ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
१२४ वेदान्त-दर्शन [पाद १ व्याख्या-ब्रह्मका इस विचित्र जगत्की सृष्टि करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है; क्योंकि वह तो पूर्णकाम है। जीवोंके लिये भी जगत्की रचना करना आवश्यक नहीं है; क्योंकि परमेश्वरकी प्रवृत्ति तो सबका हित करनेके लिये ही होनी चाहिये। इस दुःखमय संसारसे जीवोंको कोई भी सुख मिलता हो, ऐसी बात नहीं है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमेश्वर जगत्का कर्ता नहीं है; क्योंकि जगत्मे प्रत्येक कार्यकर्ता किसी-न-किसी प्रयोजनसे ही कार्य आरम्भ करता है। बिना किसी प्रयोजनके कोई भी कर्ममें प्रवृत्त नहीं होता। अतः परब्रह्मको जगत्का कर्ता नहीं मानना चाहिये। सम्बन्ध-पूर्वोक्त शङ्काका उत्तर देते हैं— लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ॥ २। १ । ३३ ॥ तु=किन्तु (उस परब्रह्म परमेश्वरका विश्वरचनादिरूप कर्ममें प्रवृत्त होना तो); लोकवत्=लोकमें आप्तकाम पुरुषोंकी भाँति; लीलाकैवल्यम्=केवल लीलामात्र है। व्याख्या-जैसे लोकमे देखा जाता है कि जो परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं, जिनका जगत्से अपना कोई स्वार्थ नहीं रह गया है, कर्म करने या न करनेसे जिनका कोई प्रयोजन नहीं है, जो आप्तकाम और वीतराग हैं, ऐसे सिद्ध महा- पुरुषोंद्वारा बिना किसी प्रयोजनके जगत्का हित साधन करनेवाले कर्म स्वभावतः किये जाते हैं; उनके कर्म किसी प्रकारका फल उत्पन्न करनेमे समर्थ न होनेके कारण केवल लीलामात्र ही है। उसी प्रकार उस परब्रह्म परमात्माका भी जगत्-रचना आदि कर्मोंसे अथवा मनुष्यादि-अवतार-शरीर धारण करके भाँति-भाँतिके लोकपावन चरित्र करनेसे अपना कोई प्रयोजन नहीं है तथा उन कर्मोंमे कर्तापनका अभिमान या आसक्ति भी नहीं है; इसलिये उनके कर्म केवल लीलामात्र ही हैं। इसीलिये शास्त्रोंमें परमेश्वर- के कर्मोंको दिव्य (अलौकिक) एवं निर्मल बताया है। यद्यपि हमलोगोंकी दृष्टिमें संसारकी सृष्टिरूप कार्य महान् दुष्कर एवं गुरुतर है, तथापि परमेश्वरकी यह लीलामात्र है; वे अनायास ही कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना और संहार कर सकते हैं; क्योंकि उनकी शक्ति अनन्त है, इसलिये परमेश्वरके द्वारा बिना प्रयोजन इस जगत्की रचना आदि कार्य होना उचित ही है। *
- भगवान् केवल सङ्कल्पमात्रसे बिना किसी परिश्रमके इस विचित्र विश्वकी
सूत्र ३३-३४ ] अध्याय २ १२५
सूत्र ३३-३४ ] अध्याय २ १२५ सम्बन्ध-यदि परब्रह्म परमात्माको जगत्का कारण माना जाय तो उसमें विषमता ( राग-द्वेषपूर्ण भाव ) तथा निर्दयताका दोष आता है; क्योंकि वह देवता आदिको अधिक सुखी और पशु आदिको अत्यन्त दुखी बनाता है तथा मनुष्योंको सुख-दुःखसे परिपूर्ण मध्यम स्थितिमें उत्पन्न करता है । जिन्हें वह सुखी बनाता है, उनके प्रति उसका राग या पक्षपात सूचित होता है और जिन्हें दुखी बनाता है, उनके प्रति उसकी द्वेष-बुद्धि एवं निर्दयता प्रतीत होती है । इस दोषका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति ॥ २ । १ । ३४॥ वैषम्यनैर्घृण्ये = ( परमेश्वरमे ) विषमता और निर्दयताका दोष; न = नहीं आता; सापेक्षत्वात् = क्योंकि वह जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर सृष्टि करता है; तथा हि = ऐसा ही; दर्शयति = श्रुति दिखलाती है । व्याख्या—श्रुतिमें कहा है, 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन ।' ( बृह० उ० ३ । २ । १३ ) अर्थात् 'निश्चय ही यह जीव पुण्य-कर्मसे पुण्य- शील होता—पुण्य-योनिमे जन्म पाता है और पाप-कर्मसे पापशील होता—पाप- योनिमे जन्म ग्रहण करता है ।' 'साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति ।' ( बृह० उ० ४ । ४ । ५ ) अर्थात् 'अच्छे कर्म करनेवाला अच्छा होता है— सुखी एवं सदाचारी कुलमे जन्म पाता है और पाप करनेवाला पापात्मा होता है—पापयोनिमे जन्म ग्रहण करके दुःख उठाता है ।' इत्यादि । इस वर्णनसे स्पष्ट है कि जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर ही परमात्मा उनको कर्मा- नुसार अच्छी-बुरी ( सुखी-दुखी ) योनियोमे उत्पन्न करते है । इसलिये अच्छे न्यायाधीशकी भाँति निष्पक्षभावसे न्याय करनेवाले परमात्मापर विषमता और निर्दयता- रचनामे समर्थ है । उनकी इस अद्भुत शक्तिको देखकर, सुनकर और समझकर भगवदीय सत्ता और उनके गुण-प्रभावपर श्रद्धा-विश्वास बढ़ाने और उनकी शरणमें जानेसे मनुष्य अनायास ही इस भव-बन्धनसे मुक्त हो सकता है । भगवान् सबके सुहृद् हैं, उनकी एक- एक लीला जगत्के जीवोंके उद्धारके लिये होती है; इस प्रकार उनकी दिव्य लीलाका रहस्य समझमें आ जानेपर मनुष्यका जगत्मे प्रतिक्षण घटित होनेवाली घटनाओके प्रति राग-द्वेषका अभाव हो जाता है; उसे किसी भी बातसे हर्ष या शोक नहीं होता । अतः साधकको इसपर विशेष ध्यान देकर भगवान्के भजन-चिन्तनमे संलग्न रहना चाहिये ।
१२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ का दोष नहीं लगाया जा सकता है। स्मृतियोमे भी जगह-जगह कहा गया है कि जीवको अपने शुभाशुभ कर्मके अनुसार सुख-दुःखकी प्राप्ति होती है। जैसे 'कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।' (गीता १४ । १६) अर्थात् 'पुण्यकर्मका फल सात्त्विक एवं निर्मल बताया गया है।' इसी प्रकार भगवान्ने अशुभ कर्ममे रत रहनेवाले असुर-स्वभावके लोगोको आसुरी योनिमे डालनेकी बात बतायी है।* इन प्रमाणोंसे परमेश्वरमे उपर्युक्त दोषोंका सर्वथा अभाव सिद्ध होता है; अतः उन्हे जगत्का कारण मानना ठीक ही है। सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें कही गयी बातपर शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ २ । १ । ३५ ॥ चेत्=यदि कहो; कर्माविभागात्=जगत्की उत्पत्तिसे पहले जीव और उनके कर्मोंका ब्रह्मसे विभाग नहीं था, इसलिये; न=परमात्मा कर्मोंकी अपेक्षासे सृष्टि करता है, यह कहना नहीं बन सकता; इति न=तो ऐसी-बात नहीं है; अनादित्वात्=क्योकि जीव और उनके कर्म अनादि है। व्याख्या—यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति होनेसे पहले तो एकमात्र सत्स्वरूप परमात्मा ही था† यह बात उपनिषदोमे बार-बार कही गयी है। इससे सिद्ध है कि उस समय भिन्न-भिन्न जीव और उनके कर्मोंका कोई विभाग नहीं था; ऐसी स्थितिमे यह कहना नहीं बनता कि जगत्कर्ता परमात्माने जीवोके कर्मोंकी अपेक्षा रखकर ही भोक्ता, भोग्य और भोग-सामग्रियोके समुदायरूप इस विचित्र जगत्की रचना की है; जिससे परमेश्वरमे विषमता और निर्दयताका दोष न आवे। तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि जीव और उनके कर्म अनादि है। श्रुति कहती है, 'धाता यथापूर्वमकल्पयत्।' परमात्माने पूर्व कल्पके अनुसार सूर्य,
- अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ (गी० १६ । १८-१९) 'जो अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोधका आश्रय ले अपने तथा दूसरोंके शरीरोंमे अन्तर्यामीरूपसे स्थित मुझ परमेश्वरसे द्वेष रखते हैं, निन्दा करते हैं; उन द्वेषी, क्रूर, अशुभकर्मपरायण नीच मनुष्योंको मैं निरन्तर संसारमे आसुरी योनियोंमे ही डालता हूँ।' † 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६ । २ । १)
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय २ १२७
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय २ १२७ चन्द्रमा आदि जगत्की रचना की। इससे जड-चेतनात्मक जगत्की अनादि सत्ता सिद्ध होती है। प्रलयकालमें सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामें विलीन हो जानेपर भी उसकी सत्ता एवं सूक्ष्म विभागका अभाव नहीं होता। उपर्युक्त श्रुतिसे ही यह बात भी सिद्ध है कि जगत्की उत्पत्तिके पहले भी वह अव्यक्त रूपसे उस सर्वशक्तिमान् परमात्मामें है, उसका अभाव नहीं हुआ है। 'लीङ् श्लेषणे' धातुसे लय शब्द बनता है। अतः उसका अर्थ संयुक्त होना या मिलना ही है। उस वस्तुका अभाव हो जाना नहीं। जैसे नमक जलमें घुल-मिल जाता है, तो भी उसकी सत्ता नहीं मिट जाती। उसके पृथक् स्वादकी उपलब्धि होनेके कारण जलसे उसका सूक्ष्म विभाग भी है ही। उसी प्रकार जीव और उनके कर्म प्रलयकालमें ब्रह्मसे अविभक्त रहते हैं तो भी उनकी सत्ता एव सूक्ष्म विभागका अभाव नहीं होता। इसलिये परमात्माको जीवोंके शुभाशुभ कर्मानुसार विचित्र जगत्का कर्ता माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। सम्बन्ध—इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जीव और उनके कर्म अनादि हैं, इसमें क्या प्रमाण है ? इसपर कहते हैं— उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥ २ । १ । ३६ ॥ च=इसके सिवा ( जीव और उनके कर्मोंका अनादि होना ); उपपद्यते=युक्तिसे भी सिद्ध होता है; च=और; उपलभ्यते= ( वेदों तथा स्मृतियोंमें ) ऐसा वर्णन उपलब्ध भी होता है । व्याख्या—जीव और उनके कर्म अनादि हैं, यह बात युक्तिसे भी सिद्ध होती है; क्योकि यदि इनको अनादि नहीं माना जायगा तो प्रलयकालमें परमात्माको प्राप्त हुए जीवोंके पुनरागमन माननेका दोष प्राप्त होगा। अथवा प्रलयकालमें सब जीव अपने आप मुक्त हो जाते हैं, यह स्वीकार करना होगा। इससे शास्त्र और उनमें बताये हुए सब साधन व्यर्थ सिद्ध होंगे, जो सर्वथा अनुचित है। इसके सिवा श्रुति भी बारंबार जीव और उनके कर्मोंको अनादि बताती है। जैसे—'यह जीवात्मा नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता।'* तथा 'वह यह प्रत्यक्ष जगत् उत्पन्न होनेसे पहले नाम-रूपसे प्रकट नहीं था, वही
- अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे । ( क० उ० १ । २ । १८ )
१२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ पीछे प्रकट किया गया।' (बृ० उ० १ । ४ । ७) 'परमात्माने शरीरकी रचना करके उसमें इस जीवात्माके सहित प्रवेश किया।' (तै० उ० २ । ७) इत्यादि । इन सब वर्णनोंसे जीवात्मा और यह जगत् अनादि सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार स्मृतिमें भी स्पष्ट कहा गया है कि 'पुरुष (जीवसमुदाय) और प्रकृति (स्वभाव, जिसमें जीवोंके कर्म भी संस्काररूपमें रहते हैं)—इन दोनोंको ही अनादि समझो।' (गीता १३ । १९) इस प्रकार जीव और उनके कर्म अनादि सिद्ध होनेसे उनका विभक्त होना अनिवार्य है; अतः कर्मोंकी अपेक्षासे परमेश्वरको इस विचित्र जगत्का कर्ता माननेमे कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—अपने पक्षमें अविरोध (विरोधका अभाव) सिद्ध करनेके लिये आरम्भ किये हुए इस पहले पादका उपसंहार करते हुए सूत्रकार कहते हैं— सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥ २ । १ । ३७ ॥ सर्वधर्मोपपत्तेः=(इस जगत्कारण परब्रह्ममे) सब धर्मोकी सङ्गति है, इसलिये; च=भी (किसी प्रकारका विरोध नहीं है)। व्याख्या—इस जगत्कारणरूप परब्रह्म परमात्मामें सभी धर्मोंका होना सङ्गत है; क्योंकि वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वधर्मा, सर्वाधार और सब कुछ बननेमें समर्थ है। इसीलिये वह सगुण भी है और निर्गुण भी। समस्त जगद्व्यापारसे रहित होकर भी सब कुछ करनेवाला है। वह व्यक्त भी है और अव्यक्त भी। उस सर्वधर्माश्रय परब्रह्म परमेश्वरके लिये कुछ भी दुष्कर या असम्भव नहीं है। इस प्रकार विवेचन करनेसे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मको जगत्का कारण माननेमें कोई भी दोष या विरोध नहीं है। इस पादमें आचार्य बादरायणने प्रधानतः अपने पक्षमे आनेवाले दोषोंका निराकरण करते हुए अन्तमे जीव और उनके कर्मोंको अनादि बतलाकर इस जगत्की अनादि-सत्ता तथा सत्कार्यवादकी सिद्धि की है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ग्रन्थकार परमेश्वरको केवल निर्गुण, निराकार और निर्विशेष ही नहीं मानते; किन्तु सर्वज्ञता आदि सब धर्मोंसे सम्पन्न भी मानते हैं। पहला पाद सम्पूर्ण
सूत्रोंद्वारा यह सिद्ध करते हैं कि सांख्योक्त 'प्रधान'को जगत्का कारण मानना
दूसरा पाद सम्बन्ध—पहले पादमें प्रधानतासे अपने पक्षमें प्रतीत होनेवाले समस्त दोषोंका खण्डन करके यह निश्चय कर दिया कि इस जगत्का निमित्त और उपादानकारण परब्रह्म परमेश्वर ही है। अब दूसरोंद्वारा प्रतिपादित जगत्- कारणोंको स्वीकार करनेमें जो-जो दोष आते हैं, उनका दिग्दर्शन कराकर अपने सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये दूसरा पाद आरम्भ किया जाता है। इसमें प्रथम दस सूत्रोंद्वारा यह सिद्ध करते हैं कि सांख्योक्त 'प्रधान'को जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है— रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ॥ २ । २ । १ ॥ च=इसके सिवा; अनुमानम्=जो केवल अनुमान है (वेदद्वारा जिसकी ब्रह्मसे पृथक् सत्ता सिद्ध नहीं होती), वह प्रधान; न=जगत्का कारण नहीं है; रचनानुपपत्तेः=क्योंकि उसके द्वारा नाना प्रकारकी रचना सम्भव नहीं है। व्याख्या—प्रधान या प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह जड है। कब, कहाँ किस वस्तुकी आवश्यकता है, इसका विचार जड प्रकृति नहीं कर सकती, अतएव उसके द्वारा ऐसी विशिष्ट रचना नहीं प्रस्तुत की जा सकती, जिससे किसीकी आवश्यकता पूर्ण हो सके। इसके सिवा, चेतन कर्ताकी सहायताके बिना जड वस्तु स्वयं कुछ करनेमे समर्थ भी नहीं है। गृह, वस्त्र, भाँति-भाँतिके पात्र, हथियार और मशीन आदि जितनी भी आवश्यक वस्तुएँ हैं, सबकी रचना बुद्धियुक्त कुशल कारीगरके द्वारा ही की जाती है। जड प्रकृति स्वयं उक्त वस्तुओंका निर्माण कर लेती हो, ऐसा दृष्टान्त कहीं नहीं मिलता है। फिर जो पृथिवी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र आदि विविध एवं अद्भुत वस्तुओंसे सम्पन्न है; मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष और तृण आदिसे सुशोभित है तथा शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि आध्यात्मिक तत्त्वोंसे अलंकृत हैं; जिसके निर्माण-कौशलकी कल्पना बड़े-बड़े बुद्धिमान् वैज्ञानिक तथा चतुर शिल्पी मनसे भी नहीं कर पाते, उस विचित्र रचना-चातुर्ययुक्त अद्भुत जगत्की सृष्टि भला जड प्रकृति कैसे कर सकती है ? मिट्टी, पत्थर आदि जड पदार्थोंमें इस प्रकार अपने-आप रचना करनेकी कोई शक्ति नहीं देखी जाती है। वे० द० ९—
१३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अतः किसी भी युक्तिसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि जड प्रधान इस जगत्का कारण है । सम्बन्ध—अब दूसरी युक्तिसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते हैं— प्रवृत्तेश्च ॥ २ । २ । २ ॥ प्रवृत्तेः=जगत्की रचनाके लिये जड प्रकृतिका प्रवृत्त होना; च=भी सिद्ध नहीं होता ( इसलिये प्रधान इस जगत्का कारण नहीं है ) । व्याख्या—जगत्की रचना करना तो दूर रहा, रचनादि कार्यके लिये जड प्रकृतिमे प्रवृत्तिका होना भी असम्भव जान पड़ता है; क्योकि साम्यावस्थामे स्थित सत्त्व, रज और तम—इन तीनो गुणोका नाम प्रधान या प्रकृति है,* उस जड प्रधानका बिना किसी चेतनकी सहायताके सृष्टिकार्य प्रारम्भ करनेके लिये प्रवृत्त होना कदापि सम्भव नहीं है । कोई भी जड पदार्थ चेतनका सहयोग प्राप्त हुए बिना कभी अपने आप किसी कार्यमें प्रवृत्त होता हो, ऐसा नहीं देखा जाता है । सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षीके द्वारा दिये जानेवाले जल आदिके दृष्टान्तमें भी चेतनका सहयोग दिखलाकर उपर्युक्त बातकी ही सिद्धि करते हैं— पयोऽम्बुवच्चेत्तत्रापि ॥ २ । २ । ३ ॥ चेत्=यदि कहो; पयोऽम्बुवत्=दूध और जलकी भाँति ( जड प्रधानका सृष्टि-रचनाके लिये प्रवृत्त होना सम्भव है ); तत्रापि=तो उसमें भी चेतनका सहयोग है ( अतः केवल जडमे प्रवृत्ति न होनेसे उसके द्वारा जगत्की रचना असम्भव है ) । व्याख्या—यदि कहो कि 'जैसे अचेतन दूध बछड़ेकी पुष्टिके लिये अपने आप गायके थनमे उतर आता है † तथा अचेतन जल लोगोके उपकारके लिये अपने आप नदी-निर्झर आदिके रूपमे बहता रहता है, उसी प्रकार जड प्रधान भी जगत्की सृष्टिके कार्यमें बिना चेतनके ही स्वयं प्रवृत्त हो सकता है' तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि जिस प्रकार रथ आदि अचेतन वस्तुएँ बिना चेतनका सहयोग पाये संचरण आदि कार्योंमे प्रवृत्त नहीं होतीं, उसी प्रकार थनमें दूध उतरने और नदी-निर्झर आदिके बहनेमे भी अव्यक्त चेतनकी ही प्रेरणा
- सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः । ( सा० सू० १ । ६१ ) † अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य । ( सां० सू० ३ । १७० )
सूत्र २-४ ] अध्याय २ १३१
सूत्र २-४ ] अध्याय २ १३१ काम करती है, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है । शास्त्र भी इस अनुमानका समर्थक है—‘योऽप्सु तिष्ठन्••••अपोऽन्तरो यमयति ।’ ( बृह० उ० ३ । ७ । ४ ) अर्थात् ‘जो जलमे रहनेवाला है और उसके भीतर रहकर उसका नियमन करता है।’ ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्य. स्यन्दन्ते’ ( बृह० उ० ३ । - ८ । ९ ) अर्थात् ‘हे गार्गि ! इस अक्षर ( परमात्मा ) के ही प्रशासनमे पूर्ववाहिनी तथा अन्य नदियाँ बहती है ।’ इत्यादि श्रुतिवाक्योसे सिद्ध होता है कि समस्त जड वस्तुओका अधिष्ठाता चेतन है। गायके थनमे जो दूध उतरता है, उसमे भी चेतन गौका वात्सल्य और चेतन बछड़ेका चूसना कारण है । इसी प्रकार जल नीची भूमिकी ओर ही स्वभावत बहता है । लोगोके उपकारके लिये वह स्वयं उठकर ऊंची भूमिपर नही चला जाता । परन्तु चेतन पुरुष अपने प्रयत्नसे उस जलके प्रवाहको जिधर चाहें मोड़ सकते है । इस प्रकार प्रत्येक प्रवृत्तिमे चेतनकी अपेक्षा सर्वत्र देखी जाती है; इसलिये किसी भी युक्तिसे जड प्रधानका स्वतः जगत्की रचनामे प्रवृत्त होना सिद्ध नहीं होता । सम्बन्ध—अब प्रकारान्तरसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते है— व्यतिरेकानवस्थितेश्च अनपेक्षत्वात् ॥ २ । २ । ४ ॥ च=इसके सिवा; व्यतिरेकानवस्थितेः=सांख्यमतमे प्रधानके सिवा, दूसरा कोई उसकी प्रवृत्ति या निवृत्तिका नियामक नहीं माना गया है, इसलिये, ( और ) अनपेक्षत्वात्=प्रधानको किसीकी अपेक्षा नहीं है, इसलिये भी ( प्रधान कभी सृष्टिरूपमे परिणत होता और कभी नहीं होता है, यह बात सम्भव नहीं जान पड़ती ) । व्याख्या—सांख्यमतावलम्बियोकी मान्यताके अनुसार त्रिगुणात्मक प्रधानके सिवा, दूसरा कोई कारण, प्रेरक या प्रवर्तक नहीं माना गया है । पुरुष उदासीन है, वह न तो प्रधानका प्रवर्तक है, न निवर्तक । प्रधान स्वयं भी अनपेक्ष है, वह किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता । ऐसी स्थितिमे जड प्रधान कभी तो महत्तत्त्व आदि विकारोंके रूपमे परिणत होता है और कभी नहीं होता है, यह कैसे युक्तिसंगत होगा । यदि जगत्की उत्पत्ति करना उसका स्वभाव अथवा धर्म है, तब तो प्रलयके कार्यमें उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी ? और यदि स्वभाव नहीं है
१३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ तो उत्पत्तिके लिये प्रवृत्ति नहीं होगी। इस प्रकार कोई भी व्यवस्था न हो सकनेके कारण प्रधान जगत्का कारण नहीं हो सकता। सम्बन्ध—तृणसे दूध बननेकी भाँति प्रकृतिसे स्वभावतः जगत्की उत्पत्ति होती है, इस कथनकी असंगति दिखाते हुए कहते हैं— अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॥ २ । २ । ५ ॥ अन्यत्र=दूसरे स्थानमे; अभावात्=वैसे परिणामका अभाव है, इसलिये; च=भी; तृणादिवत्=तृण आदिकी भाँति; ( प्रधानका जगत्के रूपमें परिणत होना ) न=नहीं सिद्ध होता । व्याख्या—जो घास ब्यायी हुई गौद्वारा खायी जाती है, उसीसे दूध बनता है। वही घास यदि बैल या घोड़ेको खिला दी जाय या अन्यत्र रख दी जाय तो उससे दूध नहीं बनता। इस प्रकार अन्य स्थानोमे घास आदिका वैसा परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि विशिष्ट चेतनके सहयोग बिना जड प्रकृति जगत्रूपमे परिणत नहीं हो सकती। जैसे तृण आदि- का दूधके रूपमे परिणत होना तभी सम्भव होता है, जब उसे ब्यायी हुई चेतन गौके उदरमे स्थित होनेका अवसर मिलता है सम्बन्ध—प्रधानसे जगत्-रचनाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति मानना व्यर्थ है, यह बतानेके लिये कहते हैं— अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ॥ २ । २ । ६ ॥ अभ्युपगमे=( अनुमानसे प्रधानमे सृष्टिरचनाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति ) स्वीकार कर लेनेपर; अपि=भी; अर्थाभावात्=कोई प्रयोजन न होनेके कारण ( यह मान्यता व्यर्थ ही होगी ) । व्याख्या—यद्यपि चेतनकी प्रेरणाके बिना जड प्रकृतिका सृष्टि-रचना आदि कार्यमे प्रवृत्त होना नहीं बन सकता, तथापि यदि यह मान लिया जाय कि स्वभावसे ही प्रधान जगत्की उत्पत्तिके कार्यमे प्रवृत्त हो सकता है तो इसके लिये कोई प्रयोजन नहीं दिखायी देता; क्योंकि सांख्यमतमें माना गया है कि प्रधानकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये ही होती है। * परंतु उनकी
- पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य। ( सांख्य-का० २१ )
सूत्र ५-७ ] अध्याय २ १३३
सूत्र ५-७ ] अध्याय २ १३३ मान्यताके अनुसार पुरुष असङ्ग, चैतन्यमात्र, निष्क्रिय, निर्विकार, उदासीन, निर्मल तथा नित्यशुद्ध बुद्ध मुक्तस्वभाव है; उसके लिये प्रकृतिदर्शनरूप भोग तथा उससे विमुक्त होनारूप अपवर्ग दोनोंकी ही आवश्यकता नहीं है। इसलिये उनका माना हुआ प्रयोजन व्यर्थ ही है। अतः प्रधानकी लोकरचनाके कार्यमें स्वाभाविक प्रवृत्ति मानना निरर्थक है। सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे सांख्यमतकी मान्यतामें दोष दिखाते हैं- पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि ॥ २ । २ । ७ ॥ चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; पुरुषाश्मवत्=अंधे और पंगु पुरुषो तथा लोह और चुम्बकके संयोगकी भाँति (प्रकृति-पुरुषकी समीपता ही प्रकृतिको सृष्टिरचनामें प्रवृत्त कर देती है); तथापि=तो ऐसा माननेपर भी (सांख्यसिद्धान्त- की सिद्धि नहीं होती)। व्याख्या-'जैसे पंगु और अंधे परस्पर मिल जायें और अंधेके कंधेपर बैठकर पंगु उसे राह बताया करे तो दोनों गन्तव्य स्थानपर पहुँच जाते हैं तथा लोहे और चुम्बकका संयोग होनेपर लोहेमें क्रियाशक्ति आ जाती है उसी प्रकार पुरुष और प्रकृतिका संयोग ही सृष्टिरचनाका कारण है।* पुरुषकी समीपतामात्रसे जड प्रकृति जगत्की उत्पत्ति आदिके कार्यमें प्रवृत्त हो जाती है।' सांख्यवादियोंकी कही हुई यह बात मान ली जाय तो भी इससे सांख्यसिद्धान्तकी पुष्टि नहीं होती; क्योंकि पंगु और अंधे दोनों चेतन हैं, एक गमनशक्तिसे रहित होनेपर भी बौद्धिक आदि अन्य शक्तियोंसे सम्पन्न है; अंधा पुरुष देखनेकी शक्तिसे हीन होनेपर भी गमन एवं बुद्धि आदिकी शक्तिसे युक्त है। एक प्रेरणा देता है तो दूसरा उसे समझकर उसके अनुसार चलता है। अतः वहाँ भी चेतनका सहयोग स्पष्ट ही है। इसी प्रकार चुम्बक और लोहेको एक दूसरेके समीप लानेके लिये एक तीसरे चेतन पुरुषकी आवश्यकता होती है। चेतनके सहयोग बिना न तो लोहा चुम्बकके समीप जायगा और न उसमे क्रियाशक्ति उत्पन्न होगी। समीपता प्राप्त होनेपर भी दोनो एक-दूसरेसे सट जायेंगे, लोहेमें किसी प्रकारकी आवश्यक क्रियाका संचार नहीं होगा, अतः ये दोनो दृष्टान्त इसी बातकी पुष्टि करते हैं कि चेतनकी प्रेरणा
- पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥ (सा० कारिका० २१)
१३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ होनेसे ही जड प्रधान सृष्टि-कार्यमे प्रवृत्त हो सकता है, अन्यथा नहीं; परन्तु सांख्यमतमें तो पुरुष असङ्ग और उदासीन माना गया है, अतः वह प्रेरक हो नहीं सकता। इसलिये केवल जड प्रकृतिके द्वारा जगत्की उत्पत्ति किसी प्रकार भी सिद्ध नहीं हो सकती। सम्बन्ध—अब प्रधानकारणवादके विरोधमे दूसरी युक्ति देते हैं— अङ्गित्वानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ८ ॥ अङ्गित्वानुपपत्तेः=अङ्गाङ्गिभाव ( सत्त्वादि गुणोंके उत्कर्ष और अपकर्ष ) की सिद्धि न होनेके कारण; च=भी ( केवल प्रधान इस जगत्का कारण नहीं माना जा सकता ) । व्याख्या—पहले यह बताया गया है, सांख्यमतमे तीनो गुणोंकी साम्यावस्थाका नाम ‘प्रधान’ है। यदि गुणोंकी यह साम्यावस्था स्वाभाविक मानी जाय, तब तो कभी भी भंग न होगी, अतएव गुणोंमें विषमता न होनेके कारण अङ्गाङ्गिभाव- की सिद्धि न हो सकेगी; क्योंकि उन गुणोंमें ह्रास और वृद्धि होनेपर ही बढ़े हुए गुणको अङ्गी और घटे हुए गुणको अङ्ग माना जाता है। यदि उन गुणोंकी विषमता ( ह्रास-वृद्धि ) को ही स्वाभाविक माना जाय तब तो सदा जगत्की सृष्टिका ही क्रम चलता रहेगा, प्रलय कभी होगा ही नहीं। यदि पुरुषकी प्रेरणासे प्रकृतिके गुणोंमें क्षोभ होना मान लें तब तो पुरुषको असङ्ग और निष्क्रिय मानना नहीं बन सकेगा। यदि परमेश्वरको प्रेरक माना जाय तब तो यह ब्रह्म कारणवादको ही स्वीकार करना होगा। इस प्रकार सांख्यमतके अनुसार गुणोंका अङ्गाङ्गिभाव सिद्ध न होनेके कारण जड प्रधानको जगत्का कारण मानना असङ्गत है। सम्बन्ध—यदि अन्य प्रकारसे गुणोंकी साम्यावस्था भंग होकर प्रकृतिके द्वारा जगत्की उत्पत्ति होती है, ऐसा मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं— अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ॥ २ । २ । ९ ॥ अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अनुमितौ=साम्यावस्था भंग होनेका अनुमान कर लेनेपर; च=भी; ज्ञशक्तिवियोगात्=प्रधानमे ज्ञान-शक्ति न होनेके कारण ( गृह, घट, पट आदिकी भाँति बुद्धिपूर्वक रची जानेवाली वस्तुओंकी उत्पत्ति उसके द्वारा नहीं हो सकती ) ।
सूत्र ८-१० ] अध्याय २ १३५
सूत्र ८-१० ] अध्याय २ १३५ व्याख्या—यदि गुणोंकी साम्यावस्थाका भंग होना काल आदि अन्य निमित्तोंसे मान लिया जाय तो भी प्रधानमे ज्ञानशक्तिका अभाव तो है ही। इसलिये उसके द्वारा बुद्धिपूर्वक कोई रचना नहीं हो सकती। जैसे गृह, वस्त्र, घट आदिका निर्माण कोई समझदार चेतन कर्ता ही कर सकता है, उसी प्रकार अनन्तकोटि ब्रह्माण्डके अन्तर्गत असंख्य जीवोंके छोटे-बड़े विविध शरीर एवं अन्न आदिकी बुद्धिपूर्वक होनेवाली सृष्टि जड प्रकृतिके द्वारा असम्भव है। ऐसी रचना तो सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सनातन परमात्मा ही कर सकता है; अतः जड प्रकृतिको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—अब सांख्यदर्शनकी असमीचीनता बताते हैं— विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ॥ २ । २ । १० ॥ विप्रतिषेधात् = परस्पर विरोधी बातोंका वर्णन करनेसे; च = भी; असमञ्जसम् = सांख्यदर्शन समीचीन नहीं है। व्याख्या—सांख्यदर्शनमे बहुत-सी परस्पर-विरुद्ध बातोंका वर्णन पाया जाता है। जैसे पुरुषको असङ्ग^१ और निष्क्रिय^२ मानना फिर उसीको प्रकृतिका द्रष्टा^३ और भोक्ता^४ बताना, प्रकृतिके साथ उसका संयोग^५ कहना, प्रकृतिको पुरुषके लिये भोग और मोक्ष^६ प्रदान करनेवाली बताना, तथा प्रकृति और पुरुषके नित्य पार्थक्यके ज्ञानसे दुःखका अभाव ही मोक्ष^७ है; ऐसा मुक्तिका स्वरूप मानना इत्यादि। इस कारण भी सांख्यदर्शन समीचीन ( निर्दोष ) नहीं जान पड़ता है। सम्बन्ध—उपर्युक्त दस सूत्रोंमे सांख्यशास्त्रकी समीक्षा की गयी। अब वैशेषिकोंके परमाणुवादका खण्डन करनेके लिये उनकी मान्यताको असंगत बताते हुए दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं— १. असङ्गोऽयं पुरुष इति । ( सा० सू० १ । १५ ) २. निष्क्रियस्य तदसंभवात् । ( सा० सू० १ । ४९ ) ३. द्रष्टृत्वादिरात्मनः करणत्वमिन्द्रियाणाम् । ( सा० सू० २ । २९ ) ४. भोक्तृभावात् । ( सां० सू० १ । १४३ ) ५. न नित्यशुद्धमुक्तस्वभावस्य तद्योगस्तद्योगादृते । ( सा० सू० १ । १९ ) ६. पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । ( सांख्यकारिका २१ ) ७. विवेकात्रिःशेषदुःखनिवृत्तौ कृतकृत्यता नेतराव्न्नेतरात् । ( सा० सू० ३ । ८४ )
१३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ॥ २ । २ । ११ ॥ ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् = ह्रस्व ( द्व्यणुक ) तथा परिमण्डल ( परमाणु ) से; महद्दीर्घवत् = महत् एवं दीर्घ ( त्र्यणुक ) की उत्पत्ति बतानेकी भाँति; वा = ही ( वैशेषिकोंके द्वारा प्रतिपादित सभी बातें असमञ्जस—असंगत ) हैं। व्याख्या—परमाणुकारणवादी वैशेषिकोंकी मानी हुई प्रक्रिया इस प्रकार है—एक द्रव्य सजातीय दूसरे द्रव्यको और एक गुण सजातीय दूसरे गुणको उत्पन्न करता है। समवायी, असमवायी और निमित्त तीनों कारणोंसे कार्यकी उत्पत्ति होती है। जैसे वस्त्रकी उत्पत्तिमे तन्तु ( सूत ) तो समवायिकारण हैं, तन्तुओंका परस्पर संयोग असमवायिकारण है और तुरी, वेमा तथा वस्त्र बुननेवाला कारीगर आदि निमित्तकारण है। परमाणुके चार भेद हैं—पार्थिव परमाणु, जलीय परमाणु, तैजस परमाणु तथा वायवीय परमाणु। ये परमाणु नित्य, निरवयव तथा रूपादि गुणोंसे युक्त हैं। इनका जो परिमाण ( माप ) है, उसे पारिमाण्डल्य कहते है। प्रलयकालमें ये परमाणु कोई भी कार्य आरम्भ न करके यों ही स्थित रहते हैं। सृष्टिकालमें कार्यसिद्धिके लिये परमाणु तो समवायिकारण बनते हैं, उनका एक दूसरेसे संयोग असमवायिकारण होता है, अदृष्ट या ईश्वर- की इच्छा आदि उसमें निमित्तकारण बनते हैं। उस समय भगवान्की इच्छासे पहला कर्म वायवीय परमाणुओंमें प्रकट होता है, फिर एक दूसरेका संयोग होता है। दो परमाणु संयुक्त होकर एक द्व्यणुकरूप कार्यको उत्पन्न करते हैं। तीन द्व्यणुकोंसे त्र्यणुक उत्पन्न होता है। चार त्र्यणुकोंसे चतुरणुककी उत्पत्ति होती है। इस क्रमसे महान् वायुतत्त्व प्रकट होता है और वह आकाशमे वेगसे बहने लगता है। इसी प्रकार तैजस परमाणुओंसे अग्निकी उत्पत्ति होती है और वह प्रज्वलित होने लगता है। जलीय परमाणुओंसे जलका महासागर प्रकट होकर उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त दिखायी देता है तथा इसी क्रमसे पार्थिव परमाणुओंसे यह बड़ी भारी पृथिवी उत्पन्न होती है। मिट्टी और प्रस्तर आदि इसका स्वरूप है। यह अचल भावसे स्थित होती है। कारणके गुणोंसे ही कार्यके गुण उत्पन्न होते हैं। जैसे तन्तुओंके शुक्ल, नील, पीत आदि गुण ही वस्त्रमें वैसे गुण प्रकट करते हैं। इसी प्रकार परमाणुगत शुक्ल आदि गुणोंसे ही द्व्यणुकगत शुक्ल आदि गुण प्रकट होते हैं। द्व्यणुकके आरम्भक ( उत्पादक ) जो दो परमाणु है, उनकी वह द्वित्व संख्या द्व्यणुकमें अणुत्व और ह्रस्वत्व—इन दो परिमाणान्तरोंका आरम्भ
सूत्र ११-१२ ] अध्याय २ १३७
सूत्र ११-१२ ] अध्याय २ १३७ ( आविर्भाव ) करती है । परन्तु विभिन्न परमाणुमे जो पृथक्-पृथक् पारिमाण्डल्य- नामक परिमाण होता है, वह द्व्यणुकमे दूसरे पारिमाण्डल्यको नहीं प्रकट करता है, क्योकि वैसा करनेपर वह कार्य पहलेसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होने लगेगा । इसी प्रकार संहारकालमें भी परमेश्वरकी इच्छासे परमाणुओंमें कर्म प्रारम्भ होता है, इससे उनके पारस्परिक संयोगका नाश होता है, फिर द्व्यणुक आदिका नाश होते-होते पृथिवी आदिका भी नाश हो जाता है । वैशेषिकोंकी इस प्रक्रियाका सूत्रकार निराकरण करते हुए कहते हैं कि यदि कारणके ही गुण कार्यमे प्रकट होते हैं, तब तो परमाणुका गुण जो पारिमाण्डल्य ( अत्यन्त सूक्ष्मता ) है, वही द्व्यणुकमे भी प्रकट होना उचित है; पर ऐसा नहीं होता । उनके ही कथनानुसार दो परमाणुओंसे ह्रस्वगुणविशिष्ट द्व्यणुककी उत्पत्ति होती है और ह्रस्व द्व्यणुकोसे महत् दीर्घ परिमाणवाले त्र्यणुक- की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार जैसे यहाँ वैशेषिकोंकी मान्यता असङ्गत है, उसी प्रकार उनके द्वारा कही जानेवाली अन्य बाते भी असङ्गत हैं । सम्बन्ध—इसी बातको स्पष्ट करते हैं— उभयथापि न कर्मात्तस्तदभावः ॥ २ । २ । १२ ॥ उभयथा=दोनो प्रकारसे; अपि=ही; कर्म=परमाणुओंमें कर्म होना; न=नहीं सिद्ध होता; अतः=इसलिये; तदभावः=परमाणुओंके संयोगपूर्वक द्व्यणुक आदिकी उत्पत्तिके क्रमसे जगत्का जन्म आदि होना सम्भव नहीं है । व्याख्या—परमाणुवादियोंका कहना है कि 'सृष्टिके पूर्व परमाणु निश्चल रहते है, उनमे कर्म उत्पन्न होकर परमाणुओंका संयोग होता है और उससे जगत्की उत्पत्ति होती है।' इसपर सूत्रकार कहते हैं कि यदि उन परमाणुओंमे कर्मका सञ्चार विना किसी निमित्तके अपने-आप हो जाता है, ऐसा माने तो यह असम्भव है; क्योंकि उनके मतानुसार प्रलयकालमे परमाणु निश्चल माने गये है । यदि ऐसा मानें कि जीवोंके अदृष्ट कर्मसंस्कारोंसे परमाणुओंमे कर्मका सञ्चार हो जाता है तो यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि जीवोंका अदृष्ट तो उन्हींमे रहता है न कि परमाणुओंमे; अतः वह उनमे कर्मका सञ्चार नहीं कर सकता । उक्त दोनो प्रकारसे ही परमाणुओंमे कर्म होना सिद्ध नहीं होता; इसलिये परमाणुओंके मयोगये जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
१३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ इसके सिवा, अदृष्ट अचेतन है। कोई भी अचेतन वस्तु किसी चेतनका सहयोग प्राप्त किये बिना न तो स्वयं कर्म कर सकती है और न दूसरेसे ही करा सकती है। यदि कहें, जीवके शुभाशुभ कर्मसे ही अदृष्ट बनता है, अतः जीवात्माकी चेतनता उसके साथ है तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि सृष्टिके पहले जीवात्माकी चेतनता जाग्रत् नहीं है, अतः वह अचेतनके ही तुल्य है। इसके सिवा, जीवात्मामें ही अदृष्टकी स्थिति स्वीकार करनेपर वह परमाणुओंमें क्रिया- शीलता उत्पन्न करनेमें निमित्त नहीं बन सकता; क्योंकि परमाणुओंसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार किसी नियत निमित्तके न होनेसे परमाणुओंमें पहला कर्म नहीं उत्पन्न हो सकता। उस कर्म या क्रियाशीलताके बिना उनका परस्पर संयोग नहीं हो सकेगा। संयोग न होनेसे द्व्यणुक आदिकी उत्पत्तिके क्रमसे जगत्की सृष्टि और प्रलय भी न हो सकेंगे। सम्बन्ध—परमाणु-कारणवादके खण्डनके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः ॥ २ । २ । १३ ॥ समवायाभ्युपगमात् = परमाणुवादमें समवाय-सम्बन्धको स्वीकार किया गया है, इसलिये; च = भी (परमाणुकारणवाद सिद्ध नहीं हो सकता); साम्यात् = क्योंकि कारण और कार्यकी भाँति समवाय और समवायीमें भी भिन्नताकी समानता है, इसलिये; अनवस्थितेः = उनमें अनवस्थादोषकी प्राप्ति हो जानेपर परमाणुओंके संयोगसे जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकेगी। व्याख्या—वैशेषिकोंकी मान्यताके अनुसार युतसिद्ध अर्थात् अलग-अलग रह सकनेवाली वस्तुओंमें परस्पर संयोग-सम्बन्ध होता है और अयुतसिद्ध अर्थात् अलग-अलग न रहनेवाली वस्तुओंमें समवाय-सम्बन्ध होता है। रज्जु (रस्सी) और घट—ये युतसिद्ध वस्तुएँ हैं, अतः इनमें संयोग-सम्बन्ध ही स्थापित हो सकता है। तन्तु और वस्त्र—ये अयुतसिद्ध वस्तुएँ हैं; अतः इनमें सदा समवाय- सम्बन्ध रहता है। यद्यपि कारणसे कार्य अत्यन्त भिन्न है तो भी उनके मतमे समवायि कारण और कार्यका पारस्परिक सम्बन्ध 'समवाय' कहा गया है। इसके अनुसार दो अणुओंसे उत्पन्न होनेवाला 'द्व्यणुक' नामक कार्य उन अणुओंसे भिन्न होकर भी समवाय-सम्बन्धके द्वारा उनसे सम्बद्ध होता है, ऐसा मान लेनेपर, जैसे द्व्यणुक उन अणुओंसे भिन्न है, उसी प्रकार 'समवाय' भी समवायीसे भिन्न है।
सूत्र १३-१५ ] अध्याय २ १३९
सूत्र १३-१५ ] अध्याय २ १३९ भेदकी दृष्टिसे दोनोंमें समानता है। अतः जैसे द्वयणुक समवाय-सम्बन्धके द्वारा उन दो अणुओंसे सम्बद्ध माना गया है, उसी प्रकार समवाय भी अपने समवायीके साथ नूतन समवायसम्बन्धके द्वारा सम्बद्ध माना जा सकता है। इस प्रकार एकके बाद दूसरे समवायसम्बन्धकी कल्पना होती रहेगी और इस परम्पराका कहीं भी अन्त न होनेके कारण अनवस्था दोष प्राप्त होगा। अतः समवाय सम्बन्ध सिद्ध न हो सकनेके कारण दो अणुओसे द्वयणुककी उत्पत्ति आदि क्रमसे जगत्की सृष्टि नहीं हो सकती। सम्बन्ध—यदि परमाणुओमे सृष्टि और प्रलयके निमित्त क्रियाका होना स्वाभाविक मान लें तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं— नित्यमेव च भावात् ॥ २ । २ । १४ ॥ च=इसके सिवा (परमाणुओमे प्रवृत्ति या निवृत्तिका कर्म स्वाभाविक माननेपर ); नित्यम्=सदा; एव=ही; भावात्=सृष्टि या प्रलयकी सत्ता बनी रहेगी, इसलिये (परमाणुकारणवाद असङ्गत है)। व्याख्या—परमाणुवादी परमाणुओंको नित्य मानते हैं, अतः उनका जैसा भी स्वभाव माना जाय, वह नित्य ही होगा। यदि ऐसा मानें कि उनमें प्रवृत्ति-मूलक कर्म स्वभावतः होता है, तब तो सदा ही सृष्टि होती रहेगी, कभी भी प्रलय नहीं होगा। यदि उनमे निवृत्ति-मूलक कर्मका होना स्वाभाविक माने तब तो सदा संहार ही बना रहेगा, सृष्टि नहीं होगी। यदि दोनों प्रकारके कर्मोंको उनमें स्वाभाविक माना जाय तो यह असङ्गत जान पड़ता है; क्योंकि एक ही तत्त्वमे परस्परविरुद्ध दो स्वभाव नहीं रह सकते। यदि उनमे दोनो तरहके कर्मोंका न होना ही स्वाभाविक मान लिया जाय तब तो यह स्वीकार करना पडेगा कि कोई निमित्त प्राप्त होनेपर ही उनमें प्रवृत्ति एवं निवृत्ति-सम्बन्धी कर्म भी हो सकते हैं; परन्तु उनके द्वारा माने हुए निमित्तसे सृष्टिका आरम्भ न होना पहले ही सिद्ध कर दिया गया है, इसलिये यह परमाणुकारणवाद सर्वथा अयुक्त है। • सम्बन्ध—अब परमाणुओंकी नित्यतामें ही संदेह उपस्थित करते हुए परमाणु- कारणवादकी व्यर्थता सिद्ध करते हैं— रूपादिमत्त्वाच्च विपर्ययो दर्शनात् ॥ २ । २ । १५ ॥
१४० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ च = तथा; रूपादिमत्त्वात् = परमाणुओको रूप, रस आदि गुणोवाला माना गया है, इसलिये; विपर्ययः = उनमे नित्यताके विपरीत अनित्यताका दोष उपस्थित होता है; दर्शनात् = क्योकि ऐसा ही देखा जाता है । व्याख्या—वैशेषिक मतमे परमाणु नित्य होनेके साथ-साथ रूप, रस आदि गुणोंसे युक्त भी माने गये हैं । इससे उनमे नित्यताके विपरीत अनित्यताका दोष उपस्थित होता है; रूपादि गुणोंसे युक्त होनेपर वे नित्य नहीं माने जा सकते; क्योकि रूप आदि गुणवाली जो घट आदि वस्तुएँ हैं, उनकी अनित्यता प्रत्यक्ष देखी जाती है । यदि उन परमाणुओको रूप, रस आदि गुणोसे रहित माने तो उनके कार्यमे रूप आदि गुण नहीं होने चाहिये । इसके सिवा वैसा माननेपर 'रूपादिमन्तो नित्याश्च'—परमाणु रूपादि गुणोसे युक्त और नित्य है, इस प्रतिज्ञा- की सिद्धि नहीं होती है । इस प्रकार अनुपपत्तियोसे भरा हुआ यह परमाणुवाद कदापि सिद्ध नहीं होता । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे परमाणुवादको सदोष सिद्ध करते हैं— उभयथा च दोषात् ॥ २ । २ । १६ ॥ उभयथा = परमाणुओको न्यूनाधिक गुणोसे युक्त मानें या गुणरहित मानें, दोनो प्रकारसे; च = ही; दोषात् = दोष आता है, इसलिये (परमाणुवाद सिद्ध नहीं होता) । व्याख्या—पृथिवी आदि भूतोमेसे किसीमे अधिक और किसीमे कम गुण देखे जाते हैं, इससे उनके आरम्भक परमाणुओमे भी न्यूनाधिक गुणोकी स्थिति माननी होगी । ऐसी दशामे यदि उनको अधिक गुणोसे युक्त माना जाय तब तो सभी कार्योमे उतने ही गुण होने चाहिये; क्योकि कारणके गुण कार्यमे समान जातीय गुणान्तर प्रकट करते हैं । उस दशामें जलमे भी गन्ध और तेजमें भी गन्ध एवं रस प्रकट होनेका दोष प्राप्त होगा । अधिक गुणवाली पृथिवीमे स्थूलता- नामक गुण देखा जाता है, यही गुण कारणभूत परमाणुमे मानना पड़ेगा । यदि ऐसा मानें कि उनमें न्यूनतम अर्थात् एक-एक गुण ही है तब तो सभी स्थूल भूतोंमे एक-एक गुण ही प्रकट होना चाहिये । उस अवस्थामे तेजमे स्पर्श नहीं होगा, जलमे रूप और स्पर्श नहीं रहेंगे तथा पृथिवीमे रस, रूप एवं स्पर्शका अभाव होगा; क्योकि उनके परमाणुओमें एकसे अधिक गुणका अभाव है । यदि उनमें सर्वथा गुणोका अभाव मान लें तो उनके कार्योंमे जो गुण प्रकट होते
सूत्र १६-१८ ] अध्याय २ १४१
सूत्र १६-१८ ] अध्याय २ १४१ है, वे उन कारणोंके विपरीत होंगे । यदि कहे कि विभिन्न भूतोके अनुसार उनके कारणोंमे कहीं अधिक, कहीं कम गुण स्वीकार करनेसे यह दोष नहीं आवेगा, तो ठीक नहीं है; क्योकि जिन परमाणुओमे अधिक गुण माने जायँगे, उनकी परमाणुता ही नहीं रह जायगी; अतः परमाणुवाद किसी भी युक्तिसे सिद्ध नहीं होता है । सम्बन्ध—अब परमाणुवादको अग्राह्य बताते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ॥ २ । २ । १७ ॥ अपरिग्रहात्=परमाणुकारणवादको शिष्ट पुरुषोने ग्रहण नहीं किया है, इसलिये; च=भी; अत्यन्तम् अनपेक्षा=इसकी अत्यन्त उपेक्षा करनी चाहिये । व्याख्या—पूर्वोक्त प्रधानकारणवादमे अंशतः सत्कार्यवादका निरूपण है । अतः उस सत्कार्यवादरूप अंशको मनु आदि शिष्टपुरुषोने ग्रहण किया है, परन्तु इस परमाणु-कारणवादको तो किसी भी श्रेष्ठ पुरुषने स्वीकार नहीं किया है, अतः यह सर्वथा उपेक्षणीय है । सम्बन्ध—पहले ग्यारहवेंसे सत्रहवेंतक सात सूत्रोंमें परमाणुवादका खण्डन किया गया । अब क्षणिकवादका निराकरण करनेके लिये यह प्रकरण आरम्भ करते हैं— समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥ २ । २ । १८ ॥ उभयहेतुके=परमाणुहेतुक बाह्यसमुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर समुदाय ऐसे दो प्रकारके; समुदाये=समुदायको स्वीकार कर लेनेपर; अपि=भी; तदप्राप्तिः=उस समुदायकी प्राप्ति ( सिद्धि ) नहीं होती है । व्याख्या—बौद्धमतके अनुयायी परस्पर किञ्चित् मतभेदको लेकर चार श्रेणियोंमे विभक्त हो गये हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं—वैभाषिक, सौत्रान्तिक, योगाचार तथा माध्यमिक । इनमे वैभाषिक और सौत्रान्तिक ये दोनो बाह्य पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करते हैं । दोनोंमे अन्तर इतना ही है कि वैभाषिक प्रत्यक्ष दीखनेवाले बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व मानता है और सौत्रान्तिक विज्ञानसे अनुमित बाह्य पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करता है । वैभाषिकके मतमें घट आदि बाह्य पदार्थ प्रत्यक्ष प्रमाणके विषय हैं । सौत्रान्तिक घट आदिके रूपमे उत्पन्न
१४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ विज्ञानको ही प्रत्यक्ष मानता है और उसके द्वारा घटादि पदार्थोंकी सत्ताका अनुमान करता है। योगाचारके मतमे 'निरालम्बन विज्ञान' मात्रकी ही सत्ता है, बाह्य पदार्थ स्वप्नमें देखी जानेवाली वस्तुओंकी भाँति मिथ्या है। माध्यमिक सबको शून्य ही मानता है। उसके मतमे दीप-शिखाकी भाँति संस्कारवश क्षणिक विज्ञानकी धारा ही बाह्य पदार्थोंके रूपमे प्रतीत होती है। जैसे दीपककी शिखा प्रतिक्षण मिट रही है, फिर भी एक धारा-सी बनी रहनेके कारण उसकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार बाह्य पदार्थ भी प्रतिक्षण नष्ट हो रहे हैं, उनकी विज्ञान- धारा मात्र प्रतीत होती है। जैसे तैल चुक जानेपर दीपशिखा बुझ जाती है, उसी प्रकार संस्कार नष्ट होनेपर विज्ञान-धारा भी शान्त हो जाती है। इस प्रकार अभाव या शून्यताकी प्राप्ति ही उसकी मान्यताके अनुसार अपवर्ग या मुक्ति है। इस सूत्रमे वैभाषिक तथा सौत्रान्तिकके मतको एक मानकर उसका निराकरण किया जाता है। उन दोनोंकी मान्यताका स्वरूप इस प्रकार है— रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा तथा संस्कार—ये पाँच स्कन्ध हैं। पृथिवी आदि चार भूत तथा भौतिक वस्तुएँ—शरीर, इन्द्रिय और विषय—ये 'रूपस्कन्ध' कहलाते है। पार्थिव परमाणु रूप, रस, गन्ध और स्पर्श—इन चार गुणोंसे युक्त एवं कठोर स्वभाववाले होते हैं; वे ही समुदायरूपमे एकत्र हो पृथिवीके आकार- में संगठित होते है। जलीय परमाणु रूप, रस और स्पर्श इन तीनोंसे युक्त एवं स्निग्ध स्वभावके होते हैं; वे ही जलके आकारमे संगठित होते हैं। तेजके परमाणु रूप और स्पर्श गुणसे युक्त एवं उष्ण स्वभाववाले है; वे अग्निके आकारमे संगठित हो जाते है। वायुके परमाणु स्पर्शकी योग्यतावाले एवं गतिशील होते हैं; वे ही वायुरूपमे संगठित होते हैं। फिर पृथिवी आदि चार भूत शरीर, इन्द्रिय और विषयरूपमे संगठित होते है। इस तरह ये चार प्रकार- के क्षणिक परमाणु हैं, जो भूत-भौतिक संघातकी उत्पत्तिमे कारण बनते हैं। यह परमाणुहेतुक भूत-भौतिकवर्ग ही रूपस्कन्ध एवं बाह्यसमुदाय कहलाता है। विज्ञानस्कन्ध कहते है आभ्यन्तरिक विज्ञानके प्रवाहको। इसीमे 'मैं' की प्रतीति होती है। यही घट-ज्ञान, पट-ज्ञान आदिके रूपमे अविच्छिन्न धाराकी भाँति स्थित हैं। इसीको कर्ता, भोक्ता और आत्मा कहते है। इसीसे सारा लौकिक व्यवहार चलता है। सुख-दुःख आदिकी अनुभूतिका नाम वेदना स्कन्ध है। उपलक्षणसे जो वस्तुकी प्रतीति करायी जाती है, जैसे ध्वजसे गृहकी और दण्डसे पुरुषकी,
सूत्र १९] अध्याय २ १४३
सूत्र १९] अध्याय २ १४३ उसीका नाम संज्ञास्कन्ध है। राग, द्वेष, मोह, मद, मात्सर्य, भय, शोक और विषाद आदि जो चित्तके धर्म हैं, उन्हींको संस्कारस्कन्ध कहते हैं। विज्ञान आदि चार स्कन्ध चित्त-चैत्तिक कहलाते हैं। विज्ञानस्कन्धरूप चित्तका नाम ही आत्मा हैं; शेष तीन स्कन्ध 'चैत्य' अथवा 'चैत्तिक' हैं। ये सब प्रकारके व्यवहारोंका आश्रय बनकर अन्तःकरणमे संगठित होते हैं। यह चारों स्कन्धोंका समुदाय या चित्त-चैत्तिक वर्ग 'आभ्यन्तर समुदाय' कहा गया है। इन दोनो समुदायोंसे भिन्न और किसी वस्तु (आत्मा, आकाश आदि) की सत्ता ही नहीं है। ये ही दोनों बाह्य और आभ्यन्तर समुदाय समस्त लोक-व्यवहारके निर्वाहक हैं। इनसे ही सब कार्य चल जाता है, इसलिये नित्य 'आत्मा' को माननेकी आवश्यकता ही नहीं है। इसके उत्तरमें कहा जाता है कि परमाणु जिसमे हेतु बताये गये हैं, वह भूत-भौतिक बाह्य-समुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर-समुदाय—ये दोनो प्रकारके समुदाय तुम्हारे कथनानुसार मान लिये जायं तो भी उक्त समुदायकी सिद्धि असम्भव ही है; क्योंकि समुदायके अन्तर्गत जो वस्तुएँ हैं, वे सब अचेतन हैं, एक-दूसरेकी अपेक्षासे शून्य हैं। अतः उनके द्वारा समुदाय अथवा संघात बना लेना असम्भव है। परमाणु आदि सभी वस्तुएँ तुम्हारी मान्यताके अनुसार क्षणिक भी हैं। एक क्षणमे जो परमाणु है, वे दूसरे क्षणमें नहीं है। फिर वे क्षणविध्वंसी परमाणु और पृथिवी आदि भूत इस समुदाय या संघातके रूपमे एकत्र होनेका प्रयत्न कैसे कर सकते है, कैसे उनका संघात बन सकता है अर्थात् किसी प्रकार और कभी भी नहीं बन सकता; इसलिये उनके सघात- पूर्वक जगत्-उत्पत्तिकी कल्पना करना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है; अतः वैभाषिक और सौत्रान्तिकोंका मत मानने योग्य नहीं है। सम्बन्ध—पूर्वपक्षीकी ओरसे दिये जानेवाले समाधानका स्वयं उल्लेख करके सूत्रकार उसका खण्डन करते हैं— इतरेतरप्रत्ययत्वादिति चेन्नोत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् ॥२।२।१९॥ चेत्=यदि कहो; इतरेतरप्रत्ययत्वात् =अविद्या, संस्कार, विज्ञान आदि- मेसे एक-एक दूसरे-दूसरेके कारण होते है, अतः इन्हींसे समुदायकी सिद्धि हो सकती है; इति न=तो यह ठीक नहीं है; उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् =क्योंकि