श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
द्वितीयोऽयं मया प्रोक्तो मंत्रो वै षोडशाक्षरः । १४०॥
सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७३५
कीर्तनीयो मनुर्मर्त्यैः सर्वपातककृन्तनः। वीणावाद्यस्वरेणोच्चैः कलकंठेने सुस्वरः ॥१३९॥
मां पाह्यतिदीनं राघव त्वत्पदयुगलीन्मिति ।
द्वितीयोऽयं मया प्रोक्तो मंत्रो वै षोडशाक्षरः । १४०॥
जय जयेति वै चोक्त्वा राघवेति ततः परम् मप्ताक्षग्मनुश्चायं कीर्तनीयः सदा नरैः ॥१४१॥
जय जय राघव इति मनुः ।
जयजयेति संकीर्त्य तथा रघुवरेति च । अष्टाक्षरमनुश्चायं कीर्तनीयः सदा नरैः ॥१४२॥
जय जय रघुवर इति मनुः ।
त्वं मां पालयेत्युक्त्वा सीतारामेति वै पुनः । नवाक्षरमनुश्चामनुधायं कीर्तनीयः सदा नरैः ॥१४३॥
वीणावाद्यस्वरेणैव महापातकनाशनः । १४४॥
त्वं मां पालय सीताराम इति मनुः
सीताराम जयेत्युक्त्वा मनुः षडक्षरः स्मृतः कीर्तनीयः सदा मर्त्यैर्वीणावाद्येन सुस्वरः । १४५॥
सीताराम जय इति मनुः ।
श्रीसीतारामेति मनुर्ज्ञेयः पञ्चाक्षरः शुभः । कीर्तनीयः सदा मर्त्यैर्वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१४६॥
श्रीसीताराम इति मनुः ।
सीतारामेति मनुश्चतुर्वर्णात्मकः स्मृतः ।
सीताराम इति मनुः ।
श्रीरामेति त्र्यक्षरश्च रामेति द्व्यक्षरो मनुः ॥१४७॥
श्रीराम इति मनुः । राम इति मनुः ।
राकारो बिंदुना युक्तश्चैकवर्णात्मको मनुः । अयं सदा जपनीयः कीर्तनीयो न वै कदा ॥१४८॥
रां इति मनुः ।
रामजयेति चोक्त्वाऽऽदौ सीतारामेति वै ततः । राघवेति ततोऽप्यन्वा मंत्रस्त्वेकादशाक्षरः ॥१४९॥
फिर 'दीनं राघव' इसके बाद 'त्वत्पदयुग्मलीनम्' ऐसा कहे। यह षोडशाक्षर मन्त्र सब प्रकारके पापोंको काटनेवाला है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि बाजों और कोकिला जैसे मीठे तथा ऊँचे स्वरसे इस मन्त्रका कीर्तन करें ।। १३८ ॥ १३९ ॥ 'मां पाह्यतिदीनं राघव त्वत्पदयुग्मलीनम्' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। षोडशाक्षर मन्त्रोंमें यह दूसरा मन्त्र है । १४०।। पहले 'जय जय' ऐसा कहकर 'राघव' कहे । यह सप्ताक्षर मन्त्र है। लोगोंको इसका भी कीर्तन करते रहना चाहिए ।। १४१ ।। 'जय जय राघव' यह इस मन्त्र-का स्वरूप है। 'जय जय' कहकर 'रघुवर' कहे यह अष्टाक्षर मन्त्र है। लोगोंको इसका भी जप करते रहना चाहिए ।। १४२ ।। "जय जय रघुवर" यह इस मंत्रका स्वरूप है । "त्वं मां पालय" ऐसा कहकर "सीताराम" ऐसा कहे। यह नवाक्षर मन्त्र है। लोगोंको इस मन्त्रका भी जप तथा कीर्तन करते रहना चाहिये । क्योंकि यह बड़े बड़े पापोंका नाशक है ।। १४३ ।। १४४ ।। "त्वं मां पालय सीताराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। "सीताराम जय" यह षडक्षर राममन्त्र है। संसारके लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ इस मन्त्रका भी कीर्तन करें । "सीताराम जय' यह मन्त्रका स्वरूप है। "श्रीसीताराम" यह पञ्चाक्षर राम-मन्त्र है। यह भी महान् पातकोंका नाशक है। इसलिए लोगोंको इसका जप तथा कीर्तन करते रहना चाहिए ।। १४५ ।। १४६ ।। 'श्रीसीताराम' यह मन्त्रका स्वरूप है। "सीताराम" यह चतुर्वर्णात्मक राममन्त्र है। "श्रीराम" यह त्र्यक्षर राममन्त्र है। "राम" यह द्व्यक्षर मन्त्र कहा गया है ।। १४७ ।। 'श्रीराम' और 'राम' यह मन्त्रका स्वरूप है। राकारको बिन्दुयुक्त (रां) कर देनेसे एकाक्षर राममन्त्र हो जाता है। लोगोंको
| ७१६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १५ |
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राम जय सीताराम राघवेति मनुः।
दशरथनदनेति रघुकुलेति वै ततः भूषणेति ततश्चोक्त्वा कौसल्येति ततः परम् ॥ १५०॥
विश्रामेति ततश्चोक्त्वा पंकजलोचनेति च रामेति द्व्यक्षरे चापि ह्यष्टाविंशाक्षरो मनुः ॥ १५१॥
अयं सदा कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः प्रोक्तः पातकविध्वंसी सर्वकामप्रदायकः ॥ १५२॥
दशरथनंदन रघुकुलभूषण कौसल्याविश्राम पंकजलोचन रामेति मनुः
सीताराम जयेत्युक्त्वा राघवेति ततः परम्। रामेति द्व्यक्षरे चापि मन्त्रस्त्वेकादशाक्षरः ॥ १५३॥
कीर्तनीयः सुस्वरेणैयं मन्त्रो वीणास्वरेण च। महापातकहन्त्रीकः सर्ववांछितदायकः ॥ १५४॥
सीताराम जय राघव रामेति मनुः।
एकादशाक्षराश्चायं मंत्रः प्रोक्तो मयाऽथ हि द्वितीयः परमो श्रेष्ठो महापातकनाशनः ॥ १५५॥
पञ्चवटीस्थितेत्युक्त्वा रामजयजयेति च दशरथानन्दनेति रामेति द्व्यक्षरे तथा ॥ १५६॥
एकविंशाक्षराश्चायं कीर्तनीयो महामनुः। कलकण्ठेन मर्त्यैश्च महापातकनाशनः ॥ १५७॥
पञ्चवटीस्थित राम जय जय दशरथनंदन रामेति मनुः।
दशरथसुतेत्युक्त्वा बालं वन्दे त्विति क्रमात् रामं घननीलमिति मत्रोऽयं षोडशाक्षरः ॥ १५८॥
द्वितीयोऽयं मया प्रोक्तः कीर्तनीयो मनोरमः वीणावाद्यस्वरेणैव वदापुण्यविवर्द्धनः ॥ १५९॥
दशरथसुतबालं वन्दे रामं घननीलमिति मनुः।
कोदंडखंडनेत्युक्त्वा दशशिरोमर्दनेति च। कौसल्यासुतं रामेति सीतारामजन पेति वै। १६०॥
राजारामेति वै चोक्त्वा एकोनत्रिंशवर्णकः। कीर्तनीयो मनुश्चायं वीणावाद्येन सुस्वरः ॥ १६१॥
कोदण्डखण्डन दशशिरोमर्दन कौसल्यासुत राम सीतारामजन राजारामेति मनुः।
चाहिए कि इस एकाक्षर मन्त्रका केवल जप करे, कीर्तन नहीं ॥ १४८॥ 'रां' यह एकाक्षर मन्त्रका स्वरूप है। पहले 'राम जय' कहकर 'सीताराम' और इसके बाद 'राघव' ऐसा कहे। यह एकादशाक्षरात्मक राममन्त्र है ॥ १४९॥ "राम जय सीताराम राघव" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। पहले "दशरथनन्दन" फिर 'रघुकुल' फिर 'भूषण' फिर 'कौसल्याविश्राम' फिर 'पंकजलोचन' और इसके बाद 'राम' ऐसा कहे। यह अट्ठाईस अक्षरोंका राममन्त्र है ॥ १५० ॥ १५१ । लोगोंको वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे सदा इस मन्त्रका जप और कीर्तन करना चाहिए, क्योंकि यह सब प्रकारका पातक नष्ट करनेवाला और अभीष्ट कामनाओंका पूर्ण करनेवाला मन्त्र है। 'दशरथनन्दन रघुकुलभूषण कौसल्याविश्राम पंकजलोचन राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। 'सीताराम जय' ऐसा कहकर 'राघव' और इसके बाद 'राम' ऐसा कहे। यह एकादशाक्षर मन्त्र है ॥ १५२ ॥ १५३ ॥ यह भी सब प्रकारका पातक नष्ट करनेवाला है। 'सीताराम जय राघव राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है इसलिए लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे इसका जप और कीर्तन करे । क्योंकि सब प्रकारकी कामनाएं इससे पूर्ण हो जाती हैं ॥ १५४ ॥ 'पञ्चवटीस्थित' ऐसा कहकर "राम जय जय" और उसके बाद 'दशरथनन्दन राम' ऐसा कहे। यह एकविंशाक्षर राममहामन्त्र है। इसका भी मीठे स्वरसे कीर्तन करना चाहिए। क्योंकि यह महामन्त्र बड़े-बड़े पापकोंको नष्ट कर देता है। १५५ ॥ १५६ ॥ 'पञ्चवटीस्थित राम जय जय दशरथनन्दन राम" यह इस एकविंशाक्षर राममन्त्रका स्वरूप है। "दशरथसुत" ऐसा कहकर "बालं वन्दे और इसके बाद "रामं घननीलम्' यह कहे। यह षोडशाक्षर राममन्त्र है । षोडशाक्षर मन्त्रोंम यह बड़े-बड़े पातकोंको नष्ट करनेवाला महामन्त्र है । इसे भी वीणा आदि बाजाके साथ मीठे स्वरसे गाना चाहिए क्योंकि यह अतिशय पुण्यवर्धन कारी मंत्र है ॥ १५७ ॥ १५८ ॥ "दशरथसुतबालं वन्दे रामं घननीलम्" यह इस मन्त्रका स्वरूप है । 'कोदण्डखण्डन' ऐसा कहकर 'दशशिरोमर्दन' इसके बाद "कौसल्यासुत राम सीतारामजन" और "राजाराम" कहे। यह मन्त्र एकानत्रिंशाक्षरात्मक है। इसका भी वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे
सर्ग १७] मनोहरकाण्डम् ७३७
कोदण्डभंजनेत्युक्त्वा रावणमर्दनेति च । कौसल्येति तथोक्त्वा विश्रामेति ततः परम् ॥१६२॥
सीतारंजनेति ततो राजारामेति वै ततः । सप्तविंशाक्षराख्यं मनु प्रोक्तः शुभप्रदः ॥१६३॥
कोदण्डभंजन रावणमर्दन कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजारामेति मनुः ।
कोदण्डखंडनेत्युक्त्वा वालीताडन चेति वै । लङ्कादहनेति ततः पाषाणतारणेति च । १६४।
रावणमर्दनेत्युक्त्वा रविकुलेति वै ततः । भूपेति तथोक्त्वा कौसल्येति ततः परम् ॥१६५॥
विश्रामेति तथोक्त्वा सीतारंजन चेति वै । राजारामेति चोक्त्वा पञ्चाशदक्षरो मनुः । १६६॥
अयं सदा कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः । मन्त्रोऽयं हि नृणांऽत्रत्यं महापातकनाशनः ॥१६७॥
कोदण्डखंडन वालीताडन लङ्कादहन पाषाणतारण रावणमर्दन रविकुलभूषण कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजारामेति मनुः ।
एवं नानाविधा मंत्राः सन्ति शिष्य सहस्रशः । सहस्रवर्षपर्यन्तं कस्तान् वक्तुं भवेत् क्षमः । १६८॥
एते सर्वे कीर्तनाया वीणावाद्येन सुस्वराः । इदं चान्यज्जानीया न ज्ञेया मान्त्रगोत्तमाः । १६९॥
मंत्रशास्त्रेषु ये प्रोक्तास्ते जपाय एव मन्त्रिणे । नैयतः कीर्तनायान्यैः कीर्तनीयास्त्विमे स्मृताः १७०॥
एतान् मन्त्रान् पुरस्कृत्य प्रबन्धा विविधाः शुभाः । रचनीया बुधैश्च कुर्वाणैर्नामानि पाथिगद्गतान् ॥१७१।
ये ये नोक्ता मया मन्त्रास्तान् पुरस्कृत्य गद्यपद्यैः । बन्धने नैव दोषोऽस्ति तेनोष्टो जायते हरिः ॥१७२॥
मन्त्रैः प्रबन्धैः काव्यैश्च स्तुतिभिः कीर्तनादिभिः । प्राचीनैर्वा कविनूतैः रामो गेयः सदा नरैः ॥१७३॥
येन केन प्रकारेण कार्यं राघवचिन्तनम् । पापराशिः क्षयं दृष्ट्वा श्रीरामाच्चितनेन हि ॥
अवश्यत्र न संदेहः पावकेन यथा कुटी ॥१७४।
दंभेन वातिभक्त्या वा निष्कामाद्वा सकामतः । यद्यत्र राघवो गीतस्तेन पापं हुतं भवेत् ॥१७५॥
स्वरसे कीर्तन करना चाहिए ॥ १६० । १६० ॥ 'कोदण्डखण्डन दशशिरोमर्दन कौसल्यासुत राम सीतारंजन राजाराम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है 'कोदण्डभंजन कहकर 'रावणमर्दन' इसके बाद 'कौसल्याविश्राम' और 'सीतारंजन राजाराम' कहे । यह सताईसअक्षरात्मक शुभ राममन्त्र है ॥ १६१ । १६२ ॥ "कोदण्डभंजन रावणमर्दन कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजाराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। 'कोदण्डखण्डन' कहकर "वालीताडन" और इसके बाद क्रमशः लङ्कादहन पाषाणतारण "रावणमर्दन" "रविकुलभूषण" "कौसल्याविश्राम" और 'सीतारंजन राजाराम' ऐसा कह । यह पञ्चाशदक्षरात्मक राममन्त्र है, इसे भी वीणा आदि बाजोंके साथ मीठे स्वरसे गाना चाहिए । यह मन्त्र सब राममन्त्रोंमें श्रेष्ठ है और बडे बडे पातक नष्ट कर देता है ॥ १६३-१६६॥ 'कोदण्डखण्डन वालीताडन लङ्कादहन पाषाणतारण रावणमर्दन रविकुलभूषण कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजाराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। हे शिष्य ! इस प्रकार हजारों राममन्त्र हैं। जिन्हें कोई हजारों वर्ष तक कहता जाय, फिर भी पूरी तौरसे नहीं कह सकता । १६७॥ ऊपर बतलाये सब मन्त्रोंको वीणा आदि वाद्यके साथ मीठे स्वरसे गान चाहिए। श्रेष्ठ मनुष्योंको यह भी जान लेना चाहिए कि ये सब मन्त्र जपके लिए नहीं बल्कि गान करनेके लिए हैं। इसके अतिरिक्त मन्त्रशास्त्रोंमें जितने मन्त्र बतलाये गये हैं, वे सब जपनेके लिए हैं, गान करनेके लिए नहीं। बुद्धिमान् कवियोंको चाहिए कि इन्हीं मन्त्रोंके आधारपर विविध भाषाओंमें विविध प्रकारके प्रबन्धोंकी रचना करें ॥ १६८-१७० ॥ मैंने जिन जिन मन्त्रोंको नहीं बतलाया है उन्हें भी बुद्धिमान् लोग गद्य वा पद्यके रूपमें ला सकते हैं। उस ग्रन्थोंकी रचना करनेमें कोई दोष नहीं होता, बल्कि ऐसा करनेसे भगवान् प्रसन्न होते हैं । १७१॥ मन्त्र, प्रबन्ध, काव्य, स्तुति, कीर्तन ये सब प्राचीन हों या अपना ग्रीष्म नये बनाये गए हों, उनका कीर्तन करना चाहिए। किसी भी प्रकारसे रामका स्मरण करना जरूरी है। क्योंकि रामका ध्यान करनेपर सारी पापराशि उसी तरह क्षणभरमें जल जाती है। जैसे फूसकी कुटीमें आग लगते ही क्षणभरमें उसे जलाकर भस्म कर देता है । १७२-१७४ ॥ दम्भसे, भक्तिसे, निष्काम या सकाम जिस किसी तरह भी रामनामका कीर्तन करनेपर पाप जल जाता है ।१७५॥
| ७३८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १६ |
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यथा वह्निस्तूलराशिं स्पर्शित्वाः कापनां विना । कामेन वा दहेत्येव क्षणात्तद्वन्न संशयः ॥१७६॥
मंत्रैः प्रबन्धैः काव्यैश्च नानाचारित्रवर्णनैः
अत्यशुद्धैः स्तुतो रामः कल्पितैरपि स्वेच्छया । तैश्च तुष्टो भवत्यत्र श्रीरामो नात्र संशयः ॥१७७।
विनाश्रयेण रामस्य यत्कृतं स्तवनादिकम् । तेनापि तुष्टः श्रीरामो भवत्येव न संशयः ॥१७८॥
आश्रयेणापि या निन्दा कृता श्रीराघवस्य च । सा भवेन्नरकायैव नात्र कार्या विचारणा ॥१७९।
किं शास्त्रैश्च पुराणैश्च पठितैः पाठितैरपि । यदि रामे रतिर्नास्ति तैर्भवेन्मानवस्य किम् ॥१८०॥
रामप्रीतिद्युतस्यात्र मूर्खस्यापि नरस्य च । तद्भाषाकृतस्तुत्याद्यैः प्रसन्नो जायते हरिः ॥१८१।
रामचन्द्रस्य प्राप्त्यर्थं यत्कृतं मानवैर्भुवि । तेनातितुष्टः श्रीरामो भवत्येव न संशयः । १८२।
रामो गेयश्चिन्तनीयोऽत्र रामः स्तव्यो रामः सेवानीयोऽत्र रामः ।
ध्येयो रामो वंदनीयोऽत्र रामो दृश्यो रामः सर्वभूतान्तरेषु ॥१८३॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतं श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे
लक्ष्मणादीनां कवचादिनिरूपणं नाम पञ्चदशः सर्गः । १५ ।
षोडशः सर्गः
( हनुमत्पताकारोपण व्रत )
श्रीरामदास उवाच
एवं यद्यत्त्वया पृष्टं तन्मया परिवर्णितम् । किमन्यच्छ्रोतुकामस्त्वं तद्वदस्व वदामि ते ॥ १ ॥
विष्णुदास उवाच
रामायणं नरः श्रुत्वा किं विधानं समाचरेत् । तच्च वद महाभाग यद्यस्ति तत्सविस्तरम् ॥ २ ॥
श्रीरामदास उवाच
रामायणे श्रुते दद्याद्रथं हेममयं सुधीः । चतुर्भिर्वाजिभिर्युक्तं तथा क्षौमपताकया ॥ ३ ॥
जिस तरह बड़ीसे बड़ी रूईकी राशिको अग्नि जला डालती है, उसी तरह किसी कामनासे या बिना कामना होके रामका कीर्तन तत्क्षण पापराशिको भस्म कर देता है । इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १७६ ॥ मन्त्र प्रबन्ध तथा विविध प्रकारके चरित्रोंसे पूर्ण काव्योंसे या अपने बनाये अतिअशुद्ध पदोंसे ही रामका कीर्तन क्या जाता है तो भी भगवान् प्रसन्न होते हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ १७७ । बिना किसी आधारके भ बने काव्योंसे रामकी स्तुति करनेसे रामचन्द्रजी प्रसन्न होते हैं । यदि रामका आधार लेकर काव्य बनाया जाय और उसमें भगवान्की निन्दा की जाय तो वह नरकका ही साधन होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है । १७८ ॥ १७९ । यदि राममें प्रीति नहीं है तो बहुतेरे शास्त्रों और पुराणोंके पठन-पाठनसे कुछ भी लाभ नहीं होता ॥ १८० ॥ राममें प्रीति रखनेवाला मनुष्य चाहे मूर्ख ही हो किन्तु वह यदि अपनी टूटी-फूटी भाषामें भगवान्का गुण गाता है तो उससे भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥ १८१ ॥ इनके अतिरिक्त रामचन्द्रजीकी प्राप्तिके लिए जो कुछ भी उपाय किये जाते हैं, उनसे भगवान् अतिशय प्रसन्न होते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १८२ ॥ इसलिए लोगोंको चाहिए कि सदा रामका गुण गायें, उनका स्मरण करें, सेवा करें, ध्यान करें, और संसारके प्रत्येक प्राणीमें भगवान्की अलौकिक ज्योतिका दर्शन करें ॥ १८३ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे पञ्चदशः सर्गः। १५ ॥
श्रीरामदास बोले— हे शिष्य ! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, सो मैने कह सुनाया । अब क्या सुनना चाहते हो, सो कहूँ ॥ १ ॥ विष्णुदासने कहा— आनन्दरामायण सुननेके अनन्तर लोगोंको क्या-क्या विधान करना चाहिए, सो आप विस्तारपूर्वक हमें बतलाइए ॥ २ ॥ श्रीरामदासने कहा—इस रामायणको सुननेके अनन्तर
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७३५
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७३५
एतैश्चैव समायुक्तं किंकिणीनादनादितम् । संपादितेश्च सम्यग्वै धेनुं दद्यात्पयस्विनीम् ॥ ४ ॥
ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चात् शतमष्टोत्तरं सुधीः । एवं कृते विधाने तन्महाकाव्यं फलप्रदम् ॥ ५ ॥
रामायणं भवेन्नूनं नात्र कार्या विचारणा । यस्मिन् रामस्य संस्थानं रामायणमथोच्यते ॥ ६ ॥
एवं त्वया यथा पृष्टं मया सर्वं निवेदितम् ।
विष्णुदास उवाच
किञ्चिद्व्रतं हनुमतस्त्वं मां वक्तुमिहार्हसि ॥ ७ ॥
श्रीरामदास उवाच
यदा रामस्त्रिकूटाद्रौ नागपाशैस्तु पीडितः । नारदस्य वचः श्रुत्वा सस्मार विनतासुतम् ॥ ८ ॥
तदाऽसौ काश्यपो वीरः समागम्य रणांगणे । प्रणाममकरोत्स्मै रामायामिततेजसे । ९ ॥
निवार्य यक्षणास्त्रं तन्मेघनादसमीरितम् । तुष्टाव रघुवीरं तं ससैन्यं च सलक्ष्मणम् ॥ १० ॥
उवाच प्रणिपत्याथ रामभद्रं खगेश्वरः ।
गरुड़ उवाच
आश्चर्यमिदमत्यन्तं यद्भवान्स्मरद्धि माम् । ११॥
सति वीरे महारुद्रे सगगे श्रीहनूमति सुग्रीवे च नले नीले सुषेणे जाम्बवत्यपि । १२।
अङ्गदे दधिवक्त्रे च तारे च साले तथा । मैंदे मनि महावीर्ये किं मेऽत्रास्ति प्रयोजनम् ॥ १३।
श्रीराम उवाच
भवद्भीतिमुपागम्य विद्रुताश्च भुजङ्गमाः एतेषु सत्सु वीरेषु किमु सैन्यमपीडयन् ॥ १४॥
गरुड़ उवाच
रामदेव महाबाहो कपीनां चरितं शृणु । आत्मनोऽपि समाविष्टान्मा कुरुध्वात्र गर्हणम् ॥ १५।
साक्षात्त्वं भगवान्विष्णुर्लक्ष्मीस्तु जनकात्मजा । सौमित्रिः फणिराजोऽयं रुद्राश्च कपयः स्मृताः ॥ १६।
बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह ४ । धोड़ो जुते और रेशमी पताकासे सुशोभित रथ कथावाचक के हाथको दान दे । विविध प्रकारसे अलंकृत गौका दान करे । इसके बाद एक सौ आठ ब्राह्मणोंको भोजन करावे । जो प्राणी आनन्दरामायण सुनकर ऐसा करता है, उसे इस महाकाव्यके श्रवण करनेका फल प्राप्त होता है । इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए । जिसमें श्री रामचन्द्रजीका निवास हो, वही रामायण है अथवा जिसमें राम विद्यमान रहें, वह रामायण है । ३-६ । इस तरह तुमने मुझसे जैसा प्रश्न किया, मैंने उसका उत्तर दे दिया । विष्णुदासने कहा—हे गुरो! अब मुझे हनुमत्पुत्रका भी कुछ वृत्त बतला दीजिए ॥ ७ । श्रीरामदासने कहा—जिस समय राम त्रिकूट पर्वतपर नागपाशमें बँध गये थे, उस समय उन्होंने नारदके कथनानुसार गरुडका स्मरण किया । उसी समय गरुडजी वहाँ जा पहुंचे और उन्होंने संग्रामभूमिम भगवान्को प्रणाम किया ॥ ८ । ९ । तदनन्तर मेघनाद द्वारा प्रेरित नागपाशका निवारण करके समस्त सेना और लक्ष्मण सहित रामकी स्तुति की । फिर प्रणाम करके गरुडजी भगवान् रामचन्द्रजीसे कहने लगे—हे प्रभो ! यह सोचकर मुझे आश्चर्य होता है कि श्रीहनुमान्जीके रहते हुए भी मुझ दासको आपने स्मरण किया ॥ १० ॥ ११॥ हनुमान्जीके अतिरिक्त सुग्रीव, नल, नील, सुषेण, जाम्बवान्, अङ्गद, दधिवक्त्र, तार, तरल, मैंद आदि वीर थे। इन वीरोंके रहते हुए श्रीमान्को मुझे स्मरण करनेकी आवश्यकता क्यों पड़ी ? । १२ ॥ १३ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा—आपके भयसे सब सर्प भाग गये, किन्तु ये लोग यहाँ रहकर भी स्वयं उनके पाशम बँध गये थे ॥ १४ ॥ गरुडजी बोले—मैं आपको वानरोंका चरित्र सुनाता हूं, सुनिए। यद्यपि यहाँ बहुतसे आत्मीय बानर बैठे हैं फिर भी मैं कहूँगा। इन लोगोंको चाहिए कि मेरी बातको अपनी निन्दाके रूपमें न मानें ॥ १५ ॥ आप साक्षात् विष्णु भगवान्
७४० आनन्दरामायणे [ सर्गः १६
सुग्रीवो वीरभद्रोऽयं शम्भुरेव स्मृतो नलः । विद्धि दाशरथे नूनं गिरिशो नील एव च ॥१७॥ महाद्यशाः सुषेणोऽयं जांबवांश्चाप्यजैकपात् । अहिर्बुध्न्यश्चगवदोऽप्यदधिवक्त्रः पिनाकधृक् ॥१८॥ अयुताजिद्वयं तारः स्थाणुश्च तरलो यमः । मैंदो भर्गस्तनुः साक्षान् हनुमान् भगवान् स्मृतः॥१९॥ अवतीर्णा महारुद्रास्त्वदर्थे रघुनन्दन अग्रतस् सर्वदेशेषु नानापर्वतसङ्घतः ॥२०॥ धृत्वा च कपिरूपाणि अवतेरुर्महातले । सर्वेऽपि कपितां प्राप्ताः कारणं तद्व्रवीमि ते ॥२१॥ पुरा देवासुरैः क्षिप्तोर्मथिता द्याधयोऽभवन् । नानापीडाकराः मर्त्या लूताविस्फोटकादयः ॥२२॥ तैरेव व्याधिभिः सर्वं पीडितं जगतीतलेम् । ऋषयोऽपि नृपालाश्च ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥२३॥ ऊचुश्च जगतां नाथ ब्रह्माणं कमलासनम् । त्राहि त्राहि जगन्नाथ व्याधिभ्यो जगतीमिमाम् ॥२४॥ पीडितां दारुणैर्दोषैर्ज्वररोगैश्च महोल्बणैः । त्रिदोषैर्जर्जरोभूतां विभ्रमैर्व्याकुलाकृताम् ॥२५॥ औषधानि न सिद्ध्यन्ति मंत्रयंत्राणि चैव हि । पीडयन्ति महारोगा मन्वानांनाशकारिणः ॥२६॥ एतत्ते कथितं सर्वं ब्रह्मन्त्वत्पुरतः सुधीः ॥२७॥ तत्तेषां वचनं श्रुत्वा रुद्रान्संप्रार्थयद्विधिः । तेऽपि श्रुत्वा ब्रह्मवाक्यं रुद्रा एकादशामलाः ॥२८॥ समाश्वास्य विरिंचि ते वीरभद्रादयः कपिः । बभूवु वानरस्तत्र सूर्य्यपुत्राद्या इमे । २९। पर्यटन् पर्वताग्राणि मण्डलानि च सर्वतः । नदन्तो जगतीं सु सुकौः सुदारुणैः । ३०॥ स्वेदितैः क्रीडनैस्तेषां व्याधयो नाशमान्नुयुः तन्तु सकलां दृष्ट्वा वानरैर्व्याप्तां भुवम् । ३१॥ तुतोष भगवान्ब्रह्मा ददौ तेभ्यो वरान् बहून् ।
ब्रह्मोवाच
युष्मास्वपि च मुद्राऽस्तु मृतसंजीवनी कला ॥३२। आज्ञाऽस्तु सर्वजगति वेगोऽस्त्व तु मनः समः । युष्मत्प्रम्मान्ति ये मर्त्याः पूजयन्ति ममत्तनुम्॥३३॥
हैं, श्रीसीताजी लक्ष्मी, लक्ष्मण शेष भगवान्, ये सब वानर महारुद्रांश सम्भव व रघुनन्दन और नल साक्षात् शिव-जीके अंशज शंभु हैं । हे दाशरथे ये नील भी साक्षात् शिव हैं । इत्यादि महायशस्वी सुषेण महायशा, जाम्बवान् अजैकपात, अहिर्बुध्न्य गवद, दधिवक्त्र पिनाकधृक्, तार, अयुताजित्, तरल स्थाणु, मैंद भर्गस्तनु और हनुमानजी साक्षात् शिव हैं ॥ १६-१९ । ये ११ ग्यारह रुद्र आपके लिए एकत्र होकर सब देशोंमें अनेक पर्वतोंपर रहते थे । २० । किन्तु अब वानरका रूप धारण करके इस भूमण्डलपर आये हैं । ये सब वानर क्यों हुए, इसका कारण भी मैं आपकी बतला रहा हूँ ॥ २१ ॥ एक समय देवताओ तथा दैत्योंने मिलकर समुद्रका मन्थन किया, उससे अनेक दुःख देनेवाले तथा और विस्फोट आदि बहुतसे रोग उत्पन्न हुए ॥ २२ । उन रोगोंसे तीनों लोक संकटमें पड़ गये । ऐसी अवस्थामें बहुतसे ऋषि और देवता एकत्र होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये और कहने लगे- हे जगन्नाथ ! इन दारुण व्याधियोंसे इस विश्वकी रक्षा करिए ॥ २३ ॥ २४ ॥ संसारके प्राणियोको ज्वर आदि महाघोर रोगों और वात, पित्त तथा कफ इन तीन दोषोंने घेर लिया है। इनकी शान्तिके लिए जिस किसी औषध तथा यंत्र मंत्र आदिका प्रयोग किया जाता है, वह भी सफल नहीं हो पाता । मनुष्योंका नाश करनेवाले रोग सदैव उन्हें सताते रहते हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥ हे ब्रह्मन् ! इस तरह मैंने लोगोने कष्ट आपके सन्मुख सुनाया ॥ २७ ॥ उनकी ऐसी बात सुनकर ब्रह्माजीने रुद्रोंसे प्रार्थना की । ब्रह्मवाक्य सुनकर व वीरभद्र आदि एकादश रुद्रगण ब्रह्माको सान्त्वना देकर सुग्रीव प्रभृति वानर होकर बड़े बड़े पर्वतों तथा भूमण्डलोमे मण्डल बाँधकर घूमते हुए अपने दारुण शब्द तथा क्रीड़ासे उन व्याधियोको नष्ट करने लगे ॥ २८-३० । इसके बाद समस्त पृथ्वीको वानरोसे वेष्टित देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए और बहुतसे वरदान दिये । ब्रह्माजीने कहा कि तुम लोगोंकी मुद्राओंमें अमृत संजीवनी नामकी कला विद्यमान रहेगी । १३१ ॥ १३२ ॥ तुम्हारा वेग मनके समान होगा । जो लोग तुम्हारे
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७५१
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७५१
पताका विविधाः कृत्वा चित्रतोरणसंयुताः । भक्ष्यभोज्यानि साद्यानि लेह्यपेय च सर्वशः ॥३४॥ युष्मदुद्दिश्य ये मर्त्या जुह्वन्ति हि हुताशने । वृत्तिः पुण्यतमं रुद्रांस्तेषां सिद्धिर्न संशयः । ३५॥ पायसेनेव साज्येन तथैव तिलसर्पिषा । यजन्ति भवतां शुद्धं ते यान्ति परमं पदम् ॥३६॥ एवं वै रुद्रमखिलं माया वैश्वानरीस्तथा । मानस्तोकेति वा मन्त्रो मनोज्योतिर्धथापि वा । ३७॥ भवतां यजनं चात्र गायत्र्या वा प्रकीर्तितम् एवं ये मानवा लोके विधानं परिकुर्वते ३८॥ व्याधिं मुक्त्वा सुखासीनास्तेऽन्ते यान्त्यक्षयं पदम् ।
गरुड उवाच इति राम पुरातवृत्तं कपीनां कथितं मया ॥३९॥ एषु रुद्रेषु सर्वेषु हनुमान्द्रनायकः ॥४०॥ विधानं तत्र कर्तव्यं यत्रास्ते हनुमान्प्रभुः । गोपुरे हनुमन्मूर्तिः शिलायां च प्रतिष्ठिता ॥४१॥ तत्र सर्वं प्रकर्तव्यं विधानं सुरसत्तमः ।
श्रीराम उवाच केन केन प्रकारेण क्रियते कपिपूजनम् ॥४२॥ पताकाः कीदृशीस्तत्र कदि कार्या द्विजेश्वर । हवनं कति सङ्ख्याकं किं द्रव्यं को जपोऽत्र वै । ४३। किं दानं केन विधिना तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ।
गरुड उवाच जनमारे समुत्पन्ने ग्रामे वा पत्तनेऽपि वा ॥४४॥ प्रभवन्त्यौषधं नैव मणिमन्त्रपुरःक्रियाः । विधानं तत्र कर्तव्यमेकादश्यां तिथौ नृप ॥४५॥ प्रातःकाले समुत्थाय कृतशौचो द्विजोत्तमः । स्नात्वा गङ्गाजले पुण्ये तिलामलकसंस्कृतः ॥४६॥ एकादश द्विजान् श्रेष्ठानुपवासान्निमन्त्रयेत् । जागरस्तैस्तु कर्तव्यः सर्वोपस्करसयुतः । [४७]॥ आदौ तु मण्डपं कृत्वा सर्वत्रापि सुशोभितम् । पुष्पमण्डपिकामध्ये मण्डपे स्थापयेद्गगन् । ४८॥
शरीरकी पूजा और स्मरण करेंगे। विविध रङ्गकी पताकाये, चित्र विचित्र तोरण, तरह तरह के भक्ष्य भोज्य तथा पेय पदार्थ आपके उद्देशसे जो आगमें हवन करेंगे उनको रुद्रसिद्धि प्राप्त होगी । इसमें कई संशय नहीं है ॥ ३३-३५ ॥ जो लोग घी मिलाकर खीरका हवन करते है उनका परम पद प्राप्त होता है ॥ ३६ ॥ इस प्रकार "एवं वै रुद्रमखिलं" इस मन्त्रसे अथवा 'वैश्वानर" या "मानस्तोके' इस मन्त्र तथा "मनोज्योति" इस मन्त्र अथवा गायत्रामन्त्रसे आपके लिए हवन करनेका विधान है। जो लोग संसारमें इस विधिक्रा पालन करते हैं, वे सब प्रकारकी व्याधियोसे मुक्त होकर अक्षय पद प्राप्त करते हैं। गरुडजीने कहा हे राम ! यह मैने बानरोंका एक प्राचीन इतिहास कह सुनाया ॥ ३७ ३८ । इन ग्यारह रुद्रोंमें हनुमानजी सबके मुखिया हैं। इसलिए ऊपर बतलाये हुए सब विधान उसी स्थानपर करने चाहिए, जहाँ कि हनुमान्जीकी मूर्ति विद्यमान हो । अथवा गोपुर या किसी पत्थरके फलकपर हनुमान्जीकी मूर्ति स्थापित करके पूर्वलिखित विधिसे पूजन करे । श्रीरामचन्द्रजाने पूछा-हे पक्षिराज ! किस-किस प्रकारसे कपिपूजन करना चाहिए ॥ ४०-४२ ॥ उनकी पूजामें कैसी पताका बनवाये, कितनी आहुतियां दे, किस मन्त्रका जप करे और किस-किस विधिसे क्या दान करे ? हे सुव्रत ! ये सब बाते हमे बतलाइए । गरुडने कहा हे प्रभो ! जिस समय ग्रामीण या नागरिक मनुष्योपर महामारी जैसी विपत्ति आ पड़े । मणि-मन्त्र आदिका प्रभाव कोई काम न करे तो एकादशी तिथिको यह विधान सम्पन्न करे। ४३-४५ ॥ किसी उत्तम ब्राह्मणको चाहिए कि वह प्रातःकाल उठे। शरीरमें तिल और आंवले लगाकर पवित्र जलसे स्नान करें। इसके अनन्तर उपवास किये हुए ग्यारह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और सब सामग्रिये एकत्रित करके उन लोगोके साथ रातभर जागरण करे ॥ ४६॥ ४७ ॥ पहले चारों ओरसे सुशोभित मंडप तैयार करवाये और उसमें फूलोंका एक छोटा-सा मन्दिर बनाकर बीचमें
७४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १६
पञ्चामृतैस्तु संस्नाप्य रुद्रांश्याः परिकल्पयेत् । ततस्तु कुसुमैः पूजा शतपत्रादिभिः शुभैः ॥४९॥ चन्दनं च सकर्पूरं रुद्रेभ्यो लेपनं वरम् । दशांगधूपमाद्यञ्च दीपनीराजयैत्ततः ॥५०॥ नैवेद्यं विविधं दद्यात्ताम्बूलैर्नैव संयुतम् । एकादश पताकास्तु पटैः सुपरिकल्पयेत् ॥५१॥ या या यस्मै समुद्दिष्टा पताका च सुशोभना । तस्य तस्यैव रूपं तु तस्यामेव प्रकल्पयेत् ॥५२॥ एवं कृते विधाने च सुपताकासुशोभनैः । प्रातःकाले तु राजेन्द्र जागरंवि द्विजोत्तमः ॥५३॥ कृतस्नानो नदीतोये होमं कुर्यात्समाहितः । पयसेन तु साज्येन तथैव तिलसर्पिषा ॥५४॥ अयुतं हवनं कृत्वा पुनः पूजां प्रकल्पयन् । पताका हनुमद्द्वारे तस्यैव च निधापयेत् ॥५५॥ राजद्वारे तु संप्रोक्तौ गोपेन्द्रोपापणे न्यसेत् । नलनोलस्तथा के च शिवद्वारे तु विन्यसेत् ॥५६॥ तारस्य सत्वराद्यादि मैन्दस्य त्रातडस्य च । ग्रामद्वाह्येषुदिक्षु मार्गेषु स्थापयेद्बुधः ॥५७॥ जलस्थाने जाम्बवतो दधिवक्त्रो चतुष्पथे । श्वपचन्वरगां दिव्यां महावाद्यादिमंगलीः ॥५८॥ द्वारदेशे जनानां च रुद्रमूर्त्तिं विलेपयेत् विचित्रौ पश्चरंगैश्च ग्राममूर्तेश्च वेष्टयेत् ॥५९॥ प्रत्यहं कारयेद्विद्वान् भक्त्या ब्राह्मणभोजनम् । द्विजेभ्य स्त्रिऋत्विग्भ्यो मालकाराणि भूरिशः ॥६०॥ छत्राणि कारयेच्च पादुकाश्च त्रिदोषनः । धेनुं पयस्विनीं दद्यादाचार्याय सवत्सकाम् ॥६१॥ सदक्षिणां सुवस्त्रां च मालकार्या गुणान्विताम् । द्विजाय महिषीं दद्यात्तथैव पृथगीरने ॥६२॥ अन्येभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च मन्न धान्यानि भूरिशः । लवणं मधुरं देयं तैलं च सगुडं तथा ॥६३॥ शय्यादानानि भूरिणि छत्राणि विविधानि च । एतत्कृत्वा विधानं च राजा क्षेममवाप्नुयात् ॥६४॥ रुद्र एवात्र निर्दिष्टो जपः सर्वैः सुखप्रदः । अथवा द्वान शाम्नं मानवशोक इति स्फुटम् ॥६५॥
इति हनुमत्पताकाभिधानं व्रतम् ।
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे हनुमत्पताकापन्न नाम षोडश सर्गः ॥ १६ ॥
वानरोंको स्थापित करे ॥ ४८ । तदनन्तर उन रुद्रांका पञ्चामृतसे स्नान कराय और शतपत्र आदिके फूलोंसे विधिवत् पूजन करे। कपूर मिले हुए चन्दनका लेप, दशाङ्ग धूपका आघ्राण और नीराजन करे। फिर ताम्बूलके साथ विविध प्रकारके नैवेद्य समर्पित करे और सूक्ष्म वस्त्रसे ग्यारह पताका बनवावे। जो पताका जिस रुद्रके लिए निर्धारित की गयी हो, उसम उसका चित्र बनवावे ॥ ४९–५२ ॥ ये विधियाँ करनेके अनन्तर सुन्दर पताका आदि समर्पित करे। वह ब्राह्मण सवेरे उठे और नदीके जलमें स्नान करके सावध- नतापूर्वक तिल और घी मिले खीरसे अग्निहोत्रमें दस हजार आहुतियाँ दे। इसके बाद फिर उन सबकी पूजा करे। हनुमान्जीके द्वारपर हनुमान्जी की पताका नरेन्द्र या सुग्रीवकी पताका, आपण (बाजार) में शुषेणकी और शिवद्वारपर नल-नीलकी पताका स्थापित करे। ५३–५६॥ तार, तरस, मैन्द और अङ्गदकी पताकाओंको ग्रामके बाहर चारों दिशाओंमें स्थापित करे ।५७। जलस्थानपर जाम्बवान् और चौराहेपर दधिवक्त्रकी पताकाको विविध वाद्यों की ध्वनिके साथ स्थापित करे। मनुष्योंके द्वारदेशपर पाँच रंगोंसे चित्रित रुद्रमूर्ति बनाये और ग्राममूसाम उसे परिवेष्टित करे । ५८ ॥ ५९ ॥ समझदार लोगोंको चाहिए कि प्रतिदिन ब्राह्मणोंको अच्छी तरह भोजन करावें और ऋत्विजोंको विविध आभूषण और वस्त्र दान दे ॥ ६० ॥ छत्र, पादुका तथा दूध देनेवाली सवत्सा गो आचार्यको दे। उस गौके साथ पर्याप्त दक्षिणा, अलंकार, वस्त्र आदि भी दे। उस यज्ञमें जो ब्राह्मण ब्रह्मा बना हो, उसे एक भैंसका दान दे ॥ ६१ । ६२ । इसके अतिरिक्त और जितने ब्राह्मण हों, उन्हें भी शय्यादान और छत्र आदि दे। जो राजा इस विधानसे रुद्रयज्ञ करता है, उसका सब प्रकारसे कल्याण होता है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ इस विधानमें रुद्रमन्त्र अथवा "मानस्तोके" यह मन्त्र जपना लाभकारी होता है । ६५ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेज-पाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥
सर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७५३
सर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७५३
सप्तदशः सर्गः
( श्रीरामचन्द्रोपदिष्ट साररामायण )
श्रीरामदास उवाच
विष्णुदास त्वया यद्यत्पृष्टं तत्तन्मयोदितम् । रामाज्ञया तव प्रीत्याऽऽनन्दचारित्रमुत्तमम् ॥ १ ॥
रामेणैव ममास्येन त्ववोपदिष्टमादरात् । त्वय्यस्ति रामसंप्रीतिस्तस्माद्रामेण मे द्विज ॥ २ ॥
आज्ञापितं पूजनांते पुरा तव तपोबलात् आनन्दरामचरितं ममेदं मंगलप्रदम् ॥ ३ ॥
विष्णुदासाय विप्राय कथयस्वेति वै मुहुः । त्वदर्थे पूजनांते मे दर्शनं दत्तवान्निजम् ॥ ४ ॥
नवोत्तरशतश्लोकसाररामायणेन च पुरा मे ग्रथितेनात्र रामेण स्मारितोऽप्यहम् ॥ ५ ॥
श्रीराघवोपदिष्टेन महामंगलदेन च नवाधिकशतश्लोकसाररामायणेन च । ६ ।।
यद्यन्मया विस्मृतं च श्रुतं पूर्वकथानकम् यम तत्तच्चापि स्मारितं वाल्मीकिमुखनिर्गतम् । ७ ।।
तदौ मया विष्णुदास राघवस्य तृषा तव । शब्दे विमिस्राद्रामचरितन्मविविच्य च । ८ ।।
सारं सारं च कथितं महामंगलकारकम् ।
विष्णुदास उवाच
त्वथैतत्कथितं चेदमानन्दमंगलं मम ॥ ९ ॥
श्रीरामचरितं रम्यं मम तोषार्थमुत्तमम् । शतकोटिमितत्तत्किं कथितं च विविच्य च । १०॥
अथवा भारतखंडांर्तर्भागादुक्तं वदस्व तत् ।
श्रीरामदास उवाच
शतकोटिमितं कृत्स्नं मया रामायणं शुभम् ॥११॥
विविच्य ज्ञानदृष्ट्याऽत्र तवेदमुपदेशितम् । विदेपान्स्मारितं चापि साररामायणश्रवात् ॥१२.।
रामोपदेशिवाद्राम्यात्तत्तस्ते कथितं मया ।
विष्णुदास उवाच
शतकोटिमिते रामचरिते पाषकापहे ॥ १३॥
कति काण्डानि सर्गाश्च तन्मां वक्तुं त्वमर्हसि ।
श्रीरामदास कहा हे विष्णुदास ! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, सो मैंने कह सुनाया। यह समस्त आनन्दरामायण रामचन्द्रजीकी आज्ञासे अथवा यों कहो कि साक्षात् रामचन्द्रजीने ही मेरे मुखसे कहा है। तुम्हारे हृदयमें रामकी भक्ति है। इसलिये उस दिन पूजनके अन्तमें तुम्हारे तपोबलसे प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे तुमको आनन्दरामायण सुनानेकी आज्ञा दी थी। उन्होंने कहा था -यह आनन्दरामायण महा मंगलकारी ग्रन्थ है, तुम इसे विष्णुदासको सुनाओ तुम्हारे ऊपर प्रसन्न होकर ही मैं पूजनके अन्तमे तुम्हें अपना दर्शन दे रहा हूँ। १-४ ॥ रामचन्द्रजीके स्मरण करानेपर ही मैंने एक सौ नौ श्लोकोंमें रामायणका सार सुनाया था। जिन-जिन कथानकोंको मैं भूल गयाथा। वे भी वाल्मीकिजीके मुखसे निकले रामायण द्वारा स्मरण होते गये ॥ ५-७॥ इसके बाद मैंने रामचन्द्रजीकी आज्ञासे रामायणके मुख्य-मुख्य अंश लेकर कहा है। विष्णुदास बोले कि आपने मुझे आनन्द देनेके लिये यह रम्य आनन्दरामायण कहा है तो कृपा करके अब यह भी बतलाइए कि सौ करोड़ सङ्ख्यात्मक रामायणसे आपने कहाँ कहाँसे क्या-क्या अंश लेकर कहा है? ॥८-१०॥ अथवा भारतखण्डसे कौन-कौन अंश लिये हैं ? श्रीरामदास कहने लगे-पूरी रामायण सौ करोड़ श्लोकोंकी है ॥ ११ ॥ ज्ञानकी दृष्टिसे विवेचना करके मैंने तुम्हें इसका उपदेश दिया है। हमें तो रामायणके सारका श्रवण
७४४ आनन्दरामायणे [ सर्ग १७
श्रीरामचन्द्र उवाच
नव लक्षाणि काण्डानि शतकोटिमिते द्विज ॥१५॥
सर्गा नवतिलक्षाश्च ज्ञातव्या मुनिकीर्तिताः । कोटीनां च शत श्लोकमानं ज्ञेयं विचक्षणैः ॥१६॥
विष्णुदास उवाच
गुरोऽहं श्रोतुमिच्छामि यत्त्वां श्रीरामवेण हि । उपदिष्ट मदर्यं हि साररामायणं शुभम् ॥१६॥
नवोत्तरशतश्लोकपरिमितं च मनोहरम् । तन्मे वदामृता पूर्ण परं कौतूहलं मम ॥१७॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । साररामायणं तेऽद्य प्रोच्यते गणकीर्तितम् ॥१८॥
आविर्भूत्वा पूजनांते मऽग्रे भ्रातृभिः श्रिया । मां प्रोवाच मुहुर्यश्च प्रसन्नमुखपङ्कजः ॥१९॥
( अथ साररामायणम् )
श्रीरामचन्द्र उवाच
रामदास शृणुष्वाद्य यन्मां प्रोचुश्चने त्व । चरित्रं सकलं स्वीयं शपा तस्य भविस्तरम् ॥ १ ॥
विष्णुदासाय शिष्याय मद्भक्तिनिरताय च । कथयस्व यथाऽन्यच्च ज्ञानाद्दृष्टं यथाश्रुतम् ॥ २ ॥
यथा भारतखंडान्तर्मार्गे वापि त्वयेक्षितम् । स्मरणार्थं त्वहं किञ्चित्तद्व वक्ष्यामि सादरम् ॥ ३ ॥
पार्वतीशिवसंवादः सूर्यवंशार्थापार्थिवः । मन्वित्रोहिरणं लङ्कां रावणेन विसर्जनम् ॥ ४ ॥
दशरथविवाहश्च कैकेय्यै द्विवरार्पणम् । कैकेय्यै द्विजशापश्च वरदानकराय च ॥ ५॥
राज्ञः शापो वैश्यहत्या शृङ्गशृङ्गाश्रमोद्यमः । ऋष्यशृङ्गमनेत्रेतःप्रताशाद्वहिनाऽर्पितम् । ६ ॥
पायसं तद्विभक्ते च गृध्री भागं गिरौ नयत् । अंतर्गर्भा नृपान्यन्त्यासामासन्नदोहदाः ॥ ७॥
स्ततो भूम्या ब्रह्मणा ये प्रार्थनं मथराजिना चैत्रे मासि ममोत्पत्तिर्वधुमिश्र हनुमता ॥ ८॥
वालक्रीडा मन्कृता च व्रतवद्यनतो मम । वेदाभ्यासो वशिष्ठाच्च तीर्थयात्रा च वधुभिः ॥ ९ ॥
करनेसे ही बहुत-सी बातें याद आ गई थीं। उन्हींका रामका आज्ञासे मैंने तुम्हें सुनाया है ॥१२ । १३। विष्णुदासने पूछा उस शतकोटिसंख्यात्मक रामायणमें कितने काण्ड और कितने सर्ग हैं? सो कृपा करके हमें बतलाइए । श्रीरामदासने कहा—हे द्विज ! सौ करोड़ संख्यात्मक रामायणमें कुल नौ लाख काण्ड तथा नब्बे लाख सर्ग हैं ॥ १४ ॥ कुल मिलाकर उस रामायणन सौ करोड़ श्लोक हैं १५। विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! अब मैं आपसे वह रामायण सुनना चाहता हूँ, जिसे स्वयं रामचन्द्रजीने आपको बतलाया था ॥ १६ ॥ जिसमें एक सौ नौ श्लोक हैं । कृपया अब मुझे वह सुनाइए । रसके सुननेके लिए मर हृदयमे बड़ा कौतूहल है । १७॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। सावधान होकर सुनो । आज मैं तुम्हें वह साररामायण सुनाऊँगा, जिसे श्रीरामचन्द्रजान मुझसे कहा था । १८॥ एक दिन जब कि मेरा पूजन समाप्त हो गया था, तब भगवान अपने तीनों भाताओंके साथ मेरे समक्ष आये । उन्होंने प्रसन्न होकर यही साररामायण कहा था ॥ १९ । श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे रामदास ! मेरे चरित्रोंका जो सार अंश है सो तुमसे कह रहा हूँ। इसे विस्मृतक्षयसे तुम विष्णुदास नामके अपन शिष्यको सुनाना । क्योंकि वह मेरी भक्तिमे निमग्न है। इन चरित्रोंके अतिरिक्त तुमने अपन ज्ञानसे जो कुछ देखा सुना हो या भारतखंडमे देखा हो, वह सब भी उसे सुना देना, स्मरण रखनेके लिए कुछ चरित्र म तुम्हें बतला रहा हूँ । १-३ । शिव पार्वती-संवाद, आधे सूर्यवंशज राजाओका चरित्र, मेरे माता-पिताका हरण रावण द्वारा उनका लंका भेजा जाना, दशरथविवाह, कैकेयीको दो वरदान देना कैकेयीके लिए ब्राह्मणका शाप, वरदान देनेवाले विप्रको राजाका शाप, वैश्यहत्या, ऋष्यशृङ्गका ले लेका उद्यम, शृङ्गशृङ्कके प्रेम वसे अग्निद्वारा महार ज दशरथको पायस मिलना ॥ ४-६ । उसके हिस्से लगानेपर उनका एक भाग एक गृद्धीका पर्वतपर लेकर चली जाना, रानियोंका गर्भिणी होना, भूमिके साथ ब्रह्माका आकर मेरी स्तुति करना, मंथराकी उत्पत्ति, चैत्रमासमे अपने सब भाइयौँ तथा हनुमान्जीके साथ मेरी उत्पत्ति, मेरी की हुई बाललीलायें, मेरा यज्ञोपवीतसंस्कार, वसिष्ठके पास वेदाध्ययन
सर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७४५
विश्वमित्राद्धनुर्विद्या ताटिकामर्दनं वने । प्रारम्भो रणदीक्षायाः सुबाहोर्मर्दनं मखे ॥१०॥
मारीचक्षेपणं चापि ह्यहल्योद्धरणं मया । स्वयंवरं च शापश्च मुनिपत्न्याः सविस्तरम् ॥११॥
नौकापेन हि गङ्गायां मदङ्घ्रिक्षालनं कृतम् । शैवं धनुर्जा मदग्न्यन्यस्तं भग्नं सभागणे ॥१२॥
सीतोत्पत्तिश्च सीताया लङ्कागमननिर्गमौ । भ्रातॄणां मे विवाहश्च जामदग्न्यपराजयः ॥१३॥
दीपावल्युत्सवश्चापि नृपैः पथि महारथः । जीवनं भरतस्यापि मङ्गावि मुनिनेरितम् ॥१४॥
वृन्दाशापः पितुः श्लाघ्यं कैकेयीपूर्वकर्म च । ततो मन्दिनचर्या च गर्भाधानमहोत्सवः ॥१५॥
नारदाग्रे प्रतिज्ञा मे यौवराज्यार्थमुद्यमः । कैकेयीवरदानेन दण्डके गमनं मम ॥१६॥
दर्शनं गुहकस्यापि सीतावाक्यं च जाह्नवीम् । भारद्वाज-प्रमोदयोर्दर्शनं च गिरौ स्थितिः ॥१७॥
काकाक्षिभेदनं चापि राज्ञश्च मरणं दिवि । दर्शनं भरतस्यापि भरतस्य विसर्जनम् ॥१८॥
सीताभालेस्तिलकोऽरण्येऽनसूयाभूषणाऽर्पणम् । विराधमर्दनं मार्गे नानाऽऽश्रमविलोकनम् ॥१९॥
अगस्त्येशाय गुह्यस्य दर्शनं संभ्रमर्दनम् । विरूपणं शूर्पणखायाः खरादीनां प्रमर्दनम् ॥२०॥
सीतादेहविभागश्च मारीचस्य वधो मया । सीताया हरणं लङ्कां संगरश्च जटायुषः ॥२१॥
इन्द्रेण पायसं दत्तं सीतायै गिरिवीक्षणम् कबन्धमर्दनं मार्गे शबर्या पूजितस्त्वहम् । २२।
ततः सख्यं कपीन्द्रेण शिरशः क्षेपणं मया । छेदनं सप्ततालानां सर्पेण मालिका हृता ॥२३॥
बालेर्घातो मया तत्र सीताशुद्ध्यर्थमुद्यमः । हनुमताऽब्धितरणं लङ्कायां जानकीक्षणम् ॥२४॥
मंदोदरीसमुत्पत्तिर्वनपालादिमर्दनम् लङ्कादाहश्च देहान्तं कर्तुं सिद्धोऽभवत्कपिः ॥२५॥
जांबूनद्वृक्षशाखाकथाऽब्धेस्तरणं पुनः बहुमुद्रादर्शनं च सेतुबंधस्ततः परम् ॥२६॥
विभीषणाभिषेकश्च विश्वनाथकथा शुभा । गंधमादनेशाख्यानं संगरश्च ततः परम् ॥२७॥
आश्रमोंके साथ तीर्थयात्रा, विश्वामित्रसे धनुर्विद्याकी प्राप्ति, ताडकासंहार, रणदीक्षाका प्रारम्भ, यज्ञभूमिमें सुबाहुका मर्दन मारीचका समुद्रपार फेंका जाना, मेरे द्वारा अहल्याका उद्धार, सीतास्वयंवरमें गमन, अहल्याके शापकी विस्तृत कथा ॥७-११॥ गंगामें निषाद द्वारा मेरे पैर धोया जाना, परशुरामजीके द्वारा लाकर रखे हुए शङ्करजीका धनुष मेरे द्वारा तोड़ा जाना, सीताकी उत्पत्ति, सीताका लंका जाना और वहाँसे फिर वापस आना, मेरा तथा मेरे भ्रातओंका विवाह, परशुरामकी पराजय, । १२ ।। १३ ।। दीपावलीका उत्सव, रास्तेमें राजाओंके साथ महान् संग्राम, भरतका पुनर्जीवन, वृन्दाका शाप मेरे पिताकेपुण्य, कैकेयीके पूर्वकर्म, मेरी दिनचर्या गर्भाधानमहोत्सव, ॥ १४ । १५ ।। युवराज न बननेके लिए नारदके समक्ष मेरी प्रतिज्ञा, मुझे युवराजपदपर अभिषिक्त करनेकी तैयारियाँ कैकेयीके वरदानसे दण्डकवनगमन निषादके साथ वार्तालाप, गङ्गाजीके लिए सीताकी कुछ मनौतियां, भारद्वाज और वाल्मीकि ऋषिका दर्शन, चित्रकूट पर्वतपर निवास, जयन्तके नेत्रभेदन, अयोध्यामे महाराज दशरथका मृत्यु, भरतजीका दर्शन और विसर्जन ॥ १६-१८ ॥ वनमें मेरे द्वारा सीताके भालमें तिलक लगाया जाना, अनसूया द्वारा भूषाणार्पण, विराधमर्दन, अनेक आश्रमोंके दर्शन, ॥ १९ ॥ अगस्त्य और गुहके दर्शन सम्भ्रममर्दन, शूर्पणखाका विरूपकरण, खर आदि राक्षसोंका संहार, सीताके शरीरका विभाजन, मेरे द्वारा मारीचका वध, सीताहरण, रावण-जटायुसंग्राम, इन्द्र द्वारा सीताके लिए पायस प्रदान, कबन्धमर्दन, शबरी द्वारा पूजित होकर सुग्रीवके साथ मित्रता, दुन्दुभीके अस्थि-को फेंकना, सात तालोका भेदन सर्पद्वारा मालिकाहरण, मेरे द्वारा बालिका संहार, सीताका पता पानेके उद्योगकी तैयारियाँ, हनुमानजी द्वारा समुद्रलंघन, लंकामे जानकीजीका दर्शन मन्दोदरीकी उत्पत्ति-कथा, अशोकवनमें हनुमानजीके द्वारा राक्षसोंका मारा जाना, लङ्कादहन, हनुमानजीका शरीर त्याग करनेका आयोजन, ॥ २०-२५ ।। जाम्बूनद वृक्षकी शाखाका वृत्तान्त, पुनः सिन्धुसन्तरण, बहुमुद्रादर्शन, सेतुबन्धन, विभीषणका अभिषेक, विश्वनाथकी कथा, गन्धमादन पर्वतस्थ शिवजीका वृत्तान्त, राम-रावणसंग्राम, काल-
७४६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १७
कालनेमिवधश्चाथ तथेरावणमर्दनम् । मैरावणमर्दनं च मया मंचकभंजनम् ॥२८॥
कुंभकर्णवधश्चापि मेघनादस्य मर्दनम् । ततो होमस्य विध्वंसस्ततो रावणमर्दनम् ॥२९॥
सीताया दिव्यदानं च स्वपुरीगमनं मम । रणदीक्षासमाप्तिश्च राज्याभिषेचनं मम ॥३०॥
उत्पत्ती शत्रुणादीनामिंद्रजेत्त्वपराक्रमः । मानभंगो रावणस्य बालिसुग्रीवजन्मनी ॥३१॥
वायुपुत्रजन्मकर्म वरदानं हनूमतः । शापोऽपि वायुपुत्राश्च ह्यगस्त्यस्य विसर्जनम् ॥३२॥
इति सारकाण्डम् ॥ १ ॥
गंगायात्रासमुद्योगः सरयूभेदनं ततः । मया स्वबाणरेखा च सीतावाक्यविसर्जनम् ॥३३॥
कुंभोदरस्य वाक्येन पृथ्वीयात्रा मया कृता । कुमारीवरदानं च सुरभी केन मेऽर्पिता ॥३४॥
चिंतामणेः शिवाल्लाभस्ततोऽयोध्याप्रवेशनम् ।
इति यात्राकाण्डम् ॥ २ ॥
आरंभो वाजिमेधस्य पृथ्व्यां वाजी विमोचितः ॥३५॥
तुरगाय ससैन्याय मार्गदानं तु गंगया । पृथ्वीप्रदक्षिणां कृत्वा वाहेरश्वस्य प्रवेशनम् ॥३६॥
तमसातटशाला च कुंभोदरप्रदर्शनम् । अष्टोत्तरशतं नाम्नां मम स्तोत्रं मुनेरितम् ॥३७।
दिनचर्याध्वजारोपावभृथोत्सवो मम । सीतादानं च तन्मुक्ती रामतीर्थादिवर्णनम् ॥३८॥
ततो यज्ञसमाप्तिश्च दश यज्ञा विशेषतः ।
इति यागकाण्डम् ॥ ३ ॥
ततो मम स्तवराजः क्रीडाशालाप्रवर्णनम् ॥३९॥
पक्षिणां नवकं स्तोत्रं जानक्या वर्णनं मया । देहरामायणं पत्न्यै मया कथितमुत्तमम् ॥४०॥
दिनचर्या पुनर्मे हि सीतालंकारवर्णनम् । पक्वान्नानां च विस्तारो जलक्रीडा च सीतया ॥४१॥
मध्याह्निकं भोजनादि मम कर्मप्रवर्णनम् । द्विजपत्न्यै भूषणानां दानं जनकजाकृतम् ॥४२॥
रात्रौ नानास्थलेष्वत्र क्रीडाश्च विविधाः स्त्रियः । हवमषोडशमूर्तीनां श्यामांगं दानमर्पितम् ॥४३।
नेमिवध, ऐरावणमदन, मैरावणवध, मंचभञ्जन, कुम्भकर्णवध, मेघनादमरण, होमविध्वंस तथा रावणवध, ॥ २८-२९ । सीताकी शपथ अयोध्या पुनरागमन, रणदीक्षाकी समाप्ति, मेरा राज्याभिषेक, राक्षस आदि-की उत्पत्ति और मेघनादके पराक्रमकी कथा, रावणका मानभंग, बालि-सुग्रीवके जन्मकी कथा, वायुपुत्रके जन्म कर्मका वृत्तान्त, हनुमत्जीके लिए वरदान, हनुमान्जीके लिए शाप और अगस्त्यऋषिका विसर्जन, इतनी कथायें सारकाण्डमें कही गयी हैं ॥ १ । ३०-३२॥ गंगायात्राकी तैयारी, सरयूभेदन, मेरे द्वारा बाणकी रेखा खिचना, कुम्भोदरके वाक्यसे मेरी पृथ्वीयात्रा, कुमारीको वरदान, मेरे लिए ब्रह्मा द्वारा सुरभी-दानका वृत्तान्त ॥ ३३ ॥ ३४ । शिवजीके पाससे चिन्तामणिकी प्राप्ति और फिर अयोध्या वापस आना, ये इतनी कथायें यात्राकाण्डमें कही गयी हैं ॥ २ ॥ अश्वमेध यज्ञका आरम्भ, पृथ्वीप्रदक्षिणाके लिए घोड़ेका छोड़ा जाना, गंगाजीका मेरी सेना तथा घोड़ेके लिए रास्ता देना, समस्त पृथ्वी घूमकर बांडेका वापस आना, कुम्भोदर द्वारा तमसा-की तटशालाका अवलोकन, कुम्भोदर द्वारा कहा हुआ मेरा शतनामस्तोत्र, ॥ ३५-३७ ॥ मेरी दिनचर्या, ध्वजारोपण अवभृथोत्सव, सीतादान, रामतीर्थ आदिका वर्णन, यज्ञसमाप्ति और दस यज्ञोंका वर्णन, ये इतनी कथायें यागकाण्डमें कही गयी हैं ॥३॥ इसके बाद मेरा स्तवराज क्रीडाशालाका वर्णन, ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ नौ पक्षियोंका स्तोत्र, मेरे द्वारा जानकीकी शोभाका वर्णन, मेरे द्वारा सीताके लिए देहरामायणका वर्णन ॥ ४० ॥ मेरी दिनचर्या, सीताके अलङ्कारोंका वर्णन, पक्वान्नोंका विस्तार और सीताके साथ जलक्रीडा ॥ ४१ । तदनन्तर भोजन आदि मेरे मध्याह्नकालीन कर्मोंका वर्णन, सीताजीके द्वारा विप्रपत्नीके
सर्गः १७] मनोहरकाण्डम् ७४७
ततो निजेष्टपत्न्यै च वरदानं मयाऽर्पितम् । गुणवत्यै वरदानं पिंगलायै वरार्पणम् ॥४४॥
सीतायाः प्रत्ययार्थं च दिव्यदानं मया मुदा । कुरुक्षेत्रेऽगस्त्यपत्नया संवादे जानकीजयः ॥४५॥
इति विलासकाण्डम् ॥ ४ ॥
सीताया दोहदार्थं हि क्रीडाऽऽम्रादिषु कृता । सीमन्तोन्नयनादीनि नानाकर्माणि वै ततः ॥४६॥
विसर्जितश्च जनको वाल्मीकेराश्रमं नया । सीतया द्वे निजे रूपे कृते मद्वाक्यगौरवात् ॥४७॥
अंगुष्ठयोग्ये लिखितः कैकेय्या रावणो महान् । लोकानां रजकस्यापि ऽपवादाद्विदेहजा ॥४८॥
मया त्यक्तोपपुत्रा त्यक्ताऽऽनीताश्च बह्रृचः । गुरुरूपेण पुत्रस्य कृतं गत्वा तु जातकम् ॥४९॥
अश्वया मया गत्वा कृताः क्षोद्रास्त्वनिष्टटे । वाल्मीकिना लवानां च ततः पुत्रः कृत परः ॥५०॥
तयोः कृतं तु मुनिना रामरक्षाभिमंत्रणम् । कमलानां च हरणे लवस्य विजयो महान् ॥५१॥
रामायणस्य श्रवणं पुत्राभ्याञ्च मयाऽध्वरे । युद्धं लवकुशं चाथ बलैस्तस्याभिपवनम् ॥५२॥
मम युद्धं सुतेनाथ सीतायाः शपथस्ततः । सीतया मण्डपं चापि विशन्त्या भूतले पुनः ॥५३॥
ततो ऽश्वमेधमाप्नित्य बन्धुपुत्रजनिस्ततः । बालक्रोडापनयनं वेदानां ग्रहणं क्रमात् ॥५४॥
बालानां शुभचिह्नानि सीतायाः पुत्रलालनम् । सर्वेषां व्रतबन्धाश्च तेषां यात्रास्ततः परम् ॥५५॥
इति जन्मकाण्डम् ॥ ५ ॥
भूरिकीर्तेः पतिंकरण मन्पुर गमनं मम । स्वप्रभाऽऽदीन्पुपुत्रीणां दर्शनार्थं तदा मम ॥५६॥
वन्दितोऽहं नृपैः सर्वैस्तदा राजमन्त्रांगणे । क्रमेण वर्णनं चापि पार्थिवानां हि नदया ॥५७॥
कुशकण्ठे चम्पिकया रत्नमाला विसर्जनम् । क्रमेण वर्णनं चात्र पार्थिवानां सुन्दया ॥५८॥
सुमत्य रत्नमालाया लवकुण्ठे विमर्जनम् । उत्साहोऽथ विवाहस्य नानासम्मानपूर्वकः ॥५९॥
गमनं हि स्नुषाभ्यां च सीतया त्वपुरीं मम । निर्हदो जलदेवीनां बालकानां प्रमोचनम् ॥६०॥
लिए भूषणदान, बहुत-सी स्त्रियोंके साथ रात्रिके समय क्रीड़ा और सुवर्णमयी षोडश स्त्रियोंका दान, देवपत्नियोंके लिए मेरा वरदान, गुणवती और पिङ्गलाके लिए वरदान ॥ ४२-४४ ॥ सीताके विश्वासार्थ मेरी शपथ, कुरुक्षेत्रमें अगस्त्यकी पत्नीके साथ बातचीतमें जानकीकी विजय इतनी कथायें विलासकाण्डमें वर्णित हैं ॥ ४५ ॥ ४ ॥ सीताकी गर्भकालीन इच्छा पूर्ण करनेके लिए बागेच आदिमे विहार, सीमन्तोन्नयन आदि विविध संस्कार, मेरे द्वारा राजा जनकको वाल्मीकिके आश्रमपर भेजा जाना, मेरे कहनेसे सीताका दो रूप धारण करना, ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ सीताके अङ्गुष्ठके अनुसार कैकेयी द्वारा रावणका पूरा स्वरूप बनाया जाना, अपनी प्रजाके कतिपय लोगों और एक धोबीके मुखसे अपनी निन्दा सुनकर मेरे द्वारा सीताका परित्याग और उनकी मुद्रा काटकर मँगवाना, गुरुरूपसे बाल्मीकिके आश्रमपर पहुंचकर । अपनेका जातकर्म संस्कार करना, मङ्गलजाके तटपर मेरे द्वारा सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पादित होना, वाल्मीकि द्वारा जल-बिन्दुओंसे लव नामक दूसरे पुत्रकी सृष्टि होना, फिर उन दोनों बच्चोंका वाल्मीकि द्वारा रामरक्षामन्त्रसे अभिमन्त्रित होना कमलहरण करते समय लवकी एक बड़ी विजय ॥ ४८-५१ ॥ यज्ञभूमिमे लवकुशके मुखसे मेरा रामायणश्रवण, उनके साथ मेरे सैनिकोंका युद्ध और अश्वके बहाने लवको छल कराया जाना, मेरे साथ कुशका संग्राम, सीताकी शपथ, पृथ्वीमे प्रवेश करती हुई सीताको मेरे द्वारा पुनः ग्रहण करना, यज्ञाभिसम्पादन, मेरे भ्राताओंकी पुत्रोत्पत्ति, बच्चोंकी बालक्रीडा, बच्चोंका उपनयनसंस्कार, बच्चोंका वेदाध्ययन, बालकोंके शुभ चिह्नोंका वर्णन, सीता द्वारा पुत्रोंका लालनपालन, सब पुत्रोंका व्रतबंध (उपनयन संस्कार) ॥ ५२-५५ ॥ ये इतनी कथायें जन्मकाण्डमें हैं ॥ ५ ॥ भूरिकीर्तिकी पुत्रीके स्वयंवरका समाचार पाकर मेरा प्रस्थान, उस पुत्रीको स्त्रियोंकी मेरे दर्शनके लिए व्यग्रता, वहाँके सब राजाओंका मेरी वन्दना करना, नन्दा द्वारा सब राजाओंकी शोभा और वैभवका वर्णन, चम्पिकाका कुशके गलेमें रत्नमाला डालना, सुमति द्वारा लवके कण्ठमें माल्यार्पण,
४९ विविध सम्मानपूर्वक विवाहोत्सव, होना और अपनी पुत्रवधुओंके साथ रामका अयोध्याको लौटना, जलदेवी द्वारा
७४८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १७
सर्वेषां तु विवाहाश्च पृथक् पुत्रगृहाणि हि । कान्तिपुर्याश्च मदनसुन्दरीहरणं ततः ॥६१॥
यूपकेतोर्विवाहश्च पौत्राणां गणना ततः । पौत्रीणां गणना चापि सर्वैः सौख्यं ततो मम ॥६२॥
इति विवाहकाण्डम् ॥ ६ ॥
सहस्रनामस्तोत्रं मे कल्पवृक्षसुहृद्द्रुमौ । समानीतौ मया स्वर्गाद्भवं दुर्वाससेऽगणात् ॥६३॥
मत्कृष्णोपासकयोश्च संवादश्च परस्परम् । काकाय वरदानं च शतस्त्रीणां वरार्पणम् ॥६४॥
स्थानान्युक्तानि निद्रायै कृतः क्रोधोऽनुमादिषु । शतशाखो रावणस्य पौण्ड्रकस्य वधोऽपि च ॥६५॥
सीताया विरहो जातो हतश्च मूलकासुरः । सीतायाश्च स्तुतिः केन लङ्कायां च प्रवेशनम् ॥६६॥
लङ्कायाः परितश्चापं भ्रामयित्वा पुरीं गतः लाभः कपिलवाराहमूर्तेर्दत्ता च बन्धवे ॥६७॥
लवणासुरघातश्च मधुरायां निवेशनम् । पुत्राणां राज्यभागश्च सप्तद्वीपजयो मया ॥६८॥
यतिशूद्रगृध्रशिक्षा सप्तप्रेतसुजीवनम् शूद्राणां वरदानं च द्विजस्त्रीणां वरार्पणम् ॥६९॥
षोडशस्त्रीसहस्राणां वराश्च मृगया मम कालिंद्यै वरदानं च पिप्पलं छेत्तुमुद्यमः ॥७०॥
इति राज्यकाण्डं पूर्वार्धम् ॥ ७ ॥
वाल्मीकेर्वचनाद्धास्यं कर्तुमाज्ञापितं जनान् । आश्विनीकुमाराभ्यां गणयोश्च परस्परम् ॥७१॥
ब्रह्मणा ऽऽवताराणां वर्णनं च पृथक्कृतम् । जन्मत्रयं च वाल्मीकेर्वरदानस्मृतिर्मम ॥७२॥
मद्राज्यवर्णनं पश्चाद्धेमायाश्च स्वयंवरम् । चित्रांगदेन संग्रामः कथा कंकणयोस्तथा ॥७३॥
लवस्य जीवदानं च राममुद्रा सविस्तरा । रामनाथपुरदानं विप्रैर्दृष्टश्च मारुतिः ॥७४॥
दिनचर्या मम ततः स्वल्पसंततिकारणम् । कर्णध्वनेः कथा चापि चेऽवतारेष्वयं वरः ॥७५॥
पत्राग्रं श्रीरामेति लेखनस्य न कारणम् । सुगुणायै वरदानं द्वे रूपे च मया धृते ॥७६॥
तुलसीपत्रसद्भिश्च रामायणश्रुतेः फलम् । सुपुत्रजीवदानं च संग्रामश्च यमेन हि ॥७७॥
बच्चोंका निग्रह और मेरे द्वारा उनका उद्धार ॥ ५९-६० ॥ सब बच्चोंका विवाह, सब बालकोंके लिए अलग-अलग गृहनिर्माण, कान्तिपुरीसे मदनसुन्दरीका हरण, यूपकेतुका विवाह मेरे पोतों और पोतियोंकी गणना, सब लोगके साथ मेरा सौख्यवचन, ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ ये इतनी कथायें विवाहकाण्डम कही गयी है ॥ ६ ॥ मेरा सहस्रनामस्तोत्र, मेरे द्वारा कल्पवृक्ष और पारिजातका स्वर्गस अयोध्या लाया जाना, मेरे और कृष्णके उपासकका संवाद, कौएके लिए मेरे द्वारा वरदान, सौ स्त्रियाके लिए वरदान, अपने अनुचर मन्दिर काध, निद्राके लिए स्थानकथन, शतमुख रावण तथा पौण्ड्रका वध, मेरा और सीताका विरह, मूलकासुरका वध, ब्रह्मा द्वारा सीताकी स्तुति और मेरा लंकामे प्रवेश, ॥ ६३-६६ ॥, लंकाको चारो ओर धनुषकी रेखा बनाकर अपनी पुरीको प्रस्थान, बन्धुके लिए कपिलवाराहको मूतिका दान, लवणासुरका वध, मथुर में प्रवेश, पुत्रोके लिए राज्यविभाजन, मेरे द्वारा सातों द्वीपोंकी विजय यति-शूद्र और गृध्रका न्याय, सप्त प्रेतोंका पुनर्जीवन शूद्रोंको वरदान, द्विज स्त्रियोंके लिए वरार्पण, सोलह हजार स्त्रियोंके लिए वरदान, मृगयावर्णन, कालिन्दीके लिए वरदान, पोपल वृक्ष काटनेके लिए उद्योग ॥ ६७-७० । य इतनी कथायें राज्यकाण्डके पूर्वार्द्धमे वर्णित है ॥ ७ ॥ मेरे द्वारा हास्यपर प्रतिबन्ध, वाल्मीकिके परामर्शानुसार लंगोंको हंसनेक लिए मेरे द्वारा आज्ञा दिया जाना, अश्विनोकुमारों और मेरे गणमें परस्पर शापप्रदान, ब्रह्माजीके द्वारा मेरे अवतारोंका वर्णन, वाल्मीकिके वरदानसे तीन जन्मोंतकका स्मरण रहना, मेरे राज्यका वर्णन, हेमाका स्वयंवरवर्णन, चित्रांगदके साथ सङ्ग्राम, दोनों कंकणोंकी कथा, लवको जीवनदान, सविस्तार राममुद्राका वर्णन, रामनाथपुरका दान, विप्रों द्वारा हनुमान्जीका दर्शन ॥७१-७४॥ मेरी दिनचर्या, स्वल्प सन्ततिका कारण, कर्णध्वनिकी कथा, अन्य अवतारोम एक विशेष वरदान, पोथीक पन्नेकी अगलमे "श्रीराम' यह लिखनेका कारण, मगुणायै वरदान, मेरा दी रूप धारण करना ॥७५॥ ३६॥ तुलसीपन-
सर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७५९
सर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७५९
सप्तद्वीपेषु सर्वत्र धर्मशिक्षा मया कृता ।
इति राज्यकाण्डमुत्तरार्धम् ॥ ७ ॥
नारदोक्तं शतश्लोकैश्चरितं मम पावनम् ॥७८॥
पौराणामुपदेशश्च मन्मातृणां पराकृतः । मनःपूजा बहिःपूजा नरस्याश्वत्थसंभवम् ॥७९॥
रामलिंगतोभद्रार्णां नानाभेदा विचित्रिताः । मामनसख्या विस्तारः कथा स्वाराज्यसंभवा ॥८०॥
मम नामलेखनस्योद्यापनं दानविस्तरः । विप्रजीविवृत्तिविस्तारो वेदादीनां श्रुतेः फलम् ॥८१॥
सार्द्धमासद्वयं नाम ते व्रतं विधिविस्तरः । गौरीव्रतस्य विस्तारो दोलके मम पूजनम् ॥८२॥
नवम्यां मूर्तिदानं च मदनोत्सवविस्तरः । काम्यदेवतविभागे रकाद्यवर्णगे गुणः ॥८३॥
मम नाम्नश्च महिमा मन्नामार्थ उदाहृतः । चैत्रव्रतस्य विस्तारो रासभादिसतिः स्मृता ॥८४॥
अद्वैतं दर्शितं लोकान्नारीणां च समर्पणम् । मन्दुद्रावद्यमाहात्म्यं कवचं मे हनूमतः ॥८५॥
सीताया लक्ष्मणादीनां कवचानि पृथक् पृथक् । शीतलाव्रतमाहात्म्यं तस्य चोद्यापनं तथा ॥८६॥
रामनामतौभद्रं च मंत्राश्च कीर्तनाय च । पताकारोपणं नाम व्रतं मारुतिनोपदम् ॥८७॥
पयोपेड़िएमंतत्त्वे साररामायणं त्वयि । हनूमता शरसेतोर्ज्जुनस्यात्र खण्डनम् ॥८८॥
इति मनोहरकाण्डम् ॥ ८ ॥
वाल्मीकिना सोमवंशवृत्तान्तनिवेदनम् । पुत्रयोरभिषेकश्च प्रस्थानं हस्तिनापुरम् ॥८९॥
ततो महासंग्रामः पुत्रयोश्च जयो मम । ब्रह्मणा प्रार्थना मेऽत्र वाल्मीकेश्च कुशस्य च ॥९०॥
रिपुस्त्रीणां प्रार्थनया सीता पुत्र न्यवारयत् । ततो दिवेश्च वाक्येन वैकुण्ठ गन्तुमुद्यमः ॥९१॥
सोमवंशोद्भवापाय दत्तं वै हस्तिनापुरम् । आजमीढाऽभिषेकश्च भवतश्च विसर्जनम् ॥९२॥
कुशस्य गमनं स्वकीयपुरि राज्य क्षणाम मः, भपेरत्सुः कुमुदत्या राज्यगमनमुद्भवः ॥९३॥
की सन्धि, रामायणश्रवणका फल, मुसषक लिए जीवनदान, यमराअक साथ संग्राम, सप्तद्वीपमे सर्वत्र मेरी धर्मशिक्षाका प्रसार किया जाना, ॥ ७६॥ ७८ में इतना कथाये राज्यकाण्डके उत्तरार्धम वर्णित है ॥ ७ ॥ नारद द्वारा सौ श्लोकोंम मेर पावन चरितका वर्णन, पुरवासियोक लिए उपदेश दूसरों द्वारा अपनी माताओंके लिए उपदेश, मनःपूजा, बहिःपूजा, रामलिङ्गताभद्रक अनेक भेद, मामनसख्याका विस्तार, स्वाराज्यकी उत्पत्ति-की कथा, मेरे नामलेखनका उद्यापन, दाना विस्तार विज्जीजीविका विस्तार वेदके श्रवणका फल ॥७६-८१॥ ढाई महीनेके लिए व्रत, तिथिका विस्तार, गौरव्रतका विस्तार, दोलके मे मेरी पूजा, नवमीका मूर्तिदानकी विधि, मदनोत्सवका विस्तार, काम्य देवताओकर विस्तार, रकारादि अक्षरोंके गुणवर्णन मेर नामोकी महिमा, मेरे नामके लिए उदाहृत चत्रव्रतका विस्तार, राक्षसादि गतिगोका वर्णन, लागोंको अद्वैत स्वरूपका दर्शन, स्त्रियोंके लिए समर्पण, मेरो मुद्रा, मेरे नामस अद्भुत बन्धकी महिमा, हनुमत्कवचका वर्णन ॥८२-८५॥ राम, सीता, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्नकवच, शीतला व्रतका माहात्म्य, शीतला व्रतका उद्यापन, रामनामतौभद्र मंत्रका कार्तन, पताकारोहण और हनुमान्जीको प्रसन्न करनेवाले व्रतका वर्णन ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ इस तरह मैने तुम्हें साररामायण सुना दिया । इसो रामायणके अन्तर्गत हनुमान्क द्वारा अर्जुनके शरसेतुके खण्डनकी की कथा वर्णित है॥ ८८ ॥ इतनी कथायें मनाहरकाण्डमें बतलायी गयी है॥ ८॥ वाल्मीकिवर्णित सोमवंशको राजाओंका वृत्तान्त, दोनों पुत्रांका अभिषेक, हस्तिनापुरक प्रस्थानका वर्णन, दोनों पुत्रोंके साथ मेरा महासंग्राम, मेरी विजय, ब्रह्माजीके द्वारा मेरी, वाल्मीकिकी तथा लवकुशकी स्तुति, रिपु-स्त्रियोंकी प्रार्थनासे सीताका अपन पुत्रोंको युद्ध करनेक रोकना, ब्रह्माके वाक्यसे मेरो वैकुण्ठगमनकी तैयारी, सोमवंशियोंके लिए हस्तिनापुरका राज्यदान, आजमीढ़का राज्याभिषेक, सब लागोंकी विदाई, ८९-६२ ॥ लवकुशका अपनी राजधानीमे पहुँचना और वहीं शासन करना, कुमुद्वतासे सन्तानोत्पत्ति, लक्ष्मण एवं सुग्रीव आदि वानरोंतथा
| ७९० | आनन्दरामायणे | [ सर्ग १७ |
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वरदानं लक्ष्मणाय वानरेभ्यस्तथा मया। अयोध्यासंस्थितानां च ततो देहविसर्जनम् ॥९४॥
वानरास्ते सुरा जाताः सीता जाता रमा मम। लक्ष्मणः पन्नगो जातः शंखोऽभूद्भरतस्तदा ॥९५॥
सुदर्शनं च शत्रुघ्नो विष्णुरूपधरस्त्वहम्। तदोर्मिलादिकानां च प्रयाणं सर्वयोषिताम् ॥९६॥
नीराजनं सुरास्त्रीभिस्तेषां सौतानिकं पदम्। शम्भुना संस्तुतश्चाहं गरुडारोहणं मम ॥९७॥
पुष्पवृष्टिर्मयि तदा वैकुण्ठे गमनं मम। वैकुण्ठे रमया स्थित्वा देवानां च विसर्जनम् ॥९८॥
सूर्यवंशानुक्रमश्चानन्दरामायणस्य च। कांडसंख्या सर्गसंख्या ग्रंथसंख्या फलश्रुतिः ॥९९॥
रामायणश्रवणस्योद्यापनं च महत्तमम्। ग्रथदानसमुत्थानं प्रकाराः पञ्च वै ततः ॥१००॥
अनुष्ठानोद्यापनं च शकुनस्य च विस्तरः। संवादस्य पूर्णतापि युवयोर्गुरुशिष्ययोः ॥१०१॥
आशंकाछेदनं देव्याः कलाऽस्य पठनस्य च। रामायणस्य महिमा चैकश्लोकेन वै त्विदम् ॥१०२॥
मम ध्यानं शंभुदेव्याः संवादस्यापि पूर्णता।
इति पूर्णकाण्डम् ॥ ९ ॥
एवं मया रामदास साररामायणं तव ॥ १०३ ॥
स्मरणार्थं चरित्राणां संक्षेपेण निवेदितम्। इदं गोप्यं त्वया कार्यं महत्पुण्यप्रदं स्मृतम् ॥१०४॥
शतकोटिमितग्रन्थान्मया सारं मयोदितम्। कः क्षमः सकलं वक्तुं विना वाल्मीकिना भुवि ॥१०५॥
स एव धन्यो वाल्मीकिर्येन मच्चरितं कृतम्। साररामायणमिदं ये पठन्त्यत्र मानवाः ॥१०६॥
तेभ्यो भुक्तिश्च मुक्तिश्च द्विज दास्याम्यहं मुदा। कृत्स्नं रामायणं श्रोतुं पठितुं वा नरोत्तमम् ॥१०७॥
अवकाशो यदा नास्ति तदेतत्संपठेन्नरः। अन्यच्चान्यन्मया कर्म कृतं पूर्वं शुभाशुभम् ॥१०८॥
तन्मच्छन्दान्मत्स्मृतेर्निर्गमिष्यति निश्चयम्। स्वदृष्टिगोचरं कृत्स्नं चरितं मे भविष्यति ॥१०९॥
विष्णुदासाय शिष्याय वद त्वमधुना सुखम्। ॥११०॥
अयोध्यावासियोंके लिए वरदान अपनी देहका त्याग, वानरोंका अपना शरीर छोड़कर फिर देवता बनना, सीताका लक्ष्मी बन जाना, लक्ष्मणका शेषरूप हो जाना, भरतका पाञ्चजन्य शङ्ख होना, शत्रुघ्नका सुदर्शन चक्र हो जाना और मेरा विष्णुरूप धारण करना, उर्मिला आदि स्त्रियोंका प्रयाण, देवाङ्गनाओं द्वारा सब लोगोंकी आरती, शिवजी द्वारा मेरी स्तुति मेरा गरुड़ारोहण मेरे ऊपर पुष्पवृष्टि, मेरा वैकुण्ठगमन, वैकुण्ठमें लक्ष्मीके साथ विराजमान होकर देवताओंका विसर्जन, ॥ ९३-९८ ॥ सूर्यवंशकी अनुक्रमणिका, आनन्दरामायणकी काण्डसंख्या, सर्गसंख्या, रामायणश्रवणका महाफल, ग्रन्थदानविधि, अनुष्ठानके पांच प्रकार, ॥ ९९ ॥ १०० ॥ अनुष्ठान, उद्यापन, शकुनका विस्तार, तुम दोनों गुरु शिष्यके संवादकी पूर्णता, देवीका आशङ्काछेदन, इसके पाठको कलाएं, रामायणके एक-एक श्लोकके पाठकी महिमा, मेरा ध्यान और शिव-पार्वतीके संवादकी समाप्ति, ये इतनी कथाएं पूर्णकाण्डमें कही गयी हैं ॥ ९ ॥ हे रामदास इस तरह मैंने तुम्हें संक्षेपमे साररामायण बतलायी। इससे तुमको मेरे चरित्रोंका स्मरण करनेमें बड़ा सहायता मिलेगी। यह बड़ी पुण्यदायक रामायण है। इसलिए इसे सदा गुप्त रखना। सौ करोड़ संख्यावाली रामायणका सार अंश लेकर ही इसे मैने तुमको बताया है वाल्मीकिके सिवाय भला और कौन है, जो पूरे तौरसे रामायणका वर्णन कर सके ॥ १०१-१०५ ॥ वे वाल्मीकिजी धन्य हैं, जिन्होंने अच्छी तरह मेरे चरित्रोंका वर्णन किया है। जो लोग इस साररामायणका पाठ करते हैं । उन्हें मैं भुक्ति और मुक्ति सब कुछ देता हूँ। यदि किसी सज्जनको पूरी रामायण पढ़ने या सुननेका अवकाश न मिले तो उन्हें इस साररामायणका ही पाठ कर लेना चाहिए। इनके अतिरिक्त भी मैंने जो शुभ अशुभ कर्म किये हैं, वे मेरी इच्छासे तुम्हें मेरे चरित्र वर्णन करते समय अपने-आप स्मरण होते जाएंगे। मेरे सारे चरित्र तुम्हारे दृष्टिगोचर होंगे । १०६-१०९ ॥ अब तुम इसे अपने शिष्य विष्णुदासको आनन्दके साथ सुनाओ ॥ ११० ॥
सर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७५१
सर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७५१
श्रीरामदास उवाच
एवं श्रीरामचन्द्रेण यथाऽत्र कथितं मम । साररामायणं रम्यं तदिदं ते निवेदितम् ॥१११॥
इदं रम्यं पवित्रं च महापातकनाशनम् । सर्वदा मानवैर्जप्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥११२॥
कृत्स्नं रामायणं श्रुत्वा यत्फलं प्राप्यते नरैः । तदस्य पठनादेव सत्यं सत्यं वचो मम ॥११३॥
तस्माद्भूमिः सदा जप्यं सर्वेषां शांतिकारकम् । पुत्रपौत्रप्रदं खादं महत्सौख्यप्रदं नृणाम् ॥११४॥
रामायणानि शतशः सन्ति त्रिष्वथभूतले । सथाप्यनेन सदृशं न भूतं न भविष्यति ॥११५॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये मनोहरकाण्डे रामदास-विष्णुदाससंवादे श्रीरामचन्द्रोपदिष्टं साररामायणं नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥
अष्टादशः सर्गः
( हनुमान्जीके द्वारा अर्जुननिर्मित शरसेतुभंजन )
श्रीविष्णुदास उवाच
कपिध्वजोऽर्जुनश्चेति मया पूर्वं श्रुतं गुरो । तन्नामकारणं भो त्वं विस्तराद्वक्तुमर्हसि ॥१॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । द्वापरान्तं भाविकथां त्वां वदामि चमत्कृताम् ॥२॥
एकदा कृष्णरहितोऽर्जुनः स्यन्दनसंस्थितः । ययावरण्ये विचरन्मृगयार्थं हि दक्षिणाम् ॥३॥
एकाकी यन्तृसंस्थाने स्थित्वा तत्कृत्यमाचरन् । हत्वा वने मृगानन्धी मध्याह्ने स्नातुमुद्यतः ॥४॥
ययौ रामेश्वरं सेतुं धनुष्कोट्यां विगाह्य च । मध्याह्नकृत्यं संपाद्य पुनः स्यन्दनसंस्थितम् ॥५॥
अब्धेस्तटे विचचार किंचिद्गर्वसमन्वितः । एतस्मिन्नन्तरेऽपश्ये पर्वतोपरि संस्थितम् ॥६॥
ददर्श मारुतिं वीरः सामान्यकपिरूपिणम् । राम रामेति जपन्तं पिंगलोमधरं शुभम् ॥७॥
दास बोले—जिस तरह रामचन्द्रजीने मेरे समक्ष साररामायणका वर्णन किया था, सो मैंने कह सुनाया ॥१११॥ यह साररामायण दिव्य, पवित्र और महान् पातकोंको नष्ट करनेवाला है। लोगोंको चाहिए कि भुक्ति और मुक्ति देनेवाले इस रामायणका पाठ करें ॥ ११२ ॥ पूरी रामायणके सुननेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल इस साररामायणके भी श्रवण करनेसे प्राप्त हो जाता है। मेरी बात सर्वथा सत्य है ॥ ११३ ॥ इसलिए लोगोंको सर्वदा इसका पाठ करते रहना चाहिए। क्योंकि यह सबकी शान्ति प्रदान करता है। यह पुत्र, पौत्र, स्त्री तथा महान् सुखोंका दाता है ॥ ११४ ॥ हे शिष्य ! वैसे तो इस पृथ्वीतलमें सैकड़ों रामायणें हैं, किन्तु इसके समान अबतक न कोई रामायण हुई है और न आगे होगी ॥ ११५ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे साररामायणं नाम सप्तदश सर्ग ॥ १७ ॥
विष्णुदास बोले—हे गुरो ! मैं कभी आपके मुखसे अर्जुनका कपिध्वज यह नाम सुन चुका हूँ। उनका यह नाम क्यों पड़ा, सो कृपा करके आप हमें बतलाइए ॥ १ ॥ श्रीरामदास कहने लगे—हे शिष्य ! तुमने बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है। सावधान होकर सुनो। यद्यपि यह कथा द्वापरके अन्तकी है, फिर भी तुम्हें बतलाता हूँ ॥ २ ॥ एक दिन कृष्णजीको छोड़कर अकेले अर्जुन वनमें शिकार खेलने गये और घूमते घूमते दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥३॥ उस समय सारथीके स्थानपर वे स्वयं थे और घोड़ोंको हांकते हुए चले जा रहे थे। इस तरह वनमें घूम-घूमकर दोपहरके समय तक उन्होंने बहुतसे वन्यजन्तुओंको मारा। इसके बाद स्नान करनेकी तैयारियां करने लगे ॥ ४ ॥ स्नान करनेके लिये वे सेतुबन्ध रामेश्वरके धनुषकोटीतीर्थपर गये, वहाँ स्नान किया और कुछ गर्वसे समुद्रके तटपर घूमने लगे। तभी उन्होंने एक पर्वतके ऊपर साधारण वानरका स्वरूप धारण करके हनुमान्जीको बैठे देखा। उस समय हनुमान्जी रामनाम जप रहे थे।
| ७८२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १८ |
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तमर्जुनोऽब्रवीद्वाक्यं किं नामाऽसि कपे त्वहम् । तदर्जुनवचः श्रुत्वा विहस्य कपिरब्रवीत् ॥८॥
यत्प्रभावाच्च रामेण शिलौघैः शतयोजनम् । बद्धोऽयं सागरे सेतुस्तं मां त्वं विद्धि वायुजम् ॥९॥
इति तद्गर्वसहितं वाक्यं श्रुत्वाऽर्जुनस्तदा । गर्वाद्धिहस्य प्रोवाच मारुतिं पुरतः स्थितम् ॥१०॥
वृथा श्रमेण सेत्वर्थे भ्रमः पूरे कृतस्त्वयम् । कथं तेन शरैः सेतुं कृत्वा कार्यं कृतं न हि ॥११॥
तदर्जुनवचः श्रुत्वा मारुतिः प्राह तं पुनः । मन्मुख्यकप भारेण शरसेतुः पयोनिधौ ॥१२॥
न्यम्जिष्यतीति मन्वा न चाकरोद्रघुनन्दनः । तक्कपेर्वचनं श्रुत्वाऽर्जुनो मारुतिमब्रवीत् ॥१३॥
कपिभारभयात्सेतुर्जले मग्नो भविष्यति । धनुर्विद्या मन्दिनः का तदा वानरसत्तम ॥१४॥
अधुनाऽहं करिष्यामि शरसेतुं तवाग्रतः । त्वं तस्योपरि नृत्यादि कुरुष्वात्र यथासुखम् । १५॥
धनुर्विद्या प्रभावं त्वं कपे पश्यतुमर्हसि । तदर्जुनगिरं श्रुत्वा तमाह सस्मितः कपिः ॥१६॥
ममाङ्घ्र्यङ्गुष्ठभारेण शरसेतुस्त्वया कृतः । चेन्मग्नः स्यात्समुद्रे हि तदा कार्यं त्वयाऽत्र किम् ॥१७॥
तत्कपेर्वाक्यमाकर्ण्य सोऽर्जुनः प्राह तं पुनः । यदि मग्नः शरसेतुस्त्वन्द्वागत्वरहं कपे ॥१८॥
विशाम्यत्रानलं सत्यं त्वं चाप्यत्र पणं वद । तत्प्रतिज्ञां कपिः श्रुत्वाऽर्जुन वचनमब्रवीत् ॥१९॥
मया स्वांगुष्ठभारेण त्वन्सेतुश्चेन्न लोपितः । तर्हि त्वद्ध्वजसङ्गोऽहं तव साहाय्यमाचरे ॥२०॥
तथाऽस्त्वित्यर्जुनः प्राह टङ्कयन्वै महद्धनुः । निमेषे शरजालैः सेतुं दृढतरं व्यधात् ॥२१॥
शतयोजनविस्तीर्णे सागरस्योध्वेऽतु स्थितम् । तं सेतुं मारुतिर्दृष्ट्वाऽन्नाग्रऽङ्गुष्ठभारतः ॥२२॥
अकरोत्सागरे मग्नं क्षणमात्रेण लीलया । तदा देवाः सगंधर्वाः किन्नरोगगराक्षसाः ॥२३॥
विद्याधराश्चाप्सरसः सिद्धाश्च गगनस्थिताः । मारुतिं धनुजस्पाग्रे ववृषुः पुष्पवृष्टिभिः ॥२४॥
तत्कर्मणाऽर्जुनश्चापि चिंतां कृत्वाऽग्निरोधसि । निवारितोऽपि कपिना देहं त्यक्तुं समुद्यतः ॥२५॥
पीले रङ्गके रोएं उनके शरीरपर बड़े अच्छे लग रहे थे॥ ५-७॥ उन्हें देखकर अर्जुनने पूछा-हे वानर ! तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है ? अर्जुनका प्रश्न सुना तो हँसकर हनुमान्जी बोले कि जिनके प्रतापसे रामचन्द्रजीने समुद्रपर सौ योजन विस्तृत सेतु बनाया था, मैं वही वायुपुत्र हनुमान् हूँ ॥८-९॥ इस तरह गर्वभर बचन सुनकर अर्जुनने बड़े गर्वसे हँसकर कहा कि रामने व्यर्थ इतना कष्ट उठाया। उन्होंने बाणोंका सेतु बनाकर क्यों नहीं अपना काम पूरा किया ॥ १०, ११॥ अर्जुनकी बात सुनकर हनुमान्जीने कहा हम जैसे बड़े-बड़े बानरोंके बोझसे वह बाणोंका सेतु डूब जाता, यही सोचकर उन्होंने ऐसा नहीं किया ॥ १२, १३ ॥ अर्जुनने कहा-हे वानरसत्तम यदि वानरोंके बोझसे सेतु डूब जानेका भय हो तो उस धनुर्धारीकी धनुर्विद्याकी क्या बड़ी विशेषता रही ॥ १४॥ अभी इसी समय मैं अपने कोदण्डसे बाणोंका सेतु बनाये देता हूँ, तुम उसके ऊपर आनन्दसे नाचो-कूदो ॥ १५ ॥ इस प्रकार मेरे धनुर्विद्याका नमूना भी देख लो अर्जुनकी ऐसी बात सुनकर हनुमान्जी मुस्कराते हुए कहने लगे कि यदि मेरे पैरके अंगूठेके बोझसे ही आपका बनाया सेतु डूब जाय तो क्या करिएगा ? ॥ १६, १७ ॥ हनुमान्जीकी बात सुनकर अर्जुनने कहा कि यदि तुम्हारे भारसे सेतु डूब जायगा तो मैं चिता लगाकर उसमें आगसे जल मरूँगा। अच्छा अब तुम भी कोई बाजी लगाओ। अर्जुनकी बात सुनकर हनुमान्जी कहने लगे कि यदि मैं अपने अंगूठेके ही भारसे तुम्हारे बनाये सेतुको न डुबा सकूँगा तो तुम्हारे रथकी ध्वजाके पास बैठकर जीवनभर तुम्हारी सहायता करूँगा ॥ १८-२० ॥ 'अच्छा, यही सही' ऐसा कहकर अर्जुनने अपने धनुषका टंकोर किया और अपने बाणोंके समूहसे बहुत थोड़े समयमें एक सुदृढ़ सेतु बनाकर तैयार कर दिया ॥ २१ ॥ उस सेतुका विस्तार सौ योजन था और वह सागरके ऊपर ही उतरा रहा था। उस सेतुको देखकर हनुमान्जीने उनके सामने ही अपने अंगूठेके भारसे डुबा दिया। उस समय गन्धर्वोंके साथ-साथ देवताओंने हनुमान्जीपर फूलोंकी वर्षा की ॥ २२-२४ ॥ हनुमान्जीके इस कर्मसे खिन्न होकर अर्जुनने
सर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७५३
सर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७५३
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णस्तं प्राह वटुरूपधृक् । ज्ञात्वाऽर्जुनमुखात्सर्वं पूर्ववृत्तं पणादिकम् ॥ २६ ॥
उभाभ्यां यच्चचरितं पूर्वं तच्च मृषा गतम् ।
साक्षित्वेन बिना कर्म सत्यं मिथ्या न बुद्ध्यते ॥ २७ ॥
साक्षित्वेनाधुना मेऽत्र युवाभ्यां कर्म पूर्ववत् ।
कर्त्तव्यं तदहं दृष्ट्वा सत्यं मिथ्या वदाम्यहम् ॥ २८ ॥
तद्वटोर्वचनं श्रुत्वा द्वावूचतुस्तथेति च । ततश्चकार गांडीवी शरसेतुं हि पूर्ववत् ॥ २९ ॥
सेतोरन्तर्गतं चक्रं श्रीकृष्णश्चाकरोत्तदा ।
ततः स्वांगुष्ठभारेण कपिः सेतुं प्रपीडयन् ॥ ३० ॥
सेतुं दृढं कपिर्ज्ञात्वा पादजानुकरादिभिः ।
बलेन पीडयामास स सेतुर्नैश्चचाल न ॥ ३१ ॥
तदा तूष्णीं हनूमांस्तं मंत्रयामास चेतसि । पूर्वं मयांगुष्ठमात्रत्सेतुश्चाधो विलोपितः ॥ ३२ ॥
हस्तादिभिः कृत नायमिदानीं न विलुप्यते ।
कारणं वटुरेवात्र वटुर्नायं हरिस्स्वयम् ॥ ३३ ॥
अस्तीत्यहं विजानामि स्मृतं पूर्ववरादिकम् ।
मद्गर्वपरिहारोऽद्य कृष्णेनानेन कर्मणा ॥ ३४ ॥
कृतोऽस्त्यत्र क्व कृष्णाये मन्मर्कटमुखोद्भवम् । इति निश्चित्य मनसि कपिः सोऽर्जुनमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
जितं त्वया वटोर्योगात्तत्र साहाय्यमाचरे ।
नायं वटुस्त्वयं कृष्णः सेतुचक्रमवेशकृत् ॥ ३६ ॥
स्वन्माहात्म्यार्थमत्रायातः सत्यं ज्ञातो मयाऽर्जुन ।
अनेन रामरूपेण त्रेतायां मे वरोऽर्पितः ॥ ३७ ॥
समुद्रके तटपर ही चिता तैयार की और हनुमान्जीके रोकनेपर भी वे उसमें कूदनेको उद्यत हो गये ॥ २५ ॥ इसी समय एक ब्रह्मचारीका रूप धारण करके श्रीकृष्णचन्द्रजी वहाँ आये ओर उन्होंने अर्जुनसे चितामें कूदनेका कारण पूछा । अर्जुनके मुखसे ही सब बात मालूम करके कहा कि तुम लोगोंने उस समय जो बाजी लगायी थी, वह निःसार थी । क्योंकि उस समय तुम्हारी बातोंका कोई साक्षी नहीं था । साक्षीके बिना सच झूठका कोई ठिकाना नहीं रहता । इस समय में तुम्हारे समग्र साक्षीके रूपमें विद्यमान हूँ । अब तुम लोग फिर पहले-की तरह कार्य करो तो मैं तुम्हारे कर्मोंको देखकर विजयपराजयका निर्णय करूँगा ॥ २६-२८ ॥ ब्रह्मचारीकी बात सुनकर दोनोंने कहा-ठीक है और फिर अर्जुनने पूर्ववत् सेतुकी रचना की २९। अबकी बार सेतुके नीचे कृष्णचन्द्रजीने अपना सुदर्शन चक्र लगा दिया । सेतु तैयार होनेपर हनुमान्जी पूर्ववत् अपने अंगूठेके भारसे उसे डुबाने लगे ॥ ३० ॥ जब हनुमान्जीने अबकी बार सेतुको मजबूत देखा तो पैरों, घुटनों तथा हाथोंके बलसे उसे दबाया, किन्तु वह जौ भर भी नहीं डूबा । ३१ ॥ चुपचाप हनुमान्जीने सोचा कि पहले तो मैंने अंगूठेके ही बोझसे सेतुको डुबा दिया था तो फिर यह हाथ-पैर आदि मेरे पूरे शरीरके बोझसे भी क्यों नहीं डूबता। इसमें ये ब्रह्मचारीजी ही कारण हैं। ये ब्राह्मण नहीं, बल्कि साक्षात् कृष्णचन्द्रजी ही हैं और मेरे गर्वका परिहार करनेके लिए ही इन्होंने ऐसा किया है। वास्तवमे है भी ऐसा ही । भला, इन भगवान्के सामने हम जैसे बानरकी सामर्थ्य ही क्या है । ऐसा निश्चय करके हनुमान्जीने अर्जुनसे कहा कि आपने इन ब्रह्मचारीकी सहायतासे मुझे परास्त कर दिया है। ये कोई वटु नहीं, साक्षात् भगवान् हैं। इन्होंने सेतुके नीचे अपना सुदर्शन चक्र लगा दिया है ॥३२-३६॥ हे अर्जुन ! मुझे यह बात मालूम हो गयी है कि ये आपकी
७५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १८
दास्यामि दर्शनं तेऽहं द्वापरे कृष्णरूपधृक् । तत्सत्यं वचनं चाद्य कृतं त्वत्सेतुहेतुतः ॥३८॥
इत्यर्जुनं कपिर्यद्वदत्यीक्षात्तदग्रतः ।
बटुर्देवाभवत्कृष्णः पीतवासा घनप्रभः ॥३९॥
तद्दर्शनोर्ध्वरोमाऽभूत्प्रणनामाञ्जनीसुतः ।
आलिङ्गितोऽपि कृष्णेन स मेने कृतकृत्यताम् ॥४०॥
चक्रं ययौ यथास्थानं श्रीकृष्णस्याज्ञया तदा । सागरेण स्वकल्लोलैः शरसेतुर्विलोपितः ॥४१॥
तदार्जुनो गर्वहीनो मेने कृष्णेन जीवितः ।
कृष्णस्तदाऽर्जुनं प्राह त्वया रामेण स्पर्द्धितम् ॥४२॥
हनूमता धनुर्विद्या तवातोऽत्र मृषा कृता ।
यत्प्रतापादिति शिरा न्न्याऽपि वायुनन्दनः । ४३।
रामेण स्पर्द्धितं यस्मात्तस्मादर्जुन संजितः । अतः परं वीतगर्वस्त्वं मां भज निरन्तरम् ॥४४॥
इत्युक्त्वा मारुतिं पृष्ट्वाऽर्जुनेन तत्पुरं ययौ ।
अतः कपिध्वजश्चेति जनैरर्जुन ईर्यते ॥४५॥
इति भाविकथा पृष्टा त्वया साऽपि मयोदिता ।
किमग्रे श्रोतुकामोऽसि संपृच्छस्व वदामि ते ॥४६॥
विष्णुदास उवाच
गुरोऽधुना राघवस्य वैकुण्ठारोहणोत्सवम् ।
मां वदस्व सविस्तारं येनाहं तोषमाप्नुयाम् ॥४७॥
श्रीरामदास उवाच
पूर्णकांडं त्वावाद्याहं वदिष्यामि शृणुष्व तत् ।
सहायताके लिए ही यहाँ आये हैं। यही रूप धारण करके त्रेतामें रामने हमें वरदान दिया था कि द्वापरके अन्तमें मैं तुम्हें कृष्णरूपसे दर्शन दूंगा। आपके सेतुके बहाने इन्होंने अपना वरदान भी आज पूरा कर दिया ॥३७॥ ३८। हनुमानजी अर्जुनसे ऐसा कह ही रहे थे कि इतनेमें भगवान् अपने बटुरूपको त्यागकर कृष्ण बन गये। उस समय वे पीले वस्त्र पहने थे और नवनीरदके समान उनका श्याम शरीर था। उस कृष्णचन्द्रजीका दर्शन करते ही हनुमान्जीके रोंगटे खड़े हो गये और उन्होंने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। जब श्रीकृष्णने हनुमान्जीको उठाकर अपने हृदयसे लगाया, तब हनुमान्जीने अपनेको कृतकृत्य मान लिया ॥३९॥४०॥ श्रीकृष्णके आज्ञानुसार चक्र सेतुसे निकलकर अपने स्थानको चला गया और अर्जुनका बनाया सेतु भी समुद्रकी तरंगोंमें लुप्त हो गया ॥४१॥ इस तरह अर्जुनका गर्व नष्ट हो गया और उन्होंने समझा कि कृष्णने हमें जीवित रख लिया। कुछ देर बाद श्रीकृष्णजीने अर्जुनसे कहा कि तुमने रामके साथ स्पर्धा की थी। इसलिए हनुमान्जीने तुम्हारी धनुर्विद्याको व्यर्थ कर दिया था! इसी प्रकार हे पवनसुत! तुमने भी रामसे स्पर्धा की थी। इसी कारण तुम अर्जुनसे परास्त हुए। तुम्हारा गर्व नष्ट हो गया। अब भ्रातृत्वके साथ मेरा भजन करो। ऐसा कह और हनुमान्जीसे पूछकर श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ हस्तिनापुर चले गये। हे शिष्य, इसी कारण अर्जुन कपिध्वज कहे जाते हैं ॥४२-४५॥ यद्यपि तुमने हमसे यह भविष्यकी कथा पूछी थी, फिर भी मैंने कह सुनाया। अब आगे क्या सुनना चाहते हो सो बताओ। मैं तुमको सुनाऊँ ॥४६॥ विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! अब मैं रामचन्द्रजीके वैकुण्ठारोहणका वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ। सो आप विस्तारपूर्वक हमें बताइए, जिससे हमारे हृदयको सन्तोष हो। श्रीरामदासने कहा—माने मैं तुमसे पूर्णकांड कहनेवाला हूँ। उसमें भगवानके वैकुण्ठारोहणका वृत्तांत तुम्हे अच्छी तरह सुननेको मिलेगा ॥४७॥