चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
१२७ चौरहँ' जौन देखि पाँ लागहिँ । पाप केत परसहिँ कर भागहिँ ॥४ रूप पुतरि गइ दस नख लावा । तरुवहिं रकत भू सर बलि भावा ॥५ पायि परौं मुख जोरूँ, सो धनि उतर न देइ ।६ सुनत राठैं बिसँमरि गा, मर मर साँसें लेइ ॥७ पाठान्तर—पंजाब प्रति— इस प्रतिरी उपलब्ध पोथमे लाल स्याहीते लिखी पंक्तियाँ अत्यन्त अस्पष्ट हैं। फलतः शीर्षक और तीसरी पक्तिका पाठ सम्भव न हो सका। पृष्ठ फट जानेसे पंक्तियाँ ५-७ भी अप्राप्य हैं। १—रस्म । २—फड़ाये । ३—गढ । ४—भौ छभतोलु हिय तर अस धरा । ५—बिमोहहिं । ६—जाहि । ७—लागी । ८—भागी (पूर्व पद के अनुसार) । ९—तष्चन । ९२ ( रीसँकडस ५१भ ) सिफते पाय व रफ्तारे चाँदा ( पग और गति वर्णन ) हँस गँवन ठुमठुमकत आवइ । चमक चमक धनि पाउ उघावइ ॥१ झनक झकरू पाँ धरती धरा । घमक घमक अनु सुगवि भरा ॥२ सेल मन्हान सों चाँदा आवइ । बानों छीनरि बेगु उघावइ ॥३ सर सुईं धरउँ चाँद धरि पाऊ । नान हुइँ न फादेउँ गाऊ ॥४ पागेँ धूर नैन भरि अँजीं । जीभ काढि दुइ तरुवा माँजौं ॥५ चलत चाँद चित लागा, मनहुत उतर न फाउ ।६ पाँयहि हाथ न पहुँचे, हँस हँस रोवइ राउ ॥७ टिप्पणी—(१) उघावइ—उठाती है। (२) पौ—पाव पैर। (४) सुईं—पृथ्वी। नानहुइँ—क्षुद्रपन म हीं। (५) धूर—धूलि। आँजीं—अञ्जन की तरह लगाऊँ। तरुवा—तालू, पैर का निचला भाग।
२१८ ९३ ( रोकेण्ड्स ५२८ ) सिफत ससोकामदे बाँदा गोयन्द ( शृंगार वर्णन ) लुगु बैस इइ अहि बुठकारी । चन्दन जैफर मिरैं मैंबारी ॥१ सरग पवान लाग मनु आयी । घाइस भैंसीं जाइ उड़ायी ॥२ बाँसपोर हुत मनु घर फोँड़ी । अछरि वइस दस्ति मैं ठाढ़ी ॥३ फोइ पुडुप अस अंग गँधाई । रितु बसन्त चहुँ दिसि फिर आई ॥४ अंग बास नौखण्ड गँधाने । बास केतकी मैंबर लुभाने ॥५ उपेन्दर गोयन्द चैंदरावळ, भरमौं बिसुन मुरारि ।६ गुन गँधरब रिखि देवता, रूप विमोहे नारि ॥७ टिप्पणी—(१) बुठकारी—मूर्तिकारी । जैफर—जायफल । मिरै—मिलाकर । (४) फोइ—कुमुदनी । (६) गोयन्द—( फारसी ) कहते हैं । (७) यह पद ३४ कड़बकमें भी है । ९४ ( रोकेण्ड्स ५३७, पंजाब [७] ) सिफते किरफत बाँदा गोयन्द ( वस्त्र वर्णन ) सुनहु चीर कस पहिर हझौरी । कुँदिया राम सेंदुरिया सारी ॥१ पहिर मघवना औ' कशियारा । चकना चीर चौकरिया सारा ॥२ मुँगिया पटरु अंग चढ़ाई । मबिला छुदरी मर पहिरायी ॥३ मानों चाँद हसँमी रातीं । एकखेंऽछाप (सोइ) गुजरातीं ॥४ दरिया चैंदरीटा जो मुक्राह' । साथ पटोरैं बहुत सिंगारू ॥५ थोला चीर पहिर ओ चासी, मानों जाइ उड़ाइ ।६ देखत रूप विमोहे देवता, फिरहुत अहर[१*] आइ ॥७
१२९ मूलपाठ—(४) सो सोइ । पाठांतर—पंजाब प्रति— इस प्रतिफ़ उपलब्धमे फोटोमें लाल स्याहीसे लिखी पंक्तियों अत्यन्त अस्पष्ट हैं । जिससे शीर्षक, और पंक्ति १, ६ और ७ का पाठ प्राप्त करना सम्भव नहीं है । १—मुर्कीना २—अरु ३—चकिया ४—जोगवई ५—मदिर ६—सष्ट ७—पाता ८—गुजराता ९—चंदोवा १०—आवा बब्वल । टिप्पणी—( १ ) कुंदिवा—इसका उल्लेख पदमावत ( ३२१।२ ) में भी है । यहाँ वासुदेव शरण अग्रवालने उसका फूँदने लगा हुआ नीवीबन्ध होनेकी सम्भावना प्रकट की है । किन्तु प्रस्तुत प्रसंगमें यह अनुमान संगत नहीं है । हमारी समझम यह किसी प्रकारका अंगिया या चोली है । अथवा यह पद्मनाभ कृत कान्हडदे प्रबन्धमें उल्लिखित फूँदड़ी ( ३।१५३ ) है । फूँदड़ी किसी प्रकारका मूल्यवान वस्त्र या किस्म होने और रत्नोंका प्रयोग होता था ( कनक मुकामल फूँन्दड़ी ए बिचि रत्न बहन्त ) । मॅहूरिया—सिंदूरी रंगकी । सारी—साड़ी । ( २ ) मघवर्णा—पदमावतमें मघीनारा ( १६९।४ ) और पृथ्वीचन्द्र चरितम मेघनादा उल्लेख है ( प्राचीन गुर्जर काव्य संग्रह बड़ोदा १९ पृ १२ ) । सम्भवतः यह वही वस्त्र है जिसे ज्योतिरीश्वर ठाकुरने अपने वर्णरत्नाकरमें मेघपत्र और मेघडम्बर नामसे पट्टवस्त्र जातिका उल्लेख किया है । चौदहवीं शतीक विविधकल्पक्रम भी मेघडम्बर, मेघाडम्बर और मेघावली नामक वस्त्रोंका उल्लेख है ( वणिक समुच्चय सम्पादक श्री जै० संडसरा पृ १४-१५)। मेघडम्बर साटियोंका उल्लेख प्राचीन बगला साहित्यमें भी प्राय मिलता है । इन सबसे अनुमान होता है कि यह आसमानी ( बादली ) रंगका कोई रेशमी वस्त्र रहा होगा । कधियारा—इस पाठके सम्बन्धमें कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता । इसे कथारा या गथारउ भी पढ़ा सकता है । पर इन नामोंके किसी वस्त्रकी जानकारी कहीं प्राप्त नहीं है । चकया—पद्मावतमें भी इसका उल्लेख है (११.३४) । (यहाँ रमऊ गगार्दजीने उसे चिकवा चुना है । यह पाठ सम्भव है पर हमने उस पाठ भूलकर ग्रहण नहीं किया है ।) रामचन्द्र शुक्लने इस चौकट नामक रेशमी वस्त्र बताया है। वर्णरत्नाकर अनुसार विवाहमें नेगके रूपमें निम्न जातियोंको चमडा चौकट करते थे । चकयाका उल्लेख यहाँ विवाहके अवसरपर दिये जाने वाले वस्त्रके प्रसंगमें नहीं है। अतः उस चौकटसे इस वस्त्रकी सही पहचान न सकता । यह वस्त्र किसी विशिष्ट रूपमें बनाया होगा। शुक्लजीने उसे गहरा
१३ धारी रंगका रेशमी वस्त्र बताया है (कास्ट्यूम्स एण्ड टेक्सटाइल्स इन सल्तनत पीरियड पृ. ७१)। सम्भवतः उन्होंने यह अनुमान उसमें चौकट बांधी पहचानके आधारपर किया है। (बनारसकी बोलीमें सामान्यतः चौकट अखन्त जैसे वस्त्रको कहते हैं)। हमारा अनुमान है कि चरचा वही वस्त्र है जिसका उल्लेखने जीर्णज्वरपरिधानविधि नामक वर्णकमें परबया नामसे किया गया है। (वर्णरसमुच्चय, पृ. १८)। पन्नवस्त्र (सं. पत्रपट) किसी ऐसे वस्त्रका नाम होगा जिसपर पत्र अथवा फूल बना रहता रहा होगा। भोजनके समय पहननेके वस्त्रोंके रूपमें यह निस्सन्देह रेशमी रहा होगा। चीर—आइन-ए-अकबरीमें सोनेके काम किये हुए वस्त्रको चीर कहा गया है। चौकठिया—इसका उल्लेख पृथ्वीचन्द्रचरितमें भी हुआ है और सम्भवत इसीका उल्लेख वर्णकसमुच्चयमें चौऊपाचीवक रूपमें हुआ है। गुजरातीमें इसे चौंकडी कहते हैं। जान अर्विनने सत्रहवीं शतीके भारतीय वस्त्र व्यवसायका जो अध्ययन प्रस्तुत किया है उसमें उन्होंने 'से गस्ते रिसक्ता' चारचानेदार सूती कपड़ा बताया है। हो सकता है। यह उड़ीसामे बनने वाला रेशम और सूतमिश्रित वस्त्र हो जो चारखाना कहा जाता था (मोनोग्राफ आन सिल्क गुड्स बङ्गी, पृ. ९९)। (३) मुंगिया—इसके कई अर्थ हो सकते हैं : (१) मूंगेके रंगका रेशमी वस्त्र (२) आसामका सुप्रसिद्ध मूँगा रेशम (३) मूंगीपट्टन (पैठन) की बनी सुप्रसिद्ध साड़ी। यह स्थान औरंगाबादसे २ मील दक्षिण पश्चिम है और मध्यराज्यमें अपने वस्त्रोंके लिए प्रसिद्ध था। मविडा—वर्णक समुच्चयमें मण्डीक और माण्डलिका नामक वस्त्रोंका उल्लेख हुआ है। जान अर्विनने मण्डिल नामक वस्त्रको रेशम और सूत मिश्रित पाटीदार वस्त्र बताया है जो काफी चमकीला होता था। यह वस्त्र बंगालमें मालदा कासिमबाजारके क्षेत्रमें तैयार होता था। माण्डलिया सम्बन्धमें मोतीचन्द्रकी धारणा है कि यह उत्तरी गुजरातके माण्डलियाकस्बेमें तैयार होता था। घुंगरी—घूँघरी । (४) एकरंग्ड—रंग्ड रेशमीवस्त्रको कहते हैं। एकरंग्डसे तात्पर्य एक रंग वाला रेशमी वस्त्र है। रूप—उठा हुआ। गुजराठी—गुजरातका बना हुआ। इसका कजराती पाठ भी सम्भव है। उस अवस्थाम इसका अर्थ होगा काजरत रंगाया। (५) दरिया—सम्भवतः धारीदार वस्त्र जिसे फारसीमें दरियाइ कहा गया है। इसका झुरिया अथवा डुरिया पाठ भी सम्भव है। झुरिया (डोरिया) धारीदार वस्त्रको कहते हैं किन्तु वह सूती होता है। पन्हरीदा—जायसीने पदमावतमें पैनौदरा नामक वस्त्रका उल्लेख किया है (१९९।१) ।
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१२२ (४) सिकरी—गलैम पहनेकी जंजीर। (९) चूरा—पैरमैं पहननेकी चूड़ियों छड़ा। पायक—(सं पादपद्म> पायवाक>पायक>पायक) पायजेब, झाँझर। ९६ (रीकैन्ड्स ५४) ब्यान कर्रन बाशिर सिफ्ते पौदा व इस्तेआदे कूच करदने राय (रूप वर्णन सुनकर राय द्वारा कूचकी तैयारी) सब सिंगार बामिर धो कहा। राजा नैन बैतरनी बहा ॥१ राइ कहा सुन बाँठा जाई। राजहूँरे फेरि देहु दुहाई ॥२ राउत पायक साझन पारी। खेतस करि ले आठ हँकारी ॥३ जाँवंत मरे देस मोर आनाँ। ताँवत बाइ पठउ परधानाँ ॥४ सिहि लग बाँधे आने काछा। मार बिपारी जो घर आछा ॥५ राजा चला मरेख, साँभर लेइ सँजोइ। ६ आगें दधि कै चला वह, पाछें रहे न कोइ ॥७ टिप्पणी—(२) राजहूँरे—राजपुत्रों में। (३) राउत—(सं राजपुत्र>रामठउ>राउअ>राउत्त) यहाँ तात्पर्य सामन्तोंसे है। पायक (सं पदातिक>पाइक) पैदल सैनिक। खेतस—शीघ्र। (५) काछा—कच्छ। ९७ (रीकैन्ड्स ५५) सिफ्ते दर इस्तेआदे यौवब (कूचकी तैयारी) ढाँके तबल मेघ जनु गाजे। घर-घर सबही राउत साजे ॥१ अगनित बीर बहुत धनुकारा। सात सहस चले फैँतकारा ॥२ नवइ सहस घोड़ पाखरे। ताखूँ सरुवाँ ठावँ खरे ॥३ चढ़े आयें लाख असवारा। लाख गयाँ औ परधारा ॥४ एक सहस फरफार पठावा। तूरों लीगाँ अन्त न पावा ॥५
१२१ राहु केतु थर उठे, दसा सूर भा आइ ॥६ सूंक सींह उतरा पँथ, जोगिनि बाहर सब लै जाइ ॥७ टिप्पणी—(१) तबल—नक्कारा जैसा स्तानगाइसके फारसी कोषके अनुसार तबल ढोलकी संज्ञा है जो घोड़े या ऊँटपर रख कर बजाया जाता था। (२) कँटकाहा—सैनिक। (३) घोर—घोड़ा। पाखरे—पख्तरयुक्त, कवचधारी। (४) वहा—(स हद्द, मा वर) तूरही। सींगा—सींग का बना हुआ बिगुल। ९८ (रीफैन्स ५१) तिनके अछवाने अरबी ताजी राव रूपचन्द (राव रूपचन्द्रके अरबी अश्व) आनों भाँत दीख कैकानों। अँगुरो दोइ-दोइ तिहँ कै फानों ॥१ सेत कियाह फार मनु रीठा। हरीयाँव मुख झमकस दीठा ॥२ फाब संकोसी लोहू समाहें। समुँद लाँघि जनु लघन चाहें ॥३ नैन निरष जनु पाइ पखारी। पवन पंख देखत हरियारी ॥४ मात चढ़े मुख घायी दीजा। तंग पिसार बैत धर लीजा ॥५ फेर समुँद हुत काढे, कै यह पापि पयान ।६ सोन पाखर खाल के, आनें पिये पठान ॥७ टिप्पणी—(१) भाँत-भाँति प्रकार। कैकानों—घोड़े। कैकान वस्तुतः बोलन दर्रेके दक्षिण बलूचिस्तानके उत्तर-पूर्व, मस्तुंग और कलातके आस-पास क क्षेत्रका नाम है। यह अति प्राचीन कालमे घोड़ोंकी अच्छी नस्लके लिए प्रसिद्ध है। वहाँके घोड़ोंका उल्लेख भोज कृत युक्ति कल्पतरु (अश्व परीक्षा श्लोक २६) मानसोल्लास (४।६६) नकुल कृत अश्व चिकित्सा (१।८) और शालिभद्र सूरि कृत बाहुबलिरास (बारहवीं शतीमें रचित) में हुआ है। कालान्तरमें कैकान घोड़ोंका पर्यायवाची बन गया। अंगुरो—अंगुष्ठ। (२) सेत—सफ़ेद घोड़े। कियाह—कृष्णोदर एक लाल व एक चमका रंग। फार—फान। रीठा—एक फल जिसका छिल्का काला
११४ होता है। हरियांत—हल्का हरा रंग ऐसा रंग जिसमें हरीतिमा की भाभा हो । (१) पखारी—पंख से युक्त । ९९ (रौकेण्ड्स ५७) सिफते पीलाने राव रूपचन्द गोयन्द (राव रूपचन्द के हाथी) पखरे हस्त दाँत बहिराये । धानुक लै ऊपर बैसाये ॥१ बनखंड जैस चले अविकारे । आने आनु मेघ अँधकारे ॥२ चलन लाग जनु चलहिं पहारा । छाँह परै अग मा अँधियारा ॥३ झँकरहि घोटहिं बाँकुस लागे । बर दस कोस सहस अग भागे॥४ जो कोपहिं तो राइ सँभारहिं । बन तरुवर अर मूर उपारहिं ॥५ सींकर पाइ बानि उठ, तरै काँदो होइ ।६ राठ रूपचंद कोपा, तेग न पारे कोइ ॥७ टिप्पणी—(१) पखरे—पाखर; हाथीके दोनों कानोंकी लोहेकी झूल । बहिराये— निकाले हुए । धानुक—धनुर्धारी सैनिक । (४) बर—आगे । (५) अर मूर—जड़मूल । (६) काँदो—कीचड़ । १०० (रौकेण्ड्स ५८) सिफते कूच कर्दने राव बाकरफरे काहिरा (सेनाकी कूच) सबही गजदल भयउ पयाना । ठोके सबल देत अँगराना ॥१ अफछत फौज चले असवारा । कोस बीस सग भयउ पसारा ॥२ आगं परे नीर खीर पावइ । पाछ रहे सो धूर पकावइ ॥३ सगरैं देस भइउ डर छावा । सबै नराएँ राउ चल आवा ॥४ उठे खेह अरु खग न पागा । जानु सरग परती होइ लागा ॥५
१३५ महतै साथ माँठ लै, राजा कीन्ह पयान ।६ तरैं ताब बासुकि खरभरे, सूरज गयउ लुकान ॥७ टिप्पणी—(१) पयावाँ—प्रयाण प्रस्थान रवानगी । सबद—झंकार । (२) अक्खत—अक्षत अपार । पसार—प्रसार, फैलाव । (४) सगरैं—सारे । मराईँ—नरेश । (७) खेह—धूल । (६) महतै—महत्, श्रेष्ठ अर्थात् ब्राह्मण । १०१ ( रीसॅण्ड्स ५९ ) दर राह फाल नअिस आमदन पेरो शब रूपचन्द व मने कर्नन महता (राहमें अपसकुन) सूखे रूख काग रिरियाये । जोगी आवा भसम चढ़ाये ॥१ दहिने दिसिहुत मरा आवा । डँजरू बायें हाथ बजावा ॥२ उत्तर सूर दिसि फुकरी सियारी । अरु सूरैं रकत दीख रतनारी ॥३ कुसगुन भये न बहिरै राऊ । न बहिरै न देखेउँ फाऊ ॥४ महते जाइ राउ समझावा । कुसगुन भयउँ कित आगे भावा॥५ चाँद सनेह काम रस बेधा, राजा गा बउराइ ।६ एको सगुन न मानी राजा, गोवर छेकसि आइ ॥७ टिप्पणी—(६) गा—हो गया । बउराइ—पागल । १०२ ( रीसॅण्ड्स ६ ) गिर्द कदन राव रूपचन्द शहर गोवर रा व दर हिसार मान्दन शहर (गोबर नगरपर रूपचन्दका घेरा) चहूँ दिसि छेकइ गाड़ फिरावा । खोंटहिँ घाट ओरि गर छावा ॥१ तुरिहिँ पान-बेलि पन्हारी । फेतिह खेत रूख फुलवारी ॥२ काटे चहुँ पास अँधराऊँ । तार खजूर आम लखराऊँ ॥३
१९२ दीन्हि मढ़ि देउर ऊँपराई । पैसय नारा पोखर पाई ॥४ काटे बारी महर के लाई । नरियर गोवा और फुलवाई ॥५ महर मंदिर चढ़ देखा, बहुत हुत असवार ।६ ओठन फिरै न असैं, साँडहि होइ झनकार ॥७ मूल पाठ—पंक्ति ४ के दोनों पदोंके अन्तिम शब्द क्रमशः उपरायउँ और पावउँ पढ़े जाते हैं। पर साथ ही पहले पदका अन्तिम शब्द बइँ के ऊपर हैं भी लिखा है। वस्तुतः उँपराई पाठ ही संगत है। उसी के अनुसार उत्तर पदके अन्तिम शब्द का पाठ पाई लिया गया है। टिप्पणी—(१) छेड़ा—घेरा। गाढ़—कठिन । फिरावा—फैलाया। (२) तुरिह—तोड़ डाला। पनवारी—पानके खेत। केतिह—कितन ही। रूँध—रुद्ध। (३) अंबराउँ—आम्राराम आम के बगीचे। तार—ताड़। बास—जासु जामुन। कवराउँ—(रुच्याराम>रुच्याराम>कहराउँ) एक खास वृत्तोत्थ बगीचा। (४) मढ़ि—मठ। देउर—(सं देवकुल>प्रा देउल>देउर) देवका मन्दिर। नारा—नाला। पोखर—पुष्कर, तालाब। (५) बारी—बगीचा। नरियर—नारियल। गोवा—सुपारी। फुलवाई— फुल्ल्वाटारी। (७) ओठन—टांक। साँड़—लम्बी सीधी तलवार जिसे सैनिक हाथमें लेकर चलते हैं। १०३ (रीडेण्ड्स ६१) हैवत उसतावन वर शहर व गिरिफ़्तबने महर रसूलान रा बर सर महर ( नगरमें आतंक—राय रूपचन्दके पास दूतका जाना) बाँधे पर्बर भई अहताग । बापहि पूत न कोउ सँभारा ॥१ महर लोग सब झार हँकारे। भासे चेव शनैं बिसारे ॥२ गाय भैंस दौघे रिरियाई । राँधा मात न कोऊ खाई ॥३ रोयहिं हीं करव [अन] काहा। फबहुँ काँप सरापत आहा ॥४ छेंक गाठें अँबरॉउँ कटाहिं । पठिये पसीठ उत्तर क्य पावाहिं ॥५
पठये बसीठ तुरी दै, राजा कह धुन काह ।६ किहँ औगुन हम छेंके, कौन रजायसु आह ॥७ टिप्पणी—(१) पैंवर—प्रवेश द्वार। तहवारा—ठहरका। (२) झार—एक-एक करक। (३) मैइस—भैंस। रिरियानी—निस्सहाय की भाँति घिसियाना। राँधा— पकाया हुआ। भात—जावक। (४) करब—करूँगा। काहा—क्या। सरापत—कोसते हैं। (५) पठिये—भेजिये। बसीठ—(सं०-अवसृष्ट > प्रा अवसिट्ठ > वसिठ्ठ
बसीठ > बसीट), ऐसा दूत जिसे सन्देशका पूरा उत्तरदायित्व सौंप दिया जाय। (६) पठये—भेजे। तुरी—घोड़ा। धुन—विचार। काह—क्या। (७) औगुन—अवगुण अपराध। रजायसु—राज्यादेश। आह—है। १०४ (रीफेन्स २१) रफ़्तने रसूलान पेशे राज रूपचन्द ब बाज नमूदने सुखनी राव गहर (दूतोंका महरका सन्देश राव रूपचन्द्रको देना) बसिठ आइ कटक नियरावा। राँइ फर बाँठा आगँ आवा ॥१ रा[इँ] कै बायन बसिठ लइ लाये। तुरी भेंट आगें लै आये ॥२ पुनि बसिठहि सर गुइँ लै आधा। कौन रीस राजा छल आधा ॥३ जो मन होइ सो उत्तर दीजा। जो तुम्ह चाहिथ अभीं लीजा ॥४ दरब कहुउ सौ मीस मराबहुँ। घोड़ कहो अभीं लँ आनहुँ ॥५ राजा देहु रजायसु, माथे पर घड लेहुँ ।६ ईह महँ जो तुम चाहउ, आज फाल के देहुँ ॥७ टिप्पणी—(१) कटक—सेना। (२) बायन—उपहार। (३) रीस—क्रोध कोप। (४) दरब—द्रव्य धन।
११८ १०५ (रीडॅण्ड्स ६३) जबान बाबल राज भर रसुकान (दूतोँ को राव का उत्तर) सुन परधान बोल तूँ मोरा । कइस तू छाड़ साउँ गड़ तोरा ॥१ दण्ड तोर हौं लेहीं नाहीं । घोड़ लाख दोइ मोहि तलआहीं ॥२ आइ कहु तुम अरथ दिसाऊँ । तीरथ गोभर आज बसाऊँ ॥३ हम तुम सरम करहिं अगराजू । चाँद बिवाह देहु महिं आजू ॥४ जो सुख देहु तो पाट पठाऊँ । बरफे लेउँ तिहि बानि मराऊँ ॥५ जो तुम आवहु डर राख, चाँद पियाही देहु ।६ जो रुचि आवे माँग, सो तुम अबहीं लेहु ॥७ १०६ (रीडॅण्ड्स ६४) जबान बाबन रसुकान भर राउ रूपचन्द रा (राव रूपचन्दके दूताका कथन) हूँ नरिन्द देस कर राजा । अस बोल तिहि कहत न छाजा ॥१ जिन धी होइ सो नाँठ न लिये । बरबतरह अस गारि न दिये ॥२ सो घर पुतर्हिस माइ भुलावा । सो राजा गारी कस पावा ॥३ जा रे महर गारी सुन पावइ । आग छोड़ पानी कइँ धावइ ॥४ चाँद और कइँ (दीन) बियाही । कौन उत्तर अब दीजै साही ॥५ बरु हम मार पियारह, फुनि उठ बारहु गाँउँ ।६ बाँदहि ढवां मिलि भागी, अह्म पार कइ नाउँ ॥७ मूलपाठ—५-४०।
१११ १०७ (रौन्दुम १५) दर गुस्सा शुदन राव रूपचन्द बर रसूलान व खामोश मानदन इशा ( राव रूपचन्दका दूतोंपर क्रोध ) अमहिं डीठ विह मार पियारू । खिन एक भीतर गोवर जारूँ ॥१ मूँद फाट के गयँड फिराऊँ । गाल फाड़ कें रूँरा टँगाऊँ ॥२ चीन्ह सून माँसु लै जोँहूँ । पुदुरहिं सून रक्त सब गोँहूँ ॥३ तिह फा यूक्त फरत ढिठाइ । जस माँ कहउँ तइस कहु जाइ ॥४ नाह वेग घाँदा लै आवहु । मुख दुपार टूट लै पावहु ॥५ करवों तम जम चोलेउँ, नाँउँ पसिठ कर आहु ।६ पग फाँद लै आवहु, तूँ इहवाँ दूत नाहु ॥७ टिप्पणी—(२) गवैँडू—गाँव । काइ—निघारु कर । (३) चीन्ह—पी पहि । मूँदुर—गुस्ता । (५) मुख दुपार—मुख्य द्वार । (६) करवों—करूँगा । (७) इहवाँ—यहाँ । १०८ ( रौन्दुम ७४ ) रज हम पैदन शुमुरान कराय बाज गुफ्तन गुर भज गव ( दूतोंको जानेका आदेश ) गजा (बोलिक) दीन्हि रजायसु । सुनहुँ (शमिट कीन्हि) पदायसु॥१ जग मूँ राजा कीन बुराइ । घाँद सबद सुनि गोबर धाइ ॥२ गावर समूँद अन अरगाहा । पूड़हि गइ न पायइ थाहा ॥३ गजा (जा) मरग पड़ पावहु । माँ न पूर घाँदा कँ पारहु ॥४ गजा नगत जा मरग भू आई । घाँद निहारे मूखें निमि पाहूँ ॥५ गगन पह् जा दग, जान इदरों आद ।६ पाट न पैर गजा, यह मणियाहु शाद ॥७ मूलपाठ—१—...
१४ १०९ (रीडिङ्ग्स ७५; काची) नाठम्मोद शुख्ने राब अज शुखने रसूलान व बाज गदानीदने ईशान रा (दूतोंकी बात सुनकर रावका बिराध होना और उन्हें लौटाना) बात सजोग बसिठ जो कहा । नाइ मूँड सुन राजा रहा ॥१ बसिठ बचन बिस भरे सुनाये¹ । रावै ठग गै ठाहू खाये² ॥२ गा असरो मनहुत जो सँजोवा । भा निरास चित भीतर रोवा ॥३ सरग चाँद मैं³ पाई नाहीं । बसिठों⁴ उत्तर देउँ उठ बाहीं ॥४ आज साँझ जो चाँद न पाऊँ । पहर रात तुम्ह सरग पठाऊँ ॥५ जीउ दान जो चाहु, पठउँ⁵ चाँद दिवाइ ।६ नतउ धर उवत गढ़ तोरों, कहु⁶ महर सों⁷ जाइ ॥७ पाठान्तर—काची प्रति : शीर्षक—जवाब दादने राव रूपचन्द रसूलान रा (दूतोंको राव रूपचन्द का उत्तर) १—सुनावा २—रावै गै ठग ठाहू खाया ३—महुं; ४—बसिठसों; ५—पठवहु; ६—कहहु ७—सो । टिप्पणी—(१) नाइ—झुका कर । मूँड—शिर । (३) गा—गया । असरा—आसरा आशा । (७) नतउ—नही तो । ११० (रीडिङ्ग्स ७६) बाज़ आमदने रसूलान बर महर व हाय नमूदने कर्ने राव रूपचन्द (दूतोंका वापस आकर राव रूपचन्दकी माँग कहना) बसिठ बहुरि गावर महँ आये । महर देखि जिन आगैं धाये ॥१ पूछा महर कुमर सों आयहु । का कहु कम उत्तर पायहु ॥२ अस पूछ वस बसिटीं कहा । सुनै नहिं राजा कोह कै रहा ॥३ हस्ति पाइ धन दरब न मानै । चाँद माँगि बिन घर न जानै ॥४ जो जिउ चाँदा पीछहि दीन्हाँ । सो तू राउ चाहु जिउ छीन्हा ॥५
१४१ कै मन्त जस तुम्ह उपजे, राजा कीजइ सोइ । ६ उबत बर गइ तोरै, पुनि तजियावा होइ ॥ ७ १११ ( रीकेण्ड्स ६९ ) मुखबिरत करदे महर बालश्कर्याने मुकरिबे खुद (महरका अपने सेनानायकोंसे परामर्श) महरै मुख कँवरहिं फर चाहा । सेतस ढुरे इहँ बोले काहा ॥ १ बहुतहि कहा चाँद जो दीजै । एक मुख होइ राज पुनि कीजै ॥ २ और कहा बर निकर पराइ । दिवस चार पाहर कै आइ ॥ ३ कँवरू सँवरू दीने गारी । जे न जरमहिं सो माइ भथारी ॥ ४ मूँसहि पैठे पाटन गाँऊँ । अब बिठ देहुँ चाँद के ठाऊँ ॥ ५ जोलहि साँस पेट महँ, तौलहि करिहौं मारि । ६ पुनि सूरूज पह मरिहहिं, अइस होइ ठवियारि ॥ ७ ११२ ( रीकेण्ड्स ७० ) सिफत अस्पान राव महर (राव महरके अश्वोंका वर्णन) महरै काढ़ि तुखार फुलाने । इन्द दस घरे पौर मँह आने ॥ १ हंस हँसोली मँघर सुहाये । दिना यक सिंगारे बहु आये ॥ २ उदिर सँमुद सुइँ पाठन धरहिं । माघ गरभ ते नाचत रहैं ॥ ३ यह तुरंग तीन पा ठाढ़े । नीर दरियाइ पखरिन्द गाढ़े ॥ ४ पौर गरया अठरो अहा । इन्ह अस रूप जो जुत ते रहा ॥ ५ पाँन पाइ परत सम देंहीं, देखत रास उड़ाइ । ६ बहुरु धाव धरि धावहिं, धापै थिर न रहाहिं ॥ ७ टिप्पणी-(१) तुखार-घोड़ा । मूलतः यह मध्य एशिया संस्थित तुर्कोंक एक कबील
१४२ और उत्तर मूल निवास स्थान का नाम था। वहाँसे आने वाले घोड़ों को तुगार कहते थे। पीछे यह अश्वरका पर्याय बन गया। (२) हंस—यह नाम हमें अश्वों की सूची में अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिला। हो सकता है हंस के समान सफेद घोड़े को कहते रहे हों। हंसोली—सम्भवतः इसे ही जायसी ने हाँसुल कहा है (पदुमावत ४७।२)। ऐसा घोड़ा जिसका शरीर महुये के रंग का और चारों पैर कुछ कालापन लिये हों; कुम्मैत हिनाई। भैंवर—भौंरे के रंगका घोड़ा; मुश्की। हिना—सम्भवतः मेहदीके रंगका अश्व। हिंगारे—इसे ही सम्भवतः जायसीने राय कहा है (पदुमावत, ४ ६।१)। फरहंग इसहानाव (पृ १८) के अनुसार कबूतरी रखा के समान सफेद रंगके घोड़ेको हिंगा कहते थे। नकुल कृत शालिहोत्र (पृ १७) में हिंगाका वर्णन इस प्रकार है : बिन सेनी तन पांडुरो होइ एक सम अंग । जूल्हे रंग न देखिये तासु कहिने हिंग ॥ (३) उंदिर—(सं —उन्दौर) बंगाली चूहे और नेवलेके रंगसे मिलता हुआ घोड़ा। सम्भवतः इसे ही संजाब या सिजाब भी कहते थे। संधूर—सम्भव बादामी रंगका घोड़ा। (४) नीर—नील नीले रंगका घोड़ा। हरिवाह—सम्भवतः अन्यत्र उल्लिखित हरितोंत (४।२) और हरिवाह एक ही प्रकारके घोड़ेके लिए प्रयुक्त हुआ है। हरे रंगका घोड़ा, सब्जा। इस रंगका घोड़ा अत्यन्त दुर्लभ है। ( ) बोर—रहाटनगासके फारसी कोष (पृ २ ६) के अनुसार लहरके रंगका घोड़ा। फरहंगनामा हाशिमीका कहना है कि हिम्बक लोग बोरको घोज़ बच कहते थे (पृ १७)। गर्रया—(गर्र गर्रा) श्वेत और लाल रंगकी खिचड़ी बालोंवाला घोड़ा। (६) पौव—पवन। बा—बापु। रास—बागडोर। (७) बारू—सोलहे कोस किन्तु मीलसे बड़ा दूरी नापनेकी इकाई। धावै—धाव्यानयेवै। ११३ ( रौलैन्छंद ) सिवते रुपादाने जयौ ( अस्वारोहियोंका वर्णन ) कसि कसि पड़े सम असवारा। जियत न देखेउँ जिंहि कर मारा॥१
१४१ बिमहिं बुझाये सांने घर । धलग माँ सो तरुफम भर ॥२ गग्गहिं मर्म पीजु कें कया । रकन पियामी फरहिं [नँ] मया ॥३ धीर अम नर परुगहिं घद् । ताल सरवा लोई जड़े ॥४ सातव भुंजवर आगे कमे । झरफे टाकै मोर्न रमे ॥५ जिहर्क डाक परहिं नर, आँ गज कीन्ह तराम । ६ मरन सनह हिये डर, इनके रह न पास ॥७ टिप्पणी-(८) बेख्या-(पारसी शब्द) लोहे अथवा बज्रके आकारकी बनी का तीर। इस पाठ बेबक-दा ताकौ बान तीर बुरकी तीर। सम्भवतः यह शब्द फारनके लिए प्रयोग होता था। (३) कया-शरीर। (६) जिहके-जिस भार। डाक परहि-पुल पड़ते हैं। ११४ (संङ्ग्रह ८२) चित्ररेखाजन्म खण्ड (पद्मावत-वर्णन) जिहि पुरि पग गय धनुसग । तिहि पथ परान मुईं अभाग ॥१ माज वेश आलिम क गद् । दन न फाड़ा पाइहिं गद् ॥२ अशो नर निंट गँकते मूँसहि । पनिज घर गतुगहिं पूसहि ॥३ बानमार क ओंग उपाय । पाँगि गल्त काउ रवि राय ॥४ दइ पोंगर घर मूँट भँपारहूँ । पागन पान माँह भेंट पारहिं ॥५ छत्र लगारी खद् दुग दीव हंकार । ६ परि-परि फींग बाँध लिटें पद करौं उबार ॥७ टिप्पणी-(१) जयो- १ व ।
१४४ छूटहिं। बाजहि जहाँ पाँक लगि फूटहिं ॥ (पद्मावत ५२४।१) में पाँककी व्युत्पत्ति पुन्तसे मान कर वासुदेवशरण अग्रवालने अथ में इसे पंख किया है। वृहद हिन्दी कोषमें इसे तीरके पीछेकी ओर का सिरा बताया गया है। ये दोनों अर्थ भी संगत नहीं हैं। अंजुमन- इस्लाम उर्दू रिसर्च इन्स्टीट्यूट (बम्बई) में एक समकालीन हिन्दी- अरबी-फारसी कोष की हस्तलिखित प्रति है। उसमें इस शब्दका अर्थ मुकीश बताया गया है। यही अर्थ ठीक भी है।
११५ (रीडींग्स ४३) सिफते रथे अनी गोबद (रथ-वर्णन) साजे रथ बितानहि कद्दे । सौ-सौ धानुक एक-एक चढ़े ॥१ हुके आय इनैं तहँ धनैं । तीन चार सै बभै गुनें ॥२ जोयन बीस गरथइ चलावहिं । खिन एक माँझ बहुरि तिहँ आवहिं ॥३ ठौर ठौर ले रन महँ घरे । जनु बोहित सागर महँ तिरे ॥४ रथ क अरथ ग्रह किन्हें कीन्हा । कर हर मुख जे सँहा दीन्हा ॥५ देख झझार राइ कै, गरबर रहे तँधाइ ।६ बहुत चले राइ औ राउत, पीइ छोक मो भाइ ॥७ टिप्पणी—(३) जोयन—योजन । (४) बोहित—जहाज । सावर—सागर ।
११६ (रीडींग्स ४४) सिफते पैकान महर (हथि वर्णन) गज गवनें डर साँसों मयउ । बासुकि (नाग) पतारहिं गयउ ॥१ झिंकत इंदरासन डर होई । कापहिं पाठ न अँगबइ कोई ॥२ घड़े महावत कसैं उपनारे । दाँत पतर मह छैंड़ सिंगारे ॥३
१४५ घोटहिं महावत आँकुस गहैं। पन कुंजरैं डर राख न रहैं ॥४ सावन मेघ ओनइ जनु रहे। पखरे कीनर परिखहिं पड़े ॥५ बीजु माँव घन परे, परे छाएँ रन आइ ।६ उठे खेह दर पौदर, सूरज गयउ सुझाइ ॥७ मूलपाठ—१—नाच । टिप्पणी—(१) औनइ—घिर । ११७ ( बम्बई ३६; रीफेण्ड्स * ) रूजे दुवम राय रूपचन्द कसदे हिसार करदन व बीरून आमदने महरा बग कदन उफ्तादन ( दूसरे दिन राव रूपचन्दका कुरांकी ओर आना और महरका युद्ध के लिए बाहर निकलना ) राउं रूपचन्द गढ़ होइ पावा¹ । राहैं महर दर आपुन सावा ॥१ फिर संजो भाँठहिं² हथबासा । फेंवरू धँवरू³ पाउ हुलासा ॥२ पाँठ कहा अर सोंको आही । मिया मरसि उठु घर बाही ॥३ फेंवरू तदपि सांड कें⁵ फाढ़ी । झेसस करी सम⁶ देखें ठाढ़ी ॥४ पाँठ वाफ खड़[ग*] गहि मारा। फिरें मामद⁷ धढ़ गयउ उपारा॥५ दीठि भुलान खड़ग वो चमका, हाथ फिरें हथ जोत ⁹ ।६ लाग गाँठ पाँटा कर, कँवरू गा भुइ लोट¹¹ ॥७ पाठान्तर—रीगेण्ट्स प्रति— शीर्षक—नमूदार शुदने हरदू फौज्हा ब हम कदंने कँवरू बा बाँटा व कुश्ता शुदने ऊ (दोनों सेनाओ का सामने सामने आना और कँवरू-बाँठा का युद्ध; कँवरूका मारा जाना) । १—रहा । २—यह शब्द छूटा है। ३—गाउ। ४—मंजोर। ५— ढाँड । ६—भागी। ७—ती। ८—मद । —को । ९—मग। ११—फिरे हाथ हथ जूट । १२—सुन । १
१४६ ११८ ( रीडीण्ड्स ७१ ) आगे कथने भैंबरू का चाँद व गुफ्तः शुदने भैंबरू ( भैंबरू-चाँद युद्ध ) भैंवरू देखा कँवरू परा। रोहतास जैसे परबरा ॥१ हाथ साँग मारसि तस आई। फिरें लाग धड़ गयठ जुझाई ॥२ फुनि झाड़सि बिजुरी तरबारा। ढाफ दइ कें हनसि कपारा ॥३ टूटि खाँड तातर सभ धावा। पीठि कहा हौं इहँ पै पावा ॥४ फुनि लेँहति काड़सि सरबानी। तँहुत माँठा चला परानी ॥५ खेदत उड़झा भैंबरू, परा दाव सँहराइ ।६ पलटि भाँठ जो देखा, तो बहुरि मारसि आइ॥७ , टिप्पणी—(१) साँग—एक प्रकारका भाला जो बहेंस्ते डोय अर्थात् ७-८ फुट लम्बा होता है और उसका सिरा ढाई फुट लम्बा और पतला होता है। उसका दण्ड भी बांसेका होता है। (अर्विन आमीं आफ द इण्डियन मुगल्स) (२) खेदत—पीछा करते हुए। उड़झा—ठोकर खाकर गिरा। ११९ ( रीडीण्ड्स ८ ) धादिदाना रखन दर लश्करे राव रूपचन्द अज हिरसते फौम ( राव रूपचन्दकी सेनामें विजयोल्लास ) साखी तार दीठ बन मार। और हँवर महरें के द्वार ॥१ दीठ आनें बांधि खपाई। पाँयक मठ फरहिं नवाई ॥२ रकत लहू है सरपर भग। एकौ कुँवर न आगे सरा ॥३ जिन्द देखा तिन्द गयठ परानों। डर सहँ फोट न करें पधानों ॥४ वे महर जेठनाग जिवाये। सगरैं पीर न काऊँ आये ॥५ मार कहा महर सों, शापैं ना यह बीर ।६ बग हँकार पठावहु, लोरक बावनबीर ॥७