बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६४१ आत्रिंशत्परतः श्रीमान्सर्वसत्वसमन्वितः । राजप्रियश्च चंडश्च जनैश्च बहुभिर्युतः ।।३१।। इसके बाद ३० रश्मि तक मनुष्य श्रीमान् सभी सत्वों से युक्त, राजप्रिय, प्रचंड और अनेक जनों से युक्त होता है।।३१।। एकत्रिंशत्शुस्त्रिंशत्यावद्रश्मिफलम् - एकत्रिंशे तु सचिवः द्वात्रिंशे वाहिनीपतिः । अत ऊर्ध्वं तु सामंत श्रातुःत्रिंशत्कपरावधिः ।।३२।। रश्मियोग ३१ हो तो राजमंत्री होता है, ३२ में सेनापति इसके बाद ३४ तक रश्मियोग में मांडलिक राजा होता है।।३२।। पंचत्रिशद्रश्मिफलम् - अत ऊर्ध्वं नृपे श्रांतः आपंचत्रिंशतः क्रमात् । शतपंचकमारम्य सहस्रावधिपोषकः ।।३३।। ३५ रश्मियोग हो तो मनुष्य राज्याधिकार के क्रम से परिश्रम करने से ५०० से १००० तक जनों का भरण पोषण करनेवाला होता है।।३३।। अत ऊर्ध्वं तु देशानां पोषकाः स्युः पंचविंशतिः । षडविंशतिश्च भानि स्युस्त्रिंशत् षड्त्रिंशदेव च ।।३४।। इसके बाद ३६ रश्मियोग में २५ ग्रामों का, ३७ रश्मियोग में २६ ग्रामों का, ३८ रश्मियोग में २७ ग्रामों का, ३९ रश्मियोग में ३० ग्रामों का और ४० रश्मियोग में ३६ ग्रामों का पालक होता है।।३४।। अत ऊर्ध्वं नृपाः क्षात्रधर्मिणः क्षत्रियोऽथवा । भूद्वित्र्यब्धीसुषट्सप्तभूभृज्जनपदाधिपाः ।।३५।। इसके बाद ४० रश्मियोग हो तो क्षत्रिय जातीय बालक राजा होता है। अन्य जातीय मनुष्य क्षत्रिय धर्म को पालन करता हुआ ४० से ४७ रश्मियोग में क्रम से १, २, ३, ४, ५, ६, ७ ग्रामों के राजाओं का शासक होता है।।३५।। पंचाशद्रश्मि संयोगे सम्राट् स्यादनुपातातः । अत ऊर्ध्वं तु देवेन्द्रतुल्यः स्युरिति पद्मभूः ।।३६।। इसके बाद ५० रश्मि योग में पुरुष सम्राट् होता है, इससे न्यून होने पर
६४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अनुपात द्वारा सम्राट् योग में न्यूनता समझना चाहिये। ५० से अधिक हो तो इन्द्र के समान होता है ऐसा ब्रह्माजी ने कहा है।।३६।। रश्मौ विशेषफलम् - उच्चचेष्टोत्थयोगार्धगुणिताः षष्ठिभाजिताः । नरादीनां तु संख्याः स्युः स्पष्टा इत्याहपद्मभूः ।।३७।। उच्च रश्मि चेष्टा रश्मि का योग करके उसके आधे को पूर्व योग से गुण कर ६० से भाग देने से जो लब्धि हो उस संख्या के तुल्य मनुष्य घोड़ा, हाथी आदि सेवक होते हैं।।३७।। राजयोगेविशेषः- शूद्रादयः कलौ राजधर्मिणो म्लेक्षधर्मिणः । विप्राश्चेच्छ्रीधनैर्युक्ता यज्ञकर्मक्रियारताः ।।३८।। जो राजयोग कहे हैं वे कलियुग में शूद्रादि म्लेक्ष धर्मवालों को होता है। यदि यह राजयोग और उत्तम रश्मि योग ब्राह्मण को हो तो वह यज्ञादि कर्मनिष्ठ होता है और उसी पुण्य से स्वर्ग के राज्य को भोगनेवाला होता है।।३८।। विशेषः- योगरश्मिसमायोगे तदानीं तत्फलं विदुः । नाभासादिषु योगेषु राजयोगे स्थितं तु तत् ।।३९।। केवल राजयोग मात्र से ही राज्य की प्राप्ति नहीं होती है किन्तु रश्मियोग राज्य फलदायक हो तो राजयोग का फल होता है और नाभासादि योग में भी रश्मियोग होने से उनका फल होता है।।३९।। योगानां फल-व्यवस्था- योगकर्त्तारमारभ्य बलिनं च विनिर्णयेत् । पूर्वभागे समुद्दिष्टभाग्यकर्मफलानि तु ।।४०।। प्रथम भाग में भाग्यादि का जो फल कहा गया है उसका शुभाशुभ फल रश्मि के अनुपात द्वारा निर्णय करना चाहिये।।४०।। अनुपातेन विज्ञाय योजयेद्वर्जयेद्बुधः । स्थानवीर्याधिके देशे मुख्यः स्यादनुपाततः ।।४१।। स्थानबल, दिग्बल, चेष्टाबल, कालबल, अयनबल, उच्चबल, नैसर्गिकबल
अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४३ इनमें जो अधिक वल हो उससे उच्च रश्मि का फल कहते हैं। स्थान वल अधिक हो तो देश में मुख्य हो।।४१।। दिग्बले विजयश्रेष्टा वीर्ये तु प्रभुता भवेत् । कालवीर्योऽधिके कार्ये सदोत्साही तथायने ।।४२।। दिग्बल अधिक हो तो विजयी हो, चेष्टावल अधिक हो तो प्रभुत्व हो, कालबल अधिक हो तो सभी कार्य में कुशल हो और अयनवल अधिक हो तो सभी समय आनंद में रहे।।४२।। स्ववंशोत्कर्षता स्वोच्चे नैसर्गे जातिनिर्णयः । राशीनां च ग्रहाणां च स्वभावाः कथितामया ।।४३।। उच्चबल अधिक हो तो अपने वंश में मुख्य हों, नैसर्गिक वल अधिक हो तो अपने जाति और कर्म का विशेष प्रतिपादन करनेवाला होता है। इस प्रकार से मेषादि राशियों का और ग्रहों का स्वभाव मैंने कहा।।४३।। ये चात्र योजनीयाश्च दैवज्ञेन सुबुद्धिना ।।४४।। जो मैंने कहा है उसे यथा अवसर विद्वान् बुद्धिमान् दैवज्ञ जहां जैसा उचित हो उसकी योजना वहां वैसा करें।।४४।। इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे रश्मिफलाध्यायश्चतुर्थः।४ अथलोकयात्राप्रकरणम्। अष्टकवर्गरेखाणांफलम् - मूलस्थानाधिके स्थाने सभावः शुभ इष्यते । न्यूनेऽशुभः समे मातृपितृवंधूवदिष्यते ।।१।। जिस ग्रह का जिस भाव में जितनी रेखा कही गई है (अष्टकवर्गाध्याय श्लो. १९ आदि) यदि उस भाव में उससे अधिक रेखा हो तो उस भाव का फल शुभ, न्यून हो तो अशुभ और सम हो तो सम फल होता है।।१।। स्ववेश्मधर्मकर्मायलग्नैश्शुभं पतिं वदेत् । मृतिव्ययारिभिस्तेषां व्ययं हानिं पृथग्वदेत् ।।२।। २।४।९।१०।११ और लग्न ये ६ भाव अपने स्वभाव के अनुसार उत्तम फल देते हैं और ८।१२ ये दो भाव खर्च तथा हानि करने वाले होते हैं।।२।।
६४४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पूर्वभागोक्तानांराजयोगादीनां व्यवस्था- ये योगापूर्वभागे तु द्विग्रहाद्या नभादयः । राजयोगादयः सर्वे यथान्यायं प्रयोजयेत् ।।३।। पूर्व खंड में जो नाभस आदि राजयोग कहे गये हैं उनका रश्मि और अष्टक वर्ग के बलाबल के अनुसार फल कहना चाहिये।।३।। भरणीयं कुटुम्बस्य द्वितीयेन शुभाशुभे । अन्येषां चैव भावानां स्वनाम सदृशं फलम् ।।४।। दूसरे भाव से रेखा और शून्य के न्यूनाधिक के अनुसार अशुभ और शुभ फल देखकर कुटुम्ब पोषण का फल कहना चाहिये। अन्य भावों का उनके नाम के सदृश फल कहे।।४।। सूर्येणवेश्मस्थानेन पितुर्मृतिपदं वदेत् । चन्द्रेणपंचमेनैव मातुर्मृतिपदं वदेत् ।।५।। सूर्य और चतुर्थ स्थान से पिता की मृत्यु के समय का विचार करे और चन्द्रमा और पाँचवें भाव से माता के मृत्यु की समय का विचार करना चाहिये।।५।। मृत्युसमयज्ञानम् - सूर्ये चन्द्रे सपापे च तयोश्च मरणं भवेत् । तयोरंतरलिप्ताश्च शतद्वयविभाजिताः ।।६।। सूर्य चन्द्र चतुर्थ और पंचम भाव पापग्रह से युत हों तो दोनों की मृत्यु होती है। सूर्यादि और पापग्रहों का यथाक्रम से अंतर करके शेष की कला बनाकर उसमें २०० का भाग देना।।६।। अब्दादयोऽशुभस्यापि दृष्ट्या संगुणयेत्ततः । षष्ठ्या विभज्याब्दाद्याश्च तस्मात्पापेवलोत्तरे ।।७।। फल वर्षादिक होता है यदि समबल हों तो न्यूनाधिक्य में यदि सूर्य चन्द्र से पापग्रह बली हो तो उस फल को पापग्रह की दृष्टि से गुणाकर ६० से भाग देकर वर्षादि फल लाना।।७।। तदामृतिर्भवेन्यूने तद्बलेनैव वर्धयेत् । तदा मृत्युस्तयोर्मृत्युस्थाने पापग्रहे सति ।।८।। पापग्रह अल्पबली हो तो सूर्य और चन्द्रबल से पूर्वोक्त वर्षादि को गुणा कर ६० से भाग देकर लब्ध वर्षादि से फल कहना चाहिये और अष्टम भाव में पापग्रह हो तो माता पिता को अरिष्ट कहना।।८।।
अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४५ त्रिकोणशोधन- अष्टकवर्ग शोधन की दो विधियाँ हैं। १. त्रिकोणशोधन, २. एकाधिपत्य शोधन। प्रथम त्रिकोण शोधन क्या है? सम्पूर्ण राशि चक्र में ४ त्रिकोण हैं। त्रिकोण से तात्पर्य प्रथम, पंचम और नवम राशि से है अतः प्रत्येक त्रिकोण की प्रथम राशि क्रमशः मेष, वृष, मिथुन और कर्क है। इसका प्रयोजन अष्टकवर्गाध्याय के श्लोक सं. ७५ में कहा हुआ है। अथ पिंडोत्पत्तिः- शोध्यावशेषं संस्थाप्य राशिमानेन वर्द्धयेत् । ग्रहयुक्तेऽपि तद्राशौ ग्रहमानेन वर्द्धयेत् ।।९।। एकाधिपत्य शोधन करने से जो अंक जिस राशि के नीचे हों उन्हें उन-उन राशि के गुणकांकों से गुणा कर उसके नीचे रख दे इसके बाद उनका योग करने से राशि पिंड होता है। इसी प्रकार जिस राशि में जो ग्रह हो उस ग्रह के गुणकांक से एकाधिपत्य शोधन से शेष अंक को गुणा कर रख दे और सबका योग करने से ग्रहपिंड होता है। उदाहरण चक्रों में है। राशिगुणकांक- गोसिंहौ दशगुणितौ वसुभिर्मिथुनालिगौ । वणिग्मेषौ तु मुनिभिः कन्यकामकरौ शरैः शेषाः स्वमानगुणिता राशिमाना इभेक्रमात् ।।१०।। ग्रहगुणकांक- जीवारशुक्रसौम्यानां दशवसुमुनीन्द्रियैः । बुधस्य संख्या शेषाणां ग्रहंगुणयेत्पृथक् ।।११।। त्रिषुद्वयोर्वा यन्न्यूनमितरत्रसमं भवेत् । एकस्मिन् भवने शून्ये तत्रिकोणं न शोधयेत् ।।१२।। समत्वे सर्वगेहेषु सर्वं शोधयेद्बुधः । त्रिकोण के तीन राशियों में से जिस राशि की रेखा संख्या अल्प हो उसे त्रिकोण की अन्य दो राशि की संख्या में से घटाकर शेष को उसी राशि के नीचे रखे अल्प रेखा संख्या के स्थान में शून्य रखना चाहिये। यदि त्रिकोण की तीनों राशियों में से किसी एक राशि में शून्य हो तो अन्य दो राशियों के नीचे वैसी रेखा स्थापित कर दें अर्थात् उनका त्रिकोण शोधन न करे।।१२।।
६४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । यदि त्रिकोण के तीनों राशियों की रेखायें तुल्य हों तो सभी का संशोधन करे अर्थात् तीनों के नीचे शून्य रखे। एकाधिपत्यशोधन- क्षीणेन सह चान्यस्मिन् शोधयेत् ग्रहवर्जितः ।।९३।। ग्रहयुक्ते फले हीने ग्रहाभावे फलाधिके । अनेन सह चान्यस्मिन् शोधयेद् ग्रहवर्जिते ।।९४।। फलाधिके ग्रहैर्युक्ते चान्यस्मिन् सर्वमुत्सृजेत् । उभयोर्ग्रहसंयुक्ते न संशोध्यः कदाचन ।।९५।। उभयोर्ग्रहहीनाभ्यां समत्वे सकलं त्यजेत् । सग्रहा ग्रहतुल्यत्वात्सर्वं संशोध्यमग्रहात् ।।९६।। एकत्र नास्ति चेत्सर्वहानिरन्यत्र कीर्त्तिताः । कुलीरसिंहयो राश्योः पृथक् क्षेत्रं पृथक् फलम् ।।९७।। १—भौमादि पंचग्रहों की दो दो राशियाँ होती हैं अतः इन्हीं का एकाधिपत्य शोधन होता है जिसका नियम यह हैं— यदि दोनों राशियों में कोई ग्रह न हो तो अल्पसंख्या को अधिक संख्या में घटाकर शेष को अधिक संख्या के नीचे रख दे और अल्पसंख्या को ज्यों का त्यों रख देना चाहिये। २—यदि एक राशि में ग्रह हो और दूसरी राशि में ग्रह न हो और ग्रहहीन राशि के संख्या से ग्रहयुक्त राशि की संख्या अल्प हो तो ग्रहहीन राशि संख्या में से प्रहयुक्त राशि की संख्या को घटाकर शेष को ग्रहहीन राशि के नीचे रखना और ग्रहयुक्त राशि की संख्या वैसी ही रख देना। ३—यदि ग्रहयुक्त राशि की संख्या ग्रहहीन राशि के संख्या से अधिक हो तो ग्रहंयुक्त राशि की संख्या वैसी ही रहेगी और ग्रहहीन राशि के नीचे शून्य रखना चाहिये। ४—यदि दोनों राशि ग्रहयुक्त हों तो संशोधन नहीं करना चाहिये अर्थात् जैसे का तैसा ही रखना चाहिये। यदि दोनों राशियों में ग्रह न हो और संख्या भी तुल्य हो तो दोनों राशियों में शून्य रखना चाहिये। ५. यदि एक सग्रह हो और दूसरी राशि ग्रहहीन हो और संख्या भी समान हो तो ग्रहहीन राशि की संख्या के स्थान में शून्य और ग्रह युक्त राशि की संख्या
अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४७ वैसी ही रहेगी। ६- यदि दोनों ग्रहयुक्त या ग्रहहीन हों अथवा दोनों में एक ग्रहयुक्त और ग्रहहीन हो और त्रिकोणशोधन के बाद किसी एक में शून्य संख्या हो तो दोनों में शून्य ही रहेगा। ७- कर्क और सिंह राशि के स्वामी चंद्र और सूर्य के अलग-अलग होने के कारण इनका एकाधिपत्य शोधन नहीं करना चाहिये। विशेष- त्रिकोणशोधन के उपरान्त ही उपर्युक्त ७ विकल्पों से एकाधिपत्य शोधन करना चाहिये। शेष उदाहरण चक्र से स्पष्ट है। सूर्याष्टकवर्ग शोधन।
| ग्रह | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | : | शु. चं. | योग | योगापिंड | |||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशि | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ |
| रेखा | ३ | ४ | २ | ४ | ६ | ५ | ४ | ३ | ३ | ५ | ५ |
| त्रि.शो. | ० | ० | ० | १ | ३ | १ | २ | ० | ० | ० | ३ |
| एका.शो. | ० | ० | ० | १ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | २ |
| रा.गु. | ० | ० | ० | ७ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | १० |
| ग्रं.गु. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| चंद्राष्टकवर्गशोधन। | |||||||||||
| ग्रह | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | योगपिंड | ||||
| :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- |
| राशि | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ |
| रेखा | ५ | २ | ४ | ३ | ४ | ५ | ५ | २ | ४ | ७ | ५ |
| त्रि.शो. | १ | ० | ० | १ | ० | ३ | १ | ० | ० | ५ | १ |
| एका.शो. | १ | ० | ० | ० | ० | ३ | १ | ० | ० | ४ | ० |
| रा.गु. | ८ | २४ | |||||||||
| ग्र.गु. | १२ | १५ | |||||||||
६४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । भौमाष्टकवर्गशोधन ।
| ग्रह | मं. | चं.<br>शु. | सू. | बु.<br>बृ. | श. | योगपिंड | ||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशि | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | योग | |
| रेखा | २ | २ | ३ | ५ | ४ | २ | ३ | ३ | २ | ६ | ३ | ४ | ३९ | |
| त्रि.शो. | ० | ० | ० | २ | २ | ० | ० | ० | ० | ४ | ० | १ | ९ | |
| एका.शो. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | |
| रा.गु. | ० | राशिपिंड | ||||||||||||
| ग्र.गु. | ० | ग्र. पिंड |
बुधाष्टकवर्गशोधन ।
| ग्रह | बु.<br>बृ. | श. | मं. | चं.<br>श. | सू. | योगपिंड | ||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशि | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | योग | |
| रेखा | ५ | ५ | ३ | ५ | ४ | ५ | ४ | ४ | ४ | ४ | ६ | ५ | ५४ | |
| त्रि.शो. | १ | १ | ० | १ | ० | १ | १ | ० | ० | ० | ३ | १ | ९ | |
| एका.शो. | १ | ० | ० | ० | ० | ० | १ | ० | ० | ० | ३ | १ | ६ | |
| रा.गु. | १० | ११ | २४ | ४५ | राशिपिंड | |||||||||
| ग्र.गु. | १५ | ८ | ३६ | ५ | ६४ | ग्र.पिं.यो. | ||||||||
| १०९ |
गुर्वष्टकवर्गशोधन ।
| ग्रह | बु.<br>बृ. | श. | मं. | शु.<br>चं. | सू. | |||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशि | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | योग | |
| रेखा | ४ | ५ | ६ | ५ | ३ | ४ | ६ | ५ | ६ | ५ | ३ | ४ | ५६ | |
| त्रि.शो. | १ | १ | ३ | १ | ० | ० | ३ | १ | ३ | १ | ० | ० | १४ | |
| ए.शो. | १ | ० | २ | १ | ० | ० | ० | ० | २ | १ | ० | ० | ७ | |
| रा.गु. | १० | ० | ८ | १८ | राशिपिंड | |||||||||
| ग्र.गु. | १५ | ५ | २० | ग्र.पि. | ||||||||||
| ३८ |
अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४९ शुक्राष्टकवर्गशोधन। | ग्रह | शु. चं. | सू. | बु. बृ. | | | श. | | मं. | | | शु. चं. | | | | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | | राशि | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | योग | | | रेखा | ७ | ४ | ४ | ४ | ४ | १ | ३ | ६ | ५ | ४ | ६ | ४ | ५२ | | | त्रि.शो. | ३ | ३ | २ | ० | ० | ० | ० | २ | १ | ३ | ३ | ० | १७ | | | ए.शो. | ० | ३ | २ | ० | ० | ० | ० | १ | १ | ० | ० | ० | ७ | | | रा.गु. | १२ | २० | | | | | | | ११ | | | | ४३ | राशिपि. | | ग्र.गु. | १५ | ३० | | | | | | | ८ | | | | ५३ | ग्र.पिं. | | | | | | | | | | | | | | | | ९६ |
शनेरष्टकवर्गशोधन।
| ग्रह | श. | मं. | शु. चं. | सू. | बु. बृ. | ||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशि | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | |
| रेखा | ५ | २ | ५ | १ | ३ | ७ | ३ | ४ | ४ | २ | १ | २ | ३९ |
| त्रि.शो. | २ | ० | ४ | ० | ० | ५ | २ | ३ | १ | ० | ० | १ | १८ |
| ए.शो. | २ | ० | ० | ० | ० | ३ | १ | ० | १ | ० | ० | १ | ८ |
| रा.गु. | १६ | ४ | २० | ||||||||||
| ग्र.गु. | १० | ५ | १५ |
लग्नाष्टकवर्गशोधन।
| ग्रह | मं. | शु. चं. | सू. | बु. बृ. | श. | योग | पिंड | ||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशि | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | |
| रेखा | ४ | ४ | ३ | ६ | ३ | ५ | २ | ५ | ५ | ३ | ६ | ३ | ४९ |
| त्रि.शो. | १ | १ | १ | ३ | ० | २ | ० | २ | ३ | ० | ४ | ० | १७ |
| ए.शो. | ० | १ | ० | ० | ० | २ | ० | २ | १ | ० | ४ | ० | १० |
| रा.गु. | ० | ११ | १६ | १० | ३२ | ६९ | |||||||
| ग्र.गु. | ८ | २४ | ३० | २० | ९२ |
६५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । समुदायाष्टकवर्गचक्र।
| राशि | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | योग |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग्रह | शु.<br>चं. | सू. | बु.<br>बृ. | श. | मं. | ||||||||
| सू. | ५ | ५ | ४ | ३ | ४ | २ | ४ | ६ | ५ | ४ | ३ | ३ | ४८ |
| चं. | ५ | ३ | ५ | २ | ४ | ३ | ४ | ५ | ५ | २ | ४ | ७ | ४९ |
| मं. | ३ | ५ | ४ | २ | ३ | ३ | २ | ६ | ३ | ४ | २ | २ | ३९ |
| बु. | ४ | ४ | ६ | ५ | ५ | ५ | ३ | ५ | ४ | ५ | ४ | ४ | ५४ |
| बृ. | ६ | ५ | ३ | ४ | ४ | ५ | ६ | ५ | ३ | ४ | ६ | ५ | ५६ |
| शु. | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ | ४ | १ | ३ | ६ | ५ | ४ | ५२ |
| श. | ७ | ३ | ४ | ४ | २ | १ | २ | ५ | २ | ५ | १ | ३ | ३९ |
| ३६ | २९ | ३६ | २४ | ३६ | २३ | २५ | ३३ | २५ | ३० | २५ | २८ | ||
| नोट- सर्वाष्टक वर्ग में सभी अष्टवर्गों में मेषादि राशियों में कितनी-कितनी | |||||||||||||
| रेखायें प्राप्त हुई हैं और उनका योग क्या हुआ लिखना चाहिये। | |||||||||||||
| अष्टकवर्ग कुंडली |
+-------------------------------------------------------------------+
| (२५)११मं \ (३०)१० / (२५)९. |
| \ / |
| (२८)१२ \ / (२३)८श |
| \--------------------------------------/ |
| | | |
| | (२५)७ | |
| (३६)१ | | |
| | | |
| |------------------------------------| |
| / \ (२६)६ |
| .(१९)२ / \ |
| / (२४)सू.४ \ |
| शु(३६)३च / \ बु(२६)वृ५ |
+-------------------------------------------------------------------+
मातृपित्रोः मृत्युकालः। ग्रहयोगेन हानिः स्यात् वर्णाद्यं पृथक्ततः । संयोज्य सप्तभिर्हत्वा सप्तविंशति भाजिताः ॥१८४॥ एकाधिपत्य शोधन करने से राशियों के नीचे जो अंक आये हैं चाहे वे शून्य हों या रेखा हों उन्हें राशि के ध्रुवांकों से पृथक्-पृथक् गुण देना और जिस राशि में ग्रह हैं उनके अंकों को उन उन ग्रहों के ध्रुवांकों से गुणकर पृथक्-पृथक् रखकर, राशियों के गुणनफल का योग और ग्रहों के गुणनफल का योग कर दोनों को एक जगह जोड़कर सात ७ से गुणकर उसमें २७ से भाग देने से॥१८४॥
अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६५१ अब्दादयस्तदा देहनाशः करणदे सति । तस्मिन् पापग्रहे तस्माद्वलिन्येवं विधिःस्मृतः ॥१९॥ लब्धि माता पिता के आयुष्य का प्रमाण होता है। यदि पापग्रह बलवान् हो पूर्वविधि से ही मृत्युकाल जानना॥१९॥ बलहीने तु तं हन्यात्सप्तभिः पंचभिर्भजेत् । आयुस्तयोः स्यात्स्थानस्य प्रदिशेदशुभे सति ॥२०॥ यदि निर्बल हो तो योग को सात से गुणकर ५ से भाग देने से जो वर्षादि वही माता पिता के आयुष्य का प्रमाण होता है॥२०॥ मुनिभक्तं वसुघ्नं स्यान्नैवं चेन्नैतयोर्मृतिः । वक्ष्यमाणेन विधिना वदेदाह पराशरः ॥२१॥ यदि रेखाप्रद ग्रह वली हो तो पूर्व पिंड को आठ से गुणकर ७ से भाग देने ने लब्ध वर्षादिक दोनों का आयुष्य होता है। शून्य के आयुष्य से रेखा का आयुष्य अधिक हो तो मृत्यु नहीं होती है ऐसा पाराशर का मत है॥२१॥ चतुर्थभावात्सूर्याच्चआयुसाधनम् - सूर्यादायुः करौ भूपा मनवोऽर्का नवार्णवाः । वेदाक्षीणि तु लग्नस्य वक्ष्याम्यायस्तथैवतत् ॥२२॥ सूर्यादि ग्रहों के और लग्न का क्रम से आयुध्रुवांक २।१६।१४।१२।९।४।४।२ है॥२२॥ स्वोच्चे नीचे तु पातः स्याद्धरणादिविधिस्ततः। आयुस्तयोः स्यात्तौ तस्मिन् भवने तु तथा स्थितौ।।२३।। यदि उच्च में ग्रह हो तो ध्रुवांक की आयु ही स्पष्ट होती है और नीच में ग्रह हो तो अनुपात द्वारा आयु लाना चाहिये॥२३॥ ध्रुवांक द्वारा आयुर्विचारः- न कश्चित्स्थानदः स्याच्चेत्तत्काले च मृतिर्भवेत् । शुभमोगे शुभा प्रोक्ता तयोःस्याद्रश्मिसंभवः ॥२४॥ यदि वहां कोई रेखाप्रद ग्रह न हो तो उसी समय मृत्यु कहना चाहिये शुभग्रह
६५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्। के योग से उत्तम रीति से और पापग्रह अधिक हों तो दंड पातादि से मृत्यु कहना।। २४ ।। रश्मितः आयु साधनम् - अष्टभिर्गुणयेत्षड्भिर्विभज्यायुः परं भवेत् । वेश्मनि स्थानदा न स्युर्जन्मकाले स्फुटीकृताः ।।२५।। सूर्य और चतुर्थभाव के रश्मि संभव को ८ से गुणकर ६ से भाग लब्ध परम आयु होती है।।२५।। करणाद्यभावेकरणादिद्वारा भाव विचारः- कलीकृतश्च खनखैर्विभज्याब्दादयः क्रमात् । एवं शुभाशुभं ब्रूयान्मातापित्रोर्द्विजोत्तम ।। २६ ।। यदि चतुर्थभाव में रेखाप्रद ग्रह न हों तो चतुर्थ भाव का कला पिंड बनाकर उसमें २०० से भाग देने से वर्षादि आयु होती है इसंपर से माता पिता के शुभाशुभ फल को कहना।।२६।। करणस्थानदातारः पापपुण्य फलप्रदाः । पुनश्चोच्चादिषु तथा त्रिगुणाद्यास्तु पूर्ववत् ।। २७ ।। शून्य के देने वाले ग्रह पापफल देने वाले होते हैं और रेखा देने वाले ग्रह शुभफल देने वाले होते हैं। यदि ये अपने मूलत्रिकोणादि में हों तो पूर्ववत् त्रिगुणांदि फल देते हैं।।२७।। शत्रुनीचाधि शत्रूणां स्थानेष्वपि तु पूर्ववत् । राशिं हित्वा तु भावानां सर्वत्रैवं क्रिया भवेत् ।। २८ ।। जहां आयुष्य का विचार हो वहां राशि को छोड़कर अंशादि से जैसा संस्कार कहा हो वैसा करना, यह क्रिया सर्वत्र जानना।।२८।। भावानां संस्कार विशेषाद् फल विचारः- द्वितीयभावलिप्ताश्च राशिलिप्ताविभाजिताः । स्ववर्गणाहतास्तस्य खेटानां वर्गणाहताः ।।२९।। दूसरे भाव के अंशादि का कला करके उसमें दूसरे भाव की राशि के कला
अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६५३ से भाग देना लब्ध कलादि फल को द्वितीय भाव के ध्रुवांक से गुणाकर यदि उनमें ग्रह हो तो उसके ध्रुवांक से गुणकर।।२९।। भावरश्मिभिराहन्यात्सप्तभिश्च विभाजयेत् । मूलरश्मिसमूहेन शिष्टं हन्यात्तथैवतान् ।।३०।। उसे दूसरे भाव के स्वामी के रश्मि से गुणाकर सात से भाग देने से जो अंक प्राप्त हो वह भारणीय कुटुम्ब की संख्या और शेष को मूलरश्मि समूह से गुणकर।।३०।। इष्टानिष्टफलाभ्यां च हत्वांतरमथद्वयोः । सप्तविंशतिभिर्हत्वा सप्तभिश्च विभाजयेत् ।।३१।। गुणनफल में भाव स्वामी के इष्ट फल से गुणन करके एवं भाव स्वामी के कष्ट बलांकों से मूलरश्मि समूह को गुणन कर दोनों के अन्तर को २७ से गुण देने से कलादि फल को ७ से भाग देने से जो आवे वह स्त्रियों की संख्या होती है।।३१।। भरणीय कुटुम्बानां पुंस्त्रियस्तत्समाविदुः । राशीन् हित्वातु लग्नादि भावभागादिकान् ।।३२।। राशियों को छोड़कर लग्नादि भावों के अंशादि अलग-अलग अपने अपने स्वामियों के रश्मियों से गुणन करने से जो आवे उसे भावभागादि कहते हैं।।३२।। गुणयेद्रश्मिभिः स्वैश्च भावभागादयोविदुः । कलीकृत्य भलिप्ताभिर्विभज्याप्तं फलं ततः ।।३३।। इसका कलापिंड बनाकर दो जगह स्थापित करे उसमें राशि लिप्ता से भाग देने से जो फल प्राप्त हो उसे भावफल कहते हैं और दूसरे स्थान में १२ से भाग देने से जो फल हो उसे भाव साधन फल कहते हैं।।३३।। प्रकारांतर से भावफल साधन- सूर्यभक्तावशिष्टं तु भावानां साधनं विदुः । राशीन् हित्वा तंतो लिप्ताखनेत्रविभाजिताः ।।३४।। राशिको छोड़कर अंशादि की कला बनाकर उसमें २०० से भाग देना।।३४।।
६५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । साधनघ्ना विभक्ताश्च. वर्गणाभिः फलाहताः । उच्चादिवृद्धिहानिं च कुर्यात्तत्संख्यकाभवेत् ॥३५॥ लब्ध को पूर्व साधित भाव साधन से गुणकर अपने ध्रुवांक में भाग देना और पूर्व प्रतिपादित भाव साधन से गुण कर अपने ध्रुवांक में भाग देना पुनः इसे पूर्वसंपादित फल से गुण देने से जो संख्या प्राप्त हो वह कुटुम्बपोषण की संख्या होती है।।३५।। अष्टकवर्गफलाध्यायः । तत्रादावष्टकवर्गे विचारणीयः- आत्मभावशक्तिश्च पितृचिन्ता रवेः फलम् । मनोवृत्तिप्रसादश्च मातृचिन्तामृगांकतः ॥१॥ आत्मा, प्रभाव, शक्ति और पिता का फल सूर्य से विचार करना चाहिये मन, वृत्ति, प्रसन्नता और माता का विचार चन्द्रमा से करना चाहिये।।१।। भ्रातृसत्वं गुणं भूमिंभौमेन च विचारयेत् । वाणिज्यकर्मवृत्तिश्च बुधेन तु विचिन्तयेत् ॥२॥ भाई, बल, गुण, भूमि का विचार भौम से करना चाहिये। वाणिज्य कर्म वृत्ति का बुध से करना चाहिये।।२।। गुरुणा देहपुष्टिं च विद्यापुत्रार्थसंपदः । भृगोर्विवाहककर्माणि भोगस्थानं च वाहनम् ॥३॥ शरीर की पुष्टि, विद्या, पुत्र, धन संपत्ति का विचार गुरु से करना चाहिये। शुक्र से विवाह, संभोग, वाहन, वेश्या, स्त्री का विचार करना चाहिये।।३।। वेश्यास्त्रीजनगात्राणि शुक्रेणैवनिरीक्षयेत् । आयुष्यं जीवनोपायं दुःखशोकमहद्भयम् । सर्वक्षणं च मरणं मंदेनैव निरीक्षयेत् ॥४॥ आयुष्य, जीवन, दुःख, शोक आदि का विचार शनि से करना चाहिये।।४।।
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५५ रविः पिता शशी माता भ्राता भौमो बुधः सुहृत् । मातुलेयः स्मृतो जीवो ज्ञानपुण्ये स्त्रियः सितः ॥५॥ सूर्य पितृ कारक, चन्द्रमा मातृकारक, भौम भ्रातृकारक, बुध मित्र और मातुल (मामा) कारक, गुरु विद्या और पुण्य (कर्म) कारक और शुक्र स्त्री कारक हैं ॥५॥ एषामृक्षे च तत्काले मरणं कुरुते शनिः । आदित्याष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु ॥६॥ इनके नक्षत्रों में जब शनि आता है तो इन लोगों को कष्ट कारक होता है। सूर्य के अष्टम वर्ग को ग्रह सहित स्थापनकर विचार करे॥६॥ अर्कस्थितस्य नवमो राशिः पितृगृहं स्मृतम् । तद्राशिफल संख्याभिवर्द्धयेद्योगपिंडकम् ॥७॥ सूर्य से नवम राशि पिता की होती है, उस नवम राशि में जो रेखा की संख्या हो उससे योग पिण्ड को गुणकर॥७॥ सप्तविंशोद्धृतं शेषं नक्षत्रं याति भानुजम् । तस्मिन्काले पितृक्लेशो भवतीति न संशयः ॥८॥ २७ से भाग देने से जो शेष बचे वह अश्विन्यादि नक्षत्र की संख्या होती है उस नक्षत्र पर जब शनि जाता है तो पिता को कष्ट होता है॥८॥ तत्त्रिकोणगते वापि पितापितृसमोऽपिवा । मरणं तस्य जानीयाद्दशाछिद्रेषु कल्पयेत् ॥९॥ अथवा इसके त्रिकोण नक्षत्र में जब शनि होता है तब पिता और पिता के सदृश लोगों को कष्ट होता है। यदि उस समय पापग्रह की दशा हो तो मृत्यु होती हैं अन्यथा कष्ट मात्र होता है॥९॥ अर्कात्तु तुर्यगेराहौ मंदे वा भूमिनंदने । गुरुशुकेक्षणमृते पितृहा जायते नरः ॥१०॥ सूर्य से चौथे स्थान में राहु, शनि, भौम में से कोई हो और उसे गुरु शुक्र न देखते हों तो पिता का नाश होता है॥१०॥
६५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । लग्नाच्चन्द्राद्गुरुस्थाने याते सूर्यसुते यदि । पित्रोर्नाशं तदा काले वीक्षिते पापसंयुते ।।९१।। लग्न या चन्द्रमा से नवम स्थान में शनि हों और पापग्रह दृष्ट और युत हों तो पिता का नाश होता है ।।९१।। लग्नात्सुखेशराशीशदशायाम् पितृक्षयः । दशानुकूलकालेन योजयेत्कालवित्तमः ।।९२।। लग्न से चतुर्थेश के राशीश की दशा में पिता का नाश होता है किन्तु दशा अनिष्टद न हो तो सुख होता है ।।९२।। पितृजन्माष्टमे जातस्तदीशे लग्नगेऽपिवा । तेनैव पितृकार्याणि करोत्यत्र न संशयः ।।९३।। पिता के जन्मलग्न से आठवें लग्न में जन्म हो अथवा पिता के जन्मलग्न से आठवें भाव के स्वामी बालक के जन्मलग्न में हों तो वह बालक ही पिता के सभी कार्यों को करता है अर्थात् पिता की मृत्यु हो जाती है और वही सभी कार्य को करता है इसमें संशय नहीं है ।।९३।। पितृसुख योग- सुखनाथ दशायां तु सुखप्राप्तेश्च संभवः । सुखेशे लाभलग्नस्थे चन्द्रलग्नाद्विशेषतः ।।९४।। सुखेश की दशा में पिता को सुख होता है। सुखेश ११ वें या जन्मलग्न में हो तो, विशेषकर चन्द्रलग्न से ।।९४।। पितृगृहं समायुक्ते जातः पितृवशानुगः । तेनैव पितृकार्याणां कर्मक्षेत्रे समापयेत् ।।९५।। दशमभाव में हो तो पिता के वश में रहने वाला होता है और वही पिता के कर्मों को करने वाला होता है ।।९५।। पितृजन्मतृतीयर्क्षे जातः पितृधनाश्रितः । पितृकर्मगृहे जातः पितृतुल्यगुणान्वितः ।।९६।। पिता के जन्मलग्न से तीसरे लग्न में जन्म हो तो पिता के धन का भोगी होता
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५७ हैं। पिता के जन्मलग्न से १०वीं राशि में जन्म हो तो पिता के गुण के सदृश गुणवाला होता है।।१६।। तदीशे लग्नसंस्थेऽपि पितृश्रेष्ठो भवेत्सुतः । एवमादिफलं ज्ञात्वा तान्यत्रापि नियोजयेत् ।।१७।। और उसके स्वामी यदि जन्मलग्न में हों तो पिता से श्रेष्ठ होता है। इस प्रकार से पूर्वोक्त के फलों की योजना यहां भी करना।।१७।। विशेषः- सूर्याष्टवर्गे यच्छून्यं तन्मासे संवत्सरेऽपि च । विवाहव्रतवंधादि सर्वं तत्वर्जयेत्सदा ।।१८।। सूर्याष्टक वर्ग में जिस राशि में अधिक शून्य हो उस राशि के मास में और संवत्सर (उस राशि में जब गुरु हों) में विवाह व्रत-वंधादि शुभकर्म को न करें।।१८।। कलहो त्रासदुःखानि शून्यमासे भवन्ति च । एवमादिफलं ज्ञात्वा मासं प्रति समाचरेत् ।।१९।। अधिक शून्य वाले मास में कलह, भय, दुःखादि होते हैं इसको ध्यान में रखते हुये मास के कार्यों को करे।।१९।। पितृ मरणकालः- संशोध्यपिंडं सूर्यस्य रंध्रमानेन वर्द्धयेत् । अर्कोद्धतावशेषर्क्षे यदा याति शनैश्चरः । तस्मिन्मासे मृतिं विद्यात्त्रिकोणगतेऽपिवा ।।२०।। सूर्य के अष्टकवर्ग के पिंड को सूर्य के शून्य संख्या से गुणकर १२ का भाग देने से जो शेष बचे उस राशि में जब शनि जाता है तब उस राशि के मास में पिता की मृत्यु होती है या उस राशि से त्रिकोण राशि में जब शनि जाते हैं तब पिता की मृत्यु होती है।।२०।। चन्द्राष्टकवर्गस्य फलम् - चन्द्राच्चतुर्थभे मातुः प्रासादग्रामचिंतनम् । चन्द्राष्टवर्गेयद्राशौ शून्याधिक्यं प्रजायते ।।२१।।
६५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । चन्द्रमा से चतुर्थ भाव में माता, गृह और ग्राम का विचार करना चाहिये। चन्द्रमा के अष्टकवर्ग में जिस राशि में अधिक शून्य है।।२१।। तं राशिं च परित्यज्य शुभकर्माणि कारयेत् । चन्द्राष्टमे शनिक्षेत्रे त्रिकोणेषु विशेषतः ॥२२॥ उस राशि में जब चन्द्रमा हो तब शुभ कर्म को न करे। चन्द्रमा से आठवें शनि की राशि से विशेष कर त्रिकोण में हों तो।।२२।। आधिव्याधिदुःखान्यपि लभते नात्र संशयः । चन्द्रात्सुखफलात्पिंडं वर्धयेद्धैर्हृतं चतत् ॥२३॥ उस समय जातक को मानसिक कष्ट, व्याधि और दुःख होता है। चन्द्रमा से चौथे भाव के फल को खंड (पिंड) से गुणा कर २७ से भाग देने से।।२३।। शेषमृक्षे शनौ याते मातृहानिं विनिर्दिशेत् । तत्रिकोणेषु वा केचिद्दशाच्छिद्रेषु कल्पयेत् ॥२४॥ जो शेष हो तत्तुल्य नक्षत्र पर शनि के रहने से माता को कष्ट या मृत्यु होती है। अथवा उस नक्षत्र से त्रिकोण नक्षत्र (१० या १९ नक्षत्र में) में शनि के रहने से और उस समय कष्टप्रद दशा के रहने से माता की मृत्यु होती है।।२४।। भौमाष्टकवर्गफलम् – भौमाष्टवर्गे संचिन्त्यं भ्रातृविक्रमधैर्यकम् । भौमस्थितस्य सहजोराशिर्भ्रातृगृहंस्मृतम् ॥२५॥ भौमाष्टक में भाई, पराक्रम और धैर्य का विचार करना चाहिये। भौम से तीसरे भाव से भाई का विचार करना चाहिये।।२५।। त्रिकोण शोधनं कृत्वा यत्रभूयांसि तत्रवै । भूमिर्भवति भार्यवा भ्रातृगेहसुखं तथा ॥२६॥ भौमाष्टकवर्ग में त्रिकोण शोधन के पश्चात् जिस राशि में अधिक शेष हो उस राशि में जब भौम जाता है तो भूमि का स्त्री का लाभ और भाई तथा गृह का सुख होता है।।२६।। भौमो बलविहीनश्चेत् दीर्घायुर्भातृकोभवेत् । फलानि यत्र क्षीयन्ते तत्रभूमिहानिः स्मृतः ॥२७॥
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५९ यदि भौम निर्बल हो तो भाई दीर्घायु होता है। और जिस राशि में फल की कमी हो उस पर भौम के जाने से भूमि की हानि होती है।।२७।। तद्राशिफलसंख्यैश्च वर्धयेच्छोध्यपूर्ववत् । शेषर्क्षे च शनौ याते भ्रातृहानिर्विनिर्दिशेत् ।।२८।। फलों के योग को पिंड से गुणा कर पूर्ववत् २७ का भाग देने से शेष नक्षत्र मे शनि के जाने से भाई की मृत्यु होती है।।२८।। अथ बुधाष्टकवर्गफलम् - बुधात्तूर्ये कुटुम्बं च धनं मित्रादिमातुलाः । तत्पंचमे मंत्रविद्यालिपि बुध्यादि चिंतयेत् ।।२९।। बुध से चौथे भाव में कुटुम्ब, धन, मित्र, मामा आदि का और बुध से पाँचवें भाव में मंत्र शास्त्र, लेखन और बुद्धि का विचार करना चाहिये।।२९।। बुधाष्टवर्ग संशोध्य शेषमृक्षगते शनौ । बंधुमित्रादि नाशादींल्लभतेनात्र संशयः ।।३०।। बुधाष्टक वर्ग में पूर्ववत् संशोधन करके राशिपिंड से योग पिंड को गुणाकर २७ से भाग देने से शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण नक्षत्र में शनि के जाने से बंधु मित्रादि का नाश होता है।।३०।। अथ गुर्वष्टकवर्गफलम् - जीवात्पंचमतो ज्ञानं पुत्रधर्मधनादिकम् । गुरोरष्टकवर्गेषु संतानमपि कल्पयेत् ।।३१।। गुरु से पाँचवें भाव में संतान का विचार करना चाहिये। इसी प्रकार गुरु के अष्टकवर्ग में भी संतान विचार करना चाहिये।।३१।। गुरुस्थितसुतस्थाने यावच्च विद्यते फलम् । शत्रुनीचगृहं त्यक्त्वा तावंतश्च सुताः स्मृताः ।।३२।। गुरु से पाँचवें भाव में जितना फल हो उतने ही संख्यक संतान होते हैं यदि वह राशि गुरु की शत्रु और नीच राशि न हो तो।।३२।।
६५० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । समुदायाष्टकवर्गचक्र।
| राशि | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | योग |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग्रह | शु.<br>चं. | सू. | बु.<br>बृ. | श. | मं. | ||||||||
| सू. | ५ | ५ | ४ | ३ | ४ | २ | ४ | ६ | ५ | ४ | ३ | ३ | ४८ |
| चं. | ५ | ३ | ५ | २ | ४ | ३ | ४ | ५ | ५ | २ | ४ | ७ | ४९ |
| मं. | ३ | ५ | ४ | २ | ३ | ३ | २ | ६ | ३ | ४ | २ | २ | ३९ |
| बु. | ४ | ४ | ६ | ५ | ५ | ५ | ३ | ५ | ४ | ५ | ४ | ४ | ५४ |
| बृ. | ६ | ५ | ३ | ४ | ४ | ५ | ६ | ५ | ३ | ४ | ६ | ५ | ५६ |
| शु. | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ | ४ | १ | ३ | ६ | ५ | ४ | ५२ |
| श. | ७ | ३ | ४ | ४ | २ | १ | २ | ५ | २ | ५ | १ | ३ | ३९ |
| ३६ | २९ | ३६ | २४ | ३६ | २३ | २५ | ३३ | २५ | ३० | २५ | २८ |
नोट- सर्वाष्टक वर्ग में सभी अष्टवर्गों में मेषादि राशियों में कितनी-कितनी रेखायें प्राप्त हुई हैं और उनका योग क्या हुआ लिखना चाहिये।
अष्टकवर्ग कुंडली
+---------------------------------------+
| (२५)११मं \ (३०)१० / (२५)९. |
| \ / |
| (२८)१२ \ / (२३)८श |
|----------------+-------------+--------------|
| (३६)१ | | (२५)७ |
| | | |
|----------------+-------------+--------------|
| (१९)२ / (२४)सू.४ \ (२६)६ |
| / \ |
| शु(३६)३च / \ बु(२६)वृ५|
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मातृपित्रोः मृत्युकालः। ग्रहयोगेन हानिः स्यात् वर्णाद्यं पृथक्ततः । संयोज्य सप्तभिर्हत्वा सप्तविंशति भाजिताः ॥१९८॥ एकाधिपत्य शोधन करने से राशियों के नीचे जो अंक आये हैं चाहे वे शून्य हों या रेखा हों उन्हें राशि के ध्रुवांकों से पृथक्-पृथक् गुण देना और जिस राशि में ग्रह हैं उनके अंकों को उन उन ग्रहों के ध्रुवांकों से गुणकर पृथक्-पृथक् रखकर, राशियों के गुणनफल का योग और ग्रहों के गुणनफल का योग कर दोनों को एक जगह जोड़कर सात ७ से गुणकर उसमें २७ से भाग देने से ॥१९८॥