ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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सदाचार की सौ शिल्पावें
५९—किसी प्रकार का अभ्यास करने से वह बढ़ता है, और न करने से घटता है। अभ्यासी शिष्य निरभ्यासी गुरु से बढ़ जाता है।
८८—काम और क्रोध, ये दोनों नरक में गिराते हैं। अतः सदा इन्हें दवाना चाहिये।
८९—किसी को दुर्बचन न कहना चाहिये। कड़ी बात बर्खा की भाँति हृदय में जुम जाती है।
८२—पुरुषार्था-उत्साही पुरुष कभी दरिद्री नहीं हो सकता और अगलसी निरुत्साही मनुष्य कभी धनी नहीं हो सकता।
८३—यदि परमात्मा ने विद्या, शक्ति और धन दिया है तो अज्ञानी, निर्बल और दीन के लिये लगादो।
८४—अपने कुटुम्ब में अनेक्य न होने देने में ही सबका करवाण है।
८५—प्रिय होने पर भी वे वस्तुयें त्याज्य हैं, जिनसे किसी प्रकार की मानसिक या शारीरिक हानि होती है।
८६—अपनी सत्कीर्ति को कभी मूलकर भी मैली न होने देने वाला ही पुरुष कुल का रत्न है।
८७—अनधिकार चेष्टा करना व्यर्थ है। अधिकारी को कुछ भी दुर्लभ नहीं।
८८—श्रेष्ठ पुरुष अपनी सरलता और सज्जनता से कभी घृष्य नहीं होते। यही उनकी श्रेष्ठता का मूल कारण है।
८९—दयालु और परोपकारी व्यक्ति का ही जीवन सार्थक होता है।
९०—गुरु में भी यदि कुछ गुण हों तो उसे ले लेना ही बुद्धिमत्ता है।
ब्रह्मचर्य-विशान
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११—संसार के हित के लिये अपने सुखों पर लात मारने वाले ही एक दिन सब के पूज्य बनते हैं।
१२—पतित से पतित 'मनुष्य भी परमात्मा की शरण में जाने से पवित्र और पुरयात्मा बन जाता है।
१३—आत्मिक बल का सन्धय करने वाला पुरुष जो चाहे कर सकता है।
१४—विद्वान, उपदेशक तथा सच्चे साधुओं से अपने लाभ की बात पूछनी चाहिये।
१५—जो बात अपने को ठुरी लगे उसका बोग दूसरे के ऊपर न लादना चाहिये।
१६—सुदृढ़-श्रेष्ठ और आचरण रहित पुरुषों को सदा अपमानित होना पड़ता है।
१७—सदाचारी पुरुष कठिन से कठिन कार्य में सफलता पा जाता है। दुराचार ही दुःखों का मूल है।
१८—हमारे पूर्वज कैसे वशत थे—वे क्यों संसार का हित करते थे और उनका जीवन क्यों आदर्श था ? इन सब बातों का सदा विचार करना चाहिये।
१९—देश, काल और बल का अनुभव तथा उचित कर्मों की योजना से कदापि न चुकना चाहिये।
१००—प्रत्येक मनुष्य अपने भले घुरे कर्मों का उत्तरदायी है; जो जैसा करता है, वैसा भरता है। यह सिद्धान्त अटल है !
ॐ. विधीय शिक्षा के प्रेमी को लेखक का सुसमय सिद्धान्त पढ़ना चाहिये।
चतुर्थः लघु
१.—ब्रह्म-चन्दनां
ॐ असतो मा सद् गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ मृत्योर्माऽमृतं गमयेति ।
( वात्सप्य माहाण १४, १, १, १० )
हे प्रभो ! तुम हमें अधर्म-मार्ग से पृथक् कर सन्मार्ग में चलाओ ! तुम हमें श्रम्वकार में न ले जाकर, प्रकाश में ले चलो !! और मृत्यु से दूर कर मोक्ष-सुख को प्रदान करो !!
तुम हमारे पथ-प्रदर्शक हो । तुम जियर चाहो वधर ले जा सकते हो । नेता को अधिकार है कि वह अपने अनुयायी को जिस मार्ग से चाहे, ले जा सकता है । हमें सन्मार्ग से चलने की इच्छा है । हमें भय है कि हम अज्ञान-वश मूर्खता न कर बैठें । इसीलिये हमें ज्योति की आवश्यकता है । जब हमें मार्ग दिखालाई पड़ेगा, तब हम श्रम में न पड़ सकेंगे । मृत्यु से तभी तक लोग डरते हैं, जब तक अमृत नहीं प्राप्त हो जाता । तुम अमृत के समुद्र हो । तुम्हारी दया होते ही हम अमरत्व को प्राप्त कर सकेंगे । ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिये हम इसकी याचना करते हैं । तुम दयालु हो ! अतः हमारी अभिलाषा पूर्ण करो !!
ब्रह्मचर्य-विधान
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२—कन्या और ब्रह्मचर्य
“ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ।”
( अथर्ववेद )
ब्रह्मचर्य का पालन करने के पश्चात् कन्या अपने योग्य युवक पति को प्राप्त करती है ।
“कन्या सदा पालनीया, स्त्रीणीया च यलतः ।”
( मूक )
कन्या का सदैव पालन और उसका यल-पूर्वक संरक्षण करता चाहिये ।
कुछ हठी और अहानी पुरुषों का विचार है कि कन्याओं के लिये शास्त्र में ब्रह्मचर्य की आज्ञा नहीं दी गई है । ब्रह्मचर्य का पालन उसी के लिये है जो वेद पढ़ने का अधिकारी हो, पर कन्याओं को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं । इसलिये वे ब्रह्मचर्य की भी अधिकारिणी नहीं ।
वास्तव में यह विचार भ्रम-मूलक और समाज को दुर्वाचार के समुद्र में डुबानेवाला है । हम बल-पूर्वक कहते हैं कि कहीं भी ऐसी किसी ऋषि-महर्षि ने आज्ञा नहीं दी है कि कन्यायें वेद न पढ़ें । वैदिककाल में बहुत सी ऐसी स्त्रियाँ थीं जो वेदों का अध्ययन करती थीं और ऋचाओं का अर्थ जानती थीं । सरस्वती और गायत्री की आज भी संसार में पूजा हो रही है । गार्गी, मैत्रेयी तथा अरुन्धती आदि स्त्रियाँ वेद जानती थीं और उनके चरित्र में भी हमें वैदिकता के प्रमाण मिलते हैं । फिर हम कैसे मान सकते हैं कि स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है । जब उन्हें वेद
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कन्या और ब्रह्मचर्य
पढ़ने का अधिकार है, तब वे ब्रह्मचर्य के पालन से किस प्रकार विमुख रह सकती हैं।
ऋग्वेद के दसवें मण्डल के ३९, ४० सूक्त में घोषा नाम की ब्रह्मचारिणी कन्या द्वारा प्रकट किये हुए मन्त्र हैं। वनमें स्पष्ट रूप से ब्रह्मचारिणी कन्या के वैद्याध्ययन के समय से लेकर, उनके गृहस्थाश्रम में पैर रखने तक के प्रायः सभी कर्तव्यकर्मों का वर्णन है। फिर कैसे कहें कि स्त्रियाँ वेद पढ़ने और ब्रह्मचर्य पालन करने की अधिकारिणी नहीं।
बालकों के ब्रह्मचर्य-विषय में तो किसी को सन्देह ही नहीं, पर कन्याओं को भी ब्रह्मचर्य का पूर्ण अधिकार है। कोई वेद ऐसा नहीं जो इस बात का विरोध करता हो। हमारी इस बात का समर्थन-प्रमाण अथर्ववेद के एक मन्त्र से भी हो सकता है जो सबसे ऊपर दिया गया है।
यदि हम नीति-शास्त्र के अनुसार भी विचार करते हैं, तो भी कन्याओं के लिये ब्रह्मचर्य उत्तम ही आवश्यक ज्ञान पड़ता है, जितना कि बालकों के लिये। क्या एक ब्रह्मचारी और वेदज्ञ-पुरुष कभी भी एक ब्रह्मचर्य-रहिता और वेद-विहीना स्त्री से विवाह कर सकेगा ?
कुमार्यं शिष्येद् विद्याः धर्म-नीतौ निवेशयेत् ।
दुर्यः कल्याणद्वा प्रोक्ता, या विद्यामधि गच्छति ॥
(देसादि)
कुमारी को विद्या पढ़ानी चाहिये। उसी भाँति धर्म और नीति में भी प्रवेश कराना योग्य है। जो कन्या विदुषी होती है, उससे दोनों कुलों का कल्याण होता है।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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विद्या पढ़ाने का अभिप्राय साक्षर बनाने से नहीं है, बल्कि योग्य बनाने से है। वही कन्या विद्याध्ययन कर सकती है, जो ब्रह्मचर्य का पालन करे। जब तक वह ब्रह्मचारिणी तथा अविवाहितो है, सब तक वह नाना प्रकार की विद्यायें और कलायें सीख सकती है। गोमिल आदि गृह सूत्रों में भी कन्या के ब्रह्मचर्य की बात स्पष्ट रूप से आई है।
यवनों के आक्रमण-काल में कन्याओं को बचाने के लिये पाराशरी और शीघ्रकौष में “अष्ट वर्षा भवेद्वगोरी, नव वर्षा च रोहिणी” जैसे पाठ गढ़ दिये गये थे, जो आज तक प्रचलित हैं। इन फकिराओं के अनुकूल रजोदर्शन से पूर्व ही कन्याओं का विवाह हो जाता है और वे ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन से परे रह जाती हैं। हमारे शरीर-शास्त्र के जानने वाले महर्षि शुभ्रत ने भी कन्याओं को सोलह वर्ष तक के पहले विवाह करने के अयोग्य ठहराया है। अतएव जब तक वे अयोग्य हैं, ब्रह्मचर्य का पालन कर जानवती वनें। इसके उपरान्त सुयोग्य वर से उनका विवाह होना चाहिये।
हमारे विचार से तो कन्याओं के लिये ब्रह्मचर्य-पालन बालकों से भी नितान्त आवश्यक और शास्त्र-सम्मत है। क्योंकि उन पर संवातोत्पत्ति सम्बन्धी संसार का बड़ा भारी उत्तर-दायित्व है।
वर्तमान भारत के आचार्य स्वामी दयानन्द सरस्वती लिखते हैं—
“बालक और बालिकाओं की पाठशाला दो कोस, एक दूसरे से दूरहोनी चाहिये। बालकों की पाठशाला में अभ्यापक तथा भृत्य आदि सभी पुरुष हों, और बालिकाओं की पाठशाला में सभी स्त्रियाँ होनी चाहिये। स्त्रियों की पाठशाला में पाँच वर्ष का बालक
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कन्या और ब्रह्मचर्य
और पुरुषों की पाठशाला में पाँच वर्ष की बालिका न जाने पावे अर्थात् जब तक वे ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी रहें, तब तक पुरुष या स्त्री के दर्शन, स्पर्श, एकान्त सेवन, भाषण, विषय-कथा, परस्पर-क्रीड़ा, विषय का ध्यान और सङ्ग—इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहें ।”
इस प्रकार कोई भी सज्जन और विचारशील पुरुष कन्याओं के ब्रह्मचर्य-व्रत और विद्याध्ययन का विरोध नहीं कर सकता ।
स्त्री के शरीर में साधारणतया १२ वर्ष की अवस्था में रज की उत्पत्ति हो जाती है और पुरुषों को प्रायः १५ वर्ष की अवस्था में वीर्यगम होता है । महर्षि शुश्रुत के मत से १६ वर्ष की कन्या और २५ वर्ष का बालक वीर्य के विचार से वराबर समका जाता है । रजोदर्शन और वीर्योत्पत्ति के उपरान्त का समय ही वास्तविक ब्रह्मचर्य-काल है । इससे पूर्व नहीं । इस प्रकार स्त्री के ब्रह्मचर्य के ३ वर्ष का समय पुरुष के ब्रह्मचर्य के ९ वर्षों के बराबर होता है । अर्थात् स्त्री का १ वर्ष का ब्रह्मचर्य पुरुष के ३ वर्ष के बराबर हुआ ।
३—ब्रह्मचारिणी का विवाह
“कन्यायां द्विगुणोवरः ।
(सूक्ति )
कन्या की अवस्था से उसका वर द्विगुण अवस्था का होना चाहिये ।
“कन्यानां सम्प्रदानञ्च, कुमारशास्त्रं रक्षणम् ।”
(मनुस्मृति)
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कन्याओं का दान और कुमारों का संरक्षण बहुत विचार कर करना योग्य है।
ऋतुमती होने के उपरान्त कम से कम ३ वर्ष तक प्रत्येक कन्या को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। १५ वर्ष से पहले विवाह का न होना ही श्रेयस्कर है, इस बात का प्रायः सभी शास्त्रकारों ने समर्थन किया है। यदि कोई यह कहे कि रजोदर्शन से पूर्व ही विवाह कर देना चाहिये, तो इस बात को हम अवैदिक समझते हैं।
समाज-सुधारक स्वामी दयानन्दजी ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी के विवाह-काल को इस प्रकार व्यवस्था देते हैं:—
“जो २५ वर्ष तक पुरुष ब्रह्मचारी रहे तो १६ वर्ष तक कन्या; जो पुरुष ३० वर्ष तक ब्रह्मचारी रहे, तो स्त्री १७ वर्ष तक; जो पुरुष ३६ वर्ष तक रहे, तो स्त्री १८ वर्ष तक जो पुरुष ४० वर्ष तक रहे तो स्त्री २० वर्ष तक रहे; जो पुरुष ४४ वर्ष तक; तो स्त्री २२ वर्ष तक और जो पुरुष ४८ वर्ष तक ब्रह्मचर्य से रहे तो स्त्री २४ वर्ष तक ब्रह्मचर्य का सेवन करे। अर्थात् ४८ वर्ष से आगे पुरुष और २४ वर्ष से आगे स्त्री को ब्रह्मचर्य न रखना चाहिये। पर यह नियम विवाह करनेवाले पुरुष और स्त्रियों के लिये है। और जो विवाह करना ही न चाहें, वे मरण पर्यन्त ब्रह्मचारी रह सकें, तो भले ही रहें, परन्तु यह कार्य पूर्ण विद्यावाले, जितेन्द्रिय और निर्दोष योगी पुरुष-स्त्री का है। यह वड़ा कठिन काम है कि काम के वेग को शाम के इन्द्रियों को अपने वश में रख सकें।”
जीष्णु वर्षाण्युधीर्योत्त, कुमार्युत्तुमती सती।
ऊर्व्यन्तु कालादेत्स्माद्, विन्देत सदृशं पतिम् ॥
(मन्त्रस्थिति)
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ब्रह्मचारिणी का विवाह
कन्या ऋतुमती हो जाने पर ३ वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई, कुमारी रहे। इसके पश्चात् अपने योग्य ( ब्रह्मचारी युवक ) पति को बने।
श्रीणि वर्षार्ण्युत्तुमदी, कांक्षेतपितृशासनम्।
ततश्चतुर्ये वर्षंतु, विन्देत सहस्रं पतिम् ॥
( बौधायन )
ऋतुमती कन्या ३ वर्ष तक पिता के संरक्षण में ब्रह्मचर्य का पालन करे। तत्पश्चात् चौथे वर्ष में अपने ( वय और गुण में ) योग्य पति से परिणय करे।
अज्ञात् पति मर्यादामज्ञातपतितेखनाम्।
नांद्वाहयेतिपिता बालामक्षतां धर्मशासनम्॥
( हेमाद्रि )
पिता को चाहिये कि पति-मर्यादा, पति-सेवा और धर्म-शासन को न जाननेवाली तथा कम अवस्थावाली कन्या का विवाह न करे।
ततो वराय विदुषे, कन्या देया मतीपिभिः।
पपः सनातनः पन्थाः, ऋपिभिः परिगीयते ॥
जब कन्या ब्रह्मचर्य का पालन कर ले, तो उसे विद्वान् वर को समर्पित करना चाहिये। यही सनातन मार्ग है और इसे ही ऋपि लोग मानते आये हैं।
महु, व्यास, दक्ष, गौतम, शातातप, बौधायन तथा आयला-यन आदि सभी प्राचीन धर्मशास्त्री लोग कन्या के ब्रह्मचर्य के समर्थक और छोटी अवस्था के विवाह के जोर विरोधी हैं। सभी के मत से ब्रह्मचारिणी रह कर ही कन्या को विवाह के लिये
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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आज्ञा दी गई है अर्थात् १५ वर्ष की आयु से पहले किसी ने भी कन्या के विवाह का समर्थन नहीं किया है।
ऋग्वेद में कन्या के विवाह के सम्बन्ध में एक प्रार्थना यह है कि हे अश्विनी कुमार ! आप ऐसी दया कीजिये जब कि एक कन्या ब्रह्मवादिनी और ब्रह्मचारिणी रह कर, स्त्री के सब लक्षणों से युक्त हो जाय और वह सौभाग्यशालिनी अपना विवाह करना चाहे तब उसे तेजस्वी, सुन्दर और युवक बन मिले। वह बन पुरुषार्थी हो। उसके घर में स्नेह, माधुर्य तथा सौन्दर्य आदि का वास हो। विविध प्रकार के अन्न और धन से परिपूर्ण हो। जहाँ दया, दान और परोपकार आदि गुणों का बाहुल्य हो और योगादि से रहित हो। अर्थात् उस स्त्री को सर्वगुणसम्पन्न युवावस्था को प्राप्त बन मिले।
विवाह का अभिप्राय पाठकों को पहले विदित ही हो चुका है। इसलिये जब तक वर-कन्या अयोग्य और ज्ञानहीन हैं, तब तक उनका विवाह करना परम मूर्खता और अनुचित पाप है।
४—ब्रह्मचारिणी देवियों
यादगुण्येन भर्जा स्त्री, संयुज्येत यथाविधि। तदगुण्या सा भवति, समुद्रयेन निक्षग्ना ॥ (मनुस्मृति)
स्त्री जैसे पति के साथ संयुक्त होती है, वैसे ही उसमें गुण आ जाते हैं। जैसे नदी समुद्र से मिलते ही उसके खारेपन को ग्रहण कर लेती है।
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ब्रह्मचारिणी देवियोंँ
आत्मानमात्मना यास्तु, रक्ष्युस्ताः सुरक्षिताः ।
( मनुस्मृति )
जो स्त्री स्वयं ही अपने सतीत्व की रक्षा करती है, वही सुरक्षित रह सकती है ।
पत्नी के लिये पति ही ब्रह्म है । उसके साथ नियमानुकूल आचरण करना ही ब्रह्मचर्य है । प्राचीन समय में इस हिन्दूजाति में अनेक सच्ची ब्रह्मचारिणी तथा सती देवियाँ हुई हैं । पुराणों तथा अन्य कथा-प्रधान ग्रन्थों में उनके दिव्य-चरित्रों का वर्णन मिलता है । यहाँ हम कुछ की संक्षिप्त कथायें लिखते हैं । आशा है हमारी पाठिकायें भी उनका अनुकरण कर लाभ उठावंगी ।
ब्रह्मवादिनी घोषा—यह कश्चिदान सुनि की कन्या और वपिज की पौत्री थीं । ऋग्वेद के दशम मण्डल के ३९,४० सूक्त इन्हीं पर श्रफट हुए थे । इन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया था और इसका उपदेश भी सबको करती थीं । इनके सिद्धान्तों का सार नीचे दिया जाता है—
जो पुरुष स्त्री की प्राण-रक्षा में तत्पर रहे, उसे यज्ञ-कार्य में नियुक्त करे, उस पर प्रगाढ़ प्रेम रखे, उससे उत्तम सन्तान उत्पन्न करे, पितृयज्ञ के योग्य बनावे इन गुणों वाला वर ब्रह्मचारिणी को प्राप्त हो । ऐसे ही पति के मिलने से स्त्रियों को सुख होता है ।
युवक स्वामी और युवती स्त्री के सहवास से जो आनन्द प्राप्त होता है उसे ब्रह्मचारिणी कन्यायें कुछ भी नहीं जान सकतीं । हे अविनी-कुमार ! वह विषय हमें समझोने, अब हम स्त्री पर प्रेम रखनेवाले बलवान् और वीर्यवान् पति के घर जाना चाहती हैं ।
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ब्रह्मवादिनी सूर्या—यह ब्रह्मवेद के दशम मण्डल के ८५ सूक्त की रचयित्री हुई है। यह सूक्त विवाह सम्बन्ध में वर्णित है। उनके उपदेशों का सार नीचे दिया जाता है:—
हे बहू! तेरे पति के घर में ऐसी बरघुर्ष प्राप्ति हो, जो प्रजा तथा लुम्के भिय लेंगे। इस गृह में तू स्वामिनी बनने के लिये जागृत हो! इस पति के साथ संसर्ग कर और अज्ञात परमात्मा को ध्यान में रख कर, दोनों बुद्धावस्था तक परस्पर जुलभोग कर ले रही।
हे परमात्मन, तू इस बधू को सुपुत्रवती और सौभाग्यवती बनाना। इसके गर्भ से १० सन्तान उत्पन्न करना और ग्यारहवें इसके पति को जीवित रखना। हे बहू, तू अपने सद्गुणवहार से ससुराल पर अधिकार जमाना, सास-ससुर को सेवा-शुश्रूषा से वश में रखना, ननदों पर राज्य करना और देवों पर महारानी की भौंति शासन करना।
ब्रह्मचारिणी गोधा—यह ब्रह्मचारिणी और ब्रह्मवादिनी थी और स्त्रियों को सदाचार की शिक्षा देती थी। इनका सिद्धान्त था कि स्त्रियाँ भी वेद और शास्त्रों के अध्ययन में निपुणता प्राप्त करें। और पुरुषों से यह बात कहती थी कि हम स्त्रियों पुरुषों को अघर्ष में नहीं पसीटतीं। इसलिये हम निर्दोष अवलाओं का चरित्र मत भ्रष्ट करो। हमारे प्रति बड़ी सदाचार का व्यवहार करो, जो कि वेदों में शिक्षा गया है। इस प्रकार से व्यवहारियों को दोकती थीं।
देवी यमी—इन्होंने भी वेद की ब्रह्मचर्य रची है। ये जनता को यम-नियम के पालन करने की शिक्षा देती थी। इनका कहना
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ब्रह्मचारिणी देवियाँ
या कि धार्मिक पुरुषों और विद्वान् तथा गुणियों के आदर्श-चरित्र का अनुकरण करना चाहिये।
ब्रह्मचरिणी अम्बा—इनकी रची हुई ऋग्वेद में ५ ऋचायें हैं। जिनमें अम्बा की महत्ता गायी गई है। इससे यह सूचित होता है कि इनका सिद्धान्त था कि अम्बा से ही मनुष्यजाति का कल्याण हो सकता है।
सती सावित्री—सत्यवान् की पत्नी थीं। विवाह से पूर्व ही नारद जी ने उनके पिता से कहा कि जिनसे आप इसका विवाह करनेवाले हैं, वह थोड़े ही दिन जीयेगा। यह सुन कर उनके पिता ने दूसरे से उसका विवाह करना चाहा। पर ब्रह्मचारिणी सावित्री ने उन्हें ऐसा करने से रोका। अन्त में उनके हठ से उनका विवाह सत्यवान् से हो गया। कुछ दिनों में वन में उनका देहान्त हो गया। यमराज उसे लेने आये पर इस पतिव्रता ने प्ररनोत्तर से उनके भी झुके छुड़ा दिये। अन्त में हार मान कर इनके पति को जिलाना पड़ा।
देवी दमयन्ती—यह राजा नल की स्त्री थीं। इन्होंने स्वयं इनके साथ स्वयंवर स्वीकार किया। राजा नल अपना सारा राज्य-पाट जुट्टे में हार गये। वन में ले जाकर इन्होंने पतिव्रता दमयन्ती को बड़ी बुरी दशा में छोड़ दिया और आप भाग गये। पर ये किसी प्रकार अपने पिता के घर पहुँचीं और मिथ्या स्वयंवर की बात रच कर पुनः नल से मिलीं। इतना होने पर भी उसने अपने प्यारे पति का प्रगाढ़ प्रेम नहीं छोड़ा।
सती सुलोचना—यह लक्ष्मीराज रावण के महावली पुत्र मेघनाद की पत्नि थीं। श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण ने संभ्रम में
ब्रह्मचर्य विज्ञान
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उसे मार डाला था। उसकी एक मुजा जाकर सुलोचना के आगे गिरी। उसे सन्देह हुआ। अतएव उन्होंने कहा कि यदि मैं मन वचन तथा कर्म से पतिव्रता होऊँ तो यह मुजा मेरे अंचल पर लिखे कि मैं तेरा पति हूँ तभी मेरे मन में विश्वास होगा कि मेरे पति मारे गये।
पेसा ही हुआ। उस मुजा ने यही बात लिख दी। फिर वे सब के समझाने दुमाने पर भी न रुकीं और अपने पतिका शीश श्रीरामचन्द्र के यहाँ से लेकर अभि-चित्ता में सती हो गईं।
सतों माझी—ये महाराज पाण्डु की पत्नी थीं। इन्होंने बहुत दिनों तक अपने पति की रक्षा के लिये ब्रह्मचर्य का पालन किया था। ये भी अपने पति के मरने पर पुत्रों को कुन्ती के अधिकार में रख पति के साथ सती हो गईं।
सती सुदक्षिणा—यह समाहृ दिलीप की भार्या थीं। इन्होंने बहुत दिनों तक ब्रह्मचर्य से रह कर पुत्र के लिये महर्षि वशिष्ठ की गो की सेवा की थी।
अभी अधिक दिन नहीं हुये कि यवनों के शासन-काल में हमारे देश की अनेक पतिव्रता और ब्रह्मचारिणी स्त्रियों ने धर्म के लिए अपने प्राण अग्निदेव को समर्पित किये थे।
सती सुकन्या—यह महर्षि च्यवन की पत्नी थीं। इनके पिता एक दिन वन में अहेर खेलने गये थे। वहाँ च्यवन ऋषि तपस्या कर रहे थे। इस बालिका ने अम वश उनक दोनों नेत्रों में काँटे गोद दिये। यह खबर उनके पिता को लगी। उन्होंने ने अपनी पुत्री को महर्षि की सेवा के लिये समर्पित कर दी। कुछ दिनों के उपरान्त सुकन्या युवती हुई, पर अपने पति की सेवा करतीं।
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ब्रह्मचारिणी देवियर्
रही; अधिनी कुमार्ग ने इसे अपने वश में करने के अनेकों प्रलोभन दिये, किन्तु इसका मन ब्रह्मचर्य से जरा भी न छिगा। अन्त में उन्होंने प्रसन्न हो कर क्यवन को अपने औपधोपचार से अत्यन्त सुन्दर युवक बना दिया।
कुछ लोगों का कहना है कि ब्रह्मचर्य-पालन का अधिकार केवल पुरुषों के ही लिये है, स्त्रियों के लिये नहीं। यह उनका निरा बाल-वाद है। परमात्मा ने पुरुष-स्त्री दोनों को एक ही गर्भ से उत्पन्न किया है। उन दोनों के जीवन का लक्ष्य भी एक ही बनाया है। दोनों को अपने शारीरिक, नैतिक और मानसिक विकास का समान अधिकार है, जो ब्रह्मचर्य से ही सिद्ध हो सकता है। फिर एक ही को क्यों ऐसा अधिकार मिलने लगा? स्त्रियों को ब्रह्मचर्य-पालन का अधिकार न देना, सभी दृष्टियों से घोर अन्याय और जघन्य पक्षपात ही समझा जायगा।
वपुता और धारिणी—श्रीमद्भागवत में लिखा है कि वपुता और धारिणी नाम की दो स्त्रियाँ थीं, जिन्हें ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हुई थी। इसलिये दोनों ने अपने को विवाह-बन्धनों से मुक्त रख कर अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया और अन्त में उनको मोक्ष प्राप्त हुआ।
प्राचीन समय में कुछ ऐसी आदर्श स्त्रियाँ भी हो गई हैं, जिन्होंने लौकिक सुख को तुच्छ समझ कर, अपना जीवन अविवाहित व्यतीत किया है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि समाज के कल्याण तथा स्वात्मानन्द के लिये स्त्रियाँ भी अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन कर सकती हैं।
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मनुस्मृत्य-विज्ञान
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५—पातिव्रत आर ब्रह्मचर्य
“कोकिलानां स्त्रो रूपं, स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम् ।”
( वाणक्य-नीति )
कोयल का रूप उसका स्वर और स्त्रियों का सौन्दर्य उनका ‘पतिव्रत’ होता है ।
“व्यभिचारान्तु मनुः स्त्री, लोके प्रामोति निन्द्याताम् ।”
( मनुस्मृति )
अपने पति को छोड़ कर पर पुरुष को चाहने वाली स्त्री संसार में निन्दित होती है । अर्थात् व्यभिचारिणी कहलाती है ।
स्त्री पुरुष की अधोक्ति होती है । अतएव पति के हित में तत्पर रहना ही उसका सनातन धर्म है । जो स्त्री अपने पति का आदर करती है तथा मन, वचन और कर्म से उसकी आज्ञा का पालन करती है, वही स्वर्ग-सुख पाती है । पति के सर्वथा अखु-कूल रहना तथा स्वप्न में भी पर पुरुष की इच्छा न करने को ‘पातिव्रत’ कहते हैं । इस देश में प्राचीन काल में अनेक पतिव्रता स्त्रियाँ हो गई हैं, जिनकी कीर्ति आज भी भूमण्डल में व्याप्त है । इस बाल का साक्षी भारतीय इतिहास है कि जितनी सती साध्वी स्त्रियाँ हिन्दू-जाति में हुईं, उतनी कहीं सुनने में भी न आ सकीं ।
ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास के पश्चात् कन्या का विवाह उसके सहरा ब्रह्मचारी और विद्वान-वर से होता है । सब से बहु अपने पति के अधिकार में रहती है । गुह्यशास्त्र में प्रशिक्षित होते ही उसको ‘पातिव्रत’ के पालन का सब से बड़ा तप उपस्थित होता
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महिलाओं का महत्त्व
है। यदि वह इसका पूर्ण-रूप से पालन कर सकी, तो वह स्त्री संसार में देवी का स्थान ग्रहण करती है।
हमारे विचार से पातिव्रत भी स्त्रियों के लिये एक प्रकार का गार्हस्थ्य 'ब्रह्मचर्य' है। इसमें भी प्रायः बहुत साधना की आवश्यकता होती है। अपने पति के साथ भी शास्त्र की मर्यादा का उल्लंघन करना न्यमिचार है। गृहस्थ स्त्रियों के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि वे इस आवश्यक ब्रह्मचर्य का पालन कर गृहस्थाश्रम को सुखमय बनाती रहें।
६—महिलाओं का महत्त्व
“स्त्री दिव्या शोभते गृहे ।”
( चाणक्य-नीति )
दिव्य ( गुणों वाली ) स्त्री घर में शोभित होती है।
हिन्दू-धर्म के इतिहास में देवियों के अनेक पवित्र चरित्रों का वर्णन आया है। प्रायः जिसने प्राचीन ऋषि-महार्षि ग्रन्थकार हुये हैं, सवों ने स्त्रियों के गौरव की कुछ न कुछ अवश्य प्रशंसा की है। स्त्री प्रधानतया प्रकृति की शक्ति है। इसके बिना सृष्टि-रचना असम्भव है। इसी से मनुस्मृति में लिखा है कि ब्रह्माजी ने प्रारम्भ में अपने शरीर के दो टुकड़े किये। एक भाग से पुरुष और दूसरे से स्त्री की रचना की।
वैदिक काल स्त्रियों के लिये स्वर्ण-युग था। उस समय ये आज कल की भाँति हीन नहीं थीं। बहुत से उदाहरणों से यह ज्ञात होता
ब्रह्मचर्य-विद्यान
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है कि स्त्री-जाति के अधिकार बहुत ही न्याय-संगत थे । उस समय ये वैदिक संस्कारों की अधिकारिणी थीं । यही कारण था कि घोषा, सूर्या, विश्ववरा, लोपासुरा तथा इन्द्राणी आदि जैसी विदुषी देवियाँ सन्तों की दर्शिका हुईं । उनका उल्लेख आज भी मंत्रों के साथ मिलता है । अब इससे घट्ट कर स्त्रियों की उन्नति और क्या हो सकती है !
अब हम महिलाओं के मूल महत्त्व, उपकार तथा सदगुणों के सम्बन्ध में लिखेंगे। प्रयासा-वाक्य महाभारत और मानव-धर्म-शास्त्र से उद्धृत करते हैं:—
अर्धं भार्यां मनुष्यस्य, भार्याश्रेष्ठतमः सखा ।
भार्यां मूलं जिवगंस्य, भार्यां मूलं तरिष्यतः ॥
पत्नी पुरुष की अर्धाङ्गिनी होती है—भार्या मनुष्य का सर्वोत्तम मित्र है—भार्या त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ और काम ) का कारण है और भार्या मोक्ष का भी साधन है ।
भार्यावन्तः क्रियावन्तः; सभायां क्रियमेधिनः ।
भार्यावन्तः प्रमोदन्ते, भार्यावन्तः श्रियान्विताः ॥
स्त्री वाले क्रियावान् हैं—स्त्री वाले गृहस्थ-धर्मी हैं—भार्या वाले प्रसन्न रहते हैं और स्त्री-युक्त ही धनवान् हैं ।
सखायः प्रविक्लिप्तेषु, भवन्नेयतः प्रियवदः ।
पितरौ धर्मकार्येषु, भवत्याचारस्य मातरः ॥
स्त्रियाँ एकान्त में मित्र, धर्म-कार्य में पितर और दुरवस्था में माता की भाँति प्रसन्नता, सहायता एवं सेवा करती हैं ।
क्रियान्तु रोचमानायां, सर्वतद्रोचते कुलम् ।
तस्मां त्वरोचमानायां, सर्वमेव न रोचते ॥
२२१
महिलाओं का महत्त्व
स्त्री की प्रसन्नता में सब की प्रसन्नता है। यदि वह घर में अभ्यसन्न हो, तो कुछ भी नहीं अच्छा लगता।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्रा फलाः क्रियाः ॥
जहाँ स्त्रियों का आदर होता है, वहाँ देवगण निर्वास करते हैं। और जहाँ इनका निरादर होता है, वहाँ सारे कार्य निष्फल हो जाते हैं।
शोचन्ति जामयां यत्र, विनश्यत्याशु तत्कलम्। न शोचन्ति तु यत्रैताः, चर्द्वन्ते तदुधि सर्वदा ॥
जिन घरों में स्त्रियाँ कष्ट पाती हैं, वे शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। और जिस कुल में ये सुख पाती हैं, वे सदैव उत्पति करते हैं।
सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता, भर्त्रा भार्या तथैवच। यस्मिन्नेव कुले नित्यं, कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥
जिस कुल में पत्नी से पति सन्तुष्ट रहता है और उसी भाँति पति से पत्नी सदैव प्रसन्न रहती है, उस कुल में कल्याण होमा निश्चित है।
मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते, धान्यं यत्र सुसञ्चितम्। द्वामपत्य-कलहो नास्ति, तत्र श्रीः स्वयमागता ॥
( चाणक्यनीति )
जिस गृह में मूर्खों का आदर नहीं होता—जहाँ अन्न सम्भित रहता है और जहाँ पति-पत्नी में कलह नहीं रहता, वहाँ लक्ष्मी स्वयं आती है।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि, सतीपादेषु तान्यपि। तेजस्त्रा सर्वदेवानां, मुनीनाञ्च सतीषु च ॥
ब्रह्मचर्य-विधान
२२२
सतीनां पादरजसा, सद्यः पूता वसुन्धरा ।
पतिव्रतां नमस्कृत्य, मुच्यते पायकाश्रयः ॥
संसार में जितने तीर्थ हैं, सब सती स्त्रियों के चरणों में हैं, सब देवताओं और मुनियों का तेज पतिव्रताओं में होता है । सती स्त्रियों की चरण-मूलि से तत्काल प्रथवी पवित्र हो जाती है । पतिव्रताओं की वन्दना करके मनुष्य पातक से छूट जाता है ।
७—आदर्श माता
“नास्ति मातुलमो गुरुः ।”
माता के समान बालक का संसार में दूसरा गुरु नहीं ।
यह बात बहुत सत्य है कि जैसी माता होती है, वैसी ही उसकी सन्तान भी होती है । प्रत्येक सन्तान पर उसकी माता के भले-पुरे गुणों का अवश्य प्रभाव पड़ता है । हमारी इस बात का समर्थन सुश्रुत और वाग्भट जैसे ऋषि-प्रणीत वैद्यक शास्त्रों में किया गया है । देखिये, धर्माचार्य मनु माता के सन्वन्ध में अपनी यह सम्मति देते हैं:—
उपाध्यायानन्दशाचार्य, आचार्यार्णो शतं पिता ।
सहस्रान्तु पितृग्माता, गौरवेणासि रिच्यते ॥
१० उपाध्याय के बराबर १ आचार्य, १०० आचार्य के बराबर १ पिता और १००० पिता के बराबर माता गौरव में बड़ी है ।
बालक-बालिकाओं पर उपाध्याय, आचार्य और पिता का उत्तम प्रभाव कदापि नहीं पड़ता, जितनाकि साता का प्रभाव पड़ता