ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पाँचवाँ अध्याय ] २६९ इनके पहले पाद में देवतों का नाम आया है । यह पहले दिन का रूप है । मरुत्वतीय प्रगाथ यह है:— प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत । वृत्रं हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा ॥ अभि प्र भर धृषता धृषन्मनः श्रवश्चित्ते असद् बृहत् । अर्षन्त्वापो जवसा वि मातरो हनो वृत्रं जया स्वः॥ (ऋ० ८।८६।३-४) इसमें 'प्र' आया है । यह पहले दिन का रूप है । निविद् सूक्त यह है:— आ यात्विन्द्रो वस उप न इह..........इत्यादि । (ऋ० ४।२१) इसमें 'आ' है, यह पहले दिन का रूप है । रथतंतर पृष्ठ यह है :— अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः । ईशानमस्य जगतः स्वदृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥ न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते । अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे ॥ (ऋ० ७।३२।२२-२३) अभित्वा पूर्वपीतय इन्द्रस्तोमेभिरायवः । समीचीनास ऋभवः समस्वरन् रुद्रा गृणन्त पूर्व्यम् ॥ अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्यं शवो मदे सुतस्य विष्णवि । अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनुष्टुवन्ति पूर्वथा ॥ (ऋ० ८।३।७-८) यह रथंतर पृष्ठ है, यह पहले दिन का रूप है । धाय्य यह है :— “यद् वावानपुरुतमं पुराषाड्” । (ऐतरेय ब्रा० ३।२२) इसमें 'आ' आया है । यह पहले दिन का रूप है । साम प्रगाथ यह है :— पिबा सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमतः । आपिनो बोधि सधमाद्यो वृधे३ऽस्माँ अवन्तु ते धियः ॥
२७० [ चौथी पञ्चिका भूयाम ते सुमतौ वाजिनो वयं मा नः स्तरभिमातये । अस्माञ् चित्राभिरवतादभिष्टिभिरा नः सुम्नेषु यामय ॥ (ऋ० ८।३१-२ ) इसमें 'पिव' शब्द आया है। यह पहले दिन का रूप है। तात्पर्य्य यह है :- त्यमूषु वाजिनं देवजूतम् । यह निविद् सूक्त के पहले पढ़ा जाता है। तात्पर्य कल्याण के लिये है। जो इस रहस्य को समझता है, उसका मार्ग कल्याणयुक्त हो जाता है और अपने साल को कल्याण से व्यतीत करता है। (१) ३०- ( निष्केवल्य शस्त्र का निविद् ) सूक्त यह है:- आ न इन्द्रो दूरादान आसात् । इत्यादि (ऋ० ४।२० ) इसमें 'आ' आया है। यह पहले दिन का रूप है। निष्केवल्य और मरुत्वतीय शस्त्रों के निविद् संपात कहलाते हैं। वामदेव ने इन तीनों लोकों को देखकर इन्हीं संपातों द्वारा उनको प्राप्त किया। ('संपतत्' = प्राप्त हुआ, से संपात बन गया )। इसीलिए इनका नाम संपात हो गया। पहले दिन संपात इसलिए पढ़े जाते हैं कि स्वर्गलोक तक पहुँच जायें। उसे प्राप्त कर लें और वहां की संगति का लाभ हो। पहले दिन अर्थात् रथंतर दिन के वैश्वदेव शस्त्र का 'प्रतिपद्' अर्थात् शुरू यह है:- तत् सवितुर्वृणीमहे वयं देवस्य भोजनम् । श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि ॥ अस्य हि स्वयशस्तरं सवितुः कच्चन प्रियम् । न मिनन्ति स्वराज्यम् ॥ स हि रत्नानि दाशुषे सुवाति सविता भगः । तं भागं चित्रमीमहे ॥ (ऋ० ५।८२।१-३ ) इसका 'अनुचर' ( पिछला भाग ) यह है :-
पाँचवाँ अध्याय ] २७९ अद्या नो देव सवितः प्रजावत् सावीः सौभगम् । परा दुःष्वप्न्यं सुव ॥ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥ अनागसो अदितये देवस्यसवितुः सवे । विश्वा वामानि धीमहि ॥ ( ऋ० ५।८२।४-६ ) यह रथंतर दिन का है। यही पहले दिन का रूप है। सविता का निविद् सूक्त है "युंजते मन उत" (ऋ० ५।८१) इसमें 'युज' शब्द पड़ा है। यह पहले दिन का रूप है। द्यावा पृथिवी का निविद् सूक्त "प्र द्यावा यज्ञैः" (ऋ० १।१५९) है। इसमें 'प्र' शब्द आया है। यह पहले दिन का रूप है। ऋभुओं का निविद् सूक्त "इहे ह वो मनसा" (ऋ० ३।६०) है। अगर इनमें 'प्र' और 'आ' होता तो 'प्रा' हो जाता। जिसका अर्थ है 'जाना'। और यजमान इस संसार से चल बसता। इसलिए 'इहे ह वो मनसा' सूक्त पढ़ते हैं। इसमें पहले दिन का रूप नहीं आता। (इस सूक्त में) 'इह' का अर्थ है 'यह लोक'। इस प्रकार यजमान इस लोक को भोगता है। वैश्वदेव का निविद् सूक्त है:— देवान् हुवे बृहच्छ्रवसः स्वस्तय इति (ऋ० १०।६६) इसके पहले पद में 'देवतों' का वर्णन है। यह पहले दिन का रूप है। जो लोग संवत्सर या द्वादशाह को करते हैं वे बड़ी लम्बी लम्बी यात्रा पर जाते हैं। इस लिये वैश्वदेवों का जो ऊपर दिया हुआ निविद् सूक्त (देवान् हुवे...) पढ़ा जाता है यह यात्रा के लिए। जो इस रहस्य को समझता है उसका कल्याण होता है और वह अपने साल को अच्छी तरह पार कर लेता है। और जो लोग इस रहस्य को समझ कर होता से इस वैश्वदेव निविद् को पढ़ाते हैं उनका भी कल्याण होता है।
२७२ [चौथी पञ्चिका अग्निमारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— वैश्वानराय पृथु पाजसे विप इति ( ऋ० ३।३ ) इसके पहले पद में देवता का उल्लेख है। यह पहले दिन का रूप है । मरुतों का निविद यह है :— “प्रत्वक्षसः प्रतवसोविरप्शिन” इति ( ऋ० १।८७ ) इसमें ‘प्र’ आया है। यह पहले दिन का रूप है। जातवेद सूक्त के पहले यह मंत्र पढ़ना है :— जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो नि दहाति वेदः। स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः। ( ऋ० १।९६।१ ) यह जातवेद मंत्र कल्याण मार्ग के कल्याण के लिये पढ़ा जाता है। इससे यजमान को कल्याण मिलता है। जो इस रहस्य को समझता है उसका साल कल्याण पूर्वक व्यतीत हो जाता है। जातवेद का निविद सूक्त है :— प्रतव्यसीं नव्यसीं...इति ( ऋ० १।१४३ ) इसमें ‘प्र’ आया है। यह पहले दिन का रूप है। द्वादशाह के पहले दिन का अग्निमारुत शस्त्र वही है जो अग्निष्टोम का । जो यज्ञ में समान किया जाता है उसी पर प्रजा जीती हैं इस लिए अग्निमारुत शस्त्र वही होता है। (२) ३१—दूसरे दिन का देवता इन्द्र है। पंचदश स्तोम है। बृहत् साम है और त्रिष्टुभ् छन्द है। जो यह जानता है कि कौन सा देवता है, कौन सा स्तोम है, कौ न सा साम है और कौन सा छन्द है, वह सफल हो जाता है । दूसरे दिन ‘प्र’ और ‘आ’ नहीं आते। दूसरे दिन का रूप है ‘स्थ’।
पाँचवाँ अध्याय ] २७६ ऊर्ध्व, प्रति, अंतः, वृषण्, वृधन् यह शब्द तथा दूसरे पदों में देवतों का स्पष्ट उल्लेख, अन्तरिक्ष की ओर संकेत. बृहत् साम और त्रिष्टुभ् छन्द और वर्तमानकाल । यह दूसरे दिन के रूप अर्थात् विशेषतायें हैं । दूसरे दिन का आज्य सूक्त यह है :- अग्निं दूतं वृणीमहे...... (ऋ० १।१२ ) इसमें ‘वृणीमहे’ यह वर्तमानकाल आया है । यह दूसरे दिन का रूप है । प्रउग शस्त्र यह है :- वायो ये ते सहस्रिणः ( ऋ० २।४१ ) इसमें ‘अयं वा मित्रावरुणा सुतः सोमऋतावृधा’ (२।४१।४) में 'वृधन्' शब्द आ गया । यह दूसरे दिन का रूप है । मरुत्वतीय शस्त्र का प्रतिपद् यह है :- विश्वानरस्य वस्पति मनानतस्य शवसः । एवैश्च चर्षणीनामूती हुवे रथानाम् ॥ अभिष्टये सदावृधं स्वमी॑डेहेषु यं नरः । नाना हवन्त ऊतये ॥ परोमात्रमृचीषममिन्द्रमुग्रं सुराधसम् । ईशानं चिद् वसूनाम् ॥ ( ऋ० ८।६८।४-६ ) इसका अनुचर यह है :- इन्द्र इत् सोमपा एक इन्द्रः सुतपा विश्वायुः । अन्तर्देवान्मत्र्याँ अ । न यं शुक्नो न दुराशीर्न तृप्रा उरुव्यचसम् । अपस्पृण्वते सुहार्दम् ॥ गोभिर्यदीमन्वे अस्मन्मृगं न व्रा मृगयन्ते । अमत्सिरन्ति धेनुभिः ॥ ( ऋ० ८।२।४-६ ) इनमें 'वृधन्' और 'अन्तः' शब्द आये हैं । यह दूसरे दिन का रूप हैं। इन्द्र-निह्वव प्रगाथ वही रहता है । "इन्द्र नेदीय एदिहि" । ( ऋ० ८।५३।५-६ ) १८
२७४ [ चौथी पञ्चिका ब्रह्मणस्पति का प्रगाथ यह है "उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते" । इसमें “उत्तिष्ठ” (उत्) शब्द ऊर्ध्व के अर्थ में है । यह दूसरे दिन का रूप है। धाय्य वही हैं :- अग्निर्नैता, त्वं सोम ऋतुभिः, पिन्वन्त्यपः । (ऐतरेय ब्रा० ३।१८) मरुत्वतीय प्रगाथ यह है :- बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम् । येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि ।। अपाधमत्तमिश्रस्तिरस्तिहाऽथेन्द्रो द्युभ्यामभवत् । देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे बृहद् भानो मरुद्गणं ॥ ( ऋ० ८।८६।१-२ ) इसमें 'ऋतावृधः' शब्द में 'वृधन्' शब्द आ गया । यही दूसरे दिन का रूप है। मरुत्वतीय शस्त्र का निविद् सूक्त यह है :- इन्द्र सोमं सोमपते.........( ऋ० ३।३२ ) इसमें 'आवृषस्व' में वृषन् शब्द आया है । [गवाशिरं...... तृपदा वृषस्वा ३।३२।२] यह दूसरे दिन का रूप है। बृहत् पृष्ठ यह है :- त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः । त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठा स्वर्वतः ॥ स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया महः स्तवानो अद्रिवः । गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे ।। ( ऋ० ६।४६।१-२ ) त्वं ह्येहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये । उद्वावृषस्व मघवन् गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये ॥ त्वं पुरु सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय मंहसे । आ पुरन्दरं चकृम विप्रवचस इन्द्रं गायन्तोऽवसे ।। ( ऋ० ८।६१।७-८ ) यह बार्हत दिन का होता है। यह दूसरे दिन का रूप है। निष्केवल्य शस्त्र की धाय्या वही है-
प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः॥ ( ऋ० ८।६१।१-२ )
पाँचवाँ अध्याय ] २७५ “यद् वावान्” । साम प्रगाथ है :— उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः । सत्राच्या मघवा सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत् ॥ तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः । उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः॥ ( ऋ० ८।६१।१-२ ) उभय का अर्थ है जो आज है और जो कल था । यह बृहत् साम का है। यह दूसरे दिन का रूप है। तार्क्ष्य वही है:— “त्यमूषु वाजिनं देवजूतम् ॥” ( ३ ) ३२—निष्केवल्य शस्त्र का निविद् है :— यां त ऊतिरवमा या परमा...(ऋ० ६।२५) इसमें “वृष्ण्यानि” शब्द आया है । 'वृषन्' दूसरे दिन का रूप है । वैश्वदेवशस्त्र का प्रतिपद् यह है :— विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीत सख्यम् । विश्वो राय इषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे ॥ ( ऋ० ५।५०।१ ) तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ देवस्य सवितुर्वयं वाजयनतः पुरन्ध्या । भगस्य रातिमीमहे ॥ ( ऋ० ३।६२।१०-११ ) इसके अनुचर यह हैं :— आ विश्वदेवं सत्पतिं सूक्तैरद्या वृणीमहे । सत्यसवं सवितारम् ॥ य इमे उभे अहनी पुर एत्यप्रयुच्छन् । स्वाधीर्देवः सविता ॥ य इम विश्वा जातान्याश्रावयति श्लोकेन । प्र च सुवाति सविता ॥ ( ऋ० ५।८२।७-९ ) यह बृहत् दिन या दूसरे दिन के हैं। दूसरा दिन का यही रूप है। सविता का निविद् सूक्त यह है :—
२७६ [ चौथी पञ्चिका उदुष्य देवः सविता हिरण्यया......... (ऋ० ६।७१) इसमें उत् शब्द ऊर्ध्व का सार्थक है। यह दूसरे दिन का रूप है। द्यावापृथिवी का निविद् सूक्त यह है :— "ते हि द्यावा पृथिवी विश्वशंभुव" (ऋ० १।१६०) इसमें 'अन्तः' शब्द आया है। यह दूसरे दिन का रूप है। ऋभुओं का निविद् सूक्त यह है :— तक्षन् रथं सुवृतं विद्मनापस...... (ऋ० १।१११) इस सूक्त में :— "तक्षन् हरी इंद्रवाहा वृषण्वसू..." इस मंत्र में 'वृषन्' शब्द आया है। यह दूसरे दिन का रूप है। वैश्वदेव निविद् सूक्त यह है :— यज्ञस्य वो रथ्यं विश्पतिं विशाम्......। (ऋ० १०।६२) इस सूक्त के "वृषा केतुर्यजतोद्यामशायत" में वृषन् शब्द आया है। यह दूसरे दिन का रूप है। इस सूक्त का ऋषि शार्यात है। जब अंगिरा लोग स्वर्ग- लोक में जाने के लिये सत्र कर रहे थे तब षडह के दूसरे दिन का कृत्य करने में भूल चूक कर जाते थे। मनु के पुत्र शार्यात ने 'यज्ञस्य रथं' वाला सूक्त दूसरे दिन पढ़वाया। इससे वह यज्ञ को जान गये और स्वर्गलोक को पहुँच गये। दूसरे दिन होता इस सूक्त को इसलिये पढ़ता है कि यज्ञ का ज्ञान हो जाय और स्वर्गलोक प्राप्त हो जाय। अग्नि-मारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— पृक्षस्य वृष्णो अरुषस्य नू सहः......(ऋ० ६।८) इसमें वृषन् शब्द आया है। यह दूसरे दिन का रूप है। अग्नि मारुत शस्त्र में मरुतों का निविद् सूक्त यह है :— वृष्णो शर्धाय सुम्नाय वेधसे......(ऋ० १।६४)
पाँचवाँ अध्याय ] २७७ इसमें वृषन् शब्द आया है। यह दूसरे दिन का रूप है। जातवेद मंत्र वही है :— जातवेद से सुनवाम सो मम् । जातवेद का निविद् सूक्त यह है :— यज्ञेन वर्धत जातवेदसम्......( ऋ० २।२ ) इसमें 'वृध' है जो दूसरे दिन का रूप है। ( ४ ) ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पञ्चिका समाप्त हुई।
(पृष्ठ रिक्त / अस्पष्ट)
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पहला अध्याय १—( द्वादशाह ) के तीसरे दिन का देवता है विश्वेदेवा । स्तोम है सत्रहवां । साम है वैरूप । छन्द जगती । जो यह जानता है कि देवता कौन है, स्तोम कौन है, साम कौन है और छन्द कौन है उसका यज्ञ सफल हो जाता है । तृतीय दिन का रूप है "समानोदर्क"*। इसके अन्य रूप यह हैं :—अश्व, अंत, पुनरावृत्ति, पुनर्निर्नृत्ति ( अर्थात् अन्त के स्वरों में समानता ), रति या रमण करना, पर्यस्ति ( ढकना ), तीन की संख्या, 'अन्त' का रूप, पिछले पद में देवता का उल्लेख, दूसरे लोक की ओर संकेत, वैरूप साम, जगती छन्द और भूत काल की क्रिया । तीसरे दिन का आज्य शस्त्र यह है :— युक्ष्वा हि देव हूतमाँऽअश्वाँऽअग्नेरथीरिव... (ऋ० ८।७५ ) तीसरे दिन के कृत्य के द्वारा देव स्वर्ग लोक की ओर चल पड़े । असुर राक्षसों ने रोका । उन्होंने असुरों से कहा, "विरूप *उदर्क का अर्थ है समाप्ति । 'समानोदर्क' का अर्थ है समान समाप्ति वाला । अर्थात् समान वाक्य पर समाप्त होने वाले सूक्त । ( २८१ )
२८२ [पाँचवीं पञ्चिका अर्थात् कुरूप हो जाओ । कुरूप हो जाओ ।” जब असुर कुरूप होने लगे, देव स्वर्ग को चले गये । इससे वैरूप साम उत्पन्न हुआ । इसीलिये इसको वैरूप ( कुरूप ) कहते हैं । जो पाप के कारण कुरूप हो गया हो, वह इस रहस्य को समझकर पाप से छूट जाता है । असुरों ने देवों को फिर सताया । देवों ने घोड़ा बनकर अपनी टापों से उनको मार दिया । इसीलिये घोड़ों का नाम हैं अश्व, जो इस रहस्य को समझता हैं वह समृद्धि को पाता है ( अश्नुते ) । घोड़ों ने पिछली टांगों से मारा इस लिये घोड़े सब पशुओं में तेज होते हैं । जो इस रहस्य को समझता है उसका पाप छूट जाता है । इसीलिये तीसरे दिन के आज्यशस्त्र में 'अश्व' शब्द आता है । यह तीसरे दिन का रूप है । प्र-उग शस्त्र में नीचे के तीन तीन मंत्र हैं :— ( १ ) वायवा याहि वीतये जुषाणो हव्यदातये । पिबा सुतस्यान्धसो अभिप्रयः ॥ सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः । निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभिप्रयः । (ऋ० ५।५१।५-७) ( २ ) वायो याहि शिवा दिवो वहस्वा सु स्वश्व्यम् । वहस्व महः पृथु- पक्षसा रथे ॥ त्वां हि सुप्सरस्तमं नृषदनेषु हूमहे । ग्रावाणं नाश्वपृष्ठं संहना ॥ स त्वं नो देव मनसा वायो मन्दानो अग्रियः । कृधि वाजाँ अपो धियः ॥ (ऋ० ८।२६।२४-२५) ( ३ ) इन्द्रश्च वायवेषां सुतानां पीतिमर्हतः । ताञ्जुषेथामरेपसावभि प्रयः । सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः । निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभि प्रयः ।
पहला अध्याय ] २८३ सजूर्विश्वेभिर्देवैभिरश्विम्यामुषसा सजूः । आ याह्यग्ने 'अत्रिवत् सुते रण ॥ (ऋ० ५।५१।६-८) ( ४ ) आ मित्रे वरुणे वयं गीर्भिर्जुहुमो अत्रिवत् । नि बर्हिषि सदतं सोम पीतये ॥ व्रतेन स्थो ध्रुवच्चेमा धर्मणा यातयज्जना । नि बर्हिषि सदतं सोम पीतये ॥ मित्रश्च नो वरुणश्च जुषेतां यज्ञमिष्टये । नि बर्हिषि सदतां सोम पीतये ॥ (ऋ० ५।७२।१-३) ( ५ ) अश्विनावेह गच्छतं नासत्या मा वि वेनतम् । तिरश्चिदर्य्या परि- वर्त्तिर्यातमदाम्या माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥ अस्मिन्यज्ञे अदाभ्या जरितारं शुभस्पती । अवश्युमश्विना युवं गृणन्तमुप भूषथो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥ अभूदुषा रुशत् पशुरारिग्रधाय्युत्वियः । अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥ (ऋ० ५।७५।७-९) ( ६ ) आ याह्यद्रिभिः सुतं सोमं सोमपते पिब । वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्र- हन्तम ॥ वृषा ग्रावा वृषा मदो वृषा सोमो अयं सुतः । वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्र- हन्तम ॥ वृषा त्वा वृषणं हुवे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः । वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्र- हन्तम ॥ (ऋ० ५।४०। १-३) ( ७ ) सजूर्देवैभिरपां नपातं सखायं कृध्वं शिवो नो अस्तु ॥ अब्जामुक्थैरहिं गृणीषेबुध्ने नदीनां रजः सु षीदन् ॥ मा नोऽहिर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्ञो अस्य स्रिधदृतायोः ॥ (ऋ० ७।३४।१५-१७) ( ८ ) उत नः प्रिया प्रियासु सप्तस्वसा सुजुष्टा । सरस्वती स्तोम्या भूत् । आपप्रुषी पार्थिवान्युरु रजो अन्तरिक्षम् । सरस्वती निदस्पातु ।
२८४ [पाँचवीं पञ्चिका त्रिषधस्था सप्तधातुः पञ्चजाता वर्धयन्ती । वाजे वाजे हव्या भूत् ॥ (ऋ० ६।६१।१०-१२) यह सब उष्णिक् छन्द में हैं और इनमें समानोदर्क है । यह तीसरे दिन का रूप है । मरुत्वतीय शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— तन्तमिन्द्राधसे मह इन्द्रं चोदामि पीतये । यः पूर्व्यामनुष्टुतिमीशे कृष्टीनां नृतुः ॥ (ऋ० ८।६८।७) न यस्य ते शवसान सख्यमानंश मर्त्यः । नकिः शवांसि ते नशत् ॥ (ऋ० ८।६८।८) त्वोतासस्त्वा युजाऽप्सु सूर्ये महद्धनम् । जयेम पृत्सु वज्रिवः ॥ (ऋ० ८।६८।९) इसका अनुचर यह है :— त्रय इन्द्रस्य सोमाः सुतासः सन्तु देवस्य । स्वे क्षये सुतपान्व ॥ त्रयः कोशासः श्चोतन्ति तिस्रश्चम्वः सुपूर्णाः । समाने अधिमार्मन् ॥ शुचिरसि पुरुनिःष्ठाः क्षीरैर्मन्थत आशीर्तः । दध्ना मन्दिष्ठः शूरस्य ॥ (ऋ० ८।२।७-९) इनमें 'नृतुः' और 'त्रयः' यह शब्द आये हैं । यह तीसरे दिन का रूप है । इन्द्र-निहिव प्रगाथ वही है—इन्द्रनेदीय... (ऋ० ८।५३।५-७) ब्रह्मणस्पति प्रगाथ यह है :— प्रनूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम् । यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे ॥ तमिद्धोचेमा विदथेषु शम्भुवं मन्त्रं देवा अनेहसम् । इमां च वाचं प्रतिहर्यथा नरो विश्वेद् वामा वो अश्नवत् ॥ (ऋ० १।४०।५-६) इसमें स्वरों की समानता है । यह तीसरे दिन का रूप है । धाय्या वही है :— अग्निनेता (ऋ० ३।२०।४)
पहला अध्याय ] २८५ त्वं सोम क्रतुभिः ( १।६१।२ ) पिन्वन्त्यपो ( ऋ० १।६४।६ ) मरुत्वतीय प्रगाथ यह है :- नकिः सुदासो रथं पर्यासं न रीरमत् । इन्द्रो यस्याविता यस्य मरुतो गमत्स गोमति व्रजे ॥ ( ऋ० ७।३२।१० ) इसमें 'पर्यस्त' है, यह तीसरे दिन का रूप है । मरुत्वतीय शस्त्र का निविद् सूक्त यह है :- त्रयर्यमा मनुषो देवतात ( ऋ० ५।२९ ) इसमें 'त्रि' शब्द है । यह तीसरे दिन का रूप है । तीसरे दिन के वैरूप पृष्ठ यह हैं :- यद्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः । न त्वा वज्रिन्सहस्रं सूर्या अनु न जात मष्ट रोदसी ॥ आ पप्रथ महिना वृष्ण्या वृषन् विश्वा शविष्ठ शवसा । अस्माँ अव मघवन् गोमति व्रजे वज्रिञ् चित्राभिरूतिभिः ॥ ( ऋ० ८।७०।५-६ ) यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय । स्तोतारमिद्धिधिषेय रदावसो न पापत्वाय रासीय ॥ शिक्षेयमिन् महयते दिवे दिवे राय आ कुहचिद्विदे । नहि त्वदन्य- न्मघवन्न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन ॥ ( ऋ० ७।३२।१८-१६ ) यह रथन्तर दिन है । यह तीसरे दिन का रूप है । धाय्य वही हैं :- यद्वावान इत्यादि । "अभित्वा शूर नोनुम" ( ऋ० ७।३२।२२-२३ ) पढ़कर इस दिन की योनि को फेर देता है । क्योंकि यह दिन क्रम के अनुसार रथन्तर दिन है । और रथंतर साम इसकी योनि है । साम प्रगाथ यह है :- इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत् । छर्दिर्यच्छ मघवद्भ्यश्च मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः ॥
२८६ [ पाँचवीं पञ्चिका ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभि प्रघ्नन्ति धृष्णुया । अध स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव ॥ ( ऋ० ६।४६।९-१० ) इसमें त्रि शब्द आया है । यह तीसरे दिन का रूप है । ताक्ष्यं वही है अर्थात् त्यमूषु वाजिनं... (ऋ० १०।१७८) (१) २—निविद् यह है :— यो जात एव प्रथमो मनस्वान् (ऋ० २।१२ ) इसमें समानोदर्क है ( अर्थात् इसके अन्त में 'सजनास, इन्द्र आता है ) । समानोदर्कता तीसरे दिन का रूप है । इसमें 'स जन' और 'इन्द्र' शब्द आये हैं । इसके पढ़ने से इन्द्र को इन्द्रिय शक्ति प्राप्त होती है । इसलिये साम गाने वाले लोग कहते हैं कि ऋग्वेदी इन्द्र की इन्द्रिय की प्रशंसा करते हैं । इसका ऋषि गृत्समद है । इस सूक्त से गृत्समद ने इन्द्र के प्रिय धाम को पाया । उसने परम लोक जीत लिया । जो इस रहस्य को समझता है वह इन्द्र के परम धाम को पाता है और परम लोक को जीत लेता है । वैश्वदेव के प्रतिपद् और अनुचर यह हैं :— तत्सवितुर्वृणीमहे इत्यादि ( ऋ० ५।८२।१-३ ) और अद्या नो देव सवितः ( ऋ०५।८२।४-५ ) यह रथंतर चिन है और यह तीसरे दिन का रूप है । सविता का निविद् सूक्त यह है :— तद्देवस्य सवितुर्वार्यं महत्... ( ऋ० ४।५३ ) इसमें 'महत्' शब्द आया है । अन्त बड़ा है । तृतीय दिन अन्त है। इसलिये यह तीसरे दिन का रूप है । द्यावा पृथिवी का निविद् सूक्त है :—
पहला अध्याय ] २८७ "घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते घृतश्रिया घृतपृचा घृतावृधा"। (ऋ० ६।७०।४) इसमें तीन शब्द आये हैं "घृत श्रिया", "घृतपृचा", "घृता- वृधे।" यहाँ 'घृत' शब्द की पुनरावृत्ति है और ( अन्त में तीन बार 'आ' आया है ) इससे 'निवृत्त' भी है। यह पुनरावृत्ति और निवृत्ति तीसरे दिन के रूप हैं। ऋभुओं का निविद् सूक्त यह है :- "अनश्वो जातो अनभीशुरुक्थ्य यो ३ रथस्त्रिचक्रः परिवर्तते रजः।" (ऋ० ४।३६) इसमें "रथस्त्रिचक्र" में 'त्रि' शब्द आ गया। यह तीसरे दिन का रूप है। वैश्वदेव का निविद् सूक्त यह है :- परावतो ये दिधिषंत आप्यम्। (ऋ० १०।६३) 'परावत' में 'अन्त' है। तीसरा दिन अन्त है। तीसरे दिन का रूप है। यह 'गय' सूक्त है। इससे 'प्लत' के पुत्र 'गय' ने देवों के प्रियधाम को पाया और परम लोक को जीता। जो इस रहस्य को समझता है वह देवों के प्रियधाम को पाता है और परम लोक को प्राप्त होता है। अग्नि-मारुत शस्त्र का प्रतिपद् ( आरम्भ ) यह है :- वैश्वानराय धिषणामृतावूधे (ऋ० ३।२) धिषणा में 'अन्त' है। तीसरा दिन (त्र्यह) अन्त होता है। यह तीसरे दिन का रूप है। मरुतों का निविद् सूक्त यह है :- धारावरामरुतो धृष्णवोजसो (ऋ० २।३४) इसमें बहुवचन है। बहुवचन अन्त है। तीसरा दिन अन्त है। यह तीसरे दिन का रूप है।
२८८ [ पाँचवीं पञ्चिका जातवेद मंत्र वही है :- जातवेदसे सुनवाम ( ऋ० १।९९।१ ) जातवेद का निविद् सूक्त यह है :- त्वमग्ने प्रथमो अं गिरा ( ऋ० १।३१ ) यहाँ हर मंत्र के पहले 'त्वमग्ने' आता है । यह उदर्कं है । यह तीसरे दिन का रूप है । 'त्वं त्वं' बार बार कहने से अगले तीन दिनों ( चौथा, पाँचवाँ, छठा ) से तात्पर्य है । जो इस रहस्य को समझ कर यह पाठ करते हैं उनके त्र्यह बिना किसी विघ्न के निरन्तर समाप्त हो जाते हैं । ( २ ) ३-तीसरे दिन सब स्तोम खतम हो जाते हैं और सब छन्द । केवल एक चीज़ बच रहती है अर्थात् 'वाक्' । वाक् एक अक्षर है । इसमें तीन अक्षर सम्मिलित हैं । एक अक्षर में तीन अक्षर हैं । अगले त्र्यह में तीन दिन होते हैं । यह तीन अक्षर तीन के अगले दिनों को बताते हैं । यह अक्षर तीन यह हैं एक वाक्, एक गौ, एक द्यौ । इसलिये चौथे दिन का देवता 'वाग्' ही है । चौथे दिन इसी अक्षर का न्यूंख बनाते हैं । इसके स्वर को कुछ घटा बढ़ा कर । यह चौथे दिन को उठाने के लिये । न्यूंख अन्न है । अन्न के लिये गायक लोक इधर-उधर फिरते हैं और अन्न उत्पन्न होता है । चौथे दिन न्यूंख करके अन्न उत्पन्न करते हैं । क्योंकि यह कृत्य अन्न के लिये ही किया जाता है । इसलिये चौथा दिन जातवद् ( उपजाऊ-fertile ) होता है । कुछ लोग कहते हैं कि चार अक्षर का न्यूंख करना चाहिये क्योंकि पशुओं के चार पैर होते हैं और यह सब पशुओं की वृद्धि के लिये किया जाता है ।