भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
२३६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु की अनुगति की लालसा स्फुरित होती है। कृष्णविषयारति सीधे श्रीकृष्ण के लिए कभी अभिव्यक्त नहीं होती। इसके लिए गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण के किसी नित्य पार्षदों के चरणचिन्हों की अनुगति आवश्यक है। जब कृष्णविषयक रस आपस में मिल जाते हैं—जैसे सख्य, दास्य, और वात्सल्य का परस्पर मिल जाना, तो परिणाम में होने वाली रति को संकुला रति (स्वाद) कहते हैं। ऐसे मिश्रित स्वाद उद्धव भीम, मुखरा नामक यशोदा मैय्या की धात्री आदि भक्तों में उदित होते हैं। संकुलारति में भी किसी एक रस का निरन्तर प्राधान्य रहता है। उसी प्रधान रस को भक्त का श्रीकृष्ण से मुख्य सम्बन्ध माना जाता है। उदाहरण के लिए उद्धव का श्रीकृष्ण से सख्यभाव है। परन्तु उद्धव के चरित्र में श्रीकृष्ण के लिए दास्यभाव भी दृष्टिगोचर होता है। इसका नाम सम्भ्रम सख्यभाव है। दूसरी ओर श्रीदामा और सुदामा जैसे सखाओं द्वारा अभिव्यक्त सखाभाव सम्भ्रम से बिल्कुल रहित है। प्रीति जो भक्त निरन्तर श्रीकृष्ण को आराध्य मानते हैं वे कृष्ण के अनु- ग्राह्य माने जाते हैं। उनकी रति प्रीति कहलाती है। ऐसे भक्त को श्रीकृष्ण के प्रति अपनी आधीनता बड़ी प्रधान रहती है और इसलिये वह कदाचित् ही किसी अन्य रस में रुचि लेता है। मुकुन्दमाला में राज कुलशेखर कहते हैं—"हे प्रभो ! आप जीवों का संसार रूपी नरक से उद्धार करने वाले हैं परन्तु अपने विषय में मुझे यह चिन्ता नहीं। मुझे चाहे स्वर्ग में रहना हो अथवा पृथ्वी पर अथवा चाहे नरक में ही क्यों न भेज दिया जाये मेरे लिये इसका कोई महत्त्व नहीं। मेरी केवल इतनी ही अभिलाषा है कि शरत् कालीन कमलों के समान सुन्दर आपके चरणों का ध्यान मरते समय भी मैं करता रहूँ।" सख्य जहाँ तक सख्य का सम्बन्ध है, जो उच्च कोटि के भक्त श्रीकृष्ण के प्रायः तुल्य हैं वे भगवान् से सख्यभाव के सम्बन्ध में अधिकारी माने जाते हैं, सख्यभाव के स्तर पर नाना प्रकार के परिहास, अट्टहास आदि होते हैं। इस प्रकार के सख्य सम्बन्ध का एक उदाहरण श्रीमद्भागवत में है जहाँ श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं—"गोचारण के समय मेरे आज सुन्दर
स्थायिभाव के लक्षण [ २३७ कानन में पुष्प चयन के लिये चले जाने पर मेरे वे मित्र गोपबालक क्षण भर के लिये मेरे विरह को न सह सके। इसलिये जब उन्होंने मुझे ढूँढ निकाला तो पहले मैं, पहले मैं, यह कहकर उन्होंने स्पर्धा पूर्वक मुझे स्पर्श करते हुये आलिंगन किया।" एक मित्र ने श्रीकृष्ण को फटकारते हुए कहा, "हे दामोदर ! यद्यपि श्रीदामा ने तुम्हें हराकर तुम्हारे अभिमान को चूर-चूर कर दिया है परन्तु फिर भी बल के मिथ्या दम्भ से अपनी इस लज्जा जनक पराजय को छिपाने का प्रयास कर रहे हो।" वात्सल्य जब माता यशोदा ने सुना कि श्रीकृष्ण की गायों को कंस के बलशाली सेवक बलात् हरकर लिये जा रहे हैं और बेचारे गोपबालक अपनी गायों की रक्षा का प्रयास कर रहे हैं तो वे सोचने लगीं, "मैं इन निरीह बालकों को कंस के सेवकों के आक्रमण से कैसे बचाऊँ?" यह भक्त के वात्सल्य भाव का उदाहरण है। श्रीकृष्ण को वन से गोचारण करके लौटता देखकर प्रेम से द्रवित हुई माता यशोदा तुरन्त उनके कपोलों को अपनी अंगुलियों से छूते हुए प्यार करने लगीं। माधुर्य श्रीकृष्ण और उनके माता-पिता में पाई जाने वाली वात्सल्यरति से भी ऊपर मधुरारति है। श्रीकृष्ण और गोपांगनाएँ कटाक्ष, भ्रू-विलास, प्रियवाणी, और स्मितादि के द्वारा इसे अभिव्यक्त करते हैं। 'गोविन्दविलास' में एक वाक्य है—"श्रीमती राधारानी बड़ी ही उत्कंठा से श्रीकृष्ण का अन्वेषण कर रही थीं। उनकी यह उत्कंठा प्रायः निराशा में परिवर्तित हो चली थी।" जब मधुरारति की ऐसी गौण अभि- व्यक्ति होती है तो हास, आश्चर्य, उत्साह, विषाद, क्रोध, भय और कभी कभी जुगुप्सा का भाव भी होता है। इन सातों प्रकार के भावों से गौण रति बनती है। मुख्या मधुरारति में हास, आश्चर्य, उत्साह, विषाद, भय तथा क्रोध तो रहते हैं, परन्तु जुगुप्सा नहीं होती। इन सभी लक्षणों को आनन्दरस का बड़ा निधान माना जाता है। जब ये सात प्रकार के प्रेम बन्ध अभिव्यक्त होते हैं तो वे स्थायित्व को प्राप्त हो जाते हैं, जिससे मधुरारति का स्वाद बढ़ता है।
अध्याय ३३ भाव के गौण लक्षण हास दो गोपियों के भांडों में से दही की चोरी करने के बाद पकड़े जाने पर श्रीकृष्ण ने अपनी गोपी सखी से कहा, "हे सखि ! हे सुमुखि ! मैं शपथ खाता हूँ कि मैंने तुम्हारे भाँड की दही को देखा तक नहीं है; परन्तु फिर भी तुम्हारी सखी राधारानी निर्लज्जता पूर्वक मेरे मुख की गन्ध को सूंघ रही है। मानो मैंने ही इसकी दही खा ली हो। इसे इस प्रकार के असाधु व्यवहार से रोको ।" श्रीकृष्ण के इस प्रकार कहने पर राधारानी की सखियाँ अपनी हँसी को रोक नहीं सकीं। यह हासरति का उदाहरण है । विस्मय ब्रह्मा ने देखा कि सारी गायें और सारे गोप-बालक पीताम्बर और नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं। सभी बालक चतुर्भुजधारी थे और सैकड़ों ब्रह्मा उनकी आराधना कर रहे थे ! साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण के साथ होने के कारण उन गोप-बालकों का आनन्द खूब खिल रहा था। उस समय अपने विस्मय में ब्रह्मा कह उठे, "यह सब मैं क्या देख रहा हूँ ?" यह विस्मयरति का उदाहरण है। उत्साहरति शृंग की बनी वंशी की ध्वनि से जिसका आकाश गुंजायमान हो रहा था इस प्रकार की यमुना तट की भूमि पर श्रीकृष्ण के साथ लड़ने के लिये उद्यत गरजते हुए श्रीदामा ने बलपूर्वक अपनी कमर कस ली, अर्थात् लड़ने को कटिबद्ध हो गया । शोकरति श्रीमद्भागवत (१०.७.२५) में आंधी के रूप में आये तृणावर्त
भाव के गौण लक्षण [ २३६
दैत्य द्वारा श्रीकृष्ण के हरण का वर्णन है। श्रीकृष्ण को आकाश में उड़ा जाता देखकर सारी गोपियाँ उच्च-उच्च कंठ से रोने लगीं। नन्द- नन्दन को न देख पाने पर वे माता यशोदा को उपालम्भ देने लगीं। यह शोकरति का उदाहरण है। श्रीकृष्ण को कालिय नाग से लड़ता देखकर यशोदा मैय्या पुकार उठीं, "मेरा प्राणप्रिय कृष्ण कालिय सर्प की फणों में जकड़ा हुआ है; फिर भी हृदय टुकड़े-टुकड़े नहीं होता। इस शरीर की ऐसी कठोरता को धिक्कार है।" यह भी शोकरति का दृष्टान्त है। क्रोधरति जब अभिमन्यु की माता जटिला ने श्रीकृष्ण को एक रत्नहार पहने देखा तो वह समझ गई कि यह अवश्य उन्हें राधारानी ने भेंट किया है। वह क्रोध से भर गई और टेढ़ी भौंहों से उन्हें घूरने लगीं। यह क्रोधरति का उदाहरण है। जुगुप्सारति यामुनाचार्य जी कहते हैं, "जब से मैं श्रीकृष्ण के साथ नित्य नव- नव रसों का आस्वादन आदान-प्रदान करने लगा हूँ, तबसे अपने पिछले स्त्रीसंग की याद आते ही मेरे होंठ घृणा से सिकुड़ जाते हैं; यहाँ तक कि मैं उस विचार पर ही थूकने लगता हूँ।" यह जुगुप्सारति है। भयरति एक पुराना भक्त कहने लगा, "हे नाथ ! जब हम आपसे दूर होते हैं तो फिर आपके दोबारा दर्शनों के लिये बड़ी उत्कंठा होती है। हमारा जीवन दुःखों से भर जाता है। परन्तु जब आप फिर मिलते हैं तो विरह का भय उपस्थित हो जाता है। अतएव चाहे आप मिलें अथवा न मिलें हमें सदा नाना प्रकार का भय सताया करता है।" यह कृष्णरति में विरोधी भावों के संकुलन का उदाहरण है। ऐसी रति बड़ी ही आस्वाद्य होती है और कुशल रसाज्ञों ने इसे दही, शक्कर और कालीमिर्च के मिश्रण की उपमा दी है। इन सबका सम्मिलित स्वाद बड़ा ही रसमय होता है।
अध्याय ३४ भक्तिरसामृत अलग-अलग भक्तों के हृदय में उदित होने वाले भिन्न-भिन्न विशिष्ट भावों को विभाव कहते हैं । इनके फलस्वरूप प्रकट कटाक्ष, भय, विस्मय, हास आदि पूर्ववर्णित भाव अनुभाव कहलाते हैं । अनुभाव और विभाव को जन्म देने वाले नाना कारण संचारिभाव हैं । जब भी श्रीकृष्णलीला विषयक काव्य अथवा नाटक का आयोजन होता है तो श्रोताओं अथवा दर्शकों में नाना प्रकार के दिव्य सेवाभाव का उदय होता है और वे भिन्न-भिन्न विभाव, अनुभाव और संचारिभावों का आस्वादन करते हैं । जो देहात्मबुद्धि के स्तर पर है वह केवल नाना शास्त्रवचनों के आधार पर भिन्न-भिन्न भाव और अनुभाव का ऐसा वर्णन नहीं करे । इनकी अभिव्यक्ति भगवान् की दिव्य आह्लादिनी शक्ति का कार्य है । बस यह समझना चाहिये कि दिव्य स्तर पर प्रेम का नाना प्रकार से आदान-प्रदान होता है । प्रेम के ऐसे आदान-प्रदान को प्राकृत अथवा लौकिक समझने की भूल कभी न करें। महाभारत उद्योगपर्व में चेतावनी है कि अचिन्त्य वस्तु को तर्क का विषय नहीं बनाना चाहिये । वास्तव में अपनी वर्तमान दशा में वैकुण्ठ जगत् की क्रियाएँ हमारे लिये अचिन्त्य हैं । रूपगोस्वामी जैसे महापुरुषों ने वैकुण्ठजगत् की दिव्य क्रियाओं का संकेत करने का प्रयास अवश्य किया है; परन्तु पूर्ण रूप से ये क्रियाएँ वर्तमान में हमारे चिन्तन से परे ही रहेंगी । श्रीकृष्ण से होने वाले दिव्य सेवाभाव- विनिमय को तभी समझा जा सकता है जब कोई वास्तव में उनकी आह्ला- दिनी शक्ति के संस्पर्श में स्थित हो जाये । इस सन्दर्भ में रूपगोस्वामी आकाश के मेघों का उदाहरण देते हैं— आकाश में मेघ सागर से उठते हैं और बरस जाने पर उनका जल दुबारा नीचे गिरकर सागर को लौट जाता है । इस प्रकार सागर के समान ही श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति है । शुद्धभक्त रसधारी मेघ है और जब
भक्तिरसामृत [ २४१ वह दिव्य प्रेममयी सेवा से परिपूर्ण हो जाता है तो परिवर्षण के रूप में अपनी कृपा को बरसाता है और क्रमशः आह्लादिनी शक्ति कृष्णरूप सागर को लौट जाती है। कृष्णभक्तिरस : मुख्य और गौण भक्तियोग से मिलने वाले दिव्य आनन्द रस के दो भेद हैं—मुख्य भक्तिरस और गौणभक्तिरस। मुख्यभक्तिरस पाँच प्रकार का है और गौणभक्तिरस के सात दिव्य प्रकार हैं। मुख्यभक्तिरस के भेद हैं—शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य। गौणभक्तिरस के भेद हैं—हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक, वीभत्स। इस प्रकार मुख्य और गौण दोनों को मिलाकर भक्तिरस कुल बारह प्रकार का होता है। इन सबका अलग-अलग वर्ण माना गया है। ये क्रमशः इस प्रकार हैं—श्वेत, चित- कबरा, अरुण, शोण, श्यामवर्ण, कपोत, पीत, गौर, धूम्र, रक्त, कृष्ण तथा नील। बारह दिव्य रसों के अधिष्ठाता, बारह अलग-अलग अवतार हैं— कपिल, माधव, उपेन्द्र, नृसिंह, नन्दनन्दन, बलराम, कूर्म, कल्की, राघव, भार्गव, वराह, तथा मत्स्य। पूति, विकास, विस्तार, विक्षेप, और विक्षोभ—प्रेम के आदान- प्रदान में ये पाँच लक्षण रहते हैं। शान्तभक्तिरस में पूति, वीरभक्तिरस में विस्तार, करुणभक्तिरस में विक्षेप, तथा रौद्रभक्तिरस में विक्षोभ रहता है, इत्यादि। भक्ति की करुण दशा अनुभवरहित भक्तों को दुःखात्मक लग सकती है; परन्तु दक्ष भक्त तो करुण अवस्था में भी अनुभव होने वाले भावों को अत्यन्त आनन्दमय ही मानते हैं। उदाहरण के लिये, रामायण करुणरस से परिपूर्ण है। इसलिये कभी-कभी उसे दुःखात्मक माना जाता है; परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। रामायण में वर्णन है कि किस प्रकार राज्याभिषेक के अवसर पर भगवान् श्रीराम को उनके पिता ने वन में निर्वासित कर दिया था। उनके प्रस्थान के अनन्तर पिता महाराज दशरथ का देहान्त हो गया ! वन में उनकी अर्धांगिनी सीता देवी का रावण ने अपहरण किया और फिर एक महान् युद्ध छिड़ा। जब अन्त में सीता देवी रावण के चंगुल से छूटीं तो रावण और उसके सारे परिवार का नाश हो चुका था। जब सीता देवी घर लौट रहीं थीं तब उन्हें अग्निपरीक्षा देनी पड़ी और कुछ ही दिनों बाद उन्हें फिर वनवास मिला। रामायण का यह सब कथानक बड़ा ही करुण है और इसलिये कभी कभी पाठक को दुःखात्मक
२४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु प्रतीत होता है । परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । अन्यथा भगवान् राम के महाभक्त हनुमान् जी रामायण में वर्णित भगवान् राम के चरित्र का नित्य- पाठ क्यों करते । वास्तविकता यह है कि उपरोक्त भक्ति के १२ रसों में से किसी भी रस में सब कुछ दिव्य आनन्ददायी है । श्रीलरूप गोस्वामी इस सन्दर्भ में उन लोगों के लिये शोक करते हैं जो मिथ्या वैराग्य की अग्नि में तप रहे हैं । मिथ्या वैराग्य, शुष्क ज्ञान और कुतर्कों की अग्नि में तपते हुए वे भक्तियोग की उपेक्षा कर देते हैं। जो वेदों के कर्मकाण्ड और निर्विशेष ब्रह्म में आसक्त हैं वे भक्तियोग के दिव्य आनन्द का आस्वादन नहीं कर सकते । अतएव श्रील गोस्वामी का परामर्श है कि जिन्हें यह महामृत प्राप्त है वे भक्ति के रसिक बड़ी सावधानी से शुष्क ज्ञानियों, स्वर्ग के अभिलाषी कर्मियों और निर्विशेष मोक्षकामियों से अपनी भक्ति की रक्षा करें । भक्तों को अपने भगवत्प्रेम रूप महारत्न को चोरों से बचाना चाहिये । भाव यह है कि शुद्धभक्त को उन्हें भक्तियोग और उसके विभिन्न तात्त्विक पक्षों का विवरण नहीं सुनाना चाहिये, जो केवल शुष्क ज्ञानी हैं अथवा मिथ्या वैराग्य का अभिमान रखते हैं । जो भक्त नहीं हैं उनके लिये भक्तिरस सर्वथा दुरूह है । अभक्त इस भक्तिरस के महत्त्व को, इसकी महिमा-गरिमा को कभी नहीं समझ सकता । उन्हें भक्तियोग का लाभ कभी नहीं मिल सकता । जिन्होंने भगवान् के चरणों में अपना जीवन-सर्वस्व चढ़ा दिया है वे भक्तजन ही यथार्थ भक्ति- रसामृत का आस्वादन कर सकते हैं । भक्त जब भावना के पथ का उल्लंघन करके शुद्ध सत्त्व की सर्वोच्च भावभूमि पर आरूढ़ हो जाता है तब हृदय का सब प्रकार के दोषों से परिष्कार हो जाता है । जीवन की उस शुद्ध अवस्था में इस अमृत का आस्वादन हो सकता है । आस्वादन की इसी योग्यता का नाम रस है । इति भक्तिरसामृतसिन्धौ भक्तिरससामान्य निरूपणनामा दक्षिणो विभागः ॥ इति भक्तिवेदान्त भाष्ये दक्षिणो विभागः ॥२॥
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अथ पश्चिमो विभागः मुख्यभक्तिरस
अध्याय ३५ शान्तरस श्रील रूपगोस्वामी सनातन-स्वरूप श्रीभगवान् को सादर प्रणाम करते हैं, जो नित्य मनोहर रूपधारी हैं और जिनके लिये शुद्धभक्त निरन्तर प्रेममयी सेवा में संलग्न रहते हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के इस पश्चिम विभाग में पाँच प्रकार के मुख्य भक्तिरस अर्थात् शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य ओर माधुर्य का वर्णन है। इन पाँचों तत्त्वों का यहाँ विशद रूप से प्रतिपादन किया जायगा। इसलिये इन्हें इस भक्तिरस रूपसागर की पश्चिम दिशा में उठने वाली पाँच लहरियों की उपमा दी गई है। जब कोई निरन्तर शुद्धसत्त्व में स्थिर रह सकता है तो उसकी अवस्था भक्तिरस के शान्तरस में समझी जाती है। बहुत से महर्षियों को यह शान्त अवस्था तप-त्याग और इन्द्रियसंयम के लिये ध्यान करने से उपलब्ध हो चुकी है। ऐसे ऋषि सामान्यतः ध्यानयोगी कहलाते हैं और प्रायः उनकी प्रवृत्ति निर्विशेष ब्रह्म के दिव्यानन्द को भोगने की ओर रहती है। श्रीभगवान् के निज संग से प्राप्त होने वाले दिव्य आनन्द रस का उन्हें प्रायः कोई आभास नहीं होता। वास्तव में परम पुरुष के संग में प्राप्त होने वाला दिव्य आह्लाद निर्विशेष ब्रह्मानुभूति से प्राप्त आनन्द से कहीं बढ़कर है क्योंकि इसमें श्रीभगवान् के सनातन रूप का सीधा साक्षात्कार होता है। निर्विशेषवादी भगवान् की लीलाकथा नहीं सुनते; इसीलिये उन्हें साक्षात् श्रीभगवान् के संग से होने वाला दिव्य सुख नहीं मिलता। इसलिये वे उस भगवद्गीता की वार्ता से भी कोई दिव्यसुख नहीं पाते, जिसे स्वयं श्रीभगवान् ने अर्जुन को सुनाया। उनकी निर्विशेष मनोवृत्ति का प्रधान सिद्धान्त उन्हें वह दिव्य सुख नहीं लेने देता जिसका आस्वादन परम पुरुष के संग में भक्तजन करते हैं। इसीलिये भगवद्गीता पर निर्विशेष भाष्य उत्पातकारी सिद्ध होता है, क्योंकि गीता के दिव्य आनन्द को जाने बिना निर्विशेषवादी उसे अपनी
२४६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सुविधा के अनुसार अर्थ देना चाहते हैं । परन्तु यदि कोई निर्विशेषवादी शुद्धभक्त के संग में आ जाये तो वह अपनी निर्विशेष ब्रह्मानुभूति से ऊपर पहुँच सकता है। अतएव बड़े-बड़े ऋषियों को भी परमोच्च दिव्य आनन्द के लिए भगवान् के विग्रह की आराधना का परामर्श दिया गया है। अर्चा विग्रह की आराधना किये बिना 'भगवद्गीता' और 'श्रीमद्- भागवत' जैसे शास्त्रों को नहीं समझा जा सकता। जो दिव्य शान्त अवस्था में हैं, उन महर्षियों को भगवान् के चतुर्भुज नारायण रूप का प्रारम्भ में आश्रय लेना चाहिये । ध्यानयोगियों के लिये विधान है कि वे भगवान् विष्णु के रूप का ध्यान करें, जैसा कपिलमुनि ने सांख्ययोग में बताया है। दुर्भाग्यवश बहुत से ध्यानयोगी किसी शून्य पर ध्यान करने का प्रयास करते हैं और जैसा भगवद्गीता में कहा है, इसके परिणाम में उन्हें केवल कष्ट ही कष्ट होता है। कोई सफलता नहीं मिलती। जब किन्हीं तपोनिष्ठ संत पुरुषों ने भगवान् विष्णु के चतुर्भुज रूप को देखा तो वे कहने लगे, “यह भगवान् का चतुर्भुज रूप है। ये घनश्याम आकृति प्रभु सारे रसों के निधान, आनन्दराशि और हमारे जीवन के केन्द्र हैं। वास्तव में जब हम विष्णु के शाश्वत् रूप को देखते हैं तो परमहंसों के साथ हम भी अविलम्ब भगवान् की माधुरी पर मोहित हो जाते हैं।” संत पुरुषों द्वारा भगवान् विष्णु का यह आस्वादन शान्तरस में होता है। प्रारम्भिक साधक कठोर तप-त्याग के द्वारा प्राकृत बन्धन से मोक्ष पाने का प्रयास करते हैं और ऐसा करते-करते निर्विशेष ब्रह्म साक्षात्कार तक पहुँच जाते हैं। इस ब्रह्मभूत मुक्तावस्था में जैसा भगवद्गीता में बताया गया है, जीव प्रसन्न, शोक और आकांक्षा से मुक्त तथा प्राणीमात्र में समभाव वाला हो जाता है। जब भक्त भक्ति के शान्तरस में स्थिर होता है, तो वह भगवान् के विष्णु रूप का आस्वादन करता है। वास्तव में सम्पूर्ण वैदिक संस्कृति का लक्ष्य भगवान् विष्णु को जानना है। ऋग्वेद में एक मन्त्र कहता है कि, सभी संत पुरुष भगवान् विष्णु के चरणकमलों के ध्यान में ही नित्य संलग्न रहा करते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार मूर्ख नहीं जानते कि विष्णु जीवन के परम लक्ष्य हैं। सम्पूर्ण प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों का निष्कर्ष है कि जब कोई विष्णु को समझ जाता है तभी उसके भक्तियोग का प्रारम्भ होता है। यदि योग्य गुरु के मार्गदर्शन में भक्ति का उत्तरोत्तर सेवन किया जाये तो भक्ति के अन्य पक्ष भी शनैः शनैः स्फुरित हो जायेंगे। शान्त
शान्तरस [ २४७ रस की इस अवस्था में दैत्यों को भी गति देने वाले भगवान् विष्णु को देखा जा सकता है। उनका साक्षात्कार किया जा सकता है। ऐसे भक्त भगवान् को सच्चिदानन्दघन, आत्मारामों में शिरोमणि, परमात्मा परब्रह्म, आत्मसंयमी, शुद्ध भक्तों पर कृपा करने वाले और किसी भी लौकिक परिस्थिति से परे अनुभव करते हैं। सन्त पुरुषों द्वारा संभ्रम और सम्मान के साथ भगवान् विष्णु के इन गुणों का ग्रहण शान्तरस का लक्षण माना जाता है। शान्तरस की इस अवस्था की प्राप्ति निर्विशेषवादियों को तभी हो सकती है जब वे शुद्ध भक्तों के संग में हों; अन्यथा ऐसा नहीं हो सकता। ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद जब कोई जीवन्मुक्त पुरुष भगवान् विष्णु के शुद्धभक्त के संग में आता है और आज्ञानुवर्ती विनम्रभाव से भगवान् श्रीकृष्ण की शिक्षा को अर्थ का अनर्थ किये बिना स्वीकार कर लेता है तब वह भक्तियोग के शान्तरस में सिद्ध हो जाता है। शान्तरस में सिद्ध संत पुरुषों के सर्वोत्तम उदाहरण सनक, सनातन, सनन्दन और सनत्कुमार हैं। ये चारों कुमार, जिन्हें चतुस्सम कहा जाता है, ब्रह्मा के पुत्र हैं। जन्म के बाद इन्हें पिता से आज्ञा मिली थी कि वे गृहस्थ बनकर मानव समाज का विस्तार करें। परन्तु उन्होंने इस आज्ञा को नहीं माना। उन्होंने कहा वे निर्णय कर चुके हैं कि गृहस्थ जीवन के प्रपंच में नहीं फसेंगे; इसके स्थान पर आत्मसिद्धि के लिये संत ब्रह्मचारियों के रूप में ही रहेंगे। इस प्रकार ये संत पुरुष करोड़ों वर्षों से हैं; परन्तु अब भी इनका स्वरूप चार- पांच वर्ष के बालकों जैसा है। इनका श्वेत वर्ण है, शरीर दिव्य ज्योति से दीप्त है और निरन्तर दिगम्बरधारी हैं। ये चारों निरन्तर एक साथ रहते हैं। चारों कुमारों की एक प्रार्थना में इस प्रकार घोषणा है, “हे मुकुन्द !, हे मुक्तिदाता कृष्ण ! जब तक नवतमाल की नीलद्युति वाले आपके सच्चिदानन्दघन रूप का दर्शन नहीं हो जाता तभी तक निर्विशेष ब्रह्म संतों को सुखदायी लगता है।” संत पुरुष की योग्यता का वर्णन 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में इस प्रकार है-संत पुरुष वह है जो यह पूर्ण रूप से जानता हो कि केवल भक्तियोग का आचरण करने से उसकी मुक्ति निश्चित हो जायगी। वह निरन्तर भक्ति के विधिविधान में स्थित रहता है और साथ ही भव-बन्धन से छूट जाना चाहता है। संत पुरुष इस प्रकार सोचते हैं, “वह दिन कब होगा जब मैं अकेले
२४८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु पर्वत की कन्दरा में रह सकूँगा ? वह दिन कब होगा जब मैं केवल कौपीन धारण कर काम चला सकूँगा ? कब ऐसा होगा जब थोड़े से फल-फूल खाने से मेरी तृप्ति हो जाया करेंगी ? ऐसा कब होगा जब ब्रह्मज्योति के स्रोत भगवान् मुकुन्द के चरण युगल अरविन्द का मैं निरन्तर स्मरण करता रहूँगा ? इस प्रकार रहते हुए कब मैं अपने दिन रात को सनातन काल के क्षुद्र क्षण समझ सकूँगा । भगवान् की कीर्ति का गान करने वाले भक्त और स्वरूपप्राप्त पुरुष निरन्तर हृदय में भगवान् के लिये प्रेमभाव को धारण किये रहते हैं। इस प्रकार शान्तभाव रूप चन्द्रमा उन पर अमृत बरसाया करता है और वे सन्त कहलाते हैं। सन्त पुरुषों में वेदों और विशेषतः उपनिषदों को पढ़ने की, निरन्तर एकान्त स्थान में रहने की, सदा-सर्वदा श्रीकृष्ण के शाश्वत् रूप के चिन्तन, विद्या की प्रधानता, कृष्णरूप के दर्शन, विष्णु रूप के दर्शन, ज्ञानी भक्तों के साथ सम्पर्क करने और अपने समान उच्च पुरुषों के साथ वेदों की वार्ता करने की ओर स्वाभाविक प्रवृति रहती है। अतः ये गुण सन्त पुरुष को शान्तरस के स्तर पर उठाने वाले उद्दीपन हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में उल्लेख है कि जो सब उपनिषद् आदि वैदिक शास्त्रों के अध्ययन के लिए भगवान् ब्रह्मा द्वारा आयोजित पुण्य गोष्ठी में एकत्र हुए थे वे सब यदुवंश शिरोमणि श्रीकृष्ण के प्रेम से भाव-विह्वल हो उठे। वास्तव में उपनिषदों के स्वाध्याय का उद्देश्य भगवान् के तत्त्व को जानना है। संसार का निराकरण तो उपनिषदों का केवल एक आनुषंगिक विषय है। दूसरा विषय है निर्विशेष साक्षात्कार के बाद निर्विशेष ब्रह्म का उल्लंघन करने पर जब कोई भगवान् के संग में आता है तब उपनिषदों के स्वाध्याय का परम प्रयोजन सिद्ध होता है। भगवान् के चरणों में अर्पित तुलसी को सूँघना, उनके शंख की ध्वनि को सुनना, गोवर्धन जैसे पुण्य पर्वत, वृन्दावन जैसे पुण्य वन को देखना; गंगा तट पर जाना; खाना, सोना, मैथुन और भय—इन शारीरिक आवश्यकताओं को जीत लेना; काल के सर्वसंहारत्व को जानना; कृष्ण- भावना परायण भक्तों से निरन्तर संग करना—ये सब संत पुरुषों को शान्तरस में आरूढ़ कर भक्तिरस की उच्च अवस्था में पहुँचा सकते हैं इसलिये इन्हें शान्तरस के विभाव कहा जाता है। श्रीमद्भागवत (३.१५.४३) में सनकादि चार कुमारों का एक वाक्य है। उसके अनुसार जब वे वैकुण्ठ लोक में भगवान् का दर्शन करने के
शान्तरस [ २४६ लिये गये तो उन्हें प्रणाम करने के लिये झुकने पर भगवान् के चरणकमल के जल से मिश्रित तुलसी की सुगन्ध ने उनकी नासिका में प्रवेश किया और तुरन्त उनके चित को आकृष्ट कर लिया। यद्यपि ये चारों संत पुरुष निरन्तर निर्विशेष ब्रह्म में लीन रहते थे; परन्तु भगवान् के संग से और तुलसी को सूँघने से उनके शरीर में तुरन्त रोमांच हो आया। यह सिद्ध करता है कि ब्रह्म साक्षात्कार को प्राप्त पुरुष भी यदि शुद्धभक्ति परायण भक्तों का संग करे तो वह भी अविलम्ब भगवान् के सविशेष साकार रूप की ओर आकृष्ट हो जायगा। भक्तियोग के शान्तरस में सिद्ध महर्षियों के लक्षण अर्थात् अनुभाव इस प्रकार हैं—वे अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग में स्थिर रखते हैं और अवधूतों के समान चेष्टा करते हैं। अवधूत उस उच्च कोटि के योगी को कहा जाता है जो किसी सामाजिक, धार्मिक अथवा वैदिक परिपाटी को नहीं मानता। वे देख-देख कर चलते हैं; बोलते हैं तो ज्ञानमुद्रा का प्रदर्शन करते हैं, अर्थात् तर्जनी और अंगूठे को जोड़े रहते हैं। वे नास्तिकों से द्वेष नहीं करते और न ही भक्तों में अधिक रुचि रखते हैं। ऐसे पुरुषों के लिए मुक्ति और विषयपरायण जीवन से अनासक्ति का बहुत महत्त्व है। वे निरन्तर उदासीन बने रहते हैं और उनमें ममता और अहंमता का अभाव रहता है। वे बहुत गम्भीर और मौन रहते हैं; परन्तु उनके विचार पूर्ण रूप से भगवान् पर केन्द्रित रहते हैं। इन असाधारण अनुभावों का विकास शान्तरस में स्थित भक्तों में होता है। नासिका के अग्रभाग में दृष्टि को केन्द्रित करने के सम्बन्ध में 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में एक भक्त का कथन है। 'किसी योगी को ऐसा करते देखकर वह बोला, "यह योगी अपनी दृष्टि को नासाग्र में एकाग्र कर रहा है। इससे प्रतीत होता है कि इसे अपने अन्तर में भगवान् के शाश्वत् रूप का साक्षात्कार हो चुका है।' कभी-कभी शान्तरस में भक्त जँहाई लेता है, अंगड़ाई लेता है, किसी को उपदेश करता है, भगवान् के स्वरूप को प्रणाम करता है, प्रार्थना करता है और अपने शरीर से प्रत्यक्ष रूप से उनकी सेवा करना चाहता है। ये शान्तरस में स्थिर भक्तों के कुछ साधारण लक्षण हैं। किसी भक्त को जँहाई लेते देखकर अन्य भक्त कहने लगा, 'हे योगी ! लगता है तुम्हारे हृदय में कुछ भक्तिरस अवश्य है जिस कारण तुम जँहाई ले रहे हो।" शान्तरस में कभी-कभी पाया जाता है कि भक्त भूमि पर लोटने लगता है, उसे रोमांच हो उठता है और सम्पूर्ण शरीर कांपने
२५० ] भक्तिरसामृतसिन्धु लगता है। इस प्रकार प्रेमसमाधि के विभिन्न लक्षण इन भक्तों में स्वतः प्रकाशित हो जाते हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में उल्लेख है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण अपने पाञ्चजन्य शंख का वादन कर रहे थे तो कन्दरावासी महर्षियों ने तुरन्त प्रतिक्रिया की। इससे उनकी समाधि खुल गई थीं। उन्होंने देखा कि उनके शरीर में रोमांच हो आया है। कभी-कभी शान्तरस में भक्तगण निर्वेद, शान्ति, हर्ष, मति, स्मृति, विषाद, हर्ष, आवेग और वितर्क आदि संचारि- भावों को अभिव्यक्त करते हैं। एक आत्मज्ञानी विषाद से तुरन्त कम्पित हो उठा। वह सोच रहा था कि उसके समय का अपव्यय हो रहा है। भाव यह है कि ऋषि को शोक हुआ कि भगवान् द्वारका में स्वयं विराजमान हैं, परन्तु फिर भी ध्यान में मग्न होने के कारण वह उनके दर्शनों से वंचित है। जब कोई योगी सब प्रकार के मनोधर्मों से मुक्त होकर ब्रह्मभूत हो जाता है तो उसकी अवस्था को देहात्मबुद्धि से परे समाधि कहा जाता है। उस अवस्था में जब वह भगवान् की दिव्य लीला कथा को सुनता है तो देह पुलकित हो उठती है। ब्रह्म-साक्षात्कार के द्वारा निर्विकल्प समाधि की अवस्था को पहुँचा भक्त जब भगवान् श्रीकृष्ण के शाश्वत् स्वरूप के संस्पर्श में आता है तो उसका दिव्य आनन्द अनन्त गुणा बढ़ जाता है। एक महर्षि ने किसी दूसरे से जिज्ञासा की थी, "हे सखे ! क्या तुम समझते हो कि जब मेरे अष्टांगयोग की सिद्धि हो जायेगी तो मैं भगवान् के शाश्वत् रूप को देख सकूँगा ?" यह शान्तरस में स्थित भक्त की जिज्ञासा का उदाहरण है। सूर्यग्रहण के अवसर पर जब भगवान् श्रीकृष्ण अपने अग्रज बलराम और बहन सुभद्रा को साथ लेकर रथ पर सवार होकर कुरुक्षेत्र पधारे तो बहुत से ध्यानयोगी भी वहाँ आये। जब इन योगियों ने भगवान् कृष्ण- बलराम को देखा तो वे कह उठे कि अब जबकि उन्होंने भगवान् की अनु- पम विग्रह ज्योति को देख लिया है, वे निर्विशेष ब्रह्म साक्षात्कार से मिलने वाले दिव्य सुखको भुला बैठे हैं। इस सन्दर्भ में ही एक योगी ने श्रीकृष्ण के पास जाकर कहा, "हे प्रभो ! आप सब दिव्य अवस्थाओं से परे अप्राकृत आनन्द से परिपूर्ण हैं। अतएव दूर से आपको देख लेने मात्र से ही मैं इस निष्कर्ष पर पहुँच गया हूँ कि मेरे लिये निर्विशेष ब्रह्म के आनन्द में स्थित होने की कोई आवश्यकता नहीं है।" जब एक महान् योगी को श्रीकृष्ण के पाञ्चजन्य शंख की ध्वनि ने
शान्तरस [ २५१ ध्यानसमाधि से जगा दिया तो वह अविभूत हो उठा, इतना अधिक कि वास्तव में अपने सिर को भूमि पर बजाने लगा । उसकी आँखें प्रेमभाव के अश्रुओँ से भर आईं और वह अपने योग-अभ्यास के सारे विधि-विधान का उल्लंघन कर बैठा । इस प्रकार उसने ब्रह्म-साक्षात्कार की पद्धति की एकदम उपेक्षा कर दी । बिल्वमंगलठाकुर अपने ग्रन्थ 'कृष्णकर्णामृत' में कहते हैं—'निर्वि- शेषवादी चाहें तो निर्विशेष ब्रह्म को भजते रहें। यद्यपि मैं पहले ब्रह्म- साक्षात्कार के पथ पर दीक्षित हुआ था । पर अब एक नटखट बालक द्वारा मार्गभ्रष्ट हो चुका हूँ, जो बहुत चंचल है और गोपियों में अत्यासक्त है। अब उसी ने मुझे अपना दास बना लिया है। ऐसे में मुझे ब्रह्मसाक्षात्कार के पथ का विस्मरण हो गया है।" बिल्वमंगल ठाकुर पहले परतत्त्व के ब्रह्मसाक्षात्कार में दीक्षित थे। परन्तु बाद में वृन्दावन में श्रीकृष्ण का संग करके वे कुशल भक्त बन गये । यही शुकदेव गोस्वामी के साथ हुआ । वे भी भगवान् की कृपा से निर्विशेष ब्रह्म के पथ को छोड़कर भक्तिमार्ग में आ गये । शुकदेव गोस्वामी और बिल्वमंगल ठाकुर, ये दोनों ही परतत्त्व के निर्विशेष स्वरूप को छोड़ कर भक्तिमार्ग में आये थे। अतएव ये शान्तरस में स्थित भक्तों के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। कुछ अधिकारियों के अनुसार इस अवस्था को रसों के अन्तर्गत नहीं माना जा सकता । परन्तु श्रील रूपगोस्वामी कहते हैं कि चाहे कोई इसे रस न भी माने; परन्तु यह तो मानना ही होगा कि इससे भक्तियोग का प्रारम्भ होता है। परन्तु यदि कोई इसके आगे भगवान् की वास्तविक सेवा की ओर नहीं बढ़ता तो उसे रस के स्तर पर नहीं समझा जा सकता । इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव को स्वयं यह उपदेश दिया है, "स्थिर अवस्था में मेरे निज रूप में निष्ठा होती है। उसका नाम शान्तरस है।" इस अवस्था में स्थिति के बिना कोई भी शुद्ध भक्तियोग नहीं कर सकता । भाव यह है कि कम से कम शान्तरस में स्थित हुए बिना कोई भी भगवान् के निज रूप में निष्ठ नहीं हो सकता ।
अध्याय ३६ प्रीतिभक्तिरस श्रीधर स्वामी जैसे आचार्यों ने प्रीति को भक्तिरस का एक सिद्धरूप माना है। यह ठीक शान्तरस के ऊपर है और दास्यरस के विकास के लिये अनिवार्य है। 'नामकौमुदी' नामक शास्त्र में इस अवस्था को श्रीकृष्ण के लिये रति स्थायिभाव माना है। शुकदेव आदि आचार्य प्रीति की अवस्था को शान्तरस में मानते हैं। चाहे जो हो, इस प्रीति का भक्तजन नाना स्वादों में आस्वादन करते हैं। इसलिये इसका सामान्य नाम प्रीति है अर्थात् श्रीकृष्ण के लिये शुद्ध रति। दास्यभाव वाले भक्त श्रीकृष्ण में सम्भ्रम प्रीति रखते हैं । गोकुल (इस लोक में वृन्दावन ) के कुछ निवासी श्रीकृष्ण में इसी प्रकार का स्नेह रखते हैं। वृन्दावनवासी कहते हैं, "श्रीकृष्ण निरन्तर हमारे सामने घनश्यामाकृति में अभिव्यक्त रहते है । उन्होंने अपने करारविन्द में अद्भुत वंशी धारण कर रखी है। पीताम्बर में सुशोभित हैं। सिर पर मोरमुकुट धारी हैं । जब श्रीकृष्ण इस सब निज रूप में गोवर्धन के निकट चलते है तो स्वर्ग और पृथ्वी के सारे निवासियों को दिव्य आह्लाद का अनुभव होता है और वे सब अपने को उनका शाश्वत् दास समझते हैं।" विष्णु श्रीकृष्ण के समान ही वस्त्र धारण किये रहते हैं और उनका वर्ण भी वही है। इसलिये कभी-कभी भक्त उनके चित्र को देखकर भी उसी सम्भ्रम और गौरव भाव से भर जाते हैं। दोनों में भेद केवल इतना है कि विष्णु चतुर्भुज हैं, जिनमें वे शंख, चक्र, गदा, और पद्म, धारण किये रहते हैं। इसके अतिरिक्त वे चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त आदि अनेक अमूल्य रत्नों से सुशोभित हैं। श्रीरूप गोस्वामी के 'ललितमाधव' में श्रीकृष्ण के दास का यह वाक्य है—"निःसन्देह कौस्तुभ मणि से युक्त होने के कारण भगवान् विष्णु बड़े सुन्दर हैं। अपने चारों हाथों में उन्होंने शंख, चक्र, गदा और पद्म
प्रीतिभक्तिरस [ २५३ धारण किये हुए हैं और उनकी रत्नराशि देदीप्यमान है। गरुड़ पर विराजमान अपनी शाश्वत् अवस्था में वे बड़े ही भव्य लगते हैं। परन्तु अब वही भगवान् विष्णु इस समय कंस के शत्रु हैं और उनके इस निज रूप ने मुझे वैकुण्ठ के सारे ऐश्वर्यों को भुला दिया है।” एक दूसरे भक्त ने कहा है- “हे भगवन् ! जिनके रोमकूपों से निरन्तर करोड़ों ब्रह्माण्डों का नित्य उदय होता रहता है, जो कृपा के सागर हैं, अचिन्त्य शक्तिशाली हैं, सर्वसिद्धिमय सब अवतारों के बीज वही श्रीभगवान् परम ईश्वर, परम आराध्य, परम सर्वज्ञ, दृढ़ व्रत वाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से पूर्ण, क्षमा के सागर तथा शरणागत जीवों के रक्षक हैं। वे उदार, सत्यप्रतिज्ञ, दक्ष, मंगलमय, बलशाली, शास्त्रों के अनुगामी, भक्तों के मित्र, वदान्य, तेजोमय, युक्त, कृतज्ञ, कीर्ति के आश्रय, मान्य, धर्मात्मा, सम्पूर्ण बल के निधान तथा प्रेम के वश में होने वाले हैं। अपनी ओर दास्यभाव से आकृष्ट भक्तों के एकमात्र वही आश्रय हैं।” भगवान् के दास चार प्रकार के होते हैं- अधिकृत (जैसे ब्रह्मा, शिव आदि, जो रजोगुण और तमोगुण पर नियंत्रण के लिये नियुक्त किये गये हैं), आश्रित भक्त, नित्यपार्षद तथा वे भक्त जो निरन्तर केवल भगवान् ही के अनुगामी हैं। अधिकृत सेवक श्रीकृष्ण की अर्द्धांगिनी जाम्बवती और कालिन्दी के बीच परस्पर वार्ता हो रही थी। जाम्बवती ने पूछा, “यह कौन हमारे श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा कर रही है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “यह अम्बिका है। अम्बिका अर्थात् पार्वती, जिसके हाथ में सारे ब्रह्माण्ड की व्यवस्था है।” फिर जाम्बवती ने पूछा, “यह कौन है जो श्रीकृष्ण को देखकर काँप रहा है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “ये भगवान् शिव हैं।” फिर जाम्बवती बोली, “यह कौन प्रार्थना कर रहा है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “ये ब्रह्मा हैं।” जाम्बवती बोली, “फिर कौन है जो भूमि पर गिर कर श्रीकृष्ण को दण्डवत् करता है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “देवराज इन्द्र।”
१५४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जाम्बवती ने आगे पूछा, "यह कौन है जो देवताओं के साथ आया है और उनके साथ हँस रहा है ?" कालिन्दी बोली, "ये मेरे अग्रज यमराज हैं, जो मृत्यु के अधिष्ठाता हैं।" इस वार्ता से पता चलता है कि यमराज सहित सारे देवता भगवान् की सेवा में नियुक्त हैं। इन्हें अधिकृत देवता कहा जाता है। आश्रित भक्त एक वृन्दावनवासी ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे कृष्ण ! हे वृन्दावन के आनन्द ! इस संसार से डर कर हमने आपकी शरण ली है क्योंकि आप हमारी रक्षा करने में पूर्ण समर्थ हैं। हमें आपको महिमा भलीभाँति ज्ञात है; इसलिये हमने मुक्ति की इच्छा को छोड़कर आपके चरणकमलों का पूर्ण आश्रय ग्रहण कर लिया है। आपके नित्य वर्धनशील प्रेम की कथा को सुनकर हम स्वेच्छा से आपकी दिव्य सेवा में संलग्न हो गये हैं।" यह भगवान् श्रीकृष्ण के एक आश्रित भक्त का वाक्य है। जब यमुना में निवास कर रहे कालिय नाग के सिर पर निरन्तर श्रीकृष्ण के चरणों का आघात हुआ तो उसे बोध हो आया और उसने स्वीकार किया, "हे नाथ ! मैंने आपका कितना अपराध किया, परन्तु फिर भी हे दयामय ! आपने कृपापूर्वक अपने चरणचिह्न को मेरे मस्तक पर अंकित कर दिया है।" यह भी श्रीकृष्ण के चरणारविन्द के आश्रित का ही उद्गार है। 'अपराधभंजन' में एक शुद्धभक्त कहता है, "हे नाथ ! मुझे यह कहते हुए लज्जा का अनुभव होता है कि आज तक मैंने काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मात्सर्य रूपी स्वामियों का आज्ञापालन किया है। कभी-कभी तो ऐसा करने में मुझे बिल्कुल निकृष्ट आचरण तक करना पड़ा है। मैंने उनकी सेवा बड़े ही निश्छलभाव सेकी है। निरन्तर उनका आज्ञापालन किया है। परन्तु फिर भी वे तृप्त नहीं हुए और न ही मुझे अपनी सेवा से मुक्त करते । इस प्रकार मुझसे सेवा कराने में उन्हें लज्जा भी नहीं आती । परन्तु हे यदुनाथ ! अब मुझे समझ आ गई है और इसलिये अब मैं उनको छोड़कर अभय प्रदान करने वाले आपकी शरण में आया हूँ। इसलिये मुझे अपनी सेवा में नियुक्त कीजिये।" यह शरणागत होकर श्रीकृष्ण के चरणकमलों का आश्रय ग्रहण करने का उदाहरण है। वैदिक शास्त्रों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब शुष्क ज्ञान के द्वारा
प्रीतिभक्तिरस [ २५५ मुक्ति के लिये प्रयत्नशील व्यक्ति इस पद्धति को छोड़कर पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण के चरणकमलों के आश्रित हो गये हैं। नैमिषारण्य के शौनक आदि ऋषि इसके अच्छे उदाहरण हैं। विद्वान् उन्हें पूर्ण ज्ञानी भक्त मानते हैं। 'हरिभक्तिसुधोदय' में एक वाक्य है जिसमें ये सब महान् ब्राह्मण शौनक ऋषि की अध्यक्षता में सूत गोस्वामी से कहते हैं—"हे महात्मन् ! देखिये यह कैसा आश्चर्यजनक है। यद्यपि हम संसार के कितने ही दोषों से दूषित थे; परन्तु आपसे केवल भगवान् की वार्ता करने से शनैःशनैः मुक्ति तक की इच्छा से छूटते जा रहे हैं।" 'पद्यावली' में एक भक्त कहता है, "जो स्वरूप-साक्षात्कार के लिये शुष्क ज्ञान में आसक्त हैं, जिनका निश्चय है कि परम सत्य ध्यान से परे है और इस प्रकार जो सत्त्वगुण में सिद्ध हो गये हैं, वे शान्ति से अपना कार्य करते रहें। जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हम तो केवल श्रीभगवान् में आसक्त हैं, जो स्वभाव से ही परम मधुर हैं। जिनका घनश्याम मेघ वर्ण है और जो पीताम्बरधारी हैं एवं जिनके नेत्र उत्फुल्ल कमलदल के समान हैं, हमें केवल उनके ध्यान की ही अभिलाषा है।" जो स्वरूप-साक्षात्कार के प्रारम्भ से ही भक्तियोग में आसक्त हैं वे सेवानिष्ठ कहलाते हैं । सेवानिष्ठता का अर्थ है केवल भक्तियोग में आसक्ति। इसके उत्तम उदाहरण—शिव, इन्द्र, बहुलाश्व, राजा इक्ष्वाकु, श्रुतदेव, पुण्डरीक आदि भक्त हैं। एक भक्त ने कहा है, "हे भगवान् ! आपके दिव्य गुण जीवनमुक्त पुरुषों को भी आकृष्ट करके भक्तों की गोष्ठ में ले जाते हैं, जहाँ निरन्तर आपकी कीर्ति का गान हुआ करता है। यहाँ तक किएकान्तवासप्रिय महर्षिजन भी आपकी कीर्ति के गान से वशीभूत हो जाते हैं। आपकी इस सम्पूर्ण दिव्य गुणावली से आकृष्ट होकर मैंने भी निश्चय किया है कि अपना सम्पूर्ण जीवन आपकी प्रेममयी सेवा में लगा दूँगा।" नित्यपार्षद द्वारका नगरी में निम्नलिखित भक्त श्रीकृष्ण के अन्तरंग पार्षद हैं— उद्धव, दारुक, सात्यकी, श्रुतदेव, शत्रुजीत, उपनन्द तथा भद्र। ये सब भगवान् के सचिवों के समान उनके साथ रहते हैं। परन्तु कभी-कभी उनका निजी सेवाकार्य भी करते हैं। कुरुवंश में भीष्म महाराज, परीक्षित तथा विदुर भी भगवान् श्रीकृष्ण के अंतरंग पार्षद माने जाते हैं। कहा है, "श्रीकृष्ण के सारे पार्षदों के शरीर दिव्य कान्ति से युक्त हैं तथा