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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ३३

सूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ३३ गया है। इसी प्रकार अन्य श्रुतियोमे भी वर्णन आया है। अतः यहाँ ब्रह्मको नेत्रमे दीखनेवाला कहना अयुक्त नहीं है; क्योकि ब्रह्म निर्लिप्त है और आँखमे दीखनेवाला पुरुष भी आँखके दोषोसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। इस समानताको लेकर ब्रह्मका तत्त्व समझानेके लिये ऐसा कहना उचित ही है। इसीलिये वहाँ यह भी कहा है कि 'आँखमे घी या पानी आदि जो भी वस्तु डाली जाती है, वह आँखकी पलकोंमें ही रहती है, द्रष्टा पुरुषका स्पर्श नहीं कर सकती।' सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तको दृढ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १ । २ । १५ ॥ च=तथा; सुखविशिष्टाभिधानात्=नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको आनन्दयुक्त बताया गया है, इसलिये; एव=भी (यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म ही है)। व्याख्या—उक्त प्रसङ्गमे यह कहा गया है कि 'यह नेत्रमे दीखनेवाला पुरुष ही अमृत, अभय और ब्रह्म है।' इस कथनमे निर्भयता और अमृतत्व—ये दोनो ही सुखके सूचक हैं। तथा जब अग्नियोने एकत्र होकर पहले-पहल उपदेश दिया है, वहाँ कहा गया है कि जो 'क' अर्थात् सुख है, वही 'ख' अर्थात् 'आकाश' है। भाव यह है कि वह ब्रह्म आकाशकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वव्यापी और आनन्दस्वरूप है। इस प्रकार उसे आनन्दयुक्त बतलाया जानेके कारण वह ब्रह्म ही है। सम्बन्ध—इसके सिवा, श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॥ १ । २ । १६ ॥ श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात्=उपनिषद् अर्थात् रहस्य-विज्ञानका श्रवण कर लेनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी जो गति बतायी है, वही गति इस पुरुषको जाननेवालेकी भी कही गयी है, इससे; च=भी (यही ज्ञात होता है कि नेत्रमे दीखनेवाला पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)। व्याख्या—इस प्रसङ्गके अन्तमे इस नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको जाननेवालेकी वही पुनरावृत्तिरहित गति अर्थात् देवयानमार्गसे जाकर ब्रह्मलोकमे ब्रह्मको प्राप्त होने और वहाँसे पुनः इस संसारमे न लौटनेकी बात बतायी गयी है; जो अन्यत्र वे० द० ३—

३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ ब्रह्मवेत्ताके लिये कही गयी है ( प्र० उ० १ । १० ) * । इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ब्रह्म ही है । सम्बन्ध—यदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिबिम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा—इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं— अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॥ १ । २ । १७ ॥ अनवस्थितेः = अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च = तथा; असम्भवात् = ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुण ) दूसरे किसीमें सम्भव न होनेसे; इतरः = ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न = नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है । व्याख्या—छाया-पुरुष या प्रतिबिम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिबिम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है । इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिने बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे सम्भव नहीं है; इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेंसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता । इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा गया है; यही मानना ठीक है।

  • अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः । 'किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं, वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते ( प्राप्त कर लेते ) हैं । यही प्राणोंका केन्द्र है । यह अमृत और निर्भय पद है । यह परम गति है । इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध— पुनरावृत्ति-निवारक है ।'

सूत्र १७—१९ ] अध्याय १ ३५

सूत्र १७—१९ ] अध्याय १ ३५ सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह बात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अब पुनः अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति बतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १ । २ । १८ ॥ अधिदैवादिषु = अधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमें; अन्तर्यामी = जिसे अन्तर्यामी बतलाया गया है (वह परब्रह्म ही है); तद्धर्म- व्यपदेशात् = क्योंकि वहाँ उसीके धर्मोंका वर्णन है । व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिने याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विषयमें प्रश्न किया है; फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको बताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सम्पूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है—'वह अन्तर्यामी देखनेमे न आने- वाला किन्तु स्वयं सबको देखनेवाला है, सुननेमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सब कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न आनेवाला किन्तु स्वयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननेमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।' इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है—यही मानना ठीक है । सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अब निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति अन्तर्यामी नहीं हो सकती— न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ॥ १ । २ । १९ ॥

३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ स्मार्तम्=सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान (जड प्रकृति); च=भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्माभिलापात्=क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है । व्याख्या—सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोंका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है; अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोंका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे 'अन्तर्यामी' के नामसे पर- ब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ है । सम्बन्ध—यह ठीक है कि जड होनेके कारण प्रकृतिको अन्तर्यामी नहीं कहा जा सकता । परन्तु जीवात्मा तो चेतन है तथा वह शरीर और इन्द्रियोंके भीतर रहनेवाला और उनका नियमन करनेवाला भी प्रत्यक्ष है । अतः उसीको अन्तर्यामी मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते है— शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ १ । २ । २० ॥ शारीरः=शरीरमे रहनेवाला जीवात्मा; च=भी; ( न= ) अन्तर्यामी नहीं है; हि=क्योकि; उभयेऽपि=माध्यन्दिनी तथा काण्व दोनो ही शाखावाले; एनम्=इस जीवात्माको; भेदेन=अन्तर्यामीसे भिन्न समझते हुए; अधीयते=अध्ययन करते है । व्याख्या—माध्यन्दिनी और काण्व—दोनो शाखाओवाले विद्वान् अन्तर्यामीको पृथिवी आदिकी भाँति जीवात्माके भी भीतर रहकर उसका नियमन करनेवाला मानते है । वहाँ जीवात्माको नियम्य और अन्तर्यामीको नियन्ता बताया गया है । इस प्रकार दोनोका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण वहाँ 'अन्तर्यामी' पद परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, जीवात्माका नहीं । १. 'य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मान- मन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' (शतपथब्रा० १४ । ५ । ३० ) २. 'यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञान५ शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' ( बृ० उ० ३ । ७ । २२ ) 'जो जीवात्मामे रहनेवाला, जीवात्माके भीतर है, जिसे जीवात्मा नही जानता, जीवात्मा जिसका शरीर है और जो उसके भीतर रहकर जीवात्माका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ।'

सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ ३७

सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ ३७ सम्बन्ध—उन्नीसवें सूत्रमे यह बात कही गयी है कि द्रष्टापन आदि चेतनके धर्म जड प्रकृतिमे नहीं घट सकते; इसलिये वह अन्तर्यामी नहीं हो सकती । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि मुण्डकोपनिषद्में जिसको अदृश्यता, अग्राह्यता आदि धर्मोंसे युक्त बतलाकर अन्तमे भूतोंका कारण बताया गया है, वह तो प्रकृति हो सकती है; क्योंकि उस जगह बताये हुए सभी धर्म प्रकृतिमें पाये जाते हैं। इसपर कहते हैं— अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॥ १ । २ । २१ ॥ अदृश्यत्वादिगुणकः=अदृश्यता आदि गुणोंवाला परब्रह्म परमेश्वर ही है; धर्मोक्तेः=क्योंकि उस जगह उसीके सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है । व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्मे यह प्रसङ्ग आया है कि महर्षि शौनक विधि- पूर्वक अङ्गिरा ऋषिकी शरणमे गये । वहाँ जाकर उन्होने पूछा—'भगवन् ! किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है ?' इसपर अङ्गिराने कहा—'जानने योग्य विद्याएँ दो हैं, एक अपरा, दूसरी परा । उनमेसे अपरा विद्या तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष है और परा वह है, जिससे उस अक्षर ब्रह्मको जाना जाता है ।' यह कहकर उस अक्षरको समझानेके लिये अङ्गिराने उसके गुण और धर्मोंका वर्णन करते हुए ( मु० १ । १ । ६ मे ) कहा— 'यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं तद् भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥' अर्थात् 'जो इन्द्रियोंद्वारा अगोचर है, पकड़नेमे आनेवाला नहीं है, जिसका कोई गोत्र नहीं है, वर्ण नहीं है, जो आँख, कान तथा हाथ-पैरसे रहित है, नित्य, व्यापक, सर्वत्र परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वथा अविनाशी है । उसको धीर पुरुष देखते है, वह समस्त भूतोका परम कारण है ।' फिर नवम मन्त्रमे कहा है— 'यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥'

३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे यह विराट्रूप समस्त जगत् तथा नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं।' यहाँ जिन सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है, वे परब्रह्म परमेश्वरके ही हैं। तथा एक ब्रह्मको जान लेनेपर ही सब कुछ जाना हुआ हो सकता है, अन्य किसीके जाननेसे नहीं। इसलिये उस प्रकरणमें जिसे अदृश्यता आदि गुणोंवाला बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—इसी बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ १ । २ । २२ ॥ विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम् = परमेश्वरसूचक विशेषणोंका कथन होनेसे तथा प्रकृति और जीवात्मासे उसको भिन्न बताये जानेके कारण; च = भी; इतरौ = जीवात्मा और प्रकृति; न = अदृश्यता आदि गुणोंवाला जगत्कारण नहीं हो सकते। व्याख्या—इस प्रकरणमे जिसको अदृश्यता आदि गुणोसे युक्त और सब भूतोंका कारण बताया गया है, उसके लिये 'सर्वज्ञ' आदि विशेषण दिये गये हैं, जो न तो प्रधान (जड प्रकृति) के लिये उपयुक्त हो सकते हैं और न अल्पज्ञ जीवात्माके लिये ही। इसके सिवा, उन दोनोको ब्रह्मसे भिन्न कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् (३। १। ७) मे उल्लेख है कि—'पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम्।' अर्थात् वह देखनेवालोके शरीरके भीतर यहीं हृदय-गुफामे छिपा हुआ है।' इसके अनुसार जीवात्मासे परमात्माकी भिन्नता स्वतः स्पष्ट हो जाती है। इसके सिवा, मुण्डक० ३। १। २ मे भी कहा है कि— 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥' 'शरीररूप वृक्षपर रहनेवाला यह जीवात्मा शरीरमे आसक्त होकर डूब रहा है। अपनेको असमर्थ समझकर मोहित हो शोक करता रहता है। परन्तु वह जब वहीं स्थित तथा भक्तजनोद्वारा सेवित अपनेसे भिन्न परमेश्वरको देख लेता है और उसकी महिमाको समझ लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है।' इस प्रकार इस मन्त्रमे स्पष्ट शब्दोद्वारा परमेश्वरको जीवात्मासे तथा शरीररूपी वृक्षसे भी भिन्न बताया गया है। अतः यहाँ जीव और

सूत्र २२-२४ ] अध्याय १ ३९

सूत्र २२-२४ ] अध्याय १ ३९ प्रकृति दोनोंमेंसे कोई भी अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त जगत्-कारण नहीं हो सकता । सम्बन्ध-इस प्रकरणमें जिसे समस्त भूतोंका कारण बताया गया है, वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, इसकी पुष्टिके लिये दूसरा प्रमाण उपस्थित करते हैं— रूपोपन्यासाच्च ॥ १ । २ । २३ ॥ रूपोपन्यासात् = श्रुतिमे उसीके निखिल लोकमय विराट् स्वरूपका वर्णन किया गया है, इससे; च = भी (वह परमेश्वर ही समस्त भूतोका कारण सिद्ध होता है)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (२ । १ । ४) में परब्रह्म परमेश्वरके सर्वलोकमय विराट्स्वरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है— 'अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥' 'अग्नि इस परमेश्वरका मस्तक है, चन्द्रमा ओर सूर्य दोनों नेत्र है, सब दिशाएँ दोनो कान हैं और प्रकट हुए वेद उसकी वाणी हैं । वायु इसका प्राण और संपूर्ण विश्व हृदय है । इसके पैरोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है । यही समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है।' इस प्रकार परमात्माके विराट् स्वरूपका उल्लेख करके उसे सबका अन्तरात्मा बताया गया है; इसलिये उक्त प्रकरणमे 'भूतयोनि'के नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, यह निश्चय होता है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद् (५ । १८ । २) में 'वैश्वानर'के स्वरूपका वर्णन करते हुए 'द्युलोक'को उसका मस्तक बताया है । 'वैश्वानर' शब्द जठराग्निका वाचक है । अतः यह वर्णन जठरानलके विषयमें है या अन्य किसीके ? इस शङ्काका निवारण करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है— वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ १ । २ । २४ ॥ वैश्वानरः = ( वहाँ ) 'वैश्वानर' नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है; साधारणशब्दविशेषात् = क्योकि उस वर्णनमे 'वैश्वानर' और 'आत्मा' इन साधारण शब्दोकी अपेक्षा ( परब्रह्मके बोधक ) विशेष शब्दोका प्रयोग हुआ है ।

४० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्मे पाँचवे अध्यायके ग्यारहवे खण्डसे जो प्रसङ्ग आरम्भ हुआ है, वह इस प्रकार है—'प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन तथा बुडिल—ये पाँचो ऋषि श्रेष्ठ गृहस्थ और महान् वेदवेत्ता थे। इन्होंने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि 'हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्मका क्या स्वरूप है ?' जब वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके तो यह निश्चय किया कि 'इस समय महर्षि उद्दालक वैश्वानर आत्माके ज्ञाता हैं, हमलोग उन्हींके पास चले।' इस निश्चयके अनुसार वे पाँचो ऋषि उद्दालक मुनिके यहाँ गये। उन्हें देखते ही मुनिने अनुमान कर लिया कि 'ये लोग मुझसे कुछ पूछेंगे, किन्तु मैं इन्हें पूर्णतया उत्तर नहीं दे सकूँगा। अतः अच्छा हो कि मैं इन्हें पहलेसे ही दूसरा उपदेष्टा बतला दूँ।' यह सोचकर उद्दालकने उनसे कहा— 'आदरणीय महर्षियो ! इस समय केवल राजा अश्वपति ही वैश्वानर आत्माके ज्ञाता हैं। आइये, हम सब लोग उनके पास चले।' यों कहकर उन सबके साथ उद्दालक मुनि वहाँ गये। राजाने उन सबका यथोचित सत्कार किया और दूसरे दिन उनसे यज्ञमे सम्मिलित होनेके लिये प्रार्थना करते हुए उन्हें पर्याप्त धन देनेकी बात कही। इसपर उन महर्षियोंने कहा--'हमें धन नहीं चाहिये, हम जिस प्रयोजनसे आपके पास आये हैं, वही दीजिये। हमें पता लगा है, आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका हमारे लिये उपदेश करे।' राजाने दूसरे दिन उन्हें अपने पास बुलाया और एक-एकसे क्रमशः पूछा, 'इस विषयमे आपलोग क्या जानते हैं ?' उनमेंसे उपमन्युपुत्र प्राचीनशालने उत्तर दिया— 'मैं 'द्युलोक'को आत्मा समझकर उसकी उपासना करता हूँ।' फिर सत्ययज्ञ बोले—'मैं सूर्यकी उपासना करता हूँ।' इन्द्रद्युम्नने कहा—'मैं वायुकी उपासना करता हूँ।' जनने अपनेको आकाशका और बुडिलने जलका उपासक बताया। इन सबकी बात सुनकर राजाने कहा--'आपलोग उस विश्वके आत्मा वैश्वानरकी उपासना तो करते हैं; परन्तु उसके एक-एक अङ्गकी ही उपासना आपके द्वारा होती है; अतः यह सर्वाङ्गपूर्ण नहीं है; क्योंकि—'तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः।' अर्थात् 'उस इस विश्वके आत्मा वैश्वानरका द्युलोक मस्तक है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश शरीरका मध्यभाग है, जल वस्ति-स्थान है,

सूत्र २५-२६ ] अध्याय १ ४१

सूत्र २५-२६ ] अध्याय १ ४१ पृथिवी दोनो चरण है, वेदी वक्षःस्थल है, दर्भ लोम है, गार्हपत्य अग्नि हृदय है अन्वाहार्यपचन अग्नि मन है और आहवनीय अग्नि मुख है।' इस वर्णनसे मालूम होता है कि यहाँ विश्वके आत्मारूप विराट् पुरुषको ही वैश्वानर कहा गया है; क्योकि इस प्रकरणमे जठराग्नि आदिके वाचक साधारण शब्दोकी अपेक्षा, परब्रह्मके वाचक विशेष शब्दोका जगह-जगह प्रयोग हुआ है। सम्बन्ध-इसी बातको दृढ करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं— स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥ १ । २ । २५ ॥ स्मर्यमाणम्=स्मृतिमे जो विराट्स्वरूपका वर्णन है, वह; अनुमानम्= मूलभूत श्रुतिके वचनका अनुमान कराता हुआ वैश्वानरके 'परमेश्वर' होनेका निश्चय करानेवाला है; इति स्यात्=इसलिये इस प्रकरणमे वैश्वानर परमात्मा ही है। व्याख्या-महाभारत, शान्तिपर्व ( ४७ । ७० ) मे कहा है— 'यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षु. दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ॥' 'अग्नि जिसका मुख, द्युलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथिवी दोनो चरण, सूर्य नेत्र तथा दिशाएँ कान है, उस सर्वलोकस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।' इस प्रकार इस स्मृतिमे परमेश्वरका अखिल विश्वके रूपमें वर्णन आया है। स्मृति- के वचनसे उसकी मूलभूत किसी श्रुतिका होना सिद्ध होता है। उपर्युक्त छान्दोग्य-श्रुतिमे जो वैश्वानरके स्वरूपका वर्णन है, वही पूर्वोक्त स्मृतिवचनका मूल आधार है। अतः यहाँ उस परब्रह्मके विराट्स्वरूपको ही वैश्वानर कहा गया है, यह बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है। अतएव जहाँ-जहाँ आत्मा या परमात्माके वर्णनमे 'वैश्वानर' शब्दका प्रयोग आवे, वहाँ उसे परब्रह्मके विराट्स्वरूपका ही वाचक मानना चाहिये, जठरानल या जीवात्माका नहीं। माण्डूक्योपनिषद्मे ब्रह्मके चार पादोका वर्णन करते समय ब्रह्मका पहला पाद वैश्वानरको बताया है। वहाँ भी वह परमेश्वरके विराट्स्वरूपका ही वाचक है; जठराग्नि या जीवात्माका नहीं। सम्बन्ध-उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं— शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्ट्युपदेशाद- संभवात्पुरुषमपि चैनमधीयते ॥ १ । २ । २६ ॥

प्रकरणमे वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है )।

४२ वेदान्त-दर्शन [पाद २ चेत्=यदि कहो; शब्दादिभ्यः=शब्दादि हेतुओंसे अर्थात् अन्य श्रुतिमे वैश्वानर शब्द अग्निके अर्थमे विशेषरूपमें प्रयुक्त हुआ है और इस मन्त्रमे गार्हपत्य आदि अग्नियोंको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है, इसलिये; च=तथा; अन्तः- प्रतिष्ठानात्=श्रुतिमें वैश्वानरको शरीरके भीतर प्रतिष्ठित कहा गया है, इसलिये भी; न=(यहाँ वैश्वानर शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक) नहीं है; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है; तथा दृष्ट्युपदेशात्=क्योंकि वहाँ वैश्वानरमें ब्रह्मदृष्टि 'करनेका उपदेश है; असंम्भवात्=इसके सिवा, केवल जठरानलका विराट्रूपमें वर्णन होना संभव नहीं है, इसलिये; च=तथा; एनम्=इस वैश्वानरको; पुरुषम्=‘पुरुष’ नाम देकर; अपि=भी; अधीयते=पढ़ते है ( इसलिये उक्त प्रकरणमे वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है )। व्याख्या—यदि कहो कि अन्य श्रुतिमे ‘स यो हैतमेवमग्निं वैश्वानरं पुरुषविधं पुरुषेऽन्तःप्रतिष्ठितं वेद ।’ ( शतपथब्रा० १०।६।१।११) अर्थात् ‘जो इस वैश्वानर अग्निको पुरुषके आकारका तथा पुरुषके भीतर प्रतिष्ठित जानता है ।’ इस प्रकार वैश्वानर शब्द अग्निके विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ है, तथा जिस श्रुतिपर विचार चल रहा है, इसमे भी गार्हपत्य आदि तीनो अग्नियोको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है । इसी प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा है कि ‘मैं ही वैश्वानररूपसे प्राणियोंके शरीरमे स्थित हो चार प्रकारके अन्नका पाचन करता हूँ।’ (१५।१४) इन सब कारणोंसे यहाँ वैश्वानरके नामसे जठराग्निका ही वर्णन है, परमात्माका नहीं, तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि शतपथब्राह्मणकी श्रुतिमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्म- दृष्टि करानेके उद्देश्यसे ही है । यदि ऐसा न होता तो उसको पुरुष नहीं कहा जाता । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामे भी जो वैश्वानर अग्निको सब प्राणियोंके शरीरमें स्थित बताया है, वहाँ भी उसमे परमात्मबुद्धि करानेके लिये भगवान्ने अपनी विभूतिके रूपमे ही कहा है । इसके सिवा, जिसपर विचार चल रहा है, उस श्रुतिमे समस्त ब्रह्माण्डको ‘वैश्वानर’ का शरीर बताया है, सिरसे लेकर पैरतक उसके अङ्गोमे समस्त लोकोंकी कल्पना की गयी है । यह जठराग्निके लिये असम्भव भी है । एवं शतपथब्राह्मणमें तथा यहाँ भी इस वैश्वानरको पुरुषके आकारवाला और पुरुष कहा गया है; जो कि जठराग्निके उपयुक्त नहीं है । इन सब कारणोंसे इस प्रकरणमे कहा हुआ वैश्वानर परब्रह्म परमेश्वर ही है । जठराग्नि या अन्य कोई नहीं ।

सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ४३

सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ४३ सम्बन्ध—इस प्रसङ्गमें पृथक्-पृथक् उपास्यरूपसे आये हुए 'दिव्', 'आदित्य', 'वायु,' 'आकाश', 'जल' तथा 'पृथिवी' भी वैश्वानर नहीं है; यह सिद्ध करनेके लिये कहते हैं— अत एव न देवता भूतं च ॥ १ । २ । २७ ॥ अतः=उपर्युक्त कारणोंसे; एव=ही ( यह भी सिद्ध होता है कि ); देवता=द्यौ, सूर्य आदि लोकोंके अधिष्ठाता देवगण; च=और; भूतम्=आकाश आदि भूतसमुदाय ( भी ); न=वैश्वानर नहीं है। व्याख्या—उक्त प्रकरणमे 'द्यौ' 'सूर्य' आदि लोकोकी तथा आकाश, वायु आदि भूतसमुदायकी अपने आत्माके रूपमे उपासना करनेका प्रसङ्ग आया है। इसलिये सूत्रकार स्पष्ट कर देते हैं कि पूर्वसूत्रमे बताये हुए कारणोसे यह भी समझ लेना चाहिये कि उन-उन लोकोके अभिमानी देवताओ तथा आकाश आदि भूतोंका भी 'वैश्वानर' शब्दसे ग्रहण नहीं है; क्योकि समस्त ब्रह्माण्डको वैश्वानरका शरीर बताया गया है। यह कथन न तो देवताओके लिये सम्भव हो सकता है और न भूतोके लिये ही। इसलिये यही मानना चाहिये कि 'जो विश्वरूप भी है और नर ( पुरुष ) भी, वह वैश्वानर है।' इस व्युत्पत्तिके अनुसार परब्रह्म परमेश्वरको ही वैश्वानर कहा गया है। सम्बन्ध—पहले २६वें सूत्रमें यह बात बतायी गयी है कि शतपथब्राह्मणके मन्त्रमे जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि करानेके उद्देश्यसे है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शालग्राम-शिलामें विष्णुकी उपासनाके सदृश यहाँ 'वैश्वानर' नामक जठराग्निमें परमेश्वरकी प्रतीकोपासना बतलानेके लिये 'वैश्वानर' नामसे उस परब्रह्मका वर्णन है; अतः इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं— साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ १ । २ । २८ ॥ साक्षात्='वैश्वानर' शब्दको साक्षात् परब्रह्मका वाचक माननेमे; अपि=भी; अविरोधम्=कोई विरोध नहीं है, ऐसा; जैमिनिः ( आह )=आचार्य जैमिनि कहते हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कथन है कि वैश्वानर शब्दको साक्षात् विश्वरूप ३*

४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ परमात्माका वाचक माननेमे कोई विरोध नहीं है । अतः यहाँ जठराग्निको प्रतीक मानकर उसके रूपमे परमात्माकी उपासना माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है । सम्बन्ध-उपर्युक्त सूत्रोंद्वारा यह बात सिद्ध की गयी कि 'वैश्वानर' नामसे इस प्रकरणमें परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया गया है । परन्तु निर्विकार निराकार अव्यक्त परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार साकार विराट्‌रूपमें देशविशेषसे सम्बद्ध बतलाना किस अभिप्रायसे है ? निर्गुण निराकारको सगुण साकार बताना विरुद्ध-सा प्रतीत होता है । इसपर २९ वें सूत्रसे ३१ वें तक विभिन्न आचार्यों- का मत बताते हुए अन्तमें ३२ वें सूत्रमें अपना सिद्धान्त कहकर सूत्रकार इस दूसरे पादको समाप्त करते हैं— अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ॥ १ । २ । २९ ॥ अभिव्यक्तेः= (भक्तोपर अनुग्रह करनेके लिये) देश-विशेषमे ब्रह्मका प्राकट्य होता है, इसलिये; (अविरोधः= ) कोई विरोध नहीं है; इति=ऐसा; आश्मरथ्यः=आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं । व्याख्या—आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि भक्तजनोपर अनुग्रह करके उन्हें दर्शन देनेके लिये भगवान् समय-समयपर उनकी श्रद्धाके अनुसार नाना रूपोमे प्रकट होते हैं; तथा अपने भक्तोको दर्शन, स्पर्श और प्रेमालाप आदिके द्वारा सुख पहुँचाने, उनका उद्धार करने और जगत्‌मे अपनी कीर्ति फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोको परम लाभ पहुँचानेके लिये भगवान् मनुष्य आदिके रूपमे भी समय-समयपर प्रकट होते हैं । यह बात उपनिषद् (केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोसे भी प्रमाणित है । इस कारण विराट्‌रूपमे उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार तथा देश-विशेषसे सम्बद्ध माननेमे कोई विरोध नहीं है; क्योकि वह सर्वसमर्थ भगवान् देश-कालातीत और देशकालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी है। वह जिस प्रकार निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है । यह बात माण्डूक्यो- पनिषद्‌में परब्रह्म परमात्माके चार पादोका वर्णन करके भलीभाँति समझायी गयी है । सम्बन्ध—अब इस विषयमे बादरि आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १ । २ । ३० ॥

सूत्र २९-३२ ] अध्याय १ ४५

सूत्र २९-३२ ] अध्याय १ ४५ अनुस्मृतेः=विराट्रूपमें परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करनेके लिये; उसको देश-विशेषसे सम्बद्ध बतानेमे ( अविरोधः= ) कोई विरोध नहीं है; ( इति= ) ऐसा; बादरिः=बादरि नामक आचार्य मानते हैं। व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर यद्यपि देशकालातीत है, तो भी उनका निरन्तर भजन, ध्यान, स्मरण करनेके लिये उन्हें देश-विशेषमें स्थित मानने, कहने और समझनेमें कोई विरोध नहीं है; क्योकि भगवान् सर्वसमर्थ है। उनके भक्त उनका जिस-जिस रूपमे चिन्तन करते है, उनपर कृपा करनेके लिये वे उसी- उसी रूपमे उनको मिलते हैं।* सम्बन्ध—इसी विषयमे आचार्य जैमिनिका मत बताते हैं— सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥ १ । २ । ३१ ॥ सम्पत्तेः=परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है, इसलिये ( उसे देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमे कोई विरोध नहीं है ); इति=ऐसा; जैमिनिः=जैमिनि आचार्य मानते हैं; हि=क्योकि; तथा=ऐसा ही भाव; दर्शयति= दूसरी श्रुति भी प्रकट करती है। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका यह कथन है कि परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है; अतः उस निर्विकार, निराकार, देशकालातीत परमात्माको सगुण, साकार और किसी देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमे कोई विरोध नहीं है; क्योकि दूसरी श्रुति भी ऐसा ही भाव प्रकट करती है। ( मु० उ० २ । १ । ४ )† सम्बन्ध—अब सूत्रकार अपने मतका वर्णन करते हुए इस पादका उपसंहार करते हैं— आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥ १ । २ । ३२ ॥ अस्मिन्=इस वेदान्त-शास्त्रमे, एनम्=इस परमेश्वरको; ( एवम्= ) ऐसा; च= ही; आमनन्ति=प्रतिपादन करते हैं।

  • श्रीमद्भागवतमे भी ऐसा ही कहा गया है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय । ( ३ । ९ । १२ ) 'महान् यशस्वी परमेश्वर ! आपके भक्तजन अपने हृदयमे आपको जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते है, आप उन संत-महात्माओपर अनुग्रह करनेके लिये वही-वही शरीर धारण कर लेते हैं।' † यह मन्त्र पृष्ठ ३९ के अन्तर्गत २३ वें सूत्रकी व्याख्यामे अर्थसहित आ गया है।

४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—इस वेदान्तशास्त्रमे सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके निवास- स्थान, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन करते है* इस विषयमे शास्त्र ही प्रमाण है । युक्ति-प्रमाण यहाँ नहीं चल सकता; क्योंकि परमात्मा तर्कका विषय नहीं है । वह सगुण, निर्गुण, साकार- निराकार, सविशेष-निर्विशेष आदि सब कुछ है । यह विश्वास करके साधकको उसके स्मरण और चिन्तनमे लग जाना चाहिये । वह व्यापक भगवान् सभी देशोंमे सर्वदा विद्यमान है । अतः उसको किसी भी देश-विशेषसे संयुक्त मानना विरुद्ध नहीं है तथा वह सब देशोंसे सदा ही निर्लिप्त है ! इस कारण उसको देश-कालातीत मानना भी उचित ही है । अतः सभी आचार्योंकी मान्यता ठीक है । दूसरा पाद सम्पूर्ण ।

  • अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ( श्वेता० ५ । १३ ) ‘दुर्गम संसारके भीतर व्याप्त, आदि-अन्तसे रहित, समस्त जगत्की रचना करने- वाले, अनेक रूपधारी, समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए एक अद्वितीय परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है ।’

तीसरा पाद

सम्बन्ध—पहले दो पादोंमें सर्वान्तर्यामी परब्रह्म परमात्माके व्यापक रूपका भलीभाँति प्रतिपादन किया गया । अब उसी परमेश्वरको सबका आधार बतलाते हुए तीसरा पाद आरम्भ करते हैं—

द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥ १ । ३ । १ ॥

द्युभ्वाद्यायतनम् = ( मु० उ० २ । २ । ५ मे ) स्वर्ग और पृथिवी आदिका जो आधार बताया गया है ( वह परब्रह्म परमात्मा ही है ); स्वशब्दात् = क्योंकि वहाँ उस परमात्माके बोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् ( २ । २ । ५ ) मे कहा गया है कि— 'यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥' अर्थात् 'जिसमे स्वर्ग, पृथिवी और उसके बीचका आकाश तथा समस्त प्राणोंके सहित मन गुँथा हुआ है, उसी एक सबके आत्मरूप परमेश्वरको जानो, दूसरी सब बातोको सर्वथा छोड़ दो । यही अमृतका सेतु है ।' इस मन्त्रमें जिस एक आत्माको उपर्युक्त ऊँचे-से-ऊँचे स्वर्ग और नीचे पृथिवी आदि सभी जगत्‌का आधार बताया है; वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं; क्योंकि इसमे परब्रह्मबोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा हेतु देते हैं—

मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । २ ॥

मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् = ( उस सर्वाधार परमात्माको ) मुक्त पुरुषोंके लिये प्राप्य बतलाया गया है, इसलिये ( वह जीवात्मा नहीं हो सकता ) । व्याख्या—उक्त उपनिषद्मे ही आगे चलकर कहा गया है कि— 'यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वांनामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥' (मु० उ० ३।२।८) 'जिस प्रकारबहती हुई नदियों नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती

४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ है, वैसे ही ज्ञानी महात्मा नामरूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है।' ' इस प्रकार श्रुतिने परमपुरुष परमात्माको मुक्त ( ज्ञानी ) पुरुषोंके लिये प्राप्तव्य बताया है; इसलिये ( मु० उ० २।२।५ ) में द्युलोक और पृथिवी आदिके आधाररूपसे जिस 'आत्मा'का वर्णन आया है, वह 'जीवात्मा' नहीं, साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही है। इसके पूर्ववर्ती चौथे मन्त्रमें भी परमात्माको जीवात्माका प्राप्य बताया गया है। वह मन्त्र इस प्रकार है-- 'प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ 'प्रणव तो धनुष है और जीवात्मा बाणके सदृश है। ब्रह्मको उसका लक्ष्य कहते है। प्रमादरहित ( सतत सावधान ) मनुष्यके द्वारा वह लक्ष्य बींधा जाने योग्य है; इसलिये साधकको उचित है कि उस लक्ष्यको बेधकर बाणकी ही भाँति उसमे तन्मय हो जाय-सब बन्धनोंसे मुक्त हो सदा परमेश्वरके चिन्तनमे ही तत्पर रहकर तन्मय हो जाय।' • इस प्रकार इस प्रसङ्गमे जगह-जगह परमात्माको जीवका प्राप्य बताये जानेके कारण पूर्वोक्त श्रुतिमे वर्णित द्युलोक आदिका आधारभूत आत्मा परब्रह्म ही हो सकता है; दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध-अब यहाँ यह शंका होती है कि पृथिवी आदि सम्पूर्ण भूत- प्रपञ्च जड प्रकृतिका कार्य है; कार्यका आधार कारण ही होता है; अतः प्रधान ( जड प्रकृति ) को ही सबका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं- नानुमानमतच्छब्दात् ॥ १ । ३ । ३ ॥ अनुमानम् = अनुमान-कल्पित प्रधान; न=द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार नहीं हो सकता; अतच्छब्दात् = क्योकि उसका प्रतिपादक कोई शब्द ( इस प्रकरणमे ) नहीं है। व्याख्या-इस प्रकरणमे ऐसा कोई शब्द नहीं प्रयुक्त हुआ है, जो जड प्रकृतिको स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार बताता हो। अतः उसे इनका आधार नहीं माना जा सकता। वह जगत्का कारण नहीं है, यह बात तो पहले ही -सिद्ध की जा चुकी है। अतः उसे कारण बताकर, इनका आधार माननेके लिये तो कोई सम्भावना ही नहीं है।

सूत्र ३-६ ] अध्याय १ ४९

सूत्र ३-६ ] अध्याय १ ४९ सम्बन्ध—प्रकृतिका वाचक शब्द उस प्रकरणमें नहीं है, यह तो ठीक है ? परन्तु जीवात्माका वाचक 'आत्म' शब्द तो वहाँ है ही; अतः उसीको द्युलोक आदिका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं— प्राणभृच्च ॥ १ । ३ । ४ ॥ प्राणभृत् = प्राणधारी जीवात्मा; च = भी; ( न= ) द्युलोक आदिका आधार नहीं हो सकता; ( क्योंकि उसका वाचक शब्द भी इस प्रकरणमे नहीं है ) । व्याख्या—जैसे प्रकृतिका वाचक शब्द इस प्रकरणमे नहीं है, वैसे ही जीवात्माका बोधक शब्द भी नहीं प्रयुक्त हुआ है । 'आत्मा' शब्द अन्यत्र जीवात्माके अर्थमे प्रयुक्त होनेपर भी इस प्रकरणमे वह जीवात्माका वाचक नहीं है; क्योकि मु० उ० ( २ । २ । ७ ) मे इसके लिये 'आनन्दरूप' और 'अमृत' विशेषण दिये गये हैं; जो कि परब्रह्म परमात्माके ही अनुरूप है । इसलिये प्राणधारी जीवात्मा भी द्युलोक आदिका आधार नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—उपर्युक्त अभिप्रायकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण देते हैं— भेदव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ५ ॥ भेदव्यपदेशात् = यहाँ कहे हुए आत्माको जीवात्मासे भिन्न बताये जानेके कारण; ( प्राणभृत् न= ) प्राणधारी जीवात्मा सबका आधार नहीं है । व्याख्या—इसी मन्त्र ( मु० उ० २ । २ । ५ ) मे यह बात कही गयी है कि 'उस आत्माको जानो ।' अतः ज्ञातव्य आत्मासे उसको जाननेवाला भिन्न होगा ही । इसी प्रकार आगेवाले मन्त्र ( मु० उ० ३ । १ । ७ ) मे उस आत्माको जाननेवालेकी हृदय-गुफामे छिपा हुआ बताया गया है । इससे भी ज्ञातव्य आत्माकी भिन्नता सिद्ध होती है; इसलिये इस प्रकरणमें बतलाया हुआ द्युलोक आदिका आधार परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा नहीं । सम्बन्ध—यहाँ जीवात्मा और जड प्रकृति दोनो ही द्युलोक आदिके आधार नहीं हैं, इसमें दूसरा कारण बताते हैं— प्रकरणात् ॥ १ । ३ । ६ ॥ प्रकरणात् = यहाँ परब्रह्म परमात्माका प्रकरण है, इसलिये; ( भी यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और जड प्रकृति द्युलोक आदिके आधार नहीं है ) । वे० द० ४—

५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—इस प्रकरणमे आगे-पीछेके सभी मन्त्रोमे उस परमात्माको सर्वाधार, सबका कारण, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् बताकर उसीको जीवात्माके लिये प्राप्तव्य ब्रह्म कहा है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मा एक दूसरेसे भिन्न है तथा यहाँ बतलाया हुआ स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार वह परब्रह्म ही है; जीव या जड प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—इसके सिवा-- स्थित्यदनाभ्यां च ॥ १ । ३ । ७ ॥ स्थित्यदनाभ्याम् = एककी शरीरमे साक्षीरूपसे स्थिति और दूसरेके द्वारा सुख-दुःखप्रद विषयका उपभोग बताया गया है, इसलिये; च = भी ( जीवात्मा और परमात्माका भेद सिद्ध होता है)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् ( ३ । १ । १ ) मे कहा है— 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥' 'एक साथ रहते हुए परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी ( जीवात्मा और परमात्मा ) एक ही शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते है। उन दोनोमेसे एक ( जीवात्मा ) तो उस वृक्षके कर्मफलरूप सुख-दुःखोंका स्वाद ले-लेकर ( आसक्तिपूर्वक ) उपभोग करता है, किन्तु दूसरा ( परमात्मा ) न खाता हुआ केवल देखता रहता है।' इस वर्णनमे जीवात्माको कर्मफलका भोक्ता तथा परमात्माको केवल साक्षीरूपसे स्थित रहनेवाला बताया गया है। इससे दोनोका भेद स्पष्ट है। अतः इस प्रकरणमे द्युलोक, पृथिवी आदि समस्त जड- चेतनात्मक जगत्का आधार परब्रह्म परमेश्वर ही सिद्ध होता है, जीवात्मा नहीं। सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें यह बात कही गयी कि जिसे द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार बताया गया है, उसीको 'आत्मा' कहा गया है; अतः वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा नही। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के सातवें अध्यायमें नारदजीके द्वारा आत्माका स्वरूप पूछे जानेपर सनत्कुमारजीने क्रमशः नाम, वाणी, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, जल, तेज, आकाश, स्मरण और आशाको उत्तरोत्तर बड़ा बताया

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ ५१

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ ५१ है। फिर अन्तमें प्राणको इन सबकी अपेक्षा बड़ा बताकर उसीकी उपासना करनेके लिये कहा है। उसे सुनकर नारदजीने फिर कोई प्रश्न नहीं किया है। इस वर्णनके अनुसार यदि इस प्रकरणमें सबसे बड़ा प्राण है और उसीको 'भूमा' एवं आत्मा भी कहते हैं; तब तो पूर्व प्रकरणमे भी सबका आधार प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही मानना चाहिये; इसका समाधान करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है-- भूमा संप्रसादादध्युपदेशात् ॥ १ । ३ । ८ ॥ भूमा = ( उक्त प्रकरणमे कहा हुआ ) 'भूमा' ( सबसे बडा ) ब्रह्म ही है; संप्रसादात् = क्योकि उसे प्राणशब्दवाच्य जीवात्मासे भी; अधि=ऊपर (बड़ा); उपदेशात् = बताया गया है । व्याख्या-उक्त प्रकरणमें नाम आदिके क्रमसे एककी अपेक्षा दूसरेको बड़ा बताते हुए पंद्रहवे खण्डमे प्राणको सबसे बड़ा बताकर कहा है—'यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्व समर्पितम् । प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति । प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राण. स्वसा प्राण आचार्य. प्राणो ब्राह्मण ।' ( छा० उ० ७ । १५ । १ ) अर्थात् 'जैसे अरे. रथचक्रकी नाभिके आश्रित रहते है, उसी प्रकार समस्त जगत् प्राणके आश्रित है, प्राण ही प्राणके द्वारा गमन करता है, प्राण ही प्राण देता है, प्राणके लिये देता है, प्राण पिता है, प्राण माता है, प्राण भ्राता है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है।' इससे यह मालूम होता है कि यहाँ प्राणके नामसे जीवात्माका वर्णन है, क्योंकि सूत्रकारने यहाँ उस प्राणका ही दूसरा नाम 'संप्रसाद' रक्खा है और संप्रसाद नाम जीवात्माका है, यह बात इसी उपनिषद् ( छा० उ० ८ । ३ । ४ ) मे स्पष्ट कही गयी है । इस प्राणशब्दवाच्य जीवात्माके विषयमे आगे चलकर यह भी कहा है कि 'यह सब कुछ प्राण ही है, इस प्रकार जो चिन्तन करनेवाला, देखनेवाला और जाननेवाल' है, वह अतिवादी होता है।' इसलिये यहाँ यह धारणा होनी स्वाभाविक है कि इस प्रकरणमे प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही सबसे बड़ा बताया गया है; क्योंकि इस उपदेशको सुनकर नारदजीने पुन. अपनी ओरसे कोई प्रश्न नहीं उठाया । मानो उन्हे अपने प्रश्नका पूरा उत्तर

प्रकरणमे ‘भूमा’ शब्द सत्य ज्ञानानन्दस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका

५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ मिल गया हो। परंतु भगवान् सनत्कुमार तो जानते थे कि इससे आगेकी बात समझाये बिना, इसका ज्ञान अधूरा ही रह जायगा, अतः उन्होंने नारदके बिना पूछे ही सत्य शब्दसे ब्रह्मका प्रकरण उठाया अर्थात् ‘तु’ शब्दका प्रयोग करके यह स्पष्ट कर दिया कि ‘वास्तविक अतिवादी तो वह है, जो सत्यको जानकर उसके बलपर प्रतिवाद करता है।’ इस कथनसे नारदके मनमे सत्य तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके उसे जाननेके साधनरूप विज्ञान, मनन, श्रद्धा, निष्ठा और क्रियाको बताया। फिर सुखरूपसे भूमाको अर्थात् सबसे महान् परब्रह्म परमात्माको बतलाकर प्रकरणका उपसंहार किया। इस प्रकार प्राण- शब्दवाच्य जीवात्मासे अधिक (बड़ा) भूमाको बताये जानेके कारण इस प्रकरणमे ‘भूमा’ शब्द सत्य ज्ञानानन्दस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है। प्राण, जीवात्मा अथवा प्रकृतिका वाचक नहीं। सम्बन्ध—इतना ही नहीं, अपि तु— धर्मोपपत्तेश्च ॥ १ । ३ । ८ ॥ धर्मोपपत्तेः=(उक्त प्रकरणमे) जो भूमाके धर्म बतलाये गये हैं, वे भी ब्रह्ममे ही सुसंगत हो सकते है—इसलिये; च=भी; (यहाँ ‘भूमा’ ब्रह्म ही है) व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमे उस भूमाके धर्मोंका इस प्रकार वर्णन किया गया है—‘यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत् पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम् । स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि।’ (छा० उ० ७ । २४ । १) अर्थात् “जहाँ पहुँचकर न अन्य किसीको देखता है, न अन्यको सुनता है, न अन्यको जानता है, वह भूमा है। जहाँ अन्यको देखता, सुनता और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है और जो अल्प है, वह नाशवान् 'है। इसपर नारदने पूछा—‘भगवन् ! वह भूमा किसमे प्रतिष्ठित है?’ उत्तरमे सनत्कुमारने कहा—‘अपनी महिमामे।’ आगे चलकर फिर कहा है कि ‘धन, सम्पत्ति, मकान आदि जो महिमाके नामसे प्रसिद्ध है, ऐसी महिमामे वह भूमा प्रतिष्ठित नहीं है; किन्तु वही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दाये और बाये है; तथा वही यह सब कुछ है।’ इसके बाद उस भूमाको ही आत्माके नामसे कहा है और यह भी बताया है कि ‘आत्मा ही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दाये और बाये है तथा वही सब कुछ है। जो इस प्रकार देखने, मानने तथा