अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
| अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥ | ५ | ||
|---|---|---|---|
| संख्या | विषयाः | स्मृतिनाम | पृष्ठानि |
| १२३ | श्वादिशुनादीनां प्रायश्चित्तानि । | ,, | २८ |
| १२४ | आहिताग्नेविदेशमरणेऽन्त्येष्टिप्रकारः | ,, | ३० |
| १२५ | प्राणिहत्याप्रायश्चित्तम् । | ,, | ३२ |
| १२६ | चाण्डालादिनीचैः सह संभाषणादौ प्रा० | ,, | ३५ |
| १२७ | द्रव्य शुद्धिप्रकारः । | ,, | ४३ |
| १२८ | ऋतुकालात्पूर्वं कन्योद्वाहः । | ,, | ४४ |
| १२९ | रजस्वलास्पर्शादि प्रायश्चित्तानि । | ,, | ४५ |
| १३० | गोवधादिप्रायश्चित्तम् | ,, | ५० |
| १३१ | धर्म सभया प्रायश्चित्तादि निर्णयः | ,, | ५२ |
| १३२ | सभयापि राजानुमतया धर्मनिर्णयः कार्यः | ,, | ५४ |
| १३३ | गोहत्यादि प्रायश्चित्तम् । | ,, | ५५ |
| १३४ | गोवृषभहत्याभेदेषु प्रायश्चित्तभेदव्याख्या । | ,, | ५७ |
| १३५ | अगम्यागमनव्यभिचारादि प्रायश्चित्तानि । | ,, | ६१ |
| १३६ | अभक्ष्यभक्षणादि प्रायश्चित्तानि । | ,, | ७४ |
| १३७ | ब्रह्मकूर्चव्रतव्याख्यानं माहात्म्यं च । | ,, | ७८ |
| १३८ | पञ्चविधानि स्नानानि । | ,, | ८४ |
| १३९ | आचमन विधिः । | ,, | ८५ |
| १४० | गृहे रक्षणीयानि वस्तूनि । | ,, | ८९ |
| १४१ | दानपात्रं कुटुम्ब्यादि । | ,, | ९० |
| १४२ | कृच्छ्रव्रत प्रत्याम्नायः । | ,, | ९१ |
| १४३ | ब्रह्महत्याप्रायश्चित्ते सेतुबन्धगमन विधिः । | ,, | ९२ |
| १४४ | सुरापानादि महापातक प्रायश्चित्तम् । | ,, | ९३ |
| १४५ | धर्मशास्त्र प्रस्तावः | १२-व्यासस्मृतौ | १ |
| १४६ | चाण्डालादयो वर्णसंकराः । | ,, | २ |
| १४७ | गर्भाधानादयः षोडश संस्काराः । | ,, | ३ |
| १४८ | ब्रह्मचारिणो नियम धर्माः । | ,, | ४ |
| १४९ | गृहस्थस्य विवाहादयो धर्माः । | ,, | ८ |
| १५० | सुभगाया गृहिण्याः पतिसेवाद्यो नित्यधर्माः । | ,, | ११ |
| १५१ | तस्याएव नैमित्तिकानि कर्त्तव्यानि । | ,, | १४ |
| १५२ | इत्थमाचरन्ती पतिव्रता भवति । | ,, | १२ |
| १५३ | त्यागाह्र्याः स्त्रियः । | ,, | १६ |
६ अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥
| संख्या | विषयाः | स्मृतिनाम | पृष्ठानि |
|---|---|---|---|
| १५४ | गृहस्थस्य प्रातरुत्थाय शयनावधि नित्यनैमित्तिकादिकर्त्तव्यक्रमः । ,, | ,, | १७ |
| १५५ | गृहस्थस्य परमो धर्मः । | ,, | २९ |
| १५६ | दानधर्मस्य सर्वोपरिरोचकं माहात्म्यम् । | ,, | ३१ |
| १५७ | वर्णधर्माः | १३-शंखस्मृतौ | १ |
| १५८ | गर्भाधानादयः संस्काराः । | ,, | २ |
| १५९ | ब्रह्मचर्य्यधर्माः | ,, | ४ |
| १६० | विवाहकरणव्याख्या । | ,, | ७ |
| १६१ | पञ्चमहायज्ञवर्णनम् । | ,, | ९ |
| १६२ | चतुराश्रमिणां पञ्चाग्न सारभूताः परमधर्माः । | ,, | ११ |
| १६३ | वानप्रस्थस्य संक्षेपेण कर्त्तव्यम् । | ,, | १२ |
| १६४ | संन्यासिनः कर्त्तव्यम् । | ,, | १४ |
| १६५ | अध्यात्मचिन्तायामात्मज्ञानप्रकारः । | ,, | १६ |
| १६६ | षड्विधस्नानव्याख्यानम् । | ,, | १८ |
| १६७ | क्रियास्नानविध्यध्यायः । | ,, | २१ |
| १६८ | आचमनविधिव्याख्यानम् । | ,, | २४ |
| १६९ | वेदोक्तपावनमन्त्रपरिगणनम् । | ,, | २७ |
| १७० | गायत्रीजपस्य विधिर्माहात्म्यं च । | ,, | २८ |
| १७१ | * तर्पणविधिमाहात्म्याध्यायः । | ,, | ३१ |
| १७२ | * श्राद्धविधिमाहात्म्याध्यायः । | ,, | ३४ |
| १७३ | सर्वविधसूतकशुद्धिव्याख्या । | ,, | ३९ |
| १७४ | द्रव्यशरीरादि शुद्धिव्याख्यानम् । | ,, | ४२ |
| १७५ | महापातकादि प्रायश्चित्तानि । | ,, | ४६ |
| १७६ | इष्ट पूर्तधर्मव्याख्या । | १४-लिखितस्मृतौ | १ |
| १७७ | मृतस्य गंगायामस्थिपातनादिना स्वर्गः । | ,, | २ |
| १७८ | मृतस्य पिण्डदान सपिण्डी करणादिकर्म । | ,, | ३ |
| १७९ | सन्ध्योपासनादि कृत्यम् । | ,, | १० |
| १८० | अपमृत्युमृते प्रेतकृत्यनिषेधः । | ,, | ११ |
| १८१ | पतितसंसर्गादिप्रायश्चित्तानि । | ,, | १२ |
| १८२ | अनुपनीतबाले दोषाभावः । | १५-दक्षस्मृतौ | १ |
| १८३ | ब्रह्मचर्याश्रमविचारः । | ,, | २ |
| अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥ | ९ | ||
|---|---|---|---|
| संख्या | विषयाः | स्मृतिनामानि | पृष्ठानि |
| १८४ | नित्यं नैमित्तिकं च प्रातरारभ्य क्रमेण कर्त्तव्यविचारः | ३ | |
| १८५ | प्रातःस्नानं पञ्चविधस्नानविचारश्च । | ” | ५ |
| १८६ | आचमनेन्द्रियस्पर्शसन्ध्योपासननित्यहोमदेवपूजाश्चेति दिवसस्याद्यभागकृत्यानि- | ” | ६ |
| १८७ | दिवसस्य द्वितीयभागे वेदाभ्यासः पञ्चविधः | ८ | |
| १८८ | पोष्यवर्गभरणपोषणविधिस्तृतीयभागकृत्यम् । | ९ | |
| १८९ | चतुर्थभागे वेदोक्तविधिना स्नानमध्याह्न सन्ध्योपासनोपस्थान तर्पणानि कर्त्तव्यानि | ” | १० |
| १९० | दिवसस्य पञ्चमभागे द्वादशनादावसरे पञ्चमहायज्ञविधानम् | ” | १२ |
| १९१ | षष्ठसप्तमभागयोरितिहासपुराणाद्यवलोकनम् । | १४ | |
| १९२ | अष्टमभागे ग्रामादितो बहिःशौचस्नानादिपुरस्सरं सायंसन्ध्योपासनं होमश्च - | ” | १४ |
| १९३ | निशायाः प्रदोषप्रहरे चतुर्थप्रहरे च सन्ध्योपासनादिरूपेण वेदाभ्यासो मध्ये यामद्वयं शयनम् | ” | १४ |
| १९४ | अमृतादिरूपाणां नवानां नवकानां विचारः । | ” | १५ |
| १९५ | दानधर्मविचारः । | ” | १८ |
| १९६ | धर्मपत्नीविचारः । | ” | २० |
| १९७ | शरीरशुद्धिविचारः | ” | २३ |
| १९८ | जननमरण सूतकशुद्धिविचारः । | ” | २५ |
| १९९ | योगाभ्यासतत्त्वज्ञानविषयः । | ” | २८ |
| २०० | ब्रह्मचर्याश्रमधर्माः | १६-गौतमस्मृतौ | १ |
| २०१ | ब्रह्मचारिणो नित्यनियमाः । | ” | ५ |
| २०२ | नैष्ठिकब्रह्मचारिकृत्यम् । | ” | ९ |
| २०३ | गृहस्थाश्रमे ब्राह्मादि विवाहलक्षणानि । | ” | ११ |
| २०४ | वर्णसंकराः । | ” | १२ |
| २०५ | पञ्चमहायज्ञानां विशेषेणातिथिपूजनव्याख्या । | ” | १३ |
| २०६ | अभ्युत्थानाभिवादनादिना मान्यानां सत्कारः। | ” | १६ |
| २०७ | आपत्काले वैश्यवृत्त्यादिजीविकाविचारः । | ” | १८ |
| २०८ | बहुश्रुतब्राह्मणलक्षणम् । | ” | २० |
| २०९ | अष्टाचत्वारिंशत्संस्काराणां व्याख्यानम् । | ” | २१ |
८
अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥
| संख्या | विषयाः | स्मृतिनाम | पृ० |
|---|---|---|---|
| २१० | स्नातकधर्माः । | ,, | २२ |
| २११ | राजधर्मव्याख्यानम् । | ,, | २७ |
| २१२ | मृतसूतकशुद्धिव्याख्या । | ,, | ३९ |
| २१३ | मृतानां श्राद्धकर्मविधिः । | ,, | ४१ |
| २१४ | उपाकर्मविधिर्वेदानध्ययाश्च । | ,, | ४५ |
| २१५ | भक्ष्याभक्ष्यविचारः । | ,, | ४७ |
| २१६ | स्त्री धर्माः । | ,, | ४९ |
| २१७ | सर्वपापनाशनपुरस्सरं निःश्रेयसप्राप्तये कृत्यम् | ,, | ५२ |
| २१८ | पूर्वजन्मकृत दुष्कृतचिह्नानि । | ,, | ५४ |
| २१९ | जीवितायैवपतिताय तिलाञ्जलिः । | ,, | ५६ |
| २२० | पतितव्याख्यानम् । | ,, | ५७ |
| २२१ | ब्रह्महत्याप्रायश्चित्तम् । | ,, | ५८ |
| २२२ | मद्यपगुरुतल्पगयोः प्रायश्चित्तानि । | ,, | ६२ |
| २२३ | रहस्यगुप्तपापप्रायश्चित्तानि । | ,, | ६४ |
| २२४ | अवकीर्णि प्रायश्चित्तम् । | ,, | ६६ |
| २२५ | कृच्छ्रत्रयविधानम् । | ,, | ६७ |
| २२६ | चान्द्रायणव्रतविधिः । | ,, | ६९ |
| २२७ | भ्रातॄणां दायविभागः । | ,, | ७१ |
| २२८ | पूर्वजन्मकृतचिह्न लक्षितपापानां प्रायश्चित्तप्रस्तावः | ॥ १७-शातातपस्मृतौ | १ |
| २२९ | ब्रह्महत्यादिहिंसाप्रायश्चित्तानि । | ,, | ६ |
| २३० | सुरापानादिप्रायश्चित्तानि । | ,, | १७ |
| २३१ | सुवर्णस्तेयादि प्रायश्चित्तानि । | ,, | २१ |
| २३२ | अगम्यागमन पापप्रायश्चित्तानि । | ,, | २६ |
| २३३ | अपमृत्युना मृतानां तारणाय विधानम् । | ,, | ३४ |
| २३४ | धर्मार्हदेशविचारः। | ८१-वसिष्ठस्मृती | १ |
| २३५ | महापातकोपपातकानि | ,, | २ |
| २३६ | ब्राह्मादिषड्विवाहव्याख्यानम् । | ,, | ३ |
| २३७ | वर्णधर्मविचारः। | ,, | ५ |
| २३८ | आपद्धर्मो वर्णानाम् । | ,, | ८ |
| २३९ | कृषिव्याख्यानं तत्र धर्मः । | ,, | ९ |
अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥ ९
| संख्या | विषयाः | स्मृतिनाम | पृ० |
|---|---|---|---|
| २४० | वार्धुषिकादीनामभक्ष्यमन्नादि । | वसिष्ठस्मृतौ | १० |
| २४१ | पात्रापात्रविवेकः । | ,, | १२ |
| २४२ | आततायिब्राह्मणस्यापि वधे न दोषः | ,, | १४ |
| २४३ | पङ्क्तिपावना ब्राह्मणाः । | ,, | १५ |
| २४४ | ब्राह्मणवैश्ययोःशस्त्रग्रहणावसरः । | ,, | १७ |
| २४५ | आचमनविधिः । शुद्धाशुद्धिविवेकश्च । | ,, | १७ |
| २४६ | द्रव्यशुद्धिविचारः । | ,, | १८ |
| २४७ | चातुर्वर्ण्योत्पत्तिः । | ,, | २० |
| २४८ | अन्त्येष्टिविधिर्मरणसूतक शुद्धिश्च । | ,, | २१ |
| २४९ | स्त्रीणां धर्मविचारः । | ,, | २४ |
| २५० | आचारस्य प्रशंसा व्याख्यानं च । | ,, | ३१ |
| २५१ | ब्रह्मचारिधर्मः । | ,, | ३२ |
| २५२ | गृहस्थधर्मेऽतिथिपूजनं विशिष्टम् । | ,, | ३३ |
| २५३ | वानप्रस्थाश्रमिणः कर्तव्यम् । | ,, | ३५ |
| २५४ | संन्यासधर्म विषयः । | ,, | ३६ |
| २५५ | अतिथि सेवाप्रकारः । | ,, | ३८ |
| २५६ | पितृश्राद्ध विषयः । | ,, | ४१ |
| २५७ | ब्राह्मणादिब्रह्मचारिणां दण्डादिभेदाः | ,, | ४५ |
| २५८ | स्नातक व्रतानि । | ,, | ४७ |
| २५९ | उपाकर्म वेदानध्यायाश्च | ,, | ४९ |
| २६० | गुर्वादिसाम्मान्यानामभिवादनादिनामान्यम् । | ,, | ५३ |
| २६१ | भक्ष्याभक्ष्यवर्णनम् । | ,, | ५५ |
| २६२ | दत्तकपुत्रग्रहण विधिस्तद्दायभागश्च । | ,, | ६० |
| २६३ | राजधर्मस्य व्याख्यानं साक्षिणश्च । | ,, | ६२ |
| २६४ | पुत्रप्रशंसा द्वादशपुत्रव्याख्यानं तद्दायभागविचारश्च । | ,, | ६६ |
| २६५ | नियोग विषयः । | ,, | ७१ |
| २६६ | ऋतुकालात्पूर्वं कन्योद्वाहोऽन्यथापापित्वम् । | ,, | ७२ |
| २६७ | पत्युर्विदेशगमने स्त्रियाः कर्तव्यम् । | ,, | ७४ |
| २६८ | अदायादस्य धनादिकं केनादेयमिति विचारः | ,, | ७५ |
१०
अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥
| संख्या | विषयाः | स्मृतिनाम | पृ० |
|---|---|---|---|
| २६९ | चाण्डालादिबर्णसंकरोत्पत्तिः। | ,, | ७५ |
| २७० | राज्ञो निजधर्म विषयः। | ,, | ७८ |
| २७१ | महापातकलक्षणतन्निस्तारादिप्रायश्चित्तानि। | ,, | ८१ |
| २७२ | अगम्यागमनादि प्रायश्चित्तानि। | ,, | ८७ |
| २७३ | जपतपोहोमादिना सर्वविधपापनिवृत्तौ निःश्रेयसम् | ,, | ९२ |
| २७४ | आत्महत्या प्रायश्चित्तादिकम् । | ,, | ९४ |
| २७५ | चान्द्रायणातिकृच्छ्रादिव्रतविधिः । | ,, | ९८ |
| २७६ | सर्वविधपापनाशार्थवेदोक्तपवित्रमन्त्रसूक्तसामादिसंग्रहः । | १०८ | |
| २७७ | सुवर्णादि दानमाहात्म्यम् । | ,, | ११० |
| २७८ | ग्रन्थे धर्मोपदेशस्तृष्णात्यागादेशश्च । | ,, | ११३ |
इत्यष्टादशस्मृतिविषयसूचीपत्रं समाप्तम् ॥
॥ अत्रिस्मृतिः ॥
हुताग्निहोत्रमासीन-मत्रिंवेदविदांवरम् ।
सर्वशास्त्रविधिज्ञंत-मृषिभिश्चनमस्कृतम् ॥ १ ॥
नमस्कृत्यचतेसर्व-इदंवचनमब्रुवन् ।
हितार्थंसर्वलोकानां भगवन्कथयस्वनः ॥ २ ॥
अत्रिरुवाच ॥
वेदशास्त्रार्थतत्वज्ञा यन्मेपृच्छथसंशयम् ।
तत्सवैंसंप्रवक्ष्यामि यथादृष्टंयथाश्रुतम् ॥ ३ ॥
भाषार्थ— अग्निहोत्र करने वाले वेदज्ञों में उत्तम संपूर्ण शास्त्रों की विधि के ज्ञाता, और ऋषियों से पूज्य बैठे हुए अत्रिजी को ॥१॥ वे संपूर्ण ऋषि नमस्कार करके यह वचन बोले कि हे भगवन् ! संपूर्ण मनुष्यों के हित के लिये आप हम को उपदेश करें ॥ २ ॥ अत्रि जी बोले कि-हे वेद और शास्त्र के रहस्य (अर्थ) के यथार्थ जानने वाले ऋषि लोगो-जो संशय मुझ से तुम पूछते हो उस संपूर्ण को अपने देखे और सुने के अनुसार मैं वर्णन करूंगा ॥ ३ ॥
विशेष—(१।२।३) अग्निहोत्र करने तथा वेद को जानने वाले अत्रि जी ने यह धर्मशास्त्र कहा इस कथन से इस की वेदमूलकता दिखायी है। अध्यात्म में (वागत्रिः-इति श्रुतिः) वाणी अत्रि है। वाणी में आने पर ही वह विषय उपदेश वा धर्मशास्त्र कहा जा सकता है। मन में रहे तब तक वह उपदेश नहीं यह जताने के लिये अत्रि जी का उपदेश अठारहों में पहिले रक्खा गया है। उपदेशकी परम्परा दिखाने के लिये प्रश्नोत्तर द्वारा शास्त्र की प्रवृत्ति दिखाई है ॥
२ भाषासंहिता ॥
सर्वतीर्थान्युपस्पृश्य सर्वान्देवान्प्रणम्यच । जप्त्वातुलसर्वसूक्तानि सर्वशास्त्रानुसारतः ॥ ४ ॥ सर्वपापहरं दिव्यं सर्वसंशयनाशनम् । चतुर्णामपिवर्णाना-मत्रिःशास्त्रमकल्पयत् ॥ ५ ॥ येचपापकृतोलोके येचान्येधर्मदूषकाः । सर्वपापैःप्रमुच्यन्ते श्रुत्वेदंशास्त्रमुत्तमम् ॥ ६ ॥ तस्मादिदंवेदविद्भि-रध्येतव्यंप्रयत्नतः । शिष्येभ्यश्चप्रवक्तव्यं सद्वृत्तेभ्यश्चधर्मतः ॥ ७ ॥ अकुलोनेह्यसद्वृत्ते जडेशूद्रे शठे द्विजे । एतेष्वेवनदातव्य-मिदंशास्त्रंद्विजोत्तमैः ॥ ८ ॥
भा०-संपूर्ण तीर्थों के जल से अभिषेक सब देवताओं को नमस्कार और संपूर्ण वेद सूक्तों का जप करके सर्वशास्त्रों के अनुसार ॥४॥ सर्व पापों का नाशक उत्तम सब संशयों का दूर करने वाला और चारों वर्णों का हितकारी शास्त्र अत्रि ऋषि ने रचा ॥५॥ जो जगत् में पापों के करने वाले हैं, और जो धर्म में दूषण लगाने वाले हैं वे संपूर्ण इस उत्तम शास्त्र को श्रवण कर सब पापों से छूट जाते हैं ॥ ६ ॥ इस लिये वेदज्ञ पुरुष इस शास्त्र को बड़े प्रयत्न से पढ़ें और सदाचारी शिष्यों को धर्मानुकूल पढ़ावें ॥७॥ श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणों को चाहिये कि-अकुलीन दुराचारी-मूर्ख-शूद्र-और शठ ब्राह्मण, इन को न पढ़ावें ॥८॥
विशेष-( ४ ) तीर्थ स्नान देवताओं का पूजन तथा विधिपूर्वक वेद मन्त्रों का जप इन कामों को जब तक श्रद्धा के साथ निरन्तर बहुत काल तक न किया जाय तब तक किसी का अन्तःकरण शुद्ध नहीं होता और शुद्धान्तःकरण हुए बिना उस के हृदय से निकला उपदेश भी ठीक शुद्ध सर्व हितकारी वेदानुकूल नहीं होता इसी से अत्रि जी ने तीर्थस्नानादि किया ( ६ ) यदि पापी लोग उत्तम उपदेश को ठीक ध्यान देकर सुनें तो अवश्य अपने धर्म विरुद्ध दुराचारों से ग्लानि हो तब सब पापों से छूटना सम्भव ही है ( = ) जैसे सांप को पिलाया अमृत भी विष होजाता वैसे अकुलीनादि निकृष्ट को किया उत्तमोपदेश भी हानिकारक परिणाम जनक होता है ॥
अत्रिस्मृतिः ॥ ३
एकम्प्यक्षरं यस्तु गुरुःशिष्यंनिवेदयेत् । पृथिव्यांनास्तितद् द्रव्यंयद्दत्त्वाह्यनृणीभवेत् ॥ ९ ॥ एकाक्षरप्रदातारं योगुरुंनाभिमन्यते । शुनांयोनिशतंगत्वा चाण्डालेष्वभिजायते ॥ १० ॥ वेदंगृहीत्वायःकश्चित् शास्त्रंचैवावमन्यते । ससद्यःपशुतांयाति संभवानेकविंशतिम् ॥ ११ ॥ स्वानिकर्माणि कुर्वाणा दूरे संतोपिमानवाः । प्रियाभवन्तिलोकस्य स्वेस्वेकर्मण्युपस्थिताः ॥ १२ ॥ कर्मविप्रस्ययजनं दानमध्ययनंतपः । प्रतिग्रहोऽध्यापनंच याजनंचेतिवृत्तयः ॥ १३ ॥
भा०-जो गुरु एक भी अक्षर शिष्य को देता है पृथिवी भर में वह कोई ऐसा द्रव्य नहीं है जिस को देकर शिष्य गुरु का अनृणी हो सके (अर्थात् बदला देसके) ॥ एक अक्षर देने वाले को जो गुरु नहीं मानता वह सौ जन्म तक कुत्तों की योनि में जाकर चांडालों में जन्मता है ।१० जो कोई कुतर्की वेद और शास्त्र को जानकर अपमान करता है वह शीघ्र ही पशु योनि को पाता और पश्चात् इक्कीस प्रकार के नरकों को प्राप्त होता है ॥११॥ अपने २ कर्मों को करने वाले और दूर रहने पर भी मनुष्य अपने कर्म पर स्थिर रहने से जगत् के प्यारे होते हैं ॥ १२ ॥ केवल धर्म संचयार्थ ब्राह्मण के कर्म ये हैं कि यज्ञ करना, दान देना, साङ्गवेद पढ़ना और तप करना, और दानलेना पढ़ाना और यज्ञ कराना ये तीन ब्राह्मण की वृत्ति धर्मानुकूल आजीविका हैं ॥१३॥
( ९ । १० ) एकाक्षर से अभिप्राय यह है कि जो विधि पूर्वक थोड़ा भी पढ़ावे अथवा एकाक्षर नाम प्रणव को ठीक २ सार्थ पढ़ावे उस को भी गुरु अवश्य माने। न माने तो निन्दार्थवाद है यह उत्सर्ग जानो॥ किसी कारण गुरु पतित वा नास्तिकादि हो जाय तो उसे गुरु न माने ऐसा लेख जहां मिले वह इस का अपवाद होगा ( १२ ) इस का मतलब यह है कि विदेश में जाने पर भी अपने देशाचारानुकूल अपने २ वर्ण के कामों को कदापि न छोड़े अर्थात् ऐसा न करें कि विलायत जांय तो साहब बन के ही लौटें ॥
४ भाषार्थसंहिता-
क्षत्रियस्यापियजनं दानमध्ययनंतपः । शस्त्रोपजीवनंभूत रक्षणंचेतिवृत्तयः ॥ १४ ॥ दानमध्ययनंवार्ता यजनंचेतिवैविशः * । शूद्रस्यवार्ताशुश्रूषा द्विजानांकारुकर्मच ॥ १५ ॥ तदेतत्कर्माभिहितं संस्थितायत्रवर्णिनः । बहुमानमिहप्राप्य प्रयान्तिपरमांगतिम ॥ १६ ॥ येव्यपेताःस्वधर्मात्ते परधर्मेव्यवस्थिताः । तेषांशास्तिकरोराजा स्वर्गलोकेमहीयते ॥ १७ ॥ आत्मीयेसंस्थितोधर्मे शूद्रोपिस्वर्गमश्नुते । परधर्मोभवेत्त्याज्यः सुरुपपरदारवत् ॥ १८ ॥
भा०-यज्ञ करना, दान देना, साङ्गवेद पढ़ना और तप करना, ये क्षत्री के कर्म हैं और शस्त्रसे आजीविका और भूतों की रक्षा ये दो धर्मानुकूल क्षत्रियकी जीविका हैं ॥१४॥ दान देना, साङ्गवेद पढ़ना, खेती गौओं की रक्षा, व्यवहार, यज्ञ करना, ये वैश्यके कर्म हैं खेती, गौओंकीरक्षा, व्यवहार, तीनों वर्णों की सेवा, और कारीगरी, ये शूद्र के कर्म हैं॥१५॥ जिस कर्म में तत्पर रहने से चारों वर्ण इहलोक में बड़े मान को प्राप्त होकर परलोक में परमगति को प्राप्त होते हैं सो यह वर्णकर्म हमने कहा ॥१६॥ जो अपने धर्म को छोड़ के दूसरे के धर्म में तत्पर होते हैं उन को शिक्षा देने वाला राजा स्वर्गलोक में पूजा को प्राप्त होता है ॥१७॥ अपने धर्म में तत्पर हुआ शूद्र भीस्वर्ग को भोगता है और पराया धर्म इस प्रकार त्यागने योग्य है किजैसे श्रेष्ठरूप वाली पराई स्त्री ॥ १८ ॥
(१८) जैसे विष में पैदा हुआ कीड़ा विषसे मरतानहीं किन्तु विष ही उस का रक्षक होता है । इसी के अनुसार अपने २ बाप दादों की परम्परा से जो २ धर्म जिस वर्ण के अनुसार चला आता है उसी को अपना प्राकृत धर्म कर्म मानकर मनुष्यों को सेवन करना चाहिये । प्रत्येक मनुष्य का प्रयोजन सर्वोत्कृष्ट सुख स्वर्ग प्राप्त करने का है सो जब शूद्रादि को स्वधर्म के सेवन से स्वर्ग और पराये उत्तम धर्म से भी नरक होना सिद्ध है तब किसी को भी भयदायकपरधर्म का सेवन न करना चाहिये ॥ * विचार्यमत्र ॥
अग्निसमृतिः ॥ ५
वध्योराज्ञासवैशूद्रो जपहोमपरश्चयः ।
ततोराष्ट्रस्यहन्तासौ यथावन्हेेश्चवैजलम् ॥१९॥
प्रतिग्रहोऽध्यापनंच तथाऽविक्रेयविक्रयः ।
याज्यंचतुर्भिरप्येतैः क्षत्रविट्पतनंस्मृतम् ॥२०॥
सद्यःपततिमांसेन लाक्षयालवणेनच ।
त्र्यहेणशूद्रोभवति ब्राह्मणःक्षीरविक्रयी ॥२१॥
अव्रताश्चानधीयाना यत्रभैक्ष्यचराद्विजाः ।
तंग्रामंदण्डयेद्राजा चौरभुक्तप्रदण्डवत् ॥२२॥
विद्वद्भोज्यमविद्वांसो येपुराष्ट्रेपुभुञ्जते ।
भा०-जो शूद्र वेदोक्त जप और होम में तत्पर है वह राजा से कठोर दण्ड पाने के योग्य है क्योंकि वह जप होम में तत्पर होने के कारण राजा के देश का नाश करने वाला है जैसे अग्नि का जल नाशक है ॥ १९ ॥ दान लेना वेदादि का पढ़ाना, निषिद्ध वस्तु का बेचना, और यज्ञ कराना इन चारों कर्मों के करने से क्षत्रिय और वैश्य का पतित होना कहा गया है ॥२०॥ मांस लाख और लवण इन के बेचने से ब्राह्मण शीघ्र ही पतित होजाता है दूध के बेचने से तीन दिन में शूद्र तुल्य होजाता है ॥२१॥ व्रतों के न करने वाले और बिना पढ़े ब्राह्मण जिस ग्राम में निवास करते हुए भिक्षा मांगते हैं उस ग्राम के लोगों को राजा वह दण्ड दे जो चोरी की वस्तु के भोगने वाले को होता है ॥ २२ ॥ जिस देशों में विद्वानों के भोगने योग्य पदार्थों को मूर्ख भोगते हैं वे
( १९ ) यदि राजदण्ड का भय न होता तो अब तक पाखाना कमाने के लिये एक भी भंगी न मिलता। क्योंकि मिहतरों को यदि अपने से उत्तम काम मिल सके तो वे कदापि अपने अतिनिकृष्ट काम को नहीं करेंगे ( २० ) दान लेना वेदादि का पढ़ाना यज्ञ कराना ये ख़ास ब्राह्मण के ही काम हैं अन्यके लिये निषेध है ( २३ ) विद्वानों को उत्तम भोग मिलने से विद्या का आदर है विपरीत करने से अविद्या का आदर होता इस लिये अनावृष्टि आदि अनिष्ट फल कहते हैं ॥
६ भाषार्थसहिता-
तेप्यनावृष्टिमिच्छन्ति महद्वाजायतेभयम् ॥२३॥
ब्राह्मणान्वेदविदुषः सर्वशास्त्रविशारदान् ।
तत्रवर्षतिपर्जन्यो यत्रैतान्पूजयेन्नृपः ॥२४॥
त्रयोलोकास्त्रयोवेदा आश्रमाश्चत्रयोऽग्नयः ।
एतेषांरक्षणार्थाय संसृष्टाब्राह्मणाःपुरा ॥२५॥
उभेसंध्येसमाधाय मौनंकुर्वन्तियेद्विजाः ।
दिव्यवर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोकेमहीयते ॥२६॥
यएवंकुरुतेराजा गुणदोषपरीक्षणम् ।
यशःस्वर्गनृपत्वंच पुनःकोशंसअर्जयेत् ॥२७॥
दुष्टस्यदण्डःसुजनस्यपूजा न्यायेनकोशस्यचसंप्रवृद्धिः ।
अपक्षपातोर्थिषुराष्ट्ररक्षा पंचैवयज्ञाःकथितानृपाणाम् ॥२८॥
देश भी वृष्टि के अभाव की इच्छा करते हैं अथवा उन में महान् भय उत्पन्न होता है ॥ २३ ॥
भा०-साङ्गोपाङ्ग वेद को जानने वाले और संपूर्ण शास्त्रों में कुशल ब्राह्मणों की पूजा जिस देश में राजा करता है वहां मेघ ठीक २ वर्षता है ॥ २४ ॥ तीनों लोक तीनों वेद आश्रम और तीनों अग्नि इन की रक्षा के लिये सृष्टि के आरम्भ में ब्राह्मण रचे गये हैं ॥ २५॥ जो दोनों सन्ध्याओं के समय एकाग्रचित्त होके मौन हुए जप करते हैं वे द्विज देवताओं के हजार वर्ष तक स्वर्गलोक में पूजा को प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ जो राजा इस प्रकार गुण दोष की परीक्षा करता है वह यश स्वर्ग, राज्य और कोश का ( क्षीण वा नष्ट होने पर भी ) फिर संचय करता है ॥ २७ ॥ ये पांच यज्ञ राजाओं के लिये कहे हैं कि दुष्ट को दण्ड-श्रेष्ठ जन की पूजा, न्याय से कोश का बढ़ाना-मांगने वालों के लिये पक्षपात का न करना. और अपने देश की रक्षा ॥ २८ ॥
( २४ ) विद्वान् ब्राह्मणों का ठीक आदर से सत्कार किया जाय तो वे लोग अग्निहोत्रादि वेदोक्त कर्म ठीक २ करें जिस से देवता लोग प्रसन्न होकर ठीक २ समय पर वर्षा करें इसी रीति से त्रिलोकी की रक्षादि हो सकती है ॥
अत्रिस्मृतिः ॥ ७
यत्प्रजापालनेपुण्यं प्राप्नुवतीहपार्थिवाः ।
नतुक्रतुसहस्रेण प्राप्नुवंतिद्विजोत्तमाः ॥ २९ ॥
अलाभेदेवखातानाम् ह्रदेषुसरसीषुच ।
उद्धृत्यचतुरःपिण्डान् पारक्येस्नानमाचरेत् ॥३०॥
वसाशुक्रमसृङ्मज्जा मूत्रंविट्कर्णविण्नखाः ।
श्लेष्मास्थिदूपिकास्वेदोद्वादशैतेनृणांमलाः ॥३१॥
षण्णांषण्णांक्रमेणैव शुद्धिरुक्तामनीषिभिः ।
मृद्वारिभिश्चपूर्वेषा-मुत्तरेषांतुवारिणा ॥ ३२ ॥
शौचंमंगलमायास * अनसूयास्पृहादमः ।
भा०-प्रजा के ठीक पालन करने से इस संसार में जिस पुण्यसुख को राजा प्राप्त होते हैं—उस पुण्य को हज़ार यज्ञ करने से भी ब्राह्मण लोग नहीं प्राप्त हो सक्ते ॥ २९ ॥ देवताओं के खोदे तीर्थों (गंगा आदि) के अभाव में दूसरे कुंड अथवा तालाबों में से मिट्टी के चार पिंड (डेले) निकाल कर स्नान करे ॥ ३० ॥ वसा-वीर्य-रुधिर-मज्जा-मूत्र-विष्ठा-कानकामैल-नख, कफ-हाड़-नेत्रों का मल और पसीना ये बारह मनुष्यों के मल हैं ॥ ३१ ॥ विद्वान् लोगों ने पहिले वसादि छः अंगों की शुद्धि मिट्टी और जल से तथा पिछले छः अंगों की शुद्धि केवल जल से क्रमशः वर्णन की है ॥ ३२ ॥ शुद्ध रहना-मंगलकाम-परिश्रम करना-दूसरे के गुणों में दोषों को न देखना-तृष्णालोभ
( २९ ) राजा में यदि १८ प्रकार के दोष न हों और ठीक धर्मानुकूल प्रजा की रक्षा करे तो अवश्य वैसा पुण्य होगा परन्तु ब्राह्मण विरक्त जितेंद्रिय होके योगाभ्यास सहित तप करे तो उसका पुण्य राजा से भी बहुत बड़ा अवश्य होगा ( ३३ ) जैसे अग्नि का लक्षण गर्मी जलका लक्षण शीतलता दीपक का लक्षण प्रकाश द्वारा अन्धकार की निवृत्ति होती है । दीप ज्योति न दीखने पर भी प्रकाश के देखने मात्र से दीपक का होना मानने पड़ता है वैसे उत्तम कक्षा के शौचादि को देख कर जाति से ब्राह्मण होना प्रत्यक्ष न होने पर भी उस को ब्राह्मण ही मानना चाहिये । क्यों कि उक्त गुण असली ब्राह्मण पन को सिद्ध करते हैं ॥ * चिन्त्यमेतत् ।
८ भाषाथसहिता-
लक्षणानिचविप्रस्य तथादानंदयापिच ॥ ३३ ॥
नगुणान्गुणिनोहन्ति स्तौतिचान्यान्गुणानपि ।
नहसेच्चान्यदोषांश्च सानसूयाप्रकीर्तिता ॥३४॥
अभक्ष्यपरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिन्दितैः ।
आचारेष्वव्यवस्थानं शौचमित्यभिधीयते ॥ ३५ ॥
प्रशस्ताचरणंनित्यमप्रशस्तविवर्जनम् ।
एतद्विमंगलंप्रोक्त मृषिभिर्धर्मवादिभिः ॥ ३६ ॥
शरीरंपीड्यतेयेन शुभेनह्यशुभेनवा ।
अत्यन्तंतन्नकुर्वीत अनायासःसउच्यते ॥ ३७ ॥
यथोत्पन्नेनकर्तव्यः संतोषःसर्ववस्तुषु ।
नस्पृहेत्परदारेषु साऽस्पृहापरिकीर्तिता । ३८ ॥
न करना-इन्द्रियों को विषयों से रोकना-दान देना-और दया करना ये ब्राह्मणों के लक्षण हैं इन का विशेष व्याख्यान ग्रन्थकार ने आगे स्वयं किया है॥३३॥
भा०-गुण वाले के उत्तम गुणों को न छिपावे किन्तु अन्य के गुणों की स्तुति करे और अन्य के दोषों की हँसी न करे उसे अनसूया कहते हैं ॥ ३४ ॥ अभक्ष्य वस्तु का त्याग और सज्जनों का संग--और उत्तम आचरणों से न विचलना इसे शौच कहते हैं ॥३५॥ प्रतिदिन उत्तम आचरण का करना और निन्दित आचरण को त्याग देना धर्म को कहने वाले ऋषियों ने इसे मंगल कहा है ॥ ३६ ॥ जिस शुभ वा अशुभ कर्म से शरीर विशेष पीडित हो उस को अधिक न करना उसे अनायास कहते हैं ॥ ३७ ॥ धर्मानुकूल परिश्रम से जो कुछ अन्न धनादि प्राप्त हो उसी में संतोष करना और पराई स्त्रियों में भोग की इच्छा न करना उस को अस्पृहा कहते हैं ॥ ३८ ॥
( ३७ ) शरीर पीड़ा से मतलब यह है कि शरीर को ऐसी बाधा न पहुंचे जिस से नष्ट हो सके अर्थात् अच्छे काम में भी अधिक श्रम न करे । शरीर बना रहा तो इसी जन्म में अधिक पुण्य कर सकेगा । इस से तपादि में भी उतना कष्ट सहे जिस से शरीर को धक्का न लगे । अर्थात् क्रमशः जप तपादि को बढ़ावे ( आत्मानं सततं रक्षेत् ) - अपने जीवन की रक्षा निरन्तर करे ॥
अत्रिस्मृतिः ॥
ग्राह्यमाध्यात्मिकंवापि दुःखमुत्पाद्यतेपरैः । नकुप्यतिनचाहन्ति दमइत्यभिधीयते ॥ ३९ ॥ अहन्यहनिदातव्य-मदीनेनान्तरात्मना । स्तोकादपिप्रयत्नेन दानमित्यभिधीयते ॥ ४० ॥ परेस्मिन्बन्धुवर्गेवा मित्रेद्वेष्येरिपौतथा । आत्मवद्वर्त्तितव्यंहि दयैषापरिकीर्तिता ॥ ४१ ॥ यश्चैतैर्लक्षणैर्युक्तो गृहस्थोपिभवेद्द्विजः । सगच्छतिपरंस्थानं जायतेनेहवैपुनः ॥ ४२ ॥ इष्टापूर्तंचकर्त्तव्यं ब्राह्मणेनैवयत्नतः । इष्टेनलभतेस्वर्गं पूर्तंमोक्षोविधीयते ॥ ४३ ॥ अग्निहोत्रंतपःसत्यं वेदानांचैवपालनम् । आतिथ्यं वैश्वदेवश्च इष्टमित्यभिधीयते ॥ ४४ ॥ वापीकूपतडागादि देवतायतनानिच । अन्नप्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते ॥ ४५ ॥
भा०—अन्य लोग भीतरी वा बाहिरी कैसा ही दुःख पहुंचावें तौभी उन पर न क्रोध करे और न उन को तंग करे इस को दम कहते हैं ॥ ३९ ॥ यदि अपने पास थोड़ा ही निर्वाह मात्र अन्न धनादि हो तौभी उसी में से कुछ प्रसन्न चित्त से नित्य २ किसी को दिया करे इस को दान कहते हैं ॥ ४० ॥ कुटुंबी में—मित्र में द्वेष करने योग्य और शत्रु इन सब में अपने आत्मा के समान जो बर्त्ताव करना है उसे दया कहते हैं ॥ ४१ ॥ जो गृहस्थी भी द्विज इन लक्षणों से युक्त होता है वह उत्तम स्थान ब्रह्मलोक वा मोक्ष को प्राप्त हो जाता है और फिर इस लोक में उत्पन्न नहीं होता ॥ ४२ ॥ इष्ट और पूर्त कर्म के करने में ब्राह्मण ही को यत्न करना उचित है इष्ट से स्वर्ग मिलता है और पूर्त से मोक्ष होता है ॥ ४३ ॥ अग्निहोत्र—तप—सत्यभाषण—वेदों की रक्षा—अतिथि का सत्कार और बलिवैश्वदेव करना इन्हें इष्ट कहते हैं ॥ ४४ ॥ बावड़ी कूप, तालाब—देवताओं के मंदिर बनवाना—अन्न का दान करना आराम (बाग) लगवाना इन्हें पूर्त कहते हैं ॥ ४५ ॥
२
१०
भाषार्थसहिता-
इष्टापूर्तेद्विजातीनां सामान्येधर्मसाधने ।
अधिकारोभवेच्छूद्रः पूर्तेधर्मेनवैदिके ॥ ४६ ॥
यमान्सेवेतसततं ननित्यंनियमान्बुधः ।
यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन् ॥४७॥
आनृशंस्यंक्षमासत्य-महिंसादानमार्जवम् ।
प्रीतिःप्रसादोमाधुर्य्य-मार्दवंचयमादश ॥ ४८ ॥
शौचमिज्यातपोदानं स्वाध्यायोपस्थनिग्रहौ ।
व्रतमौनोपवासञ्च स्नानंचनियमादश ॥ ४९ ॥
प्रतिनिधिंकुशमयं तीर्थवारिपुमज्जति ।
यमुद्दिश्यनिमज्जेत अष्टभागंलभेतसः ॥ ५० ॥
मातरंपितरंवापि भ्रातरंसुहृदंगुरुम् ।
भाषार्थ—इष्ट और पूर्त ये दोनों द्विजाति (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तीनों के सामान्य धर्म हैं और शूद्र पूर्त धर्म का अधिकारी है परन्तु वेदोक्त धर्म का अधिकारी नहीं है ॥ ४६ ॥ बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि यमों का निरंतर सेवन करे और केवल नियमों का नित्य सेवन न करे क्योंकि केवल नियमों का सेवन करता और यमों को न करता हुआ पतित होता है । तात्पर्य यह है कि यमोंके साथ नियमों का भी सेवन करके तब तो बहुत ही अच्छा है । पर ऐसा न होतो केवल यमों का सेवन नित्य नियम से करे क्यों कि केवल नियमों के सेवन करने और यमों का सेवन न करने इन दोनों दशा में मनुष्य पतित हो जाता है ॥ ४७ ॥ अक्रूरता-क्षमा-सत्य-अहिंसा-दान-नम्रता-प्रीति, प्रसन्नता-मधुरवाणी-कोमलस्वभाव ये दश यम हैं ॥४८॥ शौच-यज्ञ-तप-दान-वेद का पढ़ना-उपस्थ इन्द्रिय को रोकना व्रत-मौन-उपवास-स्नान ये दश नियम हैं ॥ ४९ ॥ जिस मनुष्य की कुशाकी प्रतिनिधि (प्रतिमा) को उसी का उद्देश लेकर तीर्थ के जलों में स्नान करावे तो उस मनुष्य को स्नान के फल का आठवां भाग प्राप्त होता है ॥ ५० ॥ माता-पिता-भ्राता मित्र और गुरु इन में से जिस के उद्देश (नाम) से पुत्रादि
अत्रिस्मृतिः ॥ १२
यमुद्दिश्यनिमज्जेत द्वादशांशफलंभवेत् ॥ ५१ ॥
अपुत्रेणैवकर्तव्यः पुत्रप्रतिनिधिस्सदा ।
पिण्डोदकक्रियाहेतो—र्यस्मात्तस्मात्प्रयत्नतः ॥५२॥
पितापुत्रस्यजातस्य पश्येच्चेज्जीवतोमुखम् ।
ऋणमस्मिन्संनयति अमृतत्वंचगच्छति ॥ ५३ ॥
जातमात्रेणपुत्रेण पितृणामनृणीपिता ।
तदहिशुद्धिमाप्नोति नरकात्त्रायतेहिसः ॥ ५४ ॥
जायन्तेबहवःपुत्रा यद्येकोपिगयांव्रजेत् ।
यजतेचाश्वमेधंच नीलंवावृषमुत्सृजेत् ॥ ५५ ॥
गोता लगावे उसको स्नान के फल का बारहवां भाग मिलता है ॥ ५१ ॥
पुत्र हीन पुरुष को पिण्ड और जलदान के लिये बड़े यत्न से जिस किसी के पुत्र को प्रतिनिधि (दत्तक पुत्र) करना चाहिये ॥ ५२ ॥ जो पैदा हुये जीवित पुत्र के मुख को पिता देख लेवे तो पुत्र को ऋण सौंप कर पिता पितृ-ऋण से छूट जाता है और मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ ५३ ॥ पुत्र के उत्पन्न होने मात्र से ही पिता पितरों का अनृणी हो जाता है और उसी दिन शुद्ध हो जाता है क्योंकि वह पुत्र पिता को नरक से रक्षा करता है ॥ ५४ ॥ उत्पन्न हुये बहुत पुत्रों में से यदि एक पुत्र भी गया जी को जाय अथवा नीले बैल से वृषोत्सर्ग करे वह मानों अश्वमेध यज्ञ करता है ॥ ५५ ॥
वि०:— (५२) श्राद्ध तर्पण का सिल सिला चला जाना शास्त्रकारों के सिद्धान्ता-नुसार ऐसा ही आवश्यक है जैसा कि मनुष्य के लिये नित्य २ अन्न जल अपेक्षित है (५३ : ५४) पुत् नाम नरक से पिता की त्राण (रक्षा) करने वाला होने से ही मनु जी ने उस का सार्थकनाम पुत्र रक्खा है। जैसे राजकुमार के उत्पन्न होते ही भविष्यत् में राजकार्य चलाने की आशा सब को हो जाती राज कार्यों का भार रूप ऋण उसी दिन से उस पर आजाता है वैसा यहां भी जानो। (५५) अच्छे काम भी किसी खास स्थान में जैसे उत्तम होते हैं वैसे सर्वत्र नहीं हो सक्ते जैसे संस्कृत के सार्वभौम पण्डित काशी में ही होते अन्यत्र पढ़ने से नहीं। बेरिस्टरी आदि पास लंदन में ही होता अन्यत्र नहीं। ऐसे ही श्राद्ध का सबसे उत्तम स्थान गया क्षेत्र ही है यह सर्वस्मृति सम्मत जानो।
| १२ | भाषार्थसंहिता- |
|---|
कांक्षन्तिपितरःसर्वे नरकान्तरभीरवः ।
गयांयास्यतियःपुत्र-स्सनस्त्राताभविष्यति ॥ ५६ ॥
फल्गुतीर्थेनरःस्नात्वा दृष्ट्वादेवंगदाधरम् ।
गयाशीर्षंपदाक्रम्य मुच्यतेब्रह्महत्यया ॥ ५७ ॥
महानदीमुपस्पृश्य तर्पयेत्पितृदेवताः ।
अक्षयान्लभतेलोकान् कुलंचैवसमुद्धरेत् ॥ ५८ ॥
शंकास्थानेसमुत्पन्ने भक्ष्यभोज्यविवर्जिते ।
आहारशुद्धिंवक्ष्यामि तन्मेनिगदतःशृणु ॥ ५९ ॥
अक्षारंलवणंरौक्षं पिबेद्ब्राह्मींसुवर्चलाम् ।
त्रिरात्रंशंखपुष्पींवा ब्राह्मणःपयसामह ॥ ६० ॥
मद्यभांडेद्विजःकश्चि-दज्ञानात्पियतेजलम् ।
प्रायश्चित्तंकथंतस्य मुच्यतेकेनकर्मणा ॥ ६१ ॥
पालाशविल्वपत्राणि कुशान्पद्मान्युदुम्बरम् ।
भा०—अन्य २ नरकों से डरते हुये पितर यह चाहते हैं कि जो पुत्र गया को जायगा वह हमारा रक्षक होगा ॥ ५६ ॥ फल्गुतीर्थ में स्नान और गदाधर (जो गया में है) देवता के दर्शन करके और गयासुर के शिर पर चरण रख कर ब्रह्महत्या से भी मनुष्य छूट जाता है ॥ ५७ ॥ जो पुरुष महानदी में स्नान करके पितर और देवताओं का तर्पण करता है वह अक्षय लोकों को प्राप्त होता और अपने कुल का उद्धार करता है ॥ ५८ ॥ जहां भक्ष्याभक्ष्य का विचार नहीं ऐसे देश में शंका उत्पन्न हो सकती है इस से भोजन की शुद्धि कहते हैं उसको कहते हुए हम से सुनो ॥ ५९ ॥ अभक्ष्य भक्षण कर लेनेकी शंका हो गई हो तो क्षार जिस में न हो ऐसे अन्न, लवण, रुखा अन्न, कांति बढ़ाने वाली ब्राह्मी ओषधि अथवा शंख पुष्पी ओषधि को दूध के संग तीन दिन तक पीवे ॥ ६० ॥ मदिरा के पात्र में यदि कोई द्विज अज्ञान से जलपान करले तो उस का कैसे प्रायश्चित्त हो और वह किस कर्म के करने से दोष से छूटे ॥ ६१ ॥ उ०—ढांक तथा बेल के पत्ता कुशा, कमल और गूलर, इन के क्वाथ के जल को तीन दिन तक पीने से शुद्धि
अत्रिसमृतिः ॥ १२
क्वाथयित्वापिबेदाप-स्त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥ ६२ ॥ सायंप्रातस्तुयःसन्ध्यां प्रमादाद्विक्रमेत्सकृत् । गायत्र्यास्तुसहस्रंहि जपेत्स्नात्वासमाहितः ॥ ६३ ॥ रोगाक्रांताथवाऽस्नातः स्थितःस्नानजपाद्बहिः ॥ ब्रह्मकूर्चं चरेद्भक्त्या दानंदत्वाविशुद्ध्यति ॥ ६४ ॥ गवांशृंगोदकेस्नात्वा महानद्युपसंगमे । समुद्रदर्शनेवापि व्यालदष्टःशुचिर्भवेत् ॥ ६५ ॥ वृकश्वानशृगालैस्तु यदिदष्टस्तुब्राह्मणः । हिरण्योदकसंमिश्रं घृतंप्राश्याविशुद्ध्यति ॥ ६६ ॥ ब्राह्मणीतुशुनीदष्टा जंबुकेनवृकेणवा । उदितंग्रहनक्षत्रं दृष्ट्वासद्यःशुचिर्भवेत् ॥ ६७ ॥ सत्रतस्तुशुनादष्ट-स्त्रिरात्रमुपवासयेत् । सघृतेपावकंप्राश्य व्रतशेषंसमापयेत् ॥ ६८ ॥
हो जाता है ॥ ६२॥ सायं वा प्रातः काल यदि प्रमाद से संध्योपासन को जो त्याग दे तो स्नान कर सावधान होके एक सहस्र गायत्री का जप करे ॥ ६३॥ किसी रोग के कारण रोग जो स्नान न कर सके और स्नान करके जो जप न कर सके वह मनुष्य भक्ति से ब्रह्मकूर्चव्रत कर और दान देकर शुद्ध होता है ॥ ६४ ॥ जिस मनुष्य को सांपने काटा हो वह गौओं के सींगों के जल से अथवा बड़ी नदी गंगा यमुना आदि के संगम में स्नान करके अथवा समुद्र के दर्शन से शुद्ध होता है ॥ ६५ ॥ भेड़िया-कुत्ता और गीदड़ ने जिस ब्राह्मण को काटा हो वह सोने के जल से मिले घीको खाकर शुद्ध होता है ॥ ६६ ॥ जिस ब्राह्मणी को कुत्ती, गीदड़ी अथवा भिड़िया काटे तो वह उदय हुए ग्रह नक्षत्रों के दर्शन करने से शीघ्र ही शुद्ध हो जाती है ॥ ६७ ॥ चान्द्रायणादि व्रतवाला ब्राह्मण कुत्ते के काटने से तीन दिन तक उपवास करे फिर घृत सहित चीते की छाल के चूर्ण को खाकर शेष व्रत को समाप्त करे ॥ ६८ ॥
१५ भाषार्थसहिता-
मोहात्प्रमादात्संलोभा-द्व्रतभंगंतुकारयेत् ।
त्रिरात्रेणैवशुद्ध्येत पुनरेवव्रतीभवेत् ॥ ६९ ॥
ब्राह्मणानांयदुच्छिष्ट-मश्नीयाद्यज्ञानतोद्विजः ।
दिनद्वयंतुगायत्र्या जपंकृत्वाविशुद्ध्यति ॥ ७० ॥
क्षत्रियान्नंयदुच्छिष्ट-मश्नीयाद्यज्ञानतोद्विजः ।
त्रिरात्रेणभवेच्छुद्धि-र्यथाक्षत्रेतथाविशि ॥ ७१ ॥
अभोज्यान्नंतुभुंक्त्वान्नं स्त्रीशूद्रोच्छिष्टमेववा ।
जग्ध्वामांसंसमक्षंच सप्तरात्रंयवान्पिबेत् ॥ ७२ ॥
असंस्पृष्टेनसंस्पृष्टः स्नानंतेनविधीयते ।
तस्यचोच्छिष्टमश्नीया-त्षण्मासान्कृच्छ्रमाचरेत् ॥७३॥
अज्ञानात्प्राश्यविण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेववा ।
पुनःसंस्कारमर्हंति त्रयोवर्णाद्विजातयः ॥ ७४ ॥
**भा०:—**मोह प्रमाद अथवा लोभ से जो व्रत को बिगाड़ दे तो वह तीन दिन उपवास कर शुद्ध होता है और फिर व्रत वाला हो जाता है ॥ ६९ ॥ जो ब्राह्मण अज्ञान से ब्राह्मणों के उच्छिष्ट को खाले तो दो दिन तक गायत्री का जप कर के शुद्ध होता है ॥ ७० ॥ क्षत्रिय अथवा वैश्य के उच्छिष्ट को जो ब्राह्मण अज्ञान से भक्षण करले तो तीन दिन गायत्री के जप से शुद्ध होता है ॥ ७१ ॥ भक्षण के अयोग्य अन्न को अथवा स्त्री और शूद्र के उच्छिष्ट अन्न को अथवा प्रत्यक्ष में मांस को खाकर ब्राह्मण सात दिन तक एक बार जौ के सत्तू पीवे ॥७२॥ स्पर्श करने के अयोग्य चाण्डालादि का जो मनुष्य स्पर्श करे तो वह स्नान करने से ही शुद्ध होजाता है और उस के झूठे अन्न को खाकर छः महीने तक कृच्छ्र व्रत करे ॥७३॥ अज्ञान से विष्ठा मूत्र अथवा मदिरा जिस में मिली हो ऐसी वस्तु के खाने से तीनों (द्विजाति) वर्ण फिर संस्कार के योग्य होते हैं ॥ ७४ ॥
विशो०:—(७४) उन २ प्रायश्चित्तों से उस २ अनिष्ट की शुद्धि ऐसे ही जानो कि जैसे कि उस २ औषधि से उस २ रोग की निवृत्ति होती है ॥