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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

अध्याय ५ भक्तियोग का शुद्ध स्वरूप श्रील रूप गोस्वामी के पूर्वोक्त सम्पूर्ण उपदेश का सार इस प्रकार है। जब तक विषयों की अथवा ब्रह्मज्योति में लीन होने की इच्छा है, तब तक शुद्ध भक्तियोग के मण्डल में प्रवेश नहीं हो सकता। यह प्रतिपादन करके श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि भक्तियोग सभी लौकिक विचारों से परे है और किसी राष्ट्र, जाति, समाज अथवा परिस्थिति-विशेष तक सीमित नहीं है। उसमें मनुष्यमात्र का अधिकार है। श्रीमद्भागवत में आया है कि भक्ति स्वरूप से अहैतुकी और अप्रतिहता होती है। भक्ति किसी लाभ की इच्छा के बिना की जाती है और कोई भी प्राकृत परि- स्थिति उसमें बाधा नहीं डाल सकती। उसमें भेदभाव के बिना सभी का अधिकार है; वह तो जीव का स्वरूपधर्म ही है। मध्यकाल में, भगवान् चैतन्य महाप्रभु के महान् पार्षद श्रीनित्यानन्द प्रभु के तिरोधान के बाद, पण्डितों का एक वर्ग अपने को नित्यानन्दवंशी गोस्वामी जाति कहने लगा। उनका दावा था कि भक्ति के साधन और प्रचार का अधिकार केवल उन्हीं का है। इस प्रकार कुछ समय तक उनका यह मिथ्या एकाधिकार चलता रहा। परन्तु गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के महान् आचार्य श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने उनके इस विचार को पूर्णतः ध्वस्त कर दिया। पहले बड़ा गंभीर संघर्ष हुआ, पर अन्त में वे सफल रहे और अब यह ठीक-ठीक वास्तव में सिद्ध हो गया है कि भक्ति का अधिकार किसी जाति-विशेष तक सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त, भक्तिपरायण व्यक्ति ब्राह्मण के पद को अपने-आप प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार भक्ति आन्दोलन के लिए श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर का संघर्ष सफल रहा है। उनके इस सिद्धान्त के आधार पर विश्व का अथवा ब्रह्माण्ड का कोई भी प्राणी गौड़ीय वैष्णव बन सकता है। जो कोई शुद्ध वैष्णव बन जाता है, वह शुद्धसत्त्व में स्थित हो जाता है, इसलिए प्राकृत-जगत् की सर्वोत्तम पात्रता-सत्त्वगुण में स्थिति उसे अपने-आप प्राप्त रहती है।

भक्तियोग का शुद्ध स्वरूप [ ४५

पाश्चात्य जगत् में हमारा कृष्णभावनामृत आन्दोलन हमारे गुरुमहाराज श्रील भक्तिसिद्धान्त गोस्वामी प्रभुपाद के इसी सिद्धान्त पर आधारित है । उसके प्रमाण के बल पर हम पाश्चात्य देशों के सभी वर्गों में ब्राह्मण बना रहे हैं। नामधारी ब्राह्मण विरोध करते हैं कि जिसका जन्म ब्राह्मण- जाति में नहीं हुआ हो, उसे यज्ञोपवीत धारण नहीं कराया जा सकता और न वह उत्तम वैष्णव बन सकता है । परन्तु हम इस मत को नहीं मानते क्योंकि यह श्रील रूप गोस्वामी अथवा विविध शास्त्रों द्वारा प्रमाणित नहीं होता । श्रील रूप गोस्वामी ने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि भक्तियोग को अंगीकार कर कृष्णभावनाभावित हो जाने का मनुष्यमात्र को जन्म- सिद्ध अधिकार है। उन्होंने नाना शास्त्रों से अनेक प्रमाण उपस्थित किए हैं; विशेष रूप से पद्मपुराण से एक उद्धरण दिया है, जिसमें वशिष्ठ ऋषि महाराज दिलीप से कहते हैं, "हे राजन् ! माघस्नान के समान भक्ति में भी मनुष्यमात्र का अधिकार है।" पद्मपुराण के काशीखण्ड में और भी प्रमाण हैं, "मयूरध्वज नामक देश में अन्त्यजों को भी भक्ति की वैष्णव दीक्षा दी जाती है। जब वे शरीर पर तिलक तथा कण्ठ और हाथ में कण्ठी- माला धारण करते हैं, तो साक्षात् वैकुण्ठ से आये लगते हैं । वास्तव में उनकी शोभा साधारण ब्राह्मणों से कहीं अधिक होती है।" अतः वैष्णव ब्राह्मणपद को पहले ही प्राप्त हो जाता है । वैष्णवों की आचारसंहिता 'हरिभक्तिविलास' में सनातन गोस्वामी ने भी इस विचार का समर्थन किया है। उनका स्पष्ट वाक्य है कि विधि-विधान से वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित पुरुष निस्सन्देह ब्राह्मण हो जाता है, उसी प्रकार जैसे पारे के मिश्रण से कांसा भी स्वर्ण बन जाता है । आचार्यों का अनुगामी सद्गुरु किसी को भी वैष्णव दीक्षा दे सकता है, जिससे शिष्य स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणश्रेष्ठ बन जाता है । श्रील रूप गोस्वामी की साथ-साथ चेतावनी है कि सद्गुरु का दीक्षित शिष्य यह न समझे कि दीक्षा मात्र से वह कृतकार्य हो गया है। विधि-विधान का दृढतापूर्वक पालन तब भी बड़ा आवश्यक है। यदि कोई गुरु से दीक्षा ग्रहण करके भक्ति की विधि का अनुसरण नहीं करता, तो फिर गिर जाता है। सावधानीपूर्वक सदा स्मरण रखना चाहिए कि वह भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य विग्रह का भिन्न-अंश है, अतः उसका कर्तव्य बनता है कि पूर्ण परात्पर श्रीकृष्ण की सेवा करे । यदि हम श्रीकृष्ण की सेवा में प्रमाद करेंगे तो फिर गिर जायेंगे । भाव यह है कि केवल दीक्षित

४६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हो जाने से ही उच्च ब्राह्मणपद नहीं मिलता। बड़ी दृढ़ता से कर्तव्य और विधि का पालन करना परम आवश्यक है। श्रील रूप गोस्वामी कहते है कि यदि कोई नियमित रूप से भक्ति- योग के परायण रहे तो गिरने का कोई भय नहीं रहता। परन्तु यदि प्रसंगवश पतन हो जाय, तो भी वैष्णव को प्रायश्चित्त करने की आवश्यकता नहीं। दैवात् भक्तिसिद्धान्त से गिरकर निषिद्ध आचरण कर बैठने पर भी शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त करना कर्तव्य नहीं है। भक्ति के विधि-विधान का पालन करने से ही अपनी स्थिति फिर प्राप्त हो जाती है। यह वैष्णव-शास्त्रों का रहस्य है। वस्तुतः अध्यात्म चेतना के तीन मार्ग हैं-कर्म, ज्ञान और भक्ति। भक्तियोग का कर्मकाण्ड अथवा मनोधर्ममय ज्ञान से कोई प्रयोजन नहीं। कहा जा चुका है कि शुद्धभक्ति में ज्ञान-कर्म का लेश भी नहीं रहता। वह उनसे सर्वथा शुद्ध होती है। इस संदर्भ में श्रील रूप गोस्वामी श्रीमद्भागवत से प्रमाण देते हैं। एकादश स्कन्ध में भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा है, "गुण-दोष का निर्णय इस प्रकार किया जा सकता है। भक्तियोगी पुरुष फिर कभी सकाम कर्म अथवा मनोधर्म का आश्रय नहीं लेते। आचार्यों और शास्त्रों के विधि-विधान का अनुसरण करते हुए भक्ति में निष्ठ रहना सर्वोपरि गुण है।" श्रीमद्भागवत (१.५.१७) में अन्यत्र भी इस वाक्य की पुष्टि है। नारदजी ने व्यासदेव से कहा, "जो अपने स्वधर्म को त्याग कर साक्षात् भगवान् हरि के चरणकमलों के आश्रित हो जाता है, उसका कभी अनिष्ट नहीं होता और सब अवस्थाओं में उसकी स्थिति सुरक्षित रहती है। यदि दुःसंग के कारण वह भक्ति से गिर भी जाय, अथवा भक्तिसाधन के पूरा होने से पहले ही मर जाय, तों भी उसे हानि नहीं होगी। दूसरी ओर, जो मनुष्य कृष्णभावना के बिना वर्णाश्रमधर्म का पालन करता है, उसे मानव- जीवन का यथार्थ लाभ नहीं होता। तात्पर्य यह है कि जो जीव यह जाने बिना कि सकामकर्मों के द्वारा भवबन्धन दूर नहीं हो सकता, उन्मत्त की भाँति इन्द्रियतृप्ति की क्रियाओं में ही लगे रहते हैं, उन्हें बारम्बार जन्म- मृत्यु के चक्र में फेंका जायगा। श्रीमद्भागवत के पाँचवे स्कन्ध में भगवान् ऋषभदेव का पुत्रों को उपदेश है, "सकामकर्मों जन्म-मृत्यु के बन्धन में ही फँसे रहते हैं। जब तक उनमें भगवान् वासुदेव के लिए प्रेमभाव का उदय नहीं होता, तब तक

भक्तियोग का शुद्ध स्वरूप [ ४७ इस दृढ बन्धन से नहीं छूट सकते ।'' अस्तु, जो मनुष्य बड़ी गंभीरता से अपने वर्णाश्रमधर्म का अनुसरण तो करता है, परन्तु भगवान् वासुदेव से प्रेम नहीं करता, वह अपना मनुष्यजीवन व्यर्थ गवाँता है। श्रीमद्भागवत (११.११.३२) में इस की पुष्टि करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, "हे उद्धव ! जो पुरुष अन्य सब कर्तव्यों को त्यागकर पूर्णरूप से शरणागत हुआ मेरे आश्रित हो जाता है और मेरा आज्ञापालन करता है, वह सर्वश्रेष्ठ है।" इस भगवत्-वचन से स्पष्ट है कि दातव्य, नैतिक, परहितवादी, राजनीतिक और समाजकल्याण क्रियाओं में रुचि वाले मनुष्य प्राकृत-जगत् की दृष्टि में उत्तम हो सकते हैं। श्रीमद्- भागवत जैसे प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों के अनुसार तो जो पुरुष भक्तियोग से युक्त होकर केवल कृष्णभावनाभावित कर्म करता है, वह इन सब से कहीं उत्तम है। यही सिद्धान्त अन्यत्र (११.५.४१) और अधिक दृढ़तापूर्वक स्थापित किया गया है। करभाजन मुनि राजा निमि को सम्बोधित करते हैं, "हे राजन ! जो अपने वर्णाश्रमधर्म को त्याग कर सर्वभाव से भगवान् मुकुन्द के चरणकमलों के शरणागत हो जाता है, वह न तो किसी का ऋणी रहता है और न ऋषि, पितर, जीवसमुदाय, परिवार अथवा समाज के प्रति उसका कोई भी कर्तव्य शेष रहता है। पापों से मुक्ति के लिए उसे पँचयज्ञों से कोई प्रयोजन नहीं। केवल भवित करने से वह कृतकृत्य हो जाता है।" इस संसार में जन्म लेते ही मनुष्य बहुत से प्राणियों का ऋणी हो जाता है, वह ऋषियों का ऋणी है, क्योंकि उनके ग्रन्थों से लाभ उठता है। उदाहरण के लिए, हम सब व्यासप्रणीत ग्रन्थों से लाभान्वित होते हैं। व्यासदेव ने सम्पूर्ण वेदों का संकलन किया। उनसे पूर्व शिष्यगण वैदिकमन्त्रों को श्रौतपरम्परा से सुनकर कण्ठ कर लेते थे। उस समय पठन नहीं था। परन्तु कलियुग में लोगों की स्मरणशक्ति मंद हो जाती है, वे गुरु के सम्पूर्ण उपदेश की स्मृति नहीं रख सकते। अतः व्यासदेव ने वेदों को लिखित रूप देने की सोची। इसी प्रेरणा से उन्होंने वैदिक ज्ञानग्रन्थों के रूप में पुराण, वेदान्तसूत्र, महाभारत तथा श्रीमद्भागवत की रचना की। शंकराचार्य, गौतम, नारद, आदि ऋषियों के भी हम ऋणी हैं क्योंकि उनकी विद्या का उपयोग करते हैं। इसी प्रकार जन्म, सम्पत्ति आदि के लिए अपने कुलपितरों के भी हम ऋणी हैं। इसीलिए पितरों को पिण्ड का दान किया जाता है। देवताओं, जनसाधारण, बन्धु-बाँधवों को तथा गाय और कुत्ते जैसे सेवक पशुओं का भी हम पर ऋण है। हमारा कर्तव्य

४८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु बनता है कि सेवा करके इन सब ऋणों का शोधन करें । परन्तु यदि कोई सब कर्तव्यों को त्याग कर अनन्यभाव से भगवान् हरि के शरणागत हो जाय तो भक्तियोग की एक चोट ही में वह किसी का भी ऋणी या किंकर नहीं रहता । भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं, "अपने सम्पूर्ण कर्तव्यों को त्याग कर एक मेरे शरणागत हो जा ! मैं शपथ खाता हूँ कि तेरी सब पापों से रक्षा करूँगा ।" कोई सोच सकता है कि यदि मैं भगवान् के शरणागत हो जाऊँगा तो अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर सकूँगा । परन्तु भगवान् बारम्बार आश्वासन देते हैं, "संकोच न कर । मत समझ कि अन्य कर्तव्यों को त्याग देने से तेरा जीवन दोषयुक्त हो जायगा । ऐसा मत समझ । मैं तेरा सब प्रकार से संरक्षण करूँगा ।” भगवद्गीता में यह भगवान् श्रीकृष्ण का वचन है । 'अगस्त्यसंहिता' में भी प्रमाण उपलब्ध है—"जिस प्रकार शास्त्र के विधि-निषेध मुक्तपुरुष पर नहीं लगते, वैसे ही रामोपासकों को पुराणों के विधि-विधान स्पर्श नहीं कर सकते ।” भाव यह है कि भगवान् राम अथवा कृष्ण के उपासक मुक्त हो जाते हैं; अतः उनके लिए वैदिकशास्त्रों के कर्मकाण्ड में वर्णित विधान का अनुसरण आवश्यक नहीं है । श्रीमद्भागवत, एकादश स्कन्ध के पाँचवें अध्याय में करभाजन मुनि राजा निमि से कहते हैं, “हे राजन् ! देवों की उपासना को छोड़कर जो पूर्ण रूप से भगवान् की भक्ति के परायण हो गया है, वह भक्त उनका अतिशय प्रेमभाजन बन जाता है । इसलिए यदि प्रसंगवश अथवा भूल से उसके द्वारा कोई निषिद्ध कर्म बन जाय तो भी किसी प्रायश्चित की आवश्यकता नहीं । हृदय में बैठे हुए श्रीहरि उसके प्रासंगिक पतन पर दया करके अन्तर से उसका मार्जन कर देते हैं ।” भगवद्गीता में बहुधा कहा है कि भगवान् श्रीकृष्ण विशेष रूप से भक्तवत्सल हैं । श्रीकृष्ण की घोषणा है कि उनके भक्तों का किसी भी कारण से आत्मपतन नहीं हो सकता । वे निरन्तर उनका संरक्षण करते हैं ।

अध्याय ६ भक्ति के साधन श्रील रूप गोस्वामी का उल्लेख है कि उनके अग्रज सनातन गोस्वामी ने वैष्णवों के मार्गदर्शन के लिए 'हरिभक्तिविलास' का संकलन करके वैष्णवों द्वारा आचरण के योग्य अनेक विधि-विधानों का वर्णन किया है। उनमें से कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण और प्रमुख हैं, जिनका अब वे पाठकों के लाभ के लिए उल्लेख करेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि रूप गोस्वामी विशदीकरण के बिना केवल मूल सिद्धान्तों का प्रतिपादन करना चाहते हैं। उदाहरणार्थ, गुरु का आश्रय लेना एक मुख्य सिद्धान्त है। परन्तु ठीक किस प्रकार गुरु का आज्ञापालन करना है, यह उस मूल सिद्धान्त का विवरण हुआ। जैसे कोई एक गुरु के उपदेश का अनुसरण करता है और वह उपदेश दूसरे गुरु की शिक्षा से भिन्न हो, तो इसे विवरणात्मक जानकारी कहा जायगा। विवरण में चाहे भेद हो, परन्तु गुरु-शरणागति का मूल सिद्धान्त सभी अवस्थाओं में लागू होता है। श्रील रूप गोस्वामी विस्तृत विवरण में न जाकर केवल सिद्धान्त-प्रतिपादन करना चाहते हैं। उन्होंने भक्ति के निम्नलिखित अंग कहे हैं—१. सद्गुरु के चरण- कमलों का आश्रय ग्रहण करना; २. गुरु से कृष्णदीक्षा और भक्तियोग की शिक्षा लेना; ३. श्रद्धाभाव से गुरुसेवा (आज्ञापालन); ४. गुरुनिर्देश के अनुसार आचार्यों के पथ का अनुगमन; ५. कृष्णभावना में उन्नति के लिए गुरु से जिज्ञासा; ६. श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए भोगादि का त्याग (इसका अर्थ यह है कि जब हम कृष्णभक्ति में लगें, तो अपनी किसी प्रियवस्तु को त्यागें और किसी अप्रिय नियम को अंगीकार करें); ७. द्वारका, वृन्दावन आदि में निवास; ८. प्राकृत-जगत् से केवल आवश्यकता भर व्यवहार करना; ६. एकादशी व्रतपालन; १०. आमलक, अश्वत्थ आदि पुण्य वृक्षों का पूजन । ये दस अंग विधिभक्ति के अनुष्ठान का आरम्भ करने के लिए

५० ] भक्तिरसामृतसिन्धु आवश्यक हैं। प्रारंभिक दशा में इन दसों अंगों का पालन करने से कनिष्ठ भक्त शीघ्र कृष्णभावना में पर्याप्त उन्नति कर लेगा । अगले दस अंग ये हैं—१. जो भगवान् से विमुख हों उनका दूर से ही संगत्याग; २. भक्तियोग में रुचि न रखनेवाले को उपदेश न करे; ३. विशाल मन्दिर-मठ बनाने के लिए अधिक उद्यम न करे; ४. अधिक ग्रन्थों का अध्ययन न करे तथा श्रीमद्भागवत और भगवद्गीता की कथा को आय का साधन न बनाये; ५. व्यवहार में प्रमाद न करे; ६. हानि-लाभ में दुःख-सुख से अभिभूत न हो; ७. देवताओं का अपमान न करे; ८. किसी भी जीव को न सताये; ९. सेवा और नाम के अपराधों से बचे; १०. श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त की निन्दा को कभी न सहन करे । उपरोक्त दस 'अंगों' का पालन किए बिना साधनभक्ति की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती । कुल मिलाकर श्रील रूप गोस्वामी ने बीस साधन बताएं हैं। ये सभी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। बीस में से पहले तीन—गुरुपाद- आश्रय, दीक्षा और श्रद्धाभाव सहित गुरुसेवा का प्रधान महत्त्व है। आगे अतिरिक्त साधन हैं : १. शरीर पर वैष्णवचिह्न, तिलकधारण करना (भाव यह है कि जब कोई वैष्णव के शरीर पर इन चिह्नों को देखेगा, तो उसे तत्काल कृष्णस्मृति होगी । श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि वैष्णव वह है, जिसके दर्शन से श्रीकृष्ण की स्मृति हो; अतः यह आवश्यक है कि दूसरों को श्रीकृष्ण का स्मरण कराने के लिए वैष्णव शरीर पर तिलक लगाये); २. शरीर पर 'हरेकृष्ण' धारण करना; ३. भगवत्-मूर्ति और गुरुदेव को अर्पित हार-पुष्प को शरीर पर ग्रहण करना; ४. मूर्ति के आगे नृत्य करना; ५. मूर्ति अथवा गुरु को देखते ही दण्डवत् प्रणाम करना; ६. खड़े होकर स्वागत करना; ७. मार्ग में मूर्ति की शोभायात्रा के पीछे- पीछे चलना (इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि आज भी अनेक मन्दिरों में, विशेषतः विष्णुमन्दिरों में यह प्रथा है कि मन्दिर में स्थापित बड़ी अचल मूर्ति के अतिरिक्त दूसरी छोटी मूर्तियाँ भी रहती हैं, जिन्हें सांध्य- काल में शोभायात्रा पर ले जाया जाता है । कुछ मन्दिरों में सांध्य में बड़ी शोभायात्रा की परिपाटी है, जिसमें नगाड़े बजते हैं, चँवर डूलाये जाते हैं और मूर्ति को पालकी में सिंहासन पर विराजित किया जाता है, जिसे भक्तजन धारण करते हैं। मूर्तियाँ मार्ग में निकलती हैं और आसपास के लोग प्रसाद लेने आते हैं। सब मूर्ति के पीछे-पीछे चलते हैं। बड़ा सुन्दर दृश्य होता है । मूर्ति को बाहर निकालते समय मन्दिर के सेवक उनके समक्ष आय-व्यय का पूरा ब्योरा रखते हैं। भाव यह है कि भगवत्-मूर्ति को

सारे संस्थान का अधिपति समझा जाता है और सब पुजारी और संचालक उनके सेवक माने जाते हैं। अतिपुरातन होने पर भी यह प्रथा अद्यावधि चल रही है। अतः यहाँ कहा गया है कि श्रीमूर्र्ति की शोभायात्रा का अनुव्रजन करे) ८. भक्त को प्रातः और सांयकाल दिन में कम से कम दो बार विष्णुमन्दिर अवश्य जाना चाहिए। (वृन्दावन में इस पद्धति का पालन बड़ी दृढ़ता से किया जाता है। सभी भक्त प्रातः-सायं विविध मन्दिरों में दर्शनों के लिए जाते हैं। इसलिए दोनों समय मन्दिरों में बहुत भीड़ हो जाती है। वृन्दावन में लगभग ५००० मन्दिर हैं। अवश्य ही सब मन्दिरों में नहीं जाया जा सकता; परन्तु ऐसे प्रायः बारह मन्दिर हैं, जिन्हें गोस्वामियों ने स्थापित किया था। उनमें अवश्य जाना चाहिए) ६. मन्दिर की कम से कम तीन बार परिक्रमा करे (प्रत्येक मन्दिर में परिक्रमा का मार्ग रहता है। भक्त अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार दस-पन्द्रह या अधिक परिक्रमा करते हैं। गोस्वामीगण गोवर्धन पर्वत की प्रदक्षिणा करते थे) सम्पूर्ण वृन्दावन धाम की परिक्रमा भी करनी चाहिए; १०. मन्दिर में मूर्ति की विधि से अर्चना करनी चाहिए (आरति, भोग, शृंगार आदि का नियम-पालन); ११. अर्चाविग्रह की परिचर्या (सेवा); १२. गाना; १३. संकीर्तन, १४. जप; १५. प्रार्थना; १६. स्तवपाठ; १७ महाप्रसाद का आस्वादन करना; १८. चरणामृतपान; १६. मूर्ति को अर्पित धूप और पुष्प की सुगन्ध को ग्रहण करना; २०. श्रीमूर्र्ति के चरणकमलों का स्पर्श करना; २१. भक्तिभाव से श्रीमूर्र्तिदर्शन करना; २२. समय-समय पर आरति करना; २३. श्रीमद्भागवत, गीता, आदि ग्रन्थों से भगवत्कथा सुनना, २४. श्रीमूर्र्ति से कृपा की याचना करना; २५. श्रीमूर्र्ति का स्मरण करना; २६. श्रीमूर्र्ति का ध्यान करना; २७, सेवा करना; २८. श्रीभगवान् के साथ सखाभाव; २६. सर्वस्व अर्पण कर देना; ३०. अपने प्रिय भोजन, वस्त्र आदि का भगवान् को अर्पण; ३१. श्रीकृष्ण के लिए सम्पूर्ण चेष्टा करना, सब संकट सहना; ३२. सब अवस्थाओं में पूर्ण रूप से भगवान् के शरणागत रहना; ३३. तुलसी को जल में सींचना; ३४. श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों को नियमित रूप से सुनना; ३५. मथुरा, वृन्दावन, द्वारका आदि धामों में वास; ३६. वैष्णवों की सेवा करना, ३७. वैभव के अनुसार भक्तियोग करना; ३८ कार्तिक आदि में विशेष सेवा का आयोजन; ३६. जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन करना; ४०. विशेष श्रद्धा और भक्ति से श्रीमूर्र्ति के चरणकमलों की सेवा करना; ४१. केवल रसिकों के साथ श्रीमद्भागवत का आस्वादन करना; ४२. अपने से उत्तम

५२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सजातीय भक्तों का सत्संग करना; ४३. कृष्णनाम का कीर्तन करना; ४४. मथुरामण्डल में रहना । इस प्रकार ये सब सम्मिलित रूप से चौंसठ अंग हैं। जैसे कहा गया है, पहले दस विधान भक्ति में प्रारम्भिक हैं । इसके बाद दस और अंग हैं; चौवालिस अतिरिक्त अंग हैं। अस्तु, साधनविधिभक्ति के कुल चौंसठ साधन हैं। इनमें से अर्चन, श्रीमद्भागवत-श्रवण, भक्तों का सत्संग, नाम- संकीर्तन तथा मथुरावास—ये पाँच प्रधान हैं। भक्ति के उपरोक्त चौंसठ साधनों में कायिक, वाचिक और मानसिक—सब क्रियायें आ जाती हैं। पूर्वकथन के अनुसार यह भक्ति की विधि है कि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भगवत्सेवा के परायण हों। यह कैसे किया जाय, इसके प्रकार का निरूपण इन चौंसठ साधनों में है। इसके बाद श्रील रूप गोस्वामी नाना शास्त्रों से इनमें से कतिपय साधनों के प्रमाण प्रस्तुत करेंगे ।

अध्याय ७ भक्ति के अंगों के प्रमाण सद्गुरु-पादाश्रय श्रीमद्भागवत (११.३.२१) में प्रबुद्ध महाराज निमि से कहते हैं, "हे राजन् ! निश्चित जानो कि प्राकृत-जगत् में लेशमात्र भी सुख नहीं है। इस दुःखमय स्थान में सुख की प्रतीति भ्रममात्र है। यथार्थ सुख का जिज्ञासु सद्गुरु को ढूंढे और दीक्षा के द्वारा उनका आश्रय ले। गुरु वही बनने योग्य है, जो स्वयं युक्ति और विमर्श द्वारा शास्त्रों के सिद्धान्तों में निष्णात् हो और दूसरों को भी इन सिद्धान्तों में निष्ठ कर सके। जो सम्पूर्ण सांसारिक कामनाओं का त्याग कर भगवान् के शरणागत हो गए हैं, वे महापुरुष ही सद्गुरु हैं। मनुष्यजीवन परमानन्द की प्राप्ति के लिए है। अतः सभी को सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए।" तात्पर्य यह है कि ऐसे व्यक्ति को गुरु न बनाए जो महामूर्ख हो, जिसे शास्त्र की आज्ञा का ज्ञान न हो, जिसका चरित्र संदिग्ध हो, जो भक्ति की विधि को न मानता हो, अथवा जिसने छः इन्द्रियतृप्ति के साधनों को जीत न लिया हो। ये छः साधन हैं: जिह्वा, उपस्थ, उदर, क्रोध, मान और वाणी। जिसने इन छहों को वश में करने का अभ्यास किया है, वह सम्पूर्ण जगत् में शिष्य बना सकता है। ऐसे गुरु का आश्रय आध्यात्मिक जीवन में सम्पूर्ण उन्नति का आधार है। सद्गुरु के आश्रय में आने वाला भाग्यवान् निश्चित रूप से भवबन्धन से मुक्त हो जाता है। गुरु से कृष्णदीक्षा तथा भक्ति का उपदेश ग्रहण प्रबुद्ध मुनि ने राजा से आगे कहा, "हे राजन् ! शिष्य गुरु को केवल गुरु ही नहीं समझे; वरन् उन्हें श्रीभगवान् और परमात्मा का रूप समझना चाहिए। भाव यह है कि शिष्य गुरु को भगवान् का रूप समझे, क्योंकि वे श्रीकृष्ण के बाह्य प्रकाश हैं।" सभी शास्त्रों से यह प्रमाणित है कि शिष्य गुरु को इसी रूप में माने। गुरुदेव के लिए पूर्ण श्रद्धा और

५४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु

आदरभाव के साथ श्रीमद्भागवत का गम्भीर अध्ययन करना चाहिए । श्रीमद्भागवत का श्रवण-कीर्तन वह धर्मपथ है, जिससे साधक भगवत्सेवा और भगवत्प्रेम तक उन्नति करता है ।” शिष्य का भाव सदा यही होना चाहिए कि गुरुदेव प्रसन्न हों । तब उसके लिए आत्मविद्या बड़ी सुगम हो जायगी । वेदों में इसका समर्थन है और रूप गोस्वामी आगे बतायेंगे कि भगवान् और गुरु में अनन्य श्रद्धालु के लिए सम्पूर्ण तत्त्व अपने-आप स्फुरित हो जाता है । श्रद्धा-विश्वास सहित गुरुसेवा गुरु से दीक्षा ग्रहण करने के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (११.१७.२७) में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, “हे उद्धव ! गुरु को मेरा रूप ही नहीं, वरन् मेरा आत्मा ही समझना चाहिए । उन्हें साधारण मनुष्य कभी न समझे । साधारण मनुष्य के जैसे गुरु से कभी द्वेष न करे। उन्हें सदा श्रीभगवान् का प्रतिनिधि मानना चाहिए । गुरु की सेवा करने से सारे देवताओं की सेवा सम्पन्न हो जाती है ।” साधुपुरुषों के चरणचिह्नों का अनुगमन ‘स्कन्दपुराण’ में आदेश है कि भक्त को पूर्ववर्ती आचार्यों एवं साधु- पुरुषों का अनुगमन करना चाहिए । इससे शोक और असफलता पास नहीं फटक सकती तथा अभीष्ट श्रेयसिद्धि हो जाती है । ‘ब्रह्मयामलशास्त्र’ में कहा गया है, “यदि कोई शास्त्रों की विधि को माने बिना ही बड़ा भक्त बनता है तो उसकी इन क्रियाओं से भक्ति सिद्ध नहीं होगी; वह भक्ति के यथार्थ साधकों के मार्ग में उत्पात ही खड़ा करेगा ।” शास्त्रविधि पर दृढ़ता से न चलने वालों को प्रायः सहजिया कहा जाता है; वे समझते हैं कि सब कुछ सहज ही हो जाता है । अपनी मनमानी विचारधारा के कारण वे शास्त्रविधि को नहीं मानते । ऐसे व्यक्ति भक्तिसाधन के मार्ग में केवल उत्पातकारी हैं । इस संदर्भ में शास्त्र को न मानने वाले अभक्त एक तर्क कर सकते हैं। इसका एक उदाहरण बौद्धदर्शन है । भगवान् बुद्ध का आविर्भाव उच्च क्षत्रिय राजकुल में हुआ था; परन्तु उनका दर्शन वैदिक सिद्धान्त के अनुकूल नहीं था, इसलिए उसे त्याग दिया गया । हिन्दू महाराज अशोक के संरक्षण में बौद्धमत सम्पूर्ण भारत और निकटवर्ती प्रदेशों में अवश्य फैल गया था । परन्तु महान् आचार्य शंकर का आविर्भाव होने के बाद यह बौद्धमत भारत की सीमा से बाहर खदेड़ दिया गया ।

भक्ति के अंगों के प्रमाण [ ५५ शास्त्र की अवज्ञा करनेवाले बौद्ध एवं अन्य मतावलम्बी प्रायः कहते हैं कि भगवान् बुद्ध के ऐसे कितने ही भक्त हैं जो उनकी सेवा के परायण हैं; अतः उन्हें भी भक्त समझा जाना चाहिए। इस तर्क के उत्तर में रूप गोस्वामी कहते हैं कि बौद्धों को भक्त नहीं माना जा सकता। यद्यपि भगवान् बुद्ध श्रीकृष्ण के अवतार मान्य हैं, परन्तु ऐसे अवतारों के अनुयायी वैदिकज्ञान में अधिक उन्नत नहीं होते । वेदाध्ययन का अर्थ श्रीभगवान् परमेश्वर हैं—इस निश्चय पर पहुँचना है। इसलिए जो मत श्रीभगवान् के परमेश्वरत्व का निराकरण करे, वह त्याज्य है, क्योंकि वह नास्तिकवाद है। वेदों के प्रमाण की अवज्ञा और जनसाधारण के कल्याण हेतु वैदिकशास्त्र की शिक्षा देने वाले महान् आचार्यों की निन्दा करना नास्तिकवाद ही है। श्रीमद्भागवत ने भगवान् बुद्ध को श्रीकृष्ण का अवतार माना है, परन्तु उसी भागवत में उल्लेख है कि भगवान् बुद्ध नास्तिक मनुष्यों को मोहित करने के लिए अवतरित हुए थे। अतः उनका दर्शन नास्तिकों के मोहन के लिए ही है, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोई जिज्ञासा कर सकता है, "श्रीकृष्ण नास्तिकवाद क्यों फैलायेंगे ?" इसका उत्तर यह है कि श्रीभगवान् की इच्छा थी कि वेदों के नाम पर उस समय चल रही हिंसा को रोका जाय । धर्मध्वजी लोग मांसाहार जैसी हिंसक क्रियाओं के लिए वेदों का दुरुपयोग कर रहे थे। ऐसे समय में पतित लोगों को वेदों की ऐसी भ्रान्त व्याख्या से बचाने के लिए भगवान् बुद्ध आए। भगवान् बुद्ध ने नास्तिकों के लिए नास्तिकवाद का उपदेश इसलिए किया, जिससे वे उनका अनुगमन करें और इस प्रकार युक्ति से उनकी, अर्थात् श्रीकृष्ण की भक्ति के परायण हो जायें । सद्धर्म की जिज्ञासा 'नारदीयपुराण' में कहा है, "जो भक्ति का यथार्थ अभिलाषी है, उसके सर्वाभीष्ट तत्काल सिद्ध हो जाते हैं।" श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए सर्वस्वत्याग 'पद्मपुराण' में उल्लेख है, "जिसने प्राकृत इन्द्रियतृप्ति को त्याग कर भक्ति के सिद्धान्तों को अंगीकार कर लिया है, विष्णुलोक का ऐश्वर्य उसकी प्रतीक्षा में है।" तीर्थवास 'स्कन्दपुराण' में कथन है कि जो एक वर्ष, छः मास, एक मास

५६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अथवा एक पक्ष के लिए भी द्वारका में निवास करता है, उसका वरण करने के लिए वैकुण्ठ धाम और सारूप्य मोक्ष आतुर रहते हैं।" 'ब्रह्मपुराण' के अनुसार, "अहो ! भगवान् जगन्नाथ के दस योजन व्यापी पुरुषोत्तम क्षेत्र का माहात्म्य मन-वाणी के अगोचर कैसा अद्भुत है ! स्वर्गीय देवता भी यहाँ के निवासियों को चतुर्भुज देखते हैं। नैमिषारण्य के ऋषिसत्र में सूत गोस्वामी श्रीमद्भागवत की कथा कह रहे थे। वहाँ गंगा का माहात्म्य इस प्रकार है, "गंगा का जल भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में अर्पित तुलसी की सौरभ से मिश्रित रहता है। यह गंगाजल निरन्तर श्रीकृष्ण की पावन कीर्ति प्रचारित कर रहा है। जहाँ-जहाँ यह प्रवाहित होता है, वहाँ सब कुछ बाहर-भीतर से शुद्ध हो जाता है।" अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक कुछ भी ग्रहण न करना) 'नारदीयपुराण' में आदेश है, “भक्ति-साधन के यथार्थ अभिलाषी को जितने अर्थ में निर्वाह हो जाय, उतना ही ग्रहण करना चाहिए।" तात्पर्य यह है कि भक्ति के विधान की उपेक्षा न करे और न ही उन विधानों को ग्रहण करे, जिनका सुगमता से पालन करने की सामर्थ्य न हो। उदाहरणार्थ, जैसे कोई कहे कि हरेकृष्ण महामन्त्र का कम से कम १,००,००० बार प्रति- दिन जप करना चाहिए। परन्तु यदि यह सम्भव न हो तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार कम जप करे। सामान्यतः हम अपने शिष्यों को प्रतिदिन कम से कम सोलह माला का जप करने को कहते हैं। यह अवश्य करना चाहिए। यदि किसी दिन सोलह माला भी पूरी न हों अगले दिन पूरी करनी चाहिए। इस व्रत के पालन में सावधान रहे। यदि कोई दृढ़ता के साथ ऐसा नहीं करता तो वह प्रमाद का दोषी होगा। भगवत्सेवा के मार्ग में यह बड़ा अपराध है। यदि हम अपराधों को प्रोत्साहन देंगे तो भक्तिपथ पर अग्रसर नहीं हो सकेंगे। अच्छा होगा यदि अपनी योग्यता के अनुसार नियम बना कर निरन्तर उसका पालन किया जाय। इससे परमार्थ में उन्नति होगी। एकादशी व्रतपालन 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में उल्लेख है कि एकादशी का उपवासी सब पापों से मुक्त होकर आत्यन्तिक पुण्य को प्राप्त करता है। मुख्य बात उपवास करना नहीं, भगवान् गोविन्द के लिए अपने श्रद्धा और प्रेम को बढ़ाना है। एकादशीव्रत का वास्तविक कारण यह है कि शारीरिक आवश्यकताओं

भक्ति के अंगों के प्रमाण [ ५७ को कम से कम करके अपने समय को भगवत्स्मरण जैसे सेवा कार्य में लगाया जा सके । व्रतवासरों पर गोविन्द की लीला का स्मरण और उनके पावन नाम का निरन्तर श्रवण करना सर्वोत्तम है । अश्वत्थ आदि वृक्षों का सम्मान 'स्कन्दपुराण' में निर्देश है कि भक्त को तुलसी और आमलक का जल से अभिसिंचन करना चाहिए । गौब्राह्मणों का सम्मान करके तथा पूजन, प्रणति और ध्यान के द्वारा वैष्णवसेवन करे । ये सब कर्म भक्त के पूर्व पापफलों के निवारण करने में सहायक हैं । श्रीकृष्णविमुखों के संग का त्याग श्रीचैतन्य महाप्रभु से एक बार उनके एक गृहस्थ भक्त ने पूछा था कि वैष्णव का सामान्य आचरण कैसा होना चाहिए । श्रीचैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया कि वैष्णव को अभक्तों के संग से सदा दूर रहना चाहिए । फिर उन्होंने समझाया कि अभक्त दो प्रकार के होते हैं, एक वे जो भगवान् श्रीकृष्ण के विरोधी हों और दूसरे घोर विषयी । भाव यह है कि इन्द्रिय- तृप्ति के अभिलाषी और भगवान् श्रीकृष्ण के विरोधी अवैष्णव हैं, उनका संग कभी नहीं करना चाहिए । 'कात्यायनसंहिता' में कहा है कि अग्नि की ज्वालाओं के मध्य में स्थित लोहे के पिंजड़े के भीतर रहना अच्छा है, पर श्रीकृष्णविमुखों का संग कभी न करे । इसी प्रकार 'विष्णुरहस्य' में कथन है कि विषयवासना से प्रेरित होकर नाना देवों की उपासना करने वालों का सहवास करने की अपेक्षा साँप, बाघ अथवा मगर का आलिंगन अच्छा है । शास्त्रों में भिन्न-भिन्न प्राकृत अभिलाषाओं के लिए नाना देवताओं की उपासना का विधान है । उदाहरणार्थ रोगनिवृत्ति के लिए सूर्य की उपासना कही गयी है; सुन्दर स्त्री के लिए पार्वती की और विद्या के लिए सरस्वती की आराधना करनी चाहिए । इस प्रकार श्रीमद्भागवत में नाना प्राकृत कामनाओं के लिए भिन्न-भिन्न देवों की उपासना का उल्लेख है । ये उपासक चाहे देवों के अच्छे भक्त प्रतीत होते हैं, परन्तु इन्हें अभक्त ही समझा जाता है । ये भक्त नहीं हैं । मायावादी कहते हैं कि किसी भी रूप की उपासना की जा सकती है क्योंकि अन्त में एक ही लक्ष्य की, भगवान् की प्राप्ति हो जाती है । किन्तु भगवद्गीता में स्पष्ट कहा है कि देवोपासकों को अन्त में देवलोकों की

५८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु प्राप्ति होगी, जबकि भगवद्भक्त वैकुण्ठ-जगत् में प्रविष्ट हो जायेंगे। देवोपासकों की तो गीता में वस्तुतः निन्दा ही है। उल्लेख है कि कामनाओं ने उनकी बुद्धि हर ली है, इसीलिए वे नाना देवताओं के आराधन में प्रवृत्त होते हैं। ‘विष्णुरहस्य’ में यह कहकर इन देवोपासकों की घोर भर्त्सना है कि भयंकर जन्तुओं के साथ रहना अच्छा है, पर इनके साथ कभी न रहे। अयोग्य शिष्य न बनाना, बड़े मन्दिरों का निर्माण न करना तथा बहुत ग्रन्थ न पढ़ना एक अन्य नियम यह है कि अधिक शिष्य तो बनाए जा सकते हैं, परन्तु ऐसा कोई व्यवहार न करे जिससे किसी कार्य अथवा कृपादृष्टि के लिए किसी शिष्य के आधीन होना पड़े। नए मन्दिरों के निर्माण के लिए अधिक उद्यम नहीं करना चाहिए और न भक्तिवर्धक ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य पुस्तकों का अभ्यास ही करना चाहिए। वस्तुतः श्रीमद्- भगवद्गीता यथारूप, श्रीमद्भागवत, 'चैतन्य महाप्रभु का शिक्षामृत' तथा इस भक्तिरसामृतसिन्धु का गम्भीर अध्ययन करने से कृष्णभावना की विद्या का पर्याप्त ज्ञान हो सकता है। अन्य ग्रन्थों के पठन के आयास की आवश्यकता नहीं रहती। श्रीमद्भागवत (७.१३.३) में नारद मुनि ने महाराज युधिष्ठिर से नाना वर्ण-आश्रमों के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए विशेषतः संन्यास के नियमों का उल्लेख किया है। संन्यासी को अयोग्य व्यक्ति को शिष्य नहीं बनाना चाहिए। उसे पहले यह देखना चाहिए कि शिष्य बनने का अभिलाषी कृष्णभावना का यथार्थ जिज्ञासु भी है या नहीं, यदि नहीं, तो उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। परन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभु की अहैतुकी करुणा इतनी अगाध है कि उन्होंने सब सद्गुरुओं को सभी देशकाल में कृष्णभावना का प्रचार करने की आज्ञा दी है। अतः श्रीचैतन्य महाप्रभु की परम्परा में संन्यासी भी कृष्णभावना पर सर्वत्र उपदेश कर सकते हैं और यदि कोई यथार्थ में शिष्य बनना चाहे तो उसे स्वीकार किया जा सकता है। इसका कारण है—शिष्यों की संख्या बढ़ाए बिना कृष्णभावनामृत का व्यापक प्रसार नहीं हो सकता। अतः कभी-कभी संकट उठाकर भी भगवान् चैतन्य महाप्रभु की परम्परा का संन्यासी पूर्ण योग्य न होने पर भी किसी व्यक्ति को शिष्य बना सकता है। बाद में सद्गुरु की कृपा से शिष्य शनैः-शनैः उन्नति कर लेता है। परन्तु यदि कोई केवल मिथ्या सम्मान

भक्ति के अंगों के प्रमाण [ ५६ के लिए या अभिमानवश अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाये तो वह निश्चित रूप से कृष्णभावना के पथ से गिर जायगा। विद्वत्ता दिखाने के लिये अधिक ग्रन्थों के अध्ययन स अथवा नाना स्थानों पर व्याख्यान देकर कीर्ति अर्जित करने से भी सद्गुरु को कोई प्रयोजन नहीं होता। इन सब दोषों से बचना चाहिए। यह भी उल्लेख है कि नए मन्दिर बनाने का अधिक उत्साह न रखे। श्रीचैतन्य महाप्रभु की परम्परा के सभी आचार्यों से जीवन में हम देखते हैं कि वे मन्दिर-निर्माण में अधिक उत्साह नहीं रखते। परन्तु यदि कोई कुछ सेवा करना चाहे तो ये संकोची आचार्य उस सेवक को बहुव्यय साध्य मन्दिरों के निर्माण की अनुमति दे देंगे। मुगल सम्राट् अकबर का सेनाधिपति मानसिंह रूप गोस्वामी की सेवा करना चाहता था। अतः रूपगोस्वामी ने बड़ी लागत से विशाल गोविन्ददेव के मन्दिर का निर्माण करने की आज्ञा दे दी। अस्तु, सद्गुरु को मन्दिर निर्माण का दायित्व स्वयं नहीं उठाना चाहिए; परन्तु यदि किसी के पास धन हो, जिसे वह भगवत्सेवा में व्यय करना चाहे तो रूप गोस्वामी जैसे आचार्य उस धन को भगवान् की सेवा के लिए बड़ा-सा सुन्दर मन्दिर बनाने में लगा सकते हैं। दुर्भाग्यवश कभी- कभी गुरुपद के अयोग्य व्यक्ति भी धनाढ्य पुरुषों से मन्दिर-निर्माण के लिए धन माँगते हैं। यदि अयोग्य गुरु ऐसे धन का प्रयोग वास्तविक प्रचार- कार्य किए बिना केवल बड़े-बड़े मन्दिरों में सुख से रहने में करे तो यह शास्त्रविरुद्ध होगा। भाव यह है कि नाममात्र के परमार्थ के लिए सद्गुरु मन्दिर-निर्माण में अधिक रुचि न दिखाये। उसका पहला और प्रधान कर्तव्य प्रचार करना है। इस सन्दर्भ में श्रील भक्तिसिद्धान्त गोस्वामी महाराज कहा करते थे कि गुरु ग्रन्थों का प्रकाशन करे। उपलब्ध धन से महँगे मन्दिर बनाने की अपेक्षा कृष्णभावना आन्दोलन के प्रसार के लिए नाना भाषाओं में प्रामाणिक ग्रन्थ छापने चाहियें। व्यवहार में निष्कपटता तथा हानि-लाभ में समता 'पद्मपुराण' में एक वाक्य है, “कृष्णभावना-परायण पुरुषों को प्राकृत हानि-लाभ से चिन्तित नहीं होना चाहिए। हानि में भी स्थिरबुद्धि के साथ अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण करे।” बद्धजीव प्राकृत क्रियाओं के चिन्तन में डूबा रहता है। उसे इन विचारों से मुक्त होकर कृष्णभावनाभावित हो जाना है। पूर्ववर्णन के अनुसार, निरन्तर कृष्ण-

६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु स्मरण कृष्णभावना का प्रधान सिद्धान्त है । प्राकृत हानि से उद्वेलित न हो, वरन् भगवान् के चरणकमलों में मन को निवेशित किए रहे । भक्त को शोक और मोह के वशीभूत नहीं होना चाहिए । 'पद्म- पुराण' में कहा है, "जिसका चित्त शोक अथवा क्रोध से आक्रान्त है, उसमें श्रीकृष्ण के स्फुरण की सम्भावना कैसे हो सकती है ?" देवता भक्त देवताओं का अपमान न करे । देवभक्त न होने का यह अर्थ नहीं कि उनका सम्मान ही न किया जाय । वैष्णव शिव अथवा ब्रह्मा का भक्त नहीं होता, परन्तु ऐसे सभी उच्च देवों को प्रणाम करना उसका कर्तव्य है । वैष्णवदर्शन के अनुसार चींटि तक को प्रणाम करना चाहिए, फिर शिव-ब्रह्मा जैसे महापुरुषों के सम्बन्ध में तो क्या कहना है । पद्मपुराण का वाक्य है, "सब देवताओं के ईश्वर के भी ईश्वर भगवान् श्रीकृष्ण की ही सदा आराधना करनी चाहिए; फिर भी ब्रह्मा, शिव आदि की अवज्ञा कभी न करे ।" किसी जीव को न सताना महाभारत का वाक्य है, "कृपामय पिता जैसे पुत्र को नहीं सताता है, इस प्रकार जो किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाता है, उस शुद्ध अन्तः- करण पुरुष पर भगवान् बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं।" आज के तथाकथित सभ्य समाज में पशुपीड़न का विरोध होता है; परन्तु साथ में नियमित वधशालायें भी चलती रहती हैं । वैष्णव को यह अच्छा नहीं लगता । वैष्णव पशुवध का समर्थन नहीं कर सकता और न कभी किसी प्राणी को सता सकता है ।

अध्याय ८ वर्जनीय अपराध वैदिक शास्त्रों में ऐसे ३२ नियमों का उल्लेख है, जिनका पालन न करने से भगवत्सेवा-अपराध बनते हैं : १. भगवान् के मन्दिर में वाहन पर बैठे हुए अथवा जूते पहने-पहने प्रवेश नहीं करना चाहिए; २. भगवान् की प्रसन्नता के लिए जन्माष्टमी, रथयात्रा, आदि महोत्सवों को अवश्य मनाना; ३. भगवत्-मूर्ति के आगे दण्डवत् प्रणाम करने में प्रमाद न करना; ४. भोजन के बाद हाथ-पैर धोये बिना मन्दिर में प्रवेश न करना; ५. दूषित अवस्था में मन्दिर-प्रवेश न करना (वैदिक शास्त्र के अनुसार परिवार में किसी की मृत्यु हों जाने पर सम्पूर्ण कुल कुछ काल के लिए दूषित हो जाता है । ब्राह्मणकुल के लिए दूषितकाल १२ दिन रहता है, क्षत्रियों और वैश्यों के लिए १५ दिन और शूद्रों के लिए ३० दिन); ६. एक हाथ से दण्डवत् प्रणाम न करना; ७. श्रीकृष्ण के आगे परिक्रमा न करना (मन्दिर की परिक्रमा की विधि यह है कि श्रीमूरित की दक्षिण दिशा से प्रदक्षिणा करे। मन्दिर के बाहर प्रतिदिन तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए); ८. मूर्ति के आगे पैर न फैलाए; ६. मूर्ति के सम्मुख उकड़वां नहीं बैठना चाहिए; १०. श्रीकृष्ण मूर्ति के आगे लेटे नहीं; ११. मूर्ति के आगे प्रसाद न खाय; १२. मूर्ति के आगे झूठ न बोले; १३. मूर्ति के समक्ष जोर से न बोले; १४. मूर्ति के आगे बात न करे १५. मूर्ति के आगे रुदन अथवा चीत्कार न करे; १६. मूर्ति के सम्मुख लड़ाई-झगड़ा न करे; १७. मूर्ति के आगे किसी को डाँटे नहीं; १८. मूर्ति के आगे भिक्षु को दान न दे; १६. मूर्ति के आगे किसी से कठोर वचन न कहे; २०. मूर्ति के आगे चर्म धारण न करे; २१. मूर्ति के सांनिध्य में किसी अन्य की स्तुति न करे; २२. मूर्ति के निकट कोई अपशब्द न कहे; २३. मूर्ति के निकट अधोवायु न छोड़े; २४. वैभव के अनुसार मूर्ति की अर्चना में प्रमाद न करे (भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि वे भक्त द्वारा समर्पित जल या पत्ते से भी संतुष्ट हो जाते हैं। भगवान् ने यह

६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु

सार्वभौम विधान किया है; परम अकिंचन मनुष्य भी इसका पालन कर सकता है । परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वैभवपूर्ण अर्चन करने में समर्थ पुरुष भी भगवान् को केवल जल और पत्र-पुष्प से तुष्ट करे। वैभव के अनुसार सुन्दर आभूषणों, पुष्पों, नैवेद्यों का अर्पण करना चाहिए। ऐसा नहीं कि भगवान् को तो जल और पत्र-पुष्प से प्रसन्न करे और सारे धन का अपनी इन्द्रियतृप्ति में व्यय करे); २५. श्रीकृष्ण को अर्पण किए बिना कुछ न खाय; २६. ऋतु के फल और अन्न का श्रीकृष्ण को निवेदन करना न भूले; २७. भोजन का भोग लगाने से पूर्व किसी को भी न खिलाये; २८. मूर्ति की ओर पीठ न करे; २६. गुरु को प्रणाम चुपचाप न करे, अर्थात् प्रणाम करते हुए गुरु-प्रणति का उच्च स्वर से पाठ करे; ३०. गुरु के सांनिध्य में स्तवपाठ करना न भूले; ३१. गुरु के आगे आत्मप्रशंसा न करे; ३२. मूर्ति के समक्ष देवनिन्दा न करे । यह ३२ अपराधों की सूची है इनके अतिरिक्त 'वराहपुराण' में कुछ अन्य अपराधों का उल्लेख है : १. अन्धकार में मूर्ति का स्पर्श न करे; २. मूर्ति-अर्चन के विधि-विधान के दृढ़ पालन में प्रमाद न करे; ३. ध्वनि किए बिना मन्दिर में प्रविष्ट न हो; ४. कुत्ते आदि अधम पशुओं की दृष्टि से दूषित पदार्थ भगवान् को अर्पित न करे; ५. आराधना के काल में मौनभंग न करे; ६. पूजन करते हुए मूत्रपुरीषोत्सर्ग न करे; ७. पुष्प का अर्पण किए बिना धूप न दिखाना; ८. गन्धरहित पुष्पों को अर्पित न करना; ६. प्रतिदिन अच्छी प्रकार से दन्तधावन करना; १०. मैथुन के बाद तत्काल मन्दिर में प्रवेश न करना; ११. रजस्वला स्त्री का स्पर्श न करना; १२. मृतदेह का स्पर्श करके मन्दिर में प्रवेश न करना; १३. लाल, नीले, अस्वच्छ वस्त्रों को धारण किए हुए मन्दिर में न जाना; १४, मृतदेह का दर्शन करके मन्दिर में न जाना; १५. मन्दिर में अधोवायु न छोड़ना; १६. मन्दिर में क्रोध न करना; १७. श्मशान जाकर मन्दिर में न जाना; १८. मूर्ति के आगे डकार न लेना। जब तक भोजन का पूर्ण पाचन न हो गया हो, मन्दिर में प्रवेश न करे; १६. चरस, गांजा का प्रयोग न करे; २०. अफीम आदि मद्य पदार्थों का सेवन न करे; २१. शरीर पर तेल लगाकर मन्दिर में प्रवेश अथवा मूर्ति का स्पर्श न करे। २२. भगवान् परम ईश्वर हैं— ऐसा प्रतिपादन करने वाले किसी भी शास्त्र का अपमान न करे; २३. किसी विरोधी शास्त्र का प्रवर्तन न करे; २४. मूर्ति के आगे पान न चबाए; २५. अशुद्ध पात्र में रखे पुष्प को न चढ़ाये; २६. आसन के बिना भूमि पर बैठ कर भगवत्-अर्चन न करे; २७. स्नान पूरा करने से पूर्व मूर्ति का स्पर्श

वर्जनीय अपराध | ६३ न करे; २८. मस्तक पर तीन रेखा का तिलक न लगाये; २६. हाथ-पैर धोये बिना मन्दिर में प्रवेश न करे। अन्य नियम इस प्रकार हैं—अवैष्णव द्वारा बनाए भोजन का अर्पण न करे; अभक्त के सामने मूर्ति-अर्चन न करे तथा प्रारम्भ में गणपति की उपासना करे, जिससे भक्ति के मार्ग में आनेवाले सब विघ्न दूर हो जाते हैं। 'ब्रह्मसंहिता' में उल्लेख है कि गणपति भगवान् नृसिंह के चरणकमलों के आराधक हैं। इसीलिए सम्पूर्ण अंतरायों को दूर करने में वे भक्तों के लिए मंगलकारी हो गए हैं। अतः सभी भक्तों को गणपति की पूजा करनी चाहिए। नखों अथवा उंगलियों के स्पर्श से दूषित जल में मूर्ति को स्नान नहीं कराना चाहिए। स्वेद-स्राव के समय भक्त अर्चन न करे। ऐसे अन्य अनेक निषेध हैं, जैसे मूर्ति को अर्पित पुष्पों का चरणों द्वारा उल्लंघन अथवा मर्दन न करे, भगवन्नाम की शपथ न खाये, इत्यादि। भक्तियोग के साधन में इन सब अपराधों से सावधानीपूर्वक बचना चाहिए। 'पद्मपुराण' में कहा है कि जीवनभर पाप करने वाले की भी भगवान् रक्षा करेंगे, यदि वह केवल उनके शरणागत हो जाय। अस्तु, सिद्ध होता है कि भगवान् का शरणागत मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। यदि कोई स्वयं भगवान् का भी अपराध कर बैठे, तो 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे'—इस महामंत्र का आश्रय लेने पर उसका भी उद्धार हो सकता है। अर्थात् हरेकृष्ण महामन्त्र का जप सब पापों को नष्ट कर देता है। परन्तु यदि कोई पवित्र भगवन्नाम का अपराधी बन जाय, तो उद्धार नहीं हो सकता। नाम-अपराध ये हैं: १. भगवन्नाम के प्रचार में जीवन का समर्पण करने वाले महाभागवतों की निन्दा करना; २. शिव, ब्रह्मा, आदि देवों के नाम को भगवन्नाम के समान अथवा उससे स्वतन्त्र समझना (कभी-कभी अनीश्वरवादी लोग यह मान बैठते हैं कि कोई भी देवता भगवान् विष्णु के समान हो सकता है। परन्तु यथार्थ भक्त जानता है कि बड़े से बड़ा देवता भी भगवान् विष्णु के समान अथवा उनसे स्वतन्त्र नहीं हो सकता। इसलिए यदि कोई समझे कि दुर्गा-दुर्गा अथवा काली-काली कहना हरेकृष्ण कहने के समान है, तो यह सबसे बड़ा अपराध होगा); ३. गुरु की अवज्ञा; ४. वैदिक शास्त्रों अथवा प्रमाणों का खण्डन; ५. हरेकृष्ण महामन्त्र के जप की महिमा को काल्पनिक समझना; ६. भगवन्नाम में अर्थवाद का आरोप; ७. नाम के बल पर पाप करना (भगवन्नाम-जप से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं—इससे यह नहीं समझना चाहिए कि पहले पाप कर लूँ और