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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

* अध्याय ३५० * ७३७

भवाँल्लेखा। भवाञ्जयः। भवाञ्छेते, भवाञ्शेते, भवाञ्शेते। भवाण्ड्डीनः। सम्भर्त्ता। त्वङ्करिष्यसि*

इत्यादि॥ ६-९॥ इसके बादकी पदावलियोंमें विसर्ग-


* वाक् यतः=वाग्यतः। ('झलां जशोऽन्ते।' पा० सू० ८।२।३९) 'पदान्तमें 'झल्' के स्थानमें 'जश्' होता है'—इस नियमके अनुसार 'वाक्'के 'क्' का 'ग्' हो गया है। यद्यपि जश्में ज् ब् ग् ड् द्—ये पाँच अक्षर हैं, तथापि 'क्'के स्थानमें 'ग्' होनेका कारण है स्थानकी समानता। 'क्' और 'ग्'का स्थान एक है। दोनों ही कण्ठस्थानसे निकलते हैं। आगेके चार उदाहरणोंमें भी यही नियम है—अच्+एकमातृकः=अजेकमातृकः। यहाँ 'च्' के स्थानमें 'ज्' हो गया है। स्वरहीन अक्षर अपने बादवाले अक्षरसे मिल जाते हैं, अतः 'ज्' 'ए' में मिलकर 'जे' बन गया। 'षट्+ एते'—इसमें 'ट्' के स्थानमें 'ड्' हुआ है। इसी तरह 'तत् + इमे' में 'त्'के स्थानमें 'द्' तथा 'अप्+आदि' में 'प्' के स्थानमें 'ब्' हुआ है। ये पूर्वनिर्दिष्ट जश्त्वविधानके उदाहरण हैं। अब अनुनासिकविधानके उदाहरण दिये जाते हैं—वाक्+नीतिः=वाङ्नीतिः। पदान्त 'यर्' प्रत्याहारके अक्षरोंका विकल्पसे अनुनासिक होता है, कोई अनुनासिक अक्षर परे हो तब। यदि प्रत्यय अनुनासिक परे हो तो 'यर्'के स्थानमें नित्य अनुनासिक होता है। इस नियमके अनुसार 'क्' के स्थानमें उसी वर्गका अनुनासिक अक्षर 'ङ्' हो गया। अनुनासिक न होनेकी स्थितिमें पूर्वनियमानुसार 'जश्त्व' होता है। उस दशामें 'वाग्नीतिः' रूप होता है। षट्+मुखः=षण्मुखः (षड्मुखः)। उक्त नियमसे 'ट्' की जगह उसीके स्थान (मूर्धा)-का अनुनासिक 'ण्' हुआ। जश्त्व होनेपर 'ड्' होता है। निम्नाङ्कित पदोंका पदच्छेद इस प्रकार है—वाक्+मनसम्=वाङ्मनसम्। वाक्+मात्रम्=वाङ्मात्रम्। अब छत्वविधानके उदाहरण देते हैं—वाक्+श्लक्ष्णम्= वाक्छ्लक्ष्णम्, वाक्श्लक्ष्णम्। यहाँ 'श्'के स्थानमें विकल्पेन 'छ्' हुआ है। नियम इस प्रकार है—'झय्' से परे 'श्' का 'छ्' हो जाता है, 'अम्' प्रत्याहार परे रहनेपर। श्चुत्वविधान— सकार-तवर्गके स्थानमें 'शकार' 'चवर्ग' होते हैं, शकार-चवर्गका योग होनेपर। 'तत्+शरीरम्'='तच्छरीरम्'। यहाँ 'शरीरम्'के शकारका योग होनेसे 'तत्' के 'त्' की जगह 'च्' हो गया। इसके बाद छत्व-विधानके नियमानुसार 'शकार'के स्थानमें 'छकार' हो गया। 'तल्लुनाति' यह लकारात्मक परसवर्णका उदाहरण है। नियम यह है कि 'तवर्गसे परे लकार हो तो उस तवर्गका 'परसवर्ण' होता है।' इसके अनुसार 'तत्+लुनाति' इस अवस्थामें 'त्' के स्थानमें 'ल्' हो गया। तत्+चरेत्=तच्चरेत्। यहाँ श्चुत्वविधानके नियमानुसार पूर्ववत् 'त्' की जगह 'च्' हो गया है। कृङ्+आस्ते=कृङ्ङास्ते। यह ङ्मुडागम-विधानका उदाहरण है। नियम है कि ह्रस्व अक्षरसे परे यदि 'ङ् ण् न्'—ये व्यञ्जन हों और इनके बाद स्वर अक्षर हों तो उक्त 'ङ्' आदिकी जगह एक और 'ङ्' आदि बढ़ जाते हैं। अर्थात् वे ङ् ङ्, ण् ण् और न् न् हो जाते हैं। इस नियमसे उक्त उदाहरणमें एक 'ङ्' की जगह दो 'ङ् ङ्' हो गये हैं। इसी तरह 'सुगण्+इह' की जगह 'सुगण्णह' बनता है। भवान्+चरन्='भवांश्चरन्'—यह नकाररुत्वविधानका उदाहरण है। नियम यह है—'प्रशान्' से भिन्न जो नकारान्त पद हैं, उनके 'न्' की जगह 'र्' हो जाता है, यदि बादमें 'छ् ठ् थ् च् ट् त्'—इनमेंसे कोई अक्षर विद्यमान हो, तब। इस नियमसे उक्त उदाहरणमें 'न्' के स्थानमें 'र्' हुआ। 'र्' का विसर्ग, विसर्गके स्थानमें 'स्' हुआ। 'स्' का श्चुत्व-विधानके अनुसार 'श्' हो गया। उसके पूर्व अनुस्वारका आगम होता है। कहीं-कहीं 'चिरम्' पाठ मिलता है। उस दशामें 'भवांश्चिरम्' रूप सिद्ध होगा। यदि 'चिरम्' के साथ परवर्ती 'भवान्' शब्द ले लिया जाय तो निम्नाङ्कितरूप सिद्ध होगा। चिरम्+भवान्=चिरंभवान्, चिरम्भवान्—यहाँ मकारके स्थानमें अनुस्वार हुआ है। अनुस्वारका वैकल्पिक परसवर्ण होनेपर 'चिरम्भवान्' रूप बनता है। 'मोऽनुस्वारः।'—इस पा० सूत्र (८।३।२३) के अनुसार मकारानुस्वारविधानका नियम इस प्रकार है—पदान्तमें 'म्'का अनुस्वार होता है, 'हल्' परे रहनेपर। ('नश्चापदान्तस्य झलि।' पा० सू० ८।३।२४) के अनुसार 'झल्' परे रहनेपर अपदान्त 'न् म्' के स्थानमें भी अनुस्वार होता है। 'न्'के अनुस्वारका उदाहरण है—'यशांसि'। 'म्' के अनुस्वारका उदाहरण है 'आक्रंस्यते'। भवान्+छात्रः=भवांश्छात्रः। यहाँ पूर्ववत् नकाररुत्व-विधानके अनुसार नकारका रुत्व, विसर्ग, सकार तथा अनुस्वारागम होकर श्चुत्वविधानके अनुसार 'स्' के स्थानमें 'श्' हो गया है। भवान्+टीका=भवाँष्टीका। यहाँ भी 'न्' की जगह रुत्व, विसर्ग और सकार होकर अनुस्वारागम हुआ और ष्टुत्व-विधानके अनुसार 'स्'के स्थानमें 'ष्' हो गया। यही बात 'भवाँष्ठकः'के साधनमें भी समझनी चाहिये—भवान्+ठकः। भवान्+तीर्थम्—भवाँस्तीर्थम्। यहाँ भी नकारका रुत्व, विसर्ग, सकार और अनुस्वारागम समझना चाहिये। 'भवान्+था+इत्याह—इसमें भी पूर्ववत् सब कार्य होंगे और था+इत्याहमें गुण एकादेश होनेपर 'भवांस्थेत्याह'—ऐसा रूप सिद्ध होगा। 'भवान्+लेखाः=भवाँल्लेखाः।'—यहाँ लकारातमक परसवर्ण सानुनासिक हुआ है। 'भवान्+जयः' इसमें श्चुत्वविधानके अनुसार चवर्ग-योगके कारण तवर्गीय 'न्' की जगह चवर्गीय 'ज्' हो गया है। 'भवान्+शेते' इस पदच्छेदमें 'भवाञ्छेते, भवाञ्छेते, भवाञ्शेते, भवाञ् शेते।'—ये रूप बनते हैं। पहलेमें 'शि तुक्।' पा० सू० (८।३।३१) के अनुसार 'शकार' परे रहते नान्त पदको 'तुक्'का आगम होता है। इसे 'नान्ततुगागम' कहा जा सकता है। इसी तरह ह्रस्व, दीर्घ और पदान्तसे परे भी तुगागम होते हैं। यहाँ 'नान्ततुगागम'के अनुसार 'तुक्' हुआ। 'उक्' की इत्संज्ञा हुई, लोप हुआ। 'भवान् त् शेते' रहा। श्चुत्वविधानके अनुसार 'त्' के स्थानमें 'च्' और 'न्' के स्थानमें 'ज्' हुआ और 'श्' की जगह 'छ्' हुआ तो 'भवाञ्छेते' बना। 'झरो झरि सवर्णे।' (पा० सू० ८।४।६५) के अनुसार 'झर्'का लोप होनेपर 'च्' अदृश्य हो जाता है, अतः

७३८* अग्निपुराण *

संधि* जाननी चाहिये—कश्चिञ्छ्यात्१, कश्चरेत्। | कश्श्वशुरः१०, कः श्वशुरः। कस्स्वरः११, कः कष्टः२। कष्ठः३। कः स्थः४। कश्चलेत्५। | स्वरः। कः फलेत्१२। कः शयिता१३। क ᳵखनेत्६। क ᳵकरोति७। क ᳶपठेत्८। क ᳶफलेत्९। | कोऽत्रयोधः१४। क उत्तमः१५। देवाएते१६।

'भवाञ्छेते' रह जाता है। 'लोप' और 'छत्त्व' वैकल्पिक हैं, अतः इनके अभावमें 'भवाञ्शेते' बना। तुगागम भी वैकल्पिक है; उसके न होनेपर 'भवाञ् शेते' बना। भवान्+डीनः=भवाण्डीनः। यहाँ ष्टुत्वविधानके अनुसार 'न्' की जगह 'ण्' हो गया है। 'त्वं+भर्ता=त्वम्भर्ता', 'त्वं करिष्यसि=त्वङ्करिष्यसि'—ये दोनों वैकल्पिक परसवर्णके उदाहरण हैं। यहाँ अनुस्वारकी जगह 'वा पदान्तस्य।' (पा० सू० ८।४।५९) के नियमानुसार परसवर्ण क्रमशः 'भ्' और 'ङ्' हो गये हैं।

'व्यञ्जनसंधि'के कुछ और भी भेद हैं, जो यहाँ कौमार व्याकरणमें निर्दिष्ट नहीं हैं—जैसे 'पूर्वसवर्ण-संधि'। इसके दो प्रकारके स्थल हैं। 'झयो होऽन्यतरस्याम्' (८।४।६२)—इस सूत्रके अनुसार 'झय्' से परे हकारके स्थानमें पूर्वसवर्ण होता है। इसके 'वाग्घरिः' इत्यादि उदाहरण हैं। यहाँ 'वाक्+हरिः' इस अवस्थामें 'ह' की जगह पूर्वसवर्ण—'घ' हो गया है। 'उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य।'—इस पा० सूत्र (८।४।६१) के अनुसार 'उद्' उपसर्गसे परे 'स्थ' और 'स्तम्भ'के आदि वर्णकी जगह पूर्व-सवर्ण होता है। इसके उदाहरण हैं—उत्थानम्, उत्तम्भनम्। 'सम्' के मकारका भी रुत्वविधान होता है, 'सुट्' परे रहनेपर। इसके 'संस्कर्ता' आदि उदाहरण हैं।

* विसर्गसंधिके भी अनेक प्रकार-भेद हैं—यहाँ लगभग दस प्रकारकी कार्य-विधि वर्णित हुई है—(१) विसर्गस्थाने सत्वविधान (इसका विधायक है—'विसर्जनीयस्य सः।' पा० सू० ८।३।३४)। (२) वैकल्पिकविसर्गत्वविधान (इसका निर्देशक है—'वा शरि'—यह पा० सूत्र ८।३।३६)। (३) क ᳵ प-विधान (यह 'कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च'—इस पाणिनिसूत्र ८।३।३७ पर आधारित है)। (४) रुत्वविधान (इसका आधार है—'ससजुषो रुः।' यह पा० सूत्र ८।२।६६)। (५) रोरुत्वविधान (यह 'अतो रोरप्लुतादप्लुते।' ६।१।११३, 'हशि च।' ६।१।११४ इत्यादि सूत्रोंपर अवलम्बित है)। (६) रोर्यत्वविधान (जो 'भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि।' इस पा० सूत्र ८।३।१७ तथा अतो रोरप्लुतादप्लुते ६।१।११३ पर आधारित है)। (७) यलोपविधान (इसका आधार 'हलि सर्वेषाम्' यह पा० सूत्र ८।३।२२ है)। (८) रकार-विसर्गविधान (इसका विधायक 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः।'—यह पा० सूत्र ८।३।१५ है)। (९) सुलोपविधान (इसके आधार हैं—'एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ् समासे हलि।', 'सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम्।' इत्यादि ६।१।१३२, ३४ सूत्र)। (१०) ढ्रलोपदीर्घविधान (इसके आधारभूत पा० सूत्र हैं—'रोरि।', 'ढो ढे लोपः।', 'ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः।' ८।३।१४, १३; ६।३।१११)।

१. 'कः+छिन्द्यात्'=कश्चिञ्छ्यात्। यहाँ विसर्गके स्थानमें 'स्' और श्चुत्वविधानके अनुसार 'स्' के स्थानमें 'श्' हुआ है। कः+चरेत्=कश्चरेत्। यहाँ भी पूर्ववत् विसर्गके स्थानमें 'स्' और श्चुत्वेन 'श्' हुआ है। २. कः+टः=कष्टः। ३. कः+ठः=कष्ठः—इन दोनों उदाहरणोंमें विसर्गके स्थानमें सकार होकर ष्टुत्वविधानके अनुसार 'सकार'के स्थानमें 'षकार' हो गया है। ४. कः+स्थः=कः स्थः, कस्स्थः। यहाँ वैकल्पिक विसर्गताका विधान है। 'वा शरि' (पा० सूत्र ८।३।३६)-के नियमानुसार यदि विसर्गसे परे 'श्', 'ष्' और 'स्'—ये अक्षर हों तो एक पक्षके मतानुसार उस विसर्गके स्थानमें 'स्' न होकर विसर्ग ही रह जाता है। पक्षान्तरसे 'सकार' हो जाता है। उक्त उदाहरणोंमें पहले विसर्गरूप, फिर सकाररूपका साक्षात्कार कराया गया है। ५. 'कः+चलेत्=कश्चलेत्।' यहाँ भी सब बातें 'कश्चरेत्' के अनुसार समझनी चाहिये। ६-७. 'कः+खनेत्'=क ᳵ खनेत्। कः+करोति=क ᳵ करोति—इन दोनों उदाहरणोंमें 'क ᳵ प विधान'के अनुसार विसर्गके स्थानमें 'क ᳵ ख हो गये हैं। कवर्ग और पवर्गके प्रथम-द्वितीय अक्षर परे हों तो विसर्गके स्थानमें क्रमशः 'क ᳵ प होते हैं—ऐसा नियम है। ८-९. 'कः+पठेत्', 'कः+फलेत्'—इस अवस्थामें अभी बताये हुए नियमके अनुसार विसर्गकी जगह 'ᳶप ᳶफ'—हो गये हैं। १०-११. इन उदाहरणोंमें 'वा शरि' (पा० सू० ८।३।३६) के नियमानुसार एक पक्षमें विसर्गका विसर्ग ही रह गया है; पक्षान्तरमें 'विसर्ग' की जगह 'स्' होकर 'श्वशुरः' के शकारका योग मिलनेसे श्चुत्वेन 'स्' की जगह 'श्' हो गया है। 'स्वरः' के साथ विसर्गका सकार उसी रूपमें दृष्टिगोचर होता है। १२. 'कः+फलेत्'—इस जगह ᳶफ प्राप्त था; परंतु वह वैकल्पिक है, अतः पक्षान्तरके अनुसार विसर्गके स्थानमें विसर्ग ही रह गया है। १३. यहाँ भी वही बात है। विसर्गकी जगह 'स्' या 'श्' नहीं हुआ है। १४. 'कस् अत्र योधः।' यह पदच्छेद है। यहाँ 'कस्' के सकारकी जगह 'रु' तथा 'रु' के स्थानमें 'उ' हुआ है; फिर गुण और पूर्वरूप होकर 'कोऽत्र योधः' बना है। रोरुत्वविधानका नियम यह है—अप्लुत 'अ' से परे 'रु' हो तो उसकी जगह 'उ' होता है, अप्लुत अकार परे विद्यमान हो तब। १५. कस् उत्तमः—इस अवस्थामें 'स्' के स्थानमें 'रु' हुआ। फिर 'रोर्यत्वविधान' के अनुसार 'रु'के स्थानमें 'य' हो गया। फिर य-लोपविधानसे 'य्' का लोप हो गया। 'लोपः शाकल्यस्य।' (८।३।१९)—इस पा० सूत्रके अनुसार यहाँ 'य्' लोप हुआ है, अतः 'क उत्तमः' प्रयोग सिद्ध हुआ है। १६. 'देवास+एते'—

* अध्याय ३५१ *७३९
भो इह$^{१७}$। स्वदेवा यान्ति$^{१८}$। भगो व्रज$^{१९}$। सु पूः$^{२०}$।स यातीह$^{२५}$। सैष$^{२६}$ याति। क ईश्वरः। ज्योतीरूपम्$^{२७}$।
सुदूरात्रित्र$^{२१}$। वायुर्याति$^{२२}$। पुनर्नहि$^{२३}$। पुनर्$^{२४}$ राति।तवच्छत्रम्$^{२८}$। म्लेच्छ$^{२९}$ धीः। छिद्रमांच्छिदत्॥ १०—१३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'संधिसिद्धरूपकथन' नामक तीन सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५०॥


तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय

सुबन्त-सिद्ध रूप

स्कन्द कहते हैं— कात्यायन! अब मैं तुम्हारे सम्मुख विभक्ति-सिद्ध रूपोंका वर्णन करता हूँ। विभक्तियाँ दो हैं—'सुप्' और 'तिङ्'। 'सुप्' विभक्तियाँ सात हैं। 'सु औ जस्'—यह प्रथमा विभक्ति है। 'अम् औट् शस्'—यह द्वितीया, 'टा भ्याम् भिस्'—यह तृतीया, 'ङे भ्याम् भ्यस्'—यह चतुर्थी, 'ङसि भ्याम् भ्यस्'—यह पञ्चमी, 'ङस् ओस् आम्'—यह षष्ठी तथा 'ङि ओस् सुप्'—यह सप्तमी विभक्ति है। ये सातों विभक्तियाँ प्रातिपदिक संज्ञावाले शब्दोंसे परे प्रयुक्त होती हैं॥ १—३॥

'प्रातिपदिक' दो प्रकारका होता है—'अजन्त' और 'हलन्त'। इनमेंसे प्रत्येक पुँल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्गके भेदसे तीन-तीन प्रकारका है। उन पुँल्लिङ्ग आदि शब्दोंके नायकोंका* यहाँ दिग्दर्शन कराया जाता है। जो शब्द नहीं कहे गये हैं (किंतु जिनके रूप इन्हींके समान होते हैं) उन्हींके ये 'वृक्ष' आदि शब्द सामर्थ्यतः नायक हैं। 'वृक्ष' शब्द पेड़का वाचक है। यह अकारान्त पुँल्लिङ्ग है। इसके सात विभक्तियोंमें तथा सम्बोधनमें एकवचन, द्विवचन और बहुवचनके भेदसे कुल मिलाकर चौबीस रूप होते हैं। उन सबको यहाँ उद्धृत किया जाता है। १—वृक्षः, वृक्षौ, वृक्षाः। २—वृक्षम्, वृक्षौ, वृक्षान्। ३—वृक्षेण, वृक्षाभ्याम्, वृक्षैः। ४—वृक्षाय, वृक्षाभ्याम्, वृक्षेभ्यः। ५—वृक्षात्, वृक्षाभ्याम्, वृक्षेभ्यः। ६—वृक्षस्य, वृक्षयोः, वृक्षाणाम्। ७—वृक्षे, वृक्षयोः, वृक्षेषु। सम्बोधने—हे वृक्ष, हे वृक्षौ, हे वृक्षाः। इसी


इस पदच्छेदमें 'स्' की जगह 'रु' और 'रु' की जगह 'य्' हो गया। फिर पूर्ववत् 'य' लोप होनेसे 'देवा एते'—ऐसा प्रयोग सिद्ध हुआ। १७-१८-१९. 'भोस् इह', 'भगोस् व्रज' तथा 'अघोस् याहि', 'स्वदेवास् यान्ति'—इन वाक्योंमें 'स्' की जगह रुत्व-यत्व हुआ। फिर पहलेमें तो 'लोपः शाकल्यस्य।'—इस सूत्रसे और अन्य उदाहरणोंमें 'हलि सर्वेषाम्।' (पा० सू० ८। ३। २२)—इस सूत्रसे 'य' लोप होनेपर निर्दिष्ट रूप बनते हैं। २०. 'सुपूः' यहाँ 'सुपूर्'—इस अवस्थामें 'रकार'के स्थानमें 'विसर्ग' हुआ है। २१. 'सुदुर्+रात्रित्र=सुदूरात्रित्र।' यहाँ 'रोरि' से 'र्' लोप होकर पूर्वस्वरको दीर्घत्व प्राप्त हुआ है। २२. इस उदाहरणमें 'वायुस्+याति'—ऐसा पदच्छेद है। यहाँ 'स्' के स्थानमें 'रु', उकारकी इत्संज्ञा और रेफका यकारसे मिलन हुआ है। २३. इस उदाहरणमें यह दिखाया गया है कि यहाँ 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः।' (पा० सू० ८। ३। १५) से रकारका विसर्ग नहीं हो सकता; क्योंकि न रेफ अवसानमें है और न उससे परे 'खर्' प्रत्याहारका ही कोई अक्षर है। २४. 'पुनर्+राति'—इस अवस्थामें 'रो रि।' (पा० सू० ८। ३। १४) से रकारका लोप हुआ और पूर्व 'अण्' को दीर्घत्व प्राप्त हुआ है। २५. 'सस् याति इह'—इस अवस्थामें 'एतत्तदोः सुलोपो।'—इस (पा० सूत्र ६। १। १३२) के अनुसार 'तत्'-शब्दसम्बन्धी 'सु' विभक्तिसे सकारका लोप हो गया है। २६. 'सस् एषस् याति', 'क ईश्वरः'—इस अवस्थामें 'सस्'के सकारका लोप श्लोककी पादपूर्तिके लिये हुआ है, 'एषस्'—के सकारका लोप पूर्ववत् हुआ है। २७. 'ज्योतिर्+रूपम्'—यहाँ रलोप और दीर्घ हुआ है। २८. 'तव + छत्रम्।' यहाँ 'छे च।'—इस (पा० सू० ६। १। ७३) सूत्रसे तुगागम हुआ है, फिर 'त' का श्चुत्वेन 'च' हो गया है। (यह व्यञ्जनसंधिका उदाहरण है।) २९. यहाँ भी 'दीर्घात्', 'पदान्ताद्वा' (पा०सू० ६। १। ७५-७६) से तुगागम हुआ है। शेष पूर्ववत् (यहाँ भी व्यञ्जनसंधि ही है)।

* अकारान्तसे लेकर औकारान्तक जितने शब्द हैं, सब 'अजन्त' हैं। ऐसे शब्द असंख्य हैं, उन सबका उल्लेख असम्भव है। अतः कुछ शब्द यहाँ नमूनेके तौरपर दिये गये हैं, उन्हींके समान अन्य शब्दोंके रूप भी होंगे। इन नमूनेके तौरपर दिये गये शब्दोंको ही यहाँ 'नायक' कहा गया है।

७४० * अग्निपुराण *


प्रकार राम, देव, इन्द्र, वरुण, भव आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'देव' आदि शब्दोंके तृतीयाके एकवचनमें 'देवेन' तथा षष्ठीके बहुवचनमें 'देवानाम्' इत्यादि रूप होते हैं। वहाँ 'न' के स्थानमें 'ण' नहीं होता। रेफ और षकारके बाद जो 'न' हो, उसीके स्थानमें 'ण' होता है। अकारान्त शब्दोंमें जो सर्वनाम हैं, उनके रूपोंमें कुछ भिन्नता होती है। उस भिन्नताका परिचय देनेके लिये सर्वनामका 'प्रथम' या 'नायक' जो 'सर्व' शब्द है, उसके रूप यहाँ दिये जाते हैं; उसी तरह अन्य सर्वनामोंके भी रूप होंगे। यथा—१—सर्वः सर्वौ सर्वे। २—सर्वम् सर्वौ सर्वान्। ३—सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः। ४—<u>सर्वस्मै</u> सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः। ५—<u>सर्वस्मात्</u> सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः। ६—सर्वस्य सर्वयोः <u>सर्वेषाम्</u>। ७—<u>सर्वस्मिन्</u> सर्वयोः सर्वेषु। सम्बोधनमें—<u>हे सर्व</u> हे सर्वौ हे सर्वे।* यहाँ रेखाङ्कित रूपोंपर दृष्टिपात कीजिये। साधारण अकारान्त शब्दोंकी अपेक्षा सर्वनाम शब्दोंके रूपोंमें भिन्नताके पाँच ही स्थल हैं। इसके बाद 'पूर्व' शब्द आता है। यह सर्वनाम होनेपर भी अन्य सर्वनामोंसे कुछ विलक्षण रूप रखता है। पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर—ये व्यवस्था और असंज्ञा में सर्वनाम हैं। 'स्व' तथा 'अन्तर' शब्द भी अर्थ-विशेषमें ही सर्वनाम हैं। अतः उससे भिन्न अर्थमें वे असर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। प्रथमाके बहुवचनमें तथा पञ्चमी-सप्तमीके एकवचनमें पूर्वाद शब्दोंके रूप सर्वनामवत् होते हैं, किंतु विकल्पसे। अतः पक्षान्तरमें उनके असर्वनामवत् रूप भी होते ही हैं—जैसे पूर्वे पूर्वाः, परे पराः, इत्यादि। पूर्वस्मात् पूर्वात्। पूर्वस्मिन् पूर्वे इत्यादि। प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय—ये शब्द सर्वनाम नहीं हैं, तथापि 'प्रथम' शब्दके प्रथमा बहुवचनमें—प्रथमे प्रथमाः—यह रूप होता है। 'चरम' आदि शब्दोंके लिये भी यही बात है। 'द्वितीय' तथा 'तृतीय' शब्द चतुर्थी, पञ्चमी तथा सप्तमीके एकवचनमें विकल्पसे सर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। यथा—द्वितीयस्मै द्वितीयाय। तृतीयस्मै तृतीयाय—इत्यादि शेष रूप वृक्षवत् होते हैं।

अब आकारान्त शब्दका एक रूप उपस्थित करते हैं—खड्गपाः—खड्गं पातीति खड्गपाः अर्थात् 'खड्ग-रक्षक'। इसका रूप यों समझना चाहिये—१—खड्गपाः, खड्गपौ, खड्गपाः। २—खड्गपाम्, खड्गपौ, खड्गपः। ३—खड्गपा, खड्गपाभ्याम्, खड्गपाभिः। ४—खड्गपे, खड्गपाभ्याम्, खड्गपाभ्यः। ५—खड्गपः, खड्गपाभ्याम्, खड्गपाभ्यः। ६—खड्गपः, खड्गपोः, खड्गपाम्। ७—खड्गपि, खड्गपोः, खड्गपासु। सम्बो०—हे खड्गपाः, हे खड्गपौ, हे खड्गपाः। इसी तरह विश्वपा (विश्वपालक), गोपा (गोरक्षक), कीलालपा (जल पीनेवाला), शङ्खध्मा (शङ्ख बजानेवाला) आदि शब्दोंके रूप होंगे। (अब ह्रस्व इकारान्त 'वह्नि' शब्दका रूप प्रस्तुत करते हैं—) १—वह्निः, वह्नी, वह्नयः। २—वह्निम्, वह्नी, वह्नीन्। ३—वह्निना, वह्निभ्याम्, वह्निभिः। ४—वह्नये, वह्निभ्याम्, वह्निभ्यः। ५—वह्नेः, वह्निभ्याम्, वह्निभ्यः। ६—वह्नेः, वह्न्योः, वह्नीनाम्। ७—वह्नौ, वह्न्योः, वह्निषु। सम्बो०—हे वह्ने, हे वह्नी, हे वह्नयः। 'वह्नि'का अर्थ है अग्नि। इसी तरह अग्रि, रवि, कवि, गिरि, पवि इत्यादि शब्दोंके रूप होंगे। इकारान्त शब्दोंमें 'सखि' और 'पति' शब्दोंके रूप कुछ भिन्नता रखते हैं। जैसे—१—सखा, सखायौ, सखायः। २—सखायम्, सखायौ, सखीन्। तृतीयाके


* यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिये कि यदि किसीका नाम 'सर्व' रख दिया जाय तो उस 'सर्व' का रूप वृक्षकी तरह ही होगा। 'सब' इस अर्थमें प्रयुक्त 'सर्व' शब्दका ही रूप ऊपर बताये अनुसार होगा। यही बात अन्य सर्वनामोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। संज्ञा एवं उपसर्जनीभूत 'सर्व' आदि शब्दोंकी सर्वनामोंमें गणना नहीं होती। 'अतिसर्व' आदि शब्दोंमें जो 'सर्व' शब्द है; वह उपसर्जन है।

  • अध्याय ३५१ * ७४१

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एकवचनमें—सख्या, चतुर्थीके एकवचनमें सख्ये, पञ्चमी और षष्ठीके एकवचनमें सख्युः तथा सप्तमीके एकवचनमें सख्यौ रूप होते हैं। शेष सभी रूप 'वह्नि' शब्दके समान हैं। 'पति' शब्दके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें वह्निवत् रूप होते हैं, शेष विभक्तियोंमें वह 'सखि' शब्दके समान रूप रखता है। 'अहर्पतिः' का अर्थ है सूर्य। यहाँ 'पति' शब्द समासमें आबद्ध है। समासमें उसका रूप वह्नितुल्य ही होता है।

(अब उकारान्त शब्दका रूप प्रस्तुत करते हैं।) पहले पुँल्लिङ्ग 'पटु' शब्दके रूप दिये जाते हैं। पटुका अर्थ है—कुशल—निपुण। १—पटुः, पटू, पटवः। २—पटुम्, पटू, पटून्। ३—पटुना, पटुभ्याम्, पटुभिः। ४—पटवे, पटुभ्याम्, पटुभ्यः। ५—पटोः, पटुभ्याम्, पटुभ्यः। ६—पटोः, पट्वोः, पटूनाम्। ७—पटौ, पट्वोः, पटुषु। सम्बो०—हे पटो, हे पटू, हे पटवः। इसी तरह भानु, शम्भु विष्णु आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। दीर्घ ईकारान्त 'ग्रामणी' शब्द है। इसका अर्थ है—गाँवका मुखिया। इसका रूप इस प्रकार है—१—ग्रामणीः, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। २—ग्रामणीम्, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। ३—ग्रामण्या, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभिः। ४—ग्रामण्ये, ग्रामणीभ्याम् २, ग्रामणीभ्यः २। ५—ग्रामण्यः २। ६—ग्रामण्योः २। बहुवचन—ग्रामण्याम्। ७—ग्रामण्याम्, ग्रामणीषु। इसी तरह 'प्रधी' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। दीर्घ ऊकारान्त 'दृन्भू' शब्द है। इसका अर्थ है—राजा, वज्र, सूर्य, सर्प और चक्र। इसका रूप—दृन्भूः, दृन्भौ, दृन्भ्वः इत्यादि। 'खलपूः'—खलिहान या भूमिको शुद्ध—स्वच्छ करनेवाला। इसके रूप खलपूः, खलप्वौ, खलप्वः इत्यादि। 'मित्रभूः'—मित्रसे उत्पन्न। इसका रूप है—मित्रभूः, मित्रभुवौ, मित्रभुवः इत्यादि। 'स्वभू' का अर्थ है—स्वयम्भूः—स्वतः प्रकट होनेवाला। इसके रूप—स्वभूः, स्वभुवौ, स्वभुवः इत्यादि हैं॥ ४—६॥

'सुश्रीः' का अर्थ है—सुन्दर शोभासे सम्पन्न। इसके रूप हैं—सुश्रीः, सुश्रियौ, सुश्रियः इत्यादि। 'सुधीः' का अर्थ है—उत्तम बुद्धिसे युक्त विद्वान्। इसके रूप हैं—सुधीः, सुधियौ, सुधियः इत्यादि। (अब ऋकारान्त पुँल्लिङ्ग 'पितृ' तथा 'भ्रातृ' शब्दोंके रूप दिये जाते हैं—'पिता' का अर्थ है—बाप और 'भ्राता' का अर्थ है—भाई। 'पितृ' शब्दके सब रूप इस प्रकार हैं—१—पिता, पितरौ, पितरः। २—पितरम्, पितरौ, पितॄन्। ३—पित्रा, पितृभ्याम्, पितृभिः। ४—पित्रे, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ५—पितुः, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ६—पितुः, पित्रोः, पितॄणाम्। ७—पितरि, पित्रोः, पितृषु। सम्बो०—हे पितः, हे पितरौ, हे पितरः। इसी तरह 'भ्रातृ' और 'जामातृ' शब्दोंके भी रूप होते हैं। 'नृ' शब्द नरका वाचक है। इसके रूप ना, नरौ, नरः इत्यादि 'पितृ' शब्दवत् होते हैं। केवल षष्ठीके बहुवचनमें दो रूप होते हैं—नृणाम् नॄणाम्। 'कर्तृ' शब्दका अर्थ है करनेवाला। यह 'तृजन्त' शब्द है। इसके दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार हैं—कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः। कर्तारम्, कर्तारौ, कर्तॄन्। शेष 'पितृ' शब्दकी भाँति। 'क्रोष्टु' शब्द सियारका वाचक है। क्रोष्टु विकल्पसे 'क्रोष्ट्र' शब्दके रूपमें प्रयुक्त होता है। उस दशामें इसका रूप 'कर्तृ' शब्दकी भाँति होता है। 'क्रोष्टु'के रूपमें ही यदि इसके रूप लिये जायें तो 'पटु' शब्दकी तरह लेने चाहिये। 'नप्तृ' शब्द नातीका वाचक है। इसके रूप 'कर्तृ' शब्दकी भाँति होते हैं। 'सुरै' शब्दका अर्थ उत्तम धनवान् है। 'रै' शब्दका अर्थ है—धन। ये ऐकारान्त पुँल्लिङ्ग हैं। इन दोनोंके रूप एक-से होते हैं—१—सुराः, सुरायौ, सुरायः। २—सुरायम्, सुरायौ, सुरायः। ३—सुराया,

७४२ * अग्निपुराण *


सुराभ्याम्, सुराभिः इत्यादि। ‘रै’—राः, रायौ, रायः इत्यादि। हलादि विभक्तियोंमें ‘रै’ की जगह ‘रा’ हो जाता है। ओकारान्त ‘गो’ शब्दपर विचार कीजिये। ‘गो’ का अर्थ है—बैल। इसके रूप—गौः, गावौ, गावः। गाम्, गावौ, गाः इत्यादि हैं। औकारान्त पुँल्लिङ्ग—‘द्यौ’ का अर्थ है—आकाश और ‘ग्लौ’ का अर्थ है—चन्द्रमा। इनके रूप—द्यौः, द्यावौ, द्यावः इत्यादि। ग्लौः, ग्लावौ, ग्लावः इत्यादि हैं। ये पुँल्लिङ्गमें ‘स्वरान्त नायक’ शब्द बताये गये ॥७॥

(अब हलन्त पुँल्लिङ्ग शब्दोंका परिचय कराया जाता है—)

सुवाक् (श्रेष्ठ वक्ता), सुत्वक् (सुन्दर त्वचावाला), पृषत् (जलबिन्दु), सम्राट् (चक्रवर्ती नरेश), जन्मभाक् (जन्म ग्रहण करनेवाला), सुराट् (श्रेष्ठ राजा), अयम् (यह), मरुत् (वायु), भवन् (होता हुआ), दीव्यन् (क्रीडा करता हुआ), भवान् (आप), मघवान् (इन्द्र), पिबन् (पीता हुआ), भगवान् (समग्र ऐश्वर्यसे सम्पन्न), अघवान् (पापयुक्त), अर्वा (अश्व), वह्निमान् (अग्नियुक्त), सर्ववित् (सर्वज्ञ), सुपृत् (भलीभाँति पालन करनेवाला), सुसीमा (उत्तम सीमावाला), कुण्डी (कुण्डधारी शिव), राजा, श्वा (कुत्ता), युवा (तरुण), मघवा (इन्द्र), पूषा (सूर्य), सुकर्मा (उत्तम कर्म करनेवाला), यज्वा (यज्ञकर्ता), सुवर्मा (उत्तम कवचधारी), सुधर्मा (उत्तम धर्मवाला), अर्यमा (सूर्य), वृत्रहा (इन्द्र), पन्थाः (मार्ग), सुककुप् (स्वच्छ दिशावाला समय), अष्ट (आठ), पञ्च (पाँच), प्रशान् (पूर्णतः शान्त), सुत्वा, ‘प्राङ् प्राञ्चौ प्राञ्चः’ तथा प्रत्यङ् इत्यादि। सुद्यौः (शोभन आकाशवाला काल), सुभ्राट् (विशेष शोभाशाली), सुपूः (सुन्दर नगरीवाला देश), चन्द्रमा, सुवचाः, श्रेयान्, विद्वान्, उशना (शुक्राचार्य), पेचिवान् (पूर्वकालमें जिसने पाचन किया हो), अनड्वान्—गाड़ी खींचनेवाला बैल, गोधुक् (गायको दुहनेवाला), मित्रध्रुक् (मित्रद्रोही), मुक् (विवेकशून्य), तथा लिट् (चाटनेवाला),—ये सभी हलन्त पुँल्लिङ्गके ‘नायक’ (आदर्श या प्रमुख शब्द) हैं*॥८—११$\frac{१}{२}$॥


* ‘सुवाक्’ यह ‘सुवाच्’ शब्दका प्रथम विभक्तिमें एकवचनान्तरूप है। जिज्ञासुओंकी सुविधाके लिये इन शब्दोंके कतिपय रूप यहाँ उदाहरणके तौरपर दिये जाते हैं—१. ‘सुवाक्’, सुवाग्, सुवाचौ, सुवाचः। २. सुवाचम्, सुवाचौ, सुवाचः। ३. सुवाचा, सुवाग्भ्याम्, सुवाग्भिः इत्यादि। सप्तमीके बहुवचनमें ‘सुवाक्षु’ यह रूप होता है। इसी तरह ‘त्वच्’ शब्दके—त्वक्, त्वचौ, त्वचः इत्यादि, ‘पृषत्’ शब्दके—पृषत्, पृषतौ, पृषतः इत्यादि, ‘सम्राज्’ शब्दके—सम्राट् सम्राड्, सम्राजौ, सम्राजः इत्यादि, ‘जन्मभाज्’ शब्दके—‘जन्मभाक्, जन्मभाग्, जन्मभाजौ, जन्मभाजः, इत्यादि तथा ‘सुराज्’ शब्दके—सुराट्, सुराड्, सुराजौ, सुराजः इत्यादि रूप होते हैं। ‘अयम्’—यह ‘इदम्’ शब्दका प्रथमविभक्तीक एकवचनान्त रूप है। व्यवहारमें इसके रूपोंकी अधिक आवश्यकता रहती है। इसलिये इसके पूरे रूप यहाँ दिये जाते हैं—

१. अयम्, इमौ, इमे। २. इमम्, इमौ, इमान्। (अन्वादेशमें) एनम्, एनौ, एनान्। ३. अनेन (अन्वादेशमें) एनेन, आभ्याम्, एभिः। ४. अस्मै, आभ्याम्, एभ्यः। ५. अस्मात् अस्माद्, आभ्याम्, एभ्यः। ६.अस्य, अनयोः (अन्वादेशमें) एनयोः, एषाम्। ७. अस्मिन्, अनयोः (एनयोः), एषु। त्यदादि गणके शब्दोंमें सम्बोधन नहीं होता।

‘मरुत्’ आदि शब्दोंके प्रथमान्त रूप क्रमसे इस प्रकार जानने चाहिये—मरुत्, मरुद्, मरुतौ, मरुतः। भवन्, भवन्तौ, भवन्तः। दीव्यन्, दीव्यन्तौ, दीव्यन्तः। भवान्, भवन्तौ, भवन्तः। मघवान्, मघवन्तौ, मघवन्तः। पिबन्, पिबन्तौ, पिबन्तः। भगवान्, भगवन्तौ, भगवन्तः। अघवान्, अघवन्तौ, अघवन्तः। अर्वा, अर्वन्तौ, अर्वन्तः। वह्निमान्, वह्निमन्तौ, वह्निमन्तः। सर्ववित् सर्वविद्, सर्वविदौ, सर्वविदः। सुपृत्, सुपृद्, सुपृतौ, सुपृतः। सुसीमा, सुसीमानौ, सुसीमानः। कुण्डी, कुण्डिनौ, कुण्डिनः। ‘राजन्’ आदि शब्दोंके तीन विभक्तियोंके रूप दिये जाते हैं। शेष रूप तदनुसार ही समझ लेने चाहिये। १. राजा, राजानौ, राजानः। २. राजानम्, राजानौ, राज्ञः। ३. राज्ञा, राजभ्याम्, राजभिः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें—राज्ञि, राजनि। १. श्वा, श्वानौ, श्वानः। २. श्वानम्, श्वानौ, शुनः। ३. शुना, श्वभ्याम्, श्वभिः। १. युवा, युवानौ, युवानः। २. युवानम्, युवानौ, यूनः। ३. यूना, युवभ्याम्, युवभिः। १. मघवा, मघवानौ, मघवानः। २. मघवानम्, मघवानौ, मघोनः।

  • अध्याय ३५१ * ७४३

अब स्त्रीलिङ्गमें नायकस्वरूप शब्दोंको उपस्थित किया जा रहा है—जाया (स्त्री), जरा (वृद्धावस्था), बाला (नूतन अवस्थाकी स्त्री), एडका (भेड़), वृद्धा (बूढ़ी), क्षत्रिया (क्षत्रिय जातिकी स्त्री), बहुराजा (जहाँ बहुतसे राजा निवास करते हों, वह नगरी), बहुदा (अधिक देनेवाली), मा (लक्ष्मी), अथवा बहुदामा (अधिक दाम—रज्जु या दीसीवाली), बालिका (लड़की), माया (भगवान्‌की शक्ति या प्रकृति), कौमुदगन्धा (कुमुदकी-सी सुगन्धवाली), सर्वा (सब), पूर्वा (पूर्व दिशा या पहली), अन्या (दूसरी), द्वितीया (दूसरी), तृतीया (तीसरी), बुद्धिः (मति), स्त्री (औरत), श्री (लक्ष्मी), नदी, सुधी (उत्तम बुद्धिवाली), भवन्ती (होती हुई), दीव्यन्ती (क्रीड़ा करती हुई), भाती, भान्ती (शोभमाना), यान्ती (जाती हुई), शृण्वती (सुनती हुई), तुदती, तुदन्ती (व्यथित करती हुई), कर्त्री (करनेवाली), कुर्वती (करती हुई), मही (पृथ्वी), रुन्धती (अवरोध करती हुई), क्रीडन्ती (खेलती हुई), दान्ती (दाँतकी बनी हुई वस्तु), पालयन्ती (पालती हुई), सुवाणी (उत्तम वाणी), गौरी (पार्वती), पुत्रवती (पुत्रवाली), नौः (नाव), वधूः (स्त्री), देवता, भूः (पृथ्वी), तिस्रः (तीन), द्वे (दो), कति, वर्षाभूः (वर्षाकालमें उत्पन्न होनेवाली मेढकी), स्वसा (बहिन), माता (माँ), अवरा (लघु), गौः (गाय), द्यौः (स्वर्ग), वाक् (वाणी), त्वक् (चमड़ा), प्राची (पूर्व दिशा), अवाची (दक्षिण दिशा), तिरश्ची (टेढ़ी या मादा पशु-पक्षी), उदीची (उत्तर दिशा), शरद् (ऋतुविशेष), विद्युत् (बिजली), सरित् (नदी), योषित् (स्त्री), अग्निवित् (अग्निको जाननेवाली), सस्यदा (अन्न देनेवाली) अथवा सम्पद् (सम्पत्ति), दृषत् (शिला), या (जो), एषा (यह), सा (वह), वेदवित् (वेदज्ञा), संविद् (ज्ञानशक्ति), बह्वी (बहुत), राज्ञी (रानी), त्वया, मया (युष्मद्-अस्मद् शब्दोंके तीनों लिङ्गोंमें समान रूप होते हैं, ये तृतीयाके एक वचनके रूप हैं)। सीमा (अवधि), पञ्च आदि (संख्यावाचक नान्त शब्द), राका (पूर्णिमा), धूः (बोझ), पूः (नगरी), दिशा (दिक्), गिरा (गीः), चतस्रः (चार), विदुषी (पण्डिता), का (कौन), इयम् (यह), दिक्


३. मघोना, मघवभ्याम्, मघवभिः। १. पूषा, पूषणौ, पूषणः। २. पूषणम्, पूषणौ, पूष्णः। ३. पूष्णा, पूषभ्याम्, पूषभिः। सप्तमीके एकवचनमें पूष्णि, पूषण्णि। १. सुकर्मा, सुकर्माणौ, सुकर्माणः। २. सुकर्माणम्, सुकर्माणौ, सुकर्मणः। ३. सुकर्मणा, सुकर्मभ्याम्, सुकर्मभिः। १. यज्वा, यज्वानौ, यज्वानः। २. यज्वानम्, यज्वानौ, यज्वनः। ३. यज्वना, यज्वभ्याम्, यज्वभिः। १. सुवर्मा, सुवर्माणौ, सुवर्माणः इत्यादि। शेषरूप 'यज्वन्' शब्दके समान हैं। सुधर्मा, सुधर्माणौ, सुधर्माणः इत्यादि। १. अर्यमा, अर्यमणौ, अर्यमणः। २. अर्यमणम्, अर्यमणौ, अर्यम्णः। ३. अर्यम्णा, अर्यमभ्याम्, अर्यमभिः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें—अर्यम्णि, अर्यमणि। १. वृत्रहा, वृत्रहणौ, वृत्रहणः। २. वृत्रहणम्, वृत्रहणौ, वृत्रघ्नः। ३. वृत्रघ्ना, वृत्रहभ्याम्, वृत्रहभिः इत्यादि। १. पन्थाः, पन्थानौ, पन्थानः। २. पन्थानम्, पन्थानौ, पथः। ३. पथा, पथिभ्याम्, पथिभिः। १. सुकक्पुङ्, सुकक्बुब्, सुकक्कुभौ, सुकक्कुभः, इत्यादि। १-२. अष्ट, अष्टौ, ३. अष्टाभिः, अष्टभिः इत्यादि। १-२. पञ्च, पञ्च। ३. 'पञ्चभिः' इत्यादि। 'अष्टन्', 'पञ्चन्' आदि शब्द नित्य बहुवचनान्त हैं। प्रशान्, प्रशामौ, प्रशामः। प्रशाम्भ्याम् इत्यादि। सुत्वा, सुत्वानौ, सुत्वानः, इत्यादि। प्राङ्, प्राञ्चौ, प्राञ्चः इत्यादि। सुद्यौः, सुदिवौ, सुदिवः, इत्यादि। सुभ्राट्, सुभ्राड्, सुभ्राजौ, सुभ्राजः इत्यादि। सुपूः, सुपुरौ, सुपुरः, इत्यादि। चन्द्रमाः, चन्द्रमसौ, चन्द्रमसः, इत्यादि। सुवचाः, सुवचसौ, सुवचसः, इत्यादि। १. श्रेयान्, श्रेयांसौ, श्रेयांसः। २. श्रेयांसम्, श्रेयांसौ, श्रेयसः। ३. श्रेयसा, श्रेयोभ्याम्, इत्यादि। १. विद्वान्, विद्वांसौ, विद्वांसः। २. विद्वांसम्, विद्वांसौ, विदुषः। ३. विदुषा, विद्वद्भ्याम्, विद्वद्भिः, इत्यादि। पेचिवान्, पेचिवांसौ, पेचिवांसः, इत्यादि। अनड्वान्, अनड्वाहौ, अनड्वाहः। २. अनड्वाहम्, अनड्वाहौ, अनडुहः। अनडुहा, अनडुद्भ्याम्, अनडुद्भिः, इत्यादि। गोधुक्, गोधुग्, गोदुहौ, गोदुहः, इत्यादि। मित्रध्रुक्, मित्रध्रुग्, मित्रधृट्, मित्रधृड्, मित्रध्रुग्भ्याम्, मित्रधृग्भ्याम् इत्यादि। मुक्, मुग्, मुट्, मुड्, मुडौ, मुडः, इत्यादि। लिट्, लिड्, लिहौ, लिहः इत्यादि।

७४४ * अग्निपुराण *


(दिशा), दृक् (नेत्र), तादृक् (तादृशी) तथा 'असौ'—ये स्त्रीलिङ्गके नायक शब्द हैं*। अब नपुंसकलिङ्गके नायक शब्द बताये जा रहे हैं॥ १२-१९ ॥

(सर्वप्रथम स्वरान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके प्रारम्भिक सिद्ध रूप दिये जाते हैं—) 'कुण्डम्'—यह अकारान्त नपुंसकलिङ्ग 'कुण्ड' शब्दका प्रथमान्त एकवचनरूप है। इसके प्रथम दो विभक्तियोंमें क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचनके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—कुण्डम्, कुण्डे, कुण्डानि। तृतीया आदि शेष विभक्तियोंके रूप पुँल्लिङ्गवत् जानने चाहिये। यथा—कुण्डेन, कुण्डाभ्याम्, कुण्डैः इत्यादि। सम्बोधनमें—हे कुण्ड, हे कुण्डे, हे कुण्डानि। 'कुण्डम्' का अर्थ है—पानीसे भरा हुआ गहरा गड्ढा। यह नदी और तालाब आदिमें होता है। मिट्टीके बड़े और गहरे पात्रविशेषको


* स्त्रीलिङ्गमें नामतः निर्दिष्ट 'नायक' शब्दोंके रूपोंका दिग्दर्शन मात्र कराया जा रहा है। 'जाया' शब्दका पूरा रूप इस प्रकार है—१. जाया जाये जायाः। २. जायाम् जाये जायाः। ३. जायया जायाभ्याम् जायाभिः। ४. जायायै जायाभ्याम् जायाभ्यः। ५. जायायाः जायाभ्याम् जायाभ्यः। ६. जायायाः जाययोः जायानाम्। ७. जायायाम् जाययोः जायासू। सम्बोधनमें—हे जाये हे जाये हे जायाः। 'जरा' शब्दका, स्वादि विभक्तियाँ परे हों तो 'जरस्' आदेश होता है। यह आदेश वैकल्पिक है। अतः 'जरा' का एक रूप तो 'जाया' की तरह ही होगा। औ, जस्, अम्, शस्, टा, ङे आदि विभक्तियोंमें क्रमशः—जरसौ, जरसः, जरसम्, जरसः, जरसा, जरसे इत्यादि वैकल्पिक रूप भी होंगे। बाला, एडका, वृद्धा आदिसे लेकर कौमुदगन्धातकतके सभी शब्दोंका रूप जायावत् होगा। 'सर्वा' शब्दका रूप—सर्वा सर्वे सर्वाः। सर्वाम् सर्वे सर्वाः। सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वाभिः। ङिद्-विभक्तियोंमें सर्वस्यै, सर्वस्याः, सर्वस्याः, सर्वस्याम् रूप होंगे। 'आम्' विभक्तिमें सर्वासाम्। शेष सब जगह जायावत् रूप चलेंगे। 'पूर्वा' और 'अन्या' शब्दोंके रूप 'सर्वा' की तरह होंगे। द्वितीया-तृतीया शब्द ङिड्-विभक्तियोंमें विकल्पसे सर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। जैसे 'ङे' विभक्तिमें 'द्वितीयायै', 'द्वितीयस्यै'। इसी प्रकार अन्य पञ्चमी आदिके एकवचनमें भी। 'बुद्धि' शब्दके रूप—'बुद्धिः, बुद्धीः, बुद्धयः। बुद्धिम्, बुद्धी, बुद्धीः। बुद्ध्या, बुद्धिभ्याम्, बुद्धिभिः। बुद्धयै इत्यादि। 'ङि'विभक्तिमें बुद्ध्याम्, बुद्धौ। इसी तरह 'मति' शब्दके भी रूप हैं। 'स्त्री' शब्दकी 'ई'को अजादि विभक्तियोंमें 'इयङ्' आदेश होता है। यथा स्त्रियौ, स्त्रियः इत्यादि। अम्-शस्में विकल्प है—स्त्रियम्, स्त्रीम्। स्त्रियः स्त्रीः। 'सु' विभक्तिमें 'स्त्री' रूप होता है। 'सु'का लोप हो जाता है। 'श्री' शब्दका रूप—श्रीः श्रियौ श्रियः इत्यादि। 'नदी' शब्दका रूप—नदी नद्यौ नद्यः। नदीम्, नद्यौ, नदीः। नद्या नदीभ्याम् नदीभिः। नद्यै नदीभ्यां नदीभ्यः। नद्याः, नदीभ्याम्, नदीभ्यः। नद्याः नद्योः नदीनाम्। नद्याम्, नद्योः नदीषु। हे नदि हे नद्यौ हे नद्यः। 'सुधी'का रूप सुधीः सुधियौ सुधियः इत्यादि। 'भवन्ती'का रूप नदीवत्। यहाँसे लेकर 'पुत्रवती' शब्दतकके रूप नदीवत् ही होंगे। 'नौ' शब्दका रूप—नौः नावौ नावः इत्यादि। वधू—वधूः वध्वौ वध्वः इत्यादि। 'देवता' का रूप जायावत्। 'भू'—भूः भुवौ भुवः इत्यादि। तिसृ—१. तिस्रः। २. तिस्रः। ३. तिसृभिः। ४-५. तिसृभ्यः। ६. तिसृणाम्। ७. तिसृषु। इसी प्रकार 'चतसृ'के रूप जानने चाहिये। 'द्वि' शब्दके स्त्रीलिङ्गमें—द्वे, द्वे, द्वाभ्याम् ३, द्वयोः २ रूप होते हैं। 'कति'—कति, कति, कतिभिः इत्यादि। 'वर्षाभू'—वर्षाभूः, वर्षाभ्वौ, वर्षाभ्वः इत्यादि। स्वसा स्वसारौ स्वसारः इत्यादि। माता मातरौ मातरः। मातरम्, मातृः इत्यादि। 'अवरा'का रूप पूर्वावत्। 'गो'—गौः गावौ गावः। गाम् गावौ गाः। गवा गोभ्याम् गोभिः। इत्यादि। द्यौः द्यावौ द्यावः इत्यादि। वाक् वाग्, वाचौ वाचः इत्यादि। त्वक्—'वाक्'के समान। 'प्राची'से लेकर 'उदीची' तकके रूप—नदीवत्। शरत्—शरत् शरद् शरदौ शरदः इत्यादि। विद्युत्—विद्युत् विद्युद् विद्युतो विद्युतः इत्यादि। सरित्-सरित् सरिद् सरितौ सरितः इत्यादि। 'अग्निवित्' शरत्के समान। 'सस्यदा' जायावत्। 'सम्पत्' शरत्के समान। 'दृषत्' शरत्के समान। या ये याः, याम् ये याः। यया याभ्याम् इत्यादि। यस्याः यासाम्, यस्याम् इत्यादि। एषा एते एताः इत्यादि। सा ते ताः इत्यादि। 'वेदविद्' शरत्के समान। 'संवित्' भी शरत्के समान। 'बह्नी', 'राज्ञी'—नदीके समान। त्वम् युवाम् यूयम्। त्वां युवाम् युष्मान्। त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः। तुभ्यम् युवाभ्याम् युष्मभ्यम्। त्वत् युवाभ्याम् युष्मत्। तव युवयोः युष्माकम्। त्वयि युवयोः युष्मासु। इसी तरह 'अस्मद्' शब्दके अहं आवाम् वयम्। माम् आवाम् अस्मान्। मया आवाभ्याम् अस्माभिः। मह्यम्, मत्, मम, अस्माकम् मयि इत्यादि रूप हैं। 'सीमा' टाबन्त हो तो सीमा सीमे सीमाः। नान्त हो तो सीमा सीमानौ सीमानः इत्यादि। 'पञ्चन्' शब्द—पञ्च पञ्च पञ्चभिः इत्यादि। 'राका' जायावत्। धूः धुरौ धुरः इत्यादि। पूः पुरौ पुरः इत्यादि। 'दिशा'—जायावत्। 'दिक्' शब्दके—दिक्-दिग् दिशौ दिशः। इत्यादि रूप हैं। गीः गिरौ गिरः इत्यादि। 'विदुषी'—नदीवत्। 'किम्' शब्दके—का के काः इत्यादि रूप हैं। 'इदम्'—इयम् इमे इमाः इत्यादि। 'दृक्' शब्द 'दिक्'के समान। तादृग्, तादृक्, तादृशौ तादृशः इत्यादि। 'अदस्' असौ अमू अमूः। अमूम् अमू अमूः। अमुया इत्यादि।

  • अध्याय ३५१ * | ७४५ ---|---

भी 'कुण्ड' कहते हैं। इसीको ध्यानमें रखकर कुण्डभर दूध देनेवाली गायको 'कुण्डोध्नी' कहते हैं। 'सर्वम्'—यह 'सर्व' शब्दका एकवचनान्त रूप है, इसका अर्थ है सम्पूर्ण या सब। इसके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें नपुंसकलिङ्ग-सम्बन्धी रूप इस प्रकार होते हैं—सर्वम् सर्वे सर्वाणि। शेष पुँल्लिङ्गवत्। 'सोमपम्'—सोम पान करनेवाला कुल (ब्राह्मणकुल या देवकुल)। इसके भी प्रथम दो विभक्तियोंमें सोमपम् सोमपे सोमपानि इत्यादि रूप होंगे। शेष पुँल्लिङ्ग रामवत्। 'दधि' और 'वारि' शब्द क्रमशः दही और जलके वाचक हैं। ये नित्य नपुंसकलिङ्ग हैं। अतः इनके सम्पूर्ण रूप यहाँ उद्धृत किये जाते हैं। प्र०, द्वि० विभक्तियोंमें—दधि दधिनी दधीनि। तृ०—दध्ना, दधिभ्याम्, दधिभिः। च०—दध्ने दधिभ्याम् दधिभ्यः। पं०—दध्नः दधिभ्याम् दधिभ्यः। ष०—दध्नः, दध्नोः, दध्नाम्। स०—दध्नि-दधनि, दध्नोः, दधिषु। 'वारि' शब्दके सातों विभक्तियोंके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—१, २—वारि वारिणी वारीणि। ३—वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः। ४—वारिणे वारिभ्याम् वारिभ्यः। ५—वारिणः वारिभ्याम् वारिभ्यः। ६—वारिणः वारिणोः वारीणाम्। ७—वारिणि, वारिणोः, वारिषु। 'खलपु' का अर्थ है—खलिहानको स्वच्छ करनेवाला साधन, 'खुरपा' आदि। इसके रूप विशेष्यके अनुसार स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्गमें भी होते हैं। यहाँ नपुंसकलिङ्गमें इसके रूप उद्धृत किये जाते हैं। १, २—खलपु खलपुनी खलपूनि। ३—खलप्वा, खलपुना खलपूभ्याम् खलपूभिः। ४—खलप्वे-खलपुने खलपूभ्याम् खलपूभ्यः इत्यादि। 'मधु' शब्द शहद और मदिराका वाचक है। इसके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—१, २—मधु मधुनी मधूनि। ३—मधुना मधुभ्याम् मधुभिः। ४—मधुने मधुभ्याम् मधुभ्यः। ५—मधुनः मधुभ्याम् मधुभ्यः। ६—मधुनः मधुनोः मधूनाम्। ७—मधुनि मधुनोः मधुषु। सं० हे मधो, हे मधु हे मधुनी हे मधूनि!। 'त्रपु' शब्द राँगाका वाचक है। इसके प्रथम दो विभक्तियोंके रूप इस प्रकार हैं—त्रपु, त्रपुणी, त्रपूनि। शेष मधुवत्। 'कर्तृ' (करनेवाला), 'भर्तृ' (भरण-पोषण करनेवाला), 'अतिभर्तृ' (भर्ताको भी अतिक्रमण करनेवाला कुल)—इन तीनों शब्दोंके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें रूप क्रमशः इस प्रकार हैं—कर्तृ कर्तृणी कर्तॄणि। भर्तृ भर्तृणी भर्तॄणि। अतिभर्तृ अतिभर्तृणी अतिभर्तॄणि। तृतीया आदि विभक्तियोंमें जो अजादि प्रत्यय हैं, उनमें दो-दो रूप होंगे। यथा—कर्त्रा, कर्तृणा। भर्त्रा, भर्तृणा। अतिभर्त्रा, अतिभर्तृणा इत्यादि। 'पयस्' शब्द जलका वाचक है। इसके रूप इस प्रकार हैं—१, २—पयः पयसी पयांसि। तृतीया आदिमें पयसा पयोभ्याम् पयोभिः इत्यादि। 'पुरस्' शब्द सकारान्त अव्यय है। इसका अर्थ है—पहले या आगे। अव्यय शब्दोंका कोई रूप नहीं चलता; क्योंकि 'अव्यय' का यह लक्षण है—॥ २०॥<br><br>सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु।<br>वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम्॥<br><br>प्राक् (पूर्व), प्रत्यक् (अंदर या पश्चिम), तिर्यक् (तिरछी दिशाकी ओर चलनेवाले पशु-पक्षी आदि), उदक् (उत्तर)—इन शब्दोंके प्रथम दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार जानने

७४६ * अग्निपुराण *

चाहिये। प्राक् प्राची प्राञ्चि। प्रत्यक् प्रतीची प्रत्यञ्चि। तिर्यक् तिरश्ची तिर्यञ्चि। उदक् उदीची उदञ्चि इत्यादि। ये गत्यर्थक 'अञ्च्'के रूप हैं, पूजा-अर्थमें प्रयुक्त 'अञ्च्'के—प्राङ् प्राञ्ची प्राञ्चि। प्रत्यङ् प्रत्यञ्ची प्रत्यञ्चि। उदङ् उदञ्ची उदञ्चि। तिर्यङ् तिर्यञ्ची तिर्यञ्चि। इत्यादि रूप होते हैं। 'जगत्' शब्द संसारका वाचक है। इसके रूप हैं—जगत् जगती जगन्ति इत्यादि। 'जाग्रत्' शब्दका अर्थ है—सजग रहनेवाला। इसके रूप हैं—जाग्रत् जाग्रती जाग्रन्ति, जाग्रति इत्यादि। 'शकृत्' शब्द मल या विष्ठाका वाचक है। इसके रूप शकृत्, शकृती, शकृन्ति, शकानि इत्यादि। तृतीया आदिमें शक्ना, शकृता इत्यादि। जिस कुलमें बहुत अच्छी सम्पत्ति है, उसको 'सुसम्पत्' कहते हैं। सुसम्पत्‌के प्रथम दो विभक्तियोंमें इस प्रकार रूप होते हैं—सुसम्पत्, सुसम्पद्, सुसम्पदी, सुसम्पन्ति, इत्यादि। सुन्दर दण्डियोंसे युक्त मन्दिर या आयतनको 'सुदण्डि' कहते हैं। 'सुदण्डिन्' शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—सुदण्डि सुदण्डिनी सुदण्डीनि। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् होते हैं। 'इह' शब्द अव्यय है। 'अहन्' शब्द दिनका वाचक है। इसके प्रथम दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार जानने चाहिये—अहः अहनी, अह्नी, अहानि। 'किम्' प्रश्नवाचक सर्वनाम है। इसके रूप तीनों लिङ्गोंमें होते हैं। नपुंसकलिङ्गमें प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें 'किम् के कानि—ये रूप होते हैं। शेष रूप पुँल्लिङ्ग 'सर्व' शब्दके समान हैं। 'इदम्'का अर्थ है—यह। इसके नपुंसकलिङ्गमें—इदम् इमे इमानि—ये रूप होते हैं। तृतीया आदि विभक्तियोंमें पुँल्लिङ्गवत् रूप जानने चाहिये॥ २१॥

'ष्' शब्द संख्या छःका वाचक और बहुवचनान्त है। इसके तीनों लिङ्गोंमें समान रूप होते हैं। १, २—षट्। ३—षड्भिः। ४-५—षड्भ्यः। ६—षण्णाम्। ७—षट्सु। 'सर्पिष्' शब्द घीका वाचक है। इसके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—सर्पिः सर्पिषी सर्पींषि। सर्पिषा सर्पिर्भ्याम् सर्पिर्भिः इत्यादि। 'श्रेयस्' शब्द कल्याणका वाचक है। उसके रूप—श्रेयः श्रेयसी श्रेयांसि इत्यादि हैं। तृतीया आदिमें 'पयस्' शब्दके समान इसके रूप जानने चाहिये। संख्या चारका वाचक 'चतुर्' शब्द नित्य बहुवचनान्त है। नपुंसकलिङ्गमें इसके रूप इस प्रकार हैं—१, २—चत्वारि। ३—चतुर्भिः। ४, ५—चतुर्भ्यः। ६—चतुर्णाम्। ७—चतुर्षु। 'अदस्' शब्द 'यह', 'वह'का वाचक सर्वनाम है। नपुंसकमें प्रथम दो विभक्तियोंमें इसके रूप—'अदः अमू अमूनि' होते हैं। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् जानने चाहिये। इनसे भिन्न जो दूसरे-दूसरे शब्द हैं, उनके रूप भी इन पूर्वकथित शब्दोंके ही समान हैं। इन शब्दोंकी 'प्रातिपदिक' संज्ञा कही गयी है। प्रातिपदिकसे परे प्रथमा आदि विभक्तियाँ होती हैं। जो धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्तसे रहित अर्थवान् शब्द है। उसीको 'प्रातिपदिक' कहते हैं। प्रातिपदिकसे प्रातिपदिकार्थ, लिङ्गमात्राधिक्य और वचनमात्रका बोध करानेके लिये प्रथमा* विभक्ति होती है॥ २२-२३॥

सम्बोधनमें तथा उक्त कर्म और कर्तामें भी


* जो लिङ्गरहित (अव्यय) और नियत लिङ्गवाले शब्द हैं, वे 'प्रातिपदिकार्थमात्र'के उदाहरण हैं। यथा—उच्चैः, नीचः, कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम् इत्यादि। जो अनियत लिङ्गवाले शब्द हैं, वे 'लिङ्गमात्राधिक्य'के उदाहरण हैं। यथा—तटः, तटी, तटम् इत्यादि। 'वचन' कहते हैं—संख्याको। उसके उदाहरण—एकः, द्वौ, बहवः इत्यादि हैं।

  • अध्याय ३५१ * ७४७

प्रथमा१ विभक्तिका प्रयोग होता है। जो किया जाता है, उसकी ‘कर्म’ संज्ञा है। कर्ममें द्वितीया२ विभक्ति होती है। जिसकी सहायतासे कर्म किया जाता है, उसको ‘करण’ कहते हैं तथा जो कार्य करता है, उसे ‘कर्ता’ कहते हैं। तिङ्, कृत्, तद्धित प्रत्ययों और समाससे अनुक्त कर्तामें और करणमें भी तृतीया३ विभक्ति होती है। किसी भी कारकके रहते हुए कर्तामें भी तृतीया होती है। यथा—‘व्रजं नेतव्या गावः कृष्णेन।’ [यहाँ ‘कृत्यानां कर्तरि वा।’—इस सूत्र (२।३।७१) के अभिप्रायका उपजीव्यभाव लक्षित होता है।] सम्प्रदानमें चतुर्थी४ विभक्ति होती है। जिसको कुछ देनेकी इच्छा हो, उसे ‘सम्प्रदान’ कहा गया है। जिससे कोई पृथक् होता हो, जिससे कुछ लेता या ग्रहण करता हो तथा जिससे भयकी प्राप्ति होती हो, उसकी ‘अपादान’ संज्ञा होती है। अपादानमें पञ्चमी५ विभक्ति होती है। जहाँ स्व-स्वामिभाव या जन्य-जनकभाव आदि सम्बन्धका बोध होता हो, वहाँ षष्ठी६ विभक्तिका प्रयोग होता है। जो आधार हो, उसकी ‘अधिकरण’ संज्ञा होती है। ‘अधिकरण’में सप्तमी७ विभक्तिका प्रयोग होता है। जहाँ एकार्थ विवक्षित हो, वहाँ एकवचन और जहाँ द्वित्व विवक्षित हो, वहाँ द्विवचनका प्रयोग करना चाहिये। बहुत्वकी विवक्षा होनेपर बहुवचनका प्रयोग होता है। अब शब्दोंके सिद्ध रूप बताता हूँ—वृक्षः, सूर्यः, अम्बुवाहः, अर्कः, हे रवे ! हे द्विजातयः !८॥ २४–२९॥

विप्रौ (विप्र+प्र० द्वि०), गजान् (गज+द्वि० बहु०), महेन्द्रेण (महेन्द्र+तृ० एक०), यमाभ्याम् (यम+तृ० द्वि), अनिलैः (अनिल+तृ० बहु०), कृतम् (कृत नपुंसकलिङ्ग प्रथमा-एकवचन), रामाय (राम+च० एक०), मुनिवर्याभ्याम् (मुनिवर्य+च० द्वि०), केभ्यः (किम्+च० बहु०), धर्मात् (धर्म+पं० एक०), हरौ (हरि+सप्त० एक०), रतिः (रति+प्र० एक०), शराभ्याम् (शर+पञ्च० द्वि०), पुस्तकेभ्यः (पुस्तक+पञ्च० बहु०), अर्थस्य (अर्थ+षष्ठी एक०), ईश्वरयोः (ईश्वर+षष्ठी द्वि०), गतिः (गति+प्र० एक०), बालानाम् (बाल+षष्ठी बहु०), सज्जने (सज्जन+सप्त० एक०), प्रीतिः (प्रीति+प्र० एक०), हंसयोः (हंस+सप्त० द्वि०), कमलेषु (कमल+सप्त० बहु०), बालकोंकी सज्जनमें प्रीति होती है और हंसके जोड़ेकी कमलोंमें—यह इकतीसवें श्लोकके उत्तरार्धका वाक्यार्थ हैं९॥ ३०–३१॥

इसी प्रकार ‘काम’, ‘महेश’ आदि शब्द


१. सम्बोधनमें प्रथमाका उदाहरण—‘हे राम! हे रामौ!’ इत्यादि। २. द्वितीयाका उदाहरण—हरिं भजति। ३. उदा०—रामेण बाणेन हतो वाली। यहाँ ‘राम’ शब्द ‘तिङ्’ प्रत्ययद्वारा अनुक्त कर्ता है। अतः उसमें तृतीया हुई है। ‘बाण’ करण है, इससे उसमें तृतीया हुई है। ४. उदा०—ब्राह्मणाय गां ददाति। ५. उदा०—ग्रामाद् अपैति, आयाति वा। शिष्यो गुरोर्विद्यामादत्ते गृह्णाति वा। चोराद् बिभेति। जो भयका हेतु हो, उसीमें पञ्चमी होती है। अतः ‘अरण्ये बिभेति’ इसमें पञ्चमी नहीं हुई; क्योंकि भयका हेतु ‘अरण्य’ नहीं, व्याघ्र आदि हैं। ६. उदा०—राज्ञः पुरुषः, देवदत्तस्य पुत्रः इत्यादि। ७. उदा०—‘कटे आस्ते’ इत्यादि।

८. एकार्थमें एकवचन ‘रामः’ इत्यादि। द्वित्वविवक्षामें ‘रामौ’ इत्यादि। बहुत्वविवक्षामें बहुवचन ‘रामाः’ इत्यादि। ‘वृक्ष’ शब्दका प्रथमा विभक्तिके एकवचनमें ‘वृक्षः’—यह रूप सिद्ध होता है। इसके शेष रूप ‘राम’ शब्दकी तरह जानने चाहिये। इसी तरह सूर्यः, अम्बुवाहः और अर्कः—इनको क्रमशः सूर्य, अम्बुवाह और अर्क शब्दका प्रथमान्त एकवचन रूप समझना चाहिये। ‘वृक्ष’ और ‘सूर्य’ शब्दका अर्थ सर्वविदित है। ‘अम्बुवाह’ और ‘अर्क’ शब्द—ये क्रमशः मेघ और सूर्यके वाचक हैं। हे रवे !—यह ‘रवि’ शब्दका सम्बोधनमें प्रथमान्त एकवचन रूप है। हे द्विजातयः !—यह ‘द्विजाति’ शब्दका सम्बोधनमें प्रथमान्त बहुवचनरूप है। ‘रवि’ शब्द सूर्यका एवं ‘द्विजाति’ शब्द ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनोंका वाचक है।

९. इन दो श्लोकोंमें जो शब्द आये हैं, उनका पृथक्-पृथक् अर्थ इस प्रकार जानना चाहिये। विप्रौ=दो ब्राह्मण। गजान्=हाथियोंको। महेन्द्रेण=महेन्द्रसे। यमाभ्याम्=दो यमोंसे। अनिलैः=हवाओंसे। कृतम्=किया गया। रामाय=रामके लिये। मुनिवर्याभ्याम्=दो मुनिवरोंके लिये। केभ्यः=किनके लिये। धर्मात्=धर्मसे। हरौ=हरिमें। रतिः=अनुराग। शराभ्याम्=दो बाणोंसे। पुस्तकेभ्यः=पुस्तकोंसे। अर्थस्य=अर्थका। ईश्वरयोः=दो ईश्वरोंकी। गतिः=प्राप्ति। बालानाम्=बालकोंकी। सज्जने=सत्पुरुषमें। प्रीतिः=प्रेम। हंसयोः=दो हंसोंकी। कमलेषु=कमलोंमें।

७४८ * अग्निपुराण *

'वृक्ष' शब्दके समान जानने चाहिये। 'सर्वे', 'विश्वे' —इन दोनोंका अर्थ है—सब। ये प्रथमा विभक्तिके बहुवचनान्तरूप हैं। सर्वस्मै, सर्वस्मात्—ये 'सर्व' शब्दके क्रमशः चतुर्थी और पञ्चमी विभक्तिके एकवचनान्त रूप हैं। कतरो मतः=दोमेंसें कौन अभिमत है? यहाँ 'कतर' शब्दका प्रथमामें एकवचनान्त सिद्ध रूप दिया गया है। 'कतर' शब्द सर्वनाम है और 'सर्व' शब्दकी भाँति उसका रूप चलता है। सर्वेषाम् (सर्व+षष्ठी० बहु०), स्वं च ('स्व' शब्द भी सर्वनाम है। अतः इसका रूप भी सर्ववत् समझना चाहिये।) विश्वस्मिन् (विश्व+सप्त० एक०)—इन शब्दोंके शेष रूप 'सर्व' शब्दके समान हैं। इसी प्रकार उभय, कतर, कतम और अन्यतर आदि शब्दोंके रूप होते हैं। पूर्वे, पूर्वाः—ये 'पूर्व' शब्दके प्रथमान्त बहुवचन रूप हैं। प्रथमान्त बहुवचनमें पूर्वादि शब्दोंको विकल्पसे सर्वनाम माना जाता है। सर्वनाम-पक्षमें 'पूर्वे' और सर्वनामाभाव-पक्षमें 'पूर्वाः' रूपकी सिद्धि होती है। पूर्वस्मै (पूर्व+च० एक०), 'पूर्वस्मात् सुसमागतः'—पूर्वसे आया। यहाँ 'पूर्व' शब्दका पञ्चमी विभक्तिमें एकवचनान्त रूप प्रयुक्त हुआ है। 'पूर्वे बुद्धिश्च पूर्वस्मिन्'—पूर्वमें बुद्धि। यहाँ 'पूर्व' शब्दका सप्तमीके एक वचनमें रूपद्वय प्रयुक्त हुआ है। 'पूर्व' आदि नौ शब्दोंसे पञ्चमी और सप्तमीके एकवचनमें 'ङसि और ङि' के स्थानोंमें 'स्मात्' और 'स्मिन्' आदेश विकल्पसे होते हैं। उनके होनेपर पूर्वस्मात् और पूर्वस्मिन् रूप बनते हैं और न होनेपर 'राम' शब्दकी भाँति 'पूर्वात्' और 'पूर्वे' रूप होते हैं। शेष रूप सर्ववत् जानने चाहिये। इसी प्रकार पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अन्तर, अपर, अधर और नेम शब्दोंके भी रूप जानने चाहिये। प्रथमे, प्रथमाः—ये 'प्रथम' शब्दके बहुवचनान्त रूप हैं। इनके शेष रूप 'अर्क' शब्दके समान जानने चाहिये। इसी तरह 'चरम' शब्द, 'तयप्' प्रत्ययान्त शब्द तथा 'अल्प', 'अर्ध' और 'नेम' आदि शब्दोंके भी रूप होते हैं। यहाँ अन्तर इतना ही है कि 'चरम' और 'कतिपय' आदि शब्दोंके शेष रूप 'प्रथम' शब्दके समान होंगे और 'नेम' आदि शब्दोंके शेष रूप सर्ववत् होंगे। जिसके अन्तमें 'तीय' लगा है, उन 'द्वितीय' और 'तृतीय' शब्दोंके चतुर्थी, पञ्चमी और सप्तमी विभक्तियोंमें एकवचनान्त रूप विकल्पसे सर्ववत् होते हैं। जैसे—(चतुर्थी) द्वितीयस्मै, द्वितीयाय। (पञ्चमी) द्वितीयस्मात्, द्वितीयात्। (सप्तमी) द्वितीयस्मिन्, द्वितीये।

इसी प्रकार 'तृतीय' शब्दके भी रूप होंगे। इन दोनों शब्दोंके शेष रूप 'अर्क' शब्दके समान होते हैं॥ ३२—३६$\frac{१}{२}$॥

अब 'सोमपा' शब्दके सिद्ध रूप क्रमशः दिये जाते हैं—

१—सोमपाः, सोमपौ, सोमपाः। २—सोमपाम्, सोमपौ, सोमपः। ३—सोमपा, सोमपाभ्याम्, सोमपाभिः। ४—सोमपे, सोमपाभ्याम्, सोमपाभ्यः। ५—सोमपः, सोमपाभ्याम्, सोमपाभ्यः। ६—सोमपः, सोमपोः, सोमपाम्। ७—सोमपि, सोमपोः, सोमपासु। (यहाँ ज्ञेयौ, व्रज, हृद और कुलम्—ये पद पादपूर्तिमात्रके लिये दिये गये हैं। यहाँ प्रकृतमें इनका कोई उपयोग नहीं है।)

'सोमपा' शब्दके समान ही 'कीलालपा' आदि शब्दोंके रूप होंगे। अब कवि, अग्नि, अरि, हरि, सात्यकि, रवि, वह्नि—इन शब्दोंके कतिपय सिद्ध रूप उद्धृत किये जाते हैं। कविः (कवि+प्र० एक०), अग्निः (अग्नि+प्र० एक०), अरयः (अरि+प्र० बहु०), हे कवे! (कवि+सम्बोधन एक०), कविम् (कवि+द्वि० एक०), अग्नी (अग्नि+द्वि० द्वि०), हरीन् (हरि+द्वि० बहु०), सात्यकिना (सात्यकि+तृ० एक०), रविभ्याम्

  • अध्याय ३५१ * ७४९

(रवि+तृ० द्वि०), रविभिः (रवि०+तृ० बहु०), 'देहि वह्नये यः समागतः — जो आया है उसे वह्नि (अग्नि)-को समर्पित कर दो।' वह्नये (वह्नि+च० एक०), अग्नेः (अग्नि+षष्ठी एक०), अग्न्योः (अग्नि+षष्ठी द्वि०), अग्नीनाम् (अग्नि+षष्ठी बहु०), कवौ (कवि+सप्त० एक०), कव्योः (कवि+सप्त० द्वि०), कविषु (कवि+सप्त० बहु०) ॥ ३७-४० ॥

इसी प्रकार सुसृति, अभ्रान्ति, सुकीर्ति और सुधृति आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। यहाँ इन सबका प्रथमाका एकवचनान्त रूप दिया गया है। यथा—सुसृतिः, अभ्रान्तिः, सुकीर्तिः, सुधृतिः। अब 'सखि' शब्दके रूप दिये जाते हैं—१-सखा, सखायौ, सखायः। हे सखे! सत्पतिं व्रज। (हे मित्र! तुम अच्छे स्वामीके पास जाओ।) 'हे सखे' यह सखि शब्दका सम्बोधनमें एकवचनान्त रूप है। २-सखायम्, सखायौ, सखीन्। ३-सख्या आगतः (मित्रके साथ आया)। ४-सख्ये दद (मित्रको दो)। ५-सख्युः। ६-सख्युः, सख्योः, सखीनाम्। ७- सख्यौ, सख्योः, सखिषु। शेष रूप 'कवि' शब्दके समान जानने चाहिये। पत्या (पति+तृ० एक०), पत्ये (पति+च० एक०), पत्युः (पति+पञ्च० एक०), पत्युः (पति+षष्ठी एक०), पत्योः (पति+षष्ठी द्वि०), पत्यौ (पति+सप्त० एक०)। 'पति' शब्दके शेष रूप 'अग्नि' शब्दके समान जानने चाहिये। (यदि 'पति' शब्द समासमें आबद्ध हो तो उसके सम्पूर्ण रूप 'कवि' शब्दके समान ही होंगे।) अब 'द्वि' शब्दके पुँल्लिङ्ग रूप दिये जाते हैं, यह नित्य द्विवचनान्त है। १, २—द्वौ। ३, ४, ५—द्वाभ्याम्। ६, ७—द्वयोः। यह दो संख्याका वाचक है ॥ ४१-४३ ॥

अब संख्या तीनके वाचक नित्य बहुवचनान्त पुँल्लिङ्ग 'त्रि' शब्दके रूप दिये जाते हैं—१-त्रयः। २-त्रीन्। ३-त्रिभिः। ४, ५-त्रिभ्यः। ६-त्रयाणाम्। ७-त्रिषु।—ये क्रमशः सात विभक्तियोंके रूप हैं। अब 'कति' शब्दके रूप दिये जाते हैं—१-कति। २-कति। शेष रूप 'कवि' शब्दके समान होते हैं। यह नित्य बहुवचनान्त शब्द है। अब 'नेता'के अर्थमें प्रयुक्त होनेवाले 'नी' शब्दके रूप उद्धृत किये जाते हैं—१-नीः, नियौ, नियः। सम्बोधन—हे नीः, हे नियौ, हे नियः। २-नियम्, नियौ, नियः। ३-निया, नीभ्याम्, नीभिः। ४-निये, नीभ्याम्, नीभ्यः। ५-नियः, नीभ्याम्, नीभ्यः। ६-नियः, नियोः, नियाम्। ७-नियि*, नियोः नीषु। सुश्रीः (सुश्री+प्र० एक०)। इसी तरह 'सुधीः' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'ग्रामणीः पूजयेद्धरिम्' गाँवका मुखिया श्रीहरिका पूजन करे। 'ग्रामणी' शब्दके रूप इस प्रकार हैं—१-ग्रामणीः, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। २-ग्रामण्यम्, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। ३-ग्रामण्या, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभिः। ४-ग्रामण्ये, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभ्यः। ५-ग्रामण्यः, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभ्यः। ६-ग्रामण्यः, ग्रामण्योः, ग्रामण्याम्। ७-ग्रामण्याम्, ग्रामण्योः, ग्रामणीषु। इसी तरह 'सेनानी' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'सुभू' शब्दके रूप—सुभूः, सुभुवौ इत्यादि हैं। 'स्वयम्भू' शब्दके रूप—१-स्वयम्भूः, स्वयम्भुवौ, स्वयम्भुवः। २-स्वयम्भुवम्, स्वयम्भुवौ, स्वयम्भुवः। ३-स्वयम्भुवा। सप्तमीके एकवचनमें 'स्वयम्भुवि'। शेष 'सुभू' शब्दके समान। इसी तरह 'प्रतिभू' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'खलपू' शब्दके रूप—खलपूः, खलप्वौ, खलप्वः। खलप्वम् इत्यादि हैं। सप्तमीके एकवचनमें 'खलप्वि'—यह रूप होता है। इसी प्रकार 'शरपू' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'क्रोष्टु' शब्दके क्रमशः पाँच रूप इस प्रकार होते हैं—क्रोष्टा, क्रोष्टारौ, क्रोष्टारः। क्रोष्टारम्, क्रोष्टारौ।


* पाणिनीय व्याकरणके अनुसार 'नी' शब्दका सप्तमी विभक्तिके एकवचनमें 'नियाम्'—यह रूप होता है। कौमार-व्याकरणमें 'नियि'—यह रूप उपलब्ध होता है। अतः इस अंशमें इन दोनों व्याकरणोंका अन्तर सुस्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

७५० * अग्निपुराण *

द्वितीयाके बहुवचनमें ‘क्रोष्टून्’—यह रूप बनता है। तृतीया आदिके स्वरादि प्रत्ययोंमें दो-दो रूप चलते हैं। एक ‘क्रोष्टु’ शब्दके, दूसरे ‘क्रोष्टृ’ शब्दके। यथा—क्रोष्टुना क्रोष्ट्रा, क्रोष्टवे क्रोष्ट्रे, क्रोष्टोः क्रोष्टुः इत्यादि। षष्ठीके बहुवचनमें ‘क्रोष्टूनाम्’—यह एक ही रूप होता है। सप्तमीके एकवचनमें क्रोष्टौ, क्रोष्टरि—ये रूप होते हैं। हलादि विभक्तियोंमें इसके रूप ‘शम्भु’ आदि शब्दोंके समान होते हैं। ‘पितृ’ शब्दके रूप— १-पिता, पितरौ, पितरः। सम्बोधनमें—हे पितः! हे पितरौ! हे पितरः! । २-पितरम्, पितरौ, पितॄन्। ३-पित्रा, पितृभ्याम्, पितृभिः। ४-पित्रे, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ५-पितुः, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ५-पितुः, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ६-पितुः, पित्रोः, पितॄणाम्। ७-पितरि, पित्रोः, पितृषु॥ ४४—५०॥

इसी प्रकार ‘भ्रातृ’ और ‘जामातृ’ आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये—१-भ्राता, भ्रातरौ, भ्रातरः। जामाता, जामातरौ, जामातरः इत्यादि। ‘नृ’ शब्दके रूप ‘पितृ’ शब्दके समान होते हैं। केवल षष्ठीके बहुवचनमें उसके नॄणाम्, नृणाम्—ये दो रूप होते हैं। ‘कर्तृ’ शब्दके प्रारम्भिक पाँच रूप इस प्रकार होते हैं—कर्त्ता, कर्त्तारौ, कर्त्तारः। कर्त्तारम्, कर्त्तारौ। द्वितीयाके बहुवचनमें कर्तॄन्, षष्ठीके बहुवचनमें कर्तॄणाम् और सप्तमीके एकवचनमें कर्त्तरि रूप होते हैं। शेष रूप ‘पितृ’ शब्दके समान जानने चाहिये। इसी तरह उद्गातृ, स्वसृ और नप्तृ आदि शब्दोंके रूप होते हैं। उद्गाता$^१$ उद्गातारौ उद्गातारः। स्वसा$^२$, स्वसारौ, स्वसारः। नप्ता$^३$, नप्तारौ, नप्तारः इत्यादि। शेष रूप ‘कर्तृ’ शब्दके समान होते हैं। ‘स्वसृ’ शब्दका द्वितीयाके बहुवचनमें ‘स्वसॄः’ रूप होता है। ‘सुरै’$^४$ शब्दके रूप इस प्रकार हैं—सुराः, सुरायौ, सुरायः इत्यादि। षष्ठीके बहुवचनमें सुरायाम् और सप्तमीके एकवचनमें सुरायि रूप होते हैं। ‘गो’ शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं। १-गौः$^५$, गावौ, गावः। २-गाम्, गावौ, गाः। ३-गवा गोभ्याम्, गोभिः इत्यादि। षष्ठी—गोः, गवोः, गवाम्। सप्तमी—गवि, गवोः, गोषु। इसी प्रकार ‘द्यौ’ तथा ‘ग्लौ’ शब्दोंके रूप जानने चाहिये। ये स्वरान्त शब्द पुँल्लिङ्गमें नायक (प्रधान) हैं॥ ५१—५३॥

अब हलन्त पुँल्लिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूप बताये जाते हैं। ‘सुवाच्’ शब्दके रूप यों जानने चाहिये—१-सुवाक्$^६$, सुवाग्, सुवाचौ, सुवाचः। २-सुवाचम्, सुवाचौ, सुवाचः। ३-सुवाचा, सुवाग्भ्याम्, सुवाग्भिः। इत्यादि। (सप्त० बहुवचनमें—) सुवाक्षु। इसी तरह ‘दिक्’ आदि शब्दोंके रूप होते हैं। प्राञ्च् शब्दके रूप—१-प्राङ्, प्राञ्चौ, प्राञ्चः। २-भोः प्राञ्चं व्रज (हे भाई! तुम प्राचीन महापुरुषोंके पथपर चलो)। यहाँ ‘प्राञ्चम्’ यह द्वितीया विभक्तिका एकवचनान्त रूप है। ३-प्राचा, प्राग्भ्याम्, प्राग्भिः। षष्ठीके बहुवचनमें ‘प्राचाम्’ रूप होता है। सप्तमीके एकवचनमें ‘प्राचि’ द्विवचनमें ‘प्राचोः’ और बहुवचनमें ‘प्राक्षु’। पूजार्थक ‘प्राञ्च’ शब्दके सप्तमीके बहुवचनमें ‘प्राङ्क्षु’ ‘प्राङ्क्षु’। इसी प्रकार उदञ्च्, सम्यञ्च् और प्रत्यञ्च् शब्दोंके भी रूप होते हैं। यथा—‘उदङ्’$^८$, उदञ्चौ उदञ्चः इत्यादि। स्त्रीलिङ्गमें उदीची$^९$। सम्यङ्$^{१०}$ सम्यञ्चौ, सम्यञ्चः। स्त्रीलिङ्गमें समीची$^{११}$। प्रत्यङ्$^{१२}$


१. यज्ञमें ‘उद्गाता’ नामक ऋत्विज्, जो साम-मन्त्रोंका उच्चस्वरसे गान करता है। २. बहिन। ३. नाती। ४. उत्तम लक्ष्मीसे सम्पन्न। ५. गाय-बैल। ६. उत्तम वक्ता। ७. पूर्ववर्ती विद्वान् या महात्मा। ८. ऊपर उठनेवाला। ९. उत्तर दिशा। १०. उत्तम आचरणवाला। ११. साध्वी। १२. अन्तर्मुख।

* अध्याय ३५१ * \hfill ७५१


प्रत्यञ्चौ, प्रत्यञ्चः। स्त्रीलिङ्गमें प्रतीची$^१$। इन सभी शब्दोंके 'शस्' आदि विभक्तियोंमें इस तरह रूप जानने चाहिये—उदीचः उदीचा। समीचः, समीचा। प्रतीचः, प्रतीचा इत्यादि। तिर्यङ्$^२$ तिर्यश्वः। सध्यङ्$^३$, सधीचः। विश्वद्र्यङ्, विश्वद्रीचः इत्यादि रूप भी पूर्ववत् बनते हैं। 'अमुम् अञ्चति'—इस विग्रहमें अमुमुयङ्$^४$, अदमुयङ्, अदद्र्यङ्—ये तीन रूप प्रथमा विभक्तिके एकवचनमें होते हैं। प्रथमाके बहुवचनमें 'अद्र्यञ्चः' रूप होता हैं और द्वितीयाके बहुवचनमें अमुमुईचः तथा अमुद्रीचः—ये रूप होते हैं। 'भ्याम्' विभक्तिमें पूर्ववत् 'अदद्र्यग्भ्याम्' रूपकी सिद्धि होती है। 'तत्त्वतृष्' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं—१-तत्त्वतृट्$^५$-तत्त्वतृड्, तत्त्वतृषौ, तत्त्वतृषः इत्यादि। तृतीया आदिके द्विवचनमें तत्त्वतृड्भ्याम्। 'तत्त्वतृड्भ्यां समागतः'—'वह तत्त्वज्ञानकी पिपासावाले दो व्यक्तियोंके साथ आया।' सप्तमीके एकवचनमें तत्त्वतृषि और बहुवचनमें तत्त्वतृट्सु—ये रूप होते हैं। इसी तरह 'काष्ठतक्ष्$^६$' आदि रूप होते हैं। यथा—काष्ठतट्, काष्ठतड्, काष्ठतक्षौ, काष्ठतक्षः इत्यादि। 'भिषज्' शब्दके रूप 'भिषक्$^७$, भिषग्-भिषजौ, भिषजः इत्यादि होते हैं। तृतीयाके द्विवचनमें 'भिषग्भ्याम्' और सप्तमीके एकवचनमें 'भिषजि' रूप होते हैं। इसी प्रकार 'जन्मभाक्' आदि भी जानने चाहिये। यथा—जन्मभाक्, जन्मभाग्, जन्मभाजौ, जन्मभाजः इत्यादि। 'मरुत्' शब्दके रूप इस प्रकार जाने—मरुत्, मरुद् मरुतौ मरुतः। मरुद्भ्याम् मरुति इत्यादि। इसी प्रकार 'शत्रुजित्$^{१०}$' आदि शब्दोंके भी रूप होते हैं। पूजनीय व्यक्तिके लिये प्रयुक्त होनेवाले 'भवत्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं—भवान्$^{११}$, भवन्तौ, भवन्तः इत्यादि। षष्ठीके बहुवचनमें 'भवताम्'—यह रूप होता है। 'भू' धातुसे बननेवाले 'शतृ' प्रत्ययान्त 'भवत्' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं—भवन्$^{१२}$, भवन्तौ भवन्तः इत्यादि। स्त्रीलिङ्गमें 'भवन्ती$^{१३}$' रूप होता है।

'महत्' शब्दके रूप—महान्$^{१४}$, महान्तौ, महान्तः। महती, इत्यादि। 'भगवत्' आदि शब्दोंके रूप 'भवत्' शब्दकी तरह—भगवान्$^{१५}$ भगवन्तौ भगवन्तः इत्यादि होते हैं। इसी प्रकार 'मघवत्' शब्दके रूप जानने चाहिये। यथा—मघवान्$^{१६}$, मघवन्तौ मघवन्तः इत्यादि। 'अग्निचित्' शब्दके रूप—अग्निचित्-द्$^{१७}$, अग्निचितौ, अग्निचितः इत्यादि होते हैं। सप्तमीके एकवचनमें 'अग्निचिति' और बहुवचनमें 'अग्निचित्सु'—ये रूप होते हैं। इसी प्रकार अन्यान्य 'तत्त्ववित्$^{१८}$' 'वेदवित्$^{१९}$' तथा 'सर्ववित्$^{२०}$' शब्दोंके रूप होते हैं॥ ५४—६१ ॥

'राजन्' शब्दके सिद्ध रूप इस प्रकार जानने चाहिये। यथा—१-राजा, राजानौ, राजानः। २-राजानम् राजानौ राज्ञः। ३-राज्ञा राजभ्याम् राजभिः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें 'राज्ञि' और 'राजनि'—ये दो रूप होते हैं। सम्बोधनमें—हे राजन्! इत्यादि। 'यज्वन्' शब्दके—यज्वा$^{२१}$ यज्वानौ यज्वानः इत्यादि रूप होते हैं। 'करिन्' और 'दण्डिन्' इत्यादि इन्तन्त शब्दोंके रूप इस प्रकार होते हैं—करी$^{२२}$ करिणौ करिणः। दण्डी$^{२३}$ दण्डिनौ दण्डिनः इत्यादि। 'पथिन्' शब्दके सिद्ध रूप यों हैं—१-पन्थाः$^{२४}$ पन्थानौ पन्थानः। २-पन्थानम् पन्थानौ पथः। ३-पथा पथिभ्याम् पथिभिः—इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें 'पथि' रूप होता


१. पश्चिम दिशा। २. तिर्यग्दिशाकी ओर जानेवाले पशु-पक्षी आदि। ३. सन्मार्गगामी। ४. उसकी ओर जानेवाला। ५. तत्त्वज्ञानके लिये प्यासा रहनेवाला। ६. काठ काटनेवाला। ७. वैद्य या चिकित्सक। ८. जन्मधारी। ९. वायु। १०. शत्रुविजयी। ११. आप। १२. होता हुआ। १३. होती हुई। १४. बड़ा, श्रेष्ठ। १५. छः प्रकारके सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न परमात्मा। १६. इन्द्र। १७. अग्निका चयन करनेवाला। १८. तत्त्वज्ञ। १९. वेदवेत्ता। २०. सर्वज्ञ। २१. यजमान। २२. हाथी। २३. दण्डधारी संन्यासी। २४. मार्ग।

७५२ * अग्निपुराण *


है। इसी प्रकार ‘मथिन्’ शब्दका भी रूप जानना चाहिये। यथा—मन्थाः$^१$, मन्थानौ, मन्थानः, इत्यादि। ऋभुक्षाः$^२$, ऋभुक्षाणौ, ऋभुक्षाणः—इत्यादि। पन्थादिमें पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षन्—ये तीन शब्द आते हैं। पाँच संख्याका वाचक ‘पञ्चन्’ शब्द नित्य बहुवचनान्त है। उसके रूप इस प्रकार होते हैं—१-२-पञ्च$^३$, ३-पञ्चभिः, ४-५-पञ्चभ्यः, ६-पञ्चानाम्, ७-पञ्चसु। ‘प्रतान्’$^४$ शब्दके रूप—प्रतान्, प्रतानौ, प्रतानः, इत्यादि हैं। तृतीया आदिके द्विवचनमें ‘प्रतान्भ्यां’ रूप होता है। सम्बोधनमें ‘हे प्रतान्!’। ‘सुशर्मन्’ शब्दके रूप—सुशर्मा$^५$ सुशर्माणौ, सुशर्माणः।—इत्यादि हैं। शस्, ङसि, ङस्—इन विभक्तियोंमें ‘सुशर्मणः’ रूप होता है। अप् शब्द नित्यबहुवचनान्त और स्त्रीलिङ्ग है। इसके रूप यों जानने चाहिये—१-आपः$^६$। २-अपः। ३-अद्भिः। ४-५अद्भ्यः। ६-अपाम्। ७-अप्सु। ‘प्रशाम्’ शब्दके रूप प्रशान्$^७$, प्रशामौ, प्रशामः इत्यादि हैं। सप्तमीके एकवचनमें ‘प्रशामि’ रूप होता है। ‘किम्’ शब्दके रूप—१-कः$^८$, कौ, के। २-कम्, कौ, कान् ३-केन, काभ्याम्, कैः—इत्यादि। सप्तमी बहुवचनमें—केषु। शेष रूप सर्ववत् होते हैं। ‘इदम्’ शब्दके रूप इस प्रकार हैं—१-अयम्$^९$, इमौ, इमे। २-इमम्, इमौ, इमान्। ‘इमान्नय’ (अर्थात् इन्हें ले जाओ) ३-अनेन, आभ्याम्, एभिः। ४-अस्मै, आभ्याम्, एभ्यः। ५-अस्मात्, आभ्याम्, एभ्यः। ६-अस्य, अनयोः, एषाम्। ७-अस्मिन्, अनयोः, एषु। ‘चतुर्’ शब्द नित्य बहुवचनान्त है। पुँल्लिङ्गमें इसके रूप यों होते हैं—१-चत्वारः$^{१०}$, २-चतुरः। ३-चतुर्भिः। ४-५-चतुर्भ्यः। ६-चतुर्णाम्। ७-चतुर्षु। जिसकी वाणी अच्छी हो, वह पुरुष श्रेष्ठ माना जाता है। उसे ‘सुगीः’ कहते हैं। यह प्रथमाका एकवचन है। ‘सुगिर्’ शब्दका सप्तमीके एकवचनमें ‘सुगिरि’ रूप होता है। ‘सुदिव्’ शब्दके रूप इस प्रकार हैं—१-सुद्यौः$^{११}$, सुदिवौ, सुदिवः इत्यादि। तृतीया आदिके द्विवचनमें ‘सुद्युभ्याम्’ रूप होता है। ‘विश्’ शब्दके रूप—विट्।विड्$^{१२}$, विशौ, विशः। विड्भ्याम् इत्यादि होते हैं। सप्तमीके बहुवचनमें ‘विक्षु’ रूप होता है। ‘यादृश्’ शब्दके रूप इस प्रकार हैं—यादृक्-ग्$^{१३}$, यादृशौ, यादृशः। यादृशा, यादृग्भ्याम् इत्यादि। ‘षष्’ शब्द नित्य बहुवचनान्त है। इसके रूप यों हैं—१-२-षट्$^{१४}$-षड्। ३-षड्भिः। ४-५-षड्भ्यः। ६-षण्णाम्। ७-षट्सु। ‘सुवचस्’ शब्दके रूप इस प्रकार हैं—१-सुवचाः$^{१५}$, सुवचसौ, सुवचसः। २-सुवचसम्, सुवचसौ, सुवचसः। ३-सुवचसा, सुवचोभ्याम्, सुवचोभिः—इत्यादि। सम्बोधनमें—हे सुवचः! ‘उशनस्’ शब्दके रूप यों हैं—१-उशना$^{१६}$, उशनसौ, उशनसः। हे उशनः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें ‘उशनसि’ रूप होता है। ‘पुरुदंशस्’ और ‘अनेहस्’ शब्दोंके रूप भी इसी प्रकार होते हैं। यथा—१-पुरुदंशा$^{१७}$, पुरुदंशसौ, पुरुदंशसः। अनेहा$^{१८}$, अनेहसौ, अनेहसः इत्यादि। ‘विद्वस्’ शब्दके रूप यों जानने चाहिये—विद्वान्$^{१९}$, विद्वांसौ, विद्वांसः, हे विद्वन् इत्यादि। ‘विद्वांस उत्तमाः’ (विद्वान् पुरुष उत्तम होते हैं)। चतुर्थी विभक्तिके एकवचनमें ‘विदुषे’ रूप होता है। ‘विदुषे नमः’ (विद्वान्‌को नमस्कार है)। द्विवचनमें ‘विद्वद्भ्याम्’ और सप्तमीके बहुवचनमें ‘विद्वत्सु’ रूप होते हैं। ‘स विद्वत्सु बभूविवान्’


१. मथानी। २. इन्द्र। ३. पाँच। ४. अधिक विस्तार करनेवाला। ५. उत्तम कल्याणसे युक्त। ६. जल। ७. अत्यन्त शान्त। ८. कौन। ९. यह। १०. चार। ११. जब आकाश स्वच्छ हो, वह समय। १२. वैश्य। १३. जैसा। १४. छः। १५. उत्तम वचन बोलनेवाला। १६. शुक्राचार्य। १७. अधिक डँसनेवाला। १८. काल या समय। १९. पण्डित।

* अध्याय ३५२ *७५३

(वह विद्वानोंमें प्रकट हुआ।)। 'बभूविवस्' शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—बभूविवान्$^१$ बभूविवांसौ, बभूविवांसः—इत्यादि। इसी प्रकार 'पेचिवान्$^२$, पेचिवांसौ, पेचिवांसः। श्रेयान्$^३$ श्रेयांसौ, श्रेयांसः—इत्यादि रूप जानने चाहिये। 'श्रेयस्' शब्दके द्वितीयाके बहुवचनमें 'श्रेयसः' रूप होता है। अब 'अदस्' शब्दके पुँल्लिङ्गमें रूप बताते हैं—१-असौ$^४$, अमू, अमी। २-अमुम्, अमू, अमून्। ३-अमुना, अमूभ्याम्, अमीभिः। ४-अमुष्मै, अमूभ्याम्, अमीभ्यः। ५-अमुष्मात्, अमूभ्याम्, अमीभ्यः। ६-अमुष्य, अमुयोः, अमीषाम्। ७-अमुष्मिन्, अमुयोः, अमीषु। 'गोधुग्भिरागतः' (वह गाय दुहनेवालोंके साथ आया)। 'गोदुह्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं—गोधुक्$^५$-ग्, गोदुहौ, गोदुहः। गोधुक्षु इत्यादि। इसी प्रकार, 'दुह्' आदि अन्य शब्दोंसे रूप जानने चाहिये। 'मित्रद्रुह्$^६$' शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—मित्रध्रुक्-ग्, मित्रध्रुद्-ड्, मित्रद्रुहौ, मित्रद्रुहः। मित्रद्रुहा, मित्रध्रुग्भ्याम्, मित्रध्रुड्भ्याम्, मित्रध्रुग्भिः, मित्रध्रुड्भिः इत्यादि। इसी प्रकार 'चित्रद्रुह्' आदि शब्दोंके भी रूप जानने चाहिये। 'स्वलिह्$^७$' शब्दके रूप यों होते हैं—स्वलिट्-स्वलिड्, स्वलिहौ, स्वलिहः। स्वलिहा, स्वलिड्भ्याम् इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें 'स्वलिहि' रूप होता है। 'अनडुह्' शब्दके रूप यों हैं—१-अनड्वान्$^८$, अनड्वाहौ, अनड्वाहः। २-अनड्वाहम्, अनड्वाहौ, अनडुहः, ३-अनडुहा, अनडुद्भ्याम्, अनडुद्भिः। सप्तमीके बहुवचनमें 'अनडुत्सु' (सम्बोधनमें 'हे अनड्वन्')। अजन्त और हलन्त शब्द पुँल्लिङ्गमें बताये गये। अब स्त्रीलिङ्गमें बताये जाते हैं॥ ६२–७३ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सामान्यतः सुब्-विभक्तियोंके सिद्ध रूपोंका वर्णन' नामक तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५१ ॥


तीन सौ बावनवाँ अध्याय

स्त्रीलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूप

भगवान् स्कन्द कहते हैं—आकारान्त स्त्रीलिङ्ग 'रमा' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं,—रमा (प्र०—ए०), रमे (प्र०—द्वि०), रमाः (प्र०—ब०), 'रमाः शुभाः' (रमाएँ शुभस्वरूपा हैं)। रमाम् (द्वि०—ए०), रमे (द्वि०—द्वि०), रमाः (द्वि०—ब०)। रमया (तृ०—ए०), रमाभ्याम् (तृ०—द्वि०), रमाभिः (तृ०—ब०), 'रमाभिः कृतमव्ययम्।'—(रमाओंने अव्यय (अक्षय) पुण्य किया है)। रमायै (च०—ए०), रमाभ्याम् (च०, पं०—द्वि०), रमायाः (प०, ष०—ए०), रमयोः (ष०, स०—द्वि०), 'रमयोः शुभम्' (दो रमाओंका शुभ)। रमाणाम् (ष०—ब०)। रमायाम् (स०—ए०), रमासु (स०—ब०)। इसी प्रकार 'कला' आदि शब्दोंके रूप होते हैं। आकारान्त 'जरा' शब्दके कुछ रूप भिन्न होते हैं—जरा (प्रथमा विभक्ति एक०)-में जरसौ—जरे (प्र०, द्वि०—द्वि०), जरसः—जराः (प्र०, द्वि०—बहु०), जरसम्—जराम् (द्वि०—ए०), जरासु (स०—ब०)। अब 'सर्वा' शब्दके रूप कहते हैं—१-सर्वा, सर्वे, सर्वाः। २-सर्वाम् सर्वे सर्वाः। सर्वया


१. हुआ। २. जो भूतकालमें पाचक रहा हो, वह। ३. श्रेष्ठ। ४. यह, वह। ५. गाय दुहनेवाला। ६. मित्रद्रोही। ७. अपनेको चाटनेवाला। ८. गाड़ी खींचनेवाला बैल।

७५४ * अग्निपुराण *


(तृ०—ए०), सर्वस्यै (च०—ए०), 'सर्वस्यै देहि' (सबको दो)। सर्वस्याः (प०—ए०), सर्वस्याः (ष०—ए०), सर्वयोः (ष०, स०—द्वि०), शेष रूप 'रमा' शब्दके समान होते हैं। स्त्रीलिङ्ग नित्य द्विवचनान्त द्वि-शब्दके रूप ये हैं—द्वे (प्र०—द्वि०), द्वे (द्वि०—द्वि०), 'त्रि' शब्दके रूप ये हैं—१-२—तिस्त्रः। तिसृणाम् (ष०—ब०)। 'बुद्धि' शब्दके रूप इस प्रकार हैं—बुद्धिः (प्र०—ए०), बुद्ध्या (तृ०—ए०), बुद्ध्यै-बुद्धयै (च०—ए०), बुद्धेः (प०, ष०—ए०)। 'मति' शब्दके सम्बोधनके एकवचनमें 'हे मते'—यह रूप होता है। 'मुनीनाम्' (यह 'मुनि' शब्दके षष्ठी—बहुवचनका रूप है) और शेष रूप 'कवि' शब्दके समान होते हैं। 'नदी' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं—नदी (प्र०—ए०), नद्यौ (प्र० द्वि०—द्वि०), नदीम् (द्वि०—ए०), नदीः (द्वि०—ब०), नद्या (तृ०—ए०), नदीभिः (तृ०—ब०), नद्यै (च०—ए०), नद्याम् (स०—ए०), नदीषु (स०—ब०), इसी प्रकार 'कुमारी' और 'जृम्भणी' शब्दके रूप होते हैं। 'श्री' शब्दके रूप भिन्न होते हैं—'श्रीः' (प्र०—ए०), श्रियौ (प्र०—द्वि०—द्वि०), श्रियः (प्र०, द्वि०—ब०), श्रिया (तृ०—ए०), श्रियै—श्रियै (च०—ए०)। 'स्त्री' शब्दके रूप अधोलिखित हैं—स्त्रीम्-स्त्रियम् (द्वि०—ए०), स्त्रीः—स्त्रियः (द्वि०—ब०), स्त्रिया (तृ०—ए०), स्त्रियै (च०—ए०), स्त्रियाः (प०, ष०—ए०), स्त्रीणाम् (ष० ब०), स्त्रियाम् (स०—ए०)। स्त्रीलिङ्ग 'ग्रामणी' शब्दका सप्तमीके एकवचनमें 'ग्रामण्याम्' और 'धेनु' शब्दका चतुर्थीके एकवचनमें 'धेन्वै, धेनवे' रूप होते हैं॥ १-७॥

'जम्बू' शब्दके रूप ये हैं—जम्बूः (प्र०—ए०) जम्ब्वौ (प्र०—द्वि०—द्वि०), जम्बूः (द्वि०—ब०), जम्बूनाम् (ष०—ब०)। 'जम्बूनां फलं पिब।' (जामुनके फलोंका रस पीयो)। 'वर्षाभू' आदि शब्दके कतिपय रूप ये हैं—वर्षाभ्वौ (प्र०, द्वि०—द्वि०)। पुनर्भवौ (प्र०, द्वि०—द्वि०)। मातृः (मातृशब्दका द्वि०—ब०)। गौः (गो+प्र०—ए०)। नौः (नौका) (प्र०—ए०)। 'वाच्' शब्दके रूप ये हैं—वाक्—वाग् (प्र०—ए०) (वाणी), वाचा (तृ०—ए०) वाग्भिः (तृ०—ब०)। वाक्षु (स०—ब०)। पुष्पहारवाचक 'स्रज्' शब्दके रूप ये हैं—स्रग्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि०)। स्रजि (स०—ए०) स्रजोः (ष० स०—द्वि०)। लतावाचक 'वीरुध्' शब्दके रूप ये हैं—वीरुद्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि) वीरुत्सु (स०—ब०)। स्त्रीलिङ्गमें प्रथमाके एकवचनमें उकारानुबन्ध 'भवत्' शब्दका 'भवती' और ऋकारानुबन्ध 'भवत्' शब्दका 'भवन्ती' रूप होता है। स्त्रीलिङ्ग 'दीव्यत्' शब्दका प्रथमाके एकवचनमें 'दीव्यन्ती' रूप होता है। स्त्रीलिङ्गमें 'भात्' शब्दके भी प्रथमाके एकवचनमें भाती—भान्ती—ये दो रूप होते हैं। स्त्रीलिङ्ग 'तुदत्' शब्दके भी प्रथमाके एकवचनमें तुदती—तुदन्ती—ये दो रूप होते हैं*। स्त्रीलिङ्गमें प्रथमाके एकवचनमें 'रुदत्' शब्दका रुदती, 'रुन्धत्' शब्दका रुन्धती, 'गृह्णत्' शब्दका गृह्णती और 'चोरयत्' शब्दका चोरयन्ती रूप होता है। 'दृषद' शब्दके रूप ये हैं—दृषद (प्र०—ए०), दृषदभ्याम् (तृ०—च० एवं पं०—द्वि०), दृषदि (स०—ए०)। विशेषविदुषी (प्र०—ए०)। प्रथमाके एकवचनमें 'कृति' शब्दका 'कृतिः' रूप होता है। 'समिध्' शब्दके रूप ये हैं—समित्-समिद् (प्र०—ए०), समिद्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—


* 'भात्' और 'तुदत्' दोनोंके आगे स्त्रीत्वविवक्षामें 'ङीप्' प्रत्यय होनेपर उसकी 'नदी' संज्ञा होनेसे 'आच्छीनद्योर्नुम्' (पा० सू० ७।१।८०)-से वैकल्पिक 'नुम्' का आगम होता है; अतः 'भाती, भान्ती' तथा 'तुदती, तुदन्ती' दो रूप होते हैं। यह पाणिनि-व्याकरणका नियम है। कुमारने जो दो रूप माने हैं, उसकी पाणिनिके सूत्रद्वारा भी सिद्धि होती है।

* अध्याय ३५३ *         ७५५


द्वि०), समिधि (स०—ए०)। 'सीमन्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं—सीमा (प्र०—ए०), सीम्नि-सीमनि (स०—ए०)। तृ०, च० एवं पं० के द्विवचनमें 'दामनी' शब्दका दामनीभ्याम्, 'ककुभ्' शब्दका ककुब्भ्याम् रूप होता है। 'का'—'किम्' शब्द प्र०—ए० इयम्— (इदम् शब्द प्र०—ए०), आभ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि०), 'इदम्' शब्दके सप्तमीके बहुवचनमें 'आसु' रूप होता है।, 'गिर्' शब्दके रूप ये हैं—गीर्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि०) गिरा (तृ०—ए०), गीर्षु (स०—ब०)। प्रथमाके एकवचनमें 'सुभूः' और 'सुपूः' रूप सिद्ध होते हैं। 'पुर्' शब्दका तृतीयाके एकवचनमें 'पुरा' और सप्तमीके एकवचनमें 'पुरि' रूप होता है। 'दिव्' शब्दके रूप ये हैं—द्यौः (प्र०—ए०), द्युभ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि०), दिवि (स०—ए०), द्युषु (स०—ब०)। तादृश्या (तृ०—ए०), तादृशी (प्र०—ए०)—ये 'तादृशी' शब्दके रूप हैं। 'दिश्' शब्दके रूप दिक्-दिग् दिशौ दिशः इत्यादि हैं। यादृश्याम् (स०—ए०), यादृशी (प्र०—ए०)—ये 'यादृशी' शब्दके रूप हैं। सुवचोभ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि) सुवचस्सु (स०—ब०)—ये 'सुवचस्' शब्दके रूप हैं। स्त्रीलिङ्गमें 'अदस्' शब्दके कतिपय रूप ये हैं—असौ (प्र०—ए०), अमू (प्र० द्वि०—द्वि०), अमूम् (द्वि०—ए०), अमूः (प्र०, द्वि०—ब०), अमूभिः (तृ०—ब०), अमुया (तृ०—ए०), अमुयोः (ष०, स०—द्वि०) ॥८—१३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्त्रीलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूपोंका कथन' नामक तीन सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५२॥


तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय

नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूप

भगवान् स्कन्द कहते हैं—नपुंसकलिङ्गमें 'किम्' शब्दके ये रूप होते हैं—(प्रथमा) किम्, के, कानि। (द्वितीया) किम्, के, कानि। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् हैं। जलम् (प्र० ए०), सर्वम् (प्र० ए०)। पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर, स्व और अन्तर—इन सब शब्दोंके रूप इसी प्रकार होते हैं। सोमपम् (प्र० द्वि० ए०), सोमपानि (प्र० द्वि० ब०)—ये 'सोमप' शब्दके रूप हैं। 'ग्रामणी' शब्दके नपुंसकलिङ्गमें इस प्रकार रूप होते हैं—ग्रामणि (प्र० द्वि०-ए०), ग्रामणिनी (प्र० द्वि०-द्वि०), ग्रामणीनि (प्र०, द्वि०-ब०)। इसी प्रकार 'वारि' शब्दके रूप होते हैं—वारि (प्र० द्वि०-ए०), वारिणी (प्र०, द्वि०-द्वि०), वारीणि (प्र० द्वि०-ब०), वारीणाम् (ष०- ब०), वारिणि (स० ए०)। शुचये-शुचिने (च०-ए०) और मृदुने-मृदवे (च०-ए०) ये क्रमसे 'शुचि' और 'मृदु' शब्दके रूप हैं। त्रपु (प्र०, द्वि०-ए०), त्रपुणी (प्र०, द्वि०-द्वि०), त्रपूणाम् (ष०-ब०)—ये 'त्रपु' शब्दके कतिपय रूप हैं। 'खलपुनि' तथा 'खलप्वि'—ये दोनों नपुंसक 'खलपू' शब्दके सप्तमी, एकवचनके रूप हैं। कर्त्रा—कर्तृणा (तृ०-ए०), कर्तृणे—कर्त्रे (च० ए०)—ये 'कर्तृ' शब्दके रूप हैं। अतिरि (प्र० द्वि०-ए०), अतिरिणी (प्र०, द्वि०-द्वि०)—ये 'अतिरि' शब्दके रूप हैं। अभिनि (प्र०, द्वि०-ए०), अभिनिनी (प्र०, द्वि०-द्वि०)—ये 'अभिनि' शब्दके रूप हैं। सुवचांसि (प्र०, द्वि०-ब०), यह 'सुवचस्' शब्दका रूप है। सुवाक्षु (स०-ब०)

७५६ | * अग्निपुराण *

यह 'सुवाच्' शब्दका रूप है। 'यत्' शब्दके ये दो यत्-यद् (प्र० द्वि०-ए०) हैं। 'तत्' शब्दके 'तत्-तद् (प्र०, द्वि०-ए०), 'कर्म' शब्दके कर्माणि (प्र० द्वि०-ब०), 'इदम्' शब्दके इदम् (प्र०, द्वि०-ए०), इमे (प्र० द्वि०-द्वि०), इमानि (प्र०, द्वि०-ब०)—ये रूप हैं। ईदृक्-ईदृग् (प्र०, द्वि०-ए०)—यह 'ईदृश्' शब्दका रूप है। अदः (प्र०, द्वि०-ए०), अमुनी (प्र०, द्वि०-द्वि०), अमूनि (प्र०, द्वि०-ब०)। अमुना (तृ-ए०), अमीषु (स०-ब०)—'अदस्' शब्दके ये रूप भी पूर्ववत् सिद्ध होते हैं। 'युष्मद्' और 'अस्मद्' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं—अहम् (प्र०-ए०), आवाम् (प्र०-द्वि०), वयम् (प्र०-ब०)। माम् (द्वि०-ए०), आवाम् (द्वि०-द्वि०), अस्मान् (द्वि०-ब०)। मया (तृ०-ए०), आवाभ्याम् (तृ०, च०-द्वि०), अस्माभिः (तृ०-ब०)। मह्यम् (च०-ए०), अस्मभ्यम् (च०-ब०)। मत् (प०-ए०), आवाभ्याम् (प०-द्वि०), अस्मत् (प०-ब०)। मम (ष०-ए०), आवयोः (ष०, स०-द्वि०), अस्माकम् (ष०-ब०)। अस्मासु (स०-ब०)—ये 'अस्मद्' शब्दके रूप हैं। त्वम् (प्र०-ए०), युवाम् (प्र०-द्वि०) यूयम् (प्र०-ब०)। त्वाम् (द्वि०-ए०), युवाम् (द्वि०-द्वि०), युष्मान् (द्वि०-ब०)। त्वया (तृ०-ए०), युष्माभिः (तृ०-ब०)। तुभ्यम् (च०-ए०), युवाभ्याम् (तृ०, च०-द्वि०), युष्मभ्यम् (च०-ब०)। त्वत् (प०-ए०) युवाभ्याम् (प०-द्वि०) युष्मत् (प०-ब०)। तव (ष०-ए०), युवयोः (ष०, स०-द्वि०), युष्माकम् (ष०-ब०)। त्वयि (स०-ए०), युष्मासु (स०-ब०)—ये 'युष्मद्' शब्दके रूप हैं। यहाँ 'अजन्त' और 'हलन्त' शब्दोंका दिग्दर्शन-मात्र कराया गया है॥ १-९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूपोंका वर्णन' नामक तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५३ ॥


तीन सौ चौवनवाँ अध्याय

कारकप्रकरण

भगवान् स्कन्द कहते हैं—अब मैं विभक्तियोंसे युक्त 'कारक'का वर्णन करूँगा*। 'ग्रामोऽस्ति' (ग्राम है)—यहाँ प्रातिपदिकार्थमात्रमें प्रथमा विभक्ति हुई है। विभक्त्यर्थमें प्रथमा होनेका विधान पहले कहा जा चुका है। 'हे महार्क'—इस वाक्यमें जो 'महार्क' शब्द है, उसमें सम्बोधनमें प्रथमा विभक्ति हुई है। सम्बोधनमें प्रथमाका विधान पहले आ चुका है। 'इह नौमि विष्णुं श्रिया सह।' (मैं यहाँ लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका स्तवन करता हूँ।)—इस वाक्यमें 'विष्णु' शब्दकी कर्म-संज्ञा हुई है। और 'द्वितीया कर्मणि स्मृता'—इस पूर्वकथित नियमके अनुसार कर्ममें द्वितीया हुई है। 'श्रिया सह'—यहाँ 'श्री' शब्दमें 'सह'का योग होनेसे तृतीया हुई है। सहार्थक और सदृशार्थक शब्दोंका योग होनेपर तृतीया विभक्ति होती है, यह सर्वसम्मत मत है। क्रियामें जिसकी स्वतन्त्रता विवक्षित हो, वह 'कर्ता' या 'स्वतन्त्र कर्ता' कहलाता है। जो उसका प्रयोजक हो, वह 'प्रयोजक कर्ता' और 'हेतुकर्ता' भी कहलाता है। जहाँ कर्म ही कर्ताके रूपमें विवक्षित हो, वह


* अध्याय तीन सौ इक्यावनमें श्लोक बाईससे अट्ठाईसतक विभक्तियोंके प्रयोगका नियम बताया गया है। वे सब श्लोक यहाँ होने चाहिये थे; क्योंकि वहाँ जो नियम या विधान दिये गये हैं, उनके उदाहरण यहाँ मिलते हैं।