बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
२. चतुर्थ-षष्ठ सर्ग: स्त्री-विघात, अभिनिष्क्रमण (महात्याग) एवं छन्दक-निवर्तन
ततस्तथा शोकविलापविह्वलां यशोधरां प्रेक्ष्य वसुन्धरांगताम्। महारविन्दैरिव वृष्टिताडितैर्मुखैः सबाष्पैर्व्रनिता विचक्रुशुः ॥८.७१ तब उस प्रकार शोक व विलाप से विह्वल यशोधरा को वसुन्धरा पर आई देखकर, वृष्टि-ताड़ित बड़े-बड़े कमलों के समान साश्रु मुखों से वनिताओं ने क्रदन किया ॥71 ॥ समाप्तजाप्यः कृतहोममङ्गलो नृपस्तु देवायतनाद्विनिर्ययौ। जनस्य तेनार्तरवेण चाहतश्चचाल वज्रध्वनिनेव वारणः ॥८.७२ जप समाप्त कर, मङ्गलमय हवन-कर्म करके, राजा देव-मन्दिर से बाहर आया और लोगों की उस आर्त ध्वनि से आहत होकर वैसे ही काँप उठा, जैसे वज्र के शब्द से हाथी ॥72 ॥ निशम्य च च्छन्दकन्थकावुभौ सुतस्य संश्रुत्य च निश्चयं स्थिरम्। पपात शोकाभिहतो महीपतिः शचीपतेर्वृत्त इवोत्सवे ध्वजः ॥८.७३ छन्दक व कन्थक दोनों को देखकर और पुत्र का दृढ़ निश्चय सुनकर, शोक से अभिभूत हो, राजा वैसे ही गिर पड़ा, जैसे उत्सव समाप्त होनेपर इन्द्र की ध्वजा ॥73 ॥ ततो मुहूर्तं सुतशोकमोहितो जनेन तुल्याभिजनेन धारितः। निरीक्ष्य दृष्ट्या जलपूर्णया हयं महीतलस्थो विललाप पार्थिवः ॥८.७४ तब मुहूर्तभर पुत्र के शोक से वह मूर्च्छित रहा, तुल्य कुल के लोगों ने उसे धारण; जलपूर्ण दृष्टि से घोड़े को देखकर, पृथिवी पर पड़े हुए राजा ने विलाप किया:— ॥74 ॥ बहूनि कृत्वा समरे प्रियाणि मे महत्त्वया कन्थक विप्रियं कृतम्। गुणप्रियो येन वने स मे प्रियः प्रियोऽपि सन्नप्रियवत्प्रवेरितः ॥८.७५ “युद्ध में मेरे बहुतेरे प्रिय (काम) करके, हे कन्थक, तुमने यह बड़ा अप्रिय (कर्म) किया, मेरे उस गुण-प्रिय पुत्र को प्रिय होनेपर भी अप्रिय के समान वन में फेंक दिया ॥75 ॥ तदद्य मां वा नय तत्र यत्र स व्रज द्रुतं वा पुनरेनमानय। ऋते हि तस्मान्मम नास्ति जीवितं विगाढरोगस्य सदौषधादिव ॥८.७६ अतः आज मुझे वहाँ ले चलो जहाँ वह है; या जल्दी जाओ, फिर उसे ले आओ क्योंकि उसके बिना मैं जीवित नही रहूँगा, जैसे अच्छी ओषधी के बिना रोग-ग्रस्त व्यक्ति (जीवित नही रह सकता) ॥76 ॥ सुवर्णनिष्ठीविनि मृत्युना हते सुदुष्करं यन्न ममार सञ्जयः। अहं पुनर्धर्मरतौ सुते गते मुमुक्षुरात्मानमनात्मवानिव ॥८.७७ सुवर्णनिष्ठीवी का मृत्यु द्वारा हरण होनेपर सञ्जय (=सृञ्जय) नही मरा, यह अति दुष्कर हुआ; किन्तु मैं, धर्म-रत पुत्र के चले जानेपर, असंयतात्मा के समान आत्मा (=प्राण) छोड़ने की इच्छा कर रहा हूँ ॥77 ॥ विभोर्दशक्षत्रकृतः प्रजापतेः परापरज्ञस्य विवस्वदात्मनः। प्रियेण पुत्रेण सता विनाकृतं कथं न मुह्येद्धि मनो मनोरपि ॥८.७८ दस राज्यों के स्रष्टा, प्रभु, प्रजापति, पर व अपर को जाननेवाले, विवस्वान् के पुत्र, मनु का भी मन, अच्छे प्रिय पुत्र से वियुक्त होकर, कैसे मूर्छित न हो? ॥78 ॥ अजस्य राज्ञस्तनयाय धीमते नराधिपायेन्द्रसखाय मे स्पृहा। गते वनं यस्तनये दिवं गतो न मोघबाष्पः कृपणं जिजीव ह ॥८.७९ राजा अज के बुद्धिमान पुत्र, इन्द्र के मित्र, नराधिप (दशरथ) से मुझे ईर्ष्या है जो पुत्र के वन जानेपर स्वर्ग चले गये, व्यर्थ आँसू बहाते हुए दीन होकर जीवित नही रहे ॥79 ॥ प्रचक्ष्व मे भद्र तदाश्रमाजिरं हतस्त्वया यत्र स मे जलाञ्जलिः। इमे परीप्सन्ति हि तं पिपासवो ममासवः प्रेतगतिं यियासवः ॥८.८० हे भद्र, मुझे वह आश्रम-स्थान बताओ जहाँ तुम मेरी उस जलाञ्जलि (=जलाञ्जलि देनेवाले) को ले गये हो; क्योंकि प्रेत गति को जाने की (=मरने की) इच्छा करनेवाले मेरे ये प्यासे प्राण उसे पाना चाहते हैं।” ॥80 ॥ इति तनयवियोगजातदुःखं क्षितिसदृशं सहजं विहाय धैर्यम्। दशरथ इव रामशोकवश्यो बहु विललाप नृपो विसञ्ज्ञकल्पः ॥८.८१ इस तरह पुत्र के वियोग से दुःखी होकर धरती की-सी स्वाभाविक धीरता को छोड़कर, राम के शोक से परतन्त्र दशरथ के समान, राजा ने मानो अचेत होकर बहुत विलाप किया ॥81 ॥ श्रुतविनयगुणान्वितस्तस्तं मतिसचिवः प्रवयाः पुरोहितश्च। समधृतमिदमूचतुर्यथावन्न च परितप्तमुखौ न चाप्यशोकौ ॥८.८२ तब विद्या, विनय व गुण से युक्त मन्त्री तथा प्रौढ़ पुरोहित ने, न संतप्त मुख होकर और न शोक-रहित होकर, तुल्य जन से धारण किये गये राजा को ठीक-ठीक यों कहा:— ॥82 ॥ त्यज नरवर शोकमोहि धैर्यं बुधृतिरिर्वाहसि धीर नाश्रु मोक्तुम्। स्रजमिव मृदितामपास्य लक्ष्मीं भुवि बहवो नृपा वनान्यतीयुः ॥८.८३ “हे नर-श्रेष्ठ शोक छोड़िए, धैर्य धारण कीजिए। हे धीर, अधीर के समान आपको आँसू न बहाना चाहिए। रौंदी गई माला के समान लक्ष्मी को छोड़कर (इस) पृथ्वी पर बहुत से राजा वन चले गये ॥83 ॥ अपि च नियत एष तस्य भावः स्मर वचनं तपसः पुरासितस्य। न हि स दिवि न चक्रवर्तिराज्ये क्षणमपि वासयितुं सुखेन शक्यः ॥८.८४ और भी, उसका यह भाव तो नियत ही था; पूर्व के असित ऋषि का वह वचन स्मरण कीजिए। न स्वर्ग में, न चक्रवर्ति-राज्य में क्षणभर के लिए भी वह सुख से रखा जा सकता है ॥84 ॥ यदि तु नृवर कार्य एव यत्नस्त्वरितमुदाहर यावदत्र यावः। बहुविधिमिह युद्धमस्तु तावत्तव तनयस्य विधेश्च तस्य तस्य ॥८.८५ हे नर-श्रेष्ठ, यदि यत्न करना ही है, तो तुरन्त कहिए, और हम वहाँ जायें। तब आपके पुत्र के और तरह- तरह के उपाय के बीच भाँति-भाँति का युद्ध हो” ॥85 ॥ 46 अश्वघोष
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**** नरपतिरथ तौ शशास तस्माद्द्रुतमित एव युवामभिप्रयातम् । **** न हि मम हृदयं प्रयाति शान्तिं वनशकुनेरिव पुत्रलालसस्य ॥८.८६ **** इसलिए तब राजा ने उन्हें आज्ञा दी— "यहाँ से आप दोनों शीघ्र चले जायें। क्योंकि, मेरा हृदय, पुत्र के **** लिए उत्सुक वन-पक्षी के हृदय के समान, शान्ति नहीं पा रहा है" ॥८६॥ **** परममिति नरेन्द्रशासनात्तौ ययतुर्मात्यपुरोहितौ वनं तत् । **** कृतमिति सवधूजनः सदारो नृपतिरपि प्रचकार शेषकार्यम् ॥८.८७ **** “अच्छा” कहकर राजा की आज्ञा से मन्त्री और पुरोहित दोनों ही उस वन को चले गये। “अच्छा ही **** किया गया”, ऐसा समझकर (पुत्र-) वधुओं और पत्नियों के साथ राजा ने भी शेष कार्य किया ॥८७॥ **** इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽन्तःपुरविलापो नामाष्टमः सर्गः ॥८॥ **** नवम सर्ग **** कुमार-अन्वेषण **** ततस्तदा मन्त्रिपुरोहितौ तौ बाष्पप्रतोदामिहतौ नृपेण । **** विद्धौ सदश्वाविव सर्वयत्नात्सौहार्दशीघ्रं ययतुर्वनं तत् ॥९.१ **** तब उस समय मन्त्री और पुरोहित दोनों, राजा के द्वारा अश्रुरूप अङ्कुश से आहत होकर, विद्ध हुए अच्छे **** घोड़े के समान समस्त यत्न से, सौहार्द के कारण वेग से उस वन को चले ॥१॥ **** तमाश्रमं जातपरिश्रमौ तावुपैत्य काले सदशानुयात्रौ । **** राजर्द्धिमत्सृज्य विनीतचेष्टावुपैयतुर्भार्गवधिष्ण्यमेव ॥९.२ **** समय पर योग्य अनुयायियों के साथ उस आश्रम के पास वे थके हुए पहुँचे। राज-ऋद्धि को छोड़, विनीत- **** चेष्ट हो, वे भार्गव के स्थान पर गये ॥२॥ **** तौ न्यायतस्तं प्रतिपूज्य विप्रं तेनार्चितौ तावपि चानुरूपम् । **** कृतासनौ भार्गवमासनस्थं छित्त्वा कथामूचतुरात्मकृत्यम् ॥९.३ **** उन दोनों ने उस विप्र की उचित पूजा की और उसने उन दोनों की भी योग्य पूजा की। आसन ग्रहण **** कर, दोनों ने आसनपर स्थित भार्गव से कथा काटकर (= सङ्क्षिप्त कर) अपना काम कहा:- ॥३॥ **** शुद्धौजसः शुद्धविशालकीर्तेरिक्ष्वाकुवंशप्रभवस्य राज्ञः । **** इमं जनं वेत्तु भवानधीतं श्रुतग्रहे मन्त्रपरिग्रहे च ॥९.४ **** “शुद्ध ओजवाले, शुद्ध व विशाल कीर्तिवाले, इक्ष्वाकु-वंश-प्रसूत राजा के इस व्यक्ति को (= हम दोनों **** को) आप शास्त्र और मन्त्रणा में निपुण (= पुरोहित और मन्त्री) जानें ॥४॥ **** तस्येन्द्रकल्पस्य जयन्तकल्पः पुत्रो जरामृत्युभयं तितीर्षुः । **** इहाभ्युपेतः किल तस्य हेतोरावामुपेतौ भगवानवैतु ॥९.५ **** उस इन्द्र-तुल्य का जयन्त-तुल्य पुत्र जरा और मृत्यु का भय पार करने की इच्छा से यहाँ आया है, इस **** हेतु हम दोनों आये हैं, ऐसा भगवान् जानें” ॥५॥ **** तौ सोऽब्रवीदस्ति स दीर्घबाहुः प्राप्तः कुमारो न तु नावबुद्धः । **** धर्मोऽयमावर्तक इत्यवेत्य यातस्त्वराडाभिमुखो मुमुक्षुः ॥९.६ **** उसने उन दोनों से कहा— “वह दीर्घबाहु आया था, कुमार है, किन्तु बुद्धिहीन नहीं। यह धर्म आवर्तक **** (= भ्रामक) है, ऐसा जानकर वह मुमुक्षु अराड के (आश्रम की) ओर चला गया” ॥६॥ **** तस्मात्तस्ताबुपलभ्य तत्त्वं तं विप्रमामन्त्र्य तदैव सद्यः । **** खिन्नावखिन्नाविव राजभक्त्या प्रसस्रतुस्तेन यतः स यात: ॥९.७ **** तब उससे वे दोनों सच्ची बात जानकर, उस विप्र से उसी समय तुरत विदा लेकर, उस ओर चल पड़े **** जिधर वह गया था, खिन्न होकर भी राज-भक्ति के कारण वे मानो अ-खिन्न थे ॥७॥ **** यान्तौ ततस्तौ मृजया विहीनमपश्यतां तं वपुषोज्वलन्तम् । **** उपोपविष्टं पथि वृक्षमूले सूर्यं घनाभोगमिव प्रविष्टम् ॥९.८ **** तब जाते हुए उन दोनों ने मार्जन-विहीन, किन्तु रूप से जलते कुमार को देखा; रास्ते पर वृक्ष की जड़ में **** वह बैठा हुआ था, जैसे बादलों के फैलाव में सूर्य घुसा हुआ हो ॥८॥ **** यानं विहायाथोपयौ ततस्तं पुरोहितो मन्त्रधरेण सार्धम् । **** यथा वनस्थं सहवामदेवो रामं दिदृक्षुर्मुनि रौर्वशेयः ॥९.९ **** तब रथ छोड़कर मन्त्री के साथ पुरोहित उसके समीप गया, जैसे वन में स्थित राम के समीप वामदेव के **** साथ दर्शनाभिलाषी और्वशेय मुनि (= वशिष्ठ) गया था ॥९॥ **** तावर्चयामासतुरर्हतस्तं दिवीव शुक्राङ्गिरसौ महेन्द्रम् । **** प्रत्यर्चयामास स चार्जतस्तौ दिवीव शुक्राङ्गिरसौ महेन्द्रः ॥९.१० **** उन दोनों ने उसकी उचित पूजा की, जैसे स्वर्ग में शुक्र और आङ्गिरस (= बृहस्पति) ने इन्द्र की (पूजा की **** थी) और उसने उन दोनों की उचित पूजा की, जैसे स्वर्ग में इन्द्र ने शुक्र और आङ्गिरस की (पूजा की **** थी) ॥१०॥ **** कृताभ्यनुज्ञावभितस्तस्तौ निषेदतुः शाक्यकुलध्वजस्य । **** विरेजतुस्तस्य च सन्निकर्षे पुनर्वसू योगगताविवेन्दोः ॥९.११ **** आज्ञा पाकर, शाक्य-कुल की पताका (सिद्धार्थ) की दोनों ओर वे दोनों बैठ गये और उसके समीप ऐसे **** विराजे जैसे चन्द्रमा के समीप योग को प्राप्त पुनर्वसु-युगल ॥११॥ **** तं वृक्षमूलस्थमभिज्वलन्तं पुरोहितो राजसुतं बभाषे । **** यथोपविष्टं दिवि पारिजाते बृहस्पतिः शक्रसुतं जयन्तम् ॥९.१२ **** वृक्ष-मूल में स्थित उस जलते हुए राज-पुत्र से पुरोहित ने कहा, जैसे स्वर्ग में परिजात वृक्ष के नीचे बैठे **** हुए शक्र-पुत्र जयन्त से बृहस्पति (कह रहा हो):- ॥१२॥ **** बुद्धचरित 47
त्वच्छोकशल्ये हृदयावगाढे मोहं गतो भूमितले मुहूर्तम्। कुमार राजा नयनाम्बुवर्षो यत्वामवोचत्तदिदं निबोध ॥९.१३ "तुम्हारा शोकरूप शल्य हृदय में गड़नेपर, भूतल पर मुहूर्त भर मूर्छित होकर, हे कुमार, राजा ने नयन- जल बरसाते हुए, तुम्हें जो कहा है वह यह है, सुनो:- ॥13 ॥ जानामि धर्मं प्रति निश्चयं ते परैमि ते भाविनमेतमर्थम् । अहं त्वकाले वनसंश्रयात्ते शोकाग्निनाग्निप्रतिमेन दह्ये ॥९.१४ "धर्म के प्रति तुम्हारा निश्चय जानता हूँ, समझता हूँ कि यह तुम्हारा भावी लक्ष्य है, किन्तु असमय में तुम वन का आश्रय ले रहे हो, अतः अग्नि-तुल्य शोकाग्नि से मैं जल रहा हूँ॥14 ॥ तदेहि धर्मप्रिय मत्प्रियार्थं धर्मार्थमेव त्यज बुद्धिमेताम् । अयं हि मा शोकरयः प्रवृद्धो नदीरयः कूलमिवाभिहन्ति ॥९.१५ इसलिए, हे धर्मप्रिय, मेरा प्रिय करने के लिए आओ, धर्म के लिए ही इस बुद्धि को छोड़ो। यह बढ़ा हुआ शोक का वेग मुझे वैसे ही मार रहा है, जैसे बढ़ा हुआ नदी का वेग किनारे को (काटता है) ॥15 ॥ मेघाम्बुकक्षाद्रिषु या हि वृत्तिः समीरणार्काग्निमहाशनीनाम् । तां वृत्तिमस्मासु करोति शोको विकर्षणोच्छोषणदाहभेदैः ॥९.१६ मेघ, जल, तृण व पर्वत के प्रति (क्रमशः) पवन, सूर्य अग्नि व महा-वज्र का जो काम होता है, विकर्षण, शोषण, दाह व भेदन द्वारा वही काम हमारे प्रति शोक कर रहा है ॥16 ॥⁴¹ तद्भुङ्क्ष्व तावद्वसुधाधिपत्यं काले वनं यास्यसि शास्त्रदृष्टे । अनिष्ठबन्धौ कुरु मय्यपेक्षां सर्वेषु भूतेषु दया हि धर्मः ॥९.१७ इसलिए तबतक वसुधा के आधिपत्य का भोग करो, शास्त्र-सम्मत समय पर वन जाओगे। मुझ अवांछित पिता की आकाङ्क्षा करो, क्योंकि सब भूतों पर दया (करना ही तो) धर्म है ॥17 ॥ न चैष धर्मो वन एव सिद्धः पुरेऽपि सिद्धिर्नियता यतीनाम् । बुद्धिश्च यत्नश्च निमित्तमत्र वनं च लिङ्गं च हि भीरुचिह्नम् ॥९.१८ और, यह धर्म (केवल) वन में ही सिद्ध नहीं होता, नगर में भी यतियों (= संयमियों) की सिद्धि नियत है। इसमें बुद्धि और यत्न निमित्त हैं, वन और (भिक्षु-) वेष तो कायर के चिह्न हैं ॥18 ॥ मौलीधरैरंसविषक्तहारैः केयूरविष्टब्धभुजैर्नरेन्द्रैः । लक्ष्म्यङ्कमध्ये परिवर्तमानैः प्राप्तो गृहस्थैरपि मोक्षधर्मः ॥९.१९ मुकुट धारण करनेवाले राजाओं ने, जिनके गले में हार लटकते थे और जिनकी भुजाएँ केयूरों से बँधी थीं, गृहस्थ होकर भी (= घर में रहकर भी) लक्ष्मी की गोद में लोटते हुए मोक्ष-धर्म प्राप्त किया ॥19 ॥ ⁴¹_ देखिये, सौ० सत्रह 59 । 48 अश्वघोष
ध्रुवानुजौ यौ बलिवज्रबाहू वैभ्राजमाषाढमथान्तिदेवम् । विदेहराजं जनकं तथैव (रामं) द्रुमं सेनजितश्च राज्ञः ॥९.२० ध्रुव के जो दो छोटे भाई बलि और वज्रबाहु, वैभ्राज, आषाढ़ और अन्तिदेव, विदेह-राज जनक, राम द्रुम और सेनजित् राजागण ॥20 ॥ एतान् गृहस्थान्नृपतीनवेहि नैःश्रेयसे धर्मविधौ विनीतान् । उभौऽपि तस्माद्युगपद्भजस्व चित्ताधिपत्यं च नृपश्रियं च ॥९.२१ विदित हो कि ये गृहस्थ राजा परम कल्याण-कारी धर्म-विधि में शिक्षित थे। इसलिए एक ही साथ ज्ञान के आधिपत्य व राज्यलक्ष्मी दोनों का सेवन करो ॥21 ॥ इच्छामि हि त्वामुपगूह्य गाढं कृताभिषेकं सलिलार्द्रमेव । धृतातपत्रं समुदीक्ष्यमाणस्तेनैव हर्षेण वनं प्रवेष्टुम् ॥९.२२ मैं चाहता हूँ कि अभिषेक करनेपर जल से आर्द्र रहनेपर ही तुम्हारा गाढ़ आलिङ्गन कर, छत्र के नीचे तुम्हें देखता हुआ उसी आनन्द से वन में प्रवेश करूँ" ॥22 ॥ इत्यब्रवीद्भूमिपतिर्भवन्तं वाक्येन बाष्पग्रथिताक्षरेण । श्रुत्वा भवानर्हति तत्प्रियार्थं स्नेहेन तत्स्नेहमनुप्रयातुम् ॥९.२३ राजा ने आपको ऐसा कहा; उसके वाक्य के अक्षर बाष्प से ग्रथित थे। यह सुनकर उसका प्रिय करने के लिए आपको स्नेहपूर्वक उसके स्नेह का अनुसरण करना चाहिए ॥23 ॥ शोकाम्भसि त्वत्प्रभवे ह्यगाधे दुःखार्णवे मज्जति शाक्यराजः । तस्मात्तमुत्तारय नाथहीनं निराश्रयं मग्नमिवार्णवे नौः ॥९.२४ तुमसे उत्पन्न अगाध दुःख सागर में, जिसका जल शोक है, शाक्यराज डूब रहा है। उससे उस नाथ-हीन को उबारो, जैसे सागर में डूबते निराश्रय (व्यक्ति) को नाव (उबारती) है ॥24 ॥ भीष्मेण गङ्गोदरसम्भवेन रामेण रामेण च भार्गवेण । श्रुत्वा कृतं कर्म पितुः प्रियार्थं पितुस्त्वमप्यर्हसि कर्तुमिष्टम् ॥९.२५ गङ्गा के उदर से उत्पन्न भीष्म ने, राम ने, और भार्गव राम ने, पिता के प्रिय के लिए काम किया, यह सुनकर तुम्हें भी पिता का प्रिय करना चाहिए ॥25 ॥ संवर्धयित्रीं समवेहि देवीमगस्त्यजुष्टां दिशमप्रयाताम् । प्रनष्टवत्सामिव वत्सलां गामजस्रमार्तां करुणं रुदन्तीम् ॥९.२६ विदित हो कि तुम्हारा संवर्धन करनेवाली देवी, (गौतमी) जो (अबतक) अगस्त्य से सेवित दिशा को नहीं गई है (= नहीं मरी है), उस वत्सल गाय के समान, जिसका बछड़ा नष्ट हो गया हो, आर्त और करुण होकर निरन्तर रो रही है ॥26 ॥ हंसेन हंसीमिव विप्रयुक्तां त्यक्तां गजेनेव वने करेणुम् । आर्त्तां सनाथामपि नाथहीनां त्रातुं वधूमर्हसि दर्शनेन ॥९.२७
हंस से वियुक्त हंसी के समान, हाथी से वन में परित्यक्त हथिनी के समान, आर्त पत्नी को, जो सनाथा होनेपर भी अनाथा है, तुम्हें दर्शन देकर बचाना चाहिए ॥२7 ॥ एकं सुतं बालमनर्हदुःखं सन्तापमन्तर्गतमुद्वहन्तम् । तं राहुलं मोक्षय बन्धुशोकाद्ग्राहूपसर्गादिव पूर्णचन्द्रम् ॥९.२८ एकमात्र बाल-पुत्र, जो दुःख के योग्य नही है, भीतरी सन्ताप वहन कर रहा है। उस राहुल को पितृ-शोक से मुक्त करो, जैसे राहु के ग्रहण से पूर्ण चन्द्र को (मुक्त किया जाय) ॥२8 ॥ शोकाग्निना त्वद्विरहेन्धनेन निःश्वासधूमेन तमःशिखेन। त्वद्दर्शनाम्ब्विच्छति दह्यमानमन्तःपुरं चैव पुरं च कृत्स्नम् ॥९.२९ शोकरूप अग्नि से, जिसका ईंधन तुम्हारा विरह है, जिसका धुआँ लम्बी साँसें हैं, जिसकी शिखा अन्धकार है, जलता हुआ अन्तःपुर और सम्पूर्ण नगर तुम्हारे दर्शन-जल की इच्छा कर रहे हैं।" ॥२9 ॥ स बोधिसत्त्वः परिपूर्णसत्त्वः श्रुत्वा वचस्तस्य पुरोहितस्य । ध्यात्वा मुहूर्तं गुणवद्गुणज्ञः प्रत्युत्तरं प्रश्रितमित्युवाच ॥९.३० उस पुरोहित का वचन सुनकर धैर्यशाली, गुणवान् व गुणज्ञ बोधिसत्त्व ने मुहूर्त भर ध्यान किया और विनय-युक्त यह उत्तर दियाः— ॥30 ॥ अवैमि भावं तनये पितॄणां विशेषतो यो मयि भूमिपस्य । जानन्नपि व्याधिजराविपद्भ्यो भीतस्त्वगत्या स्वजनं त्यजामि ॥९.३१ “पुत्र के प्रति पिता का भाव जानता हूँ, विशेषकर मेरे प्रति राजा का जो (भाव) है; यह जानता हुआ भी मैं रोग, बुढ़ापे व मौत से डरकर, (अन्य) उपाय के अभाव में स्वजन को छोड़ रहा हूँ ॥31 ॥ द्रष्टुं प्रियं कः स्वजनं हि नेच्छेन्नान्ते यदि स्यात्प्रियविप्रयोगः । यदा तु भूत्वापि चिरं वियोगस्ततो गुरुं स्निग्धमपि त्यजामि ॥९.३२ यदि अन्त में वियोग न हो, तो प्यारे स्वजन को देखना कौन नही चाहेगा? जब कि देर होकर भी वियोग होता ही है, इसलिए स्नेही पिता को भी छोड़ रहा हूँ ॥32 ॥ मद्धेतुकं यत्तु नराधिपस्य शोकं भवानह न तत्प्रियं मे । यत्स्वप्नभूतेषु समागमेषु सन्तप्यते भाविनि विप्रयोगे ॥९.३३ मेरे कारण हुआ राजा का शोक आपने जो कहा वह मुझे प्रिय नही; क्योंकि समागम स्वप्न-सदृश होनेपर और वियोग अवश्यम्भावी होनेपर वह सन्ताप कर रहे हैं ॥33 ॥ एवं च ते निश्चयमेतु बुद्धिर्दृष्ट्वा विचित्रं जगतः प्रचारम् । सन्तापहेतुर्न सुतो न बन्धुरज्ञाननैमित्तिक एष तापः ॥९.३४ जगत् की विचित्र गति देखकर, आपकी बुद्धि इस प्रकार निश्चय करे—सन्ताप का कारण न पुत्र है न पिता, इस सन्ताप का कारण निमित्त अज्ञान है ॥34 ॥ यथाध्वगानामिहं सङ्गतानां काले वियोगो नियतः प्रजानाम् । प्राज्ञो जनः को नु भजेत शोकं बन्धुप्रतिज्ञातजनैर्विहीनः ॥९.३५ पथिकों के समान, इस संसार में, सम्मिलित हुए लोगों का वियोग नियत है; अतः बन्धु समझे जानेवाले लोगों से वियुक्त होकर कौन ज्ञानीजन शोक करे ॥35 ॥ इहैति हित्वा स्वजनं परत्र प्रलभ्य चेहापि पुनः प्रयाति । गत्वापि तत्राप्यपरत्र गच्छत्येवं जने त्यागिनि कोऽनुरोधः ॥९.३६ पूर्व जन्म में स्वजन को छोड़कर मनुष्य यहाँ आता है और फिर यहाँ से भी (स्वजन को) ठगकर वह यहाँ से (परलोक) चला जाता है, वहाँ भी जाकर वहाँ से अन्यत्र चला जाता है; इस प्रकार परित्याग करनेवाले आदमी में आसक्ति क्यों की जाय? ॥36 ॥ यदा च गर्भात्प्रभृति प्रवृत्तः सर्वास्ववस्थासु वधाय मृत्युः । कस्मादकाले वनसंश्रयं मे पुत्रप्रियस्तत्प्रभवानवोचत् ॥९.३७ और जब गर्भ से लेकर सब अवस्थाओं में मौत मारने के लिए तैयार रहती है, तब क्यों पुत्र-प्रिय पूज्य (पिताजी) ने कहा कि मैं अकाल में वन का आश्रय ले रहा हूँ ॥37 ॥ भवत्यकालो विषयाभिपत्तौ कालस्तथैवार्थविधौ प्रदिष्टः । कालो जगत्कर्षति सर्वकालान्निर्वाहके श्रेयसि नास्ति कालः ॥९.३८ विषय-सेवन के लिए अकाल होता है, उसी प्रकार धन (= अर्जन) के उपाय के लिए समय निर्दिष्ट है, सब समय में काल संसार को लाचार करता रहा है, मोक्ष-प्रद कल्याण के लिए (कोई निश्चित) समय नही है ॥38 ॥ राज्यं मुमुक्षुर्मयि यच्च राजा तदप्युदारं सदृशं पितुश्च । प्रतिग्रहीतुं मम न क्षमं तु लोभादपथ्यान्नमिवातुरस्य ॥९.३९ मेरे ऊपर राजा राज्य छोड़ना चाहते हैं यह उनकी उदारता है और पिता के अनुरूप है; किन्तु मेरे लिए इसे ग्रहण करना ठीक नही, जैसे रोगी के लिए लोभ से अपथ्य अन्न ग्रहण करना ठीक नही ॥39 ॥ कथं नु मोहायतनं नृपत्वं क्षमं प्रपत्तुं विदुषा नरेण । सोद्वेगता यत्र मदः श्रमश्च परापचारेण च धर्मपीडा ॥९.४० किस प्रकार विद्वान् आदमी के लिए उस राजत्व का सेवन करना उचित नही है, जो मोह का मन्दिर है, जहाँ उद्वेग, मद व थकावट हैं, और जहाँ दूसरों पर अनाचार करने से धर्म में बाधा होती है? ॥40 ॥ जाम्बूनदं हर्म्यमिव प्रदीप्तं विषेण संयुक्तमिवोत्तमान्नम् । ग्राहकुलं चाम्ब्विव सारविन्दं राज्यं हि रम्यं व्यसनाश्रयं च ॥९.४१ सोने के जलते महल के समान, विष-युक्त उत्तम भोजन के समान, घडियालों से भरे कमल-युक्त जलाशय के समान, राज्य रमणीय है और विपत्तियों का आश्रय है ॥41 ॥ बुद्धचरित 49
इत्थं च राज्यं न सुखं न धर्मः पूर्वै यथा जातघृणा नरेन्द्रैः। वयःप्रकर्षेऽपरिहार्यदुःखे राज्यानि मुक्त्वा वनमेव जग्मुः ॥९.४२ इस प्रकार, राज्य से न सुख होता है, न धर्म; पूर्व में घृणा (=अरूचि) उत्पन्न होनेपर राजा लोग वृद्धावस्था में, जिसमें दुःख अवश्यम्भावी है, राज्य छोड़कर वन को ही गये ॥42॥ वरं हि भुक्तानि तृणान्यरण्ये तोषं परं रत्नमिवोपगृह्य। सहोषितं श्रीसुलभैर्न चैव दोषैर्दृश्यैरिव कृष्णसर्पैः ॥९.४३ जङ्गल में तृण खाकर मानो रत्न-स्पर्श का परम सन्तोष पाना अच्छा है, न कि श्री-सुलभ उन दोषों के साथ रहना जो कृष्ण-सर्पों के समान देखे जाने योग्य नही ॥43॥ श्लाघ्यं हि राज्यानि विहाय राज्ञां धर्माभिलाषेण वनं प्रवेष्टुम्। भग्नप्रतिज्ञस्य न तूपपन्नं वनं परित्यज्य गृहं प्रवेष्टुम् ॥९.४४ राज्य छोड़कर धर्म की अभिलाषा से राजाओं का वन में प्रवेश करना श्लाघ्य हैं; किन्तु प्रतिज्ञा तोड़ करके, वन छोड़कर, घर में प्रवेश करना उचित नहीं ॥44॥ जातः कुले को हि नरः ससत्त्वो धर्माभिलाषेण वनं प्रविष्टः। काषायमुत्सृज्य विमुक्तलज्जः पुरन्दरस्यापि पुरं श्रयेत ॥९.४५ (उत्तम) कुल में उत्पन्न कौन धैर्यशाली आदमी, जिसने धर्म की अभिलाषा से वन में प्रवेश किया है, काषाय-वस्त्र छोड़, निर्लज्ज हो इन्द्र के भी नगर में जायगा? ॥45॥ लोभाद्धि मोहादथवा भयेन यो वान्तमन्नं पुनराददीत। लोभात्स मोहादथवा भयेन सन्त्यज्य कामान् पुनराददीत ॥९.४६ लोभ से, मोह से अथवा भय से जो उगले हुए अन्न को फिर ग्रहण करेगा, वही लोभ से, मोह अथवा भय से काम-भोगों को छोड़कर फिर ग्रहण करेगा? ॥46॥ यश्च प्रदीप्ताच्छरणात्कथञ्चिन्निष्क्रम्य भूयः प्रविशेत्तदेव। गार्हस्थ्यमुत्सृज्य स दृष्टदोषो मोहेन भूयोऽभिलषेद्ग्रहीतुम् ॥९.४७ और, जो जलते घर से किसी प्रकार निकलकर फिर उसी में प्रवेश करे वही मनुष्य, दोष देखकर गार्हस्थ्य (= घर में रहना) छोड़ने के बाद, मोह से फिर उसे ग्रहण करना चाहेगा? ॥47॥⁴² ⁴²- नेपाल दरबार के हस्तलिखित ग्रन्थ में 47 के बाद और तिब्बती अनुवाद में 49 के बाद निम्नलिखित पद्य है— वह्नेश्च तोयस्य च नास्ति संधिः शठस्य सत्यस्य च नास्ति संधिः। आर्यस्य पापस्य च नास्ति संधिः शमस्य दण्डस्य च नास्ति संधिः॥ अग्नि और जल का मेल नहीं है, शठ और सत्य का मेल नहीं है, आर्य और पाप का मेल नहीं है, शम और दण्ड का मेल नहीं है। या च श्रुतिर्मोक्षमवाप्तवन्तो नृपा गृहस्था इति नैतदस्ति। शमप्रधानः क्व च मोक्षधर्मो दण्डप्रधानः क्व च राजधर्मः ॥९.४८ यह (जन-) श्रुति कि गृहस्थ (= घर में रहते हुए) राजाओं ने मोक्ष पाया, यह सच नही है, कहाँ शम- प्रधान मोक्ष-धर्म और कहाँ दण्ड-प्रधान राज-धर्म ॥48॥ शमे रतिश्चेच्छिथिलं च राज्यं राज्ये मतिश्चेच्छमविप्लवश्च। शमश्च तीक्ष्ण्यं च हि नोपपन्नं शीतोष्णयोरेक्यमिवोदकाग्न्योः ॥९.४९ यदि शम (= शान्ति) में रति हो, तो राज्य शिथिल होगा; यदि राज्य में मति हो, तो शान्ति में विप्लव होगा। शान्ति व तीक्ष्णता का मेल नही, जैसे शीतल जल व गर्म आग की एकता नही होती ॥49॥ तन्निश्चयाद्वा वसुधाधिपास्ते राज्यानि मुक्त्वा शममाप्तवन्तः। राज्याङ्गिता वा निभृतेन्द्रियत्वादन्नैष्ठिके मोक्षकृताभिमानाः ॥९.५० इसलिए उन वसुधाधिपों ने या तो निश्चय-पूर्वक राज्य छोड़कर शम प्राप्त किया, या राज्य के स्वामी होकर (केवल) इन्द्रिय-संयम होने के कारण अनैष्ठिक अवस्था में ही मोक्ष पाने का अभिमान किया ॥50॥⁴³ तेषां च राज्येऽस्तु शमो यथावत्प्राप्तो वनं नाहमनिश्चयेन। छित्त्वा हि पाशं गृहबन्धुसञ्ज्ञं मुक्तः पुनर्न प्रविविक्षुरस्मि ॥९.५१ उन्हें राज्य में सम्यक् शान्ति मिली हो, मैंने अनिश्चय से वन में प्रवेश नही किया है। गृह व बन्धु नामक बन्धन काटकर मुक्त हुआ मैं फिर (बन्धन में) प्रवेश करना नही चाहता हूँ।" ॥51॥ इत्यात्मविज्ञानगुणानुरूपं मुक्तस्पृहं हेतुमदूर्जितं च। श्रुत्वा नरेन्द्रात्मजमुक्तवन्तं प्रत्युत्तरं मन्त्रधरोऽप्युवाच ॥९.५२ इस तरह राजा के पुत्र का अपने ज्ञान व गुणों के अनुरूप निरभिलाष युक्तियुक्त व बलवान् उत्तर सुनकर, मन्त्री ने भी प्रति-उत्तर दिया:— ॥52॥ यो निश्चयो धर्मविधौ तवायं नायं न युक्तो न तु कालयुक्तः। शोकाय दत्वा पितरं वयःस्थं स्याद्धर्मकामस्य हि ते न धर्मः ॥९.५३ “धर्म के उपाय के लिए तुम्हारा जो यह निश्चय है, यह अनुचित नही; किन्तु यह समय इसके लिए उचित नही। वृद्ध पिता को शोक देकर, तुझ धर्माभिलाषी को धर्म नही हो सकता ॥53॥ नूनं च बुद्धिस्तव नातिसूक्ष्मा धर्मार्थकामेष्वविचक्षणा वा। हेतोरदृष्टस्य फलस्य यस्त्वं प्रत्यक्ष्रमर्थ परिभूय यासि ॥९.५४ अवश्य ही धर्म, अर्थ व काम में तुम्हारी बुद्धि या तो अति सूक्ष्म नही, या मन्द है, जो अदृष्ट फल के हेतु तुम प्रत्यक्ष अर्थ (वस्तु) का तिरस्कार करके जा रहे हो ॥54॥ ⁴³- ग-पा० 'राज्याश्रिता'-जौन्स्टन। 50 अश्वघोष
पुनर्भ वोऽस्तीति च केचिदाहुर्नास्तीति केचिन्नियतप्रतिज्ञाः । एवं यदा संशयितोऽयमर्थस्तस्मात्क्षमं भोक्तुमुपस्थिता श्रीः ॥९.५५ कुछ लोग कहते हैं कि पुनर्जन्म है, कुछ लोग प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं नहीं है। इस तरह जब यह बात संशय-युक्त है, तब उपस्थित श्री का भोग करना ही ठीक है ॥55॥ भूयः प्रवृत्तिर्यदि काचिदस्ति रंस्यामहे तत्र यथोपपत्तौ । अथ प्रवृत्तिः परतो न काचित्सिद्धोऽप्रयत्नाज्जगतोऽस्य मोक्षः ॥९.५६ यदि फिर कोई प्रवृत्ति है, तो वहाँ और कुछ मिलेगा उसी में हम रमेंगे। यदि इससे परे कोई प्रवृत्ति नहीं है, तो इस जगत् का मोक्ष अनायास ही सिद्ध है ॥56॥ अस्तीति केचित्परलोकमाहुर्मोक्षस्य योगं न तु वर्णयन्ति । अग्नेर्यथा ह्यौष्ण्यमपां द्रवत्वं तद्वत्प्रवृत्तौ प्रकृतिं वदन्ति ॥९.५७ कोई कहते हैं कि परलोक है, किन्तु मोक्ष का उपाय नहीं बताते हैं। वे कहते हैं जैसे अग्नि में उष्णता है, पानी में द्रवत्व है वैसे ही प्रवृत्ति में प्रकृति (=स्वभाव) है ॥57॥ केचित्स्वभावादिति वर्णयन्ति शुभाशुभं चैव भवाभवौ च । स्वाभाविकं सर्वमिदं च यस्मादतोऽपि मोघो भवति प्रयत्नः ॥९.५८ कोई बताते हैं कि शुभ-अशुभ और उत्पत्ति-अनुत्पत्ति स्वभाव से होती है। क्योंकि यह सब स्वाभाविक है, इसलिए भी प्रयत्न व्यर्थ है ॥58॥ यदिन्द्रियाणां नियतः प्रचारः प्रियाप्रियत्वं विषयेषु चैव। संयुज्यते यज्जरयार्तिभिश्च कस्तत्र यत्नो ननु स स्वभावः ॥९.५९ इन्द्रियों का चलना (=काम करना) नियत है, प्रिय व अप्रिय लगना (इन्द्रिय-) विषयों में हैं और लोग बुढ़ापे में व रोग से युक्त होते हैं। इन सबमें यत्न क्या? वह तो स्वभाव है ॥59॥ अद्भिर्हुताशः शममभ्युपैति तेजांसि चापो गमयन्ति शोषम् । भिन्नानि भूतानि शरीरसंस्थान्यैक्यं च गत्त्वा जगदुद्वहन्ति ॥९.६० जल में अग्नि शान्त होती है और तेज जल को सोखते हैं। शरीर में स्थित (पाँचों) तत्त्व (स्वभाव से) पृथक्-पृथक् हैं और एक होकर जगत् को बनाते हैं ॥60॥ यत्पाणिपादोदरपृष्ठमूर्ध्नां निर्वर्तते गर्भगतस्य भावः । यदात्मनस्तस्य च तेन योगः स्वाभाविकं तत्कथयन्ति तज्ज्ञाः ॥९.६१ गर्भ में जानेपर (व्यक्ति के) हाथ, पाँव, पेट व मस्तक होते हैं, आत्मा से उसका योग होता है, पण्डित यह सब स्वाभाविक बताते हैं ॥61॥ कः कण्टकस्य प्रकरोति तैक्ष्ण्यं विचित्रभावं मृगपक्षिणां वा । स्वभावतः सर्वमिदं प्रवृत्तं न कामकारोऽस्ति कुतः प्रयत्नः ॥९.६२ कौन काँटे की तीक्ष्णता या पशु-पक्षियों की विचित्रता (का सृजन) करता है? यह सब स्वभाव से हुआ है, अपनी इच्छा काम नहीं करती, प्रयत्न कहाँ से? ॥62॥ सर्गं वदन्तीश्वरतस्तथान्ये तत्र प्रयत्ने पुरुषस्य कोऽर्थः । य एव हेतुर्जगतः प्रवृत्तौ हेतुर्निवृत्तौ नियतः स एव ॥९.६३ उसी तरह दूसरे कहते हैं ईश्वर से सृष्टि होती है, उसमें पुरुष के प्रयत्न का क्या प्रयोजन? जगत् की प्रवृत्ति में जो कोई भी हेतु है, निश्चय ही उसकी निवृत्ति में भी वही हेतु है ॥63॥ केचिद्वदन्त्यात्मनिमित्तमेव प्रादुर्भवं चैव भवक्षयं च । प्रादुर्भवं तु प्रवदन्त्यनाद्यत्नेन मोक्षाधिगमं ब्रुवन्ति ॥९.६४ कोई कहते हैं जन्म व विनाश का निमित्त आत्मा ही है। वे कहते हैं कि जन्म बिना यत्न के होता है और मोक्ष-प्राप्ति यत्न से होती है ॥64॥ नरः पितॄणामनृणः प्रजाभिर्वेदर्ऋषीणां ऋतुभिः सुराणाम् । उत्पद्यत सार्धमृणैस्त्रिभिस्तैर्यस्यास्ति मोक्षः किल तस्य मोक्षः ॥९.६५ मनुष्य सन्तान द्वारा पितृ-ऋण से, वेद द्वारा ऋषि-ऋण से और यज्ञ द्वारा देव-ऋण से मुक्त होता है, वह तीन ऋणों के साथ उत्पन्न होता है, जो उनसे मुक्त होता है उसी को मोक्ष है ॥65॥ इत्येवमेतेन विधिक्रमेण मोक्षं सयत्नस्य वदन्ति तज्ज्ञाः । प्रयत्नवन्तोऽपि हि विक्रमेण मुमुक्षवः खेदमवाप्नुवन्ति ॥९.६६ इस प्रकार इस विधि-क्रम से यत्न करनेवाले को मोक्ष मिलता है, ऐसा पण्डित कहते हैं, अपनी शक्ति से मोक्ष चाहनेवाले प्रयत्न करनेपर भी थकावट ही पाते हैं ॥66॥ तत्सौम्य मोक्षे यदि भक्तिरस्ति न्यायेन सेवस्व विधिं यथोक्तम् । एवं भविष्यत्युपपत्तिरस्य सन्तापनाशश्च नराधिपस्य ॥९.६७ इसलिए हे सौम्य, यदि मोक्ष में भक्ति हो, तो कही गई विधि का उचित रीति से सेवन करो; इस प्रकार इसकी प्राप्ति होगी और राजा का सन्ताप-नाश होगा ॥67॥ या च प्रवृत्ता तव दोषबुद्धिस्तपोवनेभ्यो भवनं प्रवेष्टुम् । तत्रापि चिन्ता तव तात मा भूत् पूर्वेऽपि जग्मुः स्वगृहान्वनेभ्यः ॥९.६८ तपोवन से घर प्रवेश करने में तुम जो दोष समझते हो, उसके लिए भी, हे तात, तुम्हें चिन्ता न करनी चाहिए; पूर्व में भी लोग वन से अपने घर गये हैं ॥68॥ तपोवनस्थोऽपि वृतः प्रजाभिर्जगाम राजा पुरमम्बरीषः । तथा महीँ विप्रकृतामनायैस्तपोवनादेत्य ररक्ष रामः ॥९.६९ तपोवन में रहनेपर भी राजा अम्बरीष प्रजाओं से घिरकर नगर को गया। उसी प्रकार अनार्यों से सताई जाती पृथ्वी की रक्षा राम ने वन से आकर की ॥69॥ बुद्धचरित 51
तथैव शाल्वाधिपतिर्द्रुमाख्यो वनात्ससूनुर्नगरं विवेश । ब्रह्मर्षिभूतश्च मुनेर्वसिष्ठाद्रेभे श्रियं सांकृतिरन्तिदेवः ॥९.७० उसी प्रकार द्रुमनामक शाल्व-राज ने पुत्र के साथ वन से नगर में प्रवेश किया और ब्रह्मर्षि हुए सांकृति अन्तिदेव ने मुनि वसिष्ठ से राज्य-लक्ष्मी ग्रहण की ॥70 ॥ एवंविधा धर्मयशःप्रदीप्ता वनानि हित्वा भवनान्यतीयुः । तस्मान्न दोषोऽस्ति गृहं प्रयातु तपोवनाद्धर्मनिमित्तमेव ॥९.७१ धर्म के यश से जलते हुए ऐसे व्यक्ति वन छोड़कर घर गये। इसलिए धर्म के निमित्त ही तपोवन से घर जाने में दोष नहीं है।" ॥71 ॥ ततो वचस्तस्य निशम्य मन्त्रिणः प्रियं हितं चैव नृपस्य चक्षुषः । अनूनमव्यक्तमसक्तमद्रुतं धृतौ स्थितो राजसुतोऽब्रवीद्वचः ॥९.७२ तब राजा के नेत्रस्वरूप उस मन्त्री का प्रिय व हितकारी वचन सुनकर, राजा के पुत्र ने धैर्यपूर्वक परिपूर्ण, सुलझा हुआ, आसक्ति-रहित व ठोस उत्तर दियाः- ॥72 ॥ इहास्ति नास्तीति य एष संशयः परस्य वाक्यैर्न ममात्र निश्चयः । अवेत्य तत्त्वं तपसा शमेन च स्वयं ग्रहीष्यामि यदत्र निश्चितम् ॥९.७३ है, नहीं है, इस संसार में जो यह संशय है, इसमें दूसरों के वचन से मुझे निश्चय नहीं होगा। तपस्या और शान्ति से तत्त्व को जानकर इस विषय में जो निश्चय होगा वह मैं स्वयं ग्रहण करूँगा ॥73 ॥ न मे क्षमं संशयजं हि दर्शनं ग्रहीतुमव्यक्तपरस्पराहतम् । बुद्धः परप्रत्ययतो हि को व्रजेज्जनोऽन्धकारेऽन्ध इवान्धदेशिकः ॥९.७४ संशय से उत्पन्न, अस्पष्ट व परस्पर-विरोधी दर्शन ग्रहण करना मेरे लिए ठीक नहीं। अँधेरे में अन्धा गुरुवाले अन्धे के समान कौन बुद्धिमान् दूसरों पर विश्वास कर चलेगा? ॥74 ॥ अदृष्टतत्त्वस्य सतोऽपि किं तु मे शुभाशुभे संशयिते शुभे मतिः । वृथापि खेदो हि वरं शुभात्मनः सुखं न तत्त्वेऽपि विगर्हितातमनः ॥९.७५ यद्यपि मैंने तत्त्व को नहीं देखा है, तो भी शुभ व अशुभ संशययुक्त होनेपर शुभ में मेरी मति है। शुभात्मा (= शुभ में लगे हुए) का वृथा श्रम अच्छा है न कि अशुभात्मा का सुख, यदि वास्तव में वह सुख हो तो भी ॥75 ॥ इमं तु दृष्ट्वागममव्यवस्थितं यदुक्तमाप्तैस्तदवेहि साध्विति । प्रहीणदोषत्वमवेहि चासतां प्रहीणदोषो ह्यनृतं न वक्ष्यति ॥९.७६ इस शास्त्र को अव्यवस्थित देख रहे हैं, अतः आप्त-जनों ने जो कहा उसे ही ठीक समझिए और दोष- विनाश ही आप्तता है, क्योंकि जिसका दोष नष्ट हो गया है वह झूठ नहीं कहेगा ॥76 ॥ गृहप्रवेशं प्रति यच्च मे भवानुवाच रामप्रभृतिन्निदर्शनम् । न ते प्रमाणं न हि धर्मनिश्चयेष्वलं प्रमाणाय परिक्षतव्रताः ॥९.७७ घर जाने के बारे में आपने राम आदि के जो उदाहरण दिये वे प्रमाण नहीं हैं; क्योंकि धर्म के निश्चय में वे प्रमाण नहीं हो सकते जिनका व्रत भङ्ग हो गया ॥77 ॥ तदेवमप्येव रविर्महीं पतेदपि स्थिरत्वं हिमवान् गिरिस्त्यजेत् । अदृष्टतत्त्वो विषयोन्मुखेन्द्रियः श्रयेय न त्वेव गृहान् पृथग्जनः ॥९.७८ इसलिए यदि सूर्य पृथ्वी पर गिर पड़े, हिमालय पर्वत अपनी स्थिरता छोड़ दे, तो भी तत्त्व को देखे बिना इन्द्रियों को विषयाभिमुख कर, मैं अज्ञानी घर नहीं जा सकता ॥78 ॥ अहं विशेयं ज्वलितं हुताशनं न चाकृतार्थः प्रविशेयमालयम् । इति प्रतिज्ञां स चकार गर्वितो यथेष्टमुत्थाय च निर्ममो ययौ ॥९.७९ जलती आग में मैं प्रवेश करूँगा, किन्तु असफल होकर घर में प्रवेश नहीं करूँगा।" अभिमानपूर्वक उसने यह प्रतिज्ञा की और इच्छानुसार उठकर वह निर्मम चला गया ॥79 ॥ ततः सबाष्पौ सचिवद्विजावुभौ निशम्य तस्य स्थिरमेव निश्चयम् । विषण्णवक्त्रावनुगम्य दुःखितौ शनैर्गत्या पुरमेव जग्मतुः ॥९.८० तब उसका स्थिर निश्चय सुनकर, रोते हुए मन्त्री और विप्र विषण्ण-मुख व दुःखी होकर पीछे-पीछे गये, तब उपाय के अभाव में वे धीरे-धीरे नगर की ही ओर चले ॥80 ॥ तत्स्नेहादथ नृपतेश्च भक्तितस्तौ सापेक्षां प्रतिययतुश्च तस्थतुश्च । दुर्धर्षं रविमिव दीप्तमात्मभासा तं द्रष्टुं न हि पथि शेक्तुर्न मोक्तुम् ॥९.८१ तब उसके स्नेह से और राजा की भक्ति से वे दोनों उत्कण्ठित होकर लौटे और ठहर गये। आत्मतेज से चमकते सूर्य के समान उस दुर्धर्ष को रास्ते में वे न देख सकते थे, न छोड़ सकते थे ॥81 ॥ तौ ज्ञातुं परमगतेर्गतिं तु तस्य प्रच्छन्नांश्चरपुरुषान्शुचीन्विधाय । राजानं प्रियसुतलालसं नु गत्वा द्रक्ष्यावः कथमिति जग्मतुः कथञ्चित् ॥९.८२ उस परमगति की गति जानने के लिए उन्होंने पवित्र गुप्तचर रक्खे और "प्रिय पुत्र के लिए उत्सुक राजा को जाकर कैसे देखेंगे", यह सोचते हुए वे किसी-किसी तरह गये ॥82 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्ये कुमारान्वेषणो नाम नवमः सर्गः ॥९ ॥ दशम सर्ग श्रेण्य का आगमन स राजवत्सः पृथूपीनवक्षास्तौ हव्यमन्त्राधिकृतौ विहाय । उत्तीर्य गङ्गां प्रचलत्तरङ्गां श्रीमद्गृहं राजगृहं जगाम ॥१०.१ हवन और मन्त्रणा के उन अधिकारियों को छोड़कर, चौड़ी व मोटी छातीवाला वह राज-कुमार चञ्चल तरङ्गोंवाली गङ्गा को पारकर, श्रीसम्पन्न गृहों से युक्त राजगृह को गया ॥1 ॥
52 अश्वघोष
शैलैः सुगुप्तं च विभूषितं च धृतं च पूतं च शिवैस्तपोदैः । पञ्चाचलाङ्कं नगरं प्रपेदे शान्तः स्वयम्भूरिव नाकपृष्ठम् ॥१०.२ पर्वतों से सुरक्षित व विभूषित तथा कल्याण-कारी तपोदों (= गर्म जल के झरनों) से धारण और पवित्र किये गये नगर में, जो पाँच पहाड़ों से चिह्नित है, उसने शान्त होकर प्रवेश किया, जैसे स्वर्ग में स्वयंभू (प्रवेश कर रहा हो) ॥२॥ गाम्भीर्यमोजश्च निशाम्य तस्य वपुश्च दीप्तं पुरुषानतीत्य । विसिस्मिये तत्र जनस्तदानीं स्थाणुव्रतस्येव वृषध्वजस्य ॥१०.३ कठोर-व्रत धारी शिव का-सा उसका गाम्भीर्य, ओज तथा असाधारण दीप्त रूप देखकर लोग उस समय वहाँ विस्मित हुए ॥३॥ तं प्रेक्ष्य योऽन्येन ययौ स तस्थौ यस्तत्र तस्थौ पथि सोऽन्वगच्छत् । द्रुतं ययौ यः स जगाम धीरं यः कश्चिदास्ते स्म स चोत्पपात ॥१०.४ उसे देखकर, जो दूसरी ओर जा रहा था वह ठहर गया, जो वहाँ रास्ते में ठहरा हुआ था वह पीछे-पीछे गया, जो धीरे-धीरे जा रहा था वह शीघ्रता से गया, जो कोई बैठा हुआ था वह उछल पड़ा ॥४॥ कश्चित्त्मानर्च जनः कराभ्यां सत्कृत्य कश्चिच्छिरसा ववन्दे । स्निग्धेन कश्चिद्वचसाभ्यनन्दन्नैवं जगामाप्रतिपूज्य कश्चित् ॥१०.५ किसी ने हाथ जोड़कर उसकी पूजा की, किसी ने शिर से प्रणाम कर सत्कार किया, किसी ने स्नेह-भरे वचन से अभिनन्दन किया, उसकी पूजा किये बिना कोई नही गया ॥५॥ तं जिह्रियुः प्रेक्ष्य विचित्रवेषाः प्रकीर्णवाचः पथि मौनमीयुः । धर्मस्य साक्षादिव संनिकर्षं न कश्चिदन्यायमतिर्बभूव ॥१०.६ उसे देखकर विचित्र वेषवाले लज्जित हुए, रास्ते में बहुत बोलनेवाले चुप हो गये। साक्षात् धर्म के समान उसके समीप किसी की अन्यायबुद्धि नहीं हुई ॥६॥ अन्यक्रियाणामपि राजमार्गे स्त्रीणां नृणां वा बहुमानपूर्वम् । तं देवकल्पं नरदेवसूनुं निरीक्षमाणा न ततर्प दृष्टिः ॥१०.७ राज-मार्ग में अन्य कार्यों में व्यस्त रहनेपर भी स्त्रियों या पुरुषों की दृष्टि उस देव-तुल्य राज-कुमार का अति सम्मानपूर्वक देखती हुई तृप्त नहीं हुई ॥७॥ भ्रुवौ ललाटं मुखमीक्षणे वा वपुः करौ वा चरणौ गतिं वा । यदेव यस्तस्य ददर्श तत्र तदेव तस्याथ बबन्ध चक्षुः ॥१०.८ उसकी भौंहें, ललाट, मुख, आँखें, आकृति, हाथ, पाँव या गति जिसे ही जिसने देखा उसी में उसकी आँखें बँध गईं ॥८॥ दृष्ट्वा च सोर्णभ्रुवमायताक्षं ज्वलच्छरीरं शुभजालहस्तम् । तं भिक्षुवेशं क्षितिपालनाहं सञ्क्षुभ्ने राजगृहस्य लक्ष्मीः ॥१०.९ उसकी भौंहे लोमश थीं, आँखें लम्बी थीं, शरीर जल रहा था, हाथों में शुभसूचक (रेखा-) जाल थे, वह भिक्षु-वेष मे था, किन्तु पृथ्वी पालन के योग्य था; उसे देखकर राजगृह की लक्ष्मी संक्षुब्ध हुई ॥९॥ श्रेण्योऽथ भर्ता मगधाजिरस्य बाह्याद्रिमानाद्विपुलं जनौघम् । ददर्श पप्रच्छ च तस्य हेतुं ततस्तमस्मै पुरुषः शशंस ॥१०.१० तब मगध देश के स्वामी श्रेण्य (बिम्बसार) ने बाहरी महल से विशाल जन-समूहों को देखा और उसका कारण पूछा। तब किसी राजपुरुष ने उसे कहा:- ॥१०॥ ज्ञानं परं वा पृथिवीश्रियं वा विप्रैर्य उक्तोऽधिगमिष्यतीति । स एव शाक्याधिपतेस्तनूजो निरीक्ष्यते प्रव्रजितो जनेन ॥१०.११ “शाक्य-राज का वह यही पुत्र है, जो विप्रों के कथानुसार परम ज्ञान या पृथ्वी की लक्ष्मी प्राप्त करेगा। उसने प्रव्रज्या ली है, लोग उसे देख रहे हैं” ॥११॥ ततः श्रुतार्थो मनसागतास्थो राजा बभाषे पुरुषं तमेव । विज्ञायतां क्व प्रतिगच्छतीति तथेत्यथैनं पुरुषोऽन्वगच्छत् ॥१०.१२ तब कारण जानकर राजा के मन में आदर हुआ, उसने उसी राजपुरुष से कहा- “मालूम करो कि वह कहाँ जा रहा है।” “बहुत अच्छा” कहकर वह उसके पीछे-पीछे गया ॥१२॥ अलोलचक्षुर्युगमात्रदर्शी निवृत्तवाग्यन्त्रितमन्दगामी । चचार भिक्षां स तु भिक्षुवर्यो निधाय गात्राणि चलं च चेतः ॥१०.१३ उसकी आँखें स्थिर थीं, वह जुए की दूरी तक ही देखता था, वाणी बन्द थी, चाल मन्द व नियन्त्रित थी, गात्र व चञ्चल चित्त को वश में करके वह भिक्षु-श्रेष्ठ भिक्षा माँग रहा था ॥१३॥ आदाय भैक्षं च यथोपपन्नं ययौ गिरेः प्रस्रवणं विविक्तम् । न्यायेन तत्राभ्यवहृत्य चैनन्महीधरं पाण्डवमारुरोह ॥१०.१४ जो कुछ मिली भिक्षा को लेकर, वह पर्वत के एकान्त झरने की ओर गया। वहाँ उसे उचित रीति से खाकर, वह पाण्डव-पर्वत पर चढ़ गया ॥१४॥ तस्मिन्प्रवो लोध्रवनोपगूढे मयूरनादप्रतिपूर्णकुञ्जे । काषायवासाः स बभौ नृसूर्यो यथोदयस्योपरि बालसूर्यः ॥१०.१५ लोध्र-वन से युक्त उस पर्वत पर, जिसके कुञ्ज मोरों की ध्वनि से भर रहे थे, काषाय-वस्त्र-धारी वह नर-सूर्य इस प्रकार शोभित हुआ, जैसे उदयाचल पर बाल-सूर्य ॥१५॥ तत्रैनमालोक्य स राजभृत्यः श्रेण्याय राज्ञे कथयांचकार । संश्रुत्य राजा स च बाहुमान्यात्तत्र प्रतस्थे निभृतानुयात्रः ॥१०.१६ वहाँ उसे देखकर उस राजपुरुष ने राजा-श्रेण्य से यह सब निवेदन किया। यह सुनकर अति सम्मान के कारण विनीत अनुचरों के साथ वह राजा वहाँ चला ॥१६॥ बुद्धचरित 53
स पाण्डवं पाण्डवतुल्यवीर्यः शैलोत्तमं शैलसमानवर्मा। मौलिधरः सिंहगतिर्नृसिंहश्चलसटः सिंह इवारुरोह ॥१०.१७ पाण्डवों के समान उसकी वीरता थी, पर्वत के समान उसका शरीर था, वह पाण्डव नामक उत्तम पर्वत पर चढ़ा; वह नर-सिंह, जो मुकुट पहने हुआ था और जिसकी चाल सिंह की-सी थी, उस सिंह के समान था जिसके केसर हिल रहे हों ॥17॥ ततः स्म तस्योपरि शृङ्गभूतं शान्तेन्द्रियं पश्यति बोधिसत्त्वम्। पर्यङ्कमास्थाय विरोचमानं शशाङ्कमुद्यन्तमिवाभ्रकुञ्जात् ॥१०.१८ तब उस (पर्वत) के ऊपर शिखर-सदृश बोधिसत्त्व को देखा, जिसके इन्द्रिय शान्त थे; पर्यङ्क आसन में बैठा हुआ वह, मेघ कुञ्ज से उगते चाँद के समान चमक रहा था ॥18॥ तं रूपलक्ष्म्या च शमेन चैव धर्मस्य निर्माणमिवोपविष्टम्। सविस्मयः प्रश्रयवान्नरेन्द्रः स्वयम्भुवं शक्र इवोपतस्थे ॥१०.१९ रूप-सम्पत्ति व शान्ति से जान पड़ता था जैसे धर्म का बनाया हुआ कोई बैठा हो; विस्मय और विनयपूर्वक राजा उसके समीप उपस्थित हुआ, जैसे स्वयंभू के समीप इन्द्र (उपस्थित हो रहा हो) ॥19॥ तं न्यायतो न्यायविदां वरिष्ठः समेत्य पप्रच्छ च धातुसाम्यम्। स चाप्यवोचत्सद्देन साम्ना नृपं मनःस्वास्थ्यमनामयं च ॥१०.२० औचित्य जाननेवालों में वह श्रेष्ठ था, उसके समीप उचित रीति से जाकर उसका धातु-साम्य (= स्वास्थ्य) पूछा। उसने भी योग्य नम्रतापूर्वक राजा से मानसिक स्वास्थ्य और (शारीरिक) आरोग्य कहे ॥20॥ ततः शुचौ वारणकर्णनीले शिलातले संनिषसाद राजा। उपोपविश्यानुमतश्च तस्य भावं विजिज्ञासुरिदं बभाषे ॥१०.२१ तब स्वच्छ शिला-तलपर, जो हाथी के कान के समान नीला था, राजा बैठ गया। समीप में बैठकर और अनुमति पाकर उसका भाव जानने की इच्छा से यों कहा:- ॥21॥ प्रीतिः परा मे भवतः कुलेन क्रमागता चैव परीक्षिता च। जाता विवक्षा स्ववयो यतो मे तस्मादिदं स्नेहवचो निबोध ॥१०.२२ "आपके कुल से मेरी बड़ी प्रीति है, वह परम्परागत है और परीक्षित है; अतः हे मित्र, मुझे कुछ कहने की इच्छा हुई है। इसलिए यह स्नेह-वचन सुनिये:- ॥22॥ आदित्यपूर्वं विपुलं कुलं ते नवं वयो दीप्तमिदं वपुश्च। कस्मादियं ते मतिरक्रमेण भैक्षाक एवाभिरता न राज्ये ॥१०.२३ आपका कुल महान् है, सूर्य से उत्पन्न हुआ है, आपकी अवस्था नई है और यह दीप्त रूप है। किस कारण क्रम तोड़कर आपकी बुद्धि भिक्षावृत्ति में रत है, राज्य में नही ॥23॥ गात्रं हि ते लोहितचन्दनाहं काषायसंश्लेषमनर्हमेतत्। हस्तः प्रजापालनयोग्य एष भोक्तुं न चार्हः परदत्तमन्नम् ॥१०.२४
आपका शरीर लाल चन्दन के योग्य है, काषाय-स्पर्श के योग्य यह नही। यह हाथ प्रजा-पालन के योग्य है, दूसरों का दिया अन्न खाने योग्य नही ॥24॥ तत्सौम्य राज्यं यदि पैतृकं त्वं स्नेहात्पितुर्नैच्छसि विक्रमेण। न च क्रमं मर्षयितुं मतिस्ते बुद्ध्यार्धमस्मद्विषयस्य शीघ्रम् ॥१०.२५ इसलिए, हे सौम्य, यदि आप स्नेह-वश पिता से पैतृक राज्य पराक्रमपूर्वक नही (लेना) चाहते हैं और यदि क्रम को सहने का (= क्रम से राज्य प्राप्ति तक ठहरने का) विचार आपका नही है, तो शीघ्र ही मेरे आधे राज्य का आप पालन करें ॥25॥ एवं हि न स्यात्स्वजनापमर्दः कालक्रमेणापि शमश्रया श्रीः। तस्मात्कुरुष्व प्रणयं मयि त्वं सद्भिः सहीया हि सतां समृद्धिः ॥१०.२६ इस प्रकार स्वजन का उत्पीड़न नही होगा, काल-क्रम से शान्ति में रहनेवाली सम्पत्ति भी मिलेगी। इसलिए आप मुझसे प्रीति करें, क्योंकि सज्जनों की सङ्गति से सज्जनों की समृद्धि होती है ॥26॥ अथ त्विदानीं कुलगर्वितत्वादस्मासु विश्रम्भगुणो न तेऽस्ति। व्यूहान्यनीकानि विगाह्य बाणैर्मया सहायेन परान् जिगीष ॥१०.२७ यदि इस समय कुल के गर्व के कारण हमारे ऊपर आपका विश्वास नही है, तो मुझ सहायक के साथ बाणों से सैन्य-समूहों में प्रवेश कर शत्रुओं को जीतिये ॥27॥ तद्बुद्धिमन्त्रान्यतरां वृणीष्व धर्मार्थकामान्विधिवद्भजस्व। व्यत्यस्य रागादिह हि त्रिवर्गं प्रेत्येह भ्रंशमवाप्नुवन्ति ॥१०.२८ इसलिए दो में से एक विचार स्वीकार कीजिये। धर्म, अर्थ और काम का विधिवत् सेवन कीजिए, क्योंकि राग-वश यहाँ त्रिवर्ग का उलट-पुलट होने से लोग यहाँ और परलोक में भी भ्रष्ट होते हैं ॥28॥ यो ह्यर्थधर्मौ परिपीड्य कामः स्याद्धर्मकामौ परिभूय चार्थः। कामार्थयोश्चोपरमेन धर्मस्त्याज्यः स कृत्स्नो यदि काङ्क्षितोऽर्थः ॥१०.२९ अर्थ और धर्म को परिपीड़ित कर जो काम होगा, धर्म व काम को दबाकर जो अर्थ होगा और काम व अर्थ के विनाश से जो धर्म होगा उसे छोड़िये, यदि आप सम्पूर्ण लक्ष्य (की सिद्धि) चाहते हैं ॥29॥ तस्मात्त्रिवर्गस्य निषेवणेन त्वं रूपमेतत्स्फलं कुरुष्व। धर्मार्थकामाधिगमं ह्यनूनं नृणामनूनं पुरुषार्थमाहुः ॥१०.३० इसलिए त्रिवर्ग के सेवन से आप इस रूप को सफल कीजिए; क्योंकि कहते हैं कि धर्म, अर्थ व काम की सम्पूर्ण प्राप्ति ही मनुष्यों का सम्पूर्ण पुरुषार्थ है ॥30॥ तन्निष्फलौ नार्हसि कर्तुमेतौ पीनौ भुजौ चापविकर्षणार्हौ। मान्धातृवज्जेतुम इमौ हि योग्यौ लोकानपि त्रीनिह किं पुनर्गाम् ॥१०.३१ इसलिए धनुष खींचने योग्य इन मोटी भुजाओं को आपको निष्फल नही करना चाहिएय क्योंकि मान्धाता के समान ये तीनों लोक जीतने योग्य हैं, फिर इस पृथ्वी का क्या कहना ॥31॥
54 अश्वघोष
स्नेहेन खल्वेतदहं ब्रवीमि नैश्वर्यरोगेण न विस्मयेन । इमं हि दृष्ट्वा तव भिक्षुवेषं जातानुकम्पोऽस्म्यपि चागताश्रुः ॥१०.३२ स्नेह से मैं यह कह रहा हूँ, ऐश्वर्य के अनुराग से नहीं, विस्मय (औद्धत्य ?) से नहीं। आपका यह भिक्षु-वेष देखकर मुझे अनुकम्पा हो गई है, और आँसू आ गये हैं ॥३२॥ तद्भुङ्क्ष्व भिक्षाश्रमकाम कामान् कालेऽसि कर्ता प्रियधर्म धर्मम् । यावत्स्वंशप्रतिरूपरूपं न ते जराब्येत्यभिभूय भूयः ॥१०.३३ हे स्व-वंश-प्रतिबिम्ब, जबतक आपके रूप को दबाकर बुढ़ापा फिर नहीं आता, तबतक, हे भिक्षु-आश्रम के इच्छुक, कामोपभोग कीजिए। हे प्रियधर्म, समय पर धर्म कीजिएगा ॥३३॥ शक्नोति जीर्णः खलु धर्ममाप्तुं कामोपभोगेष्वगतिर्जरायाः । अतश्च यूनः कथयन्ति काममध्यस्य वित्तं स्थविरस्य धर्मम् ॥१०.३४ वृद्ध धर्म प्राप्त कर सकता है, कामोपभोग में बुढ़ापे की गति नहीं है। और इस कारण युवक के लिए काम, मध्य के लिए वित्त, और बूढ़े के लिए धर्म बताते हैं ॥३४॥ धर्मस्य चार्थस्य च जीवलोके प्रत्यर्थिभूतानि हि यौवनानि । संरक्ष्यमाणान्यपि दुर्ग्रहाणि कामा यतस्तेन यथा हरन्ति ॥१०.३५ जीव-लोक में धर्म और अर्थ का शत्रु यौवन है। यत्न करनेपर भी उसे पकड़ रखना कठिन है; क्योंकि काम अपने मार्ग से उसे ले जाते हैं ॥३५॥ वयांसि जीर्णानि विमर्शयन्ति धीराण्यवस्थाानपरायणानि । अल्पेन यत्नेन शमात्मकानि भवन्त्यगत्यैव च लज्जया च ॥१०.३६ वृद्धावस्था विचारवती धीर और स्थिरता परायण होती है। उपायहीनता और लज्जा के कारण अल्प यत्न से ही उसमें शान्ति मिलती है ॥३६॥ अतश्च लोलं विषयप्रधानं प्रमत्तमक्षान्तमदीर्घदर्शि । बहुच्छलं यौवनमभ्यतीत्य निस्तीर्य कान्तारमिवाश्वसन्ति ॥१०.३७ अतः चञ्चल, विषय-प्रधान, प्रमत्त (= प्रमादपूर्ण) असहनशील, अदीर्घ-दर्शी और अनेक छलों से युक्त यौवन को बिताकर लोग वैसे ही आश्वस्त होते हैं, जैसे जङ्गल को पार कर ॥३७॥ तस्मादधीरं चपलप्रमादि नवं वयस्तावदिदं व्यपैतु । कामस्य पूर्वं हि वयः शरव्यं न शक्यते रक्षितुमिन्द्रियेभ्यः ॥१०.३८ इसलिए अधीर, चपल और प्रमादपूर्ण यह नई वयस तबतक बीते; क्योकि कामदेव का लक्ष्य नई जवानी है, जिसकी इन्द्रियों से रक्षा नहीं की जा सकती ॥३८॥ अथौ चिकीर्षा तव धर्म एव यजस्व यज्ञं कुलधर्म एषः । यज्ञैरधिष्ठाय हि नागपृष्ठं ययौ मरुत्वानपि नाकपृष्ठम् ॥१०.३९⁴⁴ यदि आपको इच्छा कर्म करना ही है, तो यज्ञ कीजिए, यह आपका कुलधर्म है। यज्ञों द्वारा हाथी की पीठ पर चढ़कर इन्द्र भी स्वर्ग गया था ॥३९॥ सुवर्णकेयूरविदग्धबाहवो मणिप्रदीपोज्ज्वलचित्रमौलयः । नृपर्षयस्तां हि गतिं गता मखैः श्रमेण यामेव महर्षयो ययुः ॥१०.४० राजर्षि-गण, जिनकी भुजाएँ सुवर्ण केयूरों से बँधी थीं और जिनके रङ्ग-बिरङ्गे मुकुट मणि-प्रदीपों से उज्ज्वल थे, यज्ञों द्वारा उस गति को प्राप्त हुए, जिसको ही महर्षि-गण तपस्या द्वारा प्राप्त हुए।” ॥४०॥ इत्येवं मगधपतिर्वचो बभाषे यः सम्यग्वलभिदिव ब्रुवन् बभाषे । तच्छ्रुत्वा न स विचचाल राजसूनूः कैलासो गिरिरिव नैकचित्रसानुः ॥१०.४१ इस प्रकार मगध-राज ने वह वचन कहा। वह ठीक-ठीक बोलने में इन्द्र के समान शोभित हुआ। यह सुनकर वह राज-पुत्र विचलित नहीं हुआ, जैसे अनेक रङ्ग-बिरङ्गी चोटियों से युक्त कैलाश पर्वत (विचलित नहीं होता है) ॥४१॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृते श्रेण्याभिगमनो नाम दशमः सर्गः ॥१०॥ एकादश सर्ग काम-निन्दा अथैवमुक्तो मगधाधिपेन सुहृन्मुखेन प्रतिकूलमर्थम् । स्वस्थोऽविकारः कुलशौचशुद्धः शौद्धोदनिर्वाक्यमिदं जगाद ॥११.१ तब मगध-राज के द्वारा अपने मित्र-मुख से इस तरह प्रतिकूल बात कही जानेपर, अपने कुल की पवित्रता से पवित्र शौद्धोदनि (=शुद्धोदन के पुत्र) ने शान्ति और धैर्यपूर्वक यह वचन कहा:- ॥१॥ नाश्चर्यमेतद्भवतो विधानं जातस्य हर्यङ्ककुले विशाले । यन्मित्रपक्षे तव मित्रकाम स्याद्वृत्तिरेषा परिशुद्धवृत्तेः ॥११.२ “आप विशाल हर्यङ्क-कुल में पैदा हुए हैं, अतः आपके लिए ऐसा कहना आश्चर्यजनक नहीं; हे मित्रेच्छु, मित्रों के प्रति आप शुद्धाचार का यह व्यवहार आश्चर्यजनक नहीं ॥२॥⁴⁵ असत्सु मैत्री स्वकुलानुरूपा न तिष्ठति श्रीरिव विक्लवेषु । पूर्वैः कृतां प्रीतिपरम्पराभिस्तामेव सन्तस्तु विवर्धयन्ति ॥११.३ ⁴⁴ - “नाक” की जगह “नाग” रक्खा गया है। नमुचि के वध के बाद, यज्ञ द्वारा ब्रह्म-हत्या के पाप से मुक्त होकर, इन्द्र स्वर्ग को लौटा था। ⁴⁵- हर्यङ्क = उस कुल के किसी राजा का नाम, या वह कुल जिसका चिह्न सिंह है। बुद्धचरित 55
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[Left Column]
अपने कुल में (पूर्वजों द्वारा) पालित मैत्री असज्जनों के पास नही रहती, जैसे (अपने कुल में पालित) लक्ष्मी विह्वलों के पास नहीं रहती; किन्तु सज्जन पूर्वजों द्वारा की गई उसी (मैत्री) को प्रीतिपरम्परा से बढ़ाते हैं ॥3॥
ये चार्थकृच्छ्रेषु भवन्ति लोके समानकार्याः सुहृदां मनुष्याः । मित्राणि तानीति परैमि बुद्ध्या स्वस्थस्य वृद्धौष्विह को हि न स्यात् ॥११.४ धन कम होनेपर संसार में जो मनुष्य मित्रों के काम में हाथ बँटाते हैं, अपनी बुद्धि से मैं उन्हीं को मित्र समझता हूँ; क्योंकि जो स्वस्थ है (=अच्छी अवस्था में है) उसकी बढ़ती में कौन (साथ) नहीं रहेगा? ॥4॥
एवं च ये द्रव्यमवाप्य लोके मित्रेषु धर्मे च नियोजयन्ति । अवाप्तसाराणि धनानि तेषां भ्रष्टानि नान्ते जनयन्ति तापम् ॥११.५ इस प्रकार संसार में धन पाकर जो लोग मित्रों और धर्म में लगाते हैं, उनके धन सारवान् हैं, नष्ट होनेपर अन्त में वे (धन) ताप नहीं पैदा करते ॥5॥
सुहृत्तया चार्यतया च राजन् खल्वेष यो मां प्रति निश्चयस्ते । अत्रानुनेष्यामि सुहृत्तयैव ब्रूयामहं नोत्तरमन्यदत्र ॥११.६ मित्रता और आर्यता (सज्जनता, उदारता) से, हे राजन्, मेरे प्रति आपका जो यह निश्चय हुआ है, इसमें मित्रता से ही अनुनय करूँगा, इसमें दूसरा उत्तर नहीं दूँगा ॥6॥
अहं जरामृत्युभयं विदित्वा मुमुक्षया धर्ममिमं प्रपन्नः । बन्धून् प्रियानश्रुमुखान्विहाय प्रागेव कामानशुभस्य हेतून् ॥११.७ जरा और मृत्यु का भय जानकर मोक्ष की इच्छा से मैं इस धर्म की शरण में, अश्रु-मुख प्रिय बन्धुओं को छोड़कर, अशुभ के कारण-स्वरूप काम को तो पहले ही (छोड़कर), आया हूँ ॥7॥
नाशीविषेभ्यो हि तथा बिभेमि नैवाशनिभ्यो गगनाच्च्युतेभ्यः । न पावकेभ्योऽनिलसंहितेभ्यो यथा भयं मे विषयेभ्य एव ॥११.८ सर्पों से मैं उतना नहीं डरता, न आकाश से गिरे वज्रों से, न हवा से मिली आग से, जितना कि विषयों से डरता हूँ ॥8॥
कामा ह्यनित्याः कुशलार्थचौरा रिक्ताश्च मायासदृशाश्च लोके । आशास्यमाना अपि मोहयन्ति चित्तं नृणां किं पुनरात्मसंस्थाः ॥११.९ काम अनित्य है, कुशलरूप धन के चोर हैं, खाली हैं और संसार में माया के समान हैं। उनकी चिन्ता करनेपर भी वे मनुष्यों के चित्त मूढ़ करते हैं, फिर अपने में उनके स्थित रहनेपर क्या कहना? ॥9॥
कामाभिभूता हि न यान्ति शर्म त्रिविष्टपे किं बत मर्त्यलोके । कामैः सतृष्णस्य हि नास्ति तृप्तिरिन्धनैर्वातसखस्य वह्नेः ॥११.१०
[Right Column]
जो काम से अभिभूत हैं वे, मर्त्य-लोक में क्या, स्वर्ग में भी शान्ति नहीं पाते। तृष्णावान् को काम से तृप्ति नहीं होती, जैसे हवा का साथ पाकर आग को इन्धन से (तृप्ति नहीं होती) ॥10॥
जगत्यनर्थो न समोऽस्ति कामैर्मोहाच्च तेष्वेव जनः प्रसक्तः । तत्त्वं विदित्वैवमनर्थभीरुः प्राज्ञः स्वयं कोऽभिलषेदनर्थम् ॥११.११ जगत् में काम (=विषय) के समान अनर्थ (बुराई, विपत्ति) नहीं और मोह से आदमी उसी में आसक्त होता है। तत्त्व को जानकर अनर्थ से डरनेवाला कौन बुद्धिमान् स्वयं अनर्थ की अभिलाषा करे? ॥11॥
समुद्रवस्त्रामापि गामवाप्य पारं जिगीषन्ति महार्णवस्य । लोकस्य कामैर्न वितृप्तिरस्ति पतद्भिरम्भोभिरिवार्णवस्य ॥११.१२ समुद्र-वसना पृथिवी को भी पाकर लोग महासागर के पार जीतने की इच्छा करते हैं। संसार का काम (- उपभोग) से तृप्ति नहीं होती, जैसे गिरती जल राशि से महासागर की (तृप्ति नहीं होती) ॥12॥
देवेन वृष्टेऽपि हिरण्यवर्षे द्वीपान्समग्रांश्चतुरोऽपि जित्वा । शक्रस्य चार्धासनमप्यवाप्य मान्धातुरासीद्विषयेष्वतृप्तिः ॥११.१३ देव द्वारा सुवर्ण-वृष्टि की जानेपर भी, चारों समग्र द्वीपों को जीतकर भी और इन्द्र का आधा आसन पाकर भी, मान्धाता को विषयों में तृप्ति नहीं हुई ॥13॥
भुक्त्वापि राज्यं दिवि देवतानां शतक्रतौ वृत्रभयात्प्रनष्टे । दर्पान्महर्षीनपि वाहयित्वा कामेष्वतृप्तो नहुषः पपात ॥११.१४ वृत्र के भय से इन्द्र के छिपनेपर, स्वर्ग में देवताओं का राज्य भोगकर भी, दर्प से महर्षियों द्वारा भी (अपने को) वहन कराकर, नहुष (स्वर्ग से) गिर पड़ा, विषयों में अतृप्त ही रहा ॥14॥
ऐडश्च राजा त्रिदिवं विगाह्य नीत्वापि देवीं वशमुर्वशीं ताम् । लोभादृषिभ्यः कनकं जिहीर्षुर्जगाम नाशं विषयेष्वतृप्तः ॥११.१५ और, राजा ऐड (इडा का पुत्र पुरूरवा) स्वर्ग में प्रवेश कर, उस देवी उर्वशी को वश में लाकर भी, लोभवश ऋषियों से सुवर्ण हरण करने की इच्छा से नाश को प्राप्त हुआ, विषयों में अतृप्त ही रहा ॥15॥
बलेर्महेन्द्रं नहुषं महेन्द्रादिन्द्रं पुनर्यै नहुषादुपैयुः । स्वर्गे क्षितौ वा विषयेषु तेषु को विश्वसेद्भाग्यकुलाकुलेषु ॥११.१६ जो विषय बलि से महेन्द्र के पास, महेन्द्र से नहुष के पास, फिर नहुष से (महा-) इन्द्र के पास गये, भाग्य से परेशान रहनेवाले उन विषयों में, स्वर्ग में या पृथिवी पर, कौन विश्वास करे? ॥16॥
चीराम्बरा मूलफलाम्बुभक्षा जटा वहन्तोऽपि भुजङ्गदीर्घाः । यैर्नान्यकार्या मुनयोऽपि भग्नाः कः कामसञ्ज्ञान्मृगयेत शत्रून् ॥११.१७ वल्कल-वस्त्र पहननेवाले, जल-फल-मूल भक्षण करनेवाले, साँप से समान लक्ष्मी जटा धारण करनेवाले मुनि लोग भी, जिन्हें (तप आदि के अतिरिक्त) दूसरा काम नहीं था, जिनके द्वारा भग्न किए गये, उन कामसंज्ञक शत्रुओं की कौन खोज करे? ॥17॥
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56 अश्वघोष
उग्रायुधश्चौग्रधृतायुधोऽपि येषां कृते मृत्युमवाप भीष्मात् । चिन्तापि तेषामशिवा वधाय तद्व्रत्तिनां किं पुनरव्रतानाम् ॥११.१८ उग्र अस्त्र धारण करनेवाले, उग्रायुध ने भी जिनके कारण भीष्म से मौत पाई, उनकी चिन्ता भी अमङ्गलजनक है, और सदाचारियों के लिए भी घातक है, फिर अव्रतियों का क्या कहना? ॥18॥ आस्वादमल्पं विषयेषु मत्वा संयोजनोत्कर्षमतृप्तिमेव । सद्द्र्यश्च गर्हा नियतं च पापं कः कामसञ्ज्ञं विषमाददीत ॥११.१९ विषयों में स्वाद कम है, बन्धन अधिक हैं, केवल अतृप्ति है, सज्जनों द्वारा निन्दा होती है, और पाप नियत है—ऐसा समझकर कौन कामनामक विषयों को ग्रहण करे? ॥19॥ कृष्यादिभिः कर्मभिरर्दितानां कामात्मकानां च निशम्य दुःखम् । स्वास्थ्यं च कामेष्वकुतूहलानां काममन्विहातुं क्षममात्मवद्भिः ॥११.२० कृषि आदि कर्मों से पीड़ित रहनेवालों का स्वास्थ्य (= सुख, शान्ति, प्रसन्नता) देखकर, आत्मवान् (= संयतात्मा) लोगों के लिए काम का त्याग करना ही उचित है ॥20॥ ज्ञेया विपत्कामिनि कामसम्पत्सिद्धेषु कामेषु मदं ह्युपैति । मदादकार्यं कुरुते न कार्यं येन क्षतो दुर्गतिमभ्युपैति ॥११.२१ कामी व्यक्ति में कामरूपी सम्पत्ति को विपत्ति ही समझना चाहिए; क्योंकि काम सिद्ध होनेपर मद होता है। मद से मनुष्य अकार्य करता है, कार्य नहीं, जिससे घायल होकर वह दुर्गति को प्राप्त होता है ॥21॥ यत्नेन लब्धाः परिरक्षिताश्च ये विप्रलभ्य प्रतियान्ति भूयः । तेष्वात्मवान्याचितकोपमेषु कामेषु विद्वानिह को रमेत ॥११.२२ यत्नपूर्वक पाये गये और रखे गये जो (काम) ठगकर फिर चले जाते हैं, इस संसार मे माँगी गई वस्तुओं के समान उन कामों (= विषयों) में कौन आत्मवान् (= संयतात्मा) बुद्धिमान् रत होगा? ॥22॥ अन्विष्य चादाय च जाततर्षा यानत्यजन्तः परियान्ति दुःखम् । लोके तृणोल्कासदृशेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२३ जिन्हें खोजकर और पाकर तृष्णा होती है, जिन्हें नही छोड़ने में (लोग) दुःख पाते हैं, संसार मे तृणों की उल्का के समान उन कामों (= विषयों) में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥23॥ अनात्मवन्तो हृदि यैर्विदग्धा विनाशमर्च्छन्ति न यान्ति शर्म । क्रुद्धोग्रसर्पप्रतिमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२४ अनात्मवान् (= असंयतात्मा) जिनके द्वारा हृदय में डँसे जानेपर नष्ट हो जाते हैं, शान्ति नही पाते, क्रुद्ध उग्र साँपों के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥24॥ अस्थि क्षुधार्त्ता इव सारमेया भुक्त्वापि यान्नैव भवन्ति तृप्ताः । जीर्णास्थिकङ्कालसमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२५ जैसे हड्डी चबाकर भी भूखे कुत्ते तृप्त नही होते हैं वैसे ही जिन्हें भोगकर भी (लोग) तृप्त नही होते हैं, जीर्ण अस्थि-पञ्जर (= पुरानी ठठरी) के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥25॥ ये राजचोरोदकपावकेभ्यः साधारणत्वान्नजयन्ति दुःखम् । तेषु प्रविद्धाभिषसन्निभेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२६ राजा चोर जल व अग्नि का समान अधिकार होने के कारण जो (काम) दुःख पैदा करते हैं, फेके हुए मांस के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥26॥⁴⁶ यत्र स्थितानामभितो विपत्तिः शत्रोः सकाशादपि बान्धवेभ्यः । हिंस्रेषु तेष्वायतनोपमेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२७ जहाँ रहनेवालों (जिनमें रमनेवालों) पर चारों ओर से विपत्ति है, शत्रु के समीप से, और बन्धुओं के समीप से, यज्ञशालाओं के समान उन हिंसक कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥27॥ गिरौ वने चाप्सु च सागरे च यान् भ्रंशमर्च्छन्ति विलङ्घमानाः । तेषु द्रुमप्राग्रफलोपमेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२८ पर्वत पर, वन में, जल में और सागर में जिन्हें खोजते हुए भ्रष्ट होते हैं, वृक्ष-शिखर पर के फलों के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥28॥ तीव्रैः प्रयत्नैर्विविधैर्हवाप्ताः क्षणेन ये नाशमिह प्रयान्ति । स्वप्नोपभोगप्रतिमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२९ विविध तीव्र प्रयत्नों से प्राप्त होकर जो क्षण-भर में इस संसार में नष्ट हो जाते हैं, स्वप्न-उपभोग के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥29॥ यानर्जयित्वापि न यान्ति शर्म विवर्धयित्वा परिपालयित्वा । अङ्गारकर्षूंप्रतिमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३० जिन्हें अर्जन कर, बढ़ाकर और पालकर भी (लोग) शान्ति नही पाते, अङ्गारे की आग के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥30॥ विनाशमीयुः कुरवो यदर्थं वृष्ण्यन्धका मेखलदण्डकाश्च । शूनासिकाहप्रतिमेषु तेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३१ जिनके लिए कौरव वृष्ण्यन्धक व मेखलदण्डक विनाश को प्राप्त हुए, वध-स्थल के छुरे व काठ के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥31॥⁴⁷ ⁴⁶ - (26, 27) काम = उपभोग की वस्तुएँ। सोने चाँदी लाखों-करोड़ों सिक्कों को मैं श्रेष्ठ धन नही कहता। उसमें तो भय-ही-भय है—राजा का, अग्नि का, जल का, चोर का, लुटेरे का और अपने सगे सम्बन्धियों तक का भय है= बु० वा०। ⁴⁷ - (31-32) जुए के लिए कौरवों का, मद्यपान के लिए वृष्ण्यन्धकों का और स्त्री के लिए सुन्द-उपसुन्द का विनाश हुआ। बुद्धचरित 57
सुन्दोपसुन्दावसुराँ यदर्थमन्योन्यवैरप्रसृतौ विनष्टौ । सौहार्दविश्लेषकरेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३२ जिनके लिए सुन्द और उपसुन्द नामक दो असुर, एक दूसरे के प्रति वैर बढ़नेपर, नष्ट हुए, मैत्री विलगानवाले उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥३२॥ येषां कृते वारिणि पावके च क्रव्यात्सु चात्मानमिहोत्सृजन्ति । सपत्नभूतेष्वशिवेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३३ जिनके लिए जल में, अग्नि में, व हिंसक जीवों के आगे (लोग) अपने को उत्सर्ग (= समर्पित) कर देते हैं, शत्रु-सदृश व अमङ्गलजनक उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥३३॥ कामार्थमज्ञः कृपणं करोति प्राप्नोति दुःखं वधबन्धनादि । कामार्थमाशाकृपणस्तपस्वी मृत्युं श्रमं चार्छति जीवलोके ॥११.३४ काम (= विषय) के लिए अज्ञानी क्षुद्रता करता है और वध-बन्धन आदि दुःख पाता है। तृष्णा से दीन हुआ बेचारा प्राणि-जगत् काम के लिए मौत व थकावट पाता है ॥३४॥ गीतैर्हियन्ते हि मृगा वधाय रूपार्थमग्नौ शलभाः पतन्ति । मत्स्यो गिरत्यायसमामिषार्थी तस्मादनर्थं विषयाः फलन्ति ॥११.३५ गीतों से मृग वध के लिए अपहृत होते हैं; रूप के लिए पतङ्ग अग्नि में गिरते हैं; मांस चाहनेवाली मछली लोहे की कँटिया निगलती है; इसलिए विषयों का फल विपत्ति है ॥३५॥ कामास्तु भोगा इति यन्मतिः स्याद्भोगो न केचित्परिगण्यमानाः । वस्त्रादयो द्रव्यगुणा हि लोके दुःखप्रतीकार इति प्रथायाः ॥११.३६ काम भोग हैं, ऐसा जो विचार है सो कोई भी काम भोग नही गिने जा सकते; क्योंकि वस्त्र आदि विषय दुःख के प्रतीकार हैं, ऐसा समझना चाहिए ॥३६॥ इष्टं हि तर्षप्रशमाय तोयं क्षुन्नाशहेतोरशनं तथैव । वातातपाम्ब्वावरणाय वेश्म कौपीनशीतावरणाय वासः ॥११.३७ प्यास मिटाने के लिए पानी इष्ट (= चाहा जाता है) है, उसी प्रकार भूख मिटाने के लिए भोजन, हवा धूप व पानी से बचने के लिए घर, शीत-निवारण और लङ्गोते के लिए वस्त्र ॥३७॥ निद्राविघाताय तथैव शय्या यानं तथाध्वश्रमनाशनाय । तथासनं स्थानविनोदनाय स्नानं मृजारोग्यबलाश्रयाय ॥११.३८ उसी प्रकार नींद (की बाधा) दूर करने के लिए शय्या, उसी तरह रास्ते की थकावट नष्ट करने के लिए गाड़ी, उसी तरह खड़ा रहना दूर करने के लिए आसन और मार्जन आरोग्य व बल प्राप्त करने के लिए स्नान (इष्ट है) ॥३८॥ दुःखप्रतीकारनिमित्तभूतास्तस्मात्प्रजानां विषया न भोगाः । अश्नामि भोगानिति कोऽभ्युपेयात्प्राज्ञः प्रतीकारविधौ प्रवृत्तः ॥११.३९ इसलिए दुःख-प्रतीकार के कारणस्वरूप विषय लोगों के लिए भोग नहीं हो सकते। (दुःख) प्रतिकार-विधि में लगा हुआ कौन बुद्धिमान् यह मानेगा—"मैं भोग कर रहा हूँ" ॥३९॥ यः पित्तदाहेन विदह्यमानः शीतक्रियां भोग इति व्यवस्येत् । दुःखप्रतीकारविधौ प्रवृत्तः कामेषु कुर्यात्स हि भोगसञ्ज्ञाम् ॥११.४० पित्तज्वर से जलता हुआ जो (आदमी) शीतोपचार को भोग समझेगा, दुःख-प्रतीकार-उपाय में लगा हुआ वही (आदमी) कामों (= विषयों) को भोग समझेगा ॥४०॥ कामेष्वनैकान्तिकता च यस्मात्ततोऽपि मे तेषु न भोगसञ्ज्ञा । य एव भावा हि सुखं दिशन्ति त एव दुःखं पुनरावहन्ति ॥११.४१ क्योंकि कामों (विषयों) में ऐकान्तिकता (= एक अन्त) नही है, इसलिए भी मैं कामों को भोग नहीं समझता। जो ही पदार्थ सुख देते हैं, वे ही फिर दुःख लाते हैं ॥४१॥ गुरूणि वासांस्यगुरुणि चैव सुखाय शीते ह्यसुखाय घर्मे । चन्द्रांशवश्चन्दनमेव चोष्णे सुखाय दुःखाय भवन्ति शीते ॥११.४२ क्योंकि, भारी वस्त्र और अगुरु से जाड़े में सुख होता है और गर्मी में असुख; चन्द्र किरणों व चन्दन से गर्मी में सुख होता है और जाड़े में असुख ॥४२॥ द्वन्द्वानि सर्वस्य यतः प्रसक्तान्यलाभलाभप्रभृतीनि लोके । अतोऽपि नैकान्तसुखोऽस्ति कश्चिन्नैकान्तदुःखः पुरुषः पृथिव्याम् ॥११.४३ क्योंकि संसार मे हानि-लाभ आदि द्वन्द्व सबमें लगे हुए हैं, इसलिए भी पृथिवी पर कोई पुरुष न तो एकान्त (= केवल) सुखी है और न एकान्त दुःखी है ॥४३॥ दृष्ट्वा च विमिश्रां सुखदुःखतां मे राज्यं च दास्यं च मतं समानम् । नित्यं हसत्येव हि नैव राजा न चापि सन्तप्यत एव दासः ॥११.४४ दुःख व सुख को मिला हुआ देखकर, राज्य व दासत्व को मैं समान मानता हूँ। न तो राजा ही नित्य हँसता है और न दास ही नित्य संतप्त होता है ॥४४॥ आज्ञा नृपत्वेऽभ्यधिकेति यत्स्यान्महान्ति दुःखान्यत एव राज्ञः । आसङ्गकाष्ठप्रतिमो हि राजा लोकस्य हेतोः परिखेदमति ॥११.४५ यह कि राजत्व में आज्ञा अधिक है, इसलिए तो राज को बड़े-बड़े दुःख होते हैं। आसङ्ग-काष्ठ (?) के समान राजा संसार के लिए थकता है ॥४५॥ राज्ये नृपस्त्यागिनि बह्वमित्रे विश्वासमागच्छति चेद्विपन्नः । अथापि विश्रम्भमुपैति नेह किं नाम सौख्यं चकितस्य राज्ञः ॥११.४६ त्याग करनेवाले (= क्षण-भङ्गुर) व बहुत शत्रुओं से भरे राज्य में यदि (राजा) विश्वास करता है, तो मरता है और यदि उस (राज्य) में विश्वास नहीं करता है, तो भय-भीत रहनेवाले राजा को सुख क्या है? ॥४६॥ 58 अश्वघोष
यदा च जित्वापि महीं समग्रां वासय दृष्टं पुरमेकमेव । तत्रापि चैकं भवनं निषेव्यं श्रमः परार्थे ननु राजभावः ॥११.४७ और जब कि सारी पृथ्वी को जीतकर भी रहने के लिए वह एक ही नगर को देखता है, और उसमें भी उसे एक ही महल का सेवन करना पड़ता है, तब अवश्य ही राजत्व दूसरों के लिए (परि-) श्रम (करना) है ॥४७ ॥ राज्ञोऽपि वासोयुगमेकमेव क्षुत्सन्निरोधाय तथान्नमात्रा । शय्या तथैकासनमेकमेव शेषा विशेषा नृपतेर्मदाय ॥११.४८ राजा के लिए भी एक ही जोड़ा वस्त्र, उसी तरह क्षुधा-निवृत्ति के लिए कुछ अन्न, उसी तरह एक शय्या और एक ही आसन (आवश्यक है); राजा की शेष विशेषताएँ तो मद (पैदा करने) के लिए हैं ॥४८ ॥ तुष्ट्यर्थमेतच्च फलं यदिष्टमुपैषि राज्यान्मम तुष्टिरस्ति । तुष्टौ च सत्यां पुरुषस्य लोके सर्वे विशेषा ननु निर्विशेषाः ॥११.४९ और यदि सन्तोष के लिए यह फल इष्ट है, तो राज्य के बिना भी मुझे सन्तोष है। संसार में मनुष्य को सन्तोष होनेपर सब विशेषताएँ विशेषता-रहित हैं ॥४९ ॥ तन्नास्मि कामान् प्रति सम्प्रतार्यः क्षेमं शिवं मार्गमनुप्रपन्नः । स्मृत्वा सुहृत्त्वं तु पुनः पुनर्मां ब्रूहि प्रतिज्ञां खलु पालयति ॥११.५० इसलिए कर्मों के प्रति मैं बहकाया नहीं जा सकता; मङ्गलमय व कल्याणकारी मार्ग की शरण में हूँ। मित्रता का स्मरण कर आप बार-बार मुझसे कहें- "अवश्य प्रतिज्ञा पालन करो" ॥५० ॥ न ह्यस्म्यमर्षेण वनं प्रविष्टो न शत्रुबाणैरवधूतमौलिः । कृतस्पृहो नापि फलाधिकेभ्यो गृह्णामि नैतद्वचनं यतस्ते ॥११.५१ न तो क्रोध से मैंने वन में प्रवेश किया है, और न शत्रु के बाणों से मुकुट कँपाये जानेपर ही। न तो अधिक फल के लिए अभिलाषा करता हूँ, जिससे आपकी यह बात न मान रहा हूँ ॥५१ ॥ यो दन्दशूकं कुपितं भुजङ्गं मुक्त्वा व्यवस्येद्धि पुनर्गृहीतुम् । दाहात्मिकां वा ज्वलितां तृणोल्कां सन्त्यज्य कामान् स पुनर्भजेत ॥११.५२ जो डँसनेवाले कुपित साँपों को, या जलानेवाली जलती उल्का को छोड़कर फिर से पकड़ने का विचार करे, वही कर्मों को छोड़कर फिर उनका सेवन करे ॥५२ ॥ अन्धाय यश्च स्पृहयेदनन्धो बद्धाय मुक्तो विधनाय चाढ्यः । उन्मत्तचित्ताय च कल्पचित्तः स्पृहां स कुर्याद्विषयात्मकाय ॥११.५३ जो दृष्टिमान् दृष्टि-हीन (होने के) लिए और जो मुक्त (पुरुष) बन्दी (होने के) लिए, और जो धनी निर्धन (होने के) लिए और जो स्वस्थ-चित्त उन्मत्त-चित्त (होने के) लिए अभिलाषा करे, वही विषयी (होने के) लिए अभिलाषा करे ॥५३ ॥
भैक्षोपभोगीति च नानुकम्प्यः कृती जरामृत्युभयं तितीर्षुः । इहोत्तमं शान्तिसुखं च यस्य परत्र दुःखानि च संवृतानि ॥११.५४ "भिक्षा पर रहता है" इसलिए वह बुद्धिमान् अनुकम्पा के योग्य नहीं जो जरा व मृत्यु का भय पार करना चाहता है, जिसका इस संसार में उत्तम शान्ति सुख प्राप्त है और परलोक में जिसके दुःख नष्ट हैं ॥५४ ॥ लक्ष्म्यां महत्यामपि वर्तमानस्तृष्णाभिभूतस्त्वनुकम्पितव्यः । प्राप्नोति यः शान्तिसुखं न चेह परत्र दुःखं प्रतिगृह्यते च ॥११.५५ महती लक्ष्मी की (गोद में) रहता हुआ भी तृष्णा से अभिभूत पुरुष अनुकम्पा के योग्य है, जो इस लोक में शान्ति-सुख नहीं पाता और जो परलोक में दुःखों से प्राप्त होता है ॥५५ ॥ एवं तु वक्तुं भवतोऽनुरूपं सत्त्वस्य वृत्तस्य कुलस्य चैव । ममापि वोढुं सदृशं प्रतिज्ञां सत्त्वस्य वृत्तस्य कुलस्य चैव ॥११.५६ ऐसा कहना आपके सत्त्व आचार और कुल के अनुरूप है, मेरे लिए भी प्रतिज्ञा पालन करना मेरे सत्त्व, आचार और कुल के योग्य है ॥५६ ॥ अहं हि संसारशरेण विद्धो विनिःसृतः शान्तिमवाप्तुकामः । नेच्छेयमाप्तुं त्रिदिवेऽपि राज्यं निरामयं किं बत मानुषेषु ॥११.५७ संसाररूप तीर से विद्ध होकर शान्ति पाने की इच्छा से मैं (घर से) निकला हूँ, स्वर्ग का भी निष्कण्टक राज्य नहीं पाना चाहता हूँ, मर्त्यलोक का क्या कहना? ॥५७ ॥ त्रिवर्गसेवां नृप यत्तु कृत्स्नतः परो मनुष्यर्थ इति त्वमात्थ माम् । अनर्थ इत्येव ममात्र दर्शनं क्षयी त्रिवर्गो हि न चापि तर्पकः ॥११.५८ पूरा-पूरा त्रिवर्ग सेवन परम पुरुषार्थ है, हे राजन्, यह जो आपने मुझे कहा, इसमें मैं अनर्थ ही देखता हूँ क्योंकि त्रिवर्ग नाशवान् है और तृप्तिदायक भी नहीं है ॥५८ ॥ पदे तु यस्मिन्न जरा न भीर्न रुङ् न जन्म नैवोपरमो न चाधयः । तमेव मन्ये पुरुषार्थमुत्तमं न विद्यते यत्र पुनः पुनः क्रिया ॥११.५९ जिसमें न जरा है, न भय, न रोग, न जन्म, न मृत्यु, और न आधि, उसी पद को मैं उत्तम पुरुषार्थ मानता हूँ जिसमें बार-बार कर्म नहीं करना पड़ता ॥५९ ॥ यदप्यवोचः परिपाल्यतां जरा नवं वयो गच्छति विक्रियामिति । अनिश्चयोऽयं बहुशो हि दृश्यते जराप्यधीरा धृतिमच्च यौवनम् ॥११.६० यह जो कहा कि जरा की प्रतीक्षा करो, नई वयस में विकार होता है, यह निश्चित नहीं है; क्योंकि बहुधा देखा जाता है कि बुढ़ापे में भी अधैर्य है और जवानी में भी धैर्य ॥६० ॥⁴⁸
⁴⁸- "चपलं" की जगह "बहुशः" रक्खा गया है। बुद्धचरित 59
स्वकर्मदक्षश्च यदान्तको जगद् वयःसु सर्वेष्ववशं विकर्षति। विनाशकाले कथमव्यवस्थिते जरा प्रतीक्ष्या विदुषा शमेप्सुना ॥११.६१ जब कि अपने कर्म में निपुण यम विवश जगत् को सब अवस्थाओं में दूर खींच रहा है, तब विनाश-काल अनिश्चित होनेपर शान्ति पाने का इच्छुक बुद्धिमान् क्यों बुढ़ापे की प्रतीक्षा करे? ॥61 ॥ जरायुधो व्याधिविकीर्णसायको यदान्तको व्याध इवाशिवः स्थितः। प्रजामृगान् भाग्यवनाश्रितांस्तुदन् वयःप्रकर्षं प्रति को मनोरथः ॥११.६२ जब कि जरा-रूप-शस्त्र धारी यम अमङ्गल व्याध के समान खड़ा होकर व्याधिरूप तीरों को बिखेरता हुआ भाग्य-रूप वन में आश्रित प्रजा रूप मृगों को पीड़ित कर रहा है, तब बुढ़ापे (में धर्म करने) की क्या चाह हो सकती है? ॥62 ॥ अतो युवा वा स्थविरोऽथवा शिशुस्तथा त्वरावानिह कर्तुमर्हति । यथा भवेद्धर्मवतः कृपात्मनः प्रवृत्तिरिष्टा विनिवृत्तिरेव वा ॥११.६३ इसलिए युवा हो, या वृद्ध या शिशु, वह यहाँ शीघ्र ऐसा करे, जिससे धर्मात्मा व शुद्धात्मा होकर (स्वर्ग- प्राप्ति-द्वारा) इष्ट प्रवृत्ति या (मोक्ष-प्राप्ति-द्वारा) इष्ट निवृत्ति प्राप्त करे ॥63 ॥ यदात्थ चापीष्टफलां कुलोचितां कुरुष्व धर्म्याय मखक्रियामिति । नमो मखेभ्यो न हि कामये सुखं परस्य दुःखक्रियया यदिष्यते ॥११.६४ यह जो कहा कि इष्ट फल देनेवाली कुलोचित यज्ञ-क्रिया धर्म के लिए करो; यज्ञों को प्रणाम है, मैं वह सुख नही चाहता, जो दूसरों को दुःख देकर चाहा जाता है ॥64 ॥ परं हि हन्तुं विवशं फलेप्सया न युक्तरूपं करुणात्मनः सतः। क्रतोः फलं यद्यपि शाश्वतं भवेत्तथापि कृत्वा किमु यत्क्षयात्मकम् ॥११.६५ जो दयावान् है उसके लिए फल पाने की इच्छा से दूसरे विवश जीव की हत्या करना ठीक नहीं। यदि यज्ञ का फल शाश्वत भी हो, तो भी वह करके क्या जो हिंसात्मक है? ॥65 ॥ भवेच्च धर्मो यदि नापरो विधिर्व्रतेन शीलेन मनःशमेन वा । तथापि नैवार्हति सेवितुं क्रतुं विशस्य यस्मिन् परमुच्यते फलम् ॥११.६६ यदि व्रत, शील या मानसिक शान्ति द्वारा धर्म प्राप्त होने का दूसरा उपाय न हो, तो भी यज्ञ का सेवन नही करना चाहिए, जिसमें दूसरे को मारकर फल प्राप्त होता है ऐसा कहा जाता है ॥66 ॥ इहापि तावत्पुरुषस्य तिष्ठतः प्रवर्त्तते यत्परहिंसया सुखम् । तदप्यनिष्टं सघृणस्य धीमतो भवान्तरे किं बत यन्न दृश्यते ॥११.६७ इस लोक में रहते हुए पुरुष को पर-हिंसा से जो सुख होता है, वह भी दयावान् बुद्धिमान् के लिए इष्ट (वांछनीय) नहीं; दूसरे जन्म में जो दिखाई नहीं पड़ रहा है उसका क्या? ॥67 ॥ न च प्रतार्योऽस्मि फलप्रवृत्तये भवेषु राजन् रमते न मे मनः। लता इवाम्भोधरवृष्टिताडिताः प्रवृत्तयः सर्वगता हि चञ्चला ॥११.६८ 60 अश्वघोष और फल के लिए प्रवृत्ति की ओर मैं नही बहकाया जा सकता हूँ, जन्म-चक्र में, हे राजन्, मेरा मन नही लग रहा है। बादल की वृष्टि से ताड़ित लता के समान यह सर्वव्यापी प्रवृत्ति चञ्चल है ॥68 ॥⁴⁹ इहागतश्चाहमितो दिदृक्षया मुनेरराडस्य विमोक्षवादिनः । प्रयामि चाद्यैव नृपास्तु ते शिवं वचः क्षमेथाः मम तत्त्वनिष्ठुरम् ॥११.६९ यहाँ आया हूँ और मोक्ष-वादी मुनि अराड को देखने की इच्छा से आज ही यहाँ से जा रहा हूँ। हे राजन्, आपका कल्याण हो, मेरे सत्यनिष्ठुर वचन को क्षमा कीजिए ॥69 ॥ अवेन्द्रवद्विध्यव शश्वदर्कवद्गुणैरव श्रेय इहाव गामव । अवायुरार्यैरव सत्सुतानव श्रियञ्च राजन्नव धर्ममात्मनः ॥११.७० इन्द्र के समान रक्षा कीजिए, आकाश के सूर्य के समान सदा रक्षा कीजिए, अपने आर्य (= उत्तम) गुणों से इस लोक में कल्याण की रक्षा कीजिए, पृथ्वी की रक्षा कीजिए, आयु की रक्षा कीजिए, सत्पुत्रों की रक्षा कीजिए, हे राजन्, लक्ष्मी व अपने धर्म की रक्षा कीजिए ॥70 ॥ हिमारिकेतुद्भवसंभवान्तरे यथा द्विजो याति विमोक्ष्यवंस्तनुम् । हिमारिशत्रुक्षयशत्रुघातने तथान्तरे याहि विमोक्ष्यन्मनः ॥११.७१ जैसे अग्नि-पताका (= धूम) से उत्पन्न होनेवाले (= बादल) से वृष्टि होनेपर अग्नि अपनी बाहरी आकृति को छोड़ देती है (या साँप अपनी केंचुल छोड़ता है), वैसे ही सूर्य-शत्रु (= तम) का विनाश करने में जो शत्रु (= विघ्न) हैं उनकी हत्या करके अपना मन मुक्त कीजिए" ॥71 ॥ नृपोऽब्रवीत्साञ्जलिरागतस्पृहो यथेष्टमाप्नोतु भवानविघ्नतः । अवाप्य काले कृतकृत्यतामिमां ममापि कार्यो भवता त्वनुग्रहः ॥११.७२ राजा ने हाथ जोड़कर अभिलाषापूर्वक कहा- "आप यथेष्ट सफलता निर्विघ्न प्राप्त करें और इसे प्राप्त कर समय पर मेरे ऊपर भी आप अनुग्रह कीजिएगा" ॥72 ॥ स्थिरं प्रतिज्ञाय तथेति पार्थिवे ततः स वैश्वन्तरमाश्रमं ययौ । परिव्रजन्तं समुदीक्ष्य विस्मितो नृपोऽपि वव्राज पुरिं गिरिव्रजम् ॥११.७३ तब, “वैसा ही हो" इस तरह राजा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा कर, वह वैश्वंतर-आश्रम की ओर गया। उसे जाते देखकर विस्मित हुआ राजा भी गिरि-वज्र पुरी (= राजगृह) को चला गया ॥73 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृते कामविगर्हणो नामैकादशः सर्गः ॥११॥ ⁴⁹ - किसी जीव का जन्म बराबर एक ही योनि में नहीं होता है, वह भिन्न-भिन्न योनि में पैदा होता रहता है, और कभी वह स्वर्ग में रहता है तो कभी नरक में; इसलिए प्रवृत्ति का सर्वव्यापी और चञ्चल कहा गया है।
द्वादश सर्ग अराड-दर्शन ततः शमविहारस्य मुनेरिक्षवाकुचन्द्रमाः । अराडस्याश्रमं भेजे वपुषा पूरयन्निव ॥१२.१ तब इक्ष्वाकु (-वंश का) चन्द्रमा शम-धर्म में विहार करनेवाले अराड के आश्रम में गया, उस (आश्रम) को वह (राज-कुमार) अपने रूप से मानो भर रहा था ॥1 ॥ स कालामसगोत्रेण तेनालोक्यैव दूरतः । उच्चैः स्वागतमित्युक्तः समीपमुपजग्मिवान् ॥१२.२ कालाम गोत्र के उस मुनि ने दूर से ही उसे देखकर जोर से 'स्वागत' शब्द कहा, और वह (कुमार) उसके समीप गया ॥2 ॥ तावुभौ न्यायतः पृष्ट्वा धातुसाम्यं परस्परम् । दारव्योर्मेध्ययोर्वृष्योः शुचौ देशे निषेदतुः ॥१२.३ वे दोनों न्यायपूर्वक परस्पर धातु-साम्य (= स्वास्थ्य) पूछकर पवित्र स्थान में काठ के दो पवित्र आसनों पर बैठ गये ॥3 ॥ तमासीनं नृपसुतं सोऽब्रवीन्मुनिसत्तमः । बहुमानविशालाभ्यां दर्शनाभ्यां पिबन्निव ॥१२.४ उस मुनि-श्रेष्ठ ने, सम्मान के कारण अपनी विकसित आँखों से, बैठे हुए उस राज कुमार को मानो पीते हुए कहा:— ॥4 ॥ विदितं मे यथा सौम्य निष्क्रान्तो भवनादसि । छित्त्वा स्नेहमयं पाशं पाशं दृप्त इव द्विपः ॥१२.५ “हे सौम्य, मुझे मालूम है कि आप किस प्रकार घर से निकले हैं। जैसे गर्वीला हाथी बन्धन को काटकर (निकलता है), वैसे ही स्नेहमय बन्धन को काटकर आप निकले हैं ॥5 ॥ सर्वथा धृतिमच्चैव प्राज्ञं चैव मनस्तव । यस्त्वं प्राप्तः श्रियं त्यक्त्वा लतां विषफलामिव ॥१२.६ आपका मन सब प्रकार से धैर्यवान् व ज्ञानवान् है जो आप विषाक्त फलवाली लता की तरह लक्ष्मी को तजकर आये हैं ॥6 ॥ नाश्चर्यं जीर्णवयसो यज्जग्मुः पार्थिवा वनम् । अपत्येभ्यः श्रियं दत्त्वा भुक्तोच्छिष्टामिव स्रजम् ॥१२.७ (इसमें कुछ) आश्चर्य नहीं कि बूढ़े होनेपर राजा लोग अपनी सन्तानों को उपभोग की गई झूठी माला की तरह राज्य-लक्ष्मी सौंपकर वन गये हैं ॥7 ॥
इदं मे मतमाश्चर्यं नवे वयसि यद्भवान् । अभुक्त्वाैव श्रियं प्राप्तः स्थितो विषयगोचरे ॥१२.८ इसे मैं आश्चर्य मानता हूँ कि आप, नई वयस में विषयों की गोचर-भूमि में रहते हुए, लक्ष्मी का उपभोग किए बिना ही आ गये हैं ॥8 ॥ तद्विज्ञातुमिमं धर्मं परमं भाजनं भवान् । ज्ञानप्लवमधिष्ठाय शीघ्रं दुःखार्णवं तर ॥१२.९ इसलिए इस परम धर्म को जानने के लिए आप उत्तम पात्र हैं; ज्ञानरूप नाव पर चढ़कर दुःखरूप सागर को शीघ्र पार कीजिए ॥9 ॥ शिष्ये यद्यपि विज्ञाते शास्त्रं कालेन वर्ण्यते । गाम्भीर्याद्व्यवसायाच्च न परीक्ष्यो भवान्मम ॥१२.१० यद्यपि शिष्य को जानने के बाद समय पर शास्त्र बताया जाता है, किन्तु आपकी गम्भीरता व निश्चय के कारण मैं आपकी परीक्षा नहीं करूँगा" ॥10 ॥ इति वाक्यमराडस्य विज्ञाय स नरर्षभः । बभूव परमप्रीतः प्रोवाचोत्तरमेव च ॥१२.११ अराड की यह बात जानकर वह नर-श्रेष्ठ परम प्रसन्न हुआ और उत्तर दिया:— ॥11 ॥ विरक्तस्यापि यदिदं सौमुख्यं भवतः परम् । अकृतार्थोऽप्यनेनास्मि कृतार्थ इव सम्प्रति ॥१२.१२ “विरक्त होनेपर भी आपकी जो यह अत्यन्त अनुकूलता है, अकृतार्थ होनेपर भी मैं इससे इस समय कृतार्थ-सा हूँ ॥12 ॥ दिदृक्षुरिव हि ज्योतिर्याियासुरिव दैशिकम् । त्वद्दर्शनमहं मन्ये तितीर्षुरिव च प्लवम् ॥१२.१३ आपके दर्शन को मैं वैसा ही मान रहा हूँ, जैसा कि देखने की इच्छा करनेवला प्रकाश को, यात्रा की इच्छा करनेवाला (मार्ग) बतानेवाले को, और (नदी) पार करने की इच्छा करनेवाला नाव को मानता है ॥13 ॥ तस्मादर्हसि तद्वक्तुं वक्तव्यं यदि मन्यसे । जरामरणरोगेभ्यो यथायं परिमुच्यते ॥१२.१४ इसलिए यदि आप कहने योग्य समझें, तो आपको वह कहना चाहिए जिससे यह व्यक्ति जरा मरण व रोग से मुक्त हो जाय" ॥14 ॥ इत्यराडः कुमारस्य माहात्म्यादेव चोदितः । सङ्क्षिप्तं कथयांचक्रे स्वस्य शास्त्रस्य निश्चयम् ॥१२.१५ बुद्धचरित 61
कुमार के माहात्म्य से ही प्रेरित होकर, अराड ने अपने शास्त्र का सङ्क्षिप्त निश्चय इस प्रकार कहा:- ॥15 ॥ श्रूयतामयमस्माकं सिद्धान्तः शृण्वतां वर । यथा भवति संसारो यथा चैव निवर्तते ॥१२.१६ “हे श्रोताओं में श्रेष्ठ, हमारा यह सिद्धान्त सुनिये कि कैसे यह संसार प्रवृत्त होता है और कैसे निवृत्त होता है ॥16 ॥ प्रकृतिश्च विकारश्च जन्म मृत्युर्जरेव च । तत्तावत्सत्त्वमित्युक्तं स्थिरसत्त्व परेहि तत् ॥१२.१७ हे स्थिर-सत्त्व, इसे समझिये; प्रकृति, विकार, जन्म, जरा व मृत्यु को ही सत्त्व कहा गया है ॥17 ॥ तत्र तु प्रकृतिं नाम विद्धि प्रकृतिकौविद । पञ्च भूतान्यहङ्कारं बुद्धिमव्यक्तमेव च ॥१२.१८ हे प्रकृति को जाननेवाले, उसमें पाँच (महा-) भूतों, अहङ्कार, बुद्धि और अव्यक्त को प्रकृति जानिये ॥18 ॥ विकार इति बुध्यस्व विषयानिन्द्रियाणि च । पाणिपादं च वाचं च पायूपस्थं तथा मनः ॥१२.१९ विषयों, इन्द्रियों, हाथ-पाँव, वाणी, गुदा, जननेन्द्रिय व मन को विकार समझिये ॥19 ॥ अस्य क्षेत्रस्य विज्ञानात्क्षेत्रज्ञ इति सञ्ज्ञि च । क्षेत्रज्ञ इति चात्मानं कथयन्त्यात्मचिन्तकाः ॥१२.२० और सञ्ज्ञावान् (= चेतनावान्, होशवाला) इस क्षेत्र को जानने के कारण क्षेत्रज्ञ है। और आत्मा की चिन्ता करनेवाले लोग आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं ॥20 ॥ सशिष्यः कपिलश्चेह प्रतिबुद्ध इति स्मृतः । सपुत्रः प्रतिबुद्धस्तु प्रजापतिरिहोच्यते ॥१२.२१ और इस संसार में शिष्यों-सहित कपिल ज्ञानी स्मरण किया गया है, उसने पुत्रों सहित ज्ञान प्राप्त किया और वह इस संसार में प्रजापति कहा जाता है ॥21 ॥⁵⁰ जायते जीर्यते चैव बाध्यते म्रियते च यत् । तद्व्यक्तमिति विज्ञेयमव्यक्तं तु विपर्ययात् ॥१२.२२ जो जन्म लेता है, बूढ़ा होता है, पीड़ित होता है और मरता है उसे व्यक्त समझना चाहिए और जो इसका विपरीत (उलटा) है उसे अव्यक्त समझना चाहिए ॥22 ॥ अज्ञानं कर्म तृष्णा च ज्ञेयाः संसारहेतवः । स्थितोऽस्मिंस्त्रितये जन्तुस्तत्सत्त्वं नातिवर्तते ॥१२.२३ अज्ञान, कर्म व तृष्णा संसार के कारण-स्वरूप हैं। इन तीनों गुणों में रहनेवाला प्राणी उस सत्त्व (= प्रकृति विकार जन्म जरा व मृत्यु) के पार नहीं जा सकता ॥23 ॥ विप्रत्ययादहङ्कारात्सन्देहादभिसम्प्लवात् । अविशेषानुपायभ्यां सङ्गादभ्यवपाततः ॥१२.२४ विप्रत्यय, अहङ्कार, सन्देह अभिसम्प्लव, अविशेष, अनुपाय, सङ्ग और अभ्यवपात के कारण (प्राणी उस सत्त्व के पार नहीं जा सकता) ॥24 ॥ तत्र विप्रत्ययो नाम विपरीतं प्रवर्तते । अन्यथा कुरुते कार्यं मन्तव्यं मन्यतेऽन्यथा ॥१२.२५ उसमें विप्रत्यय (= अविश्वास, मिथ्या विश्वास) विपरीत आचरण करता है, जो करना है उसे अन्यथा करता है, जो विचारना है उसे अन्यथा विचारता है ॥25 ॥ ब्रवीम्यहमहं वेद्मि गच्छाम्यहमहं स्थितः । इतीहैवमहङ्कारस्त्वनहङ्कार वर्तते ॥१२.२६ हे अहङ्कार-रहित, मैं बोलता हूँ, मैं जानता हूँ, मैं जाता हूँ, मैं खड़ा हूँ, इस प्रकार इस संसार में अहङ्कार होता है ॥26 ॥ यस्तु भावानसन्दिग्धानेकीभावेन पश्यति । मृत्पिण्डवदसन्देहे स इहोच्यते ॥१२.२७ हे सन्देह-रहित, जो परस्पर नहीं मिली हुई चीजों को मिट्टी के ढेले के समान एक (=ठोस) देखता है, वह इस संसार में सन्देह कहा जाता है ॥27 ॥ य एवाहं स एवेदं मनो बुद्धिश्च कर्म च । यश्चैवैष गणः सोऽहमिति यः सोऽभिसम्प्लवः ॥१२.२८ जो ही मैं हूँ वही यह मन बुद्धि कर्म है, और (मन बुद्धि व कर्म का) जो यह समूह है वहीं मैं हूँ, ऐसा जो है वह अभिसम्प्लव है ॥28 ॥ अविशेषं विशेषज्ञ प्रतिबुद्धाप्रबुद्धयोः । प्रकृतीनां च यो वेद सोऽविशेष इति स्मृतः ॥१२.२९ हे विशेषज्ञ, जो ज्ञानी व अज्ञानी के बीच तथा प्रकृति के बीच अविशेष (= अभेद, भेद नहीं) जानता है वह अविशेष स्मरण किया गया है ॥29 ॥
⁵⁰- “प्रतिबुद्धिरिति स्मृतिः” के स्थान में “प्रतिबुद्ध इति स्मृतः” रक्खा गया है। यह एक दुर्बोध श्लोक है। इस दुर्बोधता का कारण पाठ-दोष ही जान पड़ता है। श्लोक-संख्या 29, 40 और 22 को देखते हुए, इसके तीसरे चरण में “प्रतिबुद्ध” की जगह “अप्रतिबुद्ध” पढ़ना ठीक होगा। तब अर्थ यों हो—“और, इस संसार में शिष्यों- सहित कपिल ज्ञानी स्मरण किया गया है और पुत्रों सहित प्रजापति (भूतात्मा, मार) अज्ञानी कहा जाता है।” 62 अश्वघोष
नमस्कारवषट्कारौ प्रोक्षणाभ्युक्षणादयः । अनुपाय इति प्राज्ञैरुपायज्ञ प्रवेदितः ॥१२.३० नमस्कार, वषट्कार (= आहुति), सिञ्चन-आदि को, हे उपायज्ञ, बुद्धिमानों ने अनुपाय (= अनुचित उपाय) बताया है ॥३०॥ सज्जते येन दुर्मेधा मनोवाग्बुद्धिकर्मभिः । विषयेष्वनभिष्वङ्ग सोऽभिष्वङ्ग इति स्मृतः ॥१२.३१ जिससे दुर्बुद्धि पुरुष मन वाणी बुद्धि व कर्म द्वारा विषयों में आसक्त होता है, वह, हे आसक्ति-रहित, सङ्ग (= आसक्ति) स्मरण किया गया है ॥३१॥ ममेदमहमत्येति यद्दुःखमभिमन्यते । विज्ञेयोऽभ्यवपातः स संसारे येन पात्यते ॥१२.३२ “मेरा यह है, मैं इसका हूँ” इस दुःख के अभिमान को अभ्यवपात जानना चाहिए जिसके द्वारा संसार में पतन होता है ॥३२॥ इत्यविद्या हि विद्वांसः पञ्चपर्वां समीहते । तमो मोहं महामोहं तामिस्रद्वयमेव च ॥१२.३३ वह विद्वान् कहता है कि अविद्या पाँच पर्वों (= ग्रन्थियों) की होती है—तम, मोह, महामोह, और तामिस्र ॥३३॥ तत्रालस्यं तमो विद्धि मोहं मृत्युं च जन्म च । महामोहस्त्वसम्मोह काम इत्येव गम्यताम् ॥१२.३४ उनमें आलस्य को तम, जन्म व मृत्यु को मोह जानिये। हे मोह-रहित, काम ही महामोह है, ऐसा समझिये ॥३४॥ यस्मादत्र च भूतानि प्रमुह्यन्ति महान्त्यपि । तस्मादेष महाबाहो महामोह इति स्मृतः ॥१२.३५ जिस कारण इस (काम) में बड़े-बड़े प्राणी भी मूढ़ हो जाते हैं, इस कारण हे महाबाहो, यह महामोह स्मरण किया गया है ॥३५॥ तामिस्रमिति चाक्रोध क्रोधमेवाधिकुर्वते । विषादं चान्धतामिस्रमविषाद प्रचक्षते ॥१२.३६ हे क्रोध-रहित, क्रोध को तामिस्र कहते हैं और हे विषाद-रहित, विषाद को अन्ध-तामिस्र कहते हैं ॥३६॥ अनयाविद्यया बालः संयुक्तः पञ्चपर्वया । संसारे दुःखभूयिष्ठे जन्मस्वभिनिषिच्यते ॥१२.३७ पाँच पर्वोंवाली इस अविद्या से युक्त होकर मूर्ख मनुष्य दुःख-बहुल संसार में बार-बार जन्म लेता है ॥३७॥ द्रष्टा श्रोता च मन्ता च कार्यकारणमेव च । अहमित्येवमागम्य संसारे परिवर्तते ॥१२.३८ “द्रष्टा श्रोता चिन्तक व कार्य का साधक मैं ही हूँ” ऐसा समझकर वह संसार में भटकता है ॥३८॥ इहैभिर्हेतुभिर्धीमन् जन्मःश्रोतः प्रवर्तते । हेत्वभावात्फलाभाव इति विज्ञातुमर्हसि ॥१२.३९ इस संसार में इन कारणों से, हे धीमन्, जन्म को सोता चलता रहता है। कारण नही होने से फल नही हो सकता, ऐसा आपको जानना चाहिए ॥३९॥ तत्र सम्यङ्गतिर्विद्वान्मोक्षकाम चतुष्टयम् । प्रतिबुद्धाप्रबुद्धौ च व्यक्तमव्यक्तमेव च ॥१२.४० इसमें, हे मोक्ष के इच्छुक, सम्यक् बुद्धिवाले को (यह) चार जानना चाहिए-ज्ञानी-अज्ञानी और व्यक्त- अव्यक्त ॥४०॥ यथावदेतद्विज्ञाय क्षेत्रज्ञो हि चतुष्टयम् । आजवंजवतां हित्वा प्राप्नोति पदमक्षरम् ॥१२.४१ इन चारों को ठीक ठीक जानकर क्षेत्रज्ञ जन्म-मरण की वेगवती धारा को छोड़ देता है और अविनाशी पद प्राप्त करता है ॥४१॥ इत्यर्थं ब्राह्मणा लोके परमब्रह्मवादिनः । ब्रह्मचर्यं चरन्तीह ब्राह्मणांन्वासयन्ति च ॥१२.४२ इसके लिए संसार में परमब्रह्म-वादी ब्राह्मण ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं और ब्राह्मणों को इसकी शिक्षा देते हैं” ॥४२॥ इति वाक्यमिदं श्रुत्वा मुनेस्तस्य नृपात्मजः । अभ्युपायं च पप्रच्छ पदमेव च नैष्ठिकम् ॥१२.४३ उस मुनि की यह बात सुनकर राजा के पुत्र ने उपाय और नैष्ठिक पद के बारे में पूछा:- ॥४३॥ ब्रह्मचर्यमिदं चर्यं यथा यावच्च यत्र च । धर्मस्यास्य च पर्यन्तं भवान्व्याख्यातुमर्हति ॥१२.४४ “इस ब्रह्मचर्य का आचरण जैसे जितना और जहाँ करना चाहिए, और इस धर्म का जो अन्त है उसकी आप व्याख्या कीजिए।” ॥४४॥ इत्यराडो यथाशास्त्रं विस्पष्टार्थं समासतः । तमेवान्येन कल्पेन धर्ममस्मै व्यभाषत ॥१२.४५ अराड ने शास्त्रानुसार उसी धर्म को उसके लिए अन्य तरीके से सङ्क्षेप में स्पष्ट शब्दों में कहा:- ॥४५॥ अयमादौ गृहान्मुक्त्वा भैक्षाकं लिङ्गमाश्रितः । समुदाचारविस्तीर्णं शीलमादाय वर्तते ॥१२.४६ बुद्धचरित 63
“आरम्भ में घर छोड़कर वह भिक्षु-वेश धारण करता है और सदाचार-व्यापी शील ग्रहण करता है ॥46 ॥ सन्तोषं परमास्थाय येन तेन यतस्ततः । विविक्तं सेवते वासं निर्द्वन्द्वः शास्त्रवित्कृती ॥१२.४७ जहाँ-तहाँ से जो कुछ मिल जाता है उसी से परम सन्तोष पाकर वह निर्द्वन्द्व शास्त्रज्ञ व बुद्धिमान् एकान्त निवास का सेवन करता है ॥47 ॥ ततो रागाद्भयं दृष्ट्वा वैराग्याच्च परं शिवम् । निगृह्णन्निन्द्रियग्रामं यतते मनसः श्रमे ॥१२.४८ तब राग से भय की (उत्पत्ति) और वैराग्य से परम कल्याण की (उत्पत्ति) देखकर इन्द्रिय-समूह का निग्रह करता हुआ वह मानसिक शान्ति के लिए यत्न करता है ॥48 ॥ अथो विविक्तं कामेभ्यो व्यापादादिभ्य एव च । विवेकजमवाप्नोति पूर्वध्यानं वितर्कवत् ॥१२.४९ तब वह काम व व्यापद (= पर-द्रोह-चिन्तन, क्रोध) आदि से रहित, विवेक-जन्य और वितर्क-युक्त पूर्व ध्यान प्राप्त करता है ॥49 ॥ तच्च ध्यानसुखं प्राप्य तत्तदेव वितर्कयन् । अपूर्वसुखलाभेन ह्रियते बालिशो जनः ॥१२.५० और उस ध्यान-सुख को पाकर, उसी की चिन्ता करता हुआ, मूर्ख आदमी अपूर्व सुख की प्राप्ति द्वारा अपहृत (पथभ्रष्ट) होता है ॥50 ॥ शमेनैवंविधेनायं कामद्वेषविगर्हिणा । ब्रह्मलोकमवाप्नोति परितोषेण वञ्चितः ॥१२.५१ काम-द्वेष-विरोधिनी ऐसी शान्ति द्वारा वह सन्तुष्ट होकर ब्रह्म-लोक प्राप्त करता है ॥51 ॥⁵¹ ज्ञात्वा विद्वान्वितर्कांस्तु मनःसङ्क्षोभकारकान् । तद्वियुक्तमवाप्नोति ध्यानं प्रीतिसुखान्वितम् ॥१२.५२ किन्तु वितर्क (= विचार) मन को क्षुब्ध करते हैं, ऐसा जानकर विद्वान् उन (वितर्कों) से वियुक्त और प्रीति-सुख से युक्त ध्यान प्राप्त करता है ॥52 ॥ ह्रियमाणस्तया प्रीत्या यो विशेषं न पश्यति । स्थानं भास्वरमाप्नोति देवेष्वाभास्वरेषु सः ॥१२.५३ उस प्रीति द्वारा हरण किया जाता हुआ जो विशेष को नहीं देखता है वह, आभास्वर देवों के बीच भास्वर (= उज्ज्वल) स्थान प्राप्त करता है ॥53 ॥ ⁵¹- = “वञ्चित” के स्थान में “सज्जितः” या “युक्त” बोधक कोई दूसरा शब्द होगा । यस्तु प्रीतिसुखात्तस्माद्विवेचयति मानसम् । तृतीयं लभते ध्यानं सुखं प्रीतिविवर्जितम् ॥१२.५४ जो उस प्रीति-सुख (प्रीति के सुख से) अपने मन को अलग करता है वह, सुखमय, किन्तु प्रीति-रहित तृतीय ध्यान प्राप्त करता है ॥54 ॥ यस्तु तस्मिन्सुखे मग्नो न विशेषाय यत्नवान् । शुभकृत्स्नैः स सामान्यं सुखं प्राप्नोति दैवतैः ॥१२.५५ जो उस सुख में मग्न होकर विशेष के लिए यत्न नही करता हे वह शुभकृत्स्न देवताओं के साथ सामान्य सुख प्राप्त करता है ॥55 ॥ तादृशं सुखमासाद्य यो न रज्यत्युपेक्षकः । चतुर्थं ध्यानमाप्नोति सुखदुःखविवर्जितम् ॥१२.५६ वैसा सुख पाकर जो अनुरक्त नही होता है, उदासीन रहता है, वह सुख-दुःख से रहित चतुर्थ ध्यान प्राप्त करता है ॥56 ॥ तत्र केचिद्व्यवस्यन्ति मोक्ष इत्यभिमानिनः । सुखदुःखपरित्यागादव्यापाराच्च चेतसः ॥१२.५७ उसमें सुख-दुःख का परित्याग होने से और चित्त का व्यापार नही होने से कुछ अभिमानी निश्चय करते हैं कि मोक्ष यही है ॥57 ॥ अस्य ध्यानस्य तु फलं समं देवैर्बृहत्फलैः । कथयन्ति बृहत्कालं बृहत्प्रज्ञापरीक्षकाः ॥१२.५८ ब्रह्म-ज्ञान के परीक्षक कहते हैं कि इस ध्यान का फल बृहत्फल देवों के साथ दीर्घ कालतक रहता है ॥58 ॥ समाधेर्व्युत्थितस्तस्माद्दृष्ट्वा दोषांश्शरीरिणाम् । ज्ञानमारोहति प्राज्ञः शरीरविनिवृत्तये ॥१२.५९ उस समाधि से उठकर, शरीर-धारियों के दोष देखकर बुद्धिमान् पुरुष शरीर-निवृत्ति के लिए ज्ञान (-मार्ग) पर आरूढ़ होता है ॥59 ॥ ततस्तद्ध्यानमुत्सृज्य विशेषे कृतनिश्चयः । कामेभ्य इव स प्राज्ञो रूपादपि विरज्यते ॥१२.६० तब उस ध्यान को छोड़कर, विशेष के लिए निश्चय कर बुद्धिमान् (पुरुष) काम की तरह रूप से भी विरक्त होता है ॥60 ॥ शरीरे खानि यान्यस्मिन्तान्यादौ परिकल्पयन् । घनेष्वपि ततो द्रव्येष्वाकाशमधिमुच्यते ॥१२.६१ 64 अश्वघोष
इस शरीर में जो शून्य स्थान हैं पहले उनकी कल्पना करता है, तब (इसके) ठोस पदार्थों को भी शून्य समझता है ॥61 ॥ आकाशगतमात्मानं सङ्क्षिप्त्य त्वपरो बुधः । तदेवानन्ततः पश्यन्विशेषमधिगच्छति ॥१२.६२ दूसरा बुद्धिमान् पुरुष आकाश में स्थित अपने को (या आकाश में व्याप्त आत्मा को) सङ्क्षिप्त (= सङ्कुचित) कर, उसी को अनन्त की तरह देखता हुआ विशेष को प्राप्त करता है ॥62 ॥ अध्यात्मकुशलस्त्वन्यो निवर्त्यात्मानमात्मना । किञ्चिन्नास्तीति सम्पश्यन्नाकिञ्चन्य इति स्मृतः ॥१२.६३ अध्यात्म-कुशल दूसरा पुरुष आत्मा द्वारा आत्मा को निवृत्त कर “कुछ भी नही है” ऐसा देखता हुआ आकिञ्चन्य (=अकिञ्चन ?) स्मरण किया गया है ॥63 ॥ ततो मुञ्जादिषीकेव शकुनिः पञ्जरादिव । क्षेत्रज्ञो निःसृतो देहान्मुक्त इत्यभिधीयते ॥१२.६४ तब मुञ्ज से (निकली) सींक के समान, पिंजड़े से (निकले) पक्षी के समान, देह से निकला हुआ क्षेत्रज्ञ मुक्त कहा जाता है ॥64 ॥ एतत्परमं ब्रह्म निर्लिङ्गं ध्रुवमक्षरम् । यन्मोक्ष इति तत्त्वज्ञाः कथयन्ति मनीषिणः ॥१२.६५ यह परम ब्रह्म है, चिह्न-रहित, ध्रुव और अविनाशी है, जिसे तत्त्वज्ञ मनीषी मोक्ष कहते हैं ॥65 ॥ इत्युपायश्च मोक्षश्च मया सन्दर्शितस्तव । यदि ज्ञातं यदि रुचैर्यथावत्प्रतिपद्यताम् ॥१२.६६ इस तरह मोक्ष और उपाय मैंने आपको बतला दिये हैं; यदि इसे समझा और यदि रुचि हो, तो उचित रीति से इसे प्राप्त कीजिए ॥66 ॥ जैगीषव्योऽथ जनको वृद्धश्चैव पराशरः । इमं पन्थानमासाद्य मुक्ता ह्यन्ये च मोक्षिणः ॥१२.६७ जैगीषव्य, जनक, वृद्ध पराशर और दूसरे मोक्षवाले इस मार्ग से चलकर मुक्त हुए” ॥67 ॥ इति तस्य स तद्वाक्यं गृहीत्वा तु विचार्य च । पूर्वहेतुबलप्राप्तः प्रत्युत्तरमुवाच ह ॥१२.६८ उसका यह वचन सुनकर और विचार करके पूर्व जन्मों के हेतु-बल (=तीन कुशल-मूलों की शक्ति) से युक्त कुमार ने उत्तर दिया:- ॥68 ॥ श्रुतं ज्ञानमिदं सूक्ष्मं परतः परतः शिवम् । क्षेत्रज्ञस्यापरित्यागाद्वैम्येतन्नैष्ठिकम् ॥१२.६९
“यह सूक्ष्म ज्ञान सुना, जो उत्तरोत्तर कल्याण-कारी होता गया है। क्षेत्रज्ञ का परित्याग नही होने से इसे मैं नैष्ठिक नही समझता हूँ ॥69 ॥ विकारप्रकृतिभ्यो हि क्षेत्रज्ञं मुक्तमप्यहम् । मन्ये प्रसवधर्माणं बीजधर्माणमेव च ॥१२.७० विकार और प्रकृति से युक्त होनेपर भी क्षेत्रज्ञ में उत्पत्ति करने का धर्म (=गुण, स्वभाव) और बीज होने का धर्म रहता है, ऐसा मैं मानता हूँ ॥70 ॥ विशुद्धो यद्यपि ह्यात्मा निर्मुक्त इति कल्प्यते । भूयः प्रत्ययसद्भावादमुक्तः स भविष्यति ॥१२.७१ यद्यपि विशुद्ध आत्मा मुक्त समझा जाता है, प्रत्ययों (कारणों) के विद्यमान होने से वह फिर अमुक्त (=बद्ध) हो जायगा ॥71 ॥ ऋतुभूम्यम्बुविरहाद्यथा बीजं न रोहति । रोहति प्रत्ययैस्तैस्तैस्तद्वत्सोऽपि मतो मम ॥१२.७२ जैसे ऋतु भूमि व जल के अभाव से बीज अङ्कुरित नही होता है और उन उन प्रत्ययों के होने से अङ्कुरित होता है, वैसे ही मैं उसे भी मानता हूँ ॥72 ॥ यत्कर्माज्ञानतृष्णानां त्यागान्मोक्षश्च कल्प्यते । अत्यन्तस्तत्परित्यागः सत्यात्मनि न विद्यते ॥१२.७३ यह कि कर्म अज्ञान व तृष्णा के त्याग से मोक्ष पाने की कल्पना की जाती है, सो आत्मा के रहनेपर उसका अत्यन्त (=सम्पूर्ण) त्याग नही हो सकता ॥73 ॥ हित्वा हित्वा त्रयमिदं विशेषस्तूपलभ्यते । आत्मनस्तु स्थितियंत्र तत्र सूक्ष्ममिदं त्रयम् ॥१२.७४ इन तीनों को धीरे-धीरे छोड़ने से विशेष की प्राप्ति होती है, किन्तु जहाँ आत्मा की स्थिति है वहाँ ये तीनों सूक्ष्म रूप में रहते ही हैं ॥74 ॥ सूक्ष्मत्वाच्चैव दोषाणामव्यापाराच्च चेतसः । दीर्घत्वायुषश्चैव मोक्षस्तु परिकल्प्यते ॥१२.७५ दोषों के सूक्ष्म होने से, चित्त का व्यापार नही होने से, और (उस अवस्था में) आयु लम्बी होने से मोक्ष की (केवल) कल्पना कर ली जाती है ॥75 ॥ अहङ्कारपरित्यागो यश्चैष परिकल्प्यते । सत्यात्मनि परित्यागो नाहङ्कारस्य विद्यते ॥१२.७६ और अहङ्कार-परित्याग की जो यह कल्पना की जाती है, सो आत्मा के रहनेपर अहङ्कार का परित्याग नही हो सकता ॥76 ॥
बुद्धचरित 65