बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
४८२ नारदीयपुराणम् शून्यदश्राः शून्यचंद्राः पूर्णचंद्रा गतेंदवः । तर्कचन्द्रा वेदपक्षाः खरामाश्चाश्विमाक्रमात् ॥४६७॥ आभ्यः परास्तु घटिकाश्चतस्रो विषसंज्ञिताः । विवाहादिषु कार्येषु विषनाडीं विवर्जयेत् ॥४६८॥ भास्करादिषु वारेषु ये मुहूर्त्ताश्च निंदिताः । विवाहादिषु ते वर्ज्या अपिलक्षगुणैर्युताः ॥४६६॥ निहिता वारदोषा ये सूर्यवारादिषु क्रमात् । अपि सर्वगुणोपेतास्ते वर्ज्याः सर्वमंगले ॥४७०॥ एकागर्लान्त्रितुल्यं यत्तल्लग्नं च विवर्जयेत् । अपिशुक्रेज्यसंयुक्तं विषसंयुक्तदुग्धवत् ॥४७१॥ ग्रहणोत्पातभं त्याज्यं मंगलेषु ऋतुत्रयम् । यावच्च शशिना मुक्ता मुक्तभं दग्धकाष्ठवत् ॥४७२॥ मंगलेषु त्यजेत्खेटैर्विद्धं च क्रूरसंयुतम् । अखिलं पञ्चगव्यं सुराविद्युतं यथा ॥४७३॥ पाद एव शुभैर्विद्धमशुभं नैव कृत्स्नभम् । क्रूरविद्धं युतं धिष्ण्यं निखिलं नैव मंगलम् ॥४७४॥ तुलामियुनकन्यांशा धनुरंत्यार्धसंयुताः । एते नवांशाः शुभदा वृषमस्यांशकाः खलु ॥४७५॥ अत्यांशास्तेऽपि शुभदा यदि वर्गोत्तमाह्वयाः । अन्ये नवांशा न ग्राह्या यतस्ते कुनवांशकाः ॥४७६॥ कुनवांशकलग्नं यत्त्याज्यं सर्वगुणान्वितम् । यस्मिन्दिने महापातस्तद्दिनं वर्जयेच्छुभे ॥४७७॥ अपि सर्वगुणोपेतं दम्पत्योर्मृत्युदं यतः । अनुक्ताः स्वल्पदोषाः स्युर्विद्युन्नीहारवृष्टयः ॥४७८॥
श्रवण का १०, धनिष्ठा का १०, शतभिषा का १८, पूर्वभाद्रपद का १६, उत्तरभाद्रपद का २४ और रेवती का ध्रुवांक ३० है। इन अश्विनो आदि नक्षत्रों के अपने-अपने ध्रुवांक तुल्य घड़ी के बाद ४ घड़ी तक विषघटी होतो है। विवाह आदि शुभ कार्यों में विषघटिकाओं का त्याग कर देना चाहिए ॥४६३-४६८॥ रवि आदि वारों में जो मुहूर्त निन्दित कहा गया है, वह यदि अन्य लाख गुणों से युक्त हो तो भी विवाह आदि शुभ कार्यों में वर्जनीय ही है ॥४६९॥ रवि आदि दिनों में जो-जो वार-दोष कहे गये हैं वे अन्य सब गुणों से युक्त हों तो भी शुभ कार्य में त्याज्य हैं ॥४७०॥ नक्षत्र के जिस चरण में पूर्वोक्त 'एकार्गल दोष' हो, उस चरण (नवांश) से युक्त जो लग्न हो उसमें यदि गुरु, शुक्र का योग हो तो भी विषयुक्त दूध के समान उसका परित्याग कर देना चाहिए ॥४७१॥ ग्रहण तथा उत्पात से दूषित नक्षत्र को तीन ऋतु (६ मास) तक शुभ कार्य में छोड़ देना चाहिए। जब चन्द्रमा को भोगकर छोड़ दे तो वह नक्षत्र जली हुई लकड़ी के समान निष्फल हो जाता है अर्थात् दोषकारक नहीं रह जाता। शुभ कार्यों में ग्रह से विद्ध और पापग्रह से युक्त सम्पूर्ण नक्षत्र को मदिरामिश्रित पञ्चगव्य के समान त्याग देना चाहिए; परन्तु यदि नक्षत्र शुभग्रह से विद्ध हो तो उसका केवल विद्धचरण ही त्याज्य है, सम्पूर्ण नक्षत्र नहीं। किन्तु पापग्रह से विद्ध नक्षत्र शुभकार्य में सम्पूर्ण रूप से त्याज्य हैं ॥४७२-४७४॥ विहित नवमांश—वृष, तुला, मिथुन, कन्या और धन का उत्तरार्ध तथा इन राशियों के नवमांस विवाह लग्न शुभप्रद है किसी भी लग्न में अन्तिम नवमांश यदि वर्गोत्तम हो तभी उसे शुभप्रद समझना चाहिए। अन्यथा विवाहलग्न का अन्तिम नवमांश (२६ अंश ४० कला के बाद) अशुभ होता है। यहाँ अन्य नवमांश नहीं ग्रहण करने चाहिए। क्योंकि वे कुनवमांश कहलाते हैं। लग्न में कुनवमांश हों तो अन्य सब गुणों से युक्त होने पर भी वह त्याज्य है। जिस दिन महापात (सूर्य-चन्द्रमा का क्रान्ति-साम्य) हो, वह दिन भी शुभ कार्य में छोड़ देने योग्य है। क्योंकि वह अन्य सब 'गुणों' से युक्त होने पर भी वर-वधू के लिए घातक होता है। इन दोषों से भिन्न विद्युत्, नीहार (कुहरा) और वृष्टि आदि दोष, जिनका अभी वर्णन नहीं किया गया है, (स्वल्पदोष) कह- लाते हैं ॥४७५-४७८॥
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८३ प्रत्यर्कपरिवेषेन्द्रचापांबुधरगर्जनाः । लत्तोपग्रहपाताह्या मासद्ग्धाह्वया तिथिः ॥४७९॥ दग्धलग्नांधबधिरपंगुसंज्ञाश्च राशयः । एवामाद्यास्ततस्तेषां व्यवस्था क्रियतेऽधुना ॥४८०॥ अकालजा भवन्त्येते विद्युन्नीहारवृष्टयः । दोषाय मंगले ननमदोषाग्रैव कालतः ॥४८१॥ बृहस्पतिः केंद्रगतः शुक्नो वा यदि वा बुधः । एकोऽपि दोषनिचयं हरत्येव न संशयः ॥४८२॥ तिर्यक्पंचोर्ध्वगाः पञ्च रेखा द्वे द्वे च कोणयोः । द्वितीये शंभुकोणेऽग्निधिष्ण्यं चक्रे प्रविन्यसेत् ॥४८३॥ मान्यत्र साभिजित्येकरेखाखेटेन विद्धभम् । पुरतः पृष्ठतोऽर्काद्या दिनक्षं लत्तयंति यत् ॥४८४॥ अर्काकृतिगुणाष्टांगबाणाष्टनवसंख्यभम् । सूर्यनक्षाह्सर्पापंञ्चर्क्षात्त्यत्त्वाष्ट्रमितोडुविष्णुभम् ॥४८५॥ संख्यया दिनभे तावदशिभभात्पातदुष्टभम् । सौराष्ट्रे सालवदेशे तु लत्तितं भं विवर्जयेत् ॥४८६॥ कलिगवंगदेशेषु पातितं न शुभप्रदम् । बाल्हिके कुरुदेशे चान्यस्मिन्देशे न दूषणम् ॥४८७॥ तिथयो मासद्ग्धाश्च दग्धलग्नानि यान्यपि । मध्यदेशे विवर्ज्यानि न दुष्टानीतरेषु च ॥४८८॥ षङ्ग्वंधकाणलग्नानि मासशून्याश्च राशयः । गौडमालवयोस्त्याज्या अन्यदेशे न गर्हिताः ॥४८९॥
लघु दोष—विद्युत् नीहार वृष्टि, प्रतिसूर्य (दो सूर्य-सा दीखना) परिवेष (घेरा), इन्द्रधनुष, मेघगर्जन, लत्ता, उपग्रह, पात, मासद्ग्धतिथि, दग्ध, अन्ध, वधिर तथा पंगु—इन राशियों के लग्न, एवं छोटे-छोटे और भी अनेक दोष हैं । अब उनकी व्यवस्था का प्रतिपादन किया जाता है ॥४७९-४८०॥ विद्युत्, नीहार, वृष्टि--ये यदि असमय में हों तभी दोष समझे जाते हैं । यदि समय पर हों (जैसे जाड़े के दिन में पाला पड़े, वर्षा ऋतु में वर्षा हो तथा सघन मेघ में बिजली चमके) तो सब शुभ ही समझे जाते हैं ॥४८१॥ यदि वृहस्पति, शुक्र अथवा बुध इनमें से एक भी केन्द्र में हो तो इन सब दोषों को नष्ट कर देते हैं । इसमें संशय नहीं ॥४८२॥ पञ्चशलाका-वेध--पाँच रेखायें पड़ी और पाँच रेखायें खड़ी खींचकर दो-दो रेखायें कोणों में खींचने (बनाने) से पञ्चशलाका-चक्र बनता है । इस चक्र के ईशान कोण वाली दूसरी रेखा में कृत्तिका को लिखकर आगे प्रदक्षिणा-क्रम से रोहिणी आदि अभिजित् सहित सम्पूर्ण नक्षत्रों का उल्लेख करे । जिस रेखा में ग्रह हों, उसी रेखा की दूसरी ओर वाला नक्षत्र विद्ध समझा जाता है ॥४८३३॥ लत्तादोष--सूर्य आदि ग्रह क्रमशः अपने आश्रित नक्षत्र से आगे और पीछे १२, २२, ३, ७, ६, ५, ८ तथा ९वें दैनिक नक्षत्र को लातों से दूषित करते हैं, इसलिए इसका नाम 'लत्तादोष' है । पातदोष—सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे अश्लेषा, मघा, रेवती, चित्रा, अनुराधा और श्रवण तक की जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनी से दिननक्षत्र तक गिनने से संख्या हो तो वह नक्षत्र पातदोष से दूषित होता है ॥४८४-४८५३॥ परिहार--सौराष्ट्र (काठियावाड़) और शाल्वदेश में लत्तादोष वर्जित है । कलिंग (जगन्नाथपुरी से कृष्णा नदी तक का भूभाग), वंग (बंगाल), बाल्हिक (बलख) और कुरु (कुरुक्षेत्र) देश में पातदोष त्याज्य हैं; अन्य देशों में ये दोष त्याज्य नहीं हैं ॥४८६-४८७॥ मासद्ग्ध तिथि तथा दग्ध लग्न--ये मध्यदेश (प्रयाग से पश्चिम, कुरुक्षेत्र से पूर्व, विन्ध्य और हिमालय के मध्य) में वर्जित हैं । अन्य देशों में ये दूषित नहीं हैं ॥४८८॥ पंगु, अंध, काण लग्न तथा मासों में जो शून्य राशियां कही गई हैं, वे गौड़ (बंगाल से भुवनेश्वर तक) और मालव (मालवा) देश में त्याज्य हैं । अन्य देशों में निन्दित नहीं हैं ॥४८९॥
४८४ नारदीयपुराणम् दोषदुष्टं सदा कालं सन्निमाष्टुं न शक्यते । अपि धातुरतो ग्राह्यं दोषाल्यत्वं गुणाधिकम् ॥४६०॥ एवं सुलग्ने दंपत्योः कारयेत्सम्यगीक्षणम् । हस्तोच्छ्रितां चतुर्हस्तैश्चतुरस्त्रां समंततः ॥४६१॥ स्तंभैश्चतुर्भिः सुलक्षणैर्वामभागे तु सन्नताम् । समंडपां चतुर्दिक्षु सोपानैरतिशोभिताम् ॥४६२ प्रागुदक्प्रवणां रंभास्तंभैहंसशुकादिभिः । विचित्रितां चित्रकुंभैर्विविधैस्तोरणांकुरैः ॥४६३॥ शृङ्गारपुष्पनिवहैर्वर्णकैः समलंकृताम् । विप्राशीर्वचनैः पुण्यस्त्रीभिर्दिव्यैर्मनोरमाम् ॥४६४॥ वादित्रनृत्यगीताद्यैहृदयानंदिनीं शुभाम् । एवंविधां समारोहेन्मिथुनं स्वाग्निवेदिकाम् ॥४६५॥ अष्टधा राशिकूटं च स्वाहुर्गुणराशयः । राशीशयोनिवर्णाख्यऋक्षवः पुत्रपौत्रदाः ॥४६६॥ एकराशौ पृथग्धिष्ण्ये दंपत्योः पाणिपीडनम् । उत्तमं मध्यमं मित्रं राश्यैकत्वं ययोस्तयोः ॥४६७॥ एकर्क्षे त्वेकराशौ हि विवाहः प्राणहानिदः । स्त्रीधिष्ण्यादाद्यनवके स्त्रीदूरमतिनिंदितम् ॥४६८॥ द्वितीये मध्यमं श्रेष्ठं तृतीये नवके नृभम् । तिस्रः पूर्वोत्तरा धातृयाम्यमाहेशतारकाः ॥४६९॥ विशेष—काल सदा दोषों से दुष्ट होता है; उसे ब्रह्मा भी सर्वथा निर्दोष नहीं बना सकते हैं, इसलिए जिसमें थोड़ा दोष और अधिक गुण हों, ऐसा काल ग्रहण करना चाहिए ॥४९०॥ वेदी और मण्डप—इस प्रकार वर-वधू के लिए शुभप्रद उत्तम समय में श्रेष्ठ लग्न का अनुसन्धान करना चाहिए। तदनन्तर एक हाथ ऊँची, चार हाथ लम्बी और चार हाथ चौड़ी उत्तर दिशा में नत (कुछ नीची) वेदी बनाकर सुन्दर चिकने चार खंभों का एक मण्डप तैयार करे, जिसमें चारों ओर सीढ़ियाँ बनायी गई हों। मण्डप भी पूर्व-उत्तर में निम्न हो। वहाँ चारों तरफ कदलीस्तम्भ गड़े हों। वह मण्डप शुक आदि पक्षियों के चित्रों से सुशोभित हो तथा वेदी नाना प्रकार के मांगलिक चित्रयुक्त कलशों से विचित्र शोभा धारण कर रही हो। भाँति-भाँति के बन्दनवार तथा अनेक प्रकार के फूलों के श्रृंगार से वह स्थान सुसज्जित हो । ऐसे मण्डप के बीच बनी हुई ब्राह्मणों के स्वस्तिवाचनपूर्वक आशीर्वादों, और पुण्यशीला स्त्रियों तथा दिव्य समारोहों से अत्यन्त मनोरम नृत्य, वाद्य और मांगलिक गीतों की ध्वनि से जो हृदय को आनन्द प्रदान करने वाली वेदी पर, वर और वधू को विवाह के लिए बिठाये ॥४९१-४९५॥ वर-वधू की कुण्डली का मिलान-- आठ प्रकार के भकूट, नक्षत्र, राशि, राशिस्वामी, योनि तथा वर्ण आदि सब गुण यदि ऋजु (अनुकूल या शुभ) हों तो ये पुत्र पौत्रादि का सुख प्रदान करने वाले होते हैं ॥४९६॥ वर और कन्या दोनों की राशि और नक्षत्र भिन्न हों तो उन दोनों का विवाह उत्तम होता है। दोनों की राशि भिन्न और नक्षत्र एक हो तो उनका विवाह मध्यम होता है और यदि दोनों का एक ही नक्षत्र, एक ही राशि हो तो उन दोनों का विवाह प्राणसंकट उपस्थित करने वाला होता है ॥४९७॥ स्त्रीदूर-दोष- कन्या के नक्षत्र से प्रथम नवक (नौ नक्षत्रों) के भीतर वर का नक्षत्र हो तो यह 'स्त्रीदूर' नामक दोष कहलाता है, जो अत्यन्त निन्दित है। द्वितीय नवक (१० से १८ तक) के भीतर हो तो मध्यम कहा गया है। यदि तृतीय नवक (१९ से २७ तक) के भीतर हो तो उन दोनों का विवाह श्रेष्ठ कहा गया है ॥४९८॥ गण विचार - पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तर भाद्रपद, रोहिणी, भरणी और आर्द्रा--ये नक्षत्र मनुष्यगण हैं। श्रवण, पुनर्वसु, हस्त, स्वाती, रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुष्य और
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८५ इति मर्त्यगणे ज्ञेयः स्यादमर्त्यगणः परः । हर्यदित्यार्कवात्वंत्यमित्राष्ट्विज्येंदुतारकाः ॥५००॥ रक्षोगणः पितृत्वाष्ट्रद्विदैवाग्नींद्रतारकाः । वसुवारीशमूलाहितारकाभिषु तास्ततः ॥५०१॥ दंपत्योर्जन्मभे चैकगणे प्रीतिरनेकधा । मध्यमा देवमर्त्यानां राक्षसानां तयोर्मृतिः ॥५०२॥ मृत्युः षष्टाष्टके पंचनवमे त्वनपत्यता । नैःस्वं द्विद्वीदशेऽन्येषु दंपत्योः प्रीतिरुत्तमा ॥५०३॥ एकाधिपे मित्रभावे शुभदं पाणिपीडनम् । द्विद्वादशे त्रिकोणे च न कदाचित्षडष्टके ॥५०४॥ अश्वेभमेषसर्पाहिह्योतुमेषोतुमूषकाः । आखुगोमहिषव्याघ्रकालीव्याघ्रमृगद्वयम् ॥५०५॥ श्वानः कपिर्बभ्रुयुगं कपिर्सिहतुरंगमाः । सिंहगोदंतिनो भानां योनयः स्युर्यथाश्विभात् ॥५०६॥ श्वैणं बभ्रूरगं मेषवानरौ सिंहवारणम् । गोव्याघ्रमाखुमार्जारं महिषाश्वं च शात्रवम् ॥५०७॥ झषालिकर्कटा विप्रास्तदूर्ध्वाः क्षत्रियादयः । पुंवर्णराशेः स्त्रीराशौ सति हीने यथाशुभम् ॥५०८॥ मृगशिरा—ये देवगण हैं तथा मघा, चित्रा, विशाखा, कृत्तिका, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल और आश्लेषा— ये नक्षत्र राक्षसगण हैं ॥४९९-५०१॥ वर और कन्या के नक्षत्र किसी एक ही के गण हों तो दोनों में परस्पर सब प्रकार से प्रेम बढ़ता है । एक मनुष्यगण और दूसरे का देवगण होने पर दोनों में मध्यम प्रेम होता है तथा यदि एक का राक्षस और दूसरे का देव या मनुष्यगण हो तो वर-वधू दोनों को मृत्युतुल्य क्लेश प्राप्त होता है ॥५०२॥ राशिकूट--वर और कन्या की राशियों को परस्पर गिनने से यदि वे छठीं और आठवीं संख्या में पड़नी हों तो दोनों के लिए घातक हैं । यदि पांचवीं और नवीं संख्या में हों तो संतान की हानि होती है । यदि दूसरी और बारहवीं संख्या में हों तो वर-वधू दोनों निर्धन होते हैं। इनसे भिन्न संख्या में हों तो दोनों में परस्पर प्रेम होता है ॥५०३॥ परिहार—द्विर्द्वादश (२, १२) और नवपञ्चम अथवा दोष में यदि दोनों की राशियों का एक ही स्वामी हो अथवा दोनों के राशि-स्वामियों में मित्रता हो तो विवाह शुभ है कहा गया है। परन्तु षडष्टक (६, ८) में दोनों के स्वामी एक होने पर भी विवाह शुभदायक नहीं होता है ॥५०४॥ योनि-कूट—१ अश्व, २ गज, ३ मेष, ४ सर्प, ५ सर्प, ६ श्वान, ७ मार्जार, १० मूषक, ११ मूषक १२ गो, १३ महिष, १४ व्याघ्र, १५ महिष, १६ व्याघ्र, १७ मृग, १८ मृग, १६ श्वान, २० वानर, २१ नकुल, २२ नकुल, २३ वानर, २४ सिंह, २५ अश्व, २६ सिंह, २७ गो तथा २८ गज--ये क्रमशः अश्विनो से लेकर रेवती तक (अभि- जित् सहित) अट्ठाईस नक्षत्रों की योनियां हैं ॥५०५-५०६॥ इनमें श्वान और मृग में, नकुल और सर्प में, मेष और वानर में, सिंह और गज में, गो और व्याघ्र में, मूषक और मार्जार में तथा महिष और अश्व में परस्पर शत्रुता होती है ॥५०७॥ वर्ण-कूट—मीन, वृश्चिक और कर्कराशि ब्राह्मण वर्ण हैं, इनके बाद वाले क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण हैं । समान वर्ण के वर और बधू में तो विवाह स्वयंसिद्ध है ही वर की राशि के वर्ण से कन्या की राशि का वर्ण हीन हो तो भी विवाह शुभ होता है । इससे विपरीत (अर्थात् वर की राशि के वर्ण से कन्या की राशि का वर्ण श्रेष्ठ) हो तो अशुभ समझना चाहिए ॥५०८॥
४८६ नारदीयपुराणम् चतुस्त्रिद्वयंघ्रिमोत्थायाः कन्यायाश्चाश्विभात्क्रमात् । वह्निभादिषुखान्नाडीस्त्रिचतुःपंचपर्वसु ॥५०६॥ गणयेत्संख्यया चैकनाड्यां मृत्युर्न पार्श्वयोः । प्राजापत्यब्राह्मदैवा विवाहाश्चार्षसंयुताः ॥५१०॥ उक्तकाले तु कर्तव्याश्चत्वारः फलदायकाः । गांधर्वासुरपैशाचराक्षसाद्यास्तु सर्वदा ॥५११॥ चतुर्थमभिजिल्लग्नमुदयर्क्षाच्च सप्तमम् । गोधूलिकं तदुभयं विवाहे पुत्रपौत्रदम् ॥५१२॥ प्राच्यानां च कलिंगानां मुख्यं गोधूलिकं स्मृतम् । अभिजित्सर्वदेशेषु मुख्यो दोषविनाशकृत् ॥५१३॥ मध्यंदिनगते भानौ मुहूर्तोऽभिजदाह्वयः । नाशयत्यखिलान्दोषान्पिनाकी त्रिपुरं यथा ॥५१४॥ पुत्रोद्वाहात्परं पुत्रीविवाहो न ऋतुत्रये । न त्रयोवंतमुद्वाहान्मंगले नान्यन्मंगलम् ॥५१५॥ विवाहश्चैकजन्यानां षण्मासाभ्यंतरे यदि । असंशयं त्रिभिर्वर्षैस्तत्रैका विधवा भवेत् ॥५१६॥ प्रत्युद्वाहो नैव कार्यो नैकस्मै दुहितृद्वयम् । न चैकजन्ययोः पुंसोरेकजन्ये तु कन्यके ॥५१७॥ नाडी-विचार-चार चरण वाले नक्षत्र (अश्विनी, भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, अश्लेषा मघा, पूर्वा फाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वा षाढ़, श्रवण, शतभिषा, उत्तर भाद्रपद, रेवती--इन) में उत्पन्न कन्या के लिए अश्विनी से आरंभ करके रेवती तक तीन पर्वों पर क्रम-उत्क्रम से गिनकर नाड़ी समझै। तीन चरण वाले (कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ ओर पूर्वाभाद्रपद) नक्षत्रों में उत्पन्न कन्या के लिए कृत्तिका से लेकर भरणी तक क्रम-उत्क्रम से चार पर्वों पर गिनकर नाड़ी का ज्ञान प्राप्त करे तथा दो चरणों वाले (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) नक्षत्रों में उत्पन्न कन्या की नाड़ी जानने के लिए मृगशिरा से लेकर रोहिणी तक पाँच पर्वों पर क्रम-उत्क्रम से गिने । यदि वर और वधू दोनों के नक्षत्र एक पर्व पर पड़े तो वे उनके लिए घातक हैं और भिन्न पर्वों पर पड़े तो शुभ होता है ॥५०९॥ विवाहों के भेद-ऊपर बताये हुए शुभ समय में (१) प्राजापत्य, (२) ब्राह्म, (३) दैव और (४) आर्ष ये- चार प्रकार के विवाह करने चाहिए। ये ही चारों विवाह उपयुक्त फल देने वाले होते हैं। इससे अतिरिक्त जो गान्धर्व, आसुर, पैशाच तथा राक्षस विवाह है, वे तो सब समय समान ही फल देने वाले होते हैं ॥५१०-५११॥ अभिजित्-और गोधूलि-लग्न--सूर्योदयकाल में जो लग्न रहता है, उससे चतुर्थ लग्न का नाम अभिजित है और सातवाँ गोधूलि-लग्न कहलाता है। ये दोनों विवाह में पुत्र-पौत्र प्रदान करने वाले होते हैं ॥५१२॥ पूर्व तथा कलिंग देशवासियों के लिए गोधूलि-लग्न प्रधान है और अभिजित् लग्न तो सब देशों के लिए मुख्य कहा गया है, क्योंकि वह सब दोषों का नाश करने वाला है ॥५१३॥ अभिजित्-प्रशंसा-सूर्य के मध्य आकाश में जाने पर अभिजित्-मुहूर्त होता है, वह समस्त दोषों को वैसे ही नष्ट कर देता है, जैसे त्रिपुरासुर को शंकर ने नष्ट किया था ॥५१४॥ पुत्र का विवाह करने के बाद छह मासों के भीतर पुत्री का विवाह नहीं करना चाहिए। एक पुत्र या पुत्री का विवाह करने के बाद दूसरे पुत्रका उपनयन भी नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार एक मंगल कार्य करने के बाद छह मासों के भीतर दूसरा मंगल कार्य नहीं करना चाहिए। एक गर्भ से उत्पन्न दो कन्याओं का विवाह यदि छह मास के भीतर हो तो निश्चय ही तीन वर्ष के भीतर उसमें से एक विधवा होती है ॥५१५-५१६॥ अपने पुत्र के साथ जिसकी पुत्री का विवाह हो, फिर उसके पुत्र के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना 'प्रत्युद्वाह' कहलाता है । ऐसा कभी नहीं करना चाहिए तथा किसी एक ही वर को अपनी दो कन्यायें नहीं देनी चाहिए। दो सहोदर वरों को दो सहोदर कन्यायें नहीं देनी चाहिए। दो सहोदरों का एक ही दिन (एक साथ) विवाह या मुण्डन नहीं करना चाहिए ॥५१७॥
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८७ नैवं कदाचिदुद्वाहो नैकदा मुंडनद्वयम् । दिवाजातस्तु पितरं रात्रौ तु जननीं तथा ॥५१८॥ आत्मानं संध्ययोर्हंति नास्ति गंडे विपर्ययः । सुतः सुता वा नियतं श्वशुरं हंति मूलजः ॥५१९॥ तदंत्यपादजो नैव तथाश्लेषाद्यपादजः । ज्येष्ठांत्यपादजौ ज्येष्ठं बालो हंति न बालिका ॥५२०॥ न बालिकांबुमूलर्क्षे मातरं पितरं तथा । सैंद्री धवाग्रजं हंति देवरं तु द्विदैवजा ॥५२१॥ आरभ्योद्वाहदिवसात् षष्ठे वाप्यष्टमे दिने । वधूप्रवेशः संपत्त्यै दशमे सप्तमे दिने ॥५२२॥ हायनद्वितयं जन्मलग्नदिवसानपि । संत्यज्य हातिशुक्रेऽपि यात्रा वैवाहिकी शुभा ॥५२३॥ श्रीप्रदं सर्वगीर्वाणस्थापनं चोत्तरायणे । गीर्वाणपुर्वगीर्वाणमतिनोद्धृश्यमानयोः ॥५२४॥ विचित्रैत्रेव्वेव मासेषु माघादिषु च पंचसु । शुक्लपक्षेषु कृष्णेषु तदादिष्वष्टसु शुभम् ॥५२५॥ दिनेषु यस्य देवस्य या तिथस्तत्र तस्य च । द्वितीयादिद्वये पंचम्यादितस्तिसृषु क्रमात् ॥५२६॥ दशम्यादेश्चतसृषु पौर्णमास्यां विशेषतः । व्युत्तगदितिचंद्रांत्यहस्तत्रयगुरूडुषु ॥५२७॥ साश्विधातृजलाधीशहरिमित्रवसुष्वपि । कुजवर्जितवारेषु कर्तुः सूर्ये बलप्रदे ॥५२८॥ चंद्रताराबलोपेते पूर्वाह्णे शोभने दिने । शुभलग्ने शुभांशे च कर्तुं नं निधनोदये ॥५२९॥ राशयः सकलाः श्रेष्ठाः शुभग्रहयुतेक्षिताः । पंचाष्टके शुभे लग्ने नैधने शुद्धिसंयुते ॥५३०॥ गण्डान्तदोष--पूर्वकथित गण्डान्त में यदि दिन में बालक का जन्म हो तो वह पिता का, रात्रि में जन्म हो तो माता का और संध्या (सायं या प्रातः) काल में जन्म हो तो वह अपने शरीर के लिए घातक होता है। गण्ड का यह परिमाण अन्यथा नहीं होता है। मूल में उत्पन्न होने वाली संतान पुत्र हो या कन्या, श्वशुर के लिए घातक होती है, किन्तु मूल के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाला बालक श्वशुर का विनाशक नहीं होता है। अश्लेषा के प्रथम चरण में जन्म लेने वाला बालक भो पिता का या श्वशुर का विनाशक नहीं होता है। ज्येष्ठा के अन्तिम चरण में उत्पन्न बालक हो श्वशुर के लिए घातक होता है, कन्या नहीं। इसी प्रकार पूर्वाषाढ या मूल में उत्पन्न कन्या भो माता या पिता का नाश करने वाली नहीं होती है। ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न कन्या अपने पति के बड़े भाई के लिए और विशाखा में जन्म लेने वाली कन्या अपने देवर के लिए घातक होती है ॥५१८-५२१॥ वधू प्रवेश - विवाह के दिन से ६,८,१० और ७ वें दिन में वधू प्रवेश (पति-गृह में प्रथम प्रवेश) हो तो सम्पत्ति की वृद्धि होती है। द्वितीय वर्ष, जन्मराशि, जन्मलग्न और जन्मदिन को छोड़कर अन्य समय में सम्मुख शुक्र रहने पर भो वैवाहिक यात्रा (वधू प्रवेश) शुभ होती है ॥५२२-५२३॥ देव प्रतिष्ठा-उत्तरायण में, बृहस्पति और शुक्र उदित हों तो चैत्र को छोड़कर माघ आदि पाँच मासों के शुक्ल पक्ष में और कृष्णपक्ष में भी आरंभ से आठ दिन तक सब देवताओं की स्थापना शुभदायक होती है। जिस देवता की जो तिथि है उसमें उस देवता को और २, ३, ५, ६, ७, १०, ११, १२, १३ तथा पूर्णिमा-इन तिथियों में सब देवताओं की स्थापना शुभ होती है। तीनों उत्तरा, पुनर्वसु, मृगशिरा, रेवती, हस्त, चित्रा, स्वाती, पुष्य, अश्विनी, रोहिणी, शतभिषा, श्रवण, अनुराधा और धनिष्ठा--इन नक्षत्रों में तथा मंलवार को छोड़कर अन्य वारों में देव-प्रतिष्ठा करनी चाहिए । स्थापना करने वाले (यजमान) के लिए सूर्य, तारा और चन्द्रमा बलवान् हों, उस दिन के पूर्वाह्न में, शुभ समय, शुभ लग्न और शुभ नवमांश में तथा यजमान की जन्मराशि से अष्टम राशि को छोड़कर अन्य लग्नों में देवताओं की प्रतिष्ठा शुभ होती है ॥५२४-५२६॥ मेष आदि सब राशियां शुभग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो देवस्थापन के लिए श्रेष्ठ समझी जाती हैं। प्रत्येक कार्य में पंचांग (तिथि, वार, नक्षत्र, भोग और करण) शुभ होने चाहिए और लग्न से अष्टम स्थान भी शुद्ध (ग्रहवर्जित) होना आवश्यक है ॥५३०॥ (१) लग्न में चन्द्रमा, सूर्य, मंगल, राहु, केतु और शनि कर्ता के
४८८ नारदीयपुराणम् लग्नस्थाश्चन्द्रसूर्यारंराहुकेत्वर्कसूनवः । कर्तुर्मृत्युप्रदाश्चान्ये धनधान्यसुखप्रदाः ॥५३१॥ द्वितीये नेष्टदाः पापाः सौम्याश्चंद्रश्चवित्तदाः । तृतीये निखिलाः खेटाः पुत्रपौत्रसुखप्रदाः ॥५३२॥ चतुर्थे सुखदाः सौम्याः क्रूराः खेटाश्च दुःखदाः । ग्लानिदाः पंचमे क्रूराः सौम्याः पुत्रसुखप्रदाः ॥५३३॥ षष्ठे शुभाः शत्रुदाः स्युः पापाः शत्रुक्षयंकराः । व्याधिदाः सप्तमे पापाः सौम्याः शुभफलप्रदाः ॥५३४॥ अष्टमस्थाः खगाः सर्वे कर्तुर्मृत्युप्रदायकाः । धर्मे पापा घ्नन्ति सौम्याः शुभदा मंगलप्रदाः ॥५३५॥ कर्मगा दुःखदाः पापाः सौम्याश्चंद्रश्च कीर्तिदाः । लाभस्थानगताः सर्वे भूरिलाभप्रदा ग्रहाः ॥५३६॥ व्ययस्थानगताः शश्वद्बहुव्ययकरा ग्रहाः । हंत्यर्थहीनाः कर्तारं मंत्रहीनास्तु ऋत्विजम् ॥५३७॥ स्त्रियं लक्षणहीनास्तु न प्रतिष्ठासमो रिपुः । गुणाधिकतरे लग्ने दोषः स्वल्पतरो यदि ॥५३८॥ सुराणां स्थापनं तत्र कर्तुरिष्टार्थसिद्धिदम् । निर्माणायतनग्रामगृहादीनां समासतः ॥५३९॥ क्षेत्रमादौ परीक्षेत गंधवर्णरसांशकैः । मधुपुष्पाम्लपिशितगंधं विप्रानुपूर्वकम् ॥५४०॥ सितं रक्तं च हरितं कृष्णवर्णं यथाक्रमम् । मधुरं कटुकं तिक्तं कषायंकरसं क्रमात् ॥५४१॥ लिए घातक होते हैं। अन्य (बुध, गुरु और शुक्र) लग्न में धन, धान्य आदि सब सुख प्रदान करते हैं। (२) द्वितीय भाव में पापग्रह अनिष्ट फल देने वाले और शुभ ग्रह धन की वृद्धि करने वाले होते हैं। (३) तृतीय भाव में शुभ और पाप सब ग्रह पुत्र-पौत्रादि सुख को बढ़ाने वाले होते हैं। (४) चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह शुभ-फल और पापग्रह पाप-फल देते हैं। (५) पञ्चम भाव में पापग्रह कष्टदायक और शुभ ग्रह पुत्रादि सुख देने वाले होते हैं। (६) षष्ठ भाव में शुभ ग्रह शत्रु वृद्धि करने वाले और पापग्रह शत्रु के लिए घातक होते हैं। (७) सप्तम भाव में पापग्रह रोगकारक और शुभ ग्रह शुभ फल देने वाले होते हैं। (८) अष्टम भाव में शुभग्रह और पापग्रह सभी कर्ता (यजमान) के लिए घातक होते हैं। (९) नवम भाव में पापग्रह हों तो वे धर्म को नष्ट करते हैं और शुभग्रह शुभ फल देने वाले होते हैं। (१०) दशम भाव में पापग्रह दुःखदायक और शुभ ग्रह सुयश की वृद्धि करने वाले होते हैं। (११) एकादश स्थान में पाप और शुभ सब ग्रह सब प्रकार से लाभकारक ही होते हैं। (१२) लग्न से द्वादश स्थान में पाप या शुभ सभी ग्रह व्यय को बढ़ाते हैं ॥५३१-५३६॥ प्रतिष्ठा में अन्य विशेष बात—प्रतिष्ठा कराने वाले पुरोहित (या आचार्य) को अर्थज्ञान न हो तो यजमान का अनिष्ट होता है। मन्त्रों का अशुद्ध उच्चारण हो तो ऋत्विजों (यज्ञ करने वालों) का और कर्म विधि- हीन हो तो कर्ता की स्त्री का अनिष्ट होता है। इसलिए नारद ! देवप्रतिष्ठा के समान दूसरा शत्रु भी नहीं है। यदि लग्न में अधिक गुण हों और थोड़े-से दोष हों तो उसमें देवताओं की प्रतिष्ठा कर लेनी चाहिए। इससे कर्ता (यजमान) के अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि होती है। मुने! अब मैं संक्षेप से ग्राम, मन्दिर तथा गृह आदि के निर्माण की बात बताता हूँ ॥५३७-५३९॥ गृहनिर्माण के विषय में ज्ञातव्य बातें—गृह आदि बनाना हो तो पहले गन्ध, वर्ण, रस तथा आकृति के द्वारा क्षेत्र (भूमि) की परीक्षा कर लेनी चाहिए। यदि उस स्थान की मिट्टी में मधु के समान गन्ध हो तो ब्राह्मणों के, पुष्पसदृश गन्ध हो तो क्षत्रियों के, आम्ल के समान गन्ध हो तो वैश्यों के और मांस की-सी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्रों के बसने योग्य जानना चाहिए। वहाँ की मिट्टी का रंग श्वेत हो तो ब्राह्मणों के, लाल हो तो क्षत्रियों के, पीत हो तो वैश्यों के और कृष्ण हो तो वह शूद्रों के निवास के योग्य है। यदि वहाँ की मिट्टी का स्वाद मधुर हो तो ब्राह्मणों के, कडुआ (मिर्च के समान) हो तो क्षत्रियों के, तिक्त हो तो वैश्यों के और कषाय (कसैला) हो तो उस स्थान को शूद्रों के निवास करने योग्य समझना चाहिए ॥५४०-५४१॥ ईशान, पूर्व और उत्तर
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८६ अत्यन्तवृद्धिदं नृणामीशानप्रागुदक्प्लवम् । अन्यदिक्षु प्लवे तेषां शश्वदत्यन्तहानिदम् ॥५४२॥ समगर्तारत्निमात्रं खनित्वा तव पूरयेत् । अत्यन्तवृद्धिरधिके होने हानिः समे समम् ॥५४३॥ तया निशादौ तत्कृत्वा पानीयेन प्रपूरयेत् । प्रातर्दृष्टे जले वृद्धिः समं पंके क्षयः क्षये ॥५४४॥ एवं लक्षणसंयुक्तं सम्यक् क्षेत्रं समीक्ष्यते । दिङ्साधनाय तन्मध्ये समं मंडलमालिखेत् ॥५४५॥ द्वादशांगुलकं शंकुं स्थापयेत्तत्र दिक्क्रमम् । चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे षड्वर्गपरिशोधिते ॥५४६॥ रेखामार्गे च कर्त्तव्यं प्राकारं सुमनोहरम् । आयामेषु चतुर्दिक्षु प्रागादिषु च सत्स्वपि ॥५४७॥ अष्टावष्टौ प्रतिदिशं द्वाराणि स्युर्यथाक्रमम् । प्रदक्षिणक्रमात्तेषाममूनि च फलानि वै ॥५४८॥ हानिर्नैःस्व्थं धनप्राप्तिर्नृपपूजा महद्धनम् । अतिचौर्य्यमतिकोधो भीतिर्दिशि शचीपतेः ॥५४९॥ निधनं बंधनं भीतिरर्थाप्तिर्धनवर्धनम् । अनातंकं व्याधिमयं निःसत्त्वं दक्षिणादिशि ॥५५०॥ पुत्रहानिः शत्रुवृद्धिलक्ष्मीप्राप्तिर्द्धनागमः । सौभाग्यमतिदौर्भाग्यं दुःखं शोकश्च पश्चिमे ॥५५१॥ कलहहानिर्निःसत्त्वं हानिर्द्धान्यधनागमः । संपद्वृद्धिर्मार्सभीतिरामयं दिशि शीतगोः ॥५५२॥ दिशा में प्लव (नीची) भूमि सब के लिए अत्यन्त वृद्धि देने वाली होती है । अन्य दिशाओं में प्लव (नीची) भूमि सब के लिए हानि करने वाली होती है ॥५४२॥ गृह भूमि परीक्षा—जिस स्थान में घर बनाना हो वहाँ अरत्नि (कोहिनी से कनिष्ठा अंगुलि तक) के बराबर लंबाई, चौड़ाई और गहराई करके कुण्ड बनाये । फिर उसे उसी खोदी हुई मिट्टी से भरे। यदि भरने से मिट्टी शेष बच जाय तो उस स्थान में वास करने से सम्पत्ति को वृद्धि होती है । यदि मिट्टी कम हो जाय तो वहाँ रहने से सम्पत्ति की हानि होतो है। यदि सारी मिट्टी से वह कुण्ड भर जाय तो मध्यम फल जानना चाहिए ॥५४३॥ अथवा उसी प्रकार अरत्नि के माप का कुण्ड बनाकर सायंकाल उसको जल से पूरित कर दे और प्रातःकाल देखे; यदि कुण्ड में जल अवशिष्ट हो तो उस स्थान में वृद्धि होगी। यदि कोचड़ (गोली मिट्टी) ही बची हो तो मध्यम फल है और यदि कुण्ड की भूमि में दरार पड़ गयी हो तो उस स्थान में वास करने से हानि होगी ॥५४४॥ मुने ! इस प्रकार निवास करने योग्य स्थान की भली भांति परीक्षा करके उक्त लक्षणयुक्त भूमि में दिक्साधन (दिशाओं का ज्ञान) करने के लिए समतल भूमि में वृत्त (गोल रेखा) बनाये । वृत्त के मध्यभाग में द्वादशांगुल शंकु (बारह विभाग या पर्व से युक्त एक सोधी लकड़ी) की स्थापना करे और दिक्साधनविधि से दिशाओं का ज्ञान करे । फिर कर्ता के नाम के अनुसार षड्वर्ग शुभ क्षेत्रफल (वास्तुभूमि की लम्बाई-चौड़ाई का गुणनफल) ठीक करके अभीष्ट लम्बाई-चौड़ाई के बराबर (दिशासाधित रेखानुसार) चतुर्भुज बनाये । उस चतुर्भुज रेखामार्ग पर सुन्दर प्रकार (चहारदीवारी) बनाये। लम्बाई और चौड़ाई में पूर्व आदि चारो दिशाओं में आठ-आठ द्वार के भाग होते हैं। प्रदक्षिण क्रम से उनके निम्नांकित फल हैं। (जैसे पूर्वभाग में उत्तर से दक्षिण तक) १. हानि, २. निर्धनता, ३. धनलाभ, ४. राजसम्मान, ५. बहुत धन, ६. अतिचोरी, ७. अतिक्रोध तथा ८. भय—ये क्रमशः आठ द्वारों के फल हैं । दक्षिण दिशा में क्रमशः १. मरण, २. बन्धन, ३. भय, ४. धनलाभ, ५. धनवृद्धि, ६. निर्भयता, ७. व्याधिभय तथा ८. निर्बलता—ये (पूर्व से पश्चिम तक के) आठ द्वारों के फल हैं। पश्चिम दिशा में क्रमशः १. पुत्रहानि, २. शत्रुवृद्धि, ३. लक्ष्मीप्राप्ति, ४. धनलाभ, ५. सौभाग्य, ६. अतिदौर्भाग्य, ७. दुःख तथा ८. शोक—ये दक्षिण से उत्तर तक के आठ द्वारों के फल ६२ ना० पु०
४६० नारदीयपुराणम् एवं गृहादिषु द्वारविस्ताराद्विगुणोच्छ्रितम् । पश्चिमे दक्षिणे वापि कपाटं स्थापयेद्गृहे ॥५५३॥ प्राकारांतःक्षिति कुर्यादेकाशीतिपदं यथा । मध्ये नवपदे ब्रह्मस्थानं तदतिनिन्दितम् ॥५५४॥ द्वात्रिंशदंशाः प्राकारसमीपांशाः समंततः । पिशाचांशे गृहारंभो दुःखशोकभयप्रदः ॥५५५॥ शेषांशाः स्युश्च निर्माणे पुत्रपौत्रधनप्रदाः । शिराः स्युर्वास्तुतो रेखा दिग्विदिग्मध्यसंभवाः ॥५५६॥ ब्रह्मभागाः पिशाचांशाः शिराणां यत्र संहतिः । तत्र तत्र विजातीयाद्वास्तुनो मर्मसंधयः ॥५५७॥ मर्माणि संधयो नेष्टाः स्वस्थेऽप्येवं निवेशने । सौम्यफाल्गुनवैशाखमाघश्रावणकार्तिकाः ॥५५८॥ मासाः स्युगृ हनिर्माणे पुत्रारोग्यधनप्रदाः । अकारादिषु भागेषु दिक्षु प्रागादिषु क्रमात् ॥५५६॥ खरोऽश्वोऽथ हरिः श्वाख्यः सर्पाखुगजशशकाः । दिग्दर्गाणामियं योनिः स्ववर्गात्पंचमो रिपुः ॥५६०॥ साध्यवर्गः पुरः स्थाप्य पृष्ठतः साधकं न्यसेत् । व्यत्यये नाशनं तस्य ऋणमल्पं धनाच्छुभम् ॥५६१॥ आरभ्य साधकं धिष्ण्यं साध्यं यावच्चतुर्गुणम् । विभजेत्सप्तभिः शेषं साधकस्य धनं तदा ॥५६२॥ हैं। इसी प्रकार उत्तर दिशा में (पश्चिम से पूर्व तक) १. स्त्रीहानि, २. निर्बलता, ३. हानि, ४. धान्यलाभ, ५. धनागम, ६. सम्पत्तिवृद्धि, ७. भय तथा ८. रोग-ये क्रमशः आठ द्वारों के फल हैं ॥५४५-५५३॥ इसी तरह पूर्व आदि दिशाओं के गृहादि में भी द्वार और उसके फल समझने चाहिए। द्वार का जितना विस्तार (चौड़ाई) हो, उससे दुगुनी ऊंची किंवाड़े बनाकर उन्हें घर में (चहार दीवारी के) दक्षिण या पश्चिम भाग में लगाये ॥५५३॥ चहारदीवारी के भीतर जितनी भूमि हो, उसके इक्यासी पद (समान खण्ड) बनाये। उनके बीच के नौ खण्डों में ब्रह्मा का स्थान है। यह गृहनिर्माण में अत्यन्त निन्दित है। चहारदीवारी से मिले हुए जो चारों ओर के ३२ भाग हैं, वे पिशाचांश हैं। उनमें घर बनाने से दुःख, शोक और भय प्राप्त होता है। शेष अंशों (पदों) में घर बनाये जायं तो पुत्र, पौत्र और धन की वृद्धि होती है ॥५५४-५५५॥ वास्तु भूमि की दिशा-विदिशाओं की रेखा वास्तु की शिरा कहलाती है। एवं ब्राह्मभाग, पिशाचभाग तथा शिरा का जहाँ-जहाँ योग हो वहाँ-वहाँ वास्तु की मर्मसन्धि वह मर्मसन्धि तथा गृहारम्भ तथा गृह-प्रवेश में अनिष्टकारक समझी जाती है ॥५५६-५५७॥ गृहारम्भ में प्रशस्त मास--मार्गशीर्ष, फाल्गुन, वैशाख, माघ, श्रावण और कार्तिक-ये मास गृहारंभ में पुत्र, आरोग्य और धन देने वाले होते हैं ॥५५८॥ दिशाओं में वर्ग और वर्गेश--पूर्व आदि आठों दिशाओं में क्रमशः अकारादि आठ वर्ग होते हैं। इन दिशा वर्गों के क्रमशः गरुड, मार्जार, सिंह, श्वान, सर्प, मूषक, गज और शशक (खरगोश) ये योनियाँ होती हैं। इन योनि वर्गों में अपने से पांचवे वर्ग वाले परस्पर शत्रु होते हैं ॥५५९-५६०॥ जिस ग्राम में या जिस स्थान में घर बनाना हो, वह साध्य तथा घर बनाने वाला साधक, कर्ता और भर्ता आदि कहलाता है। इसको ध्यान में रखना चाहिए ।) साध्य (ग्राम) की वर्गसंख्या को लिखकर, उसके पीछे (बायें भाग में) साधक की वर्गसंख्या लिखे। उसमें आठ का भाग देकर जो शेष बचे, वह साधक का धन होता है। इसके विपरीत विधि से (अर्थात् साधक की वर्गसंख्या के बायें भाग में साध्य की वर्गसंख्या रखकर जो संख्या बने, उसमें आठ से भाग देकर शेष) साधक का ऋण होता है। इस प्रकार ऋण की संख्या अल्प और धन-संख्या अधिक हो तो शुभ माने (अर्थात् उस ग्राम या उस दिशा में बनाया हुआ घर रहने योग्य है, ऐसा समझे) ॥५६१॥ इसी प्रकार, साधक के नक्षत्र से साध्य के नक्षत्र तक गिनकर जो संख्या हो उसको चार से गुणा करके गुणनफल में सात से भाग दे तो शेष साधक का धन होता है ॥५६२॥
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६१ विस्तार आयामगुणो गृहस्य पदमुच्यते । तस्माद्धनाधनायर्क्षवारांशाः संख्यया क्रमात् ॥५६३॥ धनाधिकं गृहं वृद्धयै ऋणाधिकमशोभनम् । विषमायः शुभायैव समायोधनाय निर्धनाय च ॥५६४॥ धनक्षयस्तृतीय पञ्चमर्क्षे परः क्षयः । आत्मक्षयः सप्तमोर्क्षे भवेत्येव हि भर्तृभात् ॥५६५॥ द्विर्द्वादशो निर्धनाय त्रिकोणमसुताय च । षट्काष्टकं मृत्यवे स्याच्छुभदा राशयः परे ॥५६६॥ सूर्याङ्गारकवारांशा वैश्वानरभयप्रदाः । इतरे ग्रहवारांशाः सर्वकामार्थसिद्धिदाः ॥५६७॥ नभस्यादिषु मासेषु त्रिषु त्रिषु यथाक्रमम् । पूर्वादिदक्शिरोवामपार्श्वशयायाप्रदक्षिणम् ॥५६८॥ चराह्वयो वास्तुपुमान् चरत्येवं महोदरः । यद्दिङ्मुखो वास्तुपुमान् कुर्यात्तद्दिङ्मुखं गृहम् ॥५६९॥ प्रतिकूलमुखं गेहं रोगशोकभयप्रदम् । सबलो मुखगेहानामेष दोषो न विद्यते ॥५७०॥ वृत्येटिकां स्वर्णरेणुधान्यशैवलसंयुक्तम् । गृहमध्ये हस्तमात्रे गर्ते न्यासाय विन्यसेत् ॥५७१॥ वस्त्वायामदलं नाभिस्तस्माद्व्यंगुलत्रयम् । कुक्षिस्तस्मिन्यसेच्छंकुं पुत्रपौत्रविवर्धनम् ॥५७२॥ चतुर्विंशत्रयोविंशत्षोडशद्वादशांगुलैः । विप्रादीनां कुक्षिमानं स्वर्णवस्त्राद्यलंकृतम् ॥५७३॥
वास्तुभूमि तथा घर के धन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार, और अंश के ज्ञान का साधन - वास्तुभूमि या घर को चौड़ाई को लम्बाई से गुणा करने पर गुणनफल 'पद' कहलाता है । उस 'पद' को (६ स्थानों में रख कर क्रमशः ८,३,९,८,९,६ से गुणा करे और गुणनफल में क्रमशः १२,८,८,२७,७,९ से भाग दे । फिर जो शेष बचे वे क्रमशः धन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार तथा अंश होते हैं। धन अधिक हो तो वह घर शुभ होता है । यदि ऋण अधिक हो तो अशुभ होता है तथा विषम (१,३,५,७) आय शुभ और सम (२,४,६,८) आय अशुभ होता है। घर का जो नक्षत्र हो, वहाँ से अपने नाम के नक्षत्र तक गिनकर जो संख्या हो, उसमें ९ से भाग दे । फिर यदि शेष (तारा) ३ बचे तो धन का नाश होता है । ५ बचे तो यश की हानि होती है और ७ बचे तो गृहकर्ता का ही मरण होता है। घर की राशि और अपनो गिनने पर परस्पर २,१२ हो तो धनहानि होती है; ९, ५ हो तो पुत्र की हानि होती है और ६,८ हो तो अनिष्ट होता है; अन्य संख्या हो तो शुभ समझना चाहिए । सूर्य और मंगल के वार तथा अंश हो तो उस घर में अग्निभय होता है। अन्य वार-अंश हो तो सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं की सिद्धि होती है ॥५६३-५६७॥ वास्तु पुरुष की स्थिति-भादों आदि तीन-तीन मासों में क्रमशः पूर्व आदि दिशाओं की ओर मस्तक करके बायीं करवट से सोये हुए महासर्पस्वरूप 'घर' नामक वास्तु पुरुष प्रदक्षिण-क्रम से विचरण करते रहते हैं । जिस समय जिस दिशा में वास्तुपुरुष का मस्तक हो, उस समय उसी दिशा में घर का दरवाजा बनाना चाहिए, मुख से विपरीत दिशा में घर का दरवाजा बनाने से रोग, शोक और भय होते हैं। किन्तु यदि घर में चारो दिशाओं में द्वार हो तो यह दोष नहीं होता है ॥५६८-५७०॥ गृहारम्भकाल में नींव के भीतर हाथ भर के गड्ढे में स्थापित करने के लिए सोना, पवित्र स्थान की रेणु (धूलि), धान्य और सेवारसहित ईंट घर के भीतर संग्रह करके रखे । घर की जितनी लम्बाई हो, उसके तीन अंगुल नीचे (वास्तुपुरुष के पुच्छभाग की ओर) कुक्षि रहती है। उसमें शंकु का न्यास करने से पुत्र आदि की वृद्धि होती है ॥५७१-५७२॥ शंकु प्रमाण-खैर, अर्जुन, शाखू, कचनार, रक्तचन्दन, पलाश, रक्तशाल विशाल आदि वृक्षों में से किसी की लकड़ी से शंकु बनता है। ब्राह्मणादि वर्गों के लिए क्रमशः २४, २३, २० और १६ अंगुल के शंकु होने चाहिए।
४६२ नारदीयपुराणम् खादिगञ्जु नशालोत्थं युगयंत्रं तद्भवम् । रक्तचंदनपालाशरक्तशालविशालजम् ॥५७४॥ शंकुं त्रिधा विभज्याद्यं चतुरस्रं ततः परम् । अष्टास्रं च तृतीयासौ मन्वलं सुदुमव्रणम् ॥५७५॥ एवं लक्षणसंयुक्तं परिकल्प्य शुभे दिने । षड्वर्गशुद्धिसूत्रेण सूत्रिते धरणीतले ॥५७६॥ मृदुध्रुवक्षिप्रभेषु रिक्ताभावर्जिते दिने । व्यर्कारचरलग्नेषु पापे चाष्टमवर्जिते ॥५७७॥ नैधने शुद्धिसंयुक्ते शुभलग्ने शुभांशके । शुभेक्षितेऽथ वा युक्ते लग्ने शंकुं विनिक्षिपेत् ॥५७८॥ पुण्याहघोषैर्विप्रैस्तैः पुण्यपुण्यांगनादिभिः । स्वत्रिकेंद्रत्रिकोणस्थैः शुभैस्त्वयायारिगैः परैः ॥५७९॥ लग्नांशाष्टारिचंद्रेण दैवज्ञाचंनपूर्वकम् । एकद्वित्रिचतुःशालाःसप्त शाला दशाङ्गयाः ॥५८०॥ ताः पुनः षड्विधाः शालाः प्रत्येकं दशषड्विधाः । ध्रुवं धान्यं जयं नंदं खरैः कांतं मनोरमम् ॥५८१॥ सुमुखं दुर्मुखं क्रूरं शत्रुं स्वर्णप्रदं क्षयम् । आक्रंदं विपुलाख्यं च विजयं षोडशं गृहम् ॥५८२॥ गृहाणि गणयेदेवं तेषां प्रस्तारभेदतः । गुरोरधो लघुः स्थाप्यः पुरस्तादूर्ध्वन्त्यसेत् ॥५८३॥ गृहभिः पूरयेत्पश्चात्सर्वलघववधीविधिः । कुर्याल्लघुपदेऽलिंदं गृहद्वारात्प्रदक्षिणम् ॥५८४॥
उस शंकु के बराबर-बराबर तीन भाग करके ऊपर वाले भाग में चतुष्कोण, मध्य वाले भाग में अष्टकोण और नीचे वाले (तृतीय) भाग में बिना कोण का (गोलाकार) उसका स्वरूप होना उचित है इस प्रकार उत्तम लक्षणों से युक्त कोमल और छेदरहित शंकु शुभ दिन में बनाये। उसके षड्वर्ग द्वारा शुद्ध सूत्र से सूत्रित भूमि (गृहक्षेत्र) में मृदु, ध्रुव, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रों में, अमावास्या और रिक्ता को छोड़कर अन्य तिथियों में, रविवार, मंगलवार तथा चर लग्न को छोड़कर अन्य वारों और अन्य (स्थिर या द्विस्वभाव) लग्नों में, जब पापग्रह लग्न में न हो, अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हो; शुभ राशि लग्न हो और उसमें शुभ नवमांश हो, उस लग्न में शुभग्रह का संयोग या दृष्टि हो; ऐसे समय (सुलग्न) में ब्राह्मणों द्वारा पुण्याहवाचन कराते हुए मांगलिक वाद्य और सौभाग्यवती स्त्रियों के मंगलगीत आदि के साथ मुहूर्त बताने वाले दैवज्ञ (ज्योतिष के विद्वान् ब्राह्मण) के पूजन (सत्कार) पूर्वक कुक्षि- स्थान में शंकु की स्थापना करे । लग्न से केन्द्र और त्रिकोण में शुभ ग्रह तथा ३,६,११ में पापग्रह और चन्द्रमा हो तो यह शंकुस्थापन श्रेष्ठ है ।।५७३-५७६है।। घर के छह भेद होते हैं १ एकशाला २ द्विशाला ३ त्रिशाला, ४ चतुश्शाला, ५ सप्तशाला तथा ६ दशशाला इन छहों शालाओं में से प्रत्येक के १६ भेद होते हैं। उन सब भेदों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-ध्रुव, २ धान्य, ३ जय, ४ नन्द, ५ खर, ६ कान्त, ७ मनोरम, ८ सुमुख, ९ दुर्मुख, १० क्रूर, ११ शत्रुद, १२ स्वर्णद, १३ क्षय, १४ आक्रन्द, १५ विपुल और १६वां विजय नामक गृह होता है। चार अक्षरों के प्रस्तार के भेद से क्रमशः इन गृहों की गणना करनी चाहिए ।।५८०-५८२है।। प्रस्तारभेद--प्रथम ४ गुरु (S) चिह्न लिख कर उनमें प्रथम गुरु के नीचे लघु (I) चिह्न लिखे । फिर आगे जैसा ऊपर हो उसी प्रकार के गुरु या लघु चिह्न लिखना चाहिए । फिर उसके नीचे (तीसरी पंक्ति में) प्रथम गुरु चिह्न के नीचे लघु चिह्न लिखकर आगे (दाहिने भाग में) जैसे ऊपर गुरु या लघु हो वैसे ही चिह्न लिखे तथा पीछे (बायें भाग में) गुरुचिह्न से पूरा करे। इसी प्रकार पुनः पुनः तब तक लिखता जाय जब तक पंक्ति (प्रस्तार) में सब चिह्न लघु न हो जाय। इस प्रकार चार दिशा होने के कारण ४ अक्षरों से १६ भेद होते हैं। प्रत्येक भेद में चारों चिह्न को प्रदक्षिणक्रम से पूर्व आदि दिशा समझकर जहां-जहां लघु चिह्न पड़े; वहां-वहां घर का द्वार और अलिन्द (द्वार के आगे का भाग—चबूतरा) बनाना चाहिए। इस प्रकार पूर्वादि दिशाओं में अलिन्द के भेदों से १६ प्रकार के घर होते हैं ।।५८३-५८४है।।
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६३ पूर्वादिगेष्वलिदेषु गृहभेदास्तु षोडश । स्नानागारं दिशि प्राच्यामाग्नेय्यां पाकमंदिरम् ॥५८५॥ याम्यां च शयनागारं नैऋत्यां शास्त्रमंदिरम् । प्रतीच्यां भोजनगृहं वायव्यां धान्यमंदिरम् ॥५८६॥ कौबेर्यां देवतागारमीशान्यां क्षीरमंदिरम् । शय्यामूत्रास्त्रतद्विच्च भोजनं मंगलाश्रयम् ॥५८७॥ धान्यस्त्रीभोगवित्तं च शृंगारायतनानि च । ईशान्यादिक्रमेस्तेषां गृहनिर्माणकं शुभम् ॥५८८॥ एतेष्वेतानि शस्त्राणि स्वं स्थाप्यानि स्वदिक्ष्वपि । ध्वजो धूम्रोऽथ सिंहःश्वा सौरमेयः खरो गजः ॥५८६॥ ध्वांक्षश्चैव भवंत्यष्टौ पूर्वादिपाः क्रमादमी । प्लक्षोदुंबरचूताख्या निंबस्तु हि विभीतकाः ॥५६०॥ ये कंटका दुग्धवृक्षा वृक्षाश्वत्थकपित्थकाः । अगस्तिसिधुवालाख्यतितिडीकाश्च निंदिताः ॥५६१॥ धित्त्वाग्नजदेहस्यात्पश्चिमे दक्षिणे तथा । गृहपादागृहस्तंभाः समाः शस्ताश्च नासमाः ॥५६२॥ नात्युच्छ्रितं नातिनीचं कुडचोत्सेधं यथार्हति । गृहोपरि गृहादीनामेवं सर्वत्र चिंतयेत् ॥५६३॥ गृहादीनां गृहस्रावं क्रमशोडष्टविधं स्मृतम् । पांचालमानं वैदेहं कौरवं च कुजन्यकम् ॥५६४॥ मागधं शूरसेनं च गांधारावितका स्मृतम् । सचतुर्भागविस्तारमुत्सेधं यत्तदुच्यते ॥५६५॥ पांचालमातुलानां च ह्युत्तरोत्तरवृद्धितः । वैदेहादीन्यशेषाणि मानानि स्युर्यथाक्रमम् ॥५६६॥ पांचालमानं सर्वेषां साधारणमतः परम् । अवंतिमानं विप्राणां गांधारं क्षत्रियस्य च ॥५६७॥ कौजन्यमानं वैश्यानां विप्रादीनां यथोत्तरम् । यथोदितं जलस्राव्यं द्वित्रिभूमिकवेश्मनाम् ॥५६८॥ वास्तुभूमि की पूर्वदिशा में स्नानगृह, अग्निकोण में पाकगृह, दक्षिण में शयनगृह, नैऋत्यकोण में शस्त्रागार, पश्चिम में भोजनगृह, वायुकोण में धनधान्यादि रखने का घर, उत्तर में देवताओं का गृह और ईशानकोण में जल का गृह बनाना चाहिए तथा आग्नेयकोण से आरंभ करके उक्त दो-दो घरों के बीच क्रमशः मन्थन (दूध-दही से घृत निकालने) का, घृत रखने का, पैखाने का, विद्याभ्यास का, स्त्रीसहवास का, औषध का और शृङ्गार की सामग्री रखने का घर बनाना शुभ है । अतः इन सब घरों में उन-उन वस्तुओं को रखना चाहिए ॥५८५-५८८१/२॥ आयों के नाम और दिशा—पूर्वादि आठ दिशाओं में क्रम से ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, (खर गदहा), गज और ध्वांक्ष (काक)-ये आठ आय होते हैं ॥५८९१/२॥ घर के समीप निन्द्य वृक्ष—पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा तथा कांटे वाले और दुग्धवाले सब वृक्ष, पीपल, कपित्थ (कैथ), अगस्त्य वृक्ष, सिन्धुवार (निर्गुण्डी) और इमली ये सब वृक्ष घर के समीप निन्दित कहे गये हैं । विशेषतः घर के दक्षिण और पश्चिम-भाग में वृक्ष हों तो धन आदि का नाश करने वाले होते ॥५९०-५९११/२॥ गृह प्रमाण--घर के स्तम्भ घर के पैर होते हैं । इसलिए वे समसंख्या (४,६,८ आदि) में होने पर ही उत्तम कहे गये हैं; विषम संख्या में नहीं । घर को न तो अधिक ऊँचा ही करना चाहिए, न अधिक नीचा ही। इसलिए अपनी इच्छा (निर्वाह) के अनुसार दीवार की ऊँचाई करनी चाहिए। घर के ऊपर जो घर (दूसरा मंजिल) बनाया जाता है, उसमें भी इस प्रकार का विचार करना चाहिए । घरों की ऊँचाई के प्रमाण आठ प्रकार के कहे गये हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-१पाञ्चाल, २ वैदेह, ३ कौरव, ४ कुजन्य (कान्यकुब्ज ?), ५ मागध, शूरसेन, ७ गान्धार और ८ आवन्तिक । जहाँ घर की ऊँचाई उसकी चौड़ाई से सवागुनी अधिक होती है, वह भूतल से ऊपरतक का पाञ्चालमान कहलाता है, फिर उसी ऊँचाई को उत्तरोत्तर सवागुनी बढ़ाने से वैदेह आदि सब मान होतेहैं। इनमें पाञ्चालमान तो सर्वसाधारण जनों के लिए शुभ हैं। ब्राह्मणों के लिए आवन्तिकमान, क्षत्रियों के लिए गान्धारमान तथा वैश्यों के लिए कौजन्यमान है। इस प्रकार ब्राह्मणादि वर्णों के लिए यथोत्तर गृहमान समझना चाहिए तथा दूसरे मंजिल और तीसरे मंजिल के मकान में भी पानी का बहाव पहले बताये अनुसार ही बनाना चाहिए ॥५६२-५९८॥
४६४ | नारदीयपुराणम् उष्ट्रकुंजरशालानां ध्वजायेऽथ वा गजे । पशुशालाश्च शालानां ध्वजायेऽथ वा गजे ॥५९६६॥ द्वारशय्याशनानामथध्वजाः सिंहवृषध्वजाः । वास्तुपूजाविधिं वक्ष्ये नववेश्मप्रवेशने ॥६००॥ हस्तमात्रा लिखेल्लेखा दश पूर्वा दशोत्तराः । गृहमध्ये तंडुलोपर्येकाशीतिपदं भवेत् ॥६०१॥ पंचोत्तरान्वक्ष्यमाणांश्चत्वारिंशत्सुरान् लिखेत् । द्वात्रिंशद्वाह्यतः पूज्यास्त्वंतःस्थास्त्रयोदश ॥६०२॥ तेषां स्थानानि नामानि वक्ष्यामि क्रमशोधुना । ईशानकोणतो बाह्ये द्वात्रिंशत्त्रिदशा अमी ॥६०३॥ कृपीटयोनिः पर्जन्यो जयंतः पाकशासनः । सूर्यः शशो मृगाकशी वायुः पूषा च नैऋतिः ॥६०४॥ गृहाक्षतो दंडधरो गांधर्वो भृगुराजकः । मृगः पितृगणाधीशस्ततो दौवारिकाह्वयः ॥६०५॥ सोमः सुग्रीऽदितिदिती द्वात्रिंशत्त्रिदशा अमी । अथेशानादिकोणस्थाश्चत्वारस्तत्समीपगाः ॥६०६॥ आपः सावित्रसंज्ञश्च जयो रुद्रः क्रमादमी । एकांतराः स्युः प्रागाद्याः परितो ब्रह्मणः स्मृताः । ६०७॥ अर्यमा सविता बिबविवस्वान्वसुधाधिपः । मित्रोऽथ राजयक्ष्मा च तथा पृथ्वीधराह्वयः ॥६०८॥ आपवत्सोऽष्टमः पंचचत्वारिंशत्सुरा अमी । आपश्चैवापवत्सश्च पर्जन्योऽग्निर्दितिः क्रमात् ॥६०९॥ यद्विकानां च वर्गोऽयमेवं कोणेष्वशेषतः । तन्मध्ये विंशतिर्बाह्या द्विपदास्ते तु सर्वदा ॥६१०॥
घर में प्रशस्त आय—ध्वज अथवा गज आय में ऊँट और हाथी के रहने के लिए घर बनवाये तथा अन्य सब पशुओं के घर भी उसो (ध्वज ओर गज) आय में बनाने चाहिए । द्वार, शय्या, आसन, छाता और ध्वजा-इन सबों के निर्माण के लिए सिंह, वृष अथवा ध्वज आय होने चाहिए ॥५९९१/२॥ अब मैं नूतनगृह में प्रवेश के लिए वास्तुपूजा की विधि बताता हूँ-घर के मध्यभाग में तन्दुल (चावल) पर पूर्व से पश्चिम की ओर एक-एक हाथ लम्बो दस रेखायें खींचे । फिर उत्तर से दक्षिण की ओर भी उतनी ही लम्बी-चौड़ी दस रेखायें बनाये । इस प्रकार उसमें बराबर-बराबर ८१ पद (कोष्ठ) होते हैं । उनमें आगे बताये जाने वाले ४५ देवताओं का यथोक्त स्थान में नामोल्लेख करे । बत्तीस देवता बाहर (प्रान्त के कोष्ठ में) और तेरह देवता भीतर पूजनीय होते हैं । उन ४५ देवताओं के स्थान और नाम का क्रमशः वर्णन करता हूँ । किनारे के बत्तीस कोष्ठों में ईशान कोण से आरंभ करके क्रमशः बत्तीस देवता पूज्य हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं-कृपीट- योनि (अग्नि) १, पर्जन्य २, जयन्त ३, इन्द्र ४, सूर्य ५, सत्य ६, भृश ७, आकाश ८, वायु ९, पूषा १०, अनृत ११, गृहक्षत १२, यम १३, गन्धर्व १४, भृंगराज १५, मृग १६, पितर १७, दौवारिक १८, सुग्रीव १९, पुष्पदन्त २०, वरुण २१, असुर २२, शेष २३, राजयक्ष्मा २४, रोग २५, अहि २६, मुख्य २७, भल्लाटक २८, सोम २९, सर्प ३०, अदिति ३१, और दिति-ये चारों किनारों के देवता हैं । ईशान, अग्नि, नैऋत्य और वायु कोण के देवों के समीप क्रमशः आप ३३, सावित्र ३४, जय ३५, तथा रुद्र ३६ के पद हैं । ब्रह्मा के चारों ओर पूर्व आदि आठों दिशाओं में क्रमशः अर्यमा ३७, सविता ३८, विवस्वान् ३९, विबुधाधिप ४०, मित्र ४१, राजयक्ष्मा ४२, पृथ्वीधर ४३, आपवत्स ४४, हैं और मध्य के नव पदों में ब्रह्माजी (४५) को स्थापित करना चाहिए । इस प्रकार सब पदों में ये पेंतालीस देवता पूजनीय होते हैं । जैसे ईशान-कोण में आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि और दिति-ये पाँच देव एक पद होते हैं, उसी प्रकार अन्य कोष्ठों ये पाँच-पांच देवता भी एकपद के भागी हैं । अन्य जो बाह्य पंक्ति के (जयन्त, इन्द्र आदि) बीस देवता है, वे सब द्विपद दो-दो पदों के भागी हैं तथा ब्रह्मा से पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में जो अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर-ये चार देवता हैं, वे त्रिपद (तीन-तीन पदों के भागी) हैं, अतः वास्तु-विधि के ज्ञाता विद्वान् पुरुष को चाहिए कि ब्रह्माजी सहित इन एकपद, द्विपद तथा त्रिपद
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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६५ अर्यमा च विवस्वांश्च मित्रः पृथ्वोधराह्वयः । ब्रह्मणः परितो दिक्षु चत्वारस्त्रिपदाः स्मृताः ॥६११॥ ब्रह्माणं च तथैकद्वित्रिपदानर्चयेत्सुरान् । वास्तुमंत्रेण वास्तुज्ञो दूर्वादध्यक्षतादिभिः ॥६१२॥ ब्रह्ममंत्रेण वा श्वेतवस्त्रयुग्मं प्रदापयेत् । आवाहनादिसर्वोपचारांश्च क्रमशस्तथा ॥६१३॥ नैवेद्यं त्रिविधान्नेन वाद्यैः सह समर्पयेत् । ताम्बूलं च ततः कर्ता प्रार्थयेद्वास्तुपुरुषम् ॥६१४॥ वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्यानिरत प्रभो । मद्गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा ॥६१५॥ इति प्रार्थ्य यथाशक्त्या दक्षिणामर्चकाय च । दद्यात्तदग्रे विप्रेभ्यो भोजनं च स्वशक्तितः ॥६१६॥ अनेन विधिना सम्यग्वास्तुपूजां करोति यः । आरोग्यं च पुत्रलाभं धनं धान्यं लभेन्नरः ॥६१७॥ अकृत्वा वास्तुपूजां यः प्रविशेन्नवमंदिरम् । रोगान्नानाविधान्क्लेशानश्नुते सर्वसंकटम् ॥६१८॥ अकपाटमनाच्छन्नमदत्तबलिभोजनम् । गृहं न प्रविशेदेवं विपदामाकरं हि तत् ॥६१९॥ अथो यात्रां नृपादीनामभीष्टफल सिद्धये । स्यात्तथा तां प्रवक्ष्यामि सम्यग्विज्ञातजन्मनाम् ॥६२०॥ अज्ञातजन्मनां नृणां फलाप्तिर्घुणवर्णवत् । प्रश्नोदयनिमित्ताद्यैस्तेषामपि फलोदयः ॥६२१॥ षष्ठ्यष्टमीद्वादशीषु रिक्तामापूर्णमासु च । यात्रा शुक्लप्रतिपदि निर्द्धनाय क्षयाय च ॥६२२॥
देवताओं का वास्तुमन्त्रों द्वारा दूर्वा, दही, अक्षत, फूल, चन्दन, धूप, दीप और नैवेद्यादि से विधिवत् पूजन करे, अथवा ब्राह्म मंत्र से आवाहनादि षोडश (या पञ्च) उपचारों द्वारा उन्हें दो श्वेत वस्त्र समर्पित करे ॥६००-६१३॥ नैवेद्य में तीन प्रकार के (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य) अन्न मांगलिक गीत और वाद्य के साथ अर्पण करे। अन्त में ताम्बूल अर्पण करके वास्तुपुरुष की इस प्रकार प्रार्थना करे ॥६१४॥ (भूमि-शय्या पर शयन करने वाले वास्तुपुरुष ! आपको मेरा नमस्कार है । प्रभो ! आप मेरे घर को धन-धान्य से सम्पन्न करें ।) इस प्रकार प्रार्थना करके देवता के समक्ष पूजा कराने वाले (पुरोहित) को यथाशक्ति दक्षिणा दे तथा अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें भी दक्षिणा दे । जो मनुष्य सावधान होकर गृहारम्भ या गृह- प्रवेश के समय इस विधि से वास्तु-पूजा करता है, वह आरोग्य, पुत्र, धन और धान्य प्राप्त करके सुखी होता है । जो मनुष्य वास्तु-पूजा न करके नये घर में प्रवेश करता है, वह नाना प्रकार के रोग, क्लेश और संकट प्राप्त करता है ॥६१५-६१८॥ जिसमें किवाड़े न लगी हों, जिसके ऊपर से छत आदि के द्वारा छाया न गया हो तथा जिसके लिए (पूर्वोक्त रूप से वास्तुपूजन करके) देवताओं को बलि और ब्राह्मण आदि को भोजन न दिया गया हो, ऐसे नूतन गृह में कभी प्रवेश न करे; क्योंकि वह विपत्तियों की खान होता है ॥६१९॥ यात्रा-प्रकरण--अब मैं जिस प्रकार से यात्रा करने पर वह राजा तथा अन्य जनों के लिए अभीष्ट फल की सिद्धि कराने वाली होती है, उस विधि का वर्णन करता हूँ । जिनके जन्म-समय का ठीक-ठीक ज्ञान है, उन राजाओं तथा अन्य जनों को उस विधि से यात्रा करने पर उत्तम फल की प्राप्ति होती है । जिन मनुष्यों का जन्मसमय अज्ञात है, उनको तो घुणाक्षरन्याय से ही कभी फल की प्राप्ति होती है, तथापि उनको भी प्रश्न-लग्न से तथा निमित्त और शकुन आदि द्वारा शुभाशुभ देखकर यात्रा करने से अभीष्ट फल का लाभ होता है ॥६२०-६२१॥ यात्रा में निषिद्ध तिथियाँ—षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा और शुक्लपक्ष की प्रतिपदा—इन तिथियों में यात्रा करने से दरिद्रता तथा अनिष्ट की प्राप्ति होती है ॥६२२॥
४९६ नारदीयपुराणम् मैत्रादितीन्द्रर्क्षा त्याश्विविहरितिव्यवसूडुषु । असप्तपञ्चद्वयाद्येषु यात्राभीष्टफलप्रदाः ॥६२३॥ न मंदेंदुदिने प्राचीं न व्रजेद्दक्षिणं गुरौ । सिताक॑योर्न प्रतीचीं नोदीचीं ज्ञारयोर्दिने ॥६२४॥ इंद्राजपादवम्ब्वगस्यार्यमक्षांणि पूर्वतः । शूलानि सर्वद्वाराणि मित्राकॅज्याश्वभानि च ॥६२५॥ क्रमाद्दिग्द्वारभानि स्युः सप्तसप्ताग्निधिष्ण्यतः । पुर्धिं लंघयेद्दंडं नाग्निश्वसनदिग्गमम् ॥६२६॥ आग्नेयं पूर्वादिग्धिष्ण्यैर्विदिशश्चैवमेव हि । दिग्दाशयस्तु क्रमशो मेषाद्याश्च पुनः पुनः ॥६२७॥ दिगीश्वरे ललाटस्थे यातुर्न पुनरागमः । लग्नस्थो भास्करः प्राच्यां दिशि यातुर्ललाटगः ॥६२८॥ द्वादशैकादशः शुक्रोऽप्याग्नेय्यां तु ललाटगः । दशमस्थः कुजो लग्नाद्याम्यां यातुर्ललाटगः ॥६२६॥ नवमाष्टमगो राहुनैर्ऋत्यां तु ललाटगः । लग्नात्सप्तमंगः सौरिः प्रतीच्यां तु ललाटगः ॥६३०॥ षष्ठः पञ्चमगाश्चन्द्रो वायव्यां च ललाटगः । चतुर्थस्थानगः सौम्यश्चोत्तरस्यां ललाटगः ॥६३१॥ द्वित्रिस्थानगतो जीव ईशान्यां वै ललाटगः । ललाटं तु परित्यज्य जीवितेच्छुव्रजेन्नरः ॥६३२॥ विहित नक्षत्र--अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, रेवती, अश्वनी, श्रवण, पुष्य और धनिष्ठा-इन नक्षत्रों में यदि अपने जन्म-नक्षत्र से सातवीं, पाँचवीं और तीसरी तारा न हो तो यात्रा अभीष्ट फल को देने वाली होती है ।।६२३।। दिशाशूल--शनि और सोमवार के दिन पूर्व दिशा की ओर नहीं जाना चाहिए । गुरुवार को दक्षिण नहीं जाना चाहिए । शुक्र और रविवार को पश्चिम नहीं जाना चाहिए । तथा बुध और मंगल को उत्तर दिशा यात्रा नहीं करना चाहिए । ।।६२४।। ज्येष्ठा, पूर्वभाद्रपद, रोहिणी और उत्तरा फाल्गुनी-ये नक्षत्र क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में शूल होते हैं । सर्वदिग्गमन नक्षत्र-अनुराधा, हस्त, पुष्य और अश्विनी-ये चार नक्षत्र सब दिशाओं को यात्रा में प्रशस्त हैं ।।६२५।। दिग्द्वार-नक्षत्र- कृत्तिका से आरंभ करके सात-सात नक्षत्र-समूह पूर्वादि दिशाओं में रहते हैं। तथा अग्निकोण से वायुकोण तक परिघदण्ड रहता है; अतः इस प्रकार यात्रा करनी चाहिए, जिससे परिघदण्ड का लंघन न हो ।।६२६।। पूर्व के नक्षत्रों में अग्निकोण की यात्रा करे । इसी प्रकार दक्षिण के नक्षत्रों में अग्निकोण तथा पश्चिम और उत्तर के नक्षत्रों में वायुकोण की यात्रा कर सकते हैं । दिशाओं की राशियाँ- पूर्व आदि चार दिशाओं में मेष आदि १२ राशियाँ क्रमशः पुनः पुनः (तीन आवृत्ति से) आती हैं ।।६२७।। लालाटिक योग- जिस दिशा में यात्रा करनी हो, उस दिशा का स्वामी ललाटगत (सामने) हो तो यात्रा करने वाला लौटकर नहीं आता है। पूर्व दिशा में यात्रा करने वाले को लग्न में यदि सूर्य हो तो वह ललाटगत माना जाता है। यदि शुक्र लग्न से ग्यारहवें या बारहवें स्थान में हो तो अग्निकोण में यात्रा करने से, मगंल दशम भाव में हो तो दक्षिण यात्रा करने से, राहु नवें और आठवें भाग में हो तो नैऋत्यकोण की यात्रा से, शनि सप्तम भाव में हो तो पश्चिम-यात्रा से, चन्द्रमा पाँचवें और छठे भाव में हो तो वायुकोण की यात्रा से, बुध चतुर्थ भाव में हो तो उत्तर को यात्रा से, गुरु तीसरे और दूसरे भाव में हो तो ईशानकोण की यात्रा करने से ललाटगत होते हैं। जीवन की इच्छा रखने वाले मनुष्य इस ललाटयोग को त्यागकर यात्रा करे ।।६२८-६३२।।
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६७ विलोमगो ग्रहो यस्य यात्रालग्नोपगो यदि । तस्य भङ्गप्रदो राज्ञस्तद्वर्गोऽपि विलग्नगः ॥६३३॥ रव्योर्द्वयनयोर्यातमनुकूलं शुभप्रदम् । तदभावे दिवारात्रौ या यायाद्यातुर्वधोऽन्यथा ॥६३४॥ मूढे शुक्रे कार्यहानिः प्रतिशुक्रे पराजयः । प्रतिशुक्रकृतं दोषं हंतुं शक्ता ग्रहा न हि ॥६३५॥ वासिष्ठकाश्यपेयात्रिभारद्वाजाः सगौतमाः । एतेषां पञ्चगोत्राणां प्रतिशुक्रो न विद्यते ॥६३६॥ एकग्रामे विवाहे च दुर्भिक्षे राजविग्रहे । द्विजक्षोभे नृपक्षोभे प्रतिशुक्रो न विद्यते ॥६३७॥ नीचगोऽरिगृहस्थो वा वक्रगो वा पराजितः । यातुर्भंगप्रदः शुक्रः स्वोच्चस्थश्चेज्जयप्रदः ॥६३८॥ स्वाष्टलग्नेष्टराशौ वा शत्रुभात्त्राष्टमेऽपि वा । तेषामीशस्थराशौ वा यातुर्मृत्युर्न संशयः ॥६३९॥ जन्मेशाष्टमलग्रेशौ मिथो मित्रे व्यवस्थितौ । जन्मराश्यष्टपक्षोत्थदोषा नश्यंति भावतः ॥६४०॥ क्रूरग्रहेक्षितोयुक्तो द्विःस्वभावोऽपि भंगदः । याने स्थिरोदये नेष्टो भव्ययुक्तेक्षितः स्वयम् ॥६४१॥ वस्वंत्याद्यर्द्धादिपं च संग्रहं तृणकाष्ठयोः । याम्यदिग्गमनं शय्या न कुर्याद्गेहगोपनम् ॥६४२॥ लग्न में वक्रगति ग्रह या उसके षड्वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करने वाले राजाओं को पराजय होती है ॥६३३॥ अब जिस अयन में सूर्य और चन्द्रमा दोनों हों, उस समय उस दिशा की यात्रा शुभ फल देने वाली होती है। यदि दोनों भिन्न अयन में हों तो जिस अयन में सूर्य हों उधर दिन में तथा जिस अयन में चन्द्रमा हों उधर रात्रि में यात्रा शुभ होती है। अन्यथा यात्रा करने से यात्री की पराजय होती है ॥६३४॥ शुक्रदोष-शुक्र अस्त हों तो यात्रा में हानि होती है। यदि वह सम्मुख हो तो यात्रा करने से पराजय होती है। सम्मुख शुक्र के दोष को कोई भी ग्रह नहीं हटा सकता है। किन्तु वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भरद्वाज और गौतम-इन पाँच गोत्र वालों को सम्मुख शुक्र का दोष नहीं होता है। यदि एक ग्राम के भीतर ही यात्रा करनी हो या विवाह में जाना हो या दुर्भिक्ष होने पर अथवा राजाओं में युद्ध होने पर तथा राजा या ब्राह्मणों का कोप होने पर कहीं जाना पड़े तो इन अवस्थाओं में सम्मुख शुक्र का दोष नहीं होता है। शुक्र यदि नीच राशि में या शत्रुराशि में अथवा वक्रगति या पराजित हो तो यात्रा करने वालों की पराजय होती है। यदि शुक्र अपनी उच्च राशि (मीन) में हो तो यात्रा में विजय होती है ॥६३५-६३८॥ अपने जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम राशि या लग्न में तथा शत्रु की राशि से अष्टम राशि में या लग्न में अथवा इन सबों के स्वामी जिस राशि में हों उस लग्न या राशि में यात्रा करने वाले की निश्चय ही मृत्यु होती है। परन्तु यदि जन्मलग्नराशिपति और अष्टम राशिपति में परस्पर मैत्री हो तो उक्त अष्टम राशि- जन्य दोष स्वयं नष्ट हो जाता है ॥६३९-६४०॥ द्विस्वभाव लग्न यदि पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो यात्रा में पराजय होती है। तथा स्थिर राशि पापग्रह से युक्त न हो तो भी वह यात्रालग्न में अशुभ है। यदि स्थिर लग्न में शुभग्रह का योग या दृष्टि हो तो शुभ फल होता है ॥६४१॥ धनिष्ठा नक्षत्र के उत्तरार्ध से आरंभ करके (रेवती पर्यन्त) पांच नक्षत्रों में गृहार्थ तृणकाष्ठों का संग्रह, दक्षिण की यात्रा, शय्या (तकिया, पलंग आदि) का बनाना, घर को छवाना आदि कार्य नहीं करने चाहिये ॥६४२॥ ६३ ना० पु०
४६८ नारदीयपुराणम् जन्मोदये जन्मभे वा तयोरीशस्य भेऽपि वा । ताभ्यां तयोरिकेंद्रेषु यातुः शत्रुक्षयो भवेत् ॥६४३॥ शीर्षोदये लग्नगते द्विर्लग्ने लग्नगेऽपि वा । शुभवर्गोऽथ वा लग्ने यातुः शत्रुक्षयस्तदा ॥६४४॥ शत्रुजन्मोदये जन्मराशेर्वा निधनोदये । तयोरीशस्थिते राशौ यातुः शत्रुक्षयो भवेत् ॥६४५॥ वक्रः पन्था मीनलगने यातुमीनांशकेऽपि वा । निंद्यो निखिलयात्रासु घटलग्नो घटांशकः ॥६४६॥ जललग्नो जलांशो वा जलयोनेः शुभावहः । मूर्तिः कोशो धन्विन्वश्च वाहनं मंतसंज्ञकम् ॥६४७॥ शत्रुमार्गस्तथायुश्च मनोव्यापारसंज्ञिकम् । प्राप्तिरप्राप्तिरुदयाद्भावाः स्युर्द्वादशैव ते ॥६४८॥ घ्नंति क्रूरास्त्वयाप्तिवर्गं भावान्सूर्यमहीसुतौ । न निधनतो हि व्यापारं सौम्याः पुष्णंत्यर्रि विना ॥६४९॥ शुक्रोऽस्तं च न पुष्णाति मूर्ति मृत्युं च चंद्रमाः । याम्यदिग्गमनं त्यक्त्वा सर्वकाष्ठासु यायिनाम् ॥६५०॥ यदि यात्रालग्न में जन्मलग्न, जन्मराशि या इन दोनों के स्वामी हों अथवा जन्मलग्न या जन्मराशि से ३,६,११,१०वीं राशि हो तो शत्रुओं का नाश होता है ॥६४३॥ यदि शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुम्भ) तथा दिग्द्वार (यात्रा की दिशा) की राशि लग्न में हो अथवा किसी भी लग्न में शुभग्रह के वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करने वाले राजा के शत्रुओं का नाश होता है ॥६४४॥ शत्रु के जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम राशि या उन दोनों के स्वामी जिस राशि में हों, वह राशि यात्रालग्न में हो तो शत्रु का नाश होता है । मीन लग्न में या लग्नगत मीन के नवमांश में यात्रा करने से मार्ग टेढ़ा हो जाता है (अर्थात् बहुत घूमना पड़ता है) तथा कुम्भलग्न और लग्नगत कुम्भ का नवमांश भी यात्रा में अत्यन्त निन्दित है ॥६४६॥ जलचर राशि (कर्क, मीन) या जलचर राशि का नवमांश लग्न में हो तो नौका द्वारा नदी-नद आदि मार्ग से यात्रा शुभ होती है ॥६४६॥ लग्नभावों की संज्ञा—१ मूर्ति (तन), २ कोष (धन), ३धन्वी (पराक्रम, भ्राता), ४ वाहन (सवारी, माता), ५ मंत्र (विद्या, सन्तान), ६ शत्रु (रोग, मामा), ७ मार्ग (यात्रा, पति-पत्नी), ८ आयु (मृत्यु), ९ मन (अन्तःकरण, भाग्य), १० व्यापार (व्यवसाय, पिता), ११ प्राप्ति (लाभ), १२ अप्राप्ति (व्यय)-ये क्रम से लग्न आदि १२ स्थानों की संज्ञायें हैं ॥६४७-६४८॥ पापग्रह (शनि, रवि, मंगल, राहु तथा केतु तीसरे और ग्यारहवें को छोड़कर अन्य सब भावों में जाने से भावफल को नष्ट कर देते हैं। तीसरे और ग्यारहवें भाव में जाने से वे इन दोनों भावों को पुष्ट करते हैं। सूर्य और मंगल ये दोनों दशम भाव को भी नष्ट नहीं करते, अपितु दशम भाव में जाने से उस भावफल (व्यापार, पिता, राज्य तथा कर्म) को पुष्ट ही करते हैं और शुभग्रह (चन्द्र, बुध, गुरु तथा शुक्र) जिस भाव में जाते हैं, उस भावफल को पुष्ट ही करते हैं; केवल षष्ठ (६) भाव में जाने से उस भावफल (शत्रु और रोग) को नष्ट करते हैं ॥६४९॥ शुभ ग्रहों में शुक्र सप्तम भाव को और चन्द्रमा लग्न एवं अष्टम (१,८) को पुष्ट नहीं करते हैं (अपितु नष्ट ही करते हैं) । अभिजित्-प्रशंसा-अभिजित् मुहूर्त (दिन का मध्यकाल - १२ बजे से १ घड़ी आगे और १ घड़ी पीछे) अभीष्ट फल सिद्ध करने वाला योग है। यह दक्षिण दिशा की यात्रा छोड़कर अन्य दिशाओं की यात्रा में
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६६ अभिजित्क्षणयोगोऽयमभीष्टफलसिद्धिदः । पञ्चांगशुद्धिरहिते दिवसेऽपि फलप्रदः ॥६५१॥ यात्राद्योगा विचित्रास्तान् योगान्वक्ष्ये यतस्ततः । फलसिद्धिर्यागलग्नाद्राज्ञां विप्रस्य धिष्ण्यतः ॥६५२॥ मुहूर्तशक्तितोऽन्येषां शकुनैस्तस्करस्य च। केंद्रत्रिकोणे ह्येकेन योगः शुक्रज्ञसूरिणाम् ॥६५३॥ अधियोगो भवेद्द्वाभ्यां त्रिभिर्योगाधियोगकः । योगेऽपि यायिनां क्षेममधियोगे जयो भवेत् ॥६५४॥ योगाधियोगे क्षेमं च विजयोर्थविभूतयः । व्यापारशत्रुमूर्त्तिस्थैश्चन्द्रमन्ददिवाकरैः ॥६५५॥ रणे गतस्य भूपस्य जयलक्ष्मीः प्रमाणिका । शुक्रार्कज्ञाकिभौमेषु लग्नाश्वस्तविशत्रुषु ॥६५६॥ गतस्याग्रे वैरिचमूवह्नौ लाक्षेव लीयते । लग्नस्थे त्रिदशाचार्ये धनायस्थैः परग्रहैः ॥६५७॥ गतस्य राज्ञोऽरिसेना नीयते यममंदिरम् । लग्ने शुक्रे रवौ लाभे चन्द्रे बन्धुस्थिते यदा ॥६५८॥ गतो नृपो रिपूहंति केसरीवेभसंहतिम् । स्वोच्चसंस्थे सिते लग्ने स्वोच्चे चन्द्रे च लाभगे ॥६५९॥ हंति यातोऽरिघटतनां केशवः पूतनामिव । त्रिकोणे केंद्रगाः सौम्याः क्रूरास्त्वायारिगा यदि ॥६६०॥ यस्य यातेरलक्ष्मीस्तमुपैतीवाभिसारिका । जीवार्कचन्द्रा लग्नादिरंध्रगा यदि गच्छतः ॥६६१॥ शुभ फल देता है। इस (अभिजित् मुहूर्त) में पञ्चाङ्ग (तिथि-वारादि) शुभ न हो तो भी यात्रा में वह उत्तम फल देने वाला होता है ॥६५०-६५१॥ यात्रा योग--लग्न और ग्रहों की स्थिति से नाना प्रकार के यात्रा-योग होते हैं। अब उन योगों का वर्णन करता हूँ, क्योंकि राजाओं (क्षत्रियों) को योगबल से ही अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। ब्राह्मणों को नक्षत्र- बल से तथा अन्य मनुष्यों को मुहूर्त-बल से इष्टसिद्धि होती है। तस्करों को शकुनबल से अपने अभीष्ट की प्राप्ति होती है। ६५२॥ शुक्र, बुध और बृहस्पति-इन तीन में से कोई भी यदि केन्द्र या त्रिकोण में हो तो योग कहलाता है। यदि उनमें से दो ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तो (अधियोग) कहलाता है तथा तथा यदि तीनों लग्न से केन्द्र (१,४,७,१०) या त्रिकोण (५,९) में हों तो योगाधियोग कहलाता है ॥६५३॥ योग में यात्रा करने वालों का कल्याण होता है । अधियोग में यात्रा करने से विजय प्राप्त होती है और योगाधियोग में यात्रा करने वाले को कल्याण, विजय तथा सम्पत्ति का लाभ होता है ॥६५४॥ लग्न से दसवें स्थान में चन्द्रमा, षष्ठ स्थान में शनि और लग्न में सूर्य हों तो इस समय यात्रा करने वाले राजा को विजय तथा शत्रु की सम्पत्ति भी प्राप्त होती है ॥६५५॥ शुक्र, रवि, बुध, शनि और मंगल-ये पाँचों ग्रह क्रम से लग्न चतुर्थ, सप्तम, तृतीय और षष्ठ भाव में हों तो यात्रा करने वाले राजा के सम्मुख आये हुए शत्रुगण आग में पड़ी हुई लाह की तरह नष्ट हो जाते हैं ॥६५६॥ बृहस्पति लग्न में और अन्य ग्रह यदि दूसरे और ग्यारहवें भाव में हों तो इस योग में यात्रा करने वाले राजा के शत्रुओं की सेना यमराज के घर पहुँच जाती है ॥६५७॥ यदि लग्न में शुक्र, ग्यारहवें में रवि और चतुर्थ भाव में चन्द्रमा हो तो इस योग में यात्रा करने वाला राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे हाथियों के झुंड को सिंह ॥६५८॥ अपने उच्च (मीन) में स्थित शुक्र लग्न में हो अथवा अपने उच्च (वृष) चन्द्रमा लाभ (११) भाव में स्थित हो तो यात्रा करने वाला नरेश अपने शत्रु की सेना को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे भगवान् श्रीकृष्ण ने पूतना को नष्ट किया था ॥६५९॥ यदि यात्रा के समय शुभ ग्रह केन्द्र में या त्रिकोण में हों तो तथा पापग्रह तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थान में हों तो यात्रा करने वाले राजा के शत्रु की लक्ष्मी अभिसारिका के समान उसके समीप आ जाती है ॥६६०॥ गुरु, रवि और चन्द्रमा-ये क्रमशः लग्न, ६ और ८ में हों तो यात्रा करने वाले राजा के सामने दुर्जनों की मैत्री के समान शत्रुओं की सेना नहीं ठहरती है ॥६६१॥ यदि लग्न से ३, ६ ११ में पापग्रह
५०० नारदीयपुराणम् तस्याग्रे खलमैत्रीव न स्थिरा रिपुवाहिनी । त्रिखंडायेषु मन्दारौ बलवंतः शुभा यदि ॥६६२॥ यात्रायां नृपतस्तस्य हस्तस्था शत्रुमेदिनी । स्वोच्चस्थे लग्ने जीवे चंद्रे लाभगते यदि ॥६६३॥ गतो राजा रिपूहंति पिनाकी त्रिपुरं यथा । मस्तकोदयगे शुक्रे लग्नस्थे लाभगे गुरौ ॥६६४॥ गतो राजा रिपूहंति कुमारस्तारकं यथा । जीवे लग्नगते शुक्रे केंद्रे वापि त्रिकोणगे ॥६६५॥ गतो दहत्यरीन्द्राजा कृष्णवर्मा यथा वनम् । लग्नगे ज्ञे शुभे केंद्रे धिष्ण्ये चोबकुले गतः ॥६६६॥ नृपाः शुष्यंत्यरीन् ग्रीष्मे ह्रदिनीं वार्करश्मयः । शुभे त्रिकोणे केंद्रस्थे लाभे चंद्रेऽथवा रवौ ॥६६७॥ शत्रून्हन्ति गतो राजा ह्यंधकारं यथा रविः । स्वक्षेत्रगे शुभे केंद्रे त्रिकोणावगते गतः ॥६६८॥ विनाशयत्यरीन्द्राजा तूलराशिमिवानलः । इंदौ स्वस्थे गुरौ केंद्रे मंत्रः सप्रणवो गतः ॥६६६॥ नृपो हंति रिपून्सर्वान्पापान्पंचाक्षरो यथा । वर्गोत्तमगते शुक्रेऽप्येकस्मिन्नेव लग्नेगे ॥६७०॥ हरिस्मृतिर्यथाघौघान्हंति शत्रून् गतो नृपः । शुभे केंद्रे त्रिकोणस्थे चंद्रे वर्गोत्तमे गतः ॥६७१॥ सगोत्रारोन्नृपान् हंति यथा गोत्रांश्च गोत्रभित् । मित्रभेऽथ गुरौ केंद्रे त्रिकोणस्थेऽथ वा सिते ॥६७२॥ हों और शुभ ग्रह बलवान् होकर अपने उच्चादि स्थान में (स्थित) हों तो शत्रु की भूमि यात्रा करने वाले राजा के हाथ में आ जाती है ॥६६२३॥ अपने उच्च (कर्क) में स्थित बृहस्पति यदि लग्न में हों और चन्द्रमा ११ भाव में स्थित हों तो यात्रा करने वाला नरेश अपने शत्रु को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे त्रिपुरासुर को शंकर ने नष्ट किया था ॥६६३३॥ शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ) राशि में स्थित शुक्र यदि लग्न में हों और गुरु ग्यारहवें स्थान में हों तो यात्रा करने वाला पुरुष तारकासुर को कार्तिकेय के समान अपने शत्रु को नष्ट कर देता है ॥६६४३॥ गुरु लग्न में और शुक्र किसी केन्द्र या त्रिकोण में हों तो यात्री नरेश अपने शत्रुओं को वैसे ही भस्म कर देता है जैसे वन को दावानल ॥६६५३॥ यदि बुध लग्न में और अन्य शुभग्रह किसी केन्द्र में हों तथा नक्षत्र भी अनुकूल हो तो उसमें यात्रा करने वाला राजा अपने शत्रुओं को वैसे ही सोख लेता है, जैसे सूर्य की किरणें ग्रीष्मऋतु में क्षुद्र नदियों को सोख लेती हैं ॥६६६३॥ सम्पूर्ण शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तथा सूर्य या चन्द्रमा ग्यारहवें भाव में स्थित हों तो यात्रा करने वाला नरेश अन्धकार को सूर्य की भांति अपने शत्रु को नष्ट कर देता है ॥६६७३॥ शुभग्रह यदि अपनी राशि में स्थित होकर केन्द्र (१,४,७,१०) त्रिकोण (५,९) तथा आय (११) भाव में हो तो यात्रा करने वाला राजा रूई को अग्नि के समान अपने शत्रुओं को जलाकर भस्म कर देता है ॥६६८३॥ चन्द्रमा दसवें भाव में और वृहस्पति केन्द्र में हों तो उसमें यात्रा करने वाला राजा अपने सम्पूर्ण शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे प्रणव सहित पञ्चाक्षरमंत्र (ओं नमः शिवाय) पाप-समूह का नाश कर देता है ॥६६६३॥ अकेला शुक्र भी यदि वर्गोत्तम नवमांशगत लग्न में स्थित हो तो उसमें भी यात्रा करने से राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे पापों को श्रीभगवान् का स्मरण ॥६७०३॥ शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तथा चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांश में हो तो ऐसे समय में यात्रा करने से राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार सपरिवार नष्ट करता है, जैसे इन्द्र पर्वतों को ॥६७१३॥ बृहस्पति अथवा शुक्र अपने मित्र की राशि में होकर केन्द्र या त्रिकोण में हों तो ऐसे समय में यात्रा करने वाला भूपाल सर्पों को गरुड़ के समान अपने शत्रुओं को अवश्य नष्ट करता है ॥६७२॥ यदि एक भी ग्रह वर्गोत्तम नवमांश में स्थित होकर केन्द्र में हो तो
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०१ शत्रून्हंति गतो राजा भुजंगान् गरुडो यथा । शुभकेन्द्रत्रिकोणस्थे वर्गोत्तमगते गतः ॥६७३॥ विनाशयत्यरीन्द्राजा पापान्भागीरथी यथा । ये नृपा यान्त्यरीञ्जेतुं तेषां योगैर्नृपाह्वयैः ॥६७४॥ उपैति शांतिं कोपाग्निः शत्रुयोषाश्रुबिंदुभिः । बलक्षपक्षदशमीमासीषे विजयाभिधा ॥६७५॥ विजयस्तत्र यांतॄणां संधिर्वा न पराजयः । निमित्तशकुनादिभ्यः प्रधानं हि मनोजयः ॥६७६॥ तस्मान्मनस्विनां यत्नात्फलहेतुर्मनोदयः । उत्सवोपनयोद्वाहप्रतिष्ठाशौचसूतके ॥६७७॥ असमाप्त न कुर्वीत यात्रां मर्त्यो जिजीविषुः । महिषौंदुरयोर्युद्धे कलत्रकलहातवे ॥६७८॥ वस्त्रादेः स्खलिते क्रोधे दुरुक्ते न व्रजेन्नृपः । घृतान्नं तिलपिष्टान्नं मत्स्यान्नं घृतपायसम् ॥६७९॥ प्रागादिक्रमशो भुक्त्वा याति राजा जयत्यरीन् । सज्जिका परमान्नं च कांजिकं च पयो दधि ॥६८०॥ क्षीरं तिलोदनं भुक्त्वा भानुवारादिषु क्रमात् । कुल्माषांश्च तिलान्नं च दधि क्षौद्रं घृतं पयः ॥६८१॥ मृगमांसं च तत्सारं पायसं च खगं मृगम् । शशमांसं च षाष्टिक्यं प्रियंगुकमपूपकम् ॥६८२॥ चित्रांडजफलं कूर्मशवाविद्गोधांश्र्च शास्तकम् । हविष्यं कृशरान्नं च मुद्गान्नं यवपिष्टकम् ॥६८३॥ यात्रा करने वाला नरेश पाप समूह को गंगाजी के समान अपने शत्रुओं को क्षणभर में नष्ट कर देता है ॥६७३१/२॥ जो राजा शत्रुओं को जीतने के लिए उपर्युक्त राजयोगों में यात्रा करता है, उसका कोपानल शत्रुओं की स्त्रियों के अश्रुजल से शान्त होता है ॥६७४१/२॥ आश्विन मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि विजया कहलाती है। उसमें जो यात्रा करता है, उसे अपने शत्रुओं पर विजय होती है। अथवा शत्रुओं से सन्धि हो जाती है। किसी भी दशा में उसकी पराजय नहीं होती है ॥६७५१/२॥ मनोजय प्रशंसा—यात्रा आदि सभी कार्यों में निमित्त और शकुन आदि (लग्न एवं योग) की अपेक्षा भी मनोजय प्रबल है। इसलिए मनस्वी पुरुषों के लिए यत्नपूर्वक फलसिद्धि में मनोजय ही प्रधान कारण होता है ॥६७६ १/२॥ यात्रा में प्रतिबन्ध—यदि घर में उत्सव, उपनयन, विवाह, प्रतिष्ठा या सूतक उपस्थित हो तो जीवन की इच्छा रखने वालों को बिना उत्सव को समाप्त किये यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६७७१/२॥ यात्रा में अपशकुन—यात्रा के समय यदि परस्पर दो भैंसों या चूहों में लड़ाई हो, स्त्री से कलह हो या स्त्री को मासिक धर्म हुआ हो, वस्त्र आदि शरीर से खिसककर गिर पड़े, किसी पर क्रोध हो जाय या मुख से दुर्वचन कहा गया हो तो उस दशा में राजा को यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६७८१/२॥ दिशा, वार तथा नक्षत्र-दोहद—यदि राजा घृतमिश्रित अन्न खाकर पूर्व दिशा की यात्रा करे, तिलचूर्ण मिलाया हुआ अन्न खाकर दक्षिण दिशा को जाय और घृतमिश्रित खीर खाकर उत्तर दिशा की यात्रा करे तो निश्चय ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। रविवार को सज्जिका (मिसरी और मसाला मिला हुआ दही), सोमवार को खीर मंगलवार को कांजी, बुधवार को दूध, गुरुवार को दही, शुक्रवार को दूध तथा शनिवार को तिल और भात खाकर यात्रा करे तो शत्रुओं को जीत लेता है। अश्विनी में कुल्माष (कुलथी) भरणी में तिल, कृत्तिका में उड़द, रोहिणी में गाय का दही, मृगशिरा में गाय का घी, आर्द्रा में गाय का दूध, अश्लेषा में खीर, मघा में नीलकण्ठ का दर्शन, हस्त में षाष्टिक्य (साठी धान्य) के चावल का भात, चित्रा में प्रियंगु (कंगनी), स्वाती में अपूप (मालपूआ), अनुराधा में फल, उत्तराषाढ में चावल, अभिजित् में हविष्य, श्रवण में कृशरान्न (खिचड़ी), धनिष्ठा में मूंग,