भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
३१४ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन— बर्बेरिस् की विभिन्न उपजातियों में कम-से-कम आठ प्रकार के विभिन्न क्षाराभ पाये गये हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं— बर्बेरिन् (Berberine), ऑक्सिअँकॅन्याइन् (Cxyacanthine), बबेमाइन् (Berbamine), पार्मेटाइन (Palmatine), जँट्रोहीझाइन् (Jatrorrhizine), कोलंर्बमाइन् (Columbamine), बर्बेरूबाइन् (Berberrubine) एवं हाइड्रैस्टाइन् (Hydrastine)। इनमें से प्रथम तीन विशेष महत्त्व के हैं तथा शेष विभिन्न अन्य वनस्पतियों के विशिष्ट क्षाराभ हैं। बर्बेरिन् (Berberine, C₂₀ H₁₉ NO₅), शीत जल में घुलनशील, मद्यसार में कम घुलनशील, पीतवर्ण का एवं सूइयों के आकार का क्षाराभ है। यह काष्ठ एवं छाल की अपेक्षा मूल में अधिक होता है। यह क्षाराभ और भी कई वनस्पतियों में पाया जाता है। इसके लवण भी बनाये गये हैं। इसके अतिरिक्त इसमें कषाय द्रव्य, गोंद, स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। इसके फल में मॅलिक् (Malic), टार्ट्रिक् (Tartric) एवं साइट्रिक् (Citric) अम्ल पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— दारुहलदी के मूल एवं काष्ठ बल्य, तिक्त पौष्टिक, दीपन, पाचन, ग्राही, पित्तविरेचक, ज्वरहर, पर्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, श्लेष्मघ्न, रसायन एवं त्वक् दोष-हर हैं। इसका उपयोग मलेरिया आदि विषम ज्वर, कुपचन, फिरङ्ग, गण्डमाला, अपची, त्वकदोष, भगंदर, प्रदर, अत्यार्तव, व्रण, गर्भिणीवमन, यकृत्प्लीहावृद्धि, कामला एवं सर्पदंश आदि में किया जाता है। (१) मलेरिया तथा अन्य विषमज्वरों में इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। ज्वर के साथ हल्लास, वमन, विरेचन, शिरःशूल एवं थकावट अधिक होती है तब इसके क्वाथ का उपयोग, रसौत की अपेक्षा अच्छा होता है। ज्वर में इसके पूर्व विरेचन देना चाहिये। इससे पसीना होकर ज्वर उतर जाता है। क्विनीन की तरह हृदयावसाद एवं बाधिर्य आदि इससे नहीं होते तथा प्लीहा की वृद्धि कम हो जाती है। ज्वर अच्छा होने के पश्चात् इसके उपयोग से भूख आदि बढ़ती हैं। यद्यपि उपर्युक्त गुणों के लिये इसका उपयोग किया जाता रहा लेकिन नवीन प्रयोगों से देखा गया कि इसके क्षाराभ बर्बेरिन् सल्फेट् (Berberine Sulphate) को १ १/२-२ १/२ की मात्रा में दिन में ३ बार ३ दिन तक देने पर भी किसी प्रकार का लाभ नहीं हुआ। मलेरिया में इससे एक लाभ अवश्य होता है कि इसके देने से प्लीहा आदि धातुओं में छिपे हुवे मलेरिया के कीटाणु रक्त में आ जाते हैं जिससे रक्त परीक्षा में दिखलाई देने से निदान में आसानी होती है। क्विनीन के साथ ज्वर की चिकित्सा में इसका उपयोग लाभदायक है। (२) बर्बेरिन् (Berberine)—यह क्षाराभ अत्यंत विषैला नहीं है लेकिन अधिक मात्रा में देने से अवश्य विषैला है एवं मृत्यु भी हो सकती है। इसका प्रचूषण आन्त्र एवं सूचिकाभरण द्वारा हो सकता है। बिल्ली एवं कुत्तों को उनके वजन के प्रति किलोग्राम के लिये २ मिलीग्राम की मात्रा में देने से हृदय पर अवसादक प्रभाव पड़ता है तथा रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है। यह क्रिया उन्हीं अंगों के ऊपर प्रत्यक्ष प्रभाव से एवं प्राणदा (Vagus = व्हागस्) नाड़ी की उत्तेजना से होती है। प्राणियों में मृत्युत्तर परीक्षण द्वारा देखा गया कि इससे फुफ्फुसों में अत्यन्त रक्ताधिक्य एवं हृदय के अलिन्दों (Auricle = ऑरिकल) का विस्फार होकर मृत्यु होती है। इससे वृक्कों में शोथ एवं रक्तस्राव होता है तथा इससे केन्द्रीय वातनाडीसंस्थान के कन्दों की कोशाओं को नुकसान पहुँचता है। यह श्वसन के लिये भी अवसादक है लेकिन १-१० मिलीग्राम की मात्रा में यह आन्त्र, गर्भाशय एवं श्वसनिका की अनैच्छिक मांसपेशियों को उत्तेजित करता है जिससे श्वसनका में संकोच उत्पन्न होता है। साधारण मात्रा में हृदय पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है जिससे हृदय की पोषक रक्तवाहिनियों में रक्तप्रवाह की वृद्धि होती है लेकिन अधिक मात्रा में देने पर यह अवसादक है। इससे श्वेतकणों की वृद्धि होती है। मलेरिया में निदान की दृष्टि से प्रदीपक रूप में (Provocative dose-प्रोव्होकेटिव्ह डोस) इसका उपयोग लाभदायक है जिससे छिपे हुये कीटाणु रक्त में आ जाते हैं तथा रक्तपरीक्षण में दिखलाई देने लगते हैं। यह चर्म के नीचे की धातुओं एवं
श्लैष्मिक कला के लिये स्थानिक रूप से सौम्य स्वापजनक होने के कारण वेदनास्थापन के लिए प्रयुक्त होता है । क्विनीन जो कि कोशाओं के जीवरस (प्रोटोप्लाजम्-Protoplasm) के लिये विषैला होता है उसकी अपेक्षा ८० गुना कम शक्ति का इसका घोल (८०,००० में १) लोशर्मेनिया ट्रॉपिका (Leishmania tropica) नामक प्राच्यव्रण उत्पन्न करने वाले कीटाणु के संबर्ध की वृद्धि रोकने में समर्थ होता है। यह प्राच्यव्रण (Oriental sore-ओरियण्टल् सोर) की चिकित्सा के लिये सफल औषधि है । बर्बेरिन् ॲसिड सल्फेट .५-१% घोल की १-२ सी० सी० मात्रा व्रण के किनारों पर अत्यन्त महीन सूचिका द्वारा, ४, ५ जगह दी जाती है। सूचिकाभरण हफ्ते में एक बार किया जाता है साधारणत ३ हफ्तों में व्रण अच्छा हो जाता है लेकिन द्वितीयक उपसर्ग की तीव्रता के अनुसार २-१२ हफ्ते भी अच्छा होने में लग सकते हैं । यदि एक से अधिक व्रण हों तो एक दिन में २ व्रणों से अधिक एवं हफ्ते में ४ व्रणों से अधिक (विशेष कर जब व्रण बड़े हों) में सूचिकाभरण नहीं करना चाहिये । चिकित्साकाल में व्रण का बन्धन उचित रूप में करना चाहिये । इस औषधि का तयार घोल ओरिसॉल (Orisol) नाम से बिकता है । (३) दारुहलदी पित्त एवं मूत्रमार्ग की विकृति में लाभदायक है। पित्त एवं मूत्राश्मरी, तृष्णा, दाह एवं हलास आदि के लिये इसका उपयोग किया जाता है । बस्तिशोथ एवं प्रमेह आदि में आँवले के रस एवं मधु के साथ इसको देते हैं । गर्भाशय शैथिल्य के कारण उत्पन्न रक्तप्रदर में तथा श्वेतप्रदर में मधु के साथ इसके क्वाथ का सेवन करने से लाभ होता है । कामला में मधु के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। मूलत्वक् का क्वाथ तृणाणुनाशक (Bactericidal- बॅक्टेरिसाइड्ल्) है तथा जीर्ण व्रणों में व्रण प्रक्षालन के लिये लाभदायक है । (४) दारुहलदी के फल सौम्य विरेचक, शीतल एवं रोचक होते हैं । प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण-उत्तर भारत में इसमें विशेष मिलावट नहीं होती लेकिन बंबई की तरफ इसमें कई प्रकार की वनस्पतियों के काष्ठ को हल्दी में उबालकर बेचते हैं। झाडकी हल्दी (Coscinium fenestratum Gaertn.) Colebr. (कॉसिनिअम् फेनेस्ट्रेट्म्) के कांड को भी इसके स्थान पर देते हैं। मात्रा-चूर्ण २-३ माशा, टिंक्चर १/२-२ ड्रा०, बर्बेरिन के लवण १-५ ग्रेन । अथ दार्वीक्वाथजातं रसाञ्जनम् । तस्य निर्माणविधि नामानि गुणांश्चाह दार्वीक्वाथसमं क्षीरं पादं पाक्त्वा यदा घनम् । तदा रसाञ्जनाख्यं तन्नेत्रयोः परमं हितम् ।।२०३।। रसाञ्जनं तार्क्ष्यशैलं रसगर्भञ्च तार्क्ष्यजम् । रसाञ्जनं कटु श्लेष्मविषनेत्रविकारनुत् ।।२०४।। उष्णं रसायनं तिक्तं छेदनं व्रणदोषहृत् ।।२०५।। दारुहलदी के क्वाथ से तैयार होने वाले रसोत के बनाने की विधि, नाम तथा गुण-दारुहलदी का काढ़ा बनाकर उसी के बराबर उसमें दूध डालकर औटावें । बाद को जब चौथाई भाग शेष रह जाय तब उतार लें और उसमें से जो गाढ़ा भाग हो उसे अलग कर लें। उसी को रसोत कहते हैं। वह नेत्रों के लिये परम हितकर होता है । रसाञ्जन, तार्क्ष्यशैल, रसगर्भ और तार्क्ष्यज ये रसोत के नाम हैं। रसोत-कटु तथा तिक्त रस युक्त, कफ, विष तथा नेत्र सम्बन्धी विकारों को दूर करने वाला, उष्ण वीर्य, रसायन, छेदक (पिण्डी भाव को प्राप्त हुये कफादिकों को काट-काट कर अलग करने वाला), एवम् व्रणसम्बन्धी दोषों को नष्ट करने वाला होता है । [२०३-२०५] ७१. रसौत हिं०-रसोत, रसौत, रसवत्त । बं०-रसांजन । म०-रसवत, रसांजन । गु०-रसवंती । क०-रसांजन । ते०- रसांजनमु । मा०-रसोत । पं०-रसौत । फा०-फिलजहरः । अ०-हुलुजेंहिंदी । अं०-Extract of Indian Berberis (एक्स्ट्रॅक्ट ऑफ इण्डियन् बर्बेरिस्) । ले०-Extractum Berberis (एक्स्ट्रॅक्टम् बर्बेरिस्) ।
३१६ भावप्रकाशनिघण्टुः रसोत—कालापन लिये भूरे रङ्ग की, गोंद के समान मुलायम तथा पानी और मदिरा में घुलने वाली दारुहलदी के क्वाथ और बकरी के दूध से बनी हुई औषधि है। इसका स्वाद कड़वा तथा कसैला होता है। इसको बनाने के लिये वर्षा के आखिर में इसके क्षुप को काट कर उसके पंचांग का क्वाथ बनाकर बाद में उसे गाढ़ा बनाते हैं। कुछ लोग क्वाथ में बराबर मात्रा में बकरी का दूध मिलाकर फिर गाढ़ा करते हैं। इस बात में मतभेद है कि रसौत केवल ब० लाइसियम् के मूल एवं काष्ठ से बनता है या ब० एशियाटिका से या दोनों से। बाजार में बिकने वाला रसौत प्रायः दोनों के मिश्रण से बनाया जाता है। इसमें लकड़ी, मिट्टी आदि पदार्थ मिले रहते हैं। इसलिये इसे १० गुने गरम जल में मिलाकर छान कर सुखाते हैं एवं बचे हुये भाग में मद्यसार मिलाकर छानकर उस मद्यसार को ऊर्ध्वपातन यन्त्र द्वारा अलग कर गाढ़े भाग को उपर्युक्त जल से सुखाये गाढ़े भाग में मिलाकर बन्द शीशी में रखकर काम में लाते हैं। गुण और प्रयोग—यह कड़वा पौष्टिक, ज्वरहर, पार्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, अर्शोघ्न, शोथघ्न, रक्तशोधक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक एवं नेत्रविकारहर है। इसका आन्तरिक उपयोग ज्वर, यकृत् प्लीहा वृद्धि, कामला, अर्श एवं आमाशय तथा पक्वाशय के व्रण (Gastric & duodenal ulcer-गैस्ट्रिक, अँड ड्युओडेनल अल्सर) में लाभदायक है। इसका बाह्य प्रयोग अर्श, प्राच्यव्रण, कटे हुये भाग, फोड़े फुन्सियाँ एवं पुराने व्रण आदि में किया जाता है। (१) विषमज्वर के सभी प्रकारों में इसको १५ रत्ती दिन में ३ बार जल के साथ देते हैं। क्वाथ की अपेक्षा यह ज्यादा अच्छा होता है। इससे ज्वर का शमन होकर प्लीहा वृद्धि भी कम होती है। इसके प्रयोग में पहले विरेचन देना चाहिये तथा इसकी पूर्ण मात्रा खाली पेट पर देनी चाहिये। औषधि लेने के पश्चात् रोगी को कपड़ा ओढ़ा कर सुलाना चाहिये। थोड़ी देर में रोगी को प्यास मालूम पड़ती है तथा जी घबड़ाने लगता है लेकिन उसको जल पीने न दें। एक घण्टे में पसीना निकलने लगता है तथा कमजोरी मालूम होती है। उसके बाद शरीर पोंछ कर लाजमण्ड या चावल का मांड और दूध पीने को दें। इसके बाद रोगी प्रायः सो जाता है तथा उस दिन ज्वर की पारी नहीं आती। इस प्रयोग में एक दोष यह है कि रोगी को कभी पहले रक्तातिसार हुआ हो तो वह फिर उभड़ जाता है। (२) नये एवं पुराने नेत्राभिष्यन्द में इसको पलकों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ इसमें अफीम, सैन्धव एवं फिटकिरी मिलाई जा सकती है। (३) रक्तार्श में इसको २ से ८ रत्ती मक्खन के साथ खिलाया जाता है एवं इसके घोल (३२ से १) से अर्श को धोते हैं। (४) कपूर एवं मक्खन के साथ बना इसका मलहम फोड़े, फुन्सियाँ, कटे हुये भाग एवं पुराने घावों पर लाभदायक है। मधु के साथ मिलाकर मुख के अन्दर के व्रणों पर एवं अन्य व्रणों पर लगाते हैं। शोथ पर इसके लेप से लाभ होता है। मुखरोग में इसके घोल से गण्डूष कराते हैं। प्राच्यव्रण के लिये भी यह लाभदायक है क्योंकि इसमें क्षाराम की पर्याप्त मात्रा रहती है। मात्रा—१/२-२ माशा। अथ बाकुची। तस्या नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह अवल्गुजो बाकुची स्यात्सोमराजी सुपर्णिका। शशिलेखा कृष्णफला सोमा पूतिफलीति च ॥२०६॥ सोमवल्ली कालमेषी कुष्ठघ्नी च प्रकीर्त्तिता। बाकुची मधुरा तिक्ता कटुपाका रसायनी ॥२०७॥ विष्टम्भहृद्धिमा रुच्या सरा श्लेष्मास्रपित्तनुत्। रूक्षा हृद्या श्वासकुष्ठमेहज्वरकृमिप्रणुत् ॥२०८॥ तत्फलं पित्तलं कुष्ठकफानिलहरं कटु। केश्यं त्वच्यकृ¹मिश्र्वासकासशोथामपाण्डुनुत् ॥२०९॥ १. पाठा० वमिश्र्वास। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३१७ बाकुची के नाम और उसके फल के गुण-अवल्गुज, बाकुची, सोमराजी, सुपर्णिका, शशिलेखा, कृष्णफला, सोमा, पूतिफली, सोमवल्ली, कालमेशी और कुष्ठघ्नी ये सब बाकुची के नामान्तर हैं। बाकुची-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, रसायन, विष्टम्भ को दूर करने वाली, शीतवीर्य, रुचिजनक, सारक (दस्तावर), कफ तथा रक्तपित्त को दूर करने वाली होती है तथा यह रूक्ष, हृदय के लिए हितकर तथा श्वास, कुष्ठ, प्रमेह, ज्वर और कृमि को नष्ट करने वाली होती है। इसका फल-पित्तकारक, कुष्ठ, कफ और वात को दूर करने वाला, कटु रस युक्त, केश तथा त्वचा के लिए हितकारी होता है तथा कृमि, श्वास, कास, शोथ आम और पाण्डु इन सब रोगों को नष्ट करने वाला होता है। [२०६-२०९] ७२. बाकुची हिं०-बाकुची, बकुची, बाबची, बावची, सोमराजी। बं०-लताकस्तूरी, हाकुच। म०-बावची। गु०-बाबची, बावची। क०-बाउचिगे। ते०-भवचि, कालाजिउजा। ता०-कर्पोंकरशि। फा०-बावकुचि अं०-Psoralea seed (सोरॅलिया सीड); Malaya tea (मलाया टी)। ले०-Psoralea corylifolia, Linn. (सोरॅलिया कोरिली- फोलिया, लिन.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। बाकुची-प्रायः सब प्रान्तों के जंगली झाड़ियों में तथा खादर अथवा कंकरीली भूमि में उत्पन्न होती है एवं सिलोन में भी प्राप्त होती है। अमेरिका में भी इसकी कई उपजातियाँ होती हैं जिनके गुण भी इसी के समान हैं। इसका क्षुप-१-४ फीट तक ऊँचा, वर्षायु एवं स्वावलम्बी होता है। पत्ते-१-३ इञ्च के घेरे में छोटी अरणी के पत्तों के समान गोलाकार होते हैं। ये नालयुक्त, कड़े, चिकने, लहरदार दन्तुर एवं इनके दोनों पृष्ठों पर काले लम्बे होते हैं। इन ग्रन्थियों के चिह्न शाखाओं पर भी होते हैं। १०-३० छोटे, नीले बैंगनी रंग के पुष्प-१ से २ इञ्च लम्बे पुष्पदण्ड पर आते हैं। फली-छोटी, गोल, काली, चिकनी, एक बीज युक्त, अस्फोटी एवं फलभित्ति बीज से चिपकी होती है। बीज-बाकुची वास्तव में फल ही है जिसकी फलभित्ति बीजावरण से चिपकी रहती है। यह अण्डाकार, आयताकार, कुछ चिपटे, चिकने, अग्र की तरफ नुकीले, काले रंग के एवं महीन गढ्ढों से युक्त होते हैं तथा ताल द्वारा बड़ा करके देखने पर नहाने के स्पञ्ज की तरह दिखलाई देते हैं। इसको चबाने पर एक तीव्र गन्ध आती है तथा इनका स्वाद कड़वा, तीता एवं दाहजनक होता है। औषधि कार्य में इनका तथा इनसे निकले तैल का व्यवहार किया जाता है। नोट-कुछ विद्वानों ने सोमराजी नाम से ले० व्हर्नोनिया अॅन्थेल्मिंटिका (Vernonia anthelmintica Willd.) का ग्रहण किया है लेकिन वह नाम तो अरण्यजीरक का है जिसका वर्णन परिशिष्ट में किया गया है। रासायनिक संगठन-बाकुची के फलों में राल, उड़नशील तैल, तारपीन की तरह तैल, स्थिर तैल एवं सोरॅलेन् (Psoralen) तथा आइसो-सोरॅलेन् (Iso-psoralen) नामक दो रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं। बाकुची के कृमिघ्न तथा त्वच्य गुण इन्हीं रवेदार पदार्थों के मिश्रण से हैं। यह तैल में घुलने वाले (फ्युरोकाउमरिन्स-Furocoumarins) हैं। प्रथम सोरॅलेन अंजीर से प्राप्त होने वाले फिक्युसिन् (Ficusin) के समान होता है। प्रथम फलभित्ति (Pericarp पेरीकार्प) से सोरॅलिडिन् (Psoralidin) नामक एक अन्य रवेदार पदार्थ भी प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग-यह सौम्य उत्तेजक, वातनाड़ियों के लिए बल्य, कृमिघ्न, त्वक् दोषहर, व्रण शोधक, व्रणरोपक, मृदुविरेचक, मूत्रक, स्वेदल एवं वृष्य है। इसका अन्तः बाह्य प्रयोग श्वित्र, कुष्ठ, पामा, कण्डू, गजचर्म (सोरियासिस्-Psoriasis) एवं चर्म के अन्य शोथयुक्त विकारों में किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
३१८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) श्वित्र में चौथाई भाग हरताल के साथ गोमूत्र में पीस कर इसका लेप लाभदायक होता है। खैर एवं आँवले के क्वाथ के साथ इसके चूर्ण का सेवन भी लाभदायक है। सालभर तक यदि बाकुची एवं काले तिल का सेवन करें तो सभी प्रकार के कुष्ठ अच्छे होकर शरीर की कान्ति बढ़ती है। इसको जल के साथ पीस कर भी लेप किया जा सकता है। नवीन तथा युवावस्था के श्वेत कुष्ठ रोग में शीघ्र लाभ होता है किन्तु अधिक दिन तक लगाना पड़ता है। इससे दाग लाल हो जाते हैं। (२) बाकुची में रहने वाला तैल ही प्रधान कार्यकारी भाग है। यह तैल चर्म के ऊपर रहने वाले मालागोलाणुओं (Streptococi) के लिये घातक है। अंतस्त्वचीय धमनिकाओं के ऊपर इसका निश्चित प्रभाव पड़ता है जिससे इनका विस्फार होकर वहाँ रक्तरस (Plasma-प्लाज्मा) का प्रवाह बढ़ जाता है। इससे चर्म लाल हो जाता है तथा रञ्जक कोषों (मेलॅनोब्लास्ट्स्-Melanoblasts) को उत्तेजना मिलकर रञ्जक का निर्माण होता है। यह रञ्जक, सफेद दागों में फैलकर उसका वर्ण परिवर्तन कर देता है। अधिकांश लोगों में इससे सफेद दाग लाल हो जाते हैं लेकिन कुछ (५%) लोगों में इससे छाले पड़ जाते हैं इसलिए इसको अन्य चीजों के साथ आवश्यक प्रमाण में मिश्रण कर लेना चाहिये जिससे दागों में केवल लाली आ जाय। श्वित्र के साथ-साथ यदि अन्य आंत्रिक विकार जैसे आमातिसार आदि हों तो उनकी भी चिकित्सा साथ-साथ करनी चाहिये। (३) फिरंगोत्तर श्वित्र में बाकुची के तैलीय राल सदृश सत्व (Oleo-resinous extract) का लेप लाभदायक होता है। इस सत्व में सोरॅलेन् तथा आइसो-सोरॅलेन् दोनों ही रहते हैं। इसको चॉलमोगरा के तेल के साथ मिलाकर लगाया जाता है तथा आन्तरिक प्रयोग भी करते हैं जिससे श्वित्र, सिध्म तथा सोरियासिस् में लाभ होता है। लगाने के लिये इसके साथ-साथ भाग चॉलमोगरा का तेल तथा २ भाग लॅनोलिन् मिलाकर मलहम बनाकर दिन में एक, दो बार दागों पर मलना चाहिये। करीब ३ महीने में लाभ होता है। मात्रा-बीज चूर्ण १-३ माशां। अथ चक्रमर्दः (चकवड़)। तस्य नामानि तत्फलस्य च गुणांश्चाह चक्रमर्दः प्रपुन्नाटो दद्रुघ्नो मेषलोचनः। पद्माटः स्यादेड जश्चक्री पुन्नाट इत्यपि ।। २१० ।। चक्रमर्दो लघुः स्वादू रूक्षः पित्तानिलापहः। हृद्यो हिमः कफश्वासकुष्ठदद्रुकृमीन्हरेत् ।। २११ ।। हन्त्युष्णं तत्फलं कुष्ठकण्डूदद्रुविषानिलान्। गुल्मकासकृमिश्वासनाशनं कटुकं स्मृतम् ।। २१२ ।। चकवड़ के नाम और उसके फल के गुण-चक्रमर्द, प्रपुन्नाट, दद्रुघ्न, मेषलोचन, पद्माट, एडगज, चक्री और पुन्नाट ये सब चकवड़ के नामान्तर हैं। चकवड़-लघु, स्वादिष्ट, रूक्ष, पित्तवात (वातपित्त) नाशक, हृदय के लिए हितकर, शीतवीर्य, कफ, श्वास, कुष्ठ, दद्रु (दाद) और कृमि को नष्ट करने वाला होता है। चकवड़ का फल- उष्णवीर्य और कटु रस युक्त होता है एवम् कुष्ठ, खुजली, दाद, विष, वायु, गुल्म, कास, कृमि और श्वास इन सब रोगों को दूर करने वाला होता है। [२१०-२१२] ७३. चकवड़ हिं०-चकवड़, पवाँड, पवाँर। बं०-चकुन्दा, पनेवार। म०-तरोटा, टाकली। गु०-कुँवाडीयो। क०- तगचे। ते०-तगरिस। ता०-उशिट्टुगरै। पं०-पँवार, चकुन्दा। फा०-संगेसतूया। अ०-कुल्ब। अं०-Fetid cassia (फीटिड कॅशिया)। ले०-Cassia tora Linn. (कॅशिया टोरा, लिन.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३१९ यह प्रायः सब प्रान्तों के जङ्गल, झाड़ी, खेत, मैदान, कूड़ा करकट, सड़क के किनारे एवं गन्दे स्थानों में आप ही आप उत्पन्न होता है । इसका २-५ फीट तक ऊँचा एकवर्षायु क्षुप वर्षा ऋतु में बहुतायत से उत्पन्न होता है। पत्र-संयुक्त पक्षकार और पत्रक-तीन जोड़े, अभिलट्वाकार, १-२ इञ्च लम्बे, चिकने, चमकीले, दुर्गन्धयुक्त एवं स्पष्ट शिराजाल से युक्त होते हैं। इसके निचले पत्रकों के बीच में एक ग्रन्थि होती है। पुष्प-छोटे पीले रंग के अक्षकोणीय एवं दो-दो के जोड़े में आते हैं। फलियाँ-४-८ इञ्च लम्बी, पतली, चौकोनी, कुछ मुड़ी हुई तथा इनका अग्र नुकीला होता है। बीज-बहुत, कड़े एवं मेथी के समान होते हैं। इसके कोमल पत्तों का साग बनाया जाता है तथा औषधि में पञ्चाङ्ग का व्यवहार किया जाता है। इसी का एक दूसरा भेद है जिसे कॅशिया ऑव्ट्यूसिफोलिया (Cassia obtusifolia) कहते हैं। इसका क्षुप भी ऊपर के क्षुप के समान ही होता हैं लेकिन इसमें दुर्गन्ध नहीं होती तथा इसके आधारीय पत्रकाद्वय के बीच में एक ग्रन्थि होती है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में एमोडिन (Emodin) नामक एक ग्लूकोसाइड पाया जाता है जो क्राइसोफेनिक् एसिड (Chrysophanic acid) की तरह होता है। इसके पत्तों में कॅथार्टिन (Cathartin) नामक एक विरेचक द्रव्य तथा लाल रंग होता है। गुण और प्रयोग-इसके बीज बल्य, दीपन, पाचन एवं त्वक् दोषहर होते हैं तथा पत्र विरेचक, कृमिघ्न एवं पार्यायिक ज्वरहर होते हैं। (१) इसके बीज की क्रिया त्वचा पर होती है। दाद, खुजली, कुष्ठ, सिध्म, पामा एवं छाजन (एक्झिमा) आदि में यह बहुत लाभदायक है। जिन रोगों में त्वचा मोटी हो जाती है उनमें इससे विशेष लाभ होता है। दाद में मूली के पत्ते के साथ या नींबू के रस के साथ या करञ्ज के तेल के साथ पीस कर इसे लगाया जाता है। छाजन में मट्ठे के साथ पीस कर लगाते हैं। सिध्म के लिये कांजी में पीसकर लगाना चाहिये। व्रणवस्तु के स्थान पर उत्पन्न होनेवाली तन्तु युक्त गाँठों (कीलॉइड-Cheloid) के लिये इसके बीजों को सेहुँड के दूध में भिगोकर फिर गोमूत्र में पीस कर लेप करने से लाभ होता है। अर्धविभेदक आदि शिरोरोग में कांजी के साथ इसका लेप उपयोगी है। इसका सेवन कॉफी के रूप में भी किया जाता है। (२) इसके पत्तों का क्वाथ बच्चों के विकारों में विशेषकर दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर मृदु विरेचक के रूप में दिया जाता है। इसका रस भिलावे से उत्पन्न दाह पर लगाया जाता है। इसका पोल्टिस बनाकर फोड़ों पर बाँधने से फोड़े जल्दी पक जाते हैं एवं वातरक्त, गृध्रसी तथा संधिवात में भी इनके बाँधने से वेदना कम होती है। इसके पत्तों को एरण्ड तैल में भूनकर दुर्गंध युक्त व्रणों में पुल्टिस के रूप में प्रयोग से लाभ होता है। मात्रा-बीज चूर्ण १-२ माशा। अथातिविषा (अतीस) । तस्या नामगुणानाह- विषा त्वतिविषा विश्वा शृङ्गी प्रतिविषाऽरुणा। शुक्लकन्दा चोपविषा भङ्गुरा घुणवल्लभा ।।२१३।। विषा सोष्णा कटुस्तिक्ता पाचनी दीपनी हरेत्। कफपित्तातिसारामविषकासवमिकृमीन् ।।२१४।। अतीस के नाम तथा गुण-विषा, अतिविषा, विश्वा, शृङ्गी, प्रतिविषा, अरुणा, शुक्लकन्दा, उपविषा, भङ्गुरा और घुणबल्लभा ये सब अतीस के नाम हैं। अतीस-उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्तरस युक्त, पाचक तथा अग्निदीपक होती है एवम् कफ, पित्त, अतिसार, आम, विष, कास, वमन और कृमि इन सब रोगों को दूर करनेवाली होती है। [२१३-२१४]
३२० भावप्रकाशनिघण्टुः ७४. अतीस हिं०-अतीस । बं०-आतइच । म०-अतिविष । पं०-अतीस । ते०-अतिवव । क०-अतिविषा । गु०- अतिवखनी कली । ता०-अतिवदयम । भोटि०-अइस । अं०-Indian Atees (इण्डियन् अतीस) । ले०- Aconitum heterophyllum, Wall. (एकोनाइटम् हेटरोफाइलम्, वाल.); Fam. Ranunculaceae (रॅनन्क्युलेंसी) । यह हिमालय पहाड़ में कुमाऊँ से हसोरा तक शिमला और इसके आस-पास में तथा चम्बा प्रान्त में ६ से १५ हजार फुट ऊँची चोटियों पर पाया जाता है । इसका क्षुप-२ से ४ फीट ऊँचा होता है । काण्ड-गोल, सीधा तथा विभिन्न आकार वाली पत्तियों से घिरा होता है । पत्र-नीचे के पत्तों के फलक प्रायः पाँच विच्छेदों से युक्त एवं गोलाई लिये हुये ताम्बूलाकार या लट्त्वाकार- ताम्बूलाकार होते हैं । ऊपर के पत्ते छोटे तथा धार पर दन्तुर होते हैं । पुष्प-नील अथवा हरितनील, १ से १।। इञ्च लम्बे एवं चमकीले होते हैं । आभ्यंतर पुट का एक दल सबसे बड़ा और फणाकार होता है । मूल-मूल में दो कन्द होते हैं जिनमें एक पिछले वर्ष का और दूसरा नये वर्ष का होता है । नवीन कन्द लम्बगोल या शंक्वाकार, हाथी की सूँड़ की तरह, १ इञ्च लम्बा तथा १/४ से १/२ इञ्च मोटा होता है । कन्दत्वक्-पतली तथा श्वेताभ, फीके राख के रङ्ग की तरह होती है । कन्द-स्वाद में अत्यन्त कडुवा, आसानी से टूट जाने वाला और भीतर से श्वेत तथा पिष्टमय पदार्थ से युक्त रहता है । इसे तोड़ने पर श्वेत मध्य भाग के चारों तरफ ४ काले धब्बे दिखलाई देते हैं । इनमें गन्ध नहीं रहती । इसमें कीड़े बहुत जल्दी लग जाते हैं तथा कीड़े लगने पर यह निःसत्व हो जाता है इसलिये औषधि में बिना कीड़े लगे हुवे अच्छे मूलकन्द का ही व्यवहार करना चाहिये । अन्य निघण्टुकारों ने वर्ण भेद से इसके ३, ४ भेद लिखे हैं लेकिन आजकल केवल एक ही भेद और मिलता है । जिसका वर्णन नीचे दिया गया है । (क) Aconitum palmatum D. Don (एकोनाइटम् पार्मेटम्) हिं०-बखमा । सं०-प्रतिविषा । इसके क्षुप पूर्वी हिमालय में सिकिम, गुर्बाल तथा मिश्री पर्वतों में पाये जाते हैं । इसके मूल अतीस की अपेक्षा अधिक लम्बे, कम मोटे, तोड़ने में सख्त, अधिक काले रङ्ग के तथा वजन में बहुत भारी होते हैं । इन पर गाँठें होती हैं । गुण आदि में यह अतीस के समान ही है । रासायनिक संगठन-वत्सनाभ वर्ग की औषधि होने पर भी यह विषैली नहीं है । इसमें एक अत्यन्त कड़वा बिना रवेदार क्षाराभ अतीसिन (Atisine) होता है जो विषैला नहीं है । इसके अतिरिक्त इसमें एकोनाइटिक् एसिड (Aconitic acid), टैनिक एसिड, अधिक मात्रा में पिष्टमय पदार्थ, वसा तथा ओलिइक्, पामिटिक् एवं स्टियरिक ग्लिसराइड्स (Oleic, Palmitic and Stearic Glycerides) के मिश्रण तथा गोंद, इक्षु शर्करा एवं राख २% आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-अतीस दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ग्राही, वृष्य, बल्य एवं विषमज्वरहर है । इसके सेवन से शरीर की विनिमय क्रिया सुधरती है । इसको ४-८ माशा देने पर भी विषैला परिणाम नहीं होता । इसका प्रयोग आमातिसार, विषमज्वर, कास, वमन, कुपचन, शूल, नवीन शोथयुक्त विकार एवं बालरोगों में किया जाता है । (१) तिक्तपौष्टिक तथा ग्राही होने के कारण अतिसार एवं संग्रहणी में इससे अच्छा लाभ होता है । बच्चों के वमन, अतिसार, ज्वर एवं खांसी में इससे बहुत लाभ होता है । इससे पाखाना पीला होकर मात्रा कम होती है । बच्चों तथा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३२१ प्रसूता में यदि अतिसार हो तो इसके साथ शृङ्ग भस्म देना चाहिये। अतीस के साथ भांग एवं घोड़वच मिलाकर अतिसार में दिया जाता है। इसके साथ सुगन्धित, कडुवी पौष्टिक तथा ग्राही अन्य औषधियाँ मिलाने से ज्यादा लाभ होता है। (२) इसको अधिक मात्रा में देने पर ही इसका ज्वरघ्न गुण स्पष्ट होता है लेकिन उस मात्रा में ज्वर कम होने के साथ-साथ विबन्ध भी हो जाता है जो विषमज्वर के लिये अहितकारक है। इसलिये विषमज्वर में इसकी अपेक्षा कुटकी ज्यादा लाभदायक होती है। ज्वर पश्चात् दौर्बल्य दूर करने के लिये दीपनीय एवं तिक्त पौष्टिक के रूप में इसका उपयोग अधिक अच्छा है। ज्वरातिसार के लिये यह अत्युत्तम औषधि है। इसमें १५ रत्ती अतीस तथा १५ रत्ती रसाञ्जन जल के साथ देते हैं। इसके साथ सुगन्धित पदार्थ मिलाने से ज्यादा लाभ होता है। बड़ों की अपेक्षा बच्चों के ज्वरातिसार में यह ज्यादा उपयोगी है। (३) मूषिक विष में इसको मधु के साथ सुबह चटाया जाता है। (४) कृमियों को निकालने के लिये इसके साथ विडंग का प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण १/२-२ माशा ज्वरातिसार, अतिसार में। चूर्ण २-४ रत्ती बल्य, तिक्तपौष्टिक । अथ लोध्रः 'शावरलोध्र-पटियालोध' इति लोके प्रसिद्धयोर्नामगुणानाह लोध्रस्तिल्वस्तिरीटश्च शावरो गालवस्तथा । द्वितीयः पट्टिकालोध्रः क्रमुकः स्थूलवल्कलः । जीर्णपत्रो बृहत्पत्रः पट्टी लाक्षाप्रसादनः ।। २१५ ।। लोध्रो ग्राही लघुः शीतश्चक्षुष्यः कफपित्तनुत् । कषायो रक्तपित्तासृग्ज्वरातीसारशोथहृत् ।। २१६ ।। शावरलोध्र और पटियालोध के नाम तथा गुण-लोध्र, तिल्व, तिरीट, शावर, गालव ये नाम लोध्र अर्थात् सावरलोध के हैं और दूसरा जो पटिआलोध (पटानी लोध) है उसके पट्टिकालोध्र, क्रमुक, स्थूलवल्कल, जीर्णपत्र, बृहत्पत्र, पट्टी और लाक्षा प्रसादन ये सब नाम हैं। दोनों प्रकार के लोध्र-ग्राही, लघु, शीतवीर्य, नेत्रों के लिए हितकर, कफपित्तनाशक, कषायरस युक्त, रक्तपित्त, रक्तविकार, ज्वर, अतिसार और शोथनाशक होते हैं। [२१५-२१६] ७५. लोध हिं०-लोध। बं०-म०-क०-लोध, लोध्र। गु०-लोधर। ते०-लोधुगचेट्टु। अ०-मुगाम। अं०- Lodh (लोध); Symplocos Bark (सिम्प्लोकोस् वार्क)। ले०-Symplocos racemosa, Roxb. (सिम्प्लोकॉस् रेसिमोसा, राक्सब) । Fam. Symplo-caceae (सिम्प्लोकेसी)। यह भारत के पूर्वोत्तर प्रान्त नेपाल, कुमाऊँ से आसाम, बंगाल, छोटा नागपुर, वर्मा आदि प्रदेशों के जङ्गल और छोटे पहाड़ों में पाया जाता है। इसका छोटा वृक्ष-२० फुट तक ऊँचा होता है। छाल-खुरदरी और गहरी धूसर (Grey) वर्ण की होती है। काट-(Blaze-ब्लेझ) आधा इञ्च तक मोटा, रेशेदार, हल्का पीला परन्तु हलके नारंगी भूरे रंग की रेखाओं से युक्त होता है। पत्ते-३।। से ७ इञ्च लम्बे, अण्डाकार-आयताकार या अण्डाकार-भालाकार; पत्राग्र-तीक्ष्ण, कुण्ठितलम्ब या कुंठित; पत्र तट-आरावत, अस्पष्ट गोलदन्तुर या क्वचित अखण्ड; पत्र पृष्ठ-कोमल पत्तों का ऊपर का पृष्ठ चिक्कण तथा अधोपृष्ठ मृदु रोमश, तथा अन्य पत्रों के पृष्ठ चिक्कण या मध्यशिरा पर कुछ रोमों से युक्त, चमकीले तथा ऊपर का पृष्ठ गहरे हरे रङ्ग का; शिराएँ-बगल की शिराएँ सूखे हुवे पत्तों में स्पष्ट, ५-९ जोड़ी एवं पत्रवृन्त १/४ से १/२ इञ्च लम्बा होता है। आश्विन से अगहन तक फूल फल आते हैं। फूल-गुच्छों में, पीले और सुगन्धित होते हैं। फल- अष्ठिल, प्रायः आध इञ्च लम्बे, आयताकार, चिक्कण, बैंगनी काले रङ्ग के एवं उनका बाह्यकोष चिपका रहता है। इसकी २४ भाव.I
३२२ भावप्रकाशनिघण्टुः छाल का व्यवहार किया जाता है। इसका बाह्यपृष्ठ चिकना धूसरित हरा (यदि कार्क (Cork) के साथ हो तो) तथा आड़ी धारियों से युक्त, अंदर का पृष्ठ हलका पीला लेकिन रक्ताभ बादामी दिखलाई देता है तथा इसमें लम्बाई में गढ़ेदार धारियाँ होती हैं। भग्न-छोटा, बाह्य भाग में दानेदार लेकिन अन्दर का कुछ तन्तु युक्त। बाह्य भाग (Cortical) रक्ताभ बादामी रङ्ग का। गन्ध-हलकी मधुर लेकिन बन्द डिब्बों में रखने पर तेज हो जाती हैं। स्वाद-मधुर, सुगन्धि तथा कुछ दाहजनक। नोट-एक अन्य प्रकार के पठानी लोध्र का वर्णन आगे किया गया है। लोध्र तथा पठानीलोध्र दोनों ही के गुण करीब-करीब समान ही हैं तथा दोनों ग्राही एवं अतिसारादि में लाभदायक होते हैं। लोध्र का एक पर्याय तिल्वक आया है। चरक के कल्पस्थान में तिल्वक् के मूल की (अन्दर की त्वचा रहित) बाह्य त्वचा का उपयोग विरेचन कराने के लिये किया गया है। इससे भ्रम होता है कि एक ही वस्तु विरेचक तथा ग्राही कैसे हो सकती है। व्यवहार में भी लोध्र की छाल विरेचक नहीं होती। शांवर या पठानी लोध दोनों की मूल त्वक् का प्रयोग किया गया किन्तु उससे विरेचन नहीं हुआ। इसके संबन्ध में एक श्लोक मिलता है। तिल्वकोऽपि तदाकारो बृहत्पत्रो विशेषतः। रक्तत्वचो विरेकी च बृहल्लोध्रेति कथ्यते ।। डल्हण तिल्वक् के सम्बन्ध में लिखते हैं—तिल्वकः रोध्रः, अन्ये तु रोध्राकारो रक्तत्वक्को बृहत्पत्रो वैरेचनिकः। इससे मालूम होता है कि लाल छाल वाला, दीर्घ पत्र वाला एवं विरेचक गुणवाला कोई लोध्र के समान वृक्ष होता है जो तिल्वक है। अभी इसका निर्णय नहीं हो पाया है। कुछ विद्वानों ने तिल्वक् के स्थान पर रेवाचीनी की छाल का उपयोग विरेचन के लिये करने को कहा है। रासायनिक संगठन-लोध की छाल में सम्पूर्ण क्षाराभ की मात्रा करीब ०.३२% होती है जिसमें से एक रवेदार क्षाराभ लोट्युराइन ०.२४%, अन्य चूर्णरूप में क्षाराभ लोट्युरिडाइन ०.०६% एवं एक और रवेदार क्षाराभ कोल्लोट्युराइन ०.०२% होते हैं। इसकी राख में सोडियम् कार्बोनेट रहता है तथा छाल में लाल रंजक पदार्थ बहुत अधि मात्रा में होते हैं। इसमें टैनिन द्रव्य नहीं होते। इसमें का लोट्युराइन क्षाराभ ॲब्राइन एवं हार्मैन के सदृश होता है। इसके सभी क्षाराभ विरल अम्ल घोल में अत्यन्त तेज नील-नीललोहितातीत चमक उत्पन्न करते हैं। गुण और प्रयोग-लोध की छाल ग्राही, शीतल, रक्तस्तंभक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक, शोथघ्न, बल्य एवं चक्षुष्य है। इससे छोटी रक्तवाहिनियों का संकोच होकर रक्तस्राव बन्द होता है। इससे श्लेष्मल त्वचा को शक्ति प्राप्त होकर एवं उसका संकोच होकर श्लेष्मा की उत्पत्ति कम होती है। इसका उपयोग अतिसार, प्रवाहिका, रक्तातिसार, रक्तप्रदर, अत्यार्तव, श्वेतप्रदर, सर्वाङ्गशोथ, यकृद्विकार, ज्वर एवं नेत्ररोगों में किया जाता है। (१) लोध्र अतिसार एवं प्रवाहिका के लिये बहुत अच्छी औषधि है। इसमें इसके प्रवाही सत्त्व को १/२ ड्रा० की मात्रा में देने से इपीकाक से जिनको लाभ नहीं हुआ था उन्हें भी लाभ हुआ। इसमें बेल की गुद्दी, कुचला एवं कुरैया की छाल के साथ इसका प्रयोग करते हैं या इसके साथ मुलेठी, अनार का छिलका एवं कायफल का प्रयोग किया जाता है। (२) रक्तप्रदर में इसके चूर्ण को १० रत्ती की मात्रा में दिन में ३, ४ बार मिश्री के साथ ३, ४ दिन तक देने से बहुत लाभ होता है। इससे गर्भाशय का संकोच होकर उसकी शिथिलता दूर होती है जिससे रक्तप्रदर एवं श्वेतप्रदर आदि में यह उपयोगी है। गर्भिणी में ७वें या ८वें महीने में यदि गर्भ में अधिक चलन हो तो इसे छोटी पीपल एवं मधु के साथ चटाने से गर्भाशय संकोच होकर चलन कम हो जाता है। (३) आँखों में लाली तथा सूजन होने पर इसको पलकों के चारों तरफ लगाते हैं। इसके साथ मुलेठी, रसौंत एवं भुनी फिटकिरी का उपयोग लेप में किया जाता है।
हरीतक्यादिवर्गः ३२३ (४) श्लीपद (Filaria = फाइलेरिया) के कारण उत्पन्न पायसमेह (Chyluria = काइलूरिया) तथा फीलपांव (Elephantiasis = एलिर्फेन्टियासिस) में यह लाभदायक सिद्ध हुआ है। (५) कुष्ठ एवं व्रण आदि में इसका अंतः बाह्य प्रयोग किया जाता है। प्रसूता में योनिक्षत के लिये इसका लेप उपयोगी है। गलशूण्डिका एवं लोध्र का मधु के साथ मसूढ़ों पर लेप करते हैं। सूजन पर लोध्र के लेप से सूजन कम हो जाती है। मात्रा-चूर्ण ५-१० रत्ती। ७६. पठानी लोध हिं०-पठानी लोध। बं०-पटिया लोध। गु०-पठाणी लोधर। पं०-पठानी लोद, लान्दर, लोज, लोश। म०-पट्टी लोध्र। ते०-तेल्ल लुट्टुगु। क०-बिली लोध्र। सिन्ध०-लोदर, पठानी लोध। ले०-Symplocos crataegoides Buch. Ham. (सिम्प्लोकॉस् क्रेटेगॉइडिस्)। Fam. Symplocaceae (सिम्प्लोकेसी)। इसके वृक्ष हिमालय में सिन्ध नदी से आसाम तक, खासिया पहाड़ और मरतवान के पहाड़ों में ३-९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं। यह वृक्ष-३० फुट तक ऊँचा होता है। छाल-हलके सफेद रंग की और कार्क युक्त होती है तथा उस पर खड़ी नालियाँ रहती हैं। काट-आधा इञ्च मोटा, हलका पीला व रेशेदार होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, १-१॥ इञ्च चौड़े, पतले, अण्डाकार या लट्वाकार, लंबाग्र और अग्र की ओर तीक्ष्ण दन्तुर होते हैं तथा सूखने पर पीले रङ्ग के हो जाते हैं। फूल-सफेद, समशिखाकार गुच्छों में तथा सुगन्धित होते हैं। इसके फूलों की सुगन्धि दूर तक जान पड़ती है। फल-चौथाई इञ्च से तिहाई इञ्च तक लम्बे तथा गोल होते हैं। उनसे मुड़ा हुआ गोल बीज निकलता है। इसके गुण और प्रयोग आदि सब उपर्युक्त लोध्र के समान ही है। अथ लशुना, तस्य नामान्याह लशुनस्तु रसोनः स्यादुग्रगन्धो महौषधम्। अरिष्टो म्लेच्छकन्दश्च यवनेष्टो रसोनकः ।।२१७।। अथ लशुनोत्पत्तिमाह यदाऽमृतं वैनतेयो जहार सुरसत्तमात्। तदा ततोऽपतद् बिन्दुः स रसोनोऽभवद् भुवि ।।२१८।। लहसुन की उत्पत्ति-जिस समय गरुड़ने इन्द्र के पास से अमृत हरण किया था उस समय उस अमृत) से जो बिन्दु (अमृत-बिन्दु) पृथ्वी पर गिरा उसी से लहसुन की उत्पत्ति हुई। [२१७-२१८] अथ रसोनशब्दस्य निरुक्तिमाह पञ्चभिश्च रसैर्युक्तो रसेनाम्लेन वर्जितः। तस्माद्रसोन इत्युक्तो द्रव्याणां गुणवेदिभिः ।।२१९।। लहसुन के 'रसोन' नाम की व्युत्पत्ति-लहसुन में ६ प्रकार के रसों में से ५ प्रकार के रस रहते हैं किन्तु केवल एक अम्ल रस नहीं रहता है, अतएव रस अर्थात् केवल अम्ल रस से ऊन अर्थात् शून्य रहने से द्रव्यों के गुणादि जानने वाले विद्वानों ने इसका 'रसोन' नाम रक्खा है। [२१९] अथ लशुने रसस्थानान्याह कटुकश्चापि मूलेषु तिक्तः पत्रेषु संस्थितः। नाले कषाय उद्दिष्टो नालाग्रे लवणः स्मृतः।। बीजे तु मधुरः प्रोक्तो रसस्तद्गुणवेदिभिः ।।२२०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
३२४ भावप्रकाशनिघण्टुः लहसुन में कटु आदि पाँचों रसों के रहने के स्थान—इसके मूलभाग में कटु रस रहता है । पत्तों में तिक्त रस, नाल में कषाय रस, नाल के अग्रभाग में लवण रस तथा बीज में मधुर रस रहता है, ऐसा लहसुन के गुणों के जानने वाले विद्वानों ने कहा है । [२२०] अथ लशुनगुणानाह रसोनों बृंहणो वृष्यः स्निग्धोष्णः पाचनः सरः । रसे पाके च कटुकस्तीक्ष्णो मधुरको मतः ।। २२१ ।। भग्नसन्धानकृत्कण्ठ्यो गुरुः पित्तास्रवृद्धिदः । बलवर्णकरो मेधाहितो नेत्र्यो रसायनः ।। २२२ ।। हृद्रोगजीर्णज्वरकुक्षिशूल-विबन्धगुल्मारुचिकासशोफान् । दुर्नमिकुष्ठानलसादजन्तुसमीरणाश्वासकफांश्च हन्ति ।। २२३ ।। लहसुन के गुण-लहसुन बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, उष्णवीर्य, पाचक तथा सारक होता है । और वह रस तथा पाक में कटु तथा मधुर रस युक्त, तीक्ष्ण, भग्न-सन्धानकारक (टूटी हड्डियों को जोड़ने वाला), कण्ठ को हितकारी, गुरु, पित्त एवं रक्तवर्धक, शरीर में बल तथा वर्ण को उत्पन्न करने वाला, मेधाशक्ति तथा नेत्रों के लिये हितकर और रसायन होता है । एवं हृद्रोग, जीर्णज्वर, कुक्षिशूल, मल तथा वातादिक की विबन्धता, गुल्म, अरुचि, कास, शोथ, बवासीर, कुष्ठ, अग्निमान्द्य, कृमि, वायु, श्वास और कफ को नष्ट करता है । [२२१-२२३] अथ लशुनसेविनां हिताहितपदार्थानाह मद्यं मांसं तथाऽम्लञ्च .हितं लशुनसेविनाम् । व्यायाममातपं रोषमतिनीरं पयो गुडम् ।। २२४ ।। रसोनमश्नन् पुरुषस्त्यजेदेतान् निरन्तरम् ।। २२५ ।। लहसुन सेवन करनेवालों के लिये हितकर तथा अहितकर पदार्थ-मद्य, मांस तथा अम्लरसयुक्त भक्ष्य पदार्थ ये सब लहसुन खाने वालों के लिये हितकर हैं । और व्यायाम, आतप (धूप में फिरना), क्रोध करना, अत्यन्त जल पीना, दूध और गुड़ इन सबों को लहसुन खाने वाले पुरुष सदा छोड़ दें, क्योंकि ये सब अहितकर हैं । [२२४-२२५] ७७. लहसुन हिं०-लहसुन, लशुन । बं०-रसुन । म०-लसून । क०-बेल्लुल्लिल । ते०-वेल्लुल्लिल, तेल्ललिगड्डा । ता०- वल्लपुंडु । गु०-लसण । सिंधी-पोम । आसा०-नहरु । भोटि०-गोक्पस । फा०-सीर । अ०-सूम, फूम । यू०-स्कर्दून् । अ०-Garlic (गार्लिक) । ले०-Allium sativum, Linn. (एलियम् सटाइवम्, लिन०) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में बोया जाता है । विशेषकर पश्चिमोत्तर प्रदेश, गढ़वाल, कुमाऊँ, पंजाब एवं काश्मीर आदि में अधिक उत्पन्न होता है । इसका बहुवर्षायु क्षुप-करीब १ फुट तक ऊँचा होता है । पत्र-चिपटे, लम्बे, १ इञ्च से कम चौड़े एवं इनका अग्र लम्बा होता है । पत्रकोश-३-४ इञ्च लम्बा होता है तथा पुष्प व्यूह को घेरे रहता है । पुष्पव्यूह-सवृन्त मूर्धज, छोटे, घने एवं पतले, शुष्क कोणपुष्पकों से युक्त होते हैं । इसके कन्द को लहसुन कहा जाता है जिसके अन्दर ८- २० जावा होते हैं । इसमें एक विशिष्ट प्रकार की तीव्र गन्ध तथा इसका स्वाद विशिष्ट प्रकार का कटु होता है । रासायनिक संगठन-इसमें एक बादामी पीले रंग का उड़नशील तैल ०.१-०.३% पाया जाता है जिसका वि० गु० १.०४६-१.०५७ होता है । इस तैल में प्रधान रूप से ॲलिल् डाइसल्फाइड् (Allyl disulphide, C₆ H₁₀ S₂) तथा ॲलिल्-प्रॉपिल् डाइसल्फाइड् (Allyl-propyl disulphide) एवं अल्प मात्रा में उच्च श्रेणी के पॉलीसलफाइड्स (Polysulphides) पाये जाते हैं । इसके अतिरिक्त लहसुन के मद्यसारिय सत्त्व से एक ॲल्लीसिन् (Allicin, C₆ H₁₀ S₂ O) नामक प्रतितृणाण्वीय (Antibacterial) तरल द्रव्य प्राप्त किया गया है । इसके साथ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
ही-साथ ॲल्लीसेशन् I तथा ॲल्लीसेशन् II (Allicetion I and Allicetion II) नामक दो अत्यन्त तीव्र प्रतिजैविक ((Antibiotics) पदार्थ भी पाये गये हैं जो ईथर (Ether) में घुलनशील लेकिन जल में न घुलने वाले होते हैं। **गुण और प्रयोग-**लहसुन एक बहुत ही उपयोगी औषधि है। प्राचीन काल से इसका प्रयोग किया जाता रहा है और आधुनिक विद्वानों ने भी इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। राजयक्ष्मा (Tuberculosis) एवं अन्य फुफ्फुसविकार, वातविकार, शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dyspepsia) एवं व्रण आदि के लिये यह बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुआ है। काश्यपसंहिता में लशुनकल्प नामक एक स्वतन्त्र अध्याय में इसका वर्णन किया गया है। धार्मिक ग्रन्थों में इसका सेवन निषिद्ध माना है। लहसुन उष्ण, दीपन, पाचन, वातहर, स्वेदजनन, मूत्रल, उत्तेजक, कफनिःसारक, बल्य, वृष्य, रसायन, दुर्गन्धहर एवं उत्तम प्रतिदूषक (Antiseptic) है। इसमें जो उड़नशील तैल होता है उसका उत्सर्ग, त्वचा, फुफ्फुस एवं वृक्क द्वारा होता है। फुफ्फुस से उत्सर्ग के समय इससे कफ ढीला हो जाता है तथा उसमें के जीवाणुओं का नाश होकर कफ की दुर्गन्ध दूर होती है। वात नाड़ी संस्थान पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से वमन, विरेचन एवं शिरःशूल आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। बच्चों में इसका सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये। अधिक मात्रा में सेवन करने पर कभी-कभी मृत्यु भी हो सकती है। इसका बाह्य प्रयोग त्वग्रागकारक (Rubefacient) एवं प्रतिदूषक औषधि के रूप में किया जाता है। अधिक समय. तक त्वचा के साथ सम्पर्क होने से स्फोट उत्पन्न होते हैं। (१) यक्ष्मा दण्डाणु से उत्पन्न सभी विकृतियों जैसे फुफ्फुसविकार, स्वरयन्त्रशोथ, चर्मविकार, अस्थिव्रण एवं नाड़ीव्रण आदि में यह निश्चित लाभदायक सिद्ध हुआ है। लहसुन के रस को इनमें पिलाया जाता है तथा इसका स्थानिक उपयोग भी किया जाता है। स्वरयंत्र शोथ में इसका टिंक्चर १/२-१ ड्रा० दिन में २, ३ बार देते हैं। पुराने कफविकार जैसे कास, श्वास, स्वरभङ्ग, श्वसनिका शोथ, श्वसनिकाभिस्तीर्णता (Bronchiectasis) एवं श्वासकृच्छ्र आदि में इसका अवलेह बनाकर उपयोग किया जाता है। लहसुन एवं वायविडङ्ग का सेवन भी लाभदायक है। बच्चों के कुकास में इसको ३, ४ घण्टे पर सुँघाया जाता है तथा इसके रस को पिलात भी हैं जिससे कष्ट कम हो जाता है। फुफ्फुसकोथ (Gangrene of lungs) में इसके टिंक्चर (५ में १) का उपयोग बहुत सफल रहा है। प्रारम्भ में इसको कम मात्रा में देना चाहिये तथा बाद में २० बूँद तक दिन में ३ बार देना चाहिये। थोड़े ही समय में ज्वर, कफ की दुर्गन्ध, स्वेदाधिक्य एवं अग्निमांद्य आदि दूर होकर लाभ होता है। इसी प्रकार खण्डीय फुफ्फुसपाक (Lobar pneumonia) में भी इसके टिंक्चर को ३० बूँद हर चार घण्टे पर जल के साथ देने से ४८ घण्टे के अन्दर ही लाभ मालूम होने लगता है तथा ५, ६ दिन में ज्वर कम हो जाता है। इन सभी विकारों में आन्तरिक प्रयोग के साथ-साथ इसको छाती पर लगाते भी हैं। (२) वायविडङ्ग के साथ इसका क्षीरपाक सभी वातविकार में जैसे गृध्रसी, कटिग्रह, अर्दित, पक्षाघात, एकाङ्गघात, उरुस्तम्भ, अपतन्त्रक एवं अपस्मार आदि में लाभदायक है। आन्तरिक प्रयोग के साथ इसंसे सिद्ध तैल की मालिश भी की जाती है। अपस्मार में इसका फांट भोजन के पूर्व एवं पश्चात् देने का विधान है। अपतन्त्रक में इसको सुँघाया जाता है। इसी प्रकार ठण्डक लगने से उत्पन्न पीड़ा, जीर्ण आमवात एवं संधिशोथ तथा शिरःशूल आदि में इसको खिलाया जाता है तथा बाह्य लेप भी किया जाता है। बच्चों के वात विकारों में इसकी मालिश विशेष लाभदायक है। (३) शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dyspepsia), आध्मान उदरशूल, विसूचिका, वमन, गुल्म, उदावर्त, आँव एवं केंचुवों की बीमारी में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। केंचुआ (Round worms) में १०-३० बूँद रस
३२६ भावप्रकाशनिघण्टुः दूध में मिलाकर पिलाते हैं। वातगुल्म में इसको पीस कर घृत के साथ खिलाने से लाभ होता है। ग्रहणीव्रण (Duodenal ulcer) में भी इसको लाभदायक माना गया है। (४) विषमज्वर में इसको तैल या घृत के साथ सुबह खिलाने से लाभ होता है। आन्त्रिक एवं तन्द्राभ ज्वर (Typhoid and Typhus) के प्रतिबन्धन के लिये इसका टिंक्चर को १ ड्रा० हर ४ या ६ घण्टे पर शरबत के साथ देते हैं। यदि रोग के प्रारम्भ में ही इसका प्रयोग किया जावेगा तो ज्वर बढ़ने नहीं पावेगा। इसका उपयोग आन्त्रिक प्रतिदूषक (Intestinal antiseptic) औषधि के रूप में किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। बच्चों को ½ ड्रा० की मात्रा में शरबत के साथ पर्याप्त है। (५) हृद्रोग में इसके प्रयोग से आध्मान कम हो कर हृदय के ऊपर का दबाव दूर होता है जिससे हृदय को बल प्राप्त होकर मूत्र अधिक होने लगता है तथा सर्वाङ्गशोथ एवं जलोदर में लाभ होता है। (६) इसके स्वरस को ३, ४ भाग जल में मिला कर क्षत तथा दुर्गन्धित व्रण प्रक्षालन के काम में लाया जाता है जिससे वेदना कम होकर व्रण जल्दी ठीक होता है। कार्बोलिक एसिड (Carbolic acid) की अपेक्षा इससे धातुओं को कम नुकसान होता है। इसी प्रकार शोथ, विद्रधि, बालतोड़ एवं दाद आदि पर इसका लेप लाभदायक है। इससे सिद्ध सर्षप तैल का उपयोग खुजली (पामा) में किया जाता है। रोहिणी (Diphtheria) नामक अत्यन्त उग्र गले के विकार में इसकी एक, एक कली चूसने को दी जाती है। ३, ४ घण्टे में १ छटांक तक लहसुन दिया जाता है। विकृत कला (Membrane) के दूर होने पर दिन भर में १ छटांक तक लहसुन देना चाहिये। शिशुओं के लिये इसके रस को २०-३० बूँद हर चार घण्टे पर शरबत के साथ देना चाहिये। एक रोगी में नाड़ीव्रण (Sinus) के लिये इसके ताजे स्वरस को २ बूँद को मात्रा में हर छठें दिन स्थानिक सूचिकाभरण किया गया जिससे ४ इञ्च गहरा नाड़ीव्रण २ महीने के अन्दर ठीक हो गया। उपजिह्वा शोथ में इसका स्थानिक प्रयोग सिल्वर नाइट्रेट् (Silver nitrate) की अपेक्षा अच्छा होता है। (७) कर्णशूल में इसके गुनगुने रस का या इससे सिद्ध तैल का उपयोग लाभदायक है। इससे वाधिर्य में भी लाभ होता है। (८) आर्तवप्रवर्तक होने के कारण इसका उपयोग अनार्तव एवं कष्टार्तव आदि में किया जाता है। गर्भिणी में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। (९) मवेशियों में अँन्थ्राक्स (Anthrax) नामक रोग के प्रतिबन्धन के लिये एवं सर्पविषादि में बाह्याभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है। हानिनिवारक-कतीरा, धनियाँ एवं बादाम का तेल। मात्रा-स्वरस १०-३० बूँद; कल्क २-३ माशा। ७८. एकपुतिया लहसुन हिं०-लहसुन, एककांदा लहसुन, एककली लहसुन, एकपुती लहसुन, एकपुतिया लाहुसन। बं०-गंधुन। अं०-Shallot (शॅल्लोट), One Clove Garlic (वन क्लोव गार्लिक)। ले०-Allium ascalonicum Linn. (एलियम् ॲस्कॅलोनिकम् लिन) Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। यह अनेक प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसकी जड़ दो वर्ष या इससे कुछ अधिक ही जीवित रह सकती है। इसके साथ कई एक अण्डाकार लम्बे जावे रहते हैं। यह १-१॥ इञ्च तक लम्बा और मध्यमा अङ्गुली के समान मोटा होता CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३२७ है। पत्ते-उक्त लहसुन के समान लम्बे, पतले, चिकने और पोले से होते हैं। जड़ से ही अनेक पत्ते निकलते हैं और पत्तों के बीच से दण्ड निकलता है जो एक दो फुट लम्बा, नीचे फूला हुआ किन्तु क्रमशः ऊपर संकुचित और गोल होता है। इसके अन्त में लट्टू के समान फूलों का गुच्छा लगता है। प्रत्येक गुच्छे में लगभग २०० तक नन्हें श्वेत वर्ण के फूल रहते हैं। वे प्याज के फूलों के समान दिखाई पड़ते हैं। इसके कन्द में एक ही जावा रहती है तथा यह कोमल प्याज की तरह दिखलाई देता है। गुण और प्रयोग-इसके गुण लहसुन की तरह ही होते हैं लेकिन विशेष कर यह वृष्य है। वाजीकरण के लिये इसको घी में भून कर मधु के साथ सेवन कराया जाता है। कर्णशूल में इसका टुकड़ा कान के अन्दर रखते हैं। इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। नोट-प्याज की तरह लाल रंग का एक और जंगली लहसुन होता है जो ईरान में अधिक होता है। उसे ले० में-एलियम् लेप्टोफाइलम्, वॉल (Allium leptophyllum, Wall.), ईरान में-सीर-इ-पिआझक् एवं अरब में-थूम-एल-बरी कहा जाता है। गुण और प्रयोग-यह स्वेदल होता है। इसका अचार कुपचन में व्यवहार में लाया जाता है। अथ पालाण्डुः (पियाज), तस्य नामगुणानाह पलाण्डुर्यवनेष्टश्च दुर्गन्धो मुखदूषकः। पलाण्डुस्तु बुधैर्ज्ञेयो रसोनेसदृशो गुणैः ।।२२६।। स्वादुः पाके रसेऽनुष्णः कफकृन्नातिपित्तल। हरते केवलं वातं बलवीर्यकरो गुरुः ।।२२७।। पियाज के नाम तथा गुण-पलाण्डु, यवनेष्ट, दुर्गन्ध और मुखदूषक ये सब पियाज के नाम हैं। पियाज को गुणों में लहसुन के समान समझना चाहिये। पियाज-रस तथा पाक में मधुर रस युक्त, अनुष्ण (ईषत् उष्णवीर्य) एवं
३२८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) बच्चों एवं वृद्धों के कफविकारों में विशेषकर जब ज्वर न हो तब यह लाभदायक है। कच्चे प्याज के रस को मिश्री मिलाकर बच्चों को चटाया जाता है तथा वृद्धों में इसको पकाकर देते हैं। क्षुयजकास में इससे कष्ट कम हो जाता है। श्वसनियों के जीर्ण शोथ के लिये लाभदायक औषधियों में यह श्रेष्ठ औषधि है। (२) वाजीकरण के लिये इसके रस को मधु एवं घृत के साथ दिया जाता है। (३) अर्श में इसके रस को १-२ तो० मिश्री के साथ पिलाते हैं या प्याज को पकाकर उसमें मिश्री, घी तथा जीरा मिलाकर खिलाते हैं एवं गरम-गरम मस्सों पर बाँधते हैं। (४) मसूढ़ों की सूजन तथा शूल में इसको नमक के साथ खिलाते हैं। (५) इसका क्वाथ आन्त्रावरोध, अर्श, कामला एवं गुदभ्रंश आदि में लाभदायक है। (६) विसूचिका में इसके रस के साथ चूने का पानी मिलाकर पिलाते हैं। अग्नि वृद्धि के लिये सिरके के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। प्लेग आदि मरक के समय कच्चे प्याज या सिरके के साथ इसका उपयोग किया जाता है। (७) अपतन्त्रक तथा नासिका से रक्तस्राव होने पर इसका नस्य कराया जाता है। चक्कर आता हो तो इसको सुँघाते हैं। (८) कर्णपिटिका में इसका पुटपाक करके साधारण गरम रस कान में डालने से शूल कम हो जाता है। इसके बीच के टुकड़े को भी कान में रखने से लाभ होता है। (९) अंधता तथा धुन्ध आदि विकारों में इसका रस मधु में मिलाकर नेत्र में लगाते हैं तथा रात्र्यंध में नमक के साथ इसका रस डालते हैं। (१०) इसको घी में भूनकर उसका पोल्टिस गाँठ, फोड़े, बद एवं व्रण आदि पर लगाया जाता है। आमवातादि संधिविकार एवं अन्य दाह, कण्डू आदि चर्म रोगों में इसके रस को सरसों के तेल में मिलाकर मलते हैं। (११) बिच्छू तथा अन्य कीड़ों के काटने पर इसके रस को लगाने से दाह एवं वेदना की शांति होती है। (१२) प्याज के बीज बाजीकर होते हैं। इसको पीसकर मधु के साथ खालित्य, व्यंग एवं झाँई आदि पर लगाते हैं। दाद में सिरका में पीसकर इसे लगाते हैं एवं मस्सों पर नमक के साथ इसका उपयोग किया जाता है। ८०. जंगली प्याज उपर्युक्त प्याज के अतिरिक्त इसी वर्ग का एक जंगली प्याज होता है जिसकी दो-तीन किस्में भारतवर्ष में पाई जाती हैं। यह डाक्टरी स्किल (Squill) नामक औषधि अर्जिनीया मॅरिटिमा (Urginea maritima (Linn.) Baker) की श्वेत उपजाति जो भूमध्यसागरीय तट पर होती है उसका अच्छा प्रतिनिधि है। यह अत्यन्त उपयोगी होने के कारण यहाँ उसका वर्णन दिया जा रहा है। लोग इसे रा० नि० एवं नि० र० का कोलकंद मानते हैं। दोनों निघण्टुकार उसे 'वान्तिशमनकृत्' लिखते हैं लेकिन जंगली प्याज 'वान्तिजननः' होता है। (क) ले०- Urginea indica, Kunth. (अर्जिर्निया इण्डिका, कुंथ)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। सं०- कोलकन्द, वनपलांडु। हिं०, बं०- कांदा, जंगली प्याज। गु०- जंगली कांदो, पाण कंदो। म०- नानकांदा, कोलकांदा, कोचिंदा। ता०- नेरि वंगायम्। ते०- अडवितेलु गड्डु। पं०- कफोर, कचवरसल। अ०- उन्मुले हिंदी। फा०- पियाज सहराई। अ०- Indian Squill (इण्डियन स्किल)। यह पश्चिमी हिमालय में ७००० फीट तक, गढ़वाल, कुमाऊँ, बिहार एवं कारोमंडल तट तथा कोंकण के रेतीले किनारों एवं पश्चिमी घाट पर पाया जाता है।
हरीतक्यादिवर्गः ३२९ यह वनस्पति सुदर्शन सदृश होती है। पत्र-मूलीय, ६-१८ इञ्च लम्बे, प्याज से बड़े और चौड़े, चिपटे, रेखाकार एवं नोकदार होते हैं। पत्रों के निकलने से पूर्व बीच से सदण्डिक पुष्पध्वज (Scape-स्केप) निकलता है जिस पर हरिताभ श्वेत पुष्प निकलते हैं। फल-सामान्यस्फोटी फल (Capsule-कॅपसूल) अण्डाकार, आधे-पौन इञ्च लम्बे, दोनों ओर क्रमशः पतले होते हुवे एवं ६-९ बीजों से युक्त होते हैं। बीज-छोटे, दीर्घवृत्ताकार, चिपटे तथा काले होते हैं। इसका कन्द प्याज की तरह २-४ इञ्च लम्बा, लट्वाकार एवं परिच्छदपत्रक (Tunicated Bulb-ट्यूनिकेटेड बल्ब) स्वरूप का होता है। इसके कटे हुये टुकड़े मुड़े हुए, चिपटे, विभिन्न आकार के आधे से दो इञ्च लम्बे, दोनों छोर की तरफ क्रमशः पतले होते हुए, कभी-कभी तीन या चार एक साथ, काण्डक से चिपके हुए, लंबाई में रीढ़दार ये हलके पीताभ बादामी या हलके पीत विभिन्न वर्ण के होते हैं। ये छिलके शुष्क अवस्था में सहज चूर्ण बनाने लायक एवं आर्द्र हो जाने पर चमड़े एवं लचीले हो जाते हैं। इनमें गंध नहीं होती तथा इनका स्वाद तिक्त एवं कटु होता है। ताजा कन्द खाने से जीभ पर कण्डू मालूम होती है। पहिले वर्ष के नींबू के इतने बड़े कन्द का व्यवहार करना चाहिये। पुष्पित होने पर इसके कोमल कंदों को निकाल कर, उनके ऊपर के पतले छिलकों को हटा कर, उनके टुकड़े करके सुखाकर शुष्क स्थान में रखा जाता है। इसका चूर्ण हवा से जल सोख लेता है इसलिये इसको बिलकुल शुष्क बंद पात्र में रखना चाहिये। (ख) Scilla indica, Baker (सिल्ला इण्डिका, बेकर)। हिं०, बं०-सुफेदी खस। बंबई-भुइकांदा। ता०-शिरू-नेरि-वेंगयम्। यह दक्षिणी पेनिन्सुला में कोंकण एवं नागपुर से दक्षिण की तरफ समुद्र के किनारे रेतीली भूमि में उत्पन्न होता है। इसी से मिलती-जुलती एक जाति सि० होईनकेरी (S. hohenackeri) पंजाब में मिलती है। इनके कन्द श्वेताभ बादामी, अंशच्छद पत्रक (Scaly bulb) स्वरूप के, जायफल के इतने बड़े, गोल या अंडाकार एवं कभी-कभी बगल से दबे हुए होते हैं। इनके मांसल छिलके (शल्क पत्र) बहुत चिकने होते हैं एवं इनके किनारे परस्पर ढके रहने के कारण इनका एक ही पर्त मालूम होता है। (क) और (ख) दोनों ही के गुण समान हैं तथा बाजार में दोनों के कंद मिले हुवे बिकते हैं तथा इनके शुष्क टुकड़े भी बिकते हैं। ये कंद विदेशी कंदों से कुछ छोटे होते हुए भी उन्हीं की तरह कड़वे एवं हल्लासकारक होते हैं। (क) और (ख) के कंदों में यही अन्तर है कि (क) के कन्द परिच्छद पत्रक (Tunicated bulb-ट्यूनिकेटेड बल्ब) स्वरूप के एवं (ख) के कंद अंशच्छदपत्रक (Scaly bulb-स्केली बल्ब) स्वरूप के होते हैं। रासायनिक संगठन-ताजे कंद में सिल्लारेन-ए (Scillaren-A, C₃₆ H₅₂ O₁₃) नामक एक रवेदार ग्लाइकोसाइड (Glycoside) तथा सिल्लारेन-बी Scillaren-B) नामक चूर्ण रूप का ग्लाइकोसाइड (Glycoside) पाया जाता है जिनमें से दूसरे में कम-से-कम दो ग्लाइकोसाइड मिले रहते हैं। इनमें से सिल्लारेन-ए जल में बहुत कम घुलता है और सिल्लारेन-बी जल और क्लोरिफार्म में घुलने वाला एवं अॅल्कोहोल या ईथर में न घुलने वाला होता है। कंद में जिस अनुपात में ये दोनों ग्लाइकोसाइड रहते हैं उनका सिल्लारेन (Scillaren) नामक मिश्रण जल में सरलता से घुल जाता है तथा वह बहुत दिन तक खराब भी नहीं होता। भारतीय स्क्वल में उपर्युक्त ग्लाइकोसाइड के अतिरिक्त गोंद, कर्बोज, फाइटोस्टेरॉल (Phytosterol) एवं कॅल्शियम ऑक्झॅलेट् (Calcium oxalate) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, तिक्त, कफनिःसारक, हृदयोत्तेजक, हृद्य, मूत्रविरेचक तथा उत्क्लेश एवं वमनकारक है। इसकी क्रिया डिजिटॅलिस् (Digitalis) के समान होती है जिससे हृदय की गति कम होती है एवं हृदय का कार्य ठीक होने से हृदय को बल प्राप्त होता है। पचन संस्थान द्वारा इसका प्रचूषण कम होने के कारण इसको अधिक मात्रा में देना पड़ता है लेकिन अधिक मात्रा में इससे महास्रोत में प्रक्षोभ होकर वमन, अतिसार एवं रक्तातिसार होता है। यह
३३० भावप्रकाशनिघण्टुः स्थानिक प्रक्षोभक प्रभाव इसमें के रेफाइड्स (Raphides) के कारण होता है । हृदय पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष मांसपेशी की अपेक्षा प्राणदा नाडी (Raphides) के द्वारा अधिक होता है । डिजिटैलिस की अपेक्षा इसकी क्रिया शीघ्र एवं अस्थायी होने के कारण इससे संचायी दुष्परिणाम नहीं होते । अल्प मात्रा में इसके प्रयोग से आमाशय में साधारण प्रक्षोभ होकर प्रत्यावर्तन क्रिया द्वारा कफ निकलने लगता है । वृक्क द्वारा उत्सर्ग के समय वृक्क कोशाओं को उत्तेजित करने के कारण डिजिटैलिस की अपेक्षा इससे मूत्रविरेचन अधिक होता है । अधिक मात्रा में रक्तमेह भी हो सकता है । इसका नूतन वृक्क रोगों में प्रयोग नहीं करना चाहिये । (१) हृदयोदर, सर्वांग शोफ एवं जलोदर आदि में इसका उपयोग किया जाता है । जिन व्यक्तियों में डिजिटैलिस के प्रति असहनशीलता होती है उनमें तथा जिनको जीर्ण कफविकार भी साथ-साथ रहते हैं उन्हें यह ज्यादा उपयोगी है । इससे काफी मात्रा में मूत्रस्राव होता है । इसका मूत्रल प्रभाव प्रत्यक्ष वृक्क कोशाओं की उत्तेजना से एवं रक्ताभिसरण की क्रिया ठीक होने से है । हृदयोदर में गेजपिल (Guy’s Pill) नामक पारद एवं डिजिटैलिस के साथ बनी इसकी गोलियों का व्यवहार किया जाता है । (३) बच्चों के जीर्ण श्वसनी विकारों में इसके शर्बत का उपयोग १०-१५ बूँद की मात्रा में किया जाता है । जीर्ण कफ विकारों में इससे तीन तरह से लाभ होता है । जीर्ण कफविकारों में हृदय के दक्षिण विभाग में जो शिथिलता आई रहती है वह दूर होती है, कफढीला होकर निकलने लगता है एवं पाचन सुधरकर शौच भी साफ होने लगता है । जिनमें कफ बहुत एवं चिपचिपा होता है उनमें इससे विशेष लाभ होता है । नूतन कफविकारों में इसका प्रयोग नहीं किया जाता । इपीकैक की अपेक्षा अधिक प्रक्षोभक होने के कारण वमन के लिये भी इसका उपयोग नहीं करते हैं । (३) पादकंटक (Corn = कॉर्न) पर इसके कंद को पकाकर पीसकर गरम-गरम बाँधते हैं तथा मस्सों (Warts = वार्ट्स) पर इसके चूर्ण को मला जाता है । मात्रा-शुष्क चूर्ण १/२-१ १/२ रत्ती; सिरप (शर्बत) ३०-६० बूँद; टिंकचर ५-३० बूँद । अथ भल्लातकः (भिलावा), तन्नाम तत्पक्वफलमज्जवृन्ताना तस्य च गुणानाह • भल्लातकं त्रिषु प्रोक्तमरुष्कोऽष्करोऽग्निकः । तथैवाग्निमुखी भल्ली वीरवृक्षश्च शोफकृत् ।।२२८।। भल्लातकफलं पक्वं स्वादुपाकरसं लघु । कषायं पाचनं स्निग्धं तीक्ष्णोष्णं छेदि भेदनम् ।।२२९।। मेध्यं वह्निकरं हन्ति कफवातव्रणोदरम् । कुष्ठार्शोग्रहणीगुल्मशोफानाहज्वरकृमीन् ।।२३०।। तन्मज्
हरीतक्यादिवर्गः ३३१ अथ सामान्यतो भल्लातकगुणानाह भल्लातकः कषायोष्णः शुक्रलो मधुरो लघुः । वातश्लेष्मोदरानाहकुष्ठाशोंग्रहणीगदान् ।। हन्ति गुल्मज्वरश्वित्रवह्निमान्द्यकृमिव्रणान् ।। २३२ ।। साधारण रूप से भिलावे का गुण-भिलावा-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, उष्णवीर्य, वीर्यवर्धक एवं लघु होता है और यह वातकफ, उदररोग, आनाह, कुष्ठ, बवासीर, संग्रहणी, गुल्म, ज्वर, श्वित्रकुष्ठ, अग्निमान्द्य, कृमिरोग तथा व्रण को दूर करता है । [२३२] ८१. भिलावा हिं०, पं०-भिलावा, भेला । बं०-भेला, भेलातुकी । म०-बिब्बा । गु०, मा०-भिलामो । क०-गेरकायि । ते०-जिडिचेट्टु, जीड़िविट्टुलु । ता०-शेनकोट्टै । मला०-चेर्मर । फा०-बलादुर, बिलादुर । अ०-हब्बुलकल्ब, हब्बुलफहम् । अं०-The Marking-nut tree (दि मार्किङ्ग नट् टी) । ले०-Semecarpus anacardium, Linn. (सेमेकार्पस् ॲनाकार्डियम्, लिन.) । Fam. Anacardiaceae (ॲनाकार्डिएसी) । भिलावे के वृक्ष इस देश के विशेष कर गरम प्रान्तों में एवं हिमालय के निचले भागों में ३५०० फीट की ऊँचाई तक सतलज से पूर्व की ओर आसाम तक उत्पन्न होते हैं । इसका वृक्ष-देखने में सुन्दर २० से ४० फीट तक ऊँचा होता है । छाल-एक इञ्च मोटी धूसर रंग की होती है । छाल पर चोट मारने से उसमें से एक प्रकार का दाहजनक भूरे रंग का गाढ़ा रस निकलता है जो वार्निश बनाने के काम में आता है । लकड़ी-खाकी मिश्रित लाली युक्त सफेद या भूरे रङ्ग की होती है । छोटी-छोटी शाखाओं के नीचे कुछ तीक्ष्ण रोवें होते हैं । डालियों के अन्त में सघन पत्ते रहते हैं और वे ९ से २४ इञ्च तक लम्बे तथा ५ से १४ इञ्च तक चौड़े, ऊपर से लट्वाकार-आयताकार एवं सरल धारवाले होते हैं। माघ में पुराने पत्ते गिर जाते हैं और फागुन में नवीन पत्ते निकल आते हैं, माघ-फागुन में इसका वृक्ष फूलता है किन्तु इसके सिवाय कई बार वृक्षों पर फूल देखने में आते हैं । नन्हें-नन्हें फूलों की मञ्जरियाँ आती हैं । पुष्पदल-हरापन युक्त सफेद या हरापन युक्त पीले होते हैं । फल- एक इञ्च लम्बा तथा पौन इञ्च चौड़ा, चिपटा सा, हृदयाकृति, चमकीले काले रंग का तथा चिकना होता है । कच्चे फलों में दूध जैसा श्वेत वर्ण का रस होता है जो पकने पर कुछ गाढ़ा एवं काले रंग का हो जाता है । इस फल का आधारभाग मांसल तथा नारंगी वर्ण के स्तम्भक से बना होता है जो खाने के काम आता है । फलत्वक् में एक स्फोटकारक विषैला रस होता है जिससे धोबी कपड़ों में निशान लगाने की स्याही बनाते हैं । फल के अन्दर की मज्जा स्वादिष्ट होती है तथा वह भी खाने के काम आती है । कुछ लोगों में पुष्पित भल्लातक वृक्ष के पास सोने से या पुष्पपराग को हवा लगाने से शरीर पर सूजन आ जाती है । भल्लातक शोधन-औषधि में प्रयोग के लिये अच्छे सुपक्व तथा जल में डालने पर जो डूब जायें ऐसे भिलावों को लेकर कतर कर ईंट के टुकड़ों के साथ बोरे के अन्दर रगड़ कर फिर धोकर काम में लाना चाहिये । इससे उसके अन्दर का तैल सदृश रस कम होकर उसकी तीव्रता कम हो जाती है । इसके शोधन के पूर्व मुख, हाथ एवं पैर आदि खुले अंगों पर नारियल का तैल लगा लेना चाहिये । कुछ लोग फलों को केवल उबाल कर ठंडे जल से धोकर काम में लाते हैं । रासायनिक संगठन-इसके रासायनिक संगठन के विषय में कुछ मतभेद हैं और अभी संशोधन की आवश्यकता है । लेकिन इतना निश्चित है कि फलत्वक् के स्वरस में एक दाहजनक तैलीय पदार्थ एवं मज्जा में काजू की तरह पौष्टिक द्रव्य और एक प्रकार का तैल पाया जाता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
३३२ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-भिलावा उष्ण, रसायन, मेध्य, वाजीकर, वातकफहर, मूत्रजनन, वातनाड़ीवल्य, अग्निवर्धक, व्रणोत्पादक एवं कुष्ठघ्न है। इसका प्रचूषण बहुत जल्दी होता है लेकिन उत्सर्ग बहुत देर में होता है। आमाशय एवं उत्तरगुद पर इसकी विशेष क्रिया होती है। यकृत् पर उत्तेजक क्रिया होने से पित्तस्राव ठीक होता है जिससे भूख बढ़ती है एवं रक्ताभिसरण और विनिमय क्रिया ठीक होने से अर्श में लाभ होता है। त्वचा से उत्सर्ग के समय स्वेद आता है तथा त्वचा लाल हो जाती है। वृक्क पर उत्तेजक प्रभाव होने के कारण प्रारम्भ में मूत्र की मात्रा बढ़ती है लेकिन बाद में कम हो जाती है तथा कभी-कभी मूत्र में खून भी आ जाता है। इसका वाजीकर प्रभाव वातनाड़ियों की उत्तेजना से एवं प्रत्यक्षतया मूत्रनलिका के प्रक्षोभ से होता है। प्रत्यक्ष मांसपेशियों की अपेक्षा वातनाड़ियों को बलप्राप्त होने से यह अनेक वातरोगों में लाभदायक है। इससे नाड़ी की गति बढ़ती है तथा हृदय का कार्य भी ठीक होने लगता है। रसग्रन्थियों की उत्तेजना से श्वेतकणों की वृद्धि होती है जिससे शोथ आदि में लाभ होता है। इस प्रकार शरीर की सभी क्रियाएँ ठीक होने से योग्यरूप में सेवन से इसको अमृत के समान लाभदायक एवं रसायन मानते हैं। बाह्य त्वचा पर भिलावे का तेल लगने से त्वचा काली होकर जलन होती है एवं फोड़े होकर व्रण उत्पन्न होते हैं। उचित रूप में प्रयोग करने से आन्तरिक प्रयोग में इस प्रकार के लक्षण नहीं होते। इसका उपयोग अर्श, वातविकार, कफविकार, फिरंग, गण्डमाला, कृमि, विसूचिका, गुल्म, आमवात एवं कुष्ठ आदि रोगों में किया जाता है। (१) भिलावे को दीपक पर गरम करने से जो तेल टपकता है वह दूध में टपकाकर हरिद्रा एवं मिश्री मिलाकर फुफ्फुस विकारों में रात के समय दिया जाता है। प्रारम्भ में एक बूँद तथा धीरे-धीरे इसे बढ़ाते हैं। तमकश्वास पीड़ित रोगियों के लिये शीत ऋतु में इसका नित्य प्रयोग लाभदायक है। उपजिह्वा एवं गलतोरणिका की शिथिलता से उत्पन्न कास में भी इससे लाभ होता है। फुफ्फुसपाक में मुलेठी के साथ भिलावा दिया जाता है। (२) अग्निमांद्य, कुपचन, आनाह, विबन्ध, ग्रहणी, अर्श, उदर, गुल्म एवं विसूचिका आदि रोगों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। इससे स्निग्ध पदार्थों का पाचन अच्छी तरह से होता है। अर्श में भिलावा, हर्रा एवं तिल समान मात्रा में लेकर दुगुने गुड़ के साथ गोली बनाकर ३-६ माशा खिलाते हैं तथा इसका धुआँ भी दिया जाता है। हैजे में एक भिलावे को आधा तोला इमली के साथ पीसकर २ तोला लहसुन के रस के साथ पिलाते हैं। (३) रसायन के लिये १ भिलावे को काटकर एवं कूटकर १६ गुने जल में उबाल कर आधा रहने पर फिर ८ गुना दूध मिलाकर फिर उबाले तथा आधा शेष रहने पर उस क्षीर को छानकर १-२ तो० की मात्रा में प्रयोग करें। इसके पूर्व थोड़ा सा घी मुख में चारों तरफ लगा देना चाहिये तथा थोड़ा सा घी निगलना भी चाहिये। प्रत्येक वर्ष शीत ऋतु में इसका उपयोग करने से किसी प्रकार के रोग नहीं होने पाते। (४) वातनाड़ी शोथ, गृध्रसी, अर्दित, अंगघात, ऊरूस्तम्भ, मस्तिष्कावरण शोथ तथा मानसिक कार्य अधिक करने के कारण उत्पन्न थकावट में इसको इमली की पत्ती, लहसुन, वायविडङ्ग, नारियल का रस एवं मिश्री के साथ खिलाते हैं। (५) भिलावा १ भाग, काजू ६ भाग एवं शहद १ भाग अच्छी तरह घोटकर २ माशा दिन में ४ बार देने से नूतन तथा तीव्र आमवात में दो तीन दिन में ही लाभ होता है। जीर्ण आमवात में विशेष लाभ नहीं होता है। (६) गण्डमाला के लिये भिलावा २, अजवायन २ एवं पारद १ इसको घोंटकर चने बराबर इसकी गोली दही के साथ खिलाई जाती है। (७) इसके तैल का आंतरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। एक से दो बूँद तैल किसी अन्य तिलादि अक्षोभक तैल में मिलाकर फिरंग, गण्डमाला, कुपचन, अर्श, नाडी दौर्बल्य, चर्मरोग, कृमि, अपस्मार, अंगघात, आमवात एवं श्वास आदि रोगों में दिया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३३३ (८) इसका क्वाथ दुग्ध एवं घृत के साथ नाड़ी शोथ, वातबलासक, संखिया के विष से उत्पन्न नाड़ीविकार एवं आर्त्तवविकार में लाभदायक है। (९) इसके तैल का बाह्यप्रयोग प्रतिक्षोभक (Counter irritant) एवं स्फोटोत्पादक (Vesicant) के रूप में किया जाता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसका ज्यादा उपयोग होता है। चर्मकील, दद्रु, किलास, सन्धिपीड़ा, मोच, श्वित्र, गजचर्म, कुष्ठज ग्रन्थि एवं प्लीहावृद्धि आदि पर सूई के नोक से कई जगह इसको लगाते हैं या इसको मक्खन के साथ मिलाकर मलहम के रूप में प्रयोग करते हैं। (१०) इसकी मज्जा वाजीकर होती है। गरी एवं चिरौंजी के साथ इसका पाक सेवन कराया जाता है। विषैला प्रभाव—किसी-किसी को भिलावा सहन नहीं होता है। इससे मूत्र का रंग गहरा शरीर में दाह, खुजली, चकत्ते, अतिसार, ज्वर एवं कभी-कभी रक्तमेह, फोड़े फूट कर व्रण एवं उन्माद आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। प्रारम्भ में मूत्र की मात्रा कम होती है तथा उसका रंग धुँधला होने लगता है। गुदा एवं शिश्नेन्द्रिय के मुख पर कण्डू उत्पन्न होती है। प्रारंभिक लक्षण उत्पन्न होते ही औषधि को बन्द कर नारियल का दूध या इमली की पत्ती का रस या तिल एवं नारियल खाने को देना चाहिये। शरीर पर नारियल का तेल, घी, राल या नागद्रव (Lead lotion-लेड लोशन) का बाह्य उपयोग करना चाहिये। पथ्य—भिलावे के प्रयोग के समय घी, दूध एवं चावल का सेवन अधिक करना चाहिये। वर्ज्य—धूप में घूमना, स्त्रीसहवास, मांसभक्षण, नमक, व्यायाम एवं तैलाभ्यङ्ग आदि छोड़ देना चाहिये। निषेध—पैत्तिक विकार, रक्तस्रावी प्रवृत्ति, गर्भिणी, बाल, वृद्ध, अतिसार, वृक्कशोथ एवं उष्ण काल में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। मात्रा—तैल-१-२ बूँद, अवलेह-१/४-१/२ तोला, क्षीरपाक-१-२ तोला। अथ भङ्गा (भांग), तस्या नाम गुणानाह भङ्गा गञ्जा मातुलानी मादिनी विजया जया ।।२३३।। भङ्गा कफ हरी तिक्ता ग्राहिणी पाचनी लघुः । तीक्ष्णोष्णा पित्तला मोहमदवाग्वह्निवर्द्धिनी ।।२३४।। भांग के नाम तथा गुण—भङ्गा, गञ्जा, मातुलानी, मादिनी, विजया और जया ये सब भांग के पर्यायवाची नाम हैं। भांग—कफ को दूर करने वाली, तिक्तरस युक्त, ग्राही, पाचक, लघु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पित्तकारक तथा मोह, मद, वाणी और जठराग्नि को बढ़ाने वाली होती है।।२३३-२३४। ८२. भांग हिं०—भांग, भंग, बूटी। बं०—सिद्धि। म०-पं०-मा०—भांग। गु०—भांग। ते०—गंजाायि। ब्रही०—बिन। मा०—बूटी। क०—भंगी। ता०—कञ्जा। फा०—क (कि) नव, वंग। अ०—हशीश, बर्कुल ख्याल। गाँजा हिं०—गाँजा, गंजा, गाँझा। बं०, म०—गाँजा। ता०—गाँजा, येला। गु०—गांजो। ते०—गाञ्जई, बंगि-अकु। फा०—किन्नब। अ०—कु(कि)न्नब। अं०—Indian hemp (इण्डियन हेम्प), Cannabis (कॅन्नाबिस्)। ले०— Cannabis sativa, Linn. (कॅन्नाबिस् सेटाइव्हा, लिन.); Cannabis indica Lam. (कॅन्नाबिस् इण्डिका लॅम.)। Fam. Cannabinaceae (कॅन्नैबिनॅसी)।