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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ
५५०आनन्दरामायणे[ सर्गः १०

दत्त्वा गेहमुल्लूकाय ययौ रामो निजां पुरीम् । विवेश नगरीं नृत्यवाद्यगीतपुरःसरम् ॥१४१॥ शिशुं विप्रं क्षत्रियं च वैश्यं चापि चतुर्थकम् । तैलकारं पञ्चमं च लोहकारस्नुषां तथा ॥१४२॥ चर्मकारदुहितरं सप्तैतान्हि सुजीवितान् । दृष्ट्वा रामः समायातानात्मानं द्रष्टुमादरात् ॥१४३॥ तुतोष नितरां पत्न्या तैः सर्वैः संस्तुतो मुहुः । ततः संपूज्य तान् सर्वान् विससर्ज रघूद्वहः ॥१४४॥ तदा महोत्सवश्चासीदयोध्यायां समन्ततः । एवं नानाचरित्राणि चकार रघुनन्दनः ॥१४५॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे यतिशूद्रगृध्रशिशूपाकरणं नाम दशमः सर्गः ॥१०॥


एकादशः सर्गः

( चार विप्रकन्याओंको रामका वरदान )

श्रीरामदास उवाच

अथैकदा रामचन्द्रो मृगयार्थं वनं ययौ । सीतया बन्धुभिः सैन्यैर्हस्त्यश्वरथपत्तिभिः ॥१॥ पश्यन् वनानि सर्वाणि मृगयारसिको भृशम् । कौतूहलसमाविष्ट आखेटव्यूहसंवृतः ॥२॥ उपानद्गूढपादश्च नीलोष्णीषी हरिच्छदः । नीलगोधांगुलित्राणो धनुष्पाणिः शरी नृपः ॥३॥ अश्वारूढः खङ्गचर्मधारी भूपै पदातिभिः । वेष्टितः कवची रामो विवेश गहनं वनम् ॥४॥ सीतया जालरन्ध्रैश्च वारं वारं निरीक्षितः । स रामो बन्धुवर्गैश्च पुत्राभ्यां नृपसत्तमैः ॥५॥ क्रीडां तदाऽकरोत्तत्र कुञ्जेषु मृगयन्मृगान् । इम्यतां इम्यतामेषो मृगो वेगात्पलायते ॥६॥ इति जल्पन् स्वभृत्येषु स्वयमुत्पत्य हन्ति च । गंधारेषु च रम्येषु वनेषु विपुलेषु च ॥७॥ उल्लङ्घितमहाश्रोता युवा पञ्चास्यविक्रमः । इतस्ततः पुनर्याति क्वचित्पश्यन् वनस्थलीम् ॥८॥

दण्ड देकर घोंसला उलूकको दे दिया और वहाँसे अपनी अयोध्या नगरीकी ओर चल पड़े। अयोध्यामें पहुँचे तो क्या देखा कि वहीं नाच-गान हो रहे हैं। ब्राह्मणका लड़का, मधुरपुरवाला ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तेली एवं लोहारकी पतोहू तथा चमारकी लड़की ये सब जीवित होकर रामके दर्शनोंको खड़े हैं। उनको जीवित देखकर सीता समेत राम अत्यन्त प्रसन्न हुए । वहाँ पहुँचे तो लोगोंने रामकी स्तुति की और रामने भी उनका सत्कार करके उनके ग्रामोंको भेज दिया। उस समय अयोध्या घरमें चारों ओर उत्सव ही उत्सव दीखता था। इस तरह राम अनेक प्रकारकी लीलायें करते रहते थे । १३६-१४५॥ इति श्रीमत्कोटिराम-चरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे दशमः सर्गः ॥१०॥

श्रीरामदास कहने लगे—इसके बहुत दिनों बाद रामचन्द्रजी एकसमय शिकार खेलनेके लिए सीता तथा भ्राताओं और बहुतसे हाथी-घोड़े आदिको साथ लेकर वनमें गये। मृगयाके आनन्दसे आनन्दित होकर वे बहुतसे वनोंको देखते हुए इधर-उधर घूम रहे थे। उस समय उनके साथ शिकार खेलनेवाले भीलोंका एक बहुत बड़ा दल था । रामचन्द्रजी जूता पहने थे, नीले रङ्गकी पगड़ी मस्तकपर बँधी थी हरे कपड़े पहने हुए थे और नीले ही रङ्गकी गोधांगुली उँगलियोंमें बँधी थी। हाथमें धनुष-बाण धारण किये थे, १-३॥ वे घोड़ेपर सवार थे, तलवार और ढाल बगलमें झूल रही थी। बहुतसे पैदल चलनेवाले राजे उनके साथ थे और उनके शरीर पर कवच पड़ा था। इस प्रकारका वेश धारण किये वे गहन वनमें जा पहुँचे। उस समय सीता पालकीकी खिड़कियोंसे रामकी ओर निहार रही थीं और रामचन्द्रजी अपने भ्राताओं और मित्रोंके साथ कुञ्जोंमें मृगोंको ढूँढ़ते हुए हर्षपूर्वक मृगया कर रहे थे। कभी-कभी 'मारो-मारो, यह मृग वेगसे भागा जा रहा है' इस प्रकार चिल्ला पड़ते । यदि कोई उसे मारनेको नहीं पहुंच पाता तो वे उसे स्वयं मार दिया करते थे। एक

सर्गः ११ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४५१

विटपोद्गीर्णसंस्वस्तलीनकेफिकुलाकुलाम् । हरिणीगणसन्त्रस्तां धावच्छायाददिश्रुताम् ॥९॥ क्वचित्केतच फूत्कारक्षिप्त गर्भावभीपनाम् । खड्गयूथैः क्वचिल्लक्ष्मीं दधानाभिव दन्तिनाम् ॥१०॥ क्वचित्कोटरमविशुक्रां नदत्पिनादिनाम् । मृग लिप्तमुदाभिमृदितां च क्वचित् क्वचित् ॥११॥ शार्दूलनखनिभिन्नरोहिद्रक्तारुणां क्वचित् । पायश्त्वङ्कभारानमुक्तिक्ष्मधविवाग्रजैः ॥१२॥ अवराधांग्लरोधाणि सुखपन्तीमिव क्वचित् । क्वचिदुवृक्षघमच्छायां वनपुष्पसुगन्धिनीम् ॥१३॥ क्वचिन्नागदशारमूमण्डलमवोरगाम् । सर्पनिःसुवनिर्मोकनागभीषणमण्डिताम् ॥१४॥ वृत्तस्याजगरं व्याप्तां क्वचिन्निर्मुक्तसर्पवीम् । क्वचिद्दावानलज्वालाशिग्वाद्याममहीरुहाम् ॥१५॥ ज्वलन्तिकुंजानिर्गच्छद्धरूपाश्रमसङ्कटाम् । व्यमुंचंस्तु शुनां यूथं शशकेषु कचित् कचित् ॥१६॥ पल्वलेषु च विश्रांतः पुनर्याति वनान्तरम् । ततो मध्याह्नसमये निवासं सरसस्तटे ।१७॥ कारयामास सेनायाः सीतायाश्च रघूत्तमः । स्वयं मृगद्वयोत्क्रीडामारभेटसुहृदंगतः ।१८॥ दूरस्थं मृगशरेण मुक्त्वा बाण जघान तान् एवं खेलति राजेंद्रै व्याघ्रगर्जं च वै द्विज ।१९॥ तत्र कोलाहलत्रस्तः पंचरभ्यो निर्गतो वनात् । स केसरी महावेगार्नाक्षाद्दष्ट्रा भयावहः ।२०॥ स्फुरद्दशममात्रौंतदुर्गममार्गमोहितः । कदाचिद्रगमासूढः कदाचिद्भूमिमाश्रितः ॥२१॥ न रयालश्यतां याति धन्विनां पृष्ठगामिनाम् । क्वचिद्दूरानिपथ याति दर्शनागोचरः क्वचित् ॥२२॥ वक्रमोद्योजितगंभीर कंटकीद्रुमसंकुलम् । शुकव्याघ्रममाकीर्ण पर्वतंञ्च भयंकरम् ॥२३॥ प्रविष्टो विषमरण्यं गमस्तस्य पदानुगः । दूरद्दूरं ततो गत्वा देशादेशं च निर्जनम् ॥२४॥

ठाठोंको छोड़कर दूसरेमें और दूसरेको छोड़कर तीसरेमें, इस तरह बार बार इधर उधर वनस्थलीमें दौड़ रहे थे ॥ ४-८ ॥ उस समय वही श्रृंगोपर रहनेवाले मयूरके परिवार भार दूषक वृक्षके शाखाम छिप जाने, हरिणियों चकित नत्राम इधर-उधर निवृत्त हुई भाग जाती, वनले जाब कालाहदृस त्रस्त होकर अपनी शौडसे निकल परन्त कही अपत्न विशम निकलकर सवपना फुफकार मारते थे ओर कश दौगुराकी भल्यन सनकर सुनाई देती थी। वही गेंडेके समान शोभाको धारण किये हुए हाथी भाव रहे थे, कही काटग्मे बेठे हुए तीन अनेक प्रकारकी बोलियां बोल रहे थे कही शरात्र पैशके निसान दिखाई देते थे ओर कही कियी सिंहके द्वारा मार गये हरिएाके रुधिरसे पृथ्वी रक्तवण हा गयी थी। कहीकी भूमि बड़े-बड़े स्तनोवाले भसांसे अन्त पुरके आंगनसदृश बाम सरला थी ओर कहीके पृथ्वी पन वृक्षाक छिपात छायामय्य हो गयी थी । कहीं वनपुष्योकी गानिपम यह स्थली सचगन्धयी हो रही थी और कही प्राकृतिक गैरिक स्तामण्डल बन गया था । उसपर जो भोरे मँडग रहे थे, वे उमक कारण सदृश जान पड़ते थे। कही मौर्यक शरीरसे आधा कवच छूटकर त्रिलक भूमपर लगी थी। इस प्रकार वडे वड सर्पोकी खिले दिखाई पड़ती थी । ९-१४। कहीं मुँह वाये हुए बड़े-बड़े अजगर हवं बैठे थे । कही सर्पोका केंचुवियां दिखायी देती थी । कहींपर दावानल लगनेके कारण जलते हुए निकुञ्जोमसे व्याघ्र पशू आदि बड़े-वड जन्तु निकल निकलकर भाग रहे थे। रामके सथ आये हुए शिकारी खरगोशांपर कुत्ते दौड़ा रहे थे। काई तलैया मिल जानपर वे लोग वहीं कुछ देर विश्राम करके आगे दूसरे वनमे चले जाते थे और मध्याह्नके समय किसी बड़े सरोवरपर सीता आदिके साथ आराम करते थे ॥ १५-१७॥ नौकर वहर उठकर फिर शिकारी लग जाने थे रामचन्द्रजी किसी भी मृगको देखकर उसके पीछे दौड़ पड़ते और उस बाणोंसे मार डालते थे। इस प्रकार रामचन्द्रजी मृगया कर ही रहे थे, तभो दूसरी ओरसे 'सिंह आया-सिंह आया' यह कोलाहल हान लगा। सिंह इसम ऊबकर और भी वेगस चला। उसके बड़े बड़े दाँत थे । देखनेमे वह बड़ा भयानक मालूम पड़ता था। वह बड़े भारी दुर्गम मार्गको त करता हुआ इन लोगोंकी ओर बढ़ता आ रहा था वह कभी छालां मारकर आकाशमार्गे चलता और कभी पृथ्वी-पर दौड़ता चलता था ॥ १८-२१॥ अतिशय वेगसे भागनेके कारण उसका पीछा करनेवाले लोग कभी उसे देख पाते थे-कभी नहीं इस तरह भागता हुआ वह एक ऐसे दुर्गम स्थानपर पहुँच गया, जहाँ एक टेढ़ा-

४६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११

एकाकी हयमारूढो विवेश गिरिगह्वरम् सर्व व्याधाश्च दूताश्च लक्ष्मणाद्याश्च बान्धवाः ॥२५॥
रामादर्शनमग्नांस्ता बभ्रमुस्त इतस्ततः। अथ रामः केसरीणं जघान निशितपत्रिणा ॥२६॥
ततः स दिव्यरूपेण नत्वा प्राह रघूत्तमम् । पुरा विद्याधरश्चाहं मया भुक्ता पतिव्रता ॥२७॥
मुनिपत्नी हठेनेव तया शप्तस्त्वहं क्रुधा। सिंहत्वन्निग्रहो यस्मान्मया मयि कृतोऽद्य हि ॥२८॥
अतस्त्वं मन्दिरात्सिंहा भवाग्रेऽथ महारने। तदा मया प्रार्थिता सा पुनर्मामाह राघव ॥२९॥
चिराद्रामशरस्पर्शाच्छापान्मुक्तिर्भवेत्तव । अतोऽद्य त्वच्छरस्पर्शाच्छापान्मुक्तश्चिरादहम् ॥३०॥
इत्युक्त्वा राममामन्त्र्य स स्वर्गं प्रययौ मुदा । ततः स रामचन्द्रोऽपि तुरगस्थो मुदान्वितः ॥३१॥
तत्र तस्थौ क्षणं यावद्यावत्तद्रिरिगह्वरे। गुहाद्वारे शिलामेकां ददर्श योजनायताम् ॥३२॥
महतीं तां शिलां दृष्ट्वा रामो विस्मितमानसः। धनुष्कोट्याऽक्षिपद्दूरं गुहायां प्रविवेश ह ॥३३॥
कियद्दूरं ततो गत्वाऽग्रे प्रकाशं ददर्श सः। तत्र द्रोण्यां पवनस्य तपस्यन्त्यः स्त्रियः प्रभुः ॥३४॥
ददर्श रामश्चतस्रः किंचिदन्तरसंस्थिताः । अस्थिचर्मावशिष्टैश्च देहैर्दृग्गोचरीकृताः ॥३५॥
घर्मैः सजीविताश्चेति ज्ञात्वाम्ना रघूत्तम. ॥३६।
निजरूपाणि चत्वारि कृत्वादौ तत्पुर स्थितः । अब्रवीन्मधुरं वाक्यं भिन्नरूपेण ताः पृथक् ॥३७॥
वरयध्वं वरान्नार्यः प्रसन्नोऽहं रघूत्तमः । ततस्ता रामसंस्पर्शान्मांसकादिधातुभिः । ३८।
पूरितानि शरीराणि ददृशुर्नयनैर्निजैः । श्रुत्वा तद्रामवाक्यं तास्तदा स्वपुरतोऽक्षिभिः ॥३९॥

मँदा नाला बह रहा था बहुतसे कँटीले वृक्षोंकी झाड़ियां इसके आसपास लगी थीं। आगे बांसके दरोंत-की दीवारें खड़ी थीं और झांड्य तथा व्याघ्र आदि हिंसक जीव उभय भरे पड़े थे। ऐसी अवस्थामें भी राम उसके पीछे-पीछे दौड़त चल जा रहे थे। उस समय रामचन्द्रजी अपने साथियोंसे बिछुड़कर बहुत दूर निर्जन वनमें उसके साथ निकल गये । अन्तमें वह सिंह पर्वतकी एक विशाल कन्दरामे घुस गया और रामचन्द्रजी भी घोड़ेपर चढ़े हुए उसके साथ कन्दरामे घुस गये । इधर रामके लक्ष्मणादि भ्राता, उनके दूत तथा शिकार खेलानेवाले बहलिये घबड़ाकर रामको इधर-उधर खोजने लगे। उसी समय रामने सिंहको एक विकराल बाणसे मारा ॥ २५-२६ ॥ तब वह एक दिव्य पुरुषके रूपमे परिणत हो और उनको प्रणाम करके कहने लगा हे राम मै पहिले विद्याधर था ; मैंने एक बार एक पतिव्रता मुनिपत्नीके साथ हठात् भोग किया। जिससे कुपित होकर उसने मुझे शाप दे दिया कि तूने सिंहके समान बरबस मेरी आबरू उतारी है, इसलिए मेरा बाण से तू व्याघ्र सिंह हो जा। इस प्रकार शाप का जानेपर मैने उससे विनती की तो उसने कहा कि बहुतसे बहुत दिनों बाद जब रामचन्द्रजी तुझे अपने बाणसे मारेंगे तब तू शरस्पर्श होते ही शापसे मुक्त हो जायगा। सो बहुत समय बाद आपकी दयासे मै आज उस शापसे मुक्त हो गया। इस तरह अपना पूर्ववृत्तान्त सुनानेके बाद उसने रामसे आज्ञा मांगी और अपने लोकको चला गया । रामचन्द्रजी अपने घोड़े-पर बैठे ही बैठे थोड़ी देर वहाँ ठहर हो उन्होने क्या देखा कि उस गुहाद्वारपर याजनो लम्बी चौड़ी एक शिला लगी हुई है। इतनी बड़ी शिला देखकर राम विस्मित हुए और अपने धनुषकी कोरसे उसे दूर हटा दिया । तब वे उसके भीतर घुसे । कुछ दूर आगे जानेपर उन्हे कुछ प्रकाश सा दिखायी पड़ा। और आगे बढ़े तो उन्होंने क्या देखा कि चार स्त्रियां तपस्या करती हुई बैठी हैं उनके शरीरमे हड्डी और चमड़ेके शिवाय मांसका नाम भी नहीं था। उनका श्वास चल रहा था। इससे उनको यह ज्ञात हुआ कि वे स्त्रियां अभी मरीं नहीं, प्रत्युत जीवित हैं। ऐसी अवस्थामें रामने अपना चार शरीर बनाया और सबके सम्मुख जाकर कहने लगे - 'हे नारियों! तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मांग लो। मै राम तुम लोगोंको तपस्या-से प्रसन्न हूं।' इसके अनन्तर रामने अपने हाथो उनके शरीरका स्पर्श किया । जिससे उनकी सूखी देहमे रक्त-मांसादिका संचार हो गया ॥ २७-३८ ॥ शरीर भर जानेपर उन सबोने अपने नेत्रोसे रामको देखा । उस समय प्रत्येक स्त्रीके सामनेवाले राम कोटि सूर्यकी दीप्तिके समान देदीप्यमान

सर्गः ११ ] राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धम् । ४५१

सर्गः ११ ] राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धम् । ४५१

नार्यो विलोकयामासुः सर्वाः सांगुष्ठसायकान् । कराकृष्टधनुर्दण्डान्खड्गहस्तान्निशितैरसिभिः ॥४०॥
हयारूढान्नरवेषेण सर्वासां पुरतः स्थितान् । समुत्तस्थुर्जवेनैव दृष्ट्वा कञ्जलोचनाः ॥४१॥
अतिविस्मयमापन्नास्तदाऽपृच्छन्पृथक् पृथक् । के यूयं क्व गमिष्यध्वं कुतः खलु समागताः ॥४२॥
यूयं देवा दानवा वा सम्यग्ने स्वाधुना पुरः । ब्रूतानृतं वचः सर्वं यद्वै नः प्रतिभासते ॥४३॥
अस्माकं दुःशरीराणि कमनीयानि वै कथम् । जानीथ यद्यसौ दुष्टो दुन्दुभिर्जीवति वा मृतः ॥४४॥
इति तासां वचः श्रुत्वा राघवस्ता वचोऽब्रवीत् । अहं सूर्यकुले जातो रामो नाम्ना न संशयः ॥४५॥
सम्राडधिपतिः श्रीमान् सूर्यवंशसमुद्भवः । मृगयार्थमिहायातः केशरी निहतो वने ॥४६॥
धनुष्कोट्या शिलां स्पृष्ट्वा क्षिप्त्वा चोपरिभागतः । त्यक्त्वा त्वं निःशनैर्गत्वा गुहायान्निर्गताः स्म हि ॥४७॥
मया कृतानि युष्माकं गात्राणि सुदृढान्यतः । स मया निहतो वाली रावणस्थानकारकः ॥४८॥
समाश्विता वरान्दातुं यूयं नेत्रा भयाऽद्य हि । नात्रोऽस्ति मम कार्यं हि परस्वर्ग्यं पुरीं व्रजे ॥४९॥
यत्पृष्टं तन्मया चोक्तं का यूयं कथ्यतां मम । किमर्थं दुन्दुभिः पृष्टः का वांछा प्रियतां वरान् ॥५०॥
तद्राघववचः श्रुत्वा दुन्दुभिर्निहतोऽभवत् । शिलां निष्कास्यतां चापि सर्वास्तु प्रमदा ययुः ॥५१॥
ऊचुः सर्वास्तदा राममानन्दोत्फुल्ललोचनाः । वयं ब्राह्मणपुत्र्यश्च चत्वारस्त्वथ पाठकाः ॥५२॥
सहस्राणि नृपाणां च कन्यानां कश्यपात्पुरः । समानीता बलाइव तेन दुन्दुभिना प्रभो ॥५३॥
लक्ष्म्यामितिविवाहार्थं सप्तानां कदिने सहन् । कृशोऽस्मीति मन्यमानः श्रीरन्वान्ने नहार सः ॥५४॥
यानि यानि जहार स्त्रीरत्नानि रघुनन्दन । अस्यां द्रोण्यां स्थापयित्वा दत्त्वा द्वारं शिलावगम् ॥५५॥
अचलां स्थण्डिलान्यैश्च क्षीरः समानेतुमनादरम् । पुनःशरं गतो दैत्यो वयमत्रैव संस्थिताः ॥५६॥

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हो रहे थे और धनुष-बाण तथा तलवार लिये हुए थे । ३९ ॥ ४० ॥ वे मनुष्यका वेश धारण करके घोड़ेपर सवार होकर एकाएक स्वच्छन्द उन बाणोंके सम्मुख लड़े थे और उन सब स्त्रियोंका भी समान स्वरूप था और एक ही तरहकी वेष-भूषा थी । ऐसे रामको देखकर उन स्त्रियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे कहने लगीं— "आप लोग कौन हैं ? घोड़ेपर सवार होकर कहाँसे आप आ रहे हैं ? आप सब देवता हैं या दानव ? आप कहाँ जायेंगे ? कृपया हम यह भी बतलाइये कि आप हमसे क्यों बात करना चाहते हैं ? हम लोगोंका यह हीन-शीर्ण शरीर इस प्रकार सुन्दर कैसे हो गया ? वह दुष्ट दुन्दुभि जीवित है या मर गया ?" ॥ ४१-४४ ॥ इस प्रकार उनका बात सुनकर रामने उन सबसे कहा 'सूर्यवंशमें उत्पन्न और सीता डोपके अधिपति हम राम नामका मैं एक राजा हूँ । इस समय अपने एक ही रूपको चार भागों में विभक्त करके तुम सबके सम्मुख उपस्थित हुआ हूँ । मैं यहाँ जङ्गलमें शिकार करने आया था और उसी कन्दरामें मैंने एक सिंहको मारा है । फिर तुम्हारे गुफा द्वारपर एक लम्बा-चौड़ी शिला देखा । उसे अपने धनुषका अग्रसे दूर हटाकर तुम्हारे समीप आया और अपने हाथके स्पर्शसे तुम्हारे जर्जर अंगों शरीरोंको पवित्र तथा सुन्दर बना दिया है । दुन्दुभी राक्षसको बालिने मार डाला । रावणका विनाश करनेके निमित्त मैंने उस बालिको भी मार डाला है ॥ ४५-४८ ॥ केवल तुम्हें वरदान देनेकी इच्छासे मैंने तुमसे संभाषण किया है । अब यहाँसे आगे जानेका हमारा कोई कार्यक्रम नहीं है । इससे अपनी अयोध्या नगरीको लौट जाऊँगा । तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, मैंने उसका उत्तर दे दिया । अब यह बताओ कि तुम कौन हो ? दुन्दुभीको तुमने क्यों पूछा ? तुम्हारा क्या कामना है ? इच्छित वर मुझसे माँग लो ।" जब उन सबने रामके मुखसे यह सुना कि दुन्दुभी मार डाला गया और हमारे द्वारपर लगी हुई शिला भी हट गयी है तो वे बहुत प्रसन्न हुईं और आनन्दमें प्रफुल्लित होकर उन्होंने कहा हे नाथ ! बहुत दिन हुए वह दुन्दुर्भ राक्षस हम चार ब्राह्मणकी पुत्रियों तथा सोलह हजार क्षत्रियों तथा वैश्योंकी कन्याओंको हर लाया था । उसकी यह हार्दिक इच्छा थी कि मैं एक ही दिनमें एक लाख स्त्रियोंके साथ विवाह करूँगा । इसी विचारसे वह अच्छे-अच्छे कन्याओंका अपहरण किया करता था ॥ ४९-५४ ॥ हे रघुनन्दन वह जिन सुन्दरियोंको लाता था, उन्हें इसी कन्दरामें डालकर दरवाज़ेपर एक इतनी बड़ी शिला लगा दिया करता

४५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११

वसन्तेऽग्रे नृपाणां च वैश्यानां बालिकाः प्रभो । वायुपर्णाशनाः सर्वाः श्रीविष्ण्वर्पितमानसाः ॥५७॥ तत्तासां वचनं श्रुत्वा भिन्नरूपैः पुनः प्रभुः । ता उवाच स्त्रियः सोऽहं विष्णुरेव न संशयः ॥५८॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा पुनस्ता भपमब्रुवन् । दर्शयस्व निजं विष्णुरूपं चेन्मन्यवागसि ॥५९॥ ततस्ता दर्शयामास विष्णुरूपं निजं प्रभुः । तानि चत्वारि रूपाणि पगवर्थ्य रघूत्तमः ॥६०॥ ततस्ताः पुरतो विष्णुं दृष्ट्वा नेमुः स्वमस्तकैः । ततो विष्णुः स ताः प्राह वः संदेहो गतो न वा ॥६१॥ ता ऊचुर्दर्शनात्तेऽद्य भवक्लेशा गता हि नः । कियत्किंतु तत्र संदेहस्त्वज्ञानाजजनितः प्रभो ॥६२॥ ततः पुनः क्षणाद्रामो रूपं ता दर्शयन्मुदा । एकमेव हि सर्वासां मध्ये जनकजापतिः ॥६३॥ ततो रामोऽब्रवीत्ताः स वरं वरयतामिति । ता ऊचुः कामबाणेन पीडिता राघवं मुदा ॥६४॥ भव भर्ता त्वमेवाद्य गांधर्वविधिना वने । अस्माभिश्च कुरुष्वात्र सुखं क्रीडां चिरं प्रभो ॥६५॥ ततो नय पुरीं स्वीयां नस्त्वं भाव्यद्यद्विचितप । तत्तासां वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥६६॥ एकपत्नीव्रतं मेऽस्ति न शक्नोम्यत्र वै मृषा । ततस्ता विह्वला भूत्वा निपेतुर्जगतीतले ॥६७॥ पुनस्ताः प्राह रामः स शृणुध्वं वचनं मम । द्वापरे कृष्णरूपेण यूयं क्रीडां भजिष्यथ ॥६८॥ मित्रविंदा नाग्नजिती भद्राऽन्या लक्ष्मणाव्हया एवं नामानि युष्माकं भविष्यंति तदा मया ॥६९॥ भविष्यंति विवाहाश्च सर्वासां नात्र संशयः । तदा नानाविधान् भोगान् भजध्वं वै मया सह ॥७०॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा किंचित्तुष्टमनाः स्त्रियः । रामं प्रोचुः पुनर्वोक्यं त्वमग्रे गन्तुमर्हसि ॥७१॥ ताभिः शनैस्ततो रामो ययौ तुरगमस्थितः । योजनोपरि सः सर्वाः सहस्रं षोडशाः शुभाः ॥७२॥

था कि जिस आपके सिवाय किसी अन्य व्यक्तिम हटनेका सामर्थ्य नहीं था, वह हम लोगोंका इस कन्दराम डालकर कहीं चला गया है। तदनन्तर हम ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंकी कन्याएं यहां पड़ी हुई हैं। वायु तथा वृक्षोंका पत्तियां हमारा भाजन है और श्रीविष्णुभगवान्‌के चरणाम हमन अपने मन लगा दिया है। इस प्रकार उनकी बात सुनकर सबके समक्ष एक-एक स्वरूपसे खड़े श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि जिस विष्णुम तुमने अपना मन लगा रखा है, वह मैं ही हूं। रामका बात सुनकर उन स्त्रियोने कहा कि यदि तुम यह सच कह रहे हो तो अपना विष्णुरूप हम दिखाओ, इसके अनन्तर भगवान्‌ने अपने उन चारों स्वरूपोंको अपनम समट लिया और विष्णुरूपसे सबका दर्शन दिया। जब उन्होंने विष्णुभगवान्‌को अपन सम्मुख देखा तो मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। विष्णुभगवान्‌ने उनसे पूछा कि अब तो तुम्हारा सन्देह निवृत्त हुआ? उन्हान कहा कि आपके इन पुनीत दर्शनास मग सब क्लेश दूर हा गया तो फिर अज्ञानसे जायमान सन्देहक विषयम क्या कहना है ॥ ५५-६२ ॥ क्षणभरके बाद में फिर रामके स्वरूपस उनके सम्मुख खड़े दिखाई दिये और उनसे बाल कि तुम लागोकी जा इच्छा हो, वह वर मांगो। तब कामबाणस पीडित होकर उन स्त्रियान कहा कि यदि आप हमारे ऊपर प्रसन्न हैं तो हम लागांक साथ गान्धर्व विवाह करके हमारे पति बनिये और अधिक समयतक आनन्दपूर्वक इस कन्दराम हम लागोंके साथ विहार कीजिए। उनके यह प्रार्थना सुनकर रामन कहा कि ऐसा ता नहीं हा सकता। क्योंक मे एकपत्नीव्रतवचारी हूं। मै कभी झूठ नहीं बाल्ता, तुमस सच कह रहा हूं यह बात सुनते ही व स्त्रियां मूछित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ६३-६७ ॥ ऐसी दशाम राम उनका समझाते हुए कहन लगा- इस प्रकार अधीर न होकर मेरी बात सुनो । अभो तो नहीं द्वापर युगमें कृष्णरूपसे मैं तुम लोगोंक साथ विहार करूंगा। मित्रविन्दा, नाग्नजिती, भद्रा तथा लक्ष्मणा इस प्रकार तुम लाग का नाम पड़ेगा और उस समय तुम सबका विवाह मेरे साथ होगा। इसम कोई सन्देह नहीं है। उस समय तुम सद मेरे साथ नाना प्रकारके सुख भोगना। रामकी बातोंको सुनकर उनका मन कुछ सन्तुष्ट हुआ और कहा कि अब आप चाहे तो जा सकते हैं। राम उन चारों कन्याओंके साथ धीरे-धीरे आगे बढ़। एक योजन आगे जाकर गण्डका नदाक किनार एक झाड में

सर्गः ११ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४६५


ददर्श गण्डकीतीरे वृक्षषण्डे रघूद्वहः। निमीलिताक्षः शुष्काङ्गतपसा ह्यर्धयौवनाः ॥ ७३॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्धे
द्विजकन्याचतुष्टयवरदानं नामैकादशः सर्गः ॥ ११ ॥


द्वादशः सर्गः

( सोलह हजार ललनाओं तथा कालिन्दी आदि चार स्त्रियोंको रामका वरदान )

श्रीरामदास उवाच

अथ रामः शनैः सर्वाः स्पृष्ट्वा निजकरेण ताः । कृत्वा तारुण्यपूर्णाश्चपूरिताः प्राह सादरम् ॥ १ ॥
पूर्ववत्सकलं वृत्तं सर्वाः सथाऽथ विस्तरात् । वरं वरयतां शीघ्रमित्युक्त्वा च रघूत्तमः ॥ २ ॥
हतं तं दुन्दुभिं श्रुत्वा दर्पोत्फुल्लानना स्त्रियः। पूर्ववद्विष्णुरूपाणि सहस्राणि हि षोडश ॥ ३ ॥
सन्दर्शितानि रामेण तावंति च स्थितानि हि । रामरूपाणि ता दृष्ट्वा ज्ञात्वा विष्णुं परात्परम् ॥ ४ ॥
तं वरान्द्वरयामासुस्त्वन्नो भर्ता भव प्रभो । ततो राममुवाचाऽऽत्मन्येकपत्नीव्रतस्थितम् ॥ ५ ॥
परस्परं ताः सम्मन्त्र्य प्रोचुः भर्ता मृगीदृशः । मया वृतस्त्वया चायं त्वया वृतस्तथा मया ॥ ६ ॥
एवं तासु च सर्वासु वदन्तीषु रघूत्तमः । श्रुत्वा तद्वचनं शिष्य तदा चित्तेऽव्यचारयत् ॥ ७ ॥
इमा वदंति किं सर्वा मां ज्ञात्वाऽपि व्रतस्थितम् । बलात्कारेण मां भोक्तुं मन्त्रयन्ति परस्परम् ॥ ८ ॥
ब्रह्मरुद्रमघवादयः सुरा ये च सिद्धमुनयः पुरातनाः ।
तेऽपि योगबलिनो विमोहिताः लीलया तदबलाभिरद्भुतम् ॥ ९ ॥
योषितां नयनतीक्ष्णसायकैर्धनुर्लतासमुद्धृतापनिर्गतैः ।
धन्विना मकरकेतुना हतः कस्य नो पतितो मनोमृगः ॥ १० ॥
तावदेव दृढचित्तता नृणां तावदेव गणना कुलस्य च ।
तावदेव तपसः प्रगल्भता तावदेव नियमव्रतादयः ॥ ११ ॥


उस सोलह हजार स्त्रियोंको देखा। वे सब आंखें मूंदे थीं, तपस्यासे उनका शरीर सूख गया था और यौवन नष्ट हो चला था ॥ ६८-७३ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीय सं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे एकादश सर्गः ॥ ११ ॥

श्रीरामदास बोले—इसके अनन्तर रामने ज्ञान हाथके स्पर्शसे उन सबको यौवनसम्पूर्ण कर दिया तो वे भी पहलेवाली चारों स्त्रियोंके समान अपना वृत्तान्त बता गयीं । रामने उनसे कहा कि तुम्हारो जो इच्छा हो, वह वरदान मुझसे मांग लो । उन्होंने भी जब दुन्दुभीके मरनेका समाचार सुना तो बहुत प्रसन्न हुईं। इसके अनन्तर रामने उन्हें भी अपना विष्णुरूप दिखा तथा सोलह हजार रामरूप धरकर प्रत्येक स्त्रीको अलग-अलग दर्शन दिया । स्त्रियोंने इस प्रकार रामरूपको देखकर उन्हें सर्वश्रेष्ठ विष्णुभगवान् जाना । १-४ ॥ उन्होंने भी पहलेवालियोंकी तरह रामसे प्रार्थना की कि आप मेरे पति बनें। जब उनको रामने अपनेको एकपत्नीव्रती बतलाया तो वे आपसमें सलाह करके कहने लगीं कि जैसे मैने इनको पसन्द किया है, उसी तरह तुमने भी तो किया है। सब आओ, हम सब मिलकर कोई ऐसा प्रयत्न करें कि जिसमे हमारी कामना पूर्ण हो जाय । इस प्रकार जब रामने उनकी सलाह सुनी तो अपने हृदयमे विचार करने लगे कि एकपत्नीव्रतमें स्थित देखकर भी ये स्त्रियां बरबस मेरे साथ संभोग करना चाहती हैं ॥ ५-८ ॥ ब्रह्मा रुद्र, इन्द्रादिक देवता एवं जितने पुरातन सिद्ध-मुनि हो गये हैं, वे सब योगी होकर भी कामिनियोंकी बदभुत लीलासे मुग्ध हो गये थे ॥ ९ ॥ स्त्रियोंके नेत्ररूपी सायकको धनुर्धारी कामदेव जिसके ऊपर छोड़ता है तो किसका मनरूपी

४५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२


यावद्देवं गतिर्नास्त्यवसंवने मद्यति द्रुतमदेन पूरुषः ।
मोहयंतु मदयन्तु रागिणं योषितः स्वचरितैर्मनश्शरैः ॥ १२॥
मोहयन्ति मदयन्ति मामिमा धर्मलक्षणवरं हि कैर्गुणैः ।
मांसरक्तमलमूत्रपूरितं योषितां वपुरिह निर्गुणेऽशुचौ ॥१३॥
कामिनस्तु परिकल्प्य चारुतामारभन्ति सुविमूढचेतसः ।
दारुणः परिक्लान्तिदाऽनामनिनिधिविमलबुद्धिर्वानभिः ॥१४॥
यावद्देव न मत्समीपमागतास्तावदेव हि व्रजाम्यदृश्यताम् ।
तर्हि में व्रतमित्दं सुनिर्मलं नान्यथा कथमहं करोम्यदह ॥१५॥
अथवा किं करिष्यन्ति मामेकदयिताप्रियम् । इति निश्चिय श्रीरामश्चन्द्र तूष्णीं स्थितोऽभवत् ॥१६॥
एतस्मिन्नन्तरे सर्वास्तास्तं प्रोचुर्नृपात्मजम् । वृत्तञ्च वृत्तसम्भाविनात्र कार्या विचारणा । १७॥
एकपत्नीव्रतं किं ते पार्थिवस्य श्रुतम् । अस्ति चेत्संगता प्राप्तं फलं भोक्तुमर्हसि ॥१८॥
इत्युक्त्वा तास्तदा सर्वा गत्वा तन्मन्निधिं जवात् । सङ्गालभ्यन्दनैश्च भुजपाशान् प्रचक्रिरे ॥१९॥
तद्दृष्ट्वा राघवः प्राह शृणुध्वं वचनं मम । युष्माभिरुक्ते सद्गमनुकूलं प्रियं वचः । २०॥
यतिनस्तन्न योग्यं मे मा खेदं गन्तुमर्हथ आकर्ण्य रामवाक्यानि तमूचुस्ताः समन्ततः ॥२१॥
सकामध्वनिनोत्कण्ठाः कोकिला इव माधवे ।
गोपसाम्प्रदायिक ऊचु
धर्मादर्थोऽर्थतः काम कामाद्धर्मफलोदयः ॥२२॥
इत्येवं निश्चय शास्त्रे वर्णयन्ति विपश्चितः । स कामो अतबाहुल्यात्पुरस्ते समुपस्थितः । २३॥
सेव्यतां विविधैर्भोगैः स्वर्गभूर्मार्गण मनः । अन्वा तडच्न नागां गमन्ताः प्राह सम्मितः , २४॥


मृग उस वाणसे घायल नहीं हो जाता ॥ १० ॥ मनुष्यका चित्त तभी तक वश रहता है, तभी तक कुलकी मर्यादा रहती है, तथा तब तक याग मन त्याग है तभी तक नियम व्रत आदि होते हैं, जबतक स्त्रियोंके चञ्चल कटाक्षोंसे पुरुषका मन मतवाला नहीं हो जाता और जबतक स्त्रियाँ उनपर मोहिनी डालकर अपने मनोहारी हाव-भावोंसे मोहित नहीं बना देतीं ॥ ११ । १२ ॥ ... पुरुष अपना धर्मकाम तत्पर जानकर भी अपने गुणोंसे मुग्ध करना चाहता है । मांस रक्त और मल-मूत्रसे परिपूर्ण स्त्रियोंकी अपवित्र देहपर कामी पुरुष सौन्दर्यकी कल्पना करके आनन्द लूटते हैं । भयं सम्भवता तो केवल दुःखदायक है । क्योंकि विमल बुद्धिवाले लोगोंका कहना तो यह है कि स्त्रियोंका संग बड़ा ही दारुण पश्चात्तापका हेतु होता है । अच्छा, जबतक ये मेरे समीप नहीं आ जातीं, इसके पहले ही मैं अन्तर्धान होऊँ तो अच्छा है, मेरा व्रत निर्मल रह जाय । इसके सिवाय और कोई उपाय भी तो नहीं दीखता । १३-१५ । अच्छा, यह भी देख लूँ कि ये मेरे साथ क्या करती हैं, यह निश्चय करके रामचन्द्रजी चुपचाप बैठ गये । १६ । इतनेमें ही वे सब स्त्रियांने एक स्वरसे कहा कि हम लोगोने आपको अपना पति मान लिया है । अब आप इस प्रकारका विचार मत करिये ॥ १७ ॥ हे राम क्या आपने एकपत्नीव्रत धारण किया है ? यदि ऐसा है तो अब उससे प्राप्त फलका उपभोग कीजिए ॥ १८ ॥ ऐसा कहकर वे सब उनके पास पहुँची और दौड़ती-दौड़ती दोनों भुजाओंसे रामको अपने भुजपाशमें बांधनेकी चेष्टा करने लगीं । १९ ॥ ऐसी अवस्था में रामने उनसे कहा कि आप सब जो कुछ कह रही हैं, वह ठीक ही है। किन्तु हमारे जैसे वानप्रस्थियोंके लिए वह उचित नहीं है। इसलिए तुम सब किसी प्रकारका खेद न करके पुनः दुर्योधनके यहां जाओ । इधर तो वे सब रामके वचनोंको सुनकर बड़े आदरसे सब कहने लगीं । उस समय वास्तवमें उनके कण्ठकी ध्वनि वसन्त ऋतुके कोकिलके समान मधुर सुनाई देती थी ॥ २०-२१ । सोलह हजार स्त्रियां बोलीं—धर्मसे अर्थकी प्राप्ति होती है, अर्थसे काम प्राप्त होता है और कामसे धर्मफल मिलता है । विद्वान् लोग शास्त्रोका यही निर्णय बतलाते हैं । वही काम आपके

सर्ग १२] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४१०


श्रीरामचन्द्र उवाच

वरान् दास्यामि युष्माकं नान्यं श्रोष्यामि किंचन । इत्युक्ताः पुनरूचुस्ताः किं त्वं वदसि राघव ॥२५॥

ता ऊचुः

दिव्यौषधं ब्रह्मविद्यो रसायनं सिद्धिनिधिः साधुकुला वरांगनाः ।
मन्त्रस्तथा ऽन्नजले च धर्मतो नेमे निषेध्याः सुधिया मयागताः । २६॥
कार्यं तु देवाद्यदि सिद्धिमभ्येतं तस्मिन्नुपेक्षां न च यान्ति नीतिगाः ।
यस्मादुपेक्षा न पुनः फलप्रदा तस्मान्न दीर्धीकरणं प्रशस्यते ॥२७
स्नेहानुगताः सुजनजन्मनिर्मलाः स्नेहार्द्रचित्ताः सुगिरः स्वयङ्गताः ।
कान्ताः सुरूपाः परिपूर्णयौवना धन्या लभन्तेऽत्र नरास्तु नेतरे ॥२८।
क्व वयं भूमिपादेयंः क्वैकपत्नीव्रतं तव । तस्मादस्मानिदानीं त्वं न निराकर्तुमर्हसि ॥२९॥
गान्धर्वेण विवाहेन नान्यथा भोऽस्तु जीवितम् । श्रुत्वा वाक्यं तु तासानां राघवः प्राह ताः पुनः ॥३०॥
भो मृगाक्ष्यः कथं त्यक्त्यो धर्मो धर्मविचक्षणैः । धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चैतत्चतुष्टयम् ॥३१॥
यथोक्तं सकलं ज्ञेयं विपरीतं तु निष्फलम् । तस्मान्मयोक्तं यत् पूर्वमेकपत्नीव्रतं निजम् ॥३२॥
अस्मिन् जन्मनि तन्नाहं त्यक्तुमिच्छामि भोः स्त्रियः ।
एवं श्रुत्वाऽऽशयं तस्य ताः सर्वाश्च परस्परम् ॥३३॥
करात्कराम् प्रमुच्याथ जगृहुर्धरि ततःपदाः । अन्येष्वपि तथारभ्य हुती तु जगृहुश्च ताः ॥३४॥
एवं तैर्विनिवार्यमात्मानं वीक्ष्य राघवः । अन्तर्धानमगात्तत्र तासां मध्ये क्रमात् प्रभुः । ३५॥
किं कुर्वन्ति स्त्रियः सर्वा हन्तर्धाने गते मयि । एवं रामा कौतुकं हि गुरुपुत्रे ददर्श कः ॥३६॥


इसकी प्रबलतासे स्वयं प्राप्त हुआ । २२ ।। २३ ।। विविध प्रकारके भोगोंका उपभोग करेंगे तो इसमें सन्देह नहीं है कि वह मर्त्यलोक ही आपके लिये स्वर्ग बन जायगा । उनकी बात सुनकर घबराये हुए रामचन्द्रजी कहने लगे कि सिवाय वर मांगनेके मैं तुम्हारा एक बात भी नहीं सुनूँगा । रामके ऐसा कहनेपर उन स्त्रियोंने कहा— हे राघव ! आप यह क्या कह रहे हैं ? ॥२४।२५॥ दिव्य औषधि, ब्रह्मको जाननेके सम्बन्ध रखनेवाली वाणी, रसायन, सिद्धिके खजाने, निधियां, अच्छी कलायें, अच्छी स्त्री और अन्न-जल पाकर सज्जनजन कभी नहीं छोड़ते ॥ २६ ॥ जो कोई कार्य दैवात् सिद्ध हो सकता है तो नीतिज्ञ जन उसकी कभी उपेक्षा नहीं करते । फिर उसकी उपेक्षा करनेसे कोई लाभ नहीं हो तो उसकी उपेक्षा ही क्यों की जाय । अथवा आडम्बर बढ़ानेकी क्या आवश्यकता ? ॥ २७॥ बड़े प्रेमयुक्त, अच्छे कुलमें उत्पन्न, जिनका चित्त स्नेहस आर्द्र हो गया हो, जो अच्छी-अच्छी बातें करती हों, जो वरके पास स्वयं आ पहुँची हों, जिनका सुन्दर स्वरूप हो और जिनका यौवन भी पूरी तरह उमड़ आया हो। ऐसे स्त्रियोंको जो लोग पाते हैं, वे धन्य हैं। साधारण श्रेणीके लोग ऐसी स्त्रियोंको नहीं पाते ॥ २८ ॥ कहाँ हम जैसी सुन्दरी स्त्रियां और कहाँ आपका एकपत्नीव्रत । इस कारण हम फिर भी कहती हैं कि आप हमारा निरादर न कीजिए ॥ २९ ॥ बिना आपके साथ गन्धर्व विवाह किये हम लोग नहीं जी सकेंगी । उनका बात सुनकर रामने कहा। श्रीराम बोले— हे मृगके समान नेत्रोंवाली स्त्रियो ! तुम- कैसे यह कह रही हो कि कामको मुख्य देखकर धर्मका परित्याग कर दो। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पदार्थ हैं। यदि एकके बाद एकका अच्छी तरह साधन किया जाता है तो वह सफल होता है। अन्यथा निष्फल हो जाता है अथवा विपरीत फल देनेवाला होता है । अतः जो मैंने अपने एकपत्नीव्रतका कारण बतलाया है, उसका परित्याग नहीं कर सकता। इस प्रकार रामका आशय जानकर वे आपसमें एक दूसरेका मुँह देखने लगीं ॥ ३०-३३ ॥ तदनन्तर हाथ छोड़कर स्त्रियोंने रामका पैर पकड़ लिया, किन्तु कुछ स्थिति होने भी पकड़ न पा ॥ ३४ ॥ इस तरह उन लोगोंसे अपनीको घिरा हुआ देखकर राम वहाँ ही अन्तर्धान हो गये ।

१५८आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

अदृष्ट्वा राघवं सर्वास्ताः शृण्वन्नप्रमदोत्तमाः । दृष्ट्वा तदद्भुतं कर्म विस्मयाविष्टमानसाः ॥३७॥
वित्रस्तहृदयाः सर्वाः कुरंग्य इव कातराः । संभ्रांतनयना दीना इत्यूचुस्ताः परस्परम् ॥३८॥
व्याप्तं च हृदयं तासां तदैव विरहाग्निना । ज्वलज्ज्वालानलेनैव मूर्च्छिन्नं सार्द्रकाननम् ॥३९॥
त्यजैन्द्रजालिकां मायां कांत दर्शय मन्वरम् । स्यान्मानं नर्पणा युक्तं प्राग्ग्रासे मक्षिकाऽपतत् ॥४०॥

स्त्रिय ऊचु
हा कष्टं दर्शितः कस्माद्वाञ्छा किं रचितं त्विदम् ।
ज्ञातं महत्तमं तापं दातुं नस्त्वं समागतः ॥४१॥
कच्चित्त्वं निर्दयं चेतः कच्चिदस्मान् परीक्षसि ।
कच्चित्तुष्टोऽसि हे कांत कच्चिन्मुष्णासि नो मनः ॥४२॥
कच्चिन्नो प्रत्ययोऽस्मासु कच्चिदस्मासु नो रतिः
कच्चिद्विनोदयसि नः कच्चिन्मायाविशारदः ॥४३॥
कच्चिच्चित्ते प्रवेष्टुं त्वं वेत्सि विज्ञानलाघवम् । कच्चिद्विनापराधं हि त्वमस्मासु प्रकुप्यसि । ४४॥
कच्चिद्दुःखं न जानासि परेषां विप्रलंभजम् । स्वदर्शनं बिना नूनं हृदयेधर सांप्रतम् ॥४५॥
न जीवामोऽथ जीवामः पुनस्त्वद्दर्शनाशया । अस्मांस्त्वं नय त्वं हि यत्र नाथ गतो ह्यसि ।४६।
सर्वथा दर्शनं देहि कारुण्यं भज सर्वथा । पश्यन्तं न हि पश्यति कस्यचिन्मृजता जनाः ॥४७॥
इत्थं विलप्य ताः सर्वाः प्रतीक्ष्य च बहुक्षणम् ।
रामं द्रष्टुं वने सर्वा बभ्रमुस्ता इतस्ततः ॥४८॥
वृक्षान् वनेचरान् रामो दृष्टोऽस्माकं पतिर्न वा ।
एवं सर्वांस्तु पप्रच्छु रामविश्लेषमज्वराः ॥४९।
रे रे पिप्पल वृक्षाणामधिपस्त्वं ब्रवीहि नः । रामो दृष्टोऽथ वा नैव वयं त्वां शरणं गताः । ५०॥

फिर भी वे क्या करती हैं, यह देखनेके लिए राम गुप्तकूपसे वहाँ खड़े-खड़े देख रहे थे ॥ ३७ । ३८ ॥ क्षणभरमें रामको अलक्षित देखकर वे बहुत चकरायीं । फिर व्याकुल होकर हरिणियों के नाई चञ्चल नेत्रोंसे इधर-उधर देखती हुई आपसमें कहन लगीं । ३७ । ३८ । उस समय उनका हृदय विरहाग्निमे पूर्ण हो गया था । उनकी उस विरहाग्निकी ज्वालासे उस जङ्गलमें भी थोड़ी देरके लिए तृणोंको धारा बदल गयी ॥ ३९ ॥ वे बोलीं— हे कान्त इस ऐन्द्रजाल (ठगहारी) मायाका परित्याग करके हमें शीघ्र दर्शन दीजिए । हमने आपसे हँसी की और पहले ही ग्रासमें मक्खी गिरनेके समान इतना बड़ा विघ्न आकर उपस्थित हो गया ॥ ४० । कितने दुःखकी बात है। हे विधातृ ! तुम्हारी क्या इच्छा है ? हे विश्वंभर ! ज्ञात पड़ता है कि तुम हम सबको सन्ताप देनेके लिए ही यहाँ आये थे । ४१ ॥ तुम्हारा हृदय ही निष्ठुर है या हम लोगोंकी परीक्षा ले रहे हो । हमसे नाराज़ हो या हमारा चित्त चुरा रहे हो ? । ४२ ॥ क्या हमारे ऊपर तुम्हारा विश्वास नहीं है ? क्या हमसे प्रेम नहीं करते हो ? हम लोगोंके साथ ठठोली तो नहीं कर रहे हो ? क्योंकि तुम मायाजाल फैलानेमें भी बड़े निपुण हो ॥ ४३ ॥ तुम किसीके चित्तमें घुसनेका कोई वैज्ञानिक एवं सूक्ष्म साधन जानते हो । बिना किसी अपराधके हमसे इतने क्यों रूठ गये हो ? । ४४ ॥ दूसरेको धोखा देनेसे जो दुःख होता है, क्या तुम उसे नहीं जानते ? बिना तुम्हारा दर्शन पाये हम लोग नहीं जी सकेंगी और यदि जियेंगी भी तो तुम्हारे दर्शनोंकी ही इच्छासे, अन्यथा नहीं । हे नाथ ! हमें भी वहीं ले चलिये, जहाँ आप गये हों ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ दया करके हमें दर्शन दीजिए। सज्जनजन कभी किसीका दुःख नहीं देख सकते ॥ ४७ ॥ इस तरह बहुत देरतक विलाप करके उन्होंने उनके आनेकी प्रतीक्षा की । तब भी जब वे नहीं आये तब वे उनको ढूँढ़नेके लिये वनमें इधर-उधर घूमने लगीं ॥ ४८ ॥ रास्तेके प्रत्येक वृक्ष और वनके पशुओंसे वे रामविरहिणियां यह

सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४८९

सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४८९

भो भो तुलसि नो नाथस्त्वया रामो निरीक्षितः । बद श्वावास्त्व त्वं नोऽने रामो निरीक्षितः ॥५१॥ त्वं कोकिल सदा शब्दान् करोषि परमान् शुभान् । वदाद्य जानकीकान्तस्त्वयाऽरण्ये निरीक्षितः ॥५२॥ भो कदंब वदस्व त्वं तत्र पृच्छामहे वयम् । दीनानाथो रमानाथाः र्सोवानाधस्त्वयेक्षितः ॥५३॥ पिक त्वमुत्तरं देहि सदा शब्दान् करोषि हि । पीतंर्नः श्रीपतिः संतापातेदृष्टोऽथवा न वा ॥५४॥ भो वरग मदोन्मत्त शृंगारजसमः प्रभुः । सप्तद्वीपपतिः श्रीमान् रामोऽरण्ये निरीक्षितः ॥५५॥ शुक नः कथयाद्य त्वं प्रभुर्दृष्टोऽथ वा न वा । वद पुण्ये सरिच्छ्रेष्ठे किं तूष्णीं संस्थिताऽधुना ॥५६॥ नः प्रभुः सप्तद्वीपानां प्रभुश्च निरीक्षितः । भो वायो कथयाद्य त्वं सीताराम्रो निरीक्षितः ।५७॥

श्रीरामदास उवाच एवं ता रामविश्लेषसंभ्रांताः शुशुचुर्वने । ततस्ता गडकीतीरं गत्वा गीतं प्रचक्रिरे ॥५८॥

स्त्रिय ऊचुः किं प्रभो त्वया जानकी यदा तेन रक्षसाऽरण्यमभ्यतः । स्वस्थयं हृता गौर्त्रानीतटात्तत्कृते त्वया नैव शोचितम् ॥५९।१॥ त्वद्वियोगतप्तममानसाः सर्वतो वने शोकमग्नगाः । एकदा प्रभो देहि दर्शनं देहि नो वरान् माऽस्तु वै रतिः । ६०।२॥ नो वाञ्छामो राघव त्वत्तो रतिमद्य यद्वहत्तं भूमूरजाम्प्यो वरदानम् । तद्वत्त्वंस्त्वं पूरय कामान्वरदानैर्वाञ्छामस्ते सेवनमग्रये जननेऽपि ॥६१।३॥


पूछती जाती थी कि तुमने हमारे पति रामको तो इधर कहीं नही देखा है ? । ४६ । वे कहती थी कि हे वृक्षोंके राजा विप्लवदेव ! हमें बताओ कि तुमने रामको तो नही देखा है ? हम आपकी शरणम हैं ॥५०॥ हे तुलसी देवी ! तुमने तो रामको नहीं देखा है ? हे वानरगण इस वनमें तुमन कहीं रामका तो नहीं देखा है ? ॥ ५१ ॥ हे कोकिल ! तू वहीं मीठा वाणी बोलता है, अब उसी भाषण हम यह बताव कि तून वनम कहीं रामचन्द्रको तो नही देखा है ? ॥ ५२ ॥ हे कदम्ब तुझम हम सब स्त्रियां यही पूछना चाहती है कि तूने सीतापति रामको तो कहीं नहीं देखा ? ॥ ५३ । अरे पिक ! तू सदा पीकहा पीकहा बोलता रहता है। अब हमें यह बता कि तूने कहीं जानकीवल्लभ रामको देखा है ? देखा हो तो बतला व ॥ ५४ ॥ हे मतवाले गजराज ! मन्दोधाम हाथोके समान श्रेष्ठ रामचन्द्रजीको तो तूने नहीं देखा है ? ॥ ५५ । हे शुक ! तू ही बता दे कि इस वनमें कहीं रामको देखा है ? हे पवित्र नदी ! तू क्या चुप है, मन्दोदक अशोकवर और हम लोगोंके प्रभु रामचन्द्रजी को तो नूत नही देखा है ? यदि देखा हो तो बता दे । हे वायो ! कहो, तुमने इस वनमें कहीं सीतापति रामको देखा है ? । ५६ ॥ ५७ ॥ श्रीरामदास कहते यन—इस प्रकार रामके वियोगसे पगली सी होकर वे स्त्रियां विलाप करती हुई चलती-चलती गण्डकी नदीके किनारे जाकर इस तरह प्रार्थनाभरे गायन गाने लगी - ॥ ५८ ॥ हे प्रभो ! जब रावण वनमेंसे समाका हरण करके अपनी राजधानी लङ्काको ले गया था, तब क्या उनके लिए आपने कोई शोक नहीं किया था ? ॥ ५९ । १ हे नाथ ! आपके वियोगसे हमारा हृदय जला जा रहा है। शोकमें व्याकुल होकर हम सब इस वनम आ पहुँची हैं। हे प्रभो ! हमें एक बार अपना दर्शन दे दें और कुछ वरदान भी दे दें.... तुमसे प्रेम नहीं करना चाहते ता न करिए ॥ ६० ॥ २ । हे राघव जबतक हम यहाँ हैं तबतक आपका दर्शन चाहती थी । अब उसकी इच्छा भी नहीं रह गयी ! जिस प्रकार आपने केतु (सीता) को वरदान दिया था, उसी

४३० आनन्दरामायणे [ सर्ग ११

अस्माभिर्यच्चञ्चलभावादापराधं कृतं त्वं नः स्मर एवं करुणातः ।
तः प्राणास्ते दर्शनहेतोस्तनुमध्ये तिष्ठन्ति त्वां पदशङ्खत्रयाच्ञा क्रियतेऽद्य ॥६२॥४॥
भो भो राघव मा रुषं त्वं क्रोधं मा मत्र दर्शयश्च ।
पर्याप्तं न हि दर्शनार्थं वाञ्छामो न हि त्वत्तः कामम् ॥६३॥५॥
देहि त्वं निजदर्शनलाभं जन्मान्तरेऽर्पय नो वरदानम् ।
पाहि न्द शरणं प्रपन्नानां सर्वाङ्गाग्र्यै र्नः प्रणामार्थः ॥६४॥६॥
राम त्वं किं निर्दयहृदयस्त्वयि नः किं नायान्येष स्त्रीजनकरुणा हृदये ते ।
इत्थं क्रोधं त्यज्यदयुगले पतितासु कर्तुं विष्णो नार्हसि वरदो भव नोऽद्य ॥६५॥७॥
बाले दीने स्त्रीजनविमले तनये श्व नो कुर्वन्त्यन्यं बहुविभवज्ञा मतिसंतः ।
क्रूरं क्रोधं त्वं त्यज वरदो भव नोऽद्य बार बार करकमलैस्त्वां प्रणामम् ॥६६॥८॥
हे नाथ राघव रमेश्वर रावणारि सीतापते रिपुनिषूदन कञ्जनेत्र ।
त्वं देहि राम निजदर्शनमद्य विष्णो दुःखार्णवान्नस्तर नय कामिनीर्नः । ६७॥९॥
भवत्पादपद्मवरसेवनमर्थयामो जन्मान्तरे कुरु दयां करुणासमुद्र ।
नोचेत्तवाद्य विरहाद्विजनास्तितानि त्यक्ष्याम एव नियतं महताऽद्य नद्याम् ॥६८।१०॥

श्रीरामदास उवाच

नारीगीतं राघवोऽपि श्रुत्वा प्रत्यक्षीऽभूत्कामिनीनामथाग्रे ।
दृष्ट्वा रामं ताः स्त्रियाऽतिसंतुष्टाः प्रोत्फुल्लास्यास्तं प्रणेमुः शिरोभिः ॥६९॥११॥
नारीगीतं मानवश्चापि श्रुत्वा समान् कामान्प्राप्नुयान्निश्चयेन ।
तस्मादेतन्सर्वदा कीर्तनीयं श्लोकार्धाद्यं प्राप्य छन्दांश्चतस्रः ॥७०॥१२॥


अच्छे वरदान देकर हमारी भी कामना पूर्ण कर। हम किया अगले जन्ममें ही आपकी सेवा करना चाहती हैं ॥६२। ३॥ हमने करुणावश अथवा चञ्चलतास कोई अपराध किया हो तो उस आप भूल जायें । मेरे प्राण आपके दर्शनार्थ आकुल हैं। इस समय हम आपके दर्शन का ही भीख मांग रही हैं ॥६२ ॥ ४ ॥ हे राघव ! आप नाराज न हों और दाक्षिण्योपर क्रोध न दिखलायं । हम सब आपस कामवासनाकी पूर्ति नहीं चाहती ॥ ६३ ॥ ५ ॥ इस समय आप हमें अपना दर्शन और दूसरे जन्मके लिय वरदान दें। हम सब आपकी शरणमे हैं। आप हमारी रक्षा करक हमारा निस्तार करिए। हम आपको प्रणाम करती हैं ॥ ६४ ॥ ६॥ हे राम ! क्या आप इतने निर्दयो हैं कि जो हम स्त्रियोंको इस प्रकार दुःखी देखकर भी आपके हृदयमे दया नहीं आती ? हे विष्णो ! आपके पैरोंमे पड़ी हुई हम अबलाओपर आपको इस प्रकार कोप नहीं करना चाहिए। हमपर दया करके हमें वरदान दीजिए । ६५ । ७ । बुद्धिमान् लोग बच्चोंपर, गरीब स्त्रियोंपर तथा अपनी सन्तानपर इस प्रकार कोप नहीं किया करने, इस कारण अपने क्रूर कोपका प्रत्याहार कीजिए । हम सब हाथ जोडकर प्रणाम करती हैं, हमें वरदान दीजिए । ६६ ॥ ७॥ हे नाथ ! हे राघव ! हे रमेश्वर ! हे रावणारि ! हे सीतापते ! हे रिपुनिषूदन ! हे कञ्जनत्र ! हे विष्णो ! हे राम ! अपना दर्शन देकर आप हम कामिनियोंको दुःखसंसारसे पार कीजिए॥६७॥६॥ हे करुणाके समुद्र ! अब दया कीजिए। हम दूसरे जन्ममें आपकी सेवा करनेकी इच्छुक हैं । हम आपसे यही भिक्षा माँगती हैं। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो आपके विरहदुःखसे दुःखित हम सब स्त्रियाँ इसी गण्डकी नदीमें कूदकर अपन प्राण त्याग देंगे ६८ । १० ॥ रामदासने कहा- इस प्रकार उन कामिनीयोंका विलाप सुनकर रामचन्द्रजी उनके सामने प्रकट हो गये। रामको प्रत्यक्ष देखकर वे स्त्रियाँ बहुत प्रसन्न हुई ओर विकसित वदन होकर बार बार प्रणाम करने लगीं ॥ ६९ ॥ ११ ॥ प्रत्येक मनुष्य इस नारीगीतको सुनकर अपनी अभिलषित कामनाएं पूर्ण कर सकता है। इसलिए लोगोको चाहिए कि सदा इस नारीगीत-

सर्गः १२] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४६१

सर्गः १२] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४६१

अथ रामो ददौ ताभ्यो वरान्स्वास्तोषयन् प्रभुः । पूर्वं भृगुश्रवं भो नार्यः पुरा व्यासाग्रतो मया ॥७१॥ बहुस्त्रीहेतुना रूपमूर्त्तयः षोडशांगिनाः । तासां दानेन संतुष्टास्ते विप्रा मां सदाऽब्रुवन् ॥७२॥ फलं सहस्रगुणितं तवास्तु रघुनन्दन । अनन्तरूनतश्चाहं द्वापरे कृष्णरूपधृक् ॥७३॥ करोमि पाणिग्रहण युष्माकं द्वारकापुरि । यूयं नानान्नृपाणां च भविष्यथ् बालिकास्तदा ॥७४॥ भौमासुरस्तदाऽयं वै दुन्दुभिस्तु भविष्यति । भौमासुरश्च युष्माकं पूर्ववन्म हरिष्यति ।७५॥ तदा सर्वा मोचयिष्ये हत्वा तं जगतीसुतम् । ततो मया सुखेनैव क्रीडध्वं हि यथारुचि ॥७६॥ एवं ता रामवाक्यं तच्छ्रुत्वा प्रमुदिताननाः । आनन्दोत्फुल्लनयनाः सुखमापुर्वरांगनाः ॥७७॥ एतस्मिन्नंतरे रामं पश्यन्तो लक्ष्मणादयः । शनैर्मात्राप्युस्तत्र पदांकितपथा प्रभुम् ।७८॥ षोडशस्त्रीसहस्राणां मध्ये दृष्ट्वा रघूत्तमम् । परं विस्मयमापुस्ते प्रणेमुर्जगदीश्वरम् ॥७९॥ श्रुत्वा राममुखात्सर्वं यथावृत्तं सांत्वनंगम् । सर्वं मन्तुष्टमनसस्तस्थुः धाराद्यग्रतः ।८०॥ ततो रामाज्ञया दूताः शतशोऽथ सहस्रशः । वाहनान्यामयामासुः सेशास्तत्स्थलन्मुदा ॥८१॥ तेषु ताः स्वाः सुमध्योप्य वाहनेषु रघूत्तमः । शनैः सेनानिवासे स ययौ सीतांतिके प्रभुः ॥८२॥ ततस्ता जानकीं नेमुः सीतां वृत्तं रघूत्तमः । यथा वृत्तं तथा सर्वं कथयामास कौतुकात् ॥८३॥ ततस्ताः पूजयामास वस्त्रराभरणैरसौ । ततो रामः स कासारं सेनावासस्थलांतिके ॥८४।

के श्लोकोंका पाठ किया करें ॥७० ॥ १२ । इसके अनन्तर उनको वरदान देते हुए रामचन्द्रजी कहने लगे—हे स्त्रियों ! बहुत दिनोंकी बात है कि मैंने एक समय बहुत-सी स्त्रियोंको पानका इच्छासे व्यासजीके सम्मुख सुवर्णको सोलह स्त्रियां बनवाकर ब्राह्मणोंको दान दिया था । इससे प्रसन्न होकर उन विप्रोंने हमसे कहा—हे रघुनन्दन ! तुम्हें इस दानका सहस्रगुणा फल प्राप्त होगा अर्थात् सोलहके बदले सोलह हजार स्त्रियां प्राप्त होंगी । अतएव उनके आशीर्वादनानुसार द्वापरमें कृष्णका रूप धारण करके ॥ ७१-७३ ॥ मैं तुम सबोंका द्वारकापुरीम पाणिग्रहण करूँगा उस जन्ममें तुम अनेक राजाओंकी कन्याएं होओगी । दुन्दुभी राक्षस जिसको कि बालिने मार डाला है, उस जन्ममें भौमासुर होगा और इस जन्मके समान ही तुम्हारा हरण करेगा ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ उस समय में भौमासुरको मारकर तुम सबोंको छुड़ाऊँगा और तबसे तुम सब आनन्द हमारे साथ बिहार करोगी ॥ ७६ । इस प्रकार रामके वाक्य सुनकर उनका चेहरा खिल उठा और वे अत्यन्त आनन्दित हुईं ॥ ७७ ॥ इसी समय रामको खोजते हुए उनके पैरोंके निशान देखत-देखते लक्ष्मणादि साथी भी वहीं आ पहुंचे । जब उन्होंने सोलह हजार स्त्रियोंके बीचमें रामको देखा तो बड़े विस्मित हुए और जगदीश्वर रामको उन लोगोंने प्रणाम किया । ७८ ॥ ७९ ॥ जब रामने उन स्त्रियोंका वास्तविक वृत्तान्त बतलाया तो वे बहुत प्रसन्न हुए और रामके आगे बैठ गये ॥ ८० ॥ इसके अनन्तर रामकी आज्ञासे हजारों वाहन आये । जिनपर उन स्त्रियोंको बिठाकर रामचन्द्रजी शिविरकी ओर चले, जहाँ कि सीताजी बैठी थीं ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ वहाँ पहुँचकर उन सब स्त्रियोंने सीताको प्रणाम किया और रामने उनका जो सच्चा-सच्चा हाल था, सो कह सुनाया । ८३ । इसके बाद सीताने अनेक वस्त्रों वाभरणादिसे उनका सत्कार किया । थोड़ा देर बाद रामने अपने शिविरके पास ही एक उत्तम सरोवर देखा, जो कमलों

४६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

ददर्श सुमहच्छ्रेष्ठं स्पटंयततपां पतिम्। घनपादपमध्यस्थं सुतीर्थसलिलं शुभम् ॥८५॥ विशालं विकचाम्भोजमधुमत्तध्रुवद्रुतम् पद्मनीरत्नसंयुक्तं छन्नं मरकतैरिव ॥८६॥ स्वच्छन्दपुच्छलन्मत्स्यं स्वच्छं मानुषमना यथा। चलज्जलचराद्भिन्नवीचिराजिविराजितम् ॥८७॥ अन्तर्ग्राहगणक्रूरं खलानाभिव मानमम् कचिच्छेवालदुद्गम्यं कृपणस्येव मर्ददम् ॥८८॥ नानाविहङ्गसङ्घार्ति शमयन्तं दिवाऽनिशम्। उदारमिव सर्वस्वैरापन्नार्तिहरं महत् ॥८९॥ तपयंतं हिमाम्भोभिः क्षापदन्स्यनितनिभ्रं । दृष्ट्वं सवमनाथं हिमांशुमिव चाह्निकम् ॥९०। तं दृष्ट्वाऽभूत्सुसन्तुष्टः सीतया रघुनन्दनः । तत्र स्नात्वा सुखं रामः कृतपाध्याह्निकक्रियः ॥९१॥ भुक्त्वा बन्धुजनैः सर्वैराखेटाणसंवृतः। उवास सरसस्तीरे रम्या मकतपनकथाः ॥९२। सतः शरासनं बाणं कृत्वा रात्रीं स्थितान्नरीं । व्याधाः संधानपास्थाय रुरुधुः ककुमो पयः ।९३॥ एवं स्थितेषु वीरेषु वने विस्तार्य वागुराः। निद्रार्थ निर्गतं यूथं शूकराणां सरस्तटे ॥९४॥ चरित्वा सागसीकंदान् पपात व्याधमण्डले गत्वा विद्धास्तदाऽक्रीडा व्याधैश्च बहवो हताः ॥९५॥ क्षणेनैव वराहास्ते विद्धाः पेतुर्महीतले। तान्हत्वा तुमुलं नादं चक्रुर्वाधाः मुदान्विताः । ९६। धावन्तोऽपि मुदा तत्र मिलिता यत्र भूपतिः। तान्प्रदाय महैर्भूपः सेनानाथं ययौ पुनः ॥९७॥ एवं सप्तादिनान्येव स्थित्वा रामो वने सुखम्। भुक्त्वा नानाविधान् भोगान् सीतया सपुरा ययौ ।९८॥

गहराईसे समुद्रको मात कर रहा था, उसके आसपास घना वृक्षावली लगी हुई थी, स्थान-स्थानपर घाट बने हुए थे और पवित्र जल भरा था ॥८४॥ ८५॥ उसकी लम्बाई चौड़ाई का पार नहीं था खिले हुए कमलके फूलोंपर भौंर गुञ्जार रहे थे, फैले हुए पुरइनके बड़े बड़े पत्ते मरकतके समान सुन्दर लग रहे थे ॥८६॥ सज्जन प्राणीके मनकी तरह स्वच्छन्दतापूर्वक मछलियाँ खेल रही थीं। जलचर प्राणीगणके इधर-उधर चलनेके कारण बार-बार उसमें लहर उठ रही थी ॥८७॥ खल मनुष्यके हृदयके समान उसमें कितने ही घड़ियाल भरे थे। कहीं-कहीं कंजूस प्राणीके धनकी तरह सिवार भरा था, इससे उसमें प्रविष्ट होना दूभर लगता था ॥८८॥ दिनरात कितने ही पक्षी आकर अपनी थकावट दूर कर रहे थे। इससे वह सरोवर किसी ऐसे सज्जनके समान मालूम पड़ता था जो अपना सर्वस्व लुट कर गरीब तथा विपद्ग्रस्त जनोंका रक्षण तत्पर हो ॥८९॥ अपने ठंढे जलसे वह उसी तरह वनके जीवोंकी प्यास बुझा रहा था, जैसे चन्द्रमा दिन भरके परिश्रमसे दुःखी जनोंका समस्त पीड़ा रातमें हरण लिया करता है ॥९०॥ उस सरोवरको देखकर सीता तथा रामचन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। उसमें स्नान किया, मध्याह्न कालका नित्यनियम किया और भोजन किया। फिर सारे शिकारियोंके साथ लेकर उसी तड़ागके समीप डेरा डाल दिया और अनेक तरहकी कहानियाँ कहते-कहते समय काटने लगे ॥९१॥९२॥ जब रात्रिका समय हुआ तो बहेलियेगण अनेक सामान लेकर चारों ओरसे उस तड़ागको घेर लिया और रामचन्द्रजी अपना धनुष बाण ठीक करके एक वृक्षके ऊपर जा बैठे ॥९३॥ जब कि व्याध जाल बिछाकर तत्परताके साथ सरोवरके चारों तरफ बैठ गये और ठीक मध्या रातका समय हुआ, तब वनसे शूकरों-का एक यूथ आ पहुँचा ॥९४॥ तालाबमें उत्पन्न कन्द खाकर वह शूकरयूथ बहेलियोंके ऊपर टूट पड़ा। उस समय बहुतसे शूकरोंको रामचन्द्रजीने मार डाला और बहुतोंको बहेलियोंने समाप्त कर दिया ॥९५॥ क्षणभरमें वे सारे शूकर मार डाले गये। उनको मारनेके अनन्तर व्याधोंने प्रसन्नताका कोलाहल मचाया ॥९६॥ सब बहेलिये मारे शूकरोंको दौड़ते हुए उस स्थानपर पहुँचे जहाँ रामचन्द्रजी बैठे थे। तब राम उन सबोंको तथा

सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४१३

सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४१३


ततो विप्रान्नृपान् वैश्यान् समाहूय रघूत्तमः ।
या यस्य दुहिता नारी या यस्य पुत्रपुत्रिका ॥ ९९ ॥
तस्मै तस्मै ददौ तां तामेवं सर्वा व्यसर्जयत् ।
वस्त्रालङ्कारभूषाद्यैः शोभयित्वा पृथक् पृथक् ॥ १०० ॥
ते विप्राद्याः पुनर्जाता मेनिरे निजबालिकाः ।
सतः स्वं स्वं पुरं नीत्वा भृशं वैश्याः प्रमोदिताः ॥ १०१ ॥
नृपपुत्रैर्विप्रपुत्रैस्तासां चक्रुः सुमङ्गलम् । रामप्रसादात्ताः प्रापुः पतिमग्र्यसुखं स्त्रियः ॥ १०२ ॥
ताश्चापि द्विजपुत्र्यस्तु पितृगेहमेव सर्वसु ।
निन्युः स्त्रीयायुषं तत्र व्रतचर्यादिभिः सुखम् ॥ १०३ ॥
विवाहकालानतिक्रमणात्न ता उद्वहिता द्विजैः ।
जन्मान्तरेण ता सर्वाः कृष्णः पत्नीः करिष्यति ॥ १०४ ॥
अथ रामः सुबाहोश्च पुत्रस्य मथुरां पुरीम् । विवाहार्थं सीतया स पौरांजनपदैर्ययौ । १०५॥
तत्र वैवाहिकं कर्म मपाद्य रघुनन्दनः । तस्थौ तत्र द्विपन्कालं मथुरायां यथासुखम् ॥ १०६॥
एकदा जानकीवाक्यात्कालिन्द्याः सङ्गमे शुभे । निशायां हेमपर्यङ्के सुखं सुष्वाप राघवः ॥ १०७॥
एतस्मिन्नन्तरे दासीर्दासान् दृष्ट्वा विनिद्रितान् ।
स्त्रीरूपेणाथ कालिंदी समांघ्रि संस्पृशच्छनैः ॥ १०८ ॥
ततो रामः प्रबुद्धाऽभूददर्श पुरतः स्थिताम् ।
सूर्यस्य तनयां पुण्यां कालिंदी कंजलोचनाम् ॥ १०९॥
दिव्यालङ्कारवस्त्राढ्यां दिव्यगन्धसुगन्धिताम् । नीलोत्पलदलश्यामां हेमकुंभपयोधराम् ॥ ११०॥
स्मिताननां सुरूपांरु किंकिणीजालमालिकाम् ।
केयूरकुंडलाढ्यां तां प्रोन्नत्तस्तनां वराम् ॥ १११॥

सैनिकोंको साथ लेकर अपने शिविरको लौट आये । इस प्रकार सात दिन वनमें रहते हुए अनेक तरहके सुखोंका उपभोग करके राम अपनी अयोध्यापुरीको लौट पड़े ॥ ९३ ॥ ९८ ॥ इसके अनन्तर दुन्दुभी द्वारा हरण की हुई उन कन्याओंको जो जिसकी पुत्री थी, उन-उन राजाओं, ब्राह्मणों तथा वैश्योंको बुलाकर दे दी और उन बालिकाओंको वस्त्राभूषणादिसे अलंकृत करके विदा कर दिया ॥ ९९ । १०० ॥ वे ब्राह्मणादिक अपनी कन्याओंका पुनर्जन्म मानकर रामके आज्ञानुसार अपन-अपन घरोंको ले गये और नृपों तथा वैश्योंने अच्छे वरोंके साथ उनका विवाह कर दिया । रामचन्द्रजीकी कृपासे उन सबको पतिके साथ विहार करनेका सुख प्राप्त हुआ ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ उनमेंसे जो ब्राह्मणों की कन्यायें थी, वे विवाहकाल व्यतीत हो जानेके कारण विवाह न करके यूं ही पिताके घरपर व्रत-उपवासादि करके अपना जीवन यापन करने लगीं । क्योंकि उनको यह विश्वास हो गया था कि दूसरे जन्ममें स्वयं श्रीकृष्णचन्द्रजी मेरे पति होंगे ॥ १०३ ॥ १०४ ॥ कुछ दिनों बाद सुबाहुका विवाह करनेके लिये रामचन्द्रजी सीताके साथ मथुरापुरी गये ॥ १०५ ॥ वहाँपर विवाहका सारा कार्य सम्पादन करके कुछ दिन मथुरामें ही रहे ॥ १०६ ॥ एक दिन सीताके कहनेसे रामचन्द्रजी यमुनाके तटपर सोये । उस समय वहाँके सब दासों और दासियोंको निद्रित देखकर एक स्त्रीका रूप धारण किये यमुना स्वयं रामके पास गयी और जोरसे उनका पैर पकड़ा ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ उसके ऐसा करनेपर रामचन्द्रजी जाग गये और सामने सूर्यकी पुत्री तथा कमलके समान नेत्रोंवाली कालिन्दीको देखा ॥ १०९ ॥ उस समय उसके शरीरमें दिव्य वस्त्राभूषण पडे थे । पैरोंमें सुन्दर नूपुर छनछना रहे थे । नील कमलकी पंखुड़ियोंके समान उसका रङ्ग था और सुवर्णकलशके समान उसके स्तन थे ॥ ११० ॥ मुस्कुराता हुआ मुख

५६४आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

तां तादृशीं प्रसमीक्ष्य क्षणं तूष्णीं व्यचिन्तयत् । धन्यो विधाता येनेयं कालिन्दी रचिता पुरा ॥११२॥
इत्याश्चर्यमना भूत्वा तत्सौंदर्यं व्यलोकयत् । अथ रामः स तां प्राह वदागमनकारणम् ॥११३॥
सा प्राह तं विलज्जन्ती सर्वं त्वं वेत्सि राघव । ततो रामोऽब्रवीद्भद्रे चैकपत्नीव्रतं मम ॥११४॥
इह जन्मनि कालिन्दि त्वं याहि स्वस्थलं जवात् ।
यावत्सीता प्रबुद्धा न जायेत तावदेव हि ॥११५॥
सा रामवाक्यैर्वज्रैरिव भिन्नमरुत्स्थला भुवि । मूर्च्छामापाथ तत्रैव तां दृष्ट्वा सोऽब्रवीत् पुनः ॥११६॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ कालिन्दि शृणु त्वं वचनं मम । द्वापरे कृष्णरूपेण त्वां करिष्याम्यहं स्त्रियम् ॥११७॥
विवाह्यैव मयासार्धं तदा भोक्ष्यसि मन्सुखम्
इति श्रुत्वा रामवाक्यं किंचित्तुष्टमना नदी ॥११८॥
नत्वा रामं ययौ तूष्णीं रामध्यानपरायणा ।
ततो रामोऽपि सैन्येन सीतया स्वपुरीं ययौ ॥११९॥
एवं स केतवनगरे रामः स्त्रीवधुरेहजैः ।
चरित्राण्यकरोन्नाना पापनाशानि श्रवादिना ॥१२०॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे
षोडशसहस्रस्त्रियवकालिन्दीप्यवश्रीत्वदर्शनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥


था, केलेके खम्भेकी तार्ह उसकी जंघायें थीं किङ्कणी केयूर कुण्डल आदि आभूषण अपनी छटा दिखा रहे थे ॥ १११ । इस प्रकारकी एक अपरिचित नारीको अपने सामने देखकर राम थोडी देर तक यह सोचते रहे कि विधाता धन्य है, जिसने कालिन्दी जैसी नारीकी रचना की है । ११२ ॥ इस प्रकार विचार करते हुए वे उसका सौन्दर्य देखते रहे। इसके अनन्तर उससे कहने लगे-तुम अपने आनेका कारण बतलाओ ॥ ११३ ॥ रामकी बात सुनकर सकुचाती हुई कालिन्दीने कहा- हे राघव ! तुम सब कुछ जानते हो। फिर रामने कहा कि हे कालिन्दी ! इस जन्ममें मैंने एकपत्नीव्रत धारण कर रक्खा है। इसलिये सीता जाग जाय, इसके पहले ही तुम यहाँसे चली जाओ ॥ ११४ । ११५ ॥ रामके ये वाक्य वज्रके समान उसके हृदयमें लगे, जिससे वह वहींपर मूच्छित होकर गिर पड़ी। फिर रामने कहा कालिन्दी ! उठो-उठो, मेरी बात तो सुनो। द्वापर-युगमें मैं कृष्ण होकर तुम्हें अपनी स्त्री बनाऊँगा, आज तुम लौट जाओ। जन्मान्तरमें तुम मेरे साथ विहार करके सुखी होओगी। इस प्रकारकी बात सुनकर यमुनाको कुछ सन्तोष हुआ ॥ ११६-११८ ॥ तदनन्तर रामको प्रणाम करके उनका ध्यान करती हुई वह लौट गयी। उधर राम भी अपनी सेना तथा सीताके साथ अयोध्या चले गये ॥ ११९ । इस तरह रामचन्द्रजी साकेतपुरमें अपने पुत्रों तथा सीताके साथ अनेक लीलायें किया करते थे, जिनका श्रवण करनेसे समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १२० ॥ इति शतकोटि-रामचरितामृते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

॥ इति राज्यकाण्डं पूर्वार्द्धं समाप्तम् ॥

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु ।

श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्


राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्)

त्रयोदशः सर्गः

( राम द्वारा राज्यभरमें हास्यपर प्रतिबन्ध )

श्रीरामदास उवाच

अथैकदा रमाजानिः सुहृद्भिः सदसि स्थितः । वीजितश्चामरेणैव लक्ष्मणेनातिशोभितः ॥ १ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र पौरः कश्चिद्रमार्थितः । वाराङ्गनानां नृत्यादि दृष्ट्वा हास्यं चकार सः ॥ २ ॥
तद्धास्यं राघवः श्रुत्वा सस्मार पूर्वचेष्टितम् । लङ्कायां युद्धसमये रावणस्य शिरोऽपि खात् ॥ ३ ॥
रामबाणान्स्मृतिं लब्ध्वाऽस्माभिश्चेति विहस्य च । श्रीपादं वन्दनं कर्तुं पतन्ति स्म प्रभुं पुनः ॥ ४ ॥
तेषां विकरालतां दृष्ट्वा दंतादीनां रघूत्तमः मद्भक्षुं हि पुनर्यान्ति शिरांस्येतानि खादिति । ५ ॥
रामो भीत्या पुनस्तानि खे शिरांस्त्यक्षिपच्छरैः । एकोत्तरशतान्येव वारं वारं स्वरान्वितः । ६ ॥
तदृष्ट्वा राघवः स्मृत्वा किं दशास्यस्य वै शिरः समागतं सभामध्येत्येति पार्श्वेष्वलोकयत् ॥ ७ ॥
मायाविनो राक्षसाश्च सन्त्यत्रेति विचिन्त्य च । एवं यदा यदा हास्यं स शुश्राव रघूत्तमः ॥ ८ ॥


श्रीरामदासजी बोले—एक दिन रामचन्द्रजी अपने मित्रोंके साथ सभामें बैठे थे। उस समय रामपर चँवर चल रहे थे और लक्ष्मण रामके पास बैठे हुए थे। इसलिए रामकी शोभा कईगुना अधिक दिखायी दे रही थी ॥ १ ॥ इसी समय सभाका कोई नागरिक वेश्याओंका नृत्य देखकर जोरोंके साथ हँस पड़ा ॥ २ ॥ उस हास्यको सुना तो रामको उस समयकी एक बात याद आ गयी, जब वे लङ्कामें रावणके मस्तकोंको अपने बाणोंसे काटकर आकाशमें उड़ा देते थे तो वे मस्तक यह समझकर कि रामके बाणोंसे मेरी बुद्धि ठिकाने आयी है। इस भावसे हँसते हुए ऊपरसे फिर नीचे आकर रामके चरणोंमें लोटते हुए वन्दना करने लगते थे ॥ ३ ॥ ४ ॥ उनके दाँतों आदिकी विकरालता देखकर रामको यह ख्याल होता था कि ये मस्तक मुझे खाने आ रहे हैं। इस लिए उन्हें फिर बाणों द्वारा आकाशमें उड़ा दिया करते थे। यह उपाय रामको एक दो बार नहीं पूरे एक सौ एक बार करने पड़े थे ॥ ५ ॥ ६ ॥ उसी बातको स्मरण करके रामने सोचा कि कहीं रावणके मस्तक ही तो इस सभामें आकर अट्टहास नहीं मार रहे हैं। इस भावसे उन्होंने अपने आस-पास विस्मयभरे नेत्रोंसे देखा । ७ ॥ क्योंकि उनका ख्याल था कि राक्षस मायावी होते हैं, शायद यहाँ भी आ जायें तो क्या आश्चर्य है। इस तरह राम जब कभी किसीका हास्य सुनते

७६६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३

तदा तदा पूर्ववृत्तं स्मृत्वा पार्श्वं व्यलोकयत् । ततो रामः श्रुतं किञ्चि द्विनयामास सादरम् ॥९॥ यदा यदा श्रूयतेऽत्र हास्यं केनापि यत्कृतम् सदा तदा दन्तपङ्क्त्या दिष्टं हास्यं स्मराम्यहम् ॥१०॥ मायाविनो राक्षसास्ते मां विप्रतार्य पुनश्चित्रात् । माममुत्र यास्यन्ति त्विति मत्वा सचेतसि ॥११॥ अन्यच्च निंदितं हास्यं नीतिशास्त्रेषु सर्वदा । अतो हास्यं वर्जयामि सर्वेषां भूनिवासिनाम् ॥१२॥ इति निश्चित्य हृदये लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । दुन्दुभिं घोषयस्वाद्य पुर्यां राष्ट्रेऽवनीतले ॥१३॥ स्मिताननो नरः कश्चिन्नारी वाप्यथ सुहृच्च यः । सीता वा तनयो बंधुः स मे दृश्या भवेदिति ॥१४॥ तथेति रामवाक्येन घोषयामास दुन्दुभिम् । पौरा जानपदाः सर्वे श्रुत्वा शिक्षाध्वनिं प्रभोः ॥१५॥ रामदण्डभयात् सर्वे न चक्रुस्ते स्मिताननम् । वारांगनानृत्यगीते नटगीतप्रवर्तने ॥१६॥ स्त्रीभिः सुहृद्भिर्मित्रैश्च विनोदानुत्सवोत्सवान् वरान् । मांगल्यानि च कर्माणि हास्यकारीणि नाचरात् । १७॥ वस्त्रसंग्रहकाभिश्च कौतुकानि हि यानि च । तूर्यघोषादिमाङ्गल्यकर्माणि विविधाः कथाः ॥१८॥ मात्रव्यंग्योत्सवान् सर्वान् यात्रायज्ञोत्सवान् शुभान् । कौतुकानुत्सवांश्चैव विवाहादिषु कर्मसु ॥१९॥ कांश्चित्कथञ्चापि न चक्रुश्च कदा जनाः । ययौ नावश्यककार्याद्विना सदसि कः प्रभुम् ॥२०॥ पुराणानीतिहासांश्च न पठन्ति स्म केचन । गर्भाधाने पुंसवनेनामकर्मादिषूत्सवान् ॥२१॥ पौरा जानपदाः सर्व मप्रष्टांगनिवासिनः । एतानि हास्यकारीणि नानाकर्माणि भूतले ॥२२॥ रहस्यपि न चक्रुस्ते रामदण्डभयात् कदा । एवमासीद्वर्षमेकं तदा भूम्यां कदापि हि ॥२३॥ स्मिताननं कस्य नारीन्न वक्त्रमंडनादिकम् । तदोग्यहृद्देवताश्च नानाकर्मोद्भवेववाः ॥२४॥ इन्द्राय कथयामासुस्तद्वृत्तं जगतीभवम् । इंद्रादीनां सुराणां च कर्माद्यरुचनादि हि । २५॥ नासीद्यदा जगत्त्यां हि तदेंद्रोऽकथयद्विधौ । तदा सुरु विविः प्राह न समाश्चेवरू हि नः ॥२६॥

तो उनका ध्यान उसी ओर आकृष्ट हो जाया करता था और अपने अगल-बगल निहारने लगते थे। इस समय रामने उस हास्यको सुनकर क्षणभर विचार किया और लक्ष्मण कहने लगे—॥८॥ ९ ॥ जब कभी मैं किसीका हास्य सुनता हूँ तो मुझे रावणकी हंसी स्मरण आ जाया करती है और यह ख्याल होता है कि वे मायावी राक्षस जिनको कि मैंने मार डाला है, धोखा देकर मुझे लानेके लिए फिर तो नहीं आ गये हैं ॥ १० ॥ ॥ ११ ॥ दूसरे नीतिशास्त्रम भी हास्यकी निन्दा की गयी है । इसीलिए आजसे मैं भूतलपर रहनेवालोंको हंसनेकी मनाही करता हूं । इसके बाद लक्ष्मणसे बोले कि मेरे राष्ट्र तथा पृथ्वीतल भरम डुगी पिटवाकर कहला दो कि कोई स्त्री पुरुष, मेरा मित्र, स्वयं सीता तथा मेरे बेटा या भाई भी न हँसे । जो इस आज्ञाके विपरीत चलेगा, उसे दण्ड भुगतना पडेगा ॥ १२-१४ ॥ लक्ष्मणने रामके वाक्यनुसार सारे और दुंदुभी बजवा-कर रामकी यह आज्ञा घोषित करा दी। जितने पुरवासी अथवा देशवासी थे, उन्होंने प्रभुकी इस शिक्षाध्वनि को सुनकर दण्डक भयसे हमेशाके लिये हँसना छोड़ दिया । वेश्याओके नृत्य, गान, नाटक, स्त्रियों या मित्रोंके साथ हंसी-दिल्लगी आदि ऐसे सब काय बन्द कर दिये गये, जिनमें हँसा आनेका अन्देशा रहता था ॥ १५-१७ ॥ उस समय बाँसपर चढ़कर नाचने आदिकी कथा, दुन्दुही-नगाड़े आदिके बाज, गाना, गान सावत्सरिक उत्सव, विवाह आदि मङ्गल कार्योंम भी हंसी आनेवाले खेल-कूद और गप शप आदि बातोंको बन्द कर दिया और बिना किसी विशेष कामके काई रामकी सभा में भी नहीं जाता था । १८-२० । लोगोंस पुराण-इतिहास आदिका भी पढ़ना छोड़ दिया । गर्भाधान, पुंसवन, नामकर्म आदि उत्सवोंमें हंसी न आने देनेका पूरा पूरा ध्यान रक्खा जाता था। मतलब यह कि सारे पुरवासी एवं देशवासी हास्योत्पादक कामोंको नहीं करते थे। रामके दण्डभयसे कोई एकान्तमे भी नही हँसता था। यह अवस्था एक वर्ष तक चलतीरही। इस बीचमे भूतलनिवा सियोंमेसे किसीका भी मुखमण्डल मुसकराता हुआ नहीं दीखा और किसीने भी अपना शृङ्गार आदि नहीं किया। ऐसी अवस्था में जितने ही कर्माङ्गदेवता और बहुतसे उत्साहोद्भवता एकत्रित होकर इन्द्रके पास गये ॥ २१-२४ ॥ उन्होंने पृथ्वीतलके उस समाचारको कह सुनाया । जब इन्द्रने सुना कि हम देवताओं-

सर्गः १२] गद्यकाव्यम् (उत्तरार्द्धम्) ४६७


नैवोपदेटुं योग्यः स ममापि जनरुच्युपः। युक्त्या कार्यं साधयामि येन वोऽद्य हितं भवेत् ॥२७॥
इत्याश्वास्य सुरान् सर्वान्विधिर्भूण्डलं ययौ। अयोध्यायाश्च सीमायां दृष्ट्वा वृक्षं सुविस्तृतम् ॥२८॥
स्वयं दिव्येण रूपेणो दृष्ट्वा पामरान् जहाश सः। एतस्मिन्नन्तरे कश्चिल्लक्कड़हारहः पुमान् ॥२९॥
श्रुत्वा पिप्पलहास्यं अनेन दीर्व जहाह सः। ततः स मतवाहश्च ययौ दृष्टं प्रमोः पुरेऽथ ॥३०॥
काष्ठभारक्रियाथै तत्र स्मृत्वा स्मितं हृदि। बणपुत्रस्य सोऽप्युच्चैर्न समर्थो निरोधितुम् ॥३१॥
द्वारपालस्य हास्यं तद्भावदूतोऽथ शुश्रुवे। राजदूतौ जहामोच्चैर्न समर्थो निरोधितुम् ॥३२॥
राजदूतः सभां गत्वा द्वारपालस्य यत् स्मितम्। हृदि स्मृत्वा जहामोच्चैरन्तस्स्थास्ते समासदः ॥३३॥
सभायां बहुगुः सर्वे रुन्द्ध्वा राघवोऽपि गः। उच्चैर्जहास सदसि दर्शितहामने स्थितः ॥३४॥
रामो विचारयामन्त किमर्थं हसितं मया। यस्मिस्रं सदा दण्डं वीगन् जानपदान्द्विजान् ॥३५॥
अहं करोमि सोऽप्यहं सभायां हसितः कथम्। दण्डयिष्यति मा कोऽप्य किंवां पौरा वदन्ति हि ॥३६॥
अस्माकमेव शिक्षाऽस्ति सर्वदा राघवस्य ना। न कथं हसितस्याथ सर्वैर्वा पुरत स्फुटम् ॥३७॥
शिक्षां करिष्यति विभोः कोऽप्य मिति वदंति ते। मानयिष्यति नाऽस्मते सभाणे शिक्षित जनाः ॥३८॥
अमंतव्यं व्रतं योग्यमिति रामस्त्वमन्यत। पुनर्जेहस श्रीगमस्तन्निरोद्धुं न सक्षमः ॥३९॥
ततो रामोऽब्रवीत्पौरान् सभास्थान्स्स्मितान्नभः। किमर्थं हसिता यूष मेम्बो हास्य मनापि हि ॥४०॥
प्रणागतं सभाणध्ये पौराः प्रोचुर्नृपोत्तमम्। दृष्ट्वा स्वदूतहाम्य हि तेनास्माक मनागतम् ॥४१॥
तत् पौरवचनं श्रुत्वा दूतमह रघूत्तमः। त्वया किमर्थं हसितं सोऽब्रवीत्पृष्ठनन्दनम् ॥४२॥


के क्योंकि पुत्रदादि मत्कार्य लुप्त होने जा रहे हैं तो ब्रह्माके पास जाकर यह बात बतायी। ब्रह्माजी कह कि रामचन्द्रजीके आगे हम बोलने कुछ भो शक्ति नहीं है ॥२५॥ २६॥ मैं उन्हें उपदेश नहीं दे सकता। क्योकि वे मेरे ईश हैं। इसलिए मैं किसी युक्ति अपना कार्यसाधन करूंगा कि जिससे आप लोगोंका कल्याण हो ॥२७॥ इस प्रकार उन्हें आश्वासन देकर ब्रह्माजी भूमण्डलकी ओर चल पड़े अयोध्याका सीमायार एक विशाल पिप्पल वृक्षको देखकर वे स्वयं उसके भीतर प्रविष्ट हो गए और उस रास्तेसे जाने-आनेवाले लोगोंको देख-देखकर जोरोंसे हंसने लगे। उसी समय एक लकड़हारा लकडोका बोझ माथेपर रखे हुए वहां आ पहुंचा। उसे यों देखकर पीपलके भीतर बैठे हुए ब्रह्माजी हंसे ॥२८॥२९॥ पीपलका हास्य सुनकर लकड़हारा पुने जोरोंसे हँसा और लकड़ोका बोझ लिए हुए अयोध्या नगरमें जा पहुंचा। गस्तमें उस पीपलकी हँसीवाली बात याद आ गयी और ठहाका मारकर हंस पड़ा। लेकिन क्षण भर बाद उसे रामको आज्ञाका स्मरण हो आया जिससे बेचारा शंकित हो उठा ॥३०॥३१॥ लकड़हारेकी हँसी सुनकर ओरपर-पर खड़ा सिपाही भी अपनी हँसी नहीं रोक सका । ३२॥ सिपाही सभामें गया तो उसे वहीं लकड़हारेकी हँसी याद आ गयी, जिससे वह हंस पड़ा। सिपाहीको हँसते देखा तो सभामें बैठे हुए लोग भी अपनी हंसी नहीं रोक सके और वे भी हंसने लगे ॥ ३३॥ इसपर सभामें लोगोंका हंसते देखकर रामचन्द्रका या हंसन गये । ३४॥ तब रामचन्द्रजी तुरन्त हंसी रोककर सोचने लगे—और लोग हंसे तो हंसे, मैं क्यों हंसा? जब मैं सारे भूमण्डलवासियोंका इस कामसे रोक रहा हूँ और दण्ड देता हूँ। तब मैं क्यो हंसा ? मुझे कौन दण्ड देगा ? और ये पुरवासी क्या कहेंगे ? यही न कि राम दूसरोंको ही शिक्षा देते हैं, प्रजाके वास्ते ही दण्डविधान करते हैं और स्वयं जो मनमें आता है सो कर डालते हैं। सब लोगोंके लिए जो हंसनेकी मनाही कर दी है, किन्तु स्वयं हजारों मनुष्योंके सामने ठठाकर हँसते हैं ॥३५-३७॥ इसका परिणाम यह होगा कि ये भविष्यमें मेरी बात नहीं मानेंगे। यह सब विचारकर रामने यह ठहराया कि मैंने बड़ी भारी भूल की है। लेकिन क्षणभर बाद ही रामको फिर हंसी आ गयी। पूरी चेष्टा करके भी वे हँसनेसे नहीं रुक सके ॥३८॥ तब रामचन्द्रजी सभाके लोगोंसे कहने लगे-आपलोग किस बातपर हंसे ? आप लोगोंको हंसते देख-कर मैं भी हंस गया। सभामें बैठे हुए पुरवासियोंने उत्तर दिया कि आपके सिपाहीको हंसते देखकर हमें

४५८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३

भारवाहस्य हास्यं तन् स्मृत्वा प्रहसितं मया । तद्भूतवचनं श्रुत्वा भारवाहं तदा प्रभुः ॥४३॥
दर्शनीयं सदसि तमाह रघुनन्दनः । मा भीतिं भज प्रत्यक्षं सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः ॥४४॥
हेतुं किमर्थं हसितं त्वयाऽथ कथयस्व माम् । स भारवाहकश्चकितः शुष्ककंठोष्ठतालुकः ॥४५॥
वेपमानः स्खलद्वाचा राघव वाक्यमब्रवीत् । अयोध्यायाश्च सीमायामश्वत्थस्य मयाऽद्य हि । ४६॥
दृष्ट्वा प्रहसितं राजन् हेतुं हास्यं तथा श्रुतम् मद्दूर्वा तद्विद्रं स प्रभुः श्रुत्वा मुविस्मितः । ४७॥
दूतानुवाच भोऽगच्छध्वनेनेन सह वेगतः । यूयं गत्वाऽद्य द्रष्टव्यं किं सत्यं कथ्यते न वा ॥४८॥
अनेन भारवाहेन ते तथेति त्वरान्विताः । गत्वाऽश्वत्थमथोपरि दृष्ट्वातुस्ने स्मितं मुहुः ॥४९॥
तदाश्चर्यञ्च ते दूताः प्रहसंन्तोऽतिवेगवन्तः । अश्वत्थमद्रितं सर्वं गत्वा सर्वं न्यवेदयन् ॥५०॥
तद्भूतवचनं श्रुत्वा राघवश्चातिविस्मितः । राज्ये ममैतद्दुश्चिह्नं मे शिक्षा ले मुप्तमुत्थम् ॥५१॥
इति निश्चित्य मनसि दूताँश्चाज्ञापयन्तदा । छिद्यतां चलपत्रः स ममाज्ञाभङ्गकारकः ॥५२॥
तद्रामवचनादेव शतशोऽथ सहस्रशः । कुठारपाणयः शीघ्रमप्रययु दुर्द्रुमन्तदा । ५३।
हास्यमानं नगं दृष्ट्वा ते सर्वेऽतीव विस्मिताः । कुठारैरनं तदा छेत्तुमुद्यता राघवाज्ञया ॥५४॥
ताञ्छेत्तुकामान् सकलान् ग्राव्नान् स्वनिकट विधिः । क्षित्वाऽमन्त्रान्त समापोरात्स्वेध्वनिनर्र्तैः । ५५॥
उपलैश्छिन्नभिन्नाङ्गास्ते दूता लोहिताङ्किताः । कोलाहलं प्रकुर्वन्ता रामं द्रुतं न्यवेदयन् ॥५६॥
ततोऽतिविस्मितो रामः पुनर्दूतान् सहस्रशः । प्रेषयामास तं छेत्तुं धनुर्बाणसिधारिणः ॥५७॥
तेऽपि गत्वा नगं तेन ताड़िता उपलैर्दृढम् । छिन्नाङ्गा राघवं वेगात्सर्वं वृत्तं न्यवेदयन् ॥५८।
ततो रामोऽतिमक्रुद्धः सुमंत्र सेनया युतम् । प्रेषयामास तं वृक्षं छेत्तुं बुद्धिपुरःसरम् ॥५९।

हँसी आ गयी ॥ ३९-४१ ॥ पश्चात्कि सी बात सुनकर गमन सिपाहीसे पूछा कि तुम क्यों हँसे ? उसने कहा कि एक लकड़हारेका हँसना देखकर मुझे हँसी आ गयी । दूतका बात सुनकर रामने दूतों द्वारा लकड़हारको पकड़वा मगाया और उससे कहा कि किस प्रकारका भय न करके मुझ यह बतलाओ कि तुम काम्राश्चर्य क्यों हंस थे ? ॥ ४२-४५॥ वह उस नामका बात सुनकर चौकन्ना हो गया । उसके कंठ, ओष्ठ और तालू सूख गये, थरथर कांपन लगा और भयभीत हुए स्वरसे उसन उत्तर दिया कि अयोध्याके समीप ही एक पीपलका वृक्ष है। मैने बाजार आते समय उस वृक्षकी हंसी सुना और हंस पड़ा। नगरमें आया तो यहाँ भी एकाएक वह बात याद आ गयी और चेष्टा करके भी मे हंसीको नहीं रोक सका । उसकी यह बात सुनकर मुसकराते हुए रामचन्द्रजीने दूतोंको आज्ञा दी कि तुम लोग इसके साथ जाकर देखो कि यह जो कह रहा है, वह ठीक है या नहीं ॥ ४५-४८॥ उस भारवाहकके साथ-साथ दूत चले, पीपलके समीप गये और उसकी हंसी सुनी तो स्वयं खूब हंसे और लौटकर उसका वहाँका सच्चा वृत्तांत सुना दिया ॥ ४६॥ ५० ॥ दूतों-की बात सुनकर राम बहुत विस्मित हुए और सोचने लगे कि हमारे राज्यम यह एक बड़ा दुश्चिह्न उत्पन्न होकर मेरे शासनको ही लुप्त कर देना चाहता है। इस प्रकार विचार करके रामने दूतोंको आज्ञा दी कि उस पीपलके वृक्षको काट डालो। क्योंकि यह मेरी आज्ञा भङ्ग कर रहा है ॥ ५१॥ ५२ ॥ रामके आज्ञानुसार सैकड़ों हजारो व्यक्ति कुठार ललेकर उस वृक्षकी ओर चल पड़े । उस समय भी उस वृक्षका हंसन देखकर वे सब उसे काटनेको उद्यत हो गये । उनको देखकर बहुत उस वृक्षपरसे ही पत्थरके टुकड़े फेंक फेंककर मारन लगे । इस अपकारसे कितनों ही लोगोंका गहरी चोट आयी । रुधिरसे उनका शरीर भीग गया और चिल्लाते हुए उन्होंने रामके पास पहुंचकर वहाँका हाल बतलाया । ५३-५६ ॥ सो सुनकर रामको और भी आश्चर्य हुआ और फिर हजारो दूतांका वह वृक्ष काटनेके लिए भेजा । धनुष बाण एवं तलवार धारण किये हुए वे दूत जब वृक्षके पास पहुंचे तो फिर प्रयागे पत्थर फेंक फेंककर मारा, जिससे भिन्नमस्तक हो उन सबने लौटकर रामको यह समाचार सुनाया। ५७ ॥ ५८ ॥ सब रामने कुपित होकर बहुत सी सेनाके साथ

सर्गः १२] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४६९

सर्गः १२] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४६९

सुमन्त्रो राघवं नत्वा सेनया तं मृगं ययौ । तावच्छश्वत्पाषाणौघैर्गन्तुं न स क्षमः ॥६०॥ ततो राघवभीत्या स शनैः सैन्येन सम्पुरः । ययौ तावन्मृगोद्भूतैः पाषाणैस्ताडितोऽपतत् ॥६१॥ सुमन्त्रं पतितं दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत् । अयोध्यायां च सर्वत्र तद्भङ्गमिवाभवत् ॥६२॥ सुमन्त्रं पतितं श्रुत्वा पुत्राभ्यां रघुनन्दनः । सैन्येन प्रेषयामास शत्रुघ्नं तं मृगं पुनः ॥६३॥ ततस्तत्कौतुकं श्रुत्वा पौरनार्यः सहस्रशः । प्रासादशिखराङ्कारूढा उच्चांड्य च व्यलोकयन् ॥६४॥ तर्जन्या दर्शयामासुः प्रोत्थ्यश्वेति ता मिथः । वामहस्तं भ्रुवोः स्थाप्य रवितीक्ष्णनिवारकम् ॥६५॥ कुञ्चितानलकाम्नेत्रपतितान् करपल्लवैः । स्त्रियो निवार्य प्रासादात्पुरुषाञ्जसम्मुखान् ॥६६॥ निद्रासंभ्रान्तनयनान्नान्योन्यं दर्शयन्मृगम् । एवं तन्नगरं सर्वं चकितं चाभवत्तदा ॥६७॥ शत्रुघ्नोऽथ पुराद्वात्रात्सैन्येन निर्गतो बहिः । तावत्तद्रथवाहाश्च संस्थिता एव ते पथि ॥६८॥ ताडिता अपि सूतेन नोत्तस्थुस्तुरगोत्तमाः । कुशस्याथ लवस्यापि रथवाहास्तथैव च ॥६९॥ ताडिता रुरुमद्देन नोत्तस्थुः पथि संस्थिताः । आश्चर्यञ्च तदद्भुतं राघवाय न्यवेदयन् ॥७०॥ रामोऽपि श्रुत्वा चकितस्तदा चिन्तैश्चिन्तयन् । विचारः करणीयाऽत्र ह्यविचारोऽद्य नोचितः ॥७१॥ अन्यत्र कारणं किञ्चि-द्रष्टव्योऽद्य पुरोहितः । जानन्नपि स्मादावः स्वयं सर्वं तथापि सः ॥७२॥ मानुषं भावमाश्रित्य पुरोहितमथाद्वयत् । सोपि समागत्याशु धेन्वां मयां प्रययौ गुरुः ॥७३॥ प्रत्युद्गम्य गुरुं रामो दद्यावासनमुत्तमम् । ततः सम्पूज्य विधिवत्सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥७४॥ तच्छ्रुत्वा राघवं प्राह वसिष्ठो मुनिसत्तमः । वाल्मीकिम्प्वद्य प्रष्टव्यो येन ते चरितं कृतम् ॥७५॥ तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा वाल्मीकिं स समाह्वयत् । सोऽपि समागत्य शीघ्रे ययौ श्रीराघवं प्रति ॥७६॥

मृस्तकके मुखकाटनेके लिए भेजा। सुमन्त रामको प्रणाम करके उसमृगकी ओर वढे। किन्तु वहांसे थोड़ी दूरपर ही थे। इतनामें पत्थरोंका वर्षा होने लगी। जिससे उस मृगके पासतक नहीं पहुँच सके ॥ ५९ ॥ ६० ॥ लेकिन रामके भयसे सुमन्त पीछे न लौटकर आगे ही बढ़ते गये और उधरसे बराबर पत्थरोंकी वृष्टि होती रही। जिससे वे घायल होकर गिर पड़े ॥ ६१ ॥ सुमन्तको गिरते देखा तो सेनामें बड़ा कोलाहल होने लगा। सारे अयोध्यानवासियोंका वह एक अनहोना-सा बात मालूम पड़ा । ६२ ॥ सुमन्तको घायल सुना तो रामने अपने दोनो पुत्रोंके साथ एक बड़ी सेना भेजी ॥ ६३ ॥ इस कौतूहलको सुना तो नगरकी बहुत-सी स्त्रियाँ अपनी-अपनी अट्टालिकाओंपर चढ़कर मस्तक ऊँचा कर उस मृगको देखने लगीं और धूपके प्रकाशका निवारण करनेके लिए अपना बायां हाथ भौंहापर रख-रखकर एक दूसरेको उसपर उँगलियोंसे वह मृग दिखाने लगीं ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ नेत्रके सामने आये हुए केशोंको हटाती हुई वे स्त्रियाँ मकानकी छतों, कंगूरों और अटारियोंपर अधिक-से-अधिक संख्यामें एकत्र हो गयीं ॥ ६६ ॥ कितनोंकी आंखें उस मृगका निहारते- निहारते नींदका भ्रममें यांझिल हो गया। इस तरह उस समय सारा नगर विस्मित हो रहा था । ६७ ॥ उधर शत्रुघ्न अपनी सेना लेकर चले । नगरसे बाहर निकले ही थे कि उनके रथवाले घोड़े रास्तेमें बैठ गये और कोचवानके बार-बार मारनेपर भी नहीं उठे यही दशा कुश और लवके भी रथको हुई । उनके घोड़े भी रास्तेमें बैठ गये और कितने ही डंडे छानपर भी नहीं उठे तो वे सब लौटकर आश्चर्यके साथ रामके पास पहुँचे और यह हाल बताया ॥ ६८-७० ॥ यह सुना तो वे मनमे विचारने लगे कि इस विषयमे पूर्णतया विचार करके काम करनेकी आवश्यकता है आज अविचारित काम नहीं फलनेका है ॥ ७१ ॥ इसमे अवश्य कोई कारण है। अतः पहल पुरोहितको बुलाकर पूछ लेना जरूरी है। यद्यपि रामचन्द्रजी सब कुछ जानते थे, फिर भी मनुष्यभावसे उन्होंने पुरोहितको बुलवाया। रामके आज्ञानुसार तुरन्त गुरुजी राजसभामे जा पहुँचे। तब राम गुरुके आगे गये और एक उत्तम आसनपर बिठाकर पूजन करनेके अनन्तर सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ७२-७४ । यह सब सुनकर गुरु वसिष्ठने कहा कि इस विषयमें आप वाल्मीकिजीसे पूछ-ताछ करें तो अच्छा होगा। क्योंकि उन्होंने ही आपके चरित्रको बनाया है ॥ ७५ ॥ गुरुके आज्ञानुसार रामने वाल्मीकि