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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२१ सर्वदा १ अंश बल होता है, शेष चक्र से स्पष्ट है।।१८-१९।। दिवारात्रित्रिभागबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.वृ.शु.श.ग्रह
अंश
कला
विक.
वर्षमासदिनहोरेशबल-
वर्षमासदिनेशानां तिथि स्त्रिंशच्छरार्णवाः ।
कालहोराधिपस्यैवं पूर्णं बलमुदाहृतम् ।।२०।।
वर्ष-मास, दिन के स्वामियों का क्रम से १५, ३०, ४५ बल होता है और
कालहोरेश का पूर्ण १ अंश बल होता है। पूर्व के सभी ४ बलों का योग करने
से कालवल होता है।।२०।।
वर्षेशादि साधन
शके १८७८ श्रावण कृष्ण १३ शनिवार को कलियुगादि अहर्गण साधन।
१८७८ + ३१७९ = ५०५७ गतकलिः
१२×
६०६८४ —मास
३ —गतमास
६०६८७
७०)६०६८७(८६६     ६०६८७     ६०६८७
५६०          ८६६      १८६५
---         -------      ------
४६८       ३३)६१५५३(१८६५   ६२५५२
४२०        ३३         ३०
---        ----       ---------
४८७        २८५      १८७६५६०
४२०        २६४        २७ गति
---        ----      ---------
६७        २१५      १८७६५८७
१९८        ×११
----      ---------
१७३    ७०३)२०६४२४५७(२९३६३
१६५      १४०६
---      -----
८      ६५८२
६३२७

२५५४ २१०९

४४५५ ४२१८

२३७७ २१०९

१८७६५८७              २६८ २९३६३

१८४७२२४ १

१८४७२२५ अहर्गणः।

६२२ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वर्षेश-मासेश साधन। अहर्गण—३७३ / २५२० = ल + शे शेष / ३६० ल.। शेष / ३० = ल×३+१ / ७ = शेष = वर्षेश ल×२+१ / १२ = शेष = मासेश इसके अनुसार १८४७२२५ ३७३ २५२०) १८४६८५२ (७३२ ३६०) २२१२ (६ ३०) २२१२ (७३० ल. १७६४० २१६० २१० ८२८५ ५२ ११२ ७५६० ९० ७२५२ २२ ५०४० ६×३+१ / ७ = ५ वर्षेश = गुरु २२१२ शेष ७३×२+१ / १२ = ३ मासेश = भौम इस प्रकार से वर्षेश गुरु और मासेश भौम हुये। जिस दिन जन्म होता है वही वारेश होता है। कालहोरेश साधन उक्त दिन बार प्रवृत्ति सूर्योदय के बाद २ घटी १२ पल पर हुई है अतः बार प्रवृत्ति से इष्ट घटी ३०।१६ हुआ। (३०।१६ × २) / ५ = ल. = १२, शे. = ०।३२ (६०।३२ - ०।३२ + १) / ७ = ५७ दिनपति से ५ वाँ भौम काल होरेश हुआ। वर्षेशादिबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
अंश
३०१५४५कला
विकला
नतोन्नतबल + पक्षबल + त्रिभागबल + वर्षेशादिबल = कालबल।

अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२३ कालबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
अंश
५४५४१७३८२७१२३२कला
५०५२५२२५५२विकला
अयनबलसाधन-
आधाने चित्रवेशे तु त्रिंशच्छरजलकराः ।
सायनांशग्रहभुजराशीनिष्खब्धिभिः सुरैः ।।२१।।
सूर्यैर्हत्वा क्रमाद्राशिभागः स्यादा्नुपातः ।
एवं राश्यादिके युंज्यादर्करायोर्शनः सु च ।।२२।।
राशित्रयमथो युंज्यान्मेषादिस्थेषु तेष्वथ ।
तुलादिस्थेषु राश्यादींस्त्रिराशिभ्यस्तु वर्जयेत् ।।२३।।
चन्द्राकर्योर्विपरीतं स्यात्सदा युंज्याद्बुधस्य तु ।
भागीकृत्य त्रिभिर्भक्तं ग्रहाणामयनं बलम् ।।२४।।
अयनांश युत ग्रह के भुज राशि के तुल्य ध्रुवांक से ४५।३३।१२ गुण कर
३० से भाग देकर लब्धि में गतखंड को जोड़कर राश्यादि बनाकर तुलादि ६ राशि
में ३ घटा देना मेषादि ६ राशि में हो तो ३ जोड़ देना। परन्तु चन्द्र शनि में विलोम
करना अर्थात् तुलादि में जोड़ना और मेषादि में घटाना, बुध में सर्वदा ३ राशि
जोड़ना और अंश करके ३ से भाग देने से अयनबल होता है किन्तु सूर्य के बल
को दूना करने से अयन बल होता है। २१+२४।
उदाहरण- सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें अयनांश २१।५१।१८ जोड़ने
से ४।१०।१७।५२ हुआ इसका भुज बनाने से १।१९।४२।८ हुआ, यहाँ पूर्वोक्त
नियम के अनुसार १ राशि का ध्रुवांक ३३ प्राप्त हुआ, इससे अंश कला विकला
को गुण देने से ६५१।६।२४ हुआ इसमें गतखंड ४५ को जोड़ देने से
९६।६।२४ इसका राशि कर मेषादि में होने से ३ राशि जोड़कर राशि के अंश
बनाकर इसमें ३ का भाग देने से लब्ध ६२।२।२ यह सूर्य का अयन बल हुआ
इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी साधन करना।
अयनबलचक्र।
सू.चं.बं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
:-::-::-::-::-::-::-::-:
१२४१७४६४२५९५३अंश.
५१११३८११५९कला
४४३०४३४५५०१५४७विकला

६२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । युद्धादिबल- रवेर्द्विगुणमेवं स्याद्युध्यतोर्ग्रहयोरथ । विश्लेषं बलयोश्चापि निर्जितस्य बलं भवेत् ॥२५॥ अपनीते योजिते तु जितस्य च बलं भवेत् । ग्रहयुद्ध का लक्षण-जन्मकाल में भौमादि ग्रहों में जो दो ग्रह राशि अंश कला विकलादि से आपस में तुल्य हों उनका परस्पर युद्ध होता है। ऐसे युद्ध करने वाले दोनों ग्रहों के बलैक्य का अंतर करना जिसका बल अधिक हो वह विजयी और जिसका बल कम हो वह निर्जित अर्थात् पराजित कहा जाता है। बलैक्य में अंतर के अंक को घटाने से दक्षिण दिशा के निर्जित ग्रह का बल होता है। और जित ग्रह के बलैक्य में अंतर को जोड़ने से जित ग्रह का उत्तर दिशा का बल होता है। गतिबल- षष्ठिर्वक्रगतेर्वीर्यमनुवक्रगतेर्दलम् ॥२६॥ पादं विकलभुक्तैः स्याद्दलमेव समागमे । पादं मंदगतेस्तस्य दल मन्दतरस्य च ॥२७॥ शीघ्रभुक्तेस्तु पादोनं दलशीघ्रतरस्यतु । वक्रगति का ६० बल, मार्गीगति का ३० बल, सूर्य के साथवाले ग्रह का १५ बल, चन्द्र के साथवाले ग्रह का ३० बल, मंदगति ग्रह का १५ बल, पूर्व से अल्पगति वाले ग्रह का ७।३० बल, शीघ्रगति ग्रह का ४५ बल और अतिशीघ्र गति वाले ग्रह का ३० बल होता है।।२७।। चेष्टाबल- मध्यमस्फुटविश्लेषदलयुक्तोनितं स्फुटात् ॥२८॥ मध्यम ग्रह और स्पष्ट ग्रह के अंतर का आधा कर मध्यम ग्रह में यदि मध्यम ग्रह स्पष्ट ग्रह से अधिक हो तो जोड़ देना, अन्यथा यदि मध्यम ग्रह स्पष्ट ग्रह से न्यून हो तो मध्यम ग्रह में अंतरार्ध को घटा देना।।२८।। मध्यमे त्वधिके न्यूने शीघ्रादत्रास्फुटं त्यजेत् । चेष्टाकेन्द्रं भखेटानां रवीन्द्वोरयनांशयुक् ॥२९॥ इसे शीघ्रोच्च में घटा देने से शेष चेष्टाकेन्द्र होता है किन्तु यह विधि तारा ग्रह भौमादि के लिये ही है।।२९।।

अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२५ अंगाधिकेऽर्कात्संशोध्य भागीकृत्य त्रिभिर्भजेत् । सूर्यचन्द्रौ सत्रिराशी कृत्वा प्रोक्तविधिस्तथा ।।३०।। एवं चेष्टाबलं प्रोक्तं नैसर्गिकमथो शृणु। और चेष्टाकेन्द्र ६ राशि से अधिक हो तो १२ राशि में घटाकर अंशादि बनाकर ३ से भाग देने से चेष्टा वल होता है। रवि चन्द्र के चेष्टा केन्द्र ६ राशि से अधिक होते हुये भी ३ राशि और अयनांश जोड़कर १२ राशि में घटाकर शेष विधि यथावत् करने से चेष्टा बल होता है।।३०।। उदाहरण- संवत् २०१३ श्रावण कृष्ण १३ शनौ अहर्गणः २७५० चक्रम् ३९ इस पर से इष्टकालिक मध्यम ग्रह निम्नलिखित हैं। इष्टकालिक मध्यमग्रह इष्टकालिक स्पष्टग्रह

सू.चं.मं.बु.के.बृ.शु.के.श.
१०
१९२४१०१५२८
३९१४४३११४६
१५५७३४११३२४२
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
१०
१८२२१२१२
२६३०३२२२४०
३४४७५९५४५२

भौम आदि के शीघ्रोच्च

मं.बु.बृ.शु.श.
१९२९१९१७१९
३९४७३९२०३९
४५१२४५४५

अयनांश = २१।५१।१८ स्पष्ट भौम = १०।१२।३२।८ मध्य भौम = १०।२।४२।३४ दोनों अंतर करने से राश्यादि = ०।९।४१।३४ इसका आधा = ०।४।५४।४७ मध्यमग्रह में अन्तरार्ध को घटाने से १०।२।४२।३४ ०।४।५४।४७ शेष = ९।२७।७।४७ इसे ३।१९।३९।४५ शीघ्रोच्च में घटाने से ५।२१।५१।५८ चेष्टाकेन्द्र हुआ इसका अंश बनाकर ३ से भाग देने से ३)१७१।१७।५८(५७।१७।१९

६२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । यह भौम का अंशादि चेष्टाबल हुआ। इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी चेष्टाबल साधन करना चाहिये। मध्यम चेष्टाबलचक्र

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
४५५०५७१०२७३४अंश
५७२०१७४५४०कला
२७३३१९१६१२४७विक.
अयनबल + चेष्टाबल = स्पष्ट चेष्टाबल
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
:---::---::---::---::---::---::---:
१७०५२७४५६५३८६८८
१२२८४६४५१९४०
३१४९५३२७३४
नैसर्गिकबल-
षष्टिरेकेषवः सप्तदश षड्विंशतिस्ततः ।।३१।।
चतुस्त्रिंशत्त्रिवेदांकाः सूर्यादीनांनिसर्गजाः ।
सूर्यादि का क्रम से ६०।५१।१७।२६।३४।४३।९ नैसर्गिक (स्वाभाविक)
बल होता है।।३१।।
नैसर्गिकबलचक्र।
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
:---::---::---::---::---::---::---:
५११७२६३४४३
ग्रहों का षड्बलैक्य-
शुभपापदृगब्ध्यंशयुतहीनान्वितानि च ।।३२।।
षड्बलानि ग्रहाणां स्युरेवमेकीकृतानि तु ।
पूर्वोक्त पाँच बलों (स्थानबल, कालबल, दिग्बल, निसर्गवल, चेष्टाबल) के
योग में शुभग्रह पापग्रह के दृष्टियोग के चतुर्थांश को जोड़ने और घटाने से (शुभग्रह
का दृष्टियोग पापग्रह के दृष्टियोग से अधिक हो तो धन करना अन्यथा ऋण करना)
स्पष्ट षड्बलैक्य होता है।।३२।। शेष चक्र से स्पष्ट है।

अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२७ षड्वलैक्यचक्र।

सू.चं.म.बु.बृ.शु.श.ग्रह
स्थान
१५४८५६२९५१३३बल
११३०४७५२४१११
काल
३२२७२७३४१९५५बल
१४४८४७२१५६५६
द्रेष्काण
१५४२२६४९२५बल
३९५४१८२०४८
१०
४३५२१४५६५०३६२८दिग्बल
५०४१२८४५५५१८३९
चेष्टा
५११७२३३४४३बल
निसर्ग
४६४२२७२२३८२०३१बल
५४५८३६४३४४
२१३६१७१८दृग्बल
३० ऋ.२१ ऋ.४९ ध.४१ ध.३५ ऋ.२० ध.१३ ध.
२५३४२०२७४८षड्बल
२७३७२२२८२४

भावबल- शुभदृष्टि चतुर्थांशं युतं स्वमार्यदर्शनैः ।।३२।। हीनयुतं दृग्बव्यंशैर्युतं स्वामिबलं भवेत् । जिन भावां के जो स्वामी हैं उनके जो शुभ पापग्रहों से दृष्टि का अंतर करके अंतर का चतुर्थांश करके शुभग्रह दृष्टि अधिक हो योग और पापदृष्टि अधिक हो तो अंतर करने से भावबल होता है।।३२।।

६२८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । परन्तु यह उन्हीं भावों के स्वामियों के लिये हैं जिन पर बुध, गुरु की दृष्टि है।।३२।। विशेषसंस्कारः- गुरुंज्ञाभ्यां तु युक्तस्य पूर्णमेकं तु योजयेत् ।।३३।। मंदाररवियुक्तस्य बलमेकेन वर्जितम् । जिस भाव में गुरु और बुध होवें उस भावबल में १ जोड़ देना यदि शनि मंगल युत हों तो १ घटाने से भावफल होता है।।३३।। कालविशेषे बलाधिक्यता- दिवा शीर्षोदयाश्चैव संध्यामुभयोदयः ।।३४।। नक्तं पृष्ठोदयाश्चैव बलाधिक्यम् उदीरिताः । दिन में जन्म हो तो शीर्षोदय राशि के भाव अर्थात् मिथुन, तुला, सिंह, कन्या, वृश्चिक, कुम्भ के भाव बली होते हैं। संध्या समय में उभयादय मीन राशि बलवान् और रात्रि में मेष, वृष, कर्क, मकर और धन ये बलवान् होते हैं।।३४।। भानां दिग्बलम् - नृयुग्मजूकपाथोनचापपूर्वार्धकुंभभात् ।।३५।। भावबल विचार में यदि भाव में कन्या, मिथुन, तुला, कुम्भ और धन का पूर्वार्ध हो तो उसमें सप्तम भाव को ।।३५।। मृगचापपरार्धाख्यमेषसिंहवृषादपि । अलेः कर्कटकाच्चापि मृगांत्यार्धाच्चामीनभात् ।।३६।। यदि मकर का पूर्वार्ध और धन का उत्तरार्ध मेष, सिंह, वृष हो तो चतुर्थ भाव को, यदि वृश्चिक, कर्क हो तो उसमें लग्न को, यदि मकर का उत्तरार्ध और मीन हो तो उसमें दशम भाव को घटाकर।।३६।। अस्तं सुखं क्रमाल्लग्नं खं हित्वांगाधिके सति । चक्राद्विशोध्यरामैश्च भजेद्भागीकृतं बलात् ।।३७।। भावानां च ग्रहाणां च बलान्येवं विदुर्बुधाः । शेष ६ राशि से अधिक हों तो उसे १२ में घटाकर शेष का अंश बनाकर उसमें ३ से भाग देने से लब्धि भावबल होता है।।३७।। इस प्रकार भाव ग्रहों का बल पण्डितों ने कहा है।

अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२९ षड्बलैक्ये शुभाशुभादिकम् - • नवाग्नयः सुराः खाग्निर्दशसंगुणिताः क्रमात् । रव्यादयः सुबलिनो राशीनां स्वामिनोवशात् ।।३८।। अधिकं पूर्णमेवं स्याद्बलं चेद्बलिनो मताः । सूर्यादि ग्रहों के षड्बलैक्य ३९, ३६, ३०, ४२, ३९, ३३, ३० इनको १० से गुणा देने से क्रम से ३९०, ३६०, ४२०, ३९०, ३३०, ३०० इतना हो तो सूर्यादि सुबली इससे अधिक हो तो पूर्णबली होता हैं।।३८।। स्थानादि बले पृथक् पृथक् सुबलित्वम् - गुरुसौम्यरवीणां तु भूतषट्केंदवो द्विज ।।३९।। गुरु, बुध, सूर्य के स्थानबल, दिग्बल, चेष्टाबल, कालबल और अयन बल में क्रम से १६५।।३९।। पंचाग्नयः रवभूतानि करभूमिसुधाकराः । खाग्नयश्च क्रमात्स्थानदिक् चेष्टासमयायने ।।४०।। ३५, ५०, ११२, ३० इतने बल हो तो सुबली।।४०।। सितेन्द्वोर्व्यग्निचंद्राश्च खेषवः खाग्नयःशतम्। चत्वारिंशत् क्रमाद्भौममन्दयोः पण्णवक्रमात् ।।४१।। त्रिंशतूखवेदाः सप्तांगा नखाश्च बलिनोविदुः । और शुक्र, चन्द्र, के १३३, ५०, ३०, १००, ४० हो तो सुबली, भौम और शनि के ९६।।४१।। ३०, ४०, ६७, २० हों तो सुबली होते हैं।। भावफलदाताग्रह- भावस्थानग्रहैः प्रोक्तयोगे ये योगहेतवः । तेषां बली यः कर्त्तासौ स एव फलप्रदः ।।४२।। योगेष्वाप्तेषु बहुषु न्याय एवं प्रकीर्त्तितः । अनेक प्रकार के योग कहे गये हैं उनमें जिन-जिन ग्रहों से शुभ अशुभ योग होते हैं उनमें जो बलवान् हो और जिसका बल अधिक हो वही फल देता है।।४२।। और वही योग का कर्त्ता या कारण होता है। इसी प्रकार अनेक योग एक ही भाव के हों तो इसी प्रकार से किसी एक से फल को कहना चाहिये।

६३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथैतच्छास्त्राधिकारिलक्षणम् - गणितेषु प्रवीणश्च शब्दशास्त्रे कृतश्रमः । न्यायविद्बुद्धिमान् होरास्कंधश्रवणसम्मतः ॥४३॥ जो गणित शास्त्र में कुशल हो, व्याकरण में निपुण हो, न्यायशास्त्र को जानने वाला हो, बुद्धिमान् ।।४३।। दैवविद्देशिको देवसंमतो देशकालवित् । ऊहापोहपटुः प्राज्ञः पटुः स्वजनसंमतः ॥४४॥ साहित्य शास्त्र में कुशल हो, नित्य देवाराधन करने वाला हो, देश-काल को जानने वाला हो, तर्क और समाधान करने में समर्थ हो और स्वजनों के अनुकूल रहने वाल चतुर हो वह इस शास्त्र को पढ़ने और फल कहने का अधिकारी होता है।।४४।। इति पाराशरहोरायामुत्तरभागेभावफलाद्यानयनेद्वितीयोऽध्यायः । अथैष्टकष्टाध्यायः । उच्चरश्मिसाधनम् - नीचोनं तु ग्रहं भार्धाधिके चक्राद्विशोधयेत् । उच्चरश्मिर्भवेद्राशिः सैको द्विघ्नांशसंयुतः ॥१॥ ग्रह में उसके नीच को घटा देना शेष ६ राशि से अधिक हो तो उसे १२ राशि में घटाकर राशि में १ जोड़ देना और अंशादि को दूना कर राशि में जोड़ देना तो उच्चरश्मि होगी।।१।। जैसे- सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें सूर्य का नीच ६।१० घटाने से शेष ९।८।२६।३४ शेष रहा यह ६ राशि से अधिक है इसलिये इसे १२ राशि में घटाने से शेष २।२१।३३।२६ शेष बचा यहाँ राशि में १ जोड़ने से ३ अंशादि को दूना कर इसमें जोड़ने से ३।४३।६।५२ यह सूर्य की उच्चराशि हुई इसी प्रकार सभी ग्रहों की उच्चरश्मि साधन करना चाहिये। उच्चरश्मिचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
४३२०३०४०४४४९३४
५८४७४५१८५३३८

अथैष्टकष्टाध्यायः। ६३१ चेष्टारश्मिसाधनम् – सायनार्कः सत्रिभो इन्दुश्च भानुवर्जितः । चेष्टाकेन्द्रं कुजादीनां पूर्वाध्याये समीरितम् ।।२।। सूर्य में अयनांश जोड़कर उसमें ३ राशि जोड़ने से सूर्य का चेष्टाकेन्द्र और चन्द्रमा में सूर्य को घटाने से चन्द्रमा का चेष्टाकेन्द्र होता है। और भौमादि का चेष्टाकेन्द्र पूर्वाध्याय में कहा ही हुआ है।।२।। शुभाशुभरश्मिसाधनम् – उच्चरश्मिभवदानीय चेष्टारश्मिं द्वयोर्युतेः । दलं तु शुभरश्मिः स्यादष्टभ्यो वर्जितोऽशुभः ।।३।। चेष्टाकेन्द्र पर से उच्चरश्मि साधन के तरह चेष्टारश्मि का साधन कर दोनों (उच्चरश्मि और चेष्टारश्मि) का योग कर आधा करने से जो आवे वह शुभरश्मि होती है और इसे ८ में घटाने से अशुभरश्मि होती है।।३।। जैसे- सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें अयनांश २१।५१।१८ जोड़ने से ४।१०।१७।५२ सायन सूर्य हुआ इसमें ३ राशि जोड़ने से ७।१०।१७।५२ यह सूर्य का चेष्टाकेन्द्र हुआ इस पर पूर्वोक्त रीति से ५।३९।२४ सूर्य की रश्मि हुई।।३।। चेष्टारश्मिचक्र। | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | | | ५ | १ | ३ | २ | १ | ४ | ४ | चेष्टाकेन्द्र | | ३९ | ३१ | ५१ | ४ | ४८ | ४२ | २८ | | | २४ | ५० | ४२ | ३० | ४२ | ५६ | ४ | | | ४ | ३ | ५ | ३ | ३ | ४ | ५ | शुभ रश्मि | | ४१ | २६ | ११ | ५२ | ४६ | ४६ | ३१ | | | ३० | २४ | १४ | ३७ | ३० | २२ | २१ | | | ३ | ४ | २ | ४ | ४ | ३ | २ | अशुभ रश्मि | | १८ | १३ | ४८ | ७ | १३ | २३ | २८ | | | ३० | ३६ | ४६ | २३ | ३० | ३८ | ३९ | | इष्टकष्टसाधनम् – उच्चचेष्टाकरौ व्येकौ दिग्भिर्हत्वा तु योजयेत् । दलयेदिष्टमन्यत्स्यात्षष्टिभ्यो वर्जितं फलम् ।।४।। ग्रहों के उच्चरश्मि और चेष्टारश्मि में एक एक घटाकर १० से गुणा कर दोनों का योग कर आधा करने से इष्ट होता है इसे ६० में घटाने से कष्ट होता है।।४।।

६३२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । जैसे- सूर्य की उच्चरश्मि ३।४३।६ में १ घटाकर १० से गुणा करने से २७।११।१० हुआ, चेष्टारश्मि ६।३९।३४ इसमें १ घटाकर १० से गुणा करने से ५६।३४।० हुआ दोनों का योग कर आधा करने से ४१।५२।३० यह सूर्य का इष्ट हुआ इसे ६० में घटाने से १८।७।३ कष्ट हुआ, इसी प्रकार सभी ग्रहों का इष्ट और कष्ट साधन करना चाहिये। इष्टचक्रम्। कष्टचक्रम्।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
४१२३४११७१३३७४५१८३६१८४२४६२२१४
२४५२५२४४१३३६५५१५४६
३०२५२२२०३०३०३५३८३०५५३०
सप्तवर्गजशुभाशुभसाधनम् -
स्वोच्चे मूलत्रिकोणे च स्वक्षेंधिसुहृदि क्रमात् ।
मित्रर्क्षे च समक्षे च शत्रुभेचातिशत्रुमे ।।५।।
ग्रह अपने उच्चराशि, मूलत्रिकोण, अपने राशि, अधिमित्र की राशि, मित्र
की राशि, सम की राशि, शत्रु की राशि, अतिशत्रु की राशि।।५।।
नीचे च षष्ठिरिष्वब्धिः रवाग्निःकरकरास्तिथिः ।
नागा वेदाः करौ शून्यं शुभमेतद् प्रकीर्तितम् ।।६।।
और नीच राशि में हो तो क्रम से ६०, ४५, ३०, २२, १५, ८, ४,
२, ० ये ध्रुवांक शुभ फल के प्राप्त होते हैं।।६।।
षष्टिभ्यो वर्जिताश्चैतेषाष्टिं स्यादशुभं फलम् ।
तदर्थं तु फलं प्रोक्तमन्यवर्गे शुभाशुभम् ।।७।।
इनको ६० में घटा देने से अशुभ ध्रुवांक होता है। अन्य वर्गों (होरा आदि
सप्तवर्ग) के राशियों में स्वउच्चादि में हों तो पूर्वोक्त ६० आदि बलों का आधा
शुभ में और आधा पापवर्ग में लेना।।७।।
पूर्वोक्तबले शुभाशुभत्वम् -
पंचस्विष्टफलं चादौ षष्ठं सममुदाहृतम् ।
अशुभास्तु त्रयः प्रोक्ता इति शास्त्रेषु निश्चयः ।।८।।
पूर्वं में कहे हुये ९ प्रकार के वलों (उच्चमूलत्रिकोणादि) में आदि से पाँच
वल (उच्च मूलत्रिकोण, स्वराशि, अधिमित्र, मित्र) शुभद हैं, छठाँ (समराशि) सम
और शेष ३ अशुभ होते हैं।।८।।
१- वेदकश इति पाठान्तरम्।

अथैकषष्ठाध्यायः। ६३३ दिग्बलादौ शुभाशुभत्वम् - दिग्बलं दिक्फलं तस्य तथा दिनफलं भवेत् । तयोः फलं शुभं प्रोक्तं षष्ट्या वर्ज्यं तथेतरम् ।।१९।। जो ग्रहों का दिग्बल है वह दिक्फल हैं और जो दिनबल है वह दिन फल हैं, दोनों फलों का योग करने से शुभ फल और इसे ६० में घटाने से शेष अशुभ फल होता है।।१९।। शुभाधिके शुभं नेष्टमशुभे चाधिके शुभात् । बलैरेव हते स्यातां दृष्टिं हन्यात्स्फुटैव सा ।।२०।। यदि शुभफल पापफल से अधिक है तो उस ग्रह का फल शुभ, अशुभ फल अधिक हो तो अशुभ फल होता है। पूर्वोक्त इष्टबल, कष्टबल (श्लोक ५ में) उससे दृष्टि को गुणा कर देने से इष्टदृष्टि और कष्टदृष्टि होती है।।२०।। पूर्वोक्तशुभाशुभबलस्यस्पष्टीकरणम् - बलैः षड्भिः समेधित्वा समानीतैः पृथक्-पृथक्। बलिनश्चोक्तसंज्ञैश्च बलैरेव हरेत्ततः ।।२१।। ग्रह षड्बलों (होरा आदि षड्बल) को ६ स्थान में रखकर इष्टबल से तथा कष्टबल से अलग अलग गुणकर पृथक् पृथक् षड्बलों से भाग देकर सभी फलों का योग करने से इष्ट स्थान स्पष्ट शुभ और कष्ट स्थान में स्पष्ट अशुभ फल होता है।।२१।। तत्तद्वलफलानि स्युरशुभानि शुभानि च । शुभपापफलाभ्यां च दृष्टिं हन्याद्वलं तथा ।।२२।। इसी प्रकार से दृष्टि के इष्ट कष्ट से दृष्टिबल को गुणाकर भाग देने से दृष्टि का शुभाशुभ फल होता है।।२२।। सग्रहे भावफले विशेषः- दृष्टेश्च शुभ पापोत्थे बले स्यातां तथैव च । भावानां च फले प्रोक्ते पतीनां च फले उभे ।।२३।। तन्वादि भावों के भी दो फल (भाव का तथा उसके स्वामी का) होता है दोनों के योग के तुल्य भाव का शुभाशुभ फल होता है।।२३।। सराशिर्गृहयुक्तश्चेद्वसाधनसंगुणे । फले तस्य शुभे युंज्यादशुभे वर्जयेच्छुभे ।।२४।।

६३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । यदि भावस्थ राशिग्रह युक्त हो तो भाव साधन से गुणा कर दे और शुभग्रह भाव में हो तो उस भाव के शुभ फल को फल में जोड़ दे और अशुभ भावफल में घटा दे और भाव में ।। १४ ।। पापांश्रेदन्यथा चैवं बले दृष्ट्यां च तेऽत्रतु । युंज्यादुच्चादिषु फलममित्रादिषु वर्जयेत् ।। १५ ।। पापग्रह हो तो इससे विपरीत करने से भाव का इष्ट (शुभ) और कष्ट (अनिष्ट) स्पष्ट होता है। इसी प्रकार दृष्टि में भी करना चाहिये किन्तु यह फल यदि उच्चादि का हो तो योग और शत्रु आदि का हो तो घटाना चाहिये ।। १५ ।। अष्टकवर्गे विशेषः- स्थाने चैवं क्रमात्प्रोक्तं करणेचान्यथाक्रमः । राशिद्वयगते भावे तद्राश्यधिपतेः क्रिया ।। १६ ।। इसी प्रकार से स्थान (रेखा) में भी (अष्टकवर्ग में) क्रिया करनी चाहिये किन्तु करण (बिन्दु) में विपरीत क्रिया होती है, एक ही भाव में २ राशि हो तो उनके स्वामी के साथ क्रिया करनी चाहिये ।। १६ ।। स्थानाधिकस्तु भावेन लाभभावः प्रकीर्त्तितः । तत्समाने च तद्भावे तदानीं स्थानदान् ग्रहान् ।। १७ ।। संयोज्य स्थानसंख्यायां दलमेतत्समं भवेत् ।। १८ ।। भाव से रेखा अधिक हो तो उस भाव का फल या भाव लाभदायक होता है। यदि दोनों भावों में अधिक रेखा हो तो दोनों का योग कर आधा करने से जो आवे उसके समान ही भावफल होता है ।। १७, १८ ।। इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे इष्टकष्टाध्यायस्तृतीयः । ३ अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । विधात्रालिखिता या साललाटाक्षरमालिका । तस्याः शरीरकथनं वक्ष्यामि च पृथक्-पृथक् ।। १ ।। विधाता (ब्रह्मा) ने ललाट में जो अक्षरों की पंक्ति लिखी है उसको मैं शरीर के रूप में पृथक् पृथक् कह रहा हूँ ।। १ ।।

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३५ लग्नाच्छरीरचिन्ता च द्वितीयात्स्वं च पैतृकम् । भरणीयं कुटुंबं च पश्वादिं च वदेद्बुधः ॥२॥ लग्न (तनु भाव) से शरीर की चिन्ता का, विचार करना चाहिये और द्वितीय भाव से अपने उपार्जित धन और पैतृक संपत्ति, पालनीय कुटुंब का तथा पशु आदि का विचार करना चाहिये ॥२॥ तृतीयात्सोदरं बुद्धिं दुःपूर्वा विक्रमं विदुः । चतुर्थात्पितरं वेश्म सुखं लालित्यमेव च ॥३॥ तीसरे भाव से भाइयों का, दुष्ट बुद्धि का और पराक्रम का विचार करना चाहिये, चौथे भाव से गृह का, सुख का, सौहार्द का विचार करना चाहिये ॥३॥ सौमनस्यमपत्यानि प्रज्ञां मेधां च पंचमात् । हानिं व्याधिमरिं षष्ठान्मैथुनं स्त्रीं जयं ततः ॥४॥ पांचवें भाव से सौमनस्य (मन की प्रसन्नता) का, संतान का, सुबुद्धि का और धारणा शक्ति का विचार करना चाहिये । छठें भाव से हानि, व्याधि (रोग) और शत्रु का विचार तथा सप्तम भाव से मैथुन, स्त्री और युद्ध में विजय का विचार करना चाहिये ॥४॥ मृतिं पराजयं दुःखं हानिं व्याधिं तथाष्टमात् । सौशील्यभाग्यधर्मांश्च नवमाद्दशमात्तथा ॥५॥ मानास्पदाज्ञाकर्माणि आयादर्थं व्ययाद्व्ययम् । आठवें भाव से मृत्यु का, पराजय का, दुःख (व्यसन) का, हानि का, व्याधि का विचार करना चाहिये। नवम भाव से सुशीलता, भाग्य, वैभव और धर्म का विचार करना चाहिये । दशम भाव से सत्कार, स्थान, आज्ञा और शुभाशुभ कर्म का विचार करना चाहिये ॥५॥ ग्यारहें भाव से द्रव्य के प्राप्ति का और बारहें भाव से व्यय का विचार करना चाहिये । उच्चस्थानस्थ रश्मि ध्रुवांकः- दिग्भवेष्विषुसंप्ताष्टशराः स्वोच्चे करा रवेः ॥६॥ यदि सूर्यादि ग्रह अपने उच्च राशि में हो तो क्रम से १०, ११, ५, ५, ७, ८, ५ यह रश्मि ध्रुवांक होता है ॥६॥ नीचेन चांतरा प्रोक्ता रश्मयस्त्वनुपातजाः । नीचोनं तु ग्रह- म्नाधिके चक्राद्विशोधयेत् ॥७॥

६३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । नीच राशि का ध्रुवांक नहीं है, उच्च नीच के मध्य में अनुपात द्वारा रश्मि का साधन करना चाहिये वह इस प्रकार से— नीच को ग्रह में घटा दे यदि शेष ६ राशि से अधिक हो तो उसे १२ राशि में घटाकर।।७।। स्वीयरश्मिहतं षड्भिर्भजेत्स्यूरश्मयःस्वकाः । उच्चस्वर्क्षसुहृत्स्वभागैऽगाब्धि द्विसंगुणाः ।।८।। नीचारिद्वादशांशे तु नृपांशोनाः कराश्च ते । शेष को ग्रह के उच्च रश्मि ध्रुवांक से गुणकर उसमें ६ से भाग देने से लब्ध रश्मि होती हैं। ग्रह उच्च, स्वराशि मित्र की राशि के द्वादशांश में हो तो क्रम से ६, ४, २ से गुण देने से।।८।। और नीच शत्रु के द्वादशांश में हो तो षोडशांश कम कर देने से स्पष्ट रश्मि होती है। जैसे सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें सूर्य के नीच ६।१० को घटाने से ८।२२।२६।३४ हुआ यह ६ राशि से अधिक है अतः इसे १२ राशि में घटाने से शेष ३।७।३३।२६ हुआ इसे ध्रुवांध १० से गुणा करने से ३१।५।३४।२० हुआ इसमें ६ से भाग देने से लब्धि ५।५।५५।५२ यह सूर्य की रश्मि हुई। सूर्य शनि के द्वादशांश में है और सूर्य का शनि अधिशत्रु है अतः पूर्वोक्त रश्मि का षोडशांश ०।१९।४४।४४ रश्मि में घटाने से शेष ४।२५।४८।५२ यह सूर्य की स्पष्ट रश्मि हुई इसी प्रकार से शेष ग्रहों की रश्मि का साधन करना चाहिये। रश्मि चक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
१५१११०
२५४८३२
४८२६५३४८२६३५१.२
विशेष संस्कारः—
मूलत्रिकोणस्वर्क्षाधिमित्रमित्रनवांशके ।।९।।
यदि ग्रह अपने मूलत्रिकोण, अपनी राशि, अधिमित्र की राशि, मित्र की राशि
में नवांश की राशि।।९।।
द्रेष्काणेऽपि च होरायां त्रिंशांशे च क्रमात्तथा ।
अष्टघ्ना द्व्यब्धिषट्सप्तभक्ता युक्तास्तुरश्मयः ।।१०।।
अरावध्यरिनीचे च वेदद्व्यखिलहीनकाः ।

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३७ द्रेष्काण की राशि, होरा और त्रिंशांश की राशि जिसमें हो उसे देखकर ध्रुवोत्पन्न रश्मि (८-९ श्लोकोक्त) को ८ से गुण कर क्रम से मूलत्रिकोण में २ से, अपनी राशि में ४ से, अधिमित्र में ६ से और मित्र में ७ से भाग देकर लब्धि के पूर्वोक्त रश्मि में जोड़ने से उच्च रश्मि होती है।।१०।। पूर्वोक्त वर्गों में यदि शत्रु राशि हो तो चार से भाग देकर लब्धि को घटाने से अधि शत्रु राशि हो तो २ से भाग देकर और नीच राशि में हो तो संपूर्ण को घटाने से उच्च रश्मि होती है। अन्य संस्कारः- उच्चे च त्रिगुणं प्रोक्तं स्वत्रिकोणे द्विसंगुणम् ।।११।। यदि रश्मि का स्वामी अपने उच्च राशि में हो तो उच्च रश्मि को त्रिगुणित, अपने मूल त्रिकोण राशि में हो तो द्विगुणित।।११।। स्वर्क्षे त्रिघ्ना द्विसंभक्तास्त्वधिमित्रगृहेऽपि च । वेदघ्ना रामसंभक्ता मित्रमे षड्गुणास्ततः ।।१२।। स्वराशि में होते त्रिगुणित कर दो से भाग देना और अधिमित्र की राशि में हो तो पूर्व रश्मि को चार से गुणाकर तीन से भाग देकर लब्धि को पूर्व रश्मि में जोड़ने से, मित्र के राशि में ६ से गुणा कर ५ का भाग कर लब्ध को रश्मि में जोड़ने से।।१२।। पंचभक्तास्त्वथ शत्रुगृहे द्विघ्नाश्चतुर्हताः । अधिशत्रोः करघ्नाश्च पंचभक्ता न नीचभे ।।१३।। शत्रु के गृह में हो तो २ से गुणा कर ४ से भाग देकर लब्ध को जोड़ने से स्पष्ट रश्मि होता है। और अधि शत्रु की राशि में हो तो दूना कर पाँच से भाग देकर लब्धि को जोड़ने से स्पष्ट रश्मि होती है। नीच राशि में हो तो कोई संस्कार नहीं करना।।१३।। मतांतरात् रश्मि हानिवृद्धिः- शनिं सितं बिना ताराग्रहा अस्तंगता यदि । विरश्मयो भवन्त्येवं वक्रादौ द्विगुणास्ततः ।।१४।। शनि शुक्र को छोड़कर शेष ग्रह (भौम, बुध, गुरु) अस्त हों तो रश्मि का अभाव होता है, रश्मिपति वक्रारंभ में हों तो पूर्व रश्मि को दूना करने से।।१४।।

६३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अनुपातोंऽन्तरे वक्रं त्यागेऽष्टांशविहीनकाः । मंदायां दशभागोना वस्वंशोना कराःस्मृताः ।। १५ ।। वक्र के अन्त्य में हो तो रश्मि में ८ से भाग देने से लब्ध स्पष्ट रश्मि होती है, वक्र के मध्य में हो तो अनुपात द्वारा रश्मि लाना चाहिये। रश्मिपति मंदगति हो तो रश्मि का दशांश पूर्व रश्मि में घटाने से, यदि मंदतर गति हो तो अष्टमांश हीन करने से ।।१५।। तथा शीघ्रतरायां च वेदांशोनाः कराः स्मृताः । अंगाशोनाश्च शीघ्रायां केचिदेवं वदन्ति हि ।। १६ ।। शीघ्रगति हो तो छठाँ भाग हीन करने से और शीघ्रतर गति हो तो चतुर्थांश हीन करने से स्पष्ट रश्मि होती है ऐसा कुछ ऋषियों का मत है।।१६।। अथ ग्रहाणां अष्टधा गतिः- वक्रानुवक्रा विकला शीघ्रा शीघ्रतरागतिः । वृद्धिहीने तु शिष्टे द्वे वर्जनीये समासमा ।। १७ ।। वक्र, अनुवक्र, विकला, शीघ्रगति, शीघ्रतरा, मंदगति, मंदतरा, समासमा ये आठ प्रकार की ग्रहों की गति होती हैं। शीघ्रतर गति वृद्धि हीन होने से मंदगति और शीघ्रगति वृद्धिहीन होने से अतिमंदतर होती है।।१७।। योगविशेषात्ह्रासवृद्धिः । योगेषु ये ग्रहाः प्रोक्तास्तेषां योगे च रश्मयः । पापसौम्यरिमित्राणां योगे हानिश्च कीर्त्तिताः ।। १८ ।। उच्चादिषु पूर्वोक्ताः पापो बलवशाद्भवेत् ।। १९ ।। पूर्व में जो राजयोग कहे गये हैं उनमें (राजयोग कारक और दरिद्र योग कारक) राजयोग कारक ग्रहों के रश्मियों के योग में दरिद्र योग कारक ग्रहों के रश्मियों को घटा देने से शेष राजयोग कारक रश्मि होती है।। १८ ।। इसी प्रकार पापग्रहों की उच्चादि नव स्थान पर्यन्त रश्मियों को उनके बल के अनुसार न्यूनाधिक करने से उनकी स्पष्ट रश्मि होती है।।१९।।

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३९ द्विग्रहादियोगे निर्णयः- द्विग्रहादिषु योगेषु ग्रहभावकलाहताः । ग्रह गति संज्ञानुरूपेण फलानां निर्णयः स्मृताः ।।२०।। दो तीन आदि ग्रहों के योग में ग्रहों के भाव के फलादि को उनके रश्मियों से गुण देना यदि साठ ६० से अधिक हो तो ६० से भाग देने से लब्धि स्पष्ट रश्मि होती है। ग्रहों के रश्मियों का फल उनके गति के अनुसार ही होता है।।२०।। इष्टकष्टरश्मेः प्रयोजनम् – इष्टकष्टबलसंगुणास्ततस्तत्करानथ च संयुतास्तुतान्। निश्चितार्थमखिलं समीक्ष्यतत्रस्तुतं तु सकलं वदेद्बुधः।।२१।। ग्रहों के इष्ट कष्ट बल से उनके रश्मियों को गुणकर उसमें ६० से भाग देने से ग्रहों की इष्ट और कष्ट रश्मि होती है। इन सम्पूर्ण रश्मियों को देखकर ग्रहों के फलों को कहना चाहिये।।२१।। एकतः पंचरश्मियोग फलम् – एकादि पंचकं यावद्दरिद्रा भृशदुःखिताः । नीचानां दासतां याता अपि जाता कुलोत्तमे ।।२२।। एक से पांच रश्मि योग में उत्पन्न पुरुष अत्यंत दुःखी होता है। यदि उत्तम कुल में उत्पन्न पुरुष हो तो नीचों की नौकरी करता है।।२२।। दशरश्मियोग फलन् – परतो दशकं यावत्केवलं जठराय वै । निःस्वाः कदाचिद्दासाश्च भारवाहाः कदाचन । स्त्रीपुत्रगृहहीनाश्च वंशायोग्यक्रियारताः ।।२३।। ६ से १० तक रश्मियोग हो तो पुरुष केवल पेट भरनेवाला, निर्धन, कभी दासता करनेवाला, कभी बोझा ढोने का काम करनेवाला, स्त्री पुत्र से हीन और कुल के विपरीत कार्य करनेवाला होता है।।२३।। एकादशतो त्रयोदशपर्यन्तं रश्मिफलम् – एकादशेऽल्पपुत्रस्यादल्पस्वं स्त्रीविमानितः । विभ्रति कृच्छ्रेण निजं स्वल्पं च कुटुम्बकम् ।।२४।। ग्यारह रश्मियोग हो तो अल्पपुत्र, अल्पधन और स्त्री से अनादर और थोड़े कुटुम्ब को भी कष्ट से पालन करनेवाला होता है।।२४।।

६४० वृहतपाराशरहोराशास्त्रम् । द्वादशे निर्धनः मूर्खाधूर्ताः सत्त्वविनाशकाः । त्रयोदशे च चौराः स्युर्निर्धनाः कुलपांशवाः ॥२५॥ बारह रश्मियोग हो तो निर्धन, मूर्ख, सत्त्वहीन होता है, तेरह रश्मियोग में चोर निर्धन और कुलकलंक होता है॥२५॥ चतुर्दशतः पञ्चदश रश्मि फलम् - विद्वांश्चतुर्दशे धर्मेरतो मर्षी धनार्जकः । कुटुम्बभरणे सक्तः कुलयोग्यक्रियो भवेत् ॥२६॥ चौदह रश्मियोग हो तो धार्मिक, क्रोधहीन, धन को पैदा करनेवाला, कुटुम्ब के भरण पोषण में समर्थ और कुलयोग्य क्रिया करनेवाला होता है॥२६॥ रश्मिभिः पंचदशभिरेवं पूर्वोक्त गुणयुतोऽपिसन् । स्ववंशमुख्यो जनवानित्याह भगवान्मुनिः ॥२७॥ पंद्रह रश्मियोग में पूर्वोक्त गुणों से युक्त होते हुए भी अपने कुल में प्रधान और धनी होता है ऐसा पराशर मुनि ने कहा है॥२७॥ षोडशतः द्वाविंशतिपर्यन्त रश्मियोग फलम् - आविंशतेः कुलेशानां बहुभृत्यः कुटुम्बिनः । कीर्त्तिमंतश्च पूर्णाश्च स्वजनेन च षोडशात् ॥२८॥ १६ से २० तक रश्मियोग हो तो कुल को पालन करनेवाला, बहुत से नौकरों से युक्त, कुटुम्बी, कीर्त्ति से युक्त और स्वजनों से पूर्ण होता है॥२८॥ एकविंशति विख्यातः पंचाशज्जनपोषकः । दानशीलः कृपायुक्तो द्वाविंशे लोभ संयुतः ॥२९॥ २१ रश्मि हो तो बड़ा प्रसिद्ध और पचासों लोगों का पालन करनेवाला होता है और २२ रश्मियोग में दानशील और कृपालु होता है॥२९॥ त्रिंशत्पर्यन्तरश्मिफलम् - धनवानल्प शत्रुश्च प्रभुः स्वल्पगुणो भवेत् । त्रयोविंशे च मुख्यश्च विद्याहीनो धनीसुखी ॥३०॥ रश्मियोग २३ हो तो मनुष्य धनी, अल्प शत्रु, समर्थ और अल्पगुणी होता है॥३०॥