भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

जमदग्नि-वध ] [ १२१

॥ जमदग्नि-वध ॥

वसिष्ठ उवाच—
जमदग्निस्ततो भूयस्तमुवाच रुषान्वितः ।
ब्रह्मस्वं नापहर्त्तव्यं पुरुषेण विजानता ॥१
प्रसह्य गां मे हरतो पापमाप्स्यसि दुर्मते ।
आयुर्जाने परिक्षीणं न चेदेतत्करिष्यति ॥२
बलादिच्छसि यन्नेतुं तन्न शक्यं कथंचन ।
स्वयं वा यदि सायुज्येद्दिनशिष्यति पार्थिवः ॥३
दानं विनापहरणं ब्राह्मणानां तपस्विनाम् ।
शतायुषोऽर्जुनादन्यः कोऽन्विच्छति जिजीविषुः ॥४
इत्युक्तस्तेन संक्रुद्धः स मंत्री कालचोदितः ।
बद्ध्वा तां गां दृढैः पाशैर्विचकर्ष बलान्वितः ॥५
जमदग्निरथ क्रोधाद्भाविकर्मप्रचोदितः ।
रुरोधं तं यथाशक्ति विकर्षंतं पयस्विनीम् ॥६
जीवन्न प्रतिमोक्ष्यामि गामेनामित्यमर्षितः ।
जग्राह सुदृढं कंठे बाहुभ्यां तां महामुनिः ॥७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—पुनः जमदग्नि मुनि ने क्रोध से समन्वित होते हुए उससे कहा था—एक ज्ञानी पुरुष के द्वारा ब्रह्मस्व का कभी भी अपहरण नहीं करना चाहिए ।१। हे दुष्टमति वाले ! बलात् मुझ से मेरी गौ का हरण करके तू महान् पाप को प्राप्त हो जायगा । यदि तू ऐसा ही करेगा तो मैं जानता हूँ कि आयु को परिक्षीण कर रहा है।२। बल पूर्वक जो इसको लेने की इच्छा कर रहा है वह किसी भी रीति से नहीं किया जा सकेगा । यदि यही करेगा तो तू स्वयं ही सायुज्य को प्राप्त हो जायगा अथवा तेरा राजा विनष्ट हो जायगा ।३। विना दान के तपस्वी ब्राह्मणों की वस्तु का बल से छीन लेना शतायु कार्त्तवीर्यार्जुन के सिवाय अन्य कौन जीवित रहने की इच्छा वाला चाहता है अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं चाहा करता है। वह तेरा राजा ही है जो ऐसा करना चाहता है ।४। इस तरह से जब

२२२ । [ ब्रह्माण्ड पुराण

मुनि के द्वारा उस मन्त्री से कहा गया था तो वह मन्त्री काल से प्रेरित होकर उस दुष्कर्म में प्रवृत्त हो गया था और बल (सेना) से समन्वित उस मन्त्री ने परम सुदृढ़ पाशों से उस होम धेनु को बाँध करके अपने साथ ले जाने के लिये खींचा था ।५। इसके अनन्तर क्रोध से भविष्य में होने वाले कर्म से प्रेरित होते हुए जमदग्नि ने गौ के खींचते हुए उस मन्त्री को अपनी शक्ति को भरपूर लगाकर जैसी शक्ति उनमें थी उसी के अनुसार रोका था ।६। उन्होंने कहा था कि मैं अपने जीते जी इस धेनु को नहीं छोड़ूँगा। यह कहते हुए उनको बड़ा क्रोध उत्पन्न हो गया और उस महामुनि ने बड़ी दृढ़ता के साथ अपनी दोनों बाहुओं को उस धेनु क कण्ठ में डालकर उसको बलपूर्वक पकड़ लिया था ।७।

ततः क्रोधपरीतात्मा चन्द्रगुप्तोऽतिनिर्घृणः ।
उत्सारयध्वमित्येनमादिदेश स्वसैनिकान् ॥८
अप्रधृष्यतमं लोके तमृषिं राजकिंकराः ।
भर्त्राज्ञया प्रहृत्यैनं परिवव्रुः समंततः ॥६
दंडै कशाभिर्लगुडैर्वनिघ्नंतश्च मुष्टिभिः ।
ते समुत्सारयन् धेनोः सुदूरतरमंतिकात् ॥१०
स तथा हन्यमानोऽपि व्यथितः क्षमयान्वितः ।
न चुक्रोधाक्रोधनत्वं सतो हि परमं धनम् ॥११
स च शक्तः स्वतपसा संहर्तुमपि रक्षितुम् ।
जगत्सर्वं क्षयं तस्य चिन्तयन्न प्रचुक्रुधे ॥१२
स पूर्वं क्रोधनोऽत्यर्थं मातुरर्थे प्रसादितः ।
रामेणाभूत्ततो नित्यं शांत एव महातपाः ॥१३
स हन्यमानः सुभृशं चूर्णितांगास्थिबंधनः ।
निपपात महातेजा धरण्यां गतचेतनः ॥१४

इसके अनन्तर क्रोध से परीत आत्मा वाले उस अत्यन्त नीच चन्द्रगुप्त ने अपने सैनिकों को आज्ञा दे दी थी कि इस मुनि को बल पूर्वक हटा दो ।८। वह मुनि इस लोक में ऐसे थे कि कोई भी उनको प्रधर्षित नहीं कर सकता था तथापि राजा के किंकरों ने उस ऋषि को अपने स्वामी की आज्ञा

जमदग्नि-वध ] [ २२३

से बलपूर्वक चारों ओर से उसको घेर लिया था। सैनिकों ने सेतु के समीप से बहुत दूर तक उस ऋषि को हटाते हुए उस पर दण्डों से—कशाओं से—लाठियों से—और घूँसों से पीट रहे थे ॥९-१०॥ वह ऋषि इस तरह से पीटे और मारे जाने पर भी बहुत व्यथित होकर क्रोध से संयुत तो हो गया भी उसने विशेष क्रोध का भाव प्रकट नहीं किया था क्योंकि वे यह भी जानते थे कि क्रोध का न करना सत्पुरुष का परम धन होता है ॥११॥ वह मुनिवर अपने तप के प्रभाव से शत्रु का संहार करने के लिए और अपनी रक्षा करने में भी परम समर्थ थे किन्तु यह सम्पूर्ण जगत् का क्षय है यही विचारते हुए उन्होंने विशेष क्रोध नहीं किया था ॥१२॥ वह पूर्वकाल में अत्यधिक क्रोध करने वाले थे किन्तु राम ने अपनी माता के लिए उनको प्रसादित किया था। तभी से फिर वे महान तपस्वी नित्य राम शान्त हो गये थे ॥१३॥ वे मुनि बहुत ही अधिक मारे पीटे गये थे उस मार के प्रहारों से उनकी मज्जू की अस्थियों के बन्धन सब चूर्णित हो गये थे। और फिर वह महान् तेज वाले मुनि चेतना शून्य होकर भूमि में गिर गये थे ॥१४॥

तस्मिन्मुनौ निपतिते स दुरात्मा विशंकितः ।
किंकरानादिशच्छीघ्रं धेनोरानयने बलात् ॥१५
ततः सवत्सां तां धेनुं बद्ध्वा पाशैर्दृढैर्नृपाः ।
कशाभिरभिहन्यंत चक्रुषुश्च निनीषया ॥१६
आकृष्यमाणा बहुभिः कशाभिर्लगुडैरपि ।
हन्यमाना भृशं तैश्च चुक्रुधे च पयस्विनी ॥१७
व्यथितातिकशापातैः क्रोधेन महतान्विता ।
आकृष्य पाशान् सुदृढान् कृत्वाऽऽत्मानममोचयत् ॥१८
विमुक्तपाशबंधा सा सर्वतोऽभिवृता बलैः ।
हुंकारवं प्रकुर्वाणा सर्वतोऽह्यपतद्रुषा ॥१९
विषाणखुरपुच्छाग्रैरभिहत्य समंततः ।
राजमंत्रिबलं सर्वं व्यद्रावयदमर्षिता ॥२०
विद्राव्य किंकरान्सर्वास्तरसैव पयस्विनी ।
पश्यतां सर्वभूतानां गगनं प्रत्यपद्यत ॥२१

२२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विशेष शंका से युक्त उस दुष्ट आत्मा वाले ने उस महामुनि के धरणी पर गिर जाने पर अपने किंकरों को आदेश दिया था कि बल पूर्वक बहुत ही शीघ्र उस धेनु का आनयन करें अर्थात् उसको ले जावें ।१५। इसके पश्चात् हे नृप ! वत्स के सहित उस धेनु को परम सुदृढ़ पाशों से बाँधकर चाबुकों के प्रहारों से उसको पीटते हुए ले जाने की इच्छा से वे किंकर उसे खींच रहे थे ।१६। जब बहुत से किंकरगणों के द्वारा वह खींची जा रही थी तथा चाबुकों से और लाठियों से मारी-पीटी जा रही थी तो वह तपस्विनी उनसे बहुत ही क्रोध में भर गयी थी ।१७। अत्यधिक चाबुकों के प्रहार उस पर हुए थे तो वह धेनु बहुत व्यथित हो गयी थी और महान क्रोध से भी समन्वित हो गयी थी फिर उस धेनु ने उस सुदृढ़ पाशों को खींचकर अपने आपको उन से छुड़वा लिया था ।१८। जब पाशों के बन्धन से वह विमुक्त हो गयी थी तो सैनिकों ने सब ओर से घेर लिया था। उस समय में क्रोध से हुंहा की ध्वनि करते हुई वह सभी ओर आक्रमण करने वाली हो गयी थी ।१६। फिर अत्यन्त अमर्षित होकर उसने अपने सभी ओर में विषाण-खुर और पूँछ के अग्रभाग से सम्पूर्ण राजा के मन्त्री की सेना को वहाँ से दूर खदेड़ दिया था ।२०। वह पयस्विनी समस्त किंकरों को वहाँ से दूर भगा कर सबके देखते हुए बड़े ही वेग से अन्तरिक्ष में चली गयी थी ।२१।

ततस्ते भग्नसंकल्पाः संभग्नक्षतविग्रहाः । प्रसह्य बद्ध्वा तद्वत्सं जग्मुरेवातिनिर्घृणाः ।।२२।। पयस्विनीं विना वत्सं गृहीत्वा किंकरैः सह । स पापस्तरसा राज्ञः सन्निधिं समुपागमत् ।।२३।। गत्वा समीपं नृपतेः प्रणम्यास्मै प्रशंसकृत् । तद्वृत्तांतमशेषेण व्याचचक्षे ससाध्वसः ।।२४।।

इसके अनन्तर वे सब अपने संकल्पों के भग्न हो जाने वाले हो गये थे और उनके सबके शरीर क्षतों से प्रभग्न हो गये थे। वे अत्यन्त जघन्य बलपूर्वक उस धेनु के वत्स को ही बाँधकर वहाँ से चले गये थे ।२२। फिर वह पापात्मा बिना पयस्विनी के उसके वत्स का ग्रहण करके अपने सेवकों के साथ राजा के समीप में समागत हो गया था ।२३। राजा के समीप में गमन करके प्रशंसा करने वाले उसने राजा को प्रणाम किया था और भय से भीत उसने वहाँ का सम्पूर्ण वृत्तान्त राजा के समक्ष में वर्णित किया था ।२४।

—x—

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २२५

॥ परशुराम की प्रतिज्ञा ॥

वसिष्ठ उवाच—
श्रुत्वैतत्सकलं राजा जमदग्निवधादिकम् ।
उद्विग्नचेताः सुभृशं चिन्तयामास नैकधा ॥१॥
अहो मे सुनृशंसस्य लोकयोरुभयोरपि ।
ब्रह्मस्वहरणे वाञ्छा तद्धत्या चातिगर्हिता ॥२॥
अहो नाश्रौषमस्याहं ब्राह्मणस्य विजानतः ।
वचनं तर्हि तां जह्यां विमूढात्मा गतत्रपः ॥३
इति संचितयन्नेव हृदयेन विदूयता ।
स्वपुरं प्रतिचक्राम सबलः साधुगस्ततः ॥४
पुरीं प्रतिगते राज्ञि तस्मिन्सपरिवारके ।
आश्रमात्सहसा राजन्विनिश्चक्राम रेणुका ॥५
अथ सक्षतसर्वाङ्गं रुधिरेण परिप्लुतम् ।
निश्चेष्टं पतितं भूमौ ददर्श पतिमात्मनः ॥६
ततः सा विहृतं मत्वा भर्त्तारं गतचेतनम् ।
अन्वाहतेवाशनिना मूर्च्छिता न्यपतद्भुवि ॥७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—राजा कीर्त्तवीर्य यह सम्पूर्ण जमदग्नि मुनि के वध आदि का वृत्तान्त श्रवण करके बहुत ही अधिक उद्विग्न चित्त वाला हो गया था और वह अनेक प्रकार की बातों के विषय में चिन्तन करने लग गया था ।१। अहो ! मैं दोनों ही लोकों में बहुत अधिक क्रूर हो गया हूँ क्योंकि मैंने ब्रह्मस्व के अपहरण करने में अपनी इच्छा की थी और अतीव गर्हित उस मुनि की हत्या का पाप भी मुझे लग गया है ।२। अहो ! मैंने उस ज्ञाता पुरोहित विप्र की बात को नहीं सुना था अर्थात् उसके कथन का पालन नहीं किया था । विमूढ़ आत्मा वाले निर्लज्ज मैंने उसकी वाणी का त्याग कर दिया था ।३। यही सोचते हुए बहुत ही दुखित हृदय से वह अपनी सेना और अनुगामियों के ही सहित अपने पुर की ओर चल दिया था ।४। उस राजा के पुरी की ओर चले जाने पर जो कि अपने समस्त परिकर के

२२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

साथ था, हे राजन् ! रेणुका सहसा अपने आश्रम से निकली थी ।५। इसके पश्चात उस रेणुका ऋषि पत्नी ने सम्पूर्ण अंगों में क्षतों वाले-रुधिर से लथ-पथ-चेष्टा से रहित अर्थात् बेहोश और भूमि पर पड़े हुए अपने पति को देखा था ।६। इसके अनन्तर उस रेणुका अपने भर्त्ता को चेतना से शून्य निहत (मृत) मानकर वज्राघात से चोट खाई हुई के समान मूच्छित होकर भूमि पर गिर गयी ।७।

चिरादिव पुनर्भूमॆरुत्थायातीव दुःखिता ।
पतित्वोत्थाय सा भूयः सुस्वरं प्ररुरोद ह ॥८
विललाप च सात्यर्थं धरणीधूलिधूसरा ।
अश्रुपूर्णमुखी दीना पतिता शोकसागरे ॥९
हा नाथ प्रिय धर्मज्ञ दाक्षिण्यामृतसागर ।
हा धिगत्यंतशांतं त्वं नैव कांश्चेत चेदृशम् ॥१०
आश्रमादभिनिष्क्रांतः सहसा व्यसनार्णवे ।
क्षिप्तवानाथामगाधे मां क्व च यातोऽसि मानद ॥११
सतां साप्तपदे मैत्रे मुषिताऽहं त्वया सह ।
यासि यत्र त्वमेकाकी तत्र मां नेतुमर्हसि ॥१२
दृष्ट्वा त्वामीदृशावस्थमचिराद्धृदयं मम ।
न दीर्यते महाभाग कठिनाः खलु योषितः ॥१३
इत्येवं विलपंती सा रुदती च मुहुर्मुहुः ।
चुक्रोश रामरामेति भृशं दुःखपरिप्लुता ॥१४

बहुत देर में फिर भूमि से उठकर वह अत्यन्त दुःखित हुई थी और बारम्बार भूमि में उठकर और फिर पछाड़ खाकर गिरती हुई ऊँचे स्वर से उसने रुदन किया था ।८। धरणी की धूल से धूसर होती हुई उसने बहुत ही अधिक विलाप किया था । उसका मुख झर-झर गिरते हुए आंसुओं से संयुक्त और परम दीन होकर शोक के महान् सागर में निमग्न हो गयी थी ।९। उसने अपने करुण क्रन्दन में कहा था हा नाथ ! आप तो मेरे परमप्रिय थे और आप धर्म के पूर्ण ज्ञाता थे । हे स्वामिन् ! आप दाक्षिण्य रूपी अमृत के महान् सागर थे । हा ! मुझे धिकार है आप तो अत्यन्त शान्त स्वरूप

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २२७

वाले थे किन्तु इस प्रकार से आपने कभी भी काङ्क्षा नहीं की थी। १०। हे मान प्रदान करने वाले ! अभी-अभी तो आप अपने आश्रम से निकले थे। तुरन्त ही अनाथ मुझको दुःखों के महान् घोर सागर में पटककर आप कहाँ पर चले गये हैं। ११। सत्पुरुषों की सप्तपदी की मित्रता में मुझे अपने ग्रहण किया था अब मैं आपसे उस सप्तपदी के विपरीत मुषित हो रही हूँ कि आपका सहवास मेरा छूट रहा है। जहाँ पर भी आप अकेले जा रहे हैं वहीं पर मुझको भी अपने ही साथ में ले जाने के योग्य आप हैं। १२। आपको ऐसी मूच्छित एवं मृत दशा में पतित हुओं को देखकर भी तुरन्त ही मेरा हृदय विदीर्ण नहीं हो रहा है—यह क्या बात है। निश्चय ही स्त्रियों का हृदय बहुत ही निष्ठुर होता है। १३। इस प्रकार से महान् घोर विलाप करती हुई और बार-बार क्रन्दन करती हुई हे राम ! हे राम ! यह कहकर अत्यन्त दुःख में परिप्लुत होकर रुदन कर रही थी। १४।

तावद्रामोऽपि स वनात्समिद्भारसमन्वितः । अकृतव्रणसंयुक्तः स्वाश्रमाय न्यवर्त्तत ॥१५ अपश्यद्भयशंसीनि निमित्तानि बहूनि सः । पश्यन्नुद्विग्नहृदयस्तूर्णं प्रापाश्रमं विभुः ॥१६ तमायांतमभिप्रेक्ष्य रुदती सा भृशातुरा । नवीभूतेव शोकेन प्रारुदद्रेणुका पुनः ॥१७ रामस्य पुरतो राजन्भर्तृव्यसनपीडिता । उभाभ्यामपि हस्ताभ्यामुदरं समताडयत् ॥१८ मार्गे विदितवृत्तांतः सम्यग्रामोऽपि मातरम् । कुररीमिव शोकार्त्तां दृष्ट्वा दुःखमुपेयिवान् ॥१९ धैर्यमारोप्य मेधावी दुःखशोकपरिप्लुतः । नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां तस्थौ भूमावधोमुखः ॥२० तं तथागतमालोक्य रामं प्राहाकृतव्रणः । किमिदं भृगुशार्दूल नैतत्त्वय्युपपद्यते ॥२१

तब तक वह राम समिधाओं के भार का वहन करते हुए अकृत व्रण के सहित वन से अपने आश्रम के लिए वापिस आया था । १५। मार्ग में उस

२२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

राम ने किसी आने वाले भय की सूचना देने वाले बहुत से अशकुनों को देखा था और उनको देखते हुए उसका हृदय अधिक उद्विग्न हो रहा था । फिर वह अपने आश्रम में पहुँचा था ।१६। उस अपने पुत्र राम को आते हुए देखकर वह रेणुका अत्यन्त आतुर होकर रुदन करने लगी तथा उसका वह शोक नया सा हो गया था और फिर वह दाढ़ मारकर रुदन कर रही थी ।१७। हे राजन् ! अपने पुत्र राम के सामने अपने भर्त्ता के वियोग जन्म दुःख से बहुत ही उत्पीड़ित होकर उसने दोनों करों से अपने वक्ष-स्थल को भली भाँति ताड़ित किया था ।१८। राम ने भी आते हुए मार्ग में ही यह सब वृत्तान्त जान लिया था और जब उसने अपनी जननी को शोक से अधिक आर्त्त होकर कुररी के समान विलाप-कलाप करती हुई देखा था तो उसको बड़ा ही दुःख प्राप्त हुआ था ।१९। राम बहुत ही मेधा सम्पन्न थे उन्होंने धैर्य का सहारा लिया था जो कि उस समय में दुःख और शोक में निमग्न था । उसके दोनों नेत्रों में आँसू भरे हुए थे । वह भूमि पर ही नीचे की ओर मुख करके स्थित हो गया था ।२०। उस समय में अकृत व्रण ने राम को उस प्रकार की अवस्था में अवस्थित देखकर राम से कहा था—हे भृगुकुल में शार्दूल के सदृश पुरुष ! यह क्या हो रहा है ? ऐसा शोक मग्न हो जाना आपके लिए उचित प्रतीत नहीं हो रहा है ।२१।

न त्वादृशा महाभाग भृशं शोचंति कुत्रचित् । धृतिमंतो महांस्तु दुःखं कुर्वंति न व्यये ॥२२

शोकः सर्वेन्द्रियाणां हि परिशोषप्रदायकः । त्यज शोकं महाबाहो न तत्पात्रं भवादृशाः ॥२३

ऐहिकामुष्मिकार्थानां नूनमेकांतरोधकः । शोकस्तस्यावकाशं त्वं कथं हृदि नियच्छसि ॥२४

तत्त्वं धैर्यधनो भूत्वा परिसांत्वय मातरम् । रुदतीं बत वैधव्यशंकापहृतचेतनाम् ॥२५

नैवागमनमस्तीह व्यतिक्रांतस्य वस्तुनः । तस्मादतीतमखिलं त्यक्त्वा कृत्यं विचिंतय ॥२६

इत्येवं सांत्वमानश्च तेन दुःखसमन्वितः । रामः संस्तंभयामास शनैरात्मानमात्मना ॥२७

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २२६

दुःखशोकपरीता हि रेणुका त्वरुदन्मुहुः । त्रिःसप्तकृत्वो हस्ताभ्यामुदरं समताडयत् ॥२८

हे महाभाग ! आपके समान परम धीर और ज्ञान सम्पन्न पुरुष किसी भी दशा में अत्यधिक शोक नहीं किया करते हैं। जो धैर्यशाली महान् पुरुष हुआ करते हैं वे हानि होने पर बहुत दुःख नहीं किया करते हैं।२२। यह शोक बहुत ही बुरा होता है जो कि समस्त इन्द्रियों का परिपोषण करने वाला है। हे महाबाहो ! अब आप इस शोक का परित्याग कर दीजिए। आपके समान पुरुष शोक करने के पात्र नहीं हुआ करते हैं।२३। शोक तो निश्चय ही लौकिक और परमार्थिक प्रयोजनों का एकान्त अवरोधक होता है फिर आप अपने हृदय में ऐसे दुःखद शोक को अवकाश क्यों दे रहे हैं ? ।२४। इस कारण से अब आप धैर्य के धन वाले होकर अर्थात् धीरज धारण करके रुदन करती हुई और विधवा होने की विभीषिका से बुद्धि हीन होकर पड़ी हुई अपनी माता को परि सान्त्वना दीजिए ।२५। इस संसार में जो भी वस्तु अतिक्रान्त हो गई है अर्थात् जो प्राणी देह का त्याग कर चल बसा है उसका फिर यहाँ उसी रूप में आगमन कभी भी नहीं होता है। इस कारण से जो कुछ भी व्यतीत हो गया है उस सबका त्याग करके आगे जो भी करने योग्य कृत्य हैं उनका ही परिचिन्तन आप करिए ।२६। इस रीति से उसके द्वारा सान्त्वना दिये हुए राम ने परम दुःख से समन्वित होते हुए भी धीरे-धीरे अपनी ही आत्मा से अर्थात् अपने ही आत्म ज्ञान से अपने आपको संस्तम्भित दिया था ।२७। रेणुका तो महान् और परम घोर शोक से घिरी हुई होकर बारम्बार रुदन कर रही थी और उसने अपने दोनों करों से इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को प्रताड़ित किया था ।२८।

तावत्तदंतिकं रामः समभ्येत्याश्रुलोचनः । रुदतीमलम्बेति सांत्वयामास मातरम् ॥२६

उवाचापनयन्दुःखाद्भर्तृशोकपरायणाम् । त्रिःसप्तकृत्वो यदिदं त्वया वक्षः समाहतम् ॥३०

तावत्संख्यमहं तस्मात्क्षत्रजातमशेषतः। हनिष्ये भुवि सर्वत्र सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥३१

तस्मात्त्वं शोकमुत्सृज्य धैर्यमातिष्ठ सांप्रतम् । नास्त्येव नूनमायातमतिक्रांतस्य वस्तुनः ॥३२

२३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

इत्युक्ता रेणुका तेन भृशं दुःखान्विताऽपि सा । कृच्छ्राद्धैर्यं समालंब्य तथेति प्रत्यभाषत ॥३३ ततो रामो महाबाहुः पितुः सह सहोदरैः । अग्नौ सत्कर्तु मारेभे देहं राजन्यथाविधि ॥३४ भर्तृ शोकपरीतांगी रेणुकापि दृढव्रता । पुत्रान्सर्वान्समाहूय त्विदं वचनमब्रवीत् ॥३५

इसी बीच में राम ने अपनी जननी के समीप में समुपस्थित होकर अपनी आँखों में भरे हुए अश्रुओं से समन्वित होते हुए रुदन करने वाली रेणुका से कहा था कि धीरज धारण करो—इस तरह से अपनी माता को सान्त्वना दी थी ।२६। अपने स्वामी के वियोग जन्य शोक में डूबी हुई उस माता रेणुका के दुःख को दूर करते हुए उस राम ने कहा था कि आपने जो यह इस समय में इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को प्रताड़ित किया है ।३०। उतनी ही बार संख्या में मैं इस कारण से इस भूमण्डल में सर्वत्र क्षत्रिय जाति का पूर्णरूप से हनन करूँगा—यह मैं आपके समक्ष में पूर्णतया सत्य बोल रहा हूँ अर्थात् इस कार्य में लेशमात्र भी त्रुटि नहीं होगी ।३१। इसलिए अब आप इस शोक का परित्याग करके अपने हृदय में धैर्य धारण कीजिए । यह तो निश्चित बात है कि जो वस्तु यहाँ से चली गयी है उसका पुनः यहाँ पर आगमन नहीं होता है अर्थात् मृत प्राणी फिर कितना ही चाहे शोक-दुःख किया जावे वापिस नहीं आया करता है । अतः फिर इतना अधिक शोक करना व्यर्थ ही है ।३२। उस राम के द्वारा इस प्रकार से समझाई हुई रेणुका असह्य दुःख के भार से समन्वित थी तथापि बड़ी कठिनाई से धैर्य धारण किया था और अब विशेष शोक मैं नहीं करूंगी—अपने पुत्र राम को उत्तर दिया था ।३३। हे राजन् ! इसके उपरान्त राम ने अपने सहोदर भाइयों के साथ विधि पूर्वक अपने पिता के देह को अग्नि में दाह करने के कार्य का आरम्भ किया था ।३४। अपने भर्त्ता के वियोग से समुत्पन्न शोक से परीत अङ्गों वाली तथा परम सुदृढ़ पतिव्रत धर्म से युक्त रेणुका ने भी अपने समस्त पुत्रों को बुलाकर उनसे यह वचन कहा था ।३५।

रेणुकोवाच—अहं वः पितरं पुत्राः स्वर्गंतं पुण्यशीलिनम् । अनुगंतुमिहेच्छामि तन्मेऽनुज्ञातुमर्हथ ॥३६

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३१

असह्यदुःखं वैधव्यं सहमाना कथं पुनः । भर्त्रा विरहिता तेन प्रवर्त्तिष्ये विनिन्दिता ॥३७ तस्मादनुगमिष्यामि भर्त्तारं दयितुं मम । यथा तेन प्रवर्त्तिष्ये परत्रापि सहानिशम् ॥३८ ज्वलंतमिममेवाग्निं संप्रविश्य चिरादिव । भर्तुर्मम भविष्यामि पितृलोकप्रियातिथिः ॥३६ अनुवादमृते पुत्रा भवद्भिस्तत्र कर्मणि । प्रतिभूय न वक्तव्यं यदि मत्प्रियमिच्छथ ॥४० इत्येवमुक्त्वा वचनं रेणुका दृढनिश्चया । अग्निं प्रविश्य भर्त्तारमनुगंतुं मनो दधे ॥४१ एतस्मिन्नेव काले तु रेणुकां तनयैः सह । समाभाष्याऽतिगंभीरा वागुवाचाशरीरिणी ॥४२

रेणुका ने कहा—हे पुत्रो ! मैं अब आप लोगों के परमाधिक पुण्य शील स्वर्ग में गये हुए पिता का ही मैं अनुगमन यहाँ करना चाहती हूँ सो आप लोग सब मुझे ऐसा करने की आज्ञा देने के लिए योग्य होते हो ।३६। विधवा हो जाने का दुःख बहुत ही असह्य होता है उसे सहन करती हुई मैं कैसे-कैसे रहूँगी और अपने स्वामी के विरह वाली विशेष रूप से निन्दित होकर इस संसार में अपना जीवन प्रवृत्त करूँगी ।३७। इस कारण से मैं अपने परम प्रिय स्वामी का अनुगमन करूँगी अर्थात् उनके ही देह के साथ सती हो जाऊँगी जिससे परलोक में भी निरन्तर उनके ही साथ रह सकूँगी ।३८। जलती हुई इसी अग्नि में प्रवेश करके कुछ ही समय में मैं अपने स्वामी की पितृलोक में प्रिय अतिथि बन जाऊँगी ।३६। हे पुत्रो ! यदि आप लोग मेरे अभीप्सित चाहते हैं अर्थात् मेरे प्यारे बनना चाहते हैं तो अनुवाद के बिना उस कर्म में आप लोगों को प्रतिकूल होकर कुछ भी नहीं बोलना चाहिए ।४०। इस रीति से इन वचनों को ही कहकर रेणुका सुदृढ़ निश्चय वाली हो गयी थी तथा अग्नि में प्रवेश करके अपने स्वामी का अनुगमन करने के लिये उसने मन में ठान ली थी ।४१। इसी काल में पुत्रों के सहित रेणुका को सम्बोधित करके अत्यन्त गम्भीर बिना शरीर वाणी अर्थात् अन्तरिक्ष में कही हुई वाणी ने कहा था ।४२।

२३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

हे रेणुके स्वतनयैर्गिरं मेऽवहिता शृणु ।
मा कार्षीः साहसं भद्रे प्रवक्ष्यामि प्रियं तव ॥४३
साहसो नैव कर्त्तव्यः केनाप्यात्महितैषिणा ।
न मर्त्तव्यं त्वया सर्वो जीवन्भद्राणि पश्यति ॥४४
तस्माद्धैर्यधना भूत्वा भव त्वं कालकांक्षिणी ।
निमित्तमन्तरीकृत्य किंचिदेव शुचिस्मिते ॥४५
अचिरेणैव भर्त्ता ते भविष्यति सचेतनः ।
उत्पन्नजीवितेन त्वं कामं प्राप्स्यसि शोभने ।
भवित्री चिररात्राय बहुकल्याणभाजनम् ॥४६
वसिष्ठ उवाच-
इति तद्वचनं श्रुत्वा धृतिमालंब्य रेणुका ।
तद्वाक्यगौरवाद्धर्षमवापुस्तनयाश्च ते ॥४७
ततो नीत्वा पितुर्देहमाश्रमाभ्यंतरं मुनेः ।
शाययित्वा निवाते तु परितः समुपाविशन् ॥४८
तेषां तत्रोपविष्टनामप्रहृष्टात्मचेतसाम् ।
निमित्तानि शुभान्यासन्ननेकानि महांति च ॥४९

हे रेणुके ! परम सावधान होकर अपने पुत्रों के सहित मेरी वाणी का श्रवण करो । हे भद्रे ! तुम साहस मत करो । मैं आपका प्रिय वचन कहूँगा ।४३। अपनी आत्मा के हित की अभिलाषा रखने वाले किसी को भी साहस कभी नहीं करना चाहिए । आपको नहीं मरना चाहिए क्योंकि जो प्राणी जीवित रहता है वह शुभ कर्मों को देखा करता है ।४४। इसलिए आप धैर्य के धन वाली होकर काल की प्रतीक्षा की आकाङ्क्षा वाली होओ । हे शुचि स्मित वाली ! भले ही कुछ ही निमित्त को अन्तरित बनाकर ऐसा करो ।४५। बहुत ही स्वल्प समय में आपके भर्त्ता सचेतन हो जायेंगे अर्थात् जीवित हो जायेंगे । हे शोभने ! जब उनमें जीवन समुत्पन्न हो जायगा तो आपकी कामना पूर्णतया प्राप्त हो जायगी और फिर विशेष अधिक काल पर्यन्त अनेक कल्याणों की भाजन होने वाली होंगी ।४६। वसिष्ठ जी ने कहा- इस प्रकार के उस अन्तरिक्ष वाणी के वचन का श्रवण करके रेणुका ने धैर्य

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३३

का आलम्बन ग्रहण किया था। और उसके जो पुत्र थे उन्होंने भी उसके वचनों के गौरव से परम प्रसन्नता प्राप्त की थी ।४७। इसके पश्चात् उन्होंने उस मुनि अपने पिता के मृत शरीर को आश्रम को भीतर ले जाकर रख दिया था और उसको वहाँ लिटाकर निवात में वे उसके चारों ओर बैठ गये थे ।४८। जिस समय में वे वहाँ पर बहुत ही खिन्न आत्मा और मनों वाले बैठे हुए थे तो उस बेला में उनको बहुत से परम शुभ एवं महान् निमित्त हुए थे। अच्छे शकुन दिखाई दिये थे ।४६।

तेन ते किंचिदाश्वस्तचेतसो मुनिपुंगवाः ।
निषेदुः सहिता मात्रा कांक्षंतो जीवितं पितुः ॥५०
एतस्मिन्नंतरे राजन्भृगुवंशधरो मुनिः ।
विधेर्बलेन मतिमांस्तत्रागच्छद्यदृच्छया ॥५१
अथर्वणां विधिः साक्षाद्वेदवेदांगपारगः ।
सर्वशास्त्रार्थवित्प्राज्ञः सकलासुरवंदितः ॥५२
मृतसंजीवनीं विद्यां यो वेद मुनिदुर्लभाम् ।
यथाहतान्मृतान्देबैरूत्थापयति दानवान् ॥५३
शास्त्रमौशनसं येन राज्ञां राज्यफलप्रदम् ।
प्रणीतमनुजीवंति सर्वेऽद्यापीह पार्थिवाः ॥५४
स तदाश्रममासाद्य प्रविष्टोऽन्तमहामुनिः ।
ददर्श तदवस्थांस्तान्सर्वान्दुःखपरिप्लुतान् ॥५५
अथ ते तु भृगुं दृष्ट्वा वंशस्य पितरं मुदा ।
उत्थायास्मै ददुश्चापि सत्कृत्य परमासनम् ॥५६

इस रीति से जब शुभ शकुन दिखाई दिये तो उनके देखने से वे श्रेष्ठ मुनिगण परम आश्वस्त मन वाले हो गये थे अर्थात् उनको कुछ शुभाशा हुई थी। वे सभी अपने पिता के जीवित की आकाङ्क्षा करते हुए माता के साथ वहाँ पर बैठ गये थे ।५०। हे राजन् ! इसी बीच में भृगु के वंश को धारण करने वाले मतिमान् मुनि विधि के बल से यदृच्छा से ही वहाँ पर समागत हो गये थे ।५१। वे मुनि अथर्व वेद की साक्षात् विधि के स्वरूप वाले थे और अन्य सभी वेदों तथा वेदोंके अङ्ग शास्त्रों के पारगामी मनीषी

२३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

थे । वे समस्त शास्त्रों के पारगामी मनीषी थे । वे समस्त शास्त्रों के तात्त्विक अर्थों के ज्ञाता विद्वान् थे और समस्त असुरों के द्वारा वन्दित थे ।५२। जो मनियों के लिये भी अत्यन्त दुर्लभ होती है ऐसी मृत प्राणियों को भी जीवित कर देने वाली विद्या को जानते थे । जब भी देवों के द्वारा रण में दानव निकृत हो जाया करते हैं तो इसी मृत संजीवनी विद्या से उनको उठा दिया करते हैं अर्थात् जीवित बना देते हैं ।५३। जिस महामुनि ने औशनस शास्त्र को प्रणीत किया था जो राजाओं को राज्य के फल का प्रदान करने वाला है और आज भी यहाँ पर नृपगण अनुजीवित रहते हैं ।५४। वह महामुनि उस आश्रम में पहुँच कर अन्दर प्रविष्ट हुए थे और उन्होंने उस अवस्था में अवस्थित सबको दुःख से परिप्लुत हुए देखा था ।५५। इसके अनन्तर उन सबने वंश के पिता भृगु मुनि का दर्शन प्राप्त करके बड़े ही आनन्द के साथ वे सब खड़े हो गये थे और गोत्रोत्थान देकर सबने उनका बड़ा सत्कार किया था तथा प्रणाम करके भृगु मुनि को आसन समर्पित किया था ।५६।

स चाशीभिस्तु तान्सर्वांनभिनंद्य महामुनिः ।
पप्रच्छ किमिदं वृत्तं तत्सर्वं ते न्यवेदयन् ।।५७
तच्छ्रुत्वा स भृगुः शीघ्रं जलमादाय मंत्रवित् ।
संजीविन्या विद्यया तं सिषेच प्रोच्चरन्निदम् ।।५८
यज्ञस्य तपसो वीर्यं ममापि शुभमस्ति चेत् ।
तेनासौ जीवताञ्छीघ्रं प्रसुप्त इव चोत्थितः ।।५९
एवमुक्ते शुभे वाक्ये भृगुणा साधुकारिणा ।
समुत्तस्थावथार्चीकः साक्षाद्गुरुरिवापरः ।।६०
दृष्ट्वा तत्र स्थितं वंद्यं भृगुं स्वस्य पितामहम् ।
ननाम भक्त्या नृपते कृतांजलिरुवाच ह ।।६१

जमदग्निरुवाच–

धन्योऽयं कृतकृत्योऽहं सफलं जीवितं च मे ।।६२
यत्पश्ये चरणौ तेऽद्य सुरसुरनमस्कृतौ ।
भगवन्किं करोम्यद्य शुश्रूषां तव मानद ।।६३

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३५

उन महामुनि ने आशीर्वादों के द्वारा सबका अभिनन्दन करके उनसे उन्होंने पूछा था कि यह क्या हुआ है । इस पर उन्होंने पूरा वृत्तान्त जो भी वहाँ पर घटनाएँ घटित हुई थीं भृगुमुनि की सेवा में निवेदित कर दी थीं ।५७। यह सारा वृत्तान्त सुनकर मन्त्र शास्त्र के महामनीषी भृगु मुनि ने बहुत ही शीघ्र जल लेकर यह उच्चारण करते हुए संजीवनी विद्या से उस जमदग्नि के देह को अभिषिक्त किया था । यदि मेरे तप का और यज्ञ का वीर्य शुभ है तो उसके प्रभाव से यह जमदग्नि सोकर उठे हुए के ही समान शीघ्र ही जीवित हो जावें ।५८-५६। इस प्रकार से इस परम शुभ वाक्य को साधुकारी भृगु मुनि के द्वारा उच्चारित होने पर शीघ्र ही जमदग्नि साक्षात् दूसरे देवगुरु के ही सदृश समुत्थित हो गया था ।६०। जब उठा तो उसने वहाँ पर संस्थित-वन्दना करने के योग्य अपने पितामह भृगु मुनि का दर्शन किया था । हे नृपते ! उस जमदग्नि ने भक्ति की भावना से प्रणाम करके दोनों हाथों को जोड़कर उनसे कहा था ।६१। जमदग्नि ने कहा—मैं परम धन्य तथा कृतकृत्य हो गया हूँ और मेरा जीवन आज सफल हो गया है ।६२। जो सुरगण और असुरों के द्वारा वन्दित आपके चरण कमल हैं उनका आज मैं अपने नेत्रों से अवलोकन कर रहा हूँ । हे मान के प्रदान करने वाले भगवन् ! मैं आपकी इस समय में क्या शुश्रूषा करूँ ? मुझे आप आज्ञा कीजिए ।६३।

पुनीह्यास्मत्कुलं स्वस्य चरणांबुकणैर्विभो । इत्युक्त्वा सहसाऽऽनीतं रामेणार्घ्यं मुदान्वितः ॥६४ प्रददौ पादयोस्तस्य भक्त्यानमितकंधरः । तज्जलं शिरसाऽधत्त सुकुटुम्बो महामनाः ॥६५ अथ सत्कृत्य स भृगुं प्रपच्छ विनयान्वितः । भगवन् किं कृतं तेन राज्ञा दुष्टेन पातकम् ॥६६ यस्यातिथ्यं हि कृतवानहं सम्यग्विधानतः । साधुबुद्ध्या स दुष्टात्मा किं चकार महामते ॥६७ वसिष्ठ उवाच– एवं स पृष्टो मतिमान्भृगुः सर्वविदीश्वरः । चिरं ध्यात्वा समालोच्य कारणं प्राह भूपते ॥६८

२३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भृगुरुवाच-शृणु तात महाभाग बीजमस्य हि कर्मणः । यश्च वै कृतवान्पापं सर्वज्ञस्य तवानघ ॥६६ शप्तः पुरा वसिष्ठेन नाशार्थं स महीपतिः । द्विजापराधतो मूढ वीर्यं ते विनशिष्यते ॥७०

हे विभो ! आप अपने चरणों के जल कणों के द्वारा अपने ही इस कुल को पुनीत बनाइए । इतना कहकर आनन्द से समन्वित होते हुए सहसा राम के द्वारा अर्घ्य लाया था ।६४। भक्तिभाव से अपनी गर्दन झुकाने वाले उस जमदग्नि ने उन भृगु मुनि के चरणों के प्रक्षालनार्थ जल समर्पित किया था । महान् यश वाले उसे जमदग्नि ने अपने समस्त कुटुम्ब के सहित उस चरणों के तीर्थ जल को अपने शिर पर धारण किया था ।६५। इसके उपरान्त उनका पूर्ण सत्कार करके परम विनय से समन्वित होते हुए भृगु से पूछा था । हे भगवन् ! आप कृपया बतलाइए कि उस महान् दुष्ट राजा ने यह क्या पातक किया था ? ।६६। जिसका आतिथ्य-सत्कार मैंने बड़े ही विधि-विधान से किया था । हे महामते ! मैंने यह सब बहुत ही अच्छी बुद्धि से किया था और मेरे हृदय में कुछ भी कपट का भाव नहीं था । फिर भी उस आत्मा वाले ने मेरे साथ यह ऐसा क्यों दुर्व्यवहार किया था ।६७। वसिष्ठ जी ने कहा—इस प्रकार से जब जमदग्नि के द्वारा सब कुछ के ज्ञाता ईश्वर और महामतिमान् भृगु से पूछा गया तब हे भूपते ! भृगु मुनि ने बहुत काल पर्यन्त ध्यान करके भली भाँति अवलोकन किया था और फिर इस सब घटना के घटित होने का जो भी कुछ कारण था वह कहा था ।६८। भृगुमुनि ने कहा—हे महान् भाग वाले तात ! इस कुत्सित कर्म का जो भी बीज है उसी को आप सुन लीजिए । हे अनघ ! जिसने हैहय राजा ने सर्वज्ञ आपका निश्चित रूप से पाप किया था ।६९। बहुत प्राचीन समय में वसिष्ठ मुनि ने विनाश होने के लिये उस राजा को शाप दे दिया था । वह शाप वही था कि हे मूढ़ ! द्विज के अपराध करने से तेरा सब वीर्य विक्रम विनाश को प्राप्त हो जायगा ।७०।

तत्कथं वचनं तस्य भविष्यत्यन्यथा मुनेः । अयं रामो महावीर्यं प्रसह्य नृपपुंगवम् ॥७१ हनिष्यति महाबाहो प्रतिज्ञां कृतवान्पुरा । यस्मादुरः प्रतिहतं त्वया मातर्ममाग्रतः ॥७२

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३७

एकविंशतिवारं हि भृशं दुःखपरीतया । त्रिःसप्तकृत्वो निःक्षत्रां करिष्ये पृथिवीमिमाम् ॥७३ अतोऽयं वार्यमाणोऽपि त्वया पित्रा निरंतरम् । भाविनोऽर्थस्य च बलात्कारिष्यत्येव मानद ॥७४ स तु राजा महाभागो वृद्धानां पर्युपासिता । दत्तात्रेयाद्धरेरंशाल्लब्धबोधो महामतिः ॥७५ साक्षाद्भक्तो महात्मा च तद्वधे पातकं भवेत् । एवमुक्त्वा महाराज स भृगुर्ब्रह्मणः सुतः । यथागतं ययौ विद्वान्भविष्यत्कालपर्ययात् ॥७६

मुनि तो सर्वदा सत्यवक्ता होते हैं अतः उस महामुनि का वचन किस प्रकार से अन्यथा होगा । यह आपका पुत्र राम महान वीर्य वाले उस श्रेष्ठ नृप को बल पूर्वक मार देगा । हे महाबाहो ! यह पहिले ही ऐसी प्रतिज्ञा कर चुका है । कारण यह है कि वियोग के शोक से संतप्त होकर मेरे ही समक्ष से अपने वक्षःस्थल को प्रताड़ित किया है ।७१-७२। आपने अपने उरःस्थल को बहुत ही दुःख से परीत होकर इक्कीस बार प्रताड़ित किया है सो मैं भी इक्कीस बार ही इस सम्पूर्ण भूमण्डल को क्षत्रियों से रहित करूँगा ।७३। हे मानद ! इसीलिए पिता आपके द्वारा यह निरन्तर रोके जाने पर भी भविष्य में होने वाले अर्थ के बल से ऐसा अवश्य ही करेगा क्योंकि ऐसा ही होनहार है ।७४। यह साक्षात् भक्त और महात्मा है । उसके वध करने में पातक भी होगा । इस रीति से कहकर हे महाराज ! उन ब्रह्माजी के पुत्र भृगुमुनि ने फिर यह भी कहा था कि वह राजा महान भाग वाला है और वृद्धों की उपासना करने वाला है । साक्षात् भगवान् हरि के अंश दत्तात्रेय मुनि से उसने ज्ञान प्राप्त किया है और महती मति से सुसम्पन्न है । ऐसे का वध करना भी महान् पातक है । इतना ही कहकर भविष्य में आने वाले काल के पर्यत से ये विद्वान् भृगु जैसे ही आये थे वैसे ही वहाँ से चले गये ये ।७५-७६।

— x —

२३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

॥ परशुराम का शिवलोक गमन ॥

सगर उवाच- ब्रह्मपुत्र महाभाग वद भार्गवचेष्टितम् । यच्चकार महावीर्य्यो राज्ञः क्रुद्धो हि कर्मणा ॥१

वसिष्ठ उवाच- गते तस्मिन्महाभागे भृगौ पितृपरायणः । रामः प्रोवाच संक्रुद्धो मुञ्चञ्छ्वासान्मुहुर्मुहुः ॥२

परशुराम उवाच- अहो पश्यत मूढत्वं राज्ञो ह्युत्पथगामिनः । कार्त्तवीर्यस्य यो विद्वांश्चक्रे ब्रह्मवधोद्यमम् ॥३ दैवं हि बलवन्मन्ये यत्प्रभावाच्छरीरिणः । शुभं वाप्यशुभं सर्वे प्रकुर्वंति विमोहिताः ॥४ शृण्वंतु ऋषयः सर्वे प्रतिज्ञा क्रियते मया । कार्त्तवीर्यं निहत्याजौ पितुर्वैरं प्रसाधये ॥५ यदि राजा सुरैः सर्वैरिन्द्राद्यैर्दानवैस्तथा । रक्षिष्यते तथाप्येनं संहरिष्यामि नान्यथा ॥६ एवमुक्तं समाकर्ण्य रामेण सुमहात्मना । जमदग्निरुवाचेदं पुत्रं साहसभाषिणम् ॥७

राजा सगर ने कहा—हे महाभाग ! हे ब्रह्मपुत्र ! अब आप कृपा करके भार्गव के चेष्टित का वर्णन कीजिए । महान् वीर्य वाले राम ने राजा के इस कुत्सित कर्म से क्रुद्ध होकर जो भी कुछ किया था ।१। वसिष्ठ जी ने कहा—जब महाभाग भृगुमुनि वहाँ से चले गये थे तो उस समय में पिता के चरणों की सेवा में तत्पर रहने वाले राम ने बारम्बार अत्युष्ण श्वासों का मोचन करते हुए बहुत ही क्रुद्ध होकर कहा था ।२। परशुराम ने कहा—अहो ! उत्पथ के गमन करने वाले राजा की मूढ़ता को देखिए जिस कार्त्त-वीर्य ने परम विद्वान् होते हुए भी एक तपस्वी ब्राह्मण के वध करने का उद्यम किया था ।३। मैं यह बात मानता हूँ कि दैव बड़ा बलवान् होता है

ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा ] [ २३६

ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा

अथ राजनायिका श्रिता ज्वलितांकुशा फणिसमानपाशभृत् । कलनिक्कणद्वलयमैक्षवं धनुर्दधती प्रदीप्तकुसुमेषुपंचका ॥१

उदयत्सहस्रमहसा सहस्रतोऽप्यतिपाटलं निजवपुः प्रभाझरम् किरती दिशासु वदनस्य कांतिभिः सृजतीव चन्द्रमयमभ्रमंडलम् ॥२

दशयोजनायतिपता जगत्त्रयीमभिवृण्वता विशदमौक्तिकात्मना । धवलातपत्रवलयेन भासुरा शशिमंडलस्य सखितामुपेयुषा ॥३

अभिवीजिता च मणिकांतशोभिना विजयादिमुख्यपरिचारिकागणैः । नवचन्द्रिकालहरिकांतिकंदलीचतुरेण चामरचतुष्टयेन च ॥४

शक्त्यर्चकराज्यपदवीमभिसूचयन्ती साम्राज्य- चिह्नशतमंडितसैन्यदेशा । संगीतवाद्यरचनाभिरथामरीणां संस्तूयमानविभवा विशदप्रकाशा ॥५

वाचामगोचरमगोचरमेव बुद्धेरीदृक्तया न कलनीयमनन्यतुल्यम् ॥६

त्रैलोक्यगर्भपरिपूरितशक्तिचक्रसाम्राज्यसं- पदभिमानमभिस्पृशंती । आबद्धभक्तिविपुलांजलिशेखराणामारादहंप्रथमिका कृतसेवनानाम् ॥७

इसके अनन्तर वह राज नायिका वहाँ पर विराजमान थी जिसका अंकुश ज्वलित था और जो सर्प के ही तुल्य पाश को धारण करने वाली थी। मधुर क्वणन करने वाला वलय और इक्षु का धनुष धारण किये हुए थी। उसके बाण पाँच कुसुमों के थे ।१। उदित सूर्य के तेज से भी अत्यधिक

२४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जमदग्नि ने कहा—हे राम ! अब आप मेरी बात सुनिए। मैं सत्पुरुषों के सनातन (सर्वदा से चले आने वाले) धर्म को बतलाऊँगा। जिसकी सुनकर सभी मानव धर्म के करने वाले हो जाया करते हैं ।८। महान भाग्य वाले साधुजन होते हैं और जो इस संसार से निरन्तर जन्म-मरण के महान कष्ट से छुटकारा पाने की आकांक्षा रखने वाले हैं वे कभी भी किसी पर प्रकोप नहीं किया करते हैं चाहे कोई उनको प्रताड़ित अथवा निहत भी क्यों न करे तो भी वे कुपित नहीं हुआ करते हैं ।९। जो महाभाग क्षमा ही को धन मानने वाले हैं तथा परम दमनशील और तपस्वी होते हैं उन साधु कर्म करने वालों के लिए निरन्तर लोक अक्षय होते हैं ।१०। जो महापुरुष हैं वे दुष्टों के द्वारा दण्ड आदि से ताड़ित होते हुए और बुरे वचनों द्वारा निर्भत्सित होते हुए भी कभी मन में क्षोभ नहीं किया करते हैं वे ही पुरुष साधु कहे जाया करते हैं ।११। ताड़न करने वाले को जो ताड़ित किया करता है वह कभी भी साधु नहीं हो सकता है प्रत्युत पाप का भागी ही होता है। हम लोग तो ब्राह्मण और साधु हैं क्षमा रखने के ही द्वारा परम पूज्य पद को प्राप्त हुए हैं ।१२। सामान्यजन के वध से भी अधिक एक राजा के वध करने में महान् पातक होता है क्योंकि राजा में भगवान् का अंश होता है। इसी कारण से मैं अब आपको निवारित करता हूँ और यह उपदेश देता हूँ कि क्षमा को धारण करो तथा तपश्चर्या करो ।१३। वसिष्ठजी ने कहा—नृपनन्दन ! इस रीति से भली भाँति दिये हुए आदेश को समझ कर राम ने परमाधिक क्षमा के स्वभाव वाले और अरियों के दमन करने वाले अपने पिताजी से कहा ।१४।

परशुराम उवाच— शृणु तात महाप्राज्ञ विज्ञप्ति मम सांप्रतम् ।
भवता शम उद्दिष्टः साधूनां सुमहात्मनाम् ॥१५॥
स शमः साधुदीनेषु गुरुष्वीश्वरभावनः ।
कर्त्तव्यो दुष्टचेष्टेषु न शमः सुखदो भवेत् ॥१६॥
तस्मादस्य वधः कार्यः कार्त्तवीर्यस्य वै मया ।
देह्याज्ञां माननीयाद्य साधये वैरमात्मनः ॥१७॥

जमदग्निरुवाच— शृणु राम महाभाग वचो मम समाहितः ।