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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

५२० भावप्रकाशनिघण्टुः संस्थान तथा मस्तिष्क के लिये हानिकर है। यह २८०,००० में १ हिस्से के अनुपात में भी अमीबा के लिये क्षारीय घोल में ८ मिनट में तथा बिना क्षारीय घोल में १८ मिनट में घातक है जबकि एमेटीन २००,००० में १ भाग में घातक होती है। इसके सूचिकाभरण से भी संपूर्ण क्षाराभ के समान स्थानिक प्रतिक्रिया होती है लेकिन जानवरों के समान मनुष्यों में कोई विशेष विषैला प्रभाव नहीं पड़ता। एक विशेष महत्त्व की बात यह है कि यह क्षाराभ परख नली (In vitro) में क्षय दण्डाणु (Tubercle bacillus) की वृद्धि रोकने में समर्थ है। गुण और प्रयोग- इसकी आर्द्र छाल कड़वी, अग्निदीपक, पाचक, ग्राही, अतिसारहर, ज्वरहर एवं रक्तसंग्राहक है। इसका प्रयोग रक्तातिसार, संग्रहणी, प्रवाहिका, ज्वरातिसार, जीर्णज्वर, पचन संस्थान के अनेक विकार, श्वास एवं वृक्कशूल आदि रोगों में किया जाता है। इसको पुटपाक, अवलेह, क्वाथ, फांट, चूर्ण या अरिष्ट के रूप में व्यवहार में लाते हैं। सुगन्धि, संग्राही तथा अतिसारनाशक अन्य औषधियों के साथ इसके क्वाथ या चूर्ण का प्रयोग लाभदायक है। इसकी छाल को खट्टे मट्ठे के साथ पीस कर लेने से अधिक गुण होता है। यह बच्चों एवं गर्भिणी में बिना किसी भय के दी जा सकती है। (१) अतिसार की किसी भी अवस्था में यह औषधि बहुत लाभदायक सिद्ध हुई है। विशेष कर रक्तातिसार तथा पुराने आमातिसार (Chronic amoebic dysentery) में इसके प्रवाही सत्त्व (Liquid extract) का स्वतंत्र प्रयोग या उसके साथ इसबगोल, एरंड तैल या इन्द्रजव आदि को देने से बहुत लाभ होता है। इसके क्वाथ या फांट के साथ अतीस, घोड़वच या मोचरस मिलाकर दे सकते हैं। एमेटीन के सूचिकाभरण के साथ इसको मुख द्वारा लेने से अधिक लाभ देखा गया है। इससे बनी हुई औषधियाँ जैसे कुर्चिसॉल (Kurchisol), कुर्चिलाइड (Kurchiloid), कुर्चिबार्क एक्स्ट्रैक्ट (Kurchi bark extract) आदि डाक्टरी दुकानों में बिकती हैं जिनका प्रयोग सुगम है एवं उनके क्षाराभों की मात्रा भी निश्चित रहती है। कुटज एपिकाकुआन्हा के समान कार्यकर औषधि है तथा उसमें इसके कुछ भी दोष नहीं हैं। आयुर्वेदिक योगों में अवलेहादि के अतिरिक्त कुटजाष्टक क्वाथ (शार्ङ्ग.) एवं पाठाद्य चूर्ण (चक्र.), लघु एवं बृहद् गंगाधर चूर्ण आदि उपयोगी हैं। (२) प्रसूति के पश्चात् योनिमार्ग की शिथिलता दूर करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। (३) जीर्ण ज्वर में इसका प्रयोग लाभदायक सिद्ध हुआ है। इससे सिनकोना की तरह वमन, हल्लास, शिरःशूल आदि नहीं होता। (४) इसकी कोमल फली तथा पत्रों की साग बच्चों में केचुवें की बीमारी में देते हैं। (५) इसका लेप आमवात एवं संधिशोथ में लाभदायक है तथा जलशोथ में इसके चूर्ण को शरीर पर मला जाता है। (६) दन्तशूल में इसके क्वाथ से कुल्ला करने से लाभ होता है। मात्रा- त्वक् चूर्ण १-४ मा, त्वक् चूर्ण १-४ तो. क्वाथ बना कर; फांट (१० में १) १ से २ औंस; प्रवाहीसत्त्व ६०-१२० बूँद; कुर्चि बिस्मथ आयोडाइड ४ ग्रा० द्वि० प्र० दि० २ हफ्ते तक। नोट- इन्द्रयव प्रकरण भी देखें। प्रतिनिधि और व्यामिश्रण- (क) राइटिया (Wrightia) की विभिन्न-विभिन्न उपजातियाँ जैसे—रा० टिन्क्टोरिया, रा० टोमेन्टोसा (W. tinctoria R. Br.; W. tomentosa Roem. & Schult), विशेषकर रा० टिन्क्टोरिया का गलती से अथवा मिलावट के रूप में कुटज के स्थान पर प्रयोग किया जाता रहा लेकिन इनमें कार्यकारी औषधि गुण

गुडूच्यादिवर्गः ५२१ बहुत ही अल्प मात्रा में रहते हैं। इसके वृक्ष-छोटे तथा इसकी छाल लाल-भूरे रंग की करीब-करीब चिकनी होती है। इसके मूल-गहरे भूरे रङ्ग के या काले तथा कुटज से कम कडुवे होते हैं। इसके पत्र-कुटज से छोटे होते हैं। इसके पुष्प-श्वेत चमेली की तरह तथा सुगन्धित होते हैं। फलियाँ-दो-दो एक साथ अग्र पर परस्पर जुड़ी हुई (फटने के समय दोनों अलग), ३-१२ इञ्च लम्बी और पृष्ठ पर सफेद दागों से युक्त होती हैं। बीज-१/२ से ३/४ इञ्च लम्बे, आधार के निचले सिरे पर श्वेत रेशमी तूल गुच्छ से युक्त एवं अन्त में नुकीले होते हैं। संस्कृत में इसको असित कुटज या स्त्रीकुटज कहते हैं तथा इसके बीजों को हिन्दी में मीठा इन्द्रजव कहा जाता है। गुण और प्रयोग-अल्प मात्रा में इससे आमाशय तथा यकृत की क्रिया सुधरती है लेकिन अधिक मात्रा से वमन तथा विरेचन होता है। (१) इसके पत्तों का स्वरस १/२ चम्मच की मात्रा में कर्नाटक, तेलगुप्रांत और मद्रास की तरफ कामला के लिये बहुत व्यवहार में आता है। (२) सड़े हुये दाँत के गढ़े के अन्दर इसके पत्तों को पीसकर रखने से दन्तशूल दूर होता है लेकिन यह मसूड़े तथा गाल में नहीं लगाना चाहिये, अन्यथा इससे दाह उत्पन्न होता है। (३) इसके पत्तों तथा छाल का क्वाथ अन्य कडुवी औषधियों के साथ दीपक, पाचक, बल्य तथा ज्वरहर है। इसका उपयोग ज्वर के पश्चात् अथवा अन्य तीव्र रोगों की संनिवृत्तावस्था में एवं पाचनसंस्थान के विकारों (Bowel complaints) में किया जाता है। (४) मीठा इन्द्रजव बलवर्धक है तथा धातुपौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। अथ कण्टककरञ्जघृतकरञ्जौ । (करञ्ज-करञ्जभेद) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह करञ्जो नक्तमालश्च करजश्चिरबिल्वकः । घृतपूर्णकरञ्जोऽन्यः प्रकीर्यः पूतिकोऽपि च ।।११९।। स चोक्तः पूतिकरञ्जः सोमवल्कश्च स स्मृतः। करञ्जः कटुकस्तीक्ष्णो वीर्योष्णो योनिदोषहृत् । कुष्ठोदावर्त्तगुल्मार्शोव्रणकृमिकफापहः ।।१२०।। करञ्ज के भेद, नाम तथा गुण-करञ्ज के दो भेद होते हैं-१. कण्टककरञ्ज, २. घृतकरञ्ज । 'कण्टककरञ्ज' के संस्कृत नाम-करञ्ज, नक्तमाल, करज और चिरबिल्वक ये सब हैं। 'घृतकरञ्ज' के संस्कृत नाम-प्रकीर्य, पूतिक, पूतिकरञ्ज और सोमवल्क ये सब हैं। करञ्ज-कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, योनिदोष को दूर करने वाला तथा कुष्ठ, उदावर्त्त, गुल्म, बवासीर, व्रण, कृमि तथा कफ का नाशक होता है। [११९-१२०] अथ करञ्जपत्रफलगुणानाह तत्पत्रं कफवातार्शःकृमिशोथहरं परम्। भेदनं कटुकं पाके वीर्योष्णं पित्तलं लघु ।।१२१।। तत्फलं कफवातघ्नं मेहार्शःकृमिकुष्ठजित् । घृतपूर्णकरञ्जोऽपि करञ्जसदृशो गुणैः ।।१२२।। करञ्ज के पत्ते तथा फलों के गुण-करञ्ज के पत्ते कफ, वायु, बवासीर, कृमि तथा शोथ को अत्यन्त नष्ट करने वाले होते हैं। ये मल को भेदन करने वाले, पाक में कटु रस युक्त, उष्णवीर्य, पित्तजनक तथा लघु होते हैं। इसके फल-कफ, वात, प्रमेह, बवासीर, कृमि और कुष्ठ नाशक होते हैं। घृतकरञ्ज के गुण भी करञ्ज के समान ही हैं ।[१२१- १२२] नोट-भावप्रकाशकार करञ्ज के ३ भेद-(१) करञ्ज (नक्तमाल, चिरबिल्व), (२) घृतकरञ्ज (प्रकीर्य, पूतिकरञ्ज, सोमवल्क) एवं (३) करञ्जी (उदकीर्य, षड्ग्रन्था, हस्तिवारुणी) लिखते हैं जिनमें से प्रथम दो के गुण समान लिखे हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

५२२ भावप्रकाशनिघण्टुः अन्य निघण्टुकारों ने भी इसके कई भेदों का उल्लेख किया है किन्तु इनके पर्यायवाची नामों के कारण भ्रम उत्पन्न होता है। उन्हीं नामों को किसी ने एक के साथ जोड़ा है तो किसी ने दूसरों के साथ जोड़ा है। इस तरह यह कहना कठिन है कि जिसे भावप्रकाशकार करञ्ज लिखते हैं उसी को अन्य निघण्टुकारों ने करञ्ज माना है या जिसे ये घृतकरञ्ज एवं करञ्जी लिखते हैं उसे ही अन्य निघण्टुकारों ने भी घृतकरञ्ज एवं करञ्जी माना है। आधुनिक विद्वानों ने भी (वृक्ष) करञ्ज, कंटकरञ्ज एवं चिरबिल्व नाम से इसके ३ भेदों का वर्णन किया है। भावप्रकाशकार चिरबिल्व करञ्ज का पर्याय मानते हैं। कुछ विद्वान् उदकीर्य नाम करञ्ज को देते हैं जो यहाँ करञ्जी के लिये आता है। प्रकीर्य नाम कण्टकरञ्ज के लिये कहा जाता है। यहाँ पर वृक्ष करञ्ज एवं लताकरञ्ज का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है तथा करञ्जी के अन्तर्गत चिरबिल्व का वर्णन किया गया है। ५३. करञ्ज (वृक्ष करञ्ज) सं०-करञ्ज, नक्तमाल, उदकीर्य। हिं०-करञ्ज, करञ्झवा, किरमाल, पापर, दिठोरी। बं०-डहर करञ्जा। म०- करञ्ज। गु०-कणझी, करञ्ज। पं०-सूचचेइन। ता०-पुंगम्, पुंकु। ते०-पुंगु, कानुगुचेट्टु। मला०-पोन्नम्, उन्नेमरम्। कं०-होंगे। अं०-Smooth Leaved Pongamia (स्मूथ लीव्ड पोंगेमिया), Indian Beech (इण्डियन बीच)। ले०-Pongamia glabra Vent. (पोन्गोमिआ ग्लैब्रा वेण्ट.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। सड़कों के किनारे, बगीचों में एवं नदी तथा समुद्री किनारों पर यह बहुत पाया जाता है। इसका वृक्ष साधारण वृक्षों की ऊँचाई का होता है और सदा हरा-भरा रहता है। इसकी छाया ठण्डी और प्रिय होती है। शाखायें लटकी हुई होती हैं। पत्ते-पक्षवत्, ८.१४ इञ्च लम्बे एवं पत्रदण्ड आधार पर फूला हुआ होता है। पत्रक-हरे रङ्ग के चमकीले, चिकने, संख्या में ५.७, आयताकार या लट्वाकार, नुकीले, २.५ इञ्च लम्बे एवं छोटे वृन्त से युक्त होते हैं। फूल-जरा गुलाबी और आसमानी छाया लिये हुये श्वेतवर्ण के गुच्छों में आते हैं। एक दलपत्र बड़ा होता है जो अन्य चार दलपत्रों को ढँक कर रखता है। सूखने के पहिले ही असंख्य संख्या में पुष्प जमीन पर गिर कर भूमि को आच्छादित कर देते हैं। फलियाँ-चिकनी, चिपटी, कठोर, एक बीजयुक्त, गहरे धूसर रङ्ग की तथा १.२ इञ्च लम्बी सेम के आकार की होती हैं। बीज-चिपटे कृष्णाभ रक्त वर्ण के कुछ सिकुड़नदार गोलाई लिये आयताकार एवं तैल युक्त होते हैं। इसके पत्र, कांड एवं मूल की त्वचा, तैल एवं बीजों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। बीजों का तैल जलाने के काम भी आता है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में २७-३६.४% एक कडुवा, भूरे रङ्ग का एवं विशिष्ट गन्ध का तैल पाया जाता है। इसे पोन्गोमॉल (Pongamal) या होंगे तैल (Hongay oil) कहते हैं। इस तैल से करंजीन (Karanjin, S₁₈ H₁₂ O₄) नामक एक रवेदार पदार्थ प्राप्त किया गया है। बीजों में अत्यल्प मात्रा में उड़नशील तैल रहता है। इसकी छाल में एक क्षाराभ एवं हरिताभ भूरे रंग की अम्लस्वभावी राल पाई जाती है। गुण और प्रयोग-करंज कुष्ठघ्न, आमवातघ्न, कृमिघ्न, व्रणरोपण, कासहर, पाचन एवं त्वचा के रोगों में लाभदायक है। (१) इसके बीजों का तेल बहुत अच्छा कृमिघ्न, पराश्रयी, जीवाणुनाशक या व्रणरोपक है। खुजली (Scabies) के लिये यह बहुत उपयोगी है। यह दद्रु, पामा, विचर्चिका, विसर्प, सर की खुजली, परिसर्प (Herpes) आदि त्वचा के रोगों में एवं संधिवात में लाभ-दायक है। त्वचा के रोगों में इसके साथ समान मात्रा में नींबू का रस मिलाकर लगाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ५२३ (२) वातिक पीड़ा, आमवात तथा संधिवात में इसके पत्तों के क्वाथ से सेंकते हैं तथा इसके बीजों के तैल में मालिश करते हैं। (३) दुर्गन्धयुक्त व्रण की शुद्धि के लिए तथा नाड़ीव्रण के पूरण के लिये इसके मूल का स्वरस लगाते हैं। (४) सोजाक में इसकी जड़ का स्वरस, नारियल का दूध एवं चूने का जल मिलाकर देते हैं। (५) इसके बीजों का चूर्ण ज्वरहर तथा बल्य मानते हैं। कुकास एवं अन्य प्रकार की खाँसी में इसके बीज को घिसकर देने से लाभ होता है। (६) इसके पत्तों को अपचन, अतिसार, आध्मान तथा गुल्म में खिलाते हैं। इससे उदरशूल कम होता है एवं अन्न का पाचन भी ठीक होता है। शीतपित्त में पत्र-स्वरस, दही, नमक एवं काली मिर्च के साथ देते हैं। (७) मधुमेह में इसके पुष्पों का फाण्ट पिलाते हैं। खालित्य में पुष्प पीस कर सर पर बाँधते हैं। (८) व्रणशोथ पर इसके पत्तों को निर्गुण्डी के पत्तों के साथ पीस कर बाँधने से सूजन कम हो जाती है। (९) रक्तार्श में इसके मूल को गोमूत्र में पीस कर पिलाते हैं तथा पथ्य में तक्र देते हैं। मात्रा-बीज १/२ - २ १/२ रत्ती बच्चों को, १ माशा बड़ों को; मूलस्वरस ३ माशा; छाल १.३ माशा। ५४. करंज (कंट करंज) सं०-पूतिकरंज, लताकरंज, कण्टकिकरंज, विटपकरंज, कुबेराक्ष, प्रकीर्य। हिं०-करंज, करंजवा, करंजुआ, कंटकरंज (जा), कंजा, करंजु, कटकलेजा, सागरगोटा। बं०-काँटा करंजा, नाटा करंजा, नाटा। म०-सागर गोटा, गज्रा, गजरघोटा, गाजगा। गु०-कांचका, कांक। क०-गज्जिकेकायि। ते०-गच्चकाय। ता०-कझ शिक्के। मला०- कलंचिकुरु। फा०-खाये इब्लीस। अ०-अक्तमक्त, इज्जुलविलादत। अं०-Bonduc nut (बॉण्डक् नट्); Physic nut (फ़िज़िक् नट्); Fever nut (फीवर् नट्)। ले०-Caesalpinia bonducella Fleming (सिसल्पिनिआ बॉण्डयुसेल्ला फ्लेमिंग); C. crista Linn. (सि० क्रिस्टा लिन.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह भारतवर्ष, वर्मा एवं लंका के उष्ण प्रदेशों में विशेषकर समुद्री किनारों पर तथा पहाड़ियों पर २५०० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। यह बंगाल तथा दक्षिण में बहुत होता है। इसे खेत और बागों की मेंड पर लगाते हैं। इसके सघन एवं विस्तृत काँटेदार गुल्म या लता होती है। शाखाएँ-फैली हुई तथा आरोहणशील होती हैं। इन पर सीधे, तीक्ष्ण तथा पीले रंग के काँटे होते हैं। छोटी शाखाएँ घनर्रोमश होती हैं। उपपत्र (Stipules) ६-८ जोड़े, २-३ इञ्च लम्बे तथा पत्र के आधार पर रहते हैं। पत्ते-संयुक्त द्विपक्षकार तथा १-२ फीट लम्बे होते हैं। पत्रदण्ड के काँटे टेढ़े होते हैं। पत्रक-६-९ जोड़े, ३/४-१ १/२ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च चौड़े, मुलायम, पतले, लट्वाकार, आयताकार, रोमश कुण्ठिताग्र, ऊपर से चिकने किन्तु अधो पृष्ठ मृदुरोमश एवं अत्यन्त सूक्ष्म वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-हल्के पीले तथा लम्बी मंजरियों में होते हैं। फलियाँ-चौड़ी, आयताकार, २-३ इञ्च लम्बी, करीब २ इञ्च चौड़ी, १-२ बीजों से युक्त और ऊपर से काँटों से ढँकी रहती हैं। बीज-संख्या में १-२, गोल या अंडाकार, करीब १/२- ३/४ इञ्च बड़े, सीसे के रंग के चिकने तथा कठोर आवरण वाले होते हैं। बीजों के अन्दर पीताभ श्वेत रंग का गूदा रहता है जो स्वाद में अत्यन्त कड़वा होता है। बीजों को फूलने तक सेंक कर या केवल फोड़कर अन्दर का गूदा निकालकर काम में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त पत्र एवं मूलत्वक् का भी चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसके बीजों में मज्जा करीब ४२% एवं छिलका ५८% होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

५२४ भावप्रकाशनिघण्टुः **रासायनिक संगठन-**इसके बीजों में बोण्ड्युसिन (Bonducin, C₂₀ H₂₈ O₈) नामक एक कडुवा ग्लूकोसाइड चूर्णरूप में पाया जाता है। यह श्वेत रंग का होता है। यह जल में नहीं घुलता किन्तु मद्यसार तथा तैलों में घुल जाता है। इसके अतिरिक्त बीजों में २०-२४% हल्के पीले रंग का गाढ़ा दुर्गन्धयुक्त तैल, स्टार्च, शर्करा, सिटोस्टेरॉल् (Sitosterol), फाइटोस्टेराल् (Phytosterol) एवं हेप्टोकोसेन (Heptocosane) ये पदार्थ पाये जाते हैं। **गुण और प्रयोग-**इसके बीजों की मज्जा उष्ण, रूक्ष, बल्य, नियतकालिक ज्वर प्रतिबन्धक, ज्वरहर, शोथघ्न, अल्प स्तम्भन, रक्तस्तम्भक, वेदनाहर एवं कृमिघ्न है। इसका उपयोग विषमज्वर, सूतिकाज्वर, शूल, श्वास, वातविकार, चर्मरोग, शोथ एवं व्रण आदि में किया जाता है। (१) इसके बीज अर्धविसर्गोज्वर, साधारणज्वर, संतत ज्वर, शीतज्वर तथा विशेषकर मलेरिया (Malaria) के लिये बहुत ही लाभदायक हैं। बीजों का चूर्ण काली मरिच के साथ ५-१० र० की मात्रा में ज्वर आने के पूर्व दिया जाता है। इसे खाली पेट नहीं देना चाहिये। क्विनीन की तरह ही यह लाभदायक माना जाता है। ज्वर के पश्चात् बल्य रूप में भी इसका प्रयोग करते हैं। (२) सूतिकाज्वर में या प्रसूतावस्था में बीजों के प्रयोग करने से सभी प्रकार से लाभ होता है। इससे ज्वर कम होता है। गर्भाशय का संकोच होता है, शूल कम होता है, आर्तव शुद्धि होती है एवं यदि कहीं व्रण हुआ हो तो वह भी अच्छा हो जाता है। (३) उदरशूल में वेदना कम करने के लिये तथा वमन में करीब १ बीज की १/२ मज्जा, २, ३ लौंग के साथ देते हैं। शूल में इसका धूम्रपान भी लाभदायक होता है। अजीर्ण में हींग के साथ इसका उपयोग किया जाता है। कुपचन में मिरिच के साथ इसका चूर्ण मट्ठे के साथ देते हैं। रक्तातिसार में गाँजा के साथ इसका उपयोग किया जाता है। (४) क्षयज कास तथा श्वास में बीजों का क्वाथ पिलाते हैं। (५) इसके बीजों का चूर्ण एरण्डपत्र पर डालकर अंडवृद्धि एवं अंडशोथ पर बाँधते हैं तथा इसको खिलाते हैं। इसके (पूतिकरंज) पत्तों का स्वरस श्लीपद में लाभदायक होता है (सु० चि० १९)। बीजों को पीसकर एरण्ड तैल के साथ अन्य प्रकार के शोथ पर भी बाँधते हैं। (६) बीजों को दबाकर निकाला हुआ तैल मुँह पर के दाग, तारुण्यपिटिका एवं आमवात में लगाया जाता है। कर्णस्राव में इसे डालते हैं। दुष्टव्रण एवं क्षत आदि में इससे लाभ होता है। बीजों को तैल में पकाकर सिद्ध किया हुआ तैल भी इस प्रकार उपयोग में लाया जाता है। (७) इसकी जड़ एवं पत्ते ज्वरघ्न है। इसके पत्तों का स्वरस जीर्णज्वर, शीतपित्त, उपदंश की द्वितीयावस्था में उत्पन्न चर्मविकार, कृमि एवं यकृत् विकार में दिया जाता है। **मात्रा-**बीजमज्जा ५-१० र०; मूल ५-१० र०; पत्रस्वरस १-२ तो०। अथ करंजी (अरारी) । तस्या नामगुणानाह उदकीर्यस्तृतीयोऽन्यः षड्ग्रन्था हस्तिवारुणी । मर्कटी वायसी चापि करञ्जी करभञ्जिका ।। १२३ ।। करञ्जी स्तम्भनी तिक्ता तुवरा कटुपाकिनी । वीर्योष्णा वमिपित्तार्शःकृमिकुष्ठप्रमेहजित् ।। १२४ ।। करञ्ज के उक्त भेदों से भिन्न एक तीसरा करञ्ज और होता है जिसे करञ्जी (अरारी) कहते हैं, उसके नाम तथा **गुण—**उदकीर्य, षड्ग्रन्था, हस्तिवारुणी, मर्कटी, वायसी, करञ्जी और करभञ्जिका ये सब करञ्जी के संस्कृत नाम हैं। **करञ्जी—**स्तम्भक, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, पाक में कटु रस युक्त और उष्णवीर्य होती है। यह—वमन, पित्त, बवासीर, कृमि, कुष्ठ तथा प्रमेह को दूर करने वाली होती है। [१२३-१२४] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ५२५ नोट-यह भी करंज का एक भेद है। पहले वर्णन किये हुए वृक्ष करंज एवं लताकरंज के अतिरिक्त एक तीसरा भेद चिरबिल्व नाम से पाया जाता है जिसका यहाँ वर्णन किया गया है। भावप्रकाशकार चिरबिल्व नाम नक्तमल के पर्याय में लेते हैं। कुछ लोग उदकीर्य नाम नक्तमाल के लिये उचित मानते हैं जो यहाँ करंजी के पर्याय में आया है। ५५. चिरबिल्व (करंजभेद) सं०-चिरबिल्व, पूतिकरंज। हिं०-चिलबिल, चिरमिल, पापरी, करंजी, बनचिल्ला। म०-वावल। गु०- कणझो, चरेल। उड़ि०-दुरंजा, करंजी। ता०-अयम्। ते०-जविलि। क०-रसविज। ले०-Holoptelia integrifolia Planch. (हॉलोप्टेलिआ इण्टेग्रि-फोलिआ प्लॅच)। Fam. Ulmaceae (अल्मॅसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेश, अजमेर, बुंदेलखंड, बिहार, आसाम एवं पश्चिम प्रायद्वीप में प्रायः घाटियों तथा नदियों के किनारे पाया जाता है। इसके वृक्ष-छोटे या बड़े एवं करंज के समान ही दिखलाई देते हैं। शाखाएँ-लटकी हुई, गुच्छाकार तथा श्वेत रंग की होती हैं। काण्ड-मजबूत होता है। पत्ते-दो कतारों में निकले हुये, अंडाकार या लट्वाकार, प्रायः (परिपक्व) अखण्ड, २-४.५ इञ्च लम्बे, १.५-३.७५ इञ्च चौड़े, नोकदार, दुर्गन्ध युक्त एवं बिन्दुकित होते हैं। हरे पत्तों में पारदर्शक बिन्दु होते हैं। शुष्क पत्तों में अधर तल पर छोटे-छोटे उभरे हुये बिन्दु दिखाई देते हैं। पुष्प-बहुत छोटे, हरित, शाखाओं के अग्र पर गुच्छों में पतझड़ होने पर निकलते हैं। फल-सपक्ष, चिपटा, प्रायः १ इञ्च लम्बा, गोल या अंडाकार एवं नताग्र होता है। फल भेद से इसके ३, ४ भेदों का उल्लेख है। इसके पत्तों एवं काष्ठ में दुर्गन्ध होती है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में लुआवदार पदार्थ बहुत होता है। गुण और प्रयोग-यह शोथहर, शोणितोत्क्लेशक एवं करंज के समान गुण वाला है। इसकी छाल को उबाल कर उसका लुआव अथवा मूल को पीस कर संधिशोथ पर लगाते हैं तथा उबली हुई छाल को ऊपर से बाँध देते हैं। इसके पत्तों का कल्क तैल में उबाल कर वह तैल व्रण पर लगाते हैं। दाद पर बीज को जल में घिसकर लगाया जाता है। अथ गुञ्जा-श्वेता रक्ता च। तयोर्नामगुणानाह श्वेता गुञ्जोच्चटा प्रोक्ता कृष्णला चापि सा स्मृता। रक्ता सा काकचिञ्ची स्यात्काकणन्ती च रक्तिका ।। १२५ ।। काकादनी काकपीलुः सा स्मृता काकवल्लरी। गुञ्जाद्वयन्तु केश्यं स्याद्वातपित्तज्वरापहम् ।। १२६ ।। मुखशोषभ्रमश्वासतृष्णामदविनाशनम् । नेत्रामयहरं वृष्यं बल्यं कण्डूं व्रणं हरेत् ।। १२७ ।। कृमीन्द्रलुप्तकुष्ठानि रक्ता च धवलाऽपि ।। १२८ ।। सफेद तथा लाल गुञ्जा के नाम तथा गुण-श्वेतगुंजा, उच्चटा (श्वेतोच्चटा) और कृष्णला ये सब संस्कृत नाम सफेद घुँघुची के हैं। लाली घुँघुची के संस्कृत नाम-रक्तगुञ्जा, काकचिञ्ची, काकणन्ती, रक्तिका, काकादनी, काकपीलु और काकवल्लरी ये सब हैं। दोनों प्रकार की घुँघुची केश के लिये हितकर, वात, पित्त, ज्वर, मुख का सूखना, भ्रमरोग, श्वास, तृषा, मद तथा नेत्ररोग को नष्ट करने वाली होती है। यह वृष्य, बलकारक तथा खुजली, व्रण, कृमि, इन्द्रलुप्तरोग तथा कुष्ठ इन सबों को भी दूर करनेवाली होती है। [१२५-१२८] ५६. गुञ्जा (श्वेत, रक्त) हिं०-गुंजा, घुंघची, घुँघुची, चिरमी, चिरमिटी, घुमची, करजनी, रत्ती, चौंटली। बं०-कुँच। म०-गुञ्ज। गु०-चणोठी। क०-गुलगुंति, गुरुगुंजी। मल०-कुत्रि। ता०-कुन्थमणि, कुँरि। पं०-चर्मटी। ते०-गुरुगिंज। फा०-चस्मे खरूस, सुर्ख। अं०-Jequirity (जेक्विरिटी)। ले०-Abrus precatorius Linn. (एब्रस् प्रिकेटोरिअस् लिन.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

५२६ भावप्रकाशनिघण्टुः गुंजा प्रायः सब प्रान्तों के जङ्गल-झाड़ियों में उत्पन्न होती है तथा हिमालय में ३००० फीट की ऊँचाई तक पायी जाती है। इसकी लता-सुन्दर तथा चक्रारोही होती है। शाखायें-पतली, लचीली तथा काष्ठमय होती हैं। यह बरसात के दिनों में खूब हरी-भरी दिखाई देती है। पत्ते-इमली के जैसे, २-३ १/२ इञ्च लम्बे, युग्म पक्षाकार होते हैं। पत्रक- १०-२० जोड़े, विपरीत, आधे से एक इञ्च लम्बे, १/३ इञ्च तक चौड़े, रेखाकार-आयताकार, अखण्ड तथा दोनों सिरों पर कुछ गोल एवं स्वाद में मीठे रहते हैं। पुष्प-वर्षाकाल में ३ इञ्च लम्बी और गुच्छे में निकली हुई मञ्जरियों में प्रायः सफेद या गुलाबी छाया लिये हुये या हल्के बैंगनी रङ्ग के आते हैं। फली-१-१ १/३ इञ्च लम्बी नुकीली तथा गुच्छों में आती है। यह शीतकाल के अन्त तक पक जाती है। बीज-छोटे, चिकने, चमकीले, कड़े, काले दाग के साथ और सिन्दूरवर्ण के या कभी-कभी बिल्कुल श्वेत रंग के या बिलकुल काले, संख्या में ३-६ तथा अंडाकार होते हैं। इसकी जड़-काष्ठमय, अनेक शाखाओं से युक्त टेढ़ी-मेढ़ी होती है। **नोट-**मूलविषों के अन्तर्गत सुश्रुत में इसका उल्लेख है (सु० क० अ० २)। चरक में स्थावर विष वर्ग में इसका पाठ नहीं है। उच्चटा नाम से वाजीकरण के लिये इसका प्रयोग किया गया है। गुञ्जा बीज में जो विष होता है वह उबालने से नष्ट हो जाता है तथा इसका विषैला प्रभाव केवल अधस्त्वगीय प्रवेश से ही होता है। वंगसेन ने गृध्रसी में वेदना शान्ति के लिये शिराप्रच्छन्न करके गुञ्जाकल्क लेप का निर्देश किया है।¹ बाह्य प्रयोग में गुञ्जा की उपयोगिता होने पर शुद्ध गुञ्जाबीज का ही व्यवहार करना चाहिये। इसकी जड़ गुणों में कुछ-कुछ मुलेठी के समान होती है तथा उसमें भी मुलेठी में पाया जाने वाला ग्लिसिहाइझिन् (Glycyrrhizin) नामक तत्त्व होता है। इस कारण कभी-कभी मुलेठी के प्रतिनिधि रूप में यह ले ली जाती है। किन्तु इसे मुलेठी मानना उचित नहीं है। गुञ्जा की जड़, शोधित (श्वेत) बीज एवं पत्र का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। **रासायनिक संगठन-**गुंजा के बीजों में ॲब्रिन् (Abrin) नामक एक विषैला तथा प्रक्षोभक प्रभूजिन जातीय द्रव्य है। इसके अतिरिक्त बीजों में विषैले प्रभूजिन जातीय अन्य द्रव्य, वसाविच्छेदक किण्व (Fat-splitting enzyme), ॲब्रूसिक् ॲसिड Abrussic acid), हीमॅग्लूटिनिन् (Haemagglutinin) एवं यूरिएस् (Urease) पाये जाते हैं। बीजों के छिलकों में लाल रंजक द्रव्य होता है। इसके मूल में मुलेठी में पाया जाने वाला द्रव्य ग्लिसिहाइझिन् (Glycyrrhizin) करीब १५% एवं अम्ल राल ८% पाई जाती है। इसके पत्तों में भी करीब १०% ग्लिसिहाइझिन् (Glycyrrhizin) एवं ॲब्रिन् (Abrin) रहता है। ॲब्रिन् (Abrin) यह अत्यन्त विषैला द्रव्य है। इसमें ग्लोब्युलिन् (Globulin) एवं ॲल्ब्युमोस (Albumose) ये दो प्रभूजिन (Protein) होते हैं जिनमें से प्रथम अधिक शक्तिशाली है। यह द्रव्य उबालने से नष्ट हो जाता है। इसको एरंड बीज में पाये जाने वाले रिसिन (Ricin) सदृश मानते हैं। शरीर भार के प्रति किलोग्राम के लिये १/१००० से १/२००० मिलिग्राम की मात्रा में इसका अधस्त्वगीय सूचिकाभरण घातक होता है। बीजों के क्वाथ को आँखों में डालने से भी मृत्यु हो सकती है क्योंकि वहाँ अत्यन्त तीव्र प्रक्षोभ उत्पन्न होता है तथा विष का प्रचूषण होता है। त्वचान्तर्गत प्रयोग से स्थानिक अत्यन्त तीव्र प्रक्षोभ उत्पन्न होकर शोथ एवं त्वचा में रक्तस्राव होता है। मुख द्वारा सेवन से इससे अल्प या बिलकुल ही प्रक्षोभ नहीं होता एवं आमाशय में पहुँचने पर यह विषरहित हो जाता है। जानवरों में अतिसूक्ष्मातिसूक्ष्म मात्रा में सूचिकाभरण से उनमें इस विष के प्रति सहनशीलता उत्पन्न हो जाती है। चर्मकार चर्म के लोभ में जानवरों को मारने के लिये बीजों की वर्ति बनाकर चमड़े में प्रवेश करते थे। गर्भपात कराने के लिये भी इस प्रकार की वर्तियों का उपयोग किया जाता था। १. द्वित्रिस्यानेषु गृध्रस्यां शिरा प्रच्छन्नवेधिता। गुञ्जाकल्केन लिप्ता च सद्यस्त्यजति वेदनाम्॥ वंगसेनः॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

गुड़ूच्यादिवर्गः ५२७ शोधन-श्वेतगुंजा के बीज गोदुग्ध में १ प्रहर उबाल कर, छिलके निकाल कर गरम जल से धोकर फिर प्रयोग करना चाहिये। कांजी में भी स्वेदन करने से इनकी शुद्धि हो जाती है। विष प्रभाव-बिना शोधन के बीजों का प्रयोग तीव्र वामक एवं विरेचक होता है। अधिक मात्रा में प्रयोग से भी इस प्रकार के विसूचिका सदृश लक्षण उत्पन्न होते हैं। यदि इसके प्रयोग से बेचैनी आदि हो तो चौलाई का रस मिश्री मिला कर पिलाना चाहिये तथा ऊपर से दूध पिलाना चाहिये। गुण और प्रयोग-गुंजा की जड़ की क्रिया मुलेठी की तरह होती है। पत्ते भी मधुर होते हैं। यह भी मुलेठी की ही तरह मधुर, स्नेहन, कफ शामक, मूत्रजनन एवं व्रणरोपण हैं। इसके बीज उष्ण, बल्य, वृष्य, केश्य, वातहर एवं स्थानिक प्रक्षोभक हैं। (१) स्वरभंग में श्वेत के पत्र कवाबचीनी के साथ या अकेले मिश्री मिलाकर चूसने को दिये जाते हैं। मुखपाक में भी पत्र चूसने से लाभ होता है। व्रण पर भी इसका उपयोग करते हैं। उपदंश में लाल गुंजा के पत्र १/२ माशा, जीरा २ माशा तथा मिश्री १ तोला मिलाकर दिन में दो बार ७ दिन तक प्रयोग किया जाता है। (२) वीर्य विकार में २ माशे जड़ को दूध में पका कर भोजन के पूर्व रात में देते हैं। कास तथा मूत्र रोगों में भी जड़ का अन्य औषधों के साथ उपयोग करते हैं। (३) इसकी जड़ तथा फल से सिद्ध तैल गण्डमाला, गलग्रन्थि आदि पर लगाया जाता है तथा उसका नस्य देते हैं। (४) दाद तथा खुजली पर बीजों के कल्क तथा भृंगराजपत्र-स्वरस से सिद्ध तैल का उपयोग किया जाता है। श्वेत कुष्ठ में तैलपाक के पूर्व उसमें चित्रककल्क मिलाते हैं। पत्रस्वरस का भी चित्रकमूल के साथ श्वेत कुष्ठ में प्रयोग किया जाता है। (५) ॲब्रिन या छिलका निकाले बीजों का फांट आँखों की फूली या रोहा में प्रक्षोभक औषध के रूप में उपयोग किया जाता था किन्तु कभी-कभी इससे अनियंत्रित शोथ आदि होकर आँख भी नष्ट हो जाने के कारण अब इसका उपयोग नहीं करते हैं। (६) बीजों का कल्क खालित्य, गृध्रसी, अंगघात तथा अन्य वातिक विकारों पर लगाते हैं। मात्रा-मूल २-४ माशा, बीज १/२-१ १/२ रत्ती। अथ कपिकच्छूः (कौंच)। तस्या नामगुणानाह कपिकच्छूरात्मगुप्ता वृष्या प्रोक्ता च मर्कटी। अजडा कण्डुरा व्यङ्गा दुःस्पर्शा प्रावृषायणी ।। १२९ ।। लाङ्गली शूकशिम्बी च सैव प्रोक्ता महर्षिभिः। कपिकच्छूर्भृशं वृष्या मधुरा बृंहणी गुरुः। तिक्ता वातहरी बल्या कफपित्तास्रनाशिनी ।। १३० ।। कौंच (केवांच) के नाम तथा गुण-कपिकच्छू, आत्मगुप्ता, वृष्या, मर्कटी, अजडा, कण्डुरा, व्यङ्गा, दुःस्पर्शा, प्रावृषायणी, लाङ्गली और शूकशिम्बी ये सब कौंच के पर्यायवाचक शब्द महर्षियों ने कहे हैं। कौंच-अत्यन्त वृष्य, मधुर तथा तिक्तरस युक्त, बृंहण, गुरु, वातनाशक, बलकारक तथा कफ, पित्त एवम् रक्तदोष नाशक है। [१२९-१३०] अथ तद्बीजगुणानाह तद्बीजं वातशमनं स्मृतं वाजीकरं परम् ।। १३१ ।। इसके बीज के गुण-कौंच के बीज-वातशामक एवम् अत्यन्त वाजीकरण हैं। [१३१]

५२८ भावप्रकाशनिघण्टुः ५७. कपिकच्छू (केवाँच) हिं०-केवाँच, कौंच, कौंछ, केवाछ, खुजनी। बं०-आलकुशी। म०-खाज कुहिली, कुहिली, कवच। गु०- कवच, कौंचा। क०-नासुगुन्नी। ते०-पिल्ली अडुगु। ता०-पुनाइक काली, पुनैक्कल्लिल। पं०-कवांच, कूँच। अं०-Cowhage (काउहेज); Cowitch (काउइच)। ले०-Mucuna pruriens Bek. (म्युक्युना प्रूरिएन्स बेक्)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह भारतवर्ष के सभी मैदानी भागों में एवं लंका तथा वर्मा में पाया जाता है। यह सभी उष्ण प्रदेशों में होता है एवं इसकी खेती भी की जाती है। इसकी लता-पतली, चक्रारोही, एकवर्षायु तथा चौमासे में अधिक होती है। पत्ते-त्रिपत्रक एवं २ १/२-५ १/२ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पत्रक-३-६ इञ्च लम्बे, पार्श्वपत्रक किञ्चित् हृद्वत् और लट्वाकार एवं अग्र्य पत्रक तिर्यगायताकार (Rhomboid), पतले तथा ऊपर चिकने किन्तु अधर तल पर तलशयी रोमों से युक्त होते हैं। पुष्प- नीलारुण (Purple), १ १/२ इञ्च तक लम्बे, सघन, लटकी हुई और ६-१२ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फली- २-३ इञ्च लम्बी, १/२ इञ्च चौड़ी, दोनों अग्रों पर विपरीत दिशाओं में टेढ़ी, कुछ फूली सी एवं लम्बाई में धारियों से युक्त होती है। यह भूरे रंग के करीब ०.१ इञ्च लम्बे सघन दृढ़ रोमों से ढँकी रहती हैं। ये रोम शरीर में लगाने से अत्यन्त खुजली उत्पन्न होकर दाह तथा सूजन उत्पन्न होती है। बीज-प्रत्येक फली में ५-६ काले चमकीले तथा अन्तभित्ति के पतले आवरण में ढँके रहते हैं। कौंच जंगली और बागी दो प्रकार का होता है, जंगली के फलियों के ऊपर तीक्ष्ण रोवें होते हैं। इसके शरीर में लगने से खुजलाहट, सूजन और पीड़ा उत्पन्न होती है। बागी किवाँच को बाग और खेतों में लगाते हैं। यह दो प्रकार का होता है। एक की फलियों के ऊपर रोवें कम होते हैं और उनमें अधिक तीक्ष्णता नहीं होती और दूसरे में रोवें नहीं होते हैं। दोनों की तरकारी बनती है। किन्तु इसकी तरकारी सर्वप्रिय नहीं होती। रोवें निकाल कर ही तरकारी बनाते हैं। नोट-चरक में ऋषभी नाम से बल्यवर्ग में, कच्छुरा नाम से पुरीषविरजनीय गण में एवं मधुरस्कंध में ऋष्यप्रोक्ता नाम से तथा सुश्रुत में कच्छुरा नाम से विदारिगन्धादि गण तथा वातसंशमनवर्ग में इसका उल्लेख है। 'पंजाब में सफेद रंग के कौंच के बीज पन्सारी बेचते हैं। ये चरक में लिखी हुई काकाण्डोला¹ नाम की सेम की जाति के बीज हैं' (श्री यादवजी कृत द्रव्यगुणविज्ञानम्, उत्तरार्ध द्वितीय खण्ड, पृष्ठ १७३)। इसके बीज, मूल एवं फली के ऊपर के रोमों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। चिकित्सा की दृष्टि से जंगली केंवाच के बीजों का ही व्यवहार करना चाहिये। रासायनिक संगठन-इसमें राल, टैनिन, वसा एवं मॅन्गॅनीझ रहता है। बीजों की मज्जा की अपेक्षा ऊपर के छिलके में मॅन्गॅनीझ (Manganese) अधिक रहता है। गुण और प्रयोग-केवाँच के बीज पौष्टिक, उत्तेजक, वाजीकर एवं वातशामक होते हैं। फली के ऊपर के रोम उत्तम आंत्रकृमिघ्न होते हैं। इसकी जड़ वातनाड़ियों के लिये बल्य, उत्तेजक एवं मूत्रजनन है। रोम के स्थानिक प्रयोग से कण्डू, दाह, शोथ एवं स्फोट उत्पन्न होता है। (१) इसके रोमों को घृत, मधु या गुड़ के साथ गोला बनाकर केंचुए की बीमारी में खिला देते हैं। इससे प्रक्षोभ उत्पन्न होकर कृमि बाहर निकलते हैं। इसके पश्चात् विरेचन देना आवश्यक है। १. काकाण्डोलात्मगुप्तानां माषवत्फलमादिशेत् (चरक सू. अ. २७-३२)।

गुडूच्यादिवर्गः ५२९ (२) इसके बीजों की मज्जा का चूर्ण या पाक (वानरीवटिका) आदि बनाकर वाजीकरण के लिये प्रयोग किया जाता है। प्रायः वाजीकरण के प्रत्येक योग में इसका उपयोग किया जाता है। (३) इसकी जड़ का क्वाथ या स्वरस वातनाडी-दौर्बल्य, अंगघात, अर्दित एवं अवबाहुक आदि वातरोगों में तथा ज्वर में भ्रम उत्पन्न होने पर देते हैं। यह मूत्रजनन होने के कारण इसे वृक्करोग में पिलाते हैं तथा शरीर पर लेप भी करते हैं। हैजा में इसके फांट में मधु मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। पक्वातिसार तथा रक्तातिसार में मूल का कल्क दिया जाता है तथा पथ्य में मूलसिद्ध दुग्ध का प्रयोग करते हैं (सु० उ० अ० ४०-७४)। श्लीपद में मूल का लेप किया जाता है। इसके मूलक्वाथ के धारण से योनिसंकोच होता है (भा० प्र०)। (४) इसके रोमों से बनाया हुआ मलहम स्थानिक उत्तेजक तथा साधारण स्फोटोत्पादक माना जाता है। मात्रा—बीजचूर्ण २-६ माशा; रोम ५-१० रत्ती। अथ मांसरोहिणी। तस्या नामगुणानाह मांसरोहिण्यतिरुहा वृत्ता चर्मकषावसा१,२। प्रहारवल्ली विकशा वीरवत्यपि कथ्यते ।। स्यान्मांसरोहिणी वृष्या सरा दोषत्रयापहा ।।१३२।। मांसरोहिणी के नाम तथा गुण—मांसरोहिणी, अतिरुहा (अग्निरुहा), वृत्ता, चर्मकषा, वसा, प्रहारवल्ली, विकशा और वीरवती ये सब पर्यायवाचक शब्द हैं। मांसरोहिणी—वीर्यवर्द्धक, सारक (दस्तावर) और त्रिदोषनाशक है।[१३२] ५८. मांसरोहिणी हिं०—मांसरोहिणी, रोहण, रोहिनी, रोहन, रोहिना, रकत रोहन। म०, बें०—रोहण। गु०—रोण, रोहणी। कोल०—रोहिनी। सन्ता०—रोहन। गोंड०—सोइमि। भील—रोयटा। ता०—शेम्मरम्। क०—स्वामीमर। ते०— सूमि, सोमिडमनु। अं०—Red wood tree (रेड वुड् ट्री)। ले०—Soymida febrifuqa A. Juss. (सॉयमिडा फेब्रीफ्युजा ए. जस्.)। Fam. Meliaceae (मेलिएसी)। यह प्रायद्वीप से उत्तर की तरफ मेरवारा तक तथा मिर्जापुर एवं छोटा नागपुर आदि स्थानों में पाई जाती है। इसका वृक्ष—बहुत ऊँचा और स्तम्भ मोटा होता है। इसकी छाल—तिहाई इञ्च मोटी नीलापन युक्त खाकी अथवा कालापनयुक्त भूरे रंग की एवं कड़वी होती है। लकड़ी—लालीयुक्त भूरे रंग की और खूब टिकाऊ होती है। पत्ते—पक्षवत् तथा ९-१८ इञ्च लम्बे होते हैं। पत्रक—२ से ४ इञ्च तक लम्बे, अंडाकार या आयताकार, लगभग अवृन्त, चिकने, तिर्यक् आधार वाले तथा संख्या में ३ से ६ जोड़े होते हैं। नवीन पत्ते ग्रंथियों से युक्त और लाल होते हैं। पत्रक-दण्ड तथा पत्रक-सिरा सर्वदा लाल बनी रहती है। फूल—नन्हें-नन्हें हरियाली लिये सफेद रंग के अग्रद्य मंजरियों में आते हैं। फल—१ से २।। इञ्च बड़े, बहुत कठोर, भूरे लाल रंग के किन्तु पकने पर काले एवं अग्र पर खुल जाते हैं। प्रत्येक फल में अगणित पङ्खदार बीज होते हैं जो आषाढ़, श्रावण में पककर गिर जाते हैं। इसकी छाल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। नोट—चरक में बल्य एवं सुश्रुत में न्यग्रोधादिगण में इसका उल्लेख है। सुश्रुत के टीकाकार डल्हण ने रोहिणी का अर्थ कुटकी, कायफल, कडुवी तुम्बी तथा हरीतकी भेद आदि किये हैं। इसके रकतरोहक, रोहिनी आदि प्रचलित नाम मांसरोहिणी के समानार्थक मालूम होते हैं तथा इसकी छाल भी मांसवर्ण की होती है। इस दृष्टि से इसके मांसरोहिणी होने में सन्देह नहीं मालूम पड़ता। अन्य निघंटुकारों ने इसके गुणों में 'ग्राही' लिखा है जो अधिक उचित मालूम पड़ता १. चर्मकरी इति पाठा०। २. कुशा इति पाठा०—गुण तथा आकृति की दृष्टि से इसका वसा पर्याय अधिक उचित है। ३७ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

५३० भावप्रकाशनिघण्टुः है। उपर्युक्त डल्हण की टीका के अनुसार यदि किसी द्रव्य को रोहिणी माना जाय तो उस अवस्था में 'सरा' यह उचित हो सकता है। **रासायनिक संगठन-**इसकी छाल में एक रंगहीन, जल में न घुलने वाला किन्तु मद्यसार में घुलनशील रालयुक्त कड़वा पदार्थ एवं अधिक मात्रा में टॅनिक ॲसिड् तथा गॅलिक ॲसिड् रहता है। **गुण और प्रयोग-**इसकी छाल शीत, ग्राही, तिक्त, कषाय, वृष्य, पौष्टिक, अल्प नियतकालिक, ज्वर- प्रतिबन्धक, सन्थानीय, व्रणरोपण एवं कण्ठशुद्धिकर है। अधिक मात्रा में इससे चक्कर एवं संज्ञानाश होता है। ओक वृक्ष की छाल की तरह इसका क्वाथ बाह्य प्रयोग में व्यवहार में लाते हैं। आन्तरिक प्रयोग के लिये चूर्ण का ही व्यवहार उचित है। (१) विसर्पों या जीर्णज्वरों में शरीर व आंतों में जब शिथिलता आती है तब इसका चूर्ण देते हैं। मलेरिया में इसका क्वाथ १ औंस की मात्रा में दिन में ३ बार देने से लाभ होता है। (२) पुरानी आंव तथा अतिसार में इससे अच्छा लाभ होता है। (३) इसकी छाल के क्वाथ से व्रण धोते हैं, बस्ति देते हैं तथा कुल्ले कराते हैं। **मात्रा-**त्वक् चूर्ण ३० रत्ती त्रिवार। अथ चिल्हकः 'चिल्ह' इति लोके तस्य नामगुणानाह चिल्हको वातनिर्हारः श्लेष्मघ्नो धातुपुष्टिकृत्। आग्नेयो विषवद्यस्य फलं मत्स्यनिषूदनम् ।।१३३।। चिल्हक के गुण-चिल्हक वातनाशक, कफ को दूर करने वाला, धातु की पुष्टि करने वाला और आग्नेय (अत्यन्त गरम) होता है और इसका **फल-**विषतुल्य मछलियों को मारने वाला होता है। [१३३] ५९. चिल्हक **हिं०-**चिल्ला, चिलर, चिल्हक। **म०-**मस्सी, करी लेंज। **संथा०-**चोरचो। **खर०-**बेरी। **कोल-**रोरी। **उडि०-**गिरटि। **ले०-**Casearia tomentosa Roxb. (केसएरिआ टोमेण्टोसा राक्स.)। Fam. Samydaceae (सॅमिडेसी)। यह सब जगह पाया जाता है। शाल वनों के पास या झाड़ीदार जंगलों में यह बहुत होता है। इसके **वृक्ष-**छोटे एवं शाखाएँ दिगन्तसम फैली हुई होती हैं। **छाल-**मोटी-भंगुर और चौकोर टुकड़ों में छूटती है। **काष्ठ-**पीताभ श्वेत, कठोर एवं खुरदरा होता है। **पत्ते-**आयताकार (छोटे लट्त्वाकार या अंडाकार), अधरपृष्ठ की नसों पर मृदु रोमश, २-७ इञ्च लम्बे, २ इञ्च चौड़े एवं दन्तुर होते हैं। पत्रसिरायें रक्ताभ होती हैं। **पुष्प-**हरिताभ पीत वर्ण के पुष्प नवीन टहनियों पर आते हैं। **फल-**मांसल, अंडाकृति, ३/४ इञ्च बड़े, कड़वे एवं ६ रेखाओं से युक्त होते हैं। फलों का चूर्ण पानी में डाल देने से मछलियाँ मर जाती हैं। इसके सभी भागों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। **नोट-**अन्य निघण्टुओं में इसका उल्लेख नहीं पाया जाता। इसकी एक दूसरी उपजाति केसिएरिआ एस्क्यू लेण्टा राक्स. (C. esculenta Roxb.), के मूल एवं पत्र का उपयोग सप्तरंगा या स्वर्णमूला नाम से यकृत्-वृद्धि, अर्श तथा यकृतोद्भव मधुमेह में किया जाता है। **गुण और प्रयोग-**जलशोथ में फल का गूदा खिलाते हैं, सर्वांग में छाल का लेप करते हैं तथा पत्रक्वाथ से स्नान कराते हैं। इससे पेशाब अधिक होती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ५३१ अथ टङ्कारी । तस्या गुणानाह टङ्कारी वातजित्तिक्ता श्लेष्मघ्नी दीपनी लघुः । शोथोदरव्यथाहन्त्री हिता पीठविसर्पिणाम् ।। १३४ ।। नोट-टंकारी का उल्लेख अन्य निघण्टुओं में नहीं मिलता। लघु अग्निमन्थ (Clerodendrum phlomidis) को कहीं-कहीं 'टेकारी' कहते हैं जो 'तर्कारी' का अपभ्रंश मालूम पड़ता है। इसका वर्णन ४५९ पृष्ठ पर किया गया है। टंकारी नाम से फाइसेलिस मिनिमा (Physalis minima) का वर्णन आधुनिक उद्भिदवेत्ताओं ने किया है जिसका यहाँ वर्णन किया जा रहा है। यह विदेश से आने वाले मकोय की जाति के फल 'काकनज' (Physalis alkekenji Linn.) के प्रतिनिधि माने जाते हैं। डॉ० देसाई ने सम्भवतः इसका उल्लेख फा० इण्डिका (P. indica) नाम से किया है। ६० टंकारी सं०-टंकारी, लक्ष्मीप्रिया, चिरपोटा। हिं०-तुलसीपति। बं०-वनटेपारि। म०-थानमोडी, चिरबोटी, चिरबुटले। गु०-पोपटी, पर्पोटी। पं०-हुब्बककनज। क०-बोंडुल। ता०-सिसयक्कालिक। ते०-कुपण्टे। ले०-Physalis minima Linn. (फाइसेलिस मिनिमा लिन.)। Fam. Solanaceae (सोलेनॅसी)। यह सब प्रान्तों में पाया जाता है। इसका क्षुप-६-१८ इञ्च ऊँचा, नरम लोमयुक्त एवं वर्षजीवी होता है। पत्ते- २ इञ्च लम्बे, अंडाकार तथा दन्तुर होते हैं। पुष्प-घंटाकृति, पीतवर्ण तथा १/८ इञ्च बड़े होते हैं। फल-१ १/२ इञ्च लम्बा, १/२ इञ्च चौड़ा, लाल रंग का रुचिकर होता है जिसमें छोटे-छोटे अनेक बीज होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल बलकारक, मूत्रजनन एवं विरेचक होते हैं। 'काकनज' के स्थान पर इनका उपयोग किया जाता है। सोजाक में फलों को खिलाते हैं। स्तनशिथिलता दूर करने के लिये इसके पंचांग को चावल को धोवन में पीस कर लेप करते हैं। मलावष्टम्भ में इसके फलों का पाक बहुत लाभदायक है। तमकश्वास में इसकी जड़ तथा टंकण का लावा मधु के साथ देने से श्वासावरोध कम होकर कफ निकलता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ वेतसः । तस्य नामगुणानाह वेतसो नम्रकः प्रोक्तो वानीरो वञ्जुलस्तथा। अभ्रपुष्पश्च विदुलो रथः शीतश्च कीर्त्तितः ।। १३५ ।। वेतसः शीतलो दाहशोथार्शोयोनिरुक्प्रणुत्। हन्ति वीसर्पकृच्छ्रास्रपित्ताश्मरीकफानिलान् ।। १३६ ।। वेतस के नाम तथा गुण-वेतस, नम्रक, वानीर, वञ्जुल, अभ्रपुष्प, विदुल, रथ और शीत ये सब वेतस के नाम हैं। वेतस-शीतल है तथा दाह, शोथ, अर्श (बवासीर), योनिरोग, विसर्प, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, अश्मरी (पथरी), कफ तथा वात को दूर करने वाला है। [१३५-१३६] नोट-वेतस के विषय में विद्वानों में मतभेद है। भावप्रकाश, ध० नि०, रा० नि० आदि में वेतस तथा जलवेतस इन दो भेदों का उल्लेख है। रा० नि० ने वेत्र १ नाम से एक स्वतन्त्र द्रव्य का भी उल्लेख किया है। अन्य निघंटुओं ने वेतस के पर्याय में या स्वतंत्र रूप से वेत्र का उल्लेख नहीं किया है। कुछ विद्वान् वेतस से बेंत का ग्रहण करते हैं जो कॅलॅमस् टेनुइस् (Calamus tenuis) है। कुछ लोगों के मत से वेतस से वेदमूद्रक का ग्रहण उचित है जो सॉलिक्स कॅप्रिआ (Salix caprea) है। कुछ विद्वानों के मत से इसी जाति के सं० ऑल्बा (S. alba) को वेतस मानना चाहिये। १. वेत्रो वेतो योगिदण्डः सुदण्डो मृदुपर्वकः। वेत्रः पंचविधः शैत्यकषायो भूतपित्तहृत्।। रा. नि.

५३२ भावप्रकाशनिघण्टुः इसी जाति के अन्य उपभेद (जलमाला) सँ० टेट्रास्पर्मा (S. tetrasperma) एवं सँ० ॲक्मोफाइला (S. acmophylla) को जलवेतस माना जाता है। भावप्रकाशकार वंजुल और बानीर पर्याय में लिखते हैं किन्तु चरक¹ में दोनों का साथ-साथ उल्लेख होने से ऐसा मालूम होता है कि ये दो अलग वनस्पतियाँ हैं। च० नि० अ० ४-३६ में वेत्र तथा वेतस भी साथ-साथ आये हैं जिससे ये भी दो अलग द्रव्य हैं ऐसा मालूम होता है। वंजुल नाम से चरक में वेदनास्थापन महाकषाय में एवं आसवयोनिसार वृक्षों (सु० अ० २५) में तथा सुश्रुत में न्यग्रोधादिगण में उल्लेख है 'विदुल' नाम चरक में वमनोपग महाकषाय (सू.अ. ४ में आया है जिसका अर्थ चक्रपाणि हिज्जल करते हैं। सुश्रुत (सू.अ. ३९) में ऊर्ध्वभागहरगण में विदुल आता है वहाँ डल्हण उसका अर्थ वेतस करते हैं। श्रीयुत यादव जी विदुल नाम हिज्जल के पर्याय में मानते हैं। हिज्जल (समुद्रफल) में वामक गुण देखा भी जाता है। चरक में वेतस नाम से उसकी मूलत्वक् का उपयोग रक्तपित्त (चि० अ० ४) में एवं सुश्रुत में जीर्णज्वर (उ० अ० १९) में मूल का उपयोग किया हुआ है। चरक में वेत्र नाम से रक्तपित्त (चि० अ० ४), शोथ (चि० अ० १२) एवं ऊरुस्तम्भ (चि० अ० २७) में उपयोग किया गया है। गुणों की दृष्टि से वेदमुश्क के गुण भावप्रकाशोक्त वेतस से मिलते हैं। यहाँ पर वेदमुदक एवं वेंत का अलग- अलग वर्णन किया गया है। जलवेतस के अन्तर्गत वेदमुश्क की अन्य उपजाति जलमाला का वर्णन किया गया है। ६१. वेतस १ (वेदमुश्क) सं०-वेतस, वानीर, गन्धपुष्प। हिं०, पं०-वेदमुश्क। पश्तो०-ख्वगवल। अ०-खिलाफुल् बलखी। फा०-वेदेमुश्क, गुर्वएबेद्। अं०-Willow विलो; Sallow (सॅलो)। ले०-Salix caprea Linn. (सॅलिक्स कॅप्रिआ लिन.)। Fam. Salicaceae (सॅलिकॅसी)। यह फारस, ईरान, उत्तर पश्चिम सीमान्प्रान्त एवं भारतवर्ष में काश्मीर तथा पंजाब में होता है। इसका वृक्ष-छोटा तथा १५-३० फीट ऊँचा होता है। छाल-पतली, लचीली, कषाय एवं बहुत कड़वी होती है। पत्ते-एकांतर, हरे, बड़े, अंडाकार, दन्तुर एवं नुकीले होते हैं। मध्यशिरा ऊपर के पृष्ठ पर कुछ श्वेत किन्तु अधोपृष्ठ पर रोमश होती है। पुष्प-पीतवर्ण के तथा सुगन्धित होते हैं। इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है। इसके पुष्पों से बनाये अर्क का 'अर्क वेदमुश्क' नाम से यूनानी चिकित्सा में बहुत व्यवहार किया जाता है। इससे स्रवित हुई शर्करा, वेद अंगबीन का भी उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में ४-१०% टैनिक ऐसिड, २-७% एक रवेदार ग्लूकोसाइड, सॅलीसिन (Salicin), मोम, वसा एवं गोंद होता है। इसके पुष्पों में एक सुगन्धित उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल ग्राही, शीतल, ज्वरहर, दाहप्रशमन, वेदनास्थापक, मूत्रल, शिरःशूल नाशक, हृदय को बल देने वाली, उत्तेजक एवं वाजीकर है। इसके पुष्प रोचक एवं पत्ते ज्वरहर होते हैं। (१) इसकी छाल का क्वाथ विषम ज्वर, पैत्तिक ज्वर, नूतन आमवात तथा कफक्षय में देते हैं। इससे दाह, शिरःशूल, संधिपीड़ा, संधिशोथ एवं रक्तष्ठीवन कम होता है। अर्श में छाल का लेप किया जाता है। रक्तष्ठीवन में इसके काण्ड की राख खिलाते हैं। (२) इसके फूलों का अर्क उष्ण ज्वर तथा हृदय की धड़कन में पिलाते हैं। नेत्राभिष्यन्द तथा शिरःशूल में इसमें कपड़ा भिंगो कर उसकी पट्टी रखते हैं। मात्रा-छाल १/२-१ तो०; अर्क १-२ तोला।

१. क. अ. १, ९; सि. अ. १०, १९।

गुडूच्यादिवर्गः ५३३ ६२. वेतस २ (बेंत) सं०- वेत्र, वेतस । हिं०- वेंत । बं०- छांचि वेत । म०- वेत । क०- वेतसु । गु०- नेतर । ते०- जतयूर् कुली । पं०- बैत । ता०- बेत्तम् । फा०- बेंत, हजां खिरजा । अ०- खीरजा, खलाफ, हरजां । अं०- Cane (केन) । ले०- Calamus tenuis Roxb. (कॅलॅमस् टेन्युइस् राक्स.) । Fam. Palmeae (पामेइ) । यह जलप्राय भूमि में २ हजार फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है । इसकी लता- सघन, आरोही तथा काँटेदार होती है । यह काँटों की सहायता से फैलती है । काण्ड- चिकना, हरा और कोषमय पत्राधारों से ढँका हुआ रहता है । पत्ते- २-४ फीट लम्बे, पक्षाकार और पत्रदण्ड काँटों से युक्त होते हैं । पत्रक- ६-१२ इञ्च लम्बे, १/२-३/४ इञ्च चौड़े, रेखाकार, मालाकार, नुकीले एवं तीन शिराओं से युक्त होते हैं । पत्रक के किनारे तथा शिरा पर भी काँटे होते हैं । पत्रनाल और पत्रकोष पर भी प्रायः १ इञ्च तक लम्बे और सीधे काँटे होते हैं । पत्रकोष से चाबुक के सदृश ८ फीट तक लम्बी एक रचना फ्लॅजेलम् (Flagellum) निकली रहती है जिस पर भी टेढ़े काँटे होते हैं । पुष्प- पत्रकोषों के अन्दर एकलिंगी पुष्पों की विदाण्डिक मंजरियाँ पाई जाती हैं । फल- प्रायः १/२ इञ्च लम्बा एवं काले किनारे के वल्कपत्रों से ढँका हुआ रहता है । शीतऋतु में फल पक जाते हैं । बेंत की कई जातियाँ पाई जाती हैं । गुण और प्रयोग- इसको कुछ विद्वान् वेतस मानते हैं तथा वेतस के स्थान पर इसका प्रयोग करते हैं । इसकी जड़ ज्वरहर, पित्तहर, पौष्टिक एवं विरेचक मानी जाती है । इसके फल का गूदा ग्राही होता है । इसके कोमल अंकुरों का शाक तिक्तपौष्टिक माना जाता है । अथ जलवेतसः । तस्य नामगुणानाह निकुञ्चकः परिव्याधो नादेयो जलवेतसः । जलजो वेतसः शीतः १कुष्ठहृद्वातकोपनः ॥१३७॥ जलवेतस के नाम तथा गुण- निकुञ्चक, परिव्याध, नादेय और जलवेतस ये सब पर्यायवाची शब्द हैं । जलवेतस- शीतल, कुष्ठनाशक तथा वात को कुपित करनेवाला होता है । [१३७] ६३. जलवेतस (जलमाला) सं०- जलवेतस, वंजुल ? हिं०- जलमाला, सुकूलवेत, बंद । म०- वालुञ्ज । बं०- पानिजामा । ता०- अन्नुपलै । ते०- एतिपाल । फा०- वेदसादा, वेदलेला । अ०- खिलाफ्, सफ्साफ । ले०- Salix tetrasperma Roxb. (सॅलिक्स टेट्रास्पर्मा राक्स) । Fam. Salicaceae (सॅलिकॅसी) । इसका वृक्ष प्रायः नदी नालों के किनारे पाया जाता है । हिमालय में ६००० फीट की ऊँचाई तक यह होता है । काश्मीर तथा पश्चिमोत्तर प्रान्त में इसे लगाते हैं । इसका वृक्ष- साधारण ऊँचा तथा सुन्दर होता है । छाल- कृष्णाभ, तन्तुमय, चिमड़, कड़वी, कषाय तथा कुछ सुगन्धित होती है । पत्ते- ३-६ इञ्च लम्बे, रेखाकार-भालाकार, चिकने, पत्रोदार हरा, पत्रपृष्ठ, सफेद एवं पत्रवृन्त लाल रंग का होता है । पुष्प- सफेदी लिये पीले और कुछ सुगन्धित मंजरियों में आते हैं । फल- करीब ५ इञ्च लम्बा होता है तथा प्रत्येक फल में ४-६ बीज होते हैं । इसकी छाल एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । इसके लचीले पतले काण्ड से टोकरियाँ बनायी जाती हैं । इसकी अन्य उपजातियों को वेत, लैला, मजनूं तथा भैंसा आदि नामों से पुकारा जाता है । १. संग्राही इति पाठः ।

५३४ भावप्रकाशनिघण्टुः **गुण और प्रयोग—**इसके गुण भी वेदमश्क की तरह ही हैं। इसकी छाल पौष्टिक, ज्वरघ्न तथा नियतकालिकज्वरप्रतिबंधक है। रक्तातिसार, यकृत् एवं प्लीहा तथा कामला में इसके ताजे पत्तों का रस देते हैं। **मात्रा—**छाल ½-१ तो०; रस २-५ तो०; अर्क ५-१० तो०। अथेज्जलः (समुद्रफल इति लोके) तस्य नामगुणानाह इज्जलो हिज्जलश्चापि निचुलश्चाम्बुजस्तथा। जलवेतसवद्वेद्यो हिज्जलोऽयं विषापहः ॥१३८॥ **इज्जल (समुद्रफल) के नाम तथा गुण—**इज्जल, हिज्जल, निचुल और अम्बुज, ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। **इज्जल—**गुणों में 'जलवेतस' के ही समान है तथा विशेषतः यह विषनाशक है। [१३८] ६४. इज्जल (समुद्रफल) **हिं०—**इज्जल, इंजर, हिज्जल, समुद्रफल । **बं०—**हिज्जल । **म०—**सत्फल, समुद्रफल । **गु०—**फल । मा०— समंदर फल । **आसा०—**हिंडोल । **सन्ता०—**हिंजल । **कोल०—**सपरुंग । **उरि०—**किजोलो । **ते०—**कणपु, कणिगि । **ता०—**समुद्रपुल्लानि । **क०—**केंपुकणगिन । **मल०—**चरियसंसकरवडि । **ले०—**Barringtonia acutangula (Linn.). Gaertn. (बॅरिंगटोनिआ एक्युटेग्युला, (लिन) गार्ट) । Fam. Lecythidaceae (लेसिथिर्डेसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है किन्तु बंगाल तथा दक्षिण में अधिक देखने में आता है। इसका वृक्ष— मध्यमाकार का और बारह मास हरा

गुडूच्यादिवर्गः ५३५ (१) बच्चों के प्रतिश्याय, कास, फुफ्फुसपाक आदि कफविकारों में इसे देते हैं। यदि इसके देने के पश्चात् वमन न हो तो नमक डालकर उष्ण जल पिलाना चाहिये। इससे वमन होकर कफ निकल जाता है तथा पखाना भी होता है। यदि इसके प्रयोग से कुछ दुष्परिणाम मालूम पड़े तो चावल की माँड़ घी मिलाकर दें। समुद्रफल को पीसकर छाती तथा पेट पर भी लगाते हैं। (२) तमकश्वास में ६ माशा समुद्रफल व सफेद कोयल की जड़ ६ माशे दूध में घिसकर देते हैं जिससे वमन- विरेचन होकर आराम मिलता है। (३) शिरःशूल में इसके बीजों का नस्य लाभदायक होता है। (४) इसके पत्तों का रस मधु मिलाकर आमातिसार में देने से लाभ होता है। (५) आँखों से पानी जाता हो तो समुद्रफल को जल में घिसकर लगाने से लाभ होता है। (६) उदरशूल, आनाह आदि में नमक, अजवायन के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है। (७) पर्यायिक ज्वरों में काली मिर्च एवं तुलसी पत्र के साथ इसे देते हैं। मात्रा-१-२ रत्ती। अथाङ्कोटः (अङ्कोल-ढेरा)। तस्य नामगुणानाह अङ्कोटो दीर्घकीलः स्यादङ्कोलश्च निकोचकः। अङ्कोटकः कटुस्तीक्ष्णः स्निग्धोष्णास्तुवरो लघुः।।१३९।। रेचनः कृमिशूलामशोफग्रहविषापहः। विसर्पकफपित्तास्रमूषकाहिविषापहः ।।१४०।। अंकोल के नाम तथा गुण-अंकोट, दीर्घकील, अङ्कोल और निकोचक ये सब 'अङ्कोल' के नाम हैं। अङ्कोल- कटु तथा कषाय (कसेला) रसयुक्त, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, स्निग्ध, लघु (हलका), रेचक (दस्तावर) होता है एवं कृमि, शूल, आम, शोथ (सूजन), ग्रहबाधा, विष, विसर्प, कफ, पित्त, रक्तविकार एवं मूसा तथा सर्प के विष को दूर करने वाला होता है। १३९-१४०] अथाङ्कोटफलस्य गुणानाह तत्फलं शीतलं स्वादु श्लेष्मघ्नं बृंहणं गुरु। बल्यं विरेचनं वातपित्तदाहक्षयास्रजित् ।।१४१।। अङ्कोल के फल का गुण-अङ्कोल का फल-शीतल, स्वादिष्ट, कफनाशक, बृंहण, पाक में गुरु, बलकारक, विरेचक एवं वायु, पित्त, दाह, क्षय तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [१४१] ६५. अङ्कोट हिं०-अङ्कोल, ढेरा, टेरा, ढेला। बं०-आंकोड, बाघ, आंकडा, अकरकंटा। म०-अंकोल। गु०-आंकोल, अंकोल। क०-अंकोले-मर। ते०-कुडुगु; अंकोलमु। ता०-अलंर्गी। सन्ता०-डेला, ढेला। ले०-Alangium lamarckii thwaites (एलैञ्जिअम् लेमार्काई थ्वेट्स)। Fam. Alangiaceae (एलेञ्जियेसी)। यह मध्य और दक्षिण भारत, उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार, हिमालय की घाटी से गङ्गा तक और राजपुताना आदि कई प्रान्तों में पाया जाता है। यह प्रायः नदी-नालों की ढालों पर अधिक होता है। इसका छोटा वृक्ष, काँटेदार देखने में सुन्दर और सघन होता है। छाल-धूसर रङ्ग की, मोटी एवं खुरदरी होती है। जड़-भारी, पीताभ, तेलिया तथा मजबूत होती है। जड़ की छाल, दालचीनी की अपेक्षा भूरे रङ्ग की रहती है। पत्ते- कनेर के पत्तों के समान तीन से पाँच इञ्च लम्बे, १ से २।। इञ्च चौड़े, आयताकार, आयताकार-प्रासवत् या कोई अंडाकार होते हैं। पुष्पोद्गम के पूर्व पत्ते गिर जाते हैं। फूल-सुगन्धित सफेद रङ्ग के होते हैं। फल-कच्ची अवस्था में नीले और पकने पर जामुनी लाल, .४-.६ इञ्च बड़े तथा मांसल होते हैं। बीज-गुठलीदार और बड़े होते हैं। Aesculus indica CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpu. Digitized by S3 Foundation USA

५३६ भावप्रकाशनिघण्टुः colebr. (एस्क्युलस् इण्डिका कोले.) को 'कंडार, बंखोर, अंकोल' आदि नामों से क्वचित् वर्णित किया जाता है किन्तु प्रस्तुत अङ्कोट के प्रतिनिधि के रूप में उक्त वनस्पति का व्यवहार नहीं करना चाहिये । इसकी जड़ की छाल, पत्र, बीज एवं बीज तैल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसका स्वाद कड़वा एवं गन्ध अप्रिय होती है । रासायनिक संगठन-इसकी जड़ की छाल में ॲलेज़ाइन (Alangine) नामक एक कड़वा क्षाराभ एवं पोटॅशियम् क्लोराइड (Potassium chloride) पाया जाता है । इस क्षाराभ के रवे नहीं बनते तथा यह जल में भी नहीं घुलता । यह मद्यसार में घुल जाता है । बिल्ली में ॲलेज़ाइन सल्फेट (Alangine sulphae) नामक इसके लवण के शिरान्तर्गत सूचिकाभरण से रक्तनिपीड कम होता है जो १, २ मिनट में ही स्वाभाविक हो जाता है। इससे हृदय अवसादित होता है तथा आन्त्र की पुरःसरण क्रिया बढ़ती है । इससे श्वास अनियमित हो जाता है । गुण और प्रयोग-इसकी छाल उष्ण, कड़वी, वामक, स्वेदजनक, मूत्रल, रेचक, ज्वरहर, कृमिघ्न एवं विषहर है । अल्प मात्रा में (१-३ र०) यह हल्लासकारक, स्वेदजनन एवं मूत्रल है । अधिक मात्रा (३ माशा) में यह वामक एवं विरेचक है । इसके गुण मदार तथा एपिकाक के समान हैं । वामक मात्रा में प्रयोग से आमाशय में दाह तथा हृदय एवं रक्तवाहिनियों पर अवसादक प्रभाव पड़ता है ! (१) कुष्ठ, उपदंश तथा सभी प्रकार के त्वचा के विकारों में इसकी मूलत्वक् १/२-१ रत्ती की मात्रा में दिन में तीन बार देते हैं तथा बीज तैल या जड़ को पीसकर लगाते हैं । (२) प्रतिश्याय, इन्फ्लूएञ्जा एवं संधिपीड़ा युक्त ज्वर (डेंग्यु) में इसकी जड़ घोड़वच या सोंठ के साथ चावल की मांड में उबालकर देते हैं तथा पत्तों को पीसकर जरा गरम कर पीड़ा युक्त स्थान पर बाँधते हैं । (३) यकृतोदर, जलोदर एवं वृक्कजन्य शोफ में इसकी मूलत्वक् ३ रत्ती की मात्रा में देने से विरेचन होता है तथा यकृत् की क्रिया सुधरती है । इसके साथ यवक्षार का प्रयोग करने से मूत्र भी बढ़ता है । (४) चूहे के विष में तथा सर्पविष में यह लाभदायक माना जाता है । सर्प विष में २० रत्ती की मात्रा में मूल का चूर्ण चावल की धोवन के साथ देते हैं । मात्रा-मूलत्वक् १-३ रत्ती; वामक ३ माशा । अथ बलाचतुष्टयम् तस्य नामगुणानाह बलावाट्यालिका वाट्या सैव वाट्यालकाऽपि च । महाबल पीतपुष्पा सहदेवी च सा स्मृता ।।१४२।। ततोऽन्याऽतिबला ऋष्यप्रोक्ता कङ्कतिका च सा । गाङ्गेरुकी नागबला झषा ह्रस्वगवेधुका ।।१४३।। बलाचतुष्टय (चारों प्रकार के बला) के नाम तथा गुण-(१) बला, वाट्यालिका, वाट्या तथा वाट्यालका ये सब नाम बला (खिरैंटी) के हैं । (२) महाबला, पीतपुष्पा और सहदेवी ये सब नाम महाबला के हैं । (३) अतिबला, ऋष्यप्रोक्ता और कङ्कतिका ये सब अतिबला के हैं । [१४२-१४३] बलाचतुष्टयं शीतं मधुरं बलकान्तिकृत् । स्निग्धं ग्राहि समीरास्रपित्तास्रक्षतनाशनम् ।।१४४।। बलाचतुष्टय-शीतवीर्य, मधुररसयुक्त, बलकारक, कान्तिकारक, स्निग्ध एवं ग्राही होता है और वायु रक्तपित्त, रक्तविकार तथा व्रण को दूर करने वाला होता है । [१४४] ❖ बरियारा, सहदेवी, ककहिया, गुलशकरी, इति बलाचतुष्टयम् ।।१४४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ५३७

यहाँ पर 'बलाचतुष्टय' से (१) बरियारा, (२) सहदेई, (३) ककहिया, (४) गुलशकरी—इन चारों को ही समझना चाहिये । [१४४] बलामूलत्वक्चूर्णं पीतं सक्षीरशर्करम् । मूत्रातिसारं हरति दृष्टमेतन्न संशयः ॥ १४५॥ हरेन्महाबला कृच्छ्रम् भवेद्वातानुलोमिनी। हन्यादतिबला मेहं पयसा सितया समम् ।। १४६ ।। 'बरियारे' के जड़ की छाल का चूर्ण यदि दूध तथा शक्कर के साथ मिलाकर पीया जाय तो मूत्रातिसार को दूर करता है, यह परीक्षा करके देखा गया है, अतएव इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । 'महाबला' मूत्रकृच्छ्र को दूर करती है तथा इससे वायु का अनुलोमन भी होता है। 'ककहिया' का चूर्ण दूध तथा चीनी के साथ खाने से प्रमेह नष्ट होता है। [१४५-१४६] नोट-भावप्रकाशकार बला के चार भेद लिखते हैं। आधुनिक उद्भिज्जवेत्ताओं ने भी बला प्रजाति (Sida) की कई जातियों का वर्णन किया है। इनमें से अतिबला (कंघी) निस्संदेह ॲब्युटिलॉन् (Abutilon) प्रजाति की बनस्पति है । अधिकांश विद्वानों ने सिडा कॉर्डिफोलिआ (Sida cordifolia) को बला माना है, किन्तु श्री ठाकुर बलवन्त सिंह जी ने (पीत पुष्प) सिडा रॉम्बिफोलिया (Sida rambifolia) को वास्तविक बला लिखा है जिसको अन्य विद्वानों ने महाबला माना है । कुछ विद्वान रॉम्बिफोलिआ का अन्य उपभेद (श्वेत पुष्प) सिडा रॉम्बिफोलिया (Sida rhombifolia) को महाबला मानते हैं । भावप्रकाशकार महाबला के पर्याय में सहदेवी लिखते हैं लेकिन वास्तव में सहदेवी यह भिन्न वर्ग की ह्वर्नोनिआ सिनेरिआ (Vernonia cinerea) है । चरक-सुश्रुत में महाबला नाम नहीं आया है किन्तु सहदेवा नाम है । सम्भव है कि चरक, सुश्रुतोक्त सहदेवा ही महाबला हो तथा गलती से सहदेवा के स्थान पर सहदेवी छप गया हो । नागबला-के सम्बन्ध में अधिक मतभेद हैं। सिडा हेरोनिसीफोलिआ या सिडा ह्यूमिलिस् (Sida veronicaefolia; Syn-Sida humilis) को अधिकांश विद्वान् नागबला मानते हैं। यह भूमि पर सर्प की तरह टेढ़ी-मेढ़ी फैलती है। कुछ विद्वान् गुलसकरी को नागबला मानते हैं क्योंकि नागबला के पर्याय में गांगेरुकी आया है । गुलसकरी के ले० नाम के विषय में भी मतभेद है। सिडा स्पाइनोसा (Sida spinosa) को कुछ लोगों ने गुलसकरी लिखा है किन्तु श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने उसे अशुद्ध बतलाया है तथा वे ग्रेविआ हिर्सुटा (Grewia hirsuta) को गुलसकरी मानते हैं । नागबला का चतुष्फला पर्याय इसके लिये उपयुक्त मालूम होता है । इसे तथा इसके अन्य भेद ग्रे० पोप्यूलिफोलिया (Grewia populifolia) को गांगेरुकी (गंगरेन) कहते हैं जिससे इन्हें नागबला माना जाता है। इनके अतिरिक्त सिडा ॲक्युटा (Sida acuta) एवं अन्य भेद भी पाये जाते हैं। यहाँ पर संक्षेप में उपर्युक्त भेदों का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है । वास्तव में गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने के कारण एक के स्थान में दूसरे का व्यवहार किया जा सकता है । ६६. बला (बरियारा) हिं०-बरियार, बरियारा, बरियाल, खरेठी, खरैटी, खिरैंटी । बीजबन्द-(बीज) । बं०-बेडेला । म०-चिकणा । गु०-बलदाणा (बीज), खरेटी, बल, बला । क०-किसंगी, हेतुट्टि-गिडा । ते०-चिरिबेण्डा, मुत्तवु । ता०-अखिल- मनैपुण्डु । मा०-खरेंटी । पं०-खरैहटी, सिमक । अं०-Country mallow (कण्ट्री मॅलो); Sida (सिडा) । ले०-Sida cordifolia Linn. (सिडा कॉर्डिफोलिआ लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी) । यह सब प्रान्तों में प्रायः बारहों मास पाया जाता है। किन्तु वर्षा ऋतु में इसकी बहुलता खेतों और मेड़ों पर देखने में आती है। इसकी जड़ और डंडी बहुत मजबूत होती है जो आसानी से नहीं टूटती ।

५३८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका क्षुप-छोटा, २-४ फीट ऊँचा, स्वावलम्बी, मृदुरोमश तथा अनेक शाखाओं से युक्त रहता है। स्तम्भ- काष्ठमय एवं रेशेदार होता है। छाल-हल्के पीताभ भूरे रङ्ग की होती है। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे, हृदयाकृति, लट्वाकार- आयताकार, तूलरोमश, गोलदन्तुर, ७-९ शिराओं से युक्त एवं १/२-१ १/२ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प- बरसात के अन्त में छोटे पीले रङ्ग के फूल आते हैं जिनमें ७-१० स्त्रीकेसर होते हैं। फल-छोटे, मूंग जितने बड़े होते हैं। बीज-गहरे भूरे या काले रङ्ग के छोटे बीज रहते हैं जिन्हें बीजबन्द कहा जाता है। ग्रन्थिपर्ण (पृ० २५३) के बीजों को भी बीजबन्द कहा जाता है। जड़-प्रायः २-५ इञ्च लम्बी तथा १/२ इञ्च मोटी होती है। इसकी जड़, पत्र, बीज एवं पञ्चांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पञ्चांग में एक क्षाराभ, तैल, फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterol), म्यूसिन, राल, रालीय अम्ल एवं पोटॉशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate) ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसके पत्र, काण्ड एवं मूल में क्षाराभ की मात्रा ०.०८५% रहती है किन्तु बीजों में यह ०.३% होती है। इसके क्षाराभ में प्रधान अंश एफ़ेड्रीन (Ephedrine) का रहता है। गुण और प्रयोग-बला (बरियरा) शीतवीर्य, बल्य, रसायन, वृष्य, प्रजास्थापन, संग्राही वातपित्तहर एवं स्निग्ध है। इसका उपयोग रक्तपित्त, प्रमेह, प्रदर, वातविकार एवं व्रण में किया जाता है। (१) शुक्रमेह में इसके पञ्चांग का स्वरस देने से लाभ होता है। (२) श्वेत प्रदर, बारबार पेशाब होना तथा सोजाक में इसके जड़ की छाल का चूर्ण शर्करा तथा दुग्ध के साथ प्रयोग करते हैं। (३) अर्द्धाङ्ग, अर्दित, मन्यास्तम्भ, अवबाहुक, गृध्रसी तथा शिरःशूल आदि वातविकारों में इसकी केवल जड़ या हींग और सैंधव मिलाकर जड़ का प्रयोग करते हैं तथा दुग्ध के साथ सिद्ध तैल का बाह्य प्रयोग करते हैं। (४) नेत्राभिष्यंद में इसके पत्र पीसकर बाँधते हैं। (५) उपदंश, फिरंग तथा क्षत में इसकी जड़ को पीसकर बाँधने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं। पञ्चांग के क्वाथ से व्रण प्रक्षालन भी किया जाता है। (६) (महा) बला की जड़ एवं सोंठ का क्वाथ कम्पयुक्त विषम ज्वरों में लाभदायक होता है। (७) हृदय को बल देने के लिये मकरध्वज तथा कस्तूरी के साथ इसका प्रयोग करते हैं। (८) राजयक्ष्मा में दूध के साथ इसकी जड़ से सिद्ध घृत का उपयोग मधु मिलाकर करते हैं। (९) श्लीपद में (महा) बला की जड़ एवं हरिताल पीसकर लेप करते हैं। (१०) रसायन के लिये इसकी जड़ (१/२-१ पल) को दूध के साथ पीसकर पिलाते हैं तथा आहार में घृत युक्त दूध भात खिलाते हैं। इससे आयु वृद्धि होती है। मात्रा-मूल ६ माशा-१ तोला, पञ्चांग ६ माशा-१ तोला। ६७. महाबला, सहदेवी ? सं०-सहदेवा, क्षेत्रबला। हिं०-सहदेई, सहदेया, पीतबला। बं०-पीतबडेला। म०-चिकणी, सहदेवी, तुपकड़ी। गु०-खेतराऊबल, खेतराऊबलदाणा। पं०-सहदेवि। ते०-मयिलमाणिक्यम्। ता०-मयिरमाणिक्कम्। ले०-Sida rhombifolia Linn. (सिडा रॉम्बिफोलिया लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ५३९ यह क्षुप जाति की वनौषधि प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाई जाती है। यह ऊसर भूमि में अधिक होती है। उसका क्षुप-१-४ फीट ऊँचा, झाड़दार और सीधा होता है। पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, अभिलट्वाकार या तिर्यगायताकार तथा दन्तुर होते हैं। फूल-पीले रंग के बरियारे के फूलों के आकार वाले किन्तु उनसे कुछ बड़े होते हैं। फल-बरियारे के ही समान होते हैं। यह एक परिवर्तनशील जाति बतलाई जाती है जिसके अन्तर्गत कई उपभेद बतलाये गये हैं। इसी के उपभेद सिडा रॉम्बॉइडिआ (Sida rhomboidea) के पुष्प श्वेतवर्ण के होते हैं। यद्यपि भावप्रकाशकार इसे सहदेवी लिखते हैं तथापि यह वास्तविक सहदेवी नहीं है। सहदेवा यह नाम इसके लिये अधिक उपयुक्त है क्योंकि चरक सुश्रुत में बला के भेदों में सहदेवा का उल्लेख है। सहदेवी का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है जो भिन्न वर्ग की वनस्पति है। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में लुआब बहुत होता है। गुण और प्रयोग-इसके गुण भी बला सदृश ही होते हैं। शीतज्वर तथा आमवात में सोंठ के साथ इसकी जड़ का क्वाथ पिलाते हैं। मूत्रकृच्छ्र में इसकी जड़ के क्वाथ से वेदना कम होती है। क्षत पर मूलस्वरस की पट्टी रखने से व्रण जल्दी अच्छा होता है। हरिताल के साथ इसकी जड़ के लेप से श्लीपद में लाभ होता है। मात्रा-६ मा० से १ तोला। ६८. सहदेवी सं०-सहदेवी। हिं०-सहदेई, सहदैया। बं०-छोट कुकासिमा। म०-सहदेवी, सायिदेवि, सादोडी। गु०- सदोडी, शेदरडी। ता०-नैचिट्टे। ते०-घेरिट्टेकरनिना। मल०-पिरिना। क०-सहदेवी। अं०-Fleabane (फ्लीबेन)। ले०-Vernonia cinerea Less. (व्हर्नोनिआ सिनेरिआ लेस्)। Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी)। यह बरसात के दिनों में परित्यक्त भूमि में सब जगह होती है। इसका क्षुप-स्वावलंबी अथवा प्रसरणशील, रोमश तथा ८ इञ्च से ३ फीट तक ऊँचा होता है। काण्ड-पतला, रेखा युक्त एवं रोमश होता है। शाखायें-प्रायः श्वेताभ रोमश होती हैं। पत्ते-कई तरह के अर्थात् रेखाकार, अंडाकार, लट्वाकार या अभिलट्वाकार, अखंड या दन्तुर, रोमश, अवृन्त अथवा क्रमशः संकुचित होकर सूक्ष्म वृन्त से लगे होते हैं। पुष्प-हलके जामुनी रंग के पुष्प .२५ इञ्च लम्बे और आयताकार मुण्डक में आते हैं। अधःपत्रावलि-घंटिकाकार, .२ इञ्च लम्बी और उसके पत्र प्रायः रेखाकार, लम्बाग्र और उनका अग्र कंटक सदृश तीक्ष्ण होता है। यह सहदेवी बलाभेद नहीं है किन्तु जिस सहदेवी के बारे में यह मान्यता है कि जड़ शिखा में बाँधने से ज्वर कम होता है वह यही है। गुण और प्रयोग-यह शीतवीर्य, स्वेदजनक, कृमिघ्न एवं शोथहर है। ज्वर में पसीना लाने के लिये इसका क्वाथ या स्वरस पिलाते हैं तथा शरीर पर लगाते हैं। अर्श में इसका स्वरस दिया जाता है। यह पेशाब की जलन तथा बस्ति के उद्वेष्टन में लाभदायक है। इसका लेप शोथ में उपयोगी है। इसके बीज कृमिनाशक, विषहर तथा घोड़ों के लिये पौष्टिक माने जाते हैं। नेत्राभिष्यन्द में पुष्पों का व्यवहार किया जाता है। मात्रा-स्वरस ६ मा०-१ तोला; बीज ४ र०-१ मा०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA