भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
भक्ति के अंगों के प्रमाण [ ५६ के लिए या अभिमानवश अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाये तो वह निश्चित रूप से कृष्णभावना के पथ से गिर जायगा। विद्वत्ता दिखाने के लिये अधिक ग्रन्थों के अध्ययन स अथवा नाना स्थानों पर व्याख्यान देकर कीर्ति अर्जित करने से भी सद्गुरु को कोई प्रयोजन नहीं होता। इन सब दोषों से बचना चाहिए। यह भी उल्लेख है कि नए मन्दिर बनाने का अधिक उत्साह न रखे। श्रीचैतन्य महाप्रभु की परम्परा के सभी आचार्यों से जीवन में हम देखते हैं कि वे मन्दिर-निर्माण में अधिक उत्साह नहीं रखते। परन्तु यदि कोई कुछ सेवा करना चाहे तो ये संकोची आचार्य उस सेवक को बहुव्यय साध्य मन्दिरों के निर्माण की अनुमति दे देंगे। मुगल सम्राट् अकबर का सेनाधिपति मानसिंह रूप गोस्वामी की सेवा करना चाहता था। अतः रूपगोस्वामी ने बड़ी लागत से विशाल गोविन्ददेव के मन्दिर का निर्माण करने की आज्ञा दे दी। अस्तु, सद्गुरु को मन्दिर निर्माण का दायित्व स्वयं नहीं उठाना चाहिए; परन्तु यदि किसी के पास धन हो, जिसे वह भगवत्सेवा में व्यय करना चाहे तो रूप गोस्वामी जैसे आचार्य उस धन को भगवान् की सेवा के लिए बड़ा-सा सुन्दर मन्दिर बनाने में लगा सकते हैं। दुर्भाग्यवश कभी- कभी गुरुपद के अयोग्य व्यक्ति भी धनाढ्य पुरुषों से मन्दिर-निर्माण के लिए धन माँगते हैं। यदि अयोग्य गुरु ऐसे धन का प्रयोग वास्तविक प्रचार- कार्य किए बिना केवल बड़े-बड़े मन्दिरों में सुख से रहने में करे तो यह शास्त्रविरुद्ध होगा। भाव यह है कि नाममात्र के परमार्थ के लिए सद्गुरु मन्दिर-निर्माण में अधिक रुचि न दिखाये। उसका पहला और प्रधान कर्तव्य प्रचार करना है। इस सन्दर्भ में श्रील भक्तिसिद्धान्त गोस्वामी महाराज कहा करते थे कि गुरु ग्रन्थों का प्रकाशन करे। उपलब्ध धन से महँगे मन्दिर बनाने की अपेक्षा कृष्णभावना आन्दोलन के प्रसार के लिए नाना भाषाओं में प्रामाणिक ग्रन्थ छापने चाहियें। व्यवहार में निष्कपटता तथा हानि-लाभ में समता 'पद्मपुराण' में एक वाक्य है, “कृष्णभावना-परायण पुरुषों को प्राकृत हानि-लाभ से चिन्तित नहीं होना चाहिए। हानि में भी स्थिरबुद्धि के साथ अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण करे।” बद्धजीव प्राकृत क्रियाओं के चिन्तन में डूबा रहता है। उसे इन विचारों से मुक्त होकर कृष्णभावनाभावित हो जाना है। पूर्ववर्णन के अनुसार, निरन्तर कृष्ण-
६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु स्मरण कृष्णभावना का प्रधान सिद्धान्त है । प्राकृत हानि से उद्वेलित न हो, वरन् भगवान् के चरणकमलों में मन को निवेशित किए रहे । भक्त को शोक और मोह के वशीभूत नहीं होना चाहिए । 'पद्म- पुराण' में कहा है, "जिसका चित्त शोक अथवा क्रोध से आक्रान्त है, उसमें श्रीकृष्ण के स्फुरण की सम्भावना कैसे हो सकती है ?" देवता भक्त देवताओं का अपमान न करे । देवभक्त न होने का यह अर्थ नहीं कि उनका सम्मान ही न किया जाय । वैष्णव शिव अथवा ब्रह्मा का भक्त नहीं होता, परन्तु ऐसे सभी उच्च देवों को प्रणाम करना उसका कर्तव्य है । वैष्णवदर्शन के अनुसार चींटि तक को प्रणाम करना चाहिए, फिर शिव-ब्रह्मा जैसे महापुरुषों के सम्बन्ध में तो क्या कहना है । पद्मपुराण का वाक्य है, "सब देवताओं के ईश्वर के भी ईश्वर भगवान् श्रीकृष्ण की ही सदा आराधना करनी चाहिए; फिर भी ब्रह्मा, शिव आदि की अवज्ञा कभी न करे ।" किसी जीव को न सताना महाभारत का वाक्य है, "कृपामय पिता जैसे पुत्र को नहीं सताता है, इस प्रकार जो किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाता है, उस शुद्ध अन्तः- करण पुरुष पर भगवान् बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं।" आज के तथाकथित सभ्य समाज में पशुपीड़न का विरोध होता है; परन्तु साथ में नियमित वधशालायें भी चलती रहती हैं । वैष्णव को यह अच्छा नहीं लगता । वैष्णव पशुवध का समर्थन नहीं कर सकता और न कभी किसी प्राणी को सता सकता है ।
अध्याय ८ वर्जनीय अपराध वैदिक शास्त्रों में ऐसे ३२ नियमों का उल्लेख है, जिनका पालन न करने से भगवत्सेवा-अपराध बनते हैं : १. भगवान् के मन्दिर में वाहन पर बैठे हुए अथवा जूते पहने-पहने प्रवेश नहीं करना चाहिए; २. भगवान् की प्रसन्नता के लिए जन्माष्टमी, रथयात्रा, आदि महोत्सवों को अवश्य मनाना; ३. भगवत्-मूर्ति के आगे दण्डवत् प्रणाम करने में प्रमाद न करना; ४. भोजन के बाद हाथ-पैर धोये बिना मन्दिर में प्रवेश न करना; ५. दूषित अवस्था में मन्दिर-प्रवेश न करना (वैदिक शास्त्र के अनुसार परिवार में किसी की मृत्यु हों जाने पर सम्पूर्ण कुल कुछ काल के लिए दूषित हो जाता है । ब्राह्मणकुल के लिए दूषितकाल १२ दिन रहता है, क्षत्रियों और वैश्यों के लिए १५ दिन और शूद्रों के लिए ३० दिन); ६. एक हाथ से दण्डवत् प्रणाम न करना; ७. श्रीकृष्ण के आगे परिक्रमा न करना (मन्दिर की परिक्रमा की विधि यह है कि श्रीमूरित की दक्षिण दिशा से प्रदक्षिणा करे। मन्दिर के बाहर प्रतिदिन तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए); ८. मूर्ति के आगे पैर न फैलाए; ६. मूर्ति के सम्मुख उकड़वां नहीं बैठना चाहिए; १०. श्रीकृष्ण मूर्ति के आगे लेटे नहीं; ११. मूर्ति के आगे प्रसाद न खाय; १२. मूर्ति के आगे झूठ न बोले; १३. मूर्ति के समक्ष जोर से न बोले; १४. मूर्ति के आगे बात न करे १५. मूर्ति के आगे रुदन अथवा चीत्कार न करे; १६. मूर्ति के सम्मुख लड़ाई-झगड़ा न करे; १७. मूर्ति के आगे किसी को डाँटे नहीं; १८. मूर्ति के आगे भिक्षु को दान न दे; १६. मूर्ति के आगे किसी से कठोर वचन न कहे; २०. मूर्ति के आगे चर्म धारण न करे; २१. मूर्ति के सांनिध्य में किसी अन्य की स्तुति न करे; २२. मूर्ति के निकट कोई अपशब्द न कहे; २३. मूर्ति के निकट अधोवायु न छोड़े; २४. वैभव के अनुसार मूर्ति की अर्चना में प्रमाद न करे (भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि वे भक्त द्वारा समर्पित जल या पत्ते से भी संतुष्ट हो जाते हैं। भगवान् ने यह
६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
सार्वभौम विधान किया है; परम अकिंचन मनुष्य भी इसका पालन कर सकता है । परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वैभवपूर्ण अर्चन करने में समर्थ पुरुष भी भगवान् को केवल जल और पत्र-पुष्प से तुष्ट करे। वैभव के अनुसार सुन्दर आभूषणों, पुष्पों, नैवेद्यों का अर्पण करना चाहिए। ऐसा नहीं कि भगवान् को तो जल और पत्र-पुष्प से प्रसन्न करे और सारे धन का अपनी इन्द्रियतृप्ति में व्यय करे); २५. श्रीकृष्ण को अर्पण किए बिना कुछ न खाय; २६. ऋतु के फल और अन्न का श्रीकृष्ण को निवेदन करना न भूले; २७. भोजन का भोग लगाने से पूर्व किसी को भी न खिलाये; २८. मूर्ति की ओर पीठ न करे; २६. गुरु को प्रणाम चुपचाप न करे, अर्थात् प्रणाम करते हुए गुरु-प्रणति का उच्च स्वर से पाठ करे; ३०. गुरु के सांनिध्य में स्तवपाठ करना न भूले; ३१. गुरु के आगे आत्मप्रशंसा न करे; ३२. मूर्ति के समक्ष देवनिन्दा न करे । यह ३२ अपराधों की सूची है इनके अतिरिक्त 'वराहपुराण' में कुछ अन्य अपराधों का उल्लेख है : १. अन्धकार में मूर्ति का स्पर्श न करे; २. मूर्ति-अर्चन के विधि-विधान के दृढ़ पालन में प्रमाद न करे; ३. ध्वनि किए बिना मन्दिर में प्रविष्ट न हो; ४. कुत्ते आदि अधम पशुओं की दृष्टि से दूषित पदार्थ भगवान् को अर्पित न करे; ५. आराधना के काल में मौनभंग न करे; ६. पूजन करते हुए मूत्रपुरीषोत्सर्ग न करे; ७. पुष्प का अर्पण किए बिना धूप न दिखाना; ८. गन्धरहित पुष्पों को अर्पित न करना; ६. प्रतिदिन अच्छी प्रकार से दन्तधावन करना; १०. मैथुन के बाद तत्काल मन्दिर में प्रवेश न करना; ११. रजस्वला स्त्री का स्पर्श न करना; १२. मृतदेह का स्पर्श करके मन्दिर में प्रवेश न करना; १३. लाल, नीले, अस्वच्छ वस्त्रों को धारण किए हुए मन्दिर में न जाना; १४, मृतदेह का दर्शन करके मन्दिर में न जाना; १५. मन्दिर में अधोवायु न छोड़ना; १६. मन्दिर में क्रोध न करना; १७. श्मशान जाकर मन्दिर में न जाना; १८. मूर्ति के आगे डकार न लेना। जब तक भोजन का पूर्ण पाचन न हो गया हो, मन्दिर में प्रवेश न करे; १६. चरस, गांजा का प्रयोग न करे; २०. अफीम आदि मद्य पदार्थों का सेवन न करे; २१. शरीर पर तेल लगाकर मन्दिर में प्रवेश अथवा मूर्ति का स्पर्श न करे। २२. भगवान् परम ईश्वर हैं— ऐसा प्रतिपादन करने वाले किसी भी शास्त्र का अपमान न करे; २३. किसी विरोधी शास्त्र का प्रवर्तन न करे; २४. मूर्ति के आगे पान न चबाए; २५. अशुद्ध पात्र में रखे पुष्प को न चढ़ाये; २६. आसन के बिना भूमि पर बैठ कर भगवत्-अर्चन न करे; २७. स्नान पूरा करने से पूर्व मूर्ति का स्पर्श
वर्जनीय अपराध | ६३ न करे; २८. मस्तक पर तीन रेखा का तिलक न लगाये; २६. हाथ-पैर धोये बिना मन्दिर में प्रवेश न करे। अन्य नियम इस प्रकार हैं—अवैष्णव द्वारा बनाए भोजन का अर्पण न करे; अभक्त के सामने मूर्ति-अर्चन न करे तथा प्रारम्भ में गणपति की उपासना करे, जिससे भक्ति के मार्ग में आनेवाले सब विघ्न दूर हो जाते हैं। 'ब्रह्मसंहिता' में उल्लेख है कि गणपति भगवान् नृसिंह के चरणकमलों के आराधक हैं। इसीलिए सम्पूर्ण अंतरायों को दूर करने में वे भक्तों के लिए मंगलकारी हो गए हैं। अतः सभी भक्तों को गणपति की पूजा करनी चाहिए। नखों अथवा उंगलियों के स्पर्श से दूषित जल में मूर्ति को स्नान नहीं कराना चाहिए। स्वेद-स्राव के समय भक्त अर्चन न करे। ऐसे अन्य अनेक निषेध हैं, जैसे मूर्ति को अर्पित पुष्पों का चरणों द्वारा उल्लंघन अथवा मर्दन न करे, भगवन्नाम की शपथ न खाये, इत्यादि। भक्तियोग के साधन में इन सब अपराधों से सावधानीपूर्वक बचना चाहिए। 'पद्मपुराण' में कहा है कि जीवनभर पाप करने वाले की भी भगवान् रक्षा करेंगे, यदि वह केवल उनके शरणागत हो जाय। अस्तु, सिद्ध होता है कि भगवान् का शरणागत मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। यदि कोई स्वयं भगवान् का भी अपराध कर बैठे, तो 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे'—इस महामंत्र का आश्रय लेने पर उसका भी उद्धार हो सकता है। अर्थात् हरेकृष्ण महामन्त्र का जप सब पापों को नष्ट कर देता है। परन्तु यदि कोई पवित्र भगवन्नाम का अपराधी बन जाय, तो उद्धार नहीं हो सकता। नाम-अपराध ये हैं: १. भगवन्नाम के प्रचार में जीवन का समर्पण करने वाले महाभागवतों की निन्दा करना; २. शिव, ब्रह्मा, आदि देवों के नाम को भगवन्नाम के समान अथवा उससे स्वतन्त्र समझना (कभी-कभी अनीश्वरवादी लोग यह मान बैठते हैं कि कोई भी देवता भगवान् विष्णु के समान हो सकता है। परन्तु यथार्थ भक्त जानता है कि बड़े से बड़ा देवता भी भगवान् विष्णु के समान अथवा उनसे स्वतन्त्र नहीं हो सकता। इसलिए यदि कोई समझे कि दुर्गा-दुर्गा अथवा काली-काली कहना हरेकृष्ण कहने के समान है, तो यह सबसे बड़ा अपराध होगा); ३. गुरु की अवज्ञा; ४. वैदिक शास्त्रों अथवा प्रमाणों का खण्डन; ५. हरेकृष्ण महामन्त्र के जप की महिमा को काल्पनिक समझना; ६. भगवन्नाम में अर्थवाद का आरोप; ७. नाम के बल पर पाप करना (भगवन्नाम-जप से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं—इससे यह नहीं समझना चाहिए कि पहले पाप कर लूँ और
६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु फिर बाद में नामजप से पापों को नष्ट कर दूँगा। यह विचार बड़ा ही भयंकर अपराध है, अतः इससे बचे); ८. हरेकृष्ण जप को वैदिक कर्मकाण्ड में वर्णित पुण्यकर्मों के समान समझना; ६. अश्रद्धालु को कृष्णनाम की महिमा का उपदेश करना (भगवन्नाम का जप कोई भी कर सकता है, परन्तु प्रारम्भ में उसे भगवन्नाम की दिव्य शक्ति का उपदेश नहीं करना चाहिए, क्योंकि जो अत्यन्त पापी हैं, वे भगवत्-महिमा को धारण नहीं कर सकते। इसलिए उनको यह न सुनाना ही अच्छा है); १०. भगवन्नाम के जप में पूर्ण विश्वास न होना और इसकी इतनी अगाध महिमा सुनने पर भी विषयासक्ति बनाए रखना। अपने को वैष्णव समझने वाले प्रत्येक भक्त को इन सब अपराधों से बचना चाहिए, जिससे शीघ्र अभीष्ट-सिद्धि हो।
अध्याय ६ भक्ति के अंगों का विशद विवेचन निन्दा भगवान् और उनके भक्तों की निन्दा को कभी सहन नहीं करना चाहिए। इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (१०.७०.४०) में शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से कहते हैं, "भगवान् और उनके भक्तों की निन्दा को सुनकर जो वहाँ से हट नहीं जाता, वह सम्पूर्ण पुण्यों से च्युत हो कर पतित हो जाता है।" भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने अपने शिक्षाष्टक में कहा है, "भक्त को वृक्ष से अधिक सहिष्णु और मार्ग के तिनके से भी विनम्र होना चाहिए। सब का सम्मान करे, परन्तु स्वयं मान न चाहे।" भक्त के रूप में इतने दीन और विनम्र होते हुए भी जब श्रीचैतन्य महाप्रभु को सूचना मिली कि श्रीनित्यानन्द के शरीर पर दुष्टों ने आघात किया है तो वे तत्काल उस स्थान पर दौड़ पड़े और अपराधी जगाई-मधाई को मारने के लिए उद्यत हो गए। भगवान् चैतन्य महाप्रभु का यह आचरण अतिशय महत्त्व- पूर्ण है। इससे प्रकट होता है कि भक्त निजी रूप से सर्वथा निरभिमान, सहिष्णु और विनीत हो सकता है, परन्तु जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त के सम्मान पर कोई आँच आए तो वह उसे सहन नहीं करेगा। इस प्रकार के अपमान का तीन प्रकार से प्रतिकार किया जा सकता है। यदि कोई वाणी से निन्दा करता हो तो भक्त को इतना कुशल होना चाहिए कि प्रतिपक्षी को तर्क द्वारा निरस्त कर दे। यदि ऐसा न कर सके तो दीनभाव से वहाँ खड़ा न रहे, वरन् आत्महत्या कर ले। यदि यह भी सम्भव न हो तो उस स्थान को ही त्याग कर चला जाय। यदि इन तीनों में से किसी भी आचार का पालन नहीं करता, तो वह भक्तियोग से गिर जाता है। तिलक तथा तुलसी-कण्ठी वैष्णव द्वारा शरीर को तिलक-कण्ठी से विभूषित करने के सम्बन्ध
६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु में 'पद्मपुराण' में उल्लेख है, "जो कण्ठ में तुलसी धारण करते हैं, जिनके शरीर पर विष्णुचिह्न—शंख, चक्र, गदा और पद्म के साथ द्वादश विष्णु- मन्दिर अंकित हैं; जो मस्तक पर विष्णु तिलक धारण करते हैं, वे ही जगत् में विष्णुभक्त अर्थात् वैष्णव हैं। इन वैष्णवों के सांनिध्य से जगत् पवित्र हो जाता है। वे जहाँ रहते हैं, वह स्थान वैकुण्ठ बन जाता है।" 'स्कन्दपुराण' में इसी प्रकार कहा है, "जो तिलक अथवा गोपी- चन्दन से विभूषित हैं, सम्पूर्ण शरीर पर भगवन्नाम धारण किए हुए हैं तथा जिनके कण्ठ और वक्षः स्थल पर तुलसी-माला रहती है, यमदूत उन वैष्णवों के पास भी नहीं फटक सकते।" पापियों को दण्ड का विधान करने वाले यम के दूतों की वैष्णवों पर एक नहीं चलती। श्रीमद्भागवत के अजामिल- उद्धार आख्यान में यमराज ने अपने दूतों को वैष्णवों के निकट कभी न जाने का आदेश दिया है। वैष्णव यमराज की अधिकार परिधि में नहीं आते। 'पद्मपुराण' में यह भी उल्लेख है, "चन्दन और कृष्णनाम से विभूषित मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है और साक्षात् कृष्णलोक में प्रविष्ट होकर भगवान् श्रीकृष्ण के सांनिध्य में रहता है।" पुष्पमाला ग्रहण अगला आदेश श्रीमूर्ति को अर्पित माला धारण करने के सम्बन्ध में है। इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (११.६.४६) में श्रीकृष्ण से उद्धव का वाक्य है, "हे गोविन्द ! आपके द्वारा प्रयुक्त माला, गन्ध, वस्त्र, और अलंकार को धारण करने वाला तथा आपका उच्छिष्ट भोजन करने वाला मैं आपका दास माया को जीत लूँगा, ऐसा विश्वास है।" तात्पर्य यह है कि जो गोपीचन्दन अथवा चन्दन का तिलक लगाता है और श्रीकृष्ण के निर्माल्य (माला, आदि) को धारण करता है, वह माया के वश में कभी नहीं होता। मृत्युकाल में ऐसे पुरुष के लिए यमदूत नहीं आ सकते। जो सम्पूर्ण वैष्णव आचार का पालन नहीं करता, पर कृष्णप्रसाद खाता है, वह भी शनैः-शनैः पूर्ण वैष्णव बन जायगा। स्कन्दपुराण में ब्रह्माजी नारद से कहते हैं, "हे नारद ! श्रीकृष्ण के विग्रह से उतरी हुई माला जिसके शरीर का स्पर्श करती है, वह सब पापों और रोगों से मुक्त होकर क्रमशः जड़ प्रकृति के बन्धन से छूट जाता है।" श्रीमूर्ति के सामने नाचना 'द्वारकामाहात्म्य' में श्रीमूर्ति के सामने नाचने की महिमा को
भक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ६७ श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा है, "जो पुरुष प्रसन्न होकर भक्तिपूर्वक मेरे सामने नाचता हुआ शरीर की भंगियों से विविध भावों को अभिव्यक्त करता है, वह करोड़ों जन्मान्तरों से संचित पापों को नष्ट कर देता है।" इसी ग्रन्थ में नारद का वचन है, "करताल और नाना भाव-भंगिमाओं के साथ श्रीकृष्ण के सामने नृत्य करने वाले के शरीर से सभी पातकरूपी पक्षी उड़ जाते हैं।" जैसे ताली बजाने से बहुत से पक्षी उड़ने लगते हैं, वैसे ही कृष्णमूर्ति के आगे नाचने और ताली बजाने मात्र से शरीर में रहने वाले सारे पातकरूप पक्षी उड़ाए जा सकते हैं। श्रीमूर्त्ति के सम्मान में दण्डवत् प्रणाम और अभ्युत्थान 'नारदीयपुराण' का वाक्य है, "श्रीकृष्ण को किया एक प्रणाम भी दस अश्वमेध यागों से बढ़कर है।" याज्ञिक को पुण्यफल मिलेगा, परन्तु अन्त में पुण्य क्षीण होने पर उसे संसार में फिर जन्म लेना पड़ेगा, जबकि एक बार भी श्रीमूर्त्ति को प्रणाम करने वाला सीधा कृष्णलोक को चला जायगा। उसका कभी पुनर्जन्म नहीं होगा। 'ब्रह्माण्डपुराण' में कहा गया है, "भगवान् की रथयात्रा को सामने आते हुए देखकर उठकर अगवानी करने वाला अपने सब पापों को नष्ट कर देता है।" श्रीमूर्त्ति का अनुगमन 'भविष्यपुराण' में आया है, "भगवान् के रथ के साथ आगे-पीछे चलने वाले चाण्डाल तक श्रीविष्णु के ऐश्वर्य को प्राप्त हो जाते हैं।" विष्णु मन्दिर अथवा तीर्थ गमन पुराणों में कहा है, "वृन्दावन, मथुरा, द्वारका आदि तीर्थों को जाने वाले धन्य हैं। वे संसाररूप मरुभूमि से पार हो जाते हैं।" 'हरिभक्तिसुधोदय' में भगवान् श्रीकृष्ण के मन्दिर को जाने का माहात्म्य कहा गया है। जैसा कह आए हैं, वृन्दावन, मथुरा तथा द्वारका में यह पद्धति है कि भक्तजन इन पावन तीर्थों में स्थिति मन्दिरों में जाकर लाभान्वित होते हैं। एक श्लोक का आशय है, "कृष्णभावनाभावित शुद्ध भक्तिभाव से हरिमन्दिर में प्रवेश करने वाला फिर मातृगर्भरूप कारागार में नहीं जाता।" यद्यपि गर्भ का वास बद्धजीव के लिए बड़ा ही भयंकर और कष्टदायक होता है, परन्तु जन्म के समय वह उसे भूल जाता है। इस बद्धदशा से सदा-सदा के लिए मुक्ति के अभिलाषी को भक्तिभावित
६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हृदय से विष्णुमन्दिर में जाना चाहिए। तब संसार में जन्म की दुःखमय अवस्था का सामना नहीं करना पड़ेगा । विष्णु मन्दिर की परिक्रमा ‘हरिभक्तिसुधोदय’ में कहा है, "जो विष्णुमूर्ति की परिक्रमा करता है, वह बारम्बार जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाता है ।" भवरोग के कारण बद्धजीव पुनः पुनः जन्म-मृत्यु में भ्रमायमान् है । विष्णुमन्दिर की प्रदक्षिणा से इस आवर्तन का निवारण हो सकता है। चातुर्मास्य में कृष्णभावना के प्रसारण के लिए स्थान-स्थान पर परिव्राजन करने वाले साधुजन एक स्थान पर (जो प्रायः तीर्थ होता है) रहते हैं। इस काल में कुछ विशेष नियमों का पालन अनिवार्य है। स्कन्द- पुराण के अनुसार इस समय विष्णुमन्दिर की चार परिक्रमा करने से चराचर सम्पूर्ण जगत् की परिक्रमा हो जाती है।" ऐसी परिक्रमा करने वाले ने उन सभी तीर्थों की यात्रा कर ली है, जहाँ गंगा प्रवाहित है तथा चातुर्मास्य के विधान का पालन करने से भक्तियोग की प्राप्ति बहुत शीघ्र हो सकती है । अर्चना मन्दिर में श्रीमूर्त्ति की आराधना को अर्चना कहते हैं। इस पद्धति के द्वारा देह से परे अपने आत्मस्वरूप का बोध हो जाता है। श्रीमद्भागवत (१०.८१.१६) में एक ब्राह्मण के यहाँ जाते हुए श्रीकृष्ण के अन्तरंग सखा सुदामा ने कहा है, "श्रीकृष्ण के चरणकमलों की अर्चना करने मात्र से स्वर्ग, मोक्ष, लोकों का आधिपत्य, पृथ्वी की सार्वभौम सम्पदा और योगसिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं।" सुदामा के इस कथन की पृष्ठभूमि इस प्रकार है। श्रीकृष्ण ने सखा सुदामा से किसी ब्रह्माण्ड के घर से अन्न की भिक्षा लाने को कहा था। ब्राह्मण एक महायज्ञ कर रहे थे, अतः श्रीकृष्ण ने सुदामा से कहलवाया कि कृष्ण-बलराम भूखे हैं, उन्हें कुछ भोजन चाहिए। जब सुदामा वहाँ गया तो ब्राह्मणों ने तो कुछ नहीं दिया, परन्तु यह सुनने पर कि श्रीकृष्ण भोजन माँगते हैं, ब्राह्मण-पत्नियां तत्काल अनेक नैवेद्य उन्हें अर्पण करने गयीं । ‘विष्णुरहस्य’ में भी उल्लेख है, "पृथ्वी पर जो मनुष्य भगवान् विष्णु की अर्चना करते हैं, वे नित्य आनन्दमय वैकुण्ठधाम को प्राप्त होते हैं।" भगवान् की परिचर्या (सेवा) 'विष्णुरहस्य' में उल्लेख है, सेवक जैसे राजा की सेवा करते हैं.
भक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ६६ वैसे ही जो भगवत्सेवा की व्यवस्था करता है, वह निश्चित रूप से देह त्याग कर कृष्णलोक को जाता है। "आज भी बहुत से मन्दिर वास्तव में राजप्रासाद जैसे हैं। वे साधारण भवन नहीं हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण का अर्चन उसी प्रकार होना चाहिए जैसे अपने महल में राजा सेवित होता है। वृन्दा- वन के हजारों मन्दिरों में श्रीमूर्त्ति की राजोचित परिचर्चा की व्यवस्था है। 'नारदीयपुराण' में कथन है, "जो कोई क्षणभर के लिए भी भगवान् के मन्दिर में रहे, वह भी परमपद पा जाता है।" निष्कर्षस्वरूप कहा जा सकता है कि समाज के धनाढ्य सदस्यों को सुन्दर मन्दिरों का निर्माण करके विष्णु के अर्चन की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे लोग वहाँ आकृष्ट हों और इस प्रकार उन्हें श्रीमूर्त्ति के सामने नाचने तथा भगवन्नाम के श्रवणकीर्तन का अवसर मिले । इससे सभी भगवद्धाम में प्रवेश कर सकेंगे । पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होकर निरन्तर भगवत्सेवा के परायण भक्तों का कहना ही क्या, विष्णुमन्दिर में जाने से तो साधारण मनुष्यों को भी परम लाभ सुलभ हो जायगा । इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत के चौथे स्कन्ध (२१.३१) में महाराज पृथु अपनी प्रजा से कहते हैं, "हे प्रजाजनो ! भगवान् श्रीहरि सभी के लिए पतितपावन हैं। किसी भी देवता में यह सामर्थ्य नहीं है क्योंकि वे तो स्वयं ही बन्धन में हैं। एक बद्धजीव दूसरे बद्धजीव का त्राण कैसे कर सकता है । श्रीकृष्ण अथवा उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि में ही किसी का उद्धार करने की शक्ति है। श्रीविष्णु के पैर के अँगूठे से निकली गंगा पृथ्वी आदि लोकों में प्रवाहित होती हुई सारे पापात्मा बद्धजीवों का त्राण कर रही है। फिर निरन्तर भगवत्सेवापरायण रहने वाले के सम्बन्ध में क्या कहना है। जन्म-जन्मान्तरों के संचित पापों के होते हुए भी उनकी मुक्ति निश्चित है ।" भाव यह है कि जो श्रीमूर्त्ति की अर्चना करता है, उसके करोड़ों जन्मों से संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। अर्चनपद्धति का विवरण दिया जा चुका है; साधक को इन विधि-विधानों का गंभीरता से पालन करना चाहिए । गान 'लिंगपुराण' में भगवत्कीर्ति के गान के सम्बन्ध में कहा है, "भगवान् की कीर्ति को निरन्तर गाने वाला ब्राह्मण श्रीकृष्ण के लोक को प्राप्त हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण को यह गान शिव की स्तुति से भी अधिक प्रिय है।"
७० ] भक्तिरसामृतसिन्धु संकीर्तन भगवान् के नाम, गुण, लीला, आदि का उच्च स्वर से कथन करना संकीर्तन कहलाता है । जनसमूह के भगवन्नाम के कीर्तन को भी संकीर्तन कहते हैं । ‘विष्णुधर्म’ में नामसंकीर्तन की महिमा इस प्रकार है, “हे राजन् ! यह कृष्णनाम इतना पावन है कि जिसकी जिह्वा पर आ जाता है, वह तत्काल करोड़ों जन्म के पापों से मुक्त हो जाता है ।” यह वास्तव में सत्य है । चैतन्यचरितामृत का वाक्य है, “जो एक बार भी कृष्णनाम का उच्चा- रण कर लेता है, वह उतने पापों का नाश कर देता है, जितने पाप वह कर भी नहीं सकता ।” पापी बहुत पाप करता है, परन्तु वह इतना पाप नहीं कर सकता, जिसे एक बार कृष्णनाम पुकारने से नष्ट न किया जा सके । श्रीमद्भागवत (७.६.१८) में प्रह्लाद महाराज भगवान् की स्तुति करते हैं, “हे नृसिंहदेव ! यदि मैं आपके चरणकमलों का दास बन जाऊँ तो आपकी लीलासुधा का श्रवण कर सकूँ गा । हे नाथ ! आप परम सुहृद एव परम आराध्य हैं । आपकी दिव्य लीला को सुनने मात्र से सम्पूर्ण पाप दूर हो जाते हैं । इसलिए मुझे उन पापकर्मों का भय नहीं है, क्योंकि आपके कथामृत का श्रवणपुटों से पान करता हुआ मैं शीघ्र ही भवसागर के सम्पूर्ण दुर्गुणों से तर जाऊँगा ।” श्रीभगवान् की लीलाओं से सम्बन्धित अनेक गीत हैं, जैसे ब्रह्मा की ब्रह्मसंहिता, नारद द्वारा गाया गया नारदपंचरात्र और शुकदेव गोस्वामी द्वारा गाई श्रीमद्भागवत । यदि कोई इन गीतों को सुने तो सहज ही भवबन्धन से छूट जाय । भगवान् के गीतों का श्रवण बड़ा सरल है । ये करोड़ों वर्षों से प्रचलित हैं और आज तक लोग इनसे लाभ उठा रहे हैं । अतः अब क्यों न इनका पूरा लाभ उठाकर संसार-जंजाल से मुक्त हो जाय ? गुणकीर्तन श्रीमद्भागवत (१.५.२२) में नारद मुनि अपने शिष्य व्यासदेव से कहते हैं, “हे व्यासजी ! तप-त्याग, वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान वैदिकमन्त्र- उच्चारण, ज्ञान और दान आदि पुण्यकर्मों का एकमात्र परम फल यही है कि भक्तों के संग में भगवान् की कीर्ति का गान किया जाय ।” यहाँ संकेत है कि भगवान् का गुणकीर्तन जीव की आत्यन्तिकी क्रिया है ।
भक्ति अंगों का विशद विवेचन [ ७१ जप मन्त्र का धीरे-धीरे मन्द स्वर से उच्चारण करना जप कहलाता है। उसी मन्त्र की उच्च ध्वनि करना कीर्तन है। जब महामन्त्र ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे’ का उच्चारण केवल अपने सुनने के लिए धीरे से किया जाय तो वह जप है और दूसरे उसे सुन सकें तो वह कीर्तन है। महामन्त्र का जप-कीर्तन दोनों किए जा सकते हैं। जप से केवल अपने को लाभ होता है; परन्तु कीर्तन को सुनने वाले अन्य सब का कल्याण हो जाता है। ‘पद्मपुराण’ का वाक्य है—“कृष्णनाम का जप-कीर्तन करने वाले के लिए स्वर्गसुख और मोक्ष का मार्ग तत्काल प्रशस्त हो जाता है।” विज्ञप्ति (निवेदन) ‘स्कन्दपुराण’ में भगवच्चरणकमलों में विज्ञप्ति के सम्बन्ध में एक वाक्य है, जिसमें उल्लेख है कि धीर भक्त श्रीकृष्ण के प्रति तीन प्रकार से विज्ञप्ति निवेदन कर सकते हैं : १. संप्रार्थनात्मिका (बड़ी भावमय प्रार्थना); २. दैन्यबोधिका (दीनताज्ञापन) तथा ३. लालसामयी (संसिद्धि की अभिलाषा)। परमार्थ में संसिद्धि की ऐसी अभिलाषा करना इन्द्रिय- तृप्ति जैसा नहीं है। जब जीव को श्रीभगवान् से अपने स्वरूपभूत सम्बन्ध का थोड़ा-बहुत बोध होता है तो वह अपने मूल यथार्थ स्वरूप को जान जाता है और श्रीकृष्ण के दास, सखा, माता-पिता अथवा प्रेयसी के रूप में स्थिति को फिर प्राप्त हो जाना चाहता है। इसी का नाम लालसामयी है। विज्ञप्ति की यह लालसामयी अवस्था पूर्ण मुक्ति अर्थात् स्वरूपसिद्धि होने पर प्राप्त होती है—जब पूर्ण आत्मविद्या और तत्त्वज्ञान के द्वारा जीव भगवान् से अपने आदिसम्बन्ध को जान जाता है। पद्मपुराण में भक्त की संप्रार्थनात्मिका विज्ञप्ति है, “हे नाथ ! आपके चरणकमलों में निवेदन है कि युवतियों का मन युवकों में और युवकों का मन युवतियों में जिस प्रकार रमा करता है, उसी भाँति मेरा मन भी सहज रूप में आपमें रमण करे।” दृष्टान्त समीचीन है। युवकयुवतियों में एक दूसरे को देखने पर परिचय के बिना सहज आकर्षण हो जाता है। यह सीखना नहीं पड़ता, कामविकार के कारण अपनेआप स्फुरित हो जाता है। यह एक लौकिक उदाहरण है। भक्त का उद्गार है कि उसका भगवान् में ऐसा ही राग हो जाय, जो सर्वथा हेतुरहित और अनन्य हो। भगवान् के लिए इस प्रकार की रागानुगा आसक्ति स्वरूप-साक्षात्कार की परम संसिद्धि है।
७२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु पद्मपुराण में दैन्यबोधिका विज्ञप्ति का भी विवरण है, "मेरे समान न तो कोई पापी है और न कोई अपराधी ही है। क्या कहूँ, आपके सामने आत्मनिवेदन करने के लिए आने में भी लज्जा आती है।" यह भक्त की स्वाभाविक स्थिति है। यह कोई आश्चर्य नहीं कि बद्धजीव का कुछ संचित पाप हो। उसे भगवान् से अपनी दीनता ज्ञापित करनी चाहिए। ऐसा करते ही भगवान् सच्चे भक्त को क्षमा कर देते हैं। परन्तु इस का अर्थ यह नहीं कि भगवान् की अहैतुकी करुणा की आड़ में पाप करता जाय और यह आशा करे कि प्रभु क्षमा कर देंगे। ऐसा विचार निर्लज्ज व्यक्तियों के ही योग्य है। यहाँ स्पष्ट कहा है, "आपसे अपने पापों का निवेदन करने में भी मुझे लज्जा आती है।" अतः यदि किसी को पाप करने में लज्जा नहीं आती, अपितु वह समझता है कि भगवान् उसे क्षमा कर देंगे तो ऐसी युक्ति सर्वथा अनर्थ है। वैदिक शास्त्रों में कहीं भी इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। यह सत्य है कि कृष्णनाम के जप से पूर्वजन्मों के सब पापों का धावन हो जाता है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि बार-बार पाप करे और फिर आशा करे कि वे दूर हो जायेंगे। भक्तिपथ में यह अनर्थकारी धारणा ग्राह्य नहीं है। "पूरे सप्ताह पाप करूँगा और अन्त में मन्दिर जाकर उन्हें धो डालूँगा, जिससे फिर पाप कर सकूँ" - इस विचार को भक्तिरसामृतसिन्धुकार ने अस्वीकार किया है, क्योंकि यह परम अनर्थमय अपराध है। 'नारदपंचरात्र' में लालसामयी विज्ञप्ति का विवरण है। भक्त कहता है, "हे नाथ ! लक्ष्मी के साथ विराजमान आप चमर डुलाने में लगे हुए मुझ को अपनी गम्भीर वाणी से 'ऐसा करो' यह आदेश कब देंगे ?" श्लोक का भाव यह है कि भक्त श्रीभगवान् के श्रीविग्रह को चमर से हवा करना चाहता है, अर्थात् प्रभु का निजी पार्षद बनने का अभिलाषी है। निःसन्देह दास, सखा अथवा प्रेमी के रूप में प्रत्येक भक्त सदा श्रीभगवान् के सान्निध्य में रहता है। निजी रुचि के अनुसार वह किसी एक प्रकार के रस-सम्बन्ध की अभिलाषा रखता है। यहाँ यह भक्त भगवान् का दास बनकर उनकी अन्तरंगा शक्ति लक्ष्मीजी के समान उन्हें चमर डुलाना चाहता है। उसकी यह भी अभिलाषा है कि श्रीभगवान् प्रसन्न होकर 'चमर ऐसे डुलाओ' इस प्रकार उसे आदेश दें। यह लालसामयी विज्ञप्ति स्वरूप-साक्षात्कार की परम अवधि है। 'नारदपंचरात्र' में ही भक्त की एक अन्य विज्ञप्ति है - "हे नाथ ! हे कमलनयन ! अहो ! वह दिन कब आयगा जब आपके नामों का कीर्तन
भक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ७३ करता हुआ आनन्दाश्रुओं से रुद्ध नेत्रों वाला मैं भावोन्मत्त होकर यमुना तट पर नाचूँगा ?” वह भी लालसामयी का उदाहरण है। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु का उद्गार है-“हे प्राणनाथ ! आपके विरह में मुझे क्षण भर युग जैसा भारी लगता है और सारा जगत् शून्य हुआ प्रतीत होता है।” भक्त को इस प्रकार भावमय प्रार्थना करते हुए अपनी सेवा का अर्पण करने के लिए उत्कण्ठित रहना चाहिए; सभी महाभागवतों का, विशेषतः श्रीचैतन्य महाप्रभु का यह उपदेश है। भाव यह है कि श्रीभगवान् के लिए रोने की कला सीखनी चाहिए; किसी न किसी प्रकार की भगवत्सेवा में लगने के लिए वास्तव में उत्कण्ठा- पूर्वक रोये । इस भाव का नाम ‘लौल्य’ है और ऐसा अश्रुविमोचन ही परम संसिद्धि (स्वरूपसिद्धि) का मूल्य है। यदि किसी में भगवत्-सांनिध्य और भगवत्सेवा या लौल्य उदित हो जाय तो उसका वैकुण्ठ प्रवेश निश्चित है। नहीं तो, लौकिक दृष्टि से तो वैकुण्ठ-प्रवेश के शुल्क की गणना ही नहीं हो सकती । इसका एकमात्र मूल्य है लौल्य और लालसामयी । स्तवपाठ मनीषियों के मत में भगवद्गीता अनेक प्रामाणिक स्तवों से परिपूर्ण है, विशेषतः ग्यारहवाँ अध्याय, क्योंकि उसमें अर्जुन ने भगवान् के विश्वरूप का स्तव किया है। इसी प्रकार ‘गौतमीयतन्त्र’ के सभी श्लोक स्तव हैं। श्रीमद्भागवत में तो श्रीभगवान् के शत-शत स्तव हैं ही। भक्त को अपने नित्यपाठ के हेतु इनमें से श्लोकों का चयन करना चाहिए। ‘स्कन्दपुराण’ में कहा है-“जिनकी जिह्वा निरन्तर श्रीकृष्ण के स्तवरत्नों से विभूषित रहती है, वे मुनियों और ऋषियों के लिए नमस्कार के योग्य और देवों के भी आराध्य हैं।” अल्पज्ञ लोग श्रीकृष्ण को भजने के स्थान पर भोगों की इच्छा से नाना देवताओं को पूजना चाहते हैं। परन्तु यह उल्लेख है कि निरन्तर श्रीभगवान् का स्तवन करने वाला भक्त स्वयं देवताओं का भी वन्दनीय है। शुद्धभक्तों को किसी भी देवता से कुछ नहीं चाहिए; वरन् सब के सब देवता ही शुद्धभक्तों की आराधना के उत्कण्ठित रहते हैं। ‘नृसिंहपुराण’ में कहा है, “भगवान् श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने स्तोत्र और स्तवपाठ करने वाला तत्काल सब पापों से छूट कर वैकुण्ठगमन के योग्य हो जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है।”
७४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नैवेद्य-आस्वादन पद्मपुराण में स्पष्ट वचन है—"श्रीमूर्ति के सामने से हटकर जो पुरुष तुलसी और चरणामृत से युक्त नैवेद्य का अन्न नित्य नियमित रूप से खाता है, वह अविलम्ब करोड़ों यज्ञों के पुण्य को प्राप्त करता है।" चरणामृत-पान चरणामृत की प्राप्ति प्रातःकाल वस्त्र-अलंकरण से पूर्व भगवान् की मूर्ति को स्नान कराने पर होती है। सुगन्धी और पुष्पों से युक्त जल श्रीचरणों से नीचे गिरता है। उसे एकत्रित कर दही के साथ मिलाया जाता है। इस प्रकार यह चरणामृत अतिशय आस्वाद्य तो होता ही है, इसका प्रबल पारमार्थिक माहात्म्य भी है। पद्मपुराण के अनुसार, जिस मनुष्य ने कभी दान, यज्ञ, स्वाध्याय, अर्चन, आदि कुछ भी पुण्य न किया हो, वह भी मन्दिर के चरणामृत का पान करके परमधाम के योग्य हो जाता है। मन्दिरों में चरणामृत को बड़े से पात्र में रखने की प्रथा है। श्रीमूर्त्ति का दर्शन-अभिवादन करने आया भक्त विनम्रभाव से इस चरणामृत के तीन विन्दु का पान करके परमानन्द सुख पाता है। अर्पित धूप और पुष्पों की सौरभ का आघ्राण 'हरिभक्तिसुधोदय' में उल्लेख है—"श्रीहरि को अर्पित धूप को सूंघने से संसाररूपी सर्प से डसे हुओं का विष समाप्त हो जाता है।" कुशल पुरुषों द्वारा वनों में पायी जाने वाली एक प्रकार की जड़ी सुंघाये जाने पर सर्प का विष उतर जाता है और चेतना लौट आती है। इसी भाँति जो मन्दिर में मूर्ति को अर्पित धूप सूंघता है, उसका सम्पूर्ण भवरोग तत्काल दूर हो जाता है। मन्दिर में जाने पर भक्त को फल, फूल, धूप आदि किसी न किसी पदार्थ का भगवान् को अवश्य अर्पण करना चाहिए। यदि धन की सामर्थ्य न हो तो कुछ और चढ़ाये। प्रायः प्रातः काल मन्दिर जाने वाले नर-नारी बहुत-सी भेंट ले जाते हैं। अधिक नहीं, एक अन्नकण का भी अर्पण किया जा सकता है। यह विधि है कि सन्त अथवा मन्दिर में मूर्ति के दर्शनों के लिए किसी भेंट के बिना नहीं जाना चाहिए। अर्पण अति तुच्छ हो चाहे अमूल्य हो। फल, फूल, जल आदि जो कुछ भी थोड़ा सा मिल सके, अवश्य अर्पण करना चाहिए। जब कोई भक्त प्रातः मन्दिर में भेंट चढ़ाने जायगा, तो वह धूप का आघ्राण भी करेगा और परिणाम में भवरोग के विष से मुक्ति पा जायगा।
भक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ७५ तन्त्रशास्त्र में उल्लेख है, “हरि के निर्माल्य की सौरभ के नासिका में प्रवेश करते ही पाप के बन्धन नष्ट हो जाते हैं । जो पापात्मा नहीं है, वह भी सौरभ-आंघ्राण करके मायावादी से भक्त हो जाता है ।” इसके अनेक उदाहरण हैं, जिनमें सनकादि के उत्थान की कथा मुख्य है। वे मायावादी थे, परन्तु मन्दिर में पुष्पों और धूप की सौष्ठव के आघ्राण से परम भक्त बन गए । उपरोक्त वाक्यों से ज्ञात होता है कि मायावादी शुद्ध नहीं होते, वरन् दूषित रहते हैं । श्रीमद्भागवत में प्रमाण है, “जिसने सम्पूर्ण पापों का मार्जन नहीं किया है, वह शुद्ध भक्त नहीं हो सकता । शुद्धभक्त को श्रीभगवान् के परमेश्वरत्व में कोई सन्देह नहीं रहता, इसलिए वह निरन्तर कृष्णभावना और भक्तियोग के परायण रहता है ।” ‘अगस्त्यसंहिता’ में सदृश वाक्य है—“अपनी घ्राणेन्द्रिय की विशुद्धि के लिए हमें मन्दिर में श्रीकृष्ण को अर्पित पुष्पों को सूंघना चाहिए ।” श्रीमूर्ति का स्पर्श विष्णुधर्मोत्तर में श्रीमूर्ति के चरणकमलों का स्पर्श करने के सम्बन्ध में कथन है—“जो पुरुष वैष्णवदीक्षा से युक्त है तथा कृष्णभावनाभावित भक्तियोग के परायण है, वही श्रीमूर्ति का स्पर्श करने का अधिकारी है ।” गांधी द्वारा चलाए गए राजनीतिक आन्दोलन के काल में उस वैदिक पद्धति का विरोध किया गया था, जिसके अनुसार शूद्र, चाण्डाल आदि अधम श्रेणी के लोगों का मन्दिर-प्रवेश निषिद्ध है। यह निषेध उनके अशुद्ध आचरण के कारण है । परन्तु साथ में उन्हें अन्य सुविधायें प्राप्त हैं जिनसे वे शुद्धभक्तों के संग में भक्तियोग के चरम संसिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं। किसी भी जाति में जन्मे मनुष्य का बहिष्कार नहीं है, पर सब के लिए पवित्र होना आवश्यक है । उस शुद्धि-पद्धति को अंगीकार करना होगा । परन्तु गांधी केवल ‘हरिजन’ नाम की मोहर लगाकर उन्हें शुद्ध सिद्ध करना चाहते थे, अतः मन्दिर के व्यवस्थापकों और गांधी में गम्भीर संघर्ष चला । जो कुछ हो, वर्तमान नियम सब शास्त्रों का विधान है—कोई भी शुद्ध व्यक्ति मन्दिर में प्रवेश कर सकता है । वास्तविक स्थिति यही होनी चाहिए । जो विधिपूर्वक दीक्षित है और विधि-विधान का पालन करता है, वही प्रवेश और श्रीमूर्ति का स्पर्श कर सकता है, सब नहीं । विधि के साथ मूर्ति-स्पर्श करने वाला तत्काल पापपुंज से छूट जाता है और उसकी सर्वाभीष्ट सिद्धि भी हो जाती है ।
७६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'वराहपुराण' में श्रीकृष्णमूर्ति के स्पर्श की महिमा है। कोई भक्त कहता है, “हे वसुन्धरे ! वृन्दावन में जो श्रीगोविन्ददेव का दर्शन कर लेता है, वह यमपाश में नहीं पड़ता, वरन् देवगति को जाता है।” भाव यह है कि यदि कोई साधारण व्यक्ति भी कुतूहलवश वृन्दावन जाकर दैववश गोविन्दजी का दर्शन कर ले तो उसके लिए वैकुण्ठ नहीं तो कम से कम उच्च लोकों की प्राप्ति तो निश्चित है। अतः वृन्दावन में गोविन्द मूर्ति के दर्शन मात्र से महान् पुण्य होता है। आरति दर्शन 'स्कन्दपुराण' में मूर्ति की आरति दर्शन का यह माहात्म्य है— “आरति के समय भगवान् के मुखारविन्द का दर्शन करने वाले के करोड़ों वर्षों से संचित पापपुंज भस्म हो जाते हैं। उसके ब्रह्महत्या जैसे जघन्य पाप भी नहीं ठहर पाते।” उत्सवों का आयोजन जैसा पूर्वकथन है, श्रीकृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी, प्रमुख वैष्णवों की जन्मतिथि, झूलनयात्रा, दोलयात्रा आदि महोत्सवों को अवश्य मनाना चाहिए। उत्सव में भगवान् को रथ पर विराजमान किया जाता है और फिर नगर के विभिन्न मार्गों पर उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है, जिससे लोगों को मन्दिर में दर्शन का लाभ सुलभ हो जाय। 'भविष्यपुराण' कहता है—“जो चाण्डाल आदि कौतुक में भी रथ पर विराजमान श्रीभगवान् को देख लेते हैं, वे विष्णु-पार्षद बन जाते हैं।” 'अग्निपुराण' का वाक्य है, “जो मन्दिर में श्रीमूर्र्ति की पूजा को देखकर प्रसन्न होता है, वह पंचरात्र में वर्णित क्रियायोग के फल को प्राप्त करता है।” क्रियायोग प्रायः भक्तियोग जैसी अभ्यास की पद्धति है। परन्तु वह विशेष रूप से ध्यानयोगियों के लिए विहित है। भाव यह है कि इस क्रमिक पद्धति से ध्यानयोगी अन्त में भगवद्भक्ति के स्तर पर आरूढ़ हो जाते हैं।
अध्याय १० श्रवण-स्मरण की कला श्रवण कृष्णभावना और भक्तियोग का आरम्भ श्रवण से होता है। सभी मनुष्यों को यह अवसर दिया जाना चाहिए कि वे भक्तिगोष्ठी में आकर श्रवण करें। कृष्णभावना के पथ पर उन्नति के लिए यह परम अनिवार्य है। जब कोई शब्दब्रह्म को सुनने में कर्णविवरों का योग करता है तो वह शीघ्र ही हृदय से शुद्ध और परिष्कृत हो जाता है। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने श्रवण के माहात्म्य पर बड़ा बल दिया है। यह बद्धजीव के हृदय को पवित्र कर देता है, जिससे वह द्रुतगति से भक्तियोग में लगने और कृष्णभावना को समझने का अधिकारी बन जाता है। 'गरुडपुराण' श्रवण की महिमा का अतिशय सुन्दर दिग्दर्शन है, "प्राकृत जगत् में बद्धजीव की अवस्था सर्प से कटे अचेतन मनुष्य जैसी है, क्योंकि इन दोनों को ही मन्त्रध्वनि से फिर चेतन किया जा सकता है।" सर्प द्वारा दष्ट मनुष्य तुरन्त नहीं मरता, वरन् पहले अचेतन होकर कुछ समय उसी अवस्था में पड़ा रहता है। प्राकृत-जगत् में जीव निद्रा- मग्न है, क्योंकि वह अपने यथार्थ स्वरूप और कर्तव्य को तथा श्रीभगवान् से अपने सम्बन्ध को नहीं जानता। अतः विषयी जीवन का अर्थ है कि माया- रूपी सर्प का काटना और इस प्रकार कृष्णभावना के अभाव में जीव का मृतप्राय हो जाना। सर्प से कटे हुए मुमूर्षु को मन्त्रोच्चारण से फिर जीवन- दान किया जा सकता है। इस मन्त्रविद्या के अनेक विशारद हैं। इसी प्रकार महामन्त्र हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे को सुनाकर मृयमाण अचेतन पुरुष को वापस कृष्णभावना की अवस्था में लाया जा सकता है। श्रीमद्भागवत (४.२६.४०) में भगवच्चरित-श्रवण की महिमा के सम्बन्ध में शुकदेव गोस्वामी महाराज परिक्षित से कहते हैं, "हे राजन ! वही स्थान निवास के योग्य है जहाँ महान् आचार्य भगवान् के दिव्य चरित
७८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु की वार्ता करते हैं। वहाँ रहकर उन महापुरुषों के मुखचन्द्र से निस्यन्दित कृष्णलीलारससुधा की धाराओं का कर्णपुटों से अहर्निश पान करता रहे । जो अतृप्त होकर निरन्तर इस अमृत का पान करते हैं, उनको भूख-प्यास, भय-शोक और भव-मोह स्पर्श नहीं कर पाते ।" भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भी श्रवण को वर्तमान कलियुग में स्वरूप-साक्षात्कार का साधन बतलाया है। इस काल में पूर्व युगों के विधि- विधानों और वेद-स्वाध्याय का ठीक-ठीक अनुष्ठान सम्भव नहीं रहा है। फिर भी यदि कोई महाभागवतों और आचार्यचरणों द्वारा उच्चरित शब्द- ब्रह्म का श्रवण करे तो केवल इतने से भवरोग शान्त हो जायगा। अतएव भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु की आज्ञा है कि उन्हीं अधिकारी पुरुषों से श्रवण करे, जो भगवद्भक्त हों। व्यवसायी कथा वाचकों से सुनने का कोई लाभ नहीं। आत्मज्ञानी पुरुषों से सुनने पर चन्द्रमा से निस्यन्दित सुधाधारा जैसी अमृत की कल्लोलिनी नदियां हमारे कर्णरन्ध्रों में प्रविष्ट होंगी। उपरोक्त श्लोक चन्द्रमा के इस अलंकार से युक्त है। जैसा भगवद्गीता में कहा गया है, "कृष्णभावनाभावित हो जाने पर ही विषयी अपनी विषयवासना को लात मार सकता है।" जब तक वह किसी उत्तम कार्य में नहीं लग जाता, तब तक जीव अपने तुच्छ कार्य से विरत नहीं हो सकता। प्राकृत-जगत् में जीव प्रकृति की मायिक क्रियाओं में फँसा पड़ा है, परन्तु श्रीकृष्ण की दिव्य क्रियाओं के आस्वादन का अवसर मिलने पर वह दूसरे सब अल्प सुखों को भूल जाता है। जब श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्धप्रांगण में बोलते हैं तो विषयी इसे केवल दो मित्रों का साधारण वार्तालाप समझता है, जबकि वास्तव में तो श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र से अमृत की कल्लोलिनी सी झरती है। अर्जुन ने इस दिव्यनाद का श्रवण किया और परिणाम में भवरोग के सम्पूर्ण मोह से मुक्त हो गया । श्रीमद्भागवत (१२.३.१५) में उल्लेख है, "उत्तमश्लोक भगवान् श्रीकृष्ण की शुद्धभक्ति के अभिलाषी को नित्य-निरन्तर उनके दिव्य गुणों और चरित का श्रवण करना चाहिए, जिससे हृदय के सारे अमंगल का नाश होता है।" भगवत्कृपा की बाट देखना श्रीमद्भागवत (१०.१४.८) में ही कहा है—"हे नाथ ! जो निरन्तर आपकी अहैतुकी कृपा की प्रतीक्षा में अपने पूर्वकृत पापों को भोगता हुआ