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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

दीक्षा देते हैं। मनन और त्राण के गुण से सम्पन्न होने के कारण उसे मन्त्र कहते हैं। मन्त्र ही सब अभिधेयों का वाचक है। जो भगवान स्त्री-पुरुष दोनों रूप में प्रतिष्ठित हैं, उनके लिये रूप में विग्रह यन्त्र की रचना की जाती है क्योंकि बिना यन्त्र की अर्चना देवताओं को प्रसन्न करने समर्थ नहीं होती ॥११-१३॥ स्वभू ज्योतिर्मयोऽनन्तरूपी स्वेव भासते। जीवत्वेन समो यस्य सृष्टिस्थितिलयस्य च ॥१॥ कारणत्वेन चिच्छक्त्या रजःसत्त्वतमोगुणैः। तथैव वटबीजस्थः प्राकृतश्च महान्द्रुमः ॥२ तथैव रामबीजस्थं जगदेतच्चराचरम्। रेफारूढामूर्तयः स्युः शक्तयस्तिस्र एव चेति ॥३ सीतारामौ तन्मयावत्र पूज्यौ जातान्याभ्यां भुवनानि द्विसप्त। स्थितानि च प्राहेतान्येव तेषु ततो रामो मानवो मायया धात् ॥१॥ जगत्प्राणायात्मनेऽस्मै गमः स्यान्नमस्त्वैक्यं प्रवदे- त्प्राग्गुणेनेति ॥२॥ जीववाची नमो नाम चात्मारामेति गीयते। तदात्मिका या चतुर्थी तथा मायेति गीयते ॥१ मन्त्रोऽयं वाचको रामो वाच्यः स्याद्योग एतयोः। फलतश्च व सर्वेषां साधकानां न संशय ॥२ यथा नामी वाचकेन नाम्ना योऽभिमुखो भवेत्। तथा बीजजातम्को मन्त्रोऽमन्त्रिणोऽभिमुखो भवेत् ॥ ३ बीजशक्तिन्यसेद्दक्षवामयोः स्तनयोरपि। कीलो मध्ये विना भाव्यः स्ववाञ्छाविनियोगवान् ॥४ सर्वेषामेव मन्त्राणामेष साधारणः क्रमः। अत्र रामोऽनन्तरूपस्तेजसा वह्निना समः ॥५

३२८ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् सत्त्वनुष्णगुविश्वश्वेदग्नीषोमात्मकं जगत् । उत्पन्नः सीतया भाति चन्द्रश्चन्द्रिकया यथा ॥६ प्रकृत्यासाहितः श्यामः पीतवासा जटाधरः । द्विभुजः कुण्डली रत्नमाली धीरो धनुर्धरः ॥७ प्रसन्नवदनो जेता घृष्टचष्टकविभूषितः । प्रकृत्या परमेश्वर्या जगद्धान्याङ्किताङ्गभृत् ॥८ हेमाभया द्विभुजया सर्वालंकृतया चिता । श्लिष्टः कमलधारिण्या पुष्टः कोसलजात्मजः ॥९ दक्षिणे लक्ष्मणेनाथ सधनुष्पाणिना पुनः । हैमाभेनानुजेनव तथा कोणत्रयं भवेत् ॥१० साकार होनेवाले परमेश्वर स्वयंभू कहलाते हैं क्योंकि उनके प्रकट करने में कोई कारण रूप नहीं होता, वे स्वयं ही उत्पन्न होते हैं। वे ज्योति स्वरूप हैं और अपने प्रकाश से सदा प्रकाशित रहते हैं। वे साकार होने पर भी अनन्त रहते हैं । क्योंकि वे देश, काल आदि की सीमा में सीमित नहीं रहते। वे अपनी चैतन्य शक्ति प्राण रूप से सभी देह धारियों में स्थित रहते हैं और वे ही सत्व, रज, तम गुणों के द्वारा विश्व की सृष्टि, रक्षा और अन्त करने में समर्थ हैं । इन गुणों के कारण ही संसार प्रत्यक्ष दिखाई देता है । परन्तु यह दृष्टिगोचर संसार भी ओंकार रूप ही है । जैसे महान् वट वृक्ष अपने छोटे से बीज में स्थित रहता है वैसे ही यह विशाल विश्व रामबीज में स्थित है । ब्रह्मा, विष्णु, शिव यह तीनों तथा उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली शक्तियाँ,नाद-बिन्दु और बीज से उत्पन्न रौद्री, ज्येष्ठा और वामा- यह सभी राम के 'रकार' पर टिके हुए हैं । इस बीज मन्त्र में पूजनीय सीता रूप प्रकृति और राम रूप पुरुष हैं। चौदहों भुवन इन दोनों से ही प्रकट हुए हैं। यह लोक इन दोनों के ही आश्रित हैं। इन सब का लय भी ओंकार रूप ब्रह्मा, विष्णु, शिव में ही होता है। राम ने

लीलापूर्वक ही अपने को मनुष्य रूप में प्रकट किया है। इन विश्व- प्राण और विश्वात्मा राम को नमस्कार है। इस प्रकार नमन के पश्चात् गुणों से भी पूर्व प्रकट हुए परब्रह्म रूप राम के साथ अपने एकीभाव का अनुभव करता हुआ 'मैं ही रामरूप ब्रह्म हूँ' इस प्रकार उच्चारण करे ॥ १-४ ॥ 'राम' के द्वारा आत्मा प्रतिपादित होती है और नमः जीव वाचक है। राम के साथ मिली हुई विभक्ति से जीव और आत्मा के एकीभाव का वर्णन किया जाता है। 'रामाय नमः' मन्त्र के राम ही वाच्य हैं, इन दोनों के सम्मिलित से सब उपासकों को इच्छित फल प्राप्त होता है। जैसे जिस किसी का नाम लिया जाय, वह अपने नाम की पुकार सुनकर तुरन्त सामने आता है, वैसे ही बीज रूप मन्त्र राम का उच्चारण किये जाने पर राम भी साधक के समक्ष प्रत्यक्ष होते हैं। बीज का दक्षिण स्तन पर और शक्ति का वाम स्तन पर तथा कीलक का हृदय के मध्य में न्यास और कामना-सिद्धि निमित्त विनियोग करे। जब ध्यान किया जाए तब दशरथ तनय श्रीराम में अनन्त, अविनाशी परमेश्वर की भावना करनी चाहिए। उन्हें अत्यन्त तेजोमय अग्नि के समान मानना चाहिए। जब वे सौम्य कान्ति वाली श्रीसीता जी से युक्त होते हैं, तब वे अग्निषो- मात्मक विश्व के कारणभूत होते हैं। जैसे चन्द्रमा के साथ अत्यन्त शोभा होती है, वैसे ही राम सीता के साथ अत्यन्त सुशोभित होते हैं ॥ १-६ ॥ श्रीराम अपनी आह्लादनी शक्ति सीता के साथ सुशोभित हैं। वे श्याम वर्ण के हैं। उनके देह पर पीताम्बर सिर पर जटायें, कानों में कुण्डल तथा कंठ में श्रेष्ठ रत्नों की मालायें पड़ी हैं। उनके दो भुजायें हैं। वे स्वभाव से धीर और सदा प्रसन्न मुख वाले हैं। वे धनुर्धारी राम युद्ध में सदा जीतते हैं। अणिमा आदि आठों ऐश्वर्यभूता शक्तियां उनकी शोभा वृद्धि करती हैं। वाम अंग में संसार की कारण

[Header] ३३० ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् रूपिणी सीता जी सुशोभित हैं । वे सुवर्ण के समान उज्ज्वल कान्ति वाली हैं। वे दो भुजा वाली सीता दिव्य अलंकारों से अलंकृत और हाथ में सुन्दर कमल पुष्प लिए हुए हैं। उनके साथ विराजमान श्रीराम सुन्दर और पुष्ट लगते हैं। राम के दक्षिण ओर उनके लघु भ्राता गौरवपूर्ण लक्ष्मण जी खड़े हैं, उनके हाथों में धनुष बाण है। इन तीनों के इस प्रकार प्रतिष्ठित होने से एक सुशोभित त्रिकोण की सृष्टि होती है ॥७-१०॥ तथैव तस्य मन्त्रस्य यस्यानुश्च स्वडेन्तया । एव त्रिकोणरूपं स्यात्तं देवा ये समाययुः ॥११ स्तुतिं चक्रुश्च जगतः पतिं कल्पतरौ स्थितम् । कामरूपाय रामाथ नमो मायामयाय च ॥१२ नमा वेदादिरूपाय ओङ्काराय नमो नमः । रमाधराय रामाय श्रीरामायात्ममूर्तये ॥१३ जानकीदेहभूषाय रक्षोघ्नाय शुभाङ्गिने । भद्राय रघुवीराय दशास्यान्तकरूपिणे ॥१३ रामभद्र महेष्वास रघुवीर नृपोत्तम । भो दशास्यान्तकास्माकं रक्षां देहि श्रियं च ते ॥१५ त्वमैश्वर्यं दापयाथ सप्रत्याश्चरिमारणम् । कुर्विति स्तुत्य देवाद्यास्तेन सार्धं सुखं स्थिताः ॥१६ स्तुवन्त्येवं हि ऋषयस्तदा रावण आसुरः । रामपत्नीं वनस्थां यः स्वनिवृत्त्यर्थमाददे ॥१७ स रावण इति ख्यातो यद्वा रावाच्च रावणः । तन्वाजेनेक्षितुं सीतां रामो लक्ष्मण एव च ॥१८ विचेरतुस्तदा भूमौ देवीं संहृश्च चासुरम् । हृत्वा कबन्धं शबरीं गत्वा तस्याज्ञया तया ॥१९ पूजितो वायुपुत्रेण भक्तेन च कपीश्वरम् । आहूय शंसततां सर्वमाद्यन्तं रामलक्ष्मणौ ॥२०

रामपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३३१ स तु रामे शङ्कितः सन्प्रत्ययार्थं च दुन्दुभेः । विग्रहं दर्शयामास यो रामस्तमचिक्षिपत् ॥२१ सप्त सालान्विभिद्याशु मोदते राघवस्तदा । तेन हृष्टः कपीन्द्रोऽसौ स रामस्तस्य पत्तनम् ॥२२ जगामागर्जदनुजो वालिनो वेगतो गृहात् । तदा वाली निर्जगाम तं बालिनमथाहवे ॥२३ निहत्य राघवो राज्ये सुग्रीवं स्थापयत्ततः । हरीनाहूय सुग्रीवस्त्ववाह चाशाविदोऽधुना ॥२४ राम मंत्र का बीज जैसे 'राम' है, वैसे ही अब उसका शेषांश कहा जाता है। राम शब्द के चतुर्थ्यन्त रूप में नमः मिलने से 'रां रामाय नमः' बनता है। यदि यह षडक्षर मन्त्र सिद्ध हो जाय तो छः कोण बनते हैं। एक समय की बात है—देवगण भगवान राम के दर्शनार्थ पधारे। उस समय श्रीराम कल्पवृक्ष के नीचे एक जटित सिंहासन पर विराजमान थे। देवगण उनके दर्शन कर इस प्रकार स्तवन करने लगे— 'काम रूप से युक्तं माया रूप के धारण करने वाले श्रीराम को नमस्कार है। वेद के आदि रूप ओंकार स्वरूप श्रीराम को नमस्कार है। सीता रूप रमा के धारण करने वाले, नयनाभिराम एवं आत्मा स्वरूप श्रीराम को नमस्कार है। श्रीराम जी का देह ही जिनका अलंकार है और जो राक्षसों के मारने वाले हैं, जो रावण के लिए मृत्यु रूप तथा कल्याणमय विग्रह से युक्त श्रीराम को नमस्कार है। हे नृपोत्तम, हे दशमुख विना- शक, हे महाधनुर्धर श्रीराम हमारी रक्षा करो। हमें अपने से सम्बन्धित श्री से सम्पन्न करो।' 'हे श्रीराम हमको ऐश्वर्य प्राप्त कराओ।' इस प्रकार देवगण उनकी स्तुति करते रहे। जब तक श्रीराम खर नामक राक्षस का संहार करने में लगे, तब तक देवताओं ने और ऋषियों ने भी उनकी

३३२ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् स्तुति की। जब खर और उनके साथी राक्षस मारे गये तब राक्षस-राज रावण ने वन में पहुँचकर श्रीसीता जी का हरण कर लिया। 'वन' से सीता का हरण करने के कारण उस राक्षस को 'रावण' कहा गया क्योंकि राम शब्द से 'रा' और 'वन' से 'वन' लेने पर रावण नाम बन जाता है। अथवा जो दूसरों को रुलावे वह रावण कहा जाता है। एक समय की बात है—रावण ने कैलाश को उठा लिया तब शिवजी ने कैलाश को इतना भारी कर दिया कि वह उसे ही दाबने लगा। तब तो उसने बड़ा भारी रव (शोर) किया, इसी से उसका नाम रावण हुआ। सीता हरण के पश्चात् राम और लक्ष्मण दोनों ही उनकी खोज के निमित्त वन में विचरण करने लगे। तभी उनके सामने कबन्ध नामक एक राक्षस आया, उन्होंने उसे मार डाला और उसके कहने से वे शबरी के आश्रम पर गये। वहाँ शबरी ने उनका अत्यन्त भक्ति-भाव से सत्कार किया। फिर आगे चलने पर वायु पुत्र हनुमान से उनकी भेंट हुई। उन्होंने सुग्रीव को बुलाकर इन दोनों से मेल कराया और मैत्री होने पर राम-लक्ष्मण ने अपना सब हाल उनसे कहा। सुग्रीव ने राम के अधिक पराक्रमी होने में संदेह किया और वाली द्वारा मारे हुए दुंदुभि नामक राक्षस का देह राम को दिखाया। राम ने उस राक्षस के शरीर को बात की बात में बहुत दूर फेंक दिया। और अपने एक बाण से ताड़ के सात वृक्षों को गिरा कर सुग्रीव के संदेह की निवृत्ति की। इससे सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई। इसके पश्चात् श्रीराम सुग्रीव के नगर में पहुँचे। वहाँ सुग्रीव ने घोर गर्जना कर वाली को युद्ध के लिए ललकारा। तब बाली भी घोर गर्जना करता हुआ अपने घर से दौड़ा हुआ आया। उस समय युद्ध में बाली श्रीराम के द्वारा मारा गया और किष्किन्धा की राजगद्दी पर सुग्रीव का अभिषेक हुआ ॥ ११-२४ ॥

रामपूर्वंतापिन्युपनिषत् ] [ ३३३ आदाय मैथिलीमय ददताञ्चाशु गच्छत । ततस्ततार हनुमान्ब्धिं लङ्कां समाययौ ॥२५ सीतां दृष्ट्वाऽसुरान्हत्वा पुरं दग्ध्वा तथा स्वयम् । आगत्य रामेण सह न्यवेदयत् तत्त्वतः ॥२६ तदा रामः क्रोधिरूपी तानाहूयाथ वानरान् । तैः सार्धमादायस्त्राणि पुरीं लंकां समाययौ ॥२७ तां दृष्ट्वा तदधीशेन सार्धं युद्धमकारयत् । घटश्रोत्रसहस्राक्षजिद्भ्यां युक्तं तमाहवे ॥२८ हत्वा विभीषणं तत्र स्थाप्याथ जनकात्मजाम् । आदायाङ्कस्थितां कृत्वा स्वपुरं तैर्जगाम सः ॥२६ ततः सिंहासनस्थः सन् द्विभुजो रघुनन्दनः । धनुर्धरः प्रसन्नात्मा सर्वाभरणभूषितः ॥३० मुद्रां ज्ञानमयीं याम्ये वामे तेजः प्रकाशिनीम् । धृत्वा व्याख्याननिरतश्चिन्मयः परमेश्वरः ॥३१ उदग्दक्षिणयोः स्वस्य शत्रुघ्नभरतौ ततः । हनूमन्तं च श्रोतारमग्रतः स्यान्त्रिकोणगम् ॥३२ भरताधस्तु सुग्रीवं शत्रुघ्नाधो विभीषणम् । पश्चिमे लक्ष्मणं तस्य धृतच्छत्त्रं सचामरम् ॥३३ तदधस्तौ तालवृन्तकरौ त्र्यस्रं पुनर्भवेत् । एवं षट्कोणमादौ स्वदीर्घाङ्गै रेष सयुतः ॥३४ द्वितीयं वासुदेवाद्यैराग्नेयादिषु संयुतः । तृतीय वायुसूनुं च सुग्रीवं भरतं तथा ॥३५ विभीषणं लक्ष्मणं च अङ्गद चारिमर्दनम् । जाम्बवन्तं च र्यु क्तस्ततो धृष्टिर्जयन्तकः ॥३६

३३४ ] [रामपूर्वतापिन्युपनिषत् विजयश्च सुराष्ट्रश्च राष्ट्रवर्धन एव च । अशोको धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चैभिरावृतः ॥३७ ततः सहस्रहग्वह्निर्धर्मज्ञो वरुणोऽनिलः । इन्द्रीशधालनन्ताश्च दशभिश्चैभिरावृतः ॥३८ बहिस्तदायुधैः पूज्यो नीलादिभिरलंकृतः । वसिष्ठवामदेवादिमुनिभिः समुपासितः ॥३९ इसके पश्चात् सुग्रीव ने अपने वानरों को बुलाकर कहा— वीरो ! तुम से कोई दिशा छिपी हुई नहीं है । अतः तुम शीघ्र ही यहाँ से जाकर श्री सीता जी की खोज करो । आज ही लौट कर इसकी सूचना भगवान् श्रीराम को सुनाओ । फिर हनुमान जी समुद्र को लांघकर लङ्का में जा पहुंचे । वहाँ उन्होंने सीताजी को देखा और अनेक राक्षसों को मारकर लंका को जला डाला । फिर वे लौट- कर श्रीराम के समक्ष उपस्थित हुए और उनको सब समाचार सुनाया । उस समय श्रीराम को अत्यन्त क्रोधावेश हुआ और वानरों को साथ लेकर लङ्का की ओर चल पड़े । लंका पर आक्रमण करने के लिए उसका निरीक्षण किया गया और फिर युद्ध छिड़ गया । लङ्कापति रावण का भाई कुम्भकर्ण मारा गया । फिर इन्द्रजीत और रावण भी युद्ध में मारे गये । तब विभीषण को लङ्का का राज्य देकर श्रीराम ने सीता जी को अपने वामाङ्ग में प्रतिष्ठित किया और सब वानरों को साथ लेकर अयोध्या की ओर चल पड़े । भगवान् श्रीराम अयोध्या के राज-सिंहासन पर प्रतिष्ठित हो गये । उन धनुर्धर राम का स्वभाव ही प्रसन्न रहने का है । वे सब प्रकार के अलंकारों से अलंकृत हैं । उनके दक्षिण हाथ में ज्ञानमयी मुद्रा और वाम हाथ में तेज को प्रकाशित करने वाली धनुर्मयी मुद्रा स्थित है । इस प्रकार द्विभुज रूपधारी श्रीराम स्वयं

रामपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३३५ व्याख्यान मुद्रा में स्थित हो रहे हैं। अब श्रीराम के उत्तर भाग में शत्रुघ्न और दक्षिण भाग में भरत हैं। हनुमान जी श्रीराम के सम्मुख करबद्ध खड़े हैं। यह भी त्रिकोण में स्थित हैं। भरत के नीचे की ओर सुग्रीव तथा शत्रुघ्न के नीचे की ओर विभीषण खड़े हुये हैं। श्रीराम के पीछे लक्ष्मण अपने हाथों में छत्र-चँवर लिए हुये बैठे हैं। भरत-शत्रुघ्न के हाथों में ताड़ के पंखे हैं। इस प्रकार लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न एक त्रिकोण का स्थिति में हैं। भगवान श्रीराम अपने बीजमन्त्र वाले दीर्घ अक्षरों के आवरण में घिरे बैठे हैं । भगवान राम के आग्नेय आदि दिशाओं की ओर वासुदेव, संकर्षण, शान्ति, श्री, सरस्वती, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और रति हैं । श्रीराम इनसे युक्त रहते हुये द्वितीय आवरण में घिरे हैं। भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव, अङ्गद, जाम्बवान् और विभीषण जब श्रीराम के साथ होते हैं तब तृतीय आवरण होता है। राष्ट्रवर्द्धन, अकोप, सुराष्ट्र, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुमन्त और धर्मपाल के सहित भी तीसरा आवरण ही सिद्ध होता है । तब ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु, चन्द्रमा, निऋं'ति, अनन्त और ईशान इन दस दिक्पालों से श्रीराम के आवृत होने पर चतुर्थ आवरण बन जाता है। इन दिक्पालों के बाहरी भाग में इनके आयुध रहते हैं। इसी आवरण में नल आदि बानर भगवान् को सुशोभित करते हैं। उनके साथ ही वसिष्ठ और वामदेव आदि महर्षि भी श्रीराम की उपासना में लीन दिखाई देते हैं ॥२५-३६॥ एवमुद्दे शतः प्रोक्तं निर्देशस्तस्य चाधुना । त्रिरेखापुटमालिख्य मध्ये तारद्वयं लिखेत् ॥ ४० तन्मध्ये बीजमालिख्य तदधः साध्यमालिखेत् । द्वितीयान्तं च तस्योर्ध्वं षष्ठ्यन्तं साधकं तथा ॥ ४१

३३६ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत्

कुरु द्वयं च तत्पार्श्वे लिखेद्बीजान्तरे रमाम् । तत्सर्वं प्रणवाभ्यां च वेष्टयेच्छुद्धबुद्धिमान् ॥ ४२ दीर्घभाजि षडस्रे तु लिखेद्बीजं हृदादिभिः । कोणपार्श्वे रमामाये वदग्रेऽनङ्गमालिखेत् ॥ ४३ क्रोधं कोणाग्रान्तरेषु लिख्य मन्त्र्यभितो गिरम् । वृत्तत्रयं साष्टपत्रं सरोजे विलिखेत्स्वरान् ॥ ४४ केसरे चाष्टपत्रे च वर्गाष्टकमथालिखेत् । तेषु मालामनोर्वर्णान्विलिखेदूर्भिसंख्यया ॥ ४५ अन्ते पञ्चाक्षराण्येष्वं पुनरष्टदलं लिखेत् । तेषु नारायणाष्टार्णाँल्लिख्य तत्केसरे रमाम् ॥ ४६ तद्बहिर्द्वादशदलं विलिखेद्द्वादशाक्षरम् । अथोंनमो भगवते बासुदेवाय इत्ययम् ॥ ४७

पूजा यन्त्र का संक्षिप्त वर्णन किया गया । अब उसका निर्देश करते हैं । सम रेखाओं के दो त्रिकोण बनाकर उनके बीच में पृथक्-पृथक् प्रणव लिखे, फिर उन दोनों के मध्य में आद्यबीज लिखे और उसके नीचे जो कार्य सिद्ध करना है, उसका उल्लेख करे । साध्य का नाम द्वितीयान्त हो और आद्यबीज के शीर्ष भाग में साधक का नाम षष्ट्यन्त रहे । फिर बीज के इधर-उधर एक-एक कुरुपद का उल्लेख करे । बीज के मध्य भाग में तथा साध्य के ऊपर श्री लिखे । यह सब इस प्रकार लिखने चाहिये कि वे दोनों प्रणवों में सम्पुटित रहें । तत्पश्चात् छहों कोणों में दीर्घ स्वर वाले मूल बीज को उल्लिखित करे । फिर एक-एक के साथ हृदयाय नमः और शिर से स्वाहा लिखे । कोणों के बगल में श्रीं, ह्रीं, क्लीं लिखे और कोण के अगले भाग में हुम् और हुम् के दोनों ओर ऐं लिखना चाहिये । इसके पश्चात् तीन वृत्त बनाकर वृत्तों के साथ

रामपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३३७ ही आठ दल वाला कमल बनावे । कमल की केसर में दो-दो अक्षर के क्रमपूर्वक सब स्वर वर्णों को लिखना चाहिए । कमल के आठ दलों में छः छः वर्ण के क्रम से उल्लेख करे । माला-मन्त्र के सैंतालीस वर्ण पूरे करने के लिए आठवें दल में पांच वर्ण ही रह जायेंगे । ऊपर बताये ढङ्ग से पुनः एक कमल बनाकर उसकी आठों पंखुड़ियों पर 'ॐ नमो नारायण' मन्त्र के एक-एक अक्षर को लिखे, उसके केसर में श्री लिखे । उसके ऊपर बारह पंखड़ियों का कमल बनाकर उसकी प्रत्येक पंखुड़ी पर द्वादशाक्षर मन्त्र का एक-एक अक्षर लिखना चाहिए ॥४०-४७॥ आदिक्षान्तान्केसरेषु वृत्ताकारेण संलिखेत् । तद्वहिः षोडशदलं लिख्य तत्केसरे ह्रियप्र । वर्मस्त्रिनतिसंयुक्तं दलेषु द्वादशाक्षरम् । तत्सन्धिष्विरजादीनां मन्त्रान्मन्त्री समालिखेत् ॥ ४८ हं सं भ्रं वं लूं श्रं ञं च लिखेत्सम्यक्ततो वहिः । द्वात्रिंशारं महापद्मं नादबिन्दुसमायुतम् ॥ ५० विलिखेन्मन्त्रराजाणांस्तेषु दात्रेषु यत्नतः । ध्यायेदष्टवसूनेकादशरुद्रांश्च तत्र वै ॥ ५१ द्वादशेनांश्च धातारं वषट्कारं च तद्बहिः । भूपृहं वज्रशूलाढ्यं रेखात्रयसमन्वितम् ॥ ५२ द्वारोपेतं च राश्यादिभूषितं फणिसंयुतम् । अनन्तो वासुकिश्चैव तक्षः कर्को पद्मऋः ॥ ५३ महापद्मश्च शङ्खश्च गुलिकोऽष्टौ प्रकीर्त्तिताः । एवं मण्डलमालिख्य तस्य दिक्षु विदिक्षुच ॥ ५४

३३८ ] रामपूर्वतापिन्युपनिषत् नारसिंहं च वाराहं लिखेन्मन्त्रद्वयं तथा । कूटो रेफानुग्रहेन्दुनादशक्त्यादिभिर्युतः ॥ ५५ यो नृसिंहः समाख्यातो ग्रहमारणकर्मणि । अन्त्याङ्गीशवियद्विन्दुनादैर्बीजं च सौकरम् ॥ ५६ हुंकारं चात्र रोमस्य मालामन्त्रोऽधुनेरितः । तारो नतिश्च निद्रायाः स्मृतिर्भेदश्च कामिका ॥ ५७ रुद्रेण संयुता वह्निर्मेधामरविभूषिता । दीर्घक्रूरयुता ह्लादिन्यथो दीर्घसमायुता ॥ ५८ क्षुधा क्रोधिन्यमोघा च विश्वभप्यथ मेधया । युक्ता दीर्घज्वालिनी च सुसूक्ष्मा मृत्युरूपिणी ॥ ५६ सप्रतिष्ठा ह्लादिनी त्वक्श्वेलप्रीतिश्च सामरा । ज्योतिस्तीक्ष्णाग्निसंयुक्ता श्च तानुस्वारसंयुताः ॥ ६० कामिकापञ्चमूलान्तस्तान्तान्तो थान्त इत्यथ । स सानन्तो दीर्घयुतो वायुः सूक्ष्मयुतो विषः ॥ ६१ कामिका कामका रुद्रयुक्ताथोऽथ स्थिरातपा । तापनी दीर्घयुक्ता भूरनलोऽनन्तगोऽनिलः ॥ ६१ नारायणात्मकः कालः प्राणाभो विद्यया युतः । पीतारातिस्तथा लान्तो योन्या युक्तस्ततो नतिः ॥ ६३ सप्तचत्वारिंशद्वर्णगुणान्तः सृङ्मनुः स्वयम् । राज्याभिषिक्तस्य तस्य रामस्योक्तक्रमाल्लिखेत् ॥ ६४ इदं सर्वात्मकं यन्त्रं प्रागुक्तमृषिसेवितम् । सेवकानां मोक्षकरमायुरारोग्यवर्धनम् ॥ ६५

रामपूर्वंतापिन्युपनिषत् ] [ ३३६ अपुत्राणां पुत्रदं च बहुना किमनेन वै । प्राप्नुवन्ति क्षणात्सम्यग्व धर्मादिकानपि ॥ ६६ इदं रहस्यं परममीश्वरेणापि दुर्गमम् । इदं यन्त्रं समाख्यातं न देयं प्राकृते जने ॥ ६७ ॥ इति ॥ बारह पंखुड़ी वाले कमल की केसरों में 'अ' से 'क्ष' तक के वर्ण वृत्ताकार में लिखे । उसके बाहरी भाग में फिर सोलह पंखुड़ियों का कमल बनाकर, केसरों में ह्रीं अङ्कित करे । उसकी सोलह पंखुड़ियों में एक-एक पर एक-एक अक्षर के कम से 'हूं' 'फट्' 'नमः' और द्वादशा- क्षर मन्त्र लिखना चाहिये । पंखुड़ियों की संधियों में हनुमान जैसे वीर पुरुषों के बीज मन्त्र लिखे । उसके बाहरी भाग में नाद बिन्दु से युक्त बत्तीस पंखुड़ियों का एक विशाल कमल बनावे । पंखुड़ियों पर नरसिंह मन्त्रराज के बत्तीस अक्षरों को क्रमपूर्वक लिखे । उन पंखुड़ियों में ही आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य और सबके धारक वषट्कार का न्यास एवं ध्यान करना चाहिये । इस बत्तीस पंखुड़ियों वाले कमल के बाहरी भाग में भूपुर यन्त्र बनावे और उसके चारों ओर वज्र तथा कोणों में शूल अंकित करे । भूपुर को तीन रेखाओं से मिलावे, यह रेखायें सत्य, रज, तमगुणों की सूचक हैं । मण्डप में बने द्वार के समान इसमें भी द्वार बनाना चाहिये । भूपुर में राशि आदि बनाकर भूपुर यन्त्र को शेष भाग से युक्त करना चाहिये । भूपुर यन्त्र-लेखन के पश्चात् उसकी चारों दिशाओं में नरसिंह बीजमन्त्र और कोणों में बारह बीज मन्त्र लिखना चाहिये । अनुग्रह, इन्दु, नाद, शक्ति आदि से युक्ता क्षरों मन्त्र ही नरसिंह बीज मन्त्र हैं । यह मन्त्र शत्रुओं का नाश करने, ग्रह बाधाओं को शान्त करने और इच्छित सिद्धि प्राप्त कराने वाला है । अन्त्य वर्ण, अर्धीश, बिन्दु, नाद

३४० ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् और शक्ति आदि से सम्पन्न 'हुम्' बारह बीज-मन्त्र हैं । अब श्रीराम विषयक माला-मन्त्र को कहेंगे । इसमें प्रथम प्रणव, फिर नमः, निद्रा, स्मृति, मेद और कामिका है जो रुद्र से युक्त है, फिर अमर से अलंकृत अग्नि और मेधा कामिका है जो रुद्र से युक्त है, फिर अमर से अलंकृत अग्नि और मेधा है । फिर अक्रूर से युक्त दीर्घ कला है । फिर ह्लादिनी है और इसके बाद मानदा कला से विभूषित दीर्घ कला है, फिर क्षुधा है । यहाँ तक कि 'ॐ नमो भगवते रघुनन्दनाय' बन गया । इसके पश्चात् क्रोधिनी, अमोघा और मेधा से युक्त विश्व है । फिर दीर्घा है, ज्वालिनी सूक्ष्म से संयुक्त है ; फिर प्रतिष्ठा से युक्त प्रणवकला है । फिर ह्लादिनी और त्वक् है । यहां तक 'रक्षोघ्नविशदाय' की पूर्ति हुई । फिर क्ष्वेल, प्रीति, अमर, ज्योति, अग्नि से युक्त तीक्ष्णा, अनुस्वार से युक्त श्वेता, फिर कामिका, व, द और अनन्त से युक्त न, दीर्घ स्वर युक्त वायु, सूक्ष्म इकार युक्त विष, कामिका, कामिका में रुद्र, स्थिरा और ए की मात्रा युक्त स है । इससे 'मधुरप्रसन्नवदनायामिततेजसे' बन गया । फिर तापिनी, दीर्घ भू, अनिल से 'बलाय' बना । फिर अनन्तग अनल, नारायणात्मक मकार और प्राण से 'रामाय' सिद्ध हुआ, विद्यामय अम्भस्, पीता, रति, ए की मात्रा युक्त व है, इससे विष्णवे बना । अन्त में नमः और प्रणव है । यह संतालीस अक्षरों वाला राज्या- भिषिक्त श्रीराम से सम्बन्धित माला-मन्त्र है । सगुण होते हुए भी यह साधकों के तीनों गुणों को नष्ट करने वाला है । यह मन्त्र पूर्वोक्त क्रम-पूर्वक ही लिखा जाना चाहिये । उपरोक्त मन्त्र सर्वात्मक है । इसे प्राचीन कालीन विद्वानों ने बताया और अनेक ऋषि मुनियों ने इसके द्वारा साधना की है । इसके सेवन करने वाले साधकों को आरोग्य की प्राप्ति तथा आयु वृद्धि होती है और अन्त में वे इस संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं । यह साधन पुत्रहीनों को पुत्र प्राप्त कराने वाला

रामपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३४१ है। धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य आदि सभी अभीष्टों की इससे पूर्ति होती है। इसका साधन करने वाले जन शीघ्र ही अपना इच्छित प्राप्त करते हैं। यह रहस्य अत्यन्त गोपनीय है, परन्तु बिना दीक्षा के अत्यन्त समर्थ विद्वान के लिये भी कठिन है । अनाधिकारी पुरुषों को इसका कभी उपदेश न करे ॥४८-६७॥ ॐ भूतादिकं शोधयेद्द्वारपूजां कृत्वा पद्माद्यासनस्थः प्रसन्नः । अर्चाविद्यावस्य पीठाधरोर्ध्वपार्श्वार्चनं मध्यपद्मार्चनं च ॥ १ कृत्वा मृदुश्लक्ष्णसुतूलिकायां रत्नासने देशिकमर्चयित्वा । शक्तिं चाधारव्यकां कूर्मनागौ पृथिव्यब्जे स्वासनाधः प्रकल्प्य ॥ २ विघ्नेशं दुर्गां क्षेत्रपालं च वाणीं बीजादि कांश्चाग्निदेशादिकांश्च । पीठस्याङ्घ्रिष्वेव धर्मादिकांश्च नत्वा पूर्वाद्यासु दिक्ष्वर्चयेच्च ॥ ३ मध्ये क्रमादर्कविध्वग्नितेजांस्यु- पर्यु पर्यादिमैरर्चितानि । रजः सत्त्व तम एतानि वृत्तत्रयं बीजाढ्यं क्रमाद्भावयेच्च ॥ ४ आशाव्याशास्वप्यथात्मानमन्तरात्मानं वा परमात्मानमन्तः । ज्ञानात्मानं चार्चयेत्तस्य दिक्षु मायाविद्ये ये कलापारतत्वे ॥ ५

३४२ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् संपूजयेद्विमलादींश्च शक्तीरभ्यर्चयेद्देवमावाहयेच्च । अङ्गव्यूहानिलजाद्यैश्च पूज्य धृष्ट्यादिकैर्लोकपालैस्तदस्त्रैः ॥ ६ ॥ वसिष्ठाद्यैर्मुनिभिर्नीलमुख्यैराराधयेद्राघवं चन्दनाद्यैः ॥ मुख्योपहारैर्विविधैश्च पूज्यैस्तस्मै जपादींश्च सम्यक्प्रकल्प्य ॥ ७ ॥ एवंभूतं जगदाधारभूतं रामं वन्दे सच्चिदानन्दरूपम् । गदारिशङ्खाब्जधरं भवारिं स योध्यायेन्मोक्षमाप्नोति सर्वंः ॥ ८ ॥ विश्वव्यापी राघवो यस्तदानीमन्तर्दधे शंखचक्रे गदाब्जे । धृत्वा रमासहितः सानुजश्च सपत्तनः सामुगः सर्वलोकी ॥ ९ तद्भक्ता ये लब्धकामांश्च भुक्त्वा तथा पदं परमं यान्ति ते च । इमा ऋचः सर्वकामार्थदाश्च ये ते पठन्त्यमला यान्ति मोक्षम् ॥ १० इति पंचमोपनिषत् । चिन्मयेऽस्मिंस्त्रयोदश । स्वभूर्ज्योति- स्तिस्त्रः । सीतारामावेका । जीववाची षट्षष्टिः । भूतादिकमेका- दश । पंचखण्डेषु त्रिनवतिः ॥ इति ॥ द्वारपूजा करके पद्मासन या अन्य आसन लगावे और पंचभूत की शुद्धि करे। श्रीराम की पूजा-विधि में सिंहासन की पीठ की निचला

रामपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३४३ भाग, ऊपर का भाग, अगल-बगल भी पूजन किया जाता है। पीठ के ऊपर बीच में स्थित आठ दल वाले कमल को भी पूजे । रत्न जटिट सिंहासन पर कोमल और चिकनी गद्दी की भावना कर उस पर ईश्वर रूप आचार्य की पूजा करे । पीठ के निचले भाग में, उपास्यदेव के आसन के नीचे आश्रयशक्ति, कूर्म, नाग और पृथ्वीयुक्त दो कमलों की भावना कर, उन सब का पूजन करे । विघ्न, दुर्गा, क्षेत्रपाल और वाणी के साथ आदि में बीज लगाकर नाम के साथ चतुर्थी विभक्ति लगाकर पूजा करे । फिर पीठ के पायों में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का अग्नि कोण आदि में पूजन कर अधर्म, अनर्थ, अकाम और अमोक्ष को भी पूर्वादि दिशाओं में पूजे । फिर पीठ के ऊपर के मध्य भाग में सूर्य, चन्द्र, अग्नि का पूजन करे । यन्त्र स्थित सत्व, रज तम के प्रतीक बीज सहित तीन वृत्तों का भी चिन्तन एवं पूजन करे । फिर दिशाओं और कोणों में बने हुये कमल के आठ दलों का पूजन करे । इनमें जो दल मध्य स्थित दिशा में है, उनमें आग्नेयकोण से क्रमशः आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा की पूजा करे । पूर्वादि दिशाओं में माया, विद्या, कला और पर इन तत्वों को पूजे । फिर विमला आदि शक्तियों को पूजे । फिर मुख्य देवता का आह्वान और अर्चन करे । फिर अङ्गव्यूहों का पूजन करे और धृष्टि आदि लोकपाल और उनके अस्त्र, वशिष्ठ आदि मुनि फिर नील आदि के साथ चन्दन आदि विभिन्न लेपनों और अलंकारों आदि के द्वारा श्रीराम का पूजन कर जप आदि समर्पित करे । "संसार के आश्रयभूत, गदा, चक्र, शंख, पद्मधारी भव-बन्ध के काटने वाले सच्चिदानन्द स्वरूप और अत्यन्त महिमावान हैं उन परमेश्वर श्रीराम को मैं नमस्कार करता हूँ।" इस प्रकार उनकी स्तुति करे । जो उपासक ऐसा करते हैं, वे मोक्ष को अवश्य प्राप्त करते हैं ।

३४४ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् लीला-संवरण-काल में ही श्रीराम देह सहित अन्तर्ध्यान हो गए । उनके आयुध भी साथ ही अन्तर्ध्यान हो गये। वे अपने स्वाभाविक रूप को धारण कर सीता सहित परमधाम में पहुँच गये । उनके साथ ही उनका सब परिवार, प्रजाजन, विभीषण आदि भी परमधाम में गए। उनके भक्त इच्छित भोगों को प्राप्त करते हैं और उनका उपभोग कर अन्त में परमपद प्राप्त करते हैं। यह ऋचायें सम्पूर्ण अभीष्टों और अर्थों की देने वाली हैं। इनका पाठ करने वाले भक्तजन पवित्र अन्तःकरण वाले होकर मोक्ष को प्राप्त होते हैं ॥ १-१० ॥ ॥ रामपूर्वतापिन्युपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्तिः नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्ति पाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़ देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । हरिः ॐ सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकर्मणे । नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे ॥ मुनयो ह वै ब्राह्मणमूचुः । कः परमो देवः । कुतो मृत्यु- र्बिभेति । कस्य विज्ञानेनाखिलं विज्ञातं भवति । केनेदं विश्वं संसरतीति । तदुहोवाच ब्राह्मणः । कृष्णो वै परमं दैवतम् । गोविन्दान्मृत्युर्बिभेति । गोपीजनवल्लभज्ञानेनैतद्विज्ञातं भवति । स्वाहेदं विश्वं संसरतीति । तदुहोचुः । कः कृष्णः । गोविन्दश्च कोऽसाविति । गोपीजनवल्लभश्च कः । का स्वाहेति । तानुवाच ब्राह्मणः । पापकषर्णो गोभूमिवेदवेदितो गोपीजनविद्याकलाप- Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

३४६ ] [ गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् प्रेरकः । तन्माया चेति सकलं परं ब्रह्मैव तत् । यो ध्यायति रसति भजति सोऽमृतो भवतीति । ते होचुः । किं तद्रूपं किं रसनं किमाहो तद्भजनं तत्सर्वं विविदिषतामाख्याहीति । तदुहोवाच हैरण्यो गोपवेषमभ्रामं कल्पद्रुमाश्रितम् । तदिह श्लोका भवन्ति ॥ सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम् । द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं वनमालिनमीश्वरम् ॥ १ ॥ गोपगोपीगवावीतं सुरद्रुमतलाश्रि- तम् । दिव्यालंकरणोपेतं रत्नपङ्कजमध्यगम् ॥ २ ॥ कालिन्दी- जलकल्लोलसङ्गिमारुतसेवितम् । चिन्तयञ्चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृतेः ॥ ३ ॥ सच्चिदानन्द स्वरूप परमेश्वर श्रीकृष्ण के नाम में 'कृष' शब्द सत्ता-वाचक और 'न' शब्द आनन्दबोधक है । यह सच्चिदानन्द स्वरूप श्रीकृष्ण अनायास ही सब कुछ कर सकने में समर्थ हैं, सब की बुद्धि के साक्षी और सब के जानने योग्य है । वे सम्पूर्ण विश्व के गुरु हैं । उनके लिये नमस्कार हो । एक समय मुनियों ने ब्रह्माजी से प्रश्न किया कि "भगवन् ! कौन देवता सर्वश्रेष्ठ है ? मृत्यु किससे भय मानती है ? किसके तत्त्व को भले प्रकार जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है ? यह जगत किसकी प्रेरणा से आवागमन के चक्र में घूमता है ?" ब्रह्माजी ने मुनियों को उत्तर दिया—"'सर्वश्रेष्ठ देवता श्रीकृष्ण हैं, वही गोविन्द हैं, उनसे मृत्यु भी भयभीत रहती है । उन गोपीजन- वल्लभ के तत्व को जो कोई जान लेता है, उसे अनजाना कुछ नहीं रहता । स्वाहा रूप माया की प्रेरणा से यह सम्पूर्ण जगत आवागमन के चक्र में पड़ा घूम रहा है ।"