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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

ब्रह्माका विवाह । २३५ १६ लालति तुम्हरे मन चब्बन को तुमका बार बार धिक्कार ८० त्यही समैया ऊदन चलिभा सबसों बिदा मांगि त्यहिबार ॥ चढ़ा पालकी ब्रह्मा ठाकुर ऊदन बेदुल भा असवार ८१ आयकै पहुंचे दूउ लश्कर में जहाँ दरबार चँदेले क्यार ॥ हाथ पकरिकै ब्रह्मा ऊदन तम्बुन गये दोऊ सरदार ८२ चरणन परिकै परिमालिक के बैठे दूऊ बीर बलवान ॥ पूंछन लागे बघऊदन ते तुरतै तहाँ बीर मलखान ८३ कहौ हकीकति सब महलनकी कैसी भई रीति ब्यवहार ॥ सुनिकै बातें मलखाने की कहिगा यथातथ्य सरदार ८४ सुनिकै बातें बघऊदन की आल्हा ठाकुर लीन बुलाय ॥ कमर बिलोकै बघऊदन की कैसा परा कटारी घाय ८५ चिह्न न पायो कहूं घाव को आल्हा बोल्यो बचनसुनाय ॥ झूठ न बोलत तुम ऊदन रहौ कैसी किह्यो दिल्लगी भाय ८६ ब्रह्मा बोले तब आल्हा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ साँची दादा ऊदन बोल्यो झूठ न कह्यो लहुरवाभाय ८७ लीन्हे बूटी रानी आई सो ऊदन के दिह्यो लगाय ॥ घाव पूरिगा बघऊदन का औ उठि बैठ लहुरवा भाय ८८ सुनिकै बातें ब्रह्मानँद की गे परिमाल सनाकाखाय ॥ कूच कराओ अब लश्कर को बोला फेरि चँदेलाराय ८९ बातें सुनिकै महराजा की मलखे रुपना लीन बुलाय ॥ औ समझायो यह रुपना को यह तुम कहौ पिथौ रैजाय ९० कह्यो सँदेशा परिमालिक है बेटी बिदा देयँ करवाय ॥ इतना सुनिकै रुपना चलिभा औफिरि अटा द्वारपरजाय ९१ द्वारे ठाढे पिरथी राजा तिनसों बोला शीश नवाय ॥

विदा कि विरिया अब आई है यह मोहिं कह्यो चँदेलोराय ६२ यहु संदेशा हम लाये हैं ओ महराज पिथोराराय ॥ जो कछु उत्तर तुम ते पावैं राजै सर्वइ सुनावैं जाय ६३ बातें सुनिकै ये रूपन की बोले पृथीराज महराज ॥ देश हमारे की रीती यह पुरिखन कियो अगारी काज ६४ ब्याह के पीछे गौना देवैं तबहीं होवै पूर विवाह ॥ यहतुम कहियो परिमालिक ते ऐसे कहे बचन नरनाह ६५ धन्य बखानैं हम आल्हा को सातो भाँवरि लियो कराय ॥ हैं सब लायक मलखे ठाकुर हमरो कहौ संदेशो जाय ६६ सुनिकै बातें पृथीराज की रूपन चला तुरत शिरनाय ॥ आयकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में ज्यहि में रहैं चँदेलेराय ६७ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे बैठे लिहे ढाल तलवार ॥ जोगा भोगा मन्नागूजर जगनिक भैने चँदेलेक्यार ६८ जो संदेशा पृथीराज का रूपन सो गा सबै सुनाय ॥ सुनिकै बातें पृथीराज की भा मन खुशीं चँदेलोराय ६६ हुकुम लगायो फिरि लश्कर में क्षत्री कूच देयँ करवाय ॥ मानि आज्ञा परिमालिक की आल्हा कूच दीन फरमाय १०० कूच क डंका तब बाजत भो क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ हथी चढ़ैया हाथी चढ़िगे बाकी घोड़न भे असवार १०१ बाजे डंका अहलंका के घूमन लागे लाल निशान ॥ बैठि पालकी ब्रह्मा चलि भे साथै चले वीर मलखान १०२ ढोल औ तुरही कै गिनती ना बाजन कीन घोर घमंसान ॥ ग्यारा रोज कि मैजलि करिकै मोहवे आये बराती जवान १०३ आगे चलिकै रूपनबारी मल्हना महल पहुँचा आय ॥

[Header] ब्रह्माका विवाह । २३७ ४१

कुशल प्रश्नसों सब जन आये रूपनबोला शीश नवाय १०४ बड़ी खुशाली भै मल्हना के तुरतै सखियाँ लीन बुलाय ॥ चौमुख दियना रानी बारे पहुंची तुरतद्वारपर आय १०५ बारह रानी परिमालिक की गावन लगीं मंगलाचार ॥ पलकी आई ब्रह्मानँद की परछन होनलगी तबद्वार १०६ भई आरती ब्रह्मानँद की सबियाँ याचक भये निहाल ॥ जितनी रैयति मोहबे वाली आये ज्वान वृद्ध औ बाल १०७ भयो बुलौवा फिरि पंडित का धावन चला तड़ाका धाय ॥ लै कै पत्रा पंडित आवा साइति ठीकदीन बतलाय १०८ महलन पहुंचे ब्रह्माठाकुर विप्रन मोदभयो अधिकाय ॥ दान दक्षिणा मल्हना दीन्हे सीधा घरै दीन पहुँचाय १०६ दगीं सलामी दरवाजे पर धुँवना रहा सरगमें छाय ॥ बिदा मांगिकै नेवतहरी सब निजनिजदेशपहुंचेजाय ११० दशहरिपुरवा आल्हा पहुंचे सिरसा गये वीर मलखान ॥ कथा पूरी भै अब ब्याहे कै मानो सत्यवचन परमान १११ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकनलागे सन्तन धुनी दीन परचाय ११२ परे आलसीखटिया तकि तकि घों घों कण्ठ रहे घर्राय ॥ भल बनिआई तहँ योगिन कें निर्भयरहे रामयशगाय ११३ निशा पियारी सब योगिनको चोरन अर्द्धमास की भाय ॥ कछु नहिंभावै मनबिरहिन कें उनको कालरूपदिखराय११४ सदा सहायक पितु अपने को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ११५ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥

४२ आल्हखण्ड । २३= मालिक ललिते के तबलौंतुम यशसों रहौ सदाभरपूर ११६ माथ नवावों शिवशंकर को यहँसों करों तरंग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देयो इच्छा यही मोरि भगवन्त ११७ इति श्रीलखनऊ निवासि (सी, आई, ई) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयाग नारायणजी की आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत ब्रह्मापाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥ ब्रह्मा औ बेला का विवाह सम्पूर्ण ॥ इति ॥

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ उदयसिंहकाविवाह अथवा नरवर की लड़ाई ॥ सवैया ॥ भो प्रभु दीनदयाल गुपाल सदा नँदलाल दोऊ पदध्यावों । सागर कीर्त्ति सबै गुणआगर नागर मोहनलाल बतावों ॥ स्वर्ग औ नर्क रहूं कतहूं पै सदा शुचिसों तुम्हरो गुणगावों । याँच यही ललिते कर साँच मिलैं रघुनन्दन सो बर पावों १ सुमिरन ॥ दोउपद् ध्यावों बड़े प्रेम सों स्वामी कृष्णचन्द्र महराज ॥ काज सँवार्यो धर्मराज के राख्यो द्रुपदसुता की लाज १ कंस पछार्यो यदुनन्दन तुम दीन्ह्यो उग्रसेन को राज ॥ सदा पियारे तुम भक्तन के हमरे माननीय शिरताज २ भक्त तुम्हारे सुखी न देखे आवत नाम बतावत लाज ॥ भक्त सुदामा जग में जाहिर दूसर जनकपुरी द्विजराज ३

आलहखण्ड । २४० लक्ष्मीपति तुमको सब जानत चाहन सरन आपनो काज ॥ भूप युधिष्ठिर की गति देखी वनमाँ रहे छूटिगै राज ४ वस्त्र न देखा जिन देहीमां केवल चढ़ी भस्म सब अङ्ग ॥ रावण बाणासुर को देखा जिन सों जुरी आपसौं जङ्ग ५ छूटि सुमिरनी गै देवन कै औ ऊदन का सुनो विवाह ॥ घोड़ खरीदन काबुल जैहैं पठई मोहवे का नरनाह ६ अथ कथाप्रसङ्ग ॥ एक समैया परिमालिक का भारी लाग राजदरबार ॥ बैठे क्षत्री सब महिफिल हैं एकने एक शूर सरदार १ पारस पत्थर ज्यहि के घरमा लोहा छुये सोन है जाय ॥ कौन बड़ाई तिनकै करिकै शोभा वरणि पार लै जाय २ माहिल शाले परिमालिक के सोऊ गये तहां पर आय ॥ देखि बनाफर उदयसिंह को माहिल पीर भई अधिकाय ३ माहिल बोले तहँ राजा सों मानो कही चँदेलेराय ॥ नाम तुम्हारो देश देश में तुम पर कृपा कीन रघुराय ४ एक बात की अब कमती है सो बिन कहे रहा ना जाये ॥ घोड़ तुम्हारे घर कमती हैं बूढ़े घोड़ भरे अधिकाय ५ रुपिया पैसा की कमती ना थोड़े घोड़ लेउ मँगवाय ॥ आवैं बछेड़ा काबुलवाले तौ फिरि नामहोय अधिकाय ६ इतना सुनिकै राजा बोले काबुल कौन खरीदन जाय ॥ हाथ जोरिकै ऊदन बोले काबुल हमें देउ पठवाय ७ सुनिकै बातैं बघ ऊदन की राजा गये सनाका खाय ॥ बोलि न आवा परिमालिक ते मुहँका विरागयो कुम्हिलाय ८ कलँगी गिरिगे फिरि पगड़ी ते काँपन लाग चँदेलेराय ॥

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[Header] उदयसिंहका बिवाह । २४१ ३ रौंवाँ ठाढ़े भे देही के नैनन दीन्ह्यो झरी लगाय ६ माहिल बोले परिमालिक ते काहे सोच कीन अधिकाय ॥ लड़का बाउर ऊदन नाहीं जो तुम डरो चँदेलेराय १० इनसे बढ़िकै को मोहबेमाँ घोड़ा जौन खरीदन जाय ॥ है मर्दाना इनको बाना कालौ लड़े न सम्मुख आय ११ कहिकै पलटत नहिं ऊदन हैं जानो भली भांति महराज ॥ भय नहिं लावो अपने मनमाँ करिहैं सिद्धकाज रघुराज १२ बातें सुनिकै ये माहिलकी बोले फेरि रजापरिमाल ॥ तुम भल जानत हौ ऊदन को कलहा देशराजको लाल १३ रारि मचाई यहु मारग में आई फेरि ब्याधि कछु भाय ॥ बात चलाई तुम ऐसी है जासों सोचभयो अधिकाय १४ सुनिकै बातें परिमालिक की बोला उदयसिंह सरदार ॥ शपथ शारदा शिवशङ्कर की हम काबुल को खड़े तयार १५ भली बताई माहिल मामा राजाकरो बचन बिश्वास ॥ यक अवलम्बा जगदम्बा का सोई पूरि करें सब आश १६ क्षत्री ह्वैकै समरसकावै त्यहि को बार बार धिक्कार ॥ बाँझै होवै सो नारी जग नाहक रखै पेटमें भार १७ बेद यज्ञ औ दान युद्ध ये क्षत्री केर रूप श्रृंगार ॥ ये नहिं होवें ज्यहि क्षत्री के त्यहि को बार बार धिक्कार १८ एक ऋचा गायत्री जानै सोऊ बेद पढ़ैया ज्वान ॥ ब्राह्मण क्षत्री बनिया तीनों यासों विमुख श्वान अनुमान १६ बातें सुनिकै बघऊदन की बोले फेरि रजापरिमाल ॥ कहा न मनिहौ तुम बच्चा अब कलहा देशराज के लाल २० देवा ठाकुर को सँग लैके काबुल घोड़ खरीदो जाय ॥ १६

४ आल्हखण्ड । २४२ ररि मचायो कहुँ मारग ना मान्यो कही बनाफरराय २१ इतना कहिकै परिमालिकने फिरि यह हुकुम दीन फरमाय॥ पंद्रह खच्चर मुहरैं लै कै काबुल जाउ लहुरवा भाय २२ सुनिकै बातैं परमालिक की दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥ बिदा मांगिकै परिमालिकते मल्हना महल पहुँचा जाय २३ कही हकीकति सब मल्हनाते ऊदन बार बार शिरनाय ॥ करतब जान्यो जब माहिलकै मल्हना बारवार पछिताय २४ पै भलजानै अपने मनमाँ मानी नहीं लहुरवाभाय ॥ तासों रोक्यो महरानी ना आशीर्वाद दीन हर्षाय २५ बिदा मांगिकै ऊदन चलिभा दशहरिपुरै पहुँचा जाय ॥ हालबतायो सब माता को ऊदन बार बार समुझाय २६ सुनिकै बातैं बघऊदन की भौजी माता उठीं रिसाय ॥ तुम नहिंजावो अब काबुलको ऊदन काह गये बौराय २७ आल्हा बरज्यो भल ऊदन को नीक न करो लहुरवाभाय ॥ तुम्हें पठावत नहिं राजा हैं तुमहीं कौन हेतु को जाय २८ बातैं सुनिकै ये आल्हा की ऊदन कहा बचन शिरनाय ॥ हम तो जैबै अब काबुल को बहुत न धजी धजी उड़ि जाय २६ हम को बरजो अब भाई ना इतना प्यार करो अधिकाय ॥ बातैं सुनिकै बघऊदन की आल्हा चुप्पसाधि रहि जाय ३० पायँ लागिकै फिरि माता के औ सुनवाँ को शीशनवाय ॥ बिदा मांगिकै बड़माई सों ऊदन कूच दीन करवाय ३१ घोड़ मनोहर देवा बैठा ऊदन बेंदुलपर असवार ॥ बजा काफिला फिरिकाबुलको दोऊ चले शूर सरदार ३२ एक कोस जब नरवर रहिगा ऊदन बोले बचन सुनाय ॥

उदयसिंहका विवाह । २४३ ५ कौन शहर है देवा ठाकुर हमको साँच देउ बतलाय ३३ देवा बोला तब ऊदन ते जानो नहीं हमारो भाय ॥ इतना कहिकै दूनों चलि भे रहिगा पावकोस फिरिआय ३४ तहँ चरवाहन को देखत भो तिनसों कह्यो बनाफरराय ॥ कौन शहर औ को राजा है हमको साँच देउ बतलाय ३५ सुनिकै बातें बघऊदन की बोला अहिरपूत तब भाय ॥ नरपति राजा नरवरगढ़ है ओ परदेशी बात बनाय ३६ इतना सुनिकै दूनों चलिभे पुर के पास पहुंचे जाये ॥ तहाँ जलेड़ा बहु नारिन को खैन्नैं बारिकूप में आय ३७ को गति बरखै तिन नारिनकै पतली कमर तीनिबलखाय ॥ दाँत अनारन के बीजासम मीसी हँसत परै दिखलाय ३८ परी बत्तीसी है पानन कै आननकमलखिला जसभाय ॥ छाती सोहैं नवरंगी सम क्युएडी भौंर सरिस दिखरायँ ३६ गजकीशुण्डा सम भुजदण्डा जंघा कदलिथम्भ अनुमान ॥ रूप देखिकै तिन नारिन का तेंहा होयँ अनेकन ज्वान ४० ऐसी बाला सब आला हैं नाभी यमुन भँवरसम भाय ॥ रूप देखिकै तिन नारिन का पहुँचा पास बनाफरराय ४१ मनमाँ सोचा उदयसिंह तब औ यह ठीक लीन ठहराय ॥ जौने पुरकी अस नारी हैं रानिनरूप वरणि ना जाय ४२ यहै सोचिकै बघऊदन फिरि बोला एक नारिके साथ ॥ पूरब तेनी पश्चिम आये बाबा सूर्य चराचर नाथ ४३ घोड़ पियासा अति हमरो है याको पानी देउ पियाय ॥ बातें सुनिकै ये ऊदन की बोली तुरत नारिसिसियाय ४४ करन दिल्लगी हमसों आयो क्षत्री घोड़े के असवार ॥

६ आल्हखण्ड । २४४ पनी पियावन अब घोड़े का फेरि न कह्यो दूसरीबार ४५ नरपति राजा यहि नगरी का सबविधि शूरबीर सरदार ॥ टरिजा टरिजा अब जल्दी सों क्षत्री घोड़े के असवार ४६ इतना सुनिकै ऊदन बोले अब ना बोले फेरि गवाँरि ॥ ऐसी बातें जो फिरि बोलै तौ मुँहँ घाँसिदेउँ तरवारि ४७ नरपति खरपति कै गिनतीना बर बर करै बैजनी नारि ॥ काह हक़ीक़ति है नरपति कै हमरे साथ करै तरवारि ४८ सुनिकै बातें ये ऊदन की सहमी तहाँ तुरत सो नारि॥ औरी नारी त्यहि सों बोलीं आई संग भरन जे बारि ४९ रूप उजागर सब गुण सागर नागर घोड़े को असवार ॥ करुई वाणी नाहक बोलिउ बहिनी मानों कही हमार ५० यहु बर लायक है फुलवा के सबविधि रूपशील गुणवान ॥ वह तो बोली भल धीरज में पर परिगई बनाफर कान ५१ सवैया ॥ ऊदन बोलिउठा त्यहि नारि सों कौनअहै फुलवा सहिदानी । देहु बताय न राखु छिपाय चुभी मनमें सुनिबे को कहानी ॥ कोमल बैन सुन्यो जब भामिनि बोलिउठी तबहीं यह बानी । नरपतिकी कन्या लखिकै ललिते रतिहू मनमें सकुचानी ५२ त्यहि की समता सुन्दरता की यहिपुर नारिकौन यहिकाल ॥ काह बतावों परदेशी मैं फूलन शयनकरै वह बाल ५३ त्यहिमुख फुलवाकी गाथासुनि ऊदन आगम गयो जनाय ॥ दक्षिण बाहू फरकन लाग्यो दहिने भई शारदा माय ५४ यदि आगैं फिरि माड़ो कै जो कछुकहाविजैसिनिभाल ॥

उदयसिंहका विवाह । २४५ ७ बाण लागिगा उर मन्मथ का घायल देशराजका लाल ५५ आदर करिकै फिरि देवा का बोला उदयसिंह सरदार ॥ अब दिन थोड़ा अतिबाकी है देखो चलैं शहर को यार ५६ आखिर सोना है बिरवातर सबदिन मारग में सरदार ॥ भागि भरोसे शहर जो पावा तौकस त्यागि चलैं यहिवार ५७ सुनिकै बातें ये ऊदन की देवा मैनपुरी चौहान ॥ ज्योतिष बिद्या के परचय से जाना कुशलकरी भगवान ५८ देवा बोला फिरि ऊदन सों मानो कही लघुरवाभाय ॥ द्रव्य बांधिकै पर पुर जैये यहनहिं हृदयमोर पतियाय ५६ तासों रहिबो तर बिरवा के नीकी बात बनाफरराय ॥ द्रव्य प्राण की घातक जानो मानो साँच बचन तुमभाय ६० इतना सुनिकै ऊदन बोले साँचौ मानो कही हमार ॥ भय उर राखो कछु जियरे ना चलिये टिकैं यहाँ सरदार ६१ इतना कहिकै बघऊदन ने आगे दीन्ह्यो घोड़ बढ़ाय ॥ पाछे चलिभा देवाठाकुर मनमें बार बार पछिताय ६२ जायकै पहुंचे फुलबगिया में मालिन भीर दीखअधिकाय ॥ तहाँ पै उतरे बघऊदन जब माली पास पहुँचा आय ६३ माली बोला बघऊदन ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ चलिकै उतरो बहु मोरे घर ह्याँनहिंटिको मुसाफिरभाय ६४ यह फुलवाई महाराजा की ह्याँसों मेख लेउ उखराय ॥ सुनिकै बातें त्यहि माली की चुप्पै मुहरैं दीन गहाय ६५ पांच अशर्फी माली पायो मनमाँ बड़ा खुशी ह्वैजाय ॥ हाथ जोरिकै माली बोला द्वारे टिको चलै तुम भाय ६६ द्वारे कुइँयाँ मीठा पानी नींबू वृक्ष तहाँ अधिकाय ॥

८ आल्हखण्ड । २४६ हाटक निकटै म्वरे द्वारे के सीधा घास लिह्यो मँगवाय ६७ सुनिकै बातैं त्यहि माली के ऊदन कूच दीन करवाय ॥ द्वारे पहुंचे फिरि माली के मेखैं तहाँ दीन गड़वाय ६८ मांगिकै पलँगा माली लायो द्वारे तुरत दीन डरवाय ॥ गद्दा परिगा मखमलवाला आला बैठ बनाफरराय ६६ माली चलिभा फुलवगियाका मालिनि द्वार पहुँची आय ॥ मालिनि बोली उदयसिंह ते ठाकुर हाल देउ बतलाय ७० कहाँ ते आये औ कहँ जैहौ तुम्हरो काह नाम है भाय ॥ बातैं सुनिकै ये मालिनि की बोले तुरत बनाफरराय ७१ नाम हमारो उदयसिंह है हमरो देश मोहोबा जान ॥ छोटे भैया हम आल्हा के साँचे बचन हमारे मान ७२ सुनिकै बातैं ये ऊदन की मालिनि फेरि कहा शिरनाय ॥ आल्हा बेहे कौन शहर में साँची साँची देउ बताय ७३ सुनिकै बातैं ये मालिनि की बोला उदयसिंह सरदार ॥ भैया ब्याहे नैनागढ़ माँ सुनवाँभौजी आय हमार ७४ बड़ी खुशहाली भै मालिनिके बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥ हमहूँ सुनवाँ साथै खेलीं हिरिया नाम हमारो भाय ७५ मैको हमरो है नैनागढ़ सुनवाँ बहिनी लगे हमारि ॥ चलिकै बैठो म्वरे मन्दिर में देवर सेवा करों तुम्हारि ७६ बातैं सुनिकै ये हिरिया की भा मन खुशी बनाफरराय ॥ दिह्यो अशर्फी दश मालिनिको औयहबोल्योवचनसुनाय ७७ सीधा लावो तुम लरिकनको भोजन वेगि पकावो जाय ॥ दिना चारि यहि पुरमा रहिकै पाछे कूच देव करवाय ७८ सुनिकै ये ऊदन की मालिनि बैठि धाम में जाय ॥

उदयसिंहका बिवाह । २४७ ६ माली आवा जब बगिया ते तबसब हाल कहे समुझाय ७६ देवा बोला हाँ ऊदन ते अब रँग और परै दिखराय ॥ काहे अटक्यो तुम नरवर में साँचे हाल देव बतलाय ८० बातें सुनिकै ये देवा की बोला उदयसिंह सरदार ॥ फुलवा बेटी जो नरपति की तामें लाग्यो चित्त हमार ८१ कीनि प्रतिज्ञा हम अपने मन साँची तुम्हें देयँ बतलाय ॥ नैनन दीखे बिन फुलवा को ना हम धरब अगाड़ीपाँय ८२ सुनिकै बातें ये ऊदन की देवा बोला बचन बनाय ॥ ऐसी करिहौ जो बघऊदन तौ सब जैहैं काम नशाय ८३ घोड़ खरीदैन को आये तुम नरवर नैन खरीदे आय ॥ काह बतैहौ तुम राजा ते सोऊ कहो लहुरवाभाय ८४ तुमका सौंप्यो महराजा म्हिँ ऊत तुँकाह गयो बौराय ॥ तनिक मिहिरिया के देखै का ऊमफुलदेहौ लाज गवाँय ८५ अबै न बिगरा कछु बघऊदन ह्याँ ते कूच देव करवाय ॥ सुनिकै बातें ये देवा की बोला फेरि बनाफरराय ८६ मोहिं भरोसा है शारद को देवा मैनपुरी चौहान ॥ घोड़ खरीदन फिरि हम जैहैं करिहैं कुशलमोरिभगवान ८७ पै मन अटको है फुलवा में हटको मानै नहीं हमार ॥ खटको भटको पटको झटको सोवो आज यहाँ सरदार ८८ इतना कहतै बघऊदन के दोऊ नैन गये अलसाय ॥ देवा ऊदन दोऊ सोये चकरन पहरादीन बिठाय ८६ सोयकै जागे जब बघऊदन प्रातःक्रिया कीन हर्षाय ॥ फेरिकै पहुँचे मालिनि घरमाँ मालिनि हरवा रही बनाय ६० ऊदन बोले तहँ मालिनि सौं हिरिया भौजी बात बनाय ॥

१० आल्हखण्ड । २४८ लाव मलाई अब जल्दी सों दौरति चली बजारे जाय ६१ इतना सुनिकै हिरिया बोली साँची सुनो बनाफरराय ॥ हार छोड़िकै जाउँ बजारे तौ तकसीर बड़ी है जाय ६२ तनकिउ देरी हमका लागी फुलवा जाई बेगि रिसाय ॥ बातें सुनिकै ये हिरिया की बोले फेरि बनाफरराय ६३ हार तुम्हारो हम गूंथत हैं मालिनि जाउ बजरिया धाय ॥ पांच अशर्फी ऊदन दीन्ह्यो मालिनिचली तड़ाकाजाय६४ बेला चमेली औ निवारिको ऊदन हार कीन तय्यार ॥ मालिनि आई जब बजारेते देखा चार लरिनको हार ६५ हिरिया बोली तब ऊदन ते देवर मानो कही हमार ॥ हार डुलरिया रोज बनावों चौलर आज भयो तय्यार ६६ कर्री गांठि तुम्हारी की फूनन खूब सटा है यार ॥ हाल जो पूँछी फुलहर सें उत्तर काह देब सरदार ६७ बातें सुनिकै ये मालिन की बोला उदयसिंह त्यहिंवार ॥ बिटिया आई म्वरि बहिनी कै ताने हार कीन तय्यार ६८ इतनासुनिकै हिरियामालिनि तुरतै डलिया लीन उठाय ॥ जहँना बेटी रह नरपति कै मालिनि तहाँ पहुंची जाय ६६ बैठि पलँगरा फुलवा बेटी मालिनि हार दीन पहिराय ॥ चार लरिन को हरवा दीख्यो फुलवा बोलीवचनरिसाय १०० रोज डुलरिया लै आवति थी कौने गूँधा चौलरहार ॥ साँच बतावै री मालिनि अब नाहीं पेट फोरैहौं त्वार १०१ इतना सुनिकै मालिनि बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ बिटिया आई म्वरि बहिनी कै ताने हार बनायो आय १०२ वह तो ब्याही है मोहबे माँ जहँपर बसैं रजापरिमल ॥

उदयसिंहका विवाह। २४६ ९९ पारस पत्थर तिनके घरमाँ उनकी रय्यति सबै निहाल १०३ बातें सुनिकै ये मालिनि की फुलवा हुकुमदीन फरमाय ॥ हार बनायो ज्यहि मालिनि है मोको बेगि दिखावै आय १०४ इतना सुनिकै मालिनि चलिभै मनमाँ बार बार पछिताय ॥ ज्यों त्यों आई घर अपने को तहँपर मिले बनाफरराय १०५ हाल बनायो सब फुलवाको मालिनि बार बार समुझाय ॥ मारे डरके पिंडुरी काँपै जर्दी आनन परै दिखाय १०६ ऊदन बोले तब मालिनि ते काहे सोच करो अधिकाय ॥ नई पुरानी जेवर लैके हमको देउआय पहिराय १०७ देखन जैबे हम फुलवा को मालिनि मानो कही हमार ॥ शंका लावो कछु जियरे ना तुम्हरो जाय न बांकोबार १०८ कौन डुमरिहा जग हमरो है जो तुम्हरे तन करै निगाह ॥ निश्चय जानो अपने मनमाँ हमफुलवाते करब विवाह १०६ बातें सुनिकै उदयसिंह की मालिनि शंका दीन भुलाइ ॥ तुरतै गहना को लै आई पहिरनलागलहुरवाभाय ११० मिस्सी रगरी सब दाँतन में तापर लीन्ह्यो पान चबाय ॥ काजल आँज्यो दोउ नैनन में शोभा कही बूत ना जाय १११ बेंदी बँदनी टीका तीनों मस्तक ऊपर धरा सँवार ॥ करनफूल कानन में पहिरा तामें गुज्झी करें बहार ११२ मोहनमाला मोतिनमाला पहिरे और फुलनके हार ॥ बाजू जोसन टाड़ैं तीनों दोऊभुजा पहिरि सरदार ११३ नीले रँगकी चुरियाँ पहिरी गोरे हाथनका श्रृङ्गार ॥ आगे अगेला पिछे पछेला तिनविच ककनाकैरेंबहार ११४ छल्ले पहिरे सब अँगुरिन में अँगुठा लीन आरसी धार ॥

१२ आल्हखण्ड । २५० पहिरि करधनी ली कम्मर में पायँन पायजेब झनकार ११५ कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजै नीचे मेंहदी करै बहार ॥ बिछुआपहिरे सब अँगुरिन में अनवटअँगुठनकाश्रृंगार ११६ वेष जनाना ऊदन धरिकै तुरतै पालकी लीन मँग़ाय ॥ बैठि पालकी में नरनाहर मनमें सुमिरिशारदामाय ११७ हिरिया मालिनि को सँग लै कै फुलवा महल गयेनगन्याय ॥ उतरि पालकी सों नरनाहर शारदचरणकमलफिरिध्याय ११८ आगे हिरिया पाछे ऊदन फुलवा पास पहुँचे जाय ॥ फुलवा देख्यो जब ऊदन को मनमाँ बड़ी खुशी है जाय ११९ रूप देखिकै त्यहि मालिनिको मनमाँ गई सनाकाखाय ॥ कै पैताना खाली दीन्ह्यो आदरकीनफेरिअधिकाय १२० बैठि उसीसे जब ऊदनगे फुलवा बोली बचन रिसाय ॥ कैसी मालिनि यह लाई है मालिनिहालदेयबतलाय १२१ मालिनि बोली तब फुलवाते बेटी साँची देयँ बताय ॥ बेटी प्यारी परिमालिक की नौकरितासुपासकीआय १२२ राजनीति का यह जानति है राखति सबऊ सखी का भाय ॥ बैठि उसीसे यह जावै जो तौ वह क्षमा करै हर्षाय १२३ सुनिकै बातें ये मालिनि की फुलवा क्षमा कीन सुखपाय ॥ हँसिकै बोली फिरि मालिनिते साँची साँची देउ बताय १२४ कौन बहादुर परिमालिक घर कारो राजपुत्र यहिकाल ॥ बातें सुनिकै ये फुलवाकी बोला देशराजका लाल १२५ आल्हा ब्याहे हैं नैनागढ़ पथरीगढ़ै वीर मलखान ॥ पिरथी घरमाँ ब्रह्मा ब्याहे ठाकुर दिल्लीके चौहान १२६ कारो इकलो बघऊदनहै ज्यहिकै बाँड़ि बहै तलवार ॥

उदयसिंहका विवाह । २५१ १३ बड़ा लड़ैया जगमाँ जाहिर ठाकुर बेंदुलका असवार १२७ इतना सुनिकै फुलवा बोली मालिनि साँच देउ बतलाय ॥ हाथ पैर पुरुषन के ऐसे करै करै परै दिखाय १२८ इतना सुनिकै मालिनि बोली साँचे बचन करो परमान ॥ भैंसि चराई बालापनमाँ माता पिता दरिद्रीजान १२६ परी व्यवस्था लरिकाई में ताको करी कहाँलगगान ॥ जैसी गुजरी हमरे ऊपर ऐसी परै न काहू आन १३० फुलवा बोली फिरि हिरिया ते मालिनि जाउ घरै यहिबार ॥ काल्हि सबेरे यहि लैजायो साँची मानो कही हमार १३१ इतना सुनिकै हिरिया चलिमै अपने घरै पहुँचि आय ॥ फुलवा बाँदी को बुलवायो तासों चौपरलीन मँगाय १३२ खेलन लागी मालिनि सँगमाँ आधी राति गई नगच्याय ॥ लैकै पंखा बाँदी हाँकै ऊइन केर वस्त्र उड़िजाय १३३ कब्जा झलकै तलवारी का सो फुलवा के परा निगाह ॥ फुलवा बोली तब मालिनिते झलकै बगल तुम्हारे काह १३४ तुम नहिं बेटीहौ मालिनिकी औ छल किह्यो यहाँपर आय ॥ सुनि मकरन्दा तुमका पाई तुरतै खोदि लेइ गड़वाय १३५ अब पहिंचाना हम तुमको है बेटा देशराज के लाल ॥ जियत न जैहौ तुम महलनते औपारिग्योकालके गाल १३६ नाम तुम्हारो उदयसिंह है तुम्हीं बेंदुल के असवार ॥ इतना सुनिकै मालिनि बोली कीन्ह्योनीकी आजचिन्हार १३७ कहँ पै देख्यो तुम ऊदन को साँचे हाल देउ बतलाय ॥ इतना सुनिकै सब बाँदिनको फुलवा तुरतै दीन हटाय १३८ ओ फिरि बोली बबऊदन ते मानो कही बनाफरराय ॥

१४ आल्हखण्ड । २५२ रानी कुशला के महलन में योगीरूपधरा तुम जाय १३९ घर घर लूटा तुम माड़ो माँ हमसों शपथकीन फिरिआय ॥ भेद बतावा घर अपने का तब तुमलीन बापका दायँ १४० ब्याह हमारो जब तुम कीन्हा मलखे हना मोहिं ततकाल ॥ मिलन आपनो तुम्हें बतावा नाहर देशराज के लाल १४१ साँचो चाहत जो जाको है ताको स्वई मिलै सबकाल ॥ यह सुनि राखा हम विप्रन सों सो सब साँचाभयो हवाल १४२ पै गति तुम्हरी ह्वाँ नहीं है हमसों ब्याह करो सरदार ॥ बड़ा लड़ैया मकरन्दा है ज्यहिते हारिगई तलवार १४३ सुनिकै बातें ये फुलवा की बोला उदयसिंह सरदार ॥ काह हकीकति मकरन्दा कै साँची मानो कही हमार १४४ भल पहिचान्यो तुम मोका है अब सब पूर भये मम काम ॥ ब्याह तुम्हारो अब कीन्हे बिन / लौटिन जायँ आपनेधाम १४५ इतना सुनिकै फुलवा बोली मानो कही बनाफरराय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता जादू सेल शनीचर भाय १४६ व्यापी जियरा अति मेरो है ताते धीर धरा ना जाय ॥ करो बियारी तुम महलन में सोवो सेज बनाफरराय १४७ ऊदन बोले तब फुलवा ते तुमको साँच देयँ बतलाय ॥ क्वारी कन्या की शय्यापर कबहुँ न धरैं बनाफर पायँ १४८ धीरज राखो अपने मनमाँ सोवो तुरत सेज में जाय ॥ भयो भरोसा तब फुलवा के सोई विकट नींदको पाय १४९ तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय ॥ उये निशाकर आसमान में विरहिनिपीरभईअधिकाय १५० माथ नवावों पितु अपने को ह्वाँ ते करों तरँग को अन्त ॥

उदयसिंहका विवाह । २५३ १५ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५१ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत ऊदनफुलवामिलाप वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ -⁘- सवैया ॥ कौन कि आश सुपासमिलै नितहोत मनैमन याहि बिचारा । आशकि पाश सुपास कहाँ यह सोचत मोचत दुःख अपारा ॥ भीतररी यहि लोकहिकि शिर शास्त्र औ वेद पुराण निहारा । बाम भये रघुनाथ सों साँच करै ललिते फिरि कौन उबारा १ सुमिरन ॥ मैं पद बन्दौं रिपुसूदन के लवणासुरै पराजय कीन ॥ मानों शत्रुन के जीतै को साँचो जन्म शत्रुहन लीन १ काटिकै मधुबन पुरी बसायो मथुरापुरी परा त्यहि नाम ॥ अश्वमेध में सब जग जीत्यो कीन्ह्यो शम्भु साथ संग्राम २ छोटे भाई लपणलाल के साँचे भये भरत के दास ॥ इन यश बरणा अश्वमेध में पूरण भई हमारी आश ३ मातु सुमित्रा के बालक ये जग में भये सुयश की राश ॥ जो कोउ सुमिरै रिपुसूदन का साँचो करै प्रेम बिश्वास ४ प्यारो होवै रघुनन्दन का साँचो स्वै रामको दास ॥ छूटि सुमिरनी गै ह्याँते अब ऊदन ब्याह करौं परकाश ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उये दिवाकर जब पूरब में बालकरूप बिम्ब अतिलाल ॥

[Header] १६ आल्हखण्ड । २५४

बेटी फुलवा के महलन में जागा देशराजका लाल १ देवा बोला ह्याँ हिरियाते मालिनि मानो कही हमार ॥ देर लगावो अब घरमाँ ना लावो उदयसिंह सरदार २ लै कै पलकी मालिनि चलि भै फुलवा पास पहुँची जाय ॥ फुलवा बोली तब हिरियाते अब यहि जावो तुरत लिवाय ३ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे पहुँचे तुरत द्वार में आय ॥ बैठ पालकी में बघऊदन मनमें सुमिरि शारदांमाय ४ आयकै पहुँचे जब मालिनिघर देवा बोला वचन सुनाय ॥ साथ जनाना का करिबे नाँ जैबे जहाँ चँदेलाराय ५ बन्यो जनाना तुम नरवर में कैहौं हाल जाय दरबार ॥ बाना छोड़े रजपूती का ऊदन जीवैका धिक्कार ६ इतना सुनतै कायल व्हैगा नाहर उदयसिंह सरदार ॥ पेट मारने के कारण सों ऊदन लीन्ही हाथ कटार ७ हाथ पकरिकै देवाठाकुर बोला सुनो बनाफरराय ॥ चरचा करिबे ना मोहबेमाँ ऊदन साँच देवँ बतलाय ८ भई लालसा हमरे मनमाँ फुलवा देखनको अधिकाय ॥ करु अभिलाषा पूरण हमरी आल्हाकेर ल्हुरवा भाय ६ ऊदन बोले तब देवाने तुमको कैसे लवँ दिखाय ॥ जैसे बताओ देवा ठाकुर तैसे साँचो करैं उपाय १० इतना सुनिकै देवा बोले योगी बनो बनाफरराय ॥ अलख जगैवें पुर घर घर में याही सीधोसाद उपाय ११ गइ मनभाई बघऊदन के दूनों लीन्ह्यो भस्म रमाय ॥ काँधे माला औ मृगछाला आला योगिरूप बनाय १२ गुदड़ी लीन्ही दोऊ ठाकुर तामें छिपी ढाल तलवार ॥