने का) सुशोभित हैं। एवं जो कि व्यास पीठ पर विराजमान हैं तथा श्रेष्ठ श्रेष्ठ मुनिजन जिनकी सेवा सुश्रूषा में लगे हैं और जो प्रसन्न मुख सर्पों से शोभित तथा व्याघ्र चर्म को धारण किये हैं ऐसे दक्षिणामूर्ति भगवान हमारी निरन्तर रक्षा करें । १३ । (मन्त्र द्वारा न्यास) प्रथम ओं, ह्रीं, श्रीं, कहे पुनः 'साम्ब शिवाय' पुनः 'तुभ्यं' अन्त में स्वाहा—यह बारह अक्षर वाला मनुमन्त्र है । १४ । ध्यानः— जिन्होंने हाथों में वीणा, पुस्तक तथा रुद्राक्ष माला धारण कर रखी है एवं (एक हाथ अभदान की मुद्रा में हमेशा ही रहता है) तथा जिसके गले की शोभा काले घने बादल के समान है । और जो श्रेष्ठों में भी श्रेष्ठ हैं सर्प जिनके शरीर पर लपलपा रहे हैं एवं जो शुकदेव आदि मुनियों द्वारा सेवित किये जा रहे हैं और जो कि बरगद के नीचे ( वास किये ) विराजमान हैं ऐसे भगवान की मैं स्तुति करता हूँ । १५ । विष्णु ऋषिरनुष्टुप् छन्दः । देवता दक्षिणाऽऽस्यः । मन्त्रेणन्यासः । तारं नमो भगवते तुभ्यं वटपदं ततः । मूलेति पदमुच्चार्य वासिने पद मुद्धरेत् ॥१६ वागीशाय पदं पश्चान्महाज्ञानपदं ततः ।
४०६ ] [ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् दायिने पदमुच्चार्य मायिने नम उद्धरेत् ॥१७ आनुष्टुभो मन्त्र राजः सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमः ॥१८ मुद्रापुस्तकवह्निनागविलसद्बाहुं प्रसन्नननं मुक्ताहारविभूषणं शशिकलाभास्वत्किरीटोज्ज्वलम् । अज्ञानापहमादिमादिमगिरामर्थं भवानीपतिं न्यग्रोधान्तनिवासिनं परगुरुं ध्यायाम्यभीष्टाप्तये ॥१९ प्रथम 'ओं नमो भगवते तुभ्यं' पुन 'वट' शब्द तब 'मूल' शब्द फिर 'वासिने' शब्द कहकर 'वागीशाय' पुनः 'महाज्ञान' एवं 'दयिने' और 'मायिने' का उच्चारण कर अन्त में नमः शब्द का उच्चारण करे । अर्थात् 'ओं नमो भागवते तुभ्यं' वट मूल वासिने वागीशाय महाज्ञानदायिने मायिने नमः' । यह आनुष्टुभ मंत्रराज है जो कि सभी श्रेष्ठ मन्त्रों में उत्तम है। १६-१७-१८ । ( ध्यान )—अभय ज्ञान मुद्रा, पुस्तक तथा भयानक सर्पों से जिनके हाथ सुशोभित हैं और जो कि प्रसन्नमुख हैं। मोतियों के हार जिनकी शोभा बढ़ा रहे हैं और चन्द्रमा की कला से चमकने वाले मुकुट से जो अधिक शोभायमान लग रहे हैं। साथ ही जो अज्ञान को नाश करने वाले हैं और जो कि आदि पुरुष हैं और वाणी के जो विषय नहीं हैं (यत्र वाचो निवर्तंको) ऐसे पार्वती के पति जो कि सबके गुरु हैं और बरगद के पेड़ के नीचे रहने वाले हैं, उनका मैं अपनी इच्छित वस्तु की प्राप्ति के लिये ध्यान करता हूँ ॥१९॥ सोऽहमिति यावदास्थितिः सा निष्ठा भवतिः ॥२० तदभेदेन मन्त्राम्रेडनं ज्ञानसाधनम् ॥२१ चित्ते तदेकतानता परिकरः ॥२२ अङ्गचेष्टार्पणं बलिः ॥२३ त्रीणि धामानि कालः ॥२४ द्वादशान्तपदं स्थानमिति ॥२५
दक्षिणामूर्त्युपनिषत् [ ४०७ शरीर के नष्ट होने तक 'सोऽहं' मैं वही परब्रह्म हूँ, यही ब्रह्म- निष्ठा है ।२०। उस परब्रह्म से अभिन्न मानकर पूर्व कहे गये मनुमन्त्रों का बार-बार निरन्तर उच्चारण ही ज्ञान का साधन है । २१ । चित्त से उस परमतत्त्व में एकता लगाकर ध्यान करना ही परिकर 'उपकरण' सामग्री है। २२। अंगों की चेष्टाओं का अर्पण ही बलि है अर्थात् हाथ पाँव आदि चलाना ( भगवत्कार्य में ) ही उसकी पूजा है । २३। स्वअविद्यापद, स्थूल तथा सूक्ष्म बीजरूप तीन धाम ही काल है । २४। द्वादशांत पद अर्थात् हृदय किंवा सहस्रार (सहस्रदलकमल) ही परमात्मा की प्राप्ति का स्थान होने के कारण स्थान है। २५ । ते ह पुनः श्रद्दधानास्तं प्रत्यूचुः—कथं वाऽस्योदयः । किं स्वरूपम् । को वाऽस्योपासक इति ॥ २६ ॥ स होवाच- वैराग्यतैलसंपूर्णे भक्तिवर्तिसमन्विते । प्रबोधपूर्णपात्रे तु ज्ञप्तिदीपं विलोकयेत् ॥२७ मोहान्धकारे निः सारे उदेति स्वयमेव हि । वैराग्यमरणं कृत्वा ज्ञानं कृत्वा तु चित्रगुम् ॥२८ गाढतामिस्रसंशून्यै गूढमर्थं निवेदयेत् । मोहभानुजसंक्रान्तं विवेकाख्यं मृकण्डुजम् ॥२९ तत्त्वाविचारपाशेन बद्धं द्रुतभयातुरम् । उज्जीवयन्निजानन्दे स्वस्वरूपेण संस्थित ॥३० शेमुषी दक्षिणा प्रोक्ता सा यस्याभीक्षणे मुखम् । दक्षिणाभिमुखः प्रोक्तः शिवोऽसौ ब्रह्मवादिभिः ॥३१ सर्गादिकाले भगवान् विरञ्चिरुपास्यैनं सर्गसामर्थ्यमाप्य । तुतोष चित्ते वाञ्छितार्थांश्च लब्ध्वा सोऽस्योपासको भवति धाता ।३२।
४०८ ] [ दक्षिणामृत्यु षपनित् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri य इमां परमरहस्यशिवतत्त्वविद्यामधीते स सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति । य एवं वेद स कैवल्यमनुभवतीत्यु- पनिषत् ॥ ३३ ॥ श्रद्धा से युक्त उन ऋषियों ने पुनः मार्कण्डेय से पूछा—इसका उदय कैसे होता है ? क्या इसका स्वरूप है ? और कौन इसका उपासक है ? । २६ (वह बोले) वैराग्यरूपी तेल से लबालब भरे हुये भक्ति रूपी बत्ती से युक्त प्रबोध के ( ज्ञान के ) पूर्व मात्र में ( बर्तन में ) ज्ञप्ति रूपी (अपने अन्दर तथा चराचर में व्याप्त ईश्वर को अपनी आत्मा मानना ) दीप का दर्शन होता है। २७। अर्थात् वैराग्य भक्ति तथा ज्ञान से ही ईश्वर दर्शन होता है ) सारहीन अपनी अज्ञता से कल्पित महान् अज्ञान रूपी अंधकार में वह दीप स्वयं ही उदित होता है। वैराग्य को अरणी बनाकर तथा अपने ज्ञान को ही मथने का डण्डा बनाकर गहन अज्ञान रूपी घने अन्धकार की समाप्ति के लिये गुप्त अर्थ को (परम तत्व को) जानना चाहिये । (अर्थात् निरन्तर वैराग्य तथा ज्ञान के परि- शीलन से ही उस परम तत्व का दर्शन सम्भव है ) तथा परमतत्त्व का विचार न करना रूपी जो पाश उससे बँधे हुए, द्वैतवाद के भय से व्याकुल एवं मोहरूपी शनि या मृत्यु के मुख में पड़े हुये विवेकरूपी मृकंडु के पुत्र (मार्कण्डेय) को ( अपने अज्ञान से ) पुनः उज्जजीवित करते हुए आत्माराम रूपी परमानन्द में अपने स्वरूप से स्थित हो जाता है । । २८--२६--३० । तथा तत्वज्ञानरूपिणी ब्रह्म प्रकाशिक बुद्धि ही जिसमें दक्षिणा है और वही जिस परमतत्व के अभीक्षण में अर्थात् साक्षात्कार में मुख अर्थात् द्वार है वह ब्रह्मवादियों द्वारा दक्षिणामुख नामक शिव Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
दक्षिणामूर्त्युपनिषत् [ ४०९ कहे गये हैं । ३१ । सृष्टि ( संसार ) की रचना के प्रारम्भ में भगवान् ब्रह्मा, इनकी उपासना करके सृष्टि निर्माण की शक्ति को पाकर तथा अपने मनोरथ का लाभ करके हृदय में प्रसन्न हुये अतः वही इनके उपासक हैं । ३२ । जो इस अत्यन्त गुप्त शिवतत्व विद्या को पढ़ता है वह सभी पापों से मुक्त होता है, और जो इसको भली भांति जानता है, इसका मनन करता है गुह कैवल्यपद का ( मोक्ष का ) अनुभव करता है । ३३ । ॥ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् समाप्त ॥
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शरभोपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वति नो बृहस्पतिर्दधातु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिए जो आयुष्य नियत कर दिया है, उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ अथ हैनं पैप्पलादो ब्रह्माणमुवाच भो भगवन्ब्रह्मविष्णु- रुद्राणां मध्ये को वा अधिकतरो ध्येयः स्यात्तत्त्वमेव नो ब्रूहीति । तस्मै स होवाच पितामहश्च हे पैप्पलाद शृणु वाक्यमेतत् । बहूनि पुण्यानि कृतानि येन तेनैव लभ्यः परमेश्वरोऽसौ । यस्याङ्गजोऽहं हरिरिन्द्रमुख्याः मोहान्न जानन्ति सुरेन्द्रमुख्याः ॥१॥ प्रभुं वरेण्यं पितरं महेशं यो ब्रह्माणं विदधाति तस्मै । वेदांश्च सर्वान्प्रहिणोति चाग्र्यं तं वै प्रभुं पितरं देवतानाम् ॥२॥ ममापि विष्णोर्जनकं देवमीड्यं योऽन्तकाले सर्वलोकान्संजहार ॥ ३ ॥ स एकः श्रेष्ठश्च सर्वशास्ता स एव वरिष्ठश्च । यो घोरं वेषमास्थाय शरभाख्यं महेश्वरः । नृसिंहं लोकहन्तारं संजघान महा- Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
शरभोपनिषत् ] [ ४११ बलः ॥ ४ ॥ हरि हरन्तं पादाभ्यामनुयान्ति सुरेश्वराः । माधवोः पुरुषं विष्णुं विक्रमस्व महानसि ॥ ५ ॥ कृपया भगवान्विष्णु विददार नखैः खरैः । चर्माम्बरो महावीरो वीरभद्रो बभूव ह ॥ ६ ॥ एक समय पैप्पलाद ऋषि ने ब्रह्माजी से कहा—"हे भगवन् ! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र इन तीनों में से अधिकतर ध्यान के योग्य कौन है, यह आप ही बतलाइये ? ॥ १ ॥ पितामह ब्रह्मा ने कहा—"हे पैप्पलाद ! मेरे कथन को सुनो कि जिस परमेश्वर के अङ्ग से मैं उत्पन्न हुआ हूँ वह किसी बहुत पुण्यशाली को ही प्राप्त होता है, मुख्य विष्णु, इन्द्र और सुरेन्द्र भी मोहवश उसे नहीं जान पाते ॥१॥ वह सबका प्रभु है, श्रेष्ठ है, पिता है, परमेश्वर है, वही ब्रह्मा को धारण करता है, वही वेदों का पहले निर्णय करता है वही सबका प्रभु और देवताओं का पिता है ॥२॥ वह मेरा और विष्णु का भी पिता है, उसको नमस्कार है, वही अन्तकाल में समस्त विश्व का संहार करता है ॥ ३ ॥ वही एक मात्र सबसे श्रेष्ठ, सबका नियामक और वरिष्ठ है। उसी महाबलशाली ने शरभ का घोर रूप धारण करके नृसिंह को मार दिया ॥ ४ ॥ जब रुद्र विष्णु को पैर पकड़कर ले जा रहे थे तब सब देवताओं ने उनके पीछे-पीछे जाकर उनकी प्रार्थना की "दया करके पुरुषोत्तम विष्णु का वध मत कीजिये आप महान् हैं, आपकी जय हो।" तब रुद्र ने तीक्ष्ण नखों से विष्णु को विदीर्ण किया और वे चर्माम्बर वाले रुद्र महावीर और वीरभद्र के नाम से कहे जाने लगे ॥ ५-६ ॥ स एको रुद्रो ध्येयः सर्वेषां सर्वसिद्धये । यो ब्रह्मणः पंचम- वक्त्रहन्ता तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ७ ॥ यो विस्फुलिङ्गेन ललाटजेन सर्वं जगद्भस्मसात्संकरोति । पुनश्च सृष्ट्वा पुनरप्य- रक्षदेवं स्वतन्त्रं प्रकटीकरोति ॥ तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ८ ॥ यो वामपादेन जघान कालं घोरं पपेऽथो हलाहलं दहन्तम् ।
४१२ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ शरभोपनिषत् तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ६ ॥ यो वामपादार्चितविष्णुनेत्रस्तस्मै ददौ चक्रमतीव हृष्टः । तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १० ॥ ऐसा एक भद्र ही सब सिद्धियों का दाता और सबका पूजनीय है । जिसने ब्रह्मा का पांचवां मुख नष्ट कर दिया उसको नमस्कार ॥७॥ जो अपने मस्तक के अग्नि द्वारा समस्त जगत को भस्म कर देता है और फिर से उत्पन्न करके उसका पालन भी करता है, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ ८ ॥ जिसने काल को अपने बांये पैर से मार दिया और जलते हुये हलाहल विष को पी लिया, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ ६ ॥ विष्णु ने जिसके वांये पैर पर अपनी आंख निकाल कर चढ़ाई और इससे संतुष्ट होकर जिसने चक्र दे दिया, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ १० ॥ यो दक्षयज्ञं सुरसङ्घान्विजित्य विष्णुं बबन्धोरगपाशेन वीरः । तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ११ ॥ यो लीलयैव त्रिपुरं ददाह विष्णुं कविं सोमसूर्याग्निनेत्रः । सर्वे देवाः पशुतामवापुः स्वयं तस्मात्पशुपतिर्बभूव । तस्मै रुद्रात नमो अस्तु ॥ १२ ॥ यो मत्स्यकूर्मादिवराहसिंहान्विष्णुं अवतार क्रमन्तं वामनमादि- विष्णुम् । विविकलवं पीड्यमानं सुरेशं भस्मीचकार मन्मथं यमं च । तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १३ ॥ एवंप्रकारेण बहुधा प्रतुष्ट्वा क्षमापयामासुर्नीलकण्ठं महेश्वरम् । तापत्रयसमुद्भूतजन्ममृत्यु- जरादिभिः । नानाविधानि दुःखानि जहार परमेश्वरः ॥ १४ ॥ एवं मन्त्रैः प्रार्थ्यमान आत्मा वै सर्वदेहिनाम् । शङ्करो भगवा- नाद्यो ररक्ष सकलाः प्रजाः ॥ १५ ॥ : दक्ष के यज्ञ में सब देवताओं को पराजित कर जिसने विष्णु को भी नागपाश में बांध लिया उस महावीर रुद्र को नमस्कार है ॥ ११ ॥ जिसने लीलामात्र से त्रिपुर को दग्ध कर दिया, जिसके सूर्य, चन्द्र और अग्नि तीन नेत्र हैं, सब देवता जिसके सम्मुख पशुता ( अधीनता ) को : प्राप्त हो गये और इससे जो पशुपति कहलाया, उस रुद्र को नमस्कार Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
शरभोपनिषत् [ ४१३ है ॥ १२ ॥ जो मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन आदि विष्णु के अवतारों को भी श्रमित करता है, जिसने कामदेव और यम को भस्म कर दिया, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ १३ ॥ देवों ने इस प्रकार विविध भाँति से स्तुति करके नीलकण्ठ महेश्वर से क्षमा प्रार्थना की, तब उस परमेश्वर ने तीनों प्रकार के तापों और जन्म, मृत्यु, जरा आदि तथा अन्य तरह-तरह के दुःखों का नाश किया ॥ १४ ॥ इस प्रकार विविध प्रकार के मन्त्रों से प्रार्थना किये जाने पर उस आदि भगवान् शंकर ने आत्मरूप से सब प्रजा की रक्षा की ॥ १५ ॥ यत्पादाम्भोरुहद्वन्द्वं मृग्यते विष्णुना सह । स्तुत्वा स्तुत्यं महेशानमवाङ्मनसगोचरम् ॥ १६ ॥ भक्त्या नम्रनतोर्विष्णोः प्रसादमकरोद्विभुः । यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कदाचनेति ॥ १७ ॥ अणोरणी- यान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥१८॥ वसिष्ठ- वैयासकिवामदेवविरिञ्चिमुख्यैर्हृदि भाव्यमानः । सनत्सुजाता- दिसनातनाद्यै रीड्यो महेशो भगवानादिदेवः ॥१९॥ सत्यो नित्यः सर्वसाक्षी महेशो नित्यानन्दो निर्विकल्पो निराख्यः । अचिन्त्य- शक्तिर्भगवान्गिरीशः स्वाविद्यया कल्पितमानभूमिः ।! २० ॥ वाणी और मन से भी जो अगोचर हैं और सब प्रकार की स्तुतियों के योग्य हैं, विष्णु जिनके चरण कमलों को प्राप्त करने की अभिलाषा रखते हैं ऐसे भगवान महेश्वर भक्तिपूर्वक नमस्कार करने वाले विष्णु पर प्रसन्न हुये । जिसको प्राप्त न करके वाणी मन के साथ लौट जाती है, उस ब्रह्मानन्द का ज्ञाता कभी भी भय को प्राप्त नहीं होता ॥ १६—१७ ॥ यह आत्मा छोटे से भी छोटा और बड़े से भी बड़ा है और सब प्राणियों के भीतर हृदय रूपी गुफा में निवास करता है । उस
४१४ ] [ शरभोपनिषत् दृष्टारूप महान् ईश्वर को शोक से रहित व्यक्ति भगवान् के प्रसाद से ही देखता है ॥ १८ ॥ वसिष्ठ, शुकदेव और वामदेव जैसे ऋषि तथा ब्रह्मादि सब देवता भी जिसका सदैव ध्यान करते हैं और सनत, सनातन आदि जिनकी स्तुति करते रहते हैं, ऐसे आदि भगवान महेश्वर देव हैं ॥ १९ ॥ वे महेश्वर, सत्य, नित्य, सर्वसाक्षी, नित्यआनन्द रूप, निर्विकल्प और कथन न कर सकने योग्य हैं । उनकी शक्ति की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, अज्ञानता से ही हम उनके स्थान आदि की कल्पना करते रहते हैं ॥ २० ॥ अतिमोहकरी माया मम विष्णोश्च सुव्रत । तस्य पादा- म्बुजध्यानाद्दुस्तरा सुतरा भवेत् ॥ २१ ॥ विष्णुर्विश्वजगद्योनिः स्वांशभूतैः स्वकैः सह । ममांशसंभवो भूत्वा पालयत्यखिलं जगत् ॥ २२ ॥ विनाशं कालतो याति ततोऽन्यत्सकलं मृषा । ॐ तस्मै महाग्रासाय महादेवाय शूलिने । महेश्वराय मृडाय तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ २३ ॥ एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकणः । त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २४ ॥ चतु- र्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदत ॥ २५ ॥ हे सुव्रत ! मेरे (ब्रह्मा) और विष्णु के लिये भी उसकी माया अत्यन्त मोहग्रस्त करने वाली है। यद्यपि उसे पार कर सकना अत्यन्त कठिन है तो भी उनके चरण कमलों का ध्यान करने से उसे सुगमता पूर्वक पार किया जा सकता है ॥ २१ ॥ समस्त सृष्टि के उत्पन्न करने वाले विष्णु हैं, वे अपने अंश रूप जीवों के साथ मेरे ही अंश से होते हैं और विश्व का पालन करते हैं ॥ २२ ॥ कालक्रम से सब कुछ नष्ट हो जाता है और इसलिए यह मिथ्या है । इससे सबका महाग्रास करने वाले उस शूलधारी, महादेव, महेश्वर और कृपा करने वाले रुद्र को नमस्कार है ॥ २३ ॥ सब प्रकार की सृष्टि में विष्णु सबसे भिन्न और महान् हैं ।
शरभोपनिषत् । [ ४१५ वे यद्यपि सब भूतों में व्याप्त होकर सब प्रकार के भोगों को भोगते हैं फिर भी अव्यय रहते हैं ॥ २४ ॥ जिन विष्णु भगवान को चार, चार दो और पाँच आहुतियां दी जाती हैं, वे विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों ॥२५॥ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २६ ॥ शरा जीवास्तदङ्गेषु भाति नित्यं हरिः स्वयम् । ब्रह्मैव शरभः साक्षान्मोक्षदोऽयं महामुने ॥ २७ ॥ मायावशादेव देवा मोहिता ममतादिभिः । तस्य माहात्म्यलेशांशं वक्तुं केनाप्यशक्यते ॥ २८ ॥ परात्परतरं ब्रह्म यत्परात्परो हरिः । परात्परतरो हीशस्तस्मात्तुल्योऽधिको न हि ॥ २९ ॥ एक एव शिवो नित्यस्ततोऽन्यत्सकलं मृषा । तस्मात्सर्वान्परित्यज्य ध्येयान्विष्ण्वादिकान्सुरान् ॥ ३० ॥ शिव एव सदा ध्येयः सर्व- संसारमोचकः । तस्मै महाग्रासाय महेश्वराय नमः ॥ ३१ ॥ अर्पण हवि ब्रह्म है, उसे ब्रह्म रूप कर्त्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में हवन किया जाता है, यह भी ब्रह्म ही है। इसलिए समाधिस्थ योगी के लिए ब्रह्म ही प्राप्त करने योग्य है ॥ २६ ॥ जीव ही 'शर' है जिसके अङ्ग में स्वयं भगवान नित्य प्रकाशित होते हैं । इस प्रकार ब्रह्म ही 'शरभ' है, जो साक्षात् मोक्ष के प्रदान करने वाले हैं ॥ २७ ॥ जिसकी माया से देवगण भी मोहित रहते हैं, उसकी महिमा एक अल्प अंश भी कोई नहीं कह सकता ॥ २८ ॥ पर से परब्रह्म है, उससे पर विष्णु है, उससे भी पर से पर ईश हैं । उनसे बड़ा या उनके बराबर कोई भी नहीं है ॥ २९ ॥ एक मात्र शिव ही नित्य है और अन्य सब मिथ्या है इसलिये विष्णु आदि समस्त देवों का त्याग कर संसार-बन्धन से छुड़ाने वाले एक मात्र उनका ही ध्यान करना चाहिए । सबका संहार करने वाले उस महेश को नमस्कार है ॥ ३०–३१ ॥ पैप्पलादं महाशास्त्रं न देयं यस्य कस्यचित् । नास्तिकाय
४१६ ] [ शरभोपनिषत् कृतघ्नाय दुर्वृत्ताय दुरात्मने ॥ ३२॥ दाम्भिकाय नृशंस्याय शठायानृतभाषिणे । सुव्रताय सुभक्ताय सुवृत्ताय सुशीलिने ॥३३॥ गुरुभक्ताय दान्ताय शान्ताय ऋजुचेतसे । शिवभक्ताय दातव्यं ब्रह्मकर्मोक्तधीमते ॥ ३४ ॥ स्वभक्ताय दातव्यमकृतघ्नाय सुव्रत । न दातव्यं सदा गोप्यं यत्नेनैव द्विजोत्तम ॥ ३५ ॥ एतत्पैप्पलादं महाशास्त्रं योऽधीते श्रावयेद्द्विजः स जन्ममरणेभ्यो मुक्तो भवति । यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति । गर्भवासाद्वि- मुक्तो भवति । सुरापानात्पूतो भवति । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । ब्रह्महत्यात्पूतो भवति । गुरुतल्पगमनात्पूतो भवति । स सर्वान्वे- दानधीतो भवति । स सर्वान्देवान्ध्यातो भवति । स समस्तमहा- पातकोपपातकात्पूतो भवति । तस्मादविमुक्तमाश्रितो भवति । स सततं शिवप्रियो भवति । स शिव सायुज्यमेति । न स पुनरा वर्तते न स पुनरावर्तते । इत्याह भगवान् ब्रह्मोत्युपनिषत् । इस पैप्पलाद ऋषि को प्राप्त हुये महाशास्त्र को चाहे जिस किसी को न देना चाहिये । नास्तिक, कृतघ्न, दुर्वृत्त, दुरात्मा, दाम्भिक, नृशंस, शठ, असत्यभाषी को इसे कदापि न दे । जो सुव्रतधारी, सच्चभक्त, शुद्धवृत्तिवाला, सुशील, गुरुभक्त, शम दम वाला, धर्म बुद्धिवाला, शिव- भक्त ब्रह्म कर्म में चित्त लगाने वाला हो और अपने में भक्ति रखता हो कृतघ्न न हो उसी को इसे देना चाहिए। यदि ऐसा न मिले तो किसी को न देकर इसकी रक्षा करनी चाहिए ॥ ३२—३५ ॥ पैप्पलाद के इस महा- शास्त्र को जो स्वयं पढ़ता है तथा अन्य ब्राह्मणों को सुनाता है, वह जन्म- मरण से मुक्त हो जाता है। जो इसे जानता है वह अमृतत्व को प्राप्त होता है, गर्भवास से छुटकारा पा जाता है। सुरापान, स्वर्ण की चोरी ब्रह्महत्या गुरुस्त्री गमन जैसे महा पापों से भी वह छूट जाता है । वह सब वेदों का अध्ययन करने वाला हो जाता है। उसे सब देवों के ध्यान
शरभोपनिषत् [ ४१७ करने का फल मिल जाता है। वह समस्त महापातक और उपपातकों से छुटकारा पाकर पवित्र हो जाता है। इस प्रकार मुक्त होकर शिवजी का प्रिय होता है और शिव सायुज्य को प्राप्त करता है। उसका पुनरागमन नहीं होता—उसका पुनरागमन नहीं होता वह ब्रह्म हो जाता है। इस प्रकार ब्रह्माजी ने कहा, ऐसा यह उपनिषद् है ॥ ३६ ॥ ॥ शरभोपनिषत् समाप्त ॥
विश्वमयो ब्राह्मणः शिवं व्रजति । ब्राह्मणः पञ्चाक्षरमनु-
रुड्रोपनिषत विश्वमयो ब्राह्मणः शिवं व्रजति । ब्राह्मणः पञ्चाक्षरमनु- भवति । ब्राह्मणः शिवपूजारताः । शिवभक्तिविहीनश्चेत् स चण्डालं उपचाण्डालः । चतुर्वेदज्ञोऽपि शिवभक्त्यान्तर्भवतीति स एव ब्राह्मणः । अधमश्चाण्डालोऽपि शिवभक्तोऽपि ब्राह्मण- च्छ्रेष्ठतरः । ब्राह्मणस्त्रिपुण्ड्रधृतः । अत एव ब्राह्मणः । शिवभक्तेरेव ब्राह्मणः । शिवलिङ्गार्चनयुतश्चाण्डालोऽपि स एव ब्राह्मणाधिको वति । अग्निहोत्रभसिताच्छिवभवतचाण्डालहस्त- विभूतिः शुद्धा । कपिशा वा श्वेतजापि धूम्रवर्णा वा । विरक्ता- नां तपस्विनां शुद्धा । गृहस्थानां निर्मलविभूतिः । तपस्विभिः सर्वभस्म धार्यम् । यद्वा शिवभक्तिसंपुष्टं सदापि तद्भसितं देवताधार्यम् । विश्वमय ब्राह्मण शिव के पास जाता है । वह पञ्चाक्षर का अनुभव करता है (नमः शिवाय का) ब्राह्मण वही है जो शिव की पूजा में लगा रहे । यदि वह शिव भक्ति से रहित होगा तो वह चाण्डाल अथवा उपचाण्डाल समझा जायेगा । चारों वेदों का ज्ञाता शिवभक्ति से अन्त- र्मुखी प्रवृत्ति वाला हो जाता है तथा वही प्रस्तुततः ब्राह्मण है । नीच चाण्डाल भी शिवभक्ति से युक्त होने पर ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ होता है । ब्राह्मण त्रिपुण्ड (तीन रेखा वाला तिलक) धारण करने वाला होना चाहिये । इसी में उसका ब्राह्मणत्व है । शिव भक्ति से ही वह ब्राह्मण कहलायेगा । शिवलिङ्ग की पूजा करने वाला चाण्डाल भी ब्राह्मण से अधिक श्रेष्ठ है । यज्ञ की भस्म से भी शिवभक्त चाण्डाल के हाथ की भस्म (राख) शुद्ध होती है । यह भस्म कुछ ताम्रवर्ण, सफेद, अथवा
रुद्रोपनिषत् [ ४१६ ] मटमैजी धुएँ के समान तीन तरह की होती है । विरक्त तपस्वियों के लिए शुद्ध गृहस्थियों के लिये स्वच्छ भस्म ठीक हुआ करती है । तपस्वियों को सभी भस्म करनी चाहिये अथवा शिवभक्ति से युक्त जिस भस्म में शिवभक्ति का ज्ञान—भावना कर लिया जाय उसे धारण करना चाहिए, वही देवताओं द्वारा भी धारण करने योग्य है । ॐ अग्निरिति भस्म । वायुरिति भस्म । स्थलमिति भस्म । जलमिति भस्म । व्योमेति भस्म । इत्याद्युपनिषत्कारं- णात् तत् कार्यम् । अन्यत्र "विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोहस्त उत विश्वस्पात् । सं बाहुभ्यां नमति सं पतत्रै- र्द्यावापृथिवो जनयन् देव एकः ।" तस्मात्प्राणलिङ्गी शिवः । शिव एव प्राणलिङ्गी । जटाभस्मधारोऽपि प्राणलिङ्गो हि श्रेष्ठः । प्राणलिङ्गी शिवरूपः । शिवरूपः प्राणलिङ्गी । जङ्गम- रूपः शिवः । शिव एव जङ्गमरूपः । प्राणलिङ्गिनां शुद्ध- सिद्धिर्न भवति । प्राणलिंगिनां जङ्गमपूज्यानां पूज्यतपस्वि- नामधिकश्चण्डालोऽपि प्राणलिङ्गी । तस्मात्प्राणलिंगी विशेष इत्याह । य एवं वेद स शिवः । रुद्र पव रुद्रः प्राणलिङ्गी नान्यो भवति । अग्नि, वायु, जल, स्थल, बाकाश सभी भस्ममय हैं ऐसा समझ कर इसे धारण करना चाहिये । वह ईश्वर अन्यत्र 'चारों तरफ आँख वाला, चारों तरफ मुँ ह वाला, चारों ओर हाथ वाला, चारों ओर पैर वाला' बतलाया गया है । वह एक मात्र देव पृथ्वी आकाश को हाथों द्वारा उत्पन्न करता है । वह सभी द्वारा प्रणाम करने योग्य है । सभी ( जल, थल, आकाशचारी) उसे प्रणाम करते हैं । अतः प्राणलिङ्गी ही शिव है । शिव ही प्राणलिङ्गी है । जटा तथा भस्म को धारण करने वाला प्राणलिङ्ग श्रेष्ठ है । प्राणलिङ्गी शिवरूप तथा शिव रूप प्राणलिङ्गी है । जङ्गम रूप शिव तथा शिव ही जङ्गमस्वरूप है । प्राण
लिंगियों की शुद्ध सिद्धि नहीं हुआ करती। प्राणलिंगियों में जंगम श्रेष्ठों में पूज्य, तपस्वियों में शिवभक्त चाण्डाल भी श्रेष्ठ प्राणलिङ्गी है । इसलिये प्राणलिङ्गी श्रेष्ठ कहा जाता है, जो इस तथ्य को जानता है वह शिव ही है, जो रुद्र है, प्राणलिङ्गी है दूसरा कोई नहीं । ॐ आत्मा परिशिवद्वयो गुरुः शिवः । गुरूणां सर्वविश्व- मिदं विश्वमन्त्रेण धार्यम् । देवाधीन जगदिदम् । तद्देवं तन्म- न्त्रात् तनुते । तन्मे दैवं गुरुरिति । गुरूणां सर्वज्ञानिनां गुरुणा दद्यमेतदन्नं परब्रह्म । ब्रह्म स्वानुभूतिः । गुरुः शिवो देवः । गुरुः शिव एव लिङ्गम् । उभयोर्मिश्रप्रकात्वात् । प्राणतत्त्वात् महेश्वरत्वाच्च शिवस्तद्देव गुरुः । यत्र गुरुस्तत्र शिवः । शिवगुरु- स्वरूपो महेश्वरः । भ्रमरकीटकार्येण दीक्षिताः शिवयोगिनः शिवपूजापथे गुरुपूजाविधौ च महेश्वरपूजनान्मुक्ताः । लिङ्गाभि- षेकं निर्माल्यं गुरोरभिषेकतीर्थं महेश्वरपादोदकं जन्ममालिन्यं क्षालयन्ति । तेषां प्रीतिः शिवप्रीतिः । तेषां तृप्तिः शिवतृप्तिः । तैश्च पावनो वासः । तेष निरसनं शिवनिरसनम् । आनन्द- परायणः । तस्माच्छिवं व्रजन्तु । गुरुं व्रजन्तु । इत्येव पावनम् । ये आत्मा ब्रह्म तथा शिवमय है, गुरु है, शिवरूप है। गुरुओं को ये सारा विश्व विश्वमन्त्र से धारण करना चाहिये (मन्त्रों के प्रचार प्रसार से विश्व की स्थिति ठीक रखनी चाहिए) ये संसार दैवाधीन है । वह दैव उन मन्त्रों से प्रसारित होता है । वह दैव ही मेरा गुरु है । गुरुओं तथा सर्वज्ञों के गुरु द्वारा किया यह अन्न परब्रह्म रूप है (उपदेश) ब्रह्म अपने ही अनुभव से जाना जा सकता है। देव शिव ही गुरु है । गुरु शिव ही लिङ्ग रूप है। (निराकार ब्रह्म के चिन्ह हैं) दोनों के सम्मिलित प्रकाशित होने के कारण प्राणवान तथा महेश्वर होने के कारण शिव ही परम गुरु हैं। जहां गुरु है वहाँ शिव है शिव तथा गुरु स्वरूप ही वह महेश्वर है। भ्रमर-कीट सिद्धान्त के द्वारा (प्रसिद्ध है कि
भृङ्गी नामक कीड़ा अन्य कीड़ों को पकड़कर जब अपने घर में बन्द कर देता है तब वह कीड़ा य के कारण निरन्तर उस भृङ्गी को ध्यान करने के कारण भृङ्गी जैसा ही बन जाता है)। ठीक इसी प्रकार निरंतर शिव का ध्यान करने वाले शिवयोगी शिव पूजा के मार्ग में तथा गुरु पूजा की विधि में निरंतर एक चित्त होने के कारण महेश्वर के पूजन से मुक्त हो जाते हैं । शिव लिङ्ग का अभिषेक करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । गुरु के अभिषेक से तथा महेश्वर के चरणामृत से जन्मों के पाप धुल जाया करते हैं । इन सब में प्रेम करना ही शिव से प्रेम करना है । इसकी तृप्ति ही शिवतृप्ति है, इनके समीप रहना ही (चिन्तनादि के द्वारा भी) परम पवित्र वास है । उनका निरसन शिव निरसन ही है । इस प्रकार का ज्ञानी हमेशा आनंदयुक्त रहा करता है । अतः शिव की शरण लेनी चाहिए । गुरु की शरण लेनी चाहिए । ॥ रुद्रोपनिषद् समाप्त ॥
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कालाग्निरुद्रोपनिषत्
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । यह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, हम दोनों किसी का द्वेष न करें ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्ति । अथ कालाग्निरुद्रोपनिषत् संवर्तकोऽग्निरृषिरनुष्टुप् छन्दः श्रीकालाग्निरुद्रोप देवता श्रीकालाग्निरुद्रप्रीत्यथ जपे विनियोगः।१ अथ कालाग्निरुद्रं भगवन्तं सनत्कुमारः पप्रच्छ अधोहि भगवंस्त्रिपुण्ड्रविधि सतत्त्वं कि द्रव्यं कियत् स्थानं कति प्रमाणं का रेखाः के मन्त्राः का शक्तिः कि दैवतं कः कर्त्ता कि फलमिति च ॥३॥ तं होवाच भगवान् कालाग्निरुद्रः । यद्द्रव्यं तदाग्नेयं भस्य सद्योजातादिपञ्चब्रह्ममन्त्रैः परिगृह्याग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म खमिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्मत्येनेनाभि- मन्त्र्य मानस्तोके तनय इति समुद्धृत्य मा नो महान्तमिति जलेन संसृज्य त्रियायुषं जमदग्नेरिति शिरोललाटवक्षः स्कन्धेषु त्रियायु- षैस्त्र्यम्बकैस्त्रिशक्तिभिस्तिर्यक् तिस्रो रेखाः प्रकुर्वीत व्रतमेतच्छा- म्भवं सर्वेषु वेदवादिभिरुक्तं भवति तस्मात् समाचरेन्मुमु- क्षुर्न पुनर्भावाय ॥३॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
कालाग्निरुद्रोपनिषत् ] [ ४२३ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ॐ किसी समय सनत्कुमार ने भगवान् ने कालाग्निरुद्रा से पूछा- “हे भगवन् ! त्रिपुण्ड की विधि तत्व सहित मुझे समझाइये कि वह क्या है, उसका स्थान कौन-सा है, उसका प्रमाण (आकार) कितना है, कितनी रेखाएँ हैं, कौन-सा मन्त्र है, उसकी शक्ति क्या है, कौन देवता है, कौन कर्ता है और उसका फल क्या होता है ?” यह सुनकर कालाग्नि रुद्र कहने लगे—त्रिपुण्ड का द्रव्य अग्निहोत्र की भस्म ही है, इस भस्म को, ‘सद्यो जातादि' पांच मन्त्र पढ़कर ग्रहण करना चाहिये—अर्थात् 'अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलामिति भस्म, स्थलमिति भस्म' व्योमेति भस्म' इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे, 'मान-स्तोक' मन्त्र से अँगुली पर ले और 'मा नो महान्' मन्त्र से जल लेकर 'त्रियायुष' इस मन्त्र से शिर ललाट, वक्ष और कन्धे पर और त्रियायुष तथा त्र्यंबक मन्त्र से तीन रेखाएँ करना । इसका नाम शाम्भव व्रत कहा गया है। इस व्रत का कथन वेदवेत्ताओं ने सर्व देवताओं में किया है । जो मुमुक्ष यह इच्छा रखते हैं कि उनको पुन- र्जन्म ग्रहण न करना पड़े वे इसे धारण करें ॥ १--३ ॥ अथ सनत्कुमारः प्रमाणस्य पप्रच्छ त्रिपुण्ड्राधारणस्य ।४। त्रिधा रेखा आललाटादाचक्षुषोरामूर्ध्नोराभ्रुवोर्मध्यतश्च ।५। याऽस्य प्रथमा रेखा सा गार्हपत्यश्चाकारो रजः स्वात्मा क्रियाशक्तिर्ऋग्वेदः प्रातः सवनं महेश्वरो देवतेति ।६। याऽस्य द्वितीया रेखा सा दक्षिणाग्निरुकारः सत्त्वमन्तरात्मा केच्छाशक्तिर्यजुर्वेदो माध्यंदिनं सवनं सदाशिवो देवतेति ।७। याऽस्य तृतीया रेखा साऽऽहवनीयो मकार स्तमः परमात्मा ज्ञानशक्तिः सामवेदस्तृतीयसवनं महादेवो देवतेति ।८। त्रिपुण्ड्रविधिं भस्मना करोति यो विद्वान् ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो यतिर्वा स महापातकोपपातकेभ्यः पूतो भवति स सर्वेषु Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४२४ ] [ कालाग्निरुद्रोपनिषत् तीर्थेषु स्नातो भवति स सर्वान् वेदानधीतो भवति स सर्वान् देवान् ज्ञातो भवति स सततं सकलरुद्रमन्त्रजापी भवति स सकलभोगान् भुङ्क्ते देहं त्यक्त्वा शिवसायुज्यमेति न स पुनरावर्तते न स पुनरावर्तत इत्याह भगवान् कालाग्निरुद्रः ।६। यस्त्वेतद्ब्राह्मधीते सोऽप्येवमेव भवतीत्यों सत्यमित्युपनिषत् ।१०। इतना सुनकर सनत्कुमार ने प्रश्न किया कि त्रिपुण्ड की तीन रेखायें करने का क्या कारण है ? उत्तर मिला कि 'तीन रेखाओं में से प्रथम रेखा तो गार्हपत्य, अग्निरूप 'अ' कार रूप, रजोगुणरूप, भूलोक रूप, स्वात्मकरूप, क्रियाशक्तिरूप. ऋग्वेद रूप, प्रातः सवनरूप और महेश्वर देव के रूप की है । दूसरी रेखा दक्षिणाग्निरूप, 'उ'कार रूप, स्वत्वरूप, अन्तरिक्ष रूप, अन्तरात्मारूप, इच्छाशक्तिरूप, यजुर्वेदरूप, माध्यंदिन सवनरूप और सदाशिव के रूप की है। तीसरी रेखा आहवनीयरूप, 'म'काररूप, तमरूप, द्यौ लोकरूप, परमात्मारूप, ज्ञानशक्ति रूप, सामवेद रूप तृतीय सवनरूप और महादेवरूप की है । इस प्रकार की त्रिपुण्ड की विधि से जो कोई ब्रह्मचारी गृहस्थ, वनप्रस्थी अथवा संन्यासी भस्म को धारण करता है तो वह महापातकों और उपपातकों से छूट जाता है ! वह सब तीर्थों में स्नान करने के समान पवित्र हो जाता है, उसको समस्त वेदों का अध्ययन हो जाता है । सब देवताओं का वह ज्ञाता हो जाता है और सब रुद्र मन्त्रों के जाप के फल को प्राप्त करने वाला होता है । वह सब प्रकार के भोगों को भोगकर शिवलोक को प्राप्त होता है । वह फिर जन्म नहीं लेता । इस प्रकार भगवान कालाग्नि रुद्र ने कहा । जो इसका अध्ययन करता है वह भी उसी के समान हो जाता है ऐसा यह उपनिषद् है ॥४-१०॥ ॥ कालाग्निरुद्रोपनिषत् समाप्त ॥