सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

* अध्याय ३३० *

६७३


नामक तीन पादोंवाला छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये। देवा भवत वाजिनः॥' (१।२३।१९)] जब प्रथम और द्वितीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों और तृतीय चरण बारह अक्षरोंका हो तो 'परोष्णिक्' छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अग्रे वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो। अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः^१॥' (१।७९।४)] सात-सात अक्षरोंके चार चरण होनेपर भी 'उष्णिक्' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'नदं व ओदतीनां नदं यो युवतीनाम्। पतिं वो अध्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि॥' (८।६९।२)]

आठ-आठ अक्षरके चार चरणोंका 'अनुष्टुप्' नामक छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेदमें—'सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं सर्वतः स्पृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥' (३१।१)] अनुष्टुप् छन्द कहीं-कहीं तीन चरणोंका भी होता है। 'त्रिपाद अनुष्टुप्' दो तरहके होते हैं। एक तो वह है, जिसके प्रथम चरणमें आठ तथा द्वितीय और तृतीय चरणोंमें बारह-बारह अक्षर होते हैं। दूसरा वह है, जिसका मध्यम अथवा अन्तिम पाद आठ अक्षरका हो तथा शेष दो चरण बारह-बारह अक्षरके हों। आठ अक्षरके मध्यम पादवाले 'त्रिपाद अनुष्टुप्' का उदाहरण [जैसे ऋग्वेदमें—'पर्यूषु प्र धन्व वाजसातय, परि वृत्राणि सक्षणिः। द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे॥' (९।११०।१)] तथा आठ अक्षरके अन्तिम चरणवाले 'त्रिपाद अनुष्टुप्' का उदाहरण [ऋग्वेदमें—'मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणे नो मा कुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः। स्तनाभुजो अशिश्वीः॥' (१।१२०।८)]

यदि एक चरण 'जगती' का (अर्थात् बारह अक्षरका) हो और शेष तीन चरण गायत्रीके (अर्थात् आठ-आठ अक्षरके) हों तो यह चार चरणोंका 'बृहती छन्द' होता है। इसमें भी जब पहलेका स्थान तीसरा चरण ले ले अर्थात् वही जगतीका पाद हो और शेष तीन चरण गायत्रीके हों तो उसे 'पथ्या बृहती' कहते हैं। [जैसे सामवेदमें—'मा चिदन्यद् विशंसत सखायो मा रिषण्यत। इन्द्रमित् स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत॥' (२४२)] जब पहलेवाला 'जगती'का चरण द्वितीय पाद हो जाय और शेष तीन गायत्रीके चरण हों तो 'न्यङ्गुसारिणी बृहती' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः। वृषा ते वृष्ण इन्दुर्वाद्वीसहस्रसातमः॥' (१।१७५।१)] आचार्य क्रोष्टुकिके मतमें यह (न्यङ्कुसारिणी) 'स्कन्ध' या 'ग्रीवा' नामक छन्द है^२। यास्काचार्यने इसे ही 'उरोबृहती' नाम दिया है। जब अन्तिम (चतुर्थ) चरण 'जगती'का हो और आरम्भके तीन चरण गायत्रीके हों तो 'उपरिष्टाद् बृहती^३' नामक छन्द होता है। वही 'जगती'का चरण जब पहले हो और शेष तीन चरण गायत्री छन्दके हों तो उसे 'पुरस्ताद् बृहती' छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—'महो यस्पतिः शस्वसो असाम्या महो नृम्णस्य ततुजिः। मर्ता वज्रस्य धृष्णोः पिता पुत्रमिव प्रियम्^४॥' (१०।२२।३)] वेदमें कहीं-कहीं नौ-नौ अक्षरोंके चार चरण दिखायी देते


१. पाँचवें श्लोकमें 'उष्णिक्' छन्दका जो लक्षण दिया गया है, उसीसे यह भी गतार्थ हो जाता है। यहाँ 'परोष्णिक्' यह विशेष संज्ञा बतानेके लिये पुनः उल्लेख किया गया है।
२. पिङ्गलसूत्रमें 'स्कन्धोग्रीवी' नाम आया है।
३. इसका उदाहरण सामवेदमें इस प्रकार है—'अग्रे जरितर्विश्वस्तिस्पानो देव रक्षसः। अप्रोषिवाण् गृहपते महाँ असि दिवस्यायुर्दुरोण्युः॥' (३९)
४. आठवें श्लोकके उत्तरार्धमें जो 'बृहती छन्द'का लक्षण दिया गया है, उसीसे यह भी गतार्थ हो जाता है; फिर भी विशेष संज्ञा देनेके लिये यहाँ पुनरुक्ति की गयी है।

६७४ * अग्निपुराण *


हैं। वे भी ‘बृहती’ छन्दके ही अन्तर्गत हैं। [उदाहरणके लिये ऋग्वेदमें—‘तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम। देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम् १॥’ (१।१८७।११)] जहाँ पहले दस अक्षरके दो चरण हों, फिर आठ अक्षरोंके दो चरण हों, उसे भी ‘बृहती’ छन्द कहते हैं। [जैसे सामवेदमें— ‘अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य। आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः २॥’ (४०)] केवल ‘जगती’ छन्दके तीन चरण हों तो उसे ‘महाबृहती’ कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘अजीजनो अमृत मर्त्येष्वॉ, ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः। सदासरो वाजमच्छसनिष्यदत्’ (९।११०।४)] ताण्डी नामक आचार्यके मतमें यही ‘सतो बृहती’ नामक छन्द है॥ ५-१०३/२॥

जहाँ दो पाद बारह-बारह अक्षरोंके और दो आठ-आठ अक्षरोंके हों, वहाँ ‘पङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। यदि विषम पाद अर्थात् प्रथम और तृतीय चरण पूर्वकथनानुसार बारह-बारह अक्षरोंके हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरोंके तो उसे ‘सतःपङ्क्ति’ नामक छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन। यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः॥’ (१।३६।१०)] यदि वे ही चरण विपरीत अवस्थामें हों, अर्थात् प्रथम-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके और द्वितीय-चतुर्थ बारह- बारह अक्षरोंके तो भी वह छन्द ‘सतःपङ्क्ति’ ही कहलाता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘य ऋष्ये श्रावयत्सखा विश्वेत् स वेद जनिमा पुरुष्टुतः। तं विश्वे मानुषा युगे, इन्द्रं हवन्ते तविशं यतासुचः॥’ (८।४६।१२)] जब पहलेके दोनों चरण बारह-बारह अक्षरोंके हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरोंके, तो उसे ‘प्रस्तारपङ्क्ति’ कहते हैं। [ग्यारहवें श्लोकमें बताये हुए ‘पङ्क्ति’ छन्दके लक्षणसे ही यह गतार्थ हो जाता है, तथापि विशेष संज्ञा देनेके लिये यहाँ पुनः उपादान किया गया है। मन्त्र-ब्राह्मणमें इसका उदाहरण इस प्रकार है—‘काम वेदते मदो नामासि समानया अमुं सुरा ते अभवत्। परम्त्र जन्मा अग्ने तपसा निर्मितोऽसि ४॥’] जब अन्तिम दो चरण बारह-बारह अक्षरोंके हों और आरम्भके दोनों आठ-आठ अक्षरोंके तो ‘आस्तारपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—भद्रं नो अपि वातय, मनो दक्षमृत क्रतुम्। अधा ते सख्य अन्धसो वि वो मदे रणन् गावो न यवसे विवक्षसे॥’ (१०।२५।१)] यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बीचमें हों और प्रथम एवं चतुर्थ चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो उसे ‘विस्तारपङ्क्ति’ कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘अग्ने तव श्रवो वयो, महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो। बृहद्दानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे॥’ (१०।१४०।१)] यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बारह हों, अर्थात् प्रथम एवं चतुर्थ चरणके रूपमें हों और बीचके द्वितीय-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो वह ‘संस्तारपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘पितुभूतो न तन्तुमित् सुदानवः प्रतिदध्मो यजामसि। उषा अप स्वसुस्तमः संवर्तयति वर्तनि सुजातता॥’ (१०।१७२।३)] पाँच-पाँच अक्षरोंके चार पाद होनेपर ‘अक्षरपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘प्र शुक्रैतु ५ देवी मनीषा। अस्मत् सुतष्टो


१.-२-३. इन सबमें व्यूहकी रीतिसे या ‘निचृत्’ मानकर पादपूर्ति की जाती है।
४. यहाँ ‘नामा असि’, ‘निर्मितः असि’—इस प्रकार संधिव्यूहसे पादपूर्ति की जाती है। कात्यायनने इसे गायत्री छन्दमें गिना है। सायणाने इसे ‘द्विपदा’ कहा है।
५. यहाँ ‘निचृत्’ होनेसे एक अक्षरकी न्यूनता है।

  • अध्याय ३३० * ६७५

रथो न वाजी ॥' (७।३४।१)] पाँच अक्षरोंके दो ही चरण होनेपर 'अल्पशः-पङ्क्ति' नामक छन्द कहलाता है। जहाँ पाँच-पाँच अक्षरोंके पाँच पाद हों, वहाँ 'पदपङ्क्ति' नामक छन्द जानना चाहिये। [जैसे ऋग्वेदमें—'घृतं न पूतं तनूररेपाः शुचि हिरण्यं तत्ते रुक्मो न रोचत स्वधावः१॥' (४।१०।६)] जब पहला चरण चार अक्षरोंका, दूसरा छः अक्षरोंका तथा शेष तीन पाद पाँच-पाँच अक्षरोंके हों तो भी 'पद-पङ्क्ति' छन्द ही होता है। आठ-आठ अक्षरोंके पाँच पादोंका 'पथ्यापङ्क्ति' नामक छन्द कहा गया है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत। अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया यती योजान्विन्द्र ते हरी॥' (१।८२।२)] आठ-आठ अक्षरोंके छः चरण होनेपर 'जगतीपङ्क्ति' नामक छन्द होता है। [जैसे मन्त्रब्राह्मणमें—'येन स्त्रियमकृणुतं येनापामृशतं सुराम्; येनाक्षामभ्यषिञ्चतम्। येनेमां पृथ्वीं महीं यद्वां तदश्विना यशस्तेन मामभिषिञ्चतम्॥'] ॥ ११–१४॥

'त्रिष्टुप्' अर्थात् ग्यारह अक्षरोंका एक पाद हो और आठ-आठ अक्षरोंके चार पाद हों तो पाँच पादोंका 'त्रिष्टुब्ज्योतिष्मती' नामक छन्द होता है। इसी प्रकार जब एक चरण 'जगती'का अर्थात् बारह अक्षरोंका हो और चार चरण 'गायत्री'के (आठ-आठ अक्षरोंके) हों तो उस छन्दका नाम 'जगतीज्योतिष्मती' होता है। यदि पहला ही चरण ग्यारह अक्षरोंका हो और शेष चार चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो 'पुरस्ताज्ज्योति'२ नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है और यदि पहला ही चरण बारह अक्षरोंका तथा शेष चार चरण आठ-आठके हों तो 'पुरस्ताज्ज्योति' नामक जगती छन्द३ होता है। जब मध्यम चरण ग्यारह अक्षरों और आगे-पीछेके दो-दो चरण आठ-आठके हों तो 'मध्ये-ज्योति'४ नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है; इसी प्रकार जब मध्यम चरण बारहका तथा आदि-अन्तके दो-दो चरण आठ-आठके हों तो 'मध्ये-ज्योति'५ नामक जगती छन्द होता है। जब आरम्भके चार चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तथा अन्तिम चरण ग्यारह अक्षरोंका हो तो उसे 'उपरिष्टाज्ज्योसि'६ नामक त्रिष्टुप् छन्द कहते हैं। इसी प्रकार जब आदिके चार चरण पूर्ववत् आठ-आठके हों और अन्तिम पाद बारह अक्षरोंका हो तो उसका नाम 'उपरिष्टाज्ज्योति'७ जगती छन्द होता है ॥ १५३/२ ॥

गायत्री आदि सभी छन्दोंके एक पादमें यदि पाँच अक्षर हों तथा अन्य पादोंमें पहलेके अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उस छन्दका नाम 'शङ्कुमती' होता है। [जैसे प्रथम पाद पाँच अक्षरका और तीन चरण छः-छः अक्षरोंका होनेपर उसे 'शङ्कुमती गायत्री' कह सकते हैं।]


१. यहाँ 'भूरिक्' होनेसे एक अक्षरकी अधिकता है। अन्यत्र भी अक्षरोंकी न्यूनता या अधिकता दीखनेपर इसी प्रकार समझना चाहिये। २. उदाहरण ऋग्वेदमें—तमुष्टुहीन्द्रं यो ह स त्वा यः शूरो मघवा यो रथेष्ठाः। प्रतीचश्चिद् यो धीमान् वृषण्वान् ववव्रुपांश्चित्तमसो विहन्ता ॥ (१।१७३।५) ३. उदाहरण ऋग्वेदमें—अबोध्याग्निर्ज्म उदेति सूर्यो व्यूषाश्चन्द्रा मह्यावो अर्चिषा। आयुक्षातामश्विना यातवे रथं प्रासावीद्देवः सविता जगत् पृथक् ॥ (१।१५७।१) ४. उदाहरण मन्त्रब्राह्मणमें—इमं तमुपस्थं मधुना संसृजामि। प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयं तेन पुंसोऽभिभवासि, सर्वान् कामान् वशिन्यसि राज्ञी ॥ ५. उदाहरण ऋग्वेदमें—बृहद्भिborderअग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा। भरद्वाजे समिधानो यविष्ठय रेवन्तः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि ॥ (६।४८।७) ६. उदाहरण मन्त्रब्राह्मणमें—अग्निं क्रव्यादमकृण्वन्, गुहाना स्त्रीणामुपस्थम्। ऋषयः पुराणाः, तेन आज्यमकृण्वं त्रैशुद्धं त्वयि त्वद्दधातु। ७. उदाहरण ऋग्वेदमें—नवानां नवतीनां विष्यस्य रोपुषीणाम्। सर्वसामग्रभंनामा अरे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार ॥ (१।१९१।१३)

६७६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

जब एक चरण छः अक्षरोंका हो और अन्य चरणोंमें पहले बताये अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उसका नाम ‘ककुदमती’ होगा। जहाँ तीन पादवाले छन्दके पहले और दूसरे चरणमें अधिक अक्षर हों और बीचवालेमें बहुत ही कम हों, वहाँ उस छन्दका नाम ‘पिपीलिकमध्या’ होगा। [जैसे त्रिपदा गायत्रीके आदि और अन्त चरण आठ-आठ अक्षरके हों तथा बीचवाला चरण तीन, चार या पाँच अक्षरका हो तो उसे ‘पिपीलिकमध्या’ कहेंगे।] इसके विपरीत जब आदि और अन्तवाले पादोंके अक्षर कम हों और बीचवाला पाद अधिक अक्षरोंका हो तो उस ‘त्रिपाद् गायत्री’ आदि छन्दको ‘यवमध्या’ कहते हैं। यदि ‘गायत्री’ या ‘उष्णिक्’ आदि छन्दोंमें केवल एक अक्षरकी कमी हो, उसकी ‘निचृत्’ यह विशेष संज्ञा होती है। एक अक्षरकी अधिकता होनेपर वह छन्द ‘भूरिक्’ नाम धारण करता है। इस प्रकार दो अक्षरोंकी कमी रहनेपर ‘विराट्’ और दो अक्षर अधिक होनेपर ‘स्वराट्’ संज्ञा होती है। संदिग्ध अवस्थामें आदि पादके अनुसार छन्दका निर्णय करना चाहिये। [जैसे कोई मन्त्र छब्बीस अक्षरका है, उसमें गायत्रीसे दो अक्षर अधिक हैं और उष्णिक्से दो अक्षर कम—ऐसी दशामें वह ‘स्वराट् गायत्री’ छन्द है या ‘विराड् उष्णिक्’?—ऐसे संदेहयुक्त स्थलोंमें यदि मन्त्रका पहला चरण ‘गायत्री’ से मिलता हो तो उसे ‘स्वराट् गायत्री’ कहेंगे और यदि प्रथम पाद ‘उष्णिक्’ से मिलता हो तो उसे ‘विराड् उष्णिक्’ कह सकते हैं। इसी तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये।] इसी प्रकार देवता, स्वर, वर्ण तथा गोत्र आदिके द्वारा संदिग्धस्थलमें छन्दका निर्णय हो सकता है। गायत्री आदि छन्दोंके देवता क्रमशः इस प्रकार हैं—अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, मित्रावरुण, इन्द्र तथा विश्वेदेव। उक्त छन्दोंके स्वर हैं—‘षड्ज’ आदि। उनके नाम क्रमशः ये हैं—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद। श्वेत, सारंग, पिशङ्ग, कृष्ण, नील, लोहित (लाल) तथा गौर—ये क्रमशः गायत्री आदि छन्दोंके वर्ण हैं। ‘कृति’ नामवाले छन्दोंका वर्ण गोरोचनके समान है और अतिच्छन्दोंका वर्ण श्यामल है। अग्निवेश्य, काश्यप, गौतम, अङ्गिरा, भार्गव, कौशिक तथा वसिष्ठ—ये क्रमशः उक्त सात छन्दोंके गोत्र बताये गये हैं॥ १६—२३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘छन्दस्सारका कथन’ नामक तीन सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३०॥


तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय

उत्कृति आदि छन्द, गण-छन्द और मात्रा-छन्दोंका निरूपण

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठजी! एक सौ चार अक्षरोंका ‘उत्कृति’ छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेदमें—‘होता यक्षदश्विनौ छागस्य०’ इत्यादि (२१।४१)] ‘उत्कृति’ छन्दमेंसे चार-चार घटाते जायँ तो क्रमशः निम्नाङ्कित छन्द होते हैं—सौ अक्षरोंकी ‘अभिकृति’$^१$, छानबे अक्षरोंकी ‘संस्कृति’$^२$, बानबे अक्षरोंकी ‘विकृति’$^३$, अठासी अक्षरोंकी ‘आकृति’$^४$, चौरासी अक्षरोंकी ‘प्रकृति’$^५$,


$^१$. ‘अभिकृति’ आदि छन्दोंके उदाहरणका प्रतीकमात्र यहाँ दिया जाता है, विशेष जानकारीके लिये वेदोंमें अनुसंधान करना चाहिये। यजुर्वेदे—‘देवो अग्निः स्विष्टकृत् देवान्यक्षत्’ इत्यादि (२१।५८)।
$^२$. यजुर्वेदे—‘देवो अग्निः स्विष्टकृत्, सुद्रविणामन्दः कविः’ इत्यादि।
$^३$. ‘इमे सोमाः सुरामाणाम्’ इत्यादि।
$^४$. ‘भगा अनुपयुक्तामिन्द्रो यातु पुरोगवः’ इत्यादि।
$^५$. प्रकृतेरुदाहरणम्—‘सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च’ इत्यादि प्रातराचमनमन्त्रः।

  • अध्याय ३३१ * ६७७

अस्सी अक्षरोंकी ‘कृति’$^१$, छिहत्तर अक्षरोंकी ‘अभिकृति’$^२$, बहत्तर अक्षरोंकी ‘धृति’$^३$, अड़सठ अक्षरोंकी ‘अत्यष्टि’$^४$, चौसठ अक्षरोंकी ‘अष्टि’$^५$, साठ अक्षरोंकी ‘अतिशक्वरी’$^६$, छप्पन अक्षरोंकी ‘शक्वरी’$^७$, बावन अक्षरोंकी ‘अतिजगती’$^८$ तथा अड़तालीस अक्षरोंकी ‘जगती’$^९$ होती है। यहाँतक केवल वैदिक छन्द हैं। यहाँसे आगे लौकिक छन्दका अधिकार है। ‘गायत्री’से लेकर ‘त्रिष्टुप्’ तक जो आर्षछन्द वैदिक छन्दोंमें गिनाये गये हैं, वे लौकिक छन्द भी हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—त्रिष्टुप्, पङ्क्ति, बृहती, अनुष्टुप्, उष्णिक् और गायत्री। गायत्री छन्दमें क्रमशः एक-एक अक्षरकी कमी होनेपर ‘सुप्रतिष्ठा’, ‘प्रतिष्ठा’, ‘मध्या’, ‘अत्युक्तात्युक्त’ तथा ‘आदि’ नामक छन्द होते हैं॥१-४॥

छन्दके चौथाई भागको ‘पाद’ या ‘चरण’ कहते हैं। [छन्द तीन प्रकारके हैं—गणच्छन्द, मात्रा-छन्द और अक्षरच्छन्द]। पहले ‘गणच्छन्द’ दिखलाया जाता है। चार लघु अक्षरोंकी ‘गण’ संज्ञा होती है। [‘आर्या’के लक्षणोंकी सिद्धि ही इस संज्ञाका प्रयोजन है।] ये गण पाँच हैं। कहीं आदि गुरु (ऽ।।), कहीं मध्य गुरु (।ऽ।), कहीं अन्त्य गुरु (।।ऽ), कहीं सर्वगुरु (ऽऽ) और कहीं चारों अक्षर लघु (।।।।) होते हैं। [एक ‘गुरु’ दो ‘लघु’ अक्षरोंके बराबर होता है; अतः जहाँ सब लघु हैं, वहाँ चार अक्षर तथा जहाँ सब गुरु हैं, वहाँ दो अक्षर दिखाये गये हैं।] अब ‘आर्या’का लक्षण बताया जाता है। साढ़े सात गणोंकी, अर्थात् तीस मात्राओं या तीस लघु अक्षरोंकी आधी ‘आर्या’ होती है। [आर्यामें गुरुवर्णको दो मात्रा या दो लघु मानकर गिनना चाहिये।] ‘आर्या’ छन्दके विषम गणोंमें जगण (।ऽ।)-का प्रयोग नहीं होता$^{१०}$। किंतु छठा गण अवश्य जगण (।ऽ।) होना चाहिये।$^{११}$ अथवा वह नगण और लघु यानी सब-का-सब लघु भी हो सकता है। जब छठा गण सब-का-सब लघु हो तो उस गणके द्वितीय अक्षरसे सुबन्त या तिङन्तलक्षण पदसंज्ञाकी प्रवृत्ति होती है।$^{१२}$ यदि छठा गण मध्य गुरु (।ऽ।) अथवा सर्वलघु (।।।।) हो और सातवाँ गण भी सर्वलघु ही हो, तो सातवें गणके प्रथम अक्षरसे ‘पद’ संज्ञाकी प्रवृत्ति होती है।$^{१३}$ इसी प्रकार जब आर्याके उत्तरार्ध-भागमें पाँचवाँ गण सर्वलघु हो तो उसके प्रथम अक्षरसे ही पदका आरम्भ होता है।$^{१४}$ आर्याके उत्तरार्ध भागमें छठा गण एकमात्र लघु अक्षरका (।) होता है।$^{१५}$ जिस आर्याके पूर्वार्ध और उत्तरार्धमें


१. यजुर्वेदे—‘सुपर्णोऽसि गरुत्मॉस्त्रिः सत्रिवृत्ते शिरो गायत्रम्’ इत्यादि (१७।७२)। २. ऋग्वेदे—‘स हि शर्धो न मारुतं तु विष्णोणि’ इत्यादि (१।१२७।६)। ३. ऋग्वेदे—‘अवमह इन्द्र दादृहि श्रुधि नः शुशोच हि द्यौः०’ इत्यादि (१।१३३।६)। ४. ऋग्वेदे—‘अदर्शि गातुरुरवे वरीयसी पन्था ऋतस्य समयंस्त रश्मिभिः०’ इत्यादि (१।१३६।२)। ५. ऋग्वेदे—‘त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तु विषुष्म’ इत्यादि (२।२२।१)। ६. ऋग्वेदे—‘सार्कं जातः क्रतुना साकभोजसा ववक्षिथ’ इत्यादि (२।२२।३)। ७. ऋग्वेदे—‘प्रीस्वस्मै पुरोरथं, इन्द्राय शषमर्चत्०’ इत्यादि। ८. मन्त्रब्राह्मणे—‘मा ते गृहेषु निशि घोष उत्था०’ इत्यादि। ९. सामवेदे—‘इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया। भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसदि, अग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव॥’ (६६)

१०. उदाहरण— द्वीपादप्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥ ११. सा जयति जगत्यार्या देवी दिवमुत्पतिष्णुरतिरुपिरा। यादृश्यत गगनतले कंसवधोत्पातविद्युदिव॥ १२. रूपान्तरेण देवीं तामेव स्तौमि सपदि किल महिषः। पादस्पर्शसुखादिव मीलितनयनोऽभवद् यस्याः॥ यहाँ ‘मि सपदि’ यही छठा गण है, इसमें द्वितीय अक्षरसे पदका आरम्भ है। १३. ब्रह्मक्षत्रकुलीनः प्रलीनसामन्तचक्रनुतचरणः। सकलसुकृतैकपुञ्जः श्रीमान् मुञ्जश्चिरं जयति॥ जयति भुवनैकवीरः सीरायुधतुलितविपुलबलविभवः। अनवरतवित्तवितरणनिर्जितचम्पाधिपो मुञ्जः॥ १४-१५. स जयति वाक्पतिराजः सकलार्थमनोरथैककल्पतरुः। प्रत्यर्थिभूतपार्थिवलक्ष्मीहठहरणदुर्ललितः॥

६७८ * अग्निपुराण *


तीन-तीन गणोंके बाद पहले पादका विराम होता है, उसे 'पथ्या' माना गया है।१ ॥ ५-८ ॥

जिस आर्याके पूर्वार्धमें या उत्तरार्धमें अथवा दोनोंमें तीन गणोंपर पादविराम नहीं होता, उसका नाम 'विपुला' होता है। [इस प्रकार इसके तीन भेद होते हैं—१-आदिविपुला, २-अन्त्यविपुला तथा ३-उभयविपुला। इनमें पहलीका नाम 'मुख-विपुला' दूसरीका 'जघनविपुला' तथा तीसरीका 'महाविपुला' है।] इनके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं—

१- स्निग्धच्छायालावण्यलेपिनी किंचिदवनतवीणा। मुखविपुला सौभाग्यं लभते स्त्रीत्याह माण्डव्यः ॥

२- चित्तं हरन्ति हरिणीदीर्घदृशः कामिनां कलालापैः। नीवीविमोचनव्याजकथितजघना जघनविपुला ॥

३- या स्त्री कुचकलशनितम्बमण्डले जायते महाविपुला। गम्भीरनाभिरतिदीर्घलोचना भवति सा सुभगा ॥

—पहले पद्यमें पूर्वार्धमें, दूसरेमें उत्तरार्धमें तथा तीसरेमें दोनों जगह पाद-विराम तीन गणोंसे आगे होता है।२ जिस आर्या-छन्दमें द्वितीय तथा चतुर्थ गण गुरु अक्षरोंके बीचमें होनेके साथ ही जगण अर्थात् मध्यगुरु (। ऽ ।) हों, उसका नाम 'चपला' है। तात्पर्य यह है कि 'चपला' नामक आर्यामें प्रथम गण अन्त्यगुरु (।। ऽ), तृतीय गण दो गुरु (ऽ ऽ) तथा पञ्चम गण आदिगुरु (ऽ ।।) होता है। शेष गण पूर्ववत् रहते हैं। पूर्वार्धमें 'चपला'का लक्षण हो तो उस आर्याका नाम 'मुखचपला'३ होता है। परार्धमें चपलाका लक्षण होनेपर उसे 'जघनचपला'४ कहते हैं। पूर्वार्ध और परार्ध—दोनोंमें चपलाका लक्षण संघटित होता हो तो उसका नाम 'महाचपला'५ है। जहाँ


१. पथ्याशी व्यायामी स्त्रीषु जितात्मा नरो न रोगी स्यात्। यदि वचसा मनसा वा द्रुह्यति नित्यं न भूतेभ्यः ॥
२. 'पथ्या' और 'विपुला'में सहानवस्थारूप विरोध है; अतः ये दोनों छन्द एक साथ नहीं रह सकते। यदि एक अंशमें भी 'विपुला'का लक्षण संघटित हुआ तो उसका पथ्यात्व नष्ट हो जाता है; क्योंकि 'विपुला' छन्द उभयाश्रय है; वह पूर्वार्धमें, उत्तरार्धमें तथा दोनोंमें भी रह सकता है। अब 'विपुला'का जहाँ अंश भी हो, वहाँ 'पथ्या'का प्रवेश नहीं हो सकता। 'पथ्या' छन्द एक अंशसे भी विकल हो जाय तो वहीं 'विपुला'का विषय होता है; अतः वहाँ 'विपुला'की प्राप्ति अनिवार्य है। 'पथ्या' और 'चपला'में कोई विरोध नहीं है; अतः इनमें बाध्य-बाधकभाव नहीं होता। इस विषयका संक्षिप्त संग्रह नीचे लिखे श्लोकोंमें है—
एकैव भवति पथ्या विपुलास्तिस्रस्ततश्चतस्रस्ताः। चपलाभेदैस्त्रिभिरपि भिन्ना इति षोडशार्याः स्युः ॥
गीतिचतुष्टयमित्थं प्रत्येकं षोडशप्रकारं स्यात्। साकल्येनार्याणामशीतिरेवं विकल्पाः स्युः ॥
'एक 'पथ्या', तीन 'विपुला', कुल चार भेद हुए। इनमेंसे प्रत्येक छन्द 'चपला'के तीन भेदोंसे भिन्न होकर बारह प्रकारका होता है। बारह ये और चार पहलेके—यों सोलह हुए। इन सोलहोंके 'गीति' आदि चार भेदोंद्वारा भेद होनेसे चौंसठ भेद होते हैं। पहलेके सोलह और चौंसठ—कुल अस्सी हुए। इस प्रकार 'आर्या'के अस्सी भेद हैं।'
३. पथ्यापूर्वक मुखचपलाका उदाहरण—
अतिदारुणा द्विजिह्वा परस्य रन्ध्रानुसारिणी कुटिला। दूरात्परिहरणीया नारी नागीव मुखचपला ॥
आदिविपुलापूर्वक मुखचपलाका उदाहरण—
यस्याश्च लोचने पिङ्गले भ्रुवौ संगते मुखं दीर्घम्। विपुलोन्नताश्च दन्ताः कान्तासौ भवति मुखचपला ॥
उभयविपुलापूर्वक मुख-चपलाका उदाहरण—
विपुलाभिजातवंशोद्गवापि रूपातिरेकरम्यापि। निस्सार्यते गृहाद् वल्लभापि यदि भवति मुखचपला ॥
४. पथ्यापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण—
यत्पादस्य कनिष्ठा न स्पृशति महीमनामिका वाप। सा सर्वधूर्तभोग्या भवेदवश्यं जघनचपला ॥
अन्त्यविपुलापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण—
यस्याः पादाङ्गुष्ठं व्यतीत्य याति प्रदेशिनी दीर्घा। विपुले कुले प्रसूतापि सा ध्रुवं जघनचपला स्यात् ॥
महाविपुलापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण—
मकरध्वजसद्मनि दृश्यते स्फुटं तिलकलाञ्छनं यस्याः। विपुलान्वयाभिजातापि जायते जघनचपलासौ ॥
५. पथ्यापूर्वक महाचपलाका उदाहरण—
हृदयं हरन्ति नार्यो मुनेरपि भ्रूकटाक्षविक्षेपैः। दोर्मूलनाभिदेशं निदर्शयन्त्यो महाचपलाः ॥
विपुलापूर्वक महाचपलाका उदाहरण—
चिबुके कपोलदेशेऽपि कूपिका दृश्यते स्मिते यस्याः। विपुलान्वयप्रसूतापि जायते सा महाचपला ॥

  • अध्याय ३३१ * ६७९

आर्याके पूर्वार्धके समान ही उत्तरार्ध भी हो, उसे 'गीति'^१ नाम दिया गया है। तात्पर्य यह कि उसके उत्तरार्धमें भी छठा गण मध्यगुरु (। ऽ ।) अथवा सर्वलघु (।।।।) करना चाहिये। इसी प्रकार जहाँ आर्याके उत्तरार्धके समान ही पूर्वार्ध भी हो, उसे 'उपगीति'^२ कहते हैं। आर्याके पूर्वोक्त क्रमको विपरीत कर देनेपर 'उद्गीति'^३ नाम पड़ता है। सारांश यह कि उसमें पूर्वार्धको उत्तरार्धमें और उत्तरार्धको पूर्वार्धमें रखा जाता है। यदि पूर्वार्धमें आठ गण हों तो 'आर्यागीति'^४ नामक छन्द होता है। कोई विशेषता न होनेसे इसका उत्तरार्ध भी ऐसा ही समझना चाहिये। यहाँ भी छठे गणमें मध्यगुरु और सर्वलघु-इन दोनों विकल्पोंकी प्राप्ति थी, उसके स्थानमें केवल एक 'लघु'का विधान है॥९-१०$\frac{३}{४}$॥

अब 'मात्रा-छन्द' बतलाया जाता है। जहाँ विषम, अर्थात् प्रथम और तृतीय चरणमें चौदह लघु (मात्राएँ) हों और सम-द्वितीय, चतुर्थ

१. पथ्या-गीतिका उदाहरण- मधुरं वीणारणितं पञ्चमसुभगश्च कोकिलालापः। गीतिः पौरवधूनामधुना कुसुमायुधं प्रबोधयति॥ आदिविपुला-गीति- इयमपरा विपुला गीतिरुच्यते सर्वलोकहितहेतोः। यदनिष्टमात्मनस्तत्परेषु भवतापि मा क्वचित् कारि॥ पथ्या महाचपला-गीतिका उदाहरण- कामं चकास्ति गीतिर्मृगीदृशां सीधुपानचपलानाम्। मुखं च मुक्तलज्जं निरर्गलोल्लापमणितरमणीयम्॥ महाविपुला-महाचपला-गीतिका उदाहरण- पङ्केषुवल्लभः पञ्चमध्वनिस्तत्र भवति यदि विपुलः। चपलं करोति कामाकुलं मनः कामिनामसौ गीतिः॥ २. पथ्योपगीतिका उदाहरण- गान्धर्वं मकरध्वजदेवस्यास्त्रं जगद्विजायि। इति समवेक्ष्य मुमुक्षुभिरुपगीतिस्त्यज्यते देशः॥ महाविपुलोपगीतिका उदाहरण- विपुलोपगीतिझंकारमुखरिते भ्रमरमालानाम। रैवतकोपवने वस्तुमस्तु सततं मम प्रीतिः॥ पथ्या-महाचपलोपगीतिका उदाहरण- विषयाभिलाभिलाषः करोति चित्तं सदा चपलम्। वैराग्यभावनानां तथोपगीत्या भवेत् स्वस्थम्॥ महाविपुला महाचपलोपगीतिका उदाहरण- विपुलोपगीति संत्यज्यतामिदं स्थानकं भिक्षो। विषयाभिलाषदोषेण बाध्यते चञ्चलं चेतः॥ ३. पथ्योद्गीतिका उदाहरण- व्याध इवोद्गीतिरवैः प्रथमं तावन्मनो हरसि। दुर्नयकर विश्राम्यसि पश्चात् प्राणेषु विप्रियैः शल्यैः॥ महाविपुलोद्गीतिका उदाहरण- एषा तवापरोद्गीतिरत्र विपुला परिभ्रमति। तद्वल्लभामि यत्कीर्तिरखिलदिक्पालपार्श्वमुपयाति॥ पथ्यामहाचपलोद्गीतिका उदाहरण- उद्गीतिरत्र नित्यं प्रवर्त्तते कामचपलानाम्। तस्मान्मुने विमुञ्च प्रदेशमेतं समेतमेताभिः॥ महाविपुला महाचपलोद्गीतिका उदाहरण- विपुला पयोधरश्रोणिमण्डले चक्षुषोश्चपला। उद्गीतिशालिनी कामिनी च सा वर्णिनां मनो हरति॥ ४. पथ्या आर्यागीतिका उदाहरण- अजमजरममरमेकं प्रत्यक्तैन्यमीश्वरं ब्रह्म परम्। आत्मानं भावयती भवमुक्तिः स्यादितीयमार्यागीतिः॥ महाविपुला आर्यागीतिका उदाहरण- विपुलाभिलाषमृगतृष्णिका ध्रुवं हन्ति हरिणमिव हतहृदयम्। विपुलात्ममोक्षसुखकाङ्क्षिभिस्ततस्त्यज्यते विषयरससङ्गः॥ पथ्या जघनचपलार्यागीतिका उदाहरण- वाताहतोर्मिमालाचपलं सम्प्रेक्ष्य विषयसुखमल्पतरम्। मुक्त्वा समस्तसङ्गं तपोवनान्य्याश्रयन्ति तेनात्मविदः॥ महाविपुला महाचपला आर्यागीतिका उदाहरण- चपलानि चक्षुरादीनि चित्तहारी च हन्त हतविषयगणः। एकान्तशीलिनां योगिनामतो भवति परमसुखसम्प्राप्तिः॥

६८० * अग्निपुराण *

चरणोंमें सोलह लघु हों तथा इनमेंसे प्रत्येक चरणके अन्तमें रगण (ऽ।ऽ), एक लघु और एक गुरु हो तो 'वैतालीय'¹ नामक छन्द होता है। [रगण, लघु और गुरु मिलाकर आठ मात्राएँ होती हैं, इनके सिवा प्रथम-तृतीय पादोंमें छः-छः मात्राएँ और द्वितीय-चतुर्थ चरणोंमें आठ-आठ मात्राएँ ही शेष रहती हैं। इन्हें जोड़कर ही चौदह-सोलह मात्राओंकी व्यवस्था की गयी है।] वैतालीय छन्दके अन्तमें एक गुरु और बढ़ जाय तो उसका नाम 'औपच्छन्दसक'² होता है॥ ११-१२॥

पूर्वोक्त वैतालीय छन्दके प्रत्येक चरणके अन्तमें जो रगण, लघु और गुरुकी व्यवस्था की गयी है, उसकी जगह यदि भगण और दो गुरु हो जायें तो उस छन्दका नाम 'आपातलिका'³ होता है। उपर्युक्त वैतालीय छन्दके अधिकारोंमें जो रगण आदिके द्वारा प्रत्येक चरणके अन्तमें आठ लकारों (मात्राओं)-का नियम किया गया है, उनको छोड़कर प्रत्येक चरणमें जो 'लकार' शेष रहते हैं, उनमेंसे सम लकार विषम लकारके साथ मिल नहीं सकता। अर्थात् दूसरा तीसरेके और चौथा पाँचवेंके साथ संयुक्त नहीं हो सकता; उसे पृथक् ही रखना चाहिये। इससे विषम लकारोंका सम लकारोंके साथ मेल अनुमोदित होता है। द्वितीय और चतुर्थ चरणोंमें लगातार छः लकार पृथक्-पृथक् नहीं प्रयुक्त होने चाहिये। प्रथम और तृतीय चरणोंमें रुचिके अनुसार किया जा सकता है।⁴ अब 'प्राच्यवृत्ति' नामक वैतालीय छन्दका दिग्दर्शन कराया जाता है। जब दूसरे और चौथे चरणमें चतुर्थ लकार (मात्रा) पञ्चम लकारके साथ संयुक्त हो तो उसका नाम 'प्राच्यवृत्ति'⁵ होता है। [यद्यपि सम लकारका विषम लकारके साथ मिलना निषिद्ध किया गया है, तथापि वह सामान्य नियम है; प्राच्यवृत्ति आदि विशेष स्थलोंमें उस नियमका अपवाद होता है।] शेष लकार पूर्वोक्त प्रकारसे ही रहेंगे। जब प्रथम और तृतीय चरणमें दूसरा लकार तीसरेके साथ मिश्रित होता है, तब 'उदीच्यवृत्ति'⁶ नामक वैतालीय कहलाता है। शेष लकार पूर्वोक्त रूपमें ही रहते हैं। जब दोनों लक्षणोंकी एक साथ ही प्रवृत्ति


१. वैतालीय छन्दके विभिन्न उदाहरण—
(क) शुत्क्षीणशरीरसंचया व्यक्तीभूतशिरोऽस्थिपञ्जराः। केशैः परुषैस्तवारयो वैतालीयतनुं वितन्वते॥
(ख) तव तन्वि कटाक्षवीक्षितैः प्रसरद्भिः श्रवणान्तगोचरैः। विशिखैरिव तीक्ष्णकोटिभिः प्रहतः प्राणिति दुष्करं नरः॥
(ग) शवशोणितपङ्कचर्चितं पुरुषान्त्रग्रथितोर्ध्वमूर्धजम्। वपुरातपवह्निदीपितं वैतालीयमिदं विलोक्यताम्॥
२. औपच्छन्दसकका उदाहरण—
वाक्यैर्मधुरैः प्रतार्य पूर्वं यः पश्चादभि संदधाति मित्रम्। तं दुष्टमतिं विशिष्टगोष्ठ्यामौपच्छन्दसकं वदन्ति बाह्यम्॥
३. आपातलिकाका उदाहरण—
पिङ्गलकेशी कपिलाक्षी वाचाटा विकटोन्नतदन्ती। आपातलिका पुनरेषा नृपतिकुलेऽपि न भाग्यमुपैति॥
४. वैतालीय छन्दमें इसका उदाहरण—
समरशिरसि सह्यते द्विषां नवनिशितायुधवृष्टिरग्रतः। कुवलयदलदीर्घचक्षुषां प्रमदानां न कटाक्षवीक्षितम्॥
औपच्छन्दसकमें—
परयुवतिषु पुत्रभावमादौ कृत्वा प्रार्थयते पुनः पतित्वम्। इदमपरमिहोच्यते विशेषादौपच्छन्दसकं खलस्य वृत्तम्॥
आपातलिकामें—
अभिरमयति किंनरकण्ठी हंसगतिः श्रवणायतनेत्रा। विशदकमलकोमलाङ्गी युवतिरियं हृदयं तरुणानाम्॥
५. प्राच्यवृत्तिका उदाहरण—
विपुलार्थसुवाचकाक्षराः कस्य नाम न हरन्ति मानसम्। रसभावविशेषपेशलाः प्राच्यवृत्तिकविकाव्यसम्पदः॥
६. उदीच्यवृत्तिका उदाहरण—
अवाचकर्मनूर्जिताक्षरं श्रुतिदुष्टं यतिकष्टमक्रमम्। प्रसादरहितं च नेष्यते कविभिः काव्यमुदीच्यवृत्तिभिः॥

  • अध्याय ३३१ * ६८१

हो, अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें पञ्चम लकारके साथ चौथा मिल जाय और प्रथम एवं तृतीय चरणोंमें तृतीयके साथ द्वितीय लकार संयुक्त हो जाय तो ‘प्रवृत्तिक’१ नामक छन्द होता है। जिस वैतालीय छन्दके चारों चरण विषम पादोंके ही अनुसार हों, अर्थात् प्रत्येक पाद चौदह लकारोंसे युक्त हो तथा द्वितीय लकार तृतीयसे मिला हो, उसे ‘चारुहासिनी’२ कहते हैं। जब चारों चरण सम पादोंके लक्षणसे युक्त हों अर्थात् सबमें सोलह लकार (मात्राएँ) हों और चतुर्थ लकार पञ्चमसे मिला हो तो उसका नाम ‘अपरान्तिका’३ है। जिसके प्रत्येक पादमें सोलह लकार हों, किंतु पादके अन्तिम अक्षर गुरु ही हों, उसे ‘मात्रासमक’४ नामक छन्द कहा गया है। साथ ही इस छन्दमें नवम लकार किसीसे मिला नहीं रहता। जिस ‘मात्रासमक’के चरणमें बारहवाँ लकार अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है, किसीसे मिलता नहीं, उसका नाम ‘वानवासिका’५ है। जिसके चारों चरणोंमें पाँचवाँ और आठवाँ लकार लघुरूपमें ही स्थित रहता है, उसका नाम ‘विश्लोक’६ है। जहाँ नवाँ भी लघु हो, वह ‘चित्रा’७ नामक छन्द कहलाता है। जहाँ नवाँ लकार दसवेंके साथ मिलकर गुरु हो गया हो, वहाँ ‘उपचित्रा’८ नामक छन्द होता है। मात्रासमक, विश्लोक, वानवासिका, चित्रा और उपचित्रा—इन पाँचोंमें जिस-किसी भी छन्दके एक-एक पादको लेकर जब चार चरणोंका छन्द बनाया जाय, तब उसे ‘पादाकुलक’९ कहते हैं। जिसके प्रत्येक चरणमें सोलह लघु स्वरूपसे ही स्थित हों, किसीसे मिलकर गुरु न हो गये हों, उस छन्दका नाम ‘गीत्यार्या’१० है। इसी गीत्यार्यामें जब आधे भागकी सभी मात्राएँ गुरुरूपमें हों और आधे भागकी मात्राएँ लघुरूपमें तो उसका नाम ‘शिखा’ होता है। इसीके दो भेद हैं—पूर्वाधर्भागमें लघु-ही-लघु और उत्तरार्धमें गुरु-ही-गुरु हों तो उसका नाम ‘ज्योति’११ बताया गया है। इसके विपरीत पूर्वार्धभागमें सब गुरु और उत्तरार्धमें सब लघु हों तो ‘सौम्या’१२ नामक छन्द होता है। जब पूर्वार्धभागमें उन्तीस लकार और उत्तरार्धमें इकतीस लकार हों एवं अन्तिम दो लकारोंके स्थानमें एक-एक गुरु हो तो उसका नाम ‘चूलिका’१३

१. इदं भरतवंशभूभृतां श्रूयतां श्रुतिमनोरसायनम्। पवित्रमधिकं शुभोदयं व्यासवक्त्रकथितं प्रवृत्तकम्॥
२. मनाक्प्रसृतदन्तदीधितिः स्मरोल्लसितगण्डमण्डला। कटाक्षललिता तु कामिनी मनो हरति चारुहासिनी॥
३. स्थिरविलासनतमौक्तिकावली कमलकोमलाङ्गी मृगेक्षणा। हरति कस्य हृदयं न कामिनः सुरतकेलिकुशलापरान्तिका॥
४. अश्मश्रुमुखो विरलैर्दन्तैर्गम्भीराक्षो मितानासाग्रः। निर्मांसहनुः स्फुटितैः केशैर्मात्रासमकं लभते दुःखम्॥
५. मन्मथचापध्वनिरमणीयः सुरतमहोत्सवपटहनिनादः। वनवासस्त्रीस्वनितविशेषः कस्य न चित्तं रमयति पुंसः॥
६. भ्रातृगुणरहितं विश्लोकं दुर्नयचरणकदर्थितलोकम्। जातं महितकुलेऽप्यविनीतं मित्रं परिहर साधुविगीतम्॥
७. यदि वाञ्छसि परपदमारोढुं मैत्रीं परिहर सह वनिताभिः। मुह्यति मुनिरपि विषयात्सङ्गाच्चित्रा भवति हि मनसो वृत्तिः॥
८. यच्चित्तं गुरुसक्तमुदारं विद्याभ्यासमहाव्यसनं च। पृथ्वी तस्य गुणैरुपचित्रा चन्द्रमरीचिनिभैर्भवतीथम्॥
९. अलिवाचालितविकसितचूते काले मदनसमागमदूते। स्मृत्वा कान्तां विरहितसार्थः पादाकुलकं धावति पान्थः॥
(इसमें मात्रासमक, विश्लोक, वानवासिका और उपचित्राके चरण हैं।)
१०. मदकलखगकुलकलरवमुखरिणि विकसितसरसिजपरिमलसुरभिणि।
गिरिवरपरिसरसरसि महति खलु रतिरतिशयमिह मम हृदि विलसति॥
११. यदि सुखमनुपममपरमभिलषसि परिहर युवतिषु रतिमतिशयमिह।
आत्मज्योतिर्योगाभ्यासाद् दृष्ट्वा दुः खच्छेदं कुर्याः॥
१२. सौम्यां दृष्टिं देहि स्नेहाद् देहेऽस्माकं मानं मुक्त्वा।
शशधरमुखि सुखमुपनय मम हृदि मनसिजरुजमपहर लघुतरमिह॥
१३. रतिकरमलयमरुति शुभशशभृति समभिहतहिममहसि मधुसमये।
प्रवससि पथिक विरहितं कथमिह तु परिहृतयुवतिरतिचपलतया॥

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

६८२ * अग्निपुराण *

होता है। छन्दकी मात्राओंसे उसके अक्षरोंमें जितनी कमी हो, उतनी गुरुकी संख्या और अक्षरोंसे जितनी कमी गुरुकी संख्यामें हो, उतनी लघुकी संख्या मानी गयी है। तात्पर्य यह है$^१$ कि यदि कोई पूछे, इस आर्यामें कितने लघु और कितने गुरु हैं तो उस आर्याको लिखकर उसकी सभी मात्राओंकी गणना करके कहीं लिख ले, फिर अक्षरोंकी संख्या लिख ले। मात्राके अङ्कोंमेंसे अक्षरोंके अङ्क घटा दे; जितना बचे, वह गुरुकी संख्या हुई। इसी प्रकार अक्षरसंख्यामें गुरुकी संख्या घटा देनेपर जो बचे, वह लघु अक्षरोंकी संख्या होगी$^२$। इस प्रकार वर्ण आदिके अन्तरसे गुरु-लघु आदिका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये॥ १३-१८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छन्दोजात्तिका निरूपण' नामक
तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३१॥


तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय

विषमवृत्तका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—[छन्द या पद्य दो प्रकारके हैं—'जाति' और 'वृत्त'। यहाँतक 'जाति' छन्दोंका निरूपण किया गया, अब 'वृत्त'का वर्णन करते हैं—] वृत्तके तीन भेद हैं—सम, अर्धसम तथा विषम। इन तीनोंका प्रतिपादन करता हूँ। 'समवृत्त'की संख्यामें उतनी ही संख्यासे गुणा करे। इससे जो गुणनफल हो, उसे अर्धसमवृत्तकी संख्या समझनी चाहिये। इसी प्रकार 'अर्धसमवृत्त'की संख्यामें भी उसी संख्यासे गुणा करनेपर जो अङ्क उपलब्ध हो, वह 'विषमवृत्त'की संख्या है। विषमवृत्त और अर्धसमवृत्तकी संख्यामेंसे मूलराशि घटा देनी चाहिये। इससे शुद्ध विषम और शुद्ध अर्धसमवृत्तकी संख्याका ज्ञान होगा। [केवल गुणनसे जो संख्या ज्ञात होती है, वह मिश्रित होती है; उसमें अर्धसमके साथ सम और विषमके साथ अर्धसमकी संख्या भी सम्मिलित रहती है$^३$।] जो अनुष्टुप् छन्द प्रत्येक चरणमें गुरु और लघु अक्षरोंद्वारा समाप्त होता है, अर्थात् जिसके प्रत्येक


१. 'एकोनत्रिंशदन्ते' इत्यादिकी व्याख्या इस प्रकार भी की जा सकती है—इकतीस मात्राएँ एवं अन्तमें गुरु होनेसे 'चूलिका' का आधा भाग सम्पन्न होता है। इस प्रकार इसके पूर्वार्ध और उत्तरार्ध दोनोंमें ही इकतीस-इकतीस मात्राएँ होती हैं तथा अन्तिम दो मात्राएँ गुरुके रूपमें रहती हैं। इस छन्दमें पादकी व्यवस्था नहीं है। इसका उदाहरण इस प्रकार है—
घनपरिमलमिलदलिकुलमुखरितनिखिलकमलवनमलयजवने ।
जनयति मनसि मम तु शशिमुखि मुदमतिशयितमिह मधुरयमधुना ॥
२. उदाहरणार्थ यह 'आर्या' छन्द प्रस्तुत है—
स्तनयुगलमश्रुस्नातं समीपतरवर्ति हृदयशोकाग्नेः। चरति विमुक्ताहारं व्रतमिव भवतो रिपुस्त्रीणाम् ॥
इसमें मात्रासंख्या ५७ है, इसमेंसे अक्षरसंख्या चालीस घटी, शेष बचा १७। इतने गुरुवर्ण हैं। अक्षरसंख्या ४० में १७ गुरुसंख्या घटा दी गयी। शेष २३ लघुसंख्या है। इसी तरह अन्यत्र समझना चाहिये।
३. इन सब भेदोंको इस प्रकार समझना चाहिये। गायत्री छन्दमें कितने समवृत्त, कितने अर्धसमवृत्त और कितने विषमवृत्त होंगे, इसकी संख्या दी जाती है। गायत्री छन्द चौबीस अक्षरोंका है। इसके चार भाग करनेपर एक-एक पादमें छः-छः अक्षर हो सकते हैं। इसमें वर्णप्रस्तारके नियमानुसार प्रस्तार करनेपर सर्वगुरुसे लेकर सर्वलघूतक चौंसठ भेद हो सकते हैं। ये सभी समवृत्तके भेद हैं। उपर्युक्त नियमानुसार समवृत्तकी संख्या चौंसठमें चौंसठका गुणा करनेपर ४०९६ होती है। यह सममिश्रित अर्धसमवृत्तकी संख्या हुई। पुनः इसमें इतनी ही संख्यासे गुणा करनेपर १६७७७२१६ होता है। यह सम अर्धसम-मिश्रित विषमवृत्तकी संख्या हुई। इसमें मूलराशि गुण्य अङ्क ४०९६ को घटा देनेपर १६७७३१२० होता है। यह शुद्ध विषमवृत्तकी संख्या हुई। इसी प्रकार ४०९६ में मूलराशि ६४ घटा देनेपर ४०३२ शेष रहा। यह 'शुद्ध अर्धसमवृत्त'की संख्या हुई।

* अध्याय ३३२ *६८३

पादमें अन्तिम दो वर्ण क्रमशः गुरु-लघु होते हैं, उसे 'समानी'$^१$ नाम दिया गया है। जिसके चारों चरणोंके अन्तिम वर्ण क्रमशः लघु और गुरु हों, उसकी 'प्रमाणी'$^२$ संज्ञा है। इन दोनोंसे भिन्न स्थितिवाला छन्द 'वितान'$^३$ कहलाता है। [इसके अन्तिम दो वर्ण केवल लघु अथवा केवल गुरु भी हो सकते हैं।] यहाँसे तीन अध्यायोंतक 'पादस्य' इस पदका अधिकार है तथा 'पदचतुरूर्ध्व' छन्दके पहलेतक 'अनुष्टुब्वक्त्रम्'का अधिकार है। तात्पर्य यह कि आगे बताये जानेवाले कुछ अनुष्टुप् छन्द 'वक्त्र' संज्ञा धारण करते हैं। 'वक्त्र' जातिके छन्दमें पादके प्रथम अक्षरके पश्चात् सगण (॥ऽ) और नगण (॥।) नहीं प्रयुक्त होने चाहिये।$^४$ इन दोनोंके अतिरिक्त मगण आदि छः गणोंमेंसे किसी एक गणका प्रयोग हो सकता है। पादके चौथे अक्षरके बाद भगण (ऽ॥)-का प्रयोग करना उचित है।$^५$ जिस 'वक्त्र' जातिके छन्दमें द्वितीय और चतुर्थ पादके चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग हो, उसे 'पथ्या वक्त्र'$^६$ कहते हैं। किसी-किसीके मतमें इसके विपरीत न्यास करनेसे, अर्थात् प्रथम एवं तृतीय पादके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग करनेसे 'पथ्या'$^७$ संज्ञा होती है। जब विषम पादोंके चतुर्थ अक्षरके बाद नगण (॥।) हों तथा सम पादोंमें चतुर्थ अक्षरके बाद यगण (।ऽऽ)-की ही स्थिति हो तो उस 'अनुष्टुब्वक्त्र'का नाम 'चपला'$^८$ होता है। जब सम पादोंमें सातवाँ अक्षर लघु हो, अर्थात् चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।) हो तो उसका नाम 'विपुला'$^९$ होता है। [यहाँ सम पादोंमें तो सप्तम लघु होगा ही, विषम पादोंमें भी यगणको बाधितकर अन्य गण हो सकते हैं—यही 'विपुला' और 'पथ्या'का भेद है।] सैतव आचार्यके मतमें विपुलाके सम और विषम सभी पादोंमें सातवाँ अक्षर लघु होना चाहिये। जब प्रथम और तृतीय पादोंमें चतुर्थ अक्षरके बाद यगणको बाध कर विकल्पसे भगण (ऽ॥), रगण (ऽ।ऽ), नगण (॥।) और तगण (ऽऽ।) आदि हों तो 'विपुला'$^{१०}$ छन्द होता है।

इस प्रकार 'विपुला' अनेक प्रकारकी होती है। यहाँतक 'वक्त्र' जातिके छन्दोंका वर्णन किया गया। अनुष्टुप् छन्दके प्रथम पादके पश्चात्

१. समानीका उदाहरण—
वासवोऽपि विक्रमेण यत्समानतां न याति। तस्य वल्लभेश्वरस्य केन तुल्यता क्रियेत॥
ॐ नमो जनार्दनाय पापसंघमोचनाय। दुष्टदैत्यमर्दनाय पुण्डरीकलोचनाय॥
२. प्रमाणीका उदाहरण—
सरोजयोनिरम्बरे रसातले तथाच्युतः। तव प्रयाणमीक्षितुं क्षमौ न तौ बभूवतुः॥
३. वितानका उदाहरण—
तृष्णां त्यज धर्मं भज पापे हृदयं मा कुरु। इष्टा यदि लक्ष्मीस्तव शिष्टामनिशं संश्रय॥
हृदयं यस्य विशालं गणनायोगसमानम्। लभतेऽसौ मणिवित्रं नृपतिमूर्धिन वितानम्॥
४. नवधाराम्बुसंसिक्तं वसुधागन्धिनिःश्वासम्। किंचिदुन्नतघोणाग्रं मही कामयते वक्त्रम्॥
५. दुर्भाषितेऽपि सौभाग्यं प्रायः प्रकुरुते प्रीतिः। मातुर्मनो हरन्त्येव दौर्लालित्योक्तिभिर्बालाः॥
६. उदाहरण—नित्यं नीतिनिषण्णस्य राज्ञो राष्ट्रं न सीदति। न हि पथ्याशिनः काये जायन्ते व्याधिवेदनाः॥
७. उदाहरण—भर्तुराज्ञानुवर्तिनी या स्त्री स्यात् सा स्थिरा लक्ष्मीः। स्वप्रभुत्वाभिमानिनी विपरीता परित्याज्या॥
८. उदाहरण—क्षीयमाणाग्रदशना वक्त्रनिर्मांसनासाग्रा। कन्यका वाक्यचपला लभते धूर्तसौभाग्यम्॥
९. उदाहरण—सैतवेन यथार्णवं तीर्णो दशरथात्मजः। रक्षःक्षयकरौं पुनः प्रतिज्ञां स्वेन बाहुना॥
१०. यगणके द्वारा उदाहरण—
इयं सखे चन्द्रमुखी स्मितज्योत्स्ना च मानिनी। इन्दीवराक्षी हृदयं दंदहीति तथापि मे॥

इसी प्रकार अन्य भी बहुत-से उदाहरण हो सकते हैं। 'विपुला' छन्दके पादोंका चौथा अक्षर प्रायः गुरु ही होता है।

६८४ * अग्निपुराण *


जब प्रत्येक चरणमें क्रमशः चार-चार अक्षर बढ़ते जायें तो 'पदचतुरूर्ध्व' नामक छन्द होता है। [तात्पर्य यह कि इसके प्रथम पादमें आठ अक्षर, द्वितीय पादमें बारह, तृतीय पादमें सोलह और चतुर्थ पादमें बीस अक्षर होते हैं।] उक्त छन्दके चारों चरणोंमें अन्तिम दो अक्षर गुरु हों तो उसकी 'आपीड²' संज्ञा होती है। [यहाँ अन्तिम अक्षरोंको गुरु बतलानेका यह अभिप्राय जान पड़ता है कि शेष लघु ही होते हैं।] जब आदिके दो अक्षर गुरु और शेष सभी लघु हों तो उसका नाम 'प्रत्यापीड³' होता है। 'पदचतुरूर्ध्व' नामक छन्दके प्रथम पादका द्वितीय आदि पादोंके साथ परिवर्तन होनेपर क्रमशः 'मञ्जरी⁴' 'लवली⁵' तथा 'अमृतधारा⁶' नामक छन्द होते हैं। (अर्थात् जब प्रथम पादके स्थानमें द्वितीय पाद और द्वितीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हों तो 'मञ्जरी' छन्द होता है। जब प्रथम पादके स्थानमें तृतीय पाद और तृतीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हो तो 'लवली' छन्द होता है और जब प्रथम पादके स्थानमें चतुर्थ पाद और चतुर्थ पादके स्थानमें प्रथम पाद हो तो 'अमृतधारा' नामक छन्द होता है।) अब 'उद्गता' छन्दका प्रतिपादन किया जाता है। जहाँ प्रथम चरणमें सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (॥ऽ) और एक लघु—ये दस अक्षर हों, द्वितीय पादमें भी नगण (।।।), सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु—ये दस ही अक्षर हों, तृतीय पादमें भगण (ऽ।।), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), एक लघु तथा एक गुरु—ये ग्यारह अक्षर हों तथा चतुर्थ चरणमें सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु—ये तेरह अक्षर हों, वह 'उद्गता⁷' नामवाला छन्द है। उद्गताके तृतीय चरणमें जब रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), भगण (ऽ।।) और एक गुरु—ये दस अक्षर हों तथा शेष तीन पाद पूर्ववत् ही रहें तो उसका नाम 'सौरभ⁸' होता है। उद्गताके तृतीय पादमें जब दो नगण और दो सगण हों और शेष चरण ज्यों-के-त्यों रहें तो उसकी 'ललित⁹' संज्ञा होती है। जिसके प्रथम चरणमें यगण, सगण, जगण, भगण और दो गुरु (अठारह अक्षर) हों, द्वितीय चरणमें सगण, नगण, जगण,


१. तस्याः कटाक्षविक्षेपैः कम्पिततनुकुटिलैरतिदीर्घः।
तक्षकदष्ट इवेन्द्रियशून्यः क्षतचैतन्यः, पदचतुरूर्ध्वं न चलति पुरुषः पतति सहसैव॥
—इसमें गुरु-लघुका विभाग नहीं होता।
२. कुसुमितसहकारे हतहिममहिमशुचिशशाङ्के।
विकसितकमलसरसि मधुसमयेऽस्मिन्, प्रवससि पथिकहतक यदि भवति तव विपत्तिः॥
३. चित्तं मम रमयति, कान्तं वनमिदमुपगिरिनदि।
कूजन्मधुकरकलवरकृतजनधृति, पुंस्कोकिलमुखरितसुरभिकुसुमोपचिततरुवति॥
४. जनयति महतीं प्रीतिं हृदये, कामिनां चूतमञ्जरी।
मिलदलिचक्रचञ्चुपरिचुम्बितकेसरा, कोमलमलवयातपरिनर्तिततरुशिखरस्थिता॥
५. विरहविधुरहूणकाङ्क्षनाकपोलोपमं, परिणतिधरं पीतपाण्डुच्छवि।
लवलीफलं निदाघे, भवति जगति हिमकरशीतलमतिस्वादूष्णहरम्॥
६. परिवाञ्छसि कर्णरसायनं सततममृतधाराभिर्यदि हृदि वा परमानन्दरसम्।
चेतः शृणु धरणीधरवाणीममृतमयी तत्काव्यगुणभूषणम्॥
७. मृगलोचना शशिमुखी च, रुचिरदशना नितम्बिनी।
हंसललितगमना ललना, परिणीयते यदि भवेत् कुलोद्गता॥
८. विनिवारितोऽपि नयनेन, तदपि किमिहागतो भवान्।
एतदेव तव सौरभकं यदुदीरितार्थमपि नावबुद्ध्यसे॥
९. सततं प्रियंवदमनूनममलहृदयं गुणोत्तरम्।
सुललितमतिकमनीयतनुं पुरुषं त्यजन्ति न तु जातु योषितः॥

  • अध्याय ३३३ * ६८५

रगण और एक गुरु (तेरह अक्षर) हों, तृतीय चरणमें दो नगण और एक सगण (नौ अक्षर) हों तथा चतुर्थ चरणमें तीन नगण, एक जगण और एक भगण (पंद्रह अक्षर) हों, वह उपस्थित 'प्रचुपित'¹ नामक छन्द होता है। उक्त छन्दके तृतीय चरणमें जब क्रमशः दो नगण, एक सगण, फिर दो नगण और एक सगण (अठारह अक्षर) हों तो वह 'वर्धमान'² छन्द नाम धारण करता है। उसी छन्दमें तृतीय चरणके स्थानमें जब तगण, जगण और रगण (ये नौ अक्षर) हों तो वह 'शुद्ध विराषभ'³ छन्द कहलाता है। अब अर्धसमवृत्तका वर्णन करूँगा॥ १-१०॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विषमवृत्तका वर्णन' नामक तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३२॥


तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय

अर्धसमवृत्तोंका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—जिसके प्रथम चरणमें तीन सगण, एक लघु और एक गुरु (कुल ग्यारह अक्षर) हों, दूसरे चरणमें तीन भगण एवं दो गुरु हों तथा पूर्वार्धके समान ही उत्तरार्ध भी हो, वह 'उपचित्रक'⁴ नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें तीन भगण एवं दो गुरु हों और द्वितीय पादमें एक नगण (।।।), दो जगण (।ऽ।) एवं एक जगण हो, वह 'द्रुतमध्या'५ नामक छन्द होता है। [यहाँ भी प्रथम पादके समान तृतीय पाद और द्वितीय पादके समान चतुर्थ पाद जानना चाहिये। यही बात आगेके छन्दोंमें भी स्मरण रखनेयोग्य है।] जिसके प्रथम चरणमें तीन सगण और एक गुरु तथा द्वितीय चरणमें तीन भगण एवं दो गुरु हों, उस छन्दका नाम 'वेगवती'⁶ है। जिसके पहले पादमें तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) और एक गुरु तथा दूसरे चरणमें मगण (ऽऽऽ), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु हों, वह 'भद्रविराट्'⁷ नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें सगण, जगण, सगण और एक गुरु तथा द्वितीय पादमें भगण, रगण, नगण और दो गुरु हों, उसका नाम 'केतुमती'⁸ है। जिसके पहले चरणमें दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों तथा दूसरे चरणमें जगण, तगण, जगण एवं दो


१. रामा कामकरेणुका मृगायतनेत्रा, हृदयं हरति पयोधरावनम्रा।
इयमतिशयसुभगा, बहुविधनिधुवनकुशला ललिताङ्गी॥
२. बिम्बोष्ठि कठिनोन्नतस्तनाव्नताङ्गी, हरिणी शिशुनयना नितम्बगुर्वी।
जनयति मम मनसि मुदं मदिराक्षी, मदकलकरिगमना परिणतशशिवदना॥
३. कन्येयं कनकोज्ज्वला मनोहरदीप्तिः शशिनिर्मलवदना विशालनेत्रा।
पीनोरुनितम्बशालिनी सुखयति हृदयमतिशयं तरुणानाम्॥
४. उपचित्रकमत्र विराजते चूतवनं कुसुमैर्विकसद्भिः।
परपुष्टविघृष्टमनोहरं मन्मथकेलिनिकेतनमेतत्॥
५. यद्यपि शीघ्रगतिमद्रुगामी बहुधनवानपि दुःखमुपैति। नातिशयत्वरिता न च मृद्वी नृपतिगतिः कथिता द्रुतमध्या॥
६. तव मुञ्ज नराधिपसेनां वेगवतीं सहते समरेषु। प्रलयोर्मिमिवाभिमुखीं तां कः सकलक्षितिभृन्निवहेषु॥
७. यत्पादतले चकास्ति चक्रं हस्ते वा कुलिशं सरोरुहं वा।
राजा जगदेकचक्रवर्ती स्याच्छं भद्रविराट् समश्रुतेऽसौ॥
८. हतभूरिभूमिपतिचिह्नां युद्धसहस्रलब्धजयलक्ष्मीम्।
सहते न कोऽपि वसुधायां केतुमतीं नरेन्द्र तव सेनाम्॥

६८६ * अग्निपुराण *


गुरु हों, उसे 'आख्यानिकी'^[१] कहते हैं। इसके विपरीत यदि प्रथम चरणमें जगण, तगण, जगण एवं दो गुरु हों और द्वितीय चरणमें दो तगण, एक जगण तथा दो गुरु हों तो उसकी 'विपरीताख्यानकी'^[२] संज्ञा होती है। जिसके पहले पादमें तीन सगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा दूसरेमें नगण, भगण, भगण एवं रगण मौजूद हों, उस छन्दका नाम 'हरिणप्लुता'^[३] है। जिसके प्रथम चरणमें दो नगण, एक रगण, एक लघु और एक गुरु हो तथा दूसरे चरणमें एक नगण, दो जगण और एक रगण हो, वह 'अपरवक्त्र'^[४] नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें दो नगण, एक रगण और एक यगण हो तथा दूसरेमें एक नगण, दो जगण, एक रगण और एक गुरु हो, उसका नाम 'पुष्पिताग्रा'^[५] है। जिसके पहले चरणमें रगण, जगण, रगण, जगण हो तथा दूसरेमें जगण, रगण, जगण, रगण और एक गुरु हो उसे 'यवमती'^[६] कहते हैं। जिसके प्रथम और तृतीय चरणोंमें अट्ठाईस लघु और अन्तमें एक गुरु हो तथा दूसरे एवं चौथे चरणोंमें तीस लघु एवं एक गुरु हो तो उसका नाम 'शिखा'^[७] होता है। इसके विपरीत यदि प्रथम और तृतीय चरणोंमें तीस लघु और एक गुरु हो तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरणोंमें अट्ठाईस लघुके साथ एक गुरु हो तो उसे 'खञ्जा'^[८] कहते हैं। अब 'समवृत्त' का दिग्दर्शन कराया जाता है॥१-६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अर्धसमवृत्तका वर्णन' नामक तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥३३३॥


तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय

समवृत्तका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—'यति' नाम है विच्छेद या विरामका। [पादके अन्तमें श्लोकार्ध पूरा होनेपर तथा कहीं-कहीं पादके मध्यमें भी 'यति' होती है।] जिसके प्रत्येक चरणमें क्रमशः


^[१]. भृङ्गावलीमङ्गलगीतनादैर्जनस्य चित्ते मुदमादधाति।
आख्यानिकी च स्मरजन्मपाशमहोत्सवस्याश्रवणे कृणन्ती॥
^[२]. अलं तवालीकवचोभिरेभिः स्वार्थं प्रिये साधय कार्यमन्यत्।
कथं कथावर्णनकौतुकं स्यादाख्यानिकी चेद् विपरीतवृत्तिः॥
आख्यानिकीके दोनों भेद उपजातिके अन्तर्गत हैं। यहाँ विशेष संज्ञा-विधानके लिये पढ़े गये हैं।
^[३]. तव मुञ्ज नराधिप विद्विषां भयविवर्जितकेतुलघीयसाम्।
रणभूमिपराङ्मुखवर्त्मनां भवति शीघ्रगतिर्हरिणीप्लुता॥
^[४]. 'अपरवक्त्र' नामक छन्द 'वैतालीय' छन्दके अन्तर्गत है; फिर भी विशेष संज्ञा-विधानके लिये यहाँ पढ़ा गया है। उदाहरण—
सकृदपि कृपणेन चक्षुषा नरवर पश्यति यस्तवाननम्।
न पुनरपरवक्त्रमीक्षते स हि सुखितोऽर्थिजनस्तथाविधः॥
^[५]. यह छन्द 'औपच्छन्दसक' के अन्तर्गत है, तो भी विशेष संज्ञा देनेके लिये इस प्रकरणमें इसका पाठ किया गया है। उदाहरण—
समसितदशना मृगायताक्षी स्मितसुभगा प्रियवादिनी विदग्धा।
अपहरति नृणां मनांसि रामा भ्रमरकुलानि लतेव पुष्पिताग्रा॥
^[६]. पद्मकं तु कोमले करे विभाति प्रशस्तमत्स्यलाञ्छनं च पदे यस्याः।
सा यवान्विता भवेद्धनाधिका च समस्तबन्धुपूजिता प्रिया च पत्युः॥
^[७]. अभिमतबकुलकुसुमघनपरिमलमिलदलिमुखरितहरिति मधौ सहचरमलयपवनरयतरलितसरसिजरजसि शयतणि वितते।
विकसित विविधकुसुममुलभसुरभिशर मदननिहतसकलजने ज्वलयति मम हृदयमविरतमिह सुतनु तव विरहदहनविषमशिखा॥
^[८]. 'शिखा' छन्दके ही समान 'खञ्जा'का भी उदाहरण होगा। उसका सम इसका विषम होगा और उसका विषम इसका सम होगा।

  • अध्याय ३३४ * ६८७

तगण और यगण हों, उसका नाम ‘तनुमध्या’$^१$ है। [यह गायत्री छन्दका वृत्त है।] जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, सगण और एक गुरु हो, उसे ‘कुमारललिता’$^२$ कहते हैं। [यह उष्णिच् छन्दका वृत्त है। इसमें तीन, चार अक्षरोंपर विराम होता है।] दो भगण और दो गुरुसे जिसके चरण बनते हों, वह ‘चित्रपदा’$^३$ है। [यह अनुष्टुप् छन्दका वृत्त है, इसमें पादान्तमें ही यति होती है।] जिसके प्रत्येक पादमें दो मगण और दो गुरु हों, उसका नाम ‘विद्युन्माला’$^४$ है। [इसमें चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है। यह भी अनुष्टुप्का ही वृत्त है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, तगण, एक लघु और एक गुरु हो, उसको ‘माणवकाक्रीडितक’$^५$ कहते हैं। [इसमें भी चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है।] जिसके प्रति चरणमें रगण, नगण और सगण हो, वह ‘हलमुखी’$^६$ नामक छन्द है। [इसमें तीन, पाँच, छः अक्षरोंपर विराम होता है, यह बृहती छन्दका वृत्त है।]॥१-२॥

जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और एक मगण हो, वह ‘भुजङ्गशिशुभृता’$^७$ नामक छन्द है। [इसमें सात और दो अक्षरोंपर विराम है। यह भी बृहतीमें ही है।] मगण, नगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको ‘हंसरुत’$^८$ कहते हैं। जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, सगण, जगण और एक गुरु हों, वह ‘शुद्धविराट्’$^९$ नामक छन्द कहा गया है। [यहाँसे इन्द्रवज्राके पहलेतकके छन्द पङ्क्ति छन्दके अन्तर्गत हैं; इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें मगण, नगण, यगण और एक गुरु हों, वह ‘पणव’$^{१०}$ नामक छन्द है। [इसमें पाँच-पाँचपर विराम होता है।] रगण, जगण, रगण और एक गुरुयुक्त चरणवाले छन्दका नाम ‘मयूरसारिणी’$^{११}$ है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] मगण, भगण, सगण और एक गुरुयुक्त चरणवाला छन्द ‘मत्ता’$^{१२}$ कहलाता है। [इसमें चार-छःपर विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें तगण, दो जगण और एक गुरु हो, उसका नाम ‘उपस्थिता’$^{१३}$ है। [इसमें दो-आठपर विराम होता है।] भगण, मगण, सगण और एक गुरुसे युक्त पादवाला छन्द ‘रुक्मवती’$^{१४}$ कहलाता है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों उसका नाम ‘इन्द्रवज्रा’$^{१५}$ है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है। यहाँसे ‘वंशस्थ’के पहलेतकके छन्द बृहतीके अन्तर्गत हैं।] जगण, तगण, जगण


१. उदाहरण—धन्या त्रिषु नीचा कन्या तनुमध्या। श्रोणीस्तनगुर्वी रामा रमणीया॥
२. उदाहरण—यदीह पतिसेवारता भवति योषा। कुमारललितासौ सदैव नमनीया॥
३. उदाहरण—यस्य मुखे प्रियवाणी चेतसि सज्जनता च। चित्रपदापि च लक्ष्मीस्तं पुरुषं न जहाति॥
४. उदाहरण—विद्युन्मालालोलान् भोगान् मुक्त्वा मुक्तौ यत्नं कुर्यात्। ध्यानात्पन्नं निस्सामान्यं सौख्यं भोक्तुं यद्याकाङ्क्षेत्॥
५. उदाहरण—माणवकाक्रीडितकं यः कुरुते वृद्धवयाः। हास्यमसौ याति जने भिक्षुरिव स्त्रीचपलः॥
६. उदाहरण—गण्डयोरतिशयकृशं यन्मुखं प्रकटदशनम्। आयतं कलहनिरतं तां स्त्रियं त्यज हलमुखीम्॥
७. उदाहरण—इयमधिकतरं रम्या विकचकुवलयश्यमा। रमयति हृदयं यूनां भुजगशिशुभृता नारी॥
८. उदाहरण—अभ्यागामिशिशुलक्ष्मीमञ्जीरक्वचिततुल्यम्। तीरे राजति नदीनां रम्यं हंसरुतमेतत्॥
९. विश्वं तिष्ठति कुक्षिकोटरे वक्त्रे यस्य सरस्वती सदा। अस्मद्वंशपितामहो गुरुर्ब्रह्मा शुद्धविराट् पुनातु नः॥
१०. मीमांसारसममृतं पीत्वा शास्त्रोक्तिः पटुरितरा भाति। एवं संसदि विदुषां मध्ये जल्पामो जयपणबन्धत्वात्॥
११. उदाहरण—या वनान्तराण्युपैति कृष्णं द्रष्टुमुत्सुका शिखण्डमौलिम्। बर्हिणं विलोक्य राधिका मे सा मयूरसारिणी प्रणम्या॥
१२. उदाहरण—स्वैरालापैः श्रुतिपुटपेयैर्गीतैः शौरेरति विशेषैः। श्यामप्रेम्णा व्रजवनितानां मध्ये मत्ता विलसति कापि॥
१३. उदाहरण—एषा जगदेकमनोहरा कन्या कनकोज्ज्वलदीधितिः। लक्ष्मीरिव दानवसूदनं पुण्यैर्नरनाथमुपस्थिता॥
१४. उदाहरण—पादतले पद्मोदरगौरै राजति यस्या ऊर्ध्वगरेखा। सा भवति स्त्री लक्षणयुक्ता रुक्मवती सौभाग्यवती च॥
१५. उदाहरण—ये दुष्टदैत्या इह भूमिलोके द्वेषं व्यधुर्गोद्विजदेवसङ्घे। तानिन्द्रवज्रादपि दारुणाङ्गानजीघतद् यः सततं नमस्ते॥

६८८ * अग्निपुराण *


और दो गुरुसे युक्त पादोंवाला छन्द ‘उपेन्द्रवज्रा’$^१$ कहलाता है। [इसमें भी पादान्तमें विराम होता है।] जब एक ही छन्दमें इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा—दोनोंके चरण लक्षित हों, तब उस छन्दका नाम ‘उपजाति’$^२$ होता है। [इन दोनोंके मेलसे जो उपजाति बनती है, उसके प्रस्तारसे चौदह भेद होते हैं। इसी प्रकार ‘वंशस्थ’ और ‘इन्द्रवज्रा’ तथा ‘शालिनी’ और ‘वातोर्मी’के मेलसे भी उपजाति छन्द होता है।] ॥ ३-५॥

तीन भगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले वृत्तका नाम ‘दोधक’$^३$ है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, तगण, तगण और दो गुरु हों, उसका नाम ‘शालिनी’$^४$ है। इसमें चार और सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक पादमें मगण, भगण, तगण एवं दो गुरु हों, उसे ‘वातोर्मी’$^५$ छन्द नाम दिया गया है। इसमें भी चार-सातपर विराम होता है। प्रत्येक चरणमें मगण, भगण, तगण, नगण, एक लघु और एक गुरु होनेसे ‘भ्रमरविलसिता’$^६$ (या भ्रमरविलसिता) नामक छन्द होता है। इसमें भी चार और सात अक्षरोंपर ही विराम होता है। जिसके प्रति पादमें रगण, नगण, रगण, एक लघु और गुरु हों, उसे ‘रथोद्धता’$^७$ कहते हैं। इसमें भी पूर्ववत् चार और सात अक्षरोंपर विराम होता है। रगण, नगण, भगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको ‘स्वागता’$^८$ कहते हैं। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें दो नगण, सगण और दो गुरु हों, उसे ‘वृत्ता’$^९$ (या ‘वृन्ता’) कहते हैं। [इसमें चार-सातपर विराम होता है।] जिसके चरण रगण, जगण, रगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त हों, उसे ‘श्येनी’$^{१०}$ नामक छन्द कहा गया है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जगण, रगण, जगण एवं दो गुरुसे युक्त चरणवाले


१. उदाहरण—भवन्नखाः कुन्ददलश्रियो ये नमन्ति लक्ष्मीस्तनलेखनेऽपि।
उपेन्द्रवज्राधिककर्कशत्वं कथं गतास्ते रिपुदारणायाम्॥
२. उदाहरण—तत्रोपजातिर्विविधा विदग्धैः संयोज्यते तु व्यवहारकाले।
अतः प्रयत्नः प्रथमं विधेयो नृपेण पुंरत्नपरीक्षणाय॥
३. दोधकमर्थविरोधकमग्रं स्त्रीचपलं युधि कातरचित्तम्।
स्वार्थपरं मतिहीनममात्यं मुञ्चति यो नृपतिः स सुखी स्यात्॥
४. शस्त्रश्यामा स्निग्धमुग्धायताक्षी पीनश्रोणिर्दक्षिणावर्तनाभिः।
मध्ये क्षामा पीवरोरुस्तनी या श्लाघ्या भर्तुः शालिनी कामिनी सा॥
५. यात्युत्सेकं सपदि प्राप्य किंचित् स्याद् वा यस्याश्चपला चित्तवृत्तिः।
या दीर्घाङ्गी स्फुटशब्दाट्टहासा त्याज्या सा स्त्री द्रुतवातोर्मिमाला॥
६. किं ते वक्त्रं चलदलकचितं किं वा पद्मं भ्रमरविलसितम्।
इत्येवं मे जनयति मनसि भ्रान्तिं कान्ते परिसर सरसि॥
७. या करोति विविधैर्न रैः समं संगतिं परगृहे रता च या।
म्लानयत्युभयतोऽपि बान्धवान् मार्गधूलिरिव सा रथोद्धता॥
८. आहवं विशतो यदि राहुः पृष्ठतश्चरति वायुसमेतः।
प्राणवृत्तिरपि यस्य शरीरे स्वागता भवति तस्य जयश्रीः॥
९. द्विजगुरुपरिभवकारी यो नरपतिरतिधनलुब्धात्मा।
ध्रुवमिह निपतति पापोऽसौ फलमिव पवनहतं वृन्तात्॥
१०. क्रूरदृष्टिरयताग्रनासिका चञ्चला कठोरतीक्ष्णनादिनी।
युद्धकाङ्क्षिणी सदामिषप्रिया श्येनिकेव सा विगर्हिताङ्गना॥

  • अध्याय ३३४ * ६८९

छन्दका नाम 'रम्य'$^१$ एवं 'विलासिनी' है। [यहाँ पादान्तमें ही विराम होता है।]॥ ६-८॥

यहाँसे 'जगती' छन्दका अधिकार आरम्भ होता है [और 'प्रहर्षिणी'के पहलेतक रहता है]। जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, तगण, जगण और रगण हों, उस छन्दका नाम 'वंशस्थ'$^२$ है। [यहाँ पादान्तमें विराम होता है।] दो तगण, जगण तथा रगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको 'इन्द्रवंशी'$^३$ कहते हैं। [यहाँ भी पादान्तमें ही विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें चार सगण हों, उसका नाम 'तोटक'$^४$ बताया गया है। जिसके प्रत्येक पादमें नगण, भगण, भगण और रगण हों, उसका नाम 'द्रुतविलम्बित'$^५$ है। ['तोटक' और 'द्रुतविलम्बित' दोनोंमें पादान्त-विराम ही माना गया है।] जिसके सभी चरणोंमें दो-दो नगण, एक-एक मगण तथा एक-एक यगण हों, उस छन्दका नाम 'श्रीपुट'$^६$ है। इसमें आठ और चार अक्षरोंपर विराम होता है। जगण, सगण, जगण, सगणसे युक्त पादोंवाले छन्दको 'जलोद्धतगति'$^७$ कहते हैं। इसमें छः-छः अक्षरोंपर विराम होता है। दो नगण, एक मगण तथा एक रगणसे युक्त चरणवाले छन्दका नाम 'तत'$^८$ है। नगण, यगण, नगण, यगणसे युक्त पादवाला छन्द 'कुसुमविचित्रा'$^९$ कहलाता है। [इसमें भी छः-छः अक्षरोंपर विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और दो रगण हों, उसका नाम 'चञ्चलाक्षिका'$^{१०}$ है। [इसके भीतर सात-पाँचपर विराम होता है।] प्रत्येक पादमें चार यगण होनेसे 'भुजंगप्रयात'$^{११}$ और चार रगण होनेसे 'स्रग्विणी'$^{१२}$ नामक छन्द होता है। [इन दोनोंमें


१. विलासिनीविलासमोहितानां नृणां हृदि क्व सत्त्वशालि धैर्यम्।
स उर्वशीवशीकृतो नरेन्द्रस्तदर्थमुन्मना चचार भूमौ॥

२. विशुद्धवंशस्थमुदारचेष्टितं गुणप्रियं मित्रमुपात्तसज्जनम्।
विपत्तिमग्नस्य करावलम्बनं करोति यः प्राणपरिक्रयेण सः॥

३. कुर्वीत यो देवगुरुद्विजन्मनामुर्वीपतिः पालनमर्थलिप्सया।
तस्येन्द्रवंशेऽपि गृहीतजन्मनः संजायते श्रीः प्रतिकूलवर्तिनी॥

४. अमुना यमुनाजलकेलिकृता सहसा तरसा परिरभ्य धृता।
हरिणा हरिणाकुलनेत्रवती न ययौ नवयौवनभारवती॥

५. द्रुतगतिः पुरुषो धनभाजनं भवति मन्दगतिश्च सुखोचितः।
द्रुतविलम्बितखेलगतिर्नृपः सकलराज्यसुखं प्रियमश्नुते॥

६. न विचलति कथंचिन्न्यायमार्गाद् वसुनि शिथिलमुष्टिः पार्थिवो यः।
अमृतपुट इवासौ पुण्यकर्मा भवति जगति सेव्यः सर्वलोकैः॥

७. भनक्ति समरे बहून्पि रिपून हरिः प्रभूरसौ भुजोर्जितबलः।
जलोद्धतगतिर्यथैव मकरस्तरङ्गनिकरं करेण परितः॥

८. कुरु करुणमियं गाढोत्कण्ठिका यदुतनय चकोरी कामाधिका।
विरहदहनसङ्गादङ्गैः कृशा पिबतु तव मुखेन्दोर्बिम्बं दृशा॥

९. धूतनवह्वारं विगतविकारं सदयमुदारं विमलविचारम्।
विरचितवेषं विबुधविशेषं वरयति शय्या कुसुमविचित्रा॥

१०. अतिसुरभिरभाजि पुष्पश्रियायमतनुतरतयेव संतानकः।
तरुणपरभृतः स्वनं रागिणामतनुत रतये वसन्तानकः॥

११. पुरः साधुवद्वाति मिथ्या विनीतः परोक्षे करोत्यर्थनाशं हताशः।
भुजंगप्रयातोपमं यस्य चित्तं त्यजेत्तादृशं दुश्चरित्रं कुमित्रम्॥

१२. यो रणे युद्धयते निर्भरं निर्भयस्त्यागिता यस्य सर्वस्वदानाविधिः।
तं नरं वीरलक्ष्मीर्यशःस्रग्विणी नूनमभ्येति सत्कीर्तिशुक्लांशुका॥

६९० * अग्निपुराण *


पादान्तविराम माना गया है।] जिसके प्रत्येक चरणमें सगण, जगण तथा दो सगण हों, उसकी ‘प्रमिताक्षरा’$^१$ संज्ञा होती है। [इसमें भी पादान्तविराम ही अभीष्ट है।] भगण, मगण, सगण, मगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको ‘कान्तोत्पीडा’$^२$ कहते हैं। [इसमें भी पादान्त-विराम माना गया है।] दो मगण और दो यगणयुक्त चरणवाले छन्दको ‘वैश्वदेवी’$^३$ नाम दिया गया है। इसमें पाँच-सात अक्षरोंपर विराम होता है। यदि प्रत्येक पादमें नगण, जगण, भगण और यगण हों तो उस छन्दका नाम ‘नवमालिनी’$^४$ होता है। यहाँतक ‘जगती’ छन्दका अधिकार है॥ ९—१३॥

[अब ‘अतिजगती’ छन्दके अवान्तर भेद बतलाते हैं—] जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, नगण, जगण, रगण तथा एक गुरु हों, उसकी ‘प्रहर्षिणी’$^५$ संज्ञा है। इसमें तीन और दस अक्षरोंपर विराम होता है। जगण, भगण, सगण, जगण तथा एक गुरुसे युक्त चरणवाले छन्दका नाम ‘रुचिरा’$^६$ है। इसमें चार तथा नौ अक्षरोंपर विराम माना गया है। मगण, तगण, यगण, सगण और एक गुरुयुक्त पादवाले छन्दको ‘मत्तमयूर’$^७$ कहते हैं। इसमें चार और नौ अक्षरोंपर विराम होता है। तीन नगण, एक सगण और एक गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी ‘गौरी’$^८$ संज्ञा है।

[अब शक्वरीके अन्तर्गत विविध छन्दोंका वर्णन किया जाता है—] जिसके प्रत्येक पादमें मगण, तगण, नगण, सगण तथा दो गुरु हों और पाँच एवं नौ अक्षरोंपर विराम होता हो, उसका नाम ‘असम्बाधा’$^९$ है। जिसके प्रतिपादमें दो नगण, रगण, सगण और एक लघु और एक गुरु हों तथा सात-सात अक्षरोंपर विराम होता हो, वह ‘अपराजिता’$^{१०}$ नामक छन्द है। दो नगण, भगण, नगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको ‘प्रहरणकलिता’$^{११}$ कहते हैं।


१. परिशुद्धवाक्यरचनातिशयं परिषिञ्चती श्रवणयोरमृतम्।
प्रमिताक्षरापि विपुलार्थवती तव भारती हरति मे हृदयम्॥
२. कान्तकोरैराप्ता यदि कान्तोत्पीडां सा मनुते क्रीडां मुदित स्वान्ता स्यात्।
स्नेहवती मान्या गृहिणी सम्राज्ञी गेहगता देवी सदृशी सा नित्यम्॥
३. धन्यः पुण्यात्मा जायते कोऽपि वंशे तादृक् पुत्रोऽसौ येन गोत्रं पवित्रम्।
गोविप्रज्ञातिस्वामिकार्ये प्रवृत्तः शुद्धं श्राद्धादौ वैश्वदेवी भवेद् यः॥
४. धवलयशोऽङ्कुरेण परिवीता सकलजनानुरागधुसृणाक्ता।
दृढगुणबद्धकीर्तिकुसुमौधै स्तव नवमालिनीव नृपलक्ष्मीः॥
५. श्रीवृन्दावननवकुञ्जकेलिसद्मा पद्माक्षी मुररिपुसङ्गशालिनी च।
श्रीराधा प्रियतममुष्टिमेयमध्या मद्ध्याने भवतु मनःप्रहर्षिणी मे॥
६. मृगत्वचा रुचिरतराम्वरक्रियः कपालभृत् कपिलजटाग्रपल्लवः।
ललाटदृग्दहनतृणीकृतस्मरः पुनातु वः शिशुशशिशेखरः शिवः॥
७. व्यूढोरस्कः सिंहसमानान्तमध्यः पीनस्कन्धो मांसलहस्तायतबाहुः।
कम्बुग्रीवः स्निग्धशरीरस्तनुलोमा भुङ्क्ते राज्यं मत्तमयूराकृतिनेत्रः॥
८. सकलभुवनजनगणनतपादा निजपदभजनशमितविषादा।
विजितसरसिरुहनयनपद्मा भवतु सकलमिह जगति गौरी॥
९. भङ्क्त्वा दुर्गाणि द्रुमवनमखिलं छित्त्वा हत्वा तत्सैन्यं करितुरगबलं हित्वा।
येनासम्बाधा स्थितिरजनि विपक्षाणां सर्वोर्वीनाथः स जयति नृपतिर्मुञ्जः॥
१०. फणिपतिवलयं जटामुकुटोज्ज्वलं मनसिजमथनं त्रिशूलविभूषितम्।
स्मरसि यदि सखे शिवं शशिशेखरं भवति तव तनुः परैरपराजिता॥
११. सुरमुनिमनुजैरुपचितचरणां रिपुभयचकितत्रिभुवनशरणम्।
प्रणमत महिषासुरवधकुपितां प्रहरणकलितां पशुपतिदयिताम्॥

  • अध्याय ३३४ * ६९१

इसमें सात-सातपर विराम होता है। तगण, भगण, दो जगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी ‘वसन्ततिलका’१ संज्ञा है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] किसी-किसी मुनिके मतमें इसका नाम ‘सिंहोन्नता’ और ‘उद्धर्षिणी’ भी है॥ १४-१७॥

[इसके आगे ‘अतिशक्करी’का अधिकार है।] जिसके प्रत्येक पादमें चार नगण और एक सगण हों, उसका नाम ‘चन्द्रावती’२ है। [इसमें सात-आठपर विराम होता है।] इसीमें जब छः और नौ अक्षरोंपर विराम हो तो इसका नाम ‘माला’३ होता है। आठ और सातपर विराम होनेसे यह छन्द ‘मणिगणनिकर’४ कहलाता है। दो नगण, मगण और दो यगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको ‘मालिनी’५ कहते हैं। इसमें भी आठ और सात अक्षरोंपर ही विराम होता है। भगण, रगण, तीन नगण और एक गुरुसे युक्त चरणवाले छन्दको ‘ऋषभगजविलसित’६ नाम दिया गया है। इसमें सात-नौ अक्षरोंपर विराम होता है। [यह ‘अष्टि’ छन्दके अन्तर्गत है।] यगण, मगण, नगण, सगण, भगण, एक लघु तथा एक गुरुसे युक्त चरणोंवाले छन्दको ‘शिखरिणी’७ कहते हैं। इसमें छः तथा ग्यारह अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, सगण, जगण, सगण, यगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ-नौ अक्षरोंपर विराम हो उसका नाम ‘पृथ्वी’८ है—यह पूर्वकालमें आचार्य पिङ्गलने कहा है। मगण, रगण, नगण, भगण, नगण, एक लघु तथा एक गुरुसे युक्त पदवाले छन्दको ‘वंशपत्रपतित’९ कहते हैं। इसमें दस-सातपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, एक लघु तथा एक गुरु हों और छः, चार एवं सात अक्षरोंपर विराम हो, उसका नाम ‘हरिणी’१० है। [शिखरिणीसे मन्दाक्रान्तातकका छन्द ‘अत्यष्टि’के अन्तर्गत है।] मगण, भगण, नगण, दो तगण तथा दो गुरुसे युक्त पादोंवाले


१. उद्धर्षिणी जनदृशां स्तनभारगुर्वी नीलोत्पलद्युतिमलिम्लुचलोचना च। सिंहोन्नतत्रिकतटी कुटिलालकान्ता कान्ता वसन्ततिलका नृपवल्लभासौ ॥ २. पटुजवपवनचलितजललहरीतरलितविहगनिचयरवमुखरम् । विकसितकमलसुरभिशुचिसलिलं विचरति पथिकमनसि शरदि सरः ॥ ३. नवविकसितकुवलयदलनयनं अमृतमधुररसमयमृदुवचनम्। मधुरिपुरुचिरजलजुगचरणं परिसर शरणमशरणशरणम्॥ ४. कथमपि निपतितमतिमहति पदे नरमनुसरति न फलमनुपचितम्। अपि वरयुवतिषु कुचतटनिहतः स्पृशति न वपुरिह मणिगणनिकरः ॥ ५. अतिविपुलललाटं पीवरोरःकपाटं सुघटितदशनोष्ठं व्याघ्रतुल्यप्रकोष्ठम्। पुरुषमशनिलेखा लक्षणं वीरलक्ष्मी रतिसुरभिशोभिमालिनीवाभ्युपैति ॥ ६. आयतबाहुदण्डमुपचितपृथुहृदयं पीनकटीप्रदेशमृषभगजविलसितम्॥ वीरमुदारसत्त्वमतिशयगुणरसिकं श्रीरतिचञ्चलापि न परिहरति पुरुषम्॥ ७. यशःशेषीभूते जगति नरनाथे गुणनिधौ प्रवृत्ते वैराग्ये विषयसनिष्क्रान्तमनसाम्। इदानीमस्माकं घनतरुलतां निर्झरवतीं तपस्तुङ्गं चेतो भवति गिरिमालां शिखरिणीम्॥ ८. हताः समिति शत्रवस्त्रिभुवने प्रकीर्णं यशः कृतञ्च गुणिनां गृहे निरवधिर्महानुत्सवः। त्वया कृतपरिग्रहे क्षितिपवीर सिंहासने नितान्तनिरवग्रहा फलवती च पृथ्वी कृता ॥ ९. अद्य कुरुष्व कर्म सुवृतं यदि परदिवसे मित्र विधेयमस्ति भवतः किमु चिरयसि तत्। जीवितमल्पकालकलनालघुतरतरलं नश्यति वंशपत्रपतितं हिमसलिलमिव ॥ १०. कुवलयदलेश्यामा पीनोन्नतस्तनशालिनी चकितहरिणीनेत्रच्छायामलिम्लुचलोचना । मनसिजधनुर्ज्यानिर्घोषैरिव श्रुतिपेशलैर्मनसि ललना लीलालापैः करोति ममोत्सवम् ॥

६९२ * अग्निपुराण *


छन्दको 'मन्दाक्रान्ता'<sup></sup> कहते हैं। इसमें चार, छः और सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके पादोंमें मगण, तगण, नगण तथा तीन यगण हों, वह 'कुसुमितलतावेल्लिता'<sup></sup> छन्द है। [यह 'धृति' छन्दके अन्तर्गत है।] इसमें पाँच, छः तथा सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, सगण, जगण, भगण, दो तगण और एक गुरु हों, उसका नाम 'शार्दूलविक्रीडित'<sup></sup> है। इसमें बारह तथा सात अक्षरोंपर विराम होता है। [यह छन्द 'अतिधृति'के अन्तर्गत है] ॥१८-२३॥

'सुवदना'<sup></sup> छन्द 'कृति'के अन्तर्गत है। इसके प्रत्येक पादमें मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, एक लघु और एक गुरु होते हैं। इसमें सात, सात, छःपर विराम होता है। जब कृतिके प्रत्येक पादमें क्रमशः गुरु और लघु अक्षर हों तो उसे 'वृत्त'<sup></sup> छन्द कहते हैं। मगण, रगण, भगण, नगण और तीन यगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दका नाम 'स्रग्धरा'<sup></sup> है। इसमें सात-सातके तीन विराम होते हैं। [यह 'प्रकृति' छन्दके अन्तर्गत है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, रगण, नगण, रगण, नगण, रगण, नगण तथा एक गुरु हों और दस-बारह अक्षरोंपर विराम होता हो, उसे 'सुभद्रक'<sup></sup> छन्द कहते हैं। [यह 'आकृति' छन्दके अन्तर्गत है।] नगण, जगण, भगण, जगण, भगण, जगण, भगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी 'अश्वललिता'<sup></sup> संज्ञा है। इसमें ग्यारह-बारहपर विराम होता है। [यह 'विकृति'के अन्तर्गत है] ॥ २४-२५$\frac{१}{२}$॥

जिसके प्रत्येक चरणमें दो मगण, एक तगण, चार नगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ और पंद्रहपर विराम हो, उसे 'मत्तक्रीडा'<sup></sup> [या मत्ताक्रीडा] कहते हैं। [यह भी 'विकृति'में ही है।] जिसके पृथक्-पृथक् सभी पादोंमें भगण, तगण, नगण, सगण, फिर दो भगण, नगण और यगण हों तथा पाँच, सात, बारहपर विराम होता हो, उसकी 'तन्वी'<sup>१०</sup> संज्ञा है। [यह 'संस्कृति' छन्दके अन्तर्गत है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, मगण, सगण, भगण, चार नगण और एक


१. प्रत्यादिष्टं समरशिरसः कां दिशं प्रप्य नष्टं त्वं निःशेषं कुरु रिपुबलं मार्गमासाद्य सद्यः। किं नाश्रौषीः परिणतधियां नीतियोग्योपदेशं मन्दाक्रान्ता भवति फलिनी नारिकेल्योः क्षयाय॥ २. धन्या नामैताः कुसुमितलतावेल्लितोत्फुल्लवृक्षाः सोत्कण्ठं कूजतपरभृतकलालापकोलाहलिन्यः। मध्वादौ माद्यन्मधुकरकलोद्गीतझांकाररम्य ग्रामात्तस्रोतःपरिसरभुवः प्रीतिमुत्पादयन्ति॥ ३. कम्बुग्रीवमुदग्रबाहुशिखरं रक्तान्तदीर्घेक्षणं शालप्रांशुशरीरमायतभुजं विस्तीर्णवक्षःस्थलम्। कीलस्कन्धमनुद्धतं परिजने गम्भीरसत्त्वस्वरं राज्यश्रीः समुपैति वीरपुरुषं शार्दूलविक्रीडितम्॥ ४. या पीनोद्गाढतुङ्गस्तनजघनघनाभोगलसद्गतिर्यस्याः कर्णावतंसोत्पलरुचिजयिनी दीर्घे च नयने। श्यामा सीमन्तिनीनां तिलकमिव मुखे या च त्रिभुवने संप्राप्ता साम्प्रतं मे नयनपथमसौ दैवात् सुवदना॥ ५. जन्तुमात्रादुःखकारिकर्म निर्मितं भवत्यनर्थहेतु तेन सर्वमात्मतुल्यमीक्षमाण उत्तमं सुखं लभस्व। विद्धि बुद्धिपूर्वकं ममोपदेशवाक्यमेतदादरेण वृत्तमेतदुत्तमं महाकुलप्रसूतजन्मनो हिताय॥ ६. रेखाभ्रूः शुभ्रदन्तद्युतिहसितशरच्चन्द्रिका चारूमूर्तिमद्धान्मातङ्गलीलारुचिरविपुलाभोगतुङ्गस्तनी या। रम्भास्तम्भोपमोरूरलिमलिनघनस्निग्धधम्मिल्लहस्ता राधायै रक्तकण्ठी दिशतु नवमुदं स्रग्धरा कापि गोपी॥ ७. भद्रकगीतिभिः सकृदपि स्तुवन्ति भव ये भवन्तमभवं भक्तिभ्रावनप्रशिरसः प्रणम्य तव पादयोः सुकृतिनः। ते परमेश्वरस्य पदवीमवाप्य सुखमाप्नुवन्ति विपुलं मर्त्यभुवं स्पृशन्ति न पुनर्मनोहरसुराङ्गनापरिवृताः॥ ८. पवनविधूतवीचिचपलं विलोकयति जीवितं तनुभृतां वपुरपि हीयमानमनिशं जरावशितया वशीकृतमिदम्। सपदि निपीडनव्यतिकरं यमादिव नराधिपामरयशः परवनितामवेक्ष्य कुरुते तथापि हतबुद्धिरश्वललितम्॥ ९. हृद्यं मद्यं पीत्वा नारी स्खलितगतिरतिशयरसिकहृदया मत्ताक्रीडालोलैरङ्गैर्मुदमखिलविटजनमनसि कुरुते। वीतक्रीडाश्लीलालापैः श्रवणसुखभगसुललितवचना नृत्यैर्गतैर्भूविक्षेपैः कलभणितविविधविहगकुलरुतैः॥ १०. चन्द्रमुखी सुन्दरघनजघना कुन्दसमानशिखरदशना या निष्कलवीणाश्रुतिसुखवचना त्रस्तकुरङ्गतारलनयनान्ता। निर्मुखपीनोन्नतकुचकलशा मत्तगजेन्द्रललितगतिभासा निर्भरलीलाचरितविततये नन्दकुमार भवतु तव तन्वी॥