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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

परशुराम का शिवाराधन ] [ २५३

मया सह सुदुःखार्त्तान्भ्रातॄन्मात्रा सहैव मे । सान्त्वयित्वा स मंत्रज्ञोऽजीवयत्पितरं मम ॥४३ आनामते भृगौ मातुर्दुःखेनाहं प्रकोपितः । प्रतिज्ञां कृतवान्देव सांत्वयन्मातरं स्वकाम् ॥४४ त्रिःसप्तकृत्वो यदुरस्ताडितं मातुरात्मनः । तावत्संख्यमहं पृथ्वीं करिष्ये क्षत्रवर्जिताम् ॥४५ इत्येवं परिपूर्णा मे कर्त्ता देवो जगत्पतिः । महादेवो ह्यतो नाथ त्वत्सकाशमिहागतः ॥४६ वसिष्ठ उवाच-- इत्येवं तद्वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा दुर्गामुखं हरः । बभूवानम्रवदनश्चिन्तयानः क्षणं तदा ॥४७ एतस्मिन्नंतरे दुर्गा विस्मिता प्राहसद्भृशम् । उवाच च महाराज भार्गवं वैरसाधकम् ॥४८ तपस्विन्द्विजपुत्र क्षमां निर्मूलां कर्त्तुमिच्छसि । त्रिः सप्तकृत्वः कोपेन साहसस्ते महाम्बटो ॥४९

उस समय में मैं रुदन कर रहा था और अपनी माता के साथ मेरे सब भाई भी क्रन्दन कर रहे थे। उस मन्त्र शास्त्र के ज्ञाता मुनि ने सबको सान्त्वना देकर मेरे मृत पिता जमदग्नि को संजीवनी विद्या से जीवित कर दिया था।४३। जब तक भृगु मुनि वहाँ पर नहीं आये थे उस बीच में मैं माता के वैधव्य के दुःख से बहुत ही कुपित हो गया था। हे देव! मैंने अपनी माता को सान्त्वना देते हुए एक प्रतिज्ञा कर डाली थी।४४। मेरी माता ने करुण क्रन्दन करते हुई ने जो इक्कीस वार अपना उरःस्थल ताड़ित किया था उसी गणना को लेकर ही मैंने यह प्रतिज्ञा की थी कि इक्कीस वार ही मैं इस पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दूँगा।४५। यह इस रीति से की हुई मेरी प्रतिज्ञा परिपूर्ण हो जावे--इसके पूर्ण करने वाले जगत् के पति देवेश्वर आप ही हैं। आप तो सब से बड़े देव हैं। हे नाथ! इसीलिए मैं अब आपके चरणों की सन्निधि में यहाँ पर आया हूँ।४६। वसिष्ठजी ने कहा--भगवान् शंकर ने इस प्रकार से उस राम के वचनों का श्रवण करके जगज्जननी दुर्गा के मुख की ओर देखा था और उस समय में एक क्षण के लिए

२५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

नीचे को ओर अपना मुख करके चिन्तन करने वाले प्रभु शंकर हो गये थे ।४७। इसी अन्तर में जगदम्बा देवी दुर्गा विस्मित होती हुई अत्यधिक हँस गयी थीं। और हे महाराज ! बैर के साधक उस भार्गव राम से बोली ।४८। जगदम्बा ने कहा था कि हे तपस्विन् ! द्विज के पुत्र ! क्या तुम इस भूमण्डल को भूपों से विहीन करने की इच्छा कर रहे हो ? और वह भी एक-दो बार नहीं प्रत्युत कोप से इक्कीस बार ऐसा करना चाहते हो । हे बटो ! यह तो आपका एक बहुत ही महान साहस है ।४६।

हंतुमिच्छसि निःशस्त्रः सहस्रार्जुनमीश्वरम् । भ्रूभंगलीलया येन रावणोऽपि निराकृतः ॥५० तस्मै प्रदत्तं दत्तेन श्रीहरेः कवचं पुरा । शक्तिरत्यर्थवीर्या च तं कथं हंतुमिच्छसि ॥५१ शंकरः करुणासिद्धः कत्तुं चाप्यन्यथा विभुः । न चान्यः शंकरात्पुत्र सत्कार्यं कत्तुं मीश्वरः ॥५२ अथ देव्या अनुमतिं प्राप्य शंभुद्द यार्णवः । अभ्यधाद्भद्रया वाचा जमदग्निसुतं विभु ॥५३

शिव उवाच- अद्यप्रभृति विप्र त्वं मम स्कन्दसमो भव । दास्यामि मंत्रं दिव्यं ते कवचं च महामते ॥५४ लीलया यत्प्रसादेन कार्त्तवीर्यं हनिष्यसि । त्रिःसप्तकृत्वो निर्भू पां महीं चापि करिष्यसि ॥५५ इत्युक्त वा शंकरस्तस्मै ददौ मंत्रं सुदुर्लभम् । त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥५६

उस राजा सहस्रार्जुन का बिना ही शस्त्रों वाले होते हुए तुम हनन करने की इच्छा कर रहे हो जिसने अपनी भ्रूभङ्ग की लीला से अर्थात् जरा सी भृकुटी तिरछी करके रावण जैसे महापराक्रमी को भी निराहत कर दिया था अर्थात् अपने सामने निराहत करके भगा दिया था ।५०। उस राजा को तो पहिले दत्तात्रेय मुनि ने श्री हरि का कवच प्रदान किया था और अत्यन्त वीर्य से समन्वित एक शक्ति भी उसके लिए दी थी । उसको

परशुराम का शिवाराधन ] [ २५५

तुम किस प्रकार से मार देना चाहते हो ? ।५१। भगवान् शंकर तो करुणा के अथाह सागर हैं और करुणा से ही सिद्ध हो जाते हैं। यह विभु तो परम समर्थ हैं सभी कुछ अन्यथा भी कर सकते हैं। हे पुत्र ! भगवान् शंकर के अतिरिक्त अन्य कोई भी इस कार्य के करने में समर्थ नहीं है ।५२। इसके अनन्तर देवी के इन वचनों से दया के सागर भगवान् शम्भु ने दुर्गा देवी की भी अनुमति प्राप्त कर ली थी और फिर विभु शम्भु ने जमदग्नि के पुत्र से परम भद्र वाणी के द्वारा कहा था ।५३। भगवान शिव ने कहा-हे विप्र ! आज से लेकर तुम मेरे पुत्र कार्तिकेय के समान हो जाओगे। हे महान् मति वाले ! मैं आपको परम दिव्य मन्त्र और कवच दे दूँगा ।५४। योंही बिनाही किसी आयास के लीला ही से जिनके प्रसाद के प्रभाव से आप कार्त्तवीर्य का हनन कर दोगे और जैसी तुम्हारी प्रतिज्ञा है वह भी पूर्ण होगी और इक्कीस बार इस पृथ्वी को भी भूपों से रहित तुम कर दोगे ।५५। इतना यह इस रीति से कहकर भगवान् शम्भु ने उस परशुराम के लिए सुदुर्लभ मन्त्र प्रदान कर दिया था और तीनों लोकों का विजय करने वाला परम अद्भुत कवच भी उसे दे दिया था ।५६।

नागपाशं पाशुपतं ब्रह्मास्त्रं च सुदुर्लभम् ।
नारायणास्त्रमाग्नेयं वायव्यं वारुणं तथा ॥५७
गांधर्वं गारुडं चैव जृंभणास्त्रं महाद्भुतम् ।
गदां शक्तिं च परशुं शूलं दण्डमनुत्तमम् ॥५८
शस्त्रास्त्रग्राममखिलं प्रहृष्टः संबभूव ह ।
नमस्कृत्य शिवं शांतं दुर्गा स्कन्दं गणेश्वरम् ॥५९
परिक्रम्य ययौ रामः पुष्करं तीर्थमुत्तमम् ।
सिद्धं कृत्वा शिवोक्तं तु मन्त्रं कवचमुत्तमम् ॥६०
साधयामास निखिलं स्वकार्यं भृगुनन्दनः ।
निहत्य कार्त्तवीर्यं तं ससैन्यं सकुलं मुदा ।
विनिवृत्तो गृहं प्रागात्पितुः स्वस्य भृगूद्वहः ॥६१

नागपाश—पाशुपत और सुदुर्लभ ब्रह्मास्त्र—नारायणास्त्र—आग्नेय —वायव्य-वारुण अस्त्र भी दिये थे ।५७। गान्धर्व-गारुड़ और परम अद्भुत जृम्भणा भी प्रदत्त कर दिया था। तथा गदा-शक्ति-शूल-उत्तम दण्ड उसको

[ २५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

दे दिया था ।५८। इस तरह सम्पूर्ण शस्त्रों और अस्त्रों के समूह को पाकर राम बहुत ही प्रसन्न हुआ था । फिर उस परशुराम ने परम शान्त शिव को—दुर्गा देवी को—स्वामी कार्त्तिकेय को और गणेश्वर की सेवा में प्रणिपात करके तथा इन सबकी परिक्रमा करके फिर वह राम परमोत्तम तीर्थ पुष्कर को वहाँ से चला गया था और वहाँ पर संस्थिति करते हुए भगवान् शिव के द्वारा बताये हुए उत्तम मन्त्र को और कवच को सिद्ध किया था ।५९-६०। फिर भृगु नन्दन ने बड़े ही आनन्द से सम्पूर्ण कुल और सेना के सहित राजा कार्तवीर्य का निहनन करके अपना पूर्ण कार्य साधित किया था । फिर वह राम अपने पिता के घर को विनिवृत्त होकर चला गया था ।६१।

— X —

॥ मृगमृगी कथा ॥

सगर उवाच- ब्रह्मपुत्र महाभाग महान्मेऽनुग्रहः कृतः । यदिदं कवचं मह्यं प्रकाशितमनामयम् ॥१

और्वेणानुगृहीतोऽहं कृतास्त्रो यदनुग्रहात् । भवतस्तु कृपापात्रं जातोऽहमधुना विभो ॥२

रामेण भार्गवेन्द्रेण कार्त्तवीर्यो नृपो गुरो । यथा समापितो वीरस्तन्मे विस्तरतो वद ॥३

कृपापात्रं स दत्तस्य राजा रामः शिवस्य च । उभौ तौ समरे वीरौ जघटाते कथं गुरो ॥४

वसिष्ठ उवाच- शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि चरितं पापनाशनम् । कार्त्तवीर्यस्य भूपस्य रामस्य च महात्मनः ॥५

स रामः कवचं लब्ध्वा मंत्रं चैव गुरोर्मुखात् । चकार साधनं तस्य भक्त्या परमया युतः ॥६

भूमिशायी त्रिश्ववणं स्नानसंध्यापरायणः । उवास पुष्करे राम शतवर्षमतंद्रितः ॥७

मृगमृगी कथा ] [ २५७

राजा सगर ने कहा---हे ब्रह्माजी के पुत्र ! आप तो महान् भाग वाले हैं। मेरे ऊपर आपने बड़ा भारी अनुग्रह किया है कि यह कवच जो कि अनामय है, मेरे सामने आपने प्रकाशित कर दिया है ।१। कृतास्त्र में और्व के द्वारा अनुगृहीत हुआ हूँ । हे विभो ! इस समय में तो मैं आपकी कृपा का पात्र बन गया हूँ ।२। हे गुरुदेव ! भार्गवेन्द्र परशुराम ने राजा कार्त्तवीर्य को जो बड़ा ही वीर था जिस प्रकार से समाप्त किया था वह सब विस्तार के साथ मेरे सामने वर्णन करके सुनाइए ।३। वह राजा तो दत्तात्रेय मुनि की कृपा का पात्र था और राम भगवान शिव की अनुकम्पा का भाजन था । हे गुरुवर ! ये दोनों ही महान् वीर थे । समर क्षेत्र में किस प्रकार से इन्होंने युद्ध किया था ।४। वसिष्ठ जी ने कहा---हे राजन् ! अब आप श्रवण कीजिए मैं इस चरित को बतलाऊँगा क्योंकि यह चरित तो पापों का विनाश कर देने वाला है । यह चरित महान् बलशाली राजा कार्त्तवीर्य का तथा महान् आत्मा वाले परशुराम के महायुद्ध का है ।५। उन परशुराम ने गुरुदेव के मुख से इस कवच और मन्त्र की दीक्षा ग्रहण की थी फिर उन परशुराम ने बड़ी भारी भक्ति से युक्त होकर इनको सिद्ध किया था ।६। भूमि पर इन्होंने शयन किया था---तीनों कालों में सन्ध्योपासना की थी और यह स्नान तथा सन्ध्या में परायण हो गये थे । इस प्रकार में यह सब साधना करते हुए राम बहुत ही समाहित होकर एक सौ वर्ष तक पुष्कर में रहे थे अर्थात् पुष्कर क्षेत्र में ही निवास किया था ।७।

समित्पुष्पकुशादीनि द्रव्याण्यहरहर्भृगोः ।
आनीय काननाद्भूप प्रायच्छदकृतव्रणः ॥८
सततं ध्यानसंयुक्तो रामो मतिमतां वरः ।
आराधयामास विभुं कृष्णं कल्मषनाशनम् ॥९
तस्यैवं यजमानस्य रामस्य जगतीपते ।
गतं वर्षशतं तत्र ध्यानयुक्तस्य नित्यदा ॥१०
एकदा तु महाराज रामः स्नातुं गतो महान् ।
मध्यमं पुष्करं तत्र ददर्शाश्चर्यमुत्तमम् ॥११
मृग एकः समायातो मृग्या युक्तः पलायितः ।
व्याधस्य मृगयां प्राप्तो घर्मतप्तोऽतिपीड़ितः ॥१२

२५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पिपासितो महाभाग जलपानसमुत्सुकः । रामस्य पश्यतस्तत्र सरसस्तटमागतः ॥१३ पश्चान्मृगी समायाता भीता सा चकितेक्षणा । उभौ तौ पिवतस्तत्र जलं शंकितमानसौ ॥१४

हे भूप ! अकृतव्रण प्रतिदिन उस भृगुवंशज परशुराम के लिए वन से समिधा पुष्प और कुशा आदि द्रव्यों को लाकर दिया करता था ।८। मति-मानों में परम श्रेष्ठ परशुराम निरन्तर ध्यान में संलग्न होकर समस्त कल्मषों के विनाश करने वाले विभु श्रीकृष्ण की आराधना किया करता था ।९। हे जगतीपते ! इस रीति से यजन करते हुए और वहाँ पर नित्य ही ध्यान में सं सक्त रहने वाले परशुराम को एक सौ वर्ष व्यतीत हो गये थे ।१०। हे महाराज ! एक बार वह महान राम स्नान करने के लिए मध्यम पुष्कर में गया था और वहाँ पर उसने उत्तम आश्चर्य का अवलोकन किया था ।११। एक मृग मृगी के साथ दौड़ा हुआ वहाँ पर आया था जो एक व्याध की मृगया को प्राप्त हो रहा था तथा घाम से सन्तप्त होकर अत्यन्त पीड़ित था ।१२। हे महाभाग ! बहुत ही प्यासा था और जलपान करने के लिए बड़ा ही उत्सुक हो रहा था परशुराम उसको देख रहे थे कि वहाँ पर उस सरोवर के तट पर समागत हो गया था ।१३। इसके पीछे-पीछे मृगी भी वहाँ पर आ गयी थी जो बहुत ही डरी हुई थी और उसके नेत्र चकित हो रहे थे । वे दोनों ही बहुत शङ्कित मन वाले होते हुए वहाँ पर जलपान कर रहे हैं ।१४।

तावत्समागतो व्याधो बाणपाणिर्धनुर्द्धरः । स दृष्ट्वा तत्र संविष्टं रामं भार्गवनन्दनम् ॥१५ अकृतव्रणसंयुक्तं तस्थौ दूरकृतेक्षणः । स चिन्तयामास तदा शंकितो भृगुनन्दनात् ॥१६ अयं रामो महावीरो दुष्टानामंतकारकः । कथमेतस्य हन्म्येतौ पश्यतो मृगयाम्‌मृगौ ॥१७ इति चिन्तासमाविष्टो व्याधो राजन्यसत्तम । तस्थौ तत्रैव रामस्य भयात्संत्रस्तमानसः ॥१८

मृगमृगी कथा ] [ २५६

रामस्तु तौ मृगौ दृष्ट्वा पिबंतौ सभयं जलम् ।
तर्कयामास मेधावी किमत्र भयकारणम् ॥१९॥
नैवात्र व्याघ्रसंनादो न च व्याधो हि दृश्यते ।
केनैतो कारणेनाहो शंकितौ चकितेक्षणौ ॥२०॥
अथ वा मृगजातिर्हि निसर्गाच्चकितेक्षणा ।
येनैतौ जलपानेऽपि पश्यतश्चकितेक्षणौ ॥२१॥

उसी समय में धनुष धारण किये हुए हाथ में बाण ग्रहण कर वहाँ पर व्याध भी आ गया था । उस व्याध ने वहाँ पर विराजमान परशुराम को देखा था ।१५। उस राम ही समीप में अकृत व्रण भी बैठा हुआ था । वह व्याध दूर तक अपनी दृष्टि डाले हुए वहीं पर ठहर गया था और उस व्याध का मन भृगुनन्दन राम से उस समय में शंकित हो गया था और विचार किया था ।१६। यह परशुराम तो महान वीर हैं और दुष्टों का विनाश कर देने वाला है । अब मैं इसके देखते हुए इन दोनों शिकार वाले मृगी और मृग का हनन करूं ।१७। हे राजन्यों मैं परम श्रेष्ठ ! वह व्याध इस प्रकार से चिन्ता में डूबा हुआ परशुराम के भय से संत्रस्त मन वाला होकर वहीं पर स्थित हो गया था ।१८। परशुराम ने उन दोनों मृगों को देखा था कि बड़े ही भय के साथ वहाँ पर जल पी रहे थे । उस मेधावी राम ने मन में विचार किया था कि यहाँ पर इनके लिए भय होने का क्या कारण है ।१९। यहाँ पर किसी व्याघ्र की गर्जना की ध्वनि भी नहीं है और न यहाँ पर कोई व्याध ही दिखाई दे रहा है फिर किस कारण से ये दोनों मृग शंकित नेत्रों वाले तथा चकित दृष्टि से युक्त हो रहे हैं—यह बड़े आश्चर्य की बात है ।२०। अथवा यही कारण हो सकता है कि इन मृगों की जाति ही स्वाभाविक रूप से चकित नेत्रों वाली हुआ करती है । इस कारण से ही ये दोनों जलपान करने में भी चकित नेत्रों वाले होते हुए देख रहे हैं ।२१।

नैतावत्कारणं चात्र किं तु खेद्भयातुरी ।
लक्ष्येते खिन्नसर्वांगौ कम्पयुक्तौ यतस्त्विमौ ॥२२
एवं संचित्य मतिमांस्तस्थौ मध्यपुष्करे ।
शिष्येण संयुतो रामो यावत्तौ चापि संस्थितौ ॥२३

२६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पीत्वा जलं ततस्तौ तु वृक्षच्छायासमाश्रितौ ।
रामं दृष्ट्वा महात्मानं कथां तौ चक्रतुर्मुदा ॥२४
मृग्युवाच-कांत चात्रैव तिष्ठावो यावद्रामोऽत्र संस्थितः ।
अस्य वीरस्य सांनिध्ये भयं नैवावयोर्भवेत् ॥२५
अत्राप्यागत्य चेद्व्याधो ह्यावयोः प्रहरिष्यति ।
दृष्टमात्रो हि मुनिना भस्मीभूतो भविष्यति ॥२६
इत्युक्तं वचने मृग्या रामदर्शनतुष्टया ।
मृगश्चोवाच हर्षेण समाविष्टः प्रियां स्वकाम् ॥२७
एवमेव महाभागे यद्वै वदसि भामिनि ।
जानेऽहमपि रामस्य प्रभावं सुमहात्मनः ॥२८

यहाँ पर इतना ही कारण नहीं है किन्तु ये दोनों तो बड़े खेद और भय से आतुर हो रहे हैं—ऐसे ही दिखलाई दे रहे हैं। क्योंकि इनके सभी अङ्ग खिन्नता से संयुत हैं और ये दोनों ही कम्प से प्रकम्पित हो रहे हैं ।२२। इस तरह से चिन्तन करके मतिमान् वह परशुराम मध्य पुष्कर में संस्थित हो गया था और उसके साथ में शिष्य भी था। वह राम जब तक वहाँ खड़ा रहा था तब तक वे दोनों मृग भी वहाँ पर संस्थित रहे थे ।२३। जल-पान करके वे दोनों मृग एक वृक्ष की छाया का आश्रय ग्रहण करके बैठ गये थे। उस महान् आत्मा वाले परशुराम का दर्शन करके उन दोनों ने बड़े ही आनन्द के साथ आपस में बातचीत की थी ।२४। मृगी ने मृग से कहा—हे कान्त ! हम दोनों यहाँ पर स्थित रहेंगे जब तक यह परशुराम यहाँ पर संस्थित रहते हैं। इस वीर के समीप में हम दोनों को कोई भय नहीं होगा ।२५। यदि यहाँ पर भी व्याध आकर हम दोनों पर प्रहार करेगा तो इस मुनि के द्वारा केवल देखने ही से वह भस्मीभूत हो जायगा ।२६। परशुराम के दर्शन करने से परम सन्तुष्ट मृगी के द्वारा इस प्रकार से यह वचन कहने पर वह मृग भी बड़े ही हर्ष से समाविष्ट होकर अपनी प्रिया से बोला था ।२७। हे महाभागे ! यह बात तो इसी प्रकार की है। हे भामिनि ! आप यह बात निश्चित ही कह रही है। मैं भी परम महान् आत्मा वाले राम के प्रभाव को अच्छी तरह से जानता हूँ ।२८।

मृगमृगी कथा ] [ २६१

योऽयं संदृश्यते चास्य पार्श्वे शिष्योऽकृतव्रणः । स चानेन मताभागस्त्रातो व्याघ्रभयातुरः ॥२९॥ अयं रामो महाभागे जमदग्निसुतोऽनुजः । पितरं कार्त्तवीर्येण दृष्ट्वा चैव तिरस्कृतम् ॥३०॥ चकारातितरां क्रुद्धः प्रतिज्ञां नृपघातिनीम् । तत्पूर्तिकामो ह्यगद्ब्रह्मलोकं पुरा ह्ययम् ॥३१॥ स ब्रह्मा दिष्टवांश्चैनं शिवलोकं व्रजेति ह । तस्य त्वाज्ञां समादाय गतोऽसौ शिवसन्निधिम् ॥३२॥ प्रोवाचाखिलवृत्तांतं राज्ञश्चाप्यात्मनः पितुः । स कृपालुर्महादेवः सभाज्य भृगुनन्दनम् ॥३३॥ ददौ कृष्णस्य सन्मंत्रमभेद्यं कवचं तथा । स्वीयं पाशुपतं चास्त्रमन्यास्त्रग्राममेव च ॥३४॥ विसर्जयामास मुदा दत्त्वा शस्त्राणि चादरात् । सोऽयमत्रागतो भद्रे मंत्रसाधनतत्परः ॥३५॥

जो इस महापुरुष के समीप में अकृतव्रण नाम वाला एक शिष्य दिखाई दे रहा है उसको इसी महापुरुष ने ही व्याघ्र के भय से जब यह आतुर हो गया तो इसकी व्याघ्र से सुरक्षा की थी ।२६। हे महाभागे ! यह राम है जो जमदग्नि मुनि का पुत्र है । इसने ही अपने पिता को राजा कार्तवीर्य के द्वारा निराकृत किया हुआ देखा था और उस समय में इसने अत्यन्त क्रुद्ध होकर नृपों के विघात करने की प्रतिज्ञा की थी और उस प्रतिज्ञा की पूर्त्ति की कामना वाला यह पहिले ब्रह्म लोक में गया था ।३०-३१। वहाँ पर इसको यह निर्देश किया था कि यह शिवलोक में चला जावे । उन ब्रह्माजी की आज्ञा को प्राप्त करके फिर यह राम भगवान् शिव की सन्निधि में प्राप्त करके फिर यह राम भगवान् शिव की सन्निधि में प्राप्त हुआ ।३२। और वहाँ पर इसने भगवान् शम्भु के समक्ष राजा का, पिता का और अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदित किया था । वे महादेव बहुत ही कृपालु थे उन्होंने इस भृगुनन्दन का स्वागत किया था ।३३। फिर उन शङ्कर प्रभु ने श्रीकृष्ण का एक उत्तम मन्त्र और न भेदन करने के योग्य एक कवच इसको

२६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रदान कर दिया था तथा अपना पाशुपत अस्त्र और अन्यान्य बहुत से अस्त्रों का समुदाय इसको प्रदान किये थे ।३४। बड़े आदर के साथ प्रीति से इन सब शस्त्रास्त्रों को प्रदान करके भगवान् शिव ने वहाँ से विदा किया था। हे भद्रे ! वही राम इस समय में मन्त्रों की साधना में तत्पर होता हुआ यहाँ पर समागत हुआ है ।३५।

नित्यं जपति धर्मात्मा कृष्णस्य कवचं सुधीः ।
शतवर्षाणि चाप्यस्य गतानि सुमहात्मनः ॥३६॥
मंत्रं साधयतो भद्रे न च तत्सिद्धिरेति हि ।
अत्रास्ति कारणं भक्तिः सा च वै त्रिविधा मता ॥३७॥
उत्तमा मध्यमा चैव कनिष्ठा तरलेक्षणे ।
शिवस्य नारदस्यापि शुकस्य च महात्मनः ॥३८॥
अम्बरीषस्य राजर्षे रंतिदेवस्य मारुतेः ।
बलेर्विभीषणास्यापि प्रह्लादस्य महात्मनः ॥३९॥
उत्तमा भक्तिरेवास्ति गोपीनामुद्धवस्य च ।
वसिष्ठादिमुनीशानां मन्वादीनां शुभेक्षणे ॥४०॥
मध्या च भक्तिरेवास्ति प्राकृतान्यजनेषु सा ।
मध्यभक्तिरयं रामो नित्यं यमपरायणः ॥४१॥
सेवते गोपिकाधीशं तेन सिद्धि न चागतः ।

वरिष्ठ उवाच-
इत्युक्ता त्वरितं कांतं सां मृगी हृष्टमानसा ॥४२॥
पुनः पप्रच्छ भक्तेस्तु लक्षणं प्रेमदायकम् ।

मृग्युवाच-
साधु कांत महाभाग वचस्तेऽलौकिकं प्रिय ।
ईदृग् ज्ञानं तव कथं संजातं तद्वदाधुना ॥४३॥

सुधी यह धर्मात्मा परशुराम नित्य ही भगवान् श्रीकृष्ण के कवच का यहाँ पर जप कर रहा है। इस महात्मा को जाप करते हुए एक सौ वर्ष तो व्यतीत हो गये हैं ।३६। हे भद्रे ! यह मन्त्र की साधना तो कर रहा है किन्तु

मृगमृगी कथा ] [ २६३

इसको उसकी सिद्धि नहीं हो रही है। इस साधना में मुख्य कारण भक्ति ही होता है। वह भक्ति तीन प्रकार की होती है, ऐसा माना गया है।३७। हे चञ्चल नेत्रों वाली प्रिये ! उस भक्ति के उत्तम-मध्यम और कनिष्ठ—ये तीन भेद हुआ करते हैं। अब यह बतलाता हूँ कि उत्तमा भक्ति किन-किन महापुरुषों में विद्यमान है—भगवान् शिव-देवर्षि नारद-महात्मा शुकदेव- राजर्षि अम्बरीष-राजा रन्तिदेव-पवनसुत हनुमान्-राजा बलि-दानव विभी- षण और महात्मा प्रह्लाद-इन में परमोत्तमा भक्ति होती है ।३८-३९। ब्रज की गोपियों में और उद्धव में भी उत्तम प्रकार की ही भक्ति विद्यमान है। हे शुभेक्षणे ! जो वसिष्ठ मुनिश हैं तथा मनु आदि हैं उनमें भी मध्यम श्रेणी की ही भक्ति होती है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी जनों में कनिष्ठ श्रेणी की प्राकृत भक्ति हुआ करती है। यह जो परशुराम है इसमें मध्य श्रेणी वाली ही भक्ति है जो कि नित्य ही यम-नियमों में परायण हो रहा है ।४०- ४१। यह राम गोपिकाओं के अधीश्वर भगवान् का सेवन तो कर रहा है किन्तु यह सिद्धि को अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। महामुनीन्द्र वसिष्ठ जी ने कहा—जब उस मृग के द्वारा अपनी प्रिया मृगी से कहा गया था तो उस मृगी ने परम प्रसन्न मन वाली होकर शीघ्र ही अपने स्वामी से प्रश्न किया था ।४२। उस मृगी ने फिर उस भक्ति का प्रेम प्रदान करने वाला लक्षण अपने स्वामी से पूछा था। मृगी ने कहा—हे कान्त ! आप तो महान् भाग वाले हैं। हे प्रिय ! आपके ये वचन तो बहुत ही अच्छे और अलौकिक हैं। अब आप कृपा करके मुझे यह बतलाइए कि इस प्रकार का विशद ज्ञान आपके हृदय में कैसे समुद्भूत हो गया है ।४३।

मृग उवाच— शृणु प्रिये महाभागे ज्ञानं पुण्येन जायते ॥४४ तत्पुण्यमद्य संजातं भार्गवस्यास्य दर्शनात् । पुण्यात्मा भार्गवश्चायं कृष्णभक्तो जितेंद्रियः ॥४५ गुरुशुश्रूषको नित्यं नित्यनैमित्तिकादरः । अतोऽस्य दर्शनाज्जातं ज्ञानं मेऽद्यैव भामिनि ॥४६ त्रैलोक्यस्थितसत्त्वानां शुभाशुभनिदर्शकम् । अद्यैव विदितं मेऽभूद्रामस्यास्य महात्मनः ॥४७

२६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

चरितं पुण्यदं चैव पापघ्नं शृण्वतामिदम् ।
यद्यत्करिष्यते चैव तदपि ज्ञानगोचरम् ॥४८
योत्तमा भक्तिराख्याता तां विना नैव सिद्ध्यति ।
कवचं मंत्रसहितं ह्यपि वर्षायुतायुतैः ॥४९॥

अपनी परम प्रिया के द्वारा इस रीति से पूछे जाने पर उस मृग ने कहा था—हे महान् भाग वाली प्रिये ! अब आप श्रवण कीजिए कि यह ज्ञान जो होता है वह परम उत्कृष्ट पुण्य से ही हुआ करता है ।४४। वह उस प्रकार का पुण्य आज इन्हीं महापुरुष भार्गव परशुराम के दर्शन प्राप्त करने ही से समुत्पन्न हो गया है । यह भार्गव महान् पुण्यात्मा हैं और यह भगवान् श्रीकृष्ण के परम भक्त तथा अपनी इन्द्रियों को जीत लेने वाले हैं ।४५। हे भामिनि ! यह राम अपने गुरु की शुश्रूषा करने वाले हैं और प्रतिदिन नित्य कर्मों तथा नैमित्तिक कर्मों में बड़ा आदर करने वाले हैं । इसलिए आज ही इस महापुरुष के दर्शन से मेरे हृदय में यह अद्भुत ज्ञान समुत्पन्न हो गया है ।४६। यह मेरा ज्ञान ऐसा है जो इस त्रिभुवन में संस्थित जीव हैं उन सबके शुभ और अशुभ कर्मों को बता देने वाला है और आज ही मुझे महात्मा इस परशुराम का भी पूर्ण चरित विदित हो गया है ।४७। इसका चरित बहुत ही पुण्य का देने वाला है और समस्त पापों का विनाशक है । अब तुम इसका श्रवण करो । यह राम भविष्य में जो-जो भी कर्म करेंगे वह भी सब मेरे ज्ञान का गोचर हो रहा है अर्थात् मुझे सब ज्ञात हो गया है ।४८। मैंने जो आपके सामने उत्तम प्रकार की भक्ति का वर्णन किया था उस तरह भी भक्ति के बिना इस परशुराम को यह मन्त्र और कवच दश सहस्र वर्षों में भी कभी सिद्ध नहीं होगा ।४९।

यद्ययं भार्गवो भद्रे ह्यगस्त्यानुग्रहं लभेत् ।
कृष्णप्रेमामृतं नाम स्तोत्रमुत्तमभक्तिदम् ॥५०
ज्ञात्वा च लप्स्यते सिद्धिं मंत्रस्य कवचस्य च ।
स मुनिर्ज्ञाततत्त्वार्थः सानुकंपोऽभयप्रदः ॥५१
उपदेक्ष्यति चैवैनं तत्त्वज्ञानं मुदावहम् ।
श्रीकृष्णचरितं सर्वं नामभिर्ग्रथितं यतः ॥५२
कृष्णप्रेमामृतस्तोत्राज्ज्ञास्यतेऽस्य महामतिः ।

परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २६५

ततः संसिद्धकवचो राजानं हैहयाधिपम् ॥ ५३ हत्वा सपुत्रामात्यं च ससुहृद्वलवाहनम् । त्रिःसप्तकृत्वो निर्भूपां करिष्यत्यवनीं प्रिये ॥ ५४ वसिष्ठ उवाच– एवमुक्त्वा मृगो राजन्विरराम मृगीं ततः । आत्मनो मृगभावस्य कारणं ज्ञातवांश्च ह ॥ ५५

यदि यह भार्गव परशुराम हे भद्रे ! अगस्त्य मुनि की कृपा को प्राप्त कर लेवे तो इसको सिद्धि हो सकती है । अगस्त्य मुनि उत्तम भक्ति के देने वाले कृष्ण प्रेमामृत नाम का स्तोत्र जानते हैं । ५०। उन महामुनि की कृपा से यदि उस स्तोत्र का ज्ञान प्राप्त कर लेवे तो उसको जानकर यह मन्त्र की और कवच की सिद्धि को प्राप्त कर लेगा । वह अगस्त्य मुनि तो तत्त्वों के अर्थ को जाने हुए हैं और वे बहुत ही दयालु तथा अभय के प्रदान करने वाले हैं । ५१। वे मुनि उस आनन्द-प्रद तत्त्व ज्ञान का इस राम के लिये उपदेश कर देंगे क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण चरित उनके सुनामों से ही ग्रथित है । ५२। श्रीकृष्ण मृत स्तोत्र से इस राम की महामति ज्ञान प्राप्त कर लेगी । फिर इसको इस कवच की संसिद्धि हो जायगी और कवच की सिद्धि वाला यह राम हैहयों के अधिप राजा का हनन पुत्र-पौत्र, मन्त्रीगण, मित्र-वर्ग-सेना और समस्त वाहनों के सहित करके हे प्रिये ! फिर वह परशुराम इस मोदिनी को निश्चित रूप से इक्कीस बार क्षत्रिय राजाओं से रहित कर देगा—इसमें कुछ भी संशय नहीं है । श्री वसिष्ठजी ने कहा—इतना यह सब अपनी प्रिया मृगी से कहकर हे राजन् ! फिर वह मृग शान्त हो गया था और उसने मृग होने के भाग के कारण को भी उस समय में जान लिया था । ५३-५४-५५।

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॥ परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ॥

सगर उवाच–

मुने परमतत्त्वज्ञ ध्यानज्ञानार्थकोविद । भगवद्भक्तिसंलीनमानसानुग्रहः कृतः ॥ १ त्वयापि हि महाभाग यतः शंससि सत्कथाः ।

२६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

श्रुत्वा मृगमुखात्सर्वं भार्गवस्य विचेष्टितम् ॥२
भूतं भवद्भविष्यं च नारायणकथान्वितम्।
पुनः पप्रच्छ किं नाथ तन्मे वद सविस्तरम् ॥३
वसिष्ठ उवाच-
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि मृगस्य चरितं महत्।
यथा पृष्टं तया सोऽस्यै वर्णयामास तत्त्ववित् ॥४
श्रुत्वा तु चरितं तस्य भार्गवस्य महात्मनः।
भूयः पप्रच्छ तं कांतं ज्ञानतत्त्वार्थमादरात् ॥५
मृग्युवाच-
साधु साधु महाभाग कृतार्थस्त्वं न संशयः।
यदस्य दर्शनात्तेऽद्य जातं ज्ञानमतीन्द्रियम् ॥६
अथातश्चात्मनः सर्वं ममापि वद कारणम्।
कर्मणा येन संप्राप्तावावां तिर्यग्जनिं प्रभो ॥७

राजा सगर ने कहा- हे मुनिवर ! आप तो परम तत्त्वों के ज्ञाता हैं और आप तत्त्वों के ध्यान तथा ज्ञान के अर्थों के महान् मनीषी हैं। आप तो भगवान् की भक्ति से संलीन मन वाले हैं और उसी मन से आपने अनुग्रह किया है। हे महाभाग ! आप तो बहुत ही अच्छी कथाओं का कथन कर रहे हैं। उस मृगी ने अपने स्वामी मृग के मुख से भार्गव परशुराम का सम्पूर्ण विचेष्टित श्रवण करके तथा भूत-वर्त्तमान और भविष्य में होने वाले रामायण की कथा से समन्वित वृत्त का श्रवण करके हे नाथ ! उसने पुनः क्या पूछा था—यह पूर्ण विस्तार के सहित हमारे सामने वर्णन करने की कृपा कीजिए ।१-३। वसिष्ठजी ने कहा—हे राजन् ! मैं आपके आगे उस मृग का जो महान चरित्र है उसे भली भाँति बतलाऊँगा। आप उसका श्रवण कीजिए। जिस प्रकार से जो भी उस मृगी ने उस मृग से पूछा था उस सबको तत्त्वों के ज्ञाता उसने उस मृगी के समक्ष में वर्णन कर दिया था ।४। उस महान आत्मा वाले भार्गव का चरित्र श्रवण करके उस मृगी ने फिर बड़े ही आदर से अपने स्वामी से ज्ञान के तत्व का अर्थ पूछा था ।५। मृगी ने कहा—हे महाभाग ! बहुत ही अच्छा और परम सुन्दर है। आप तो

परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २६७

कृतार्थ हैं—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है कि आज इन परशुराम के दर्शन करने से आपको ऐसा ज्ञान उत्पन्न हो गया है जो इन्द्रियों की पहुँच से भी दूर है ।६। इसीलिए इसके पश्चात् अपनी आत्मा का सम्पूर्ण कारण मुझे भी कृपा करके बतलाइए । हे प्रभो ! ऐसा वह क्या कर्म हमने किया था जिसके कारण से हम दोनों ने यह पशु की तिर्यग् योनि प्राप्त की है ।७।

इति वाक्यं समाकर्ण्य प्रियायाः स मृगः स्वयम् ।
वर्णयामास चरितं मृग्याश्चैवात्मनस्तदा ॥८

मृग उवाच—
शृणु प्रिये महाभागे यथाऽऽवां मृगतां गतौ ।
संसारेऽस्मिन्महाभागे भावोऽय भवकारणम् ॥९
जीवस्य सदसद्भ्यां हि कर्मभ्यामागतः स्मृतिम् ।
पुरा द्रविडदेशे तु नानाऋद्धिसमाकुले ॥१०
ब्राह्मणानां कुले वाऽहं जातः कौशिकगोत्रिणाम् ।
पिता मे शिवदत्तोऽभून्नाम्ना शास्त्रविशारदः ॥११
तस्य पुत्रा वयं जाताश्चत्वारो द्विजसत्तमाः ।
ज्येष्ठो रामोऽनुजस्तस्य धर्मस्तस्यानुजः पृथुः ॥१२
चतुर्थोऽहं प्रिये जातो सूरिरित्यभिविश्रुतः ।
उपनीय क्रमात्सर्वाञ्छिवदत्तो महायशाः ॥१३
वेदान ध्यापयामास सांगांश्च सरहस्यकान् ।
चत्वारोऽपि वयं तत्र वेदाध्ययनतत्पराः ॥१४

उस मृग ने इस अपनी प्रिया के वाक्य का श्रवण करके स्वयं ही उस समय में अपना और अपनी प्रिया मृगी का चरित वर्णन किया था ।८। मृग ने कहा—हे महाभाग वाली प्रिये ! अब आप सुनिए कि जिस प्रकार से हम तुम दोनों उस मृग की जाति में देह धारण करने वाले हुए हैं । हे महाभागे ! इस संसार में इस भव अर्थात् जन्म के ग्रहण करने का कारण एक मात्र भाव ही हुआ करता है। तात्पर्य यह है कि जैसी भावना जिसकी होगी वह वैसा ही उसके अनुरूप जन्म धारण किया करता है ।९। जो भी जीव के सद् और असत् कर्म होते हैं उनसे ही यह स्मृति को प्राप्त होता है ।

२६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

बहुत पहिले अनेक प्रकार की ऋद्धियों से पूर्ण द्रविड़ देश में कौशिक गोत्र वाले ब्राह्मणों के कुल में मैंने जन्म ग्रहण किया था । मेरे पिता नाम से शिवदत्त हुए थे जो कि शास्त्रों के अच्छे विद्वान् थे ।१०-११। उन शिवदत्त नामधारी विप्र के परम श्रेष्ठ द्विज हम चार पुत्र समुत्पन्न हुए थे । सबमें बड़ा राम था, उससे छोटा भाई धर्म था और उससे भी छोटा भाई पृथु नाम वाला हुआ था ।१२। हे प्रिये ! चौथा भाई मैं उत्पन्न हुआ था जो सूरि—इस नाम से प्रसिद्ध था । महा यशस्वी उस शिवदत्त ने क्रम से सबका उपनयन संस्कार करा दिया था ।१३। और फिर उसने हम सबको रहस्य के सहित तथा समस्त वेद के अङ्ग शास्त्रों के साथ वेदों का अध्यापन किया था अर्थात् साङ्ग सम्पूर्ण वेदों को पढ़ाया था ।१४।

गुरुशुश्रूषणे युक्ता जाता ज्ञानपरायणाः ।
गत्वाऽरण्यं फलान्यंबुसमित्कुशमृदोऽन्वहम् ॥१५॥
आनीय पित्रे दत्त्वाथ कुर्मोऽध्ययनमेव हि ।
एकदा तु वयं सर्वे संप्राप्ता पर्वते वने ॥१६॥
औद्भिदं नाम लोलाक्षि कृतमालातटे स्थितम् ।
सर्वे स्नात्वा महानद्यामुषसि प्रीतमानसाः ॥१७॥
दत्तार्घाः कृतजप्याश्च समारूढा नगोत्तमम् ।
शालैस्तमालैः प्रियकैः पनसैः कोविदारकैः ॥१८॥
सरलार्जुनपूगैश्च खर्जूरैर्नालिकेलकैः ।
जंबूभिः सहकारैश्च कटुफलैर्बृहतीद्रुमैः ॥१९॥
अन्यैर्नानाविधैर्वृक्षैः परार्थप्रतिपादकैः ।
स्निग्धच्छायैः समाहृष्टनानापक्षिनिनादितैः ॥२०॥
शार्दूलहरिभिर्भल्लैर्गण्डकैर्मृगनाभिभिः ।
गजेंद्रैः शरभाद्यैश्च सेवितं कन्दरागतैः ॥२१॥

हम सभी भाई गुरु की शुश्रूषा में निरत रहा करते थे और बहुत ही ज्ञान में परायण हो गये थे । प्रतिदिन वन में जाकर फल—जल—समिधा—कुशा और मृत्तिका लाया करते थे ।१५। ये सब वस्तुएँ वन से लाकर अपने पिता को दिया करते थे और फिर इसके अनन्तर अपना अध्ययन ही किया

परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २६६

करते थे। एक बार ऐसा हुआ था कि हम सब वन में पर्वत पर पहुँच गये ।१६। हे चञ्चल नेत्रों वाली ! कृतमाला नदी के तट पर औदुभि नाम वाला वहाँ स्थित था। हम सबने प्रातःकाल की वेला में उसी नदी में स्नान किया था और बहुत ही प्रसन्न मन वाले हो गये थे ।१७। हम सबने सूर्य देव को अर्घ्य दिया था और जाप करके हम सब उस उत्तम पर्वत पर सकारूढ़ हो गये थे। अब वहाँ की वृक्षावली की प्राकृतिक छटा का वर्णन किया जाता है—वह स्थल ऐसा अत्यधिक रमणीय था कि वहाँ पर शाल-तमाल-प्रियक-पनस-कोविदार-सरल-अर्जुन-पूग-खजूर-नारिकेल-जम्बू-सहकार-कटु फल और बृहती के वृक्ष लगे थे ।१८-१९। इनके अतिरिक्त अन्य भी वहाँ पर अनेक प्रकार के तरुवर थे जो दूसरों के अर्थ का प्रतिपादन करने वाले थे। अर्थात् पुष्प-फलादि से द्वारा दूसरे जीवों का उपकार करने वाले थे। उन वृक्षों की छाया बहुत ही घनी थी और उन पर दूर-दूर से पक्षी गण उन पर समावृष्ट होकर अपना कलख कर रहे थे ।२०। उस पर्वतीय महारण्य में विविध प्रकार के वन्य हिंस्र जीव भी भ्रमण कर रहे थे। शार्दूल-भल्ल-हरि-गण्डक-मृगनाभि-गजेन्द्र और शरभ आदि बहुत हिंसक अपनी-अपनी कन्दरा में निवास करते हुए उसका सेवन कर रहे थे ।२१।

मल्लिकापाटलाकुन्दकर्णिकारकदंबकैः । सुगंधिभिर्वृतं चान्यैर्वातोद्धूतपरागिभिः ॥२२

नानामणिगणाकीर्णैर्नीलपीतसितारुणैः । शृंगै समुल्लिखंतं च व्योम कौतुकसंयुतम् ॥२३

अत्युच्चपातध्वनिभिर्निर्झरैः कंदरोद्गतैः । गर्जंतमिव संसक्तं व्यालाद्यैर्मृगपक्षिभिः ॥२४

तत्रातिकौतुकाहृष्टदृष्टयो भ्रातरो वयम् । नास्माष्मं चात्मनाऽत्मानं वियुक्ताश्च परस्परम् ॥२५

एतस्मिन्नंतरे चैका मृगी ह्यागात्पिपासिता । निर्झरापात शिरसि पातुकामा जलं प्रिये ॥२६

तस्याः पिबंत्यास्तु जलं शार्दूलोऽतिभयंकरः । तत्र प्राप्तो यदृच्छातो जगृहे तां भयार्दिताम् ॥२७

२७० ] | ब्रह्माण्ड पुराण

अहं तद्ग्रहणं पश्यन्भयेन प्रपलायितः । अत्युच्चवत्त्वात्पतितो मृतश्चैणीमनुस्मरन् ॥२८

वहाँ वन में अनेक सुन्दर एवं सुरभित सुमनों वाले द्रुम और लताएं भी समुत्पन्न हुए थे जिनमें कदम्ब-मल्लिका-पाटल-कुन्द-कर्णिकार आदि थे। इनके अतिरिक्त अन्य भी ऐसे वृक्ष थे जिनके पराग वायु से उड़ रहा था और वह वन सुगन्धित उन गुल्मलता और द्रुमों से समाकीर्ण था ।२२। उस पर्वत में अनेक नील-सित-पीत अरुण वर्ण वाली मणियाँ थीं । उसकी शिखरें इतनी अधिक उच्च थीं कि वे मानों व्योम में पहुँच कुछ उल्लेख कर रही हों । इस तरह से वह पर्वत बहुत से कौतुकों से समन्वित था ।२३। वहाँ बहुत ही ऊँचाई से गिरने के कारण घोर गम्भीर ध्वनि वाले अनेक झरने थे । ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कन्दराओं में स्थित व्यालादि मृगों और पक्षियों की गर्जना से वह संसक्त है ।२४। वहाँ पर अत्यधिक कौतुकों से युक्त वह स्थल था । मैंने अपनी आत्मा से अपने आपको स्मरण नहीं किया था अर्थात् मैं अपने आपको भूल गया था तथा हम सब परस्पर में एक दूसरे से विमुक्त हो गये थे क्योंकि हम सब भाई वहाँ अत्यधिक कौतुकों से हृष्ट दृष्टि वाले हो गये थे ।२५। इसी बीच में वहाँ पर एक मृगी बहुत ही प्यासी आ गयी थी । हे प्रिये ! वह मृगी जहाँ पर एक झरना गिर रहा था उसके ही शिर में वह जलपान करने की इच्छा वाली थी ।२६। वह विचारी जब जल पी रही थी तो वहाँ पर एक महान भयङ्कर शार्दूल आ पहुँचा था जो अपनी ही इच्छा से घूमता हुआ आ निकला था और उसने भय से पीड़ित उस हिरनी को पकड लिया था ।२७। मैंने जब यह देखा कि शार्दूल ने उसका ग्रहण कर लिया है तो मुझे भी बड़ा भय उत्पन्न हो गया था और मैं वहाँ से भाग दिया था । उस तरह से भयभीत होकर जब मैं बेतहाशा भागा था तो एक बहुत ही उच्च स्थल से नीचे गिर गया था और उस शार्दूल के द्वारा पकड़ी हुई हिरणी का अनुस्मरण करते हुए गिरते-गिरते मृत हो गया था ।२८।

सा मृता त्वं मृगी जाता मृगस्त्वाहमनुस्मरन् । जातो भद्रे न जाने वै क्व गता भ्रातरोऽग्रजाः ॥२९

एतन्मे स्मृतिमापन्नं चरितं तव चात्मनः । भूतं भविष्यं च तथा शृणु भद्रे वदाम्यहम् ॥३०

परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २७१

योऽयं वा पृष्ठसंलग्नो व्याधो दूरस्थितोऽभवत् । रामस्यास्य भयात्सोऽपि भक्षितो हरिणाधुना ॥३१ प्राणांस्त्यक्त्वा विधानेन स्वर्गलोकं गमिष्यति । आवाभ्यां तु जलं पीतं मध्यमे पुष्करे त्विह ॥३२ संदृष्टो भार्गवश्चायं साक्षाद्विष्णुस्वरूपधृक् । तेनानेकभवोत्पन्नं पातकं नाशमागतम् ॥३३ अगस्त्यदर्शनं लब्ध्वा श्रुत्वा स्तोत्रं गतिपदम् । गमिष्यावः शुभांल्लोकान्येषु गत्वा न शोचति ॥३४ इत्येवमुक्त्वा सं मृगः प्रियायै प्रियदर्शनः । विरराम प्रसन्नात्मा पश्यन्नाममनातुरः ॥३५

वह जो हिरणी शार्दूल के द्वारा पकड़ी जाने पर मर गयी थी वही तू अब पुनः इस जन्म में मृगी हुई है। और मैं द्विज सुत जो मरती हुई तेरा अनुस्मरण करते प्राणों का गिरकर परित्याग करने वाला था वही अब मृग होकर जन्म लेने वाला हूँ। यह मृत्यु के समय में भावना का ही कारण है कि हम तुम दोनों इस तिर्यग् योनि से समुत्पन्न हुए हैं। मैं यह नहीं जानता हूँ कि मेरे अन्य तीन भाई जो मुझसे बड़े थे कहाँ पर गये है।२६। यह मेरा अपना और तुम्हारा चरित मेरी स्मृति में विद्यमान है। हे भद्रे ! जो व्यतीत हो गया है और जो आगे होने वाला है उसको मैं बतलाता हूँ। तुम उसका श्रवण करो।३०। जो यह व्याघ्र पीछे की ओर लगा हुआ दूर में खड़ा था और यम का उसको भय हो रहा था। उसका भी इस समय में एक सिंह ने भक्षण कर लिया है।३१। उसका ऐसा ही विधान है उससे वह अपने प्राणों का त्याग करके स्वर्गलोक में चला जायगा और यहाँ पर मध्यम पुष्कर में हम तुम दोनों ने जल पिया है।३२। यहाँ पर इन भार्गव परशुराम का भली भांति दर्शन किया गया है। इससे अनेक जन्मों में किये हुए भी पातक नाश को प्राप्त हो गये हैं क्योंकि वह भार्गव साक्षात् भगवान् विष्णु के ही स्वरूप को धारण करने वाले हैं।३३। अब महामुनीन्द्र अगस्त्य के दर्शन प्राप्त करके तथा सद्गति प्रदायक स्तोत्र का श्रवण करके हम तुम दोनों ही परम शुभ लोकों में गमन करेंगे जिनमें गमन करके प्राणी को किसी भी प्रकार की चिन्ता नहीं रहा करती है अर्थात् कोई पीड़ा होती ही नहीं है

२७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

।३४। इस तरह से यह इतना अपनी प्रिया से कहकर वह प्रिय दर्शन मृग चुप हो गया था ओर अनातुर होकर राम का दर्शन करते हुए वह बहुत ही प्रसन्न आत्मा वाला हो गया था ।३५।

भार्गवः श्रुत्वांश्र्चैव मृगोक्तं शिष्यसंयुतः ।
विस्मितोऽभूच्च राजेन्द्र गन्तुं कृतमतिस्तथा ।।३६
अकृतव्रणसंयुक्तो ह्यगस्त्यस्याश्रमं प्रति ।
स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा प्रतस्थे हर्षितो भृशम् ।।३७
रामेण गच्छता मार्गे दृष्टो व्याधो मृतस्तथा ।
सिंहस्य संप्रहारेण विस्मितेन महात्मना ।।३८
अध्यर्द्धं योजनं गत्वा कनिष्ठं पुष्करं प्रति ।
स्नात्वा माध्याह्निकीं सन्ध्यां चकारातिमुदान्वितः ।।३९
हितं तदात्मनः प्रोक्तं मृगेण स विचारयन् ।
तावत्तत्पृष्ठसंलग्नं मृगयुग्ममुपागतम् ।।४०
पुष्करे तु जलं पीत्वाभिषिच्यात्मतनुं जलैः ।
पश्यतो भार्गवस्यागादगस्त्याश्रमसंमुखम् ।।४१
रामोऽपि सन्ध्यां निर्वर्त्त्य कुम्भजस्याश्रमं ययौ ।
विपद्गतं पुष्करं तु पश्यमानो महामनाः ।।४२

भार्गव परशुराम ने अपने शिष्य के सहित इस तरह से उस मृग के द्वारा कही हुई बातों को सुना था और इसको सुनकर उसको बड़ा भारी विस्मय हो गया था । हे राजेन्द्र ! फिर उस परशुराम ने उसी भाँति से गमन करने के लिये अपनी बुद्धि बना ली थी ।३६। उस भार्गव ने सर्वप्रथम स्नान किया था और फिर अपनी जो नित्य क्रिया थी उसको समाप्त किया था । इसके पश्चात् मन में अत्यधिक हर्षित होकर अकृत व्रण नामधारी के साथ संयुत होकर अगस्त्य मुनि के आश्रम की ओर उसने प्रस्थान कर दिया था ।३७। जिस समय में राम गमन कर रहे थे तब मार्ग में मरे हुए व्याध को देखा था जो कि सिंह के द्वारा किये हुए सम्प्रहार से ही मर गया था । उसको देखकर उस महान् आत्मा वाले को बड़ा विस्मय हो गया था ।३८। फिर आगे आधे योजन तक चलकर कनिष्ठ पुष्कर था । वहाँ पहुँचकर राम