भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
२४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु है। यह 'विकर्म' का फल है। 'विकर्म' उस कर्म को कहते हैं, जिसे नहीं करना चाहिए। इसके उपचाररूप में साधनभक्ति का आचरण करना है। इस अभ्यास के मुख्य अंग ये हैं—प्रातः काल मंगल-आरती (अर्चन) करना, कुछ प्राकृत क्रियाओं से बचना, गुरुवन्दन आदि। अन्य बहुत से विधि- विधानों का पालन भी करना है, जिनका वर्णन आगे क्रमानुसार किया जायगा। इन साधनों से उन्माद दूर करने में सहायता मिलेगी। वैद्य मनुष्य के मस्तिष्करोग को दूर करता है और यह साधनभक्ति माया के कारण बद्धजीव की उन्मत्तता को मिटा देती है। नारद मुनि ने इस साधनभक्ति का उल्लेख श्रीमद्भागवत (७.१.३२) में किया है। वे महाराज युधिष्ठिर से कहते हैं, "हे राजन् ! जिस किसी उपाय से मन को श्रीकृष्ण में लगाना है।" इसी का नाम कृष्णभावनामृत है। आचार्य का कर्तव्य है कि ऐसे उपाय करें जिससे शिष्य का चित्त श्रीकृष्ण में एकाग्र हो जाय। यही साधनभक्ति का उपक्रम है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस उद्देश्य से हमें एक प्रामाणिक कार्यक्रम दिया है, जो हरे कृष्ण मन्त्र के कीर्तन पर आधारित है। यह कीर्तन इतना दिव्य शक्तिसम्पन्न है कि इसके साधन से श्रीकृष्ण में तत्काल आसक्ति हो जाती है। इससे 'साधनभक्ति' का सूत्रपात होता है। जिस किसी प्रकार मन को श्रीकृष्ण में निवेशित करना है। सन्तप्रवर अम्बरीष महाराज ने राज्य का दायित्व होते हुए भी अपने मन को श्रीकृष्ण में लगा रखा था। इस प्रकार जो कोई अपने मन को एकाग्र करने का साधन करेगा, वह अपनी स्वरूपभूत कृष्णभावना का पुनर्जागरण करने में बहुत शीघ्र सफल होगा। इस साधनभक्ति का भी दो भागों में वर्गीकरण किया जा सकता है। पहली, 'वैधी' नामक साधनभक्ति में गुरु-आज्ञा अथवा शास्त्रप्रमाण के आधार पर विविध विधानों का पालन करना अनिवार्य है। इसमें तर्क अथवा प्रमाद का प्रश्न ही नहीं बनता, विधि का पालन आवश्यक कर्तव्य है। दूसरी, 'रागानुगा' साधनभक्ति की प्राप्ति तब होती है जब साधक विधि का पालन करता हुआ श्रीकृष्ण में अधिक अनुरक्त हो जाता है और सहज प्रेमवश भक्ति करने लगता है। जैसे किसी साधक-भक्त को प्रातः काल मंगल आरती के समय उठने का आदेश दिया जाय। प्रारम्भ में वह गुरु-आज्ञा के अनुसार प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में उठकर आरती करता है, पर कालान्तर में उसका इस कार्य में यथार्थ अनुराग हो जाता है। इस आसक्ति का उदय होने पर वह स्वतः मूर्ति का शृंगार करने लगता है,
नाना प्रकार के वस्त्रालंकार बनाता है और भक्ति का सर्वांग सुन्दर आचरण करने के लिए अनेक संकल्प करता है। साधनभक्ति की श्रेणी में होते हुए भी यह प्रेममयी सेवा रागानुगा है। अस्तु, साधनभक्ति की वैधी और रागानुगा—दो श्रेणियां सिद्ध हुईं। रूप गोस्वामी ने 'वैधीभक्ति' की व्याख्या इस प्रकार की है : “जब राग अथवा रागानुगा भगवत्सेवा के बिना केवल और गुरु अथवा शास्त्र का आज्ञा के बल पर भगवत्सेवा में प्रवृत्ति होती है, उसे 'वैधीभक्ति' कहते हैं।” 'वैधीभक्ति' का श्रीमद्भागवत (२.१.५) में भी वर्णन है, जहाँ शुक- देव गोस्वामी मुमुर्षु महाराज परीक्षित का उनके योग्य आचरण का निर्देश किया है। महाराज परीक्षित की शुकदेव से भेंट मरने से केवल सात दिन पहले हुई। उस समय राजा अपने मरण-काल के कर्तव्य के विषय में बहुत चिन्तित थे। दूसरे-दूसरे कितने ही ऋषि वहाँ पधार चुके थे, पर कोई उन्हें उपयुक्त निर्देश नहीं दे सका। ऐसे में शुकदेव जी ने उन्हें आज्ञा दी— “हे राजन् ! यदि सात दिन बाद आने वाली भयावह मृत्यु का सामना तुम निर्भय होकर करना चाहते हो तो अविलम्ब भगवान् श्रीहरि का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करने लगो।” यदि कोई हरेकृष्ण महामन्त्र का श्रवण- कीर्तन करता हुआ भगवान् श्रीकृष्ण को निरन्तर स्मरण रखे तो मृत्यु कभी भी क्यों न आय, उसे कोई भय नहीं रहेगा। शुकदेव गोस्वामी के वाक्यों में कहा गया है कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं, अतः नित्य उन्हीं में कथा का श्रवण करना चाहिए। शुकदेवजी ने देवताओं का श्रवण-कीर्तन करने को नहीं कहा है। मायावादियों का मत है कि किसी भी नाम का कीर्तन किया जा सकता है; वह नाम चाहे श्रीकृष्ण का हो अथवा किसी देवता का, दोनों का एक परिणाम होगा। परन्तु वास्तव में यह सत्य नहीं है। श्रीमद्भागवत के प्रमाण के अनुसार, केवल भगवान् विष्णु (कृष्ण) का ही श्रवण-कीर्तन करना है। शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को परामर्श दिया है कि मृत्युभय की निवृत्ति के लिए सब प्रकार से निरन्तर भगवान् श्रीकृष्ण का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए। वे यह कहते हैं कि भगवान् 'सर्वात्मा' हैं, अर्थात् सबके परमात्मा हैं। श्रीकृष्ण को 'ईश्वर' भी कहा गया है; क्योंकि वे सबके अन्तर्यामी परम नियन्ता हैं। अतः यदि किसी प्रकार हम श्रीकृष्ण में आसक्त हो जायें तो वे हमें सब प्रकार के भय से मुक्त कर देंगे। भगवद्गीता में उल्लेख है कि भगवान् के भक्त का कभी नाश
२६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नहीं होता। पर दूसरों का अवश्य नाश होता है। नाश होता है, अर्थात् इस मनुष्ययोनी की प्राप्ति होने पर भी वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो पाते और इस प्रकार इस स्वर्ण अवसर को खो बैठते हैं। ऐसा व्यक्ति नहीं जानता कि प्रकृति के नियम उसे कहाँ फेंक रहे हैं। यदि कोई मनुष्य-योनि में अपनी कृष्णभावना को जागृत नहीं करता तो उसे ८४,००,००० योनियों में जन्म-मृत्यु के चक्र में फेंक दिया जायगा और उसका आत्मस्वरूप खोया रहेगा। जीव-योनियाँ अनेक हैं, कोई नहीं जानता कि वह आगे पौधा बनेगा, पशु अथवा, पक्षी या कुछ और। अपनी आद्यस्वरूपभूत कृष्णभावना को पुनः उद्भावित करने के लिए रूप गोस्वामी का परामर्श है कि किसी न किसी प्रकार हमें अपना मन दृढ़ता से श्रीकृष्ण में निवेशित कर देना चाहिए। ऐसा करके परिणाम में मृत्यु से निर्भय हो जायें। मरने के बाद हमारी गति क्या होगी, हमें पता नहीं, क्योंकि हम पूर्ण रूप से प्रकृति के नियमों के परवश हैं। एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण का प्रकृति पर नियन्त्रण है। इसलिए यदि हम निष्कपट भाव से श्रीकृष्ण का आश्रय ले लें तो नाना योनियों के चक्र में वापस फेंके जाने का भय न रहेगा। निष्छल भक्त निश्चित रूप से कृष्णलोक में प्रवेश करेगा, जैसा भगवद्गीता से प्रमाणित है। 'पद्मपुराण' में भी इसी पद्धति का विधान है। वहाँ कहा है कि निरन्तर भगवान् विष्णु का स्मरण करना चाहिए। श्रीकृष्ण के इस नित्य चिन्तन को 'ध्यान' कहते हैं। विधान है कि मन को विष्णु पर एकाग्र करके ध्यान करे। पद्मपुराण के अनुसार, ध्यान के द्वारा मन को श्रीविष्णु में निवेशित कर देना चाहिए, जिससे क्षणभर को भी उनका विस्मरण कभी न हो। चेतना की इसी अवस्था का नाम 'समाधि' है। अपने जीवन की क्रियाओं को इस प्रकार ढालने के लिए हमें सदा प्रयत्न करते रहना चाहिए, जिससे विष्णु (कृष्ण) का स्मरण निरन्तर रह सके। इसका नाम कृष्णभावनामृत है। ध्यान चाहे चतुर्भुज विष्णु का किया जाय, अथवा द्विभुज श्रीकृष्ण का, एक ही बात है। 'पद्मपुराण' कहता है कि जिस-किसी प्रकार सदा श्रीविष्णु का चिन्तन करे, किसी भी परिस्थिति में उनकी विस्मृति न हो। यह सम्पूर्ण विधानों में सबसे मूलभूत है। जब किसी कर्म का विधान किया जाता है, तो उसके साथ कुछ निषेध भी होते हैं। जब यह विधान किया गया है कि निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए तो यह निषेध भी समझना चाहिए कि उनकी
साधनभक्ति [२७ विस्मृति कभी न हो। इस सीधे से विधि-निषेध के अन्तर्गत सम्पूर्ण विधि- विधान आ जाते हैं। यह विधि ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- सब वर्ण-आश्रमों के लिए है। विधि-विधान केवल ब्रह्म- चारियों के लिए ही आचरणीय नहीं; वरन् सभी के लिए पालनीय हैं। इसमें यह नहीं देखा जाता कि कोई ब्रह्मचारी है या संन्यासी, उत्तम साधक है अथवा कनिष्ठ। श्रीभगवान् का निरन्तर स्मरण, एक क्षण के लिए भी उन्हें न भूलना- इस सिद्धान्त का अनुसरण सभी को अवश्य करना चाहिए। यदि इस विधान को माना जाये तो अन्य सब विधि-निषेधों का अपने-आप पालन हो जायगा, क्योंकि अन्य सब विधान इस प्रधान सिद्धान्त के सेवक हैं। विधि-विधान और उनके फल का श्रीमद्भागवत (११.५.२-३) में उल्लेख है। राजा निमि को उपदेश करने आए नौ योगेश्वरों में से चमस मुनि उन्हें सम्बोधित करते हुये कहते हैं, "हे राजन ! ब्राह्मण आदि चारों वर्ण श्रीभगवान् के विराट्रूप से प्रकट हुए । ब्राह्मण उनके मुख से, क्षत्रिय बाहु से, वैश्य उरु से और शूद्र चरणों से उत्पन्न हुए। इसी प्रकार संन्यासी मुख से, वानप्रस्थ बाहु से, गृहस्थ उरु से और ब्रह्मचारी चरणों से अलग- अलग उत्पन्न हुए।" इन वर्ण और आश्रमों का विभाजन गुणों के आधार पर है। भगवद्गीता में श्रीभगवान् स्वयं कहते हैं कि उन्होंने चार-चार वर्ण आश्रमों की रचना मनुष्यों के निजी गुणों के आधार पर की है। जैसे एक ही शरीर के अलग अलग अंगों के भिन्न-भिन्न कार्य होते हैं, वैसे ही गुण और स्थिति के अनुरूप वर्ण और आश्रमों के अपने-अपने कर्तव्यकर्म हैं। परन्तु इन सभी कर्मों के लक्ष्य श्रीभगवान् हैं। जैसा भगवद्गीता में आया है, वे परम भोक्ता हैं। अतः चाहे कोई संन्यासी हो या शूद्र, अपने कर्मों से भगवान् को प्रसन्न करता है। श्रीमद्भागवत में भी इसका प्रमाण है- "सब को अपने-अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। परन्तु कर्तव्य-कर्म की पूर्णता इसी में है कि इनसे भगवान् का सन्तोष हो।" इस प्रकार आज्ञा है कि अपने वर्ण-आश्रम के अनुसार कर्म करता हुआ अपनी क्रियाओं से भगवान् को प्रसन्न करे। जो ऐसा नहीं करता, वह अपनी स्थिति से नीचे अधम योनियों में गिर जायगा। उदाहरणार्थ, भगवान् के मुख से उत्पन्न ब्राह्मण का कर्तव्य 'शब्दब्रह्म' का प्रचार करना है। ब्राह्मण मुख है, इसलिए उसे शब्दब्रह्म को प्रसारित करना है और भगवान् के लिए भोजन भी करना है। वैदिक विधान है कि
[२८] भक्तिरसामृतसिन्धु
जब ब्राह्मण भोजन करे तो समझना चाहिए कि उसके माध्यम से भगवान् खा रहे हैं। परन्तु यह नहीं कि ब्राह्मण भगवान् के लिए खाने के नाम पर केवल भोजन करता रहे और विश्वभर में भगवद्गीता के सन्देश का प्रसारण न करे। वास्तव में गीता का प्रचारक भगवान् श्रीकृष्ण का बड़ा प्रिय है; इसका प्रमाण स्वयं गीता में विद्यमान है। ऐसा प्रचारक ही यथार्थ ब्राह्मण है और उसे भोजन कराने से साक्षात् श्रीभगवान् तृप्त होते हैं। इसी प्रकार, क्षत्रिय का कर्तव्य माया के आक्रमण से जनता की रक्षा करना है। महाराज परीक्षित ने जैसे ही यह देखा कि एक शूद्र वर्ण का व्यक्ति गोवध करने को उद्यत है, तो तत्काल उन्होंने उस दुष्ट कलि को मारने के लिए खड्ग उठा ली। यह क्षत्रिय का प्रधान कर्तव्य है। रक्षण के लिए हिंसा आवश्यक है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रत्यक्ष आज्ञा दी है कि जनसाधारण की रक्षा के लिए वह कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में हिंसा करे। वैश्यों का कार्य कृषि-पदार्थों का उत्पादन, क्रय-विक्रय और वितरण करना है। शूद्र वर्ग में वे आते हैं, जिनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की बुद्धि का अभाव है। इस श्रेणी के लोग शारीरिक श्रम के द्वारा तीनों उच्च जातियों की सहायता करते हैं। इस विधि से सब वर्णों में पूर्ण सहयोग रहता है और सब पारमार्थिक प्रगति करते हैं। उपरोक्त सहयोग के अभाव में समाज का पतन हो जायगा। इस कलह के युग—कलि में यही स्थिति है। कोई अपना कर्तव्य नहीं निभाता, फिर भी सब ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय होने का अभिमान करते हैं। परन्तु वास्तव में ऐसे मनुष्यों की कोई स्थिति नहीं है। वे श्रीभगवान् से बहिर्मुख हैं, क्योंकि वे कृष्णभावनाभावित नहीं हैं। ऐसे में इस कृष्णभावना आन्दोलन का उद्देश्य सम्पूर्ण मानवसमाज को सुव्यवस्थित करना है, जिससे सब सुखी हों और कृष्णभावना का विकास करके लाभ उठायें। भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव को उपदेश किया है कि वर्णाश्रम के विधान का पालन करने से भगवान् तृप्त होते हैं; परिणाम में सम्पूर्ण समाज को जीवन की सब आवश्यक वस्तुयें सुगमता से सुलभ हो जाती हैं यह इसलिए है क्योंकि वास्तव में तो श्रीभगवान् ही सब प्राणियों के भर्त्ता हैं। यदि सारा समाज अपने कर्तव्यपालन में कटिबद्ध और कृष्णभावना- भावित रहे, तो इसमें सन्देह नहीं कि उसके सारे सदस्य बड़े ही सुख- शान्ति से रह सकेंगे। जीवन की आवश्यकताओं से भरापूरा सारा जगत्
साधनभक्ति [ २६ वैकुण्ठ बन जायगा। भगवद्धाम में जाये बिना, केवल श्रीमद्भागवत का आज्ञापालन और कृष्णभावनाभावित कर्तव्यों का पालन करने से सारी मानवजाति सब प्रकार से सुखी हो जायगी। श्रीमद्भागवत (११.२७.४६) में ही एक अन्य वाक्य है, जिसमें श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, "हे उद्धव ! सभी मनुष्य वैदिक-लौकिक क्रियाओं में लगे रहते हैं। यदि वे कृष्णभावनाभावित होकर इनमें से किसी भी प्रकार की क्रियाओं के फल से मेरी अर्चना करें, तो अपने-आप उनके लोक-परलोक दोनों सुखी हो जायेंगे, इसमें कुछ सन्देह नहीं।" श्रीकृष्ण के इस वाक्य से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि कृष्णभावनाभावित क्रियाओं से सबकी सर्वाभीष्ट-सिद्धि होगी। इस प्रकार कृष्णभावनामृत आन्दोलन इतना उत्तम है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी—किसी भी उपाधि की आवश्यकता नहीं। मनुष्यमात्र जो कुछ कर रहा है, उसी में लगा रहकर अपनी कृष्णभावना- भावित क्रियाओं के फल से श्रीकृष्ण की आराधना करे। इससे सारी परि- स्थिति का समाधान हो जायगा और जगत् में सब सुख-शांति-लाभ करेंगे। 'नारदपंचरात्र' में भक्ति के इस विधि-विधान का वर्णन है : "शास्त्र में भगवान् की प्रसन्नता के लिए जो भी क्रियायें बताई गयी हैं, उसे संतपुरुष भक्ति की विधि मानते हैं। यदि कोई सद्गुरु के आश्रय में नियमित रूप से इस प्रकार भगवत्सेवा का आचरण करे तो शनैः-शनैः शुद्ध भगवत्प्रेममय सेवाभाव को प्राप्त हो जायगा।"
अध्याय ३ भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण पूर्णरूप से भगवद्भक्तिपरायण महात्माजनों के सत्संग के प्रभाव से किसी में श्रीकृष्ण के लिए किंचित् रुचि का उन्मेष हो सकता है। परन्तु साथ ही सकाम कर्मों और प्राकृत इन्द्रियतृप्ति में आसक्ति बनी रह सकती है, जिस कारण नाना प्रकार का तप-त्याग करना अच्छा नहीं लगता। यदि ऐसे पुरुष की श्रीकृष्ण में अनन्य आसक्ति हो जाय तो वह भक्तियोग का अधिकारी बन जाता है। शुद्धभक्तों के सत्संग में कृष्णभावना की ओर ऐसा आकर्षण बड़े सौभाग्य का सूचक है। श्रीचैतन्य महाप्रभु का प्रमाण है कि कोई भाग्य- वान् पुरुष ही सद्गुरु और श्रीकृष्ण की कृपा से भक्तिरूप लता के बीज को पाता है। इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (११.२०.८) में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, “हे उद्धव ! दुर्लभ भाग्यवश ही कोई मुझमें आसक्त होता है। यदि वह सकाम कर्मों से पूर्णरूप से विरक्त न भी हो अथवा भक्ति में पूरा आसक्त न हुआ हो, तो भी मेरी सेवा शीघ्र प्रभाव दिखाती है।" भक्त तीन प्रकार के होते हैं। प्रथम अथवा उत्तम कोटि का वर्णन इस प्रकार है। उत्तम भक्त शास्त्रों में पारंगत और तदनुकूल तर्क करने में निपुण तथा युक्ति के साथ सिद्धान्त का प्रतिपादन करने में दक्ष होता है। उसे भक्तियोग की विधि का दृढ़ निश्चय करता है। वह भलीभाँति जानता है कि जीवन का परम लक्ष्य श्रीकृष्ण की प्रेममयी सेवा की प्राप्ति है और एकमात्र श्रीकृष्ण ही प्रेमास्पद तथा आराध्य हैं। उत्तम भक्त वही हो सकता है जिसने सद्गुरु के शिक्षण में विधि-विधान का दृढ़ता से पालन करते हुए शास्त्र के अनुसार उनका निश्चल भाव से अनुसरण किया हो। इस प्रकार प्रचारक और गुरुरूप में कार्य करने की पूरी शिक्षा पाकर वह उत्तम अधिकारी हो जाता है। उत्तम भक्त आचार्यों के सिद्धान्तों से कभी विचलित नहीं होता तथा सम्पूर्ण युक्ति और तर्क से समझकर शास्त्र में प्रौढ श्रद्धा को प्राप्त हो जाता है। यहाँ युक्ति और तर्क का अभिप्राय
भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण [ ३१
शास्त्र पर आधारित तर्क-युक्ति से है। उत्तम भक्त समय का अपव्यय करनेवाले शुष्क मनोधर्म में रुचि नहीं लेता। भाव यह है कि जिसने भक्ति में दृढ़ निष्ठा को पा लिया है, उसे उत्तम भक्त जानना चाहिए। मध्यम भक्त के लक्षण इस प्रकार हैं। मध्यम भक्त शास्त्र के आधार पर तर्क करने में अधिक निपुण नहीं होता, पर लक्ष्य में प्रगाढ श्रद्धा रखता है। तात्पर्य यह है कि मध्यम भक्त कृष्णभक्ति में श्रद्धा तो रखता है, परन्तु कदाचित् विरोधी पक्ष के आगे शास्त्र के बल पर तर्क और निश्चय प्रस्तुत करने में असफल रह सकता है। फिर भी, यह निश्चय उसके हृदय में अचलभाव से रहता है कि श्रीकृष्ण परमाराध्य हैं। शास्त्र के निश्चय में अनिपुण और कोमल श्रद्धा वाला कनिष्ठ भक्त कहलाता है। उसकी श्रद्धा को कोई दूसरा अपने प्रबल तर्क अथवा विपरीत निर्णय से बदल सकता है। मध्यम भक्त के समान उसमें भी शास्त्र के आधार पर तर्क करने और प्रमाण देने की योग्यता नहीं होती। परन्तु जहाँ मध्यम अधिकारी में ध्येय में दृढ़ श्रद्धा रहती है, कनिष्ठ में ध्येय में कोई दृढ़ श्रद्धा भी नहीं होती। इसीलिए वह कनिष्ठ भक्त कहलाता है। भगवद्गीता में कनिष्ठ भक्तों का और अधिक वर्गीकरण है। वहाँ कथन है कि आर्त (विपदाग्रस्त), अर्थार्थी (धन का अभिलाषी), जिज्ञासु तथा ज्ञानी, ये चार प्रकार के मनुष्य भक्ति में प्रवृत्त हो कर अपनी-अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिए श्रीभगवान् के उन्मुख होते हैं। वे किसी मन्दिर में जाकर भगवान् से कष्ट-निवारण, अर्थ प्राप्ति अथवा जिज्ञासा-निवृत्ति के लिए याचना करते हैं। श्रीभगवान् की महिमा को जानने वाला ज्ञानी भी इन कनिष्ठों में आता है। शुद्धभक्तों का संग करने से ये मध्यम अथवा उत्तम भक्त बन सकते हैं। महाराज ध्रुव कनिष्ठ श्रेणी के अन्यतम उदाहरण हैं। उन्हें पिता के राज्य की इच्छा थी और इसी को लेकर वे भक्तियोग में प्रवृत्त हो गए। परन्तु अन्त में पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाने पर उन्होंने श्रीभगवान् से कोई लौकिक वरदान माँगने से इन्कार कर दिया। ऐसे ही, गजेन्द्र ने संकट में आत्मरक्षा के लिए श्रीकृष्ण को पुकारा था; बाद में वह शुद्धभक्त बन गया। सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्, चारों कुमार ज्ञानी संतपुरुष थे, पर वे भी भक्ति की ओर आकर्षित हो गए। ठीक यही नैमिषारण्य के शौनकादि ऋषियों के साथ हुआ। वे बड़े जिज्ञासु थे, निरन्तर सूत गोस्वामी से श्रीकृष्ण विषयक प्रश्न किया करते थे। इस प्रकार शुद्धभक्त
३२] भक्तिरसामृतसिन्धु का सत्संग करके वे स्वयं भी शुद्धभक्त हो गए। आत्मा के उत्थान का यही मार्ग है। कोई किसी भी अवस्था में क्यों न हो, सौभाग्य से यदि शुद्धभक्त का संग मिल जाय, तो वह बड़ी शीघ्रता के साथ मध्यम अथवा उत्तम श्रेणी पर आरूढ हो जाता है। इन चारों प्रकार के भक्तों का वर्णन भगवद्गीता के सातवें अध्याय में है; इन सब को पुण्यात्मा कहा गया है। पुण्यात्मा हुए बिना भक्तियोग में प्रवेश नहीं हो सकता। भगवद्गीता में बताया है कि जिसने निरन्तर पुण्यकर्म किये हों और जिसके पापों का अन्त हो गया हो, वही कृष्णभावना को अंगीकार कर सकता है, दूसरे नहीं। पुण्यकर्मों के क्रम से ही कनिष्ठ भक्तों की आर्त, (विपदाग्रस्त), अर्थार्थी (धन का अभि- लाषी), जिज्ञासु और ज्ञानी नामक कोटियाँ हैं। पुण्यात्मा हुए बिना तो आर्त मनुष्य नास्तिक अथवा कम्युनिस्ट हो जाता है। उसका भगवान् में विश्वास नहीं होता; वह समझता है कि भगवान् से सम्पूर्ण विश्वास को हटा लेने से उसका सब कष्ट दूर हो जायगा। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि इन चार प्रकार के कनिष्ठ भक्तों में ज्ञानी उन्हें बड़ा प्रिय है, क्योंकि श्रीकृष्ण में उनकी आसक्ति किसी लौकिक लाभ के लिए नहीं होती। श्रीकृष्ण में आसक्त ज्ञानी कष्ट- निवारण अथवा धन-प्राप्ति के रूप में बदले में उनसे कुछ नहीं चाहता। इसका अर्थ है कि प्रारम्भ से ही श्रीकृष्ण में उसकी आसक्ति प्रेमवश है। इसके अतिरिक्त, ज्ञान और शास्त्र-अध्ययन से भी वह यह समझ सकता है कि श्रीकृष्ण साक्षात् स्वयं भगवान् हैं। भगवद्गीता का प्रमाण है कि अनेक-अनेक जन्मों के बाद कहीं जाकर यथार्थ ज्ञान को प्राप्त हुआ पुरुष भली-भाँति जान पाता है कि वासुदेव (श्रीकृष्ण) सब कारणों के आदि कारण हैं और फिर उनके शरणागत हो जाता है। वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों में ही अनन्य रहता है। इस प्रकार शनैः-शनैः उसमें उनके लिए प्रेमभाव बढ़ता है। अतः ज्ञानी निःसन्देह श्रीकृष्ण का दयित है; परन्तु औरों को भी उदार कहा गया है, क्योंकि कष्ट अथवा धनाभाव के लिए ही क्यों न हों तृप्ति के लिए आए तो वे श्रीकृष्ण की शरण में ही हैं। इसलिए उन्हें भी महात्मा माना है। ज्ञानी हुए बिना भगवत्-उपासना के सिद्धान्त पर दृढ़ नहीं रहा जा सकता। जो अल्पमति हैं अथवा जिनकी मति माया द्वारा हर ली गयी है, वे प्रकृति के गुणों के प्रभाववश नाना देवताओं में आसक्त रहते हैं। ज्ञानी
भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण [ ३३ वह है जो भलीभाँति जान गया है कि वह देह से परे आत्मतत्त्व है। यह जानकर कि मैं आत्मा हूँ और श्रीकृष्ण परमात्मा हैं, वह अनुभव करता है कि उसका घनिष्ठ सम्बन्ध श्रीकृष्ण से है, देह से नहीं। आर्त और अर्थार्थी दोनों देहात्मबुद्धि में हैं, क्योंकि कष्ट और धन की इच्छा का सम्बन्ध केवल देह से है। जिज्ञासु पुरुष आर्त और अर्थार्थी से थोड़ा ऊपर तो अवश्य है, पर है प्राकृत स्तर पर ही। परन्तु श्रीकृष्ण का अनन्य अभिलाषी ज्ञानी पूर्ण रूप से जानता है कि वह ब्रह्म है और श्रीकृष्ण परब्रह्म हैं। वह यह भी जानता है कि आत्मा आधीन और अणु है, इसलिए उसे सदा अनन्त परम आत्मा श्रीकृष्ण के साथ सहयोग चाहिए। यह ज्ञानी पुरुष और श्रीकृष्ण का सम्बन्ध है। निष्कर्ष किया जा सकता है कि देहात्मबुद्धि से छूटा पुरुष शुद्ध भक्तियोग का अधिकारी है। भगवद्गीता में प्रमाण है कि ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद, जब वह प्राकृत उद्वेगों से मुक्त होकर सम्पूर्ण जीवों को समभाव से देखता है, तब भक्तियोग में प्रवेश का अधिकारी होता है। जैसा पूर्व में कहा जा चुका है, सुख के तीन भेद हैं—विषयसुख, ब्रह्मसुख और भक्तिसुख। भक्ति और उसके सुख का उदय तब तक नहीं हो सकता, जब तक प्राकृतवासना रहती है। प्राकृतवासना में विषयभोग की इच्छा और ब्रह्मैक्य की इच्छा, दोनों आती हैं। निर्विशेषवादी श्रीभगवान् के संग से और उनके साथ प्रेमरस का विनिमय करने से मिलने वाले दिव्य सुख की महिमा नहीं जानते; इसीलिए वे श्रीभगवान् से एकत्व प्राप्ति को अपना परम लक्ष्य बना लेते हैं। यह विचार विषयवासना का ही एक सूक्ष्म रूप है। प्राकृत-जगत् में मनुष्यमात्र सबसे शक्तिशाली बनने के लिए प्रयत्नशील है। देहात्मबुद्धिवश वह अपनी जाति, अपने समाज और अपने देश में अन्य सबसे महान् बनने की स्पर्धा में लगा हुआ है। महान् बनने की यह अभिलाषा जब अनन्त तक बढ़ जाती है, तो वह सबसे महान्, श्रीभगवान् से ही एक हो जाना चाहता है। यह भी देहात्मबुद्धि का ही एक सूक्ष्म रूप है। परन्तु पूर्ण आत्मज्ञान अपने यथार्थ स्वरूप को जानना है, जिससे प्रेममयी भगवत्सेवा में तत्पर होने की विद्या का पूर्ण बोध हो जाता है। जीव को यह जानना चाहिए कि वह सीमित है, जबकि श्रीभगवान् अनन्त हैं। अतः इच्छा होने पर भी श्रीभगवान् से एक नहीं हुआ जा सकता। यह कभी सम्भव नहीं। इसलिए जो प्राकृत अथवा ब्रह्मरूप में अधिक से अधिक महान् बन कर इन्द्रियतृप्ति करने की इच्छा रखता है, वह भक्ति
३४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु के मधुररस का वास्तविक आस्वादन कर ही नहीं सकता। इसीलिए श्रील रूप गोस्वामी ने हृदय में भुक्ति-मुक्ति की इच्छाओं के होने को पिशाची बताया है; दोनों कष्टदायक हैं। भुक्ति का अर्थ विषयसुख है और मुक्ति का अभिप्राय भवबन्धन से छूटकर भगवान् से एकत्व प्राप्त करना है। ये दोनों पिशाची हैं, क्योंकि जब तक विषयसुख अथवा ब्रह्मैक्य की इच्छा रहेगी, तब तक भक्ति के यथार्थ दिव्य सुख का आस्वादन कोई नहीं कर सकता। शुद्धभक्त मुक्ति की चिन्ता कभी नहीं करता। श्रीचैतन्य महाप्रभु की श्रीकृष्ण से प्रार्थना है, "हे नन्दकुमार (श्रीकृष्ण) ! मुझे बहुत से अनु- यायियों का सुख, धन का ऐश्वर्य और सुन्दर स्त्री नहीं चाहिए और न भवबन्धन से मुक्ति का ही मैं अभिलाषी हूँ। जन्म-जन्मान्तर में आपके चरणों में मेरी अनन्यभक्ति हो, बस यही प्रार्थना है।" शुद्धभक्त का ध्यान भगवान् के नाम, गुण, रूप, लीला, धाम आदि के यशोगान में इतना आकृष्ट रहता है कि मुक्ति तक की परवाह नहीं करता। श्री बिल्वमंगल ठाकुर का उद्गार है, "हे प्राणप्रिये प्रभो ! आपकी भक्ति के परायण मुझे सर्वत्र आपकी ही स्फूर्ति होती है। ऐसे में मुक्ति मेरी सेवा के अवसर की प्रतीक्षा में द्वार पर करबद्ध खड़ी है।" शुद्धभक्तों के लिए मुक्ति अथवा ब्रह्मैक्य का कुछ भी महत्त्व नहीं है। इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (३.२५.३६) में भगवान् कपिल माता देवहूति को उपदेश करते हुए कहते हैं, "हे जननि ! मेरे शुद्धभक्त मेरे नाना रूपों, मेरे मुखमण्डल की माधुरी और मोहक अवयवों को देखने में मुग्ध रहते हैं। मेरा हँसना, मेरी क्रीड़ा और मेरा देखना उन्हें इतना मधुर लगता है कि उनके विचार मुझमें ही लगे रहते हैं; वरन् उनका सम्पूर्ण जीवन ही मेरे अर्पण हो जाता है। यद्यपि उन्हें किसी भी प्रकार का मोक्षसुख या प्राकृतसुख नहीं चाहिए, परन्तु मैं उन्हें अपने परमधाम में पार्षदपद दे देता हूँ।" श्रीमद्भागवत के इस प्रमाण से शुद्धभक्तों को आश्वासन मिलता है कि वे श्रीभगवान् का संग अवश्य प्राप्त करेंगे। इस सन्दर्भ में श्रील रूप गोस्वामीपाद कहते हैं कि जो भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों अथवा उनकी सेवा की मधुरिमा के प्रति आकृष्ट हो गया है और इस आकर्षणवश जिसका चित्त निरन्तर दिव्यसुख से ओतप्रोत रहता है, ऐसे भक्त को स्वाभाविक रूप में उस मोक्ष की कभी इच्छा नहीं होती, जो निर्विशेष- वादियों के लिए इतना महत्त्वपूर्ण है।
भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण [ ३५ इसी के समान, तृतीय स्कन्ध (३.३.१५) में उद्धव भगवान् श्रीकृष्ण से प्रार्थना करता है, 'प्रभो ! आपके चरणकमलों की दिव्य प्रेममयी सेवा करने वालों के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से कुछ भी प्राप्त होने योग्य नहीं रहता, यद्यपि इनसे होने वाले सुख उन्हें बड़ी सुगमता से मिल सकते हैं। फिर भी हे सर्वशक्तिमान् ! मैं आपसे मोक्ष आदि को नहीं चाहता। मुझे तो बस आपके चरणकमलों में अनन्य श्रद्धा-भक्ति ही चाहिए ।" इसी प्रकार, तृतीय स्कन्ध, अध्याय २५ के श्लोक ३१ में भगवान् कपिल कहते हैं, "हे माता ! जिनका हृदय मेरे चरणों की सेवा से ओतप्रोत है और मेरी तृप्ति के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं, विशेष रूप से जो मेरे नाम, रूप, गुण और यश का संकीर्तन करते हुए दिव्य परमानन्दसिंधु में मग्न रहते हैं, वे भाग्यवान् भक्त मुझसे एक होने की कभी इच्छा नहीं करते । मुझसे एक होना तो दूर, मेरी भक्ति में तृप्त रहने वाले भक्तजन तो मेरे द्वारा दिये जाने पर भी सालोक्य, साष्टि, सामीप्य और सारूप्य मुक्ति तक को लेना नहीं चाहते ।" श्रीमद्भागवत (४.६.१०) में ही ध्रुव महाराज कहते हैं, "हे देव ! आपके चरणकमलों का ध्यान करने से मनुष्य को जिस दिव्य सुख की प्राप्ति होती है, निर्विशेषवादियों को ब्रह्म-साक्षात्कार से उसका आभास भी नहीं हो सकता। फिर उच्च स्वर्गीय लोकों को जाने की इच्छा से सकामकर्म करने वाले आपको कैसे जान सकते हैं, और उन्हें भक्तों के समान सुखी किस प्रकार समझा जाय ।''
अध्याय ४ भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है भक्त का भगवान् की भक्ति में कितना अनुराग होता है, यह आदि- राज महाराज पृथु के वाक्य से समझा जा सकता है। श्रीमद्भागवत (४.२०.२४) में वे कहते हैं, “हे देव ! यदि मुक्ति होने पर आपके चरण- कमलों के जयगान में शुद्ध भक्तों के हृदय से गूंजने वाली आपकी अमृतमय कीर्ति सुनने को नहीं मिलती तो मैं उस मोक्ष अथवा ब्रह्मैक्य को कभी नहीं लूंगा। मेरी तो बस निरन्तर यही प्रार्थना है कि आप मुझे असंख्य जिह्वा और कान प्रदान कीजिए, जिससे मैं सर्वदा आपकी दिव्य कीर्ति का श्रवण-कीर्तन करता हुआ परमानन्द में निमग्न रहूँ।” निर्विशेषवादी भगवान् में लीन हो जाना चाहते हैं। वे नहीं जानते कि अपना निजी स्वरूप बनाए रखे बिना जीव भगवत्-कीर्ति का श्रवण- कीर्तन नहीं कर सकता। उन्हें भगवान् के दिव्य विग्रह का कुछ भी बोध नहीं होता, इसलिए भगवान् की दिव्य लीला का श्रवण-कीर्तन वे नहीं कर सकते। भाव यह है कि मुक्ति से ऊपर उठे बिना भगवत्-कीर्ति का आस्वादन अथवा दिव्य भगवत्-विग्रह के तत्त्व का ज्ञान नहीं हो सकता। श्रीमद्भागवत (५.१४.४४) में ही एक अन्य सदृश वाक्य है। शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से कह रहे हैं, “भक्तप्रवर राजा भरत श्रीकृष्ण के चरणारविन्द की सेवा में इतने अतिशय अनुरक्त थे कि उन्होंने बड़ी सुगमता से पृथ्वी पर अपने शासन तथा पुत्र, समाज, मित्र, राजऐश्वर्य और सुन्दर स्त्री के मोह को त्याग दिया। देवगण भी जिसके लिए ललचाते रहते हैं, वे लक्ष्मीदेवी तक उनपर प्रसन्न थीं। पर उन्होंने कभी कुछ नहीं माँगा।” राजा भरत के इस आदर्श व्यवहार की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए शुकदेव आगे कहते हैं, “भगवान् की सेवा में जिनका मन अनुरक्त है, भोगों की तो बात ही क्या, उनके लिए तो महामुनियों द्वारा वाँछित मोक्ष भी तुच्छ हो जाता है।”
भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है [ ३७ श्रीमद्भागवत (६.११.२५) में वृत्रासुर भगवान् से कहता है, “हे भगवान् ! आपकी भक्ति को छोड़कर मैं न स्वर्गपद को, न महेन्द्रपद को, न त्रिलोकी के सार्वभौम राज्य को, न योग की सिद्धियों को और न मोक्ष को ही चाहता हूँ । मुझे तो बस आपके शाश्वत् संग और प्रेमसेवा की इच्छा है ।” इस वाक्य की पुष्टि करते हुए भगवान् शिव सती से श्रीमद्भागवत (६.१७.२८) में कहते हैं, “हे साध्वि ! नारायणभक्त किसी से नहीं डरते । स्वर्ग हो, मोक्ष हो, या नरक, उनके लिए सब समान है । भगवान् नारायण के चरणकमलों के शरणागत हो जाने मात्र से उनके लिए प्राकृत-जगत् की सभी परिस्थितियाँ एक जैसी हो जाती हैं ।” श्रीमद्भागवत (६.१८.७४) में इन्द्र अपनी माता अदिति का सम्बोधन करते हुए कहते हैं, “हे माता ! निष्कामभाव से केवल भगवान् की भक्ति करने वाले भक्तजन ही वास्तव में अपने स्वार्थ को जानते हैं । ऐसे पुरुष वास्तव में स्वार्थकुशल हैं, और जीवन की संसिद्धि की ओर उन्नति करने में परम दक्ष माने जाते हैं ।” महाराज प्रह्लाद (७.६.२५) का वचन है, “हे दैत्यमित्रो ! भगवान् के प्रसन्न होने पर संसार में क्या दुर्लभ रह सकता है ? यदि भगवान् तुष्ट हो जायें, तो तुम्हारे हृदय के सम्पूर्ण मनोरथ निस्सन्देह सिद्ध हो जायेंगे । इसलिए त्रिगुणमयी प्रकृति द्वारा अपने-आप सिद्ध होने वाले सकामकर्मों से क्या लाभ ? निरन्तर भगवत्-कीर्ति का गान करते हुए उनकी चरणमाधुरी का आस्वादन करने वाले के लिए मोक्ष से भी क्या लाभ ?” प्रह्लाद महाराज के इस वाक्य से स्पष्ट है कि जो भगवान् की दिव्य कीर्ति के श्रवण-कीर्तन में सुख का अनुभव करता है, वह सब प्रकार से प्राकृतसुखों—पुण्यकर्मों, यज्ञों और मोक्ष तक का उल्लंघन कर चुका है । इसी भाँति, सातवें स्कन्ध के अध्याय आठ, श्लोक ४२ में भगवान् नृसिंह की स्तुति करते हुए इन्द्र कहते हैं, “हे परम पुरुष ! ये दैत्य यज्ञों में हमारे भाग का अपहरण करना चाहते थे; परन्तु नृसिंह रूप से प्रकट होकर आपने महाभय से हमारा त्राण कर दिया है। वास्तव में हमारा यज्ञभाग आपसे ही है, क्योंकि आप सम्पूर्ण यज्ञों के परम भोक्ता हैं। आप जीवमात्र के अन्त- र्यामी, सबके यथार्थ स्वामी हैं। हमारे हृदय बहुत समय से इस दैत्य हिरण्यक- शिपु के भय से आक्रान्त थे; परन्तु आप हम पर इतने कृपाशील हैं कि इसे मार कर आपने हमारे हृदयों से भय को भगा दिया है और हमें अवसर
३८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु दिया है कि हम आपको अपने हृदय में फिर अभिराजित कर सकें। आपकी दिव्य प्रेममयी सेवा के परायण भक्तों के लिए वे सब ऐश्वर्य तृणतुल्य हैं जिनका दैत्यों ने हमसे अपहरण किया था। भक्त तो मोक्ष की भी चिन्ता नहीं करते, फिर इन प्राकृत ऐश्वर्यों का क्या कहना। वास्तव में यज्ञ के भोक्ता हम नहीं हैं। हे नाथ ! हमारा तो बस यही कर्तव्य है कि सदा आपकी सेवा में लगे रहें, क्योंकि आप ही सबके भोक्ता हैं।" इन्द्र के इस वाक्य का यह तात्पर्य है कि ब्रह्मा से लेकर तुच्छ चिंटि तक कोई भी जीव प्राकृत ऐश्वर्य का भोग करने के लिए नहीं है। सबको अपना सर्वस्व भगवान् को अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें अपने- आप लाभ होगा। शरीर के अंग सामग्री जुटा कर उदरपूर्ति के लिए भोजन बनाते हैं, क्योंकि उदरपूर्ति होने पर शरीर के सभी अंगों को समान रूप से लाभ होता है। इसी भाँति, सबका कर्तव्य है कि परमेश्वर श्रीकृष्ण को प्रसन्न करें। तब अपने-आप सबको सुख मिलेगा। श्रीमद्भागवत (८.३.२०) में इसी के समान, गजेन्द्र ने कहा है, "प्रभो ! आपके भक्तियोग के दिव्य सुख का मुझे अनुभव नहीं है, इसी लिए आपकी कृपा की याचना करता हूँ। वास्तव में तो महापुरुषों के चरण- कमलों की सेवा करके जो सम्पूर्ण वासनाओं से छूट चुके हैं, वे शुद्धभक्त सदा परमानन्द सिन्धु में निमग्न रहते हैं। आपके परम मंगलमय चरित्र का गान करते हुए वे संतुष्ट रहते हैं; अतः और कुछ नहीं चाहते।" स्कन्ध नौ, अध्याय ४, श्लोक ६७ में वैकुण्ठनाथ दुर्वासा से कहते हैं, "मेरी भक्ति से भरे हुए भक्तजन सालोक्य, सारूप्य, सायुज्य, साष्टि और सामीप्य नामक पाँच प्रकार की मुक्ति भी नहीं चाहते; फिर अन्य विनश्वर पदार्थों की तो बात ही क्या है।" भागवत के दसवें स्कन्ध (अध्याय १६, श्लोक ३७) में नागपत्नियाँ प्रार्थना करती हैं, "हे गोविन्द ! आपके चरणसरोज की रज बड़ी अद्भुत है। जिस भाग्यवान् को यह सुलभ हो जाती है, वह न स्वर्गपद को, न सार्वभौम राज्य को, न योगसिद्धि और न मोक्ष को ही चाहता है। आपकी चरणरज का अनुरागी अन्य किसी भी सिद्धि की इच्छा नहीं करता।" दसवें स्कन्ध (अध्याय ८७, श्लोक २१) में मूर्तिमान् वेदश्रुतियाँ कहती हैं, "भगवन् ! आत्मज्ञान को जानना बड़ा कठिन है। हमें इसका बोध कराने के लिए ही आप अपने स्वयंरूप में प्रकट हुए हैं। इसी के लिए गृहसुख को त्याग कर परमहंस आचार्यों का सत्संग करने वाले भक्त आपकी भक्ति- रूप अमृत के महासागर में निमग्न रहकर मुक्ति की कामना नहीं करते।"
भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है [ ३६ इस श्लोक को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि आत्म- ज्ञान आत्मा और परमात्मा दोनों के ज्ञान का वाचक है। जीवात्मा और परमात्मा दिव्य गुणों में एक हैं, इसलिए दोनों को 'ब्रह्म' कहा जाता है। परन्तु ब्रह्म का ज्ञान बड़ा दुर्जेय है। कितने ही दार्शनिक आत्मतत्त्व को समझने का प्रयास करते हैं, पर अधिक उन्नति नहीं कर पाते। भगवद्- गीता से प्रमाणित है कि करोड़ों मनुष्यों में कोई एक आत्मतत्त्व की जिज्ञासा करता है और बहुत से जिज्ञासुओं में भी कोई एक ही भगवान् को तत्त्व से जानता है। श्लोक का तात्पर्य हुआ कि आत्मतत्त्व बड़ा कठिन है, इसलिए श्रीभगवान् स्वयं आदि रूप में प्रकट होकर अर्जुन जैसे पार्षदों को प्रत्यक्ष रूप से उपदेश करते हैं, जिससे जनसाधारण इस आत्मविद्या का लाभ उठा सके। इस श्लोक से यह भी स्पष्ट है कि मुक्ति का अर्थ सब प्राकृत सुखों को पूर्ण रूप से त्याग देना है। निर्विशेषवादी भवबन्धन की मुक्ति से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं । भक्त मुक्तिलाभ तो करते ही हैं; साथ-साथ भगवान् श्रीकृष्ण के अद्भुत चरित्र के श्रवण-कीर्तन के दिव्य आनन्द का भी रसास्वादन करते हैं। भागवत (११.२०.३४) में श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं- "हे उद्धव ! पूर्ण रूप से मेरी सेवा के आश्रित हुए भक्तजन भक्तियोग में इतने दृढ़ (अनन्य) रहते हैं कि अन्य अभिलाषाओं का उनमें बिल्कुल अभाव हो जाता है। मेरे द्वारा दिए जाने पर चार प्रकार के मोक्ष को भी वे नहीं लेते, फिर प्राकृत-जगत् की किसी वस्तु का क्या कहना है।" अन्यत्र (११.१४.१४) भी श्रीकृष्ण का कथन है, "हे उद्धव ! मेरे चिन्तन और लीला में अर्पित मन-बुद्धि वाला ब्रह्मपद, इन्द्रपद, सार्वभौम आधिपत्य, योगसिद्धि अथवा मुक्ति तक की इच्छा नहीं करता।" श्रीमद्- भागवत (१२.१०.६) में शिवजी पार्वती से कहते हैं, "देवि ! ये महान् ब्रह्मर्षि मारकण्डेय भगवान् की अनन्य श्रद्धा-भक्ति को प्राप्त हो गये हैं। इसलिए अब ये कुछ नहीं चाहते, यहाँ तक कि संसार से मुक्ति भी नहीं।" 'पद्मपुराण' के कार्तिकमाहात्म्य में इस सिद्धान्त का समर्थन है। इस समय वृन्दावन में भगवान् श्रीकृष्ण के दामोदर रूप की उपासना करने का विधान है। दामोदररूप श्रीकृष्ण की उस बाललीला का द्योतक है, जब वे माता यशोदा द्वारा बाँधे गए थे (दाम अर्थात् बंधन)। श्रीकृष्ण के चांचल्य से रुष्ट होकर यशोदा मैया ने उन्हें रस्सी से बाँधा था; इसीलिए वे दामोदर कहलाए। कार्तिक में भगवान् दामोदर से निवेदन करते हैं,
४० ] भक्तिरसामृतसिन्धु “हे प्रभो ! हे वरों के स्वामिन् ! ब्रह्मा और शिव आदि देवता हिरण्यकशिपु, रावण जैसे अपने भक्तों को बहुत से वर दिया करते हैं; परन्तु ब्रह्मा, शिव भी आपके वरों पर आश्रित हैं।” यही कारण है कि श्रीकृष्ण को वरों का स्वामी कहा गया है। वे भक्तों को कुछ भी वर दे सकते हैं; पर भक्तों की प्रार्थना है, “मुझे किसी प्राकृतसुख या मुक्ति की इच्छा नहीं है। बस इतना वर दीजिए कि आपका यह दामोदर रूप सदा मेरे हृदय में बसा रहे। आपके इस मधुर मनोहर रूप के अतिरिक्त मेरा चित्त और कुछ नहीं चाहता ।” इस प्रार्थना के अगले श्लोक में कहा है, “हे दामोदर ! एक समय नन्द महाराज के प्रांगण में चंचल क्रीड़ा करते हुए आपने दही का भाण्ड फोड़ डाला था। उस पर यशोदा मैया ने आपको रस्सी से ऊखल से बाँध दिया। तब आपने नन्दजी के आंगन में यमलार्जुन के रूप में खड़े नलक्कूवर और मणिग्रीव का उद्धार करके अपनी भक्ति का अधिकारी बनाया। कृपामयी लीला करके मुझे भी अपनी भक्ति प्रदान कीजिए, मुझे मुक्ति का आग्रह नहीं है ।” देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के दोनों पुत्र अपने पिता के ऐश्वर्य के मद में मत्त हो रहे थे। एक समय वे किसी दिव्यलोक में नग्न अप्सराओं के साथ विलासमग्न थे। तभी महामुनि नारद मार्ग से जा रहे थे। उन्हें कुबेरपुत्रों के अभद्र व्यवहार पर हार्दिक दुःख हुआ। नारदजी को जाते देखकर अप्सराओं ने तो वस्त्रधारण कर लिए, परन्तु मद्यप कुबेरपुत्रों को लज्जा नहीं आयी । उनके व्यवहार से क्रुद्ध होकर नारदजी ने शाप दिया, “तुम दोनों सर्वथा निर्लज्ज हो रहे हो, इसलिए कुबेरपुत्र होने के स्थान पर वृक्ष बन जाओ।” यह सुनने पर दोनों को चेतना हुई और नारद जी से क्षमा माँगने लगे। तब नारद ने कहा, “तुम अर्जुन के वृक्ष बन कर नन्द महाराज के आँगन में खड़े रहोगे। नन्द महाराज के पुत्ररूप में जब श्रीकृष्ण प्रकट होंगे, तब तुम्हारा उद्धार होगा।” प्रकारा- न्तर से, नारद का शाप कुबेरपुत्रों के लिए वरदान सिद्ध हुआ, क्योंकि इससे उन्हें पूर्वसूचना मिल गयी कि उनपर श्रीकृष्ण का अनुग्रह होगा। उसके बाद दोनों कुबेरपुत्र नन्दजी के घर में यमलार्जुन के रूप में खड़े रहे। कालान्तर में नारद की वाणी सत्य करने को भगवान् दामोदर ने ऊखल से पेड़ों को गिराकर उन का उद्धार किया। नलकुबर और मणिग्रीव अब तक महाभागवत बन गए थे। गिरे वृक्षों से निकलकर उन्होंने भगवान् दामोदर की अभ्यर्थना की । ‘हयशीर्ष पञ्चरात्र’ में उल्लेख है, “हे प्रभो ! हे भगवन् ! मैं धर्म’
भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़ कर है [ ४१ अर्थ, काम और मोक्ष को नहीं चाहता । बस इतनी ही अभिलाषा है कि मैं सदा आपके चरणकमलों का दास बना रहूँ। कृपया मुझपर यह अनुग्रह करें ।" उसी ‘हयशीर्ष पञ्चरात्र' में उल्लेख है कि नृसिंहदेव के बारम्बार आग्रह करने पर भी प्रह्लाद महाराज ने कोई विषयवस्तु नहीं माँगी, अपितु सदा भक्ति के परायण करने का ही वर चाहा । इस सन्दर्भ में प्रह्लाद महाराज ने भगवान् रामचन्द्र के नित्यदास हनुमान् जी का उदाहरण दिया । हनुमान् ने भगवान् से कोई भी प्राकृत वरदान न माँगने का आदर्श स्थापित किया है । वे सदा भगवत्सेवा के परायण रहे । इस आदर्श गुण के लिए वे आज तक भक्तों के आराध्य हैं । प्रह्लाद महाराज ने भी हनुमान्जी का सादर अभिवादन किया । श्रीहनुमान् का प्रसिद्ध वचन है, “मैं भवबन्धन से उस मोक्ष को अथवा आप के सायुज्य को नहीं चाहता, जिसके आप प्रभु हैं और मैं आपका दास हूँ-इस भाव का लोप हो जाय ।" ‘नारदपञ्चरात्र' के एक अन्य श्लोक में कहा है, "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है । बस यही प्रार्थना है कि अपने चरणकमलों की छाया में मुझे जीने दीजिए । हे धरणीधर ! मैं सालोक्य, सारूप्य आदि मुक्तियों को नहीं चाहता । मुझे तो केवल आपकी दया की कामना है, जिससे निरन्तर आपकी प्रेममयी सेवा के परायण रहूँ ।" श्रीमद्भागवत (६.१४.५) में महाराज परीक्षित की शुकदेव गोस्वामी से जिज्ञासा है, "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! मैं समझता हूँ वृत्रासुर बड़ा पापात्मा था और उसकी मति रजोगुण-तमोगुण से भरी थी । फिर उसमें नारायणभक्ति का ऐसा पूर्ण विकास कैसे हुआ ? मैंने सुना है कि कठोर तपस्या करके सिद्ध और पूर्ण ज्ञानी मुक्त पुरुषों को भी भगवद्भक्त बनने का साधन करना पड़ता है । नारायणभक्त निःसन्देह बड़ा दुर्लभ है । अतः आश्चर्य है कि वृत्रासुर भक्त कैसे बन गया !” उपरोक्त श्लोक में सबसे महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि निर्विशेष ब्रह्म में लीन हुए असंख्य मुक्त पुरुषों में भी नारायणभक्त मिलना बहुत दुर्लभ है । करोड़ों मुक्तों में कोई एक भाग्यवान् ही भक्त होता है । श्रीमद्भागवत (१.८.२०) में श्रीकृष्ण को विदा करते हुए महारानी कुन्ती प्रार्थना करती हैं, “प्रभो ! बड़े-बड़े विद्वान् और परमहंस भी आपकी अगाध महिमा का पार नहीं पा सकते । जब अमल आत्मा मुनि भी आपको जान नहीं सकते तो मुझ स्त्री के लिए आपकी कीर्ति को जानना
४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु कैसे सम्भव होगा ? मैं आपको कैसे जान सकती हूँ ?" इस श्लोक से स्पष्ट है कि मुक्तपुरुष भगवान् को नहीं जान सकते, पर कुन्ती जैसे दीन भक्त उन्हें जान जाते हैं। स्त्रियाँ पुरुषों से अल्पज्ञ होती हैं, परन्तु कुन्ती देवी को भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा अनुभव हुई। श्रीमद्भागवत (१.७.१०) का 'आत्माराम' श्लोक महत्त्वपूर्ण है। इसके अनुसार प्राकृत बन्धन से पूर्ण रूप में छूटे हुए आत्माराम पुरुष भी भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं।* भाव यह है कि मुक्तजीव में विषयभोग की लेशमात्र इच्छा नहीं रहती, वह प्राकृत वासना से पूर्णतया मुक्त हो जाता है। फिर भी, वह भगवान् श्रीहरि की लीला कथा को सुनने के वशीभूत रहता है। अतएव सिद्ध होता है कि भगवद्गुण और भगवत्-लीला प्राकृत नहीं हैं। अन्यथा आत्माराम मुक्त पुरुष उनसे आकर्षित कैसे होते ? यह इस श्लोक का सार है। पूर्वोक्त वाक्यों से स्पष्ट है कि भक्त किसी भी प्रकार की मुक्ति नहीं चाहता। मुक्ति के पाँच भेद हैं-१. सायुज्य : भगवान् में लीन होना; २. सालोक्य : भगवान् के लोक में वास; ३. सारूप्य : भगवान् के समान रूप की प्राप्ति; ४. सार्ष्टि : भगवान् के समान ऐश्वर्य की उपलब्धि; ५. सामीप्यः भगवान् का सांनिध्य। इन पाँचों में से सायुज्य मुक्ति को तो भक्त कभी भी स्वीकार नहीं करते। वैसे तो भक्त अन्य चारों मुक्तियों को भी नहीं लेते, परन्तु वे भक्ति के विपरीत नहीं हैं। ऐसे चार प्रकार के मुक्त पुरुषों में से कुछ में श्रीकृष्ण के लिए अनुराग उदित हो जाता है, जिससे वे भी परव्योम के गोलोक वृन्दावन धाम में प्रविष्ट हो सकते हैं। भाव यह है कि वैकुण्ठधाम में प्रविष्ट हुए चार प्रकार के भक्त पुरुष भी कभी-कभी श्रीकृष्ण में अनुरक्त होकर कृष्णलोक को गमन कर जाते हैं। इस प्रकार चार प्रकार के मुक्त भी जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में बने रह सकते हैं। प्रारम्भ में उन्हें श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य की कामना हो सकती है, परन्तु परिपक्व अवस्था में वृन्दावन में प्रकट कृष्णप्रेम, जो पहले उनमें सुप्त था, फिर उनके हृदय में छा जाता है। अतएव शुद्धभक्त भक्ति
- श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक समय सनातन गोस्वामी को इस 'आत्माराम' श्लोक की बड़ी सुन्दर व्याख्या सुनायी थी, जो लेखक के ग्रन्थ 'चैतन्य महाप्रभु का शिक्षामृत' में संकलित है।
भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है [ ४३ के अनुकूल होने पर अन्य चारों मुक्तियों को तो कदाचित् ले भी सकते हैं, पर सायुज्य को कभी नहीं लेते । भगवान् के नाना प्रकार के भक्तों में वह सर्वोत्तम माना जाता है, जो वृन्दावन में प्रकट श्रीकृष्ण के आदिरूप पर मोहित रहता है। ऐसा भक्त वैकुण्ठलोक और श्रीकृष्ण की दिव्य नगरी द्वारका तक के ऐश्वर्य की ओर आकृष्ट नहीं होता । अस्तु, श्रील रूप गोस्वामी का निर्णय है कि भगवान् की गोकुल अथवा वृन्दावन* की लीला पर आकृष्ट भक्त सर्वश्रेष्ठ हैं। भक्त भगवान् के इष्ट रूप में अनन्य रहता है। उदाहरण के लिए, रामभक्त हनुमान् जी जानते थे कि भगवान् राम और भगवान् नारायण में भेद नहीं है। फिर भी, वे केवल भगवान् राम की सेवा के ही अभिलाषी थे। इसका कारण भक्त की विशिष्ट रुचि है। भगवत्-रूप बहुत से हैं, परन्तु कृष्ण आदिरूप है। यद्यपि सभी भगवत्-रूपों के भक्त एक श्रेणी में हैं, फिर भी सब प्रकार के भक्तों में कृष्णभक्त सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
- वृन्दावन वह दिव्य धाम है, जहाँ श्रीकृष्ण अपने शैशवकालीन लीला- रस का परिवेषण करते हैं। यह परमधाम है। जब यह प्राकृत-जगत् में प्रकट होता है तो इसे गोकुल कहते हैं; वैकुण्ठ-जगत् में यही गोलोक या गोलोक-वृन्दावन कहलाता है।