बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
कारकांशफलमाह १११ . कारकांशात्तृतीये च पापखेटयुतेक्षिते। सशूरो जायते बालो वीर्यवान्बहुविक्रमी ।।४२।। कारकांश से तीसरे भोव में पापग्रह युत हो वा देखते हों तो बालक शूरवीर एवं पराक्रमी होता है ।।४२।। कारकांशात्तृतीये च शुभखेटयुतेक्षिते। जायते तत्त्वहृदयः कातरोऽपि विशेषतः ।।४३।। कारकांश से तीसरे भाव में शुभग्रह हों वा देखते हों तो बालक शुद्ध हृदय का और विशेषकर कातर होता है ।।४३।। कारकांशात्तृतीये च षष्ठे पापयुतेक्षिते। कृषिकर्मरतो नित्यं जायते नात्र संशयः ।।४४।। कारकांश से तीसरे व छठे भाव में पापग्रह हों या देखते हों तो बालक कृषिकर्म को करने वाला होता है ।।४४।। कारकांशाच्चतुर्थभावफलम्- पाताले कारकांशाच्च शशिशुक्रयुतेक्षिते। प्रासादवान् भवेद्बालो विचित्रगृहवांन्भवेत् ।।४५।। कारकांश से चतुर्थ स्थान में चन्द्रमा, शुक्र युत हों वा देखते हों तो विचित्र प्रासाद (किला) या गृह वाला होता है ।।४५।। कारकांशाच्च पाताले तुङ्गर्क्षे कोऽपि खेचरः। हर्म्यमन्दिरसंयुक्तो ह्यंत्युच्चो बहुदीप्तिमान् ।।४६।। चौथे में यदि कोई ग्रह अपनी उच्चराशि का हो तो बहुत ऊँचा, खूबसूरत एवं प्रकाशमान् गृह होता है ।।४६।। कारकांशाच्च पाताले शनिराहुयुतेक्षिते। विप्रेच्छाटनपट्टीयुग्जायते मन्दिरं द्विज ।।४७।। कारकांश से चौथे भाव में शनि-राहु हों या देखते हों तो पत्थर का गृह होता है ।।४७।। कारकांशाच्च पाताले कुजकेतुशनीक्षिते। ऐष्टिकं मन्दिरं तस्य जायते नात्र संशयः ।।४८।। कारकांश से चौथे भाव में भौम, केतु एवं शनि हों वा देखते हों तो ईंटे का मकान होता है ।।४८।।
१२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारकांशाच्च पाताले गुरुयुक्तनिरीक्षिते । दारवं मन्दिरं तस्य जायते नात्र संशयः ॥४९॥ कारकांश से चौथे भाव में गुरु युक्त हो वा देखता हो तो लकड़ी का गृह होता है॥४९॥ कारकांशाच्च पाताले रवियुक्तनिरीक्षिते । तृणावेष्टितगृहं तस्य जायते नात्र संशयः॥५०॥ कारकांश से चौथे भाव में सूर्य युत हो वा देखता हो तो फूस का गृह होता है॥५०॥ कारकांशात्पञ्चमभावफलम्— स्वांशे तत्सुते वापि गुरुचन्द्राभ्यां च ग्रन्थकृत्। भृगुणा किञ्चिदूनोऽसौ तस्मान्न्यूनो बुधेन च ॥५१॥ आत्मकारकांश में अथवा उससे पाँचवें स्थान में चन्द्रमा-गुरु हों तो ग्रंथ बनाने वाला होता है। यदि शुक्र हों तो कुछ न्यून होता है और बुध हो तों और भी न्यून होता है॥५१॥ सुराचार्येण सर्वज्ञः ग्रन्थकर्त्ता तथैव च। वेदवेदान्तविच्चापि न वाग्मी शाब्दिकेऽपि च ॥५२॥ केवल गुरु हो तो सर्वज्ञ और ग्रन्थकर्त्ता होता है तथा वेद-वेदान्त को जानने वाला वैयाकरणी होते हुए भी वाग्मी नहीं होता है॥५२॥ न्यायज्ञः धरणीजेन बुधे मीमांसकस्तथा। सभामूकस्तु शनिना गीतज्ञो रविणा तथा ॥५३॥ यदि भौम हो तो नैयायिक, बुध हो तो मीमांसक, शनि हो तो सभा में मूक रहने हाला और सूर्य हो तो गानविद्या में पंडित ॥५३॥ शशिना सांख्ययोगज्ञः काव्यज्ञश्च तथा द्विज। केतुना गणितज्ञश्च जायते नात्र संशयः॥५४॥ चन्द्रमा हो तो सांख्यशास्त्र और काव्य का पंडित और केतु हो तो गणित का पंडित होता है॥५४॥ उक्तफलानां साफल्यं गुरुसम्बन्धमात्रतः। कारकांशाद्धने केचित्फलमेवं ब्रुवन्ति हि॥५५॥
कारकांशफलमाह १२१ जो योग ऊपर कहे गये हैं सभी में गुरु का योग और दृष्टि हो तो योग का फल अवश्य होता है। किसी-किसी का मत है कि कारकांश से दूसरे स्थान में भी इसी प्रकार विचार करना चाहिए।।५५।। कारकांशात्षष्ठभावफलम्- स्वांशात्तृतीये षष्ठे च पापस्तिष्ठेच्चे द् द्विज । कर्षको जायते बालः नात्र कार्या विचारणा ।।५६।। आत्मकारक से तीसरे, छठे स्थान में पापग्रह हों तो जातक किसान होता है।।५६।। कारकांशात्सप्तमभावफलम्- कारकांशाच्च द्यूने चेद्गुरुचन्द्रयुते द्विज। सुन्दरी गृहिणी तस्य पतिभक्तिपरायणा ।।५७।। आत्मकारक से सातवें भाव में गुरु-चन्द्रमा हों तो जातक की स्त्री सुन्दरी और पतिव्रता होती है।।५७।। राहुणा विधवा भार्या जायते नात्र संशयः। शनिना च वयोधिक्या रोगिणी वा तपस्विनी ।।५८।। यदि सातवें राहु हो तो विधवा स्त्री का संयोग होता है। यदि शनि हो तो अवस्था में अधिक, रोगिणी या तपस्विनी होती है।।५८।। भौमेन विकलाङ्गी च तथा कान्ताद्यलक्षणा। रविणा स्वकुले गुप्ता आसक्ता परवेश्मनी ।।५९।। भौम हो तो अंग से हीन, सूर्य हो तो अपने कुल में गुप्तरिति से रहती हुई दूसरे के वश में रहती है।।५९।। बुधे कलावती ज्ञेया कलाभिज्ञा प्रजायते। शुक्रेण तद्विज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।६०।। बुध हो तो कला को जानने वाली स्वयं कलाविद् होती है। इसी प्रकार शुक्र से भी जानना चाहिए।।६०।। कारकांशादष्टमभावफलम्- कारकांशाल्लये चन्द्रे कुजराहुनिरीक्षिते । क्षयरोगो भवेत्तस्य श्वासकासादिरोगयुक् ।।६१।। कारकांश से आठवें भाव में चन्द्रमा हो और भौम-राहु से देखा जाता हो तो जातक क्षयरोग और श्वास-कास रोग से युक्त होता है।।६१।।
१२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारकांशत्रवमभावफलम्— कारकांशाच्च नवमे शुभखेटयुतेक्षिते। सत्यवादी गुरोर्भक्तः स्वधर्मनिरतो भवेत्।।६२।। कारकांश से नवम स्थान शुभग्रह से युत-दृष्ट हो तो जातक सत्यवादी, गुरुभक्त, अपने धर्म में आसक्त होता है।।६२।। कारकांशाच्च नवमे पापग्रहयुतेक्षिते। स्वधर्मनिरतो बालो मिथ्यावादी भवेद्द्विज।।६३।। कारकांश से नवम स्थान पापग्रह से युत-दृष्ट हो तो अपने धर्म से रहित और असत्यवादी होता है।।६३।। कारकांशाच्च नवमे शनिराहुयुतेक्षिते। गुरुद्रोही भवेद्विप्र शास्त्रेषु विमुखो नरः।।६४।। कारकांश से नवम भाव शनि-राहु से दृष्ट-युत हों तो गुरु से द्रोह करने वाला और मूर्ख होता है।।६४।। कारकांशाच्च नवमे गुरुभानुयुतेक्षिते। तदापि गुरुद्रोही स्याद्गुरुवाक्यं न मन्यते।।६५।। कारकांश से नवम भाव गुरु-सूर्य से युत-दृष्ट हों तो भी गुरुद्रोही और गुरु के वचन को न माननेवाला होता है।।६५।। कारकांशाच्च नवमे भृगुभौमयुतेक्षिते। षड्वर्गाधिकयोगे च मरणं पारदारिकः।।६६।। कारकांश से नवम भाव शुक्र-भौम से युत-दृष्ट हों तो और इन्हीं का षड्वर्ग अधिक हो तो परस्त्री के द्वारा मरण होता है।।६६।। कारकांशाच्च नवमे बुधयुक्तेक्षिते द्विज। परस्त्रीसङ्गमाद्बालो बन्धको जायते ध्रुवम्।।६७।। कारकांश से नवम भाव बुध से युत-दृष्ट हो तो परस्त्रीसंगम से दुष्ट प्रकृति का होता है।।६७।। कारकांशाच्च नवमे गुरुयुक्तेक्षिते यदा। स्त्रीलोलुपो भवेद्बालो विषयी नैव जायते।।६८।। कारकांश से नवम भाव गुरु से युत-दृष्ट हो तो स्त्रीलोलुप होता है, किंन्तु विषयी नहीं होता है।।६८।।
कारकांशफलमाह १२३ कारकांशाद्दशमभावफलम्- दशमे कारकांशाच्च बुधेन समवीक्षिते। व्यापारे बहुलाभश्च महत्कर्मविचक्षणः ।।६९।। कारकांश से दशम भाव बुध से देखा जाता हो तो व्यापार में बहुत लाभ और बड़े-बड़े काम होते हैं।।६९।। कारकांशाच्च दशमे रविणा संयुतो यदि। गुरुदृष्टे तदा विप्र जायते योगकारकः ।।७०।। कारकांश से दशम में रवि हो और गुरु से देखा जाता हो तो राजयोग होता है।।७०।। कारकांशाच्च दशमे शुभखेटनिरीक्षिते। स्थिरचित्तो भवेद्बालो गम्भीरो बहुवीर्यवान् ।।७१।। कारकांश से दशम भाव को शुभग्रह देखता हो तो बालक स्थिरचित्त, गंभीर और बलवान् होता है।।७१।। कारकांशद्व्ययभावफलम्- कारकांशाद्व्ययस्थाने उच्चस्थे च शुभग्रहे। सङ्गतिर्जायते तस्य शुभलोकमवाप्नुयात् ।।७२।। कारकांश से बारहवें भाव में अपनी उच्चराशि में कोई शुभग्रह हो तो उस जातक को सद्गति और शुभ लोक की प्राप्ति होती है।।७२।। कारकांशाद्व्यये केतौ शुभखेटैर्युतेक्षिते। तदापि जायते मुक्तिः सायुज्यपदमाप्नुयात् ।।७३।। कारकांश से बारहवें भाव में केतु हो, शुभग्रह से देखा जाता हो वा दृष्ट हो तो भी मुक्ति होती है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।।७३।। मेषेऽथ वापि कोदण्डे कारकांशात् व्यये शिखी। शुभग्रहेण सन्दृष्टे कैवल्यपदमाप्नुयात् ।।७४।। कारकांश से बारहवें भाव में मेष वा धन राशि मैं केतु हो, शुभग्रह से दृष्ट हो तो मोक्षपद की प्राप्ति होती है।।७४।। केवलेऽपि व्यये केतुः पापग्रहयुतेक्षिते। न मुक्तिर्जायते तस्य शुभलोकं न पश्यति ।।७५।।
१२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् रविणा संयुते केतौ कारकांशाद्व्ययस्थिते। गौर्यां भक्तिर्भवेत्तस्य शाक्तिको जायते नरः।।७६।। केवल बारहवें भाव में केतु हो और पापग्रह से युत-दृष्ट हो तो उसकी मुक्ति नहीं होती है और मोक्ष भी नहीं होता है। कारकांश से बारहवें भाव में केतु सूर्य से युत हो तो पार्वती की भक्ति करने वाला शाक्त होता है।।७५-७६।। रविभक्तिर्भवेत्तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम। चन्द्रेण संयुते केतौ कारकांशात् व्ययस्थिते ।।७७।। कारकांश से बारहवें केतु चन्द्रमा से युत हो तो सूर्य का उपासक होता है।।७७।। शुक्रेण संयुते केतौ कारकांशात् व्ययस्थिते। समुद्रतनयाभक्तिर्जायतेऽसौ समृद्धिमान् ।।७८।। कारकांश से बारहवें केतु शुक्र से युत हो तो लक्ष्मी का उपासक और धनी होता है।।७८।। कुजेन स्कन्दभक्तो वा जायते द्विजसत्तम। वैष्णवो बुधसौरिभ्यां गुरुणा शिवभक्तिमान् ।।७९।। भौम से युत हो तो स्कंद (स्वामिकार्तिक) की भक्ति, बुध-शनि से युत हो तो विष्णु का उपासक, गुरु से युत हो तो शिव का उपासक।।७९।। राहुणा तामसीं दुर्गां भूतप्रेतादिसेवकृत्। हेरम्बभक्तः शिखिना स्कन्दभक्तोऽथवा भवेत् ।।८०।। राहु हो तो तामसी दुर्गा का और भूतप्रेतादि का सेवक होता है। केतु हो तो गणेश वा स्कंद का उपासक।।८०।। कारकांशात् व्यये शौरिः पापराशौ यदा भवेत्। तदैव क्षुद्रदेवस्य भक्तिस्तस्य न संशयः ।।८१।। कारकांश से बारहवें शनि पापग्रह की राशि में हो तो क्षुद्रदेवता का उपासक।।८१।। पापर्क्षेऽपि व्यये शुक्रस्तदापि क्षुद्रसेवकः। कारकान्यूनभागो हि अमात्यो जायते ग्रहः ।।८२।। बारहवें भाव में पापग्रह की राशि में शुक्र हो तो भी क्षुद्रदेवता का सेवक
कारकांशफलमाह १२५ होता है। आत्मकारक से न्यून अंशवाला अमात्यकारक होता है।।८२।। अमात्यात् द्वादशे राशौ पापर्क्षे पापसंयुते। तदापि क्षुद्रदेवस्य भक्तिर्भवति निश्चितम्।।८३।। अमात्य से बारहवें भाव में पापग्रह की राशि पापयुत हो तो भी क्षुद्रदेवता का उपासक होता है।।८३।। विशेषफलमाह- अंशात्त्रिकोणे पापे द्वे तान्त्रिको जायते नरः। पापदृष्टे क्षुद्रदेवः शुभेन शुभसेवकः।।८४।। आत्मकारक से ९वें, ५वें भाव में दो पापग्रह हों तो जातक तांत्रिक होता है। पापग्रह देखता हो तो क्षुद्रदेवता का और शुभग्रह देखता हो तो शुभ देवता का उपासक होता है।।८४।। पापैर्निरीक्षिते तत्र तन्त्रविग्राहको भवेत्। शुभैर्निरीक्षिते वापि तन्त्रानुग्रहकारकः।।८५।। यदि पापग्रह देखते हों तो निग्राहक और शुभग्रह देखते हों तो अनुग्राहक होता है।।८५।। कारकांशेन्दुशुकौ च शुभग्रहनिरीक्षितौ। रसवादी भवेद्बालो धातूनां भस्मकारकः।।८६।। कारकांश में चन्द्रमा और शुक्र हों तथा शुभग्रह से देखे जाते हों तो रस बनाने वाला वैद्य होता है।।८६।। शुक्रेन्दू बुधसन्दृष्टौ सद्द्वैद्यो हि नरो भवेत्। पीयूषपाणिः कुशलः सर्वरोगहरो द्विज।।८७।। शुक्र-चन्द्रमा को बुध देखता हो तो सद्धैद्य, कुशल और सभी रोगों को हरने वाला होता है।।८७।। अंशाच्चतुर्थगे चन्द्रे दैत्याचार्यनिरीक्षिते। श्वेतकुष्ठी भवेन्नूनं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।८८।। कारक से चौथे स्थान में चन्द्रमा हो और शुक्र से देखा जाता हो तो श्वेतकुष्ठी होता है।।८८।। अंशाच्चतुर्थगे चन्द्रे धरापुत्रेण वीक्षिते। राजरोगो भवेत्तस्य रक्तपित्तार्तिको भवेत्।।८९।।
१२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारक से चौथे स्थान में चन्द्रमा को भौम देखता हो तो राजरोग (यक्ष्मा) और रक्तपित्त से कष्ट होता है।।८९।। अंशाच्चतुर्थगे चन्द्रे शिखिना वीक्षिते सति । नीलकुष्ठं भवेत्तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।९०।। केतु कारकांश से चौथे चन्द्रमा को देखता हो तो नीलकुष्ठ होता है।।९०।। चतुर्थे पञ्चमे वापि युतौ राहुकुजौ यदि। क्षयरोगो भवेत्तस्य चन्द्रदृष्ट्या विशेषतः।।९१।। कारकांश से चौथे या पाँचवें राहु-भौम हों तो क्षयरोग होता है। चन्द्रमा देखता हो तो विशेषकर कुष्ठरोग होता है।।९१।। स्वांशात्तूर्ये सुते वापि केवलः संस्थितः कुजः। पिटकादि भवेत्तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।९२।। कारकांश से चौथे या पाँचवें केवल भौम हो तो पिटक आदि क्षुद्र रोग होते हैं।।९२।। तत्र स्थिते च शिखिना ग्रहणीरोगपीडितः। स्वर्भानुर्गुलिके तत्र विषवैद्यो विषात्तिकः।।९३।। यदि उन्हीं भावों में केतु हो तो संग्रहणी रोग होता है। यदि उक्त भावों में राहु और गुलिक हो तो विषवैद्य या विष से कष्ट पाने वाला होता है।।९३।। कारकांशाद्धने तुर्ये केवलं संस्थिते शनौ। धनुर्विद्याधिको बालो जायते नात्र संशयः।।९४।। कारकांश से दूसरे या चौथे भाव में शनि हो तो धनुष विद्या को जानने वाला होता है।।९४।। कारकांशात्सुखे वित्ते केवले संस्थिते शिखी। घटिकायन्त्रवादी स्यादिष्टशोधनतत्परः।।९५।। कारकांश से चौथे वा दूसरे भाव में यदि केतु हो तो घटिकायंत्र को जानने वाला होता है।।९५।। उक्तस्थाने स्थिते सौम्ये जातस्तु परमहंसकः। तथा संन्यस्तकं ज्ञेयं निर्विशङ्को द्विजोत्तम।।९६।। पूर्वोक्त स्थान में बुध हो तो परमहंस या संन्यासी दंडधारी।।९६।।
कारकांशफलमाह १२७ उक्तस्थानस्थिते राहौ लोहयन्त्रादिकारकः। रविणा खड्गधारी च कुजेन कुन्तधारकः॥१९७॥ राहु हो तो लोह के यंत्रों को बनाने वाला, रवि हो तो खड्ग धारण करने वाला और भौम हो तो कुंत (भाला) धारण करने वाला होता है॥१९७॥ चन्द्रेज्यौ कारकांशे च तथां तत्पञ्चमे स्थितौ। ग्रन्थकर्त्ता भवेन्नूनं सर्वविद्याविशारदः॥१९८॥ चन्द्रमा और गुरु कारकांश में हो अथवा उससे पाँचवें भाव में हो तो बालक सभी विद्याओं को जानने वाला और ग्रंथकार होता है॥१९८॥ उक्तस्थानंगते शुक्रे स्वल्पग्रन्थकरो द्विज। उक्तस्थानगते सौम्ये किञ्चिद्ग्रन्थकरो ह्यसौ॥१९९॥ यदि उक्त स्थान में शुक्र हो तो अल्प ग्रंथकार होता है। यदि बुध हो तो कुछ ग्रंथकार होता है॥१९९॥ शुक्रेण काव्यकर्ता च प्राकृतग्रन्थतत्परः। गुरुणा सर्वग्रन्थानां कारको द्विजसत्तम॥२००॥ शुक्र हो तो काव्य करने वाला, गुरु हो तो सभी ग्रंथों को करने वाला होता है॥२००॥ उक्तस्थानगतः शौरिः सभाजाड्यो भवेन्नरः। मीमांसको भवेन्नूनमुक्तस्थानगते बुधः॥२०१॥ यदि शनि हो तो सभामूक होता है। उक्त स्थान में बुध हो तो मीमांसक होता है॥२०१॥ कारकांशे धरासूनुर्लग्ने वा नवपञ्चमे। नैयायिको भवेन्नूनं सुष्ठुकाव्यकरो नरः॥२०२॥ कारकांश लग्न में वा नवम-पंचम में हो तो नैयायिक और कविता करने वाला होता है॥२०२॥ कारकांशे निशानाथे त्रिकोणे चाथ लग्नगे। सांख्यशास्त्रज्ञनिपुणो जायते मतिमान्नरः॥२०३॥ कारकांश में वा त्रिकोण वा लग्न में यदि चन्द्रमा हो तो सांख्यशास्त्र को जानने वाला होता है॥२०३॥
१२८ . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारकांशे स्थिते केतौ पञ्चमे वापि संस्थिते । गणितज्ञो भवेन्नूनं ज्योतिषशास्त्रविशारदः ।।१०४।। कारकांश में या पाँचवें भाव में केतु हो तो गणित को जानने वाला ज्योतिषशास्त्र में प्रवीण होता है।।१०४।। सुराचार्येण सम्बन्धात्साम्प्रदायिकसिद्धिकृत्। ये योगा पञ्चमे भावे यथावद्भाषितं मया ।।१०५।। सभी योगों में गुरु का संबंध होने से साम्प्रदायिक कार्यों की सिद्धि होती है। जो योग पाँचवें भाव में कहा है उसमें गुरु का योग होने से फल होता है।।१०५।। वित्तस्थानेऽपि ते ज्ञेया पूर्ववत्फलसिद्धिदम् । कोऽपि तृतीयभावे तु कथयन्ति पुरो द्विज ।।१०६।। जो योग मैंने पाँचवें भाव में कहे हैं उन्हें दूसरे भाव में भी जानना चाहिए। किसी प्राचीन आचार्य ने तीसरे भाव में भी देखने को कहा है।।१०६।। कारकांशे धने केतौ तथा भाग्यालये गते । पापग्रहेण सन्दृष्टे वाचालश्च भवेन्नरः ।।१०७।। कारकांश में वा उससे दूसरे या ९वें भाव या ५वें भाव में केतु हो और पापग्रह से देखा जाता हो तो मनुष्य वाचाल होता है।।१०७।। अंशाल्लग्नात्तथारूढाद्धने रन्ध्रे स्थिते द्विज । पापसाम्ये च विज्ञेयो योगः केमद्रुमो भवेत् ।।१०८।। कारकांश लग्न तथा आरूढलग्न से दूसरे, आठवें भाव में यदि समान पापग्रह हो तो केमद्रुम योग होता है।।१०८।। चन्द्रदृष्टिविशेषेण योगः केमद्रुमो मतः । द्वितीयाष्टमभावाभ्यां योगोऽयं कथ्यते द्विज ।।१०९।। चन्द्रमा देखता हो तो विशेष रूप से केमद्रुम होता है। दूसरे और आठवें भाव में विशेषकर यह योग होता है।।१०९।। कारकांशेषु ये योगाः पूर्वोक्ता गदितो मया । तत्तद्राशिदशापाके सर्वेषां फलमादिशेत् ।।११०।। कारकांश से जिन योगों को मैंने कहा है उनका फल उन राशियों के दशा-अंतर में होता है।।११०।।
अथाऽऽरूढमाह १२९ एवं दशाप्रदाद्राशेर्द्वितीयाष्टमयोर्द्विज। ग्रहसाम्ये च विज्ञेयः केमद्रुः शशिनेक्षिते ।।१९१।। इसी प्रकार दशाप्रद राशि से दूसरे, आठवें भाव में ग्रहसाम्य हो और चन्द्रमा देखता हो तो केमद्रुम योग होता है।।१९१।। दशाप्रारम्भसमये शोधयेज्जन्मलग्नवत्। सूर्यादिखेचरान् स्पष्टान् साधयेज्जन्मवद्द्विज।।१९२।। दशा प्रवेश समय में सूर्यादि ग्रहों और लग्न को साधना चाहिए।।१९२।। तत्र वित्ताष्टमे भावे ग्रहसाम्यो यदा भवेत्। तदा केमद्रुमो ज्ञेयश्चन्द्रदृष्ट्या विशेषतः ।।१९३।। उस समय उक्त भावों में ग्रहसाम्य और चन्द्रमा की दृष्टि हो तो केमद्रुम योग होता है।।१९३।। एवं तन्वादिभावानां दशारम्भेषु योजयेत्। तत्तद्ग्रहानुसारेण फलं वाच्यं बुधैः सदा ।।१९४।। इसी प्रकार तनु आदि भावों की दशा के आरंभ में भी योजना करना चाहिए। क्योंकि उस समय के ग्रह के अनुसार ही फल होता है।।१९४।। इति बृहत्पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां कारकांशफलकथनं नामाऽष्टमोऽध्यायः। अथाऽऽरूढमाह अधुना सम्प्रवक्ष्यामि राश्यारूढपदं द्विज। राशीनां द्वादशानान्तु यावदीशाश्रयो भवेत् ।।१।। अब मैं राशि का आरूढ़-पद कहता हूँ— बारह्रों राशियों का उसके स्वामी जहाँ बैठे हों, उस राशि के राशि की संख्या जितनी हो।।१।। संख्या त्वीशोदयादग्रे समाना तत्पदं वदेत्। राशिवद्ग्रह आरूढं ज्ञायते गणकैर्जनैः ।।२।। उतनी संख्या और आगे गिनने से जो राशि हो वही आरूढ़ लग्न या पद होता है। इसी प्रकार अर्थात् राशि के ही समान ग्रहों का भी आरूढ़ लग्न होता है।।२।।
१३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यावद्दूरं यस्य राशिस्तावत्संख्याक्रमेण वै। अग्रे लग्नारूढपदं ज्ञायते द्विजसत्तम ॥३॥ जिस ग्रह की राशि उस ग्रह से जितनी दूर हो उतनी ही संख्या आगे उस ग्रह की लग्नारूढ़ राशि होती है॥३॥ जन्मुर्लग्नाल्लग्नस्वामी यावद्दूरं हि तिष्ठति। तावद्दूरं तदग्रे च लग्नारूढं च कथ्यते॥४॥ जन्मलग्न से लग्नेश जितनी दूर राशि पर हो उतनी ही राशि आगे जो राशि हो उसे लग्नारूढ़ राशि रहते हैं॥४॥ यदि लग्नेश्वरः स्वर्क्षे कलत्रे संस्थितोऽथवा। आरूढलग्नमित्याहुर्जन्मलग्नं द्विजोत्तम ॥५॥ यदि लग्नेश अपनी राशि के सप्तम में हो तो जन्मलग्न ही आरूढ़ लग्न होती है॥५॥ एकं तन्वादिभावानां भावारूढपदं भवेत्। यत्र यत्र ग्रहा लग्ने तत्र तत्र सुसंलिखेत् ॥६॥ इसी प्रकार तन्वादि भावों का प्रत्येक का आरूढ़ बनाना चाहिए॥६॥ इस प्रकार लग्नारूढ़ को लग्न मानकर चक्र बनावे। उसमें जो ग्रह जिस स्थान में हो वहाँ लिखकर फल कहे। विशेष— यहाँ पद और आरूढ़ शब्द दोनों एकार्थक हैं। जैमिनि के मत से यदि लग्नेश लग्न से चौथे भाव में हो तो चतुर्थभावगत राशि और सातवें भाव में हो तो दशमभावगत राशि लग्न का पद होता है। जैसे मिथुन लग्न का स्वामी बुध वृश्चिक राशि में है, मेषादि गणना से वृश्चिक की संख्या ५ है, अतः वृश्चिक से ५वीं मेष राशि ही मिथुन लग्न का पद हुआ। प्रायः लग्न के पद से ही विचार करना चाहिए। पदादेकादशस्थानफलम्— पदादेकादशे स्थाने शुभग्रहयुतेक्षिते। लक्ष्मीवाञ्जायते बालः प्रजावाञ्छीलसंयुतः ॥७॥ पद से ११वें भाव में शुभग्रह हों या देखते हों तो बालक धनी, पुत्रवान् और शीलवान् होता है॥७॥ वित्तोपार्जनन्यायेन नीतिवाञ्जायते सदा। नरो न नास्तिको नूनं न तु शास्त्रविरुद्धकृत् ॥८॥
अथाऽऽरूढमाह १३१ सन्मार्ग से द्रव्य पैदा करने वाला नीतियुक्त होता है और धार्मिक तथा शास्त्रज्ञ होता है।।८।। पदादेकादशे विप्र पापखेटयुतेक्षिते। अन्यायोपार्जितं वित्तं विरुद्धं शास्त्रमार्गतः।।९।। यदि पद से ११वें भाव में पापग्रह वा पापग्रह देखते हों तो अन्याय से द्रव्य को पैदा करने वाला और शास्त्र से अनभिज्ञ होता है।।९।। मिश्रैर्मिश्रफलं ज्ञेयमुच्चमित्रादिक्षेत्रगः। बहुधा जायते लाभो यत्र तत्र द्विजोत्तम।।१०।। यदि शुभग्रह और पापग्रह दोनों से दृष्ट-युत हों तो दोनों फल होता है। यदि उच्च-मित्र आदि के गृह में हों तो प्रायः लाभ ही होता है।।१०।। आरूढाल्लाभभवनं ग्रहः पश्येत्तु न व्ययम्। यस्य जन्मनि सोऽपि स्यात्प्रबलो धनवानपि।।११।। यदि शुभाशुभ ग्रह उच्चराशि में बैठे हों और ११वें भाव को देखते हों तो अनेक प्रकार से लाभ होता है, परन्तु १२वें भाव को न देखते हों तो।।११।। दृष्टग्रहाणां बाहुल्ये तथा द्रष्टरि तुङ्गगे। सार्गले चापि तत्रापि बह्वर्गलसमागमे।।१२।। यदि बहुत से ग्रह अपनी उच्चराशि में होकर ११वें भाव को देखते हों और अर्गला योग करते हों।।१२।। शुभग्रहार्गले तत्र तत्राप्युच्चग्रहार्गले। सुखानि स्वामिनां दृष्टे लग्नभाग्यादिगेन वा।।१३।। उच्चराशिस्थ शुभग्रह का अर्गला योग हो तो बालक अत्यंत सुख को पाता है।।१३।। जातस्य पुंसः प्राबल्यं निर्दिशेदुत्तरोत्तरम्। उक्तयोगेषु खेटाश्चेद्द्वादशं नैव पश्यति।।१४।। लग्न, भाग्य में बैठे हुए ग्रह से देखा जाता हो, जो द्वादशभाव को न देखता हो तो जातक उत्तरोत्तर उन्नति करता है।।१४।। पदाद्द्वादशभावादीनां फलम्- आरूढाद्द्वादशे विप्र शुभपापयुतेक्षिते। व्ययाधिक्यं भवेदेवं विशेषोपार्जनात्तथा।।१५।।
१३२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् पद से १२वें भाव में शुभग्रह-पापग्रह युत हों और देखते हों तो विशेष लाभ के कारण द्रव्य का अधिक खर्च होता है।। १५५।। शुभग्रहे सुमार्गेषु कुमार्गात्पापखेचरैः। मिश्रैर्मिश्रफलं वाच्यं यथालाभेषु पूर्ववत् ।।१६।। शुभग्रह का संबंध होने से सुमार्ग में और पापग्रह का संबंध होने से कुमार्ग में व्यय होता है। दोनों (शुभ-पाप) के रहने से दोनों मार्ग में व्यय होता है।।१६।। आरूढाद्द्वादशे शुक्रे भानुस्वर्भानुवीक्षिते । राजमूलाद्व्ययं वाच्यं चन्द्रदृष्ट्या विशेषतः ।।१७।। आरूढ से १२वें शुक्र हो, सूर्य-राहु से देखा जाता हो तो राजा के द्वारा व्यय होता है। चन्द्रमा देखता हो तो विशेष व्यय होता ही है।।१७।। आरूढाद्द्वादशे सौम्ये शुभखेटयुतेक्षिते। ज्ञातिमध्ये व्ययो नित्यं पापदृक्कल्हाद्व्ययः।।१८।। आरूढ़ से १२वें भाव में बुध हो और शुभग्रह से दृष्ट वा युत हो तो जाति (भाई-बंधु) में व्यय होता है और पापग्रह देखता हो तो कलह होने से व्यय होता है।।१८।। पदाद्व्यये सुराचार्ये वीक्षिते चान्यखेचरैः। करमूलाद्व्ययं वाच्यं करवाजेन वै द्विज ।।१९।। पद से १२वें भाव में गुरु हो और अन्य ग्रहों से देखा जाता हो तो कर (लगान) आदि से व्यय होता है।।१९।। आरूढाद्द्वादशे सौरी धरापुत्रेण संयुते। अन्यग्रहेक्षिते विप्र भ्रातृमूलाद्धनव्ययम् ।।२०।। आरूढ से व्ययभाव में शनि हो और भौम से देखा जाता हो तथां शेष ग्रहों से देखा जाता हो तो भाई, कुटुंब के कारण धन का व्यय होता है।।२०।। पदाद्द्वादशे भावे ये योगा गदिता मया। लाभस्थानेषु ते योगा लाभयोगकराः सदा।।२१।। पद से बारहवें भाव में जिन योगों को मैंने कहा है वे ही योग लाभभाव में हों तो लाभ करने वाले होते हैं।।२१।।
अथाऽऽरूढमाह १३३ पदात्सप्तमभावफलम्- पदाच्च सप्तमे राहुरथवा संस्थितः शिखी । उदरव्यथायुतो बालः शिखिना पीडितोऽधिकम् ॥२२॥ पद से सातवें भाव में राहु अथवा केतु हो तो बालक पेट की बीमारी से व्यथित रहता है। केतु से अधिक पीड़ायुक्त होता है।।२२।। पदाच्च सप्तमे केतुः पापखेटयुतेक्षिते। साहसी श्वेतकेशी च दीर्घलिङ्गी भवेन्नरः॥२३।। पद से सातवें केतु हो और पापग्रह से युत वा दृष्ट हो तो बालक साहसी, सफेद बालों वाला और दीर्घलिंगी होता है।।२३।। पदाच्च सप्तमे स्थाने गुरुशुक्रनिशाकराः। एको द्वयं त्रयं वा स्याल्लक्ष्मीवान् कारयेद्बुधः।।२४।। पद से सातवें भाव में गुरु, शुक्र, चन्द्रमा तीनों हों वा इनमें से एक या दो हों तो बालक धनी होता है।।२४।। तुङ्गर्क्षे सप्तमे खेटे शुभो वाप्यशुभः पदात्। श्रीमान् सोऽपि भवेन्नूनं सत्कीर्त्तिसहितो द्विज ।।२५।। पद से सातवें भाव में अपनी उच्चराशि में शुभग्रह या पापग्रह में से कोई हो तो बालक कीर्त्तिमान् और लक्ष्मीवान् होता है।।२५।। ये योगाः सप्तमे भावे आरूढात् कथिता मया। ते योगा द्यूनवच्चिन्त्या वित्तभावेऽपि वै द्विज ।।२६।। पद से सातवें भाव में जिन योगों को मैंने कहा है उनको उसी प्रकार दूसरे भाव में भी विचार करना चाहिए।।२६।। तुङ्गस्थो रौहिणेयो वा जीवो वा शुक्र एव वा। एको बली धनगतः श्रियं दिशति देहिनः ।।२७।। यदि बुध, गुरु, शुक्र इनमें से कोई भी अपनी उच्चराशि में बली होकर धनभाव में हो तो धन को देता है।।२७।। ये योगाश्च पदे लग्ने यथावद्गदिता मया। कारकांशस्थकुण्डल्यां निर्बाधका विचिन्तयेत् ।।२८।। जो योग लग्न पद में कहे गये हैं उनको कारकांश कुंडली में भी देखना चाहिए।।२८।।
१३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् आरूढाद्वित्तभे सौम्ये सर्वदेशाधिपो भवेत्। सर्वज्ञो वा भवेद्बालः कविर्वाग्मी च भार्गवे ।।२९ ।। पद से दूसरे भाव में शुभग्रह हो तो सभी देशों का स्वामी होता है अथवा सर्वज्ञ होता है। केवल शुक्र हो तो कवि और वक्ता होता है।।२९।। आरूढात्केन्द्रकोणेषु तथा लाभपदे द्विज। लग्नदारपदे वापि सबलग्रहसंयुते ।।३० ।। श्रीमांश्च जायते नूनं देशं विख्यातिमान् भवेत्। षष्ठाष्टमे व्ययस्थाने श्रीमान्स न भवेत्तदा ।।३१।। पद से केन्द्र तथा कोण में लाभ पद में अथवा लग्न दारपद में बलवान् ग्रह हों तो श्रीमान् और प्रसिद्ध होता है। यदि छठे, आठवें, बारहवें स्थान में हों तो श्रीमान् नहीं होता है।।३०-३१।। पदालग्ने सप्तमे वा केन्द्रत्रिकोणोपचये। सुवीर्यसंस्थिते खेटे भार्याभर्तृसुखप्रदः ।।३२।। पद से लग्न में वा सातवें वा केन्द्र, त्रिकोण, उपचय स्थान में बली ग्रह हों तो स्त्री, भाई आदि का सुख होता है।।३२।। एवं लग्नपदाद्विप्र पुत्रभावादि चिन्तयेत्। मित्रामित्रे विजानीयात्त्रिकभावेषु वै द्विज ।।३३ ।। इसी प्रकार लग्नपद से पुत्रभाव आदि का भी विचार करना चाहिए। यदि दोनों में मित्रता हो तो मित्रता, अन्यथा शत्रुता होती है।।३३।। लग्नारूढं दारपदं मिथः केन्द्रगते यदि। लाभे वा त्रित्रिकोणे वा तदा राजा धराधिपः ।। ३४ ।। लग्नपद और दारपद परस्पर केन्द्रगत, लाभ, तृतीय वा त्रिकोण में हो तो पृथ्वी का राजा होता है।।३४।। एवं दारादिभावानामर्जायित्वारिमित्रता। जातकद्वयमालोक्य चिन्तनीयं विचक्षणैः।।३५।। इसी प्रकार दारा आदि भावों के शत्रु-मित्रादि का विचार कर उनके फलों को भी कहना चाहिए।।३५।। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां आरूढफलाध्यायः नवमः।
उपपदप्रकरणम् १३५ उपपदप्रकरणम् पराशर उवाच- अधुना सम्प्रवक्ष्याम्युपपदं च द्विजोत्तम। यस्य विज्ञानमात्रेण जायते फलसूचकः॥१॥ अब मैं उपपद को कह रहा हूँ, जिसके ज्ञान मात्र से फल का निर्णय होता है॥१॥ लग्ने विषमे विप्र धनस्य पदोपपदम्। समे लग्ने व्ययस्य च पदमुपपदं भवेत्॥२॥ लग्न यदि विषम हो तो धनभाव का पद उपपद होता है, यदि समलग्न हो तो बारहवें का पद उपपद होता है॥२॥ तदेवोपारूढगौणपदं च कथ्यते द्विज। तस्मादेव फलं सर्वं शुभाशुभं विचारयेत्॥३॥ उपपद को ही उपारूढ़ और गौणपद कहते हैं। इसी से शुभ-अशुभ फलों का विचार करना चाहिए॥३॥ पापाक्रान्ते पापयुते पापर्क्षे पापवीक्षिते। पापसम्बन्धसंयोगे उपपदाद् द्वितीयके।॥४॥ उपपद से दूसरे भाव में पापग्रह हो, पापग्रह की राशि पापग्रह से देखी जाती हो तो॥४॥ प्रव्रज्या योगो विज्ञेयः संन्यासो भवति ध्रुवम्। तथा भार्याविरोधी स्यादथवा स्त्रीविनाशकृत्॥५॥ व्रज्या (संन्यास) योग होता है। इसमें उत्पन्न बालक अवश्य संन्यासी होता है तथा स्त्री का विरोधी वा स्त्री का नाश करने वाला होता है॥५॥ रवेः पापत्वमात्रैव सिंहर्क्षे स्वोच्चभे सति। पूर्वोक्तं नो फलं ज्ञेयं जायते गृहिणीसुखम्॥६॥ यदि सूर्य सिंह राशि में वा अपनी उच्चराशि में हो तो सूर्य पापग्रह नहीं होता है। ऐसी स्थिति का सूर्य उक्त भाव में हो तो प्रव्रज्या योग नहीं होता अपितु स्त्री का सुख होता है॥६॥ मेषादिपापराशौ चेत्संस्थिते दिवसाधिपे। पूर्वोक्तं च फलं ज्ञेयं प्रव्रज्यादारनाशकः॥७॥
१३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि मेषादि पापराशियों में सूर्य हो तो पूर्वोक्त फल होता है और स्त्री का नाश होता है।।७।। उपपदाच्च द्वितीयं वै शुभसम्बन्धदृष्टियुक्। शुभर्क्षे शुभसंयोगे पूर्वोक्तफलदो भवेत्।।८।। उपपद से दूसरे भाव में शुभग्रह का संबंध हो, शुभग्रह देखते हों अथवा शुभग्रह की राशि हो तो पूर्वोक्त फल होता है।।८।। उपपदे द्वितीये वा नीचांशे नीचखेटयुक्। नीचसम्बन्धयोगे वा प्रव्रज्यादारनाशकृत्।।९।। उपपद में उससे दूसरे भाव में नीचांश वा नीच राशि में नीच ग्रह युक्त हो, नीचस्थ ग्रह से संबंध होता हो तो प्रव्रज्या योग और स्त्री का नाश होता है।।९।। उच्चांशे उच्चराशौ वा उच्चसम्बन्धदृष्टियुक्। बहुदारा भवेत्तस्य रूपलक्षणसंयुताः।।१०।। यदि उच्चांश का उच्चराशि में उच्चस्थ ग्रह से संबंध और दृष्टि हो तो उसे रूपवती अनेक स्त्रियाँ होती हैं।।१०।। उपपदे द्वितीये वा युग्मर्क्षे संस्थिते यदा। तत्र प्रजातः पुरुषः बहुदारसमन्वितः।।११।। उपपद वा दूसरे भाव में मिथुन राशि हो तो जातक को अनेक स्त्रियाँ होती हैं।।११।। उपपदे द्वितीये वा स्वस्वामिखेटसंयुते। उत्तरायुषि निर्दारो भवत्येव न संशयः।।१२।। स्वराशौ संस्थिते वापि नित्याख्ये दारकारके। उत्तरायुषि भो विप्र! निर्दारः स नरो भवेत्।।१३।। उपपद या दूसरा भाव अपने स्वामी शुभग्रह से युत हो तो आयुष्य के उत्तरार्ध में बिना स्त्री के पुरुष होता है।।१३।। उपपदेऽपि तुङ्गर्क्षे नित्याख्ये दारकारके। उत्तमकुलाद्दारलाभो नीचस्थे तु विपर्ययः।।१४।। उपपद में उच्च में नित्य स्त्रीकारक हो तो उत्तम कुल से स्त्री का लाभ होता है। नीच राशि में हो तो विपर्यय होता है।।१४।।
उपपदप्रकरणम् १३७ शुभग्रहयुते दृष्टे उपपदे दारकारके। सुन्दरी लभ्यते भार्या भव्या रूपवती द्विज।।१५।। उपपद और स्त्रीकारक शुभग्रह से युत-दृष्ट हों तो बहुत सुन्दर स्त्री प्राप्त होती है।।१५।। उपपदे द्वितीये वा शनिराहुयुते सति। अपवादात्स्त्रियस्त्यागो भार्यानाशोऽथवा भवेत् ।।१६।। उपपद वा द्वितीय में शनि-राहु युत हों तो अपवाद के कारण स्त्री का त्याग या स्त्री का नाश होता है।।१६।। उपपदे च द्वितीये वा शिखिशुक्रौ स्थितौ यदा। रक्तप्रदररोगार्त्ता जायते तस्य भामिनी।।१७।। उपपद या द्वितीय में केतु-शुक्र युत हों तो स्त्री रक्तप्रदर रोग से रोगिणी होती है।।१७।। उपपदादिषु संयोगो बुधकेत्वोर्द्विजोत्तम। अस्थिस्रावयुता बाला गृहे तस्य न संशयः।।१८।। यदि बुध-केतु का संयोग हों तो अस्थिस्राव से स्त्री रोगिणी होती है।।१८।। रविराहुस्तथा पङ्गुरूपपदे योगकारकः। अस्थिज्वरवती बाला तप्ताङ्गा च दिवानिशम् ।।१९।। रवि, राहु, शनि उपपद में हों तो स्त्री अस्थिज्वर से पीड़ित होती है।।१९।। उपपदे बुधकेतुभ्यां योगसम्बन्धके द्विज। स्थूलाङ्गी गृहिणी तस्य जायते नात्र संशयः।।२०।। उपपद में बुध-केतु का योग वा संबंध हो तो उसकी स्त्री स्थूल शरीर की होती है।।२०।। उपपदे बुधक्षेत्रे भौमर्क्षे चाथवा द्विज। मन्दारौ संस्थितौ तत्र नासिकारोगयुग्भवेत् ।।२१।। उपपद में बुध की राशि या भौम की राशि हो और शनि-भौम युत हों तो स्त्री की नाक में रोग होता है।।२१।। यदि तत्र युतो सौरिः गुरुणा सहितो भवेत्। कर्णरोगवती बाला नेत्ररोगयुता तथा।।२२।।
१३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि गुरु-शनि का योग हो तो स्त्री कान तथा आँख के रोग वाली होती है।।२२।। कुजसौम्यौ चान्यक्षेत्रे उपपदे द्विजोत्तम। योगे स्वर्भानुदेवेज्यौ दन्तार्ता गृहिणी भवेत्।।२३।। यदि भौम-बुध वा गुरु-राहु उपपद में हों तो दाँत के रोग से पीड़ित स्त्री होती है।।२३।। उपपदे च कुम्भस्थे मीनस्थेऽपि तथा द्विज। शनिस्वर्भानुयोगश्चेत्पंग्वंगी तस्य भामिनी।।२४।। उपपद में कुम्भ या मीन राशि हो और उसमें शनि-राहु का योग हो तो उसकी स्त्री पंगुल (वातव्याधि से) होती है।।२४।। ये योगाः पूर्वकथिता मया ते विप्रसत्तम। शुभयुग्दृष्टिसंयोगे न भवेयुः फलप्रदाः।।२५।। पूर्वोक्त जो योग कहे गये हैं वे यदि शुभग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो फलप्रद नहीं होते हैं।।२५।। लग्नादुपपदाद्वापि यो राशिः सप्तमो द्विज। तदीशात्तन्नवांशाच्च फलमेव विचारयेत्।।२६।। लग्न से वा उपपद से सातवीं राशि के जो स्वामि और उसके नवांश से भी इसी प्रकार फल का विचार करना चाहिए।।२६।। शनिः शुक्रस्तथा चान्द्रिः सप्तमांशग्रहेभ्यश्च। नवमे संस्थितो विप्र अपत्यरहितो नरः।।२७।। उक्त प्रकार से सप्तमेश से नवम में शनि, शुक्र और बुध हों तो पुरुष पुत्रहीन होता है।।२७।। पदोपपदलग्नाच्च सप्तमांशग्रहेभ्यश्च। नवमस्थे गुरौ भावौ स्वर्भानौ योगकृत्तथा।।२८।। उपपद से वा सप्तमांश ग्रह से नवमभाव में गुरु, सूर्य, राहु का योग हो तो।।२८।। बहुपुत्रो भवेन्नूनं प्रतापी बलवीर्ययुक्। प्रचण्डविजयी विप्र रिपुनिग्रहकारकः।।२९।। बड़े बलवान् पराक्रमी, प्रतापी शत्रुओं का दमन करने वाले अनेक पुत्र होते हैं।।२९।।