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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

ब्रह्माण्ड पुराण

(द्वितीय खण्ड)

॥ असमंजस का त्याग ॥

सगर उवाच-

कुशलं मम सर्वत्र महर्षे नात्र संशयः ।
यस्य मे त्वमनुध्याता शमं भार्गवसत्तमः ॥१
यस्तथा शिक्षितः पूर्वमस्त्रे शस्त्रे च सांप्रतम् ।
सोऽहं कथमशक्तः स्यां सकलारिविनिग्रहे ॥२
त्वं मे गुरुः सुहृद्दैवं बंधुमित्रं च केवलम् ।
न ह्यन्यमभिजानामि त्वामृते पितरं च मे ॥३
त्वयोपदिष्टेनास्त्रेण सकला भूभृतो मया ।
विजिता यदनुस्मृत्या शक्तिः सा तपसस्तव ॥४
तपसा त्वं जगत्सर्वं पुनासि परिपासि च ।
स्रष्टुं संहर्तुमपि च शक्नोष्वेव न संशयः ॥५
महाननन्यसामान्यप्रभावस्तपसश्च ते ।
इह तस्यैकदेशोऽपि दृश्यते विस्मयप्रदः ॥६
पश्य सिंहासने बाल्यादुपैत्य मृगपोतकः ।
पिबत्यंभः शनैर्ब्रह्मन्निः शंकं ते तपोवने ॥७

राजा सगर ने कहा—हे महर्षे ! मेरे यहाँ सर्वत्र कुशल है—इसमें तो कुछ भी संशय नहीं है जिस मेरे विषय में भार्गव श्रेष्ठ आप शमका अनुध्यान करने वाले विद्यमान हैं। जिसको पूर्व में ही शस्त्रास्त्रों के प्रयोग करने की भली भाँति शिक्षा-दीक्षा दे दी गयी है वह मैं इस समय समस्त

१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शत्रुओं के विनिग्रह करने में कैसे असमर्थ हो सकता हूँ ।१-२। आप तो मेरे गुरुदेव हैं— सुहृत्-दैव-बन्धु और मित्र हैं। केवल आप ही मेरे सब कुछ हैं। मैं तो आपके अतिरिक्त अन्य किसी को भी मेरा पिता नहीं जानता हूँ ।३। आपके द्वारा उपदेश किये गये अस्त्र से ही मैंने सब नृपों पर विजय प्राप्त की है जिनके स्मरण से ही पूर्ण विजय मेरी हुई है यह आपके ही तप की शक्ति है। यहाँ पर उसका एक देश भी विस्मय देने वाला दिखलाई देता है ।४-६। देखिये, मृग का शिशु बचपन से ही सिंहासन पर समीप में आकर हे ब्रह्मन् ! धीरे-धीरे जल पी रहा है और वह आपके इस तपोवन में बिल्कुल ही निःशङ्क अर्थात् भय से रहित है ।७।

धयत्यतिविश्रम्भात् कृशाऽपि हरिणीस्तनम् । करोति मृगशृंगाग्रे गंडकंडूयनं रुरुः ॥८ नवप्रसूतां हरिणीं हत्वा वृत्त्यै वनांतरे । व्याघ्री त्वत्तसावासे सैव पुष्णाति तच्छिशून् ॥९ गजं द्रुतमनुद्रुत्य सिंहो यस्मादिदं वनम् । प्रविष्टोऽनुसरंतौ त्वद्भयादेकत्र तिष्ठतः ॥१० नकुलस्त्वाखुमार्जारमयूरशशपन्नगाः । वृकसूकरशार्दूलशरभर्क्षप्लवंगमाः ॥११ श्रृगाला गवया गावो हरिणा महिषास्तथा । वनेऽत्र सहजं वैरं हित्वा मैत्रीमुपागताः ॥१२ एवंविधा तपः शक्तिर्लोकविस्मयदायिनी । न क्वापि दृश्यते ब्रह्मंस्त्वामृते भुवि दुर्लभा ॥१३ अहं तु त्वत्प्रसादेन विजित्य वसुधामिमाम् । रिपुभिः सह विप्रर्षे स्वराज्यं समुपागतः ॥१४

वह अत्यन्त दुबली हरिणी भी अत्यधिक विश्राम के साथ अपने स्तन को पिला रही है। हरिण मृग छोना के गण्डों को शृङ्ग के अग्रभाग से खुजला रहा है ।८। नव प्रसूता अर्थात् हाल ही में प्रसव करने वाली हरिणी को मारकर वृत्ति के लिए दूसरे वन में वही व्याघ्री आप के इस तपस्या के आश्रम में उसके शिशुओं के पोषण कर रही है ।९। एक सिंह एक हाथी के

असमंजस का त्याग ] [ ११

पीछे आक्रमण करके जब यहाँ पर आ गया है तो प्रवेश करते ही अनुसरण करते हुए वे दोनों सिंह और गज आपके ही भय से एक ही स्थान में स्थित हो रहे हैं ।१०। जो स्वभाव से ही आपस में शत्रु होते हैं वे सभी नकुल-मूषक-मार्जार-मयूर-शश-सर्प-वृक-सूकर--शार्दूल--शरभ-प्लवङ्गम-शृगाल-गवय-गौ हरिण और महिष ये सभी एक-एक के शत्रु होते हुए भी इस वन में अपने स्वाभाविक वैर को भूलकर परस्पर मैत्री के भाव को प्राप्त हो गये हैं ।११-१२। इस प्रकार की यह आपकी ही शक्ति है जो लोगों को बड़ा ही विस्मय देने वाली है। हे ब्रह्मन् ! आपके बिना लोक में इस भूमि पर ऐसी दुर्लभ शक्ति अन्यत्र कहीं पर भी दिखलाई नहीं देती है ।१३। और मैं तो आपके ही प्रसाद से इस सम्पूर्ण वसुधा को जीतकर सब रिपुओं को ध्वस्त करके अपने राज्य में प्राप्त हुआ हूँ ।१४।

वश्यामात्यस्त्रिवर्गेऽपि यथायोग्यकृतादरः । त्वयोपदिष्टमार्गेण सम्यग्राज्यमपालयम् ।।१५

एवं प्रवर्त्तमानस्य मम राज्येऽवतिष्ठतः । भवद्दिक्षा संजाता सापेक्षा भृगुपुंगव ।।१६

किं त्वद्य मयि पर्याप्तमनपत्यतयैव मे । पितृपिण्डप्रदानेन सह संरक्षणं भुवः ।।१७

तदिदं दुःखमत्यर्थमनिवार्यं मनोगतम् । नान्योऽपहर्त्ता लोकेऽस्मिन् ममेति त्वामुपागतः ।।१८

इत्युक्तः सगरेणाथ स्थित्वा सोऽन्तर्मनाः क्षणम् । उवाच भगवानौर्वः सनिदेशमिदं वचः ।।१९

नियम्य सह भार्याभ्यां किञ्चित्कालमिहावस । अवाप्स्यति ततोऽभीष्टं भवान्नात्र विचारणा ।।२०

स च तत्रावसत्प्रीतस्तच्छुश्रूषापरायणः । पत्नीभ्यां सह धर्मात्मा भक्तियुक्तश्चिरं तदा ।।२१

मेरे सभी अमात्य वश्य हैं और तीनों वर्गों में भी मैं यथायोग्य आदर प्राप्त करने वाला हूँ । आपके ही द्वारा जो उपदेश प्राप्त किया है उसी मार्ग से मैंने अच्छी तरह से राज्य का परिपालन किया है ।१५। इसी रीति से मैं

१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रवृत्त हो रहा हूँ और अपने राज्य पर स्थित हूँ किन्तु हे भृगु श्रेष्ठ ! मेरी इच्छा आपके दर्शन प्राप्त करने की हुई थी जो कि कुछ अपेक्षा से समन्वित है ।१६। आज मुझमें आपके प्रसाद से सभी कुछ पर्याप्त प्राप्त हुआ है किन्तु मेरी कोई सन्तति नहीं है । इसी कारण से मुझे इस भूमि का संरक्षण करना और पितृगण को पिण्डों का देना दुष्कर सा हो रहा है ।१७। यही मुझे बड़ा भारी घोर दुःख है जो मेरे मन में बैठा हुआ है और निवारण के योग्य नहीं है । इस लोक में मेरे इस दुःख का अपहरण करने वाला आपको छोड़कर अन्य कोई भी नहीं है । अतएव मैं आपकी सन्निधि में प्राप्त हुआ हूँ ।१८। इस प्रकार से जब सगर नृप के द्वारा उस मुनि से कहा गया था तो वह मुनि एक क्षण तक मन ही मन में सोचते हुए स्थित रहे थे और फिर और्व भगवान् ने निदेश पूर्वक यह वचन राजा से कहा था ।१९। आप नियमित रहकर अपनी दोनों पत्नियों के साथ कुछ समय तक यहीं पर निवास करें । फिर आपका जो भी अभीप्सित है उसको आप अवश्य ही प्राप्त कर लेंगे—इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।२०। फिर वह राजा भी सेवा में तत्पर होकर वहीं पर निवास करने लगा था । उसको परम प्रसन्नता हुई थी । उस समय मैं दोनों पत्नियों के साथ धर्म में युक्त तथा भक्तिभाव से समन्वित होकर ही चिरकाल पर्यन्त वहाँ निवास किया था ।२१।

राजपत्न्यौ च ते तस्य सर्वकालमतंद्रिते ।
मुनेरतनुतां प्रीतिं विनयाचारभक्तिभिः ॥२२
भक्त्या शुश्रूषया चैव तयोस्तुष्टो महामुनिः ।
राजपत्न्यौ समाहूय इदं वचनमब्रवीत् ॥२३
भवत्यौ वरमस्मत्तो ब्रियतां काममीप्सितम् ।
दास्यामि तं न संदेहो यद्यपि स्यात्सुदुर्ल्लभम् ॥२४
ततः प्रणम्य शिरसा तेऽप्युभे तं महामुनिम् ।
ऊचतुर्भगवन्पुत्रान्कामयावेति सादरम् ॥२५
ततस्ते भगवानाह भवतीभ्यां मया पुनः ।
राज्ञश्च प्रियकामेन वरो दत्तोऽयमीप्सितः ॥२६
पुत्रवत्यौ महाभागे भवत्यौ मत्प्रसादतः ।

असमंजस का त्याग ] [ १३

भवेतां ध्रुवमन्यच्च श्रूयतां वचनं मम ॥२७ पुत्रो भविष्यत्येकस्यामेकः सोऽनतिधार्मिकः । तथापि तस्य कल्पांतं संभूतिश्च भविष्यति ॥२८

उन दोनों राजा की पत्नियों ने सदा ही अतन्द्रित होकर उस मुनि की विनय—आचार और भक्ति से प्रीति को बढ़ा दिया था ।२२। उस भक्ति और शुश्रूषा से मुनिवर बहुत ही अधिक सन्तुष्ट हो गये थे और फिर उन्होंने दोनों राजा की पत्नियों को अपने समीप में बुलाकर उन से यह वचन कहा था—आप दोनों ही हमसे किसी भी वरदान का वरण करो जो भी तुम्हारी इच्छा हो ओर तुमको अभीप्सित हो । मैं उसी को तुम्हारे लिए दे दूँगा—इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है यद्यपि वह वरदान बहुत दुर्लभ भी क्यों न होवे ।२३-२४। इसके अनन्तर उन दोनों ने मस्तक टेक कर प्रणाम किया था और उन महामुनि से कहा था—हे भगवान् ! हम दोनों ही आदर के साथ पुत्रों की कामना करती हैं ।२५। इसके अनन्तर और्व भगवान् ने कहा—आप दोनों के लिये राजा के प्रिय की कामना वाले मैंने यह अभीष्ट वरदान दे दिया है ।२६। हे महाभाग वालियो ! मेरे प्रसाद से तुम दोनों ही पुत्रों वाली होओगी और अन्य भी एक वचन परम ध्रुव है, उसका भी श्रवण कीजिए । ।२७। एक पत्नी में एक ही पुत्र जन्म ग्रहण करेगा किन्तु वह अति धार्मिक नहीं होगा तो भी कल्प के अन्त में उनकी संभूति होगी ।२८।

षष्टिः पुत्रसहस्राणामपरस्यां च जायते । अकृतार्थाश्च ते सर्वे विनंक्ष्यंत्यचिरादिव ॥२९ एवंविधगुणोपेतौ वरो दत्तौ मया युवाम् । अभीप्सितं तु यद्यस्याः स्वेच्छया तत्प्रकीर्त्यताम् ॥३० एवमुक्ते तु मुनिना वैदर्भ्यान्वयवर्द्धनम् । वरयामास तनयं पुत्रानन्यांस्तथा परा ॥३१ इति दत्त्वा वरं राज्ञे सगराय महामुनिः । सभार्य्यमनुमान्यैनं विससर्ज पुरीं प्रति ॥३२ मुनिना समनुज्ञातः कृतकृत्यो महीपतिः । रथमारुह्य वेगेन सप्रियः प्रययौ पुरीम् ॥३३

१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स प्रविश्य पुरीं रम्यां हृष्टपुष्टजनावृताम् । आनंदितः पौरजनै रेमे परमया मुदा ॥३४ एतस्मिन्नेव काले तु राजपत्नयावुभे नृप । राज्ञे प्रावोचतां गर्भं मुदा परमया युते ॥३५

और दूसरी रानी के गर्भ से साठ सहस्र पुत्र समुत्पन्न होंगे । और वे भी सब अकृतार्थ अर्थात् असफल ही होकर थोड़े ही समय में विनष्ट हो जायँगे ।२६। इस प्रकार के गुणों से समन्वित दो वरदान तुम दोनों को दे दिये हैं । इन दोनों में जिसका भी आप दोनों में जो भी अभीष्ट हो उसको मुझे बतला दो ।३०। महामुनीन्द्र के द्वारा जब उन दोनों से इस तरह से कहा गया था जोकि वैदर्भ्य वंश का वर्धन करने वाला था तो वैदर्भी ने तो एक पुत्र प्राप्त करने का वरदान चाहा था और दूसरी ने अन्य साठ हजार पुत्रों के नाम ग्रहण करने के वरदान की याचना की थी ।३१। उस महामुनि ने इस प्रकार से राजा सगर को वरदान देकर भार्याओं के सहित उसको आज्ञा देकर अपनी नगरी की ओर विदा कर दिया था ।३२। मुनि के द्वारा आज्ञा प्राप्त करके राजा कृतकृत्य हो गया था और रथ पर समारूढ़ होकर अपनी प्रियाओं के साथ बड़े वेग से पुरी की ओर चला गया था ।३३। उस नृप ने अपनी नगरी में प्रवेश किया था, जो नगरी परम सुरम्य थी और हृष्ट-पुष्ट जनों से घिरी हुई थी । पुरवासी जनों के साथ हर्षोल्लास से युक्त होकर आनन्दित होते हुए प्रेम से रमण करने लगा था ।३४। इसी समय में हे नृप ! उन दोनों राजा की पत्नियों ने परमाधिक प्रीति संयुक्त होकर राजा की सेवा में अपने-अपने गर्भों के धारण करने की सूचना दी थी ।३५।

ववृधे च तयोर्गर्भः शुक्लपक्षे यथोडुराट् । सह संतोषसंपत्त्या पित्रोः पौरजनस्य च ॥३६ संपूर्णे तु ततः काले मुहूर्त्ते केशिनी शुभे । असुयताग्निगर्भाभं कुमारममितद्युतिम् ॥३७ जातकर्मादिकं तस्य कृत्वा चैव यथाविधि । असमंजस इत्येव नाम तस्याकरोन्नृपः ॥३८ सुमतिश्चापि काले गर्भालाबुमसूयत । संप्रसूतं तु तं त्यक्तुं दृष्ट्वा राजाऽकरोन्मनः ॥३६

असमंजस का त्याग ] [ १५

तज्ज्ञात्वा भगवानौर्वस्तत्रागच्छद्यदृच्छया । सम्यक् संभावितो राजा तमुवाच त्वरान्वितः ॥४० गर्भालाबुरयं राजन्न त्यक्तुं भवताऽर्हति । पुत्राणां षष्टिसाहस्रबीजभूतो यतस्तव ॥४१ तस्मात्तत्सकलीकृत्य घृतकुम्भेषु यत्नतः । निःक्षिप्य सपिधानेषु रक्षणीयं पृथक्पृथक् ॥४२

उन दोनों के गर्भ शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा के ही समान बढ़ गये थे । इससे माता-पिता को और पुरवासियों को भी बहुत अधिक सन्तोष हुआ था ।३६। इसके अनन्तर जब गर्भ का पूरा समय सम्प्राप्त हो गया तो परम शुभ मुहूर्त्त में केशिनी ने अपरिमित द्युति से सम्पन्न अग्नि के गर्भ की आभा वाले कुमार को जन्म ग्रहण कराया था ।३७। उस कुमार का जातकर्म आदि संस्कार करके उसका विधि के साथ असमञ्जस नाम नृप ने रक्खा था ।३८। उसी समय में सुमति रानी ने भी एक गर्भ से अलावु को प्रसूत किया था । उसको प्रसूत हुआ देखकर उसका त्याग कर देने का विचार राजा के मन में हुआ था ।३९। किन्तु जब यह ज्ञात हुआ था कि राजा उस अलावु का त्याग करना चाहता है तो भगवान् और्व मुनि यदृच्छा से ही वहाँ पर समागत हो गये थे । राजा सगर ने उनका भली भाँति स्वागत-सत्कार किया था । तब बहुत ही शीघ्रता से युक्त होकर मुनि ने राजा से कहा—।४०। हे राजन् ! आप इस गर्भ से निःसृत अलावु का त्याग करने के योग्य नहीं हैं क्योंकि यह आपके साठ सहस्र पुत्रों का बीजभूत है ।४१। इस कारण से इन सबको एकत्रित करके घृत के कलशों में यत्न पूर्वक ऊपर ढकना लगाकर अलग-२ इनकी रक्षा करनी चाहिए ।४२।

सम्यगेवं कृते राजन्भवतो मत्प्रसादतः । यथोक्तसंख्या पुत्राणां भविष्यति न संशयः ॥४३ काले पूर्णे ततः कुम्भान्भित्त्वा निर्याति ते पृथक् । एवं ते षष्टिसाहस्रं पुत्राणां जायते नृप ॥४४ इत्युक्त्वा भगवानौर्वस्तत्रैवांतरधाद्विभुः । राजा च तत्तथा चक्रे यथौर्वेण समीरितम् ॥४५ ततः संवत्सरे पूर्णे घृतकुम्भात्क्रमेण ते ।

१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भित्वा भित्वा पुनर्जज्ञुः सहसैवानुवासरम् ॥४६
एवं क्रमेण संजातास्तनयास्ते महीपते ।
ववृधुः संघशो राजन्षष्टिसहस्रसंख्यया ॥४७

अपृथग्धर्मचरणा महाबलपराक्रमाः ।
बभूवुस्ते दुराधर्षाः क्रूरात्मानो विशेषतः ॥४८

स नातिप्रीतिमांस्तेषु राजा मतिमतां वरः ।
केशिनीतनयं त्वेकं बहुमान सुतं प्रियम् ॥४९

हे राजन् ! इसी विधि से कार्य किये जाने पर मेरे पूर्ण प्रसाद से आपके पुत्रों की जो भी बतायी गयी है वही संख्या उत्पन्न होगी—इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है ।४३। काल जब भी पूर्ण हो जायगा तभी वे सब इन कुम्भों को तोड़कर पृथक्-२ निकल आयेंगे । हे नृप ! इस तरह से आपके साठ सहस्र पुत्र जन्म ग्रहण करेंगे ।४४। इतना कह कर भगवान् और्व वहाँ पर ही अन्तर्हित हो गये क्योंकि वे तो विभु थे और राजा सगर ने वैसा ही सब किया था जैसा भी और्व मुनि ने उनसे कहा था ।४५। इसके पश्चात् जब एक वर्ष पूर्ण हो गया तो वे घृत कुम्भों से क्रम से उन्हें फोड़-तोड़ करके तुरन्त ही प्रतिदिन जन्म लेने लग गये थे ।४६। हे महीपते ! इसी तरह से वे सब क्रम से पुत्र समुत्पन्न हुए थे । हे राजन् ! समुदाय में ये उत्पन्न होकर साठ सहस्र संख्या में बढ़ गये थे ।४७। उन सबके धर्माचरण समान ही थे और वे सब महान बल पराक्रम से समन्वित थे । वे सभी विशेष रूप से क्रूर आत्मा वाले थे और सब दुराधर्ष थे अर्थात् उनको दबा देना बड़ा ही कठिन था, ऐसे तेजस्वी थे ।४८। राजा सगर भी मतिमानों में परम श्रेष्ठ था और इन साठ सहस्र पुत्रों पर उसकी अधिक प्रीति नहीं थी । केशिनी का जो एक पुत्र था उसका वह राजा विशेष मान किया करता था और वह उसको प्रिय भी लगता था ।४९।

विवाहं विधिवत्तस्मै कारयामास पार्थिवः ।
स चाप्यानन्दयामास स्वगुणैः सुहृदोऽखिलान् ॥५०

एवं प्रवर्तमानस्य केशिनीतनयस्य तु ।
अजायत सुतः श्रीमानंशुमानिति विश्रुतः ॥५१

असमंजस का त्याग ] [ १७

स बाल्य एव मतिमानुदारैः स्वगुणैर्भृशम् ।
प्रीणयामास सुहृदः स्वपितामहमेव च ॥५२
एतस्मिन्नंतरे राजंस्तस्य पुत्रोऽसमंजसः ।
आविष्टो नष्टचेष्टोऽभूत्स पिशाचेन केनचित् ॥५३
स तु कश्चिदभूद्वैश्यः पूर्वजन्मनि धर्मवित् ।
कस्यचिद्विषये राज्ञः प्रभूतधनधान्यवान् ॥५४
स कदाचिदरण्येषु विचरन्निधिमुत्तमम् ।
दृष्ट्वा ग्रहीतुमारेभे वणिग्लोभपरिप्लुतः ॥५५
ततस्तद्रक्षकोऽभ्येत्य पिशाचः प्राह तं तदा ।
क्षुधितोऽहं चिरादस्मिन्नवसन्निधिपालकः ॥५६

राजा सगर ने उस असमञ्जस पुत्र का विवाह भी विधिपूर्वक करा दिया था और उसने भी अपने सद्गुणों के द्वारा सभी सुहृदों को आनन्दित किया था ।५०। इस रीति से रहने वाले उस केशिनी के पुत्र के एक सुत ने भी जन्म ले लिया था जो अंशुमान नाम से प्रख्यात हुआ था ।५१। वह बचपन की अवस्था में ही बड़ा मतिमान् था और अपने उदार गुणों से उसमें सभी सुहृदों को तथा अपने पितामह राजा सगर को बहुत ही अधिक प्रीणित किया था ।५२। इसी बीच में ऐसा हुआ था कि उस राजा का अंशुमान पुत्र असमञ्जस किसी पिशाच के द्वारा समाविष्ट हो गया था जिस कारण से उसकी चेष्टा एकदम नष्ट हो गयी थी ।५३। वह पूर्वजन्म में कोई धर्म का ज्ञाता वैश्य हुआ था। वह किसी राजा के देश में हुआ था था और बहुत धन-धान्य की समृद्धि से युक्त था ।५४। वह किसी समय में अरण्यों में विचरण कर रहा था और वहाँ पर उसने एक स्थल में उत्तम निधि देखी थी। वह वैश्य भी लोभ से युक्त होकर उसके लेने का उपक्रम करने लगा था ।५५। उस निधि का रक्षक एक पिशाच था। वह उसी समय में वहाँ पर आगया था और उससे बोला। मैं बहुत समय से भूखा हूँ और यहाँ पर निवास करता हुआ इस निधि की रक्षा कर रहा हूँ ।५६।

तस्मात्तत्परिहाराय मम दत्वा गवामिषम् ।
कामतः प्रतिगृह्णीष्व निधिमेनं ममाज्ञया ॥५७

[ १८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स तस्मै तत्परिश्रुत्य दास्यामीति गवामिषम् । आदत्त च निधिं तं तु पिशाचेनानुमोदितः ॥५८ न प्रादाच्च ततो मौढ्यात्तस्मै यत्तत्प्रतिश्रुतम् । प्रतिश्रुताप्रदानोत्थरोषं न श्रद्दधे नृप ॥५९ तमेवं सुचिरं कालं प्रतीक्ष्याशनकांक्षया । अपनीतधनः सोऽपि ममार व्यथितः क्षुधा ॥६० वैश्योऽपि कालो मरणं संप्राप्य सगरस्य तु । बभूव काले केशिन्यां तनयोऽन्वयवर्द्धनः ॥६१ अशरीरः पिशाचोऽपि पूर्ववैरमनुस्मरन् । वायुभूतोऽविशद्देहं राजपुत्रस्य भूपते ॥६२ तेनाविष्टस्ततः सोऽपि क्रूरचित्तोऽभवत्तदा । मतिविभ्रंशमासाद्य मुहुस्तेन बलात्कृतः ॥६३

इसलिए मेरी क्षुधा को दूर करने के वास्ते तुम मुझको गो मांस लाकर दो और तभी फिर मेरी आज्ञा से इस महान् निधि का ग्रहण करो ।५७। उस वैश्य ने उसके सामने प्रतिज्ञा की थी कि मैं आपको गौओं का मांस लाकर दे दूँगा । फिर पिशाच की अनुमति से उस निधि का ग्रहण कर लिया था ।५८। और मूर्खता से उसको खाने के लिए वह वस्तु नहीं दी थी जिसके देने की उससे प्रतिज्ञा की थी । हे नृप ! प्रतिज्ञा करके भी गौ मांस न देने से उसका बड़ा क्रोध हो गया था । जिसको वह सहन नहीं कर सका था ।५९। उस पिशाच ने बहुत लम्बे समय तक खाने की इच्छा से प्रतीक्षा की थी किन्तु जब वह वैश्य न पहुँचा तो उस पिशाच ने क्षुधा से व्यथित होकर उसका समस्त धन छीन लिया और उसको मार भी डाला था ।६०। वह वैश्य भी मृत्युगत होकर फिर सगर के यहाँ बालक होकर जन्मधारी हुआ था । जब समय प्राप्त हुआ था तो वह केशिनी का पुत्र वंश की वृद्धि करने वाला हुआ था ।६१। वह पिशाच भी शरीरधारी तो था नहीं, हे भूपते ! उसने अपने पूर्व के होने वाले वैर का अनुस्मरण करके वायुभूत होकर उसी राजा सगर के पुत्र के पुत्र के देह में प्रवेश कर लिया था ।६२। उसी के द्वारा आविष्ट होकर वह भी फिर बड़ा भारी क्रूर हाचित्त बोला

असमंजस का त्याग ] [ १६

गया था। मति का विभ्रंश हो गया था और वह बार-२ बल पूर्वक असदा- चरण करने लग गया था ॥६३॥

असमंजसत्वं नगरे चक्रे सोऽपि नृशंसवत् । बालांश्च यूनः स्थविरान्योषितश्च सदा खलः ॥६४॥ हत्वा हत्वा प्रचिक्षेप सरय्वामतिनिर्दयः । ततः पौरजनाः सर्वे दृष्ट्वा तस्य कदर्यताम् ॥६५॥ बहुशो निकृतास्तेन गत्वा राज्ञे व्यजिज्ञपन् । राजा च तदुपश्रुत्य तमाहूय प्रयत्नतः ॥६६॥ वारयामास बहुधा दुःखेन महतान्वितः । बहुशः प्रतिषिद्धोऽपि पित्रा तेन महात्मना ॥६७॥ जले तप्ते च संतप्ताः सं बभूवुर्यथा यवाः । नाशकत्तं यदा पापाद्विनिवर्त्तयितुं नृपः ॥६८॥ लोकापवादभीरुत्वाद्विषयानत्यजत्तदा ॥६६॥

उसने भी फिर तो अपने नगर में एक नृशंस के ही समान असम- करदी थी। वह खल ऐसा दुष्ट हो गया था कि छोटे बालकों को—युवकों को—वृद्धों को और स्त्रियों को सदा ही पकड़ लिया करता था ॥६४॥ सबको मार-मार कर वह अत्यन्त निर्दयता से सरयू नदी में फेंक दिया करता था। फिर तो सभी नगर निवासियों ने उसकी उस नीचता को देखा था। वह सभी का निरादर करके डांट देता था। ऐसा जब बहुत बार हुआ जो उन सबने जाकर राजा से कहा था ओर राजा ने अब यह सुना तो उसको प्रयत्न पूर्वक अपने समीप में बुलाया था। राजा ने कितनी ही बार बहुत अधिक दुःख से संयुत होकर उसको इस महान नीच कुकर्म से रोका था। बहुत बार उसको रोका भी गया था तो भी महात्मा पिता का कथन उसने नहीं माना था ॥६५-५७॥ जिस तरह से संतप्त जल में यव हो जाते हैं उसी प्रकार की दशा राजा की हो गयी थी। जब राजा में उस महान पापकर्म से हटाने की शक्ति न रही थी तो बहुत ही वह दुःखित हो गया था। लोक में बड़ा भारी अपवाद होगा कि राजा ही का पुत्र ऐसा अन्याय करता है तो अब न्याय कहाँ होगा—इससे डरकर उसने उस समय में विषयों का त्याग किया था ॥६८-६६॥

२७ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अश्वमोचन वर्णन

जैमिनिरुवाच—
त्यक्त्वा पुत्रं स धर्मात्मा सगरः प्रेम तद्गतम् ।
धर्मशीले तदा बाले चकारांशुमति प्रभुः ॥१॥
एतस्मिन्नेव काले तु सुमत्यास्तनया नृप ।
ववृधुः संघशः सर्वे परस्परमनुव्रताः ॥२
वज्रसंहननाः क्रूरा निर्दया निरपत्रपाः ।
अधर्मशीला नितरामेकधर्माण एव च ॥३
एककार्याभिनिरताः क्रोधना मूढचेतसः ।
अधृष्याः सर्वभूतानां जनोपद्रवकारिणः ॥४
विनयाचारसन्मार्गनिरपेक्षाः समंततः ।
बबाधिरे जगत्सर्वमसुरा इव कामतः ॥५
विध्वस्तयज्ञसन्मार्गं भुवनं तैरुपद्रुतम् ।
निःस्वाध्यायवषट्कारं बभूवार्तं विशेषतः ॥६
विध्वस्यमाने सुभृशं सागरैर्वरदर्पितैः ।
प्रक्षोभं परमं जग्मुर्देवासुरमहोरगाः ॥७

जैमिनी मुनि ने कहा—उस परम धर्मात्मा नृप सगर ने अपने पुत्र असमञ्जस का त्याग कर दिया था और उसमें जो उसका प्रेम था उसको तब तब धर्मशील बालक अंशुमान में उस प्रभु ने किया था ।१। इसी काल में सुमति नाम वाली रानी के जो साठ हजार पुत्र थे हे नृप ! वे सब समुदाय में समुत्पन्न होकर परस्पर में अनुव्रत होकर बढ़कर बड़े हो गये थे ।२। ये सभी एक ही धर्म वाले थे तथा वज्र के समान सुदृढ़ शरीरों वाले बहुत ही क्रूर-अत्यन्त निर्दयी और निर्लज्ज थे और निरन्तर अधर्म शील थे और धर्म को सर्वथा जानते ही नहीं थे ।३। ये सब एक ही कार्य में निरत रहते थे—बहुत अधिक क्रोधी और मूढ़ चित्तों वाले थे । ये सब समस्त प्राणियों को अधृष्य थे और जनों के लिए अत्यधिक पद्रवों के करने वाले थे ।४। ये सभी ओर से विनय पूर्वक आचरण और सन्मार्ग की अपेक्षा नहीं रखते थे । इन्होंने असुरों के ही समान स्वेच्छा से सम्पूर्ण जगत को बाधा पहुँचाई

अश्वमोचन वर्णन ] [ २१

थी ।५। उन्होंने यज्ञ के सन्मार्ग को विध्वस्त करके भुवन को उपद्रव से युक्त कर दिया था और इस जगत् को वेदाध्ययन और वषट्कार से रहित करके विशेष रूप से आर्त्त कर दिया था ।६। उस समय में वरदान से बढ़े हुए दर्प वाले सगर के पुत्रों के द्वारा बहुत अधिक विध्वस्तमान इस जगत् के हो जाने पर समस्त देव-असुर और महोरग अत्यधिक क्षोभ को प्राप्त हो गये थे ।७।

धरा सा सागराक्रांता न चलापि तदाचला ।
तपः समाधिभंगश्च प्रबभूव तपस्विनाम् ॥८
हव्यकव्यपरिभ्रष्टास्त्रिदशाः पितृभिः सह ।
दुःखेन महताविष्टा विरिञ्चिभवनं ययुः ॥९
तत्र गत्वा यथान्यायं देवाः शर्वपुरोगमाः ।
शशंसुः सकलं तस्मै सागराणां विचेष्टितम् ॥१०
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां ब्रह्मा लोकपितामहः ।
क्षणमंतर्मना भूत्वा जगाद सुरसत्तमः ।११
देवाः शृणुत भद्रं वो वाणीमवहिता मम ।
विनंक्ष्यंत्यचिरेणैव सागरा नात्र संशयः ॥१२
कालं कंचित्प्रतीक्षध्वं तेन सर्वं नियम्यते ।
निमित्तमात्रमन्यत्तु स एव सकलेशिता ।१३
तस्माद्युष्मद्धितार्थाय यद्वक्ष्यामि सुरोत्तमाः ।
सर्वैर्भवद्भिराधुना तत्कर्त्तव्यमतंद्रितैः ॥१४

यह वसुन्धरा अचला है तथापि उस समय में सगर के पुत्रों के द्वारा आक्रान्त होकर चलायमान हो गयी थी । उस समय में धरा की चलगति को देखकर बड़े-बड़े तपस्वियों की समाधि टूट गयी थी और तपश्चर्या का भंग हो गया था ।८। देवगण भी पितरों के साथ अपने हव्य-कव्य से जो भी उनके लिए समर्पित किए जाते थे उनसे परिभ्रष्ट हो गए थे और उनको महान् दुःख हो गया था तथा वे सभी अत्यन्त उत्पीड़ित होकर ब्रह्माजी के भवन पर गए थे ।९। वहाँ पर समस्त देवगण जिनमें शिव अग्रणी थे जाकर

२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

न्याय के अनुरूप उन्होंने ब्रह्माजी से निवेदन किया था कि सगर नृप के पुत्रों की भूमि पर कैसी कुचेष्टायें हो रही हैं ।१०। सब लोकों के पितामह ब्रह्माजी उनके कहे वचनों कर श्रवण करके एक क्षण के अन्दर विचार वाले हुए थे और इसके पश्चात् सुरों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ने उनसे कहा—।११। हे देवगणों ! आप सबका कल्याण होवे । अब आप लोग सावधान होकर मेरी वाणी का श्रवण कीजिए जो भी कुछ मैं आपके सामने इस समय में कह रहा हूँ—ये सगर के पुत्र सबके सब विनष्ट हो जायेंगे—यह सर्वथा सत्य है इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।१२। कुछ काल पर्यन्त प्रतीक्षा करो। समय के ही द्वारा सब नियमित हो जाया करता है । यह काल बड़ा बलवान है । अन्य तो केवल निमित्त ही हुआ करते हैं करने वाला तो वास्तव में काल ही होता है । यह ही सबको खाने वाला होता है। इसके सामने सब बल-वैभव और प्रताप धूल में मिल जाया करते हैं ।१३। हे सुरश्रेष्ठो ! मैं आप सभी के हित-सम्पादन होने के लिए जो भी कुछ कहूँगा वही अब आप सब को अतन्द्रित होकर कर डालना चाहिए ।१४।

विष्णोरंशेन भगवान्कपिलो जयतां वरः । जातो जगद्धितार्थाय योगीन्द्रप्रवरो भुवि ॥१५॥

अगस्त्यपीतसलिले दिव्यवर्षशतावधि । ध्यायन्नास्तेऽधुनाऽम्भोधावेकांते तत्र कुत्रचित् ॥१६॥

गत्वा यूयं ममादेशात्कपिलं मुनिपुंगवम् । ध्यानावसानमिच्छंतस्तिष्ठध्वं तदुपह्वरे ॥१७॥

समाधिविरतौ तस्य स्वाभिप्रायमशेषतः । नत्वा तस्मै वदिष्यध्वं स वः श्रेयो विधास्यति ॥१८॥

समाधिभंगश्च मुनेर्यथा स्यात्सागरैः कृतः । कुरुध्वं च तथा यूयं प्रवृत्तिं विबुधोत्तमाः ॥१९॥

जैमिनिरुवाच— इत्युक्तास्तेन विबुधास्तं प्रणम्य पितामहम् । गत्वा तं विबुधश्रेष्ठं ते कृतांजलयोऽब्रुवन् ॥२०॥

अश्वमोचन वर्णन ] [ २३

देवा ऊचुः- प्रसीद नो मुनिश्रेष्ठ वयं त्वां शरणं गताः । उपद्रुतं जगत्सर्वं सागरैः संप्रणश्यति ॥२१

जयशीलों में श्रेष्ठ भगवान् कपिल मुनि भगवान विष्णु के ही अंश से इस जगत के हित के लिए समतीर्ण हुए है। यह विष्णु भगवान का ही अंशावतार है और भूमण्डल में योगीन्द्रों में परम श्रेष्ठ हैं ।१५। अगस्त्य मुनि के द्वारा इस विशाल सागर का जल पी लेने पर दिव्य सौ वर्षों की अवधि हो गयी है वे इसी अम्भोधि में वहां पर किसी स्थल में इस समय में इस समय में ध्यान करने वाले स्थित हैं ।१६। मेरा यह आदेश है कि आप लोग मुनियों में परम श्रेष्ठ कपिलजी के समीप में चले जाओ। जब उनकी ध्यानावस्था का अन्त होवे तब तक इच्छा रखने वाले आप लोग वहीं उप-गह्वर में संस्थित रहें ।१७। जब उनकी समाधि समाप्त हो जावे तभी आप अपना अभिप्राय पूर्ण रूप से नमस्कार करके उनको बतला देवें । वही ऐसे शक्तिशाली हैं कि वे आप लोगों का कल्याण कर देंगे ।१८। हे देवगणो ! जिस भी रीति से उन मुनिवर की समाधि का भङ्ग सगर के पुत्रों द्वारा किया हुआ होवे आप लोगों को वैसी ही प्रवृत्ति करनी चाहिए। इसी से आप का कार्य सुसम्पन्न हो जायगा ।१९। जैमिनि मुनि ने कहा—पितामह के द्वारा जब देवगणों से इस तरह से कहा था तो वे सब पितामह को प्रणाम करके उन देवों में श्रेष्ठ मुनिवर के समीप में चले गये थे और हाथ जोड़कर उन्होंने उनसे कहा था ।२०। देवों ने कहा—हे मुनिश्रेष्ठ ! आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइए। हम लोग आपकी शरणागति में प्राप्त हुए हैं । राजा सगर के पुत्रों ने जगत् में बड़ा उपद्रव मचा दिया है और ऐसा हो गया है कि यह सम्पूर्ण जगत् विनष्ट ही हो जायगा ।२१।

त्वं किलाखिललोकानां स्थितिसंहारकारणः । विष्णोरंशेन योगींद्रस्वरूपो भुवि संस्थितः ॥२२ पुंसां तापत्रयार्त्तानामार्तिनाशाय केवलम् । स्वेच्छया ते धृतो देहो न तु त्वं तपतां वरः ।२३ ममसेव जगत्सर्वं स्रष्टुं संहर्तुमेव च । विधातुं स्वेच्छया ब्रह्मन्भवाञ्छक्नोत्यसंशयम् ॥२४

२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

त्वं नो धाता विधाता च त्वं गुरुस्त्वं परायणम्।
परित्राता त्वमस्माकं विनिवर्त्तय चापदम् ॥२५
शरणं भव विप्रेन्द्र विप्राणां विशेषतः।
सागरैर्दह्यमानानां लोकत्रयनिवासिनाम् ॥२६
ननु वै सात्विकी चेष्टा भवतीह भवादृशाम्।
त्रातुमर्हसि तस्मात्त्वं लोकानस्मांश्च सुव्रत ॥२७
न चेदकाले भगवन्विनंक्ष्यत्यखिलं जगत्।

जैमिनिरुवाच—
इत्युक्तः सकलैर्देवैरुन्मील्य नयने शनैः ॥२८

आप तो समस्त लोकों की स्थिति और संहार के कारण हैं। आप तो भगवान् विष्णु के अंश से ही अवतीर्ण हुए हैं और इस भूमण्डल में योगीन्द्र के स्वरूप को धारण करके समवस्थित हैं।२२। आप कोई महान् श्रेष्ठ तपस्वी ही नहीं हैं। आपने तो अपने इस देह को अपनी ही इच्छा से धारण किया है और यह भी केवल तीनों तापों से अत्यधिक आर्त्त पुरुषों की आर्त्ति पुरुषों की आर्ति के ही विनाश के लिए धारण किया है।२३। हे ब्रह्मन्! आप तो ऐसे अद्भुत शक्तिशाली हैं कि अपने मन से ही इस सम्पूर्ण जगत् का सृजन, संस्थिति और संहार अपनी इच्छा के अनुसार बिना किसी संशय के कर सकते है।२४। आप तो हमारे धाता और विधाता हैं तथा आप गुरु हैं और परायण हैं। आप हमारा परित्राण भी करने वाले हैं। अब आप हमारी इस वर्त्तमान आपदा को दूर भगाइए। ।२५। हे विप्रेन्द्र! आप हमारे रक्षक होइए और विशेष रूप से हम विप्रों की रक्षा करने वाले होइए। हम तीनों लोकों में निवासी सगर के पुत्रों के द्वारा दह्यमान हो रहे हैं।२६। हे सुव्रत! इस लोक में आप जैसे महापुरुषों की सात्विकी चेष्टा हुआ करती है। इसलिए आप समस्त लोकों की और हमारी रक्षा करने के योग्य हैं।२७। हे भगवान्! यदि आप ही हम सबकी रक्षा नहीं करेंगे तो यह सम्पूर्ण जगत् अकाल में ही विनष्ट हो जायगा। जैमिनि मुनि ने कहा—जब इस प्रकार से सब देवगणों ने अभ्यर्थना की थी तो कपिल मुनि ने धीरे से अपने दोनों नेत्रों को खोला था।२८।

विलोक्य तानुवाचेदं कपिलः सूनृतं वचः।

अश्वमोचन वर्णन ] [ २५

स्वकर्मणेव निर्दग्धाः प्रविनाङ्क्ष्यंति सागराः ॥२६ काले प्राप्ते तु युष्माभिः स तावत्परिपाल्यताम् । अहं तु कारणं तेषां विनाशाय दुरात्मनाम् ॥३० भविष्यामि सुरश्रेष्ठा भवतामर्थसिद्धये । मम क्रोधाग्निविप्लुष्टाः सागराः पापचेतसः ॥३१ भविष्यंतु चिरेणैव कालोपहतबुद्धयः । तस्माद्गतज्वरा देवा लोकाश्चैवाकुतोभयाः ॥३२ भवंतु ते दुराचाराः क्षिप्रं यास्यंति संक्षयम् । तद्ययं निर्भया भूत्वा व्रजध्वं स्वां पुरीं प्रति ॥३३ कालं कंचित्प्रतीक्षध्वं ततोऽभीष्टमवाप्स्यथ । कपिलेनैवमुक्तास्ते देवाः सर्वे सवासवाः ॥३४ तं प्रणम्य ततो जग्मुः प्रतीतास्त्रिदिवं प्रति । एतस्मिन्नंतरे राजा सगरः पृथिवीपतिः ॥३५

फिर उन सबका अवलोकन करके कपिल भगवान ने यह परम मुनृत वचन कहा था । ये सगर के पुत्र सब अपने ही कर्म से निर्दग्ध होकर विनष्ट होकर विनष्ट हो जायेंगे ।२६। जब भी इनके विनाश का काल प्राप्त होगा तभी नाश होगा । तब तक उस काल की आप सब लोग प्रतीक्षा कीजिए । और मैं तो उन दुष्ट आत्मा वालों के विनाश करने का कारण बनूँगा ।३० हे सुरश्रेष्ठो ! आप लोगों के अर्थ की सिद्धि के लिए केवल मैं कारण स्वरूप बनूँगा । महापापी ये सगर के पुत्र मेरे क्रोध की अग्नि से विप्लुष्ट होकर भस्मीभूत हो जायेंगे ।३१। ऐसा ही काल होगा कि इन सबकी बुद्धि उपहत हो जायगी और चिरकाल में इनका विनाश होगा । इसलिए सभी देवों का दुःख दूर हो जायगा और सभी लोक सभी ओर से भयहीन हो जायेंगे ।३२। वे सभी बुरे आचरण वाले हो जायेंगे । इसलिए अब आप लोग सब निर्भय होकर अपनी पुरी की ओर गमन कीजिए ।३३। आप लोगों को कुछ काल की प्रतीक्षा अवश्य ही करनी होगी । तभी आप अपने अभीप्सित की प्राप्ति करेंगे । जब इस प्रकार से कपिल मुनि के द्वारा देवगणों से कहा गया था तो इन्द्र के सहित सब देवों ने उनका अभिवादन किया था ।३४।

२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

फिर उन मुनीश्वर को प्रणाम करके परम समाश्वस्त होकर उन सबने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था। इसी बीच में पृथिवी के स्वामी राजा सगर ने एक महान् यज्ञ करने का विचार मन में किया था ।३५।

वाजिमेधं महायज्ञं कर्तुं चक्रे मनोरथम् ।
आहृत्य सर्वसंभारान्वसिष्ठानुमते तदा ॥३६
और्वाद्यैः सहितो विप्रैर्यथावद्दीक्षितोऽभवत् ।
दीक्षां प्रविष्टो नृपतिर्हयंसंचारणाय वै ॥३७
पुत्रान्सर्वान्समाहूय संदिदेश महयशाः ।
संचारयित्वा तुरगं परीत्य पृथिवीतले ॥३८
क्षिप्रं ममांतिकं पुत्राः पुनराहतुंमर्हथ ।

जैमिनिरुवाच-

ततस्ते पितुरादेशात्तमादाय तुरंगमम् ॥३९
परिचक्रमयामासुः सकले क्षितिमंडले ।
विधिचोदनयैवाश्वः स भूमौ परिवर्तितः ॥४०
न तु दिग्विजयार्थाय करादानार्थमेव च ।
पृथिवीभूभुजा तेन पूर्वमेव विनिर्जिता ॥४१
नृपाश्चोदारवीर्येण करदाः समरे कृताः ।
ततस्ते राजतनया निस्तोये लवणांबुधौ ॥४२
भूतले विविशुहृष्टाः परिवार्य तुरंगमम् ॥४३

उस समय में वसिष्ठ मुनि की अनुमति से सगर नृपति ने अश्वमेध नामक एक महान् यज्ञ के करने का मन में मनोरथ किया था और उस यज्ञ कार्य के सम्पादन करने के लिये सभी सम्भारों का समाहरण किया गया था ।३६। उस समय में और्व आदि जो विप्र थे उनके द्वारा राजा विधि-विधान के साथ दीक्षित हुआ था। जब राजा ने दीक्षा लेकर यज्ञ का समाचरण करने के लिये दीक्षा में प्रविष्ट हो गया था तो उसमें जो अश्व छोड़ा जाता है उसके भली भाँति चारण करने के लिये नियुक्ति की थी ।३७। महा यशस्वी सगर ने उन सब सहस्त्र पुत्रों को अपने समीप में बुलाकर उनको

सगर विनाश वर्णन ] [ २७

आदेश दिया था। इस अश्व को इस पृथ्वी तल में चारों ओर चारण कराने को गमन करो। ३८। फिर हे पुत्रो ! शीघ्र ही आप लोग घुमाकर इस अश्व को फिर मेरे पास ले आओ। जैमिनि मुनि ने कहा—इसके अनन्तर उन पुत्रों ने अपने पिताश्री की आज्ञा से उस अश्व को वहाँ से अपने साथ में ले लिया था। ३९। उन्होंने उस अश्व को समस्त पृथिवी तल में चारों ओर घुमाया था। विधि की प्रेरणा से ही वह अश्व भूमि में परिवर्तित हो गया था। ४०। उस राजा ने अश्व को दिग्विजय करने के लिये तथा करों का आदान करने के लिये तो छोड़ा ही नहीं था क्योंकि समस्त नृपों को तो नृप सगर ने पहिले ही जीत लिया था। ४१। उदार वीर्य वाले सगर ने सभी नृपों को समर में कर देने वाले बना लिया था। इसके पश्चात् जब वह अश्व दिखाई नहीं दिया था तो फिर उन समस्त राजपुत्रों ने जल से रहित क्षार सागर के पास गमन किया था। ४२। उस अश्व को परिवारित करके उन सबने भूतल के अन्दर प्रसन्न होकर प्रवेश किया था। ४३।


सगर विनाश वर्णन

जैमिनिरुवाच- तेषु तत्र निविष्टेषु वासवेन प्रचोदितः।
जहार तुरगं वायुस्तत्क्षणेन रसातलम् ॥१॥
अदृष्टमश्वं तैः सर्वैरपहृत्य सदागतिः।
आनयत्तत्पथा राजन्कपिलस्यांतिकं मुनेः ॥२॥
ततः समाकुलाः सर्वे विनष्टेऽश्वे नृपात्मजाः।
परीत्य वसुधां सर्वां प्रमार्गतस्तुरंगमम् ॥३॥
विचित्य पृथिवीं ते तु स पुराचलकाननाम्।
अपश्यंतो यज्ञपशुं दुःखं महदवाप्नुवन् ॥४॥
ततोऽयोध्यां समासाद्य ऋषिभिः परिवारिताम्।
दृष्ट्वा प्रणम्य पितरं तस्मै सर्वं न्यवेदयन् ॥५॥
परीत्य पृथ्वीमस्माभिर्निविष्टे वरुणालये।
रक्ष्यमाणोऽपि पश्यद्भिः केनापि तुरगो हृतः ॥६॥

२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

इत्युक्तस्तेरुषाविष्टस्तानुवाच नृपोत्तमः । प्रयास्यध्वमधर्मिष्ठाः सर्वेऽनावृत्तये पुनः ॥७

जैमिनि मुनि ने कहा—वे सगर के पुत्र जब वहाँ प्रविष्ट हो गये थे तो इसके अनन्तर इन्द्रदेव के द्वारा प्रेरणा प्राप्त करके वायु ने उसी क्षण में उस अश्व का हरण करके रसातल में पहुँचा दिया था ।१। जब उन सगर पुत्रों ने वहाँ कहीं पर भी उस अश्व को नहीं देखा था । वायु देव ने उसका अपहरण करके हे राजन् ! उसी मार्ग से कपिल मुनि के समीप में पहुँचा दिया था ।२। उस अश्व के वहाँ पर न दिखलाई देने पर सब नृप के पुत्र बहुत ही अधिक बेचैन हो गये थे और सम्पूर्ण पृथ्वी परिक्रमा लगाकर उस अश्व को खोज कर रहे थे ।३। उन्होंने पहिले सम्पूर्ण भूतल पर उस अश्व को ढूँढ़ा था फिर सब नगर-पर्वत और वनों में उसकी खोज की थी । जब उन्होंने कहीं पर भी उस यज्ञ के पशु अश्व को नहीं देखा था तो उन सबके हृदयों में बड़ा भारी दुःख हुआ था ।४। फिर वे सब अनेक ऋषियों से घिरी हुई अयोध्या पुरी में समागत हो गये थे । अपने पिता सगर का दर्शन कर उन्होंने प्रणाम करके सभी घटित घटना के विषय में अपने पिता से निवेदन किया था ।५। उन्होंने कहा—हम सबने पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके फिर वरुणालय (सागर) में प्रवेश किया था । हम उस अश्व को बराबर देखते रहे थे किन्तु हमारे द्वारा रक्षा किया हुआ भी वह अश्व को किसी के द्वारा सहसा हरणकर लिया गया है ।६। जब इस रीति से उनके द्वारा राजा सगर से कहा गया था तो यह सुनकर उसको बड़ा भारी क्रोध हो गया था और उस उत्तम नृप ने उन सबसे यह कहा था—तुम सब बड़े पापी हो, यहाँ से इसी समय निकलकर चले जाओ और फिर लौटकर अपना मुँह मत दिखाना ।७।

कथं भवद्भिर्जीवद्भिर्भावनष्टो वै दुरात्मभिः । तुरगेण विना सत्यं नेहागमनमस्ति वः ॥८ ततः समेत्य तस्मात्ते संप्रयाताः परस्परम् । ऊचुर्न दृश्यतेऽद्यापि तुरगः किं प्रकुर्महे ॥६ वसुधा विचिताऽस्माभिः सशैलवनकानना । न चापि दृश्यते वाजी तद्वार्त्तापि न कुत्रचित् ॥१०