भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

३८० आनन्दरामायणे [सर्गः ९

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्मं धनार्थी धनमाप्नुयात् । कामनार्थी लभेत् कामान् मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ॥ ३०॥ स्त्रीकामुकैरयं नित्यं पठनार्थं प्रयत्नतः । विवाहकाण्डं परमं प्राप्नुयुश्चात्र ते वधूः ॥ ३१॥ पतिकाम्या कुमारी चेच्छृणुयाद्भक्तिभाविता । विवाहकाण्डमेतद्वै मनोज्ञं पतिमाप्नुयात् ॥ ३२॥ ममार्थं यः पठेदेतच्छृणुयाद्वाऽथ भक्तितः । इह स्त्रिया सुखं भुक्त्वाऽप्सरोगोष्ठ्या दिवि मोदते ॥ ३३॥ सधवा शृणुयादेतद्या नारी कांतमुत्तमम् । विवाहकाण्डं कुत्रचित्तं वियोगं नाप्नुयात्तु सा ॥ ३४॥ सप्तदशदिनैरस्य कार्यं स्त्रीकामुकैर्मुहुः । अनुष्ठानं वर्षमेकं शृण्वन्नपि स्त्रियमाप्नुयात् ॥ ३५॥ प्रथमे दिवसे सर्गं पठेद्द्वाँ च परschemaऽहनि । त्रयमेव दिने सर्गान्क्रमेण संपठेन्नव ॥ ३६॥ दशमे दिवसेऽष्टैव ह्येकमेकेन वै क्रमात् । एवं सप्तदशाद्दिनैरनुष्ठानं स्मृतं बुधैः ॥ ३७॥ अथवा सकलं काण्डं प्रथमे दिवसे पठेत् । परेऽह्नि द्विगुणं हि नवमे दिवसे क्रमात् ॥ ३८॥ नववारं पठेतच्चेद् दशमे दिवसे ततः । अष्टवारं पठेत्तावद् ह्ययमेकेन क्रमान्नृपः ॥ ३९॥ एवं नरो वर्षमेकमुणुनानांस्त्रियं लभेत् । विमलबक्त्रां च सुनासां दिव्यरूपों मनोहराम् ॥ ४०॥ विवाहकाण्डं परमं पवित्रमानन्ददं मङ्गलकारकं च । स्त्रीदं मनोज्ञं श्रुतिसौख्यदं वै नरैः सदा सश्रवणीयंमेतत् ॥ ४१॥ आनन्दरामायणमध्यसंस्थं विवाहकांडं परमं हि रम्यम् । शृण्वंति भक्त्या भुवि मानवास्ते लभन्ति कामानखिलान्मनोऽज्ञान् ॥ ४२॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे राज्यवर्णनो नाम नवमः सर्गः ॥ ९॥ विवाहकाण्डस्य सर्वानन्दरामायण सर्वज्ञ ज्ञायतय । पञ्चशताष्ट संख्या श्लोकाश्चाप्युत्थिनाः ॥ १ ॥

जो मनुष्य विवाहकाण्डका श्रवण करते हैं, वे अपना गया हुआ पुत्र, धन व कार्य में निपुण नेहा ज्ञान ॥ २९ ॥ इसका सुननेसे धर्मार्थी धर्मको, धनार्थी धनको, काम कामको और मोक्षार्थी मोक्षको प्राप्त करता है ॥ ३० ॥ जो लोग स्त्रीकी इच्छा रखते हों, उन्हें चाहिये कि निरन्तर इस विवाहकाण्डका पाठ किया करें। इससे उन्हें स्त्री अवश्य प्राप्त होगी ॥ ३१ ॥ अच्छे पतिकी कामना इच्छा रखनेवाली कुमारी यदि भक्तिपूर्वक इस काण्डको सुने तो सुन्दर पति पावेगी ॥ ३२ ॥ जो सम्यक् रूप मनुष्य इस काण्डको पढ़ता या सुनता है सो वह इस जन्ममें स्त्रीके साथ सुख भोगकर स्वर्गमें अप्सराओके साथ विहार करता है ॥ जो सधवा नारी इस काण्डको सुनती है वह कभी पतिवियोगका दुःख नहीं पाती । जो लोग स्त्री चाहते हों वे सत्रह दिनमें इस आवृत्तिके क्रमसे एक वर्ष पर्य्यन्त अनुष्ठान करें ऐसा करनेसे मूढ मानव भी स्त्री प्राप्त कर सकता है ॥ ३३-३५ ॥ उसका क्रम इस तरह है- पहिले दिन एक सर्ग, दूसरे दिन दो सर्ग तीसरे दिन तीन सर्ग इस क्रमसे नवें दिन नौ सर्गोंका पाठ करे। फिर दसवें दिन आठ सर्ग और ग्यारहवें दिन सात सर्ग इस एक-एक घटाता हुआ सत्रह दिनमें पूर्ण करे। विद्वा- नोंने यही अनुष्ठानकी विधि बतलाई है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ अथवा बन पड़े तो पहिले रोज विवाहकाण्डका एक बार पाठ कर जाय, दूसरे रोज दो बार, तीसरे रोज तीन बार, इस रीतिसे बढ़ाता हुआ नवमें दिन नौ बार इस काण्डका पाठ करे और ग्यारहवें रोज सात बार इस विधानसे घटाता हुआ सत्रहवें दिन केवल एक बार पाठ करे ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ इस तरह एक वर्ष तक अनुष्ठान करनेसे वह चन्द्रमाके मुखी, अच्छी नासिका और दिव्य रूपवाली मनोहर स्त्री पाते हैं ॥ ४० ॥ लोगोंको चाहिए कि इस परम पवित्र, आनन्ददायक, द्युतिसुखदायी तथा आनन्द देनेवाल विवाहकाण्डको नित्य पढ़कर ॥ ४१ ॥ आनन्दरामायणके अन्तर्गत इस छरे विवाहकाण्डको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनते हैं वे अपनी सब कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४२ ॥ इति श्रीम- त्काशिनाथचरणकमलार्त्त श्रीमदानन्दरामायण वाङ्मयकार्यं... रामतेजपाण्डेयविरचित ज्योत्स्ना भाषाटीका- सहिते विवाहकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥ इस विवाहकाण्डमें कुल नौ सर्ग हैं और उनमें पाँच सौ दस मा श्लोक कह गये हैं ॥ १ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डं समाप्तम् ।

श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽलंकृतम्

राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्)

प्रथमः सर्गः

( रामसहस्रनाम )

विष्णुदास उवाच

रामदास गुरो प्रोक्तं त्वया पूर्वं ममांतिके । विवाहकाण्डचरमसर्गेऽत्र पातकापहे ॥ १ ॥
रामनामसहस्रेण नारदेन महात्मना । सूर्यलोके सभायां स रामचन्द्रः स्तुतस्त्विति ॥ २ ॥
तत्कीदृशं रामनामसहस्रं मां प्रकाशय । कथं सूतेन कथितं मुनीनामग्रतः पुरा ॥ ३ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक्पृष्टं त्वया शिष्य सावधानेमनाः शृणु । रामनामसहस्रं च सुश्लोकं प्रवदामि ते ॥ ४ ॥
यथा त्वया कृतः प्रश्नः शौनकेन तथा कृतः । सूतः प्राह तदाकर्ण्य शौनक नैमिषे वने ॥ ५ ॥

श्रीसूत उवाच

एकदा सुखमासीनौ पार्वतीपरमेश्वरौ । अन्योन्याश्लिष्टहृद्वाहू लोकरक्षणतत्परौ ॥ ६ ॥
इन्द्रादिलोकपालैश्च सेवितौ च परात्परौ । पार्वती परिपप्रच्छ तदा धर्माननुक्रमात् ॥ ७ ॥

पार्वत्युवाच

मन्नाथ जगतो नाथ सर्वज्ञ परमेश्वर । त्वत्प्रसादान्मया ज्ञातं धर्मशास्त्रमनुत्तमम् ॥ ८ ॥
प्रायश्चित्तं तु पापानां श्रुतं सर्वमशेषतः । ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं वक्तुमर्हसि ॥ ९ ॥


विष्णुदासने कहा—हे गुरो रामदास अभी अभी आप मुझसे कह चुके हैं कि पातकोंको नष्ट करनेवाले विवाहकांडमें नारदने सुलोक रामसहस्रनामक सभायें रामचन्द्रजीकी स्तुति की थी ॥ १ ॥ २ ॥ वह रामसहस्रनाम कैसा है और किस प्रकार सूतजीने मुनियोंके समक्ष उसे प्रकट किया था। सो आप मुझसे कहें ॥ ३ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है, सावधान चित्त होकर सुनो ! मैं तुम्हे सूतका कहा हुआ रामसहस्रनाम सुनाता हूँ । आज जिस तरह तुम मुझसे पूछ रहे हो, उसी तरह शौनकन सूतजीसे पूछा था । उनका प्रश्न सुनकर नैमिषारण्यम सूतजीने शौनकसे कहा—एक समय कैलासमें तत्पर शिव और पार्वती गलबहियाँ डाले हुए आनन्दपूर्वक बैठे थे ॥ ४-६॥ सर्वश्रेष्ठ देवता शिव और पार्वतीकी सेवामें इन्द्रादि लोकपाल उपस्थित थे उस समय शिव-पार्वतीमें कोई धार्मिक चर्चा चल रही थी । समय पाकर पार्वती ने शिवजी से कहा-हे हमारे प्रभु जगत्के प्रभु, सर्वज्ञ एवं परमेश्वर ! आपकी कृपासे मैने समस्त धर्मशास्त्र जान लिया। पापोंका प्रायश्चित्त किस तरह हो सकता है, सो भी सुन चुकी ।

१८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

श्रीमहादेव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत् । सनत्कुमारविघ्नेशसंवादं पापनाशनम् ॥१०॥ उपविष्टं गणाध्यक्षमेकान्ते प्रणिपत्य च । सनत्कुमारः पप्रच्छ सर्वधर्मविदां वरम् ॥११॥

सनत्कुमार उवाच भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वविघ्नविनाशन । द्विजहत्याहरं धर्मं वक्तुमर्हसि मे प्रभो ॥१२॥ विना भवन्तं धर्मस्य वक्ता नास्ति जगत्त्रये ।

श्रीगणेश उवाच साधु पृष्टं त्वया ब्रह्मन्सर्वलोकोपकारकम् ॥१३॥ मया चिरं कृतं कर्म स्मारितं भवताऽनघ पुराऽहं गजरूपेण जातः पर्वतसन्निभः ॥१४॥ रुतो वृक्षान्समुत्पाट्य मुनिहिंसां समारभम् । तदा मया मुनिगणा निहता बहवो बलात् ॥१५॥ हाहाकारो महानासीद्ब्राह्मणानां समन्ततः । तदा ह्यत्याहृतेन चेष्टितः पतितोऽस्म्यहम् ॥१६॥ निःसंज्ञं मृततुल्यं मां पतितं वीक्ष्य मे पिता । अराधयज्जगतामीशं रामं सर्वहृदि स्थितम् ॥१७॥ प्रत्यक्षमकरोद्देवं मद्हेतो रघुनन्दनम् । तदा प्रोवाच भगवान् श्रीरामः पितरं मम ॥१८॥

श्रीराम उवाच प्रसन्नोऽस्मि महादेव किं मां प्रार्थयसे प्रभो दास्यामि यदभीष्टं ते त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥१९॥

श्रीमहादेव उवाच द्विजहत्यासमाविष्टं मम पुत्रमिमं प्रभो । निष्पापं कुरु देवेश यद्यस्ति मयि ते दया ॥२०॥

श्रीगणेश उवाच तथेत्युक्त्वा तदा तेन कृपादृष्ट्याऽहं निरीक्षितः । तत्क्षणाल्लब्धचैतन्यो निर्मलज्ञानबुद्धिदः ॥२१॥ बहुभिर्गद्यपद्यैश्च स्तुत्वा तं प्रणतोऽभवम् ।

अत आप मुझपर कृपा करके ब्रह्महत्यादि महापापोंके निष्कृतिका कोई उपाय बतलाइए। श्रीशिवजी बोले— हे देवि ! मैं तुम्हें अतिशय गुह्य तथा पापनाशक सनत्कुमार और गणपति का सम्वाद सुनाता हूँ ॥ ७-१० ॥ एक समय जब कि गणेशजी एकान्तमे बैठे हुए थे तब सनत्कुमारने जाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा-हे भगवन् ! समस्त धर्मोंको जाननेवाले तथा विघ्नके विनाशक हे प्रभो मुझ ब्रह्महत्याका विनाश करनेवाला कोई कर्म बतलाइए ॥ ११ । १२ ॥ आपके सिवाय तथा लाख्या कोई सा धमका वक्ता मुझे नहीं दीखता । गणपतिने कहा-हे ब्रह्मन् ! तुमने मुझसे बहुत ठीक प्रश्न किया है। इससे सारे संसारका उपकार होगा ॥ १३ ॥ तुमने एक ही बातसे पूर्वमे किये हुए मेरे सब कर्मोका स्मरण दिला दिया है। पूर्वकालमे मैं गजरूपसे संसारमें जन्मा था और पर्वतकी भाँति लम्बा चौड़ा मेरा डील डौल था । १४ । उस समय मैने पहले तो बहुतसे वृक्ष उखाड़े । फिर मुनियोंकी हिंसा आरम्भ कर दी। मैने अपने अपरिमय बलसे कितन ही मुनियोंका बघ कर पापी बन बैठा ॥ १५ । १६ ॥ मेरे होश-हवास ठिकाने न रह तथा एक मृतककी नाईं मेरी आकृति हो गयी । मेरी दशा देखकर मेरे पिताने संसारके महाप्रभु रामकी आराधना की, इससे प्रसन्न होकर रामचन्द्रजी मेरे पिता- के सम्मुख आये और कहने लगे। रामचन्द्रजी बाले हे महादेव ! मै तुम्हारे ऊपर अति प्रसन्न हूँ । बतलाओ, तुम किसलिए इस प्रकार मेरी प्रार्थना कर रहे हो ? तुम्हारा कामना यदि तीन लोकमे दुर्लभ होगा तो भी मै उसे पूर्ण करूँगा ॥ १७-१९ ॥ श्रीशिवजीने कहा-हे प्रभो ! मेरे पुत्र गणेशको ब्रह्महत्या लग गयी है। हे देवेश ! यदि आपकी मुझपर दया हो तो उसे निष्पाप कर दीजिए ॥२०॥ श्रीगणेशजी सनत्कुमारसे कहने लगे-इसप्रकार मेरे पिताकी बात सुनकर रामचन्द्रने अपनी कृपाभरी दृष्टिसे एक बार मेरी ओर देखा। उनके देखते ही मैं चैतन्य हो गया। घेरेमें एक निर्मल ज्ञानका प्रकाश संचार हो गया ॥ २१ ॥ तब बहुतसे गद्य-पद्यों द्वारा मैने भगवान्की

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८३

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८३

श्रीरामचन्द्र उवाच द्विजहत्यामहंमस्य प्रायश्चित्तं वदामि ते ॥ २२ ॥ जप नामसहस्रं मे हत्याकोटिविनाशनम् । इति गुह्यं ददौ रामस्तत्त्वं नामसहस्रकम् ॥२३॥ तस्य त्वग्रहणादेव निष्पापोऽहं तदाभवम् । सदारभ्यास्मि देवानां पूज्योऽहं मुनिसत्तम ॥२४॥ त्वमप्येतदधीयानो राघवस्य महात्मना । नाम्नां सहस्रं लोकेषु प्रख्यापय महामते ॥२५॥

सनत्कुमार उवाच धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि गणाधिप । त्वत्प्रसादान्मयाऽधीतं रामनामसहस्रकम् ॥२६॥

श्रीमहादेव उवाच इति विज्ञाप्य देवेशं परिक्रम्य प्रणम्य च । तदादि सततं जपन्वा स्तोत्रमेतद्वरानने ॥२७॥ अवाप परमां सिद्धिं पुण्यपापविवर्जितः ।

श्रीपार्वत्युवाच श्रोतुमिच्छामि देवेश तदहं सर्वकामदम् ॥ २८ ॥ नाम्नां सहस्रं तां ब्रूहि यद्यस्ति मयि ते दया ।

श्रीमहादेव उवाच अद्य वक्ष्यामि भो देवि रामनामसहस्रकम् । शृणुष्वैकमनाः स्तोत्रं गुह्याद्गुह्यतरं महत् ॥२९॥ ऋषिर्विनायकश्चास्य अनुष्टुप्छन्द उच्यते । परब्रह्मात्मको रामो देवता शुभदर्शने ॥३०॥

ॐअस्य श्रीरामसहस्रनाममालामंत्रस्य विनायक ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीरामो देवता महाविष्णुरिति बीजं गुणभृन्निर्गुणो महानिति शक्ति सच्चिदानन्दविग्रह इति कीलकं श्रीराम-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः

ॐश्रीरामचन्द्राय अंगुष्ठाभ्यां नमः । सीतापतये तर्जनीभ्यां नमः । रघुनाथाय मध्यमाभ्यां नमः । भरताग्रजाय अनामिकाभ्यां नमः । दशरथात्मजाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । हनुमत्प्रभवे करतलकर-पृष्ठाभ्यां नमः । श्रीरामचन्द्राय हृदयाय नमः सीतापतये शिरसे स्वाहा रघुनाथाय शिखायै वषट् । भरताग्रजाय कवचाय हुम् । दशरथात्मजाय नेत्रत्रयाय वौषट् । हनुमत्प्रभवे अस्त्राय फट् ।

स्तुति की और उनके चरणोमे लाट गया । फिर रामचन्द्रजी कहने लगे तुजारो द्विजहत्याके पापसे उद्धार पानेका उपाय मै तुम्हें बतलाता हूँ ॥ २२ ॥ मेरे रामसहस्रनाम का जप करो वह सहस्रों हत्याओंका नाशभी नष्ट कर देता है । ऐसा कहकर रामचन्द्रजीने अपना गुप्त सहस्रनाम मुझे बताया और उसके ग्रहणमात्रसे मेरे पाप नष्ट हो गये । तभीसे हे मुनिसत्तम ! मै देवताओंका भी पूज्य हो गया हूँ ॥ २३ ॥ २४ ॥ तुम भी इसी रामसहस्रनामका पाठ करते हुए संसारमे इसका प्रचार करो । सनत्कुमारने कहा-मैं धन्य हूँ । मुझपर आपकी बड़ी कृपा है । आपकीही दयासे मैने रामसहस्रनाम पा लिया । मै कृतार्थ हो गया । श्रीशिवजीने कहा-इस तरह उस सहस्र-नामको जानकर सनत्कुमारने गणेशजीकी परिक्रमा की, प्रणाम किया और तभीसे नित्य इसका जप करके पुण्य-पापसे विवर्जित होकर वे परम सिद्धिको प्राप्त हुए । पार्वतीजी बोलीं-हे देवेश ! सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाले रामसहस्रनामको मैं भी जानना चाहती हूँ । यदि आपकी मुझपर दया रहती हो तो मुझे बताइए । शिवजी कहने लगे-हे देवि ! मै तुम्हें वह पुनीत सहस्रनाम बतलाता हूँ । तुम भी सावधान मन होकर उस गुह्यातिगुह्य स्तोत्रको सुनो ॥ २५-२९ ॥ इस रामसहस्रनाम मंत्रमय स्तोत्रके ऋषि विनायक हैं और साक्षात् परब्रह्म राम इसके देवता हैं ॥ ३० । 'ॐ अस्य श्रीराम' इस मंत्रसे विनियोग करके 'श्रीरामचन्द्राय' कहकर अंगुष्ठ, 'सीता-पतये' कहकर तर्जनी, 'रघुनाथाय' कहकर मध्यकी अंगुली, 'भरताग्रजाय' कहकर अनामिका, 'दशरथात्मजाय' कहकर कनिष्ठिका, 'हनुमत्प्रभवे' कहकर दोनों करपृष्ठोंका न्यास करे । फिर 'रामचन्द्राय' कहकर हृदय, 'सीतापतये' कहकर शिर, 'रघुनाथाय' कहकर शिखा, 'भरताग्रजाय' से दोनों बाहुमूल, 'दशरथात्मजाय'

३८२आनन्दरामायणे[ सर्गः १

अथ ध्यानम्

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलस्पर्धि नेत्रं प्रसन्नम् ।
रामांकास्तूर्णताक्षमुखकमलमलम्प्रेक्ष्यनेत्रं नीलाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥३१॥

वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्डपे
मध्ये पुष्पकमासने मणिमये वीरासने संस्थितम् ।
अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं
व्याख्यातं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजेच्छ्याम लम् ॥३२॥

सौवर्णेमण्डपे दिव्ये पुष्पके सुविराजिते । मूले कल्पतरोः स्वर्णपीठे सिंहासनेयुते ॥३३॥
मृदुल्लक्ष्णीतरे तत्र जानक्या सह संस्थितम् । रामं नीलोत्पलश्यामं द्विभुजं पीतवाससम् ॥३४॥
स्मितवक्त्रं सुखासीनं पद्मपत्रनिभेक्षणम् । किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः ॥३५॥
आभ्रमानं ज्ञानमुद्राधरं वीरासनन्दितम् । स्पृशन्तं स्तनयोश्च जानक्याः सव्यपाणिना ॥३६॥
वसिष्ठवामदेवाद्यैः सेवितं लक्ष्मणादिभिः । अयोध्यानागरो रम्ये अभिषिक्तं रघूद्वहम् ॥३७॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं रामनामसहस्रकम् । हत्याकोटियुतो वापि मुच्यते नात्र संशयः ॥३८॥
ॐरामः श्रीमान्महाविष्णुर्जिष्णुर्देवहितावहः । तत्त्वं चा तारक ब्रह्म शाश्वतः सर्वसिद्धिदः ॥३९॥
राजीवलोचनः श्रीमांल्लक्ष्मण्यो रघुपूंगवः । रामभद्रः सदाचारो राजेन्द्रो जानकीपतिः ॥४०॥
अग्रगण्यो वरेण्यश्च वरदः परमेश्वरः । जनार्दनो जितमित्रः परार्थैकप्रयोजनः ॥४१॥


से दोनों नेत्र छुए तथा 'हुंफट्स्वाहे' कहकर चुटकी बजाये । अथ ध्यानम् जिनका आजानु बाहु है, जो धनुष-बाण धारण किये हैं, पद्मासन मारकर बैठे हैं, पीत वस्त्र पहने हैं, नवीन कमलदलसे होड़ करनेवाले जिनकी दोनों आँखें हैं, जिनके वामभाग सीताजी बैठी हैं सीता तथा राम दोनों आपसमें एक दूसरेके मुखकी शोभा देखनेमें संलग्न हैं, नवीन मेघके सदृश जिनका रूप है, विविध प्रकारके अलङ्कारोंसे अलंकृत तथा लम्बो लम्बी जटा धारण करनेवाले रामचन्द्रका ध्यान करे ॥३१॥ कल्पवृक्षके नीचे सुवर्णके मध्य एक सुन्दर सुवर्णके मण्डपमें पूर्वनिर्मित महासन, जिसमें अनेक प्रकारकी मणियां जड़ी हैं, उसपर श्रीराम वीरासनसे बैठे हुए हैं। उनके सामने बैठे हनुमान्‌जी मुनियोंको परम सम्बन्ध व्याख्यान कर रहे हैं। भरतादि तीनों भ्राता जिनकी बगल-बगल खड़े हैं। ऐसे श्यामस्वरूप रामका भजन करे ॥३२॥ सुवर्णनिर्मित दिव्य पुष्पक विमान कल्पतरुके नीचे रक्खा है। जिसमे आठ सिंह लगे हैं। जो कोमल और चिकने हैं, ऐसी गद्दीपर सीताके साथ बैठे हुए हैं नीलोत्पल सरीखे जिनके नेत्र हैं दो भुजाएं हैं, पीत वस्त्र है, मुसकुराता हुआ मुख है और वे आनन्दसे बैठे हैं। किरीट, हार, केयूर कुण्डल और कटकादिसे सुशोभित हो रहे हैं। वे एक ओर ज्ञानमुद्रा धारण किये हैं। दूसरी तरफ बायें हाथसे सीताके स्तनोंको छूते हैं। ॥३३-३६॥ वसिष्ठ, वामदेव तथा लक्ष्मणादिक जिनकी सेवामें तत्पर हैं। अयोध्या नगरीमें जिनका राज्यभिषेक हो चुका है। ऐसे रघूद्वह रामचन्द्रजीका ध्यान करके सर्वदा इस रामसहस्रनामका पाठ करना चाहिए। ऐसा करनेसे यदि किसीको करोड़ों हत्यायें भी लगी हैं तो दूर हो जाती हैं इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं करना चाहिए। ॥३७-३८॥ ॥३८॥ अब सहस्रनाम कहते हैं - राम, श्रीमान्, महाविष्णु, जिष्णु (सबको जीतनेवाले), देवहितावह (देवताओंका कल्याण करनेवाले), तत्त्वात्मकस्वरूप तारकब्रह्म, शाश्वत, सर्वसिद्धिद (सब प्रकारकी सिद्धियो-को देनेवाले) ॥३९॥ कमल सरीखे नेत्रवाले, श्रीमान्, रघुपूंगव, धनु, रामभद्र, सदाचार, (पुनीत आचारवाले) राजेन्द्र, जानकीके पति ॥४०॥ सबमें अग्रेसर, वरेण्य (सर्वश्रेष्ठ), वरद (वरदायक)

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८५

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८५


विश्वामित्रप्रियो दाता शत्रुजिच्छत्रुतापनः । सर्वज्ञः सर्ववेदादिः शरण्यो बलिमर्दनः ॥४२॥ ज्ञानमयोऽपरिच्छेद्यो वाग्मी सत्यव्रतः शुचिः । ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञः शरधन्वी प्रतापवान् ॥४३॥ द्युतिमानात्मवान् वीरो जितक्रोधोऽरिमर्दनः । विश्वरूपो विशालाक्षः प्रभुः परिदृढो दृढः ॥४४॥ ईशः खड्गधरः श्रीमान् कौसल्येयोऽनसूयकः । विपुलांसो महोरस्कः परमेष्ठी परायणः ॥४५॥ सत्यव्रतः सत्यसंधो गुरुः परमधार्मिकः । लोकज्ञो लोकवत्त्वा लोकात्मा लोककृद्विभुः ॥४६॥ अनादिर्भगवान् सेव्यो जितमायो रघूद्वहः । रामो दयाकरो दक्षः सर्वज्ञः सर्वपावनः ॥४७॥ ब्रह्मण्यो नीतिमान् गोप्ता सर्वदेवमयो हरिः । सुन्दरः पीतवासाश्च सूत्रकारः पुरातनः ॥४८॥ सौम्यो महर्षिः कोदण्डः सर्वज्ञः सर्वकोविदः । कविः सुग्रीववरदः सर्वपुण्याधिकप्रदः ॥४९॥ भव्यो जिताग्निरिष्वर्गो महोदारोऽघनाशनः । सुकीर्तिरादिपुरुषः कान्तः पुण्यकृतोत्तमः ॥५०॥ अकल्मषश्चतुर्बाहुः सर्वावासो दुरासदः १०० स्मितभाषी निवृत्तात्मा स्मृतिमान् वीर्यवान् प्रभुः ॥५१॥ धीरो दान्तो घनश्यामः सर्वायुधविशारदः । अध्यात्मशामानिलयः सुमना लक्ष्मणाग्रजः ॥५२॥ सर्वतीर्थमयः शूरः सर्वयज्ञफलप्रदः । यज्ञस्वरूपो यज्ञेशो जरामरणवर्जितः ॥५३॥


परमेश्वर, जनार्दन जितमित्र (शत्रुओं को पराजित करनेवाले), परार्थकप्रयातन (परोपकार करना ही जिनका एकमात्र प्रयोजन है)। विश्वामित्रप्रिय दाता शत्रुजिच्छत्रुतापन (शत्रुओं को सतानेवाले), सर्वज्ञ, सर्ववेदादि समस्त वेदोंके आदिकारण। शरण्य, बलिमर्दन बलिको परास्त करनेवाले, ज्ञानमय, परिच्छेद्य वाग्मी (कुशल वक्ता) सत्यव्रत, शुचि, पवित्र, ज्ञानगम्य (ज्ञानद्वारा जानने योग्य), दृढप्रज्ञ (स्थिर बुद्धिकाले), शरधन्वी, प्रतापवान्, आत्मवान् वीर, जितक्रोध (जिन्होंने क्रोधको जीत लिया है), अरिमर्दन (शत्रुओंको नीचा दिखानेवाले) विश्वरूप (संसार ही जिनका स्वरूप है), विशालाक्ष (बड़ी बड़ी आंखवाले), प्रभु समस्त जगत्के ईश्वर) परिदृढ (सतर्क)। ४१-४४ ॥ ईश (सब संसारके स्वामी), खड्गधर (तलवार धारण करनेवाले), श्रीमान् कौसल्येय (कौशल्याके पुत्र), अनसूयक (किसीसे ईर्ष्या न करनेवाले), विपुलांस (जिनके स्कंध चौड़े हैं) महोरस्क (जिनकी विशाल छाती है), परमेष्ठी (जो ब्रह्मस्वरूप हैं), सत्यव्रतपरायण (सत्यवादी), सत्यसंध (सत्यप्रतिज्ञ), गुरु (सबके पूज्य), परम धार्मिक, लोकज्ञ (सब लोकोंके ज्ञाता), लोकवत्ता (सब लोकोंमें वसनेवाले, लोकात्मा (सब लोकोंके आत्मा), लोककृत (लोकोंके रचयिता, विभु (सर्वव्यापी)। ४५ । ४६ । अनादि (जिनका आदि नहीं है), भगवान् (सर्वसम्पत्तिशाली), सेव्य (सेवा योग्य), जितमाय (मायाका जीतनेवाले), रघूद्वह (रघुवंशके उजागरकर्ता), राम दयाकर, दयाके खानिस्वरूप, दक्ष (सब कार्योंमे निपुण), सर्वज्ञ, सर्वपावन (सबको पुनीत करनेवाले), ब्रह्मण्य (ब्राह्मणभक्त) नीतिमान् गोप्ता (सबका रक्षक), सर्वदेवमय, हरि, सुन्दर, पीतवासा (पीले वस्त्र धारण करनेवाले), पुरातन सूत्रकार (सर्वप्राचीन सूत्रकार अर्थात् सूत्ररूपमें ग्रंथोंके रचयिता), पुरातन (सबमे प्राचीन) ॥ ४७ । ४८ । सौम्य (जिनका सरल स्वभाव है), महर्षि, कोदण्ड (धनुर्धर), सर्वज्ञ, सर्वकोविद (सब विषयोंमें पूर्ण पण्डित, कवि, सुग्रीववरद (सुग्रीवको अभयवर देनेवाले), सर्वपुण्याधिकप्रद (सब पुण्योंसे भी अधिक फल देनेवाले) ॥ ४९, भव्य जिताग्निरिष्वर्गो (जिन्होंने अपने बलसे शत्रुके संघ-उत्साहादि छः वर्गोंको जीत लिया है), महोदार (जो सबसे उदार हैं), अघनाशन (पापका नाश करनेवाले, सुकीर्ति (जिनकी सुन्दर कीर्ति है), आदिपुरुष (जो सबके आदि पुरुष हैं), कान्त (सर्वप्रिय), पुण्यकृतोत्तम (पवित्रविचारसम्पन्न) अकल्मष (पापरहित) चतुर्बाहु (चतुर्भुज), सर्वावास (सबके निवासस्थान, दुरासद (बड़ी कठिनाईसे प्राप्त १०० स्मितभाषी (मुसकुराते हुए बातें करनेवाले), निवृत्तात्मा, जिनकी आत्मा स्वतन्त्र है, वा स्मृतिमान, वीर्यवान् और सबके प्रभु हैं। धीर, दान्त (उदारप्रकृति), घनश्याम (मेघकी नई श्यामस्वरूप), सर्वायुधविशारद (सब शस्त्रास्त्रोंमे निपुण, अध्यात्मशामनिलय (अध्यात्मशास्त्रोंके निवास), सुमना (सुन्दर चित्तवाले), लक्ष्मणाग्रज (लक्ष्मणके बड़े भ्राता), ॥ ५०-५२ ॥ तीर्थमय, शूर (महासाहस योद्धा), सर्वयज्ञफलप्रद (सब यज्ञोंके फलदाता) यज्ञस्वरूप

३८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजिच्छत्रुतापनः । शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता परमात्मा परात्परः ॥ ५५ ॥ प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः पूर्णः परपुरंजयः । अनन्तरूपिरानन्दी धनुर्वेदी धनुर्धरः ॥ ५६ ॥ गुणकरो गुणश्रेष्ठः सच्चिदानन्दविग्रहः । आप्तवाद्यो महाकायो विश्वकर्मा विशारदः ५७॥ विनीतात्मा वीतरागस्तपस्वीशो जनेश्वरः । कल्याणः प्रकृतिः कल्पः सर्वज्ञः सर्वकामदः । ५७.। अक्षयः पुरुषः साक्षी केशवः पुरुषोत्तमः । लोकाध्यक्षो महाकार्यो विभीषणवरप्रदः ॥ ५८ । आनन्दविग्रहो ज्योतिर्हनुमत्प्रभुरव्ययः, भ्राजिष्णुः महनो भोक्ता मन्त्रवादी बहुश्रुतः । ५९ । सुप्रदः कारणं कर्ता भवबन्धनविमोचनः । देवचूड़ामणिर्नेता ब्राह्मण्यो ब्रह्मवर्धनः । ६० ॥ संसारतारको रामः सर्वदुःखविमोक्षकत् । विद्वत्तमो विश्वकर्ता विश्वकृद्विश्वकर्म च ॥ ६१ : नित्यो नियतकल्याणः सर्वोपद्रवनाशकत् । काकुत्स्थः पुण्डरीकाक्षो विश्वामित्रभयापहः । ६२ । मारीचमथनो रामो विराधवधपण्डितः । दुःस्वप्ननाशनो रम्य किरीटी त्रिदशाधिपः ॥ ६३ ॥ महाधनुर्महाकायो भीमो भीमपराक्रमः । तत्त्वस्वरूपस्तत्त्वज्ञस्तत्त्ववादी सुविक्रमः । ६४ भूतात्मा भूतकृत्स्वामी कालज्ञानी महाप्रभुः । अनिर्विष्णो गुणग्रामो निष्कलङ्कः कलङ्कहा । ६५ । स्वभावभद्रः शत्रुघ्नः केशवः स्थाणुरीश्वरः । भूतादिः शंभुरादित्यः सर्वविद्ः शाश्वतो ध्रुवः । ६६ । कवची कुण्डली चक्री खड्गी भक्तजनप्रियः । अमर्त्युर्धर्म्मगदितः सर्वजिन्मर्वगोचरः । ६७ । अनुत्तमोऽप्रमेयात्मा सर्वात्मा गुणसागरः २००, समः समात्मा समगो जटामुकुटमण्डितः । ६८ । अजेयः सर्वभूतात्मा विष्वक्सेनो महातपाः । लोकाध्यक्षो महाबाहुःस्मृतो वरदश्चितमः । ६९ ।

। यज्ञके मूर्ति रूप ), यज्ञेश ( यज्ञके स्वामी ), जरमरणवर्जित ( बुढ़ापा और मृत्यु दोनोंस रहित ), वर्णाश्रमगुरु ( वर्ण और आश्रमके गुरु ), शत्रुजित् ( शत्रुओंको जीतनेवाले), पुरुषोत्तम ( सब पुरुषोंमें श्रेष्ठ ), शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता ( विविध शिवलिङ्गोंके संस्थापक ), परमात्मा, परात्पर प्रमाणभूत विश्वके प्रमाणस्वरूप ), दुर्ज्ञेय बड़े कठिनाईसे जानने योग्य ), पूर्ण, परपुरञ्जय ( शत्रुओका नगर जीतनेवा... अनन्तरूपि ( अपारदृष्टि ), आनन्द, धनुर्वेदके ज्ञाता, धन्धारि गुणकर, गुणाक भण्डार ), गुणश्रेष्ठ ( सब गुणोंमें श्रेष्ठ ), सच्चिदानन्दविग्रह ( सत चित् आनन्द इन तीनोंस जिनका शरीर बना है ), आप्तवाद्य ( सबोंके वन्दनीय ), महाकाय, विश्वकर्मा विशारद । ५३ ५६ ॥ विनीत आन्तरवाल, वीतराग ( रागद्वेषशून्य ), तपस्वीश ( तपस्वियोंके स्वामी ), जनेश्वर, कल्याण ( कल्याणस्वरूप ), प्रकृति सदा प्रसन्न ), कल्प, स्थिति तथा प्रलयकालके अधिपति ), सर्वज्ञ, सर्वकामद अक्षय, पुरुष, साक्षी केशव, पुरुषोत्तम, लोकाध्यक्ष, महाकार्य, विभीषणवरप्रद । ५७ । ५८ आनन्दविग्रह आनन्द रूप ही ), ज्योतिस्वरूप, हनुमान्के स्वामी, अविनाशी, भ्राजिष्णु ( दीप्तिसम्पन्न ), सहनशील, भोक्ता, मन्त्रके बहुश्रुत । ५९ ॥ सुखदाता, कारणस्वरूप, कर्ता, भवबन्धनसे छुड़ानेवाले, देवताओंके मुकुट, ब्राह्मणभक्त ब्राह्मणके बढ़ानेवाले ॥ ६० ॥ संसारसागरसे तारनेवाले, सब दुःखसे छुड़ानेवाले, अतिशय विद्वान्, विश्वरचयिता, विश्वकर्ता, विश्वके कत्तृत्व रूपस्वरूप ॥ ६१ , नित्य कल्याणतत्पर, सर्वबाधाविनाशक, काकुत्स्थ, कमलनयन, विश्वामित्रभयहारी । ६२ । मारीचहन्ता, राम, विराधवधमें निपुण, दुःस्वप्नविद्वारक, रमणीक, किरीटधारी, देवाधिपति ॥ ६३ ॥ विशाल धनुष धारण करनेवाले विशालकाय, भयानक भयानक पराक्रम-सम्पन्न, तत्त्वाक मूर्तरूप, तत्त्वोंके ज्ञाता तत्त्वविषयक वक्ता, असाधारण पराक्रमी ॥ ६४ ॥ प्राणमात्रके सखा सबके स्वामी, समयके पारखी, विशालभारोद्धारी, सदा प्रसन्न, गुणधाम निष्कलंक, कलंकनाशक ॥ ६५ ॥ स्वभावतः कल्याणकारी, शत्रुनाशक, केशव, चिरस्थायी, ईश्वर, प्राणियोंके आदि शम्भु अदिति-तनय स्वर्गी, नित्य, अटल ॥ ६६ ॥ कवचधारी, कुण्डलधारी चक्रधारी, खड्गधारी, भक्तजनके प्रिय, अमर, भक्तके सेवक विजेता, सर्वदर्शी ॥ ६७ ॥ सर्वोत्तम, अप्रमेयात्मा सर्वात्मा, गुणसागर २०० । सदा सम, प्रकृति, समात्मा, समगामी, जटामुकुटविमण्डित । ६८ ॥ अजय, सर्वभूतात्मा, विष्वक्सेन महातपा,

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) १८७

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) १८७


सहिष्णुः सद्गतिः शास्ता विश्वयोनिर्दिनद्युतिः । अनीशः अजितः प्रांशुरुपेन्द्रो वामनो बलिः ॥७०॥ धनुर्वेदो विधाता च ब्रह्मा विष्णुश्च शङ्करः । हंसो मरीचिर्गोविन्दो रत्नगर्भो महद्युतिः ॥ ७१ । व्यासो वाचस्पतिः सर्वदर्पिदानवमर्दनः । जानकाश्रयभः श्लाघ्यः प्रकटः प्रीतिवर्धनः ॥७२॥ सम्भवोऽतीन्द्रियो वेद्यो निर्देश्यो नग्नवान्प्रभुः । मदनो मन्मथो वश्या विश्वरूपो निरञ्जनः ॥७३॥ नारायणोऽग्रणी साधुर्जटायुप्राणिवर्द्धनः । नैकरूपो जगन्नाथः गुरुकार्यहरः प्रभुः ॥७४। जितक्रोधो जितारातिः प्लवगाधिपराज्यदः । वसुदः सुभुजो नैक्रमायो भव्यः प्रमोदनः ॥७५। चण्डांशुः सिद्धिदः कल्पः शरणागतवत्सलः । अगादो गगहर्त्ता च मन्त्रज्ञो मन्त्रभावनः ॥७६॥ सौमित्रिवत्सलो धूर्यो व्यक्तऽव्यक्तस्वरूपधृक् । वसिष्ठो ग्रामणीः श्रीमाननुकूलः प्रियरतः ॥७७॥ अनुत्कः मान्त्रिको धीरः शरासनविशारदः । ज्येष्ठः सर्वगुणोपेतः शक्तिमान्त्राटकांतकः ॥७८॥ वैकुण्ठः प्राणिनां प्राणः कमठः कमळाधिपः । गोवर्धनधरो मत्स्यरूपः कारुण्यसागरः ॥७९॥ कुम्भकर्णप्रभेत्ता च गोपिगोपालनन्दनः ३०० । मायावी व्यापको व्यापी रेणुकेयबलापहः ॥८०। पिनाकभञ्जनो वन्द्यः समर्थो गरुडध्वजः । लोकत्रयाश्रयः लोकभर्त्ताच भरताग्रज ॥८१॥ श्रीधरः संप्रतिर्लोकाध्यक्षो नारायणो विभुः । मनोरूपो मनोजेगी पूर्णः पुरुषपुंगवः । ८२॥ यदुश्रेष्ठो यदुपतिर्मुनामयः मुविक्रमः । तेजाधरो घराधरश्चतुर्मूर्तिर्महानिधिः । ८३ । बाणप्रमथनो वद्यः शांतो भरतवंदितः । शब्दातीतः समात्मा कमलाङ्गः प्रजागरः ।८४। लोकार्थगमः शशायी धीरः स्थितिलयात्मकः । आग्मज्योतिर्गदात्मा सहस्रार्च्चिः सहस्रपात् ॥८५। अमृतांशुर्महीगर्भो निर्व्वत्तिरप्यस्पृहः । त्रिकालज्ञो मुनिः साक्षी विहायसगतिः कृतः ॥८६। पर्जन्यः कुमुदो भूतावासः कमलासनः । आत्मप्रत्ययः श्रोवाशो वाग्मी लक्ष्मणग्रजः ॥८७॥ लोकाभिरामो लोकार्त्तिमर्त्तः सेवर्काप्रियः । मनातनतमा मध्व्यामलः राक्षसातकृ ॥८८।


स्माकक भावी, भगवान् अगम्य, वरदीय ने । ९६ ॥ सहिष्णु, सद्गति, शासक, विश्वयोनि परमकन्ति-सम्पन्न अनीश (इन्द्रसे भ्रष्ट), महाबली, उपेन्द्र, वामन, बलि, ॥ ७० ॥ धनुर्वेदविधाता, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर हंस, मरीचि, गोविन्द रत्नगर्भ महा तेजस्वी ॥ ७१ ॥ व्यास, बृहस्पति, सभी अभिमानी असुरोंके घातक, जानक आश्रम, श्लाघ्य प्रकट, प्रीतिवर्धन ॥ ७२ ॥ संभव, अतीन्द्रिय, वेद्य, निर्देश, ज्ञानवान्‌के स्वाभा मदन मन्मथ, सर्वव्यापी विश्वरूप निरञ्जन ॥ ७३ ॥ नारायण, अग्रणी, साधु जटायुके प्रीतिवर्धन, अनेकरूप, जगन्नाथ देवकार्यसाधक, प्रभु ॥ ७४ ॥ जितक्रोध, शत्रुविजेता, सुग्रीवराज्यदायक, वसुदाता, बहुभुज विविधमायाधारी, भव्य प्रमादन ॥ ७५ । चण्डांशु, सिद्धिदायक, कल्प, शरणागत-वत्सल, अगाद रोगहर्त्ता मन्त्रज्ञ मंत्रभावन। ७६ । लक्ष्मणप्रिय, धुर व्यक्त-अव्यक्तस्वरूपधारी, वसिष्ठ, ग्रामीण, धीमान्, अनुकूल, प्रियरत । ७७ । अनुत्सुक मांत्रिक धीर, धनुर्विद्यामें निपुण, श्रेष्ठ, सर्वगुणसम्पन्न, शक्तिमान्, ताड़काके घातक। ७८ । वैकुण्ठ, प्राणियोंके प्राण, कमठ, कमलापति, गोवर्धनधारी, मत्स्य-रूपधारी, करुणासागर ॥ ७९ ॥ कुम्भकर्णके नाशक, गोपीगोपालनन्दन ३००, मायावी, व्यापक , व्यापी, रेणुकेय (परशुराम)के बलनाशक ॥ ८० धनुर्भञ्जक, वंद्य समर्थ, गरुडध्वज, तीनों लोकोंके आश्रय, लोकभर्त्ता भरतके बड़े भ्राता । ८१ ॥ श्रीधर, सद्गति, लोकाध्यक्ष नारायण, विभु, मनोरूपों, मनोवेगी, पूर्ण, पुरुष पुंगव । ८२ । यदुश्रेष्ठ यदुपति, मूनामय, मुविक्रम, तेजाधर, घराधर, चतुर्मूर्ति, महानिधि ॥ ८३ ॥ बाणप्रमथन वद्य अन्त, भरतवन्दित शब्दातीत, सर्वात्मा, कमलांग, प्रजागर ॥ ८४ । लोकौर्थगामी, शेषशायी धीर स्थितिलय, अमल, आत्मज्योति, अदीनात्मा, सहस्रार्चि, सहस्रचरण । ८५ । अमृतांशु, महीगर्भ, विप्रभक, स्पृहरहित, त्रिकालज्ञ मुनि साक्षी, विहायसगति, कृतः ॥ ८६ ॥ पर्जन्य, कुमुद भूतावास, कमलासन आत्मसंवद्या, आवास, बोरहा, लक्ष्मणाग्रज ॥ ८७ ॥ लोकाभिराम, लोका-

३८८आनन्दरामायणे[ सर्गः १

दिव्यायोधधरः श्रीमानप्रमेयो जितेन्द्रियः । भूदेववंद्यो जनकप्रियकृत्प्रपितामहः ॥ ८९ ॥
उत्तमः सात्विकः सत्यः सत्यसन्धस्त्रिविक्रमः । सुवृत्तः सुगमः सूक्ष्मः सुघोषः सुहृदः सुहृत् ॥ ९० ॥
दामोदरोऽच्युतः शार्ङ्गी वामनो मधुराधिपः । देवकीनन्दनः शौरि शूरः कैटभमर्दनः ॥ ९१ ॥
सप्ततालप्रभेत्ता च मित्रवंशप्रवर्धनः । कालस्वरूपी कालात्मा कालः कल्याणदः ४०० कलिः ॥ ९२ ॥
संवत्सरो ऋतुः पक्षो ह्ययनं दिवमो युगः । स्तव्यो विविक्तो निर्लेपः सर्वव्यापी निराकुलः ॥ ९३ ॥
अनादिनिधनः सर्वलोकपूज्यो निरामयः रसो रसज्ञः सारज्ञो लोकसारो रसात्मकः ॥ ९४ ॥
सर्वदुःखातिगो विद्याराशिः परमगोचरः शेषो विशेषो विगतकल्मषो रघुपूङ्गवः ॥ ९५ ॥
वर्णश्रेष्ठो वर्णभाव्यो वर्णो वर्णगुणोज्ज्वलः कर्मसाक्षी गुणश्रेष्ठो देवः सुरवरप्रदः ॥ ९६ ॥
देवाधिदेवो देवर्षिदेवतासुरनमस्कृतः । सर्वदेवमयश्चक्री शार्ङ्गपाणी रघूत्तमः ॥ ९७ ॥
मनोबुद्धिग्हंकारः प्रकृतिः पुरुषोऽव्ययः । न्यायो न्यायी नयी श्रीमान् नयो नभश्चरो ध्रुव ॥ ९८ ।
लक्ष्मीविश्वम्भरो भर्ता देवेन्द्रो बलिमर्दनः । बाणारिमर्दनो यज्वाऽनुत्तमो मुनिसेवितः ॥ ९९ ॥
देवाग्रणीः शिवध्यानतत्परः परमः परः सामगेयः प्रियः शूरः पूर्णकीर्तिः सुलोचनः ॥ १०० ॥
अव्यक्तलक्षणो व्यक्तो दशस्याद्रिपकेसरी कलानिधिः कलानाथः कमलानन्दवर्धनः ॥ १०१ ॥
पुण्यः पुण्याधिकः पूर्णः पूर्वः पूरयिता रविः जटिल कल्मषघ्नोऽप्रभजनोऽविभावसुः ॥ १०२ ॥
जयी जितारिः सर्वादिः शमगो भवभञ्जनः । अलङ्करिष्णुरचलो रोचिष्णुर्विक्रमोत्तमः ॥ १०३ ॥
आशुः शब्दपतिः शब्दगोचरो रजनो लघुः । निःशब्दपुरुषो माया स्थूलः सूक्ष्मो ५०० विलक्षणः ॥
आत्मयोनिरयोनिञ्च सप्तजिह्वः सहस्रपात् । सनातनतमः साध्वी पेशलो विजितांबरः ॥ १०५ ॥
शक्तिमान् शस्त्रभृन्नाधो गदाधररथांगभृत् । निरीहो निर्विकल्पश्च चिद्रूपो वीतसाध्वसः । १०६ ॥
सनातनः सहस्राक्षः शतसूर्यनभप्रभः इक्ष्वाकुवंशवर्धनः कठिनो द्रुम एव च ॥ १०७ ॥
सूर्य्यो ग्रहपतिः श्रीमान् समर्थोऽनर्थनाशनः अधर्मशत्रु रोधनः पुरुहूतः पुरस्तुतः ॥ १०८ ॥


रिमर्दन, सर्वप्रिय, सनातनतम, मेघश्यामल, राक्षसार्थक ॥ ८८ ।, दिव्यायुधधर, श्रीमान्, अप्रमेय, जितेन्द्रिय, विप्रवंद्य, पिताके प्रियकर्ता, प्रपितामह ॥ ८९ । उत्तम सात्त्विक सत्य, सत्यसन्ध, त्रिविक्रम, सुवृत्त, सुगम, सूक्ष्म सुघोष, सुहृद, सुहृत् ॥ ९० ॥ दामोदर, अच्युत शार्ङ्गी, वामन मधुराधिपति, देवकीनन्दन, वासुदेव, शूर, कटभमदन ॥ ९१ ॥ सप्ततालप्रभेत्ता, मित्रवंशवर्धन, कालस्वरूपी, कालात्मा, काल, कल्याणद ४०० कलि, ॥ ९२ । संवत्सर, ऋतु, पक्ष, अयन, युग, स्तव्य विविक्त, निर्लेप, सर्वव्यापी, निराकुल ॥ ९३ ॥ अनादिनिधन, सर्वलोकपूज्य, निरामय, रस, रसज्ञ, सारज्ञ, लोकसार, रसात्मक ॥ ९४ ॥ सर्वदुःखातिग, विद्याराशि, परमगोचर, शेष, विशेष, विगतकल्मष, रघुपूङ्गव, ॥ ९५ ॥ वर्णश्रेष्ठ, वर्णभाव्य, वर्ण, वर्णगुणोज्ज्वल कर्मसाक्षी, गुणश्रेष्ठ, देव, सुरवरप्रद । ९६ ॥ देवाधिदेव देवर्षि देवामुरनमस्कृत सर्वदेवमय, चक्री, शार्ङ्गपाणि, रघूत्तम ॥ ९७ । मन बुद्धि अहंकार प्रकृति, पुरुष अव्यय, न्याय न्यायी नयी, श्रीमान्, नय, नभश्चर, ध्रुव, ॥ ९८ । लक्ष्मी-विश्वम्भर, भर्ता, देवेन्द्र, बलिमर्दन बाणारिमर्दन, यज्वा उत्तम मुनिसेवित ॥ ९९ ॥ देवाग्रणी, शिवध्यानतत्पर, दग्म, पर, सामगेय प्रिय, शूर पूर्णकीर्ति, सुलोचन । १०० ॥ अव्यक्तलक्षण, व्यक्त, दशश्याद्रिपकेसरी, कलानिधि कलानाथ कमलानन्दवर्धन । १०१ ॥ पुण्याधिक पूर्ण पूरयिता, रवि, जटिल, कल्मषोंको ध्वंस करनेवाले, अग्नि ॥ १०२ ॥ जयी, जितारि, सर्वादि, शमन भवभञ्जन, अलङ्करिष्णु अचल, रोचिष्णु विक्रमोत्तम ॥ १०३ ॥ आशु शब्दपति, शब्दगोचर, रजन, लघु, निःशब्द, पुरुष, मायो, स्थूल, सूक्ष्म ५०० विलक्षण ,१०४॥ आत्मयोनि, अयोनि, सप्तजिह्व, सहस्रपात् सनातनतम, साध्वी, पेशल, विजिताम्बर । १०५ । शक्तिमान् शस्त्रभृत्, नाथ, गदाधर, रथाङ्गभृत्, निरीह, निर्विकल्प, चिद्रूप, वीतसाध्वस ॥ १०६ ॥ सनातन

सर्गः १ ] गायत्रीकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८९


अन्नमयो बृहद्धर्मा धर्मधेनुर्धनेन्दगमः । हिरण्यगर्भाऽपरोविद्वान सुकलाव सुविक्रमः ॥ १०९ ॥
त्रिवृज्जातः श्रीमान् भवानीपितृकृद्वशी । नरो नारायणः श्यामः कपर्दी नीललोहितः ॥ ११०॥
रुद्रः पशुपति स्थाणुर्विश्वामित्रो दिनेश्वरः । मातामहो मातरिश्वा विरिश्चिविश्रवश्रवा ॥ १११॥
अक्षोभ्यः सर्वभूतानां चण्डः मन्थरगक्षकः । बालिखिल्यो महाकल्पः कल्पवृक्षः कलाधरः ॥ ११२॥
निदाघस्तपनो मेघः शुकः पत्रवलापहः । वसुश्रवाः कृकवाकुः प्रसन्नो विश्वभोजनः ॥ ११३॥
रामो नीलोत्पलश्यामो ज्ञानस्कन्दो महाद्युतिः । कवन्ध्यमथनो दिव्यः कम्बुग्रीवः शिवप्रियः ॥ ११४॥
सुखो नीलः मुनिष्पन्नः मूलमः शिशिरात्मकः । अमसृष्टीऽतिथिः शूरः प्रमाथा पापनाशकः ॥ ११५॥
पवित्रपादः पार्वार्णिमणिपूरो नभोगतिः । उत्तार्णो दुर्लभोदुष्टा दुर्धर्षो दुःसहो बलः ६००॥११६॥
अमृतेशोऽमृतवपुर्धर्मी धर्मः कृपाकरः । भगो विश्वस्त्वानादित्ये योगाचार्यो दिवसपतिः॥११७॥
उदारकीर्तिरुद्योगी वाङ्मयः सदनन्वयः । नक्षत्रमत्री नाकेशः स्वाधिष्ठानः षडाश्रयः ॥११८॥
चतुर्वर्गफलं वर्णेशस्त्रितयफलं निधिः । निधानगर्भो निर्व्याजो निरीशो व्यक्त्तवर्द्धनः ॥११९॥
श्रावलम्बः शिवारम्भः शान्तो भद्रः समंत्रमः । भूताराः भृकुटनिर्भीषणो भूतवाहनः ॥१२०॥
अकायो भक्तकायस्थः कलन्नानी महापटुः । परार्द्धवृत्तिरखलो विविक्तः श्रुतिसागरः ॥१२१॥
स्वभावभद्रो मध्यस्थः समाशय्यननाशनः । वेद्यो वैद्यो वियद्धोता सर्वावगुणनाशकः ।१२२॥
सुरेन्द्रः कारणं कर्मकरः कर्मी ह्यरीक्षजः । धैर्याज्यश्रुर्यो धात्रात्मा मकल्पः क्षत्रेशपतिः ॥१२३॥
परमार्थगुहर्तृष्टिः सुविश्राभ्रितवरबलः । विष्णुर्जिष्णुर्विधुर्यज्ञो यज्ञेशो यज्ञपालकः ॥१२४॥
प्रभुविष्णुर्यज्ञिष्ठश्च लोकान्मा लोकपालकः । केशवः केशिहा काव्यः कविः कारणकारणम् । १२५॥
कालकर्ता कालशयो वासुदेवः पुरूहुतः । आदिकर्ता वराहश्च वामनो मधुसूदनः ॥ १२६॥
नारायणो नरो हंसो विष्पक्येनो जनार्दनः । विश्वकर्ता महायज्ञा ज्योतिष्मान्पुरुषोत्तमः ७००॥१२७


सप्तमाक्ष, शतमूर्ति, धनप्रद, दृष्टादृष्टोपशयनात, कठिन द्वय ॥ १०७ ॥ सूर्य, हंसपति श्रीमान् अभयं, अनर्थ-
नाशन अधर्मशत्रु, रहोरत्न, गुह्यरत्न गच्छत। १०८ । ब्रह्मधर्म, बृहद्धर्म, धर्मधेनु, धनेन्द्रगम, हिरण्यगर्भ,
अपरोविद्वान, सुकलाव, सुविक्रम ॥ १०९ । त्रिपुज्जातः, श्रीमान्, भवानीपितृकृत, वशी, नर, नारायण, श्याम,
कपर्दी, नीललोहित, ॥ ११० । रुद्र, पशुपति, स्थाणु, विश्वामित्र, दिनेश्वर मातामह, मातरिश्वा, विरिश्चि,
विश्रवश्रवा ॥ १११ । अक्षोभ्य, चण्ड, मन्थरगक्षक, बालखिल्य, महाकल्प, कल्पवृक्ष, कलाधर ॥ ११२ ॥
निदाघ, तपन, मेघ, शुक, पत्रवलापहारी, वसुश्रवा, कृकवाकु, प्रसन्न, विश्वभोजन । ११३ ॥ राम, नीलो-
त्पलश्याम, ज्ञानस्कन्द, महाद्युति, कवन्धमथन, दिव्य, कम्बुग्रीव, शिवप्रिय, ॥ ११४ ॥ मुखा, नील, मुनिष्पन्न,
मूलभ, शिशिरात्मक, अमसृष्ट, अतिथि, शूर प्रमाथी पापनाशकारी । ११५ ॥ पवित्रपाद पार्वारि, मणि-
पूर, नभोगति, उत्तारण, दुर्लभो, दुष्टह, दुःसह, बल ६००... ११६ ॥ अमृतेश, अमृतवपु, धर्मी, कृपाकर, भग,
विश्वस्वान्, आदित्य, योगाचार्य, दिवसपति । ११७ ॥ उदारकीर्ति, उद्योगी, वाङ्मय, सदनन्वय, नक्षत्र-
माला, नाकेश, स्वाधिष्ठान, षडाश्रय ॥ ११८ ॥ चतुर्वर्गफल, वर्णेशत्रितयफल, निधि, निधानगर्भ निर्व्याज,
निरीश व्यक्तवर्द्धन । ११९ ॥ श्रीलम्ब, शिवारम्भ, शान्त, भद्र, समंत्रम, भूतारी भूरि, भूतवाहन । १२०॥
अकाय, भक्तकायस्थ, कलन्तानी, महापटु, परार्द्धवृत्ति, अखल, विविक्त, श्रुतिसागर । १२१ स्वभावभद्र,
मध्यस्थ, समाशय्यनाशन, वेद्य वैद्य, वियद्धोता, सर्वावगुणनाशक ॥ १२२ । सुरेन्द्र, कारण, कर्मकर,
कर्मी, अरीक्षज, धैर्य, धैयार्जु धात्रात्म संकल्प, क्षत्रेशपति । १२३ ॥ परमार्थगुह, दृष्टि, सुविश्राभ्रितवरबल,
विष्णु जिष्णु विधु, यज्ञ यज्ञेश यज्ञपालक ॥ १२४ प्रभु विष्णु प्रसिद्ध लोकान्मा, लोकपालक, केशव,
केशिहा काव्य, कवि, कारणकारण । १२५॥ कालकर्ता कालशय, वासुदेव, पुरुहूत, आदिकर्ता, वराह,
वामन, मधुसूदन ॥ १२६ ॥ नारायण, नर, हंस, विष्यक्सेन जनार्दन विश्वकर्ता, महायज्ञ, ज्योतिष्मान्,

३९० आनन्दरामायणं [ सर्गः १

वैकुण्ठः पुण्डरीकाक्षः कृष्णः सूर्यः सुरार्चितः । नारसिंहो महाभीमो वज्रदंष्ट्रो नखायुधः ॥१२८॥ आदिदेवो जगत्कर्ता योगीशो गरुड़ध्वजः । गोविन्दो गोपतिर्गोप्ता भूपतिर्भुवनेश्वरः ॥१२९॥ पद्मनाभो हृषीकेशो धाता दामोदरः प्रभुः । त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशो महेशः प्रीतिवर्धनः ॥१३०॥ संन्यासी शास्त्रशास्त्रज्ञो मन्दरो गिरिशो नतः । वासनो दुष्टदमनो गोविन्दो गोपवल्लभः ॥१३१॥ भक्तप्रियोऽच्युतः सत्यः सत्यकीर्तिधृतिःस्मृतिः। कारुण्यः करणो व्यासः पापहा शुचिवर्द्धनः ॥१३२॥ बदरीनिलयः शान्तस्तपस्वी वैद्युतः प्रभुः । भूतवासो महावासा श्रीनिवासः श्रियः पतिः ॥१३३॥ तपोवासो मुदावासः सत्यवासः सनातनः । पुरुषः पुष्करः पुण्यः पुष्कराक्षो महेश्वरः ॥१३४॥ पूर्णमूर्त्तिः पुगणज्ञः पुण्यदः प्रीतिवर्धनः पूर्णरूपः कालचक्रप्रवर्तनसमाहितः ॥१३५॥ नारायणः परं ज्योतिः परमात्मा सदाशिवः । शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी लाङ्गली मुसली हली ॥१३६॥ किरीटी कुण्डली हारी मेखली कवची ध्वजी । योद्धा जेता महावीर्यः शत्रुघ्नः शत्रुतापनः ॥१३७॥ शास्ता शास्त्रकरः शास्त्रं शङ्करः शङ्करस्मृतः । सख्या सात्त्विकः स्वामी सामवेदप्रियः समः ८००॥ पवनः सहितः शक्तिः सम्पूर्णाङ्गः समृद्धिमान् । स्वर्गदः कामदः श्रीदः कीर्तिदः कीर्तिदायकः ॥१३९॥ मोक्षदः पुण्डरीकाक्षः क्षीराब्धिकृतकेतनः । सर्वात्मा सर्वलोकेशः प्रेरकः पापनाशनः ॥१४०॥ वैकुण्ठः पुण्डरीकाक्षः सर्वदेवनमस्कृतः । सर्वव्यापी जगन्नाथः सर्वलोकमहेश्वरः ॥१४१॥ सर्गस्थित्यन्तकृद्देवः सर्वलोकसुखावहः । अक्षयः शाश्वतोऽनन्तः क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥१४२॥ निर्लेपो निर्गुणः सूक्ष्मो निर्विकारो निरञ्जनः । सर्वोपाधिविनिर्मुक्तः सत्तामात्रव्यवस्थितः ॥१४३॥ अविकारी विभुर्नित्यः परमात्मा सनातनः । अचलो निश्चलो व्यापी नित्यतृप्तो निराश्रयः ॥१४४॥ श्यामो युवा लोहिताक्षो दीप्त्या शोभितभाषणः । आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥१४५॥ सत्त्ववान् गुणसंपन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा । कालात्मा भगवान् कालः कालचक्रप्रवर्तकः ॥१४६॥

पुरुषोत्तम ७०० । १२० । वैकुण्ठ, पुण्डरीकाक्ष, कृष्ण, सूर्य, सुरार्चित, नारसिंह, महाभीम, वज्रदंष्ट्र, नखायुध ॥ १२८ ॥ आदिदेव, जगत्कर्ता, योगीश, गरुड़ध्वज, गोविन्द, गोपति, गोप्ता, भूपति, भुवनेश्वर ॥ १२९ ॥ पद्मनाभ, हृषीकेश, धाता, दामोदर, प्रभु, त्रिविक्रम, त्रिलोकेश, महेश, प्रीतिवर्धन ॥ १३० ॥ संन्यासी, शास्त्रशास्त्रज्ञ, मन्दर, गिरिश, नत, वासन, दुष्टदमन, गोविन्द, गोपवल्लभ, ॥ १३१ ॥ भक्तप्रिय, अच्युत, सत्य, सत्यकीर्ति, धृति, स्मृति, कारुण्य, करण, व्यास, पापहा, शुचिवर्द्धन ॥ १३२ ॥ बदरीनिलय, शान्त, तपस्वी, वैद्युत, प्रभु, भूतवास, महावास, श्रीनिवास, श्रीपति । १३३। तपोवास, मुदावास, सत्यवास, सनातन, पुष्कर, पुण्य, पुष्कराक्ष, महेश्वर ॥ १३४। पूर्णमूर्त्ति, पुराणज्ञ, पुण्यद, प्रीतिवर्द्धन, पूर्णरूप, कालचक्रप्रवर्त्तन, समाहित । १३५। नारायण, परंज्योति, परमात्मा, सदाशिव, शंखी, चक्री, गदी, शार्ङ्गी, लांगली, मुसली, हली ॥ १३६ ॥ किरीटी, कुण्डली, हारी, मेखली, कवची, ध्वजी, योद्धा, जेता, महावीर्य, शत्रुघ्न, शत्रुतापन । १३७॥ शास्ता, शास्त्रकर, शास्त्र, शङ्कर, शङ्करस्मृत, साख्या, सात्त्विक, स्वामी, सामवेदप्रिय, सम = ८०० ॥ १३८ ॥ पवन, सहित, शक्ति, सम्पूर्णाङ्ग, समृद्धिमान्, स्वर्गद, कामद, श्रीद, कीर्तिद, कीर्तिदायक । १३९ ॥ मोक्षद, पुण्डरीकाक्ष, क्षीराब्धिकृतकेतन, सर्वात्मा, सर्वलोकेश, प्रेरक, पापनाशन । १४०। वैकुण्ठ, पुण्डरीकाक्ष, सर्वदेवनमस्कृत, सर्वव्यापी, जगन्नाथ, सर्वलोकमहेश्वर ॥ १४१ ॥ सर्गस्थित्यन्तकृद् देव, सर्वलोकसुखावह, अक्षय, शाश्वत, अनन्त, क्षयवृद्धिविवर्जित ॥ १४२ ॥ निर्लेप, निर्गुण, सूक्ष्म, निर्विकार, निरञ्जन, सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, सत्तामात्रव्यवस्थित । १४३॥ अविकारी, विभु, नित्य, परमात्मा, सनातन, अचल, निश्चल, व्यापी, नित्यतृप्त, निराश्रय ॥ १४४ ॥ श्याम, युवा, लोहिताक्ष, शोभितभाषण, आजानुबाहु, सुमुख, सिंहस्कन्ध, महाभुज ॥ १४५ ॥ सत्त्ववान्, गुणसम्पन्न, अपने तेजसे दीप्यमान, कालात्मा, भगवान्, काल,

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९१

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९१


नारायणः परं ज्योतिः परमात्मा सनातनः । विश्वकृद्विश्वभोक्ता च विश्वगोप्ता च शाश्वतः ॥ ५७ । विश्वेश्वरो विश्वमूर्तिर्विश्वात्मा विश्वभावनः । सर्वभूतमहृच्छान्तः सर्वभूतानुकम्पनः ॥ १५८॥ सर्वेश्वरः सर्वशर्वः सर्वदाऽभिनवन्मलः । सर्वगः सर्वभूतशः सर्वभूताशयस्थितः । १४९॥ अभ्यन्तरस्थस्तमसश्छेत्ता नारायणः परः । अनादिनिधनः स्रष्टा प्रजापतिपतिर्हरिः ॥ १६०॥ नरसिंहो हृषीकेशः सर्वात्मा सर्वदृग्वशी । जरास्मन्मध्यधैर्यं च सुनेता सनातनः ९०० ॥ १६१॥ कर्ता धाता विधाता च सर्वेषां पतिरीश्वरः । महत्समूह्यो विश्वात्मा विष्णुविश्वहृदव्ययः । १६२॥ पुराणपुरुषः श्रेष्ठः सहस्राक्षः सहस्रपात् । तत्त्वं नारायणो विष्णुर्वासुदेवः सनातनः । १६३॥ परमात्मा परं ब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रहः । परं ज्योतिः परं धाम पराकाशः परात्परः ॥ १६४॥ अच्युतः पुरुषः कृष्णः शाश्वतः शिव ईश्वरः । नित्यः सर्वगतः स्थाणु रुद्रः साक्षी प्रजापतिः १६५॥ हिरण्यगर्भः सविता लोककृल्लोकपूजितः ॐकारवाच्यो भगवान् श्रीभूनीलापतिः प्रभुः । १५६॥ सर्वलोकेश्वरः श्रीमान् सर्वज्ञः सर्वतोमुखः । स्वामी सुशीलः सुलभः सर्वगः सर्वशक्तिमान् ॥ १६७॥ नित्यः संप्रसन्नकामश्च नैसर्गिक्सुहृत्सुखी । कृपापीयूषजलधिः शरण्यः सर्वशक्तिमान् ॥ १६८ । श्रीमान्नारायणः स्वामी जगतां प्रभुुरीश्वरः । मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहोऽथ वामनः ॥ १६९ । रामो रामश्च कृष्णश्च बौद्धः कल्की परात्परः । अयोध्मेशो नृपश्रेष्ठः कुशबालः परन्तपः ॥ १७०॥ लवबालः कञ्जनेत्रः कञ्जाङ्घिः पङ्कजाननः । सीताकान्तः सौम्यरूपः शिशुजीवनतत्परः ॥ १७१॥ सेतुकृच्चित्रकूटस्थः शबरीसंस्तुतः प्रभुः । योगिध्येयः शिवध्येयः शान्ता रावणदर्पहा ॥ १७२॥ श्रीदः शरण्यो भूतानां संश्रिताभीष्टदायकः । अनन्तः श्रीपती रामो गुणभृन्निर्गुणो महान् १००० ॥ एवमादीनि नामानि ह्यामख्यान्यपराणि च । एकैकं नाम रामस्य सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १७४॥ सहस्रनामफलदं सर्वैश्वर्यप्रदायकम् । सर्वसिद्धिप्रदं पुण्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ १७५॥


कालत्रयवर्त्तक । १४६ । नारायण, परंज्योति परमात्मा सनातन, विश्वकृत, विश्वभोक्ता, विश्वगोप्ता, शाश्वत ॥ १४७ ॥ विश्वेश्वर विश्वमूर्ति विश्वात्मा, विश्वभावन सर्वभूतमहृत्, शान्त सर्वभूतानुकम्पन ॥१४८॥ सर्वेश्वर सर्वशर्व, सर्वदा आभिनवयन्मलः, सर्वग सर्वभूतश सर्वभूताशयस्थित । १४९ ॥ अभ्यन्तरस्थ, अन्धकारनाशक, नारायण, पर, अनादिनिधन, स्रष्टा प्रजापति हरि ॥ १५० । नरसिंह, हृषीकेश, सर्वात्मा, सर्वदृक, वशी, स्थावर तथा जंगम विश्वके प्रभु, नेता, सनातन ९०० ॥ १५१ ॥ कर्ता, धाता, विधाता, सबके पति ईश्वर, महत्समूह्य, विश्वात्मा विष्णु, विश्वहृत्, अव्यय ॥ १५२ ॥ पुराणपुरुष श्रेष्ठ, सहस्राक्ष, सहस्रपात्, तत्त्व, विष्णु, नारायण वासुदेव, सनातन । १५३ ॥ परमात्मा परब्रह्म, सच्चिदानन्दविग्रह, परंज्योति, पर धाम, पराकाश, परात्पर । १५४ । अच्युत पुरुष शाश्वत, शिव, ईश्वर, नित्य सर्वगत, स्थाणु, रुद्र साक्षी, प्रजापति । १५५ ॥ हिरण्यगर्भ, सविता लोककृत, विश्व ॐकारवाच्य, भगवान्, श्रीभूनीलापति, प्रभु ॥ १५६ । सर्वलोकेश्वर श्रीमान् सर्वज्ञ, सर्वतोमुख, स्वामी, सुशील सर्वग, सर्व-शक्तिमान्, प्रभु ॥ १५७ ॥ सन्तुष्टकाम नैसर्गिक्सुहृत् सुखी, कृपापीयूषजलधि सबके शरण ॥ १५८ ॥ श्रीमान् नारायण, स्वामी, सब भुवनोंके प्रभु, ईश्वर मत्स्य कूर्म वराह, नृसिंह, वामन ॥ १५९ ॥ राम, कृष्ण, बौद्ध, कल्की, परात्पर अयोध्या, नृपश्रेष्ठ कुशके पिता, परन्तप ॥ १६० ॥ लवके पिता, सेतुकृत्, चित्रकूटस्थ कमलनेयन, कमलचरण, कमलमुख, सीताकान्त सौम्यरूप, शिशुजीवनतत्पर ॥ १६१ ॥ शबरीसंस्तुत, प्रभु योगिध्येय, शिवध्येय, शान्ति, रावणदर्पहा ॥ १६२ ॥ श्रीज्ञ शरण्य, आश्रितोंके अभीष्टदायक अनन्त श्रीपति राम गुणभृत् निर्गुण महान् १००० ॥ १६३ । यहां रामसहस्रनाम पूर्ण हुआ। इसी तरह और भी भगवान्के बहुतसे नाम हैं, जिनकी गणना हो नहीं की जा सकती । रामका एक-एक नाम सब प्रकारके पापोंको हरने तथा सहस्रनामका फल देनेवाला है । यह रामनाम सब प्रकारकी समृद्धियों एवं

३९२आनन्दरामायणे[ सर्गः २

मन्त्रात्मकमिदं सर्वं व्याख्यातं सर्वमंगलम् । उक्तानि तव पुत्रेण विघ्नराजेन धीमता ॥१६६॥ सनत्कुमाराय पुरा तान्युक्तानि मया तव । यः पठेच्छृणुयाद्वापि स तु ब्रह्मपदं लभेत् ॥१६७॥ तावदेव बलं तेषां महापातकदन्तिनाम् । यावन्न श्रूयते रामनामरूपंचाननध्वनिः ॥१६८॥ ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः । शरणागतघाती च मित्रविश्वासघातकः ॥१६९॥ मातृहा पितृहा चैव भ्रूणहा वीरहा तथा । कोटिकोटिमहत्पापि क्षुद्रपापानि यान्यपि १७०॥ संवत्सरं क्रमाज्जप्त्वा प्रत्यहं रामसन्निधौ निष्कण्टकं सुखं भुक्त्वा ततो मोक्षमवाप्नुयात् ॥१७१॥

सूत उवाच

एवं शौनक पार्वत्यै रामनामसहस्रकम् यथा शिवेन कथितं मया तेऽद्य निवेदितम् ॥१७२॥

श्रीरामदास उवाच

यथा शिष्य त्वया पृष्टं रामनामसहस्रकम् तन्मयोक्तं सविस्तरं मया तेऽद्य निवेदितम् । १७३॥ अनेन गर्म सदसि नारदः स्तुतवान्मुनिः । रामनामसहस्रेण भुक्तिमुक्तिप्रदेन च ॥१७४। श्रीरामनाम्नां परमं सहस्रकं पापापहं सौख्यविवृद्धिकारकम् भवापहं भक्तजनैकपालकं स्त्रीपुत्रपौत्रप्रदमृद्धिदायकम् ॥१७५।

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे रामसहस्रनामकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

( कल्पवृक्ष और पारिजातके पृथ्वीपर आनेका कारण )

विष्णुदास उवाच

गुरो त्वया रामनामसहस्रं राघवस्य च ध्यानं कल्पतरोर्मूले कथितं स्वर्णपीठके ॥ १ ॥

सिद्धिर्योंका करनेवाला और मुक्ति-मुक्तिका दाता है। हे पार्वति ! मैंने अभी जो सहस्रनाम तुम्हें बतलाया है, यह मन्त्रात्मक और सर्वमंगलकारक है। इसे तुम्हारे पुत्र गणेशजीने स्वयं सनत्कुमारको बतलाया था उसे मैंने आज तुमसे कहा है। जो कोई इस सहस्रनामको पढ़ता और सुनता है, उसे ब्रह्मपद प्राप्त होता है॥ १६४-१६७ ॥ महापातकरूपी मत्तवाले हाथियोंका बल तभी तक रहता है, जब तक रामनामरूपी पंचानन (सिंह) की गर्जना नहीं सुनायी देती । १६८ ॥ जो मनुष्य ब्रह्महत्यारा, मद्यप गुरुकी शय्यापर शयन करनेवाला तथा चोर हो। जो शरणागतको मारनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, माता पिता, भ्रूण (गर्भस्थ संतान) तथा वीर मनुष्यकी हत्या करनेवाला हो तथा जिसने संसारमें करोड़ों पाप किये हों, वह भी यदि श्रीरामके पास बैठकर एक संवत्सर पर्यन्त प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करे तो संसारम निष्कंटक सुख भोगकर अन्तमे मोक्ष पाता है । १६९ ॥ १७० सूतजी बोले हे शौनक ! शिवजीने पार्वतीको जिस प्रकार रामका सहस्रनाम सुनाया था वही मैंने आज तुम्हे बताया है । १७१ । श्रीरामदासने कहा - हे शिष्य ! जैसे तुमने हमसे रामका सहस्रनाम पूछा वैसे मैंने तुम्हे बतलाया। उसी सहस्रनामसे नारदने सभामे रामजीकी स्तुति की थी। क्योंकि यह स्तोत्र भुक्ति-मुक्ति सब कुछ देनेवाला है। १७२-१७४। यह रामका सहस्रनाम पापोंका नाशक, सौख्यवर्द्धक, सांसारिक पापोंका नाशक भक्तजनोंका पालक और स्त्री-पुत्र-पौत्र तथा सम्पत्तिका देनेवाला है। १७५॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेज-पाण्डेयविरचित 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे प्रथमः सर्ग ॥ १ ॥

श्रीविष्णुदासने कहा- हे गुरो ! आपने रामका सहस्रनाम बताते समय कहा था कि कल्पवृक्षके नीचे

सर्गः २ ] गद्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९३

सर्गः २ ] गद्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९३


संदेहोऽनेन मे जातः स्तन्वङ्गः कथं भुवि । अयोध्यायां रामगेहे स्वर्गलोकान्समागतः ॥ २ ॥
प्रभो मे संशयं छिन्धि कृपां कृत्वा ममोपरि ।
सम्यक् पृष्टं विष्णुदास सावधानमनाः शृणु ॥ ३ ॥
एकदा राघवं द्रष्टुं दुर्वासा मुनिरभ्यगात् । शिष्यैः परिवृतस्तैश्च वेष्टितोऽचिन्तयत्पथि ॥ ४ ॥
विष्णुर्मनुजरूपेण रामो जातोऽत्र संशयम् । तथापि लोकान् रामस्य दर्शयिष्यामि पौरुषम् ॥ ५ ॥
एवं निश्चित्य साकेते मुनिः शिष्यैर्विबेश ह । विसृज्य सोऽष्टकक्षांस्तैः सीतागेहं ययौ मुनिः ॥ ६ ॥
सीतागेहे महत्द्वारप्रसंस्थितं मुनिपुङ्गवम् । दुर्वाससं शिष्ययुक्तं दृष्ट्वा वै वेत्रपाणयः ॥ ७ ॥
शीघ्रं निवेदयामासुर्दुर्व्यासां रामं रहः स्थितम् । रामोऽपि श्रुत्वा संप्राप्तं मुनिं प्रत्युज्जगाम सः ॥ ८ ॥
नत्वा चानाययामास सय ह्यासनमर्पयत् । एतस्मिन्नन्तरे रामं तिष्ठन्तं मुनिसत्तमः ॥ ९ ॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं शिष्यैः सर्वत्र वेष्टितः । अद्य वर्षसहस्राणामुपवाससमापनम् ॥ १०॥
अतो भोजनमिच्छामि हविष्यान्नलहैर्विना सिद्धमन्नं मुहूर्तेन सशिष्याय समर्पय ॥११॥
मम मनोरभिलषितं नानापक्वान्नसंयुतम् । तथा शंकूरुजनार्थे हि शम्भोः पुष्पाणि मे नरैः ॥१२॥
अदृष्टान्यन्यवस्त्राद्य गाहंश्चयं चेत्प्रयच्छसि । नोचेन्नाहं समर्थोऽस्मीत्युक्त्वा मां त्वं विसर्जये ॥१३॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा विहस्य रघुनन्दनः । सर्वमङ्गीकृतं चेति विनयेनाब्रवीन्मुनिम् ॥१४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तुष्टोऽभून् मुनिपुङ्गवात् । स्नात्वा सरय्वां शीघ्रन्याम गच्छामि त्वरं कुरु ॥१५॥
मदुक्तं सफलं कर्तुं सिद्धं कार्यश्च जानकी । तथेत्युक्त्वा भुवि रामः स्नानाथं तं व्यसर्जयत् ॥१६॥
तदा ते लक्ष्मणाद्याश्च बंधवो जानकी तथा । कुश या बालकाः सर्वे तेऽभूवन् भयविह्वलाः ॥१७॥


स्पर्शनामित धोयोपर बैठे हुए अनशनका व्यान करें ॥ १ ॥ सो सुनकर मुझे यह संदेह हो रहा है कि कल्प-वृक्ष स्वर्गलोकसे रामचन्द्रजीके भवनमें कैसे आया। मुझपर कृपा करके आप इस संशयका निवारण कीजिये। श्रीशेषदासजीने कहा—हे विष्णुदास तुमने बहुत अच्छी बात पूछा है। सावधान होकर सुनो ॥ २॥ ३॥ एक बार रामचन्द्रजीका दर्शन करनेके लिये सहस्र हजार शिष्योंस परिवेष्टित दुर्वासा मुनि अयोध्याको जा रहे थे। रास्तेमं जात-जात दुर्वासान सब कि स्वयं विष्णुभगवान् मनुष्यका रूप धारण करके यतारण आये हैं यह मैं जानता हूँ। फिर भी आज मगरके साधारण मनुष्योंको मैं उनका पौरुष दिख-लाऊंगा ॥ ४ ॥ ५ ॥ ऐसा निश्चय करके व अपन शिष्याँके साथ अयोध्या नगरीमं प्रविष्ट हुए और सबकी सथ लिये हुए आठ चौक लांघकर सीताके भवनमे जा पहुंचे ॥ ६ ॥ सीताक विशाल द्वारपर शिष्यों समेत आये हुए दुर्वासा को देखकर दण्डायोंने तुरन्त रामचन्द्रजीको खबर दी। यह समाचार सुनते ही भगवान् दुर्वासा मुनिक पास आ पहुंचे। उन्हें प्रणाम किया और सबको बड़े आदर समेत भवनके भीतर ले गये। वहाँ बैठनेके लिये उन्हें सुन्दर आसन दिया। उससमय बैठे हुए दुर्वासानि बड़े मधुर वाणीमं रामचन्द्रजीसे कहा महाराज ! आज एक हजार वर्षका मेरा उपवासव्रत पूरा हुआ है। इस कारण मेरे शिष्योंके साथ मुझे भोजन चाहिए। इसके लिये आपको केवल एक मुहूर्तका समय मिलेगा और वह भोजन मणि, कामधेनु तथा अग्निकी सहा-यतासे न तैयार किया जाय। बस, एक मुहूर्तमें इस मग इच्छाके अनुकूल भोजन मिले, जिसमं विविध प्रकार-के पक्वान्न सम्मिलित हों। यदि इस बपना दुर्भास्कर बने रहना चाहते होगे तो शिवजीकी पूजाके निमित्त मुझे ऐसे फूल मँगवा दो, जिन्हें अबतक किसीने न देखा हो। यदि ऐसा न कर सकत हो तो साफ साफ कह दो कि मैं ऐसा काममें असमर्थ हूँ। यह कहकर मुझे विदा कर दो। ७-१३॥ मुनिकी बातोंको सुनकर मुसकाते हुए राम नम्रता पूर्वक बोले-"मुझे सब कुछ अंगीकार है" ॥ १४॥ रामकी बातस प्रसन्न होकर दुर्वासान कहा कि मैं शीघ्र सरयूम स्नान करके आता हूं ॥१५। हमारे कथनानुसार सब चीजोंकी तैयारीके लिए अपने भ्राताओं तथा सीताको भी शीघ्रताके लिए कह दया। 'अच्छा' कहकर रामचन्द्रजाने दुर्वासाको स्नान करनेके लिये

३९४आनन्दरामायणे[सर्गः २]

ऊचुः परस्परं सर्वे रामन्यस्तेक्षणाः शनैः। किं याचितं हि मुनिना किं रामोऽग्रे करिष्यति ॥१८॥ विना गोवह्निमणिभिः कथमन्नं प्रदास्यति । ततो गते मुनौ रामः पत्रं सौमित्रिणा तदा ॥१९॥ विलिख्य बद्ध्वा बाणे तन्मुमोच शरमुत्तमम् । स शरो वायुवेगेन शीघ्रं गत्वाऽमरावतीम् ॥२०॥ सुधर्मायां सुरैर्युक्तस्येन्द्रस्याग्रे पपात ह । तं शरं सहसा दृष्ट्वा चकितो भयविह्वलः ॥२१॥ कस्यायमिति चोक्त्वा तद्बाणनाम व्यलोकयत् । सुवर्णाङ्कितं बाणपुच्छस्थं पापदारकम् २२॥ ततो ज्ञात्वा राघवस्य शूरोऽयमिति देवराट् । तस्मिन्ग्रन्थं विमुच्याथ पत्रं नत्वा पपाठ च ॥२३॥ एतस्मिन्नन्तरे बाणः पुन श्रीराघवं ययौ । त्रिदशं समनुज्ञाप्य पूर्वस्तूणीगतोऽभवत् ॥२४॥ मघवाऽपि सुधर्मायां श्रावयामास निर्जरान् । राममुद्राङ्कितं पत्रं भयाद्विस्मयसंयुतः ॥२५॥ मघवंस्त्वं सुखं तिष्ठ स्वर्गेऽहं त्वां सदा स्मरे । मन्नियोगं शृणुष्वाथ याचितोऽस्म्यधुना त्वहम् ॥२६॥ विना गोवह्निमणिभिरन्नं शिष्यैर्युतेन च । वरैः षष्टिसहस्रैश्च तथाऽन्यैर्मुनिसत्तमैः ॥२७॥ सहस्राब्दक्षुधितेन क्रोधिनाऽतितपस्विना । दुर्वाससा मुहूर्त्तात्तु मध्यात्त्वंगीकृतं हि तत् ॥२८॥ याचितान्यपि पुष्पाणि तेनादृष्टानि मानवैः । मयाङ्गीकृत्य सकलं स्नानार्थं ते विसर्जिताः ॥२९॥ अतः शीघ्रं कल्पवृक्षपारिजातौ समुद्रजौ । प्रेषयस्व क्षणान्मां त्वमादरात्स्वेन सादरम् ॥३०॥ मा रावणशिरश्छेत्तुः प्रतीक्षां त्वामिषोः कुरु। एवं संश्राव्य तद्यन्त्रं सुरेन्द्रः सुरैः सह ॥३१॥ समभ्याय कल्पवृक्षपारिजातौ विबुद्धमः । विमानेन सुरैर्युक्तः श्रीरामाग्रं ययौ ॥३२॥ इन्द्रागमनमाज्ञाय तं प्रत्युद्गम्य लक्ष्मणः। प्रायोध्यायां विनायेन्द्रं सभास्थं रघुनन्दनम् ३३॥ कल्पवृक्षपारिजातौ मधवा रघुनन्दनम् । समर्प्य नत्वा श्रीरामं स उपाविशदासने ॥३४॥ एतस्मिन्नन्तरे शिष्यं दुर्वासा मुनिरब्रवीत् । गत्वा त्वं पश्य रामं तु किं करोत्यधुना गृहे ॥३५॥


भेज दिया ॥ १८ ॥ इधर लक्ष्मणादिक भ्राता, जानकी और सभासद् आदि भयके मारे सब भयभीत हो गये और वे रामकी ओर निर्निमेष दृष्टिसे देखते हुए अपने मनमें कहने लगे कि मुनिने बड़ी अद्भुत वस्तुएँ मांगी हैं। देखें, राम अब क्या करते हैं। बिना गौ, मणि तथा अग्निके किस प्रकार भोजन तैयार करके देते हैं ॥१७-१८॥ मुनिके चले जानेपर रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे एक पत्र लिखवाया। उसे बाणके सामने बाँध कर धनुषपर चढ़ाया और छोड़ दिया। वह बाण वायुके समान वेगसे अमरावतीपुरीमें जाकर सुधर्मा नामकी देवसभामें इन्द्रके सामने गिरा। उस बाणको इन्द्रने देखा तो वे चकित होकर बोले ॥१९-२०॥ 'यह बाण किसका है !' यह कहकर उसपर लिखे रामके नामको देखा और पत्र संभालकर पढ़ा। पत्र से जान गया बाण वहाँसे फिर रामजीके तूणीरमें लौट आया । २१-२४॥ भय और विस्मय युक्त इन्द्रने वह पत्र सभामे बैठे हुए देवताओंको सुनाया। २५। उस पत्रपर लिखा था—'हे इन्द्र तुम स्वर्गमें सुखी रहो। मैं सदा तुम्हारा स्मरण किया करता हूँ। हाँ, इस समय तुमसे सहाय मांगा दे रहा हूँ। आज एक हजार वर्षके भूखे एवं उग्र क्रोधी दुर्वासा मुनि अपने साठ हजार अच्छे शिष्योंके साथ मेरे यहाँ आये हुए हैं वे ऐसा भोजन चाहते हैं कि जो गौ, मणि अथवा अग्निके द्वारा न बना हो। साथ ही उन्होंने शिवपूजनके लिए ऐसे फूल मांगे हैं, जिन्हें अबतक मनुष्योंने न देखा हो। मैंने उनकी गति स्वीकार करली है इस समय मैंने उन्हें स्नान करनेको भेज दिया है । २६-२९॥ इससे तुम सत्वर कल्पवृक्ष और पारिजात, जो कि क्षीरसागरमें निकले हैं, क्षणभरमें आदरपूर्वक मेरे पास भेज दी। ३०। देखो, कहीं रावणका विनाश करनेवाले मेरे बाणकी प्रतीक्षा न करने लगना,' इस प्रकार वह पत्र देवताओं को सुनाकर इन्द्रदेव गुरुके सबने साथ मन्त्रणा करके कल्पवृक्ष और पारिजात ले तथा देवताओंके समेत विमानपर चढ़कर अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे ॥ ३१-३२॥ लक्ष्मणने जब यह जाना कि देवराज इन्द्र आ गये हैं तो उनके पास गये और आदरपूर्वक अयोध्यामें रामके पास ले आये ॥ ३३ ॥ इन्द्रने पारिजात तथा कल्पवृक्ष रामको अर्पण करके प्रणाम किया। फिर एक

सर्गः २ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९५

सर्गः २ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९५


अस्माकं कल्पितं किंचिदसमस्तमथवा न वा ।
चिंतायुक्तोऽस्ति वा तूष्णीं संस्थितोऽन्यच्च किं कृतम् ॥३६॥
बहिः संपादितं सर्वं मया यद्यन्न याचितम् । रहः स्थितः सुवैर्दृष्ट्वा शीघ्रं त्वं याहि मां पुनः ॥३७॥
इत्येवमुक्त्वा मुनिं शिष्यः स ययौ रामसद्गृहम्। तत्र दृष्ट्वा कल्पवृक्षपारिजातौ सनिर्जरौ । ३८।
सनिर्जरेशं रामं च मुदितं सीतयाऽन्वितम् । ततस्तूर्णं ययौ शिष्यः परावृत्य मुनिं प्रति ॥३९॥
कथयामास सकलं यदाश्चर्यं निरीक्षितम् । तच्छ्रुत्वा शिष्यवचनं दुर्वासा विस्मयान्वितः । ४०॥
ययौ शिष्यैः परिवृतो विवेश नृपतेर्गृहम् । तं मुनिं राघवो दृष्ट्वा प्रत्युद्गम्य पुनः सुरैः ॥४१॥
नमस्कृत्य मुहुर्वेगाद्ददावासनमुत्तमम् । ततो मुनेः पूजनं स सशिष्यस्य रघूत्तमः ॥४२॥
चकार सीतया सार्द्धं लक्ष्मणारिभिरन्वितः । पारिजातप्रसूनानि नेक्षितान्यत्र मानवैः ॥४३॥
ददौ शंभोः पूजनार्थं रामो दुर्वाससे तदा । तानि दृष्ट्वा मुनिस्तूर्णं वैष्णवेश्वरार्चनम् ॥४४॥
ततः सर्वान्मुरानाहूय परिवेषणकर्मणि । चोदयामास श्रीरामो जानकीं लक्ष्मणेन सः ॥४५॥
तत सा जानकी वेगाद्दिव्यालंकारमण्डिता । कल्पवृक्षपारिजातौ सम्पूज्य नूपुरस्वना ॥४६॥
पात्राणि कल्पवृक्षाधः स्थापयामास कोटिशः । सीता तं प्रार्थयामास कल्पवृक्षं नगोत्तमम् ॥४७॥
क्षीरसागर्सम्भूत देवानां विहितप्रद । दुर्वाससे कल्पवृक्ष सशिष्याय च तोषय ॥४८॥
तन्मतान्यन्नं भूत्वा हेमपात्राणि कोटिशः । विविधैः पूरयामास क्षणात्कल्पतरुस्तदा ॥४९॥
तैरन्नैर्हेमपात्रेषु जानकी परिवेषणम् । शुश्रूषूञ्चकार मुहुः सुर्मिलाचंपिकादिभिः ॥५०॥
ततस्तुष्टो मुनिश्रेष्ठः शिष्यैरशनमादरात् । चकार रघुप्रीरेण प्रार्थितः स मुहुर्मुहुः ॥५१॥
ततः कृत्वा भोजनं हि कराशुद्धिं विधाय सः । तांबूलं दक्षिणां चापि ज्याह रघुनायकात् । ५२।


आसनपर जा बैठे ॥ ३४ ॥ उधर उत्सुक चित्त से दुर्वासाने अपना एक शिष्य भेजा और उससे कहा- "तुम जाकर देखो कि, राम इस समय क्या कर रहे हैं ॥ ३५ ॥ मैंने जो जो बतलाया था, उसमें कुछ अन्न तैयार है या नहीं । अथवा अभी तक चिंतामग्न हुए यूं ही चुपचाप बैठे हैं, ३६ ॥ यदि मेरे आज्ञानुसार काम कर रहे हैं तो अबतक क्या-क्या किया है। मैंने जैसा कहा था, वे सब चीजें इन्होंने इकट्ठी कर लीं या नहीं। कहीं छिपकर चुपचाप वह सब देखो और शीघ्र मेरे पास लौट आओ" । ३७ । "अच्छा" कहकर शिष्य रामचन्द्रजीके भवनमें जा पहुंचा। वहां कल्पवृक्ष, परिजात, इन्द्र, देवताओंकी मण्डली एवं प्रसन्न राम तथा सीताको देखकर फिर दुर्वासा मुनिके पास लौट गया और जैसा देखा था, सब समाचार कह सुनाया। शिष्यकी बात सुनकर दुर्वासाको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३८-४० ॥ इसके बाद शिष्योंको साथ लेकर वे रामचन्द्रजीके सुन्दर भवनमें पहुंचे । मुनि दुर्वासाको देख देवताओंके साथ उठकर रामचन्द्रजीने बड़े आदरके साथ समस्त शिष्यों समेत मुनिको प्रणाम किया और बैठनेके लिये उत्तम आसन देकर सीता तथा लक्ष्मणादिके साथ उनकी पूजा की। मत्र्यगण पारिजातके फूल नहीं देख पे ॥ ४१-४३ ॥ सो उन फूलोंको शिवपूजनके निमित्त मुनिके सामने रखा । दुर्वासाने उन्हें एक बार विस्मित नेत्रोंसे देखा और तुरताव शिव तथा सब देवताओंका पूजन किया ॥ ४४ ॥ इसके अनन्तर सम्यक्प्रकार से लक्ष्मण और जानकीको भोजन परोसनेकी आज्ञा दी ॥ ४५ ॥ तब दिव्यालंकारोंको धारण किये सीताने कल्पवृक्ष और पारिजातका पूजन करके करोड़ों बर्तन लाकर उनके नीचे रख दिया और इस प्रकार प्रार्थना करने लगी-॥ ४६ ४७ ॥ "हे क्षीरसागरसे जायमान तथा देवताओंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्ष ! आज शिष्यो समेत दुर्वास को आप सन्तुष्ट कर दीजिए" । ४८ । सीताकी प्रार्थना सुनकर क्षणभरमें कल्पवृक्षने करोड़ों पात्रोंको विविध प्रकारका बाञ्छतान्नपियोंसे भर दिया । उन अन्नोंको उर्मिलादिके साथ सीताने सुवर्णके पात्रोंमें परोसा और महर्षि दुर्वासा ने प्रसन्न होकर अपने समस्त शिष्योंके साथ रामचन्द्रजीके द्वारा प्रार्थित होनेपर भोजन करना आरम्भ किया ॥ ४९-५१ ॥ भोजन करनेके बाद उन्होंने

३९६आनन्दरामायणे[ सर्गः २

ततः सुराणां पुरतो वेदवाक्यैः सविस्तरम् । दुर्वासा राघवं स्तुत्वा तमाहाऽऽनन्दनिर्भरः ॥५३॥
राम राजीवपत्राक्ष त्वं साक्षाज्जगदीश्वरः । अत्र रावणनाशार्थमवतीर्णोऽसि भूतले ॥५४॥
जनांस्त्वत्पौरुषं ज्ञातुं मयैतद्याचितं तव । विना गोवृद्धिमणिभिर्द्विजान्ने रघुनन्दन ॥५५॥
प्रभूतान्यन्नपात्राणि सान्नैर्व्यजनैस्तले । किं राम दुर्घटं तत्र यस्य भूभङ्गमात्रतः ॥५६॥
लयो ब्रह्मादिदेवानां जायते सम्भवोऽपि च । मन्दरं मज्जमानं तु दृष्ट्वा त्वं क्षीरसागरे । ५७ ।
कूर्म्मरूपेण जातोऽसि धर्तुं तु मन्दराचलम् । निष्कासितानि रत्नानि तदा देवैश्चतुर्दश ॥५८॥
तत्र साहाय्यमात्रेण सर्वं जानन्त्यहं प्रभो । लक्ष्मीः सोमः कामधेनुः कौस्तुभश्च सुधा विषम् । ५९ ॥
ऐरावतश्चाप्सरसः कल्पवृक्षो भिषग्वरः । उच्चैःश्रवाः पारिजातो सुरा ज्येष्ठेति राघवः । ६० ॥
चतुर्दश सुरत्नानि विभक्तानि पुरा त्वया । देवेभ्यो यानि तान्येते भोक्ष्यन्ति कृपया तव ॥६१॥
त्वदाज्ञापालिनः सर्वे शङ्कराद्याश्च निर्जराः । सर्वेषां जीवनोपायस्त्वयैव सर्वं पृथक् पृथक् ॥६२॥
कल्पिता येन रामेण तत्र किं दुर्घटं तव । ममाभिलषितं भोज्यं दातुं त्वत्कौतुकं मया ॥६३॥
अद्यावलोकितं राम जनानाग्रे प्रदर्शितम् । त्वं पाता सर्वलोकानां जनकोऽपि पालकः ॥६४॥
अस्माकं मतिदानाञ्च ये क्षमस्वाऽपराधिनम् । एवं नानाविधं स्तुत्वा तं प्रणम्य पुनः पुनः ॥६५॥
राममामन्त्र्य दुर्वासा ययौ शिष्यैः स्वाश्रमम् । अथ तान्निर्जरान् प्राह रामः कनकलोचनः ॥६६॥
कल्पवृक्षपारिजातौ गृहीत्वा सम्पदं दिवम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा बृहस्पतिः प्राह राघवम् ॥६७॥
यावत्कालं निवासाऽत्र भूम्यां तावन्नयात्मनः । अयोध्यायां विमुक्तस्तौ कल्पवृक्षसुहृत्तमौ ॥६८॥
त्वाय वैकुण्ठमायाने दिवं तौ यास्यतो ध्रुवम् । तथेति तमुद्गुरुं प्रोतिनद वचः प्रभुः ॥६९॥


हाथ पाया और राक्षस ताम्बूल दीजियेगा ॥ ५३ ॥ फिर उन देवताओंके सामने ही वेदवाक्यों द्वारा विस्तारपूर्वक रामचन्द्रजीकी स्तुति की और अत्यन्त प्रसन्न होकर कहने लगे ॥ ५४ ॥ हे राम हे कमलदल सदृश नेत्रवाले भगवन् ! मैं जानता हूँ कि तुम साक्षात् जगदीश्वर हो और रावणका विनाश करनेके लिए इस धरातलपर आये हो ॥ ५५ ॥ केवल प्रजाको तुम्हारा पौरुष दिखलानेके लिए ही मैंने गौ-वृद्धि और मणिसे न सिद्ध हुआ अन्न तथा मनुष्योन् न्हीं अनेक प्रकारके विभिन्न भाँति भाँति हे राम ! तुम्हारे लिए यह कुछ दुर्घट कार्य नहीं है तुम्हारे भूभंग मात्र से ही ब्रह्मादिक देवताओंका संहार विनाश एवं उद्भव होता है। जिस समय मंदराचलका क्षीरसागरमें तुमने डूबते देखा ॥ ५५ । ५६ ॥ तब कूर्मरूप धरकर उसे अपनी पीठपर उठा लिया था । उस समय एकमात्र तुम्हारी सहायतासे ही देवताओंने क्षीरसागर से चौदह रत्न निकाले थे ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ जिनके नाम हैं—लक्ष्मी, चन्द्रमा कामधेनु, कौस्तुभ, सुधा, विष, ऐरावत, अप्सराएँ, कल्पवृक्ष, धन्वन्तरि, उच्चैःश्रवा, पारिजात, सुरा और मद्य ॥ ५९ ॥ ६० ॥ उन चौदहो रत्नोंको तुमने चौदह देवताओंको बाँट दिया और तुम्हारी ही कृपासे वे सब आनन्दपूर्वक उनका उपभोग कर रहे हैं ॥ ६१ ॥ शंकरादिक समस्त देवता तुम्हारी ही आज्ञाका पालन करते हैं। इस जगत् में स्थित सब प्राणियोंका जीवनका उपाय तुम्हीं करते हो ॥ ६२ ॥ तब यदि तुमने हमारे इच्छानुसार भोजनकी सामग्रियें जुटा दीं तो इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। यह तो तुमने इन साधारण अज्ञानी मनुष्योंको तुम्हारा कौतुक दिखलाया था, सो दिखा दिया । ६३ ॥ हे राम ! तुम्हीं समस्त लोकोंके रक्षक, स्रष्टा तथा संहारक ज्ञापक हो ॥ ६४ ॥ तुम्हीं हमारे गतिदाता हो । मुझसे जो कुछ त्रुटि हुई हो सो क्षमा कर दो । इस तरह नाना प्रकारके वाक्यों द्वारा स्तुति करके दुर्वासाने बारम्बार प्रणाम किया और रामचन्द्रजीकी आज्ञा लेकर सब शिष्योंको साथ लिये हुए अपने आश्रमको चल दिये । इसके अनन्तर रामचन्द्रजीने उन देवताओंसे कहा—कल्पवृक्ष और पारिजातको लेकर अब आप लोग भी अपने लोकको चले जायें । इस प्रकार रामकी बात सुनकर देवगुरु बृहस्पति कहने लगे ॥ ६५-६७ ॥ "जबतक आप भूमण्डलमें रहेंगे, तबतक कल्पवृक्ष तथा पारिजात ये दोनों भी इस अयोध्यामें ही रहेंगे ॥ ६८ ॥ जब आप अपने वैकुण्ठ लोकको जाने लगेंगे, तब ये भी आपके साथ चले

सर्गः ३ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९७


पुष्पके स्थापयामास कल्पवृक्षसुरद्रुमौ । ततस्ते राघवं नत्वा ययुरिन्द्रादिकाः सुराः ॥७०॥
स्वर्गलोकं सुसंतुष्टा राघवेणातिपूजिताः । एवं प्राप्तौ कल्पवृक्षपारिजातौ भुवं दिवः ॥७१॥
तयोरेतत्त्वकारणं ते प्रोक्तं पृष्टं यथा त्वया । तदारभ्य सुरतरू पुष्परथौ विरेजतुः ॥७२॥
साकेते सीतया रामस्ताभ्यां सुखमवाप सः । कल्पवृक्षतले दिव्यपर्यङ्के सीतया सह ॥७३॥
नानाभोगावाप्तचन्द्रः स बुभोज चिरं सुखम् । अतः पूर्वं मया रामध्यानं कल्पतरोः स्थले ॥७४॥
सहस्रनामसङ्केते प्रोक्तं शिष्य तवाग्रतः । तदारभ्य पारिजातवृक्षांशाः शतशो भुवि ॥७५॥
पारिजातनगा जाता वर्तन्तेऽद्यापि तेऽत्र हि । नानेन सदृशं पुष्प वर्तते रामतोषद्म् ॥७६॥
कल्पवृक्षांशरूपाश्च ज्ञातव्यास्तत्र मानवैः । अश्वत्थाः सेवनाद्यैश्च सर्ववाञ्छितदायकाः ॥७७॥
पुण्याधिक्येन सेवन्ते रोपेक्षन्ते शुभाश्रये । पापाधिक्येनापि सेवां नरा वाञ्छन्ति नो कलौ ॥७८॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे
चम्पिकास्वयंवरो नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीयः सर्गः

( रामोपासक तथा कृष्णोपासक का परस्पर मधुर विवाद )

विष्णुदास उवाच

रामदास गुरो भूपां रामकृष्णौ परौ भुवि । मया दशावतारेषु ह्यवतारवुभौ पुरा ॥ १ ॥
तयोरपि च कः श्रेष्ठस्तन्मे वद ममाग्रतः । यं श्रुत्वा सर्वदा दस्य श्रोष्येऽहं चरितं शुभम् ॥ २ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक् पृष्टं विष्णुदास सावधानमनाः शृणु । रामावतारः श्रेष्ठोऽत्र विशेयः सर्वदा नरैः ॥ ३ ॥
अस्मिन्नर्थे पूर्ववृत्तां कथां शृणु मनोहराम् । द्विजाभ्यां वादरूपेण कीर्तितां पुण्यदायिकाम् ॥ ४ ॥


कार्यंत। रामने सुरगुरु बृहस्पतिकी बात स्वीकार कर ली ॥ ६९॥ देवताओने उन दोनोंको पुष्पक विमानमें रखकर भगवान्‌को प्रणाम किया और राम द्वारा पूजित होकर सब अपने अपने लोकको चल गये । ७० ॥ इस प्रकार कल्पवृक्ष और पारिजात स्वर्गसे मृत्युलोकमें आय , उनके आनेका जो कारण था, वह तुम्हारे प्रश्नानुसार मैंने कह सुनाया। तभीसे दोनों सुरतरु पुष्पकमे विराजमान रहे ॥ ७१ । ७२ ॥ अयोध्यामें सीताके साथ रामचन्द्रजी उन्हीं वृक्षोंके नीचे दिव्य पर्यङ्कपर कार विहार करत हुए विविध प्रकारके सुखोंको भोगते थे ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ इसलिए मैंने रामसहस्रनामक कथन करत समय कल्पवृक्षके नीचे रामका ध्यान करनेको कहा था। तभीसे पारिजातके सैकड़ो अंश पृथ्वीतलमें उत्पन्न हुए और वे आज भी इस धरातलमे विद्यमान हैं। इसके समान रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाला कोई दूसरा फूल नहीं है ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ कल्पवृक्षके अंशसे पीपल वृक्षकी भी उत्पत्ति हुई है उसकी आराधना करनेसे सब प्रकारका कामना पूर्ण होती है ॥ ७७ ॥ अन्य युगोंमें पुण्य अधिक था। इस कारण लोग पीपलके वृक्षकी आराधना करते थे। किन्तु कलियुगमे पापकी अधिकता होनेके कारण लोग उसका पूजन नहीं करना चाहत ७८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचितायां 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते राज्यकांडे पूर्वार्द्ध द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

विष्णुदासने कहा--हे गुरो ! भगवान्‌के दश अवतारोंम राम-कृष्ण दो अवतार श्रेष्ठ माने जाते हैं । यह मैंने बहुसे कई बार सुना है ॥ १ ॥ अब आप हमको यह बतलाइए कि इन दोनों अर्थात् राम और कृष्णमें कौन बड़ा है। जिसको आप श्रेष्ठ बतलायेंगे, मै सर्वदा उसीका चरित्र सुना करूँगा ॥ २ ॥ श्रीरामदासने कहा- हे विष्णुदास ! तुमने ठीक प्रश्न किया है सावधान मन होकर सुनो। इन दोनों अवतारोंमें मनुष्यको रामका अवतार ही श्रेष्ठ समझना चाहिए ॥ ३ ॥ इसके लिए एक मनोहर कथा आपसमें दो ब्राह्मणोंके

३९८आनन्दरामायण[ सर्ग ३

अयोध्याविषये कश्चिद्विजो रामाह्वयस्त्वभूत् । द्वारकायां तथा विप्रः कृष्णाख्योऽभूत्परः सुधीः ॥ ५ ॥
भक्त्या संसक्तौ चोभौ सर्वदा रामकृष्णयोः । तावेकदा माधवमासे प्रयागे मिलितौ द्विजौ ॥ ६ ॥
उभौ स्नात्वा त्रिवेण्यां हि माधवं परिपूज्य च । कथां पौराणिकमुखाच्छ्रोतुं तत्पुरः स्थितौ ॥ ७ ॥
शुश्रुतुः कथास्तत्र प्रसङ्गाद्राघवस्य च । रामाख्यो रामभक्तःस श्रुत्वा राघवसत्कथाम् ॥ ८ ॥
तुष्टस्तं पूजयामास मुदा पौराणिकं तदा । कृष्णाख्यः क्रोधसंयुक्तस्तदा वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
किं क्लेशिनोऽद्य रामस्य कथां श्रुत्वाऽतिहर्षितः ।
पूजितोऽपि वृथा व्यासस्त्वं मूढोऽसीति वेद्म्यहम् ॥ १० ॥
नान्यस्यैवं कस्यापि पावनं श्रुतिदोषहम् । यथा कृष्णस्य मे रम्यं नानाक्रोडापुरःसरम् ॥ ११ ॥
तत्कृष्णवचनं श्रुत्वा रामाख्यः प्राह सस्मितः ।

रामोपासक उवाच
रामः क्लेशी कथं प्रोक्तस्त्वया कृष्णः कथं सुखी ॥ १२ ॥
कथं कृष्णस्य ते रम्यं चरितं दुश्चिन्तापहम् । कथं रामस्य मे रम्यं चरितं नेरितं त्वया ॥ १३ ॥
वदाद्य विस्तरेणैव शृण्वन्त्वेते सभासदः ।

कृष्णोपासक उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया राम सावधानमनाः शृणु ॥ १४ ॥
वदामि राघवस्याथ कृष्णस्य चरितं महत् । क्लेशदं तोषदं नृणां शृण्वन्त्वेते सभासदः ॥ १५ ॥
तत्र रामस्य जन्मादौ जातः शापः पितुः पुरा । शापस्यादावपि पुरा तद्वेत्तो रावणेन हि ॥ १६ ॥
लंका वन्दितरौ नादौ प्रारम्भे दुःखमीदृशम् । मम कृष्णस्य जन्मादौ तद्विप्री-सौख्यदायकैः ॥ १७ ॥
विवाहमङ्गलैः कंसः पूजयामास सादरम् ।


विवादरूपां कही गयी थी। वह कथा परम पुण्यदायिता है, उस सुनो । १ एक समय अयोध्यामे राम नामका एक ब्राह्मण रहा करता था। उसी तरह द्वारकापुरीम कृष्ण नामका विद्वान् विप्र रहता था ॥ ५ ॥ वे दोनों सदा राम और कृष्णकी उपासना किया करते थे। एक समय माध म मेवे त्रिवेणी के तटपर उन दानोकी भेंट हुई ॥ ६ । उन्होंने त्रिवेणीम स्नान किया और वेणीमाधवकी पूजा करके दिशा करके एक पौराणिकके पास कथा सुननेकी इच्छासे जा बैठे ॥ ७ ॥ दानां कथा सुन रहे थे। उनम कही राघवका प्रसग आ गया। उसे सुनकर वह राम नामवाला ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और हर्षपूर्वक पौराणिकका भली भांति पूजा की। इससे कृष्ण नामवाला ब्राह्मण मार क्रोधके लाल हो गया और कहने लगा उत्सुका कष्ट देनवाले रामकी कथा सुनने-से तुम्हें क्या लाभ हुआ, जो तुम इतने प्रसन्न हुए और तुमने व्यासकी ऐसी पूजा की ? मेरी समझम तो यही आता है कि तुम बडे मूर्ख हो ॥ ८-१० ॥ मुझे तो और किसोका चरित्र इतना सुन्दर नहीं लगता, जितना श्रीकृष्णका। क्योंकि उस चरित्रमें त्रिविध प्रकारकी लीलाएं भरी हुई हैं ॥ ११ । कृष्ण नामक ब्राह्मणकी यह बात सुनकर रामोपासक मुसकाता हुआ कहने लगा कि तुमने रामचन्द्रको कैसे दुःखी बतलाया और कृष्णको सुखी ॥ १२ ॥ तुमने कृष्णचरित्रको कैसे पापनाशक बतलाया और रामचन्द्रजीका नाम लेना भी पसन्द नहीं किया। तुम इसे विस्तारपूर्वक कहो । जिससे ये सभासद भी सुनें। कृष्णोपासकन कहा-हे राम ! तुमने बहुत ठीक प्रश्न किया है। अब सावधान होकर सुनो ॥ १३ ॥ १४ ॥ मै रामचन्द्र तथा कृष्णचन्द्र इन दानोका चरित्र सुनाता हूँ। उनम रामचरित्र कैसा क्लेशप्रद और कृष्णचरित्र कितना सुखकर है, सो सब सभासद सुनते जायें ॥ १५ ॥ तुम्हारे रामके जन्मके पहले ही उनके पिताको श्रवणके पिताका शाप मिल चुका था। उसके भी पहले उनके माता-पिताको रावण अपनी लंकामे उड़ा ले गया था। इस प्रकार रामके जन्मके पहले उनके माता-पिताको

सर्गः ३] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ३०९


रामोपासक उवाच
रे रे शृणु त्वं दुर्बुद्धे न स शापो वरोऽर्पितः । १८॥
यत्प्रसादादपुत्रस्य नृपस्य तनयश्चतुः । तथा मद्रावमीत्या हौ नीतावपि विसर्जितौ ॥ १९॥
दशास्येन तत्पितरौ जन्मार्दो पौरुषं त्विदम् । तव कृष्णस्य जन्मादौ पित्रोः कारागृहस्थितिः ॥ २०॥
राजभोगनिषेधार्थं शापो यदुकुलाय च । जन्मापि बहिशालायां वियोगश्च तयोरपि ॥ २१॥
सहोदरवधश्चापि उद्वेगोर्मातुलेन हि । न बाहुजश्च वैश्यश्च यस्य तातावुभौ स्मृतौ ॥ २२॥
गोरक्षकस्य तनयः प्रवासः शैशवेऽपि च ।
परेण पोषितश्चापि कनीयान् बलभद्रतः । एव नानाविधं दुःखं तव कृष्णस्य नो सुखम् ॥ २३॥

कृष्णोपासक उवाच
आत्मार्थं तव रामेण त्राटिका स्त्री विदारिता । नार्थाद्विमोचितो बाणः पित्रोः खेदो वियोगतः ॥ २४॥

रामोपासक उवाच
द्विजघ्ना निहता दुष्टा मम रामेण ताटिका । मुनियज्ञरक्षणार्थं मुदा राज्ञाऽर्पितो शिशुः ॥ २५॥
तव कृष्णेन रक्षार्थमात्मनः पूतना हता । तथाऽऽत्मार्थं प्राणिहिंसा बहु तेन कृता ब्रजे ॥ २६॥
गोपैश्च सङ्गतिस्तस्य तथैव गोरक्षणम् । गोवधः सर्पघातश्च स्रगवाजिबधस्तथा ॥ २७॥
रासभवृषघातश्च चौर्यं द्यूतं वनेऽटनम् । कंबलाव्रणं शीतोपर्जन्योग्रप्रपीडनम् ॥ २८॥
क्षुत्तृड्भ्यां पीडनं नित्यं गोपालोच्छिष्टसेवनम् । आत्मार्थे याचितं चान्नं द्विजस्त्रीभ्यो वने मुहुः ॥ २९॥
इन्द्रध्वजपूजनं दिष्ट्वाचाप्रलोपनम् । परस्त्रीगमनं ज्येष्ठनारीभिः क्रीडनं चिरम् ॥ ३०॥


कितना क्लेश हुआ। इसके विपरीत हमारे कृष्णके जन्मके पहले कंसने उनके माता-पिताको वैवाहिक तथा मङ्गलमयी सामग्रियास पूजा की थी। रामोपासकने कहा— अरे दुर्बुद्धे ! वह रामचन्द्रके पिताको शाप नहीं, बल्कि वरदान मिला था। जिसके प्रभावस्वरूप निपुत्र महाराज दशरथके घरमें रामचन्द्रादि चार भाइयोका जन्म हुआ और हमारे मन्दराजके डरसे ही रावण उनके माता-पिताको ले जाकर भी अयोध्यामे लौटा गया था। १८-१९ ॥ जन्मके पहले ही मेरे रामचन्द्रजीमे इतना पौरुष था। तुम्हारे कृष्णके जन्मके प्रथम ही उनके माता-पिता कारागारमे बन्द थे। दूसरे यदुकुलको राजभोगनिषेधके निमित्त पहले ही शाप प्राप्त हो चुका था। उनका जन्म भी हुआ तो जेलखानेमे और वहा थोड़ी ही देरमे माता-पितासे वियोग हो गया। कृष्णके कितने ही सगे भाई मामाके द्वारा पहले ही मार डाले गये। उनको जो कृत्रिम माता-पिता मिले थे, वे न तो क्षत्रिय थे और न वैश्य ॥ २०-२२ ॥ तुम्हारे कृष्ण एक ग्वालेके लड़के बने। इस प्रकार वे शैशवावस्थामें ही प्रवासी हो गये। औरोन उनकी रक्षा की और तुम्हारे कृष्ण बलरामसे छोटे थे। इसीलिए कृष्णको अनेक प्रकार का दुःख मिला, सुख कुछ भी नहीं। २३ । कृष्णोपासक बोला—अपनी रक्षा करनेके लिए तुम्हारे रामने ताड़का नामवाली एक स्त्रीका वध किया और रामके वियोगसे उनके माता पिताको महान् क्लेश हुआ ॥ २४॥ रामोपासकने कहा— हमारे रामन ब्राह्मणांकी हत्या करनेवाली स्त्री ताड़काको मारा था और द्विज यज्ञरक्षाके लिए उन्हें पिता दशरथने प्रसन्नतापूर्वक मुनिके साथ भेजा था। २५। किन्तु तुम्हारे कृष्णने रक्षाके लिए पूतनाको मारा था। इसी प्रकार उन्होंने आत्मरक्षामे लिए ब्रजमे और भी बहुत सी प्राणिहिंसाएं की थीं ॥ २६॥ गोप-ग्वालोंका साथ था और वे गायोंकी ही रक्षा करते थे। उन्होंने गौ (धेनुकासुर) पक्षी (बकासुर) घोड़ा (केसी), रासभ तथा वृष आदिको मारा, चोरी की, जुआ खेले और वनोंमे इधर-उधर घूमत रहे। शीत वर्षा तथा आतपसे बचनेके लिए अपने ऊपर केवल एक कम्बल डाले रहते थे ॥ २७-२८ ॥ भूख-प्याससे दुखी होकर ग्वालोंका जूठन खाते थे अपने लिए उन्होंने वनमें ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंसे बार-बार अन्न माँगा। २९ ॥ इन्द्रध्वज-पूजन आदि वृद्धोंकी कुलपरम्परासे चलनवाली प्रथाका उन्होंने लोप किया। वे परस्त्रियोंके साथ घूमते