बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६५१ अब्दादयस्तदा देहनाशः करणदे सति । तस्मिन् पापग्रहे तस्माद्वलिन्येवं विधिःस्मृतः ॥१९१॥ लब्धि माता पिता के आयुष्य का प्रमाण होता है। यदि पापग्रह बलवान् हो तो पूर्वविधि से ही मृत्युकाल जानना॥१९॥ बलहीने तु तं हन्यात्सप्तभिः पंचभिर्भजेत् । आयुस्तयोः स्यात्स्थानस्य प्रदिशेदशुभे सति ॥२०॥ यदि निर्बल हो तो योग को सात से गुणकर ५ से भाग देने से जो वर्षादि हो वही माता पिता के आयुष्य का प्रमाण होता है॥२०॥ मुनिभक्तं वसुघ्नं स्यान्नैवं चेन्नैतयोर्मृतिः । वक्ष्यमाणेण विधिना वदेदाह पराशरः ॥२१॥ यदि रेखाप्रद ग्रह बली हो तो पूर्व पिंड को आठ से गुणकर ७ से भाग देने से लब्ध वर्षादिक दोनों का आयुष्य होता है। शून्य के आयुष्य से रेखा का आयुष्य अधिक हो तो मृत्यु नहीं होती है ऐसा पाराशर का मत है॥२१॥ चतुर्थभावात्सूर्याच्चायुसाधनम् - सूर्यादायुः करौ भूपा मनवोऽर्का नवार्णवाः । वेदाक्षीणि तु लग्नस्य वक्ष्याम्यायुस्तथैवतत् ॥२२॥ सूर्यादि ग्रहों के और लग्न का क्रम से आयुध्रुवांक २।१६।१४।१२।९।४।४।२ हैं॥२२॥ स्वोच्चे नीचे तु पातः स्याद्धरणादिविधिस्ततः । आयुस्तयोः स्यात्तौ तस्मिन् भवने तु तथा स्थितौ ॥२३॥ यदि उच्च में ग्रह हो तो ध्रुवांक की आयु ही स्पष्ट होती है और नीच में ग्रह हो तो अनुपात द्वारा आयु लाना चाहिये॥२३॥ ध्रुवांक द्वारा आयुर्विचारः- न कश्चित्स्थानदः स्याच्चेत्तत्काले च मृतिर्भवेत् । शुभभोगे शुभा प्रोक्ता तयोःस्याद्रश्मिसंभवः ॥२४॥ यदि वहां कोई रेखाप्रद ग्रह न हो तो उसी समय मृत्यु कहना चाहिये शुभग्रह
६५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्। के योग से उत्तम रीति से और पापग्रह अधिक हों तो दंड पातादि से मृत्यु कहना।।२४।। रश्मितः आयु साधनम् - अष्टभिर्गुणयेत्षड्भिर्विभज्यायुः परं भवेत् । वेश्मनि स्थानदा न स्युर्जन्मकाले स्फुटीकृताः ।।२५।। सूर्य और चतुर्थभाव के रश्मि संभव को ८ से गुणकर ६ से भाग लब्ध परम आयु होती है।।२५।। करणाद्यभावकरणादिद्वारा भाव विचारः- कलीकृतश्च खनखैर्विभज्याब्दादयः क्रमात् । एवं शुभाशुभं ब्रूयान्मातापित्रोर्द्विजोत्तम ।।२६।। यदि चतुर्थभाव में रेखाप्रद ग्रह न हों तो चतुर्थ भाव का कला पिंड बनाकर उसमें २०० से भाग देने से वर्षादि आयु होती है इसपर से माता पिता के शुभाशुभ फल को कहना।।२६।। करणस्थानदातारः पापपुण्य फलप्रदाः । पुनश्चोच्चादिषु तथा त्रिगुणाद्यास्तु पूर्ववत् ।।२७।। शून्य के देने वाले ग्रह पापफल देने वाले होते हैं और रेखा देने वाले ग्रह शुभफल देने वाले होते हैं। यदि ये अपने मूलत्रिकोणादि में हों तो पूर्ववत् त्रिगुणादि फल देते हैं।।२७।। शत्रुनीचाधि शत्रूणां स्थानेष्वपि तु पूर्ववत् । राशिं हित्वा तु भावानां सर्वत्रैवं क्रिया भवेत् ।।२८।। जहां आयुष्य का विचार हो वहां राशि को छोड़कर अंशादि से जैसा संस्कार कहा हो वैसा करना, यह क्रिया सर्वत्र जानना।।२८।। भावानां संस्कार विशेषाद् फल विचारः- द्वितीयभावलिप्ताश्च राशिलिप्ताविभाजिताः । स्ववर्गेणाहतास्तस्य खेटानां वर्गणाहताः ।।२९।। दूसरे भाव के अंशादि का कला करके उसमें दूसरे भाव की राशि के कला
अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६५३ से भाग देना लब्ध कलादि फल को द्वितीय भाव के ध्रुवांक से गुणाकर यदि उनमें ग्रह हो तो उसके ध्रुवांक से गुणकर।।२९।। भावरश्मिभिराहन्यात्सप्तभिश्च विभजयेत् । मूलरश्मिसमूहेन शिष्टं हन्यात्तथैवतान् ।।३०।। उसे दूसरे भाव के स्वामी के रश्मि से गुणाकर सात से भाग देने से जो अंक प्राप्त हो वह-भारणीय कुटुम्ब की संख्या और शेष को मूलरश्मि समूह से गुणकर।।३०।। इष्टानिष्टफलाभ्यां च हत्वांतरमथद्वयोः । सप्तविंशतिभिर्हत्वा सप्तभिश्च विभजयेत् ।।३१।। गुणनफल में भाव स्वामी के इष्ट फल से गुणन करके एवं भाव स्वामी के कष्ट बलांकों से मूलरश्मि समूह को गुणन कर दोनों के अन्तर को २७ से गुण देने से कलादि फल को ७ से भाग देने से जो आवे वह स्त्रियों की संख्या होती है।।३१।। भरणीय कुटुम्बानां पुंस्त्रियस्तत्समाविदुः । राशीन् हित्वातु लग्नादि भावभागादिकान् ।।३२।। राशियों को छोड़कर लग्नादि भावों के अंशादि अलग-अलग। अपने अपने स्वामियों के रश्मियों से गुणन करने से जो आवे उसे भावभागादि कहते हैं।।३२।। गुणयेद्रश्मिभिः स्वैश्च भावभागादयोविदुः । कलीकृत्य भलिप्ताभिर्विभज्याप्तं फलं ततः ।।३३।। इसका कलापिंड बनाकर दो जगह स्थापित करे उसमें राशि लिप्ता से भाग देने से जो फल प्राप्त हो उसे भावफल कहते हैं और दूसरे स्थान में १२ से भाग देने से जो फल हो उसे भाव साधन फल कहते हैं।।३३।। प्रकारांतर से भावफल साधन- सूर्यभक्तावशिष्टं तु भावानां साधनं विदुः । राशीन् हित्वा तंतो लिप्ताखखनेत्रविभाजिताः ।।३४।। राशिको छोड़कर अंशादि की कला बनाकर उसमें २०० से भाग देना।।३४।।
६५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । साधनघ्ना विभक्ताश्च वर्गणाभिः फलाहताः । उच्चादिवृद्धिहानिं च कुर्यात्तत्संख्यकाभवेत् ॥३५॥ लब्ध को पूर्व साधित भाव साधन से गुणकर अपने ध्रुवांक में भाग देना और पूर्व प्रतिपादित भाव साधन से गुण कर अपने ध्रुवांक में भाग देना पुनः इसे पूर्वसंपादित फल से गुण देने से जो संख्या प्राप्त हो वह कुटुम्बपोषण की संख्या होती है॥३५॥ अष्टकवर्गफलाध्यायः । तत्रादावष्टकवर्गे विचारणीयः- आत्मभावशक्तिश्च पितृचिन्ता रवेः फलम् । मनोवृत्तिप्रसादश्च मातृचिन्तामृगांकतः ।।१।। आत्मा, प्रभाव, शक्ति और पिता का फल सूर्य से विचार करना चाहिये मन, वृत्ति, प्रसन्नता और माता का विचार चन्द्रमा से करना चाहिये।।१।। भ्रातृसत्वं गुणं भूमिंभौमेन च विचारयेत् । वाणिज्यकर्मवृत्तिश्च बुधेन तु विचिन्तयेत् ।।२।। भाई, बल, गुण, भूमि का विचार भौम से करना चाहिये। वाणिज्य कर्म वृत्ति का बुध से करना चाहिये।।२।। गुरुणा देहपुष्टिं च विद्यापुत्रार्थसंपदः । भृगोर्विवाहकर्माणि भोगस्थानं च वाहनम् ।।३।। शरीर की पुष्टि, विद्या, पुत्र, धन संपत्ति का विचार गुरु से करना चाहिये। शुक्र से विवाह, संभोग, वाहन, वेश्या, स्त्री का विचार करना चाहिये।।३।। वेश्यास्त्रीजनगात्राणि शुक्रेणैवनिरीक्षयेत् । आयुष्यं जीवनोपायं दुःखशोकमहद्भयम् । सर्वक्षणं च मरणं मंदेनैव निरीक्षयेत् ।।४।। आयुष्य, जीवन, दुःख, शोक आदि का विचार शनि से करना चाहिये।।४।।
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५५ रविः पिता शशी माता भ्राता भौमो बुधः सुहृत् । मातुलेयः स्मृतो जीवो ज्ञानपुण्ये स्त्रियः सितः ।। ५ ।। सूर्य पितृ कारक, चन्द्रमा मातृकारक, भौम भ्रातृकारक, बुध मित्र और मातुल (मामा) कारक, गुरु विद्या और पुण्य (कर्म) कारक और शुक्र स्त्री कारक हैं।। ५ ।। एषामृक्षे च तत्काले मरणं कुरुते शनिः । आदित्याष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु ।। ६ ।। इनके नक्षत्रों में जब शनि आता है तो इन लोगों को कष्ट कारक होता है। सूर्य के अष्टम वर्ग को ग्रह सहित स्थापनकर विचार करे।। ६ ।। अर्कस्थितस्य नवमो राशिः पितृगृहं स्मृतम् । तद्राशिफल संख्याभिवर्द्धयेद्योगपिंडकम् ।। ७ ।। सूर्य से नवम राशि पिता की होती है, उस नवम राशि में जो रेखा की संख्या हो उससे योग पिण्ड को गुणकर।। ७ ।। सप्तविंशोद्धृतं शेषं नक्षत्रं याति भानुजम् । तस्मिन्काले पितृक्लेशो भवतीति न संशयः ।। ८ ।। २७ से भाग देने से जो शेष बचे वह अश्विन्यादि नक्षत्र की संख्या होती है उस नक्षत्र पर जब शनि जाता है तो पिता को कष्ट होता है।। ८ ।। तत्रिकोणगते वापि पितापितृसमोऽपिवा । मरणं तस्य जानीयाद्दशाच्छिद्रेषु कल्पयेत् ।। ९ ।। अथवा इसके त्रिकोण नक्षत्र में जब शनि होता है तब पिता और पिता के सदृश लोगों को कष्ट होता है। यदि उस समय पापग्रह की दशा हो तो मृत्यु होती है अन्यथा कष्ट मात्र होता है।। ९ ।। अर्कात्तु तुर्यगेराहौ मंदे वा भूमिनंदने । गुरुशुक्रेक्षणमृते पितृहा जायते नरः ।। १० ।। सूर्य से चौथे स्थान में राहु, शनि, भौम में से कोई हो और उसे गुरु शुक्र न देखते हों तो पिता का नाश होता है।। १० ।।
६५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । लग्नाच्चन्द्राद्गुरुस्थाने याते सूर्यसुते यदि । पित्रोर्नाशं तदा काले वीक्षिते पापसंयुते ॥९१॥ लग्न या चन्द्रमा से नवम स्थान में शनि हों और पापग्रह दृष्ट और युत हों तो पिता का नाश होता है॥९१॥ लग्नात्सुखेशराशीशदशायाम् पितृक्षयः । दशानुकूलकालेन योजयेत्कालवित्तमः ॥९२॥ लग्न से चतुर्थेश के राशीश की दशा में पितां का नाश होता है किन्तु दशा अनिष्ट न हो तो सुख होता है॥९२॥ पितृजन्माष्टमे जातस्तदीशे लग्नगेऽपिवा । तेनैव पितृकार्याणि करोत्यत्र न संशयः ॥९३॥ पिता के जन्मलग्न से आठवें लग्न में जन्म हो अथवा पिता के जन्मलग्न से आठवें भाव के स्वामी बालक के जन्मलग्न में हों तो वह बालक ही पिता के सभी कार्यों को करता है अर्थात् पिता की मृत्यु हो जाती है और वही सभी कार्य को करता है इसमें संशय नहीं है॥९३॥ पितृसुख योग- सुखनाथ दशायां तु सुखप्राप्तेश्च संभवः । सुखेशे लाभलग्नस्थे चन्द्रलग्नाद्विशेषतः ॥९४॥ सुखेश की दशा में पिता को सुख होता है। सुखेश ११ वें या जन्मलग्न में हो तो, विशेषकर चन्द्रलग्न से॥९४॥ पितृगृहं समायुक्ते जातः पितृवशानुगः । तेनैव पितृकार्याणां कर्मक्षेत्रे समापयेत् ॥९५॥ दशमभाव में हो तो पिता के वश में रहने वाला होता है और वही पिता के कर्मों को करने वाला होता है॥९५॥ पितृजन्मतृतीयर्क्षे जातः पितृधनाश्रितः । पितृकर्मगृहे जातः पितृतुल्यगुणान्वितः ॥९६॥ पिता के जन्मलग्न से तीसरे लग्न में जन्म हो तो पिता के धन का भोगी होता
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५७ है। पिता के जन्मलग्न से १०वीं राशि में जन्म हो तो पिता के गुण के सदृश गुणवाला होता है।।१६।। तदीशे लग्नसंस्थेऽपि पितृश्रेष्ठो भवेत्सुतः । एवमादिफलं ज्ञात्वा तान्यत्रापि नियोजयेत् ।।१७।। और उसके स्वामी यदि जन्मलग्न में हों तो पिता से श्रेष्ठ होता है। इस प्रकार से पूर्वोक्त के फलों की योजना यहां भी करना।।१७।। विशेषः- सूर्याष्टवर्गे यच्छून्यं तन्मासे संवत्सरेऽपि च । विवाहव्रतबंधादि सर्वं तत्वर्जयेत्सदा ।।१८।। सूर्याष्टक वर्ग में जिस राशि में अधिक शून्य हो उस राशि के मास में और संवत्सर (उस राशि में जब गुरुहों) में विवाह व्रत-वधादि शुभकर्म को न करें।।१८।। कलहो त्रासदुःखानि शून्यमासे भवन्ति च । एवमादिफलं ज्ञात्वा मासं प्रति समाचरेत् ।।१९।। अधिक शून्य वाले मास में कलह, भय, दुःखादि होते हैं इसको ध्यान में रखते हुये मास के कार्यों को करे।।१९।। पितृ मरणकालः- संशोध्यपिंडं सूर्यस्य रंध्रमानेन वर्द्धयेत् । अर्कोद्धतावशेषर्क्षे यदा याति शनैश्चरः । तस्मिन्मासे मृतिं विद्यात्तत्रिकोणगतेऽपिवा ।।२०।। सूर्य के अष्टकवर्ग के पिंड को सूर्य के शून्य संख्या से गुणकर १२ का भाग देने से जो शेष बचे उस राशि में जब शनि जाता है तब उस राशि के मास में पिता की मृत्यु होती है या उस राशि से त्रिकोण राशि में जब शनि जाते हैं तब पिता की मृत्यु होती है।।२०।। चन्द्राष्टकवर्गस्य फलम् - चन्द्राच्चतुर्थभे मातुः प्रासादग्रामचिंतनम् । चन्द्राष्टवर्गेयद्राशौ शून्याधिक्यं प्रजायते ।।२१।।
६५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । चन्द्रमा से चतुर्थ भाव में माता, गृह और ग्राम का विचार करना चाहिये। चन्द्रमा के अष्टकवर्ग में जिस राशि में अधिक शून्य है ।।२१।। तं राशिं च परित्यज्य शुभकर्माणि कारयेत् । चन्द्राष्टमे शनिक्षेत्रे त्रिकोणेषु विशेषतः ।।२२।। उस राशि में जब चन्द्रमा हो तब शुभ कर्म को न करे। चन्द्रमा से आठवें शनि की राशि से विशेष कर त्रिकोण में हों तो ।।२२।। आधिव्याधिदुःखान्यपि लभते नात्र संशयः । चन्द्रात्सुखफलात्पिंडं वर्धयेद्वैर्हतं चतत् ।।२३।। उस समय जातक को मानसिक कष्ट, व्याधि और दुःख होता है। चन्द्रमा से चौथे भाव के फल को खंड (पिंड) से गुणा कर २७ से भाग देने से ।।२३।। शेषमृक्षे शनौ याते मातृहानिं विनिर्दिशेत् । तत्रिकोणेषु वा केचिद्दशाछिद्रेषु कल्पयेत् ।।२४।। जो शेष हो तत्तुल्य नक्षत्र पर शनि के रहने से माता को कष्ट या मृत्यु होती है। अथवा उस नक्षत्र से त्रिकोण नक्षत्र (१० या १९ नक्षत्र में) में शनि के रहने से और उस समय कष्टप्रद दशा के रहने से माता की मृत्यु होती है।।२४।। भौमाष्टकवर्गफलम् - भौमाष्टवर्गे संचिन्त्यं भ्रातृविक्रमधैर्यकम् । भौमस्थितस्य सहजोराशिभ्रातृगृहंस्मृतम् ।।२५।। भौमाष्टक में भाई, पराक्रम और धैर्य का विचार करना चाहिये। भौम से तीसरे भाव से भाई का विचार करना चाहिये ।।२५।। त्रिकोण शोधनं कृत्वा यत्रभूयांसि तत्रवै । भूमिर्भवति भार्यावा भ्रातृगेहसुखं तथा ।।२६।। भौमाष्टकवर्ग में त्रिकोण शोधन के पश्चात् जिस राशि में अधिक शेष हो उस राशि में जब भौम जाता है तो भूमि का स्त्री का लाभ और भाई तथा गृह का सुख होता है।।२६।। भौमो बलविहीनश्चेत् दीर्घायुर्भातृकोभवेत् । फलानि यत्र क्षीयन्ते तत्रभूमिहानिः स्मृतः ।।२७।।
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५९ यदि भौम निर्बल हो तो भाई दीर्घायु होता है। और जिस राशि में फल की कमी हो उस पर भौम के जाने से भूमि की हानि होती है।।२७।। तद्राशिफलसंख्यैश्च वर्धयेच्छोध्यपूर्ववत् । शेषर्क्षे च शनौ याते भ्रातृहानिर्विनिर्दिशेत् ।।२८।। फलों के योग को पिंड से गुणा कर पूर्ववत् २७ का भाग देने से शेष नक्षत्र मे शनि के जाने से भाई की मृत्यु होती है।।२८।। अथ बुधाष्टकवर्गफलम् – बुधात्तूर्ये कुटुम्बं च धनं मित्रादिमातुलाः । तत्पंचमे मंत्रविद्यालिपि बुध्यादि चिंतयेत् ।।२९।। बुध से चौथे भाव में कुटुम्ब, धन, मित्र, मामा आदि का और बुध से पाँचवें भाव में मंत्र शास्त्र, लेखन और बुद्धि का विचार करना चाहिये।।२९।। बुधाष्टवर्ग संशोध्य शेषमृक्षगते शनौ । बंधुमित्रादि नाशादींल्लभतेनात्र संशयः ।।३०।। बुधाष्टक वर्ग में पूर्ववत् संशोधन करके राशिपिंड से योग पिंड को गुणाकर २७ से भाग देने से शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण नक्षत्र में शनि के जाने से बंधु मित्रादि का नाश होता है।।३०।। अथ गुर्वष्टकवर्गफलम् – • जीवात्पंचमतो ज्ञानं पुत्रधर्मधनादिकम् । गुरोरष्टकवर्गेषु संतानमपि कल्पयेत् ।।३१।। गुरु से पाँचवें भाव में संतान का विचार करना चाहिये। इसी प्रकार गुरु के अष्टकवर्ग में भी संतान विचार करना चाहिये।।३१।। गुरुस्थितसुतस्थाने यावच्च विद्यते फलम् । शत्रुनीचगृहं त्यक्त्वा तावंतश्च सुताः स्मृताः ।।३२।। गुरु से पाँचवें भाव में जितना फल हो उतने ही संख्यक संतान होते हैं यदि वह राशि गुरु की शत्रु और नीच राशि न हो तो।।३२।।
६६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सुतभेशनवांशैश्च तुल्या वा सन्ततिर्भवेत् । व्ययार्थसुतसंस्थैश्च पापैः स्यात्क्षीणसन्ततिः ।।३३।। पंचमेश के नवांश संख्या के तुल्य संतान की संख्या होती है। १२, २, ५ वें पापग्रह के तुल्य संतति की हानि होती है। पूर्व राशिपिंड को योगपिंड से गुणा कर २७ का या १२ का भाग देकर शेष तुल्य नक्षत्र या राशि में शनि के जाने से पुत्र को कष्ट होता है।।३३।। अथ शुक्राष्टकवर्गफलम् - भृगोरष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु । येषु येषु फलानि स्युर्भूयांसि किलतत्रतु ।।३४।। शुक्र का अष्टक वर्ग ग्रहों के साथ रखकर देखना चाहिये जहाँ जिस राशि में अधिक फल हो उस राशि पर जब शुक्र होते हैं तो जातक को।।३४।। भूमिं कलत्रं वित्तं च तद्देशे निर्दिशेन्नृणाम् । शुक्रजामित्रतो लब्धिर्दिशान्वितदिग्भवा ।।३५।। उस समय भूमि, स्त्री और धन का लाभ उस राशि के देश से प्राप्त होता है। शुक्र से सातवें स्थान की दशा अथवा सप्तमेश की दशा में स्त्री आदि का लाभ होता है।।३५।। भृगुदारेशयुक्तर्क्षफलसंख्या स्त्रियो विदुः । शुक्रान्मन्दे त्रिकोणस्थे नेष्टं जीवे सुखप्रदम् ।।३६।। शुक्र अथवा सप्तमेश के युत राशि के फल के तुल्य स्त्री की संख्या होती है। शुक्र से त्रिकोण में जब गुरु होता है तब स्त्री को सुख होता है। शेष पूर्ववत् देखना चाहिये।।३६।। अथ शनेरष्टकवर्गफलम् - शनैश्चरस्तिस्थस्थानादष्टमं मृतिरुच्यते । शनेरष्टकवर्गाच्च स्वस्यायुष्यं विनिर्दिशेत् ।।३७।। शनि से आठवां भाव मृत्यु का होता है और शनि के अष्टकवर्ग से आयु का विचार करना चाहिये।।३७।।
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६१ लग्नात्प्रभृति मंदान्तं फलान्येकत्र कारयेत् । लग्नादिफलयोगाब्दे व्याधिबैरं समादिशेत् ।। ३८ ।। शनि के अष्टकवर्ग में लग्न से शनि पर्यन्त फलों (रेखा) का योग करना चाहिये उस योग के समान वर्ष में जातक को व्याधि और बैर का भय होता है ।। ३८ ।। मन्दादिलग्नपर्यन्तं फलान्येकत्र संयुतम् । मंदादिफलतुल्याब्दे व्याधिं तस्य समादिशेत् ।। ३९ ।। इसी प्रकार शनि से लग्न पर्यन्त फलों को एकत्र जोड़कर जो हो तत्तुल्यवर्ष में भी व्याधि भय कहना ।। ३९ ।। तयोर्योगसमाब्दे तु मृत्युयोगं समादिशेत् । शोध्यादिगुणं कृत्वा पिंडं संस्थाप्ययत्नतः ।। ४० ।। और दोनों फलों के योग तुल्य वर्ष में मृत्यु होती है। शोधनादि करने से जो पिंड आवे ।। ४० ।। अष्टमस्थफलैर्हत्वा स्वप्तविंशति भाजितम् । शतादूर्ध्वं तु तत्पिंडं शतभेवाग्रतस्त्यजेत् ।। ४१ ।। उसे अष्टमभावस्थ फल से गुणा कर २७ से भाग देने से यदि पिंड सौ से अधिक हो तो १०० को ही रखना ।। ४१ ।। आयुः पिंडं तु जानीयात्प्राग्वद्धेलांतुकल्पयेत् । त्रिकोणैकाधिपत्यर्क्ष शोधनं विरचय्य चं ।। ४२ ।। और उसी से गुणाकर २७ से भाग देने से आयु पिंड होता है इस पर से पूर्ववत् मृत्यु काल का निश्चय करना एकाधिपत्य शोधन से जो पिंड हो ।। ४२ ।। पिंडं संस्थाप्य गुणयेल्लग्नादष्टमगैः फलैः । सप्तविंशतिहृच्छेषं मृत्युकालं वदेद्बुधः ।। ४३ ।। उसे अष्टमस्थ फल से गुणाकर २७ का भाग देने से जो शेष हो उस नक्षत्र पर शनि के जाने से या उससे त्रिकोण के नक्षत्र पर जाने से मृत्यु होती है ।। ४३ ।।
·६६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । विशेषः- मार्त्तण्डपुत्राष्टकवर्गमध्ये यद्यद्गृहे शून्यफलं भवेच्च। तत्तद्द्रमध्ये रविजेऽथ सूर्ये तदा शरीरामयपीडनंस्यात्।।४४।। शनि के अष्टकवर्ग में जिन-जिन राशियों में शून्य फल हो उन-उन राशियों में जब शनि या सूर्य जाते हैं तब-तब शरीर में रोग और कष्ट होता है।।४४।। अवस्थात्रयविचारः- मीनाद्यं मिथुनांतकं प्रथमकं प्रोक्तं वयः प्राक्तनैः । कर्काद्यं वणिजांतकं तरुणता संज्ञं च मध्यंवुधैः।।४५।। मीन राशि से मिथुन राशि पर्यन्त प्रथम अवस्था पूर्वाचार्यों ने कल्पना की है। कर्क से तुला पर्यन्त युवा अवस्था।।४५।। कुभांतं स्थविराह्वयं च बहुभिर्यत्तत्फलैः संयुतम् । तत्सौख्यार्थविशेषकं बलयुतेहित्वाव्ययाष्टकम् ।।४६।। और वृश्चिक से कुभं पर्यन्त वृद्धा अवस्था की कल्पना की है उक्त अवस्था के भावों के (सर्वाष्टक वर्ग) रेखाओं का योग करना जिस अवस्था में अधिक रेखा हो उस अवस्था में जातक को विशेष सुख होता है। किन्तु इसमें ८ वें और १२ वें भाव की रेखाओं का योग नहीं करना चाहिये।।४६।। इत्यष्टकवर्गफलम्। अथसर्वाष्टकवर्गफलम् – मेषादिभानां सकलाष्टवर्ग उत्पन्नरेखागणमेवकुर्यात् । धृत्यादि तत्त्वांतमितं कनिष्ठं त्रिंशावसानं किल मध्यवीर्याः ।।४७।। सर्वाष्टकवर्ग में मेषादि राशियों की रेखाओं का योग करना, रेखाओं का योग १८ से २५ तक हो तो कनिष्ठ फल, इसके बाद ३० तक हो तो मध्यम फल।।४७।। त्रिंशाधिकं तूत्तमवीर्यदाः स्युः शरीरसौख्यार्थयशोविशेषः ।
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६३ स्वस्वाष्टवर्गे यदि वेदहीनाः क्लेशाय सौख्यायच वेदपुष्टाः ॥४८॥ इससे अधिक हो तो उत्तम बल होता है इसमें शरीर का सुख, धन और यश का लाभ होता है। अपने-अपने अष्टक वर्ग में ४ से अल्प रेखा हो तो कष्टकारक और ४ से अधिक हो तो सुखकारक होता है।।४८।। मध्यात्फलाधिके लाभो मध्यात्क्षीणफलेव्ययः । यस्य रेखाधिकं लग्नं भोगवानर्थवान् भवेत् ॥४९॥ दशम भाव की रेखा से लाभ भाव की रेखा अधिक हो और इससे अधिक लग्न की रेखा हो तो जातक के भोगसम्पत्ति की हानि होती है। यदि दशम भाव के फल से लाभभाव की रेखायें अधिक हों और दशम भाव की रेखा से व्यय भाव की रेखा अल्प हो और लग्न की रेखायें अधिक हो तो वह जातक भोगवान् और धनी होता है।।४९।। प्रादक्षिण्यादिभानां सकलफलयुतिं दिक्चतुष्कक्रमेण कृत्वात्तद्भागतो यः समदधिकफलतः शोभनं हानिमल्पात्। सौम्यां स्वोच्चस्वगेहोदितखचरयुते दिग्विभागे स्वकार्ये वित्तेशाशासु वित्तं मृतिपतिगतदिग्भागगे देहनाशः।।५०।। लग्नादि द्वादश भावों की तीन-तीन राशियां पूर्व से दक्षिण क्रम से (सव्य गणना से) पूर्वादि दिशा कल्पना करना अर्थात् लग्न व्यय, लाभ भाव को पूर्व दिशा में, दशम, नवम, अष्टम भाव को दक्षिण दिशा में, सप्तम, षष्ठ, पंचम भाव को पश्चिम दिशा में और चतुर्थ, तृतीय, द्वितीय भाव को उत्तर दिशा में कल्पना करके प्रत्येक दिशा के भावों के संपूर्ण फलों का योग करके विचार करना जिन-जिन दिशाओं में अल्पफल हो उन-उन दिशाओं में हानि होती है।।५०।। अथ भावफलम्। भावं विलोक्य सदसत्फलदायकंयत्तद्राशि संभवफलैश्च तदुक्तपिंडम् । पिंडे रेखा ताडिते भावशेषे राशौ तस्मिन्याति सौरिः समायाम् ॥५१॥
६६४ | बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । शुभ-अशुभ फल देने वाले भाव के फल को पूर्वोक्त लग्नपिंड से गुणाकर २७ का भाग देने से शेष राशि में जब शनि जाता है।।५१।। यस्यां तद्भावहानिं च विद्यात्राहूर्वशेऽथवा तत्रिकोणे । कृत्वा विन्दुभ्यस्तु कालं सुधीमांस्तस्माद्वाच्यः प्राप्तिकालः शुभत्वे ।।५२।। तब उस भाव जनित फल की हानि होती है। लग्नपिंड को भावफल से गुणाकर उसमें १२ का भाग देने से शेष राशि में जिस वर्ष शनि जाता है अथवा उसके त्रिकोण राशि में जब शनि जाता है तब उस भाव की हानि होती है।।५२।। अथ समुदायाष्टकवर्गफलम् – सर्वकर्मफलोपेते ह्यष्टवर्ग उच्यते । अन्यथा फलविज्ञानं दुर्गमं गुणदोषजम् ।।५३।। सभी कर्मों के फल के उपयुक्त अष्टकवर्ग होता है, अन्यथा फल विज्ञान दुर्गम और दोषपूर्ण होता है।।५३।। त्रिंशाधिकफलाये स्युः राशयस्ते शुभप्रदाः । त्रिंशांतं पंचविंशादि राशयो मध्यमाः स्मृताः ।।५४।। जो राशि ३० से अधिक फल वाली हैं वह शुभफलद होती है, २५ से ३० तक फलवाली मध्यम फल वाली होती है।।५४।। अतिक्षीणफला ये च राशयः कष्टदुःखदाः । श्रेष्ठराशिषु सर्वेषु शुभकार्याणि कारयेत् ।।५५।। और अत्यन्त क्षीण फल वाली जो राशि होती है वह कष्ट और दुःख देने वाली होती है। जो श्रेष्ठ फल देने वाली राशियाँ हैं उन सभी में शुभकर्मों को करना चाहिये।।५५।। श्रेष्ठात्राशीन्मुहूर्तेषु योजयेन्मतिमान्नरः । तत्तज्जन्मप्रभावास्तु पुंसस्तैः सार्धमाचरेत् ।।५६।।
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६५ और श्रेष्ठ राशियों को मुहूर्तों में योजित करना चाहिये।।५६।। लग्ने यावत्फलं चास्ति तद्दशायां फलं वदेत् । मूर्त्यादिव्ययपर्यन्तं दृष्ट्वा भवफलानि वै ।।५७।। लग्न में जो फल होता है वही दशा का फल होता है, लग्न से व्यय पर्यन्त प्रत्येक भाव के फल को देखे।।५७।। अधिके शोभनं विद्यात्क्षीणे हीने च मृत्यवे । मध्यमे मध्यमं चैव विचार्यैवं फलं वदेत् ।।५८।। जिस भाव का फल अधिक हो वह शुभफलदायक, न्यून अथवा शून्य फल वाले भाव कष्टकारक होते हैं और मध्यम फलवाले मध्यम होते हैं यह विचार कर फल को कहे।।५८।। मेषादियद्गृहगता वसुसंख्ययातास्तद्भाव- पुष्टिवलवृद्धिकरा भवंति । षट्पंचसप्तसहितानि शुभप्रदानि त्रिव्येक- कर्णयुतभानि न शोभनानि ।।५९।। मेषादि जिस राशि में ८ रेखा हो उस राशि के भाव का फल शुभ और वृद्धि कारक होता है। ६।५।७ रेखा से युक्त हो तो शुभप्रद होता है और ३, २, १ रेखा वाले शुभद नहीं होते हैं।।५९।। मिश्रंफलंभवतिसागरकर्णयोगे रोगापवादभयदा यदि शून्यभावाः । एकादिकर्णयुतभानुमुखग्रहाणां भिन्नाष्टवर्गजनि सर्वफलं प्रवच्मि ।।६०।। और ४ रेखा से युक्त भाव मिश्रित फल को देने वाला होता है और शून्य रेखा वाला भाव रोग कलंक और भय देने वाला होता है, यह एकादि रेखा का सूर्यादि ग्रहों का फल भिन्नाष्टक वर्ग से कहा जाता है।।६०।। रेखाशान्तिफलम् - रेखाभिः सप्तभिर्युक्ते मासे मृत्युर्भवेन्नृणाम् । सुवर्ण विंशति पलं दद्याद्वौ तिलपर्वतौ ।।६१।।
६६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । समुदायाष्टक वर्ग में जिस राशि में ७ रेखा हो उस राशि के सूर्य के मांस में मृत्युभय होता है। इसकी शान्ति के लिये २० पल सुवर्ण और दो तिल का पर्वत दान करना चाहिये॥६१॥ वसुभिर्जातिहीनः स शीघ्रं मृत्युवशो नरः । असतफल विनाशाय दद्यात्कर्पूरजां तुलाम् ॥६२॥ जिस राशि में ८ रेखा हो उस मास में जातिभ्रष्टता और मृत्युभय होता है अशुभफल के नाशार्थ कंपूर का तुलादान करना चाहिये॥६२॥ रेखाभिः नवभिः सर्पान्म्रियते मनुजो ध्रुवम् । अश्वैश्चतुभिः संयुक्तं रथं दद्यात्शुभाप्तये ॥६३॥ जिस राशि में ९ रेखा हो उस मास में सर्प से मृत्यु का भय होता है। इसकी शान्ति के लिये चार घोड़ों के रथ का दान करना चाहिये॥६३॥ रेखाभिर्दशभिः शस्त्रात्राणास्त्यजति मानवः । दद्याच्छुभफलावाप्त्यै कवचं वज्र संयुक्तम् ॥६४॥ जिस राशि में १० रेखा हो उस मास में हथियार की चोट से मृत्यु की संभावना होती है। वज्र सहित कवच का दान करना चाहिये॥६४॥ रुद्रैः प्राप्याभिशापं च प्राणैर्मुक्तोभवेन्नरः । दिक्पलैः स्वर्णघटितां प्रदद्यात्प्रतिमां विधोः ॥६५॥ जिस राशि में ११ रेखा हो किसी के शाप के कारण मृत्युभय होता है अतः शान्त्यर्थ १० भरी सुवर्ण की चन्द्रमा की मूर्त्तिदान करना चाहिये॥६५॥ आदित्यैर्जलदोषेण मानवस्य मृतिंवदेत् । भूमिं दद्यात् ब्राह्मणाय तस्माच्छुभफलंभवेत् ॥६६॥ जिस राशि में १८ रेखा हो उस मास में जलदोष से मृत्यु की संभावना होती है अतः शान्त्यर्थ ब्राह्मण को भूमि का दान करे॥६६॥ त्रयोदशमितैर्व्याघ्रान्मानवो मृत्युमाप्नुयात् । विष्णोर्हिरण्यगर्भस्य दानं कुर्याच्छुभाप्तये ॥६७॥ जिस राशि में १३ रेखा हो उस मास में व्याघ्र से मृत्यु का भय होता है अतः शान्त्यर्थ हिरण्यगर्भ (शालिग्राम) विष्णुमूर्त्ति का दान करने से शुभफल होता है॥६७॥
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६७ अचिराज्जीवितं जहाच्छक्रैः कालेनभ क्षितः । वाराहप्रतिमां दद्यात्कनकेन विनिर्मिताम् ।।६८।। १४ रेखा हो तो थोड़े काल में अल्पायु होने का भय होता है अतः शान्त्यर्थ सुवर्ण की वराह की मूर्त्ति दान करना चाहिये।।६८।। राज्ञोभयं तिथिमितैस्तत्रहस्ती प्रदीयते । रिष्टभूपैः कल्पतरोः प्रतिमां च निवेदयेत् ।।६९।। १५ रेखा हो तो राजभय होता है अतः उसकी शान्ति के लिये हाथी का दान करना चाहिये। १६ रेखा हो तो अरिष्ट का भय होता है अतः शान्त्यर्थ कल्पतरु वृक्ष की प्रतिमा का दान करे।।६९।। ऋषिचन्द्रैर्व्याधिभयं गुड़धेतुं निवेदयेत् । कलहोऽष्टेंदुभिर्दद्याद्रत्नगोभूहिरण्यकम् ।।७०।। १७ रेखा हो तो व्याधि का भय होता है अतः शान्त्यर्थ गुड धेनु का दान करना चाहिये १८ रेखा हों तो भय होता है अतः शान्ति के लिये रत्न, गौ और भूमि का दान करना चाहिये।।७०।। देशत्यागोऽकंचन्द्रौ स्याच्छान्तिं कुर्याद्विधानतः । विंशत्या बुद्धिनाशः स्यात्कुर्याल्लक्षमितंजपम् ।।७१।। १९ रेखा हो तो देश निकाला होता है अतः शान्त्यर्थ विधानपूर्वक ग्रह शान्ति कराना चाहिये। २० रेखा हो तो बुद्धि की हानि होती है अतः शान्त्यर्थ वागीश्वरी देवी के मंत्र का एक लाख जप कराना चाहिये।।७१।। भूमिपक्षैः रोगपीडा दद्याद्धान्यस्य पर्वतम् । यमाश्विभिर्वन्धुपीडादद्यादादर्शकं बुधः ।।७२।। २१ रेखा हो तो रोग से पीड़ा होती है अतः शान्त्यर्थ धान्य का पर्वत दान देना. चाहिये।।७२।। रामपक्षयुते मासे नानाक्लेशान्प्रपद्यते । सौवर्णी प्रतिमां दद्याद्रवेः सप्तपलैः क्रमात् ।।७३।। २३ रेखा हो तो उस मास में अनेक कष्टों से युक्त होता है इसकी शान्ति के लिये ७ पल की सूर्य की प्रतिमा का दान करें।।७३।।
६६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वेदाश्विभिर्बंधुहीनो दद्याद्गोदानकं दश । सर्वरोगादि नाशार्थं जपहोमादि कारयेत् ॥७४॥ २४ रेखा हो तो बंधु हीनता का भय होता है इसकी शान्ति के लिये दश गोदान करे २५ रेखा हो तो सभी रोग आदि के नाशार्थ जप होम करावै ।।७४।। ऋतुपक्षैर्बुद्धिहीनः पूज्या वागीश्वरी तथा । धनक्षयः स्यान्नक्षत्रैः श्रीसूक्तं तत्र संजपेत् ।।७५।। २६ रेखा हो तो बुद्धि हीनता होती है इसकी शान्ति के लिये बागीश्वरी देवी का पूजन करना चाहिये। २७ रेखा हो तो धन की हानि होती है इसकी शान्ति के लिये श्रीसूक्त का जप करावै ।।७५।। वसुपक्षयुते मासे न लाभो हानिखेचरैः । सूर्यहोमश्च कर्त्तव्यः विधिना शुभकांक्षिभिः ।।७६।। २८ रेखा हो तो ग्रहों द्वारा हानि होती है। सूर्य के मंत्र से हवन कराना चाहिये ।।७६।। एकोनत्रिशता चापि चिंता व्याकुलितो भवेत् । घृतवस्त्रसुवर्णानि तत्र दद्याद्विचक्षणः ।।७७।। २९ रेखा हो तो चिंता से व्याकुलता होती है इसकी शान्ति के लिये घी वस्त्र सुवर्ण का दान करना चाहिये।।७७।। त्रिशता धनधान्याप्तिरिति जातकनिर्णयः । भूवह्निभिर्महोद्योगः पुत्रसंपद्गुणाग्निभिः ।।७८।। ३० रेखा हो तो धन धान्य का लाभ होता है। ३१ रेखा हो तो बड़े उद्योग का आरम्भ और ३३ रेखा में पुत्र संपत्ति का लाभ।।७८।। सहेमवस्त्रलाभश्च चतुस्त्रिंशत्समन्विते । पंचरामैर्भवेद्धीमान्षट्त्रिंशत्सुतवित्तदा ।।७९।। और ३४ रेखा में सुवर्ण वस्त्र का लाभ रेखा में बुद्धि की प्राचुर्यता, ३६ रेखामें पुत्र और धन का लाभ होता है।।७९।। सप्तत्रिंशद्धनस्याप्तिरष्टत्रिंशत्सुखार्थदा । द्रव्यरत्नाप्तिरेकोनचत्वारिंशद्भिर्प्रवर्धते ।।८०।।
षष्ठोऽध्यायः । ६६९ ३७ रेखा में धन का लाभ और ३८ रेखा में सुख और धन का लाभ होता है। ३९ रेखा में द्रव्य और रत्न का लाभ।।८०।। धनवान्कीर्त्तिमांश्चैव चत्वारिंशतिवर्धते । अतऊर्ध्वं यशोऽर्थाप्तिः पुण्यश्रीरूपचीयते ।।८१।। और ४० रेखा में धन और कीर्त्ति की वृद्धि होती है। इससे अधिक रेखा में यश धन, पुण्य आदि की वृद्धि होती है।।८१।। इतिपाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽष्टकवर्गप्रकरणम्। इति पाराशर होरायामुत्तरर्धेलोकयात्रा वर्णनंनाम पंचमोध्यायः।।५।। षष्ठोऽध्यायः । भाग्योत्कर्षं भाग्यहानिं कुटुम्बं दुःखं हानिं शत्रुमायं व्ययंच । उद्वाहं स्त्रीपुत्रलाभादिकं च ब्रूयादेवं चाब्दचर्या क्रमेण ।।१।। भाग्यवृद्धि भाग्यहानि, पोषणीय समूह, कष्ट, हानि, शत्रु, आय, व्यय, विवाह, स्त्री, पुत्र, लाभादिक का फल कहते हैं।।१।। अब्दमासदिनचर्याविधानं वक्ष्यते खलु मया सुमते ते । वक्ष्यमाणविधिना परमायुः सम्यगत्र विदधीत महात्मन् ।।२।। हे मैत्रेय! तुम्हें मैं वर्षचर्या, मासचर्या, दिनचर्या का विधान निश्चय कर कहता हूँ। इसके जानने के लिये सम्यक् रीति से आयु का ज्ञान आवश्यक है।।२।। भावानां फल समयः। भावानां साधनं हत्वा दृष्टिभिश्च वलेन च । षड्वर्गादिपतीनां च भावे पृथक्-पृथक् ।।३।। भावों को अपनी-अपनी दृष्टि और भाव बल से गुणा कर गुणनफल में।।३।। तेषां च दृग्वलानां च संहत्या भाजयेदथ । स्वामिदृष्टिस्थितानां तु काले भावफलं विदुः ।।४।। उन उन भावों के स्वामियों के षड्बल, दृष्टि के योग से भाग देने से लब्ध वर्षादिक में भावों के फल होते हैं।।४।।
६७० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । ज्ञानसंभवकालस्तु जन्मकालाद्वला यदा । लग्नादिव्ययपर्यन्ता भावाः काले तथा विदुः ॥५॥ जो भाव अपने स्वामी से दृष्ट हो और स्वामी बली हो तो उसके दशा में फल होता है। यदि अपने स्वामी से न देखा जाता हो तो उक्त समय में लग्न से व्ययपर्यन्त भावों में जो अधिक बली हो उसके स्वामी के दशा में उक्तभाव का फल होता है।।५।। अथ शुभपापभेदाद्भावफले विशेषः- लग्नाषड्वर्गहोराणां भोक्तारः पतयः स्मृताः । त्रिपंचवेददिक्सप्तमुनिरामांशके फलम् ॥६॥ लग्न में जो षड्वर्ग कहा गया है उसके (अर्थात् ६ वर्गों के स्वामी) पृथक्- पृथक् अपनी-अपनी दशा में फल को देते हैं।।६। शुभग्रहास्तुद्रष्टारः स्थानदाःसकलाग्रहाः । युक्ताः तदातु सद्भावाः संज्ञानुफलदास्तदा ।।७।। किन्तु क्रम से ३।५।३।१०।७।७ ३ अंशों में फल को देते हैं। देखने वाले शुभग्रहों का ही शुभ फल होता है पापग्रहों का नहीं होता है। रेखा में दोनों का शुभाशुभ फल होता है।।७।। पापात् हानिकरान् हित्वा स्वोच्चकोणसुहृत्स्थितान्। तद्राशिर्यस्य शत्रुंर्वा नीचयोर्वा ग्रहो यदि ।।८।। हानिं कुर्यात्तदातस्य दृष्टियोगानुपातः । भावों में जो ग्रह पाप या शुभ अपने उच्च नीच मूलत्रिकोण आदि में शत्रु मित्रादि की राशि में हों उसी क्रम से वह फल देते हैं।।८।। अथ कारक विचारः- उद्वाहकारकौ चन्द्रशुकौ ज्ञोवातपोऽथवा ।।९।। चन्द्रमा और शुक्र विवाह कारक होते हैं अथवा बुध और गुरु भी विवाह कारक होते हैं।।९।। शनिर्मृतिकरो भौमरवी नीचासतीपती । गुरुः शुभकरः पुत्रे कुजो भ्रातरि शत्रुमे ।।१०।।