भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
७४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नैवेद्य-आस्वादन पद्मपुराण में स्पष्ट वचन है—"श्रीमूर्ति के सामने से हटकर जो पुरुष तुलसी और चरणामृत से युक्त नैवेद्य का अन्न नित्य नियमित रूप से खाता है, वह अविलम्ब करोड़ों यज्ञों के पुण्य को प्राप्त करता है।" चरणामृत-पान चरणामृत की प्राप्ति प्रातःकाल वस्त्र-अलंकरण से पूर्व भगवान् की मूर्ति को स्नान कराने पर होती है। सुगन्धी और पुष्पों से युक्त जल श्रीचरणों से नीचे गिरता है। उसे एकत्रित कर दही के साथ मिलाया जाता है। इस प्रकार यह चरणामृत अतिशय आस्वाद्य तो होता ही है, इसका प्रबल पारमार्थिक माहात्म्य भी है। पद्मपुराण के अनुसार, जिस मनुष्य ने कभी दान, यज्ञ, स्वाध्याय, अर्चन, आदि कुछ भी पुण्य न किया हो, वह भी मन्दिर के चरणामृत का पान करके परमधाम के योग्य हो जाता है। मन्दिरों में चरणामृत को बड़े से पात्र में रखने की प्रथा है। श्रीमूर्त्ति का दर्शन-अभिवादन करने आया भक्त विनम्रभाव से इस चरणामृत के तीन विन्दु का पान करके परमानन्द सुख पाता है। अर्पित धूप और पुष्पों की सौरभ का आघ्राण 'हरिभक्तिसुधोदय' में उल्लेख है—"श्रीहरि को अर्पित धूप को सूंघने से संसाररूपी सर्प से डसे हुओं का विष समाप्त हो जाता है।" कुशल पुरुषों द्वारा वनों में पायी जाने वाली एक प्रकार की जड़ी सुंघाये जाने पर सर्प का विष उतर जाता है और चेतना लौट आती है। इसी भाँति जो मन्दिर में मूर्ति को अर्पित धूप सूंघता है, उसका सम्पूर्ण भवरोग तत्काल दूर हो जाता है। मन्दिर में जाने पर भक्त को फल, फूल, धूप आदि किसी न किसी पदार्थ का भगवान् को अवश्य अर्पण करना चाहिए। यदि धन की सामर्थ्य न हो तो कुछ और चढ़ाये। प्रायः प्रातः काल मन्दिर जाने वाले नर-नारी बहुत-सी भेंट ले जाते हैं। अधिक नहीं, एक अन्नकण का भी अर्पण किया जा सकता है। यह विधि है कि सन्त अथवा मन्दिर में मूर्ति के दर्शनों के लिए किसी भेंट के बिना नहीं जाना चाहिए। अर्पण अति तुच्छ हो चाहे अमूल्य हो। फल, फूल, जल आदि जो कुछ भी थोड़ा सा मिल सके, अवश्य अर्पण करना चाहिए। जब कोई भक्त प्रातः मन्दिर में भेंट चढ़ाने जायगा, तो वह धूप का आघ्राण भी करेगा और परिणाम में भवरोग के विष से मुक्ति पा जायगा।
भक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ७५ तन्त्रशास्त्र में उल्लेख है, “हरि के निर्माल्य की सौरभ के नासिका में प्रवेश करते ही पाप के बन्धन नष्ट हो जाते हैं । जो पापात्मा नहीं है, वह भी सौरभ-आंघ्राण करके मायावादी से भक्त हो जाता है ।” इसके अनेक उदाहरण हैं, जिनमें सनकादि के उत्थान की कथा मुख्य है। वे मायावादी थे, परन्तु मन्दिर में पुष्पों और धूप की सौष्ठव के आघ्राण से परम भक्त बन गए । उपरोक्त वाक्यों से ज्ञात होता है कि मायावादी शुद्ध नहीं होते, वरन् दूषित रहते हैं । श्रीमद्भागवत में प्रमाण है, “जिसने सम्पूर्ण पापों का मार्जन नहीं किया है, वह शुद्ध भक्त नहीं हो सकता । शुद्धभक्त को श्रीभगवान् के परमेश्वरत्व में कोई सन्देह नहीं रहता, इसलिए वह निरन्तर कृष्णभावना और भक्तियोग के परायण रहता है ।” ‘अगस्त्यसंहिता’ में सदृश वाक्य है—“अपनी घ्राणेन्द्रिय की विशुद्धि के लिए हमें मन्दिर में श्रीकृष्ण को अर्पित पुष्पों को सूंघना चाहिए ।” श्रीमूर्ति का स्पर्श विष्णुधर्मोत्तर में श्रीमूर्ति के चरणकमलों का स्पर्श करने के सम्बन्ध में कथन है—“जो पुरुष वैष्णवदीक्षा से युक्त है तथा कृष्णभावनाभावित भक्तियोग के परायण है, वही श्रीमूर्ति का स्पर्श करने का अधिकारी है ।” गांधी द्वारा चलाए गए राजनीतिक आन्दोलन के काल में उस वैदिक पद्धति का विरोध किया गया था, जिसके अनुसार शूद्र, चाण्डाल आदि अधम श्रेणी के लोगों का मन्दिर-प्रवेश निषिद्ध है। यह निषेध उनके अशुद्ध आचरण के कारण है । परन्तु साथ में उन्हें अन्य सुविधायें प्राप्त हैं जिनसे वे शुद्धभक्तों के संग में भक्तियोग के चरम संसिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं। किसी भी जाति में जन्मे मनुष्य का बहिष्कार नहीं है, पर सब के लिए पवित्र होना आवश्यक है । उस शुद्धि-पद्धति को अंगीकार करना होगा । परन्तु गांधी केवल ‘हरिजन’ नाम की मोहर लगाकर उन्हें शुद्ध सिद्ध करना चाहते थे, अतः मन्दिर के व्यवस्थापकों और गांधी में गम्भीर संघर्ष चला । जो कुछ हो, वर्तमान नियम सब शास्त्रों का विधान है—कोई भी शुद्ध व्यक्ति मन्दिर में प्रवेश कर सकता है । वास्तविक स्थिति यही होनी चाहिए । जो विधिपूर्वक दीक्षित है और विधि-विधान का पालन करता है, वही प्रवेश और श्रीमूर्ति का स्पर्श कर सकता है, सब नहीं । विधि के साथ मूर्ति-स्पर्श करने वाला तत्काल पापपुंज से छूट जाता है और उसकी सर्वाभीष्ट सिद्धि भी हो जाती है ।
७६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'वराहपुराण' में श्रीकृष्णमूर्ति के स्पर्श की महिमा है। कोई भक्त कहता है, “हे वसुन्धरे ! वृन्दावन में जो श्रीगोविन्ददेव का दर्शन कर लेता है, वह यमपाश में नहीं पड़ता, वरन् देवगति को जाता है।” भाव यह है कि यदि कोई साधारण व्यक्ति भी कुतूहलवश वृन्दावन जाकर दैववश गोविन्दजी का दर्शन कर ले तो उसके लिए वैकुण्ठ नहीं तो कम से कम उच्च लोकों की प्राप्ति तो निश्चित है। अतः वृन्दावन में गोविन्द मूर्ति के दर्शन मात्र से महान् पुण्य होता है। आरति दर्शन 'स्कन्दपुराण' में मूर्ति की आरति दर्शन का यह माहात्म्य है— “आरति के समय भगवान् के मुखारविन्द का दर्शन करने वाले के करोड़ों वर्षों से संचित पापपुंज भस्म हो जाते हैं। उसके ब्रह्महत्या जैसे जघन्य पाप भी नहीं ठहर पाते।” उत्सवों का आयोजन जैसा पूर्वकथन है, श्रीकृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी, प्रमुख वैष्णवों की जन्मतिथि, झूलनयात्रा, दोलयात्रा आदि महोत्सवों को अवश्य मनाना चाहिए। उत्सव में भगवान् को रथ पर विराजमान किया जाता है और फिर नगर के विभिन्न मार्गों पर उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है, जिससे लोगों को मन्दिर में दर्शन का लाभ सुलभ हो जाय। 'भविष्यपुराण' कहता है—“जो चाण्डाल आदि कौतुक में भी रथ पर विराजमान श्रीभगवान् को देख लेते हैं, वे विष्णु-पार्षद बन जाते हैं।” 'अग्निपुराण' का वाक्य है, “जो मन्दिर में श्रीमूर्र्ति की पूजा को देखकर प्रसन्न होता है, वह पंचरात्र में वर्णित क्रियायोग के फल को प्राप्त करता है।” क्रियायोग प्रायः भक्तियोग जैसी अभ्यास की पद्धति है। परन्तु वह विशेष रूप से ध्यानयोगियों के लिए विहित है। भाव यह है कि इस क्रमिक पद्धति से ध्यानयोगी अन्त में भगवद्भक्ति के स्तर पर आरूढ़ हो जाते हैं।
अध्याय १० श्रवण-स्मरण की कला श्रवण कृष्णभावना और भक्तियोग का आरम्भ श्रवण से होता है। सभी मनुष्यों को यह अवसर दिया जाना चाहिए कि वे भक्तिगोष्ठी में आकर श्रवण करें। कृष्णभावना के पथ पर उन्नति के लिए यह परम अनिवार्य है। जब कोई शब्दब्रह्म को सुनने में कर्णविवरों का योग करता है तो वह शीघ्र ही हृदय से शुद्ध और परिष्कृत हो जाता है। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने श्रवण के माहात्म्य पर बड़ा बल दिया है। यह बद्धजीव के हृदय को पवित्र कर देता है, जिससे वह द्रुतगति से भक्तियोग में लगने और कृष्णभावना को समझने का अधिकारी बन जाता है। 'गरुडपुराण' श्रवण की महिमा का अतिशय सुन्दर दिग्दर्शन है, "प्राकृत जगत् में बद्धजीव की अवस्था सर्प से कटे अचेतन मनुष्य जैसी है, क्योंकि इन दोनों को ही मन्त्रध्वनि से फिर चेतन किया जा सकता है।" सर्प द्वारा दष्ट मनुष्य तुरन्त नहीं मरता, वरन् पहले अचेतन होकर कुछ समय उसी अवस्था में पड़ा रहता है। प्राकृत-जगत् में जीव निद्रा- मग्न है, क्योंकि वह अपने यथार्थ स्वरूप और कर्तव्य को तथा श्रीभगवान् से अपने सम्बन्ध को नहीं जानता। अतः विषयी जीवन का अर्थ है कि माया- रूपी सर्प का काटना और इस प्रकार कृष्णभावना के अभाव में जीव का मृतप्राय हो जाना। सर्प से कटे हुए मुमूर्षु को मन्त्रोच्चारण से फिर जीवन- दान किया जा सकता है। इस मन्त्रविद्या के अनेक विशारद हैं। इसी प्रकार महामन्त्र हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे को सुनाकर मृयमाण अचेतन पुरुष को वापस कृष्णभावना की अवस्था में लाया जा सकता है। श्रीमद्भागवत (४.२६.४०) में भगवच्चरित-श्रवण की महिमा के सम्बन्ध में शुकदेव गोस्वामी महाराज परिक्षित से कहते हैं, "हे राजन ! वही स्थान निवास के योग्य है जहाँ महान् आचार्य भगवान् के दिव्य चरित
७८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु की वार्ता करते हैं। वहाँ रहकर उन महापुरुषों के मुखचन्द्र से निस्यन्दित कृष्णलीलारससुधा की धाराओं का कर्णपुटों से अहर्निश पान करता रहे । जो अतृप्त होकर निरन्तर इस अमृत का पान करते हैं, उनको भूख-प्यास, भय-शोक और भव-मोह स्पर्श नहीं कर पाते ।" भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भी श्रवण को वर्तमान कलियुग में स्वरूप-साक्षात्कार का साधन बतलाया है। इस काल में पूर्व युगों के विधि- विधानों और वेद-स्वाध्याय का ठीक-ठीक अनुष्ठान सम्भव नहीं रहा है। फिर भी यदि कोई महाभागवतों और आचार्यचरणों द्वारा उच्चरित शब्द- ब्रह्म का श्रवण करे तो केवल इतने से भवरोग शान्त हो जायगा। अतएव भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु की आज्ञा है कि उन्हीं अधिकारी पुरुषों से श्रवण करे, जो भगवद्भक्त हों। व्यवसायी कथा वाचकों से सुनने का कोई लाभ नहीं। आत्मज्ञानी पुरुषों से सुनने पर चन्द्रमा से निस्यन्दित सुधाधारा जैसी अमृत की कल्लोलिनी नदियां हमारे कर्णरन्ध्रों में प्रविष्ट होंगी। उपरोक्त श्लोक चन्द्रमा के इस अलंकार से युक्त है। जैसा भगवद्गीता में कहा गया है, "कृष्णभावनाभावित हो जाने पर ही विषयी अपनी विषयवासना को लात मार सकता है।" जब तक वह किसी उत्तम कार्य में नहीं लग जाता, तब तक जीव अपने तुच्छ कार्य से विरत नहीं हो सकता। प्राकृत-जगत् में जीव प्रकृति की मायिक क्रियाओं में फँसा पड़ा है, परन्तु श्रीकृष्ण की दिव्य क्रियाओं के आस्वादन का अवसर मिलने पर वह दूसरे सब अल्प सुखों को भूल जाता है। जब श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्धप्रांगण में बोलते हैं तो विषयी इसे केवल दो मित्रों का साधारण वार्तालाप समझता है, जबकि वास्तव में तो श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र से अमृत की कल्लोलिनी सी झरती है। अर्जुन ने इस दिव्यनाद का श्रवण किया और परिणाम में भवरोग के सम्पूर्ण मोह से मुक्त हो गया । श्रीमद्भागवत (१२.३.१५) में उल्लेख है, "उत्तमश्लोक भगवान् श्रीकृष्ण की शुद्धभक्ति के अभिलाषी को नित्य-निरन्तर उनके दिव्य गुणों और चरित का श्रवण करना चाहिए, जिससे हृदय के सारे अमंगल का नाश होता है।" भगवत्कृपा की बाट देखना श्रीमद्भागवत (१०.१४.८) में ही कहा है—"हे नाथ ! जो निरन्तर आपकी अहैतुकी कृपा की प्रतीक्षा में अपने पूर्वकृत पापों को भोगता हुआ
श्रवण-स्मरण की कला [ ७६ हृदय से, वाणी से और शरीर से निरन्तर आपको प्रणाम करता रहता है, वह मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।" श्रीमद्भागवत का यह वाक्य सब भक्तों का मार्गदर्शक है। भक्त को अपने पूर्वपापों के दुःख से तुरन्त मुक्त होने की आशा नहीं करनी चाहिए। कोई भी बद्धजीव इस कर्मभोग से मुक्त नहीं है, क्योंकि पूर्वकर्मों से निरन्तर सुख-दुःख की प्राप्ति का नाम ही संसार है। यदि कोई प्राकृत क्रियाओं से विरत हो गया है तो उसका फिर जन्म नहीं होगा। यह तभी सम्भव है कि जब वह कृष्णभावनाभावित कर्म के परायण हो जाय, क्योंकि ऐसे कर्मों का फल नहीं होता। अतः कृष्णभावनाभावित क्रियाओं में सिद्ध होते ही जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है। ऐसा पुरुष फिर प्राकृत- जगत् में जन्म नहीं लेगा। इसलिए जो भक्त कर्मफल से पूर्णतः मुक्त नहीं हुआ है, वह गम्भीरता से कृष्णभावनाभावित कर्म करता रहे, मार्ग में कितने ही व्यवधान क्यों न आयें। किसी बाधा की स्थिति में वह केवल श्रीकृष्ण का चिन्तन-स्मरण करता हुआ उनकी कृपा की बाट देखता रहे। यही उसका अवलम्बन है। यदि भक्त इस भाव से दिन बिताता है तो उसका वैकुण्ठगमन निश्चित समझना चाहिए। इन क्रियाओं के द्वारा वह भगवद्धाम में प्रविष्ट होने का दायभाक् अधिकार पा जाता है। दायभाक् पैतृक सम्पत्ति में पुत्र के कानूनी अधिकार को कहते हैं। इसी प्रकार शुद्धभक्त, जो अपने कृष्णभावना सम्बन्धी कर्तव्य के निर्वाह में सब प्रकार के कष्ट सहने को सन्नद्ध रहता है, भगवद्धाम का योग्य अधिकारी हो जाता है। स्मृति जिस किसी प्रकार से यदि कोई चित्त में श्रीकृष्ण से अपने नित्य सम्बन्ध को बसा लेता है तो इस का नाम स्मृति है। स्मृति के विषय में विष्णुपुराण का एक सुन्दर वाक्य है, "जिन भगवान् के स्मरणमात्र से सम्पूर्ण जीव समग्र कल्याण के भाजन बन जाते हैं, मैं उन्हीं अजन्मा और नित्य परम पुरुष की शरण हूँ।" पद्मपुराण में इसी स्मृति की विवेचना है—"मृत्युकाल में अथवा जीवनकाल में जिनके नाम का स्मरण करने से मनुष्यों के पापपुंज तत्काल भस्म हो जाते हैं, उन चित्स्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार है।" ध्यान मन से भगवान् के रूप, चिद्गुण, क्रीड़ा, सेवा, आदि का चिन्तन
८० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
करना ध्यान कहलाता है। ध्यान का किसी निर्विशेष अथवा शून्य से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार ध्यान सदा विष्णुरूप का ही किया जाता है। 'नृसिंहपुराण' में भगवान् के रूप के ध्यान का वर्णन है—"भगवान् के चरणकमलों का ध्यान दिव्य और प्राकृत सुख-दुःख की अनुभूति से सर्वथा परे है। इस ध्यान से परम पापात्मा भी जीवनभर के पापों से छूट सकते हैं।" 'विष्णुधर्म' में भगवद्गुणों के ध्यान के सम्बन्ध में कहा है—"निरन्तर कृष्णभावनाभावित रहकर भगवान् के दिव्य गुणों का स्मरण करने वाले जन सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ-गमन के योग्य बन जाते हैं।" भाव यह है कि शुद्ध हुए बिना कोई भगवद्धाम में प्रवेश नहीं पा सकता और भगवान् के चिद्गुण, रूप, लीला, आदि का स्मरण रखने मात्र से सब प्रकार के पापों से बचा जा सकता है। 'पद्मपुराण' में क्रीड़ाध्यान का उल्लेख है—"सर्वमाधुर्य सार, परम अद्भुत और ललित हरिचरित्रका जो निरन्तर ध्यान करता है, वह भव- बन्धन से छूट जाता है।" सेवाध्यान कतिपय शास्त्रों में प्रमाण हैं कि जो मनुष्य केवल सेवाध्यान भी करता है, उसकी भी सर्वाभीष्ट सिद्धि होती है और वह अपने नेत्रों से भगवान् का साक्षात्कार करता है। इस सन्दर्भ में ब्रह्मवैवर्त पुराण के अन्तर्गत एक सुन्दर कथा है। दक्षिण भारत के प्रतिष्ठानपुर में एक ब्राह्मण रहता था। वह सम्पन्न तो नहीं था परन्तु यह सोचकर सदा आत्मतृप्त रहता था कि पूर्वजन्म के पाप और श्रीकृष्ण की इच्छा के कारण ही उसे पर्याप्त धन- वैभव नहीं मिला। अतः उसे अपनी दरिद्रता की लेशमात्र भी ग्लानि नहीं थी; वह बड़ी शान्ति से रहता था। वह परम उदार था और कभी-कभी महान् आत्मज्ञानियों के प्रवचन सुनने जाता। ऐसी ही एक सभा में, जहाँ वह बड़ी श्रद्धा से वैष्णव आचार का श्रवण कर रहा था, उसने सुना कि ये क्रियायें मानससेवा के रूप में भी की जा सकती हैं। तात्पर्य यह है कि यदि कोई प्रकट रूप में वैष्णव क्रियाओं को न कर सके तो वह सेवा का ध्यान ही करे। ऐसा करने से वही फल प्राप्त होगा । ब्राह्मण अकिंचिन था, इसलिए उसने निश्चय किया कि वह बड़े भारी ऐश्वर्य के साथ भगवान् की सेवा करने का ध्यान ही करेगा। वह इस प्रकार करने लगा। कभी वह
श्रवण-स्मरण की कला [ ८१
गोदावरी में स्नान करता । स्नान के बाद एकान्त नदी तट पर आसन लगाकर प्राणायाम के अभ्यास से मन को एकाग्र करता । प्राणायाम का यह अभ्यास चित्त को यन्त्र के समान किसी एक वस्तु पर केन्द्रित करने के लिए है। प्राणायाम और आसनों का यही लाभ है। पूर्वकाल में साधारण मनुष्य भी भगवान् के स्मरण में मन को एकाग्र करना जानते थे; ब्राह्मण ने भी ऐसा अभ्यास किया । मन में भगवान् का रूप बस जाने पर वह ध्यान में भगवान् को बहुमूल्य वस्त्रों, अलंकारों, मुकुटों आदि से विभूषित करने लगा । फिर उसने भगवान् को दण्डवत् प्रणाम किया । इसके बाद मन्दिर-मार्जन का ध्यान करने लगा । मन्दिर-मार्जन करके वह बहुत से स्वर्ण और चाँदी के पात्रों में नदी का पवित्र जल लाने गया । गोदावरी से ही नहीं, अपितु गंगा, यमुना, नर्मदा और कावेरी से भी जल लाया । वैष्णवजन सामान्यतः भगवत्-अर्चन करते हुए मन्त्रों के द्वारा इन नदियों के जल का आह्वान करते हैं। मन्त्रोच्चारण के स्थान पर इस ब्राह्मण ने ध्यान किया है कि वह स्वयं स्वर्णपात्रों में भर-भर कर सब नदियों का जल ला रहा है । तत्पश्चात् उसने फल, फूल, धूप आदि अर्चन के सब पदार्थ जुटाए और उन्हें श्रीमूर्त्ति के सामने रखा । श्रीमूर्त्ति की प्रसन्नता के लिए जल, पुष्प, धूप आदि इन सब पदार्थों का सुन्दर रीति से अर्पण किया । फिर आरति की । इस प्रकार पूर्ण विधि से अर्चना सम्पन्न हुई । वह नित्य नियमित रूप से इसी प्रकार अर्चन करता था और यह क्रम वर्षों तक चलता रहा । फिर एक दिन ब्राह्मण ध्यान कर रहा था कि उसने श्रीमूर्त्ति के लिए कुछ खीर बनायी है; परन्तु वह इस भोग से प्रसन्न नहीं हुआ क्योंकि खीर बहुत गरम थी । इसलिए वह हाथ से छू कर देखना चाहता कि खीर भगवान् के खाने योग्य है या नहीं । जैसे ही उसने अपनी अंगुलो से खीर पात्र को स्पर्श किया कि वह जल गयी और उसका ध्यान भंग हो गया । अब वह क्या देखता है कि उसकी अंगुली वास्तव में जल गयी है। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । वह तो खीर को स्पर्श करने का केवल ध्यान ही कर रहा था, उसे यह आशा नहीं थी कि उसकी अंगुली सचमुच जल जायगी । जब वह इस प्रकार विचारमग्न था, तभी लक्ष्मीसहित वैकुण्ठ में विराजमान भगवान् नारायण हँस पड़े । उनकी हँसी को देखकर उनकी परिचर्या में तत्पर सभी लक्ष्मी देवियाँ उत्कण्ठावश इसका कारण पूछने लगीं। श्रीभगवान् ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, वरन् तत्काल ब्राह्मण को बुला भेजा । वैकुण्ठ का एक विमान ब्राह्मण को लेकर तत्क्षण भगवान्
८२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नारायण के सान्निध्य में पहुँच गया। तब भगवान् ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया। इस प्रकार बड़भागी ब्राह्मण को भगवान् और लक्ष्मीगण के सांनिध्य में नित्य वैकुण्ठवास प्राप्त हुआ। इस कथा से प्रकट होता है कि अपने धाम में विराजमान होने पर भी श्रीभगवान् सर्वव्यापी हैं। वैकुण्ठ में ही नहीं, अर्चन का ध्यान करते हुए ब्राह्मण के हृदय में भी वे बैठे थे । अतएव हम जान सकते हैं कि भगवान् भक्तों द्वारा ध्यान में अर्पित पदार्थों को भी ग्रहण करते हैं और इससे भक्त की अभीष्टसिद्धि हो जाती है।
अध्याय ११ भगवत्सेवा के नाना रूप दास्यभाव कर्मियों के मत में कर्मफल का अर्पण दास्य है; परन्तु रूप गोस्वामी आदि वैष्णव आचार्यों के अनुसार किसी-न-किसी रूप में भगवत्सेवा में निरन्तर संलग्न रहना दास्य का स्वरूप है। 'स्कन्दपुराण' में कहा है कि कर्मकाण्ड और वर्णाश्रम का आचरण करने वाले भक्त हैं। परन्तु जो यथार्थ में प्रत्यक्ष रूप से भगवत्सेवा में लगे रहते हैं, वे भागवत, अर्थात् शुद्धभक्त हैं। सकाम कर्मी अथवा वर्णाश्रमधर्म का पालन करने वाले शुद्धभक्त नहीं हो सकते । फिर भी, भगवान् को कर्मफल का अर्पण करते हैं, इस कारण उन्हें भी भक्त मान लिया है। जब अन्य कोई अभिलाषा नहीं रहती और वह भगवत्प्रेम से भरकर स्वाभाविक रागानुगा भगवत्सेवा करता है, तब उसे शुद्धभक्त समझना चाहिए। प्राकृत-जगत् के संसर्ग में आए सभी बद्धजीव न्यूनाधिक रूप में माया पर प्रभुत्व करना चाहते हैं। वर्णाश्रम पद्धति और तत्सम्बन्धी कर्तव्य इस विधि से निर्धारित हैं कि बद्धजीव स्वेच्छानुसार प्राकृत-जगत् को भोग सके, पर साथ ही शनैः-शनैः पारमार्थिक ज्ञान को भी प्राप्त हो जाय। वर्णाश्रमधर्म के अन्तर्गत ऐसे अनेक कर्तव्य हैं, जो कृष्णभावनाभावित भक्तियोग के अंग हैं। गृहस्थ भक्त वैदिककर्म और भक्ति के कर्तव्य, दोनों का आचरण करते हैं क्योंकि ये दोनों ही श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए हैं। गृहस्थ भक्त किसी वैदिककर्म का अनुष्ठान श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही करते हैं। पूर्व- वर्णन किया जा चुका है कि जिस भी क्रिया का लक्ष्य श्रीकृष्ण की तृप्ति करना हो, वह भक्ति है। श्रीरूप गोस्वामी भक्ति करने के योग्य पुरुष का वर्णन करते हैं। जिनमें थोड़ा कुछ भगवत्प्रेम का उदय हो गया है, वे कनिष्ठ अधिकारी अपनी भक्ति के विकास के अनुसार इन्द्रियतृप्ति से अरुचि अनुभव करते हैं। यदि इन्द्रियतृप्तिकारक क्रियाओं में कुछ भी आसक्ति शेष हो तो इन क्रियाओं
८४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु के फल का श्रीकृष्ण को अर्पण करना चाहिए । इसी का नाम दास्यभाव है, अर्थात् भगवान् स्वामी और भक्त उनका दास । ‘नारदीयपुराण’ में इस दास्यभाव को दिव्य बताया गया है। वहाँ उल्लेख है कि जो पुरुष मन, वचन और कर्म से निरन्तर भगवद्भक्ति के परायण है अथवा जो केवल इसकी अभिलाषा भी करता है, वह सब अवस्थाओं में जीवन्मुक्त है। सख्य सख्यभक्ति के दो भेद हैं—एक विश्वासवृत्ति और दूसरा मित्रवृत्ति । भगवद्भक्ति में विश्वास रखनेवाला क्रम से विधि-विधान का पालन करता है क्योंकि उसे यह दृढ़ श्रद्धा रहती है कि वह शुद्धसत्त्व में अवश्य स्थित हो जायगा । दूसरे प्रकार का सखाभाव श्रीभगवान् का हितैषी (सुहृद) बन जाना है। भगवद्गीता में कहा है कि प्रचारक भगवान् का परम प्रिय प्रेमपात्र है। गीता का गोपनीय सन्देश जनसाधारण में प्रसारित करने वाला श्रीकृष्ण का इतना प्यारा है कि जगत् में कोई भी उसकी तुलना नहीं कर सकता । महाभारत में द्रौपदी कहती है, “हे गोविन्द ! आपकी प्रतिज्ञा है कि मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता । मुझे इस पर विश्वास है, इसलिए महान् विपत्तियों में भी इसे याद कर-कर के प्राणधारण किए हुए हूँ।” द्रौपदी और उसके पति पाँचों पाण्डवों को दुर्योधन आदि बान्धवों ने बड़े- बड़े दुःख दिए । उनके दुःख इतने भयंकर थे कि महान् पराक्रमी और नैष्ठिक ब्रह्मचारी भीष्मदेव भी उनका विचार करके कभी-कभी रो पड़ते थे। उन्हें विस्मय होता कि यद्यपि पाण्डव इतने धर्मात्मा थे, द्रौपदी साक्षात् लक्ष्मी जैसी थी और स्वयं श्रीकृष्ण उनके बन्धु थे, फिर भी उन्हें इतना दुःख उठाना पड़ा । ऐसे अपार दुःख में भी द्रौपदी विचलित नहीं हुई । वह जानती थी कि श्रीकृष्ण उनके सुहृद हैं, अतः अन्त में विजय उन्हीं की होगी । श्रीमद्भागवत (११.२.५३) में भगवान् ऋषभ के पुत्र हवि राजा निमि से कहते हैं, “हे राजन् ! जो त्रिभुवन के ऐश्वर्य के लिए भी श्रीभगवान् के चरणकमलों की सेवा से जो देवताओं की भी चिर अभिलाषा है, विचलित नहीं होता, इसी को परम, आराध्य मानने के दृढ़ निश्चय से युक्त रहता है, वह उत्तम भक्त है ।’’ श्रीरूप गोस्वामी ने कनिष्ठ भक्त की सामान्य श्रद्धा को भगवान्
भगवत्सेवा के नाना रूप [ ८५ की भक्ति में अधिकार का कारण तथा भक्ति में दृढ़ विश्वास को भक्ति का का अंग कहा गया है । कभी-कभी अन्तरंग सखा की भाँति भगवान् के सेवन के लिए शुद्ध- भक्त मन्दिर के भीतर ही सो जाते हैं। भक्त के इस सख्य-व्यवहार को रागानुगा कहा जा सकता है। यद्यपि यह विधि है कि भगवत्-मन्दिर में कोई नहीं सो सकता, फिर भी यह रागानुगाभक्ति सख्य के वर्ग में मानी जा सकती है। आत्मनिवेदन आत्मनिवेदन के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (११.२६.३४) में भगवान् का सुन्दर कथन है—“जो पुरुष मेरे चरणों में पूर्ण समर्पण करके अन्य सब कर्मों को त्याग देता है, उसकी लोक-परलोक में मैं स्वयं रक्षा करता हूँ । आत्मनिवेदन के पथ पर उत्तरोत्तर आगे बढ़ने में मैं उसकी सहायता करता हूँ । ऐसा पुरुष साष्टि को प्राप्त हो चुका है।” भगवद्गीता में भी प्रमाण है कि जैसे ही कोई श्रीकृष्ण के चरणसरोज की शरण लेता है, श्रीकृष्ण उसकी बागडोर अपने हाथों में पकड़ लेते हैं और सम्पूर्ण पापों से मुक्ति का वचन देते हैं। वे अन्तरतर से उपदेश भी करते हैं जिससे वह परमार्थ के पथ पर शीघ्र अग्रसर हो सके । पूर्ण शरणागति का नाम ही आत्मनिवेदन है। प्रसंग के अनुसार ‘आत्म शब्द के विभिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं। इसका प्रयोग कभी ‘आत्मा’ के अर्थ में होता है तो कभी यह शरीर अथवा मन का निर्देश करता है । अतः पूर्ण आत्मनिवेदन का अर्थ अपने आत्मा, अपने मन और शरीर को भगवान् की सेवा में समर्पित कर देना है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने इस सम्बन्ध में अतिशय सुन्दर भजन गाया है। भगवच्चरणों में पूर्ण आत्मनिवेदन करते हुए वे कहते हैं, “मेरा मन, मेरा घर-परिवार, मेरा शरीर—जो कुछ भी मेरा है, हे नाथ ! वह सब आपकी सेवा में समर्पित है। अब आप जो चाहें उनके साथ वैसा ही करें । आप स्वामी हैं, मैं नित्यदास हूँ, इसलिए चाहें तो मुझे मार डालें अथवा इच्छा हो तो मेरी रक्षा करें । आपका पूर्ण अधिकार है, मेरा अपना कुछ नहीं ।” श्रीयामुनाचार्य ने भी भगवत्स्तवन में यही उद्गार अभिव्यंजित किए हैं—‘शरीर से मैं मनुष्य, देवता आदि जो कोई भी हूँ और जिस किसी गुण से युक्त हूँ, मुझे चिन्ता नहीं, क्योंकि यह सब त्रिगुणमयी माया का कार्य है, मैंने तो अपने-आपको आपके चरणकमलों में समर्पित कर दिया है ।' .
८६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'हरिभक्तिविवेक' में शरीर के समर्पण का प्रकार कहा गया है। भक्त कहता है, 'हे स्वामिन् ! बिका हुआ पशु अपने शरीर की रक्षा के लिए चिन्ता नहीं करता । मेरा शरीर-आत्मा आपको समर्पित हो गया है, इसलिए अपने रक्षण की चिन्ता से विरत हो गया हूँ।' भाव यह है कि अपने अथवा परिवार के रक्षण-मरण की चिन्ता न करे । यदि कोई वास्तव में शरीर-आत्मा से समर्पित हो गया है तो सदा स्मरण रखे कि उसका एकमात्र कार्य भगवत्सेवा के परायण रहना है । श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि सख्य और आत्मनिवेदन, भक्ति के ये दोनों अंग दुष्कर हैं, बहुत कम पाये जाते हैं और केवल उत्तर भक्तों के लिए ही साधना में सुखसाध्य हैं। भाव यह है कि शुद्ध भावभक्ति से युक्त आत्मनिवेदन बड़ा ही दुर्लभ है। यह तभी होगा जब पूर्ण रूप से भगवान् की इच्छा के परायण (शरणागत) हो जाय । निज प्रिय वस्तु का समर्पण श्रीमद्भागवत (११.११.४१) में भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, "हे सखे ! अपने पास जो-जो परम श्रेष्ठ वस्तु हो या संसार में जो प्रिय हो, उसे मेरे अर्पण करने से अनन्त लाभ होता है ।" भगवान् की प्रीति के लिए सब चेष्टा करना भगवान् के लिए सब चेष्टा करने का दृष्टान्त 'नारदपंचरात्र' में है । उल्लेख है कि भक्ति के अभिलाषी को भगवान् की सेवा के लिए सब लौकिकी-वैदिकी क्रियायें करनी चाहियें । तात्पर्य यह है कि भक्ति के शास्त्रविहित विधान का पालन करने के साथ-साथ भक्त को अपने व्याव- हारिक जीवन के कर्त्तव्यों का आचरण भी कृष्णभावनाभावित होकर ही करना चाहिए । जैसे किसी भक्त का कोई बड़ा उद्योग हो, तो वह इस लौकिक सम्पत्ति के फलों को भगवान् की सेवा में लगा सकता है। शरणापत्ति हरिभक्तिविलास' का वचन है, "जिस शरणागत भक्त को यह दृढ़ विश्वास है कि मैं भगवान् का हूँ और जो इस भाव के अनुरूप वास्तव में मन, वचन और कर्म से क्रिया भी करता है, वह यथार्थ दिव्य आनन्दमय का आस्वादन करता है।" नृसिंहपुराण में भगवान् नृसिंह कहते हैं—"हे देवदेव ! जनार्दन ! मैं आप की शरण में आया हूँ, इस प्रकार कहकर जो
भगवत्सेवा के नाना रूप [ ८७ शरण में आ जाता है, अपने उस आश्रित का मैं सब क्लेशों से उद्धार करता हूँ।” तुलसीसेवन ‘स्कन्दपुराण’ में तुलसी का माहात्म्य है, “जिसके दर्शन से पापों और रोगों का नाश होता है, स्पर्श से शरीर शुद्ध होता है, वंदन करने और सींचने से यमभय जाता रहता है, संरोपण करने से जो भगवान् की भक्ति देने वाली है और श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित करने से जो पूर्ण भगवत्प्रेम का दान करती है, उस तुलसीदेवी के चरणों में सादर प्रणाम करता हूँ।” अवैष्णव हिन्दुओं के घरों में भी तुलसी की विशेष शुश्रूषा की जाती है। महानगरों में तुलसी रखना बड़ा कठिन है, परन्तु फिर भी लोग इसे बड़ी सावधानी से लगाते हैं। वे इसे जल से सींच कर प्रणाम करते हैं क्योंकि भक्तिपथ में तुलसीसेवा बहुत महत्त्वपूर्ण है। ‘स्कन्दपुराण’ में तुलसीमाहात्म्य का एक अन्य वाक्य है, “तुलसी सर्वमंगलमयी हैं। इसे देखने, स्पर्श, स्मरण, स्तुति, वन्दना, श्रवण अथवा रोपण करने से सब प्रकार का कल्याण होता है। इन नौ विधियों से तुलसीसेवन करने वाला शाश्वत् काल तक वैकुण्ठ-जगत् में वास करता है।
अध्याय १२ भक्ति के अंग (२) शास्त्र-श्रवण श्रील रूपगोस्वामी के अनुसार, जो ग्रन्थ भक्तिमार्ग को प्रकाशित करे, वह शास्त्र है। श्रील मध्वाचार्य का वचन है कि रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद्, वेदान्तसूत्र आदि ग्रन्थ और इनके अनुगामी अन्य सब ग्रन्थ शास्त्र हैं। ‘स्कन्दपुराण’ में उल्लेख है, “जो वैष्णव शास्त्रों का निरन्तर पठन और श्रवण करते हैं, वे मनुष्यों में धन्य हैं, निस्सन्देह भगवान् श्रीकृष्ण उनसे प्रसन्न होते हैं। वैष्णवशास्त्रों की घर में अर्चना करने वाले पापों से छूट कर देवताओं के वन्दनीय बन जाते हैं।” नारदजी से कहा गया है, “हे नारद ! जो मनुष्य वैष्णवशास्त्रों को लिखकर घर में रखता है, उसके यहाँ साक्षात् श्रीमन्नारायण विराजते हैं।” श्रीमद्भागवत (१२.१३.१५) में कथन है, “यह श्रीमद्भागवत सारे वेदान्त का परम सार है। जो किसी प्रकार श्रीमद्भागवत में रस लेने लगता है, उसकी किसी अन्य साहित्य को पढने में रुचि नहीं होती। भाव यह है कि श्रीमद्भागवत के दिव्यरस से तृप्त हुआ भाग्यवान् ग्राम्यवार्ता में रस नहीं ले सकता।” मथुरामण्डल में वास ‘वराहपुराण’ में मथुरामण्डल की स्तुति है। भगवान् वराह पृथ्वी- वासियों से कहते हैं, “जो मथुरा को छोड़ अन्य स्थान में प्रेम करता है, वह मूढ़ मेरी माया द्वारा मोहित होकर संसार में चक्कर काटता रहेगा।” ‘ब्रह्माण्डपुराण’ में वचन है, “जो परमानन्दमयी सिद्धि तीनों लोकों के तीर्थों में जाने से भी नहीं मिलती, वह मथुरा के स्पर्शमात्र से प्राप्त हो जाती है।” शास्त्रों में स्थान-स्थान पर कहा गया है कि मथुरा
भक्ति के अंग (२) [ ८६ के श्रवण-स्मरण, कीर्तन, चाहने, दर्शन, गमन, स्पर्श, आश्रय लेने और सेवन करने से अभीष्ट-सिद्धि होती है । वैष्णवसेवन 'पद्मपुराण में वैष्णवसेवन की प्रशंसा में एक सुन्दर वाक्य है । शिवजी पार्वती से कहते हैं । "हे देवि ! सब प्रकार की आराधनाओं में भगवान् की अराधना सर्वोत्तम है । परन्तु भगवद्भक्तों की आराधना उससे भी बड़ी है ।" श्रीमद्भागवत (३.७.१६) में ऐसा ही वाक्य है, "मैं भक्तों का निष्कपट दास बनने का अभिलाषी हूँ, क्योंकि उनकी सेवा करने से भगवत्- चरणारविन्दों की शुद्धभक्ति सुलभ है। भक्तसेवन से सम्पूर्ण दुःखमय भव-उपाधियों का नाश होकर भगवान् में तीव्र रति का उदय हो जाता है ।" 'स्कन्दपुराण' में उल्लेख है—"शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिन्ह से युक्त शरीर वाले, सिर पर तुलसीमंजरी धारण किए तथा गोपीचन्दन लगाए हुए भक्त का यदि एक बार भी दर्शन हो जाय तो फिर पाप कैसे रह सकता है ?" श्रीमद्भागवत (१.१६.३३) की उक्ति है, "जिनके स्मरणमात्र से घर-परिवार शुद्ध हो जाता है, उन भक्तों के दर्शन, स्पर्श, चरण-परवारने, आसन देने तथा सेवा करने से होने वाले पुण्य का तो कहना ही क्या है ।" 'आदिपुराण' में स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "हे पार्थ ! जो अपने को मेरा भक्त कहता है, वह मेरा भक्त नहीं है। जो मेरे भक्त का भक्त है, वही मेरा यथार्थ भक्त है ।" कोई भी अपने निजी प्रयास से भगवान् को प्राप्त नहीं कर सकता । उनकी प्राप्ति उनके शुद्धभक्तों के माध्यम से ही होती है । अतएव वैष्णव आचार में पहली क्रिया भक्त को गुरु बनाकर उसका सेवन करना है । श्रील रूप गोस्वामी पुष्टि करते हैं कि भक्तिरसामृतसिन्धु में नाना शास्त्रों से समाहृत सारे उद्धरण महान् आचार्यों और भगवद्भक्तों को मान्य हैं। वैभव-महोत्सव पद्मपुराण में कहा गया है कि अपने वैभव के अनुसार सभी को भगवान् के सब उत्सवों और जयंतियों का आयोजन करना चाहिए । इनमें से ऊर्जव्रत का बड़ा माहात्म्य है। यह ऊर्जव्रत कार्तिक में मनाया जाता
६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु है। वृन्दावन में भगवान् के दामोदर रूप की अर्चना का विशेष आयोजन होता है। दामोदर नाम का सम्बन्ध श्रीकृष्ण की ऊखल-बन्धन लीला से है। कहा जाता है जैसे भगवान् दामोदर अपने भक्तों को अतिशय प्रिय हैं, वैसे ही दामोदर अथवा कार्तिक मास भी है। कार्तिक में ऊर्जव्रत की भक्ति का साधन विशेषतः मथुरा में करना चाहिए। बहुत से भक्त अद्यावधि इसका पालन करते हैं। वे कार्तिक में मथुरा अथवा वृन्दावन में वास करते हुए भक्तियोग का साधन करते हैं। पद्मपुराण में आया है, "अन्य स्थानों पर सेवा करने वाले को श्रीकृष्ण भोग और मोक्ष तो दे सकते हैं पर भक्ति नहीं देते, क्योंकि वह (भक्ति) भगवान् को वश में कर लेने वाली है। किन्तु मथुरा में कार्तिक मास में एक बार भी भगवान् दामोदर की सेवा कर लेने से मनुष्यों को वह भक्ति तत्काल ही प्राप्त हो जाती है। फिर उन्हें मुक्ति-भुक्ति की इच्छा नहीं रहती, वे केवल शुद्धभक्ति चाहते हैं।" तात्पर्य यह है कि यथार्थ उत्कण्ठा से रहित साधारण मनुष्यों को भगवान् अपनी भक्ति नहीं देते। परन्तु ऐसे व्यक्ति भी यदि कार्तिक मास में मथुरा में विधि से भक्ति का साधन करें तो वे सुगमता से भगवत्सेवा प्राप्त कर लेते हैं। जन्मदिन-यात्रा भगवान् के जन्मोत्सव आदि दिव्य क्रियाओं के सम्बन्ध में 'भविष्य- पुराण में उल्लेख है—"हे जनार्दन ! जिस दिन देवकी से आप प्रकट हुए, वह दिन बताइए, जिससे उस दिन हम महोत्सव मनायें। हे केशव ! हम आपके पूर्णतः शरणागत जन आपको इन महोत्सवों के द्वारा प्रसन्न करना चाहते हैं।" 'भविष्यपुराण' का यह वाक्य इस बात का प्रमाण है कि भगवत्- महोत्सव मनाने वाला अवश्य भगवान् की प्रीति-लाभ करता है। प्रगाढ़ भक्ति से श्रीमूर्त्ति-सेवन 'आदिपुराण' में उल्लेख है—"जो पुरुष निरन्तर नामकीर्तन और भगवत्सेवा में तन्मय होकर दिव्य सुख का आस्वादन करता है, वह भक्ति का पात्र है, उसे केवल मुक्ति कभी नहीं दी जाती।" मुक्ति का अर्थ है—भवबन्धन से छूट जाना। मुक्त हो जाने पर प्राकृत-जगत् में फिर जन्म नहीं लेना पड़ता। निर्विशेषवादी भगवान् में लीन होकर अपने स्वरूप को नष्ट करना चाहते हैं। परन्तु श्रीमद्भागवत
भक्ति के अंग (२) [ ६१ ] के अनुसार मुक्ति तो अपनी स्वाभाविक स्थिति को फिर से पा लेने की केवल प्रारम्भिक दशा है। भगवान् की भक्ति करना ही जीवमात्र की स्वाभाविक स्थिति है। 'आदिपुराण' के वाक्य से ज्ञान होता है कि भक्त केवल भक्ति करने में सन्तोष मानता है। वह भवबन्धन से कोई सी मुक्ति नहीं चाहता। भाव यह है कि जो भक्ति के परायण है वह भवबन्धन में नहीं है, चाहे ऐसा प्रतीत भले ही हो। भक्तगोष्ठी में श्रीमद्भागवत का आस्वादन श्रीमद्भागवत वैदिकज्ञानरूपी कल्पवृक्ष का परिपक्व अमृतफल है। वेद शब्द ज्ञान के सम्पूर्ण समवाय का वाचक है। मानवसमाज के लिए जिस भी ज्ञान की अपेक्षा है, वह सब श्रीमद्भागवत में पूर्ण रूप से प्राप्त है। वैदिक शास्त्रों में समाजशास्त्र, राजनीति, आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि ज्ञान के अनेक वर्ग हैं। ज्ञान के इन सभी वर्गों का वेदों में सांगोपांग प्रतिपादन हुआ है। वेद अध्यात्मविद्या में पूर्ण हैं और श्रीमद्भागवत को इस वेद रूप कल्पवृक्ष का परिपक्व अमृतफल कहा गया है। किसी भी वृक्ष की महिमा उसके फलों से ही होती है। उदाहरणार्थ, आम का पेड़ बड़ा मूल्यवान् समझा जाता है क्योंकि आम फलों का राजा है। पका हुआ आम उस वृक्ष का सर्वोत्तम उपहार है। श्रीमद्भागवत भी इसी प्रकार वेदकल्पतरु का पक्व फल हैं। जैसे तोते की चोंच से कटा हुआ फल अधिक मधुर हो जाता है, वैसे ही शुकदेव गोस्वामी के दिव्य मुखारविन्द से गायी जा कर भागवती कथा भी अधिक रसमय़ी हो गयी है। श्रीमद्भागवत को अखण्ड शिष्यपरम्परा से ग्रहण करना चाहिए। पेड़ पर चढ़े मनुष्यों द्वारा एक शाखा से दूसरी शाखा पर क्रम से उतर कर भूमि पर गिरा हुआ पक्व फल नष्ट नहीं होता। परम्परा से ग्रहण करने पर श्रीमद्भागवत भी अखण्ड (अविकृत) रहती है। भगवद्गीता में उल्लेख है कि दिव्यज्ञान परम्परा से ही हो सकता है। शास्त्र के यथार्थ प्रयोजन को जानने वाले प्रामाणिक आचार्य ही ज्ञान का संचार कर सकते हैं। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि श्रीमद्भागवत को भागवत पुरुष के मुख से सीखना चाहिए। भागवत का अर्थ है—"भगवान् का।" अतः भक्त को भी भागवत कहा जाता है और भगवान् की भक्ति से सम्बन्धित ग्रन्थ को भी भागवत कहा जाता है। श्रीचैतन्य महाप्रभु का आग्रह है कि श्रीमद्भागवत का यथार्थ रसास्वादन करने के लिए उसे
६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु भागवतपुरुष के मुखपद्म से ही सुने । श्रीमद्भागवत तो वास्तव में जीवन्मुक्तों के लिए भी आस्वाद्य हैं। स्वयं शुकदेव गोस्वामी ने कहा है कि यद्यपि वे माँ के गर्भ से मुक्त थे, परन्तु श्रीमद्भागवत का रसपान करने पर महा- भागवत भक्त बने। अतएव जो कृष्णभावनाभावित होने का अभिलाषी हो, वह भक्तगोष्ठी में श्रीमद्भागवत की कथा का आस्वादन करे। श्रीमद्भागवत (२.१.६) में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि वे निर्विशेष ब्रह्म में अत्यन्त निष्ठ थे, परन्तु पिता व्यासदेव के मुख से जब उन्होंने श्रीभगवान् की दिव्य लीलाकथा सुनी तो श्रीमद्भागवत में अतिशय अनु- रक्त हो गए। व्यासदेव भी आत्मज्ञानी थे और इस प्रकार दिव्यज्ञान की अपनी इस प्रौढ़ रचना को उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से शुकदेव गोस्वामी को प्रदान किया। शुद्धभक्तों का संग शुद्धभक्तों की गोष्ठी में श्रीमद्भागवत की वार्ता का माहात्म्य शौनक मुनि ने नैमिषारण्य की सभा में सूत गोस्वामी के सामने अभिव्यक्त किया है। शुद्धभक्त के क्षणभर के सत्संग की इतनी अधिक महिमा है कि स्वर्ग- मोक्षदायक पुण्य भी उसकी तुलना नहीं कर सकते। भाव यह है कि श्रीमद्- भागवत के अनुरागीजन किसी प्रकार का स्वर्ग अथवा निर्विशेषवादियों द्वारा चिर अभिलाषित मुक्ति नहीं चाहते। अस्तु, शुद्धभक्त के सत्संग के दिव्य माहात्म्य के समान कोई भी प्राकृतसुख नहीं हो सकता। 'हरिभक्तिसुधोदय' में प्रह्लाद महाराज और उनके पिता हिरण्यक- शिपु में एक संवाद है। वहाँ हिरण्यकशिपु प्रह्लाद से कहता है, "हे वत्स ! संग की बड़ी महिमा है। मनुष्य जिसका संग करता है, मणि के समान वह उसके गुण को धारण कर लेता है।" इस नियम के अनुसार यदि हम सुमन जैसे निर्मल भगवद्भक्तों का संग करेंगे और यदि हमारा हृदय स्वच्छ होगा तो हमसे भी वही कर्म बनेंगे। एक सन्दर्भ में एक अन्य दृष्टान्त यह है—यदि मनुष्य समर्थ है और स्त्री भी रुग्ण नहीं है तो दोनों के संग से गर्भाधान हो जायगा। इसी प्रकार, यदि अध्यात्मविद्या के दाता और ग्राहक दोनों सच्चे अधिकारी हैं तो अच्छा परिणाम होगा। भगवन्नाम का कीर्तन श्रीमद्भागवत (२.१.११) में हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे महामन्त्र के कीर्तन की बड़ी महिमा
भक्ति के अंग (२) [ ६३ है । शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से कहते हैं—"हे राजन ! यदि हरेकृष्ण महामन्त्र के कीर्तन में किसी का सहज अनुराग हो तो समझना चाहिए कि वह परम संसिद्धि को प्राप्त हो गया है ।" यह विशेष रूप से उल्लेख है कि कर्मफल के अभिलाषी सकाम कर्मी, परमेश्वर से एक होने की इच्छा वाले मुमुक्षु तथा सिद्धिकामी योगी केवल हरेकृष्ण महामन्त्र के कीर्तन से सम्पूर्ण संसिद्धियों को पा सकते हैं । शुकदेवजी ने इस कथन को 'निर्णीत' अर्थात् 'निश्चित' बताया है । शुकदेव मुक्तपुरुष थे; वे ऐसे किसी मत को स्वीकार नहीं करते, जो निर्णीत (सिद्ध) न हुआ हो । उन्होंने इस निर्णय पर बल दिया है कि जो मनुष्य दृढ़ता और स्थिरता से हरे- कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने लगा है, वह सकामकर्म, मनोधर्म और ध्यानयोग को लाँघ चुका है । 'आदिपुराण' में श्रीकृष्ण ने भी यही कहा है । वे अर्जुन से कहते हैं—"हे अर्जुन ! जो मेरे दिव्य नाम का गान करता है, वह मेरे ही सांनिध्य में रहता है । हे सखे ! मैं सत्य कहता हूँ । वह मुझे खरीद लेता है ।" 'पद्मपुराण' में उल्लेख है, "जिसने हजारों जन्मों तक भगवान् वासुदेव की सेवा की है, उसी की जिह्वा पर हरेकृष्ण महामन्त्र विराजता है ।" पद्मपुराण में कहा है, "भगवान् के पावन नाम और स्वयं भगवान् में कुछ भी भेद नहीं है । अतः भगवन्नाम भगवान् के समान ही पूर्ण, शुद्ध एवं नित्यमुक्त है । चैतन्यरसविग्रह कृष्णनाम चिन्तामणि-स्वरूप है; वह कोई प्राकृत ध्वनि नहीं है और न विकारी है ।" अतः जिसने अपनी इन्द्रियों को शुद्ध नहीं कर लिया है, ऐसा पुरुष कृष्णनाम का निरपराध उच्चारण नहीं कर सकता । भाव यह है कि प्राकृत विकारमयी कुंठित इन्द्रियाँ हरे- कृष्ण महामन्त्र का अच्छी प्रकार से उच्चारण नहीं कर सकतीं । परन्तु इस कीर्तन-पद्धति का सेवन करने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है, जिससे अति शीघ्र अपराधरहित जप होने लगता है । भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु का आग्रह है कि मल से चित्तरूप दर्पण को स्वच्छ करने के लिए सब लोग हरेकृष्ण महामन्त्र का जप-कीर्तन करें । हृदयशुद्धि हो जाने पर ही कृष्णनाम की यथार्थ महिमा समझ में आती है । जो हृदय को अशुद्ध बनाए रखना चाहते हैं, वे हरेकृष्ण जप के दिव्य लाभ से वंचित रह जाते हैं । अतः भगवान् के प्रति सेवाभाव का उत्साह के साथ विकास करना चाहिए, क्योंकि उससे वह निरपराध जप कर सकेगा । इसलिए गुरुदेव के मार्गदर्शन में शिष्य को एक साथ भगवत्सेवा और हरे- कृष्ण जप करने की शिक्षा दी जाती है । हृदय में स्वरूपभूत रागानुगा