१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
लिंगियों की शुद्ध सिद्धि नहीं हुआ करती। प्राणलिंगियों में जंगम श्रेष्ठों में पूज्य, तपस्वियों में शिवभक्त चाण्डाल भी श्रेष्ठ प्राणलिङ्गी है । इसलिये प्राणलिङ्गी श्रेष्ठ कहा जाता है, जो इस तथ्य को जानता है वह शिव ही है, जो रुद्र है, प्राणलिङ्गी है दूसरा कोई नहीं । ॐ आत्मा परिशिवद्वयो गुरुः शिवः । गुरूणां सर्वविश्व- मिदं विश्वमन्त्रेण धार्यम् । देवाधीन जगदिदम् । तद्देवं तन्म- न्त्रात् तनुते । तन्मे दैवं गुरुरिति । गुरूणां सर्वज्ञानिनां गुरुणा दद्यमेतदन्नं परब्रह्म । ब्रह्म स्वानुभूतिः । गुरुः शिवो देवः । गुरुः शिव एव लिङ्गम् । उभयोर्मिश्रप्रकात्वात् । प्राणतत्त्वात् महेश्वरत्वाच्च शिवस्तद्देव गुरुः । यत्र गुरुस्तत्र शिवः । शिवगुरु- स्वरूपो महेश्वरः । भ्रमरकीटकार्येण दीक्षिताः शिवयोगिनः शिवपूजापथे गुरुपूजाविधौ च महेश्वरपूजनान्मुक्ताः । लिङ्गाभि- षेकं निर्माल्यं गुरोरभिषेकतीर्थं महेश्वरपादोदकं जन्ममालिन्यं क्षालयन्ति । तेषां प्रीतिः शिवप्रीतिः । तेषां तृप्तिः शिवतृप्तिः । तैश्च पावनो वासः । तेष निरसनं शिवनिरसनम् । आनन्द- परायणः । तस्माच्छिवं व्रजन्तु । गुरुं व्रजन्तु । इत्येव पावनम् । ये आत्मा ब्रह्म तथा शिवमय है, गुरु है, शिवरूप है। गुरुओं को ये सारा विश्व विश्वमन्त्र से धारण करना चाहिये (मन्त्रों के प्रचार प्रसार से विश्व की स्थिति ठीक रखनी चाहिए) ये संसार दैवाधीन है । वह दैव उन मन्त्रों से प्रसारित होता है । वह दैव ही मेरा गुरु है । गुरुओं तथा सर्वज्ञों के गुरु द्वारा किया यह अन्न परब्रह्म रूप है (उपदेश) ब्रह्म अपने ही अनुभव से जाना जा सकता है। देव शिव ही गुरु है । गुरु शिव ही लिङ्ग रूप है। (निराकार ब्रह्म के चिन्ह हैं) दोनों के सम्मिलित प्रकाशित होने के कारण प्राणवान तथा महेश्वर होने के कारण शिव ही परम गुरु हैं। जहां गुरु है वहाँ शिव है शिव तथा गुरु स्वरूप ही वह महेश्वर है। भ्रमर-कीट सिद्धान्त के द्वारा (प्रसिद्ध है कि
भृङ्गी नामक कीड़ा अन्य कीड़ों को पकड़कर जब अपने घर में बन्द कर देता है तब वह कीड़ा य के कारण निरन्तर उस भृङ्गी को ध्यान करने के कारण भृङ्गी जैसा ही बन जाता है)। ठीक इसी प्रकार निरंतर शिव का ध्यान करने वाले शिवयोगी शिव पूजा के मार्ग में तथा गुरु पूजा की विधि में निरंतर एक चित्त होने के कारण महेश्वर के पूजन से मुक्त हो जाते हैं । शिव लिङ्ग का अभिषेक करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । गुरु के अभिषेक से तथा महेश्वर के चरणामृत से जन्मों के पाप धुल जाया करते हैं । इन सब में प्रेम करना ही शिव से प्रेम करना है । इसकी तृप्ति ही शिवतृप्ति है, इनके समीप रहना ही (चिन्तनादि के द्वारा भी) परम पवित्र वास है । उनका निरसन शिव निरसन ही है । इस प्रकार का ज्ञानी हमेशा आनंदयुक्त रहा करता है । अतः शिव की शरण लेनी चाहिए । गुरु की शरण लेनी चाहिए । ॥ रुद्रोपनिषद् समाप्त ॥
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कालाग्निरुद्रोपनिषत्
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । यह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, हम दोनों किसी का द्वेष न करें ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्ति । अथ कालाग्निरुद्रोपनिषत् संवर्तकोऽग्निरृषिरनुष्टुप् छन्दः श्रीकालाग्निरुद्रोप देवता श्रीकालाग्निरुद्रप्रीत्यथ जपे विनियोगः।१ अथ कालाग्निरुद्रं भगवन्तं सनत्कुमारः पप्रच्छ अधोहि भगवंस्त्रिपुण्ड्रविधि सतत्त्वं कि द्रव्यं कियत् स्थानं कति प्रमाणं का रेखाः के मन्त्राः का शक्तिः कि दैवतं कः कर्त्ता कि फलमिति च ॥३॥ तं होवाच भगवान् कालाग्निरुद्रः । यद्द्रव्यं तदाग्नेयं भस्य सद्योजातादिपञ्चब्रह्ममन्त्रैः परिगृह्याग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म खमिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्मत्येनेनाभि- मन्त्र्य मानस्तोके तनय इति समुद्धृत्य मा नो महान्तमिति जलेन संसृज्य त्रियायुषं जमदग्नेरिति शिरोललाटवक्षः स्कन्धेषु त्रियायु- षैस्त्र्यम्बकैस्त्रिशक्तिभिस्तिर्यक् तिस्रो रेखाः प्रकुर्वीत व्रतमेतच्छा- म्भवं सर्वेषु वेदवादिभिरुक्तं भवति तस्मात् समाचरेन्मुमु- क्षुर्न पुनर्भावाय ॥३॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
कालाग्निरुद्रोपनिषत् ] [ ४२३ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ॐ किसी समय सनत्कुमार ने भगवान् ने कालाग्निरुद्रा से पूछा- “हे भगवन् ! त्रिपुण्ड की विधि तत्व सहित मुझे समझाइये कि वह क्या है, उसका स्थान कौन-सा है, उसका प्रमाण (आकार) कितना है, कितनी रेखाएँ हैं, कौन-सा मन्त्र है, उसकी शक्ति क्या है, कौन देवता है, कौन कर्ता है और उसका फल क्या होता है ?” यह सुनकर कालाग्नि रुद्र कहने लगे—त्रिपुण्ड का द्रव्य अग्निहोत्र की भस्म ही है, इस भस्म को, ‘सद्यो जातादि' पांच मन्त्र पढ़कर ग्रहण करना चाहिये—अर्थात् 'अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलामिति भस्म, स्थलमिति भस्म' व्योमेति भस्म' इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे, 'मान-स्तोक' मन्त्र से अँगुली पर ले और 'मा नो महान्' मन्त्र से जल लेकर 'त्रियायुष' इस मन्त्र से शिर ललाट, वक्ष और कन्धे पर और त्रियायुष तथा त्र्यंबक मन्त्र से तीन रेखाएँ करना । इसका नाम शाम्भव व्रत कहा गया है। इस व्रत का कथन वेदवेत्ताओं ने सर्व देवताओं में किया है । जो मुमुक्ष यह इच्छा रखते हैं कि उनको पुन- र्जन्म ग्रहण न करना पड़े वे इसे धारण करें ॥ १--३ ॥ अथ सनत्कुमारः प्रमाणस्य पप्रच्छ त्रिपुण्ड्राधारणस्य ।४। त्रिधा रेखा आललाटादाचक्षुषोरामूर्ध्नोराभ्रुवोर्मध्यतश्च ।५। याऽस्य प्रथमा रेखा सा गार्हपत्यश्चाकारो रजः स्वात्मा क्रियाशक्तिर्ऋग्वेदः प्रातः सवनं महेश्वरो देवतेति ।६। याऽस्य द्वितीया रेखा सा दक्षिणाग्निरुकारः सत्त्वमन्तरात्मा केच्छाशक्तिर्यजुर्वेदो माध्यंदिनं सवनं सदाशिवो देवतेति ।७। याऽस्य तृतीया रेखा साऽऽहवनीयो मकार स्तमः परमात्मा ज्ञानशक्तिः सामवेदस्तृतीयसवनं महादेवो देवतेति ।८। त्रिपुण्ड्रविधिं भस्मना करोति यो विद्वान् ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो यतिर्वा स महापातकोपपातकेभ्यः पूतो भवति स सर्वेषु Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४२४ ] [ कालाग्निरुद्रोपनिषत् तीर्थेषु स्नातो भवति स सर्वान् वेदानधीतो भवति स सर्वान् देवान् ज्ञातो भवति स सततं सकलरुद्रमन्त्रजापी भवति स सकलभोगान् भुङ्क्ते देहं त्यक्त्वा शिवसायुज्यमेति न स पुनरावर्तते न स पुनरावर्तत इत्याह भगवान् कालाग्निरुद्रः ।६। यस्त्वेतद्ब्राह्मधीते सोऽप्येवमेव भवतीत्यों सत्यमित्युपनिषत् ।१०। इतना सुनकर सनत्कुमार ने प्रश्न किया कि त्रिपुण्ड की तीन रेखायें करने का क्या कारण है ? उत्तर मिला कि 'तीन रेखाओं में से प्रथम रेखा तो गार्हपत्य, अग्निरूप 'अ' कार रूप, रजोगुणरूप, भूलोक रूप, स्वात्मकरूप, क्रियाशक्तिरूप. ऋग्वेद रूप, प्रातः सवनरूप और महेश्वर देव के रूप की है । दूसरी रेखा दक्षिणाग्निरूप, 'उ'कार रूप, स्वत्वरूप, अन्तरिक्ष रूप, अन्तरात्मारूप, इच्छाशक्तिरूप, यजुर्वेदरूप, माध्यंदिन सवनरूप और सदाशिव के रूप की है। तीसरी रेखा आहवनीयरूप, 'म'काररूप, तमरूप, द्यौ लोकरूप, परमात्मारूप, ज्ञानशक्ति रूप, सामवेद रूप तृतीय सवनरूप और महादेवरूप की है । इस प्रकार की त्रिपुण्ड की विधि से जो कोई ब्रह्मचारी गृहस्थ, वनप्रस्थी अथवा संन्यासी भस्म को धारण करता है तो वह महापातकों और उपपातकों से छूट जाता है ! वह सब तीर्थों में स्नान करने के समान पवित्र हो जाता है, उसको समस्त वेदों का अध्ययन हो जाता है । सब देवताओं का वह ज्ञाता हो जाता है और सब रुद्र मन्त्रों के जाप के फल को प्राप्त करने वाला होता है । वह सब प्रकार के भोगों को भोगकर शिवलोक को प्राप्त होता है । वह फिर जन्म नहीं लेता । इस प्रकार भगवान कालाग्नि रुद्र ने कहा । जो इसका अध्ययन करता है वह भी उसी के समान हो जाता है ऐसा यह उपनिषद् है ॥४-१०॥ ॥ कालाग्निरुद्रोपनिषत् समाप्त ॥
प्रथमः खण्डः
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नीलरुद्रोपनिषत्
प्रथमः खण्डः
अपश्य त्वावरोहन्तं दिदितः पृथिवीमवः । अपश्यं युद्रमस्यन्तं नीलग्रीवं शिखण्डिनम् ॥ दिव उग्रोऽवारुक्षत् प्रत्यस्थाद्भूभ्यामधि । जनासः पश्यतेमं नीलग्रीवं विलोहितम् ॥ एष एत्यवीरहा रुद्रो जलासभेषजीः । वित्तेऽक्षेममनीनशद्धातीकारोऽप्येतु ते ॥ नमस्ते भवभामाय नमस्ते भवमन्यवे । नमस्ते अस्तु बाहुभ्यामुतो त इषवे नमः ॥ यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यास्तवे । शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिँँसीः पुरुषं जगत् ॥ शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छा वदामसि । यथा नः सर्वमिज्जगदयक्ष्मं सुमना असत् ॥ या त इषुः शिवतमा शिवं बभूव ते धनुः । शिवा शरव्या या तब तया नो मृड जीवसे ॥ या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी । तया नस्तन्वा शांतमया गिरिशन्ताभिचाकशीत् ॥ असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुर्विलोहितः । ये चेमे रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशोऽवैषांहेड ईमहे ॥१॥ हे नीलकण्ठ ! अपने दिव्य धाम से भूमण्डल पर अवतीर्ण होते हुए हमने आप को देखा । अपने उग्र रुद्र रूप से मोरपंख के समान Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४२६ ] [ नीलरुद्रोपनिषत् आकाश को अपना मुकुट बनाये हुए आप पृथिवी पर अविर्भूत होकर पृथिवी में ही प्रतिष्ठित होते हुए दुष्टों का संहार करते हुए हम आपको देखते हैं । मनुष्यों ! इन भगवान् नीलकण्ठ का अत्यन्त रक्तवर्ण है, इनका दर्शन करो। यही भगवान् रुद्र हैं जो जल में उत्पन्न ओषधियों में निहित होकर रोग रूप पापों को नष्ट करते हैं। यह प्राणियों के लिए प्राण रूप हैं। अमङ्गल को नष्ट करने के लिए और अप्राप्त कामनाओं को पूर्ण के लिए वे तुम्हारे निकट पधारें। हे भगवान् रुद्र ! आपके क्रोध रूप को हमारा नमस्कार ! हे भगवान् भव ! आपके क्रोधावेश रूप को नमस्कार । हे भगवान् नील- कण्ठ ! आपकी दोनों भुजाओं और उनमें ग्रहण किए हुए बाणों को भी नमस्कार । हे कैलाश निवासी शिव ! आप पर्वत पर निवास करते हुए भी सबका कल्याण करते हो । आपने अपने जिस बाण का, दुष्टों को लक्ष्य बनाने के लिए संधान किया है, उस बाण को हमारे लिए कल्याण करने वाला कीजिए। उसके द्वारा हमारे जनों का संहार मत करना । हे कैलाशवासी शिव ! हम अपनी मङ्गलमयी वाणी के द्वारा आपके अत्यन्त निर्मल यश का गान करते हैं। क्योंकि ऐसा करने से यह सम्पूर्ण विश्व हमारे अनुकूल होकर दुःख से शून्य हो जायगा । आपके बाण कल्याणकारी हैं। आपका धनुष और उसकी प्रत्यञ्चा भी कल्याण के करने वाली है। हे कल्याणस्वरूप ! अपने इन आयुधों के द्वारा आप हमें जीवन देते हैं । हे भगवान् रुद्र ! आप पर्वत पर निवास करते हुए भी सबका मङ्गल करते हैं। आपका जो पापनाशक स्वरूप है, उसके द्वारा हमें सब ओर से प्रकाश दीजिए। आपके लाल, अत्यन्त लाल, भूरा तथा ताम्रवर्ण वाले विभिन्न स्वरूप हैं, उन सबकी स्तुति के लिए हम अभिलाषा करते हैं ॥ १ ॥
द्वितीयः खण्डः
नीलरुद्रोपनिषत् ] [ ४२७ द्वितीयः खण्डः अपश्यं त्वावरोहन्तं नीलग्रीवं विलोहितम्। उत त्वा गोपा अदृशन्नुत त्वोदहार्यः॥ उत त्वा विश्वा भूतानि तस्मै दृष्टाय ते नमः। नमो अस्तु नीलशिखण्डाय सहस्राक्षाय वाजिने ॥ अथो ये अस्य सत्त्वानस्तेभ्योऽहमकरं नमः। नमांसि त आयुधायानातताय धृष्णवे ॥ उभाभ्यामकरं नमो बाहुभ्यां तव धन्वने। प्रमुञ्च धन्वनस्त्वमुभयोरार्त्रियोर्ज्याम् ॥ या श्च ते हस्त इषवः परा ता भगवो वप। अवतत्य धनुस्त्वँ सहस्राक्ष शतेषुधे ॥ निशीर्य शल्यानां मुखा शिवो नः शंभुराभर। विजय धनुः शिखण्डिनो विशल्यो बाणबाँ उत ॥ अनेशन्नस्येषव आभुरस्य निषङ्गथिः। परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः॥ अथो य इषुधिस्तवारे अस्मिन्निधेहि तम्। या ते हेतिर्मीढुष्टम् हस्ते बभूव ते धनुः॥ तया त्वं विश्वतो अस्मानयक्ष्मया परिब्भुज। नमो अस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु ॥ ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः। ये वाभिरोचने दिवि ये च सूर्यस्य रश्मिषु ॥ येषामप्सु सदस्कृतं तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः। या इषवो यातुधानानां ये वा वनस्पतीनाम्। ये वाऽवटेषु शेरते तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः ॥२
४२८ ] [ नीलरुद्रोपनिषद् हे अधिक लाल वर्ण वाले नीलकण्ठेश्वर ! हमने आपको पृथिवी पर अवतीर्ण होते हुए देखा है। आपकी उस अवतार रूप अवस्था के देखने वाले गोप और गोपियां हैं। आपका स्वरूप गोपियों के लिए भी दिखाई देना कठिन है, परन्तु उसके अवतीर्ण होने पर विश्व के सभी प्राणियों ने दर्शन किये। आपके उस कृष्णस्वरूप को हमारा नमस्कार। हे मोरमुकुट धारी प्रभो ! हम आपको नमस्कार करते हैं। आप ही महान् शक्ति वाले इन्द्र हैं। अपने भक्तों के समक्ष आप सहस्राक्ष विराट् रूप में भी दर्शन देते हैं। आपके इस रूप के जो सहचर, बाल-गोपाल गोपिकाएं आदि हैं, वे भी हमारे नमस्कार के पात्र हैं। हे प्रभो ! आपके अत्यन्त शक्तिशाली उन आयुधों को भी अने- कानेक नमस्कार हैं, जो इस समय शान्त रूप में स्थित हैं। मैं आपके धनुष को करबद्ध प्रणाम करता हूँ। अब आप अपने धनुष की प्रत्यंचा को शत्रु के लिए भी प्रयुक्त मत कीजिये। आप अपने बाण को हाथ से उतार कर तूणीरस्थ करके अपने परम कल्याणमय एवं सौम्य शिव रूप का मुझे दर्शन करावें। हे सहस्राक्ष ! आप सौ-सौ बाणों का एक साथ संधान करने वाले हैं। आप अपने बाणों के मुखों को तीक्ष्ण कर हमारे कल्याणार्थ उन्हें धनुष पर चढ़ावें। शत्रु-नाश के पश्चात् आपके धनुष से प्रत्यंचार उतर जाय और आपके बाण संताप देना त्याग कर शान्तिपूर्वक तूणीर में निवास करें। वे पर्वतों को चूर्ण कर देने वाले बाण कल्याणकारी हो जांय। आपका शर-संधान हमारी चारों ओर से रक्षा करें। रक्षा करने के पश्चात् उस बाण को आप तूणीर में स्थित कर दें। हे कृपा-वर्षक प्रभो ! आप अपने अमोघ बाण और धनुष के द्वारा चारों ओर से हमारे रक्षक हों। जो सर्प पृथिवी पर वास करते हैं, उन्हें हमारा नमस्कार। आकाश और स्वर्ग में रहने वाले सर्पों को भी नमस्कार सूर्य की रश्मियों, प्रकाश-
तृतीयः खण्डः
नीलरुद्रोपनिषत् [ ४२६ ] मय लोकों और जलों में निवास करने वाले सब सर्पों को नमस्कार । जो सर्प राक्षसों के बाण रूप हैं, गड्ढों में रहते हैं तथा वनस्पतियों में निवास करते हैं, उन सर्पों को नमस्कार ॥ २ ॥ तृतीयः खण्डः यः स्वजनाञ्छीलग्रीवो वः स्वजनान्हरिः । कल्माषपुच्छमोषधे जम्भयोताश्वरुन्धति ॥ वभ्रुश्च बभ्रु कर्णश्च नीलग्रीवश्च यः शिवः । शर्वेण नीलकण्ठेन भवेन मरुतां पिता ॥ विरूपाक्षेण बभ्रु णा वाचं वदिष्यतो हतः । शर्वं नीलशिखण्ड वीर कर्मणि कर्मणि ॥ इमामस्य प्राशं जहि येनेदं विभजामहे । नमो भवाय । नमश्शर्वाय । नमः कुमाराय शत्रवे । नमः सभाप्रपादिने । यस्याश्वतरौ द्विसरौ गर्दभावभितस्सरौ । तस्मै नीलशिखण्डाय नमः । नीलशिखण्डाय नमः ॥ ३ ॥ हे औषधियो ! जो भगवान् शिव विश्व के कल्याण के लिए विष- पान कर नीलकण्ठ हो जाते हैं, तथा जो अपने भक्तों का मङ्गल करने के लिए हरि रूप धारण करते हैं, उन कली पूँछ वाले केदारेश्वर प्रभु के लिए अमोघ शक्ति वाली होकर उन्हें सन्तुष्ट करो । भगवान् शिव पिंगलवर्ण देह और कानों वाले हैं, वही नीलकण्ठ वाले सर्व स्वरूप और सर्व व्यापक हैं । उन्हीं विरूपाक्ष भव के द्वारा वाणी के जनक और देवताओं का ही नहीं सम्पूर्ण प्राणियों के पिता ब्रह्माजी का संहार हुआ । प्रत्येक कर्म में उन्हें ही व्यापक रूप से देखो और उनके सम्बन्ध में शङ्का का परित्याग करो । इस विश्व को जिस शङ्का द्वारा हम उनसे पृथक मान लेते हैं, वह शंका सर्वथा त्याज्य है ।
४३० ] [ नीलरुद्रोपनिषत् संसार के कारण भव को नमस्कार, संहार करने वाले रुद्र को नमस्कार, संसार के संहारक भगवान् शंकर को नमस्कार, नीलमुकुट धारी और काले सींग वाले केदारेश्वर को नमस्कार । दक्ष के यहां मण्डप को सुशोभित करने वाले कुमार रूप शिव को नमस्कार । जिन नीलशिखण्डधारी से अश्व, खच्चर, गर्दभ आदि-आदि की उत्पत्ति हुई, उनको नमस्कार । सभा मण्डप को सुशोभित करने वाले शिव रूप ईश्वर को बारम्बार नमस्कार ॥ ३ ॥ ॥ नीलरुद्रोपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—
रुद्रहृदयोपनिषत्
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, हम दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शांति, शांति, शांति । हरि ॐ हृदयं कुण्डली भस्म रुद्राक्ष गण दर्शनम् । तारसारं महावाक्यं पञ्च ब्रह्माग्निहोत्रकम् ॥ प्रणम्य शिरसा पादौ शुको व्यासमुवाच ह । को देवः सर्वदेवेषु कस्मिन् देवाश्च सर्वशः ॥१ कस्य शुश्रूषणान्नित्यं प्रीता देवा भवन्ति मे । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच पिता शुकम् ॥२ सर्वदेवात्मको रुद्रः सर्वे देवाः शिवात्मकाः । रुद्रस्य दक्षिणे पार्श्वे रविर्ब्रह्मा त्रयोऽग्नयः ॥३ वामपार्श्वे उमादेवी विष्णुः सोमोऽपि ते त्रयः । या उमा सा स्वयं विष्णुर्यो विष्णुः स हि चन्द्रमाः ॥४ ये नमस्यन्ति गोविन्दं ते नमस्यन्ति शंकरम् । येऽर्चयन्ति हरिं भक्त्या तेऽर्चयन्ति वृषध्वजम् ॥५ प्रणव के मूल तत्व को कहने वाले रुद्रहृदय, योग-कुण्डली, भस्म जाबाल, रुद्राक्ष जाबाल और गणपति यह पाँच उपनिषद् हैं। इन्हें ब्रह्म-
४३२ ] [ रुद्रहृदयोपनिषत् ज्ञान से सम्बन्धित अग्निहोत्र के पञ्च महामन्त्र कहा गया है तथा यही श्रुति के पंच महावाक्य माने गए हैं । एक बार श्री शुकदेवजी ने अपने पिता महाज्ञानी व्यासजी महा- राज के चरणों में शीश झुकाकर निवेदन किया—'प्रभो ! सब वेदों ने किस देव का प्रतिपादन किया है और समस्त देवताओं का वास किस देव में है, यह कृपा कर मेरे प्रति कहिये और यह भी बताइये किस देवता की उपासना करने से सभी देवता मुझ पर प्रसन्न होंगे ?' ऐसा प्रश्न सुनकर तत्वज्ञानी व्यासजी ने कहा—हे पुत्र ! भगवान् रुद्र में सब देवता निवास करते हैं । रुद्र भगवान् के दक्षिण पार्श्व में सूर्य, ब्रह्मा एवं गार्ह- पत्य, दक्षिणादि तीनों अग्नियों की स्थिति है । वाम पार्श्व में उमा, विष्णु और सोम स्थित हैं । इन तीनों में भी कोई भेद नहीं है । क्योंकि उमा ही विष्णु भगवान् हैं और विष्णु ही सोम हैं । जो गोविन्द को नमस्कार करते हैं, उनका नमस्कार भगवान् शंकर को स्वयं ही पहुँच जाता है । जो भक्त भगवान् विष्णु की पूजा करते हैं वे मानों वृषभध्वज की ही पूजा करते हैं ॥ १—५ ॥ ये द्विषन्ति विरूपाक्षं ते द्विषन्ति जनार्दनम् । ये रुद्रं नाभिजानन्ति ते न जानन्ति केशवम् ॥६ रुद्रात् प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दनः । यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्म यो ब्रह्मा स हुताशनः ॥७ ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत् । पुंलिङ्गं सर्वमीशानं स्त्रीलिङ्गं भगवत्युमा ॥८ उमारुद्रात्मिकाः सर्वाः प्रजाः स्थावरजङ्गमाः । व्यक्तं सर्वमुमारूपमव्यक्तं तु महेश्वरम् ॥९ उमाशंकरयोर्योगः य योगो विष्णुरुच्यते । यस्तु तस्मै नमस्कारं कुर्याद्भक्तिसमन्वितः ॥१०
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri रुद्रहृदयोपनिषत् [ ४३३ जो भगवान् आशुतोष से द्वेष करने वाले हैं, वे जनार्दन प्रभु के प्रिय कभी नहीं हो सकते। जो रुद्र के ज्ञाता नहीं हैं, वे केशव के भी ज्ञाता नहीं हो सकते। क्योंकि रुद्र ही जीव के उत्पन्नकर्त्ता हैं और बीज की योनि रूप भगवान् विष्णु है। रुद्र ही ब्रह्मा है, ब्रह्मा ही अग्नि हैं। रुद्र ही ब्रह्मा और विष्णु रूप हैं। यह अग्नि और सोम से सम्बन्धित विश्व भी रुद्र ही है। सृष्टि में जितने प्राणी पुंल्लिंग रूप से हैं, वे सभी रुद्र हैं तथा स्त्रीलिंगात्मक समस्त देहधारी हैं वे उमा हैं। इस प्रकार जङ्गम रूप यह सम्पूर्ण सृष्टि रुद्र और उमा रूप है। अव्यक्त ससार रुद्र का रूप और व्यक्त ससार भगवती का उमा रूप है। उमा और शङ्कर दोनों के मिलने से विष्णु कहे जाते हैं। जो विष्णु को नमस्कार करते हैं वे त्रिविधात्मा के ज्ञाता होकर परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं ॥६-१०॥ आत्मानं परमात्मानमन्तरात्मानमेव च । ज्ञाता त्रिविधमात्मानं परमात्मानमाश्रयेत् ॥११ अन्तरात्मा भवेद्ब्रह्मा परमात्मा महेश्वरः । सर्वेषामेव भूतानां विष्णुरात्मा सनातनः ॥१२ अस्य त्रैलोक्यवृक्षस्य भूमौ विटपशाखिनः । अग्रं मध्यं तथा मूलं विष्णुब्रह्ममहेश्वराः ॥१३ कार्यं विष्णुः क्रिया ब्रह्मा कारणं तु महेश्वरः । प्रयोजनार्थं रुद्रेण मूर्तिरेका त्रिधा कृता ॥१४ धर्मो रुद्रो जगद्विष्णुः सर्वज्ञानं पितामहः ॥१५ श्रीरुद्र रुद्र रुद्रेति यस्तं ब्रूयाद्विचक्षणः । कीर्तनात् सर्वदेवस्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१६ सब प्राणियों के आत्मा विष्णु हैं, अन्तरात्मा ब्रह्मा और परमात्मा रुद्र हैं। इस लोकत्रय रूप वृक्ष की शाखायें पृथ्वी पर फैली हुई हैं, इसके अग्र भाग विष्णु, क्रिया रूप ब्रह्मा और मूल भाग रुद्र हैं।
४३४ ] [रुद्रहृदयोपनिषत् कार्यं रूप विष्णु, क्रिया रूप ब्रह्मा और कारण रूप रुद्र हैं। इस प्रकार भगवान् रुद्र ने ही प्रयोजन के अनुसार अपने तीन रूप धारण किए हैं। संसार विष्णुरूप, ज्ञान ब्रह्मारूप और धर्मं रुद्ररूप है। जो ज्ञानी पुरुष रुद्र के नाम का जप करता है, वह इससे सभी देवताओं के नाम- जप का फल पाकर सब पापों से छूट जाता है ॥११-१६॥ रुद्रो नर उमा नारी तस्मै तस्यै नमो नमः ॥१७ रुद्रो ब्रह्मा उपा वाणी तस्मै नमो नमः। रुद्रो विष्णुरुमा लक्ष्मीस्तस्मै तस्यै नमो नमः ॥१८ रुद्रः सूर्य उमा छाया तस्मै तस्यै नमो नमः । रुद्रः सोम उमा तारा तस्मै तस्यै नमो नमः ॥१९ रुद्रो दिवा उमा रात्रि तस्मै तस्यै नमो नमः । रुद्रो यज्ञ उमा वेदिस्तस्यै तस्मै नमो नमः ॥२० रुद्रो वह्निरुमा स्वाहा तस्मै तस्यै नमो नमः । रुद्रो वेद उमा शास्त्रं तस्यै नमो नमः ॥२१ रुद्रो वृक्ष उमा वल्ली तस्मै तस्यै नमो नमः । रुद्रो गन्ध उमा पुष्पं तस्मै तस्यै नमो नमः ॥२२ रुद्रोऽथं अक्षरः सोमा तस्मै तस्यै नमो नमः । रुद्रो लिङ्गमुमा पीठं तस्मै तस्यै नमो नमः ॥२३ सर्वदेवात्मकं रुद्रं नमस्कुर्यात् पृथक्पृथक् । एभिर्मन्त्रपदैरेव नमस्यामीशपार्वती ॥२४ यत्र यत्र भवेत् सार्धमिमं मन्त्रमुदीरयेत् । ब्रह्महा जलमध्ये तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२५ रुद्र रूप पुरुष और उमा रूप स्त्री, इस प्रकार के रूप द्वय में भगवान् शङ्कर और भगवती उमा को नमस्कार है । रुद्र ब्रह्मा स्वरूप
रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३५ और उमा वाणी स्वरूप हैं। इन दोनों रूप में उमा महेश्वर को नमस्कार है। रुद्र रूप विष्णु और उमा रूप लक्ष्मी को नमस्कार है। सूर्य रुद्र हैं छाया उमा है, उनके इन दोनों रूपों को नमस्कार है। चन्द्रमा और तारा रूप रुद्र-उमा को नमस्कार है। दिवस-रात्रि रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। यज्ञ और वेदी रूप शिव और उमा को नमस्कार है। वेद-शास्त्र रूप शकर और उमा को नमस्कार है। वृक्ष और लता रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। अर्थ और अक्षर रूप शिव-उमा को नमस्कार है। लिंग और पीठ रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। इस प्रकार इन वेदात्मक रुद्र और उमा को पृथक्-पृथक् नमस्कार करना चाहिए। मैं भी इन मन्त्रों द्वारा शिव-उमा को नमस्कार किया करता हूँ। जहाँ भी, जिस स्थिति में रहना हो, वहीं इस अर्घालीयुक्त मन्त्र का जप करता रहे। जिसने ब्रह्म-हत्या की हो वह भी यदि जल में प्रविष्ट होकर इस मन्त्र को जपे तो सभी पापों से छूट जाता है ॥१७-२५॥ सर्वाधिष्ठानमद्वन्द्वं परं ब्रह्म सनातनम् । सच्चिदानन्दरूपं तदवाङ्मनसगोचरम् ॥२६ तस्मिन् सुविदिते सर्वं विज्ञातं स्यादिदं शुक । तदात्मकत्वात् सर्वस्य तस्माद्भिन्नं न हि क्वचित् ॥२७ द्वे विद्ये वेदितव्ये हि परा चैवापरा च ते। तत्रापरा तु विद्यैषा ऋग्वेदो यजुरेव च ॥२८ सामवेदस्तथाऽथर्ववेद शिक्षा मुनीश्वर । कल्पो व्याकरणं चैव निरुक्तं छन्द एव च ॥२९ ज्योतिषं च तथाऽनात्मविषया अपि बुद्धयः । अथैषा परमा विद्या ययाऽऽत्मा परमाक्षरम् ॥३० यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रं रूपवर्जितम् । अचक्षुःश्रोत्रमत्यर्थं तदपाणिपदं तथा ॥३१
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४३६ ] ( रुद्रहृदयोपनिषत् नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् । तद्भूतयोनिं पश्यन्ति धीरा नात्मानमात्मनि ॥३२ हे शुक ! जो सनातन परम ब्रह्म सबका अधिष्ठान, मन और वाणी से अगोचर और सच्चिदानन्दघन स्वरूप है, उसे जो भले प्रकार जान लेता है वह इस सम्पूर्ण रहस्य का ज्ञाता हो जाता है। क्योंकि उस ब्रह्म से भिन्न कुछ भी नहीं है। यह सब उसी का स्वरूप हैं। परा और अपरा नाम की दो विद्यायें हैं वे साधक के लिये ज्ञातव्य हैं। ऋक्, यजु, साम, अथर्व, यह चारों वेद, शिक्षा, कल्प, छन्द, निरुक्त, छन्द, व्याकरण और ज्योतिष यह अपरा है। इसमें आत्म-विषय के अतिरिक्त अन्य सब प्रकार का बौद्धिक ज्ञान भरा हुआ है। परन्तु जिसके द्वारा आत्म-ज्ञान होता है वह परा विद्या है। वही परम अविनाशी आत्मतत्त्व है। वह दिखाई नहीं पड़ता, न ग्रहण किया जा सकता है। उसका नाम, रूप, व गोत्रादि कुछ नहीं है। उसके न नेत्र हैं, न कान हैं, हाथ-पाँव भी नहीं हैं। वह विषयों ने परे, नित्य, विभु, सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने से सर्वगत और निर्विकार है। वह सब भूतों का आश्रय स्थान है। ज्ञानी पुरुष उस परमात्मा का अपने ही आत्मा में दर्शन करते हैं ॥२६-३२॥ यः सर्वज्ञः सर्वविद्यो यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादतन्नह्मरूपेण जायते जगदावलि ॥३३ सत्यवद्भाति तत् सर्वं रज्जुसर्पवदास्थितम् । तदेतदक्षरं सत्यं तद्विज्ञाय विमुच्यते ॥३४ ज्ञानादेव हि संसारविनाशो नैव कर्मणा । श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं स्वगुरुं गच्छेद्व्यथाविधि ॥३५ गुरुस्तस्मै परां विद्यां दद्याद्ब्रह्मात्मबोधिनीम् । गुहायां निहितं साक्षादक्षरं वेद चेन्नरः ॥३६ छित्त्वाऽविद्यामहाग्रन्थि शिवं गच्छेत् सनातनम् । तदेतदमृतं सत्यं तद्वेद्धव्यं मुमुक्षुभिः ॥३७
रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३७ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ब्रह्म से ही भोक्ता एवं अन्य-रूप युक्त यह विश्व प्रकट होता है । वह ब्रह्म सर्वज्ञ एवं सब विद्याओं का आश्रयस्थान है। उसका तप ज्ञान ही है। सत्य के समान दिखाई पड़ने वाला यह विश्व रस्सी में सर्प के आभास के समान ही ब्रह्म में स्थित है। यह विश्व असत्य है, परन्तु ब्रह्म अविनाशी एवं सत्य है। इस प्रकार जानने वाला पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। कर्म से संसार की पाश नहीं कटती, वह तो ज्ञान से ही छिन्न-भिन्न होती है। इसलिए मुक्ति-काम्य पुरुष को अपने ब्रह्मनिष्ठ एवं श्रोत्रिय गुरु की शरण लेनी चाहिए। वह गुरु उसे आत्मा और ब्रह्म के एक होने का ज्ञान कराने वाली परविद्या सिखावे। गुहा में अलक्षित उस अविनाशी ब्रह्म से जो पुरुष साक्षात् कर लेता है, उसके अविद्या रूपी बन्धन तो कट जाते हैं और फिर वह पुराण पुरुष शिव के समीप जाता है। अमृतरूप सत्य मोक्ष की कामना वाले साधकों के लिए ज्ञातव्य है। धनुस्तारं शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्य मुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥३८ लक्ष्यं सर्वगतं चैव शरः सर्वगतो मुखः । वेद्धा सर्वगतश्चैव शिवलक्ष्यं न संशयः ॥३९ न तत्र चन्द्रार्कवपुः प्रकाशते न वान्ति तावाः सकला देवताश्च । स एष देवः कृतभावभूतः रूपं विशुद्धो विरजाः प्रकाशते ॥४० द्वौ सुपर्णौ शरीरेऽस्मिन् जीवेशाख्यौ सह स्थितौ । तयोर्जीवः फलं भुङ्क्ते कर्मणो न महेश्वरः ॥४१ केवलं साक्षिरूपेण विना भोगं महेश्वरः । प्रकाशते स्वयं भेदः कल्पितो मायया तयोः ॥४२ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४३६ ] [ रुद्रहृदयोपनिषत् घटाकाशमठाकाशौ यथाऽऽकाशप्रभेदतः । कल्पितौ परमो जीव शिव रूपेण कल्पितौ ॥४३ तत्त्वतश्च शिवः साक्षाच्चिज्जीवश्च स्वतः सदा । चिच्चिदाकारतो भिन्ना न भिन्ना चित्त्वहानितः ॥४४ चितश्चिन्न चिदाकाराद्भिद्यते जडरूपतः । भिद्यते केज्जडो भेदश्चिदेका सर्वदा खलु ॥४५ तर्कतश्च प्रमाणाच्च चिदेजत्वव्यवस्थितेः । चिदेकत्वपरिज्ञाने न शोचति न मुह्यति । अद्वैतं परमानन्दं शिवं याति तु केवलम् ॥४६ अधिष्ठानं समस्तस्य जगतः सत्यचिद्धनम् । अहमस्मीति निश्चित्य वीतशोको भवेन्मुनि ॥४७ स्वशरीरे स्वयं ज्योतिस्स्वरूपं सर्वसाक्षिणम् । क्षीणादोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययाऽऽवृताः ॥४८ एवंरूपपरिज्ञान यस्यास्ति परयोगिनः । कुत्रचिद्गमनं नास्ति तस्य पूर्णस्वरूपिणः ॥४६ आकाशमेकं सम्पूर्णं कुत्र चिन्नैव गच्छति । तद्वत्स्वात्म परिज्ञानी कुत्र चिन्नैव गच्छति ॥५० स तो॒ ह वै॒ तत्पर॑मंब्रह्म॒यो वेदं॒ वै मुनिः॑ । ब्रह्म॑ वै भवति स्वस्थः सच्चिदानन्दमातृकः ॥५१ : ब्रह्म रूप लक्ष्य के लिए प्रणव धनुष रूप और आत्मा बाण के समान है । उसे बींधने के लिए आलस्य का त्याग आवश्यकीय कार्य है । उस ब्रह्म में उसी प्रकार तन्मय हो जाना चाहिए जैसे लक्ष्य की बींधने के लिए बाण क्रियारत होता है । ब्रह्म रूप लक्ष्य सर्वगत है, आत्मा सर्वतोमुख है, परन्तु यदि साधक भी सर्वगत हो तो शिवःरूप लक्ष्य की प्राप्ति निःसन्देह होती है । जिन परमात्मा के परमधाम में चन्द्र-सूर्य नहीं होते, जहाँ वायु तथा अन्य देवगण भी पहुंच नहीं पातें, वहीं पर-
रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३६ मात्मा साधक द्वारा चिंतन किये जाने पर अपने निर्मल और निर्गुण रूप से प्रकाशमान होते हैं। यह शरीर रूपी वृक्ष जीव और ईश्वर रूप दो पक्षियों को निवास देने वाला है। इनमें जीवरूप पक्षी स्वीकृत कर्मों का फल भोगता है। परन्तु ईश्वर उसके कर्म-फल भोग के साक्षी स्वरूप प्रकाशित रहता है, वह कर्म का फल नहीं भोगता। माया के द्वारा ही जीव और ईश्वर के भेद की कल्पना हुई है। यथार्थ में तो चिन्मय जीव स्वयं ही साक्षात् ईश्वर है। जीव और ईश्वर में चित् रूप उपाधि सम्बन्धी आकार भेद के कारण यह विभक्ति परिलक्षित होती है। वास्तव में उनमें कोई भिन्नता नहीं है। यदि यथार्थ में ही भेद हो तो दोनों का चित् स्वरूप ही नष्ट हो जायगा। चित् से चित् का भेद कल्पित किया जाना जड़ रूप उपाधि से ही हुआ है। चिदाकारता से कोई भेद नहीं हो सकता। भेद-दृष्टि ही जड़ता से उत्पन्न होती है। चित्त की एकता युक्ति और प्रमाण दोनों के द्वारा ही परिपुष्ट है। अतः चित् की एकता का ज्ञान हो जाने पर मनुष्य मोह और शोक से मुक्त हो जाता है और अद्वैत परमानन्द रूप शिवत्व की उसे प्राप्ति होती है। वह चिद्धन स्वरूप परमात्मा सम्पूर्ण विश्व का परम आश्रय है। ऋषि- गण परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा मानकर शोक से छूट जाते हैं। जिन मनुष्यों के दोष नष्ट हो गये हैं, वे ही उस सर्वसाक्षी और स्वयंज्योति रूप परब्रह्म के दर्शन प्राप्त कर सकते हैं। माया के जाल में फँसे हुए जीव उसे नहीं देख सकते । जो सिद्ध पुरुष आत्मा के स्वरूप का ऐसा ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, वे पूर्णता को प्राप्त पुरुष कहीं आते-जाते नहीं। जैसे परिपूर्ण आकाश कहीं जाता नहीं, वैसे ही आत्म-तत्त्व का ज्ञाता महात्मा भी कहीं नहीं जाता। जो उस परमब्रह्म का ज्ञाता है, वह सच्चिदानन्द रूप में स्थित होकर स्वयं ब्रह्म हो जाता है ॥ ३८-५१ ॥ ॥ रुद्रहृदयोपनिषत् समाप्त ॥